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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

जिसका कपड़ा मलसे दूषित हो गया है ऐसे पुरुषके लिये द्विगुण शौचका विधान है। उसे दोनों पैरों, दोनों जाँघों और दोनों हाथोंकी विशेष शुद्धि अवश्य करनी चाहिये ।। अवधीयमानस्य संदेह उपजायते । यथा यथा विशुद्ध्येत तत् तथा तदुपक्रमेत् ।। शौचका पालन न करनेसे शरीर-शुद्धिके विषयमें संदेह बना रहता है। अतः जिस-जिस प्रकारसे शरीर-शुद्धि हो वैसे-ही-वैसे कार्य करनेकी चेष्टा करे ।। क्षारौशराभ्यां वस्त्रस्य कुर्याच्छौचं मृदा सह ।। लेपगन्धापनयनममेध्यस्य विधीयते । मिट्टीके साथ क्षार और रेह मिलाकर उसके द्वारा वस्त्रकी शुद्धि करनी चाहिये। जिसमें कोई अपवित्र वस्तु लग गयी हो उस वस्त्रसे उस वस्तुका लेप मिट जाय और उसकी दुर्गन्ध दूर हो जाय, ऐसी शुद्धिका सम्पादन आवश्यक होता है ।। देयाश्चतस्रस्तिस्रो वा द्वे वाप्येकां तथाऽऽपदि ।। कालमासाद्य देशं च शौचस्य गुरुलाघवम् । आपत्तिकालमें चार, तीन, दो अथवा एक बार मृत्तिका लगानी चाहिये। देश और कालके अनुसार शौचाचारमें गौरव अथवा लाघव किया जा सकता है ।। विधिनानेन शौचं तु नित्यं कुर्यादतन्द्रितः ।। अविप्रेक्षन्नसम्भ्रान्तः पादौ प्रक्षाल्य तत्परः । इस विधिसे प्रतिदिन आलस्यका परित्याग करके शौच (शुद्धि) का सम्पादन करे तथा शुद्धिका सम्पादन करनेवाला पुरुष दोनों पैरोंको धोकर इधर-उधर दृष्टि न डालता हुआ बिना किसी घबराहटके चला जाय ।। सुप्रक्षालितपादस्तु पाणिमामणिबन्धनात् ।। अधस्तादुपरिष्टाच्च ततः पाणिमुपस्पृशेत् । पहले पैरोंको भलीभाँति धोकर फिर कलाईसे लेकर समूचे हाथको ऊपरसे नीचेतक धो डाले। इसके बाद हाथमें जल लेकर आचमन करे ।। मनोगतास्तु निश्शब्दा निश्शब्दं त्रिरपः पिबेत् ।। द्विर्मुखं परिमृज्याच्च खानि चोपस्पृशेद बुधः । आचमनके समय मौन होकर तीन बार जल पीये। उस जलमें किसी प्रकारकी आवाज न हो तथा आचमनके पश्चात् वह जल हृदयतक पहुँचे। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह अंगूठेके मूलभागसे दो बार मुँह पोंछे। इसके बाद इन्द्रियोंके छिद्रोंका स्पर्श करे ।। ऋग्वेदं तेन प्रीणाति प्रथमं यः पिबेदपः । द्वितीयं च यजुर्वेदं तृतीयं साम एव च ।। वह प्रथम बार जो जल पीता है, उससे ऋग्वेदको तृप्त करता है, द्वितीय बारका जल यजुर्वेदको और तृतीय बारका जल सामवेदको तृप्त करता है ।।

मृज्यते प्रथमं तेन अथर्वा प्रीतिमाप्नुयात् ।।
द्वितीयेनेतिहासं च पुराणस्मृतिदेवताः ।
पहली बार जो मुखका मार्जन किया जाता है, उससे अथर्ववेद तृप्त होता है और द्वितीय बारके मार्जनसे इतिहास-पुराण एवं स्मृतियोंके अधिष्ठाता देवता सन्तुष्ट होते हैं ।।

यच्चक्षुषि समाधत्ते तेनादित्यं तु प्रीणयेत् ।।
प्रीणाति वायुं घ्राणं च दिशश्चाप्यथ श्रोत्रयोः ।
मुखमार्जनके पश्चात् द्विज जो अंगुलियोंसे नेत्रोंका स्पर्श करता है, उसके द्वारा वह सूर्यदेवको तृप्त करता है। नासिकाके स्पर्शसे वायुको और दोनों कानोंके स्पर्शसे वह दिशाओंको संतुष्ट करता है ।।

ब्रह्माणं तेन प्रीणाति यन्मूर्धनि समालभेत् ।।
समुत्क्षिपति चापोर्ध्वमाकाशं तेन प्रीणयेत् ।
आचमन करनेवाला पुरुष अपने मस्तकपर जो हाथ रखता है, उसके द्वारा वह ब्रह्माजीको तृप्त करता है और ऊपरकी ओर जो जल फेंकता है, उसके द्वारा वह आकाशके अधिष्ठाता देवताको संतुष्ट करता है ।।

प्रीणाति विष्णुः पद्भ्यां तु सलिलं वै समादधत् ।।
प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि अन्तर्जानुरुपस्पृशेत् ।
सर्वत्र विधिरित्येष भोजनादिषु नित्यशः ।।
वह अपने दोनों पैरोंपर जो जल डालता है, इससे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। आचमन करनेवाला पुरुष पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके अपने हाथको घुटनेके भीतर रखकर जलका स्पर्श करे। भोजन आदि सभी अवसरोंपर सदा आचमन करनेकी यही विधि है ।।

अन्नेषु दन्तलग्नेषु उच्छिष्टः पुनराचमेत् ।
विधिरेष समुद्दिष्टः शौचे चाभ्युक्षणं स्मृतम् ।।
यदि दाँतोंमें अन्न लगा हो तो अपनेको जूठा मानकर पुनः आचमन करे, यह शौचाचारकी विधि बतायी गयी। किसी वस्तुकी शुद्धिके लिये उसपर जल छिड़कना भी कर्तव्य माना गया है ।।

शूद्रस्यैष विधिर्दृष्टो गृहान्निष्क्रमतः सतः ।
नित्यं चालुप्तशौचेन वर्तितव्यं कृतात्मना ।।
यशस्कामेन भिक्षुभ्यः शूद्रेणात्महितार्थिना ।।
(साधु-सेवाके उद्देश्यसे) घरसे निकलते समय शूद्रके लिये भी यह शौचाचारकी विधि देखी गयी है। जिसने मनको वशमें किया है तथा जो अपने हितकी इच्छा रखता है, ऐसे सुयशकामी शूद्रको चाहिये कि वह सदा शौचाचारसे सम्पन्न होकर ही संन्यासियोंके निकट जाय और उनकी सेवा आदिका कार्य करे ।।

क्षत्रा आरम्भयज्ञास्तु हविर्यज्ञा विशः स्मृताः ।
शूद्राः परिचारयज्ञा जपयज्ञास्तु ब्राह्मणाः ।।
क्षत्रिय आस्मभ (उत्साह) रूप यज्ञ करनेवाले होते हैं। वैश्योंके यज्ञमें हविष्य (हवनीय पदार्थ) की प्रधानता होती है, शूद्रोंका यज्ञ सेवा ही है, तथा ब्राह्मण जपरूपी यज्ञ करनेवाले होते हैं ।।

शुश्रूषाजीविनः शूद्रा वैश्या विपणजीविनः ।
अनिष्टनिग्रहाः क्षत्रा विप्राः स्वाध्यायजीविनः ।।
शूद्र सेवासे जीवननिर्वाह करनेवाले होते हैं, वैश्य व्यापारजीवी हैं, दुष्टोंका दमन करना क्षत्रियोंकी जीवनवृत्ति है और ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायसे जीवन-निर्वाह करते हैं ।।

तपसा शोभते विप्रो राजन्यः पालनादिभिः ।
आतिथ्येन तथा वैश्यः शूद्रो दास्येन शोभते ।।
क्योंकि ब्राह्मण तपस्यासे, क्षत्रिय पालन आदिसे, वैश्य अतिथि-सत्कारसे और शूद्र सेवावृत्तिसे शोभा पाते हैं ।।

यतात्मना तु शूद्रेण शुश्रूषा नित्यमेव तु ।
कर्तव्या त्रिषु वर्णेषु प्रायेणाश्रमवासिषु ।।
अपने मनको वशमें रखनेवाले शूद्रको सदा ही तीनों वर्णोंकी विशेषतः आश्रमवासियोंकी सेवा करनी चाहिये ।।

अशक्तेन त्रिवर्णस्य सेव्या ह्याश्रमवासिनः ।
यथाशक्ति यथाप्रज्ञं यथाधर्मं यथाश्रुतम् ।।
विशेषेणैव कर्तव्या शुश्रूषा भिक्षुकाश्रमे ।।
त्रिवर्णकी सेवामें अशक्त हुए शूद्रको अपनी शक्ति, बुद्धि, धर्म तथा शास्त्रज्ञानके अनुसार आश्रमवासियोंकी सेवा करनी चाहिये। विशेषतः संन्यास-आश्रममें रहनेवाले भिक्षुकी सेवा उसके लिये परम कर्तव्य है ।।

आश्रमाणां तु सर्वेषां चतुर्णां भिक्षुकाश्मम् ।
प्रधानमिति मन्यन्ते शिष्टाः शास्त्रविनिश्चये ।।
शास्त्रोंके सिद्धान्त-ज्ञानमें निपुण शिष्ट पुरुष चारों आश्रमोंमें संन्यासको ही प्रधान मानते हैं ।।

यच्चोपदिश्यते शिष्टैः श्रुतिस्मृतिविधानतः ।
तथाऽऽस्थेयमशक्तेन स धर्म इति निश्चितः ।।
शिष्ट पुरुष वेदों और स्मृतियोंके विधानके अनुसार जिस कर्तव्यका उपदेश करें असमर्थ पुरुषको उसीका अनुष्ठान करना चाहिये। उसके लिये वही धर्म निश्चित किया गया है ।।

अतोऽन्यथा तु कुर्वाणः श्रेयो नाप्नोति मानवः ।

तस्माद् भिक्षुषु शूद्रेण कार्यमात्महितं सदा ॥ इसके विपरीत करनेवाला मानव कल्याणका भागी नहीं होता है, अतः शूद्रको संन्यासियोंकी सेवा करके सदा अपना कल्याण करना चाहिये ॥
इह यत् कुरुते श्रेयस्तत् प्रेत्य समुपाश्नुते ।
तच्चानसूयता कार्यं कर्तव्यं यद्धि मन्यते ॥
असूयता कृतस्येह फलं दुःखदवाप्यते ॥
मनुष्य इस लोकमें जो कल्याणकारी कार्य करता है, उसका फल मृत्युके पश्चात् उसे प्राप्त होता है। जिसे वह अपना कर्तव्य समझता है, उस कार्यको वह दोष‌दृष्टि न रखते हुए करे। दोष‌दृष्टि रखते हुए जो कार्य किया जाता है, उसका फल इस जगत्‌में बड़े दुःखसे प्राप्त होता है ॥
प्रियवादी जितक्रोधो वीततन्द्रिरमत्सरः ।
क्षमावान् शीलसम्पन्नः सत्यधर्मपरायणः ॥
आपद्भावेन कुर्याद्धि शुश्रूषां भिक्षुकाश्रमे ॥
शूद्रको चाहिये कि वह प्रिय वचन बोले, क्रोधको जीते, आलस्य दूर भगा दे, ईर्ष्या-द्वेषसे रहित हो जाय, क्षमाशील, शीलवान् तथा सत्यधर्ममें तत्पर रहे। आपत्तिकालमें वह संन्यासियोंके आश्रममें (जाकर) उनकी सेवा करे ॥
अयं मे परमो धर्मस्त्वनेनेदं सुदुस्तरम् ।
संसारसागरं घोरं तरिष्यामि न संशयः ॥
निर्भयो देहमुत्सृज्य यास्यामि परमां गतिम् ।
नातः परं ममास्त्यन्य एष धर्मः सनातनः ॥
एवं संचिन्त्य मनसा शूद्रो बुद्धिसमाधिना ।
कुर्यादविमना नित्यं शुश्रूषाधर्ममुत्तमम् ॥
'यही मेरा परम धर्म है, इसीके द्वारा मैं इस अत्यन्त दुस्तर घोर संसार-सागरसे पार हो जाऊँगा। इसमें संशय नहीं है। मैं निर्भय होकर इस देहका त्याग करके परमगतिको प्राप्त हो जाऊँगा। इससे बढ़कर मेरे लिये दूसरा कोई कर्तव्य नहीं है। यही सनातन धर्म है।' मन-ही-मन ऐसा विचार करके प्रसन्नचित्त हुआ शूद्र बुद्धिको एकाग्र करके सदा उत्तम शुश्रूषा-धर्मका पालन करे ॥
शुश्रूषानियमेनेह भाव्यं शिष्टाशिना सदा ।
शमान्वितेन दान्तेन कार्याकार्यविदा सदा ॥
शूद्रको चाहिये कि वह नियमपूर्वक सेवामें तत्पर रहे, सदा यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करे। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखे और सदा कर्तव्याकर्तव्यको जाने ॥
सर्वकार्येषु कृत्यानि कृतान्येव च दर्शयेत् ।
यथा प्रीतो भवेद् भिक्षुस्तथा कार्यं प्रसाधयेत् ॥

यदकल्पं भवेद् भिक्षोर्न तत् कार्यं समाचरेत् ।
सभी कार्योंमें जो आवश्यक कृत्य हों, उन्हें करके ही दिखावे। जैसे-जैसे संन्यासीको प्रसन्नता हो, उसी प्रकार उसका कार्य साधन करे। जो कार्य संन्यासीके लिये हितकर न हो, उसे कदापि न करे ।।
यदाश्रमस्याविरुद्धं धर्ममात्राभिसंहितम् ।।
तत् कार्यमविचारेण नित्यमेव शुभार्थिना ।
जो कार्य संन्यास-आश्रमके विरुद्ध न हो तथा जो धर्मके अनुकूल हो, शुभकी इच्छा रखनेवाले शूद्रको वह कार्य सदा बिना विचारे ही करना चाहिये ।।
मनसा कर्मणा वाचा नित्यमेव प्रसादयेत् ।।
स्थातव्यं तिष्ठमानेषु गच्छमानाननुव्रजेत् ।
आसीनेष्वासितव्यं च नित्यमेवानुवर्तिना ।।
मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा ही उन्हें संतुष्ट रखे। जब वे संन्यासी खड़े हों, तब सेवा करनेवाले शूद्रको स्वयं भी खड़ा रहना चाहिये तथा जब वे कहीं जा रहे हों, तब उसे स्वयं भी उनके पीछे-पीछे जाना चाहिये। यदि वे आसनपर बैठे हों तब वह स्वयं भी भूमिपर बैठे। तात्पर्य यह कि सदा ही उनका अनुसरण करता रहे ।।
नैशकार्याणि कृत्वा तु नित्यं चैवानुचोदितः ।
यथाविधिरुपस्पृश्य संन्यस्य जलभाजनम् ।।
भिक्षूणां निलयं गत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम् ।
ब्रह्मपूर्वान् गुरूस्तत्र प्रणम्य नियतेन्द्रियः ।।
तथाऽऽचार्यपुरोगाणामनुकुर्यान्नमस्क्रियाम् ।
स्वधर्मचारिणां चापि सुखं पृष्ट्वाभिवाद्य च ।।
यो भवेत् पूर्वसंसिद्धस्तुल्यधर्मा भवेत् सदा ।
तस्मै प्रणामः कर्तव्यो नेतरेषां कदाचन ।।
रात्रिके कार्य पूरे करके प्रतिदिन उनसे आज्ञा लेकर विधिपूर्वक स्नान करके उनके लिये जलसे भरा हुआ कलश ले आकर रखे। फिर संन्यासियोंके स्थानपर जाकर उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम करके इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्राह्मण आदि गुरुजनोंको प्रणाम करे। इसी प्रकार स्वधर्मका अनुष्ठान करनेवाले आचार्य आदिको नमस्कार एवं अभिवादन करे। उनका कुशल-समाचार पूछे। पहलेके जो शूद्र आश्रमके कार्यमें सिद्धहस्त हों, उनका स्वयं भी सदा अनुकरण करे, उनके समान कार्यपरायण हो। अपने समानधर्मा शूद्रको प्रणाम करे, दूसरे शूद्रोंको कदापि नहीं ।।
अनुक्त्वा तेषु चोत्थाय नित्यमेव यतव्रतः ।
सम्मार्जनमथो कृत्वा कृत्वा चाप्युपलेपनम् ।।

संन्यासियों अथवा आश्रमके दूसरे व्यक्तियोंको कहे बिना ही प्रतिदिन नियमपूर्वक उठे और झाडू देकर आश्रमकी भूमिको लीप-पोत दे ।। ततः पुष्पबलिं दद्यात् पुष्पाण्यादाय धर्मतः । निष्क्रम्यावसथात् तूर्णमन्यत् कर्म समाचरेत् ।। तत्पश्चात् धर्मके अनुसार फूलोंका संग्रह करके पूजनीय देवताओंकी उन फूलोंद्वारा पूजा करे। इसके बाद आश्रमसे निकलकर तुरंत ही दूसरे कार्यमें लग जाय ।। यथोपघातो न भवेत् स्वाध्यायेऽऽश्रमिणां तथा । उपघातं तु कुर्वाण एनसा सम्प्रयुज्यते ।। आश्रमवासियोंके स्वाध्यायमें विघ्न न पड़े, इसके लिये सदा सचेष्ट रहे। जो स्वाध्यायमें विघ्न डालता है, वह पापका भागी होता है ।। तथाऽऽत्मा प्रणिधातव्यो यथा ते प्रीतिमाप्नुयुः । परिचारिकोऽहं वर्णानां त्रयाणां धर्मतः स्मृतः ।। किमुताश्रमवृद्धानां यथालब्धोपजीविनाम् ।। अपने-आपको इस प्रकार सावधानीके साथ सेवामें लगाये रखना चाहिये, जिससे वे साधु पुरुष प्रसन्न हों। शूद्रको सदा इस प्रकार विचार करना चाहिये कि 'मैं तो शास्त्रोंमें धर्मतः तीनों वर्णोंका सेवक बताया गया हूँ। फिर जो संन्यास-आश्रममें रहकर जो कुछ मिल जाय, उसीसे निर्वाह करनेवाले बड़े-बूढ़े संन्यासी हैं, उनकी सेवाके विषयमें तो कहना ही क्या है? (उनकी सेवा करना तो मेरा परम धर्म है ही) ।। भिक्षूणां गतरागाणां केवलं ज्ञानदर्शिनाम् । विशेषेण मया कार्या शुश्रूषा नियतात्मना ।। 'जो केवल ज्ञानदर्शी, वीतराग संन्यासी हैं, उनकी सेवा मुझे विशेषरूपसे मनको वशमें रखते हुए करनी चाहिये ।। तेषां प्रसादात् तपसा प्राप्स्यामीष्टां शुभां गतिम् ।। एवमेतद् विनिश्चित्य यदि सेवेत भिक्षुकान् । विधिना यथोपदिष्टेन प्राप्नोति परमां गतिम् ।। 'उनकी कृपा और तपस्यासे मैं मनोवांछित शुभगति प्राप्त कर लूँगा।' ऐसा निश्चय करके यदि शूद्र पूर्वोक्त विधिसे संन्यासियोंका सेवन करे तो परम गतिको प्राप्त होता है ।। न तथा सम्प्रदानेन नोपवासादिभिस्तथा । इष्टां गतिमवाप्नोति यथा शुश्रूषकर्मणा ।। शूद्र सेवाकर्मसे जिस मनोवांछित गतिको प्राप्त कर लेता है, वैसी गति दान तथा उपवास आदिके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर सकता ।। यादृशेन तु तोयेन शुद्धिं प्रकुरुते नरः । तादृग् भवति तद्धौतमुदकस्य स्वभावतः ।।

मनुष्य जैसे जलसे कपड़ा धोता है, उस जलकी स्वच्छताके अनुसार ही वह वस्त्र स्वच्छ होता है ।। शूद्रोऽप्येतेन मार्गेण यादृशं सेवते जनम् । तादृग् भवति संसर्गादचिरेण न संशयः ।। शूद्र भी इसी मार्गसे चलकर जैसे पुरुषका सेवन करता है, संसर्गवश वह शीघ्र वैसा हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।। तस्मात् प्रयत्नतः सेव्या भिक्षवो नियतात्मना । अतः शूद्रको चाहिये कि अपने मनको वशमें करके प्रयत्नपूर्वक संन्यासियोंकी सेवा करे ।। अध्वना कर्शितानां च व्याधितानां तथैव च ।। शुश्रूषां नियतः कुर्यात् तेषामापदि यत्नतः । जो राह चलनेसे थके-माँदे कष्ट पा रहे हों तथा रोगसे पीड़ित हों, उन संन्यासियोंकी उस आपत्तिके समय यत्न और नियमके साथ विशेष सेवा करे ।। दर्भाजिनान्यवेक्षेत भैक्षभाजनमेव च ।। यथाकामं च कार्याणि सर्वाण्येवोपसाधयेत् । उनके कुशासन, मृगचर्म और भिक्षापात्रकी भी देखभाल करे तथा उनकी रुचिके अनुसार सारा कार्य करता रहे ।। प्रायश्चित्तं यथा न स्यात् तथा सर्वं समाचरेत् ।। व्याधितानां तु प्रयतः चैलप्रक्षालनादिभिः । प्रतिकर्मक्रिया कार्या भेषजानयनैस्तथा । सब कार्य इस प्रकार सावधानीसे करे, जिससे कोई अपराध न बनने पावे। संन्यासी यदि रोगग्रस्त हो जायें तो सदा उद्यत रहकर उनके कपड़े धोवे। उनके लिये ओषधि ले आवे तथा उनकी चिकित्साके लिये प्रयत्न करे ।। भिक्षाटनोऽभिगच्छेत भिषजश्च विपश्चितः । ततो विनिष्क्रियार्थानि द्रव्याणि समुपार्जयेत् ।। भिक्षुक बीमार होनेपर भी भिक्षाटनके लिये जाय। विद्वान् चिकित्सकोंके यहाँ उपस्थित हो तथा रोग-निवारणके लिये उपयुक्त विशुद्ध ओषधियोंका संग्रह करे ।। यश्च प्रीतमना दद्यादादद्याद् भेषजं नरः । अश्रद्धया हि दत्तानि तान्यभोज्याणि भिक्षुभिः ।। जो चिकित्सक प्रसन्नतापूर्वक ओषधि दे, उसीसे संन्यासीको औषध लेना चाहिये। अश्रद्धापूर्वक दी हुई ओषधियोंको संन्यासी अपने उपयोगमें न ले ।। श्रद्धया यदुपादत्तं श्रद्धया चोपपादितम् । तस्योपभोगाद् धर्मः स्याद् व्याधिभिश्च निवर्त्यते ।।

जो श्रद्धापूर्वक दी गयी और श्रद्धासे ही ग्रहण की गयी हो, उसी ओषधिके सेवनसे धर्म होता है और रोगोंसे छुटकारा भी मिलता है ।।
आदेहपतनादेवं शुश्रूषेद् विधिपूर्वकम् ।
न त्वेव धर्ममुत्सृज्य कुर्यात् तेषां प्रतिक्रियाम् ।।
शूद्रको चाहिये कि जबतक यह शरीर छूट न जाय तबतक इसी प्रकार विधिपूर्वक सेवा करता रहे। धर्मका उल्लंघन करके उन साधु-संन्यासियोंके प्रति विपरीत आचरण न करे ।।
स्वभावतो हि द्वन्द्वानि विप्रयान्त्युपयान्ति च ।
स्वभावतः सर्वभावा भवन्ति न भवन्ति च ।।
सागरस्योर्मिसदृशा विज्ञातव्या गुणात्मकाः ।
शीत-उष्ण आदि सारे द्वन्द्व स्वभावसे ही आते-जाते रहते हैं, समस्त पदार्थ स्वभावसे ही उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं। सारे त्रिगुणमय पदार्थ समुद्रकी लहरोंके समान उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं ।।
विद्यादेवं हि यो धीमांस्तत्त्ववित् तत्त्वदर्शनः ।।
न स लिप्येत पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ।
जो बुद्धिमान् एवं तत्त्वज्ञ पुरुष ऐसा जानता है, वह जलसे निर्लिप्त रहनेवाले पद्मपत्रके समान पापसे लिप्त नहीं होता ।।
एवं प्रयतितव्यं हि शुश्रूषार्थमतन्द्रितैः ।।
सर्वाभिरुपसेवाभिस्तुष्यन्ति यतयो यथा ।
इस प्रकार शूद्रोंको आलस्यशून्य होकर संन्यासियोंकी सेवाके लिये प्रयत्नशील रहना चाहिये। वह सब प्रकारकी छोटी-बड़ी सेवाओंद्वारा ऐसी चेष्टा करे, जिससे वे संन्यासी सदा संतुष्ट रहें ।।
नापराध्येत भिक्षोस्तु न चैवमवधीरयेत् ।।
उत्तरं च न संदद्यात् क्रुद्धं चैव प्रसादयेत् ।
भिक्षुका अपराध कभी न करे, उसकी अवहेलना भी न करे, उसकी कड़ी बातका कभी उत्तर न दे और यदि वह कुपित हो तो उसे प्रसन्न करनेकी चेष्टा करे ।।
श्रेय एवाभिधातव्यं कर्तव्यं च प्रहृष्टवत् ।।
तूष्णीम्भावेन वै तत्र न क्रुद्धमभिसंवदेत् ।
सदा कल्याणकारी बात ही बोले और प्रसन्नतापूर्वक कल्याणकारी कर्म ही करे। संन्यासी कुपित हो तो उसके सामने चुप ही रहे, बातचीत न करे ।।
लब्धालब्धेन जीवेत तथैव परिपोषयेत् ।
संन्यासीको चाहिये कि भाग्यसे कोई वस्तु मिले या न मिले, जो कुछ प्राप्त हो उसीसे जीवन-निर्वाह एवं शरीरका पोषण करे ।।
कोपिनं तु न याचेत ज्ञानविद्वेषकारितः ।।

स्थावरेषु दयां कुर्याज्जंगमेषु च प्राणिषु । यथाऽऽत्मनि तथान्येषु समां दृष्टिं निपातयेत् ॥ जो क्रोधी हो, उससे किसी वस्तुकी याचना न करे। जो ज्ञानसे द्वेष रखता हो, उससे भी कोई वस्तु न माँगे। स्थावर और जंगम सभी प्राणियोंपर दया करे। जैसे अपने ऊपर उसी प्रकार दूसरोंपर समतापूर्ण दृष्टि डाले ॥ पुण्यतीर्थानुसेवी च नदीनां पुलिनाश्रयः । शून्यागारनिकेतश्च वनवृक्षगुहाशयः ॥ अरण्यानुचरो नित्यं वेदारण्यनिकेतनः । एकरात्रं द्विरात्रं वा न क्वचित् सज्जते द्विजः ॥ संन्यासी पुण्यतीर्थोंका निरन्तर सेवन करे, नदियोंके तटपर कुटी बनाकर रहे। अथवा सूने घरमें डेरा डाले। वनमें वृक्षोंके नीचे अथवा पर्वतोंकी गुफाओंमें निवास करे। सदा वनमें विचरण करे। वेदरूपी वनका आश्रय ले, किसी भी स्थानमें एक रात या दो रातसे अधिक न रहे। कहीं भी आसक्त न हो ॥ शीर्णपर्णपुटे वापि वन्ये चरति भिक्षुकः । न भोगार्थमनुप्रेत्य यात्रामात्रं समश्नुते ॥ संन्यासी जंगली फल-मूल अथवा सूखे पत्तेका आहार करे। वह भोगके लिये नहीं, शरीरयात्राके निर्वाहके लिये भोजन करे ॥ धर्मलब्धं समश्नाति न कामान् किंचिदश्नुते । युगमात्रदृग्ध्वानं क्रोशादूर्ध्वं न गच्छति ॥ वह धर्मतः प्राप्त अन्नका ही भोजन करे। कामना-पूर्वक कुछ भी न खाय। रास्ता चलते समय वह दो हाथ आगेतककी भूमिपर ही दृष्टि रखे और एक दिनमें एक कोससे अधिक न चले ॥ समो मानापमानाभ्यां समलोष्टाश्मकाञ्चनः । सर्वभूताभयकरस्तथैवाभयदक्षिणः ॥ मान हो या अपमान—वह दोनों अवस्थाओंमें समान भावसे रहे। मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको एक समान समझे। समस्त प्राणियोंको निर्भय करे और सबको अभयकी दक्षिणा दे ॥ निर्द्वन्द्वो निर्ममस्कारो निरानन्दपरिग्रहः । निर्ममो निरहंकारः सर्वभूतनिराश्रयः ॥ शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे निर्विकार रहे, किसीको नमस्कार न करे। सांसारिक सुख और परिग्रहसे दूर रहे। ममता और अहंकारको त्याग दे। समस्त प्राणियोंमेंसे किसीके भी आश्रित न रहे ॥ परिसंख्यानतत्त्वज्ञस्तथा सत्यरतिः सदा ।

ऊर्ध्वं नाधो न तिर्यक् च न किंचिदभिकामयेत् ।।
वस्तुओंके स्वरूपके विषयमें विचार करके उनके तत्त्वको जाने। सदा सत्यमें अनुरक्त रहे। ऊपर, नीचे या अगल-बगलमें कहीं किसी वस्तुकी कामना न करे ।।
एवं संचरमाणस्तु यतिधर्मं यथाविधि ।
कालस्य परिणामात् तु यथा पक्वफलं तथा ।।
स विसृज्य स्वकं देहं प्रविशेद् ब्रह्म शाश्वतम् ।
इस प्रकार विधिपूर्वक यतिधर्मका पालन करनेवाला संन्यासी कालके परिणामवश अपने शरीरको पके हुए फलकी भाँति त्यागकर सनातन ब्रह्ममें प्रविष्ट हो जाता है ।।
निरामयमनाद्यन्तं गुणसौम्यमचेतनम् ।।
निरक्षरमबीजं च निरिन्द्रियमजं तथा ।
अजय्यमक्षरं यत् तदभेद्यं सूक्ष्ममेव च ।।
निर्गुणं च प्रकृतिमन्निर्विकारं च सर्वशः ।
भूतभव्यभविष्यस्य कालस्य परमेश्वरम् ।।
अव्यक्तं पुरुषं क्षेत्रमानन्त्याय प्रपद्यते ।
वह ब्रह्म निरामय, अनादि, अनन्त, सौम्यगुणसे युक्त, चेतनासे ऊपर उठा हुआ, अनिर्वचनीय, बीजहीन, इन्द्रियातीत, अजन्मा, अजेय, अविनाशी, अभेद्य, सूक्ष्म, निर्गुण, सर्वशक्तिमान्, निर्विकार, भूत, वर्तमान और भविष्य कालका स्वामी तथा परमेश्वर है। वही अव्यक्त, अन्तर्यामी पुरुष और क्षेत्र भी है। जो उसे जान लेता है, वह मोक्षको प्राप्त कर लेता है ।।
एवं स भिक्षुर्निर्वाणं प्राप्नुयाद् दग्धकिल्बिषः ।।
इहस्थो देहमुत्सृज्य नीडं शकुनिवद् यथा ।
इस प्रकार वह भिक्षु घोंसला छोड़कर उड़ जानेवाले पक्षीकी भाँति यहीं इस शरीरको त्यागकर समस्त पापोंको ज्ञानाग्निसे दग्ध कर देनेके कारण निर्वाण—मोक्ष प्राप्त कर लेता है ।।
यत् करोति यदश्नाति शुभं वा यदि वाशुभम् ।।
नाकृतं भुज्यते कर्म न कृतं नश्यते फलम् ।
मनुष्य जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसका वैसा ही फल भोगता है। बिना किये हुए कर्मका फल किसीको नहीं भोगना पड़ता है तथा किये हुए कर्मका फल भोगके बिना नष्ट नहीं होता है ।।
शुभकर्मसमाचारः शुभमेवाप्नुते फलम् ।।
तथाशुभसमाचारो ह्यशुभं समवाप्नुते ।
जो शुभ कर्मका आचरण करता है, उसे शुभ फलकी ही प्राप्ति होती है और जो अशुभ कर्म करता है, वह अशुभ फलका ही भागी होता है ।।

तथा शुभसमाचारो ह्यशुभानि विवर्जयेत् ।।
शुभान्येव समादद्याद् य इच्छेद् भूतिमात्मनः ।
अतः जो अपना कल्याण चाहता हो, वह शुभ-कर्मोंका ही आचरण करे। अशुभ कर्मोंको त्याग दे। ऐसा करनेसे वह शुभ फलोंको ही प्राप्त करेगा ।।
तस्मादागमसम्पन्नो भवेत् सुनियतेन्द्रियः ।।
शक्यते ह्यागमादेव गतिं प्राप्तुमनामयाम् ।
मनुष्यको चाहिये कि वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके शास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न हो। शास्त्रके ज्ञानसे ही मनुष्यको अनामय गतिकी प्राप्ति हो सकती है ।।
परा चैषा गतिर्दृष्टा यामन्वेषन्ति साधवः ।।
यत्रामृतत्वं लभते त्यक्त्वा दुःखमनन्तकम् ।
साधु पुरुष जिसका अन्वेषण करते हैं, वह परमगति शास्त्रोंमें देखी गयी है। जहाँ पहुँचकर मनुष्य अनन्त दुःखका परित्याग करके अमृतत्वको प्राप्त कर लेता है ।।
इमं हि धर्ममास्थाय येऽपि स्युः पापयोनयः ।।
स्त्रियो वैश्याश्च शूद्राश्च प्राप्नुयुः परमां गतिम् ।
इस धर्मका आश्रय लेकर पापयोनिमें उत्पन्न हुए पुरुष तथा स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र भी परमगतिको प्राप्त कर लेते हैं ।।
किं पुनर्ब्राह्मणो विद्वान् क्षत्रियो वा बहुश्रुतः ।।
न चाप्यक्षीणपापस्य ज्ञानं भवति देहिनः ।
ज्ञानोपलब्धिर्भवति कृतकृत्यो यदा भवेत् ।।
फिर जो विद्वान् ब्राह्मण अथवा बहुश्रुत क्षत्रिय है, उसकी सद्गतिके विषयमें क्या कहना है। जिस देहधारीके पाप क्षीण नहीं हुए हैं, उसे ज्ञान नहीं होता। जब मनुष्यको ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है, तब वह कृतकृत्य हो जाता है ।।
उपलभ्य तु विज्ञानं ज्ञानं वाप्यनसूयकः ।
तथैव वर्तेद् गुरुषु भूयांसं वा समाहितः ।।
ज्ञान या विज्ञानको प्राप्त कर लेनेपर भी दोषदृष्टिसे रहित हो गुरुजनोंके प्रति पहले ही-जैसा सद्भाव रखे। अथवा एकाग्रचित्त होकर पहलेसे भी अधिक श्रद्धाभाव रखे ।।
यथावमन्येत गुरुं तथा तेषु प्रवर्त्तते ।
व्यर्थमस्य श्रुतं भवति ज्ञानमज्ञानतां व्रजेत् ।।
शिष्य जिस तरह गुरुका अपमान करता है, उसी प्रकार गुरु भी शिष्योंके प्रति बर्ताव करता है। अर्थात् शिष्यको अपने कर्मके अनुसार फल मिलता है। गुरुका अपमान करनेवाले शिष्यका किया हुआ वेद-शास्त्रोंका अध्ययन व्यर्थ हो जाता है। उसका सारा ज्ञान अज्ञानरूपमें परिणत हो जाता है ।।
गतिं चाप्यशुभां गच्छेन्निरयाय न संशयः ।

प्रक्षीयते तस्य पुण्यं ज्ञानमस्य विरुध्यते ॥
वह नरकमें जानेके लिये अशुभ मार्गको ही प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। उसका पुण्य नष्ट हो जाता है और ज्ञान अज्ञान हो जाता है ॥
अदृष्टपूर्वकल्याणो यथादृष्टविधिर्नरः ॥
उत्सेकान्मोहमापद्य तत्त्वज्ञानं न चाप्नुयात् ।
जिसने पहले कभी कल्याणका दर्शन नहीं किया है ऐसा मनुष्य शास्त्रोक्त विधिको न देखनेके कारण अभिमानवश मोहको प्राप्त हो जाता है। अतः उसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती ॥
एवमेव हि नोत्सेकः कर्तव्यो ज्ञानसम्भवः ॥
फलं ज्ञानस्य हि शमः प्रशमाय यतेत् सदा ।
अतः किसीको भी ज्ञानका अभिमान नहीं करना चाहिये। ज्ञानका फल है शान्ति, इसलिये सदा शान्तिके लिये ही प्रयत्न करे ॥
उपशान्तेन दान्तेन क्षमायुक्तेन सर्वदा ॥
शुश्रूषा प्रतिपत्तव्या नित्यमेवानसूयता ।
मनका निग्रह और इन्द्रियोंका संयम करके सदा क्षमाशील तथा अदोषदर्शी होकर गुरुजनोंकी सेवा करनी चाहिये ॥
धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा ॥
इन्द्रियार्थांश्च मनसा मनो बुद्धौ समादधेत् ।
धैर्यके द्वारा उपस्थ और उदरकी रक्षा करे। नेत्रोंके द्वारा हाथ और पैरोंकी रक्षा करे। मनसे इन्द्रियोंके विषयोंको बचावे और मनको बुद्धिमें स्थापित करे ॥
धृत्याऽऽसीत ततो गत्वा शुद्धदेशं सुसंवृतम् ॥
लब्ध्वाऽऽसनं यथादृष्टं विधिपूर्वं समाचरेत्।
पहले शुद्ध एवं घिरे हुए स्थानमें जाकर आसन ले, उसके ऊपर धैर्यपूर्वक बैठे और शास्त्रोक्त विधिके अनुसार ध्यानके लिये प्रयत्न करे ॥
ज्ञानयुक्तस्तथा देवं हृदिस्थमुपलक्षयेत् ॥
आदीप्यमानं वपुषा विधूममनलं यथा ।
रश्मिमन्तमिवादित्यं वैद्युताग्निमिवाम्बरे ॥
संस्थितं हृदये पश्येदीशं शाश्वतमव्ययम् ।
विवेकयुक्त साधक अपने हृदयमें विराजमान परमात्मदेवका साक्षात्कार करे। जैसे आकाशमें विद्युत्का प्रकाश देखा जाता है तथा जिस प्रकार किरणोंवाले सूर्य प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार उस परमात्मदेवको धूमरहित अग्निकी भाँति तेजस्वी स्वरूपसे प्रकाशित देखे। हृदयदेशमें विराजमान उन अविनाशी सनातन परमेश्वरका बुद्धिरूपी नेत्रोंके द्वारा दर्शन करे ॥

न चायुक्तेन शक्योऽयं द्रष्टुं देहे महेश्वरः ॥
युक्तस्तु पश्यते बुद्ध्या संनिवेश्य मनो हृदि ।
जो योगयुक्त नहीं है ऐसा पुरुष अपने हृदयमें विराजमान उस महेश्वरका साक्षात्कार नहीं कर सकता। योगयुक्त पुरुष ही मनको हृदयमें स्थापित करके बुद्धिके द्वारा उस अन्तर्यामी परमात्माका दर्शन करता है ।।

अथ त्वेवं न शक्नोति कर्तुं हृदयधारणम् ॥
यथासांख्यमुपासीत यथावद् योगमास्थितः ।
यदि इस प्रकार हृदयदेशमें ध्यान-धारणा न कर सके तो यथावत्रूपसे योगका आश्रय ले सांख्यशास्त्रके अनुसार उपासना करे ।।

पञ्च बुद्धीन्द्रियाणीह पञ्च कर्मेन्द्रियाण्यपि ॥
पञ्च भूतविशेषाश्च मनश्चैव तु षोडश ।
इस शरीरमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत और सोलहवाँ मन—ये सोलह विकार हैं ।।

तन्मात्राण्यपि पञ्चैव मनोऽहंकार एव च ॥
अष्टमं चाप्यथाव्यक्तमेताः प्रकृतिसंज्ञिताः ।
पाँच तन्मात्राएँ, मन, अहंकार और अव्यक्त—ये आठ प्रकृतियाँ हैं ।।

एताः प्रकृतयश्चाष्टौ विकाराश्चापि षोडश ॥
एवमेतदिहस्थेन विज्ञेयं तत्त्वबुद्धिना ।
एवं वर्ष्म समुत्तीर्य तीर्णो भवति नान्यथा ॥
ये आठ प्रकृतियाँ और पूर्वोक्त सोलह विकार—इन चौबीस तत्त्वोंको यहाँ रहनेवाले तत्त्वज्ञ पुरुषको जानना चाहिये। इस प्रकार प्रकृति-पुरुषका विवेक हो जानेसे मनुष्य शरीरके बन्धनसे ऊपर उठकर भवसागरसे पार हो जाता है, अन्यथा नहीं ।।

परिसंख्यानमेवैतन्मन्तव्यं ज्ञानबुद्धिना ।
अहन्यहनि शान्तात्मा पावनाय हिताय च ॥
एवमेव प्रसंख्याय तत्त्वबुद्धिर्विमुच्यते ।
ज्ञानयुक्त बुद्धिवाले पुरुषको यही सांख्ययोग मानना चाहिये। प्रतिदिन शान्तचित्त हो अपने अन्तःकरणको पवित्र बनाने और अपना हित-साधन करनेके लिये इसी प्रकार उपर्युक्त तत्त्वोंका विचार करनेसे मनुष्यको यथार्थ तत्त्वका बोध हो जाता है और वह बन्धनसे छूट जाता है ।।

निष्कलं केवलं भवति शुद्धतत्त्वार्थतत्त्ववित् ॥
शुद्ध तत्त्वार्थको तत्त्वसे जाननेवाला पुरुष अवयवरहित अद्वितीय ब्रह्म हो जाता है ।।

सत्संनिकर्षे परिवर्तितव्यं
विद्याधिकाश्चापि निषेवितव्याः ।

सवर्णतां गच्छति संनिकर्षा- न्नीलः खगो मेरुमिवाश्रयन् वै ॥

मनुष्यको सदा सत्पुरुषोंके समीप रहना चाहिये। विद्यामें बड़े-चढ़े पुरुषोंका सेवन करना चाहिये। जो जिसके निकट रहता है, उसके समान वर्णका हो जाता है। जैसे नील पक्षी मेरु पर्वतका आश्रय लेनेसे सुवर्णके समान रंगका हो जाता है ॥

भीष्म उवाच

इत्येवमाख्याय महामुनिस्तदा चतुर्षु वर्णेषु विधानमर्थवित् । शुश्रूषया वृत्तगतिं समाधिना समाधियुक्तः प्रययौ स्वमाश्रमम् ॥

भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! शास्त्रोंके तात्पर्यको जाननेवाले महामुनि पराशर इस प्रकार चारों वर्णोंके लिये कर्तव्यका विधान बताकर तथा शुश्रूषा और समाधिसे प्राप्त होनेवाली गतिका निरूपण करके एकाग्रचित्त हो अपने आश्रमको चले गये ॥

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)


[सबके पूजनीय और वन्दनीय कौन हैं—इस विषयमें इन्द्र और मातलिका संवाद]

युधिष्ठिर उवाच

केषां देवा महाभागाः संनमन्ते महात्मनाम् । लोकेऽस्मिंस्तानृषीन् सर्वान् श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥

युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! इस लोकमें महाभाग देवता किन महात्माओंको मस्तक झुकाते हैं? मैं उन समस्त ऋषियोंका यथार्थ परिचय सुनना चाहता हूँ ॥

भीष्म उवाच

इतिहासमिमं विप्राः कीर्तयन्ति पुराविदः । अस्मिन्नर्थे महाप्राज्ञास्तं निबोध युधिष्ठिर ॥

भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! इस विषयमें प्राचीन बातोंको जाननेवाले महाज्ञानी ब्राह्मण इस इतिहासका वर्णन करते हैं। तुम उस इतिहासको सुनो ॥

वृत्रं हत्वाप्युपावृत्तं त्रिदशानां पुरस्कृतम् । महेन्द्रमनुसम्प्राप्तं स्तूयमानं महर्षिभिः ॥ श्रिया परमया युक्तं रथस्थं हरिवाहनम् । मातलिः प्राञ्जलिर्भूत्वा देवमिन्द्रमुवाच ह ॥

जब इन्द्र वृत्रासुरको मारकर लौटे, उस समय देवता उन्हें आगे करके खड़े थे। महर्षिगण महेन्द्रकी स्तुति करते थे। हरित वाहनोंवाले देवराज इन्द्र रथपर बैठकर उत्तम शोभासे सम्पन्न हो रहे थे। उसी समय मातलिने हाथ जोड़कर देवराज इन्द्रसे कहा।।

मातलिरुवाच

नमस्कृतानां सर्वेषां भगवंस्त्वं पुरस्कृतः।
येषां लोके नमस्कुर्यात् तान् ब्रवीतु भवान् मम॥
**मातलि बोले—**भगवन्! जो सबके द्वारा वन्दित होते हैं, उन समस्त देवताओंके आप अगुआ हैं; परन्तु आप भी इस जगत्में जिनको मस्तक झुकाते हैं, उन महात्माओंका मुझे परिचय दीजिये।।

भीष्म उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा देवराजः शचीपतिः।
यन्तारं परिपृच्छन्तं तमिन्द्रः प्रत्युवाच ह॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! मातलिकी वह बात सुनकर शचीपति देवराज इन्द्रने उपर्युक्त प्रश्न पूछनेवाले अपने सारथिसे इस प्रकार कहा।।

इन्द्र उवाच

धर्मं चार्थं च कामं च येषां चिन्तयतां मतिः।
नाधर्मे वर्तते नित्यं तान् नमस्यामि मातले॥
**इन्द्र बोले—**मातले! धर्म, अर्थ और कामका चिन्तन करते हुए भी जिनकी बुद्धि कभी अधर्ममें नहीं लगती, मैं प्रतिदिन उन्हींको नमस्कार करता हूँ।।

ये रूपगुणसम्पन्नाः प्रमदाहृदयंगमाः।
निवृत्ताः कामभोगेषु तान् नमस्यामि मातले॥
मातले! जो रूप और गुणसे सम्पन्न हैं तथा युवतियोंके हृदय-मन्दिरमें हठात् प्रवेश कर जाते हैं—अर्थात् जिन्हें देखते ही युवतियाँ मोहित हो जाती हैं, ऐसे पुरुष यदि काम-भोगसे दूर रहते हैं तो मैं उनके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ।।

स्वेषु भोगेषु संतुष्टाः सुवाचो वचनक्षमाः।
अमानकामाश्चार्घ्यार्हास्तान् नमस्यामि मातले॥
मातले! जो अपनेको प्राप्त हुए भोगोंमें ही संतुष्ट हैं—दूसरोंसे अधिककी इच्छा नहीं रखते। जो सुन्दर वाणी बोलते हैं और प्रवचन करनेमें कुशल हैं, जिनमें अहंकार और कामनाका सर्वथा अभाव है तथा जो सबसे अर्घ्य पानेके योग्य हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।।

धनं विद्यास्तथैश्वर्यं येषां न चलयेन्मतिम्।

चलितां ये निगृह्णन्ति तान् नित्यं पूजयाम्यहम् ।। धन, विद्या और ऐश्वर्य जिनकी बुद्धिको विचलित नहीं कर सकते तथा जो चंचल हुई बुद्धिको भी विवेकसे काबूमें कर लेते हैं, उनकी मैं नित्य पूजा करता हूँ ।। इष्टैर्दारैरुपैतानां शुचीनामाग्निहोत्रिणाम् । चतुष्पादकुटुम्बानां मातले प्रणमाम्यहम् ।। मातले! जो प्रिय पत्नीसे युक्त हैं, पवित्र आचार-विचारसे रहते हैं, नित्य अग्निहोत्र करते हैं और जिनके कुटुम्बमें चौपायों (गौ आदि पशुओं) का भी पालन होता है, उनको मैं नमस्कार करता हूँ ।। येषामर्थस्तथा कामो धर्ममूलविवर्धितः । धर्मार्थौ यस्य नियतौ तान् नमस्यामि मातले ।। मातले! जिनका अर्थ और काम धर्ममूलक होकर वृद्धिको प्राप्त हुआ है तथा जिसके धर्म और अर्थ नियत हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ ।। धर्ममूलार्थकामानां ब्राह्मणानां गवामपि । पतिव्रतानां नारीणां प्रणामं प्रकरोम्यहम् ।। धर्ममूलक धनकी कामना रखनेवाले ब्राह्मणोंको तथा गौओं और पतिव्रता नारियोंको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ।। ये भुक्त्वा मानुषान् भोगान् पूर्वे वयसि मातले । तपसा स्वर्गमायान्ति शश्वत् तान् पूजयाम्यहम् ।। मातले! जो जीवनकी पूर्व अवस्थामें मानवभोगोंका उपभोग करके तपस्याद्वारा स्वर्गमें आते हैं, उनका मैं सदा ही पूजन करता हूँ ।। असम्भोगान्न चासक्तान् धर्मनित्याञ्जितेन्द्रियान् । संन्यस्तानचलप्रख्यान् मनसा पूजयामि तान् ।। जो भोगोंसे दूर रहते हैं, जिनकी कहीं भी आसक्ति नहीं है, जो सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं, इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं, जो सच्चे संन्यासी हैं और पर्वतोंके समान कभी विचलित नहीं होते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषोंकी मैं मनसे पूजा करता हूँ ।। ज्ञानप्रसन्नविद्यानां निरूढं धर्ममिच्छताम् । परैः कीर्तितशौचानां मातले तान् नमाम्यहम् ।। मातले! जिनकी विद्या ज्ञानके कारण स्वच्छ है, जो सुप्रसिद्ध धर्मके पालनकी इच्छा रखते हैं तथा जिनके शौचाचारकी प्रशंसा दूसरे लोग करते हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[सरोवर खोदाने और वृक्ष लगानेका माहात्म्य]

युधिष्ठिर उवाच

संस्कृतानां तटाकानां यत् फल कुरुपुंगव ।
तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तोऽद्य भरतर्षभ ॥
युधिष्ठिरने कहा— कुरुपुंगव! भरतश्रेष्ठ! सरोवरोंके बनानेका जो फल है, उसे आज मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥

भीष्म उवाच

सुप्रदर्शो धनपतिश्चित्रधातुविभूषितः ।
त्रिषु लोकेषु सर्वत्र पूजितो यस्तटाकवान् ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! जो तालाब बनवाता है वह पुरुष विचित्र धातुओंसे विभूषित धनाध्यक्ष कुबेरके समान दर्शनीय है। वह तीनों लोकोंमें सर्वत्र पूजित होता है ॥

इह चामुत्र सदनं पुत्रीयं वित्तवर्धनम् ।
कीर्तिसंजननं श्रेष्ठं तटाकानां निवेशनम् ॥
तालाबका संस्थापन श्रेष्ठ एवं कीर्तिजनक है। वह इस लोक और परलोकमें भी उत्तम निवासस्थान है। वह पुत्रका घर तथा धनकी वृद्धि करनेवाला है ॥

धर्मस्यार्थस्य कामस्य फलमाहुर्मनीषिणः ।
तटाकं सुकृतं देशे क्षेत्रे देशसमाश्रयम् ॥
मनीषी पुरुषोंने सरोवरोंको धर्म, अर्थ और काम तीनोंका फल देनेवाला बताया है। तालाब देशमें मूर्तिमान् पुण्यस्वरूप है और क्षेत्रमें देशका भारी आश्रय है ॥

चतुर्विधानां भूतानां तटाकमुपलक्षये ।
तटाकानि च सर्वाणि दिशन्ति श्रियमुत्तमाम् ॥
मैं तालाबको चारों (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) प्रकारके प्राणियोंके लिये उपयोगी देखता हूँ। जगत्में जितने भी सरोवर हैं, वे सभी उत्तम सम्पत्ति प्रदान करते हैं ॥

देवा मनुष्या गन्धर्वाः पितरोरगराक्षसाः ।
स्थावराणि च भूतानि संश्रयन्ति जलाशयम् ॥
देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस तथा स्थावर भूत—ये सभी जलाशयका आश्रय लेते हैं ॥

तस्मात्तांस्ते प्रवक्ष्यामि तटाके ये गुणाः स्मृताः ।
या च तत्र फलप्राप्ती ऋषिभिः समुदाहृता ॥
अतः सरोवर खोदवानेमें जो गुण हैं, उन सबका मैं तुमसे वर्णन करूँगा तथा ऋषियोंने तालाब खोदानेसे जिन फलोंकी प्राप्ति बतायी है, उनका भी परिचय दे रहा हूँ ॥

वर्षमात्रं तटाके तु सलिलं यत्र तिष्ठति ।

अग्निहोत्रफलं तस्य फलमाहुर्मनीषिणः ॥
जिस सरोवरमें एक वर्षतक पानी ठहरता है, उसका फल मनीषी पुरुषोंने अग्निहोत्र बताया है अर्थात् उसे खोदानेवालेको प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेका पुण्य प्राप्त होता है ॥
निदाघकाले सलिलं तटाके यस्य तिष्ठति ।
वाजपेयफलं तस्य फलं वै ऋषयोऽब्रुवन् ॥
जिसके तालाबमें गर्मीभर जल रहता है, उसके लिये ऋषियोंने वाजपेय यज्ञके फलकी प्राप्ति बतायी है ॥
सकुलं तारयेद् वंशं यस्य खाते जलाशये ।
गावः पिबन्ति पानीयं साधवश्च नसः सदा ॥
जिसके खोदवाये हुए सरोवरमें सदा साधुपुरुष तथा गौएँ पानी पीती हैं, वह अपने कुलको तार देता है ॥
तटाके यस्य गावस्तु पिबन्ति तृषिता जलम् ।
मृगपक्षिमनुष्याश्च सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥
जिसके जलाशयमें प्यासी गौएँ पानी पीती हैं तथा तृषित मृग, पक्षी एवं मनुष्य अपनी प्यास बुझाते हैं, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ॥
यत् पिबन्ति जलं तत्र स्नायन्ते विश्रमन्ति च ।
तटाककर्तुस्तत् सर्वं प्रेत्यानन्त्याय कल्पते ॥
मनुष्य उस तालाबमें जो जल पीते, स्नान करते और तटपर विश्राम लेते हैं, वह सारा पुण्य सरोवर बनवानेवालेको परलोकमें अक्षय होकर मिलता है ॥
दुर्लभं सलिलं तात विशेषेण परंतप ।
पानीयस्य प्रदानेन सिद्धिर्भवति शाश्वती ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले तात! जल विशेषरूपसे दुर्लभ वस्तु है; अतः जलदान करनेसे शाश्वत सिद्धि प्राप्त होती है ॥
तिलान् ददत पानीयं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् ।
बान्धवैः सह मोदध्वमेतत् प्रेतेषु दुर्लभम् ॥
तिल, जल, दीप, अन्न और रहनेके लिये घर दान करो, तथा बन्धु-बान्धवोंके साथ सदा आनन्दित रहो, क्योंकि ये सब वस्तुएँ मरे हुओंके लिये दुर्लभ हैं ॥
सर्वदानैर्गुरुतरं सर्वदानैर्विशिष्यते ।
पानीयं नरशार्दूल तस्माद् दातव्यमेव हि ॥
नरश्रेष्ठ! जलका दान सभी दानोंसे गुरुतर है। वह समस्त दानोंसे बढ़कर है; अतः उसका दान अवश्य ही करना चाहिये ॥
एवमेतत् तटाकेषु कीर्तितं फलमुत्तमम् ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वृक्षाणामपि रोपणे ॥

इस प्रकार यह सरोवर खोदनेका उत्तम फल बताया गया है। इसके बाद वृक्ष लगानेका फल भली प्रकार बताऊँगा ।।

स्थावराणां तु भूतानां जातयः षट् प्रकीर्तिताः । वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारतृणवीरुधः ।। एता जात्यस्तु वृक्षाणामेषां रोपगुणास्त्विमे । स्थावर भूतोंकी छः जातियाँ बतायी गयी हैं—वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, त्वक्सार तथा तृण, वीरुध—ये वृक्षोंकी जातियाँ हैं। इनके लगानेसे ये-ये गुण बताये गये हैं ।।

पनसाम्रादयो वृक्षा गुल्मा मन्दारपूर्वकाः ।। नागिकामलियावल्ल्यो मालतीत्यादिका लताः । वेणुक्रमुकत्वक्साराः सस्यानि तृणजातयः ।। कटहल और आम आदि वृक्ष जातिके अन्तर्गत हैं। मन्दार आदि गुल्म कोटिमें माने गये हैं। नागिका, मलिया आदि वल्लीके अन्तर्गत हैं। मालती आदि लताएँ हैं। बाँस और सुपारी आदिके पेड़ त्वक्सार जातिके अन्तर्गत हैं। खेतमें जो घास और अनाज उगते हैं, वे सब तृण जातिमें अन्तर्भूत हैं ।।

कीर्तिश्च मानुषे लोके प्रेत्य चैव शुभं फलम् । लभ्यते नाकपृष्ठे च पितृभिश्च महीयते ।। देवलोकगतस्यापि नाम तस्य न नश्यति । अतीतानागतांश्चैव पितृवंशांश्च भारत ।। तारयेद् वृक्षरोपी तु तस्माद् वृक्षान् प्ररोपयेत् । भरतनन्दन! वृक्ष लगानेसे मनुष्यलोकमें कीर्ति बनी रहती है और मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें शुभ फलकी प्राप्ति होती है। वृक्ष लगानेवाला पुरुष पितरोंद्वारा भी सम्मानित होता है। देवलोकमें जानेपर भी उसका नाम नहीं नष्ट होता। वह अपने बीते हुए पूर्वजों और आनेवाली संतानोंको भी तार देता है। अतः वृक्ष अवश्य लगाने चाहिये ।।

तस्य पुत्रा भवन्त्येव पादपा नात्र संशयः ।। परलोकगतः स्वर्गे लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् । जिसके कोई पुत्र नहीं हैं, उसके भी वृक्ष ही पुत्र होते हैं; इसमें संशय नहीं है। वृक्ष लगानेवाला पुरुष परलोकमें जानेपर स्वर्गमें अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ।।

पुष्पैः सुरगणान् वृक्षाः फलैश्चापि तथा पितॄन् ।। छायया चातिथिंस्तात पूजयन्ति महीरुहाः । तात! वृक्ष अपने फूलोंसे देवताओंका, फलोंसे पितरोंका तथा छायासे अतिथियोंका सदा पूजन करते रहते हैं ।।

किन्नरोरगरक्षांसि देवगन्धर्वमानवाः ।। तथा ऋषिगणाश्चैव संश्रयन्ते महीरुहान् ।

किन्नर, नाग, राक्षस, देव, गन्धर्व, मनुष्य तथा ऋषिगण भी वृक्षोंका आश्रय लेते हैं ।।
पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान् ।।
वृक्षदान् पुत्रवद् वृक्षाः तारयन्ति परत्र च ।
तस्मात् तटाके वृक्षा वै रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा ।।
फल और फूलोंसे भरे हुए वृक्ष इस जगत्में मनुष्योंको तृप्त करते हैं। जो वृक्ष दान करते हैं, उनके वे वृक्ष परलोकमें पुत्रकी भाँति पार उतारते हैं। अतः कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सदा ही सरोवरके किनारे वृक्ष लगाना चाहिये ।।
पुत्रवत् परिरक्ष्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः ।
तटाककृद् वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्च यो द्विजः ।।
एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिनः ।
वृक्ष लगाकर उनकी पुत्रोंकी भाँति रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि वे धर्मतः पुत्र माने गये हैं। जो तालाब बनवाता है और जो उसके किनारे वृक्ष लगाता है, जो द्विज यज्ञका अनुष्ठान करता है तथा दूसरे जो लोग सत्यभाषण करनेवाले हैं—वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं ।।
तस्मात् तटाकं कुर्वीत आरामांश्चापि योजयेत् ।।
यजेच्च विविधैर्यज्ञैः सत्यं च विधिवद् वदेत् ।
इसलिये सरोवर खोदावे और उसके तटपर बगीचे भी लगावे। सदा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करे और विधिपूर्वक सत्य बोले ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि छत्रोपानहदानप्रशंसा नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ।। ९६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छत्रदान और उपानहदानकी प्रशंसानामक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९६ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १७५ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १९७ १/२ श्लोक हैं)