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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

श्रूयतां तु प्रभो तत्त्वं दिव्यतां चात्मनो नृप । निर्माणं च शरीरस्य ततो धैर्यमवाप्नुहि ॥ ५ ॥ प्रभो! एक रहस्यकी बात सुनिये। नरेश्वर! आपका स्वरूप दिव्य है तथा आपके शरीरका निर्माण भी अद्भुत प्रकारसे हुआ है। यह हमलोगोंसे सुनकर धैर्य धारण कीजिये ॥ ५ ॥

पुरा त्वं तपसास्माभिर्लब्धो राजन् महेश्वरात् । पूर्वकायश्च पूर्वस्ते निर्मितो वज्रसंचयैः ॥ ६ ॥ राजन्! पूर्वकालमें हमलोगोंने तपस्याद्वारा भगवान् शंकरकी आराधना करके आपको प्राप्त किया था। आपके शरीरका पूर्वभाग—जो नाभिसे ऊपर है, वज्रसमूहसे बना हुआ है ॥ ६ ॥

अस्त्रैरभेद्यः शस्त्रैश्चाप्यधः कायश्च तेऽनघ । कृतः पुष्पमयो देव्या रूपतः स्त्रीमनोहरः ॥ ७ ॥ वह किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे विदीर्ण नहीं हो सकता। अनघ! उसी प्रकार आपका नाभिसे नीचेका शरीर पार्वतीदेवीने पुष्पमय बनाया है, जो अपने रूप-सौन्दर्यसे स्त्रियोंके मनको मोहनेवाला है ॥ ७ ॥

एवमीश्वरसंयुक्तस्तव देहो नृपोत्तम । देव्या च राजशार्दूल दिव्यस्त्वं हि न मानुषः ॥ ८ ॥

नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार आपका शरीर देवी पार्वतीके साथ साक्षात् भगवान् महेश्वरने संघटित किया है। अतः राजसिंह! आप मनुष्य नहीं, दिव्य पुरुष हैं॥ ८॥ क्षत्रियाश्च महावीर्या भगदत्तपुरोगमाः । दिव्यास्त्रविदुषः शूराः क्षपयिष्यन्ति ते रिपून् ॥ ९ ॥ भगदत्त आदि महापराक्रमी क्षत्रिय दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता तथा शौर्यसम्पन्न हैं। वे आपके शत्रुओंका संहार करेंगे।। तदलं ते विषादेन भयं तव न विद्यते । साहाय्यार्थं च ते वीराः सम्भूता भुवि दानवाः ॥ १० ॥ अतः आपको शोक करनेकी आवश्यकता नहीं है। आपको कोई भय नहीं है। आपकी सहायताके लिये बहुत-से वीर दानव भूतलपर प्रकट हो चुके हैं।। १० ।। भीष्मद्रोणकृपादींश्च प्रवेक्ष्यन्त्यपरेऽसुराः । यैराविष्टा घृणां त्यक्त्वा योत्स्यन्ते तव वैरिभिः ॥ ११ ॥ दूसरे भी अनेक असुर भीष्म, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य आदिके शरीरोंमें प्रवेश करेंगे, जिनसे आविष्ट होकर वे लोग दयाको त्यागकर आपके शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे ।। ११ ।। नैव पुत्रान् न च भ्रातॄन् न पितॄन् च बान्धवान् । नैव शिष्यान् न च ज्ञातीन् न बालात् स्थविरान् न च ॥ १२ ॥ युधि सम्प्रहरिष्यन्तो मोक्ष्यन्ति कुरुसत्तम । निःस्नेहा दानवाविष्टाः समाक्रान्तेऽन्तरात्मनि ॥ १३ ॥ कुरुश्रेष्ठ! दानवोंका आवेश होनेपर भीष्म, द्रोण आदिकी अन्तरात्मापर भी उन दानवोंका ही अधिकार हो जायगा। उस दशामें युद्धमें स्नेहरहित हो प्रहार करते हुए वे लोग पुत्रों, भाइयों, पितृजनों, बान्धवों, शिष्यों, कुटुम्बीजनों, बालकों तथा बूढ़ोंको भी नहीं छोड़ेंगे ।। प्रहरिष्यन्ति विवशाः स्नेहमुत्सृज्य दूरतः । हृष्टाः पुरुषशार्दूलाः कलुषीकृतमानसाः । अविज्ञानविमूढाश्च दैवाच्च विधिनिर्मितात् ॥ १४ ॥ वे पुरुषसिंह भीष्म आदि वीर (दानवोंके आवेशके कारण) विवश होकर अज्ञानसे मोहित हो जायँगे। उनके मनमें मलिनता आ जायगी और वे स्नेहको दूर छोड़कर प्रसन्नतापूर्वक अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा प्रहार करेंगे। इसमें विधिनिर्मित होनहार ही कारण है ॥ १४ ॥ व्याभाषमाणाश्चान्योन्यं न मे जीवन् विमोक्ष्यसे । सर्वे शस्त्रास्त्रमोक्षेण पौरुषे समवस्थिताः ॥ १५ ॥ श्लाघमानाः कुरुश्रेष्ठ करिष्यन्ति जनक्षयम् ।

एक-दूसरेके विरुद्ध भाषण करते हुए वे सब योद्धा कहेंगे—'आज तू मेरे हाथोंसे जीवित नहीं बच सकता।' कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार सभी अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए पराक्रमपर डटे रहेंगे और परस्पर होड़ लगाकर जनसंहार करेंगे ।। १५१/२ ।। तेऽपि पञ्च महात्मानः प्रतियोत्स्यन्ति पाण्डवाः ।। १६ ।। वधं चैषां करिष्यन्ति दैवयुक्ता महाबलाः । वे दैवप्रेरित महाबली महात्मा पाँचों पाण्डव भी इन भीष्म आदिका सामना करते हुए इनका वध करेंगे ।। १६१/२ ।। दैत्यरक्षोगणाश्चैव सम्भूताः क्षत्रयोनिषु ।। १७ ।। योत्स्यन्ति युधि विक्रम्य शत्रुभिस्तव पार्थिव । गदाभिर्मुसलैः शूलैः शस्त्रैरुच्चावचैस्तथा ।। १८ ।। (प्रहरिष्यन्ति ते वीरास्तवारिषु महाबलाः ।) राजन्! दैत्यों तथा राक्षसोंके समुदाय क्षत्रिययोनिमें उत्पन्न हुए हैं, जो आपके शत्रुओंके साथ पराक्रमपूर्वक युद्ध करेंगे। वे महाबली वीर दैत्य आपके शत्रुओंपर गदा, मुसल, शूल तथा अन्य छोटे-बड़े अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा प्रहार करेंगे ।। १७-१८ ।। यच्च तेऽन्तर्गतं वीर भयमर्जुनसम्भवम् । तत्रापि विहितोऽस्माभिर्वधोपायोऽर्जुनस्य वै ।। १९ ।। वीर! आपके भीतर जो अर्जुनका भय समाया हुआ है, वह भी निकाल देना चाहिये; क्योंकि हमलोगोंने अर्जुनके वधका उपाय भी कर लिया है ।। १९ ।। हतस्य नरकस्यात्मा कर्णमूर्तिमुपाश्रितः । तद् वैरं संस्मरन् वीर योत्स्यते केशवार्जुनौ ।। २० ।। श्रीकृष्णके हाथों जो नरकासुर मारा गया है, उसकी आत्मा कर्णके शरीरमें घुस गयी है। वीरवर! वह (नरकासुर) उस वैरको याद करके श्रीकृष्ण और अर्जुनसे युद्ध करेगा ।। २० ।। स ते विक्रमशौटीरो रणे पार्थं विजेष्यति । कर्णः प्रहरतां श्रेष्ठः सर्वांश्चारीन् महारथः ।। २१ ।। महारथी कर्ण योद्धाओंमें श्रेष्ठ और अपने पराक्रमपर गर्व रखनेवाला है। वह रणभूमिमें अर्जुन तथा आपके अन्य सब शत्रुओंपर अवश्य विजयी होगा ।। २१ ।। ज्ञात्वैतच्छद्मना वज्री रक्षार्थं सव्यसाचिनः । कुण्डले कवचं चैव कर्णस्यापहरिष्यति ।। २२ ।। इस बातको समझकर वज्रधारी इन्द्र अर्जुनकी रक्षाके लिये छल करके कर्णके कुण्डल और कवचका अपहरण कर लेंगे ।। २२ ।। तस्मादस्माभिरप्यत्र दैत्याः शतसहस्रशः । नियुक्ता राक्षसाश्चैव ये ते संशप्तका इति ।। २३ ।।

प्रख्यातास्तेऽर्जुनं वीरं हनिष्यन्ति च मा शुचः । असपत्ना त्वया हीयं भोक्तव्या वसुधा नृप ॥ २४ ॥ इसीलिये हमलोगोंने भी एक लाख दैत्यों तथा राक्षसोंको इस काममें लगा रखा है, जो संशप्तक नामसे विख्यात हैं। वे वीर अर्जुनको मार डालेंगे। अतः आप शोक न करें। नरेश्वर! आपको इस पृथ्वीका निष्कंटक राज्य भोगना है ॥ २३-२४ ॥

मा विषादं गमस्तस्मान्नैतत्त्वय्युपपद्यते । विनष्टे त्वयि चास्माकं पक्षो हीयेत कौरव ॥ २५ ॥ अतः कुरुनन्दन! आप विषाद न करें। यह आपको शोभा नहीं देता है। आपके नष्ट हो जानेपर तो हमारे पक्षका ही नाश हो जायगा ॥ २५ ॥

गच्छ वीर न ते बुद्धिरन्या कार्या कथञ्चन । त्वमस्माकं गतिर्नित्यं देवतानां च पाण्डवाः ॥ २६ ॥ वीरवर! जाइये। अब आपको किसी तरह भी अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। देखिये, देवताओंने पाण्डवोंका आश्रय ले रखा है; परंतु हमारी गति तो सदा आप ही हैं ॥ २६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा परिष्वज्य दैत्यास्तं राजकुञ्जरम् । समाश्वास्य च दुर्धर्षं पुत्रवद् दानवर्षभाः ॥ २७ ॥ स्थिरां कृत्वा बुद्धिमस्य प्रियाण्युक्त्वा च भारत । गम्यतामित्यनुज्ञाय जयमाप्नुहि चेत्यथ ॥ २८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! दुर्धर्ष वीर नृपशिरोमणि दुर्योधनसे ऐसा कहकर दैत्यों तथा दानवेश्वरोंने उसे पुत्रकी भाँति हृदयसे लगाया और आश्वासन देकर उसकी बुद्धिको स्थिर किया। भारत! तत्पश्चात् प्रिय वचन बोलकर उन्होंने दुर्योधनको जानेके लिये आज्ञा देते हुए कहा—'अब आप जाइये और शत्रुओंपर विजय प्राप्त कीजिये' ॥ २७-२८ ॥

तैर्विसृष्टं महाबाहुं कृत्या सैवानयत् पुनः । तमेव देशं यत्रासौ तदा प्रायमुपाविशत् ॥ २९ ॥ दैत्योंके विदा करनेपर उसी कृत्याने महाबाहु दुर्योधनको पुनः उसी स्थानपर पहुँचा दिया, जहाँ वह पहले आमरण उपवासके लिये बैठा था ॥ २९ ॥

प्रतिनिक्षिप्य तं वीरं कृत्या समभिपूज्य च । अनुज्ञाता च राज्ञा सा तथैवान्तरधीयत ॥ ३० ॥ वीर राजा दुर्योधनको वहाँ रखकर कृत्याने उसके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया और उससे आज्ञा लेकर जैसे आयी थी, वैसे ही अदृश्य हो गयी ॥ ३० ॥

गतायामथ तस्यां तु राजा दुर्योधनस्तदा ।
स्वप्रभूतमिदं सर्वमचिन्तयत भारत ॥ ३१ ॥
(सम्पृश्य तानि वाक्यानि दानवोक्तानि दुर्मतिः ।)
विजेष्यामि रणे पाण्डूनिति चास्याभवन्मतिः ।
भारत! कृत्याके चले जानेपर राजा दुर्योधनने इन सारी बातोंको स्वप्न समझा। दैत्योंके कहे हुए वचनोंपर विचार करके दुर्बुद्धि दुर्योधनके मनमें यह संकल्प उदित हुआ कि 'मैं युद्धमें पाण्डवोंको जीत लूँगा' ॥ ३१ ½ ॥
कर्णं संशप्तकांश्चैव पार्थस्यामित्रघातिनः ॥ ३२ ॥
अमन्यत वधे युक्तान् समर्थांश्च सुयोधनः ।
दुर्योधनने यह मान लिया कि संशप्तकगण तथा कर्ण ये शत्रुघाती अर्जुनके वधमें लगे हुए हैं और इसके लिये वे समर्थ हैं ॥ ३२ ½ ॥
एवमाशा दृढा तस्य धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥ ३३ ॥
विनिर्जये पाण्डवानांमभवद् भरतर्षभ ।
जनमेजय! इस प्रकार उस खोटी बुद्धिवाले धृतराष्ट्रपुत्रके मनमें पाण्डवोंपर विजय पानेकी दृढ़ आशा हो गयी ॥ ३३ ½ ॥
कर्णोऽप्याविष्टचित्तात्मा नरकस्यान्तरात्मना ॥ ३४ ॥
अर्जुनस्य वधे क्रूरां करोति स्म तदा मतिम् ।
इधर कर्ण भी नरकासुरकी अन्तरात्मासे आविष्टचित्त होनेके कारण अर्जुनका वध करनेके लिये क्रूरतापूर्ण संकल्प करने लगा ॥ ३४ ½ ॥
संशप्तकाश्च ते वीरा राक्षसाविष्टचेतसः ॥ ३५ ॥
रजस्तमोभ्यामाक्रान्ताः फाल्गुनस्य वधैषिणः ।
इसी प्रकार राक्षसोंसे आविष्टचित्त होकर वे संशप्तक वीर भी रजोगुण और तमोगुणसे आक्रान्त हो अर्जुनको मार डालनेकी इच्छा रखने लगे ॥ ३५ ½ ॥
भीष्मद्रोणकृपाद्याश्च दानवाक्रान्तचेतसः ॥ ३६ ॥
न तथा पाण्डुपुत्राणां स्नेहवन्तो विशाम्पते ।
राजन्! भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिके मनपर भी दानवोंने अधिकार कर लिया था। अतः पाण्डवोंके प्रति उनका भी वैसा स्नेह नहीं रह गया ॥ ३६ ½ ॥
(कृत्ययाऽऽनाय्यकथितं यत् तस्यां निशि दानवैः ।)
न चाचचक्षे कस्मैचिदेतद् राजा सुयोधनः ॥ ३७ ॥
दानवोंने रातमें कृत्याद्वारा अपने यहाँ बुलाकर जो बातें कही थीं, उन्हें राजा दुर्योधनने किसीपर भी प्रकट नहीं किया ॥ ३७ ॥
दुर्योधनं निशान्ते च कर्णो वैकर्तनोऽब्रवीत् ।

स्मयन्निवाञ्जलिं कृत्वा पार्थिवं हेतुमद् वचः ॥ ३८ ॥ वह रात बीतनेपर सूर्यपुत्र कर्णने आकर राजा दुर्योधनसे हाथ जोड़ मुसकराते हुए यह युक्तियुक्त वचन कहा— ॥ ३८ ॥

न मृतो जयते शत्रूञ्जीवन् भद्राणि पश्यति । मृतस्य भद्राणि कुतः कौरवेय कुतो जयः ॥ ३९ ॥ ‘कुरुनन्दन! मरा हुआ मनुष्य कभी शत्रुओंपर विजय नहीं पाता। जो जीवित रहता है वह कभी सुखके दिन भी देखता है। मरे हुए को कहाँ सुख और कहाँ विजय? ॥ ३९ ॥

न कालोऽद्य विषादस्य भयस्य मरणस्य वा । परिष्वज्याब्रवीच्चैनं भुजाभ्यां स महाभुजः ॥ ४० ॥ ‘यह समय शोक मनाने, भयभीत होने अथवा मरनेका नहीं है’, यह कहकर महाबाहु कर्णने दोनों भुजाओंसे खींचकर दुर्योधनको हृदयसे लगा लिया और कहा— ॥ ४० ॥

उत्तिष्ठ राजन् किं शेषे कस्माच्छोचसि शत्रुहन् । शत्रून् प्रताप्य वीर्येण स कथं मृत्युमिच्छसि ॥ ४१ ॥ ‘शत्रुघाती नरेश! उठो, क्यों सो रहे हो? किसलिये शोक करते हो? अपने पराक्रमसे शत्रुओंको संतप्त करके अब मृत्युकी इच्छा क्यों करते हो? ॥ ४१ ॥

अथवा ते भयं जातं दृष्ट्वार्जुनपराक्रमम् । सत्यं ते प्रतिजानामि वधिष्यामि रणेऽर्जुनम् ॥ ४२ ॥ ‘अथवा यदि तुम्हें अर्जुनका पराक्रम देखकर भय हो गया हो तो मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि मैं युद्धमें अर्जुनको अवश्य मार डालूँगा ॥ ४२ ॥

गते त्रयोदशे वर्षे सत्येनायुधमालभे । आनयिष्याम्यहं पार्थान् वशं तव जनाधिप ॥ ४३ ॥ ‘महाराज! मैं धनुष छूकर सचाईके साथ यह शपथ ग्रहण करता हूँ कि तेरहवाँ वर्ष व्यतीत होते ही पाण्डवोंको तुम्हारे वशमें ला दूँगा’ ॥ ४३ ॥

एवमुक्तस्तु कर्णेन दैत्यानां वचनात् तथा । प्रणिपातेन चाप्येषामुदतिष्ठत् सुयोधनः ॥ ४४ ॥ कर्णके ऐसा कहनेपर और इन दुःशासन आदि भाइयोंके प्रणामपूर्वक अनुनय-विनय करनेपर दैत्योंके वचनोंका स्मरण करके दुर्योधन अपने आसनसे उठ खड़ा हुआ ॥ ४४ ॥

दैत्यानां तद् वचः श्रुत्वा हृदि कृत्वा स्थिरां मतिम् । ततो मनुजशार्दूलो योजयामास वाहिनीम् ॥ ४५ ॥ रथनागाश्वकलिलां पदातिजनसंकुलाम् । गङ्गौघप्रतिमा राजन् सा प्रयाता महाचमूः ॥ ४६ ॥ दैत्योंके पूर्वोक्त कथनको याद करके नरश्रेष्ठ दुर्योधनने पाण्डवोंसे युद्ध करनेका पक्का विचार कर लिया और फिर हस्तिनापुर जानेके लिये रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकोंसे

युक्त अपनी चतुरंगिणी सेनाको तैयार होनेकी आज्ञा दी। राजन्! वह विशाल वाहिनी गंगाके प्रवाहके समान चलने लगी ॥ ४५-४६ ॥

श्वेतच्छत्रैः पताकाभिश्चामरैश्च सुपाण्डुरैः । रथैर्नागैः पदातैश्च शुशुभेऽतीव संकुला ॥ ४७ ॥ व्यपेताभ्रघने काले द्यौरिवाव्यक्तशारदी ।

श्वेत छत्र, पताका, शुभ चँवर, रथ, हाथी और पैदल योद्धाओंसे भरी हुई वह कौरव-सेना शरत्कालमें कुछ-कुछ व्यक्त शारदीय सुषमासे सुशोभित आकाशकी भाँति शोभा पा रही थी ॥ ४७१/२ ॥

जयाशीर्भिर्द्विजेन्द्रैः स स्तूयमानोऽधिराजवत् ॥ ४८ ॥ गृह्णन्नञ्जलिमालाश्च धार्तराष्ट्रो जनाधिपः । सुयोधनो ययावग्रे श्रिया परमया ज्वलन् ॥ ४९ ॥

धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन सम्राट्की भाँति श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके मुखसे विजयसूचक आशीर्वादोंके साथ अपनी स्तुति सुनता तथा लोगोंकी प्रणामाञ्जलियोंको ग्रहण करता हुआ उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित हो आगे-आगे चला ॥ ४८-४९ ॥

कर्णेन सार्धं राजेन्द्र सौबलेन च देविना । दुःशासनादयश्चास्य भ्रातरः सर्व एव ते ॥ ५० ॥ भूरिश्रवाः सोमदत्तो महाराजश्च बाह्निकः । रथैर्नानाविधाकारैर्हयैर्गजवरैस्तथा ॥ ५१ ॥ प्रयान्तं नृपसिंहं तमनुजग्मुः कुरूद्वहाः । कालेनाल्पेन राजेन्द्र स्वपुरं विविशुस्तदा ॥ ५२ ॥

राजेन्द्र! कर्ण तथा द्यूतकुशल शकुनिके साथ दुःशासन आदि सब भाई, भूरिश्रवा, सोमदत्त तथा महाराज बाह्लीक—ये सभी कुरुकुलरत्न नाना प्रकारके रथों, गजराजों तथा घोड़ोंपर बैठकर राजसिंह दुर्योधनके पीछे-पीछे चल रहे थे। जनमेजय! थोड़े समयमें उन सबने अपनी राजधानी हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ॥ ५०—५२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनपुरप्रवेशे द्विपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनका नगरमें प्रवेशविषयक दो सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५२ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ११/२ श्लोक मिलाकर कुल ५३ १/२ श्लोक हैं)

२५३-

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान

जनमेजय उवाच

वसमानेषु पार्थेषु वने तस्मिन् महात्मसु ।
धार्तराष्ट्रा महेष्वासाः किमकुर्वत सत्तमाः ॥ १ ॥
जनमेजय बोले— मुने! जब महात्मा पाण्डव उस वनमें निवास करते थे, उन दिनों महान् धनुर्धर नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र-पुत्रोंने क्या किया? ॥ १ ॥

कर्णो वैकर्तनश्चैव शकुनिश्च महाबलः ।
भीष्मद्रोणकृपाश्चैव तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ २ ॥
सूर्यपुत्र कर्ण, महाबली शकुनि, भीष्म, द्रोण तथा कृपाचार्य—इन सबने कौन-सा कार्य किया? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं गतेषु पार्थेषु विसृष्टे च सुयोधने ।
आगते हास्तिनपुरं मोक्षिते पाण्डुनन्दनैः ॥ ३ ॥
भीष्मोऽब्रवीन्महाराज धार्तराष्ट्रमिदं वचः ।
वैशम्पायनजीने कहा— महाराज! पाण्डवोंद्वारा गन्धर्वोंसे छुटकारा मिल जानेपर जब दुर्योधन विदा होकर हस्तिनापुर पहुँच गया और पाण्डव जाकर पूर्ववत् वनमें ही रहने लगे तब भीष्मजीने धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे यह बात कही— ॥ ३ १/२ ॥

उक्तं तात यथा पूर्वं गच्छतस्ते तपोवनम् ॥ ४ ॥
गमनं मे न रुचितं तव तत्र कृतं च ते ।
‘तात! तुम्हारे तपोवन जाते समय जैसा कि मैंने पहले ही कह दिया था, वही आज भी कह रहा हूँ। मुझे तुम्हारा वहाँ जाना अच्छा नहीं लगा और वहाँ जाकर तुमने जो कुछ किया, वह भी पसंद नहीं आया ॥ ४ १/२ ॥

ततः प्राप्तं त्वया वीर ग्रहणं शत्रुभिर्बलात् ॥ ५ ॥
मोक्षितश्चासि धर्मज्ञैः पाण्डवैर्न च लज्जसे ।
‘वीर! शत्रुओंने तुम्हें वहाँ बलपूर्वक बंदी बना लिया और धर्मज्ञ पाण्डवोंने तुम्हें उस संकटसे छुड़ाया है। क्या अब भी तुम्हें लज्जा नहीं आती? ॥ ५ १/२ ॥

प्रत्यक्षं तव गान्धारे ससैन्यस्य विशाम्पते ॥ ६ ॥
सूतपुत्रोऽपयाद् भीतो गन्धर्वाणां तदा रणात् ।
‘गान्धारीनन्दन! सेनासहित तुम्हारे सामने ही सूतपुत्र कर्ण गन्धर्वोंसे भयभीत हो युद्धभूमिसे भाग निकला ॥ ६ १/२ ॥

क्रोशस्रस्तव राजेन्द्र ससैन्यस्य नृपात्मज ॥ ७ ॥
दृष्टस्ते विक्रमश्चैव पाण्डवानां महात्मनाम् ।

राजेन्द्र! राजकुमार! जब सेनासहित तुम चीखते-चिल्लाते रहे उस समय महात्मा पाण्डवोंने जो पराक्रम कर दिखाया था वह भी तुमने प्रत्यक्ष देखा है ।। ७ १/२ ।। कर्णस्य च महाबाहो सूतपुत्रस्य दुर्मतेः ॥ ८ ॥ न चापि पादभाक् कर्णः पाण्डवानां नृपोत्तम । धनुर्वेदे च शौर्ये च धर्मे वा धर्मवत्सल ॥ ९ ॥ महाबाहो! उस समय खोटी बुद्धिवाले सूतपुत्र कर्णका पराक्रम भी तुमसे छिपा नहीं था। नृपश्रेष्ठ! धर्मवत्सल! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि धनुर्वेद, शौर्य और धर्माचरणमें कर्ण पाण्डवोंकी अपेक्षा चौथाई योग्यता भी नहीं रखता है ।। ८-९ ।। तस्मादहं क्षमं मन्ये पाण्डवैस्तैर्महात्मभिः । संधिं संधिविदां श्रेष्ठ कुलस्यास्य विवृद्धये ॥ १० ॥ ‘अतः संधिवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नरेश! मैं तो इस कुलके अभ्युदयके लिये उन महात्मा पाण्डवोंके साथ संधि कर लेना ही उचित समझता हूँ’ ।। १० ।। एवमुक्तश्च भीष्मेण धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः । प्रहस्य सहसा राजन् विप्रतस्थे ससौबलः ॥ ११ ॥ राजन्! भीष्मके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधन हँस पड़ा और शकुनिके साथ सहसा वहाँसे अन्यत्र चला गया ।। ११ ।। तं तु प्रस्थितमाज्ञाय कर्णदुःशासनादयः । अनुजग्मुर्महेष्वासा धार्तराष्ट्रं महाबलम् ॥ १२ ॥ महाबली दुर्योधनको अन्यत्र गया जान कर्ण और दुःशासन आदि महान् धनुर्धरोंने उसका अनुसरण किया ।। १२ ।। तांस्तु सम्प्रस्थितान् दृष्ट्वा भीष्मः कुरुपितामहः । लज्जया व्रीडितो राजन् जगाम स्वं निवेशनम् ॥ १३ ॥ राजन्! उन सबको वहाँसे प्रस्थान करते देख कुरुकुलपितामह भीष्म लज्जित होकर अपने आवास-स्थानको चले गये ।। १३ ।। गते भीष्मे महाराज धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः । पुनरागम्य तं देशममन्त्रयत मन्त्रिभिः ॥ १४ ॥ महाराज! भीष्मके चले जानेपर राजा दुर्योधन फिर उसी स्थानपर लौट आया और अपने मन्त्रियोंके साथ गुप्त मन्त्रणा करने लगा— ।। १४ ।। किमस्माकं भवेच्छ्रेयः किं कार्यमवशिष्यते । कथं च सुकृतं तत् स्यान्मन्त्रयामोऽद्य यद्धितम् ॥ १५ ॥ ‘मित्रो! क्या करनेसे हमलोगोंकी भलाई होगी? हमारे लिये कौन-सा कार्य शेष रह गया है? कैसे करनेसे हमारा कार्य शुभ परिणामजनक होगा? क्या करनेमें हमारा हित है? आज इसी विषयपर हमलोगोंको विचार करना है’ ।। १५ ।।

कर्ण उवाच

दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ।
भीष्मोऽस्मान् निन्दति सदा पाण्डवांश्च प्रशंसति ॥ १६ ॥
**कर्ण बोला—**कुरुकुलरत्न दुर्योधन! मैं तुमसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसपर ध्यान दो। भीष्म सदा हमारी निन्दा और पाण्डवोंकी प्रशंसा करते रहते हैं ॥ १६ ॥

त्वद् द्वेषाच्च महाबाहो ममापि द्वेष्टुमर्हति ।
विगर्हते च मां नित्यं त्वत्समीपे नरेश्वर ॥ १७ ॥
महाबाहो! वे तुम्हारे प्रति द्वेष होनेसे मुझसे भी द्वेष रखते हैं। नरेश्वर! तुम्हारे सामने वे सदा मेरी निन्दा ही किया करते हैं ॥ १७ ॥

सोऽहं भीष्मवचस्तद् वै न मृष्यामीह भारत ।
त्वत्समक्षं यदुक्तं च भीष्मेणामित्रकर्षण ॥ १८ ॥
पाण्डवानां यशो राजंस्तव निन्दां च भारत ।
अनुजानीहि मां राजन् सभृत्यबलवाहनम् ॥ १९ ॥
भारत! तुम्हारे सामने भीष्मने जो कुछ कहा है, उसे मैं सहन नहीं कर सकता। शत्रुदमन! भरतकुलनन्दन! उन्होंने जो पाण्डवोंका यश गाया और तुम्हारी निन्दा की है, यह मेरे लिये असह्य है। अतः तुम मुझे सेवक, सेना तथा सवारियोंके साथ दिग्विजय करनेकी आज्ञा दो ॥

जेष्यामि पृथिवीं राजन् सशैलवनकाननाम् ।
जिता च पाण्डवैर्भूमिश्चतुर्भिर्बलशालिभिः ॥ २० ॥
तामहं ते विजेष्यामि एक एव न संशयः ।
सम्पश्यतु सुदुर्बुद्धिर्भीष्मः कुरुकुलाधमः ॥ २१ ॥
राजन्! मैं पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वीको जीत लूँगा। जिस भूमिपर चार बलशाली पाण्डवोंने मिलकर विजय पायी है उसे मैं तुम्हारे लिये अकेला ही जीत लूँगा, इसमें संशय नहीं है। खोटी बुद्धिवाला कुरु-कुलाधम भीष्म मेरे इस पराक्रमको अपनी आँखों देखे ॥

अनिन्द्यं निन्दते यो हि अप्रशंस्यं प्रशंसति ।
स पश्यतु बलं मेऽद्य आत्मानं तु विगर्हतु ॥ २२ ॥
जो अनिन्दनीयकी निन्दा और अप्रशंसनीयकी प्रशंसा करता है, वह भीष्म आज मेरा बल देख ले और अपने-आपको धिक्कारे ॥ २२ ॥

अनुजानीहि मां राजन् ध्रुवो हि विजयस्तव ।
प्रतिजानामि ते सत्यं राजन्नायुधमालभे ॥ २३ ॥
राजन्! मुझे आज्ञा दो। तुम्हारी विजय निश्चित है। यह मैं तुमसे प्रतिज्ञापूर्वक सत्य कहता हूँ और शस्त्र छूकर शपथ करता हूँ ॥ २३ ॥

तच्छ्रुत्वा तु वचो राजन् कर्णस्य भरतर्षभ । प्रीत्या परमया युक्तः कर्णमाह नराधिपः ॥ २४ ॥ भरतश्रेष्ठ राजन्! कर्णकी यह बात सुनकर राजा दुर्योधनने बड़ी प्रसन्नताके साथ उससे कहा— ॥ २४ ॥

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे त्वं महाबलः । हितेषु वर्तसे नित्यं सफलं जन्म चाद्य मे ॥ २५ ॥ ‘वीर! मैं धन्य हूँ, तुम्हारे अनुग्रहका पात्र हूँ; क्योंकि तुम-जैसे महाबली सुहृद् सदा मेरे हितसाधनमें लगे रहते हैं। आज मेरा जन्म सफल हो गया ॥ २५ ॥

यदा च मन्यसे वीर सर्वशत्रुनिबर्हणम् । तदा निर्गच्छ भद्रं ते ह्यनुशाधि च मामिति ॥ २६ ॥ ‘वीरवर! जब तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे द्वारा सब शत्रुओंका संहार हो सकता है तब तुम दिग्विजयके लिये यात्रा करो। तुम्हारा कल्याण हो। मुझे आवश्यक व्यवस्थाके लिये आज्ञा दो ॥ २६ ॥

एवमुक्तस्तदा कर्णो धार्तराष्ट्रेण धीमता । सर्वमाज्ञापयामास प्रायात्रिकमरिंदम ॥ २७ ॥ जनमेजय! बुद्धिमान् दुर्योधनके इस प्रकार कहनेपर कर्णने यात्रासम्बन्धी सारी आवश्यक तैयारीके लिये आज्ञा दे दी ॥ २७ ॥

प्रययौ च महेष्वासो नक्षत्रे शुभदैवते । शुभे तिथौ मुहूर्ते च पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥ २८ ॥ मङ्गलैश्च शुभैः स्नातो वाग्भिश्चापि प्रपूजितः । नादयन् रथघोषेण त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ २९ ॥ तदनन्तर महान् धनुर्धर कर्णने मांगलिक शुभ पदार्थोंसे जलके द्वारा स्नान करके द्विजातियोंकी आशीर्वादमय वाणीसे सम्मानित एवं प्रशंसित हो शुभ नक्षत्र, शुभ तिथि और शुभ मुहूर्तमें यात्रा की। उस समय वह अपने रथकी घर्घराहटसे चराचर भूतोंसहित समस्त त्रिलोकीको प्रतिध्वनित कर रहा था ॥ २८-२९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदिग्विजये त्रिपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णदिग्विजयविषयक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५३ ॥

२५४-

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चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

कर्णके द्वारा सारी पृथ्वीपर दिग्विजय और हस्तिनापुरमें उसका सत्कार

वैशम्पायन उवाच

ततः कर्णो महेष्वासो बलेन महता वृतः ।
द्रुपदस्य पुरं रम्यं रुरोध भरतर्षभ ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तदनन्तर महाधनुर्धर कर्णने अपनी विशाल सेनाके साथ जाकर राजा द्रुपदके रमणीय नगरको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १ ॥

युद्धेन महता चैनं चक्रे वीरं वशानुगम् ।
सुवर्णं रजतं चापि रत्नानि विविधानि च ॥ २ ॥
करं च दापयामास द्रुपदं नृपसत्तम ।
तं विनिर्जित्य राजेन्द्र राजानस्तस्य येऽनुगाः ॥ ३ ॥
तान् सर्वान् वशगांश्चक्रे करं चैनानदापयत् ।
फिर महान् युद्ध करके उसने वीर द्रुपदको अपने वशमें कर लिया और उन्हें सोना, चाँदी, भाँति-भाँतिके रत्न एवं कर देनेके लिये विवश किया। नृपश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! इस प्रकार द्रुपदको जीतकर कर्णने उनके अनुयायी नरेशोंको भी अपने अधीन कर लिया और उन सबसे भी कर वसूल किया ॥ २-३½ ॥

अथोत्तरां दिशं गत्वा वशे चक्रे नराधिपान् ॥ ४ ॥
भगदत्तं च निर्जित्य राधेयो गिरिमारुहत् ।
हिमवन्तं महाशैलं युध्यमानश्च शत्रुभिः ॥ ५ ॥
प्रययौ च दिशः सर्वान् नृपतीन् वशमानयत् ।
स हैमवतिकान् जित्वा करं सर्वानदापयत् ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् उसने उत्तर दिशामें जाकर वहाँके राजाओंको अपने वशमें कर लिया। भगदत्तको जीतकर राधानन्दन कर्ण शत्रुओंसे युद्ध करता हुआ महान् पर्वत हिमालयपर आरूढ़ हुआ। वहाँसे सब दिशाओंमें जाकर उसने समस्त राजाओंको अपने अधीन किया और हिमालयप्रदेशके समस्त भूपालोंको जीतकर उनसे कर लिया ॥ ४—६ ॥

नेपालविषये ये च राजानस्तानवाजयत् ।
अवतीर्य ततः शैलात् पूर्वा दिशमभिद्रुतः ॥ ७ ॥
तदनन्तर नेपालदेशमें जो राजा थे, उनपर भी विजय प्राप्त की, फिर हिमालय पर्वतसे उतरकर उसने पूर्व दिशाकी ओर धावा किया ॥ ७ ॥

अङ्गान् वङ्गान् कलिङ्गांश्च शुण्डिकान् मिथिलानथ । मागधान् कर्कखण्डांश्च निवेश्य विषयेऽऽत्मनः ॥ ८ ॥ आवशीरंश्च योध्यांश्च अहिक्षत्रं च निर्जयत् । पूर्वां दिशं विनिर्जित्य वत्सभूमिं तथागमत् ॥ ९ ॥ अंग, वंग, कलिंग, शुण्डिक, मिथिला, मगध और कर्कखण्ड—इन सब देशोंको अपने राज्यमें मिलाकर कर्णने आवशीर, योध्य और अहिक्षत्र देशको भी जीत लिया। इस प्रकार पूर्व दिशापर विजय प्राप्त करके उसने वत्सभूमिमें पदार्पण किया ॥ ८-९ ॥ वत्सभूमिं विनिर्जित्य केवलां मृत्तिकावतीम् । मोहनं पत्तनं चैव त्रिपुरीं कोसलां तथा ॥ १० ॥ एतान् सर्वान् विनिर्जित्य करमादाय सर्वशः । वत्सभूमिको जीतकर कर्णने केवला, मृत्तिकावती, मोहन, पत्तन, त्रिपुरी तथा कोसला—इन सब देशोंको अपने अधिकारमें किया और सबसे कर लेकर (दक्षिण दिशाकी ओर) प्रस्थान किया ॥ १० १/२ ॥ दक्षिणां दिशमास्थाय कर्णो जित्वा महारथान् ॥ ११ ॥ रुक्मिणं दाक्षिणात्येषु योधयामास सूतजः । स युद्धं तुमुलं कृत्वा रुक्मी प्रोवाच सूतजम् ॥ १२ ॥ दक्षिण दिशामें पहुँचकर कर्णने बड़े-बड़े महारथियोंको जीता। दाक्षिणात्योमें रुक्मीके साथ कर्णने युद्ध किया। रुक्मीने पहले तो बड़ा भयंकर युद्ध किया, फिर उसने सूतपुत्र कर्णसे कहा ॥ ११-१२ ॥ प्रीतोऽस्मि तव राजेन्द्र विक्रमेण बलेन च । न ते विघ्नं करिष्यामि प्रतिज्ञां समपालयम् ॥ १३ ॥ ‘राजेन्द्र! मैं तुम्हारे बल और पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हारे कार्यमें विघ्न नहीं डालूँगा। थोड़ी देर युद्ध करके मैंने केवल क्षत्रियधर्मका पालन किया है ॥ १३ ॥ प्रीत्या चाहं प्रयच्छामि हिरण्यं यावदिच्छसि । समेत्य रुक्मिणा कर्णः पाण्ड्यंशैलं च सोऽगमत् ॥ १४ ॥ ‘तुम जितना सोना ले जाना चाहो उतना मैं प्रसन्नतापूर्वक दे रहा हूँ।’ इस प्रकार रुक्मीसे मिलकर कर्णने पाण्ड्यदेश तथा श्रीशैलकी ओर प्रस्थान किया ॥ स केरलं रणे चैव नीलं चापि महीपतिम् । वेणुदारिसुतं चैव ये चान्ये नृपसत्तमाः ॥ १५ ॥ दक्षिणस्यां दिशि नृपान् करान् सर्वानदापयत् । उसने रणभूमिमें केरल नरेश, राजा नील तथा वेणुदारिपुत्रको हराया और दक्षिण दिशामें अन्य जितने प्रमुख भूपाल थे, उन सबको जीतकर उनसे कर वसूल किया ॥ १५ १/२ ॥

शैशुपालिं ततो गत्वा विजिग्ये सूतनन्दनः ।। १६ ।।
पार्श्वस्थांश्चापि नृपतीन् वशे चक्रे महाबलः ।
इसके बाद सूतपुत्र महाबली कर्णने चेदिदेशमें जाकर शिशुपालके पुत्रको हराया और उसके पार्श्ववर्ती नरेशोंको भी अपने अधीन कर लिया ।। १६½ ।।
आवन्त्यांश्च वशे कृत्वा साम्ना च भरतर्षभ ।
वृष्णिभिः सह संगम्य पश्चिमामपि निर्जयत् ।। १७ ।।
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर उसने सामनीतिके द्वारा अवन्तीदेशके राजाओंको वशमें करके वृष्णिवंशी यादवोंसे हिल-मिलकर पश्चिम दिशापर भी विजय प्राप्त की ।। १७ ।।
वारुणीं दिशमागम्य यवनान् बर्बरांस्तथा ।
नृपान् पश्चिमभूमिस्थान् दापयामास वै करान् ।। १८ ।।
इसके बाद पश्चिम दिशामें जाकर यवन तथा बर्बर राजाओंको, जो पश्चिम देशके ही निवासी थे, पराजित करके उनसे कर लिया ।। १८ ।।
विजित्य पृथिवीं सर्वां स पूर्वापरदक्षिणाम् ।
सम्लेच्छाटविकान् वीरः सपर्वतनिवासिनः ।। १९ ।।
भद्रान् रोहितकांश्चैव आग्रेयान् मालवानपि ।
गणान् सर्वान् विनिर्जित्य नीतिकृत् प्रहसन्निव ।। २० ।।
शशकान् यवनांश्चैव विजिग्ये सूतनन्दनः ।
इस प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण सब दिशाओंकी समूची पृथ्वीको जीतकर म्लेच्छ, वनवासी, पर्वतीय, भद्र, रोहितक, आग्नेय तथा मालव आदि समस्त गणराज्योंको परास्त किया। इसके बाद नीतिके अनुसार काम करनेवाले सूतनन्दन कर्णने हँसते-हँसते शशक और यवन राजाओंको भी जीत लिया ।। १९-२०½ ।।
नग्नजित्प्रमुखांश्चैव गणान् जित्वा महारथान् ।। २१ ।।
एवं स पृथिवीं सर्वां वशे कृत्वा महारथः ।
विजित्य पुरुषव्याघ्रो नागसाह्वयमागमत् ।। २२ ।।
इस प्रकार पुरुषसिंह महारथी कर्ण नग्नजित् आदि महारथी नरेशसमुदायोंको जीतकर सारी पृथ्वीको पराजित करके अपने वशमें कर लेनेके पश्चात् हस्तिनापुरको लौट आया ।। २१-२२ ।।
तमागतं महेष्वासं धार्तराष्ट्रो जनाधिपः ।
प्रत्युद्गम्य महाराज सभ्रातृपितृबान्धवः ।। २३ ।।
अर्चयामास विधिना कर्णमाहवशोभिनम् ।
आश्रावयच्च तत् कर्म प्रीयमाणो जनेश्वरः ।। २४ ।।
महाराज! रणमें शोभा पानेवाले महाधनुर्धर कर्णको आया हुआ जान भाई, पिता तथा बन्धु-बान्धवोंसहित राजा दुर्योधनने उसकी अगवानी की और विधिपूर्वक उसका स्वागत-

सत्कार किया। तत्पश्चात् दुर्योधनने अत्यन्त प्रसन्न होकर कर्णके दिग्विजयकी सब ओर घोषणा करा दी ।।

यन्न भीष्मान्न च द्रोणान्न कृपान्न च बाह्लिकात् ।
प्राप्तवानस्मि भद्रं ते त्वत्तः प्राप्तं मया हि तत् ।। २५ ।।
तत्पश्चात् उसने कर्णसे कहा—'वीरवर! तुम्हारा कल्याण हो। मुझे भीष्मजीसे, आचार्य द्रोणसे, कृपाचार्यसे तथा बाह्लिकसे भी जो वस्तु नहीं मिली थी, वह तुमसे प्राप्त हो गयी ।। २५ ।।
बहुना च किमुक्तेन शृणु कर्ण वचो मम ।
सनाथोऽस्मि महाबाहो त्वया नाथेन सत्तम ।। २६ ।।
‘महाबाहु कर्ण! अधिक कहनेसे क्या लाभ? तुम मेरी बात सुनो। सत्पुरुषरत्न! तुम्हें अपना नाथ (सहायक) पाकर ही मैं सनाथ हूँ ।। २६ ।।
न हि ते पाण्डवाः सर्वे कलामर्हन्ति षोडशीम् ।
अन्ये वा पुरुषव्याघ्र राजानोऽभ्युदितोदिताः ।। २७ ।।
‘पुरुषसिंह! वे समस्त पाण्डव अथवा अन्य श्रेष्ठतम नरेश तुम्हारी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते ।। २७ ।।
स भवान् धृतराष्ट्रं तं गान्धारीं च यशस्विनीम् ।

पश्य कर्ण महेष्वास अदितिं वज्रभृद् यथा ॥ २८ ॥ ‘महाधनुर्धर कर्ण! अब तुम मेरे पूज्य पिता धृतराष्ट्र तथा यशस्विनी माता गान्धारीका उसी प्रकार दर्शन करो, जैसे वज्रधारी इन्द्र माता अदितिका दर्शन करते हैं’ ॥ २८ ॥ ततो हलहलाशब्दः प्रादुरासीद् विशाम्पते । हाहाकाराश्च बहवो नगरे नागसाह्वये ॥ २९ ॥ जनमेजय! तदनन्तर हस्तिनापुर नगरमें सब ओर बड़ा भारी कोलाहल मच गया। अनेक प्रकारके हाहाकार सुनायी देने लगे ॥ २९ ॥ केचिदेनं प्रशंसन्ति निन्दन्ति स्म तथापरे । तूष्णीमासंस्तथा चान्ये नृपास्तत्र जनाधिप ॥ ३० ॥ राजन्! कोई तो कर्णकी प्रशंसा करते थे और दूसरे उसकी निन्दा। अन्य कितने ही राजा निन्दा और प्रशंसा कुछ भी न करके मौन थे ॥ ३० ॥ एवं विजित्य राजेन्द्र कर्णः शस्त्रभृतां वरः । सपर्वतवनाकाशां ससमुद्रां सनिष्कुटाम् ॥ ३१ ॥ देशैरुच्चावचैः पूर्णां पत्तनैर्नगरैरपि । द्वीपैरानूपसम्पूर्णैः पृथिवीं पृथिवीपते ॥ ३२ ॥ कालेन नातिदीर्घेण वशे कृत्वा तु पार्थिवान् । अक्षयं धनमादाय सूतजो नृपमभ्ययात् ॥ ३३ ॥ महाराज! इस प्रकार शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र कर्णने पर्वत, वन, खुले स्थान, समुद्र, उद्यान, ऊँचे-नीचे देश, पुर और नगर, द्वीप और जलयुक्त प्रदेशोंसे युक्त सारी पृथ्वीको जीतकर थोड़े ही समयमें समस्त राजाओंको वशमें कर लिया और उनसे अटूट धनराशि लेकर वह राजा धृतराष्ट्रके समीप आया ॥ ३१—३३ ॥ प्रविश्य च गृहं राजन्नभ्यन्तरमरिंदम । गान्धारीसहितं वीरो धृतराष्ट्रं ददर्श सः ॥ ३४ ॥ पुत्रवच्च नरव्याघ्र पादौ जग्राह धर्मवित् । धृतराष्ट्रेण चाश्लिष्य प्रेम्णा चापि विसर्जितः ॥ ३५ ॥ शत्रुसूदन जनमेजय! धर्मज्ञ वीर कर्णने अन्तःपुरमें प्रवेश करके गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका दर्शन किया और पुत्रकी भाँति उसने उनके दोनों चरण पकड़ लिये। धृतराष्ट्रने भी उसे प्रेमपूर्वक हृदयसे लगाकर विदा किया ॥ तदा प्रभृति राजा च शकुनिश्चापि सौबलः । जानते निर्जितान् पार्थान् कर्णेन युधि भारत ॥ ३६ ॥ भारत! तबसे राजा दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि युद्धमें कर्णद्वारा पाण्डवोंको पराजित हुआ ही समझने लगे ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदिग्विजये चतुष्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २५४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णदिग्विजयसम्बन्धी दो सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २५४ ।।

२५५-

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पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

कर्ण और पुरोहितकी सलाहसे दुर्योधनकी वैष्णवयज्ञके लिये तैयारी

वैशम्पायन उवाच

जित्वा तु पृथिवीं राजन् सूतपुत्रो जनाधिप ।
अब्रवीत् परवीरघ्नो दुर्योधनमिदं वचः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज जनमेजय! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सूतपुत्र कर्णने सारी पृथ्वीको जीतकर दुर्योधनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

कर्ण उवाच

दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ।
श्रुत्वा वाचं तथा सर्वं कर्तुमर्हस्यरिंदम ॥ २ ॥

**कर्ण बोला—**कुरुनन्दन दुर्योधन! मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो। शत्रुदमन! मेरी बात सुनकर उसके अनुसार सब कुछ करो ॥ २ ॥

तवाद्य पृथिवी वीर निःसपत्ना नृपोत्तम ।
तां पालय यथा शक्रो हतशत्रुर्महामनाः ॥ ३ ॥

वीर! नृपश्रेष्ठ! आज सारी पृथ्वी तुम्हारे लिये निष्कण्टक हो गयी है। जैसे महामना इन्द्र अपने शत्रुओंका संहार करके त्रिलोकीका पालन करते हैं, उसी प्रकार तुम भी इस पृथ्वीका पालन करो ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु कर्णेन कर्णं राजाब्रवीत् पुनः ।
न किंचिद् दुर्लभं तस्य यस्य त्वं पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥
सहायश्चानुरक्तश्च मदर्थं च समुद्यतः ।
अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तं वै शृणु यथातथम् ॥ ५ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कर्णके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधनने पुनः उससे कहा—'पुरुषश्रेष्ठ! जिसके सहायक तुम हो एवं जिसपर तुम्हारा अनुराग है, उसके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है। तुम सदा मेरे हितके लिये उद्यत रहते हो। मेरा एक मनोरथ है, जिसे यथार्थरूपसे बतलाता हूँ, सुनो' ॥ ४-५॥

राजसूयं पाण्डवस्य दृष्ट्वा क्रतुवरं महत् ।
मम स्पृहा समुत्पन्ना तां सम्पादय सूतज ॥ ६ ॥

सूतनन्दन! 'पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके उस क्रतुश्रेष्ठ महान् राजसूययज्ञको देखकर मेरे मनमें

भी उसे करनेकी इच्छा जाग उठी है। तुम इस इच्छाको पूर्ण करो' ।। ६ ।।

एवमुक्तस्ततः कर्णो राजानमिदमब्रवीत् ।

तवाद्य पृथिवीपाला वश्याः सर्वे नृपोत्तम ॥ ७ ॥

आहूयन्तां द्विजवराः सम्भाराश्च यथाविधि ।

सम्भ्रियन्तां कुरुश्रेष्ठ यज्ञोपकरणानि च ।। ८ ।।

दुर्योधनकी यह बात सुनकर कर्णने उससे यह कहा—'नृपश्रेष्ठ! इस समय भूपाल

तुम्हारे वशमें हैं। कुरुकुलश्रेष्ठ! उत्तम ब्राह्मणोंको बुलाओ और विधिपूर्वक यज्ञकी सामग्रियों

तथा उपकरणोंको जुटाओ ।। ७-८ ।।

ऋत्विजश्च समाहूता यथोक्ता वेदपारगाः ।

क्रियां कुर्वन्तु ते राजन् यथाशास्त्रमरिंदम ॥ ९ ॥

'शत्रुदमन नरेश! तुम्हारे द्वारा आमन्त्रित शास्त्रोक्त योग्यतासे सम्पन्न वेदज्ञ ऋत्विक्

विधिके अनुसार सब कार्य करें ।। ९ ।।

बह्वन्नपानसंयुक्तः सुसमृद्धगुणान्वितः ।

प्रवर्त्ततां महायज्ञस्तवापि भरतर्षभ ॥ १० ॥

'भरतश्रेष्ठ! तुम्हारा महायज्ञ भी प्रचुर अन्नपानकी सामग्रीसे युक्त और अत्यन्त

समृद्धिशाली गुणोंसे सम्पन्न हो' ।। १० ।।

एवमुक्तस्तु कर्णेन धार्तराष्ट्रो विशाम्पते ।

पुरोहितं समानाय्य वचनं चेदमब्रवीत् ।। ११ ।।

राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं समाप्तवरदक्षिणम् ।

आहर त्वं मम कृते यथान्यायं यथाक्रमम् ।। १२ ।।

राजन्! कर्णके इस प्रकार अनुमोदन करनेपर दुर्योधनने अपने पुरोहितको बुलाकर यह

बात कही—'ब्रह्मन्! आप मेरे लिये उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका यथोचित

रीतिसे विधिपूर्वक अनुष्ठान करवाइये' ।। ११-१२ ।।

स एवमुक्तो नृपतिमुवाच द्विजसत्तमः ।

(ब्राह्मणैः सहितो राजन् ये तत्रासन् समागताः ।)

न स शक्यः क्रतुश्रेष्ठो जीवमाने युधिष्ठिरे ।। १३ ।।

आहर्तुं कौरवश्रेष्ठ कुले तव नृपोत्तम ।

दीर्घायुर्जीवति च ते धृतराष्ट्रः पिता नृप ।। १४ ।।

अतश्चापि विरुद्धस्ते क्रतुरेष नृपोत्तम ।

नरेश्वर! राजाके इस प्रकार आदेश देनेपर विप्रवर पुरोहितने वहाँ आये हुए अन्य

ब्राह्मणोंके साथ इस प्रकार उत्तर दिया—'कौरवश्रेष्ठ! नृपशिरोमणे! राजा युधिष्ठिरके जीते

आपके कुलमें इस उत्तम क्रतु राजसूयका अनुष्ठान नहीं किया जा सकता। महाराज! अभी