महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
३३६- राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान्की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना ३३७- यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अधःपतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा ३३८- नारदजीका दो सौ नामोंद्वारा भगवान्की स्तुति करना ३३९- श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान्का दर्शन, भगवान्का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूहस्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य ३४०- व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना ३४१- भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना ३४२- सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथा रुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय ३४३- जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना ३४४- नर-नारायणका नारदजीकी प्रशंसा करते हुए उन्हें भगवान् वासुदेवका माहात्म्य बतलाना ३४५- भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना ३४६- नारायणकी महिमासम्बन्धी उपाख्यानका उपसंहार ३४७- हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन ३४८- सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान्के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा ३४९- व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा ३५०- वैजयन्त पर्वतपर ब्रह्मा और रुद्रका मिलन एवं ब्रह्माजीद्वारा परम पुरुष नारायणकी महिमाका वर्णन ३५१- ब्रह्मा और रुद्रके संवादमें नारायणकी महिमाका विशेषरूपसे वर्णन ३५२- नारदके द्वारा इन्द्रको उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणकी कथा सुनानेका उपक्रम
३५३- महापद्मपुरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके सदाचारका वर्णन और उसके घरपर अतिथिका आगमन ३५४- अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन ३५५- अतिथिद्वारा नागराज पद्मनाभके सदाचार और सद्गुणोंका वर्णन तथा ब्राह्मणको उसके पास जानेके लिये प्रेरणा ३५६- अतिथिके वचनोंसे संतुष्ट होकर ब्राह्मणका उसके कथनानुसार नागराजके घरकी ओर प्रस्थान ३५७- नागपत्नीके द्वारा ब्राह्मणका सत्कार और वार्तालापके बाद ब्राह्मणके द्वारा नागराजके आगमनकी प्रतीक्षा ३५८- नागराजके दर्शनके लिये ब्राह्मणकी तपस्या तथा नागराजके परिवारवालोंका भोजनके लिये ब्राह्मणसे आग्रह करना ३५९- नागराजका घर लौटना, पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध ३६०- पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना ३६१- नागराज और ब्राह्मणका परस्पर मिलन तथा बातचीत ३६२- नागराजका ब्राह्मणके पूछनेपर सूर्यमण्डलकी आश्चर्यजनक घटनाओंको सुनाना ३६३- उञ्छ एवं शिलवृत्तिसे सिद्ध हुए पुरुषकी दिव्य गति ३६४- ब्राह्मणका नागराजसे बातचीत करके और उञ्छव्रतके पालनका निश्चय करके अपने घरको जानेके लिये नागराजसे विदा माँगना ३६५- नागराजसे विदा ले ब्राह्मणका च्यवनमुनिसे उञ्छवृत्तिकी दीक्षा लेकर साधनपरायण होना और इस कथाकी परम्पराका वर्णन
चित्र-सूची
चित्र-सूची
[सादा]
१- सुवर्णमय पक्षीके रूपमें देवराज इन्द्रका संन्यासी बने हुए ब्राह्मण-बालकोंको उपदेश २- स्वयं श्रीकृष्ण शोकमग्न युधिष्ठिरको समझा रहे हैं ३- ध्यानमग्न श्रीकृष्णसे युधिष्ठिर प्रश्न कर रहे हैं ४- भगवान् श्रीकृष्णका देवर्षि नारद एवं पाण्डवोंको लेकर शरशय्यास्थित भीष्मके निकट गमन ५- राजासे हीन प्रजाकी ब्रह्माजीसे राजाके लिये प्रार्थना ६- राजा वेनके बाहु-मन्थनसे महाराज पृथुका प्राकट्य ७- राजा क्षेमदर्शी और कालकवृक्षीय मुनि ८- राजर्षि जनक अपने सैनिकोंको स्वर्ग और नरककी बात कह रहे हैं ९- कालकवृक्षीय मुनि राजा जनकका राजकुमार क्षेमदर्शीके साथ मेल करा रहे हैं १०- समुद्र देवताका मूर्तिमती नदियोंके साथ संवाद ११- चूहेकी सहायताके फलस्वरूप चाण्डालके जालसे बिलावकी मुक्ति १२- मरे हुए ब्राह्मण-बालकपर तथा गीध एवं गीदड़पर शंकरजीकी कृपा १३- काश्यप ब्राह्मणके प्रति गीदड़के रूपमें इन्द्रका उपदेश १४- इन्द्रको पहचाननेपर काश्यपद्वारा उनकी पूजा १५- महर्षि भृगुके साथ भरद्वाज मुनिका प्रश्नोत्तर १६- जापक ब्राह्मण एवं महाराज इक्ष्वाकुकी ऊर्ध्वगति १७- प्रजापति मनु एवं महर्षि बृहस्पतिका संवाद १८- भगवान् वराहकी ऋषियोंद्वारा स्तुति १९- महर्षि पञ्चशिखका महाराज जनकको उपदेश २०- देवर्षि एवं देवराजको भगवती लक्ष्मीका दर्शन २१- मुनि जाजलिकी तपस्या २२- चिरकारी शस्त्र त्यागकर अपने पिताको प्रणाम कर रहे हैं २३- सनकादि महर्षियोंकी शुक्राचार्य एवं वृत्रासुरसे भेंट २४- दक्षके यज्ञमें शिवजीका प्राकट्य २५- साध्यगणोंको हंसरूपमें ब्रह्माजीका उपदेश २६- महर्षि वसिष्ठका राजा कराल जनकको उपदेश २७- महर्षि याज्ञवल्क्यके स्मरणसे देवी सरस्वतीका प्राकट्य
२८- राजा जनकके द्वार शुकदेवजीका पूजन २९- शुकदेवजीको नारदजीका उपदेश ३०- नर-नारायणका नारदजीके साथ संवाद ३१- (१६ लाइन चित्र फरमोंमें)
कृष्णत्रय (श्रीकृष्ण, अर्जुन और वेदव्यास) का स्तवन यज्ज्योतिस्तमसः परं महदहो निर्माय रूपाणि त- न्नामानि प्रविभज्य च व्यवहरत्येतैर्गुहायां गतम् । आनन्दैकरसं तदद्वयमथो तन्मायया देवकी- कुन्तीसत्यवतीषु जन्म धृतवत् कृष्णत्रयं पातु नः ॥
जो अज्ञानान्धकारसे परे, चिन्मय ज्योतिःस्वरूप तथा महद् ब्रह्मरूप हैं, जो अपने ही अनेक रूपोंका निर्माण करके उनके भिन्न-भिन्न नाम रखकर उन सबके द्वारा यथायोग्य व्यवहार करते हैं तथा जो 'अन्तर्यामी आत्मा' रूपसे सबकी हृदय-गुफामें स्थित, आनन्दैकरसस्वरूप और द्वैतरहित हैं; वे मायाद्वारा देवकी, कुन्ती तथा सत्यवतीके गर्भसे प्रकट हुए तीन कृष्ण (श्रीकृष्ण, अर्जुन और वेदव्यास) हमलोगोंकी रक्षा करें।
शान्तिपर्व
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
शान्तिपर्व
राजधर्मानुशासनपर्व
प्रथमोऽध्यायः
युधिष्ठिरके पास नारद आदि महर्षियोंका आगमन और युधिष्ठिरका कर्णके साथ अपना सम्बन्ध बताते हुए कर्णको शाप मिलनेका वृत्तान्त पूछना
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत) का पाठ करना चाहिये ॥
वैशम्पायन उवाच
कृतोदकास्ते सुहृदां सर्वेषां पाण्डुनन्दनाः ।
विदुरो धृतराष्ट्रश्च सर्वाश्च भरतस्त्रियः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! पाण्डव, विदुर, धृतराष्ट्र तथा भरतवंशकी सम्पूर्ण स्त्रियाँ—इन सबने गंगाजीमें अपने समस्त सुहृदोंके लिये जलांजलियाँ प्रदान कीं ॥ १ ॥
तत्र ते सुमहात्मानो न्यवसन् पाण्डुनन्दनाः ।
शौचं निवर्तयिष्यन्तो मासमात्रं बहिः पुरात् ॥ २ ॥
तदनन्तर वे महामनस्वी पाण्डव आत्मशुद्धिका सम्पादन करनेके लिये एक मासतक वहीं (गंगातटपर) नगरसे बाहर टिके रहे ॥ २ ॥
कृतोदकं तु राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
अभिजग्मुर्महात्मानः सिद्धा ब्रह्मर्षिसत्तमाः ॥ ३ ॥
मृतकोंके लिये जलांजलि देकर बैठे हुए धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके पास बहुतसे श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि सिद्ध महात्मा पधारे ॥ ३ ॥ द्वैपायनो नारदश्च देवलश्च महानृषिः । देवस्थानश्च कण्वश्च तेषां शिष्याश्च सत्तमाः ॥ ४ ॥ द्वैपायन व्यास, नारद, महर्षि देवल, देवस्थान, कण्व तथा उनके श्रेष्ठ शिष्य भी वहाँ आये थे ॥ ४ ॥ अन्ये च वेदविद्वांसः कृतप्रज्ञा द्विजातयः । गृहस्थाः स्नातकाः सन्तो ददृशः कुरुसत्तमम् ॥ ५ ॥ इनके अतिरिक्त अनेक वेदवेत्ता एवं पवित्र बुद्धिवाले ब्राह्मण, गृहस्थ एवं स्नातक संत भी वहाँ आकर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरसे मिले ॥ ५ ॥ तेऽभिगम्य महात्मानः पूजिताश्च यथाविधि । आसनेषु महार्हेषु विविशुस्ते महर्षयः ॥ ६ ॥ वे महात्मा महर्षि वहाँ पहुँचकर विधिपूर्वक पूजित हो राजाके दिये हुए बहुमूल्य आसनोंपर विराजमान हुए ॥ ६ ॥ प्रतिगृह्य ततः पूजां तत्कालसदृशीं तदा । पर्युपासन् यथान्यायं परिवार्य युधिष्ठिरम् ॥ ७ ॥ पुण्ये भागीरथीतीरे शोकव्याकुलचेतसम् । आश्वासयन्तो राजानं विप्राः शतसहस्रशः ॥ ८ ॥ उस समयके अनुरूप पूजा स्वीकार करके वे सैकड़ों हजारों ब्रह्मर्षि भागीरथीके पावन तटपर शोकसे व्याकुलचित्त हुए राजा युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर आश्वासन देते हुए यथोचितरूपसे उनके पास बैठे रहे ॥ ७-८ ॥ नारदस्त्वब्रवीत् काले धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । सम्भाष्य मुनिभिः सार्धं कृष्णद्वैपायनादिभिः ॥ ९ ॥ उस समय श्रीकृष्णद्वैपायन आदि मुनियोंके साथ बातचीत करके सबसे पहले नारदजीने धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ९ ॥ भवता बाहुवीर्येण प्रसादान्माधवस्य च । जितेयमवनिः कृत्स्ना धर्मेण च युधिष्ठिर ॥ १० ॥ महाराज युधिष्ठिर! आपने अपने बाहुबल, भगवान् श्रीकृष्णकी कृपा तथा धर्मके प्रभावसे इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर विजय पायी है ॥ १० ॥ दिष्ट्या मुक्तस्तु संग्रामादस्माल्लोकभयंकरात् । क्षत्रधर्मरतश्चापि कच्चिन्मोदसि पाण्डव ॥ ११ ॥ 'पाण्डुनन्दन! सौभाग्यकी बात है कि आप सम्पूर्ण जगत्को भयमें डालनेवाले इस संग्रामसे छुटकारा पा गये। अब क्षत्रियधर्मके पालनमें तत्पर रहकर आप प्रसन्न तो हैं
न? ॥ ११ ॥ कच्चिच्च निहतामित्रः प्रीणासि सुहृदो नृप । कच्चिच्छ्रियमिमां प्राप्य न त्वां शोकः प्रबाधते ॥ १२ ॥ ‘नरेश्वर! आपके शत्रु तो मारे जा चुके। अब आप अपने सुहृदोंको तो प्रसन्न रखते हैं न? इस राज्यलक्ष्मीको पाकर आपको कोई शोक तो नहीं सता रहा है?’ ॥ १२ ॥
युधिष्ठिर उवाच विजितेयं मही कृत्स्ना कृष्णबाहुबलाश्रयात् । ब्राह्मणानां प्रसादेन भीमार्जुनबलेन च ॥ १३ ॥ युधिष्ठिर बोले—मुने! भगवान् श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय लेनेसे ब्राह्मणोंकी कृपा होनेसे तथा भीमसेन और अर्जुनके बलसे इस सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त हुई ॥ १३ ॥
इदं मम महद् दुःखं वर्तते हृदि नित्यदा । कृत्वा ज्ञातिक्षयमिमं महान्तं लोभकारितम् ॥ १४ ॥ परन्तु मेरे हृदयमें निरन्तर यह महान् दुःख बना रहता है कि मैंने लोभवश अपने बन्धु-बान्धवोंका महान् संहार करा डाला ॥ १४ ॥
सौभद्रं द्रौपदेयांश्च घातयित्वा सुतान् प्रियान् । जयोऽयमजयाकारो भगवन् प्रतिभाति मे ॥ १५ ॥ भगवन्! सुभद्राकुमार अभिमन्यु तथा द्रौपदीके प्यारे पुत्रोंको मरवाकर मिली हुई यह विजय भी मुझे पराजय-सी ही जान पड़ती है ॥ १५ ॥
किं नु वक्ष्यति वार्ष्णेयी वधूर्मे मधुसूदनम् । द्वारकावासिनी कृष्णमितः प्रतिगतं हरिम् ॥ १६ ॥ वृष्णिकुलकी कन्या मेरी बहू सुभद्रा, जो इस समय द्वारकामें रहती है, जब मधुसूदन श्रीकृष्ण यहाँसे लौटकर द्वारका जायँगे, तब इनसे क्या कहेगी? ॥ १६ ॥
द्रौपदी हतपुत्रेयं कृपणा हतबान्धवा । अस्मत्प्रियहिते युक्ता भूयः पीडयतीव माम् ॥ १७ ॥ यह द्रुपदकुमारी कृष्णा अपने पुत्रोंके मारे जानेसे अत्यन्त दीन हो गयी है। इस बेचारीके भाई-बन्धु भी मार डाले गये। यह हमलोगोंके प्रिय और हितमें सदा लगी रहती है। मैं जब-जब इसकी ओर देखता हूँ तब-तब मेरे मनमें अधिक-से-अधिक पीड़ा होने लगती है॥
इद्मन्यत् तु भगवन् यत् त्वां वक्ष्यामि नारद । मन्त्रसंवरणेनास्मि कुन्त्या दुःखेन योजितः ॥ १८ ॥ भगवन् नारद! यह दूसरी बात जो मैं आपसे बता रहा हूँ और भी दुःख देनेवाली है। मेरी माता कुन्तीने कर्णके जन्मका रहस्य छिपाकर मुझे बड़े भारी दुःखमें डाल दिया
है ॥ १८ ॥ यः स नागायुतबलो लोकेऽप्रतिरथो रणे । सिंहखेलगतिर्धीमान् घृणी दाता यतव्रतः ॥ १९ ॥ आश्रयो धार्तराष्ट्राणां मानी तीक्ष्णपराक्रमः । अमर्षी नित्यसंरम्भी क्षेप्तास्माकं रणे रणे ॥ २० ॥ शीघ्रास्त्रश्चित्रयोधी च कृती चाद्भुतविक्रमः । गूढोत्पन्नः सुतः कुन्त्या भ्रातास्माकमसौ किल ॥ २१ ॥ जिनमें दस हजार हाथियोंका बल था, संसारमें जिनका सामना करनेवाला दूसरा कोई भी महारथी नहीं था, जो रणभूमिमें सिंहके समान खेलते हुए विचरते थे, जो बुद्धिमान्, दयालु, दाता, संयमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले और धृतराष्ट्रपुत्रोंके आश्रय थे; अभिमानी, तीव्रपराक्रमी, अमर्षशील, नित्य रोषमें भरे रहनेवाले तथा प्रत्येक युद्धमें हमलोगोंपर अस्त्रों एवं वाग्बाणोंका प्रहार करनेवाले थे, जिनमें विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेकी कला थी, जो शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले, धनुर्वेदके विद्वान् तथा अद्भुत पराक्रम कर दिखानेवाले थे, वे कर्ण गुप्तरूपसे उत्पन्न हुए कुन्तीके पुत्र और हमलोगोंके बड़े भाई थे; यह बात हमारे सुननेमें आयी है ॥ १९—२१ ॥ तोयकर्मणि तं कुन्ती कथयामास सूर्यजम् । पुत्रं सर्वगुणोपेतमवकीर्णं जले पुरा ॥ २२ ॥ जलदान करते समय स्वयं माता कुन्तीने यह रहस्य बताया था कि कर्ण भगवान् सूर्यके अंशसे उत्पन्न हुआ मेरा ही सर्वगुणसम्पन्न पुत्र रहा है, जिसे मैंने पहले पानीमें बहा दिया था ॥ २२ ॥ मञ्जूषायां समाधाय गङ्गास्रोतस्यमज्जयत् । यं सूतपुत्रं लोकोऽयं राधेयं चाभ्यमन्यत ॥ २३ ॥ स ज्येष्ठपुत्रः कुन्त्या वै भ्रातास्माकं च मातृजः । नारदजी! मेरी माता कुन्तीने कर्णको जन्मके पश्चात् एक पेटीमें रखकर गङ्गाजीकी धारामें बहाया था। जिन्हें यह सारा संसार अबतक अधिरथ सूत एवं राधाका पुत्र समझता था, वे कुन्तीके ज्येष्ठ पुत्र और हमलोगोंके सहोदर भाई थे ॥ २३ १/२ ॥ अजानता मया भ्रात्रा राज्यलुब्धेन घातितः ॥ २४ ॥ तन्मे दहति गात्राणि तूलराशिमिवानलः । मैंने अनजानमें राज्यके लोभमें आकर भाईके हाथसे ही भाईका वध करा दिया। इस बातकी चिन्ता मेरे अंगोंको उसी प्रकार जला रही है, जैसे आग रूईके ढेरको भस्म कर देती है ॥ २४ १/२ ॥ न हि तं वेद पार्थोऽपि भ्रातरं श्वेतवाहनः ॥ २५ ॥ नाहं न भीमो न यमौ स त्वस्मान् वेद सुव्रतः ।
कुन्तीनन्दन श्वेतवाहन अर्जुन भी उन्हें भाईके रूपमें नहीं जानते थे। मुझको, भीमसेनको तथा नकुल-सहदेवको भी इस बातका पता नहीं था; किंतु उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कर्ण हमें अपने भाईके रूपमें जानते थे॥ २५ १/२॥ गता किल पृथा तस्य सकाशमिति नः श्रुतम्॥ २६॥ अस्माकं शमकामा वै त्वं च पुत्रो ममेत्यथ। पृथाया न कृतः कामस्तेन चापि महात्मना॥ २७॥ सुननेमें आया है कि मेरी माता कुन्ती हमलोगोंमें संधि करानेकी इच्छासे उनके पास गयी थीं और उन्हें बताया था कि ‘तुम मेरे पुत्र हो।’ परन्तु महामनस्वी कर्णने माता कुन्तीकी यह इच्छा पूरी नहीं की॥ २६-२७॥ अपि पश्चादिदं मातर्यवोचदिति नः श्रुतम्। न हि शक्ष्याम्यहं त्यक्तुं नृपं दुर्योधनं रणे॥ २८॥ अनार्यत्वं नृशंसत्वं कृतघ्नत्वं च मे भवेत्। हमने यह भी सुना है कि उन्होंने पीछे माता कुन्तीको यह जवाब दिया कि ‘मैं युद्धके समय राजा दुर्योधनका साथ नहीं छोड़ सकता; क्योंकि ऐसा करनेसे मेरी नीचता, क्रूरता और कृतघ्नता सिद्ध होगी॥ २८ १/२॥ युधिष्ठिरेण संधिं हि यदि कुर्यां मते तव॥ २९॥ भीतो रणे श्वेतवाहादिति मां मंस्यते जनः। ‘माताजी! यदि तुम्हारे मतके अनुसार मैं इस समय युधिष्ठिरके साथ संधि कर लूँ तो सब लोग यही समझेंगे कि ‘कर्ण युद्धमें अर्जुनसे डर गया’॥ २९ १/२॥ सोऽहं निर्जित्य समरे विजयं सहकेशवम्॥ ३०॥ संधास्ये धर्मपुत्रेण पश्चादिति च सोऽब्रवीत्। ‘अतः मैं पहले समरांगणमें श्रीकृष्णसहित अर्जुनको परास्त करके पीछे धर्मपुत्र युधिष्ठिरके साथ संधि करूँगा’ ऐसी बात उन्होंने कही॥ ३० १/२॥ तमुवाच किल पृथा पुनः पृथुलवक्षसम्॥ ३१॥ चतुर्णामभयं देहि कामं युध्यस्व फाल्गुनम्। तब कुन्तीने चौड़ी छातीवाले कर्णसे फिर कहा—‘बेटा! तुम इच्छानुसार अर्जुनसे युद्ध करो; किंतु अन्य चार भाइयोंको अभय दे दो’॥ ३१ १/२॥ सोऽब्रवीन्मातरं धीमान् वेपमानां कृताञ्जलिः॥ ३२॥ प्राप्तान् विषह्यांश्चतुरो न हनिष्यामि ते सुतान्। पञ्चैव हि सुता देवि भविष्यन्ति तव ध्रुवाः॥ ३३॥ सार्जुना वा हते कर्णे सकर्णा वा हतेऽर्जुने।
इतना कहकर माता कुन्ती थर्रथर्र काँपने लगीं। तब बुद्धिमान् कर्णने हाथ जोड़कर मातासे कहा—'देवि! तुम्हारे चार पुत्र मेरे वशमें आ जायँगे तो भी मैं उनका वध नहीं करूँगा। तुम्हारे पाँच पुत्र निश्चित रूपसे बने रहेंगे। यदि कर्ण मारा गया तो अर्जुनसहित तुम्हारे पाँच पुत्र होंगे और यदि अर्जुन मारे गये तो वे कर्णसहित पाँच होंगे' ।। ३२-३३ १/२ ।। तं पुत्रगृद्धिनी भूयो माता पुत्रमथाब्रवीत् ।। ३४ ।। भ्रातॄणां स्वस्ति कुर्वीथा येषां स्वस्ति चिकीर्षसि । एवमुक्त्वा किल पृथा विसृज्योपययौ गृहान् ।। ३५ ।। तब पुत्रोंका हित चाहनेवाली माताने पुनः अपने ज्येष्ठ पुत्रसे कहा—'बेटा! तुम जिन चारों भाइयोंका कल्याण करना चाहते हो, उनका अवश्य भला करना' ऐसा कहकर माता कर्णको छोड़कर घर लौट आयीं ।। ३४-३५ ।। सोऽर्जुनेन हतो वीरो भ्रात्रा भ्राता सहोदरः । न चैव विवृतो मन्त्रः पृथायास्तस्य वा विभो ।। ३६ ।। उस वीर सहोदर भाईको भाई अर्जुनने मार डाला। प्रभो! इस गुप्त रहस्यको न तो माता कुन्तीने प्रकट किया और न कर्णने ही ।। ३६ ।। अथ शूरो महेष्वासः पार्थेनाजौ निपातितः । अहं त्वज्ञासिषं पश्चात् स्वसोदर्यं द्विजोत्तम ।। ३७ ।। पूर्वजं भ्रातरं कर्णं पृथाया वचनात् प्रभो । तेन मे दूयते तीव्रं हृदयं भ्रातृघातिनः ।। ३८ ।। द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर युद्धस्थलमें महाधनुर्धर शूरवीर कर्ण अर्जुनके हाथसे मारे गये। प्रभो! मुझे तो माता कुन्तीके ही कहनेसे बहुत पीछे यह बात मालूम हुई है कि 'कर्ण हमारे ज्येष्ठ एवं सहोदर भाई थे।' मैंने भाई की हत्या करायी है; इसलिये मेरे हृदयको तीव्र वेदना हो रही है ।। ३७-३८ ।। कर्णार्जुनसहायोऽहं जयेयमपि वासवम् । सभायां क्लिश्यमानस्य धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभिः ।। ३९ ।। सहसोत्पतितः क्रोधः कर्णं दृष्ट्वा प्रशाम्यति । कर्ण और अर्जुनकी सहायता पाकर तो मैं देवराज इन्द्रको भी जीत सकता था। कौरवसभामें जब दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंने मुझे बहुत क्लेश पहुँचाया, तब सहसा मेरे हृदयमें क्रोध प्रकट हो गया; परंतु कर्णको देखकर वह शान्त हो गया ।। ३९ १/२ ।। यदा ह्यस्य गिरो रूक्षाः शृणोमि कटुकोदयाः ।। ४० ।। सभायां गदतो द्यूते दुर्योधनहितैषिणः । तदा नश्यति मे रोषः पादौ तस्य निरीक्ष्य ह ।। ४१ ।। जब द्यूतसभामें दुर्योधनके हितकी इच्छासे वे बोलने लगते और मैं उनकी कड़वी एवं रूखी बातें सुनता, उस समय उनके पैरोंको देखकर मेरा बढ़ा हुआ रोष शान्त हो जाता
था ।। ४०-४१ ।।
कुन्त्या हि सदृशौ पादौ कर्णस्येति मतिर्मम ।
सादृश्यहेतुमन्विच्छन् पृथायास्तस्य चैव ह ।। ४२ ।।
कारणं नाधिगच्छामि कथंचिदपि चिन्तयन् ।
मेरा विश्वास है कि कर्णके दोनों पैर माता कुन्तीके चरणोंके सदृश थे। कुन्ती और कर्णके पैरोंमें इतनी समानता क्यों है? इसका कारण ढूँढ़ता हुआ मैं बहुत सोचता-विचारता; परंतु किसी तरह कोई कारण नहीं समझ पाता था ।। ४२ ½ ।।
कथं नु तस्य संग्रामे पृथिवी चक्रमग्रसत् ।। ४३ ।।
कथं नु शप्तो भ्राता मे तत्त्वं वक्तुमिहार्हसि ।
नारदजी! संग्राममें कर्णके पहियेको पृथ्वी क्यों निगल गयी और मेरे बड़े भाई कर्णको कैसे यह शाप प्राप्त हुआ? इसे आप ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें ।। ४३ ½ ।।
श्रोतुमिच्छामि भगवंस्त्वत्तः सर्वं यथातथम् ।
भवान् हि सर्वविद् विद्वान् लोके वेद कृताकृतम् ।। ४४ ।।
भगवन्! मैं आपसे यह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप सर्वज्ञ विद्वान् हैं और लोकमें जो भूत और भविष्य कालकी घटनाएँ हैं, उन सबको जानते हैं ।। ४४ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कर्णाभिज्ञाने प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कर्णकी पहचानविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ।। १ ।।
द्वितीयोऽध्यायः
नारदजीका कर्णको शाप प्राप्त होनेका प्रसंग सुनाना
वैशम्पायन उवाच
स एवमुक्तस्तु मुनिर्नारदो वदतां वरः ।
कथयामास तत् सर्वं यथा शप्तः स सूतजः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदमुनिने सूतपुत्र कर्णको जिस प्रकार शाप प्राप्त हुआ था, वह सब प्रसंग कह सुनाया ॥ १ ॥
नारद उवाच
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत ।
न कर्णार्जुनयोः किंचिदविसह्यं भवेद् रणे ॥ २ ॥
नारदजीने कहा— महाबाहु भरतनन्दन! तुम जैसा कह रहे हो, ठीक ऐसी ही बात है। वास्तवमें कर्ण और अर्जुनके लिये युद्धमें कुछ भी असाध्य नहीं हो सकता था ॥ २ ॥
गुह्यमेतत् तु देवानां कथयिष्यामि तेऽनघ ।
तन्निबोध महाबाहो यथा वृत्तमिदं पुरा ॥ ३ ॥
अनघ! यह देवताओंकी गुप्त बात है जिसको मैं तुम्हें बता रहा हूँ। महाबाहो! पूर्वकालके इस यथावत् वृत्तान्तको तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ३ ॥
क्षत्रं स्वर्गं कथं गच्छेदच्छस्त्रपूतमिति प्रभो ।
संघर्षजननस्तस्मात् कन्यागर्भो विनिर्मितः ॥ ४ ॥
प्रभो! एक समय देवताओंने यह विचार किया कि कौन-सा ऐसा उपाय हो, जिससे भूमण्डलका सारा क्षत्रिय-समुदाय शस्त्रोंके आघातसे पवित्र हो स्वर्गलोकमें पहुँच जाय। यह सोचकर उन्होंने सूर्यद्वारा कुमारी कुन्तीके गर्भसे एक तेजस्वी बालक उत्पन्न कराया, जो संघर्षका जनक हुआ ॥ ४ ॥
स बालस्तेजसा युक्तः सूतपुत्रत्वमागतः ।
चकाराङ्गिरसां श्रेष्ठाद् धनुर्वेदं गुरोस्तदा ॥ ५ ॥
वही तेजस्वी बालक सूतपुत्रके रूपमें प्रसिद्ध हुआ। उसने अंगिरागोत्रीय ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ गुरु द्रोणाचार्यसे धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की ॥ ५ ॥
स बलं भीमसेनस्य फाल्गुनस्य च लाघवम् ।
बुद्धिं च तव राजेन्द्र यमयोर्विनयं तदा ॥ ६ ॥
सख्यं च वासुदेवेन बाल्ये गाण्डीवधन्वनः ।
प्रजानामनुरागं च चिन्तयानो व्यदह्यत ॥ ७ ॥
राजेन्द्र! वह भीमसेनका बल, अर्जुनकी फुर्ती, आपकी बुद्धि, नकुल और सहदेवकी विनय, गाण्डीवधारी अर्जुनकी श्रीकृष्णके साथ बचपनमें ही मित्रता तथा पाण्डवोंपर प्रजाका अनुराग देखकर चिन्तामग्न हो जलता रहता था ॥ ६-७ ॥
स सख्यमकरोद् बाल्ये राज्ञा दुर्योधनेन च ।
युष्माभिर्नित्यसंद्विष्टो दैवाच्चापि स्वभावतः ॥ ८ ॥
इसीलिये उसने बाल्यावस्थामें ही राजा दुर्योधनके साथ मित्रता स्थापित कर ली और दैवकी प्रेरणासे तथा स्वभाववश भी वह आपलोगोंके साथ सदा द्वेष रखने लगा ॥ ८ ॥
वीर्याधिकमथालक्ष्य धनुर्वेदे धनंजयम् ।
द्रोणं रहस्युपागम्य कर्णो वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
एक दिन अर्जुनको धनुर्वेदमें अधिक शक्तिशाली देख कर्णने एकान्तमें द्रोणाचार्यके पास जाकर कहा ॥ ९ ॥
ब्रह्मास्त्रं वेत्तुमिच्छामि सरहस्यनिवर्तनम् ।
अर्जुनेन समं चाहं युध्येयमिति मे मतिः ॥ १० ॥
समः शिष्येषु वः स्नेहः पुत्रे चैव तथा ध्रुवम् ।
त्वत्प्रसादान्न मां ब्रूयुरकृतास्त्रं विचक्षणाः ॥ ११ ॥
‘गुरुदेव! मैं ब्रह्मास्त्रको उसके छोड़ने और लौटानेके रहस्यसहित जानना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि मैं अर्जुनके साथ युद्ध करूँ। निश्चय ही आपका सभी शिष्यों और पुत्रपर बराबर स्नेह है। आपकी कृपासे विद्वान् पुरुष यह न कहें कि यह सभी अस्त्रोंका ज्ञाता नहीं है’ ॥ १०-११ ॥
द्रोणस्तथोक्तः कर्णेन सापेक्षः फाल्गुनं प्रति ।
दौरात्म्यं चैव कर्णस्य विदित्वा तमुवाच ह ॥ १२ ॥
कर्णके ऐसा कहनेपर अर्जुनके प्रति पक्षपात रखनेवाले द्रोणाचार्य कर्णकी दुष्टताको समझकर उससे बोले— ॥ १२ ॥
ब्रह्मास्त्रं ब्राह्मणो विद्याद् यथावच्चरितव्रतः ।
क्षत्रियो वा तपस्वी यो नान्यो विद्यात् कथंचन ॥ १३ ॥
‘वत्स! ब्रह्मास्त्रको ठीक-ठीक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण जान सकता है अथवा तपस्वी क्षत्रिय। दूसरा कोई किसी तरह इसे नहीं सीख सकता’ ॥ १३ ॥
इत्युक्तोऽङ्गिरसां श्रेष्ठमामन्त्र्य प्रतिपूज्य च ।
जगाम सहसा रामं महेन्द्रं पर्वतं प्रति ॥ १४ ॥
उनके ऐसा कहने पर अंगिरागोत्रीय ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यकी आज्ञा ले उनका यथोचित सम्मान करके कर्ण सहसा महेन्द्र पर्वतपर परशुरामजीके पास चला गया ॥ १४ ॥
स तु राममुपागम्य शिरसाभिप्रणम्य च । ब्राह्मणो भार्गवोऽस्मीति गौरवेणाभ्यगच्छत ॥ १५ ॥ परशुरामजीके पास जाकर उसने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और 'मैं भृगुवंशी ब्राह्मण हूँ' ऐसा कहकर उसने गुरुभावसे उनकी शरण ली ॥ १५ ॥ रामस्तं प्रतिजग्राह पृष्ट्वा गोत्रादि सर्वशः । उष्यतां स्वागतं चेति प्रीतिमांश्चाभवद् भृशम् ॥ १६ ॥ परशुरामजीने गोत्र आदि सारी बातें पूछकर उसे शिष्यभावसे स्वीकार कर लिया और कहा—'वत्स! तुम यहाँ रहो। तुम्हारा स्वागत है।' ऐसा कहकर वे मुनि उसपर बहुत प्रसन्न हुए ॥ १६ ॥ तत्र कर्णस्य वसतो महेन्द्रे स्वर्गसंनिभे । गन्धर्वै राक्षसैैर्यक्षैर्देवैश्चासीत् समागमः ॥ १७ ॥ स्वर्गलोकके सदृश मनोहर उस महेन्द्र पर्वतपर रहते हुए कर्णको गन्धर्वों, राक्षसों, यक्षों तथा देवताओंसे मिलनेका अवसर प्राप्त होता रहता था ॥ १७ ॥ स तत्रेष्वस्त्रमकरोद् भृगुश्रेष्ठाद् यथाविधि । प्रियश्चाभवदत्यर्थं देवदानवरक्षसाम् ॥ १८ ॥ उस पर्वतपर भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीसे विधिपूर्वक धनुर्वेद सीखकर कर्ण उसका अभ्यास करने लगा। वह देवताओं, दानवों एवं राक्षसोंका अत्यन्त प्रिय हो गया ॥ १८ ॥ स कदाचित् समुद्रान्ते विचरन्नाश्रमान्तिके । एकः खड्गधनुष्पाणिः परिचक्राम सूर्यजः ॥ १९ ॥ एक दिनकी बात है, सूर्यपुत्र कर्ण हाथमें धनुष बाण और तलवार ले समुद्रके तटपर आश्रमके पास ही अकेला टहल रहा था ॥ १९ ॥ सोऽग्निहोत्रप्रसक्तस्य कस्यचिद् ब्रह्मवादिनः । जघानाज्ञानतः पार्थ होमधेनुं यदृच्छया ॥ २० ॥ पार्थ! उस समय अग्निहोत्रमें लगे हुए किसी वेदपाठी ब्राह्मणकी होमधेनु उधर आ निकली। उसने अनजानमें उस धेनुको (हिंस्र जीव समझकर) अकस्मात् मार डाला* ॥ २० ॥ तदज्ञानकृतं मत्वा ब्राह्मणाय न्यवेदयत् । कर्णः प्रसादयैंश्चैनमिदमित्यब्रवीद् वचः ॥ २१ ॥ अनजानमें यह अपराध बन गया है, ऐसा समझकर कर्णने ब्राह्मणको सारा हाल बता दिया और उसे प्रसन्न करते हुए इस प्रकार कहा— ॥ २१ ॥ अबुद्धिपूर्वं भगवन् धेनुरेषा हता तव । मया तत्र प्रसादं च कुरुष्वेति पुनः पुनः ॥ २२ ॥
‘भगवन्! मैंने अनजानमें आपकी गाय मार डाली है, अतः आप मेरा यह अपराध क्षमा करके मुझपर कृपा कीजिये,’ कर्णने इस बातको बार-बार दुहराया ।। २२ ।।
तं स विप्रोऽब्रवीत् क्रुद्धो वाचा निर्भर्त्सयन्निव ।
दुराचार वधार्हस्त्वं फलं प्राप्नुहि दुर्मते ।। २३ ।।
येन विस्पर्धसे नित्यं यदर्थं घटसेऽनिशम् ।
युध्यतस्तेन ते पाप भूमिश्चक्रं ग्रसिष्यति ।। २४ ।।
ब्राह्मण उसकी बात सुनते ही कुपित हो उठा और कठोर वाणीद्वारा उसे डाँटता हुआ-सा बोला—‘दुराचारी! तू मार डालने योग्य है। दुर्मते! तू अपने इस पापका फल प्राप्त कर ले। पापी! तू जिसके साथ सदा ईर्ष्या रखता है और जिसे परास्त करनेके लिये निरन्तर चेष्टा करता है, उसके साथ युद्ध करते हुए तेरे रथके पहियेको धरती निगल जायगी ।। २३-२४ ।।
ततश्चक्रे महीग्रस्ते मूर्धानं ते विचेतसः ।
पातयिष्यति विक्रम्य शत्रुर्गच्छ नराधम ।। २५ ।।
‘नराधम! जब पृथ्वीमें तेरा पहिया फँस जायगा और तू अचेत-सा हो रहा होगा, उस समय तेरा शत्रु पराक्रम करके तेरे मस्तकको काट गिरायेगा। अब तू चला जा ।।
यथेयं गौर्हता मूढ प्रमत्तेन त्वया मम ।
प्रमत्तस्य तथारातिः शिरस्ते पातयिष्यति ।। २६ ।।
‘ओ मूढ! जैसे असावधान होकर तूने इस गौका वध किया है, उसी प्रकार असावधान-अवस्था में ही शत्रु तेरा सिर काट डालेगा’ ॥ २६ ॥
शप्तः प्रसादयामास कर्णस्तं द्विजसत्तमम् ।
गोभिर्धनैश्च रत्नैश्च स चैनं पुनरब्रवीत् ॥ २७ ॥
इस प्रकार शाप प्राप्त होनेपर कर्णने उस श्रेष्ठ ब्राह्मणको बहुत-सी गौएँ, धन और रत्न देकर उसे प्रसन्न करनेकी चेष्टा की। तब उसने फिर इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ २७ ॥
न हि मेऽव्याहृतं कुर्यात् सर्वलोकोऽपि केवलम् ।
गच्छ वा तिष्ठ वा यद् वा कार्यं ते तत् समाचर ॥ २८ ॥
‘सारा संसार आ जाय तो भी कोई मेरी बातको झूठी नहीं कर सकता। तू यहाँसे जा या खड़ा रह अथवा तुझे जो कुछ करना हो, वह कर ले’ ॥ २८ ॥
इत्युक्तो ब्राह्मणेनाथ कर्णो दैन्यादधोमुखः ।
राममभ्यगमद् भीतस्तदेव मनसा स्मरन् ॥ २९ ॥
ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर कर्णको बड़ा भय हुआ। उसने दीनतावश सिर झुका लिया। वह मन-ही-मन उस बातका चिन्तन करता हुआ परशुरामजीके पास लौट आया ॥ २९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कर्णशापो नाम
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कर्णको ब्राह्मणका शापनामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
* कर्णपर्वमें भी यह प्रसंग आया है, वहाँ कर्णके द्वारा बछड़ेके मारे जानेका उल्लेख है; अतः यहाँ भी होमधेनुका बछड़ा ही समझना चाहिये।
तृतीयोऽध्यायः
कर्णको ब्रह्मास्त्रकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप
नारद उवाच
कर्णस्य बाहुवीर्येण प्रणयेन दमेन च ।
तुतोष भृगुशार्दूलो गुरुशुश्रूषया तथा ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं—राजन्! कर्णके बाहुबल, प्रेम, इन्द्रिय-संयम तथा गुरुसेवासे भृगुश्रेष्ठ परशुरामजी बहुत संतुष्ट हुए ॥ १ ॥
तस्मै स विधिवत् कृत्स्नं ब्रह्मास्त्रं सनिवर्तनम् ।
प्रोवाचाखिलमव्यग्रं तपस्वी तत् तपस्विने ॥ २ ॥
तदनन्तर तपस्वी परशुरामने तपस्यामें लगे हुए कर्णको शान्तभावसे प्रयोग और उपसंहार विधिसहित सम्पूर्ण ब्रह्मास्त्रकी विधिपूर्वक शिक्षा दी ॥ २ ॥
विदितास्त्रस्ततः कर्णो रममाणोऽश्रमे भृगोः ।
चकार वै धनुर्वेदे यत्नमद्भुतविक्रमः ॥ ३ ॥
ब्रह्मास्त्रका ज्ञान प्राप्त करके कर्ण परशुरामजीके आश्रममें प्रसन्नतापूर्वक रहने लगा। उस अद्भुत पराक्रमी वीरने धनुर्वेदके अभ्यासके लिये बड़ा परिश्रम किया ॥ ३ ॥
ततः कदाचिद् रामस्तु चरन्नाश्रममन्तिकात् ।
कर्णेन सहितो धीमानुपवासेन कर्शितः ॥ ४ ॥
सुष्वाप जामदग्न्यस्तु विश्रम्भोत्पन्नसौहृदः ।
कर्णस्योत्सङ्ग आधाय शिरः क्लान्तमना गुरुः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् एक समय बुद्धिमान् परशुरामजी कर्णके साथ अपने आश्रमके निकट ही घूम रहे थे। उपवास करनेके कारण उनका शरीर दुर्बल हो गया था। कर्णके ऊपर उनका पूरा विश्वास होनेके कारण उसके प्रति सौहार्द हो गया था। वे मन-ही-मन थकावटका अनुभव करते थे, इसलिये गुरुवर जमदग्निनन्दन परशुरामजी कर्णकी गोदमें सिर रखकर सो गये ॥ ४-५ ॥
अथ कृमिः श्लेष्ममेदोमांसशोणितभोजनः ।
दारुणो दारुणस्पर्शः कर्णस्याभ्याशमागतः ॥ ६ ॥
इसी समय लार, मेदा, मांस और रक्तका आहार करनेवाला एक भयानक कीड़ा, जिसका स्पर्श (डंक मारना) बड़ा भयंकर था, कर्णके पास आया ॥ ६ ॥
स तस्योरुमथासाद्य बिभेद रुधिराशनः ।
न चैनमशकत् क्षेप्तुं हन्तुं वापि गुरोर्भयात् ॥ ७ ॥
उस रक्त पीनेवाले कीड़ेने कर्णकी जाँघके पास पहुँचकर उसे छेद दिया; परंतु गुरुजीके जागनेके भयसे कर्ण न तो उसे फेंक सका और न मार ही सका॥ संदश्यमानस्तु तथा कृमिणा तेन भारत। गुरोः प्रबोधनाशङ्की तमुपैक्षत सूर्यजः॥ ८॥ भरतनन्दन! वह कीड़ा उसे बारंबार डँसता रहा तो भी सूर्यपुत्र कर्णने कहीं गुरुजी जाग न उठें, इस आशंकासे उसकी उपेक्षा कर दी॥ ८॥ कर्णस्तु वेदनां धैर्यादसह्यां विनिगृह्य ताम्। अकम्पयन्नव्यथयन् धारयामास भार्गवम्॥ ९॥ यद्यपि कर्णको असह्य वेदना हो रही थी तो भी वह धैर्यपूर्वक उसे सहन करके कम्पित और व्यथित न होता हुआ परशुरामजीको गोदमें लिये रहा॥ ९॥ यदास्य रुधिरेणाङ्गं परिस्पृष्टं भृगूद्वहः। तदाबुध्यत तेजस्वी संत्रस्तश्चेदमब्रवीत्॥ १०॥ जब उसका रक्त परशुरामजीके शरीरमें लग गया, तब वे तेजस्वी भार्गव जाग उठे और भयभीत होकर इस प्रकार बोले—॥ १०॥ अहोऽस्म्यशुचितां प्राप्तः किमिदं क्रियते त्वया। कथयस्व भयं त्यक्त्वा याथातथ्यमिदं मम॥ ११॥ ‘अरे! मैं तो अशुद्ध हो गया! तू यह क्या कर रहा है? भय छोड़कर मुझे इस विषयमें ठीक-ठीक बता'॥ तस्य कर्णस्तदाऽऽचष्ट कृमिणा परिभक्षणम्। ददर्श रामस्तं चापि कृमिं सूकरसंनिभम्॥ १२॥ तब कर्णने उनसे कीड़ेके काटनेकी बात बतायी। परशुरामजीने भी उस कीड़ेको देखा, वह सूअरके समान जान पड़ता था॥ १२॥ अष्टपादं तीक्ष्णदंष्ट्रं सूचीभिरिव संवृतम्। रोमभिः संनिरुद्धाङ्गमलर्कं नाम नामतः॥ १३॥ उसके आठ पैर थे और तीखी दाढ़ें। सूई-जैसी चुभनेवाली रोमावलियोंसे उसका सारा शरीर भरा तथा रुँधा हुआ था। वह 'अलर्क' नामसे प्रसिद्ध कीड़ा था॥ स दृष्टमात्रो रामेण कृमिः प्राणानवासृजत्। तस्मिन्नेवासृजि क्लिन्नस्तदद्भुतमिवाभवत्॥ १४॥ परशुरामजीकी दृष्टि पड़ते ही उसी रक्तसे भीगे हुए उस कीड़ेने प्राण त्याग दिये, वह एक अद्भुत-सी बात हुई॥ १४॥ ततोऽन्तरिक्षे ददृशे विश्वरूपः करालवान्। राक्षसो लोहितग्रीवः कृष्णाङ्गो मेघवाहनः॥ १५॥
तदनन्तर आकाशमें सब तरहके रूप धारण करनेमें समर्थ एक विकराल राक्षस दिखायी दिया, उसकी ग्रीवा लाल थी और शरीरका रंग काला था। वह बादलोंपर आरूढ था ।। १५ ।।
स रामं प्राञ्जलिर्भूत्वा बभाषे पूर्णमानसः । स्वस्ति ते भृगुशार्दूल गमिष्येऽहं यथागतम् ।। १६ ।। मोक्षितो नरकादस्माद् भवता मुनिसत्तम । भद्रं तवास्तु वन्दे त्वां प्रियं मे भवता कृतम् ।। १७ ।। उस राक्षसने पूर्णमनोरथ हो हाथ जोड़कर परशु-रामजीसे कहा—'भृगुश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो। मैं जैसे आया था, वैसे लौट जाऊँगा। मुनिप्रवर! आपने इस नरकसे मुझे छुटकारा दिला दिया। आपका भला हो। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आपने मेरा बड़ा प्रिय कार्य किया है' ।। १६-१७ ।।
तमुवाच महाबाहुर्जामदग्न्यः प्रतापवान् । कस्त्वं कस्माच्च नरकं प्रतिपन्नो ब्रवीहि तत् ।। १८ ।। तब महाबाहु प्रतापी जमदग्निनन्दन परशुरामने उससे पूछा—'तू कौन है? और किस कारणसे इस नरकमें पड़ा था? बतलाओ' ।। १८ ।।