महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
शर्वस्य शास्त्रेषु तथा दशनामशतानि च ॥ ७५ ॥ पितामह ब्रह्माने पूर्वकालमें देवताओंके निकट महादेवजीके दस हजार नाम बताये थे और शास्त्रोंमें भी उनके सहस्र नाम वर्णित हैं ॥ ७५ ॥ गुह्यानीमानि नामानि तण्डिर्भगवतोऽच्युत । देवप्रसादाद् देवेशः पुरा प्राह महात्मने ॥ ७६ ॥ अच्युत! पहले देवेश्वर ब्रह्माजीने महादेवजीकी कृपासे महात्मा तण्डिके निकट जिन नामोंका वर्णन किया था, महर्षि तण्डिने भगवान् महादेवके उन्हीं समस्त गोपनीय नामोंका मेरे समक्ष प्रतिपादन किया था ॥ ७६ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मेघवाहनपर्वाख्याने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मेघवाहनपर्वकी कथाविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
सप्तदशोऽध्यायः
शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल
वासुदेव उवाच
ततः स प्रयतो भूत्वा मम तात युधिष्ठिर ।
प्राञ्जलिः प्राह विप्रर्षिर्नामसंग्रहमादितः ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—तात युधिष्ठिर! तदनन्तर ब्रह्मर्षि उपमन्युने मन और इन्द्रियोंको एकाग्र करके पवित्र हो हाथ जोड़ मेरे समक्ष वह नाम-संग्रह आदिसे ही कहना आरम्भ किया ॥ १ ॥
उपमन्युरुवाच
ब्रह्मप्रोक्तैर्ऋषिप्रोक्तैर्वेदवेदाङ्गसम्भवैः ।
सर्वलोकेषु विख्यातं स्तुत्यं स्तोष्यामि नामभिः ॥ २ ॥
उपमन्यु बोले—मैं ब्रह्माजीके कहे हुए, ऋषियोंके बताये हुए तथा वेद-वेदाङ्गोंसे प्रकट हुए नामोंद्वारा सर्वलोकविख्यात एवं स्तुतिके योग्य भगवान्की स्तुति करूँगा ॥ २ ॥
महद्भिर्विहितैः सत्यैः सिद्धैः सर्वार्थसाधकैः ।
ऋषिणा तण्डिना भक्त्या कृतैर्वेदकृतात्मना ॥ ३ ॥
यथोक्तैः साधुभिः ख्यातैर्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
प्रवरं प्रथमं स्वर्ग्यं सर्वभूतहितं शुभम् ॥ ४ ॥
श्रुतैः सर्वत्र जगति ब्रह्मलोकावतारितैः ।
सत्यैस्तत् परमं ब्रह्म ब्रह्मप्रोक्तं सनातनम् ॥ ५ ॥
वक्ष्ये यदुकुलश्रेष्ठ शृणुष्वावहितो मम ।
वरयैनं भवं देवं भक्तस्त्वं परमेश्वरम् ॥ ६ ॥
इन सब नामोंका आविष्कार महापुरुषोंने किया है तथा वेदोंमें दत्तचित्त रहनेवाले महर्षि तण्डिने भक्तिपूर्वक इनका संग्रह किया है। इसलिये ये सभी नाम सत्य, सिद्ध तथा सम्पूर्ण मनोरथोंके साधक हैं। विख्यात श्रेष्ठ पुरुषों तथा तत्त्वदर्शी मुनियोंने इन सभी नामोंका यथावत्रूपसे प्रतिपादन किया है। महर्षि तण्डिने ब्रह्मलोकसे मर्त्यलोकमें इन नामोंको उतारा है; इसलिये ये सत्यनाम सम्पूर्ण जगत्में आदरपूर्वक सुने गये हैं। यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण! यह ब्रह्माजीका कहा हुआ सनातन शिव-स्तोत्र अन्य स्तोत्रोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है और उत्तम वेदमय है। सब स्तोत्रोंमें इसका प्रथम स्थान है। यह स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला, सम्पूर्ण भूतोंके लिये हितकर एवं शुभकारक है। इसका मैं आपसे वर्णन करूँगा। आप
सावधान होकर मेरे मुखसे इसका श्रवण करें। आप परमेश्वर महादेवजीके भक्त हैं; अतः इस शिवस्वरूप स्तोत्रका वरण करें॥ ३—६॥
तेन ते श्रावयिष्यामि यत् तद् ब्रह्म सनातनम् । न शक्यं विस्तरात् कृत्स्नं वक्तुं सर्वस्य केनचित् ॥ ७ ॥ युक्तेनापि विभूतीनामपि वर्षशतैरपि । यस्यादिर्मध्यमन्तं च सुरैरपि न गम्यते ॥ ८ ॥ कस्तस्य शक्नुयाद् वक्तुं गुणान् कात्स्न्र्येन माधव ।
शिवभक्त होनेके ही कारण मैं यह सनातन वेदस्वरूप स्तोत्र आपको सुनाता हूँ। महादेवजीके इस सम्पूर्ण नामसमूहका पूर्णरूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन तो कोई कर ही नहीं सकता। कोई व्यक्ति योगयुक्त होनेपर भी भगवान् शिवकी विभूतियोंका सैकड़ों वर्षोंमें भी वर्णन नहीं कर सकता। माधव! जिनके आदि, मध्य और अन्तका पता देवता भी नहीं पाते हैं, उनके गुणोंका पूर्णरूपसे वर्णन कौन कर सकता है? ॥ ७-८½ ॥
किं तु देवस्य महतः संक्षिप्तार्थपदाक्षरम् ॥ ९ ॥ शक्तितश्चरितं वक्ष्ये प्रसादात् तस्य धीमतः । अप्राप्य तु ततोऽनुज्ञां न शक्यः स्तोतुमीश्वरः ॥ १० ॥
परंतु मैं अपनी शक्तिके अनुसार उन बुद्धिमान् महादेवजीकी ही कृपासे संक्षिप्त अर्थ, पद और अक्षरोंसे युक्त उनके चरित्र एवं स्तोत्रका वर्णन करूँगा। उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना उन महेश्वरकी स्तुति नहीं की जा सकती है ॥ ९-१० ॥
यदा तेनाभ्यनुज्ञातः स्तुतो वै स तदा मया । अनादिनिधनस्याहं जगद्योनेर्महात्मनः ॥ ११ ॥ नाम्नां कंचित् समुद्देशं वक्ष्याम्यव्यक्तयोनिनः ।
जब उनकी आज्ञा प्राप्त हुई है, तभी मैंने उनकी स्तुति की है। आदि-अन्तसे रहित तथा जगत्के कारणभूत अव्यक्तयोनि महात्मा शिवके नामोंका कुछ संक्षिप्त संग्रह मैं बता रहा हूँ ॥ ११½ ॥
वरदस्य वरेण्यस्य विश्वरूपस्य धीमतः ॥ १२ ॥ शृणु नाम्नां च यं कृष्ण यदुक्तं पद्मयोनिना ।
श्रीकृष्ण! जो वरदायक, वरेण्य (सर्वश्रेष्ठ), विश्वरूप और बुद्धिमान् हैं, उन भगवान् शिवका पद्मयोनि ब्रह्माजीके द्वारा वर्णित नाम-संग्रह श्रवण करो ॥
दशनामसहस्राणि यान्याह प्रपितामहः ॥ १३ ॥ तानि निर्मथ्य मनसा दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ।
प्रपितामह ब्रह्माजीने जो दस हजार नाम बताये थे, उन्हींको मनरूपी मथानीसे मथकर मथे हुए दहीसे घीकी भाँति यह सहस्रनामस्तोत्र निकाला गया है ॥
गिरेः सारं यथा हेम पुष्पसारं यथा मधु ॥ १४ ॥
घृतात् सारं यथा मण्डस्तथैतत् सारमुद्धृतम् । जैसे पर्वतका सार सुवर्ण, फूलका सार मधु और घीका सार मण्ड है, उसी प्रकार यह दस हजार नामोंका सार उद्धृत किया गया है ॥ १४ १/२ ॥ सर्वपापापहमिदं चतुर्वेदसमन्वितम् ॥ १५ ॥ प्रयत्नेनाधिगन्तव्यं धार्यं च प्रयतात्मना । माङ्गल्यं पौष्टिकं चैव रक्षोघ्नं पावनं महत् ॥ १६ ॥ यह सहस्रनाम सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला और चारों वेदोंके समन्वयसे युक्त है। मनको वशमें करके प्रयत्नपूर्वक इसका ज्ञान प्राप्त करे और सदा अपने मनमें इसको धारण करे। यह मङ्गलजनक, पुष्टिकारक, राक्षसोंका विनाशक तथा परम पावन है ॥ इदं भक्ताय दातव्यं श्रद्दधानास्तिकाय च । नाश्रद्दधानरूपाय नास्तिकायाजितात्मने ॥ १७ ॥ जो भक्त हो, श्रद्धालु और आस्तिक हो, उसीको इसका उपदेश देना चाहिये। अश्रद्धालु, नास्तिक और अजितात्मा पुरुषको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये ॥ यश्चाभ्यसूयते देवं कारणात्मानमीश्वरम् । स कृष्ण नरकं याति सह पूर्वैः सहात्मजैः ॥ १८ ॥ श्रीकृष्ण! जो जगत्के कारणरूप ईश्वर महादेवके प्रति दोषदृष्टि रखता है, वह पूर्वजों और अपनी संतानके सहित नरकमें पड़ता है ॥ १८ ॥ इदं ध्यानमिदं योगमिदं ध्येयमनुत्तमम् । इदं जप्यमिदं ज्ञानं रहस्यमिदमुत्तमम् ॥ १९ ॥ यह सहस्रनामस्तोत्र ध्यान है, यह योग है, यह सर्वोत्तम ध्येय है, यह जपनीय मन्त्र है, यह ज्ञान है और यह उत्तम रहस्य है ॥ १९ ॥ यं ज्ञात्वा अन्तकालेऽपि गच्छेत परमां गतिम् । पवित्रं मङ्गलं मेध्यं कल्याणमिदमुत्तमम् ॥ २० ॥ इदं ब्रह्मा पुरा कृत्वा सर्वलोकपितामहः । सर्वस्तवानां राजत्वे दिव्यानां समकल्पयत् ॥ २१ ॥ तदाप्रभृति चैवायमीश्वरस्य महात्मनः । स्तवराज इति ख्यातो जगत्यमरपूजितः ॥ २२ ॥ जिसको अन्तकालमें भी जान लेनेपर मनुष्य परमगतिको पा लेता है, वह यह सहस्रनामस्तोत्र परम पवित्र, मङ्गलकारक, बुद्धिवर्द्धक, कल्याणमय तथा उत्तम है। सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने पूर्वकालमें इस स्तोत्रका आविष्कार करके इसे समस्त दिव्यस्तोत्रोंके राजाके पदपर प्रतिष्ठित किया था। तबसे महात्मा ईश्वर महादेवका यह देवपूजित स्तोत्र संसारमें 'स्तवराज' के नामसे विख्यात हुआ ॥ २०—२२ ॥ ब्रह्मलोकादयं स्वर्गे स्तवराजोऽवतारितः ।
कारण भयंकर, ५ प्रवरः—सर्वश्रेष्ठ, ६ वरदः—अभीष्ट वर देनेवाले, ७ वरः—वरण करने योग्य, वरस्वरूप, ८ सर्वात्मा—सबके आत्मा, ९ सर्वविख्यातः—सर्वत्र प्रसिद्ध, १० सर्वः—विश्वात्मा होनेके कारण सर्वस्वरूप, ११ सर्वकरः—सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा, १२ भवः—सबकी उत्पत्तिके स्थान ॥ ३१ ॥
जटी चर्मी शिखण्डी च सर्वाङ्गः सर्वभावनः ।
हरश्च हरिणाक्षश्च सर्वभूतहरः प्रभुः ॥ ३२ ॥
१३ जटी—जटाधारी, १४ चर्मी—व्याघ्रचर्म धारण करनेवाले, १५ शिखण्डी—शिखाधारी, १६ सर्वाङ्गः—सम्पूर्ण अंगोंसे सम्पन्न, १७ सर्वभावनः—सबके उत्पादक, १८ हरः—पापहारी, १९ हरिणाक्षः—मृगके समान विशाल नेत्रवाले, २० सर्वभूतहरः—सम्पूर्ण भूतोंका संहार करनेवाले, २१ प्रभुः—स्वामी ॥
प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च नियतः शाश्वतो ध्रुवः ।
श्मशानवासी भगवान् खचरो गोचरोऽर्दनः ॥ ३३ ॥
२२ प्रवृत्तिः—प्रवृत्तिमार्ग, २३ निवृत्तिः—निवृत्तिमार्ग, २४ नियतः—नियमपरायण, २५ शाश्वतः—नित्य, २६ ध्रुवः—अचल, २७ श्मशानवासी—श्मशानभूमिमें निवास करनेवाले, २८ भगवान्—सम्पूर्ण ऐश्वर्य, ज्ञान, यज्ञ, श्री, वैराग्य और धर्मसे सम्पन्न, २९ खचरः—आकाशमें विचरनेवाले, ३० गोचरः—पृथ्वीपर विचरनेवाले, ३१ अर्दनः—पापियोंको पीड़ा देनेवाले ॥ ३३ ॥
अभिवाद्यो महाकर्मा तपस्वी भूतभावनः ।
उन्मत्तवेषप्रच्छन्नः सर्वलोकप्रजापतिः ॥ ३४ ॥
३२ अभिवाद्यः—नमस्कारके योग्य, ३३ महाकर्मा—महान् कर्म करनेवाले, ३४ तपस्वी—तपस्यामें संलग्न, ३५ भूतभावनः—संकल्पमात्रसे आकाश आदि भूतोंकी सृष्टि करनेवाले, ३६ उन्मत्तवेषप्रच्छन्नः—उन्मत्त वेषमें छिपे रहनेवाले, ३७ सर्वलोकप्रजापतिः—सम्पूर्ण लोकोंकी प्रजाओंके पालक ॥ ३४ ॥
महारूपो महाकायो वृषरूपो महायशाः ।
महात्मा सर्वभूतात्मा विश्वरूपो महानुः ॥ ३५ ॥
३८ महारूपः—महान् रूपवाले, ३९ महाकायः—विराट्रूप, ४० वृषरूपः—धर्मस्वरूप, ४१ महायशाः—महान् यशस्वी, ४२ महात्मा—, ४३ सर्वभूतात्मा—सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा, ४४ विश्वरूपः—सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है वे, ४५ महाहनुः—विशाल ठोढ़ीवाले ॥ ३५ ॥
लोकपालोऽन्तर्हितात्मा प्रसादो हयगर्दभिः ।
पवित्रं च महांश्चैव नियमो नियमाश्रितः ॥ ३६ ॥
४६ लोकपालः—लोकरक्षक, ४७ अन्तर्हितात्मा—अदृश्य स्वरूपवाले, ४८ प्रसादः—प्रसन्नतासे परिपूर्ण, ४९ हयगर्दभिः—खच्चर जुते रथपर चलनेवाले, ५० पवित्रम्—
शुद्ध वस्तुरूप, ५१ महान्—पूजनीय, ५२ नियमः—शौच-संतोष आदि नियमोंके पालनसे प्राप्त होने योग्य, ५३ नियमाश्रितः—नियमोंके आश्रयभूत ॥ ३६ ॥
सर्वकर्मा स्वयम्भूत आदिरादिकरो निधिः ।
सहस्राक्षो विशालाक्षः सोमो नक्षत्रसाधकः ॥ ३७ ॥
५४ सर्वकर्मा—सारा जगत् जिनका कर्म है वे, ५५ स्वयम्भूतः—नित्यसिद्ध, ५६ आदिः—सबसे प्रथम, ५७ आदिकरः—आदि पुरुष हिरण्यगर्भकी सृष्टि करनेवाले, ५८ निधिः—अक्षय ऐश्वर्यके भण्डार, ५९ सहस्राक्षः—सहस्रों नेत्रवाले, ६० विशालाक्षः—विशाल नेत्रवाले, ६१ सोमः—चन्द्रस्वरूप, ६२ नक्षत्रसाधकः—नक्षत्रोंके साधक ॥ ३७ ॥
चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्ग्रहो ग्रहपतिर्वरः ।
अत्रिरत्र्या नमस्कर्ता मृगबाणार्पणोऽनघः ॥ ३८ ॥
६३ चन्द्रः—चन्द्रमारूपसे आह्लादकारी, ६४ सूर्यः—सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत सूर्य, ६५ शनिः—, ६६ केतुः—, ६७ ग्रहः—चन्द्रमा और सूर्यपर ग्रहण लगानेवाला राहु, ६८ ग्रहपतिः—ग्रहोंके पालक, ६९ वरः—वरणीय, ७० अत्रिः—अत्रि ऋषिस्वरूप, ७१ अत्र्या नमस्कर्ता—अत्रिपत्नी अनसूयाको दुर्वासारूपसे नमस्कार करनेवाले, ७२ मृगबाणार्पणः—मृगरूपधारी यज्ञपर बाण चलानेवाले, ७३ अनघः—पापरहित ॥ ३८ ॥
महातपा घोरतपा अदीनो दीनसाधकः ।
संवत्सरकरो मन्त्रः प्रमाणं परमं तपः ॥ ३९ ॥
७४ महातपाः—महान् तपस्वी, ७५ घोरतपाः—भयंकर तपस्या करनेवाले, ७६ अदीनः—उदार, ७७ दीनसाधकः—शरणमें आये हुए दीन-दुखियोंका मनोरथ सिद्ध करनेवाले, ७८ संवत्सरकरः—संवत्सरका निर्माता, ७९ मन्त्रः—प्रणव आदि मन्त्ररूप, ८० प्रमाणम्—प्रमाणस्वरूप, ८१ परमं तपः—उत्कृष्ट तपःस्वरूप ॥ ३९ ॥
योगी योज्यो महाबीजो महारेता महाबलः ।
सुवर्णरेताः सर्वज्ञः सुबीजो बीजवाहनः ॥ ४० ॥
८२ योगी—योगनिष्ठ, ८३ योज्यः—मनोयोगके आश्रय, ८४ महाबीजः—महान् कारणरूप, ८५ महारेताः—महावीर्यशाली, ८६ महाबलः—महान् शक्तिसे सम्पन्न, ८७ सुवर्णरेताः—अग्निरूप, ८८ सर्वज्ञः—सब कुछ जाननेवाले, ८९ सुबीजः—उत्तम बीजरूप, ९० बीजवाहनः—जीवोंके संस्काररूप बीजको वहन करनेवाले ॥ ४० ॥
दशबाहुस्त्वनिमिषो नीलकण्ठ उमापतिः ।
विश्वरूपः स्वयं श्रेष्ठो बलवीरोऽबलो गणः ॥ ४१ ॥
९१ दशबाहुः—दस भुजाओंसे युक्त, ९२ अनिमिषः—कभी पलक न गिरानेवाले, ९३ नीलकण्ठः—जगत्की रक्षाके लिये हालाहल विषका पान करके उसके नील चिह्नको कण्ठमें धारण करनेवाले, ९४ उमापतिः—गिरिराजकुमारी उमाके पतिदेव, ९५ विश्वरूपः
—जगतस्वरूप, ९६ स्वयं श्रेष्ठः—स्वतःसिद्ध श्रेष्ठतासे सम्पन्न, ९७ बलवीरः—बलके द्वारा वीरता प्रकट करनेवाले, ९८ अबलो गणः—निर्बल समुदायस्वरूप ।। ४१ ।।
गणकर्ता गणपतिर्दिग्वासाः काम एव च ।
मन्त्रवित् परमो मन्त्रः सर्वभावकरो हरः ।। ४२ ।।
९९ गणकर्ता—अपने पार्षदगणोंका संघटन करनेवाले, १०० गणपतिः—प्रमथगणोंके स्वामी, १०१ दिग्वासाः—दिगम्बर, १०२ कामः—कमनीय, १०३ मन्त्रवित्—मन्त्रवेत्ता, १०४ परमो मन्त्रः—उत्कृष्ट मन्त्ररूप, १०५ सर्वभावकरः—समस्त पदार्थोंकी सृष्टि करनेवाले, १०६ हरः—दुःख हरण करनेवाले ।। ४२ ।।
कमण्डलुधरो धन्वी बाणहस्तः कपालवान् ।
अशनी शतघ्नी खड्गी पट्टिशी चायुधी महान् ।। ४३ ।।
१०७ कमण्डलुधरः—एक हाथमें कमण्डलु धारण करनेवाले, १०८ धन्वी—दूसरे हाथमें धनुष धारण करनेवाले, १०९ बाणहस्तः—तीसरे हाथमें बाण लिये रहनेवाले, ११० कपालवान्—चौथे हाथमें कपालधारी, १११ अशनी—पाँचवें हाथमें वज्र धारण करनेवाले, ११२ शतघ्नी—छठे हाथमें शतघ्नी रखनेवाले, ११३ खड्गी—सातवेंमें खड्गधारी, ११४ पट्टिशी—आठवेंमें पट्टिश धारण करनेवाले, ११५ आयुधी—नवें हाथमें अपने सामान्य आयुध त्रिशूलको लिये रहनेवाले, ११६ महान्—सर्वश्रेष्ठ ।। ४३ ।।
सुवहस्तः सुरूपश्च तेजस्तेजस्करो निधिः ।
उष्णीषी च सुवक्त्रश्च उदग्रो विनतस्तथा ।। ४४ ।।
११७ सुवहस्तः—दसवें हाथमें सुवा धारण करनेवाले, ११८ सुरूपः—सुन्दर रूपवाले, ११९ तेजः—तेजस्वी, १२० तेजस्करो निधिः—भक्तोंके तेजकी वृद्धि करनेवाले निधिरूप, १२१ उष्णीषी—सिरपर साफा धारण करनेवाले, १२२ सुवक्त्रः—सुन्दर मुखवाले, १२३ उदग्रः—ओजस्वी, १२४ विनतः—विनयशील ।। ४४ ।।
दीर्घश्च हरिकेशश्च सुतीर्थः कृष्ण एव च ।
शृगालरूपः सिद्धार्थो मुण्डः सर्वशुभङ्करः ।। ४५ ।।
१२५ दीर्घः—ऊँचे कदवाले, १२६ हरिकेशः—ब्रह्मा, विष्णु, महेशस्वरूप, १२७ सुतीर्थः—उत्तम तीर्थस्वरूप, १२८ कृष्णः—सच्चिदानन्दस्वरूप, १२९ शृगालरूपः—सियारका रूप धारण करनेवाले, १३० सिद्धार्थः—जिनके सभी प्रयोजन सिद्ध हैं, १३१ मुण्डः—मूँड़ मुड़ाये हुए, भिक्षुस्वरूप, १३२ सर्वशुभंकरः—समस्त प्राणियोंका हित करनेवाले ।। ४५ ।।
अजश्च बहुरूपश्च गन्धधारी कपर्द्यपि ।
ऊर्ध्वरेता ऊर्ध्वलिङ्ग ऊर्ध्वशायी नभःस्थलः ।। ४६ ।।
१३३ अजः—अजन्मा, १३४ बहुरूपः—बहुत-से रूप धारण करनेवाले, १३५ गन्धधारी—कुंकुम और कस्तूरी आदि सुगन्धित पदार्थ धारण करनेवाले, १३६ कपर्दी—
जटाजूटधारी, १३७ ऊर्ध्वरेताः—अखण्डित ब्रह्मचर्यवाले, १३८ ऊर्ध्वलिङ्गः—, १३९ ऊर्ध्वशायी—आकाशमें शयन करनेवाले, १४० नभः स्थलः—आकाश जिनका वासस्थान है वे ।।
त्रिजटी चीरवासाश्च रुद्रः सेनापतिर्विभुः । अहश्चरो नक्तंचरस्तिग्ममन्युः सुवर्चसः ।। ४७ ।।
१४१ त्रिजटी—तीन जटा धारण करनेवाले, १४२ चीरवासाः—वल्कल वस्त्र पहननेवाले, १४३ रुद्रः—दुःखको दूर भगानेवाले, १४४ सेनापतिः—सेनानायक, १४५ विभुः—सर्वव्यापी, १४६ अहश्चरः—दिनमें विचरनेवाले, १४७ नक्तंचरः—रातमें विचरनेवाले, १४८ तिग्ममन्युः—तीखे क्रोधवाले, १४९ सुवर्चसः—सुन्दर तेजवाले ।। ४७ ।।
गजहा दैत्यहा कालो लोकधाता गुणाकरः । सिंहशार्दूलरूपश्च आर्द्रचर्माम्बरावृतः ।। ४८ ।।
१५० गजहा—गजरूपधारी महान् असुरको मारनेवाले, १५१ दैत्यहा—अन्धक आदि दैत्योंका वध करनेवाले, १५२ कालः—मृत्यु अथवा संवत्सर आदि समय, १५३ लोकधाता—समस्त जगत्का धारण-पोषण करनेवाले, १५४ गुणाकरः—सद्गुणोंकी खान, १५५ सिंहशार्दूलरूपः—सिंह-व्याघ्र आदिका रूप धारण करनेवाले, १५६ आर्द्रचर्माम्बरावृतः—गजासुरके गीले चर्मको ही वस्त्र बनाकर उससे अपने-आपको आच्छादित करनेवाले ।। ४८ ।।
कालयोगी महानादः सर्वकामश्चतुष्पथः । निशाचरः प्रेतचारी भूतचारी महेश्वरः ।। ४९ ।।
१५७ कालयोगी—कालको भी योगबलसे जीतनेवाले, १५८ महानादः—अनाहत ध्वनिरूप, १५९ सर्वकामः—सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न, १६० चतुष्पथः—जिनकी प्राप्तिके ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग और अष्टाङ्गयोग—ये चार मार्ग हैं वे महादेव, १६१ निशाचरः—रात्रिके समय विचरनेवाले, १६२ प्रेतचारी—प्रेतोंके साथ विचरण करनेवाले, १६३ भूतचारी—भूतोंके साथ विचरनेवाले, १६४ महेश्वरः—इन्द्र आदि लोकेश्वरोंसे भी महान् ।।
बहुभूतो बहुधरः स्वर्भानुरमितो गतिः । नृत्यप्रियो नित्यनर्तो नर्तकः सर्वलालसः ।। ५० ।।
१६५ बहुभूतः—सृष्टिकालमें एकसे अनेक होनेवाले, १६६ बहुधरः—बहुतोंको धारण करनेवाले, १६७ स्वर्भानुः—, १६८ अमितः—अनन्त, १६९ गतिः—भक्तों और मुक्तात्माओंके प्राप्त होने योग्य, १७० नृत्यप्रियः—ताण्डव नृत्य जिन्हें प्रिय है वे शिव, १७१ नित्यनर्तः—निरन्तर नृत्य करनेवाले, १७२ नर्तकः—नाचने-नचानेवाले, १७३ सर्वलालसः—सबपर प्रेम रखनेवाले ।। ५० ।।
घोरो महातपाः पाशो नित्यो गिरिरुहो नभः ।
सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यतन्द्रितः ॥ ५१ ॥
१७४ घोरः—भयंकर रूपधारी, १७५ महातपाः—महान् तप करनेवाले, १७६ पाशः—अपनी मायारूपी पाशसे बाँधनेवाले, १७७ नित्यः—विनाशरहित, १७८ गिरिरुहः—पर्वतपर आरूढ़—कैलाशवासी, १७९ नभः—आकाशके समान असङ्ग, १८० सहस्रहस्तः—हजारों हाथोंवाले, १८१ विजयः—विजेता, १८२ व्यवसायः—दृढ़निश्चयी, १८३ अतन्द्रितः—आलस्यरहित ॥ ५१ ॥
अधर्षणो धर्षणात्मा यज्ञहा कामनाशकः ।
दक्षयागापहारी च सुसहो मध्यमस्तथा ॥ ५२ ॥
१८४ अधर्षणः—अजेय, १८५ धर्षणात्मा—भयरूप, १८६ यज्ञहा—दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेवाले, १८७ कामनाशकः—कामदेवको नष्ट करनेवाले, १८८ दक्षयागापहारी—दक्षके यज्ञका अपहरण करनेवाले, १८९—सुसहः—अति सहनशील, १९० मध्यमः—मध्यस्थ ॥ ५२ ॥
तेजोऽपहारी बलहा मुदितोऽर्थोऽजितोऽवरः ।
गम्भीरघोषो गम्भीरो गम्भीरबलवाहनः ॥ ५३ ॥
१९१ तेजोपहारी—दूसरोंके तेजको हर लेनेवाले, १९२ बलहा—बलनामक दैत्यका वध करनेवाले, १९३ मुदितः—आनन्दस्वरूप, १९४ अर्थः—अर्थस्वरूप, १९५ अजितः—अपराजित, १९६ अवरः—जिनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है वे भगवान् शिव, १९७ गम्भीरघोषः—गम्भीर घोष करनेवाले, १९८ गम्भीरः—गाम्भीर्ययुक्त, १९९ गम्भीरबलवाहनः—अगाध बलशाली वृषभपर सवारी करनेवाले ॥ ५३ ॥
न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो वृक्षकर्णस्थितिर्विभुः ।
सुतीक्ष्णदशनश्चैव महाकायो महाननः ॥ ५४ ॥
२०० न्यग्रोधरूपः—वटवृक्षस्वरूप, २०१ न्यग्रोधः—वटनिकटनिवासी, २०२ वृक्षकर्णस्थितिः—वटवृक्षके पत्तेपर शयन करनेवाले बालमुकुन्दरूप, २०३ विभुः—विविध रूपोंसे प्रकट होनेवाले, २०४ सुतीक्ष्णदशनः—अत्यन्त तीखे दाँतवाले, २०५ महाकायः—बड़े डीलडौलवाले, २०६ महाननः—विशाल मुखवाले ॥ ५४ ॥
विष्वक्सेनो हरिर्यज्ञः संयुगापीडवाहनः ।
तीक्ष्णतापश्च हर्यश्वः सहायः कर्मकालवित् ॥ ५५ ॥
२०७ विष्वक्सेनः—दैत्योंकी सेनाको सब ओर भगा देनेवाले, २०८ हरिः—आपत्तियोंको हर लेनेवाले, २०९ यज्ञः—यज्ञरूप, २१० संयुगापीडवाहनः—युद्धमें पीड़ारहित वाहनवाले, २११ तीक्ष्णतापः—दुःसह तापरूप सूर्य, २१२ हर्यश्वः—हरे रंगके घोड़ोंसे युक्त, २१३ सहायः—जीवमात्रके सखा, २१४ कर्मकालवित्—कर्मोंके कालको ठीक-ठीक जाननेवाले ॥ ५५ ॥
विष्णुप्रसादितो यज्ञः समुद्रो वडवामुखः । हुताशनसहायश्च प्रशान्तात्मा हुताशनः ॥ ५६ ॥ २१५ विष्णुप्रसादितः—भगवान् विष्णुने जिन्हें आराधना करके प्रसन्न किया था वे शिव, २१६ यज्ञः—विष्णुस्वरूप (यज्ञो वै विष्णुः), २१७ समुद्रः—महासागररूप, २१८ वडवामुखः—समुद्रमें स्थित बड़वानलरूप, २१९ हुताशनसहायः—अग्निके सखा वायुरूप, २२० प्रशान्तात्मा—शान्तचित्त, २२१ हुताशनः—अग्नि ।। ५६ ।।
उग्रतेजा महातेजा जन्यो विजयकालवित् । ज्योतिषामयनं सिद्धिः सर्वविग्रह एव च ॥ ५७ ॥ २२२ उग्रतेजाः—भयंकर तेजवाले, २२३ महातेजाः—महान् तेजसे सम्पन्न, २२४ जन्यः—संसारके जन्मदाता, २२५ विजयकालवित्—विजयके समयका ज्ञान रखनेवाले, २२६ ज्योतिषामयनम्—ज्योतिषोंका स्थान, २२७ सिद्धिः—सिद्धिस্বরূপ, २२८ सर्वविग्रहः—सर्वस्वरूप ।। ५७ ।।
शिखी मुण्डी जटी ज्वाली मूर्तिजो मूर्द्धगो बली । वेणवी पणवी ताली खली कालकटंकटः ॥ ५८ ॥ २२९ शिखी—शिखाधारी गृहस्थस्वरूप, २३० मुण्डी—शिखारहित संन्यासी, २३१ जटी—जटाधारी वानप्रस्थ, २३२ ज्वाली—अग्निकी प्रज्वलित ज्वालामें समिधाकी आहुति देनेवाले ब्रह्मचारी, २३३ मूर्तिजः—शरीर रूपसे प्रकट होनेवाले, २३४ मूर्द्धगः—मूर्द्धा—सहस्रार चक्रमें ध्येय रूपसे विद्यमान, २३५ बली—बलिष्ठ, २३६ वेणवी—वंशी बजानेवाले श्रीकृष्ण, २३७ पणवी—पणव नामक वाद्य बजानेवाले, २३८ ताली—ताल देनेवाले, २३९ खली—खलिहानके स्वामी, २४० काल-कटंकटः—यमराजके मायाको आवृत्त करनेवाले ।। ५८ ।।
नक्षत्रविग्रहमतिर्गुणबुद्धिर्लयोऽगमः । प्रजापतिर्विश्वबाहुर्विभागः सर्वगोऽमुखः ॥ ५९ ॥ २४१ नक्षत्रविग्रहमतिः—नक्षत्र—ग्रह-तारा आदिकी गतिको जाननेवाले, २४२ गुणबुद्धिः—गुणोंमें बुद्धि लगानेवाले, २४३ लयः—प्रलयके स्थान, २४४ अगमः—जाननेमें न आनेवाला, २४५ प्रजापतिः—प्रजाके स्वामी, २४६ विश्वबाहुः—सब ओर भुजावाले, २४७ विभागः—विभागस्वरूप, २४८ सर्वगः—सर्वव्यापी, २४९ अमुखः—बिना मुखवाला ।। ५९ ।।
विमोचनः सुसरणो हिरण्यकवचोद्भवः । मेढ्रजो बलचारी च महीचारी सुतस्तथा ॥ ६० ॥ २५० विमोचनः—संसार-बन्धनसे छुड़ानेवाले, २५१ सुसरणः—श्रेष्ठ आश्रय, २५२ हिरण्य-कवचोद्भवः—हिरण्यगर्भकी उत्पत्तिका स्थान, २५३ मेढ्रजः—, २५४ बलचारी
—बलका संचार करनेवाले, २५५ महीचारी—सारी पृथ्वीपर विचरनेवाले, २५६ स्रुतः—सर्वत्र पहुँचे हुए ।। ६० ।।
सर्वतूर्यनिनादी च सर्वातोद्यपरिग्रहः ।
व्यालरूपो गुहावासी गुहो माली तरङ्गवित् ॥ ६१ ॥
२५७ सर्वतूर्यनिनादी—सब प्रकारके बाजे बजानेवाले, २५८ सर्वातोद्यपरिग्रहः—सम्पूर्ण वाद्योंका संग्रह करनेवाले, २५९ व्यालरूपः—शेषनागस्वरूप, २६० गुहावासी—सबकी हृदयगुफामें निवास करनेवाले, २६१ गुहः—कार्तिकेयस्वरूप, २६२ माली—मालाधारी, २६३ तरङ्गवित्—क्षुधा-पिपासा आदि छहों ऊर्मियोंके ज्ञाता साक्षी ।। ६१ ।।
त्रिदशस्त्रिकालधृक् कर्मसर्वबन्धविमोचनः ।
बन्धनस्त्वसुरेन्द्राणां युधि शत्रुविनाशनः ॥ ६२ ॥
२६४ त्रिदशः—प्राणियोंकी तीन दशाओं—जन्म, स्थिति और विनाशके हेतुभूत, २६५ त्रिकालधृक्—भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंको धारण करनेवाले, २६६ कर्मसर्वबन्धविमोचनः—कर्मोंके समस्त बन्धनोंको काटनेवाले, २६७ असुरेन्द्राणां बन्धनः—बलि आदि असुरपतियोंको बाँध लेनेवाले, २६८ युधिशत्रुविनाशनः—युद्धमें शत्रुओंका विनाश करनेवाले ।। ६२ ।।
सांख्यप्रसादो दुर्वासाः सर्वसाधुनिषेवितः ।
प्रस्कन्दनो विभागज्ञोऽतुल्यो यज्ञविभागवित् ॥ ६३ ॥
२६९ सांख्यप्रसादः—आत्मा और अनात्माके विवेकरूप सांख्यज्ञानसे प्रसन्न होनेवाले, २७० दुर्वासाः—अत्रि और अनसूयाके पुत्र रुद्रावतार दुर्वासा मुनि, २७१ सर्वसाधुनिषेवितः—समस्त साधुपुरुषोंद्वारा सेवित, २७२ प्रस्कन्दनः—ब्रह्मादिको भी स्थानभ्रष्ट करनेवाले, २७३ विभागज्ञः—प्राणियोंके कर्म और फलोंके विभागको यथोचितरूपसे जाननेवाले, २७४ अतुल्यः—तुलनारहित, २७५ यज्ञविभागवित्—यज्ञसम्बन्धी हविष्यके विभिन्न भागोंका ज्ञान रखनेवाले ।। ६३ ।।
सर्ववासः सर्वचारी दुर्वासा वासवोऽमरः ।
हैमो हेमकरोऽयज्ञः सर्वधारी धरोत्तमः ॥ ६४ ॥
२७६ सर्ववासः—सर्वत्र निवास करनेवाले, २७७ सर्वचारी—सर्वत्र विचरनेवाले, २७८ दुर्वासाः—अनन्त और अपार होनेके कारण जिनको वस्त्रसे आच्छादित करना दुर्लभ है, २७९ वासवः—इन्द्रस्वरूप, २८० अमरः—अविनाशी, २८१ हैमः—हिमसमूह—हिमालयस्वरूप, २८२ हेमकरः—सुवर्णके उत्पादक, २८३ अयज्ञः—कर्मरहित, २८४ सर्वधारी—सबको धारण करनेवाले, २८५ धरोत्तमः—धारण करनेवालोंमें सबसे उत्तम—अखिल ब्रह्माण्डको धारण करनेवाले ।। ६४ ।।
लोहिताक्षो महाक्षश्च विजयाक्षो विशारदः ।
संग्रहो निग्रहः कर्ता सर्पचीरनिवासनः ॥ ६५ ॥
२८६ लोहिताक्षः—रक्तनेत्र, २८७ महाक्षः—बड़े नेत्रवाले, २८८ विजयाक्षः—विजयशील रथवाले, २८९ विशारदः—विद्वान्, २९० संग्रहः—संग्रह करनेवाले, २९१ निग्रहः—उद्दण्डोंको दण्ड देनेवाले, २९२ कर्ता—सबके उत्पादक, २९३ सर्पचीर-निवासनः—सर्पमय चीर धारण करनेवाले ।। ६५ ।।
मुख्योऽमुख्यश्च देहश्च काहलिः सर्वकामदः ।
सर्वकालप्रसादश्च सुबलो बलरूपधृक् ।। ६६ ।।
सर्वकामवरश्चैव सर्वदः सर्वतोमुखः ।
आकाशनिर्विरूपश्च निपाती ह्यवशः खगः ।। ६७ ।।
२९४ मुख्यः—सर्वश्रेष्ठ, २९५ अमुख्यः—जिससे बढ़कर मुख्य दूसरा कोई न हो वह, २९६ देहः—देहस्वरूप, २९७ काहलिः—काहल नामक वाद्यविशेषको बजानेवाले, २९८ सर्वकामदः—सम्पूर्ण कामनाओंके दाता, २९९ सर्वकालप्रसादः—सर्वदा कृपा करनेवाले, ३०० सुबलः—उत्तम बलसे सम्पन्न, ३०१ बलरूपधृक्—बल और रूपके आधार, ३०२ सर्वकामवरः—सम्पूर्ण कमनीय पदार्थोंमें श्रेष्ठ—मोक्षस्वरूप, ३०३ सर्वदः—सब कुछ देनेवाले, ३०४ सर्वतोमुखः—सब ओर मुखवाले, ३०५ आकाशनिर्विरूपः—आकाशकी भाँति जिनसे नाना प्रकारके रूप प्रकट होते हैं वे, ३०६ निपाती—पापियोंको नरकमें गिरानेवाले, ३०७ अवशः—जिनके ऊपर किसीका वश नहीं चलता वे, ३०८ खगः—आकाशगामी ।। ६६-६७ ।।
रौद्ररूपोंऽशुरादित्यो बहुरश्मिः सुवर्चसी ।
वसुवेगो महावेगो मनोवेगो निशाचरः ।। ६८ ।।
३०९ रौद्ररूपः—भयंकर रूपधारी, ३१० अंशुः—किरणस्वरूप, ३११ आदित्यः—अदितिपुत्र, ३१२ बहुरश्मिः—असंख्य किरणोंवाले, सूर्यरूप, ३१३ सुवर्चसी—उत्तम तेजसे सम्पन्न, ३१४ वसुवेगः—वायुके समान वेगवाले, ३१५ महावेगः—वायुसे भी अधिक वेगशाली, ३१६ मनोवेगः—मनके समान वेगवाले, ३१७ निशाचरः—रात्रिमें विचरनेवाले ।। ६८ ।।
सर्ववासी श्रियावासी उपदेशकरोऽकरः ।
मुनिरात्मनिरालोकः सम्भग्नश्च सहस्रदः ।। ६९ ।।
३१८ सर्ववासी—सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मरूपसे निवास करनेवाले, ३१९ श्रियावासी—लक्ष्मीके साथ निवास करनेवाले विष्णुरूप, ३२० उपदेशकरः—जिज्ञासुओंको तत्त्वका और काशीमें मरे हुए जीवोंको तारकमन्त्रका उपदेश करनेवाले, ३२१ अकरः—कर्तृत्वके अभिमानसे रहित, ३२२ मुनिः—मननशील, ३२३ आत्मनिरालोकः—देह आदिकी उपाधिसे अलग होकर आलोचना करनेवाले, ३२४ सम्भग्नः—सम्यक् रूपसे सेवित, ३२५ सहस्रदः—हजारोंका दान करनेवाले ।। ६९ ।।
पक्षी च पक्षरूपश्च अतिदीप्तो विशाम्पतिः ।
उन्मादो मदनः कामो ह्यश्वत्थोऽर्थकरो यशः ॥ ७० ॥ ३२६ पक्षी—गरुड़रूपधारी, ३२७ पक्षरूपः—शुक्लपक्षस्वरूप, ३२८ अतिदीप्तः—अत्यन्त तेजस्वी, ३२९ विशाम्पतिः—प्रजाओंके स्वामी, ३३० उन्मादः—प्रेममें उन्मत्त, ३३१ मदनः—कामदेवरूप, ३३२ कामः—कमनीय विषय, ३३३ अश्वत्थः—संसार-वृक्षरूप, ३३४ अर्थकरः—धन आदि देनेवाले, ३३५ यशः—यशस्वरूप ॥ ७० ॥
वामदेवश्च वामश्च प्राग् दक्षिणश्च वामनः । सिद्धयोगी महर्षिश्च सिद्धार्थः सिद्धसाधकः ॥ ७१ ॥ ३३६ वामदेवः—वामदेव ऋषिस्वरूप, ३३७ वामः—पापियोंके प्रतिकूल, ३३८ प्राक्—सबके आदि, ३३९ दक्षिणः—कुशल, ३४० वामनः—बलिको बाँधनेवाले वामन रूपधारी, ३४१ सिद्धयोगी—सनत्कुमार आदि सिद्ध महात्मा, ३४२ महर्षिः—वसिष्ठ आदि, ३४३ सिद्धार्थः—आप्तकाम, ३४४ सिद्धसाधकः—सिद्ध और साधकरूप ॥ ७१ ॥
भिक्षुश्च भिक्षुरूपश्च विपणो मृदुरव्ययः । महासेनो विशाखश्च षष्टिभागो गवां पतिः ॥ ७२ ॥ ३४५ भिक्षुः—संन्यासी, ३४६ भिक्षुरूपः—श्रीराम-कृष्ण आदिकी बालछविका दर्शन करनेके लिये भिक्षुरूप धारण करनेवाले, ३४७ विपणः—व्यवहारसे अतीत, ३४८ मृदुः—कोमल स्वभाववाले, ३४९ अव्ययः—अविनाशी, ३५० महासेनः—देव-सेनापति कार्तिकेयरूप, ३५१ विशाखः—कार्तिकेयके सहायक, ३५२ षष्टिभागः—प्रभव आदि साठ भागोंमें विभक्त संवत्सररूप, ३५३ गवाम्पतिः—इन्द्रियोंके स्वामी ॥ ७२ ॥
वज्रहस्तश्च विष्कम्भी चमूस्तम्भन एव च । वृत्तावृत्तकरस्तालो मधुर्मधुकलोचनः ॥ ७३ ॥ ३५४ वज्रहस्तः—हाथमें वज्र धारण करनेवाले इन्द्ररूप, ३५५ विष्कम्भी—विस्तारयुक्त, ३५६ चमूस्तम्भनः—दैत्यसेनाको स्तब्ध करनेवाले, ३५७ वृत्तावृत्तकरः—युद्धमें रथके द्वारा मण्डल बनाना वृत्त कहलाता है और शत्रुसेनाको विदीर्ण करके अक्षत शरीरसे लौट आना आवृत्त कहलाता है। इन दोनोंको कुशलतापूर्वक करनेवाले, ३५८ तालः—संसारसागरके तल प्रदेश—आधार-स्थान अर्थात् शुद्ध ब्रह्मको जाननेवाले, ३५९ मधुः—वसन्त ऋतुरूप, ३६० मधुकलोचनः—मधुके समान पिंगल नेत्रवाले ॥ ७३ ॥
वाचस्पत्यो वाजसनो नित्यमाश्रमपूजितः । ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी विचारवित् ॥ ७४ ॥ ३६१ वाचस्पत्यः—पुरोहितका काम करनेवाले, ३६२ वाजसनः—शुक्ल यजुर्वेदकी माध्यन्दिनी शाखाके प्रवर्तक, ३६३ नित्यमाश्रमपूजितः—सदा आश्रमोंद्वारा पूजित होनेवाले, ३६४ ब्रह्मचारी—ब्रह्मनिष्ठ, ३६५ लोकचारी—सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले, ३६६ सर्वचारी—सर्वत्र गमन करनेवाले, ३६७ विचारवित्—विचारोंके ज्ञाता ॥ ७४ ॥
ईशान ईश्वरः कालो निशाचारी पिनाकवान् । निमित्तस्थो निमित्तं च नन्दिर्नन्दिकरो हरिः ॥ ७५ ॥ ३६८ ईशानः—नियन्ता, ३६९ ईश्वरः—सबके शासक, ३७० कालः—कालस्वरूप, ३७१ निशाचारी—प्रलयकालकी रातमें विचरनेवाले, ३७२ पिनाकवान्—पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, ३७३ निमित्तस्थः—अन्तर्यामी, ३७४ निमित्तम्—निमित्त कारणरूप, ३७५ नन्दिः—ज्ञानसम्पत्तिरूप, ३७६ नन्दिकरः—ज्ञानरूपसम्पत्ति देनेवाले, ३७७ हरिः—विष्णुस्वरूप ॥
नन्दीश्वरश्च नन्दी च नन्दनो नन्दिवर्द्धनः । भगहारी निहन्ता च कालो ब्रह्मा पितामहः ॥ ७६ ॥ ३७८ नन्दीश्वरः—नन्दी नामक पार्षदके स्वामी, ३७९ नन्दी—नन्दी नामक गणरूप, ३८० नन्दनः—परम आनन्द प्रदान करनेवाले, ३८१ नन्दिवर्द्धनः—समृद्धि बढ़ानेवाले, ३८२ भगहारी—ऐश्वर्यका अपहरण करनेवाले, ३८३ निहन्ता—मृत्युरूपसे सबको मारनेवाले, ३८४ कालः—चौंसठ कलाओंके निवासस्थान, ३८५ ब्रह्मा—लोकस्रष्टा ब्रह्मा, ३८६ पितामहः—प्रजापतिके भी पिता ॥ ७६ ॥
चतुर्मुखो महालिङ्गश्चारुलिङ्गस्तथैव च । लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो योगाध्यक्षो युगावहः ॥ ७७ ॥ ३८७ चतुर्मुखः—चार मुखवाले, ३८८ महालिङ्गः—महालिङ्गस्वरूप, ३८९ चारुलिङ्गः—रमणीय वेषधारी, ३९० लिङ्गाध्यक्षः—प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंके अध्यक्ष, ३९१ सुराध्यक्षः—देवताओंके अधिपति, ३९२ योगाध्यक्षः—योगके अध्यक्ष, ३९३ युगावहः—चारों युगोंके निर्वाहक ॥ ७७ ॥
बीजाध्यक्षो बीजकर्ता अध्यात्मानुगतो बलः । इतिहासः सकल्पश्च गौतमोऽथ निशाकरः ॥ ७८ ॥ ३९४ बीजाध्यक्षः—कारणोंके अध्यक्ष, ३९५ बीजकर्ता—कारणोंके उत्पादक, ३९६ अध्यात्मानुगतः—अध्यात्मशास्त्रका अनुसरण करनेवाले, ३९७ बलः—बलवान्, ३९८ इतिहासः—महाभारत आदि इतिहासरूप, ३९९ सकल्पः—कल्प—यज्ञोंके प्रयोग और विधिके विचारके साथ मीमांसा और न्यायका समूह, ४०० गौतमः—तर्कशास्त्रके प्रणेता मुनिस्वरूप, ४०१ निशाकरः—चन्द्रमारूप ॥ ७८ ॥
दम्भो ह्यदम्भो वैदम्भो वश्यो वशकरः कलिः । लोककर्ता पशुपतिर्महाकर्ता ह्यनौषधः ॥ ७९ ॥ ४०२ दम्भः—शत्रुओंका दमन करनेवाले, ४०३ अदम्भः—दम्भरहित, ४०४ वैदम्भः—दम्भरहित पुरुषोंके आत्मीय, ४०५ वश्यः—भक्तपराधीन, ४०६ वशकरः—दूसरोंको वशमें करनेकी शक्ति रखनेवाले, ४०७ कलिः—कलि नामक युग, ४०८ लोककर्ता—जगत्की सृष्टि करनेवाले, ४०९ पशुपतिः—पशुओं—जीवोंके स्वामी, ४१० महाकर्ता—
पञ्च महाभूतादि सृष्टिकी रचना करनेवाले, ४११ अनौषधः—अन्न आदि ओषधियोंके सेवनसे रहित ॥ ७९ ॥
अक्षरं परमं ब्रह्म बलवच्छक्र एव च । नीतिर्ह्यनीतिः शुद्धात्मा शुद्धो मान्यो गतागतः ॥ ८० ॥
४१२ अक्षरम्—अविनाशी ब्रह्म, ४१३ परमं ब्रह्म—सर्वोत्कृष्ट परमात्मा, ४१४ बलवत्—शक्तिशाली, ४१५ शक्रः—इन्द्र, ४१६ नीतिः—न्यायस्वरूप, ४१७ अनीतिः—साम, दाम, दण्ड, भेदसे रहित, ४१८ शुद्धात्मा—शुद्धस्वरूप, ४१९ शुद्धः—परम पवित्र, ४२० मान्यः—सम्मानके योग्य, ४२१ गतागतः—गमनागमनशील संसारस्वरूप ॥ ८० ॥
बहुप्रसादः सुस्वप्नो दर्पणोऽथ त्वमित्रजित् । वेदकारो मन्त्रकारो विद्वान् समरमर्दनः ॥ ८१ ॥
४२२ बहुप्रसादः—भक्तोंपर अधिक कृपा करनेवाले, ४२३ सुस्वप्नः—सुन्दर स्वप्नवाले, ४२४ दर्पणः—दर्पणके समान स्वच्छ, ४२५ अमित्रजित्—बाहर-भीतरके शत्रुओंको जीतनेवाले, ४२६ वेदकारः—वेदोंका कर्ता, ४२७ मन्त्रकारः—मन्त्रोंका आविष्कार करनेवाले, ४२८ विद्वान्—सर्वज्ञ, ४२९ समरमर्दनः—समरांगणमें शत्रुओंका संहार करनेवाले ॥ ८१ ॥
महामेघनिवासी च महाघोरो वशी करः । अग्निज्वालो महाज्वालो अतिधूम्रो हुतो हविः ॥ ८२ ॥
४३० महामेघनिवासी—प्रलयकालिक महामेघोंमें निवास करनेवाले, ४३१ महाघोरः—प्रलय करनेवाले, ४३२ वशी—सबको वशमें रखनेवाले, ४३३ करः—संहारकारी, ४३४ अग्निज्वालः—अग्निकी ज्वालाके समान तेजवाले, ४३५ महाज्वालः—अग्निसे भी महान् तेजवाले, ४३६ अतिधूम्रः—कालाग्निरूपसे सबके दाहकालमें अत्यन्त धूम्र वर्णवाले, ४३७ हुतः—आहुति पाकर प्रसन्न होनेवाले अग्निरूप, ४३८ हविः—घी-दूध आदि हवनीय पदार्थरूप ॥ ८२ ॥
वृषणः शङ्करो नित्यं वर्चस्वी धूमकेतनः । नीलस्तथाङ्ग्लुब्धश्च शोभनो निरवग्रहः ॥ ८३ ॥
४३९ वृषणः—कर्मफलकी वर्षा करनेवाले धर्मस्वरूप, ४४० शङ्करः—कल्याणकारी, ४४१ नित्यं वर्चस्वी—सदा तेजसे जगमगाते रहनेवाले, ४४२ धूमकेतनः—अग्निस্বরূপ, ४४३ नीलः—श्यामवर्ण श्रीहरि, ४४४ अङ्ग्लुब्धः—अपने श्रीअङ्गके सौन्दर्यपर स्वयं ही लुभाये रहनेवाले, ४४५ शोभनः—शोभाशाली, ४४६ निरवग्रहः—प्रतिबन्धरहित ॥ ८३ ॥
स्वस्तिदः स्वस्तिभावश्च भागी भागकरो लघुः । उत्सङ्गश्च महाङ्गश्च महागर्भपरायणः ॥ ८४ ॥
४४७ स्वस्तिदः—कल्याणदायक, ४४८ स्वस्तिभावः—कल्याणमयी सत्ता, ४४९ भागी—यज्ञमें भाग लेनेवाले, ४५० भागकरः—यज्ञके हविष्यका विभाजन करनेवाले, ४५१ लघुः—शीघ्रकारी, ४५२ उत्सङ्गः—संगरहित, ४५३ महाङ्गः—महान् अंगवाले, ४५४ महागर्भपरायणः—हिरण्यगर्भके परम आश्रय ।। ८४ ।। कृष्णवर्णः सुवर्णश्च इन्द्रियं सर्वदेहिनाम् । महापादो महाहस्तो महाकायो महायशाः ।। ८५ ।। ४५५ कृष्णवर्णः—श्यामवर्ण विष्णुस्वरूप, ४५६ सुवर्णः—उत्तम वर्णवाले, ४५७ सर्वदेहिनाम् इन्द्रियम्—समस्त देहधारियोंके इन्द्रियसमुदायरूप, ४५८ महापादः—लंबे पैरोंवाले त्रिविक्रमस्वरूप, ४५९ महाहस्तः—लंबे हाथवाले, ४६० महाकायः—विश्वरूप, ४६१ महायशाः—महान् सुयशवाले ।। ८५ ।। महामूर्धा महामात्रो महानेत्रो निशालयः । महान्तको महाकर्णो महोष्ठश्च महाहनुः ।। ८६ ।। ४६२ महामूर्धा—महान् मस्तकवाले, ४६३ महामात्रः—विशाल नापवाले, ४६४ महानेत्रः—विशाल नेत्रोंवाले, ४६५ निशालयः—निशा अर्थात् अविद्याके लयस्थान, ४६६ महान्तकः—मृत्युकी भी मृत्यु, ४६७ महाकर्णः—बड़े-बड़े कानवाले, ४६८ महोष्ठः—लंबे ओठवाले, ४६९ महाहनुः—पुष्ट एवं बड़ी ठोड़ीवाले ।। ८६ ।। महानासो महाकम्बुर्महाग्रीवः श्मशानभाक् । महावक्षा महोरस्को ह्यन्तरात्मा मृगालयः ।। ८७ ।। ४७० महानासः—बड़ी नासिकावाले, ४७१ महाकम्बुः—बड़े कण्ठवाले, ४७२ महाग्रीवः—विशाल ग्रीवासे युक्त, ४७३ श्मशानभाक्—श्मशान भूमिमें क्रीडा करनेवाले ४७४ महावक्षाः—विशाल वक्षःस्थलवाले, ४७५ महोरस्कः—चौड़ी छातीवाले, ४७६ अन्तरात्मा—सबके अन्तरात्मा, ४७७ मृगालयः—मृग-शिशुको अपनी गोदमें लिये रहनेवाले ।। ८७ ।। लम्बनो लम्बितोष्ठश्च महामायः पयोनिधिः । महादन्तो महादंष्ट्रो महाजिह्वो महामुखः ।। ८८ ।। ४७८ लम्बनः—अनेक ब्रह्माण्डोंके आश्रय, ४७९ लम्बितोष्ठः—प्रलयकालमें सम्पूर्ण विश्वको अपना ग्रास बनानेके लिये ओठोंको फैलाये रखनेवाले, ४८० महामायः—महामायावी, ४८१ पयोनिधिः—क्षीरसागररूप, ४८२ महादन्तः—बड़े-बड़े दाँतवाले, ४८३ महादंष्ट्रः—बड़ी-बड़ी दाढ़वाले, ४८४ महाजिह्वः—विशाल जिह्वावाले, ४८५ महामुखः—बहुत बड़े मुखवाले ।। ८८ ।। महानखो महारोमा महाकोशो महाजटः । प्रसन्नश्च प्रसादश्च प्रत्ययो गिरिसाधनः ।। ८९ ।।
४८६ महानखः—बड़े-बड़े नखवाले नृसिंह, ४८७ महारोमा—विशाल रोमवाले वराहरूप, ४८८ महाकोशः—बहुत बड़े पेटवाले, ४८९ महाजटः—बड़ी-बड़ी जटावाले, ४९० प्रसन्नः—आनन्दमग्न, ४९१ प्रसादः—प्रसन्नताकी मूर्ति, ४९२ प्रत्ययः—ज्ञानस्वरूप, ४९३ गिरिसाधनः—पर्वतको युद्धका साधन बनानेवाले ॥ ८९ ॥ स्नेहनोऽस्नेहनश्चैव अजितश्च महामुनिः । वृक्षाकारो वृक्षकेतुरनलो वायुवाहनः ॥ ९० ॥ ४९४ स्नेहनः—प्रजाओंके प्रति पिताकी भाँति स्नेह रखनेवाले, ४९५ अस्नेहनः—आसक्तिसे रहित, ४९६ अजितः—किसीसे पराजित न होनेवाले, ४९७ महामुनिः—अत्यन्त मननशील, ४९८ वृक्षाकारः—संसारवृक्षस्वरूप, ४९९ वृक्षकेतुः—वृक्षके समान ऊँची ध्वजावाले, ५०० अनलः—अग्निस्वरूप, ५०१ वायुवाहनः—वायुका वाहनके रूपमें उपयोग करनेवाले ॥ ९० ॥ गण्डली मेरुधामा च देवाधिपतिरेव च । अथर्वशीर्षः सामास्य ऋक्सहस्रामितेक्षणः ॥ ९१ ॥ ५०२ गण्डली—पहाड़ोंकी गुफाओंमें छिपकर रहनेवाले, ५०३ मेरुधामा—मेरु-पर्वतको अपना निवासस्थान बनानेवाले, ५०४ देवाधिपतिः—देवताओंके स्वामी, ५०५ अथर्वशीर्षः—अथर्ववेद जिनका मस्तक है वे, ५०६ सामास्यः—सामवेद जिनका मुख है वे, ५०७ ऋक्सहस्रामितेक्षणः—सहस्रों ऋचाएँ जिनके नेत्र हैं ॥ ९१ ॥ यजुःपादभुजो गुह्यः प्रकाशो जङ्गमस्तथा । अमोघार्थः प्रसादश्च अभिगम्यः सुदर्शनः ॥ ९२ ॥ ५०८ यजुःपादभुजः—यजुर्वेद जिनके हाथ-पैर हैं, ५०९ गुह्यः—गोपनीयस्वरूप, ५१० प्रकाशः—भक्तोंपर कृपा करके स्वयं ही उनके समक्ष अपनेको प्रकाशित कर देनेवाले, ५११ जङ्गमः—चलने-फिरनेवाले, ५१२ अमोघार्थः—किसी वस्तुके लिये याचना करनेपर उसे अवश्य सफल बनानेवाले, ५१३ प्रसादः—दया करके शीघ्र प्रसन्न होनेवाले, ५१४ अभिगम्यः—सुगमतासे प्राप्त होने योग्य, ५१५ सुदर्शनः—सुन्दर दर्शनवाले ॥ ९२ ॥ उपकारः प्रियः सर्वः कनकः काञ्चनच्छविः । नाभिर्नन्दिकरो भावः पुष्करस्थपतिः स्थिरः ॥ ९३ ॥ ५१६ उपकारः—उपकार करनेवाले, ५१७ प्रियः—भक्तोंके प्रेमास्पद, ५१८ सर्वः—सर्वस्वरूप, ५१९ कनकः—सुवर्णस्वरूप, ५२० काञ्चनच्छविः—काञ्चनके समान कमनीय कान्तिवाले, ५२१ नाभिः—समस्त भुवनका मध्यदेशरूप, ५२२ नन्दिकरः—आनन्द देनेवाले, ५२३ भावः—श्रद्धा-भक्तिस्वरूप, ५२४ पुष्करस्थपतिः—ब्रह्माण्डरूपी पुष्करका निर्माण करनेवाले, ५२५ स्थिरः—स्थिरस्वरूप ॥ द्वादशस्त्रासनश्चाद्यो यज्ञो यज्ञसमाहितः ।
नक्तं कलिश्च कालश्च मकरः कालपूजितः ॥ ९४ ॥ ५२६ द्वादशः—ग्यारह रुद्रोंसे श्रेष्ठ बारहवें रुद्र, ५२७ त्रासनः—संहारकारी होनेके कारण भयानक, ५२८ आद्यः—सबके आदि कारण, ५२९ यज्ञः—यज्ञपुरुष, ५३० यज्ञसमाहितः—यज्ञमें उपस्थित रहनेवाले, ५३१ नक्तम्—प्रलयकालकी रात्रिस্বরূপ, ५३२ कलिः—कलिके स्वरूप, ५३३ कालः—सबको अपना ग्रास बनानेवाले कालरूप, ५३४ मकरः—मकराकार शिशुमार चक्र, ५३५ कालपूजितः—काल अर्थात् मृत्युके द्वारा पूजित ॥ ९४ ॥
सगणो गणकारश्च भूतवाहनसारथिः । भस्मशयो भस्मगोप्ता भस्मभूतस्तरूर्गणः ॥ ९५ ॥ ५३६ सगणः—प्रमथ आदि गणोंसे युक्त, ५३७ गणकारः—बाणासुर आदि भक्तोंको अपने गणमें सम्मिलित करनेवाले, ५३८ भूतवाहनसारथिः—त्रिपुर-विनाशके लिये समस्त प्राणियोंके योगक्षेमका निर्वाह करनेवाले ब्रह्माजीको सारथि बनानेवाले, ५३९ भस्मशयः—भस्मपर शयन करनेवाले, ५४० भस्मगोप्ता—भस्मद्वारा रक्षा करनेवाले, ५४१ भस्मभूतः—भस्मस्वरूप, ५४२ तरुः—कल्पवृक्षस्वरूप, ५४३ गणः—भृंगिरिटि और नन्दिकेश्वर आदि पार्षदरूप ॥ ९५ ॥
लोकपालस्तथालोको महात्मा सर्वपूजितः । शुक्लस्त्रिशुक्लः सम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः ॥ ९६ ॥ ५४४ लोकपालः—चतुर्दश भुवनोंका पालन करनेवाले, ५४५ अलोकः—लोकातीत, ५४६ महात्मा—, ५४७ सर्वपूजितः—सबके द्वारा पूजित, ५४८ शुक्लः—शुद्धस्वरूप, ५४९ त्रिशुक्लः—मन, वाणी और शरीर ये तीनों, ५५० सम्पन्नः—सम्पूर्ण सम्पदाओंसे युक्त, ५५१ शुचिः—परम पवित्र, ५५२ भूतनिषेवितः—समस्त प्राणियोंद्वारा सेवित ॥ ९६ ॥
आश्रमस्थः क्रियावस्थो विश्वकर्ममतिर्वरः । विशालशाखस्ताम्रोष्ठो ह्यम्बुजालः सुनिश्चलः ॥ ९७ ॥ ५५३ आश्रमस्थः—चारों आश्रमोंमें धर्मरूपसे स्थित रहनेवाले, ५५४ क्रियावस्थः—यज्ञादि क्रियाओंमें संलग्न, ५५५ विश्वकर्ममतिः—संसारकी रचनारूप कर्ममें कुशल, ५५६ वरः—सर्वश्रेष्ठ, ५५७ विशालशाखः—लंबी भुजाओंवाले, ५५८ ताम्रोष्ठः—लाल-लाल ओठवाले, ५५९ अम्बुजालः—जलसमूह—सागररूप, ५६० सुनिश्चलः—सर्वथा निश्चलरूप ॥ ९७ ॥
कपिलः कपिशः शुक्ल आयुश्चैव परोऽपरः । गन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्ष्यः सुविज्ञेयः सुशारदः ॥ ९८ ॥ ५६१ कपिलः—कपिल वर्ण, ५६२ कपिशः—पीले वर्णवाले, ५६३ शुक्लः—श्वेत वर्णवाले, ५६४ आयुः—जीवनरूप, ५६५ परः—प्राचीन, ५६६ अपरः—अर्वाचीन, ५६७
गन्धर्वः—चित्ररथ आदि गन्धर्वरूप, ५६८ अदितिः—देवमाता आदितिरूप, ५६९ तार्क्ष्यः—विनतानन्दन गरुडरूप, ५७० सुविज्ञेयः—सुगमतापूर्वक जानने योग्य, ५७१ सुशारदः—उत्तम वाणी बोलनेवाले ॥ ९८ ॥ परश्वधायुधो देवो अनुकारी सुबान्धवः । तुम्बवीणो महाक्रोध ऊर्ध्वरेता जलेशयः ॥ ९९ ॥ ५७२ परश्वधायुधः—फरसेका आयुधके रूपमें उपयोग करनेवाले परशुरामरूप, ५७३ देवः—महादेवस्वरूप, ५७४ अनुकारी—भक्तोंका अनुकरण करनेवाले, ५७५ सुबान्धवः—उत्तम बान्धवरूप, ५७६ तुम्बवीणः—तूँबीकी वीणा बजानेवाले, ५७७ महाक्रोधः—प्रलयकालमें महान् क्रोध प्रकट करनेवाले, ५७८ ऊर्ध्वरेताः—अस्खलितवीर्य, ५७९ जलेशयः—विष्णुरूपसे जलमें शयन करनेवाले ॥ ९९ ॥ उग्रो वंशकरो वंशो वंशनादो ह्यनिन्दितः । सर्वाङ्गरूपो मायावी सुहृदो ह्यनिलोऽनलः ॥ १०० ॥ ५८० उग्रः—प्रलयकालमें भयंकर रूप धारण करनेवाले, ५८१ वंशकरः—वंशप्रवर्तक, ५८२ वंशः—वंशस्वरूप, ५८३ वंशनादः—श्रीकृष्णरूपसे वंशी बजानेवाले, ५८४ अनिन्दितः—निन्दारहित, ५८५ सर्वाङ्गरूपः—सर्वांग पूर्णरूपवाले, ५८६ मायावी—, ५८७ सुहृदः—हेतुरहित दयालु, ५८८ अनिलः—वायुस्वरूप, ५८९ अनलः—अग्निस्वरूप ॥ १०० ॥ बन्धनो बन्धकर्ता च सुबन्धनविमोचनः । सयज्ञारिः सकामारिर्महादंष्ट्रो महायुधः ॥ १०१ ॥ ५९० बन्धनः—स्नेहबन्धनमें बाँधनेवाले, ५९१ बन्धकर्ता—बन्धनरूप संसारके निर्माता, ५९२ सुबन्धनविमोचनः—मायाके सुदृढ़ बन्धनसे छुड़ानेवाले, ५९३ सयज्ञारिः—दक्षयज्ञ-शत्रुओंके साथी, ५९४ सकामारिः—कामविजयी योगियोंके साथी, ५९५ महादंष्ट्रः—बड़ी-बड़ी दाढ़वाले नरसिंहरूप, ५९६ महायुधः—विशाल आयुधधारी ॥ १०१ ॥ बहुधा निन्दितः शर्वः शङ्करः शङ्करोऽधनः । अमरेशो महादेवो विश्वदेवः सुरारिहा ॥ १०२ ॥ ५९७ बहुधा निन्दितः—दक्ष और उनके समर्थकोंद्वारा अनेक प्रकारसे निन्दित, ५९८ शर्वः—प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले, ५९९ शङ्करः—कल्याणकारी, ६०० शङ्करः—भक्तोंको आनन्द देनेवाले, ६०१ अधनः—सांसारिक धनसे रहित, ६०२ अमरेशः—देवताओंके भी ईश्वर, ६०३ महादेवः—देवताओंके भी पूजनीय, ६०४ विश्वदेवः—सम्पूर्ण विश्वके आराध्यदेव, ६०५ सुरारिहा—देवशत्रुओंका वध करनेवाले ॥ १०२ ॥ अहिर्बुध्योऽनिलाभश्च चेकितानो हविस्तथा ।