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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

अथ कपोतो राजानमब्रवीत् । प्राणरक्षार्थं श्येनाद् भीतो भवन्तं प्राणार्थी प्रपद्ये अङ्गैरङ्गानि प्राप्यार्थी मुनिर्भूत्वा प्राणांस्त्वां प्रपद्ये ॥ ६ ॥ तदनन्तर कबूतरने राजासे कहा—‘महाराज! मैं बाजके डरसे प्राण बचानेके लिये प्राणार्थी होकर आपकी शरणमें आया हूँ। मैं वास्तवमें कबूतर नहीं ऋषि हूँ। मैंने स्वेच्छासे पूर्व शरीरसे यह शरीर बदल लिया है। प्राणरक्षक होनेके कारण आप ही मेरे प्राण हैं। मैं आपकी शरणमें हूँ, मुझे बचाइये ॥ ६ ॥

स्वाध्यायेन कर्शितं ब्रह्मचारिणं मां विद्धि । तपसा दमेन युक्तमाचार्यस्याप्रतिकूलभाषिणम् । एवं युक्तमपापं मां विद्धि ॥ ७ ॥ ‘मुझे ब्रह्मचारी समझिये। मैंने वेदोंका स्वाध्याय करते हुए अपने शरीरको दुर्बल किया है। मैं तपस्वी और जितेन्द्रिय हूँ। आचार्यके प्रतिकूल कभी कोई बात नहीं करता। इस प्रकार मुझे योगयुक्त और निष्पाप जानिये ॥ ७ ॥

गदामि वेदान् विचिनोमि छन्दः सर्वे वेदा अक्षरशो मे अधीताः । न साधु दानं श्रोत्रियस्य प्रदानं मा प्रादाः श्येनाय न कपोतोऽस्मि ॥ ८ ॥ ‘मैं वेदोंका प्रवचन और छन्दोंका संग्रह करता हूँ। मैंने सम्पूर्ण वेदोंके एक-एक अक्षरका अध्ययन किया है। मैं श्रोत्रिय विद्वान् हूँ। मुझ-जैसे व्यक्तिको किसी भूखे प्राणीकी

भूख बुझानेके लिये उसके हवाले कर देना उत्तम दान नहीं है। अतः आप मुझे बाजको न सौंपिये। मैं कबूतर नहीं हूँ' ॥ ८ ॥

अथ श्येनो राजनम्ब्रवीत् ॥ ९ ॥ पर्यायेण वसतिर्वा भवेषु सर्गे ज्ञातः पूर्वमस्मात् कपोतात् । त्वमाददानोऽथ कपोतमेनं मा त्वं राजन् विघ्नकर्ता भवेथाः ॥ १० ॥

तदनन्तर बाजने राजासे कहा—‘महाराज! प्रायः सभी जीवोंको बारी-बारीसे विभिन्न योनियोंमें जन्म लेकर रहना पड़ता है। मालूम होता है, आप इस सृष्टि-परम्परामें पहले कभी इस कबूतरसे जन्म ग्रहण कर चुके हैं; तभी तो इसे अपने आश्रयमें ले रहे हैं! राजन्! मैं आग्रहपूर्वक कहता हूँ, आप इस कबूतरको लेकर मेरे भोजनके कार्यमें विघ्न न डालें' ॥ ९-१० ॥

राजोवाच

केनेदृशी जातु परा हि दृष्टा वागुच्यमाना शकुनेन संस्कृता । यां वै कपोतो वदते यां च श्येन उभौ विदित्वा कथमस्तु साधु ॥ ११ ॥

राजा बोले—अहो! आजसे पहले किसने कभी भी किसी पक्षीके मुखसे ऐसी उत्तम संस्कृत भाषाका उच्चारण देखा या सुना है, जैसी कि ये कबूतर और बाज बोल रहे हैं? किस प्रकार इन दोनोंका स्वरूप जानकर इनके प्रति न्यायोचित बर्ताव किया जा सकता है? ॥ ११ ॥

नास्य वर्षं वर्षति वर्षकाले नास्य बीजं रोहति काल उप्तम् । भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे न त्राणं लभेत् त्राणमिच्छन् स काले ॥ १२ ॥

जो राजा अपनी शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसके देशमें समयपर वर्षा नहीं होती। उसके बोये हुए बीज भी समयपर नहीं उगते हैं। वह कभी संकटके समय जब अपनी रक्षा चाहता है, तब उसे कोई रक्षक नहीं मिलता ॥ १२ ॥

जाता ह्रस्वा प्रजा प्रमीयते सदा न वासं पितरोऽस्य कुर्वते । भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे नास्य देवाः प्रतिगृह्णन्ति हव्यम् ॥ १३ ॥

जो राजा अपनी शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसकी पैदा हुई संतान छोटी अवस्थामें ही मर जाती है। उसके पितरोंको कभी पितृलोकमें रहनेके लिये स्थान नहीं मिलता और देवता उसका दिया हुआ हविष्य नहीं ग्रहण करते हैं ॥ १३ ॥

मोघमन्नं विन्दति चाप्रचेताः
स्वर्गाल्लोकाद् भ्रश्यति शीघ्रमेव ।
भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे
सेन्द्रा देवाः प्रहरन्त्यस्य वज्रम् ॥ १४ ॥

जो राजा शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसका खाना-पीना निष्फल है। वह अनुदार हृदयका मनुष्य शीघ्र ही स्वर्गलोकसे भ्रष्ट हो जाता है और इन्द्र आदि देवता उसके ऊपर वज्रका प्रहार करते हैं ॥ १४ ॥

उक्षाणं पक्त्वा सह ओदनेन
अस्मात् कपोतात् प्रति ते नयन्तु ।
यस्मिन् देशे रमसेऽतीव श्येन
तत्र मांसं शिबयस्ते वहन्तु ॥ १५ ॥

‘अतः बाज! इस कबूतरके बदले मेरे सेवक ले जायँ तुम्हारी पुष्टिके लिये भातके साथ ऋषभकन्द पकाकर दूँगा। तुम जिस स्थानपर प्रसन्नतापूर्वक रह सको, वहीं चलकर रहो। ये शिबिवंशी क्षत्रिय वहीं तुम्हारे लिये भात और ऋषभकन्दका गूदा पहुँचा दें ॥ १५ ॥

श्येन उवाच

नोक्षाणं राजन् प्रार्थयेयं न चान्य-
दस्मान्मांसमधिकं वा कपोतात् ।
देवैर्दत्तः सोऽद्य ममैष भक्ष-
स्तन्मे ददस्व शकुनानामभावात् ॥ १६ ॥

**बाज बोला—**राजन्! मैं आपसे ऋषभकन्द नहीं माँगता और न मुझे इस कबूतरसे अधिक कोई दूसरा मांस ही चाहिये। आज दूसरे पक्षियोंके अभावमें यह कबूतर ही मेरे लिये देवताओंका दिया हुआ भोजन है। अतः यही मेरा आहार होगा। इसे ही मुझे दे दीजिये ॥ १६ ॥

राजोवाच

उक्षाणं वेहतमनूनं नयन्तु
ते पश्यन्तु पुरुषा ममैव ।
भयाहितस्य दायं ममान्तिकात् त्वां
प्रत्याम्नायं तु त्वं ह्येनं मा हिंसीः ॥ १७ ॥

**राजाने कहा—**बाज! उक्षा (ऋषभकन्द) अथवा वेहत नामक ओषधियाँ बड़ी पुष्टिकारक होती हैं। मेरे सेवक जाकर उनकी खोज करें और पर्याप्त मात्रामें भातके साथ उन्हें पकाकर तुम्हारे पास पहुँचा दें। भयभीत कपोतके बदलेमें मेरे पाससे मिलनेवाला यह उचित मूल्य होगा। इसे ले लो, किंतु इस कबूतरको न मारो ॥ १७ ॥

त्यजे प्राणान् नैव दद्यां कपोतं
सौम्यो ह्ययं किं न जानासि श्येन ।
यथा क्लेशं मा कुरुष्वेह सौम्य
नाहं कपोतमर्पयिष्ये कथंचित् ॥ १८ ॥

मैं अपने प्राण दे दूँगा, किंतु इस कबूतरको नहीं दूँगा। बाज! क्या तुम नहीं जानते, यह कितना सुन्दर स्वयं कैसा भोला-भाला है? सौम्य! अब तुम यहाँ व्यर्थ कष्ट न उठाओ। मैं इस कबूतरको किसी तरह तुम्हारे हाथमें नहीं दूँगा ॥ १८ ॥

यथा मां वै साधुवादैः प्रसन्नाः
प्रशंसेयुः शिबयः कर्मणा तु ।
यथा श्येन प्रियमेव कुर्यां
प्रशाधि मां यद् वदेस्तत् करोमि ॥ १९ ॥

बाज! जिस कर्मसे शिबिदेशके लोग प्रसन्न होकर मुझे साधुवाद देते हुए मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा करें और जिससे मेरेद्वारा तुम्हारा भी प्रिय कार्य बन सके, वह बताओ। उसीके लिये मुझे आज्ञा दो। मैं वही करूँगा ॥ १९ ॥

श्येन उवाच

ऊरोर्दक्षिणादुत्कृत्य स्वपिशितं तावद् राजन् यावन्मांसं कपोतेन समम् । तथा तस्मात् साधु त्रातः कपोतः प्रशंसेयुश्च शिबयः कृतं च प्रियं स्यान्ममेति ॥ २० ॥

**बाज बोला—**राजन्! अपनी दायीं जाँघसे उतना ही मांस काटकर दो, जितना इस कबूतरके बराबर हो सके। ऐसा करनेसे कबूतरकी भलीभाँति रक्षा हो सकती है। इसीसे शिबिदेशकी प्रजा आपकी भूरि-भूरि प्रशंसा करेगी और मेरा भी प्रिय कार्य सम्पन्न हो जायगा ॥ २० ॥

अथ स दक्षिणादूरोत्कृत्य स्वमांसपेशीं तुलयाऽऽधारयत् । गुरुतर एव कपोत आसीत् ॥ २१ ॥

तब राजाने अपनी दायीं जाँघसे मांस काटकर उसे तराजूके एक पलड़ेपर रखा, किंतु कबूतरके साथ तौलनेपर वही अधिक भारी निकला ॥ २१ ॥

पुनरन्यमुञ्चकर्त गुरुतर एव कपोतः । एवं सर्वं समधिकृत्य शरीरं तुलायामारोपयामास । तत् तथापि गुरुतर एव कपोत आसीत् ॥ २२ ॥

राजाने फिर दूसरी बार अपने शरीरका मांस काटकर रखा, तो भी कबूतरका ही पलड़ा भारी रहा। इस प्रकार क्रमशः उन्होंने अपने सभी अंगोंका मांस काट-काटकर तराजूपर चढ़ाया तो भी कबूतर ही भारी रहा ॥ २२ ॥

अथ राजा स्वयमेव तुलाममारोह । न च व्यलीकमासीद् राज्ञ एतद् वृत्तान्तं दृष्ट्वा त्रात इत्युक्त्वा प्रालीयत श्येनोऽथ राजा अब्रवीत् ॥ २३ ॥

तब राजा स्वयं ही तराजूपर चढ़ गये। ऐसा करते समय उनके मनमें क्लेश नहीं हुआ। यह घटना देखकर बाज बोल उठा—‘हो गयी कबूतरकी प्राणरक्षा।' ऐसा कहकर वह वहीं अन्तर्धान हो गया। अब राजा शिबि कबूतरसे बोले— ॥ २३ ॥

कपोतं विद्युः शिबयस्त्वां कपोत पृच्छामि ते शकुने को नु श्येनः । नानीश्वर ईदृशं जातु कुर्या- देतं प्रश्नं भगवन् मे विचक्ष्व ॥ २४ ॥

‘कपोत! ये शिबिलोग तो तुम्हें कबूतर ही समझते थे। पक्षिप्रवर! मैं तुमसे पूछता हूँ, बताओ, यह बाज कौन था? ईश्वरके सिवा दूसरा कोई कभी ऐसा चमत्कारपूर्ण कार्य नहीं कर सकता। भगवन्! मेरे इस प्रश्नका यथावत् उत्तर दो' ॥ २४ ॥

कपोत उवाच

वैश्वानरोऽहं ज्वलनो धूमकेतु- रथैव श्येनो वज्रहस्तः शचीपतिः । साधु ज्ञातुं त्वामृषभं सौरभेय नौ जिज्ञासाया त्वत्सकाशं प्रपन्नौ ॥ २५ ॥

कबूतर बोला— राजन्! मैं धूममयी ध्वजासे विभूषित वैश्वानर अग्नि हूँ और उस बाजके रूपमें साक्षात् वज्रधारी शचीपति इन्द्र थे। सुरथानन्दन! तुम एक श्रेष्ठ पुरुष हो। हम दोनों तुम्हारी श्रेष्ठताकी परीक्षाके लिये यहाँ आये थे ॥ २५ ॥

यामेतां पेशीं मम निष्क्रयाय प्रादाद् भवानसिनोत्कृत्य राजन् । एतद् वो लक्ष्म शिवं करोमि हिरण्यवर्णं रुचिरं पुण्यगन्धम् ॥ २६ ॥

राजन्! तुमने मेरी रक्षाके लिये जो तलवारसे काटकर अपना यह मांस दिया है, इसके घावको मैं अभी अच्छा कर देता हूँ। यहाँकी चमड़ीका रंग सुन्दर और सुनहला हो जायगा तथा इससे बड़ी पवित्र सुगन्ध फैलती रहेगी, यह तुम्हारा राजचिह्न होगा ॥ २६ ॥

एतासां प्रजानां पालयिता यशस्वी सुरर्षीणामथ सम्मतो भृशम् ।

एतस्मात् पार्श्वात् पुरुषो जनिष्यति कपोतरोमेति च तस्य नाम ॥ २७ ॥ तुम्हारे इस दक्षिण पार्श्वसे एक पुत्र उत्पन्न होगा, जो इन प्रजाओंका पालक और यशस्वी होनेके साथ ही देवर्षियोंके अत्यन्त आदरका पात्र होगा। उसका नाम होगा, 'कपोतरोमा' ॥ २७ ॥

कपोतरोमाणं शिबिनौद्भिदं पुत्रं प्राप्स्यसि नृप वृषसंहननं यशोदीप्यमानं द्रष्टासि शूरमृषभं सौरथानाम् ॥ २८ ॥ राजन्! तुम्हारे द्वारा उत्पन्न किया हुआ वह पुत्र, जिसे तुम भविष्यमें प्राप्त करोगे, तुम्हारी जाँघका भेदन करके प्रकट होगा; इसीलिये औद्भिद कहलायेगा। उसके शरीरके रोएँ कबूतरके समान होंगे। उसका शरीर साँड़के समान हृष्ट-पुष्ट होगा। तुम देखोगे कि वह सुयशसे प्रकाशित हो रहा है। सुरथाके वंशजोंमें वह सर्वश्रेष्ठ शूरवीर होगा ॥ (इतना कहकर अग्निदेव अन्तर्धान हो गये।)

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि शिबिचरिते सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें शिबिचरित्रविषयक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९७ ॥


* राजाका यह कठोर नियम था कि वे सोना-चाँदीके सिवा और कुछ ब्राह्मणको नहीं देते थे, जो उनसे ये ही वस्तुएँ माँगता, उसे प्रसन्नतापूर्वक देते थे। जो दूसरी कोई चीज माँगता, उसे यह समझकर कि यह मेरा नियम भंग करना चाहता है, दण्ड देते थे। ब्राह्मण देवता दूसरेके भेजनेसे आये थे, इसलिये राजाने एक हजार अश्वोंके मूल्यसे अधिक सोना-चाँदी उन्हें दिया।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः प्रार्थना की—‘मुने! क्षत्रिय नरेशोंके माहात्म्यका पुनः वर्णन कीजिये।’ तब मार्

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अष्टनव्यधिकशततमोऽध्यायः

देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन

वैशम्पायन उवाच

भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवो मार्कण्डेयम् । अथाचष्ट मार्कण्डेयः । अष्टकस्य वैश्वामित्रेरश्वमेधे सर्वे राजानः प्रागच्छन् ।। १ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः प्रार्थना की—‘मुने! क्षत्रिय नरेशोंके माहात्म्यका पुनः वर्णन कीजिये।’ तब मार्कण्डेयजीने कहा—‘धर्मराज! विश्वामित्रके पुत्र अष्टकके अश्वमेधयज्ञमें सब राजा पधारे थे ।। १ ।।

भ्रातरश्चास्य प्रतर्दनो वसुमनाः शिबिरौशीनर इति । स च समाप्तयज्ञो भ्रातृभिः सह रथेन प्रायात् । ते च नारदमागच्छन्तमभिवाद्यारोहतु भवान् रथमित्यब्रुवन् ।। २ ।।

‘अष्टकके तीन भाई प्रतर्दन, वसुमना तथा उशीनर-पुत्र शिबि भी उस यज्ञमें आये थे। यज्ञ समाप्त होनेपर एक दिन अष्टक अपने भाइयोंके साथ रथपर आरूढ़ हो (स्वर्गकी ओर) जा रहे थे। इसी समय रास्तेमें देवर्षि नारदजी आते दिखायी दिये। तब उन तीनोंने उन्हें प्रणाम करके कहा—‘भगवन् आप भी रथपर आ जाइये’ ।। २ ।।

तांस्तथेत्युक्त्वा रथमारुरोह । अथ तेषामेकः सुरर्षिं नारदमब्रवीत् । प्रसाद्य भगवन्तं किञ्चिदिच्छेयं प्रष्टुमिति ।। ३ ।।

‘तब नारदजी ‘तथास्तु’ कहकर उस रथपर बैठ गये। तदनन्तर उनमेंसे एकने देवर्षि नारदसे कहा—‘भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करके कुछ पूछना चाहता हूँ’ ।। ३ ।।

पृच्छेत्यब्रवीदृषिः । सोऽब्रवीदायुष्मन्तः सर्वगुणप्रमुदिताः । अथायुष्मन्तं स्वर्गस्थानं चतुर्भि-र्यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् । अयमष्टकोऽवतरे-दित्यब्रवीदृषिः ।। ४ ।।

‘देवर्षिने कहा—‘पूछो’ तब उसने इस प्रकार कहा—‘भगवन्! हम सब लोग दीर्घायु तथा सर्वगुणसम्पन्न होनेके कारण सदा प्रसन्न रहते हैं। हम चारोंको दीर्घकालतक उपभोगमें आनेवाले स्वर्ग-लोकमें जाना है, किंतु वहाँसे सर्वप्रथम कौन इस भूतपर उतर आयेगा?’ देवर्षिने कहा—‘सबसे पहले अष्टक उतरेगा’ ।। ४ ।।

किं कारणमित्यपृच्छत् । अथाचष्टाष्टकस्य गृहे मया उषितं स मां रथेनानुप्रावहदथापश्यमनेकानि गोसहस्राणि वर्णशो विविक्तानि तमहमपृच्छं कस्येमा गाव इति सोऽब्रवीत् । मया निसृष्टा इत्येतास्तेनैव स्वयं श्लाघति कथितेन । एषोऽवतरेदथ त्रिभिर्यातव्यं साम्प्रतं कोऽवतरेत् ।। ५ ।।

'फिर उसने पूछा—‘क्या कारण है कि अष्टक ही उतरेगा?’ तब नारदजीने कहा—एक दिन मैं अष्टकके घर ही ठहरा था। उस दिन अष्टक मुझे रथपर बिठाकर भ्रमणके लिये ले जा रहे थे। मैंने रास्तेमें देखा, भिन्न-भिन्न रंगकी कई हजार गौएँ पृथक्-पृथक् चर रही हैं। उन्हें देखकर मैंने अष्टकसे पूछा—‘ये किसकी गौएँ हैं।’ इन्होंने उत्तर दिया—‘ये मेरी दान की हुई गौएँ हैं।’ इस प्रकार ये स्वयं अपने किये हुए दानका बखान करके आत्मश्लाघा करते हैं। इसीलिये इन्हें स्वर्गसे पहले उतरना पड़ेगा।’ तत्पश्चात् उन लोगोंने पुनः प्रश्न किया—‘यदि हम शेष तीनों भाई स्वर्गमें जायँ, तो सबसे पहले किसको उतरना पड़ेगा?’ ॥ ५ ॥

प्रतर्दन इत्यब्रवीदृषिः । तत्र किं कारणं प्रतर्दनस्यापि गृहे मयोषितं स मां रथेनानुप्रावहत् ॥ ६ ॥

अथैनं ब्राह्मणोऽभिक्षेताश्वं मे ददातु भवान् निवृत्तो दास्यामीत्यब्रवीद् ब्राह्मणं त्वरितमेव दीयता-मित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्त्वरितमेव स ब्राह्मणस्यैवमुक्त्वा दक्षिणं पार्श्वमददात् ॥ ७ ॥

'देवर्षिने उत्तर दिया—‘प्रतर्दनको।’ ‘इसमें क्या कारण है?’ ऐसा प्रश्न होनेपर देवर्षिने उत्तर दिया—‘एक दिन मैं प्रतर्दनके घर भी ठहरा था। ये मुझे रथसे ले जा रहे थे। उस समय एक ब्राह्मणने आकर इनसे याचना की—‘आप मुझे एक अश्व दे दीजिये।’ तब उन्होंने ब्राह्मणको उत्तर दिया—‘लौटनेपर दे दूँगा।’ ब्राह्मणने कहा—‘नहीं, तुरंत दे दीजिये।’ ‘अच्छा तो तुरंत ही लीजिये’ यों कहकर इन्होंने रथके दाहिने पार्श्वका घोड़ा खोलकर उसे दे दिया’ ॥ ६-७ ॥

अथान्योऽप्यश्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत् । तथैव चैनमुक्तवा वामपार्ष्णिमभ्यदादथ प्रायात् पुनरपि चान्योऽप्यश्वार्थी ब्राह्मण आगच्छत् त्वरितोऽथ तस्मै अपनह्य वामं धुर्यमददत् ॥ ८ ॥

'इतनेहीमें एक-दूसरा ब्राह्मण आया। उसे भी घोड़ेकी ही आवश्यकता थी। जब उसने याचना की, तब राजाने पूर्ववत् उससे भी यही कहा—‘लौटनेपर दूँगा।’ परंतु उसके आग्रह करनेपर उन्होंने रथके वाम पार्श्वका एक घोड़ा दिया। फिर वे आगे बढ़ गये। तदनन्तर एक घोड़ा माँगनेवाला दूसरा ब्राह्मण आया। उसने भी जल्दी ही माँगा। तब राजाने उसे बायें धुरेका बोझ ढोनेवाला अश्व खोल करके दे दिया ॥ ८ ॥

अथ प्रायात् पुनरन्य आगच्छदश्वार्थी ब्राह्मणस्तमब्रवीदतियातो दास्यामि त्वरितमेव मे दीयतामित्यब्रवीद् ब्राह्मणस्तस्मै दत्त्वाश्वं रथधुरं गृह्णता व्याहृतं ब्राह्मणानां साम्प्रतं नास्ति किंचिदिति ॥ ९ ॥

'तत्पश्चात् जब वे आगे बढ़े, तब फिर एक अश्वका इच्छुक ब्राह्मण आ पहुँचा। उसके माँगनेपर राजाने कहा—‘मैं शीघ्र ही अपने लक्ष्यतक पहुँचकर घोड़ा दे दूँगा।’ ब्राह्मण बोला—‘मुझे तुरंत दीजिये।’ तब उन्होंने ब्राह्मणको अश्व देकर स्वयं रथका धुरा पकड़ लिया और कहा—‘ब्राह्मणोंके लिये ऐसा करना सर्वथा उचित नहीं है’ ॥ ९ ॥

य एष ददाति चासूयति च तेन व्याहृतेन तथावतरेत् । अथ द्वाभ्यां यातव्यमिति

कोऽवतरेत् ।। १० ।।

'ये प्रतर्दन दान देते हैं और ब्राह्मणकी निन्दा भी करते हैं, अतः वह निन्दायुक्त वचन

बोलनेके कारण पहले इन्हींको स्वर्गसे उतरना पड़ेगा। तब पुनः प्रश्न किया गया, 'हम शेष

दो भाई जा रहे हैं, उनमेंसे कौन पहले स्वर्गसे नीचे उतरेगा?' ।। १० ।।

वसुमना अवतरेदित्यब्रवीदृषिः ।। ११ ।।

'देवर्षिने उत्तर दिया- 'वसुमना पहले उतरेंगे' ।।

किं कारणमित्यपृच्छदथाचष्ट नारदः । अहं परिभ्रमन् वसुमनसो गृहमुपस्थितः ।।

१२ ।।

'तब उन्होंने पूछा- 'इसका क्या कारण है?' नारदजी बोले- 'एक दिन मैं घूमता-

घामता वसुमनाके घरपर जा पहुँचा ।। १२ ।।

स्वस्तिवचनमासीत् पुष्परथस्य प्रयोजनेन तमहमन्वगच्छं स्वस्तिवाचितेषु

ब्राह्मणेषु रथो ब्राह्मणानां दर्शितः ।। १३ ।।

'उस दिन उनके यहाँ स्वस्तिवाचन हो रहा था। राजाके यहाँ एक ऐसा रथ था, जो

पर्वत, आकाश और समुद्र आदि दुर्गम स्थानोंपर भी सुगमतासे आ-जा सकता था। उसका

नाम था 'पुष्परथ'। मैं उसीके प्रयोजनसे राजाके यहाँ गया था। जब ब्राह्मणलोग

स्वस्तिवाचन कर चुके, तब राजाने ब्राह्मणोंको अपना वह रथ दिखाया ।। १३ ।।

तमहं रथं प्राशंसमथ राजाब्रवीद् भगवता रथः प्रशस्तः । एष भगवतो रथ

इति ।। १४ ।।

'उस समय मैंने उस रथकी बड़ी प्रशंसा की।' राजा बोले- 'भगवन्! आपने इस रथकी

प्रशंसा की है। अतः यह रथ आपहीका है' ।। १४ ।।

अथ कदाचित् पुनरप्यहमुपस्थितः पुनरेव च रथप्रयोजनमासीत् । सम्यगयमेष

भगवत इत्येवं राजाब्रवीदिति पुनरेव तृतीयं स्वस्तिवाचनं समभावयमथ राजा

ब्राह्मणानां दर्शयन् मामभिप्रेक्ष्याब्रवीत् । अथो भगवता पुष्परथस्य स्वस्तिवाचनानि

सुष्ठु सम्भावितानि एतेन द्रोहवचने नावत्तरेत् ।। १५ ।।

'तदनन्तर एक दिन और मैं राजाके यहाँ उपस्थित हुआ। पुनः मेरे जानेका उद्देश्य

पुष्परथको प्राप्त करना ही था। उस दिन भी राजाने बड़ी आवभगतके साथ कहा

—'भगवन्! यह रथ आपका ही है।' फिर तीसरी बार मैंने उनके यहाँ जाकर

स्वस्तिवाचनका कार्य सम्पन्न किया। राजाने ब्राह्मणोंको उस रथका दर्शन कराते हुए मेरी

ओर देखकर कहा- 'भगवन्! आपने पुष्परथके लिये अच्छे स्वस्तिवाचन किये।' (ऐसा

कहकर भी उन्होंने रथ नहीं दिया।) इस (छलयुक्त) वचनसे वसुमना ही पहले स्वर्गसे

पृथ्वीपर उतरेंगे' ।। १५ ।।

अथैकेन यातव्यं स्यात् कोऽवतरेत् पुनर्नारद आह शिबिर्यायादहमवतरेयमत्र किं कारणामित्यब्रवीत् । असावहं शिबिना समो नास्मि यतो ब्राह्मणः कश्चिदेनमब्रवीत् ॥ १६ ॥

शिबे अन्नार्थ्यस्मीति तमब्रवीच्छिबिः किं क्रियतामाज्ञापयतु भवानिति ॥ १७ ॥

'यदि आपके साथ हममेंसे एकमात्र शिबिको ही स्वर्गलोकमें जाना हो तो वहाँसे पहले कौन उतरेगा?' ऐसा प्रश्न होनेपर नारदजीने फिर कहा—'शिबि जायेंगे और मैं उतरूँगा। 'इसमें क्या कारण है?' यह पूछे जानेपर देवर्षि नारदने कहा—'मैं राजा शिबिके समान नहीं हूँ, क्योंकि एक दिन एक ब्राह्मणने शिबिसे कहा—'शिबे! मैं भोजन करना चाहता हूँ।' राजाने पूछा—'आपके लिये क्या रसोई बनायी जाय, आज्ञा कीजिये' ॥ १६-१७ ॥

अथैनं ब्राह्मणोऽब्रवीद् य एष ते पुत्रो बृहद्गर्भो नाम एष प्रमातव्य इति तमेनं संस्कुरु अन्नं चोपपादय ततोऽहं प्रतीक्ष्य इति । ततः पुत्रं प्रमाथ्य संस्कृत्य विधिना साधयित्वा पात्र्यामर्पयित्वा शिरसा प्रतिगृह्य ब्राह्मणममृगयत् ॥ १८ ॥

'तब इनसे ब्राह्मणने कहा—'यह जो तुम्हारा पुत्र बृहद्गर्भ है, इसे मार डालो।' फिर उसका दाह-संस्कार करो। तत्पश्चात् अन्न तैयार करो और मेरी प्रतीक्षा करो।' तब राजाने पुत्रको मारकर उसका दाह-संस्कार कर दिया और फिर विधिपूर्वक अन्न तैयार करके उसे बटलोईमें डालकर (और ढक्कनसे ढककर) अपने सिरपर रख लिया, फिर वे उस ब्राह्मणकी खोज करने लगे ॥ १८ ॥

अथास्य मृग्यमाणस्य कश्चिदाचष्ट एष ते ब्राह्मणो नगरं प्रविश्य दहति ते गृहं कोशागारमायुधागारं स्त्र्यगारमश्वशालां हस्तिशालां च क्रुद्ध इति ॥ १९ ॥

'खोज करते समय किसी मनुष्यने उनके पास आकर कहा—राजन्! आपका ब्राह्मण इधर है। यह नगरमें प्रवेश करके आपके भवन, कोषागार, शस्त्रागार, अन्तःपुर, अश्वशाला और गजशाला सबमें कुपित होकर आग लगा रहा है' ॥ १९ ॥

अथ शिबिस्तथैवाविकृतमुखवर्णो नगरं प्रविश्य ब्राह्मणं तमब्रवीत् सिद्धं भगवन्नन्नमिति ब्राह्मणो न किंचिद् व्याजहार विस्मयादधोमुखश्चासीत् ॥ २० ॥

'यह सब सुनकर भी राजा शिबिके मुखकी कान्ति पूर्ववत् बनी रही। उसमें तनिक भी विकार न आया। वे नगरमें घुसकर ब्राह्मणसे बोले—'भगवन्! आपका भोजन तैयार है।' ब्राह्मण कुछ न बोला। वह आश्चर्यसे मुँह नीचा किये देखता रहा ॥ २० ॥

ततः प्रासादयद् ब्राह्मणं भगवन् भुज्यतामिति । मुहूर्तादुद्वीक्ष्य शिबिमब्रवीत् ॥ २१ ॥

'तब राजाने ब्राह्मणको मनाते हुए कहा—'भगवन्! भोजन कर लीजिये।' ब्राह्मणने दो घड़ीतक ऊपरकी ओर देखनेके पश्चात् शिबिसे कहा— ॥ २१ ॥

त्वमेवैतदशानेति तत्राह तथेति शिबिस्तथैवाविमना महित्वा कपालमभ्युद्धार्य भोक्तुमैच्छत् ॥ २२ ॥

‘तुम्हीं यह सब खा जाओ।’ शिबिने उसी प्रकार मनको प्रसन्न रखते हुए ‘बहुत अच्छा’ कहकर ब्राह्मणकी आज्ञा स्वीकार की और उनका पूजन करके (सिरपर रखे हुए) ढक्कनको उघाड़कर वह सब खानेकी इच्छा की ॥ २२ ॥

अथास्य ब्राह्मणो हस्तमगृह्लात् । अब्रवीच्चैनं जितक्रोधोऽसि न ते किञ्चिदपरित्याज्यं ब्राह्मणार्थे ब्राह्मणोऽपि तं महाभागं सभाजयत् ॥ २३ ॥ ‘तब ब्राह्मणने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा—‘राजन्! तुमने क्रोधको जीत लिया है। तुम्हारे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे तुम ब्राह्मणके लिये न दे सको।’ ऐसा कहकर ब्राह्मणने भी उन महाभाग नरेशका समादर किया ॥ २३ ॥

स ह्युद्वीक्षमाणः पुत्रमपश्यदग्रे तिष्ठन्तं देवकुमारमिव पुण्यगन्धान्वितमलङ्कृतं सर्वं च तमर्थं विधाय ब्राह्मणोऽन्तरधीयत ॥ २४ ॥ ‘राजाने जब आँख उठाकर देखा, तब उनका पुत्र आगे खड़ा था। वह देवकुमारकी भाँति दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित था। उसके शरीरसे पवित्र सुगन्ध निकल रही थी। ब्राह्मण-देवता सब वस्तुओंको पूर्ववत् ठीक करके अन्तर्धान हो गये ॥ २४ ॥

तस्य राजर्षेर्विधाता तेनैव वेषेण परीक्षार्थमागत इति तस्मिन्नन्तर्हिते अमात्या राजानमूचुः । किं प्रेप्सुना भवता इदमेवं जानता कृतमिति ॥ २५ ॥ साक्षात् विधाता ब्राह्मणके वेशमें राजर्षि शिबिकी परीक्षा लेने आये थे। उनके अन्तर्धान हो जानेपर राजाके मन्त्रियोंने उनसे पूछा—‘महाराज! आप क्या चाहते हैं? जिसके लिये सब कुछ जानते हुए भी ऐसा दुःसाहसपूर्ण कार्य किया है?’ ॥ २५ ॥

शिबिरुवाच

नैवाहमेतद् यशसे ददानि न चार्थहेतोर्न च भोगतृष्णया । पापैरनासेवित एष मार्ग इत्येवमेतत् सकलं करोमि ॥ २६ ॥ **शिबि बोले—**मैं यशके लिये यह दान नहीं देता। धनके लिये अथवा भोगकी लिप्सासे भी दान नहीं करता। यह धर्मात्माओंका मार्ग है। पापी मनुष्य इसपर नहीं चल सकते। ऐसा समझकर ही मैं यह सब कुछ करता रहता हूँ ॥ २६ ॥

सद्भिः सदाध्यासितं तु प्रशस्तं तस्मात् प्रशस्तं श्रयते मतिर्मे । एतन्महाभाग्यवरं शिबेस्तु तस्मादहं वेद यथावदेतत् ॥ २७ ॥ श्रेष्ठ पुरुष सदा जिस मार्गसे चले हैं, वही उत्तम मार्ग है। इसीलिये मेरी बुद्धि सदा उस उत्तम पथका ही आश्रय लेती है। यह है राजा शिबिकी सर्वश्रेष्ठ महिमा, जिसे मैं (अच्छी

तरह) जानता हूँ। इसीलिये इन सब बातोंका यथावत् वर्णन किया है॥ २७॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि राजन्यमहाभाग्ये शिबिचरिते
अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९८॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें क्षत्रियमाहात्म्यके प्रकरणमें शिबिचरित्रविषयक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९८॥

राजा इन्द्रद्युम्न तथा अन्य चिरजीवी प्राणियोंकी कथा

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नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

राजा इन्द्रद्युम्न तथा अन्य चिरजीवी प्राणियोंकी कथा

वैशम्पायन उवाच

मार्कण्डेयमृषयः पाण्डवाः पर्यपृच्छन्नस्ति कश्चिद् भवतश्चिरजाततर इति ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऋषियों तथा पाण्डवोंने मार्कण्डेयजीसे पूछा—‘भगवन्! कोई आपसे भी पहलेका उत्पन्न चिरजीवी इस जगत्में है या नहीं? ॥

स तानुवाचास्ति खलु राजर्षिरिन्द्रद्युम्नो नाम क्षीणपुण्यस्त्रिदिवात् प्रच्युतः कीर्तिस्ते व्युच्छिन्नेति स मामुपातिष्ठदथ प्रत्यभिजानाति मां भवानिति ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा—‘है क्यों नहीं, सुनो। एक समय राजर्षि इन्द्रद्युम्न अपना पुण्य क्षीण हो जानेके कारण यह कहकर स्वर्गलोकसे नीचे गिरा दिये गये थे कि ‘जगत्में तुम्हारी कीर्ति नष्ट हो गयी है।’ स्वर्गसे गिरनेपर वे मेरे पास आये और बोले—‘क्या आप मुझे पहचानते हैं?’ ॥ २ ॥

तमहमब्रुवं कार्यचेष्टाकुलत्वान्न वयं वासायनिका ग्रामैकरात्रवासिनो न प्रत्यभिजानीमोऽप्यात्मनोऽर्थानामनुष्ठानं न शरीरोपतापेनात्मनः समारभामोऽर्थानामनुष्ठानम् ॥ ३ ॥
‘मैंने उनसे कहा—‘हमलोग तीर्थयात्रा आदि भिन्न-भिन्न पुण्य कार्योंकी चेष्टाओंमें व्यग्र रहते हैं, अतः किसी एक स्थानपर सदा नहीं रहते। एक गाँवमें केवल एक रात निवास करते हैं। अपने कार्योंका अनुष्ठान भी हमें भूल जाता है। व्रत-उपवास आदिमें लगे रहनेसे अपने शरीरको सदा कष्ट पहुँचानेके कारण आवश्यक कार्योंका आरम्भ भी हमसे नहीं हो पाता है, ऐसी दशामें हम आपको कैसे जान सकते हैं?’ ॥ ३ ॥

(एवमुक्तो राजर्षिरिन्द्रद्युम्नः पुनर्मामब्रवीद् अथास्ति कश्चित् त्वत्तश्चिरं जाततर इति ॥)
‘मेरे ऐसा कहनेपर राजर्षि इन्द्रद्युम्नने पुनः मुझसे पूछा—‘क्या आपसे भी पहलेका पैदा हुआ कोई पुरातन प्राणी है?’ ॥

(तं पुनः प्रत्यब्रवम्) अस्ति खलु हिमवति प्रावारकर्णो नामोलूकः प्रतिवसति । स मत्तश्चिरजातो भवन्तं यदि जानीयादितः प्रकृष्टे चाध्वनि हिमवांस्तत्रासौ प्रतिवसतीति ॥ ४ ॥
‘तब मैंने उन्हें पुनः उत्तर दिया—‘हिमालय पर्वतपर प्रावारकर्ण नामसे प्रसिद्ध एक उलूक निवास करता है। वह मुझसे भी पहलेका उत्पन्न हुआ है। सम्भव है, वह आपको जानता हो। यहाँसे बहुत दूरकी यात्रा करनेपर हिमालय पर्वत मिलेगा। वहीं वह रहता है’ ॥ ४ ॥

ततः स मामश्वो भूत्वा तत्रावहद् यत्र बभूवोलूकः । अथैनं स राजा पप्रच्छ प्रतिजानाति मां भवानिति ॥ ५ ॥ 'तब इन्द्रद्युम्न अश्व बनकर मुझे वहाँतक ले गये, जहाँ उलूक रहता था। वहाँ जाकर राजाने उससे पूछा—‘क्या आप मुझे जानते हैं?’ ॥ ५ ॥

स मुहूर्तमिव ध्यात्वाब्रवीदेनं नाभिजानामि भवन्तमिति स एवमुक्त इन्द्रद्युम्नः पुनस्तमुलूक-मब्रवीद् राजर्षिः ॥ ६ ॥ ‘उसने दो घड़ीतक सोच-विचारकर उनसे कहा—‘मैं आपको नहीं जानता हूँ।’ उलूकके ऐसा कहनेपर राजर्षि इन्द्रद्युम्नने पुनः उससे पूछा— ॥ ६ ॥

अथास्ति कश्चिद् भवतः सकाशाच्चिरजात इति स एवमुक्तोऽब्रवीदस्ति खल्विन्द्रद्युम्नं नाम सरस्तस्मिन् नाडीजङ्घो नाम बकः प्रतिवसति सोऽस्मत्तश्चिरजाततरस्तं पृच्छेति तत इन्द्रद्युम्नो मां चोलूकमादाय तत् सरोऽगच्छद् यत्रासौ नाडीजङ्घो नाम बको बभूव ॥ ७ ॥ ‘क्या आपसे भी पहलेका उत्पन्न हुआ कोई चिरजीवी प्राणी है?’ उनके ऐसा पूछनेपर उलूकने कहा—‘इन्द्रद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक सरोवर है। वहाँ नाडीजंघ नामसे प्रसिद्ध एक बक निवास करता है। वह हमसे बहुत पहलेका उत्पन्न हुआ है। उससे पूछिये।’ तब इन्द्रद्युम्न मुझको और उलूकको भी साथ लेकर उस सरोवरपर गये जहाँ नाडीजंघ बक निवास करता था ॥ ७ ॥

सोऽस्माभिः पृष्टो भवानिममिन्द्रद्युम्नं राजान-मभिजानातीति स एवं मुहूर्तं ध्यात्वाब्रवीन्ना-भिजानाम्यहमिन्द्रद्युम्नं राजानमिति । ततः सोऽस्माभिः पृष्टः कश्चिद् भवतोऽन्यश्चिरजाततरोऽस्तीति । स नोऽब्रवीदस्ति खल्वस्मिन्नेव सरस्यकूपारो नाम कच्छपः प्रतिवसति । स मत्तश्चिरजाततरः । स यदि कथंचिदभिजानीयादिमं राजानं तमकूपारं पृच्छध्वमिति ॥ ८ ॥ ‘हमलोगोंने उस बकसे पूछा—‘क्या आप—राजा इन्द्रद्युम्नको जानते हैं?’ उसने दो घड़ीतक सोचकर उत्तर दिया—‘मैं राजा इन्द्रद्युम्नको नहीं जानता हूँ।’ तब हमलोगोंने उनसे पूछा—‘क्या दूसरा कोई प्राणी ऐसा है? जिसका जन्म आपसे भी पहले हुआ हो?’ उसने हमसे कहा—‘है; इसी सरोवरमें अकूपार नामक एक कछुआ रहता है। वह मुझसे भी पहले उत्पन्न हुआ है। आपलोग उस अकूपारसे ही पूछिये। सम्भव है, वह इन राजर्षिको किसी तरह जानता हो’ ॥ ८ ॥

ततः स बकस्तमकूपारं कच्छपं विज्ञापयामास । अस्माकमभिप्रेतं भवन्तं किञ्चिदर्थमभिप्रष्टुं साध्वागम्यतां तावदिति तच्छ्रुत्वा कच्छपस्तस्मात् सरस उत्थायाभ्यगच्छद् यत्र तिष्ठामो वयं तस्य सरसस्तीरे आगतं चैनं वयमपृच्छाम भवानिन्द्रद्युम्नं राजानमभिजानातीति ॥ ९ ॥

'तब उस बकने अकूपार नामक कछुएको यह सूचना दी कि 'हमलोग आपसे कुछ

अभीष्ट प्रश्न पूछना चाहते हैं। कृपया आइये।' यह संदेश सुनकर वह कछुआ उस सरोवरसे

निकलकर वहीं आया, जहाँ हमलोग तटपर खड़े थे। आनेपर उससे हमलोगोंने पूछा- 'क्या

आप राजा इन्द्रद्युम्नको जानते हैं?' ।। ९ ।।

स मुहूर्तं ध्यात्वा बाष्पसम्पूर्णनयन उद्विग्न-हृदयो वेपमानो विसंज्ञकल्पः

प्राञ्जलिरब्रवीत् । किमहमेनं न प्रत्यभिज्ञास्यामीह ह्यनेन सहस्र-कृत्विश्चितिषु यूपा

आहिताः ।। १० ।।

'उसने दो घड़ीतक ध्यान करके नेत्रोंमें आँसू भरकर उद्विग्न हृदयसे काँपते हुए

अचेतकी-सी दशामें हाथ जोड़कर कहा- 'मैं इन्हें क्यों नहीं पहचानूँगा। इन्होंने एक हजार

बार अग्निस्थापनके समय यज्ञ-यूपोंकी स्थापना की है ।। १० ।।

सरश्चेदमस्य दक्षिणाभिर्दत्ताभिर्गोभिरति-क्रममाणाभिः कृतम् । अत्र चाहं

प्रतिवसामीति ।। ११ ।।

'इनके द्वारा दक्षिणामें दी हुई गौओंके आने-जानेसे यह सरोवर बन गया है, जिसमें मैं

निवास कर रहा हूँ' ।। ११ ।।

अथैतत् सकलं कच्छपेनोदाहृतं श्रुत्वा तदनन्तरं देवलोकाद् देवरथः प्रादुरासीद्

वाचश्चाश्रूयन्तेन्द्रद्युम्नं प्रति प्रस्तुतस्ते स्वर्गो यथोचितं स्थानं प्रतिपद्यस्व

कीर्तिमानस्यव्यग्रो याहीति ।। १२ ।।

'कच्छपके मुँहसे ये सारी बातें सुन लेनेके पश्चात् देवलोकसे एक दिव्य रथ आकर

प्रकट हुआ और उसमेंसे इन्द्रद्युम्नके प्रति कही हुई कुछ बातें सुनायी देने लगीं- 'राजन्!

आपके लिये स्वर्गलोक प्रस्तुत है। वहाँ चलकर यथोचित स्थान ग्रहण करें। आप कीर्तिमान्

हैं। अतः निश्चिन्त होकर स्वर्गलोककी यात्रा करें' ।। १२ ।।

भवन्ति चात्र श्लोकाः—

दिवं स्पृशति भूमिं च

शब्दः पुण्यस्य कर्मणः ।

यावत् स शब्दो भवति

तावत् पुरुष उच्यते ।। १३ ।।

'इस विषयमें ये श्लोक हैं— 'जबतक मनुष्यके पुण्यकर्मका शब्द भूलोक और

देवलोकका स्पर्श करता है, जबतक दोनों लोकोंमें उसकी कीर्ति बनी रहती है, तभीतक वह

पुरुष स्वर्गलोकका निवासी बताया जाता है ।। १३ ।।

अकीर्तिः कीर्त्यते लोके

यस्य भूतस्य कस्यचित् ।

स पतत्यधमाँल्लोकान्

यावच्छब्दः प्रकीर्त्यते ।। १४ ।।

'संसारमें जिस किसी प्राणीकी अपकीर्ति कही जाती है—जबतक उसके अपयशका शब्द गूँजता रहता है, तबतकके लिये वह नीचेके लोकोंमें गिर जाता है ।। १४ ।। तस्मात् कल्याणवृत्तः स्या- दनन्ताय नरः सदा । विहाय चित्तं पापिष्ठं धर्ममेव समाश्रयेत् ।। १५ ।। 'इसलिये मनुष्यको सदा कल्याणकारी सत्कर्मोंमें ही लगे रहना चाहिये। इससे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है। पापपूर्ण चित्त (चिन्तन या विचार)-का परित्याग करके सदा धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये' ।। १५ ।। इत्येतच्छ्रुत्वा स राजाब्रवीत् तिष्ठ तावद् यावदिमौ वृद्धौ यथास्थानं प्रतिपादयामीति ।। १६ ।। 'देवदूतकी यह बात सुनकर राजाने कहा—'जबतक इन दोनों वृद्धोंको इनके स्थानपर पहुँचा न दूँ तबतक ठहरे रहो' ।। १६ ।। स मां प्रावारकर्णं चोलूकं यथोचिते स्थाने प्रतिपाद्य तेनैव यानेन संस्थितो यथोचितं स्थानं प्रतिपेदे । तन्मयानुभूतं चिरजीविनेदृशमिति पाण्डवानुवाच मार्कण्डेयः ।। १७ ।। 'यह कहकर राजाने मुझे तथा प्रावारकर्ण नामक उलूकको यथोचित स्थानपर पहुँचा दिया और उसी रथसे स्वर्गकी ओर प्रस्थान करके वहाँ यथोचित स्थान प्राप्त कर लिया। इस प्रकार मैंने चिरजीवी होकर अनुभव किया है'—यह बात पाण्डवोंसे मार्कण्डेयजीने कही ।। पाण्डवाश्चोचुः साधु शोभनं भवता कृतं राजानमिन्द्रद्युम्नं स्वर्गलोकाच्च्युतं स्वे स्थाने प्रतिपादयतेत्यथैतानब्रवीदसौ ननु देवकीपुत्रेणापि कृष्णेन नरके मज्जमानो राजर्षिर्नृगस्तस्मात् कृच्छ्रात् पुनः समुद्धृत्य स्वर्गं प्रापित इति ।। १८ ।। पाण्डव बोले—'आपने यह बहुत अच्छा किया कि स्वर्गलोकसे भ्रष्ट हुए राजा इन्द्रद्युम्नको पुनः अपने स्थानकी प्राप्ति करवा दी।' तब इनसे मार्कण्डेयजीने कहा—'देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने भी नरकमें डूबते हुए राजर्षि नृगको उस भारी संकटसे छुड़ाकर फिर स्वर्गमें पहुँचा दिया' ।। १८ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि इन्द्रद्युम्नोपाख्याने नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९९ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें इन्द्रद्युम्नोपाख्यानविषयक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९९ ।।

निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण, दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्

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द्विशततमोऽध्यायः

निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण, दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा स राजा राजर्षेरिन्द्रद्युम्नस्य तत् तदा ।
मार्कण्डेयान्महाभागात् स्वर्गस्य प्रतिपादनम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरो महाराज पुनः पप्रच्छ तं मुनिम् ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! महाभाग मार्कण्डेयजीके मुखसे राजर्षि इन्द्रद्युम्नको पुनः स्वर्गकी प्राप्तिका वृत्तान्त सुनकर राजा युधिष्ठिरने उन मुनीश्वरसे फिर प्रश्न किया ॥ १ १/२ ॥

कीदृशीषु ह्यवस्थासु दत्त्वा दानं महामुने ॥ २ ॥
इन्द्रलोकं त्वनुभवेत् पुरुषस्तद् ब्रवीहि मे ।
‘महामुने! किन अवस्थाओंमें दान देकर मनुष्य इन्द्रलोकका सुख भोगता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें’ ॥ २ १/२ ॥

गार्हस्थ्येऽप्यथवा बाल्ये यौवने स्थविरेऽपि वा ।
यथा फलं समश्नाति तथा त्वं कथयस्व मे ॥ ३ ॥
‘मनुष्य बाल्यावस्था या गृहस्थाश्रममें, जवानीमें अथवा बुढ़ापेमें दान देनेसे जैसा फल पाता है, उसका मुझसे वर्णन कीजिये’ ॥ ३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

वृथा जन्मानि चत्वारि वृथा दानानि षोडश ।
वृथा जन्म ह्यपुत्रस्य ये च धर्मबहिष्कृताः ॥ ४ ॥
परपाकेषु येऽश्नन्ति आत्मार्थं च पचेत् तु यः ।
पर्यश्नन्ति वृथा ये च तदसत्यं प्रकीर्त्यते ॥ ५ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा—(नीचे लिखे अनुसार) चार प्रकारके जीवन व्यर्थ हैं और सोलह प्रकारके दान व्यर्थ हैं। जो पुत्र-हीन हैं, जो धर्मसे बहिष्कृत (भ्रष्ट) हैं, जो सदा दूसरोंकी ही रसोईमें भोजन किया करते हैं तथा जो केवल अपने लिये ही भोजन बनाते एवं

देवता और अतिथियोंको न देकर अकेले ही भोजन कर लेते हैं, उनका वह भोजन असत् कहा गया है। अतः उनका जन्म वृथा है (इस प्रकार इन चार प्रकारके मनुष्योंका जन्म व्यर्थ है) ॥ ४-५ ॥ आरूढपतिते दत्तमन्यायोपहृतं च यत् । व्यर्थं तु पतिते दानं ब्राह्मणे तस्करे तथा ॥ ६ ॥ जो वानप्रस्थ या संन्यास-आश्रमसे पुनः गृहस्थ-आश्रममें लौट आया हो, उसे 'आरूढ़-पतित' कहते हैं। उसको दिया हुआ दान व्यर्थ होता है। अन्यायसे कमाये हुए धनका दान भी व्यर्थ ही है। पतित ब्राह्मण तथा चोरको दिया हुआ दान भी व्यर्थ होता है ॥ ६ ॥ गुरौ चानृतिके पापे कृतघ्ने ग्रामयाजके । वेदविक्रयिणे दत्तं तथा वृषलयाजके ॥ ७ ॥ ब्रह्मबन्धुषु यद् दत्तं यद् दत्तं वृषलीपतौ । स्त्रीजनेषु च यद् दत्तं व्यालग्राहे तथैव च ॥ ८ ॥ परिचारकेषु यद् दत्तं वृथा दानानि षोडश । पिता आदि गुरुजन, मिथ्यावादी, पापी, कृतघ्न, ग्रामपुरोहित, वेदविक्रय करनेवाले, शूद्रसे यज्ञ करानेवाले, नीच ब्राह्मण, शूद्राके पति ब्राह्मण, साँपको पकड़कर व्यवसाय करनेवाले तथा सेवकों और स्त्री-समूहको दिया हुआ दान व्यर्थ है*। इस प्रकार ये सोलह दान निष्फल बताये गये हैं ॥ ७-८ १/२ ॥ तमोवृतस्तु यो दद्याद् भयात् क्रोधात् तथैव च ॥ ९ ॥ भुङ्क्ते च दानं तत् सर्वं गर्भस्थस्तु नरः सदा । ददद् दानं द्विजातिभ्यो वृद्धभावेन मानवः ॥ १० ॥ जो तमोगुणसे आवृत हो भय और क्रोधपूर्वक दान देता है, वह मनुष्य वैसे सब प्रकारके दानोंका फल भावी जन्ममें गर्भावस्थामें भोगता है, अर्थात् तामसी दान करनेके कारण वह उसका फल दुःखके रूपमें भोगता है तथा (श्रेष्ठ) ब्राह्मणोंको दान देनेवाला मानव उस दानका फल बड़ा होनेपर (कामनाके अनुसार) भोगता है ॥ ९-१० ॥ तस्मात् सर्वास्ववस्थासु सर्वदानानि पार्थिव । दातव्यानि द्विजातिभ्यः स्वर्गमार्गजिगीषया ॥ ११ ॥ राजन्! इसीलिये मनुष्यको चाहिये कि वह स्वर्ग-मार्गपर अधिकार पानेकी इच्छासे सभी अवस्थाओंमें (श्रेष्ठ) ब्राह्मणोंको ही सब प्रकारके दान दे ॥ ११ ॥

युधिष्ठिर उवाच

चातुर्वर्ण्यस्य सर्वस्य वर्तमानाः प्रतिग्रहे । केन विप्रा विशेषेण तारयन्ति तरन्ति च ॥ १२ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**महामुने! जो ब्राह्मण चारों वर्णोंमेंसे सभीके दान ग्रहण करते हैं, वे किस विशेष धर्मका पालन करनेसे दूसरोंको तारते और स्वयं भी तरते हैं ॥ १२ ॥

मार्कण्डेय उवाच

जपैर्मन्त्रैश्च होमैश्च स्वाध्यायाध्ययनेन च । नावं वेदमयीं कृत्वा तारयन्ति तरन्ति च ॥ १३ ॥ **मार्कण्डेयजीने कहा—**राजन्! ब्राह्मण जप, मन्त्र (पाठ), होम, स्वाध्याय और वेदाध्ययनके द्वारा वेदमयी नौकाका निर्माण करके दूसरोंको भी तारते हैं और स्वयं भी तर जाते हैं ॥ १३ ॥

ब्राह्मणांस्तोषयेद् यस्तु तुष्यन्ते तस्य देवताः । वचनाच्चापि विप्राणां स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥ १४ ॥ जो ब्राह्मणोंको संतुष्ट करता है, उसपर सब देवता संतुष्ट रहते हैं। ब्राह्मणोंके वचनसे अर्थात् आशीर्वादसे भी मनुष्य स्वर्गलोक पा सकता है ॥ १४ ॥

पितृदैवतपूजाभिर्ब्राह्मणाभ्यर्चनेन च । अनन्तं पुण्यलोकं तु गन्तासि त्वं न संशयः ॥ १५ ॥ राजन्! तुम पितरों और देवताओंकी पूजासे तथा ब्राह्मणोंका आदर-सत्कार करनेसे अक्षय पुण्यलोकमें जाओगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १५ ॥

श्लेष्मादिभिर्व्याप्ततनुर्म्रियमाणो विचेतनः । ब्राह्मणा एव सम्पूज्याः पुण्यं स्वर्गमभीप्सता ॥ १६ ॥ जिसका शरीर कफ आदिसे भर गया हो, जो मर रहा हो और अचेत हो गया हो, उसे पुण्यमय स्वर्गलोककी प्राप्ति अभीष्ट हो तो ब्राह्मणोंकी पूजा भी करनी चाहिये ॥ १६ ॥

श्राद्धकाले तु यत्नेन भोक्तव्या ह्यजुगुप्सिताः । दुर्वर्णः कुनखी कुष्ठी मायावी कुण्डगोलकौ ॥ १७ ॥ वर्जनीयाः प्रयत्नेन काण्डपृष्ठाश्च देहिनः । जुगुप्सितं हि यच्छ्राद्धं दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥ १८ ॥ श्राद्धकालमें प्रयत्न करके उत्तम ब्राह्मणोंको ही भोजन कराना चाहिये। जिनके शरीरका रंग घृणाजनक हो, नख काले पड़ गये हों, जो कोढ़ी और धूर्त हो, पिताकी जीवित-अवस्थामें ही माताके व्यभिचारसे जिनका जन्म हुआ हो अथवा जो विधवा माताके पेटसे पैदा हुए हों और जो पीठपर तरकस बाँधे क्षत्रियवृत्तिसे जीविका चलाते हों, ऐसे ब्राह्मणोंको श्राद्धमें प्रयत्नपूर्वक त्याग दे; क्योंकि उनको भोजन करानेसे श्राद्ध निन्दित हो जाता है और निन्दित श्राद्ध यजमानको उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे अग्नि काष्ठको जला डालती है ॥ १७-१८ ॥

ये ये श्राद्धे न युज्यन्ते मूकान्धबधिरादयः ।

तेऽपि सर्वे नियोक्तव्या मिश्रिता वेदपारगैः ॥ १९ ॥ किंतु अंधे, गूँगे, बहरे आदि जिन-जिन ब्राह्मणोंको श्राद्धमें वर्जित बताया गया है, उन सबको वेदपारंगत ब्राह्मणोंके साथ श्राद्धमें सम्मिलित किया जा सकता है ॥ १९ ॥

प्रतिग्रहश्च वै देयः शृणु यस्य युधिष्ठिर । प्रदातारं तथाऽऽत्मानं यस्तारयति शक्तिमान् ॥ २० ॥ युधिष्ठिर! अब मैं तुम्हें यह बताता हूँ कि कैसे व्यक्तिको दान देना चाहिये। जो दाताको और अपने-आपको भी तारनेकी शक्ति रखता हो ॥ २० ॥

तस्मिन् देयं द्विजे दानं सर्वागमविजानता । प्रदातारं यथाऽऽत्मानं तारयेद् यः स शक्तिमान् ॥ २१ ॥ सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता मानव उसी ब्राह्मणको दान दे, जो दाताका तथा अपना भी संसारसागरसे उद्धार कर सके। वही शक्तिशाली ब्राह्मण है ॥ २१ ॥

न तथा हविषो होमैर्न पुष्पैर्नानुलेपनैः । अग्नयः पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यातिथिभोजने ॥ २२ ॥ कुन्तीनन्दन! अतिथियोंको भोजन करानेसे अग्निदेव जितने संतुष्ट होते हैं, उतना संतोष उन्हें हविष्यका हवन करने तथा पुष्प और चन्दन चढ़ानेसे भी नहीं होता ॥ २२ ॥

तस्मात् त्वं सर्वयत्नेन यतस्वातिथिभोजने । पादोदकं पादघृतं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् ॥ २३ ॥ प्रयच्छन्ति तु ये राजन् नोपसर्पन्ति ते समम् । इसलिये तुम सभी उपायोंसे अतिथियोंको भोजन देनेका प्रयत्न करो। राजन्! जो लोग अतिथिको चरण धोनेके लिये जल, पैरमें मलनेके लिये तेल, उजालेके लिये दीपक, भोजनके लिये अन्न तथा रहनेके लिये स्थान देते हैं, वे कभी यमराजके यहाँ नहीं जाते ॥ २३ ½ ॥

देवमाल्यापनयनं द्विजोच्छिष्टावमार्जनम् ॥ २४ ॥ आकल्पः परिचर्या च गात्रसंवाहनानि च । अत्रैकैकं नृपश्रेष्ठ गोदानाद्व्यतिरिच्यते ॥ २५ ॥ नृपश्रेष्ठ! देवविग्रहोंपर चढ़े हुए चन्दन-पुष्प आदिको यथासमय उतारना, ब्राह्मणोंकी जूठन साफ करना, उन्हें चन्दन-माला आदिसे अलंकृत करना, उनकी सेवा-पूजा करना और उनके पैर आदि अंगोंको दबाना, इनमेंसे एक-एक कार्य गोदानसे भी अधिक महत्त्व रखता है ॥ २४-२५ ॥

कपिलायाः प्रदानात् तु मुच्यते नात्र संशयः । तस्मादलंकृतां दद्यात् कपिलां तु द्विजातये ॥ २६ ॥ कपिला गौका दान करनेसे मनुष्य निःसंदेह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसलिये कपिला गौको अलंकृत करके ब्राह्मणको दान करना चाहिये ॥ २६ ॥