महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
एतद् विकीर्णं सुश्रीमत् कैलासशिखरोपमम् । यत् पश्यसि नरश्रेष्ठ पर्वतप्रतिमं स्थितम् ॥ १५ ॥ एतान्यस्थीनि दैत्यस्य नरकस्य महात्मनः । पर्वतप्रतिमं भाति पर्वतप्रस्तराश्रितम् ॥ १६ ॥ 'नरश्रेष्ठ! यह जो सब ओर बिखरी हुई कैलासशिखरके समान सुन्दर प्रकाशयुक्त पर्वताकार वस्तु देख रहे हो, ये सब विशालकाय नरकासुरकी हड्डियाँ हैं। पर्वत और शिलाखण्डोंपर स्थित होनेके कारण ये भी पर्वतके समान ही प्रतीत होती हैं ॥ १५-१६ ॥
पुरातनेन देवेन विष्णुना परमात्मना । दैत्यो विनिहतस्तेन सुरराजहितैषिणा ॥ १७ ॥ 'पुरातन परमात्मा श्रीविष्णुदेवने देवराज इन्द्रका हित करनेकी इच्छासे उस दैत्यका वध किया था ॥ १७ ॥
दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्यन् महामनाः । ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं तपःस्वाध्यायविक्रमात् ॥ १८ ॥ 'वह महामना दैत्य दस हजार वर्षोंतक कठोर तपस्या करके तप, स्वाध्याय और पराक्रमसे इन्द्रका स्थान लेना चाहता था ॥ १८ ॥
तपोबलेन महता बाहुवेगबलेन च । नित्यमेव दुराधर्षो धर्षयन् स दितेः सुतः ॥ १९ ॥ 'अपने महान् तपोबल तथा वेगयुक्त बाहुबलसे वह देवताओंके लिये सदा अजेय बना रहता था और स्वयं सब देवताओंको सताया करता था ॥ १९ ॥
स तु तस्य बलं ज्ञात्वा धर्मे च चरितव्रतम् । भयाभिभूतः संविग्नः शक्र आसीत् तदानघ ॥ २० ॥ 'निष्पाप युधिष्ठिर! नरकासुर बलवान् तो था ही, धर्मके लिये भी उसने कितने ही उत्तम व्रतोंका आचरण किया था, यह सब जानकर इन्द्रको बड़ा भय हुआ, वे घबरा उठे ॥ २० ॥
तेन संचिन्तितो देवो मनसा विष्णुरव्ययः । सर्वत्रगः प्रभुः श्रीमानागतश्च स्थितो बभौ ॥ २१ ॥ 'तब उन्होंने मन-ही-मन अविनाशी भगवान् विष्णुका चिन्तन किया, उनके स्मरण करते ही सर्वव्यापी भगवान् श्रीपति वहाँ उपस्थित हो प्रकाशित हुए ॥ २१ ॥
ऋषयश्चापि तं सर्वे तुष्टुवुश्च दिवौकसः । तं दृष्ट्वा ज्वलमानश्रीर्भगवान् हव्यवाहनः ॥ २२ ॥ नष्टतेजाः समभवत् तस्य तेजोऽभिभर्त्सितः । तं दृष्ट्वा वरदं देवं विष्णुं देवगणेश्वरम् ॥ २३ ॥ प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा नमस्कृत्य च वज्रभृत् । प्राह वाक्यं ततस्तत्त्वं यतस्तस्य भयं भवेत् ॥ २४ ॥
'उस समय सभी देवताओं तथा ऋषियोंने उनकी स्तुति की। उन्हें देखते ही प्रज्वलित कान्तिसे सुशोभित भगवान् अग्निदेवका तेज नष्ट-सा हो गया। वे श्रीहरिके तेजसे तिरस्कृत हो गये। समस्त देवसमुदायके स्वामी एवं वरदायक भगवान् विष्णुका दर्शन करके वज्रधारी इन्द्रने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बार-बार मस्तक झुकाया। तदनन्तर वे सारी बातें भगवान्से कह सुनायीं, जिनके कारण उन्हें उस दैत्यसे भय हो रहा था' ।। २२—२४ ।।
विष्णुरुवाच जानामि ते भयं शक्र दैत्येन्द्रान्नरकात् ततः । ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं तपःसिद्धेन कर्मणा ॥ २५ ॥ **तब भगवान् विष्णुने कहा—**इन्द्र! मैं जानता हूँ, तुम्हें दैत्यराज नरकासुरसे भय प्राप्त हुआ है। वह अपने तपःसिद्ध कर्मोंद्वारा इन्द्रपदको लेना चाहता है ।। २५ ।।
सोऽहमेनं तव प्रीत्या तपःसिद्धमपि ध्रुवम् । वियुनज्मि देहाद् देवेन्द्र मुहूर्तं प्रतिपालय ॥ २६ ॥
देवेन्द्र! यद्यपि तपस्याद्वारा उसे सिद्धि प्राप्त हो चुकी है तो भी मैं तुम्हारे प्रेमवश निश्चय ही उस दैत्यको मार डालूँगा, तुम थोड़ी देर और प्रतीक्षा करो ।। २६ ।।
तस्य विष्णुर्महातेजाः पाणिना चेतनां हरत् । स पपात ततो भूमौ गिरिराज इवाहतः ॥ २७ ॥
ऐसा कहकर महातेजस्वी भगवान् विष्णुने हाथसे मारकर उस दैत्यके प्राण हर लिये और वह वज्रके मारे हुए गिरिराजकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २७ ॥ तस्यैतदस्थिसंघातं मायाविनिहतस्य वै । इदं द्वितीयमपरं विष्णोः कर्म प्रकाशते ॥ २८ ॥ इस प्रकार मायाद्वारा मारे गये उस दैत्यकी हड्डियोंका यह समूह दिखायी देता है। अब मैं भगवान् विष्णुका यह दूसरा पराक्रम बता रहा हूँ, जो सर्वत्र प्रकाशमान है ॥ २८ ॥ नष्टा वसुमती कृत्स्ना पाताले चैव मज्जिता । पुनरुद्धरिता तेन वाराहेणैकशृङ्गिणा ॥ २९ ॥ एक समय सारी पृथ्वी एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो गयी, पातालमें डूब गयी। उस समय भगवान् विष्णुने पर्वतशिखरके सदृश एक दाँतवाले वाराहका रूप धारण करके पुनः इसका उद्धार किया था ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् विस्तरेणेमां कथां कथय तत्त्वतः । कथं तेन सुरेशेन नष्टा वसुमती तदा ॥ ३० ॥ योजनानां शतं ब्रह्मन् पुनरुद्धरिता तदा । केन चैव प्रकारेण जगतो धरणी ध्रुवा ॥ ३१ ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! देवेश्वर भगवान् विष्णुने पातालमें सैकड़ों योजन नीचे डूबी हुई इस पृथ्वीका पुनरुद्धार किस प्रकार किया? आप इस कथाको यथार्थरूपसे और विस्तारपूर्वक कहिये। जगत्का भार धारण करनेवाली इस अचला पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये उन्होंने किस उपायका अवलम्बन किया? ॥ ३०-३१ ॥ शिवा देवी महाभागा सर्वसस्यप्ररोहिणी । कस्य चैव प्रभावाद्धि योजनानां शतं गता ॥ ३२ ॥ सम्पूर्ण शस्योंका उत्पादन करनेवाली यह कल्याणमयी महाभागा वसुधादेवी किसके प्रभावसे सैकड़ों योजन नीचे धँस गयी थी ॥ ३२ ॥ केन तद् वीर्यसर्वस्वं दर्शितं परमात्मनः । एतत् सर्वं यथातत्त्वमिच्छामि द्विजसत्तम । श्रोतुं विस्तरशः सर्वं त्वं हि तस्य प्रतिश्रयः ॥ ३३ ॥ परमात्माके उस अद्भुत पराक्रमका दर्शन (ज्ञान) किसने कराया था? द्विजश्रेष्ठ! यह सब मैं यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। आप इस वृत्तान्तके आश्रय (ज्ञाता) हैं ॥ ३३ ॥
लोमश उवाच
यत् तेऽहं परिपृष्टोऽस्मि कथामेतां युधिष्ठिर ।
तत् सर्वमखिलेनेह श्रूयतां मम भाषतः ॥ ३४ ॥ लोमशजीने कहा— युधिष्ठिर! तुमने जिसके विषयमें मुझसे प्रश्न किया है, वह कथा—वह सारा वृत्तान्त मैं बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३४ ॥ पुरा कृतयुगे तात वर्तमाने भयंकरे । यमत्वं कारयामास आदिदेवः पुरातनः ॥ ३५ ॥ तात! इस कल्पके प्रथम सत्ययुगकी बात है, एक समय बड़ी भयंकर परिस्थिति उत्पन्न हो गयी थी। उस समय आदिदेव पुरातन पुरुष भगवान् श्रीहरि ही यमराजका भी कार्य सम्पन्न करते थे ॥ ३५ ॥ यमत्वं कुर्वतस्तस्य देवदेवस्य धीमतः । न तत्र म्रियते कश्चिज्जायते वा तथाप्युत ॥ ३६ ॥ युधिष्ठिर! परम बुद्धिमान् देवदेव भगवान् श्रीहरिके यमराजका कार्य सँभालते समय किसी भी प्राणीकी मृत्यु नहीं होती थी; परंतु उत्पत्तिका कार्य पूर्ववत् चलता रहा ॥ वर्धन्ते पक्षिसंघाश्च तथा पशुगवेडकम् । गवाश्वं च मृगाश्चैव सर्वे ते पिशिताशनाः ॥ ३७ ॥ फिर तो पक्षियोंके समूह बढ़ने लगे। गाय, बैल, भेड़-बकरे आदि पशु, घोड़े, मृग तथा मांसाहारी जीव सभी बढ़ने लगे ॥ ३७ ॥ तथा पुरुषशार्दूल मानुषाश्च परंतप । सहस्रशो ह्ययुतशो वर्धन्ते सलिलं यथा ॥ ३८ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले नरश्रेष्ठ! जैसे बरसातमें पानी बढ़ता है, उसी प्रकार मनुष्य भी हजार एवं दस हजार गुनी संख्यामें बढ़ने लगे ॥ ३८ ॥ एतस्मिन् संकुले तात वर्तमाने भयंकरे । अतिभाराद् वसुमती योजनानां शतं गता ॥ ३९ ॥ तात! इस प्रकार सब प्राणियोंकी वृद्धि होनेसे जब बड़ी भयंकर अवस्था आ गयी तब अत्यन्त भारसे दबकर यह पृथ्वी सैकड़ों योजन नीचे चली गयी ॥ ३९ ॥ सा वै व्यथितसर्वाङ्गी भारेणाक्रान्तचेतना । नारायणं वरं देवं प्रपन्ना शरणं गता ॥ ४० ॥ भारी भारके कारण पृथ्वी देवीके सम्पूर्ण अंगोंमें बड़ी पीड़ा हो रही थी। उसकी चेतना लुप्त होती जा रही थी। अतः वह सर्वश्रेष्ठ देवता भगवान् नारायणकी शरणमें गयी ॥ ४० ॥
पृथिव्युवाच भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तिष्ठेयं सुचिरं त्विह । भारेणास्मि समाक्रान्ता न शक्नोमि स्म वर्तितुम् ॥ ४१ ॥
पृथ्वी बोली— भगवन्! आप ऐसी कृपा करें जिससे मैं दीर्घ कालतक यहाँ स्थिर रह सकूँ। इस समय मैं भारसे इतनी दब गयी हूँ कि जीवन धारण नहीं कर सकती ॥ ४१ ॥ ममेमं भगवन् भारं व्यपनेतुं त्वमर्हसि । शरणागतास्मि ते देव प्रसादं कुरु मे विभो ॥ ४२ ॥ भगवन्! मेरे इस भारको आप दूर करनेकी कृपा करें। देव! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। विभो! मुझपर कृपाप्रसाद कीजिये ॥ ४२ ॥ तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा भगवानक्षरः प्रभुः । प्रोवाच वचनं हृष्टः श्रव्याक्षरसमीरितम् ॥ ४३ ॥ पृथ्वीका यह वचन सुनकर अविनाशी भगवान् नारायणने प्रसन्न होकर श्रवणमधुर अक्षरोंसे युक्त मीठी वाणीमें कहा ॥ ४३ ॥
विष्णुरुवाच न ते महि भयं कार्यं भारार्ते वसुधारिणि । अहमेवं तथा कुर्मि यथा लघ्वी भविष्यसि ॥ ४४ ॥ भगवान् विष्णु बोले— वसुधे! तू भारसे पीड़ित है; किंतु अब उसके लिये भय न कर। मैं अभी ऐसा उपाय करता हूँ जिससे तू हलकी हो जायगी ॥ ४४ ॥
लोमश उवाच स तां विसर्जयित्वा तु वसुधां शैलकुण्डलाम् । ततो वराहः संवृत्त एकशृङ्गो महाद्युतिः ॥ ४५ ॥ लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! पर्वतरूपी कुण्डलोंसे विभूषित वसुधादेवीको विदा करके महातेजस्वी भगवान् विष्णुने वाराहका रूप धारण कर लिया। उस समय उनके एक ही दाँत था, जो पर्वत-शिखरके समान सुशोभित होता था ॥ ४५ ॥ रक्ताभ्यां नयनाभ्यां तु भयमुत्पादयन्निव । धूमं च ज्वलयँल्लक्ष्म्या तत्र देशे व्यवर्धत ॥ ४६ ॥ वे अपने लाल-लाल नेत्रोंसे मानो भय उत्पन्न कर रहे थे और अपनी अंगकान्तिसे धूम प्रकट करते हुए उस स्थानपर बढ़ने लगे ॥ ४६ ॥ स गृहीत्वा वसुमतीं शृङ्गेणैकेन भास्वता । योजनानां शतं वीर समुद्धरति सोऽक्षरः ॥ ४७ ॥ वीर युधिष्ठिर! अविनाशी भगवान् विष्णुने अपने एक ही तेजस्वी दाँतके द्वारा पृथ्वीको थामकर उसे सौ योजन ऊपर उठा दिया ॥ ४७ ॥ तस्यां चोद्धार्यमाणायां संक्षोभः समजायत । देवाः संक्षुभिताः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः ॥ ४८ ॥
पृथ्वीको उठाते समय सब ओर भारी हलचल मच गयी। सम्पूर्ण देवता तथा तपस्वी ऋषि क्षुब्ध हो उठे ।। हाहाभूतमभूत् सर्वं त्रिदिवं व्योम भूस्तथा । न पर्यवस्थितः कश्चिद् देवो वा मानुषोऽपि वा ।। ४९ ।। ततो ब्रह्माणमासीनं ज्वलमानमिव श्रिया । देवाः सर्षिगणाश्चैव उपतस्थुरनेकणः ।। ५० ।। स्वर्ग, अन्तरिक्ष तथा भूलोक सबमें अत्यन्त हाहाकार मच गया। कोई भी देवता या मनुष्य स्थिर नहीं रह सका। तब अनेक देवता और ऋषि ब्रह्माजीके समीप गये। उस समय वे अपने आसनपर बैठकर दिव्य कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे ।। ४९-५० ।। उपसर्प्य च देवेशं ब्रह्माणं लोकसाक्षिकम् । भूत्वा प्राञ्जलयः सर्वे वाक्यमुच्चारयंस्तदा ।। ५१ ।। लोकसाक्षी देवेश्वर ब्रह्माके निकट पहुँचकर सबने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा— ।। ५१ ।। लोकाः संक्षुभिताः सर्वे व्याकुलं च चराचरम् । समुद्राणां च संक्षोभस्त्रिदशेश प्रकाशते ।। ५२ ।। ‘देवेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंमें हलचल मच गयी है। चर और अचर सभी प्राणी व्याकुल हैं। समुद्रोंमें बड़ा भारी क्षोभ दिखायी दे रहा है ।। ५२ ।। सैषा वसुमती कृत्स्ना योजनानां शतं गता । किमेतद् किं प्रभावेण येनेदं व्याकुलं जगत् । अख्यातु नो भवान् शीघ्रं विसंज्ञाः स्मेह सर्वशः ।। ५३ ।। ‘यह सारी पृथ्वी सैकड़ों योजन नीचे चली गयी थी, अब यह किसके प्रभावसे कौन-सी अद्भुत घटना घटित हो रही है जिससे सारा संसार व्याकुल हो उठा है। आप शीघ्र हमें इसका कारण बताइये। हम सब लोग अचेत-से हो रहे हैं’ ।। ५३ ।।
ब्रह्मोवाच
असुरेभ्यो भयं नास्ति युष्माकं कुत्रचित् क्वचित् । श्रूयतां यत्कृतेष्वेष संक्षोभो जायतेऽमराः ।। ५४ ।। योऽसौ सर्वत्रगः श्रीमानक्षरात्मा व्यवस्थितः। तस्य प्रभावात् संक्षोभस्त्रिदिवस्य प्रकाशते ।। ५५ ।। ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! तुम्हें असुरोंसे कभी और कोई भय नहीं है। यह जो चारों ओर क्षोभ फैल रहा है, इसका क्या कारण है? वह सुनो। वे जो सर्वव्यापी अक्षरस्वरूप श्रीमान् भगवान् नारायण हैं, उन्हींके प्रभावसे यह स्वर्गलोकमें क्षोभ प्रकट हो रहा है ।। ५४-५५ ।।
यैषा वसुमती कृत्स्ना योजनानां शतं गता । समुद्धृता पुनस्तेन विष्णुना परमात्मना ॥ ५६ ॥ यह सारी पृथ्वी, जो सैकड़ों योजन नीचे चली गयी थी, इसे परमात्मा श्रीविष्णुने पुनः ऊपर उठाया है ॥ ५६ ॥
तस्यामुद्धार्यमाणायां संक्षोभः समजायत । एवं भवन्तो जानन्तु छिद्यतां संशयश्च वः ॥ ५७ ॥ इस पृथ्वीका उद्धार करते समय ही सब ओर यह महान् क्षोभ प्रकट हुआ है। इस प्रकार तुम्हें इस विश्वव्यापी हलचलका यथार्थ कारण ज्ञात होना और तुम्हारा आन्तरिक संशय दूर हो जाना चाहिये ॥ ५७ ॥
देवा ऊचुः क्व तद् भूतं वसुमतीं समुद्धरति हृष्टवत् । तं देशं भगवन् ब्रूहि तत्र यास्यामहे वयम् ॥ ५८ ॥ देवता बोले—भगवन्! वे वाराहरूपधारी भगवान् प्रसन्न-से होकर कहाँ पृथ्वीका उद्धार कर रहे हैं, उस प्रदेशका पता हमें बताइये; हम सब लोग वहाँ जायेंगे ॥ ५८ ॥
ब्रह्मोवाच हन्त गच्छत भद्रं वो नन्दने पश्यत स्थितम् । एषोऽत्र भगवान् श्रीमान् सुपर्णः सम्प्रकाशते ॥ ५९ ॥ वाराहेणैव रूपेण भगवाँल्लोकभावनः । कालानल इवाभाति पृथिवीतलमुद्धरन् ॥ ६० ॥ ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! बड़े हर्षकी बात है, जाओ। तुम्हारा कल्याण हो। भगवान् नन्दनवनमें विराजमान हैं। वहीं उनका दर्शन करो। उस वनके निकट ये स्वर्णके समान सुन्दर रोमवाले परम कान्तिमान् विश्वभावन भगवान् श्रीविष्णु वाराहरूपसे प्रकाशित हो रहे हैं। भूतलका उद्धार करते हुए वे प्रलयकालीन अग्निके समान उद्भासित होते हैं ॥ ५९-६० ॥
एतस्योरसि सुव्यक्तं श्रीवत्समभिराजते । पश्यध्वं विबुधाः सर्वे भूतमेतदनामयम् ॥ ६१ ॥ इनके वक्षःस्थलमें स्पष्टरूपसे श्रीवत्सचिह्न प्रकाशित हो रहा है। देवताओ! ये रोग-शोकसे रहित साक्षात् भगवान् ही वाराहरूपसे प्रकट हुए हैं, तुम सब लोग इनका दर्शन करो ॥ ६१ ॥
लोमश उवाच ततो दृष्ट्वा महात्मानं श्रुत्वा चामन्त्र्य चामराः ।
पितामहं पुरस्कृत्य जग्मुर्देवा यथागतम् ॥ ६२ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर देवताओंने जाकर वाराहरूपधारी परमात्मा श्रीविष्णुका दर्शन किया, उनकी महिमा सुनी और उनकी आज्ञा लेकर वे ब्रह्माजीको आगे करके जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥ ६२ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तु तां कथां सर्वे पाण्डवा जनमेजय ।
लोमशादेशितेनाशु पथा जग्मुः प्रहृष्टवत् ॥ ६३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह कथा सुनकर सब पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए और लोमशजीके बताये हुए मार्गसे शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ गये ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे
द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४२ ॥
१४३-
त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना
वैशम्पायन उवाच
ते शूरास्ततधन्वानस्तूणवन्तः समागॆणाः ।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणाः खड्गवन्तोऽमितौजसः ॥ १ ॥
परिगृह्य द्विजश्रेष्ठाञ्ज्येष्ठाः सर्वधनुष्मताम् ।
पाञ्चालीसहिता राजन् प्रययुर्गन्धमान्दनम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें अग्रगण्य वे अमिततेजस्वी शूरवीर पाण्डव धनुष, बाण, तरकश, ढाल और तलवार लिये, हाथोंमें गोहके चमड़ेके बने दस्ताने पहने और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको आगे किये द्रौपदीके साथ गन्धमादन पर्वतकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १-२ ॥
सरांसि सरितश्चैव पर्वतांश्च वनानि च ।
वृक्षांश्च बहुलच्छायान् ददृशुर्गिरिमूर्धनि ॥ ३ ॥
पर्वतके शिखरपर उन्होंने बहुत-से सरोवर, सरिताएँ, पर्वत, वन तथा घनी छायावाले वृक्ष देखे ॥ ३ ॥
नित्यपुष्पफलान् देशान् देवर्षिगणसेवितान् ।
आत्मन्यात्मानमाधाय वीरा मूलफलाशिनः ॥ ४ ॥
चेरुरुच्चावचाकारान् देशान् विषमसंकटान् ।
पश्यन्तो मृगजातानि बहूनि विविधानि च ॥ ५ ॥
उन्हें कितने ही ऐसे स्थान दृष्टिगोचर हुए जहाँ सदा फूल और फलोंकी बहुतायत रहती थी। उन प्रदेशोंमें देवर्षियोंके समुदाय निवास करते थे। वीर पाण्डव अपने मनको परमात्माके चिन्तनमें लगाकर फल-मूलका आहार करते हुए ऊँचे-नीचे विषम-संकटपूर्ण स्थानोंमें विचर रहे थे। मार्गमें उन्हें नाना प्रकारके मृगसमूह दिखायी देते थे जिनकी संख्या बहुत थी ॥ ४-५ ॥
ऋषिसिद्धामरयुतं गन्धर्वाप्सरसां प्रियम् ।
विविशुस्ते महात्मानः किन्नराचरितं गिरिम् ॥ ६ ॥
इस प्रकार उन महात्मा पाण्डवोंने गन्धर्वों और अप्सराओंकी प्रिय भूमि, किन्नरोंकी क्रीडास्थली तथा ऋषियों, सिद्धों और देवताओंके निवासस्थान गन्धमादन पर्वतकी घाटीमें प्रवेश किया ॥ ६ ॥
प्रविशत्स्वथ वीरेषु पर्वत॑ गन्धमादनम् । चण्डवातं महद् वर्षं प्रादुरासीद् विशाम्पते ॥ ७ ॥ राजन्! वीर पाण्डवोंके गन्धमादन पर्वतपर पदार्पण करते ही प्रचण्ड आँधीके साथ बड़े जोरकी वर्षा होने लगी ॥ ७ ॥
ततो रेणुः समुद्भूतः सपत्रबहुलो महान् । पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव सहसाऽऽवृणोत् ॥ ८ ॥ फिर धूल और पत्तोंसे भरा हुआ बड़ा भारी बवंडर (आँधी) उठा, जिसने पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गको भी सहसा आच्छादित कर दिया ॥ ८ ॥
न स्म प्रज्ञायते किंचिदावृते व्योम्नि रेणुना । न चापि शेकुस्तत् कर्तुमन्योन्यस्याभिभाषणम् ॥ ९ ॥ न चापश्यंस्ततोऽन्योन्यं तमसावृतचक्षुषः । आकृष्यमाणा वातेन साश्मचूर्णेन भारत ॥ १० ॥ धूलसे आकाशके ढक जानेसे कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था; इसलिये वे एक-दूसरेसे बातचीत भी नहीं कर पाते थे। अन्धकारने आँखोंपर पर्दा डाल दिया था; जिससे पाण्डवलोग एक-दूसरेके दर्शनसे भी वञ्चित हो गये थे। भारत! पत्थरोंका चूर्ण बिखेरती हुई वायु उन्हें कहीं-से-कहीं खींच लिये जाती थी ॥ ९-१० ॥
द्रुमाणां वातभग्नानां पततां भूतलेऽनिशम् । अन्येषां च महीजानां शब्दः समभवन्महान् ॥ ११ ॥ प्रचण्ड वायुके वेगसे टूटकर निरन्तर धरतीपर गिरनेवाले वृक्षों तथा अन्य झाड़ोंका भयंकर शब्द सुनायी पड़ता था ॥ ११ ॥
द्यौः स्वित् पतति किं भूमिर्दीर्यते पर्वतो नु किम् । इति ते मेनिरे सर्वे पवनेनापि मोहिताः ॥ १२ ॥ हवाके झोंकेसे मोहित होकर वे सब-के-सब मन-ही-मन सोचने लगे कि आकाश तो नहीं फट पड़ा है। पृथ्वी तो नहीं विदीर्ण हो रही है अथवा कोई पर्वत तो नहीं फटा जा रहा है ॥ १२ ॥
ते पथानन्तरान् वृक्षान् वल्मीकान् विषमाणि च । पाणिभिः परिमार्गन्तो भीता वायोर्निलिल्यिरे ॥ १३ ॥ तत्पश्चात् वे रास्तेके आस-पासके वृक्षों, मिट्टीके ढेरों और ऊँचे-नीचे स्थानोंको हाथोंसे टटोलते हुए हवासे डरकर यत्र-तत्र छिपने लगे ॥ १३ ॥
ततः कार्मुकमादाय भीमसेनो महाबलः । कृष्णामादाय संगम्य तस्थावाश्रित्य पादपम् ॥ १४ ॥ उस समय महाबली भीमसेन हाथमें धनुष लिये द्रौपदीको अपने साथ रखकर एक वृक्षके सहारे खड़े हो गये ॥ १४ ॥
धर्मराजश्च धौम्यश्च निलिल्येते महावने । अग्निहोत्राण्युपादाय सहदेवस्तु पर्वते ॥ १५ ॥ धर्मराज युधिष्ठिर और पुरोहित धौम्य अग्निहोत्रकी सामग्री लिये उस महान् वनमें कहीं जा छिपे। सहदेव पर्वतपर ही (कहीं सुरक्षित स्थानमें) छिप गये ॥ १५ ॥
नकुलो ब्राह्मणांश्चान्ये लोमशश्च महातपाः । वृक्षानासाद्य संत्रस्तास्तत्र तत्र निलिल्यिरे ॥ १६ ॥ नकुल, अन्यान्य ब्राह्मणलोग तथा महातपस्वी लोमशजी भी भयभीत होकर जहाँ-तहाँ वृक्षोंकी आड़ लेकर छिपे रहे ॥ १६ ॥
मन्दीभूते तु पवने तस्मिन् रजसि शाम्यति । महद्भिर्जलधारौघैर्वर्षमभ्याजगाम ह ॥ १७ ॥ भृशं चटचटाशब्दो वज्राणां क्षिप्यतामिव । ततस्ताश्चञ्चलाभासश्चेरुरभ्रेषु विद्युततः ॥ १८ ॥ थोड़ी देरमें जब वायुका वेग कुछ कम हुआ और धूल उड़नी बंद हो गयी, उस समय बड़ी भारी जलधारा बरसने लगी। तदनन्तर वज्रपातके समान मेघोंकी गड़गड़ाहट होने लगी और मेघमालाओंमें चारों ओर चंचल चमकवाली बिजलियाँ संचरण करने लगीं ॥ १७-१८ ॥
ततोऽश्मसहिता धाराः संवृण्वन्त्यः समन्ततः । प्रपेतुरनिशं तत्र शीघ्रवातसमीरिताः ॥ १९ ॥ तत्पश्चात् तीव्र वायुसे प्रेरित हो समस्त दिशाओंको आच्छादित करती हुई ओलोंसहित जलकी धाराएँ अविराम गतिसे गिरने लगीं ॥ १९ ॥
तत्र सागरगा ह्यापः कीर्यमाणाः समन्ततः । प्रादुरासन् सकलुषाः फेनवत्यो विशाम्पते ॥ २० ॥ महाराज! वहाँ चारों ओर बिखरी हुई जलराशि समुद्रगामिनी नदियोंके रूपमें प्रकट हो गयी जो मिट्टी मिल जानेसे मलिन दीख पड़ती थी। उसमें झाग उठ रहे थे ॥ २० ॥
वहन्त्यो वारि बहुलं फेनोडुपपरिप्लुतम् । परिसस्रुर्महाशब्दाः प्रकर्षन्त्यो महीरुहान् ॥ २१ ॥ फेनरूपी नौकासे व्याप्त अगाध जलसमूहको बहाती हुई सरिताएँ टूटकर गिरे हुए वृक्षोंको अपनी लहरोंसे समेटकर जोर-जोरसे 'हर-हर' ध्वनि करती हुई बह रही थीं ॥ २१ ॥
तस्मिन्नुपरते शब्दे वाते च समतां गते । गते ह्यम्भसि निम्नानि प्रादुर्भूते दिवाकरे ॥ २२ ॥ निर्जग्मुस्ते शनैः सर्वे समाजग्मुश्च भारत । प्रतस्थिरे पुनर्वीराः पर्वतं गन्धमादनम् ॥ २३ ॥
भारत! थोड़ी देर बाद जब तूफानका कोलाहल शान्त हुआ, वायुका वेग कम एवं सम हो गया, पर्वतका सारा जल बहकर नीचे चला गया और बादलोंका आवरण दूर हो जानेसे सूर्यदेव प्रकाशित हो उठे, उस समय वे समस्त वीर पाण्डव धीरे-धीरे अपने स्थानसे निकले और गन्धमादन पर्वतकी ओर प्रस्थित हो गये ॥ २२-२३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४३ ॥
१४४-
चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन
वैशम्पायन उवाच
क्रोशमात्रं प्रयातेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
पद्भ्यामनुचिता गन्तुं द्रौपदी समुपाविशत् ॥ १ ॥
श्रान्ता दुःखपरीता च वातवर्षेण तेन च ।
सौकुमार्याच्च पाञ्चाली सम्मुमोह तपस्विनी ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! महात्मा पाण्डव अभी कोसभर ही गये होंगे कि पांचालराजकुमारी तपस्विनी द्रौपदी सुकुमारताके कारण थककर बैठ गयी। वह पैदल चलनेयोग्य कदापि नहीं थी। उस भयानक वायु और वर्षासे पीड़ित हो दुःखमग्न होकर वह मूर्छित होने लगी थी ॥ १-२ ॥
सा कम्पमाना मोहेन बाहुभ्यामसितेक्षणा ।
वृत्ताभ्यामनुरूपाभ्यामूरू समवलम्बत ॥ ३ ॥
घबराहटसे काँपती हुई कजरारे नेत्रोंवाली कृष्णाने अपने गोल-गोल और सुन्दर हाथोंसे दोनों जाँघोंको थाम लिया ॥ ३ ॥
आलम्बमाना सहितावूरू गजकरोपमौ ।
पपात सहसा भूमौ वेपन्ती कदली यथा ॥ ४ ॥
तां पतन्तीं वरारोहां भज्यमानां लतामिव ।
नकुलः समभिद्रुत्य परिजग्राह वीर्यवान् ॥ ५ ॥
हाथीकी सूँड़के समान चढ़ाव-उतारवाली परस्पर सटी हुई जाँघोंका सहारा ले केलेके वृक्षकी भाँति काँपती हुई वह सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी। सुन्दर अंगोंवाली द्रौपदीको टूटी हुई लताकी भाँति गिरती देख बलशाली नकुलने दौड़कर थाम लिया ॥ ४-५ ॥
नकुल उवाच
राजन् पञ्चालराजस्य सुतेयमसितेक्षणा ।
श्रान्ता निपतिता भूमौ तामवेक्षस्व भारत ॥ ६ ॥
**तत्पश्चात् नकुलने कहा—**भरतकुलभूषण महाराज! यह श्याम नेत्रवाली पांचालराजकुमारी द्रौपदी थककर धरतीपर गिर पड़ी है, आप आकर इसे देखिये ॥ ६ ॥
अदुःखार्हा परं दुःखं प्राप्तेयं मृदुगामिनी ।
आश्वासय महाराज तामिमां श्रमकर्शिताम् ॥ ७ ॥
राजन्! यह मन्दगतिसे चलनेवाली देवी दुःख सहन करनेके योग्य नहीं है; तो भी इसपर महान् दुःख आ पड़ा है। रास्तेके परिश्रमसे यह दुर्बल हो गयी है। आप आकर इसे सान्त्वना दें ।। ७ ।।
वैशम्पायन उवाच
राजा तु वचनात् तस्य भृशं दुःखसमन्वितः । भीमश्च सहदेवश्च सहसा समुपाद्रवन् ।। ८ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नकुलकी यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुखी हो गये और भीम तथा सहदेवके साथ सहसा वहाँ दौड़े आये ।। ८ ।। तामवेक्ष्य तु कौन्तेयो विवर्णवदनां कृशाम् । अङ्कमानीय धर्मात्मा पर्यदेवयदातुरः ।। ९ ।। धर्मात्मा कुन्तीनन्दनने देखा—द्रौपदीके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी है और उसका शरीर कृश हो गया है। तब वे उसे अंकमें लेकर शोकातुर हो विलाप करने लगे ।। ९ ।।
युधिष्ठिर उवाच
कथं वेश्मसु गुप्तेषु स्वास्तीर्णशयनोचिता । भूमौ निपतिता शेते सुखार्हा वरवर्णिनी ।। १० ।। युधिष्ठिर बोले—अहो! जो सुरक्षित सदनोंमें सुसज्जित सुकोमल शय्यापर शयन करनेयोग्य है, वह सुख भोगनेकी अधिकारिणी परम सुन्दरी कृष्णा आज पृथ्वीपर कैसे सो रही है? ।। १० ।।
सुकुमारौ कथं पादौ मुखं च कमलप्रभम् ।
मत्कृतेऽद्य वरार्हायाः श्यामतां समुपागतम् ॥ ११ ॥
जो सुखके श्रेष्ठ साधनोंका उपभोग करनेयोग्य है, उसी द्रौपदीके ये दोनों सुकुमार चरण और कमलकी कान्तिसे सुशोभित मुख आज मेरे कारण कैसे काले पड़ गये हैं? ॥ ११ ॥
किमिदं द्यूतकामेन मया कृतमबुद्धिना ।
आदाय कृष्णां चरता वने मृगगणायुते ॥ १२ ॥
मुझ मूर्खने द्यूतक्रीड़ाकी कामनामें फँसकर यह क्या कर डाला? अहो! सहस्रों मृगसमूहोंसे भरे हुए इस भयानक वनमें द्रौपदीको साथ लेकर हमें विचरना पड़ा है ॥ १२ ॥
सुखं प्राप्स्यसि कल्याणि पाण्डवान् प्राप्य वै पतीन् ।
इति द्रुपदराजेन पित्रा दत्ताऽऽयतेक्षणा ॥ १३ ॥
तत् सर्वमनवाप्येयं श्रमशोकाध्वकर्शिता ।
शेते निपतिता भूमौ पापस्य मम कर्मभिः ॥ १४ ॥
इसके पिता राजा द्रुपदने इस विशाललोचना द्रौपदीको यह कहकर हमें प्रदान किया था कि ‘कल्याणि! तुम पाण्डवोंको पतिरूपमें पाकर सुखी होगी।’ परंतु मुझ पापीकी
करतूतोंसे वह सब न पाकर यह परिश्रम, शोक और मार्गके कष्टसे कृश होकर आज पृथ्वीपर पड़ी सो रही है ॥ १३-१४ ॥
वैशम्पायन उवाच
तथा लालप्यमाने तु धर्मराजे युधिष्ठिरे । धौम्यप्रभृतयः सर्वे तत्राजग्मुर्द्विजोत्तमाः ॥ १५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिर जब इस प्रकार विलाप कर रहे थे, उसी समय धौम्य आदि समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मण भी वहाँ आ पहुँचे ॥ १५ ॥
ते समाश्वासयामासुराशीर्भिश्वाप्यपूजयन् । रक्षोघ्नांश्च तथा मन्त्रान्जेपुश्चक्रुश्च ते क्रियाः ॥ १६ ॥ उन्होंने महाराजको आश्वासन दिया और अनेक प्रकारके आशीर्वाद देकर उन्हें सम्मानित किया। तत्पश्चात् वे राक्षसोंका विनाश करनेवाले मन्त्रोंका जप तथा शान्तिकर्म करने लगे ॥ १६ ॥
पठ्यमानेषु मन्त्रेषु शान्त्यर्थं परमर्षिभिः । स्पृश्यमाना करैः शीतैः पाण्डवैश्च मुहुर्मुहुः ॥ १७ ॥ महर्षियोंद्वारा शान्तिके लिये मन्त्रपाठ होते समय पाण्डवोंने अपने शीतल हाथोंसे बार-बार द्रौपदीके अंगोंको सहलाया ॥ १७ ॥
सेव्यमाना च शीतेन जलमिश्रेण वायुना । पाञ्चाली सुखमासाद्य लेभे चेतः शनैः शनैः ॥ १८ ॥ जलका स्पर्श करके बहती हुई शीतल वायुने भी उसे सुख पहुँचाया। इस प्रकार कुछ आराम मिलनेपर पांचालराजकुमारी द्रौपदीको धीरे-धीरे चेत हुआ ॥ १८ ॥
परिगृह्य च तां दीनां कृष्णाजिनसंस्तरे । पार्था विश्रामयामासुर्लब्धसंज्ञां तपस्विनीम् ॥ १९ ॥ तस्या यमौ रक्ततलौ पादौ पूजितलक्षणौ । कराभ्यां किणजाताभ्यां शनकैः संववाहतुः ॥ २० ॥ होशमें आनेपर दीनावस्थामें पड़ी हुई तपस्विनी द्रौपदीको पकड़कर पाण्डवोंने मृगचर्मके बिस्तरपर सुलाया और उसे विश्राम कराया। नकुल और सहदेवने धनुषकी रगड़के चिह्नसे सुशोभित दोनों हाथोंद्वारा उसके लाल तलवोंसे युक्त और उत्तम लक्षणोंसे अलंकृत दोनों चरणोंको धीरे-धीरे दबाया ॥ १९-२० ॥
पर्याश्वासयदप्येनां धर्मराजो युधिष्ठिरः । उवाच च कुरुश्रेष्ठो भीमसेनमिदं वचः ॥ २१ ॥ फिर कुरुश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरने भी द्रौपदीको बहुत आश्वासन दिया और भीमसेनसे इस प्रकार कहा— ॥
बहवः पर्वता भीम विषमा हिमदुर्गमाः । तेषु कृष्णा महाबाहो कथं नु विचरिष्यति ॥ २२ ॥ ‘महाबाहु भीम! यहाँ बहुत-से ऊँचे-नीचे पर्वत हैं, जिनपर चलना बर्फके कारण अत्यन्त कठिन है। उनपर द्रौपदी कैसे जा सकेगी?’ ॥ २२ ॥
भीमसेन उवाच
त्वां राजन् राजपुत्रीं च यमौ च पुरुषर्षभ । स्वयं नेष्यामि राजेन्द्र मा विषादे मनः कृथाः ॥ २३ ॥ **भीमसेनने कहा—**पुरुषरत्न! महाराज! आप मनमें खेद न करें। मैं स्वयं राजकुमारी द्रौपदी, नकुल-सहदेव और आपको भी ले चलूँगा ॥ २३ ॥ हैडिम्बश्च महावीर्यो विहगो मद्बलोपमः । वहेदनघ सर्वान्नो वचनात् ते घटोत्कचः ॥ २४ ॥ हिडिम्बाका पुत्र घटोत्कच भी महान् पराक्रमी है। वह मेरे ही समान बलवान् है और आकाशमें चल-फिर सकता है। अनघ! आपकी आज्ञा होनेपर वह हम सबको अपनी पीठपर बिठाकर ले चलेगा ॥ २४ ॥
वैशम्पायन उवाच
अनुज्ञातो धर्मराज्ञा पुत्रं सस्मार राक्षसम् । घटोत्कचस्तु धर्मात्मा स्मृतमात्रः पितुस्तदा ॥ २५ ॥ कृताञ्जलिरुपातिष्ठदभिवाद्याथ पाण्डवान् । ब्राह्मणांश्च महाबाहुः स च तैरभिनन्दितः ॥ २६ ॥ उवाच भीमसेनं स पितरं भीमविक्रमम् । स्मृतोऽस्मि भवता शीघ्रं शुश्रूषुरहमागतः ॥ २७ ॥ आज्ञापय महाबाहो सर्वं कर्तास्म्यसंशयम् । तच्छ्रुत्वा भीमसेनस्तु राक्षसं परिषस्वजे ॥ २८ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर धर्मराजकी आज्ञा पाकर भीमसेनने अपने राक्षसपुत्रका स्मरण किया। पिताके स्मरण करते ही धर्मात्मा घटोत्कच हाथ जोड़े हुए वहाँ उपस्थित हुआ। उस महाबाहु वीरने पाण्डवों तथा ब्राह्मणोंको प्रणाम करके उनके द्वारा सम्मानित हो अपने भयंकर पराक्रमी पिता भीमसेनसे कहा—‘महाबाहो! आपने मेरा स्मरण किया है और मैं शीघ्र ही सेवाकी भावनासे आया हूँ, आज्ञा कीजिये; मैं आपका सब कार्य अवश्य ही पूर्ण करूँगा।’ यह सुनकर भीमसेनने राक्षस घटोत्कचको हृदयसे लगा लिया ॥ २५—२८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४४ ॥
घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष, नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन
पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष, नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
धर्मज्ञो बलवान् शूरः सत्यो राक्षसपुङ्गवः ।
भक्तोऽस्मानौरसः पुत्रो भीम गृह्णातु मा चिरम् ॥ १ ॥
तव भीम सुतेनाहमतिभीमपराक्रम ।
अक्षतः सह पाञ्चाल्या गच्छेयं गन्धमादनम् ॥ २ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**अत्यन्त भयानक पराक्रम दिखानेवाले भीम! तुम्हारा औरस पुत्र राक्षसश्रेष्ठ घटोत्कच धर्मज्ञ, बलवान्, शूरवीर, सत्यवादी तथा हमलोगोंका भक्त है। यह हमें शीघ्र उठा ले चले। जिससे भीमसेन! तुम्हारे पुत्र घटोत्कचद्वारा शरीरसे किसी प्रकारकी क्षति उठाये बिना ही मैं द्रौपदीसहित गन्धमादन पर्वतपर पहुँच जाऊँ ॥ १-२ ॥
वैशम्पायन उवाच
भ्रातुर्वचनमाज्ञाय भीमसेनो घटोत्कचम् ।
आदिदेश नरव्याघ्रस्तनयं शत्रुकर्शनम् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! भाईकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके नरश्रेष्ठ भीमसेनने अपने पुत्र शत्रुसूदन घटोत्कचको इस प्रकार आज्ञा दी ॥ ३ ॥
भीमसेन उवाच
हैडिम्बेय परिश्रान्ता तव मातापराजित ।
त्वं च कामगमस्तात बलवान् वह तां खग ॥ ४ ॥
**भीमसेन बोले—**अपराजित और आकाशचारी हिडिम्बानन्दन! तुम्हारी माता द्रौपदी बहुत थक गयी है। तुम बलवान् एवं इच्छानुसार सर्वत्र जानेमें समर्थ हो; अतः इसे (आकाशमार्गसे) ले चलो ॥ ४ ॥
स्कन्धमारोप्य भद्रं ते मध्येऽस्माकं विहायसा ।
गच्छ नीचिकया गत्या यथा चैनां न पीडयेः ॥ ५ ॥
बेटा! तुम्हारा कल्याण हो। इसे कंधेपर बैठाकर हम लोगोंके बीच रहते हुए आकाशमार्गसे इस प्रकार धीरे-धीरे ले चलो, जिससे इसे तनिक भी कष्ट न हो ॥ ५ ॥
घटोत्कच उवाच
धर्मराजं च धौम्यं च कृष्णां च यमजौ तथा । एकोऽप्यहमलं वोढुं किमुताद्य सहायवान् ॥ ६ ॥ अन्ये च शतशः शूरा विहङ्गाः कामरूपिणः । सर्वान् वो ब्राह्मणैः सार्धं वक्ष्यन्ति सहितानघ ॥ ७ ॥ घटोत्कच बोला—अनघ! मैं अकेला रहूँ तो भी धर्मराज युधिष्ठिर, पुरोहित धौम्य, माता द्रौपदी और चाचा नकुल-सहदेवको भी वहन कर सकता हूँ; फिर आज तो मेरे और भी बहुत-से संगी-साथी मौजूद हैं। इस दशामें आप लोगोंको ले चलना कौन बड़ी बात है? मेरे सिवा दूसरे भी सैकड़ों शूरवीर, आकाशचारी और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षस मेरे साथ हैं। वे ब्राह्मणोंसहित आप सब लोगोंको एक साथ वहन करेंगे ॥ ६-७ ॥
एवमुक्त्वा ततः कृष्णामुवाह स घटोत्कचः । पाण्डूनां मध्यगो वीरः पाण्डवानपि चापरे ॥ ८ ॥ ऐसा कहकर वीर घटोत्कच तो द्रौपदीको लेकर पाण्डवोंके बीचमें चलने लगा और दूसरे राक्षस पाण्डवोंको भी (अपने-अपने कंधेपर बिठाकर) ले चले ॥ ८ ॥ लोमशः सिद्धमार्गेण जगामानुपमद्युतिः । स्वेनैव स प्रभावेण द्वितीय इव भास्करः ॥ ९ ॥