मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ४०४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| समाकुञ्चितजानुस्थमणिबन्धेन शोभितम्।<br>किञ्चिदाकुञ्चितं चैव नाभिदेशकरस्थितम्॥ ३२<br><br>तृतीयं तु भुजं तस्य चतुर्थं तु तथा शृणु।<br>आत्तसंतानकुसुमं घ्राणदेशानुसर्पिणम्॥ ३३<br><br>लक्ष्म्या संवाह्यमानाङ्घ्रिः पद्मपत्रनिभैः करैः।<br>संतानमालामुकुटं हारकेयूरभूषितम्॥ ३४<br><br>भूषितं च तथा देवमङ्गदैरङ्गुलीयकैः।<br>फणीन्द्रफणविन्यस्तचारुरत्नशिखोज्ज्वलम्॥ ३५<br><br>अज्ञातवस्तुचरितं प्रतिष्ठितमथात्रिणा।<br>सिद्धानुपूर्व्यं सततं संतानकुसुमार्चितम्॥ ३६<br><br>दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गं दिव्यधूपेन धूपितम्।<br>सुरसैः सुफलैर्हृद्यैः सिद्धैरुपहृतैः सदा॥ ३७<br><br>शोभितोत्तमपार्श्वं तं देवमुत्पलशीर्षकम्। | तीसरे हाथका मणिबन्ध मुड़े हुए घुटनेपर सुशोभित था तथा कुछ मुड़कर नाभिदेशपर फैले हुए पहले हाथपर अवलम्बित था। अब उनके चौथे हाथकी दशा सुनो। चौथे हाथमें भगवान् कल्पवृक्षका पुष्प धारण किये हुए थे और उसे अपनी नासिकातक ले गये थे। उस समय लक्ष्मी अपने कमल-दलके समान कोमल हाथोंसे भगवान्का चरण दबा रही थीं। भगवान्के मस्तकपर कल्पवृक्षके पुष्पोंकी मालाओंका मुकुट शोभा दे रहा था। वे हार, केयूर, बाजूबंद और अँगूठीसे विभूषित तथा शेषनागके फणोंपर रखे हुए सुन्दर रत्नोंसे प्रकाशित हो रहे थे। एवं इनकी विशेषता यह थी कि महर्षि अत्रिने उनकी स्थापना की थी। उनका चरित्र वस्तुतः जाना नहीं जा सकता। सिद्धगण सदा उनकी पूजा करते थे। कल्पवृक्षके पुष्पोंद्वारा उनकी अर्चना होती थी। उनके अङ्गोंमें दिव्य चन्दनका अनुलेप था तथा वे दिव्य धूपसे धूपित थे। सिद्धगण उन्हें सदा सरस एवं मनोहर फलोंका उपहार देते थे। वे उत्तम पार्श्वसे सुशोभित थे तथा उनके मस्तकपर कमल शोभा पा रहा था॥ ३१-३७ १/२ ॥ |
| ततः सम्मुखमुद्वीक्ष्य ववन्दे स नराधिपः॥ ३८<br><br>जानुभ्यां शिरसा चैव गत्वा भूमिं यथाविधि।<br>नाम्नां सहस्रेण तथा तुष्टाव मधुसूदनम्॥ ३९<br><br>प्रदक्षिणमथो चक्रे स तूत्थाय पुनः पुनः।<br>रम्यमायतनं दृष्ट्वा तत्रोवासाश्रमे पुनः॥ ४०<br><br>बिलाद् बहिर्गुहां काञ्चिदाश्रित्य सुमनोहराम्।<br>तपश्चकार तत्रैव पूजयन् मधुसूदनम्॥ ४१<br><br>नानाविधैस्तथा पुष्पैः फलमूलैः सगोरसैः।<br>नित्यं त्रिषवणस्नायी वह्निपूजापरायणः॥ ४२<br><br>देववापीजलैः कुर्वन् सततं प्राणधारणम्।<br>सर्वाहारपरित्यागं कृत्वा तु मनुजेश्वरः॥ ४३<br><br>अनास्तृतगुहाशायी कालं नयति पार्थिवः।<br>त्यक्ताहारक्रियश्चैव केवलं तोयतो नृपः।<br>न तस्य ग्लानिमायाति शरीरं च तदद्भुतम्॥ ४४ | ऐसे भगवान् (-की मूर्ति)-को अपने सम्मुख देखकर राजा पुरूरवाने विधिपूर्वक घुटने टेककर और मस्तकको भूमिपर रखकर भगवान्को प्रणाम किया तथा सहस्रनामोंद्वारा उन मधुसूदनका स्तवन किया और उठकर बारम्बार उनकी प्रदक्षिणा की। पुनः उस रमणीय देवमन्दिरको देखकर उसी आश्रममें निवास करनेका निश्चय किया। तत्पश्चात् उस बिलसे बाहर निकलकर वे किसी अतिशय मनोहारिणी गुफाका आश्रय लेकर नाना प्रकारके पुष्पों, फलों, मूलों तथा गोरसोंद्वारा भगवान् मधुसूदनकी पूजा करते हुए वहीं तपस्यामें संलग्न हो गये। वे नित्य त्रिकाल स्नान तथा अग्निहोत्र करते थे। वे नरेश सभी प्रकारके आहारका परित्याग कर सदा उस देववापी (पोखरी)-के जलसे ही प्राणोंकी रक्षा करते थे। राजा बिना बिछौनेके ही गुफामें शयन करते हुए समय बिता रहे थे। यद्यपि राजाने भोजन करना छोड़ दिया था और केवल जलपर ही निर्भर थे, तथापि उन्हें किसी प्रकारकी ग्लानि नहीं होती थी, प्रत्युत उनका शरीर अद्भुत तेजोमय हो गया |
| * अध्याय १२० * | ४०५ |
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| एवं स राजा तपसि प्रसक्तः<br>सम्पूजयन् देववरं सदैव।<br>तत्राश्रमे कालमुवास कञ्चित्<br>स्वर्गोपमे दुःखमविन्दमानः॥ ४५॥ | था। इस प्रकार राजा पुरूरवाने तपस्यामें दत्तचित्त होकर सदा देवश्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी पूजा करते हुए दुःखकी कुछ भी परवा न कर उस स्वर्गतुल्य आश्रममें कुछ कालतक निवास किया॥ ३८–४५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे आयतनवर्णनं नामैकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ ११९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णनमें आयतनवर्णन नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११९॥
एक सौ बीसवाँ* अध्याय
राजा पुरूरवाकी तपस्या, गन्धर्वों और अप्सराओंकी क्रीडा, महर्षि अत्रिका आगमन तथा राजाको वरप्राप्ति
| सूत उवाच<br><br>स त्वाश्रमपदे रम्ये त्यक्ताहारपरिच्छदः।<br>क्रीडाविहारं गन्धर्वैः पश्यत्यप्सरसां सह॥ १<br><br>कृत्वा पुष्पोच्चयं भूरि ग्रथयित्वा तथा स्रजः।<br>अर्घ्यं निवेद्य देवाय गन्धर्वेभ्यस्तदा ददौ॥ २<br><br>पुष्पोच्चयप्रसक्तानां क्रीडन्तीनां यथासुखम्।<br>चेष्टा नानाविधाकाराः पश्यन्नपि न पश्यति॥ ३<br><br>काचित् पुष्पोच्चये सक्ता लताजालेन वेष्टिता।<br>सखीजनेन संत्यक्ता कान्तेनाभिसमुज्झिता॥ ४<br><br>काचित् कमलगन्धाभा निःश्वासपवनाहतैः।<br>मधुपैराकुलमुखी कान्तेन परिमोचिता॥ ५<br><br>मकरन्दसमाक्रान्तनयना काचिदङ्गना।<br>कान्तनिःश्वासवातेन नीरजस्ककृतेक्षणा॥ ६<br><br>काचिदुच्चीय पुष्पाणि ददौ कान्तस्य भामिनी।<br>कान्तसंग्रथितैः पुष्पै रराज कृतशेखरा॥ ७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार राजकीय सामग्रियों तथा आहारका परित्याग कर राजा पुरूरवा उस रमणीय आश्रममें निवास करने लगे। वहाँ उन्हें गन्धर्वोंके साथ अप्सराओंका क्रीडाविहार भी देखनेको मिलता था। राजा बहुत-से फूलोंको तोड़कर उसकी माला गूँथते थे और उन्हें अर्घ्यसहित पहले भगवान् विष्णुको निवेदित कर पुनः गन्धर्वोंको दे देते थे। वे वहाँ पुष्प-चयनमें लगी हुई एवं सुखपूर्वक क्रीडा करती हुई अप्सराओंकी विभिन्न प्रकारकी चेष्टाओंको देखकर भी अनदेखी कर जाते थे। वहाँ पुष्प-चयनमें निरत कोई अप्सरा लता-समूहमें उलझ गयी और सखियाँ उसे उसी दशामें छोड़कर चलती बनीं, तब उसके पतिने आकर उसे बन्धन-मुक्त किया। किसी अप्सराके शरीरसे कमलकी-सी गन्ध निकल रही थी। इस कारण उसकी निःश्वासवायुसे आकृष्ट होकर भ्रमर उसके ऊपर मँडरा रहे थे। उन भ्रमरोंसे उसका मुख ढक-सा गया था; तब उसके पतिने उसे उस कष्टसे मुक्त किया। किसी अप्सराकी आँखें पुष्प-रजसे आक्रान्त हो गयीं, तब उसके पतिने अपनी श्वासवायुसे फूँककर उन्हें धूलरहित कर दिया। किसी सुन्दरीने पुष्पोंको एकत्रकर अपने पतिको दे दिया। तत्पश्चात् वह अपने पतिद्वारा गूँथी गयी पुष्पमालाको अपने मस्तकपर रखकर सुशोभित |
* इस अध्यायके अनेक शब्दालंकारोंसे उद्दीपित अधिकांश श्लोक भागवत १०। ३३ से मिलते हैं। कोई एक-दूसरेसे अवश्य प्रभावित है। वैसे इस प्रकारका वर्णन गर्गसंहिता, ब्रह्मवैवर्तपुराणके रासप्रकरणोंमें तथा भागवतके रामनारायणकृत भावविभाविक तथा किशोरीदासकृता विशुद्धरसदीपिकामें इनकी भी पूरी व्याख्या है।
| ४०६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| उच्चीय स्वयमुद्ग्रथ्य कान्तेन कृतशेखरा।<br>कृतकृत्यमिवात्मानं मेने मन्मथवर्धिनी ॥ ८ | होने लगी। तभी किसीके पतिने पुष्प-चयन करके अपने ही हाथों माला गूँथकर उसे अपनी पत्नीके मस्तकपर रखकर उसे सुसज्जित कर दिया, इससे उसने अपनेको कृतकृत्य मान लिया॥१—८॥ |
| अस्त्यस्मिन् गहने कुञ्जे विशिष्टकुसुमा लता।<br>काचिदेवं रहो नीता रमणेन रिरंसुना ॥ ९ | कोई पतिद्वारा झुकायी गयी लतासे फूल तोड़ रही |
| कान्तसंनामितलता कुसुमानि विचिन्वती।<br>सर्वाभ्यः काचिदात्मानं मेने सर्वगुणाधिकम् ॥ १० | थी, जिससे वह अपनेको सभी सखियोंसे सम्पूर्ण गुणोंमें बढ़-चढ़कर मान रही थी। कुछ सुन्दरी देवाङ्गनाएँ |
| काश्चित् पश्यन्ति भूपालं नलिनीषु पृथक् पृथक्।<br>क्रीडमानास्तु गन्धर्वैर्देवरामा मनोरमाः ॥ ११ | गन्धर्वोंके साथ पृथक्-पृथक् क्रीडा करती हुई कमलसमूहोंके बीचसे राजाकी ओर देख रही थीं। कोई |
| काचिदाताडयत् कान्तमुदकेन शुचिस्मिता।<br>ताड्यमानाथ कान्तेन प्रीतिं काचिदुपाययौ ॥ १२ | सुन्दरी अपने पतिके ऊपर जल उछाल रही थी और किसीके ऊपर उसका पति जल फेंक रहा था, जिससे |
| कान्तं च ताडयामास जातखेदा वराङ्गना।<br>अदृश्यत वरारोहा श्वासनृत्यत्पयोधरा ॥ १३ | उसे बड़ी प्रसन्नता हो रही थी। कोई देवाङ्गना खिन्न मनसे अपने पतिके ऊपर जल उछाल रही थी। पतिके |
| कान्ताम्बुताडनाकृष्टकेशपाशनिबन्धना ।<br>केशाकुलमुखी भाति मधुपैरिव पद्मिनी ॥ १४ | ऊपर जल फेंकनेसे किसीकी चोटी खुल गयी थी, जिससे उसका मुख बालोंसे ढक गया था। उस समय |
| स्वचक्षुःसदृशैः पुष्पैः संच्छन्ने नलिनीवने।<br>छन्ना काचिच्चिरात् प्राप्ता कान्तेनान्विष्य यत्नतः ॥ १५ | वह ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो भ्रमरोंसे घिरी हुई कमलिनी हो। कोई अपने नेत्रोंके समान कमल- |
| स्नाता शीतापदेशेन काचित् प्राहाङ्गना भृशम्।<br>रमणालिङ्गनं चक्रे मनोऽभिलषितं चिरम् ॥ १६ | पुष्पोंसे ढके हुए उस कमलिनीके वनमें छिप गयी थी, जिसे उसके पतिने बड़ी देरके बाद प्रयत्नपूर्वक खोजकर |
| जलार्द्रवसनं सूक्ष्ममङ्गलीनां शुचिस्मिता।<br>धारयन्ती जनं चक्रे काचित् तत्र समन्मथम् ॥ १७ | प्राप्त किया। किसीको उसका पति गलेमें पड़ी हुई मालाके |
| कण्ठमाल्यगुणैः काचित् कान्तेन कृष्यताम्भसि।<br>त्रुट्यत्स्त्रग्दामपतितं रमणं प्राहसच्चिरम् ॥ १८ | धागेको पकड़कर जलमें खींच रहा था, किंतु उस धागेके टूट |
| काचिद्दुग्ना सखीदत्तजानुदेशे नखक्षता।<br>सम्भ्रान्ता कान्तशरणं मग्ना काचिद् गता चिरम् ॥ १९ | |
| काचित् पृष्ठकृतादित्या केशनिस्तोयकारिणी।<br>शिलातलगता भर्त्रा दृष्टा कामार्तचक्षुषा ॥ २० | |
| कृत्तमाल्यं विलुलितं संक्रान्तकुचकुङ्कुमम्।<br>रतिक्रीडितकान्तेव रराज तत् सरोदकम् ॥ २१ | |
| सुस्रातदेवगंधर्वदेवरामागणेन च।<br>पूज्यमानं च ददृशे देवदेवं जनार्दनम् ॥ २२ |
१२२- शाकद्वीप, कुशद्वीप, क्रौञ्चद्वीप और शाल्मलद्वीपका वर्णन
| * अध्याय १२० * | ४०७ |
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| क्वचिच्च ददृशे राजा लतागृहगताः स्त्रियः।<br>मण्डयन्तीः स्वगात्राणि कान्तसंन्यस्तमानसाः॥ २३<br>काचिदादर्शनकरा व्यग्रा दूतीमुखोद्गतम्।<br>शृण्वती कान्तवचनमधिका तु तथा बभौ॥ २४<br>काचित् सत्वरिता दूत्या भूषणानां विपर्ययम्।<br>कुर्वाणा नैव बुबुधे मन्मथाविष्टचेतना॥ २५ | जानेपर जब वह गिर पड़ा, तब वह बड़ी देरतक हँसती रही। इस प्रकार राजाने स्नानसे निवृत्त हुई सभी देव-देवियों एवं गन्धर्व-अप्सराओंद्वारा भगवान् जनार्दनको पूजित होते हुए देखा॥ ९—२५॥ |
| वायुनुन्नातिसुरभिकुसुमोत्करमण्डिते ।<br>काचित् पिबन्ती ददृशे मैरेयं नीलशाद्वले॥ २६<br>पाययामास रमणं स्वयं काचिद् वराङ्गना।<br>काचित् पपौ वरारोहा कान्तपाणिसमर्पितम्॥ २७<br>काचित् स्वनेत्रचपलनीलोत्पलयुतं पयः।<br>पीत्वा पप्रच्छ रमणं क्व गतौ तौ ममोत्पलौ॥ २८<br>त्वयैव पीतौ तौ नूनमित्युक्ता रमणेन सा।<br>तथा विदित्वा मुग्धत्वाद् बभूव व्रीडिता भृशम्॥ २९<br>काचित् कान्तार्पितं सुभ्रूः कान्तपीतावशेषितम्।<br>सविशेषरसं पानं पपौ मन्मथवर्धनम्॥ ३०<br>आपानगोष्ठीषु तथा तासां स नरपुङ्गवः।<br>शुश्राव विविधं गीतं तन्त्रीस्वरविमिश्रितम्॥ ३१<br>प्रदोषसमये ताश्च देवदेवं जनार्दनम्।<br>राजन् सदोपनृत्यन्ति नानावाद्यपुरःसराः॥ ३२<br>याममात्रे गते रात्रौ विनिर्गत्य गुहामुखात्।<br>आवसन् संयुताः कान्तैः परर्द्धिरचितां गुहाम्॥ ३३<br>नानागन्धान्वितलतां नानागन्धसुगन्धिनीम्।<br>नानाविचित्रशयनां कुसुमोत्करमण्डिताम्॥ ३४<br>एवमप्सरसां पश्यन् क्रीडितानि स पर्वते।<br>तपस्तेपे महाराजन् केशवार्पितमानसः॥ ३५<br>तमूचुर्नृपतिं गत्वा गन्धर्वाप्सरसां गणाः।<br>राजन् स्वर्गोपमं देशमिमं प्राप्तोऽस्यरिंदम॥ ३६<br>वयं हि ते प्रदास्यामो मनसः काङ्क्षितान् वरान्।<br>तानादाय गृहं गच्छ तिष्ठेह यदि वा पुनः॥ ३७ | राजन्! वे अप्सराएँ सदा प्रदोषकालमें देवाधिदेव भगवान् जनार्दनके समक्ष नाना प्रकारके बाजोंके साथ नृत्य करती थीं। एक पहर रात बीत जानेपर वे गुफाके मुखद्वारसे बाहर निकलकर अपने पतियोंके साथ ऐसी सजी-सजायी गुफामें निवास करती थीं, जिसपर अनेकों प्रकारके गन्धोंवाली लताएँ फैली हुई थीं, जिसमेंसे विभिन्न प्रकारकी सुगन्ध निकल रही थी, जो पुष्पसमूहसे सुशोभित थी तथा जिसमें अनेकों विचित्र शय्याएँ बिछी थीं। महाराज! इस प्रकार उस पर्वतपर अप्सराओंकी क्रीडाका अवलोकन करते हुए राजा पुरूरवा भगवान् केशवमें मनको एकाग्र करके तपस्या करते रहे। एक दिन यूथ-के-यूथ गन्धर्व और अप्सराएँ राजाके निकट जाकर उनसे बोलीं—'शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! (बड़े सौभाग्यसे) आप इस स्वर्गतुल्य देशमें आ गये हैं, अतः हमलोग आपको मनोऽभिलषित वर प्रदान करेंगी। उन्हें ग्रहणकर यदि आपकी इच्छा हो तो घर चले जाइये अथवा यहीं रहिये'॥ २६—३७॥ |
| राजोवाच<br>अमोघदर्शनाः सर्वे भवन्तस्त्वमितौजसः।<br>वरं वितरताद्यैव प्रसादं मधुसूदनात्॥ ३८ | राजाने कहा— गन्धर्वो एवं अप्सराओ! आपलोग अमित तेजस्वी हैं, इससे आपलोगोंका दर्शन कभी निष्फल नहीं होता, इसलिये आपलोग आज ही मुझे ऐसा वरदान दें, जिससे भगवान् मधुसूदनकी कृपा प्राप्त हो जाय। यह |
४०८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी |
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| एवमस्त्वित्यथोक्तस्तैः स तु राजा पुरूरवाः।<br>तत्रोवास सुखी मासं पूजयन्तो जनार्दनम्॥ ३९<br>प्रिय एव सदैवासीद् गन्धर्वाप्सरसां नृपः।<br>तुतोष स जनो राज्ञस्तस्यालौल्येन कर्मणा॥ ४०<br>मासस्य मध्ये स नृपः प्रविष्ट-<br> स्तदाश्रमं रत्नसहस्रचित्रम्।<br>तोयाशनस्तत्र ह्युवास मासं<br> यावत्सितान्तो नृप फाल्गुनस्य॥ ४१<br>फाल्गुनामलपक्षान्ते राजा स्वप्ने पुरूरवाः।<br>तस्यैव देवदेवस्य श्रुतवान् गदितं शुभम्॥ ४२<br>रात्र्यामस्यां व्यतीतायामत्रिणा त्वं समेष्यसि।<br>तेन राजन् समागम्य कृतकृत्यो भविष्यसि॥ ४३<br>स्वप्नमेवं स राजर्षिर्दृष्ट्वा देवेन्द्रविक्रमः।<br>प्रत्यूषकाले विधिवत् स्नातः स प्रयतेन्द्रियः॥ ४४<br>कृतकृत्यो यथाकामं पूजयित्वा जनार्दनम्।<br>ददर्शात्रिं मुनिं राजा प्रत्यक्षं तपसां निधिम्॥ ४५<br>स्वप्नं तु देवदेवस्य न्यवेदयत धार्मिकः।<br>ततः शुश्राव वचनं देवतानां समीरितम्॥ ४६<br>एवमेतन्महीपाल नात्र कार्या विचारणा।<br>एवं प्रसादं सम्प्राप्य देवदेवाज्जनार्दनात्॥ ४७<br>कृतदेवार्चनो राजा तथा हुतहुताशनः।<br>सर्वान् कामानवाप्तोऽसौ वरदानेन केशवात्॥ ४८ | सुनकर वे 'एवमस्तु—ऐसा ही होगा'—ऐसा कहकर वहाँसे चले गये। तत्पश्चात् राजा पुरूरवा वहाँ एक मासतक भगवान् जनार्दनकी पूजा करते हुए सुखपूर्वक निवास करते रहे। वे सदा गन्धर्वों एवं अप्सराओंके प्रेमपात्र बने रहे। वे लोग राजाके निर्लोभ कर्मसे परम संतुष्ट थे। राजन्! उस मासके बीचमें ही राजा पुरूरवाने हजारों रत्नोंसे चित्रित उस आश्रममें प्रवेश किया। वहाँ वे एक मासतक केवल जल पीकर तबतक निवास करते रहे, जबतक फाल्गुनमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथि नहीं आ गयी। राजा पुरूरवाने फल्गुनमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिकी रातमें स्वप्नमें उन्हीं देवाधिदेव भगवान् विष्णुद्वारा कहे जाते हुए इस प्रकारके मङ्गलमय शब्दोंको सुना—'राजन्! इस रात्रिके व्यतीत हो जानेपर अत्रिसे तुम्हारी भेंट होगी और उनसे मिलकर तुम कृतकृत्य हो जाओगे। देवराजके समान पराक्रमी राजर्षि पुरूरवाको जब इस प्रकारका स्वप्न दीख पड़ा, तब उन्होंने प्रातःकाल उठकर इन्द्रियोंको संयत रखते हुए विधिपूर्वक स्नान किया और इच्छानुसार भगवान् जनार्दनकी पूजा की। तत्पश्चात् उन्हें तपोधन महर्षि अत्रिका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ, जिससे वे कृतकृत्य हो गये। तब धर्मात्मा राजाने महर्षि अत्रिसे देवाधिदेव भगवान्द्वारा दिखाये गये स्वप्नके वृत्तान्तको कह सुनाया। उसी समय उन्होंने देवताओंद्धारा कहे हुए इस वचनको फिर सुना—'महीपाल! यह ऐसा ही होगा, इसमें तुम्हें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।' इस प्रकार देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी कृपा प्राप्तकर राजाने देवार्चन किया और अग्निमें आहुतियाँ डालीं। इस तरह भगवान् केशवके वरदानसे उनकी सारी कामनाएँ पूरी हो गयीं॥३८—४८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे ऐलाश्रमवर्णनं नाम विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णनमें ऐलाश्रमवर्णन नामक एक सौ बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२०॥
* अध्याय १२१ * ४०९
एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय
कैलास पर्वतका वर्णन, गङ्गाकी सात धाराओंका वृत्तान्त तथा जम्बूद्वीपका विवरण
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| सूत उवाच<br><br>तस्याश्रमस्योत्तरतस्त्रिपुरारिनिषेवितः ।<br>नानारत्नमयैः शृङ्गैः कल्पद्रुमसमन्वितैः ॥ १<br><br>मध्ये हिमवतः पृष्ठे कैलासो नाम पर्वतः ।<br>तस्मिन् निवसति श्रीमान् कुबेरः सह गुह्यकैः ॥ २<br><br>अप्सरोऽनुगतो राजा मोदते ह्यलकाधिपः ।<br>कैलासपादसम्भूतं पुण्यं शीतजलं शुभम् ॥ ३<br><br>मन्दोदकं नाम सरः पयस्तु दधिसंनिभम् ।<br>तस्मात् प्रवहते दिव्या नदी मन्दाकिनी शुभा ॥ ४<br><br>दिव्यं च नन्दनं तत्र तस्यास्तीरे महद्वनम् ।<br>प्रागुत्तरेण कैलासाद् दिव्यं सौगन्धिकं गिरिम् ॥ ५<br><br>सर्वधातुमयं दिव्यं सुवेलं पर्वतं प्रति ।<br>चन्द्रप्रभो नाम गिरिः यः शुभ्रो रत्नसंनिभः ॥ ६<br><br>तत्समीपे सरो दिव्यमच्छोदं नाम विश्रुतम् ।<br>तस्मात् प्रभवते दिव्या नदी ह्याच्छोदिका शुभा ॥ ७<br><br>तस्यास्तीरे वनं दिव्यं महच्चैत्ररथं शुभम् ।<br>तस्मिन् गिरौ निवसति मणिभद्रः सहानुगः ॥ ८<br><br>यक्षसेनापतिः शूरो गुह्यकैः परिवारितः ।<br>पुण्या मन्दाकिनी नाम नदी ह्याच्छोदिका शुभा ॥ ९ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! उस आश्रमकी उत्तर दिशामें हिमालय पर्वतके पृष्ठ-भागके मध्यमें कैलास नामक पर्वत स्थित है। उसपर त्रिपुरासुरके संहारक शंकरजी निवास करते हैं। उसके शिखर नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित हैं तथा उनपर कल्पवृक्ष शोभा पा रहे हैं। उस पर्वतपर श्रीमान् कुबेर गुह्यकोंके साथ निवास करते हैं। इस प्रकार अलकापुरीके अधीश्वर राजा कुबेर अप्सराओंद्वारा अनुगमन किये जाते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं। कैलासके पाद (उपत्यका)-से एक मन्दोदक नामक सरोवर प्रकट हुआ है, जिसका जल बड़ा पवित्र, निर्मल एवं शीतल है। उसका जल दहीके समान उज्ज्वल है। उसी सरोवरसे मङ्गलमयी दिव्य मन्दाकिनी नदी प्रवाहित होती है। वहाँ उस नदीके तटपर नन्दन नामक दिव्य एवं महान् वन है। कैलासकी पूर्वोत्तर दिशामें चन्द्रप्रभ नामक पर्वत है, जो रत्न-सदृश चमकदार है। वह सभी प्रकारकी धातुओंसे विभूषित तथा अनेकों प्रकारकी सुगन्धसे सुवासित दिव्य सुबेल पर्वततक फैला हुआ है। उसके निकट अच्छोद (अच्छावत) नामसे विख्यात एक दिव्य सरोवर है, उससे अच्छोदिका (अच्छोदा) नामकी कल्याणमयी दिव्य नदी उद्भूत हुई है। उस नदीके तटपर चैत्ररथ नामक दिव्य एवं सुन्दर महान् वन है। उस पर्वतपर शूरवीर यक्ष-सेनापति मणिभद्र गुह्यकोंसे घिरे हुए अपने अनुयायियोंके साथ निवास करते हैं। पुण्यमयी मन्दाकिनी तथा कल्याणकारिणी अच्छोदा—ये दोनों नदियाँ पृथ्वी-मण्डलके मध्यभागसे प्रवाहित होती हुई महासागरमें मिली हैं॥ १—९ १/२ ॥ |
| महीमण्डलमध्ये तु प्रविष्टा सा महोदधिम् ।<br>कैलासदक्षिणे प्राच्यां शिवं सर्वौषधिं गिरिम् ॥ १० | कैलासके दक्षिण-पूर्व दिशामें लाल वर्णवाला हेमशृङ्ग नामक एक विशाल पर्वत है। वह दिव्य सुवेल पर्वततक |
| ४१० | * मत्स्यपुराण * |
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| मनःशिलामयं दिव्यं सुवेलं पर्वतं प्रति।<br>लोहितो हेमशृङ्गस्तु गिरिः सूर्यप्रभो महान्॥ ११<br><br>तस्य पादे महद् दिव्यं लोहितं सुमहत्सरः।<br>तस्मात् प्रभवते पुण्यो लौहित्यश्च नदो महान्॥ १२<br><br>दिव्यारण्यं विशोकं च तस्य तीरे महद् वनम्।<br>तस्मिन् गिरौ निवसति यक्षो मणिधरो वशी॥ १३<br><br>सौम्यैः सुधार्मिकैश्चैव गुह्यकैः परिवारितः।<br>कैलासात् पश्चिमोदीच्यां ककुद्मानौषधिगिरिः॥ १४<br><br>ककुद्मति च रुद्रस्य उत्पत्तिश्च ककुद्मिनः।<br>तदञ्जनं त्रैककुदं शैलं त्रिककुदं प्रति॥ १५<br><br>सर्वधातुमयस्तत्र सुमहान् वैद्युतो गिरिः।<br>तस्य पादे महद् दिव्यं मानसं सिद्धसेवितम्॥ १६<br><br>तस्मात् प्रभवते पुण्या सरयूर्लोकपावनी।<br>यस्यास्तीरे वनं दिव्यं वैभ्राजं नाम विश्रुतम्॥ १७<br><br>कुवेरानुचरस्तस्मिन् प्रहेतितनयो वशी।<br>ब्रह्मधाता निवसति राक्षसोऽनन्तविक्रमः॥ १८<br><br>कैलासात् पश्चिमामाशां दिव्यः सर्वौषधिगिरिः।<br>वरुणः पर्वतश्रेष्ठो रूक्मधातुविभूषितः॥ १९<br><br>भवस्य दयितः श्रीमान् पर्वतो हैमसंनिभः।<br>शातकौम्भमयैर्दिव्यैः शिलाजालैः समाचितः॥ २०<br><br>शतसंख्यैस्तापनीयैः शृङ्गैर्दिवमिवोल्लिखन्।<br>शृङ्गवान् सुमहादिव्यो दुर्गः शैलो महाचितः॥ २१<br><br>तस्मिन् गिरौ निवसति गिरिशो धूम्रलोचनः।<br>तस्य पादात् प्रभवति शैलोदं नाम तत्सरः॥ २२ | फैला हुआ है। उसकी कान्ति सूर्यके समान है। वह मङ्गलप्रद पर्वत सभी प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न तथा मैनशिल नामक धातुसे परिपूर्ण है। उसके पाद-प्रान्तमें एक विशाल दिव्य सरोवर है, जिसका नाम लोहित है। वह पुण्यमय लौहित्य (ब्रह्मपुत्र) नामक महान् नदका उद्गमस्थान है। उस नदके तटपर विशोक नामक एक दिव्य एवं विस्तृत वन है। उस पर्वतपर मणिधर नामक यक्ष इन्द्रियोंको वशमें करके परम धार्मिक एवं सौम्य-स्वभाववाले गुह्यकोंके साथ निवास करता है। कैलासकी पश्चिमोत्तर दिशामें ककुद्मान् नामक पर्वत है, जिसपर सभी प्रकारकी ओषधियाँ सुलभ हैं। वह अञ्जन-जैसा काला तथा तीन शिखरोंसे सुशोभित है। उस ककुद्मान् पर्वतपर भगवान् रुद्रके गण ककुद्मी (नन्दिकेश्वर)-की उत्पत्ति हुई है। वहीं समस्त धातुओंसे सम्पन्न वैद्युत नामक अत्यन्त महान् पर्वत है, जो त्रिककुद् पर्वततक विस्तृत है। उसके पाद-प्रान्तमें सिद्धोंद्वारा सेवित एक महान् दिव्य मानस सरोवर है। उस सरोवरसे लोकपावनी पुण्य-सलिला सरयू* निकली हुई हैं, जिनके तटपर (वरुणका) वैभ्राज नामक सुप्रसिद्ध दिव्य वन है। उस वनमें प्रहेतिका पुत्र ब्रह्मधाता नामक राक्षस निवास करता है। वह जितेन्द्रिय, अनन्तपराक्रमी और कुबेरका अनुचर है॥ १०—१८॥<br><br>कैलासकी पश्चिम दिशामें सम्पूर्ण ओषधियोंसे सम्पन्न वरुण नामक दिव्य पर्वत है। वह पर्वतश्रेष्ठ सुवर्ण आदि धातुओंसे विभूषित, भगवान् शंकरका प्रियपात्र, शोभाशाली, स्वर्णसदृश चमकीला और स्वर्णमयी दिव्य शिलाओंसे सम्पन्न है। वह अपने स्वर्णसरीखे चमकदार सैकड़ों शिखरोंसे आकाशको छूता हुआ-सा दीख पड़ता है। वहीं शृङ्गवान् नामका एक महान् दिव्य पर्वत है, जो समृद्धिशाली एवं दुर्गम है। उस पर्वतपर धूम्रलोचन भगवान् शिव निवास करते हैं। उस पर्वतके पाद-प्रान्तमें शैलोद नामक सरोवर है। उसीसे मङ्गलमयी पुण्यतोया शैलोदका नामकी नदी प्रवाहित होती है। उसे चक्षुषी |
* इस अध्यायका हिमालयसे सम्बद्ध भौगोलिक विवरण बड़े महत्त्वका है और यह वर्णन बहुत कुछ कालिकापुराणसे मिलता है।
* अध्याय १२१ * । ४११
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मात् प्रभवते पुण्या नदी शैलोदका शुभा।<br>सा चक्षुषी तयोर्मध्ये प्रविष्टा पश्चिमोदधिम्॥ २३<br>अस्त्युत्तरेण कैलासाच्छिवः सर्वौषधो गिरिः।<br>गौरं तु पर्वतश्रेष्ठं हरितालमयं प्रति॥ २४<br>हिरण्यशृङ्गः सुमहान् दिव्यौषधिमयो गिरिः।<br>तस्य पादे महद् दिव्यं सरः काञ्चनवालुकम्॥ २५<br>रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः।<br>गङ्गार्थे स तु राजर्षिरुवास बहुलाः समाः॥ २६<br>दिवं यास्यन्तु मे पूर्वे गङ्गातोयाप्लुतास्थिकाः।<br>तत्र त्रिपथगा देवी प्रथमं तु प्रतिष्ठिता॥ २७<br>सोमपादात् प्रसूता सा सप्तधा प्रविभज्यते।<br>यूपा मणिमयास्तत्र विमानाश्च हिरण्मयाः॥ २८<br>तत्रेष्ट्वा क्रतुभिः सिद्धः शक्रः सुरगणैः सह।<br>दिव्यश्छायापथस्तत्र नक्षत्राणां तु मण्डलम्॥ २९<br>दृश्यते भासुरा रात्रौ देवी त्रिपथगा तु सा।<br>अन्तरिक्षं दिवं चैव भावयित्वा भुवं गता॥ ३०<br>भवोत्तमाङ्गे पतिता संरुद्धा योगमायया।<br>तस्या ये बिन्दवः केचित्क्रुद्धायाः पतिता भुवि॥ ३१<br>कृतं तु तैर्बहुसरस्ततो बिन्दुसरः स्मृतम्।<br>ततस्तस्या निरुद्धाया भवेन सहसा रुषा॥ ३२<br>ज्ञात्वा तस्या ह्यभिप्रायं क्रूरं देव्याश्चिकीर्षितम्।<br>भित्त्वा विशामि पातालं स्रोतसा गृह्य शङ्करम्॥ ३३<br>अथावलेपं तं ज्ञात्वा तस्याः क्रुद्धस्तु शङ्करः।<br>तिरोभावयितुं बुद्धिरासीदङ्गेषु तां नदीम्॥ ३४<br>एतस्मिन्नेव काले तु दृष्ट्वा राजानमग्रतः।<br>धमनीसंततं क्षीणं क्षुधाव्याकुलितेन्द्रियम्॥ ३५ | भी कहते हैं। वह उन दोनों पर्वतोंके बीचसे बहती हुई पश्चिम-सागरमें जा मिली है। कैलासकी उत्तर दिशामें हिरण्यशृङ्ग नामका अत्यन्त विशाल पर्वत है, जो हरितालसे परिपूर्ण पर्वतश्रेष्ठ गौरतक फैला हुआ है। इस कल्याणकारी पर्वतपर दिव्य ओषधियाँ प्राप्त होती हैं। इसके पादप्रान्तमें बिन्दुसर नामक अत्यन्त रमणीय दिव्य सरोवर है, जो सुवर्णके समान बालुकासे युक्त है। यहींपर राजर्षि भगीरथने 'मेरे पूर्वज गङ्गाजलसे हड्डियोंके अभिषिक्त हो जानेपर स्वर्गलोकको चले जायँ, इस भावनासे भावित होकर गङ्गाको भूतलपर लानेके लिये बहुत वर्षोंतक (तप करते हुए) निवास किया था। इसलिये त्रिपथगा* गङ्गादेवी सर्वप्रथम वहीं प्रतिष्ठित हुई थीं और सोम पर्वतके पादसे निकलकर सात भागोंमें विभक्त हो गयीं। उस सरोवरके तटपर अनेकों मणिमय यज्ञस्तम्भ तथा स्वर्णमय विमान शोभा पा रहे थे। वहाँ देवताओंके साथ इन्द्रने यज्ञोंका अनुष्ठान कर सिद्धि लाभ किया था। वहाँ दिव्य छायापथ तथा नक्षत्रोंका मण्डल विद्यमान है। वहाँ त्रिपथगा गङ्गादेवी रातमें चमकती हुई दीख पड़ती हैं॥ १९—२९ १/२ ॥<br><br>गङ्गादेवी स्वर्गलोक और अन्तरिक्षलोकको पवित्र कर भूतलपर आयीं और वे शिवजीके मस्तकपर गिरीं। तब शिवजीने अपनी योगमायाके बलसे उन्हें वहीं रोक दिया। (इससे गङ्गादेवी क्रुद्ध हो गयीं।) उस समय उन कुपित हुई गङ्गादेवीकी जो कुछ बूँदें पृथ्वीपर गिरीं, उनसे 'बहुसर' नामक एक सरोवर बन गया, वही आगे चलकर 'बिन्दुसर' नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस समय शिवजीके सहसा रोक लिये जानेपर गङ्गादेवी क्रुद्ध होकर ऐसा विचार करने लगीं कि मैं अपनी धाराके साथ शङ्करको बहाती हुई पृथ्वीको फोड़कर पातालमें प्रवेश कर जाऊँगी। जब शङ्करजीको गङ्गाकी यह कुचेष्टा और क्रूर अभिप्राय ज्ञात हुआ, तब वे उसे गङ्गाका अभिमान समझकर क्रुद्ध हो गये और उस नदी-रूपिणी गङ्गाको अपने अङ्गोंमें ही लीन कर लेनेका विचार करने लगे; परंतु ठीक इसी समय राजा भगीरथ, जिनकी इन्द्रियाँ भूखसे व्याकुल हो गयी थीं तथा जिनके शरीरमें नसेंमात्र दीख रही थीं, शिवजीके सम्मुख आ गये। |
* वाल्मी० रामायण (१। ४४। ६)-के अनुसार गङ्गा भू, पाताल, स्वर्ग—इन तीन पथों—मार्गोंको भावित—पवित्र करनेके कारण 'त्रिपथगा' कही जाती हैं—'त्रीन् पथो भावयतीति तस्मात्त्रिपथगा स्मृता।'
४१२ * मत्स्यपुराण *
| अनेन तोषितश्चाहं नद्यर्थे पूर्वमेव तु।<br>बुद्ध्वास्य वरदानं तु ततः कोपं न्ययच्छत॥ ३६<br><br>ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा यदुक्तं धारयन् नदीम्।<br>ततो विसर्जयामास संरुद्धां स्वेन तेजसा॥ ३७<br><br>नदीं भगीरथस्यार्थे तपसोग्रेण तोषितः।<br>ततो विसर्जयामास सप्त स्रोतांसि गङ्गया॥ ३८ | उन क्षीणकाय नरेशको देखकर शङ्करजी विचारमें पड़ गये कि इसने तो पहले ही इस नदीको भूतलपर लानेके लिये तपस्याद्वारा मुझे संतुष्ट कर लिया है। फिर अपने द्वारा राजाको दिये गये वरदानको यादकर उन्होंने अपने क्रोधको रोक लिया। तत्पश्चात् गङ्गा नदीको धारण करते समय ब्रह्माद्वारा कहे गये वचनोंको सुनकर तथा भगीरथकी उग्र तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शङ्करने अपने तेजसे रोकी हुई गङ्गा नदीको छोड़ दिया। इसके बाद गङ्गा सात धाराओंमें विभक्त होकर प्रवाहित हुई॥ ३०—३८॥ | | त्रीणि प्राचीमभिमुखं प्रतीचीं त्रीण्यथैव तु।<br>स्रोतांसि त्रिपथायास्तु प्रत्यपद्यन्त सप्तधा॥ ३९<br><br>नलिनी ह्लादिनी चैव पावनी चैव प्राच्यगाः।<br>सीता चक्षुश्च सिन्धुश्च तिस्त्रस्ता वै प्रतीच्यगाः॥ ४०<br><br>सप्तमी त्वनुगा तासां दक्षिणेन भगीरथम्।<br>तस्माद् भागीरथी सा वै प्रविष्टा दक्षिणोदधिम्॥ ४१<br><br>सप्त चैताः प्लावयन्ति वर्षं तु हिमसाह्वयम्।<br>प्रसूताः सप्त नद्यस्तु शुभा बिन्दुसरोद्भवाः॥ ४२<br><br>तान् देशान् प्लावयन्ति स्म म्लेच्छप्रायांश्च सर्वशः।<br>सशैलान् कुकुरान् रौध्रान् बर्बरान् यवनान् खसान्॥ ४३<br><br>पुलिन्दांश्च कुलत्थांश्च अङ्गलौक्यान् वरांश्च यान्।<br>कृत्वा द्विधा हिमवन्तं प्रविष्टा दक्षिणोदधिम्॥ ४४ | त्रिपथगा गङ्गाकी तीन धाराएँ पूर्वाभिमुखी तथा तीन पश्चिमाभिमुखी प्रवाहित हुई (और सातवीं धारा स्वयं भागीरथी गङ्गा थीं)। इस प्रकार वे सात धाराओंमें विभक्त हो गयीं। उनमें पूर्व दिशामें बहनेवाली धाराओंका नाम नलिनी, ह्लादिनी और पावनी है तथा पश्चिम दिशामें प्रवाहित होनेवाली तीनों धाराएँ सीता, चक्षु और सिंधु नामसे कही गयी हैं। उनमें सातवीं धारा भगीरथके पीछे-पीछे दक्षिण दिशाकी ओर चली और दक्षिणसागरमें प्रविष्ट हो गयी, इसी कारण वह भागीरथी नामसे प्रसिद्ध हुई। ये ही सातों धाराएँ हिमवर्षको आप्लावित करती हैं। इस प्रकार ये सातों नदियाँ बिन्दुसरसे निकली हुई हैं। ये सब ओरसे उन म्लेच्छप्राय देशोंको सींचती हैं, जो पर्वतीय कुकुर, रौध्र, बर्बर, यवन, खस, पुलिन्द, कुलत्थ, अङ्गलौक्य और वर नामसे कहे जाते हैं। इस प्रकार गङ्गा हिमवान्को दो भागोंमें विभक्त कर दक्षिणसमुद्रमें प्रवेश कर गयी हैं। | | अथ वीरमरूंश्चैव कालिकांश्चैव शूलिकान्।<br>तुषारान् बर्बरान् कारान् पह्लवान् पारदाञ्छकान्॥ ४५<br><br>एताञ्जनपदांश्चक्षुः प्लावयित्वोदधिं गता।<br>दरदोर्जगुडांश्चैव गान्धारानौरसान् कुहून्॥ ४६<br><br>शिवपौरानिन्द्रमरून् वसतीन् समतेजसम्।<br>सैन्धवानुर्वशांन् बर्बान् कुपथान् भीमरोमकान्॥ ४७<br><br>शुनामुखांश्चोर्दमरून् सिन्धुरेतान् निषेवते।<br>गन्धर्वान् किंनरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान्॥ ४८<br><br>कलापग्रामकांश्चैव तथा किम्पुरुषान् नरान्।<br>किरातांश्च पुलिन्दांश्च कुरून् वै भारतानपि॥ ४९ | इसके बाद चक्षु (वंक्षु) नदी वीरमरु, कालिक, शूलिक, तुषार, बर्बर, कार, पह्लव, पारद और शक—इन देशोंको आप्लावित कर समुद्रमें मिल गयी है। सिन्धु नदी दरद, उर्जगुड, गान्धार, औरस, कुहू, शिवपौर, इन्द्रमरु, वसति, सैन्धव, उर्वश, वर्ब, कुपथ, भीमरोभक, शुनामुख और उर्दमरु—इन देशोंकी सेवा करती अर्थात् इन देशोंमें बहती है। मङ्गलमयी गङ्गा गन्धर्व, किंनर, यक्ष, राक्षस, विद्याधर, नाग, कलापग्रामवासी जन, किम्पुरुष, किरात, पुलिन्द, कुरु, भारत, पाञ्चाल, कौशिक मत्स्य (विराट), मगध, अङ्ग, |
- अध्याय १२१ * ४१३
| पाञ्चालान् कौशिकान् मत्स्यान् मागधाङ्गांस्तथैव च।<br>सुह्मोत्तरांश्च वङ्गांश्च ताम्रलिप्तांस्तथैव च॥ ५०<br>एताञ्जनपदानार्यान् गङ्गा भावयते शुभा।<br>ततः प्रतिहता विन्ध्ये प्रविष्टा दक्षिणोदधिम्॥ ५१ | उत्तरसुह्म, वङ्ग और ताम्रलिप्त—इन आर्य देशोंको पवित्र करती हैं। इस प्रकार वे (हिमालयसे निकलकर) विन्ध्यपर्वतसे अवरुद्ध होकर पूर्वकी ओर आगे बढ़ती हुई दक्षिणसमुद्रमें मिल गयी हैं॥ ३९–५१॥ |
| ततस्तु ह्लादिनी पुण्या प्राचीनाभिमुखी ययौ।<br>प्लावयन्त्युपकांश्चैव निषादानपि सर्वशः॥ ५२<br>धीवरानृषिकांश्चैव तथा नीलमुखानपि।<br>केकरानेककर्णांश्च किरातानपि चैव हि॥ ५३<br>कालञ्जरान् विकर्णांश्च कुशिकान् स्वर्गभौमकान्।<br>सा मण्डले समुद्रस्य तीरे भूत्वा तु सर्वशः॥ ५४<br>ततस्तु नलिनी चापि प्राचीमेव दिशं ययौ।<br>कुपथान् प्लावयन्ती सा इन्द्रद्युम्नसरांस्यपि॥ ५५<br>तथा खरपथान् देशान् वेत्रशङ्कुपथानपि।<br>मध्येनोजानकमरून् कुथप्रावरणान् ययौ॥ ५६<br>इन्द्रद्वीपसमीपे तु प्रविष्टा लवणोदधिम्।<br>ततस्तु पावनी प्रायात् प्राचीमाशां जवेन तु॥ ५७<br>तोमरान् प्लावयन्ती च हंसमार्गान् समूहकान्।<br>पूर्वान् देशांश्च सेवन्ती भित्त्वा सा बहुधा गिरिम्।<br>कर्णप्रावरणान् प्राप्य गता साश्वमुखानपि॥ ५८<br>सिक्त्वा पर्वतमेरुं सा गत्वा विद्याधरानपि।<br>शैमिमण्डलकोष्ठं तु सा प्रविष्टा महत्सरः॥ ५९<br>तासां नद्युपनद्योऽन्याः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>उपगच्छन्ति ता नद्यो यतो वर्षति वासवः॥ ६० | इसी प्रकार पुण्यतोया ह्लादिनी, जो पूर्वाभिमुखी प्रवाहित होती है, उपका, निषाद, धीवर, ऋषिक, नीलमुख, केकर, अनेककर्ण, किरात, कालेंजर, विकर्ण, कुशिक और स्वर्गभौमक—इन सभी देशोंको सींचती हुई समुद्रमण्डलके तटपर पहुँचकर उसमें लीन हो गयी है।<br><br>नलिनी नदी भी बिन्दुसरसे निकलकर पूर्व दिशाकी ओर प्रवाहित हुई है। वह कुपथ, इन्द्रद्युम्नसर, खरपथ, वेत्र (ट) द्वीप, शङ्कुपथ आदि प्रदेशोंको सींचती हुई उज्जानक (जूनागढ़) मरुके मध्यभागसे बहती हुई कुथप्रावरणकी ओर चली गयी है तथा इन्द्रद्वीपके निकट लवणसागरमें मिल गयी है। उसी (मूल) सरोवरसे पावनी नदी बड़े वेगसे पूर्व दिशाकी ओर बहती है। वह तोमर, हंसमार्ग और समूहक देशोंको सींचती हुई पूर्वी देशोंमें जा पहुँचती है। वहाँ अनेकों प्रकारसे पर्वतको विदीर्ण करके कर्णप्रावरणमें पहुँचकर अश्वमुख देशमें चली जाती है। इसके बाद मेरु पर्वतको सींचती हुई विद्याधरोंके लोकोंमें जाकर शैमिमण्डलकोष्ठ नामक महान् सरोवरमें प्रवेश कर जाती है। इनकी छोटी-बड़ी सैकड़ों-हजारों सहायक नदियाँ भी हैं, जो पृथक्-पृथक् इन्हींमें आकर मिली हैं। इन्हींके जलको ग्रहण कर इन्द्र वर्षा करते हैं॥ ५२–६०॥ |
| तीरे वंशौकसारायाः सुरभिर्नाम तद् वनम्।<br>हिरण्यशृङ्गो वसति विद्वान् कौबेरको वशी॥ ६१<br>यज्ञादपेतः सुमहान्मितौजाः सुविक्रमः।<br>तत्रागस्त्यैः परिवृता विद्वद्भिर्ब्रह्मराक्षसैः॥ ६२<br>कुबेरानुचरा ह्येते चत्वारस्तत्समाशिताः।<br>एवमेव तु विज्ञेया सिद्धिः पर्वतवासिनाम्॥ ६३ | वंशौकसाराके तटपर सुरभि नामक वह वन है, जिसमें जितेन्द्रिय एवं विद्वान् हिरण्यशृङ्ग निवास करता है। वह कुबेरका अनुचर, यज्ञसे विमुख, अमित तेजस्वी एवं परम पराक्रमी है। वहीं अगस्त्यगोत्रीय विद्वान् ब्रह्मराक्षसोंका भी निवासस्थान है। (उनकी संख्या चार है।) वे चारों कुबेरके अनुचर हैं, जो उसी हिरण्यशृङ्गके आश्रममें रहते हैं। इसी प्रकार पर्वतनिवासियोंकी सिद्धि समझनी चाहिये। |
| ४१४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| परस्परेण द्विगुणा धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>हेमकूटस्य पृष्ठे तु सर्पाणां तत् सरः स्मृतम्॥ ६४<br>सरस्वती प्रभवति तस्माज्ज्योतिष्मती तु या।<br>अवगाढे ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ॥ ६५<br>सरो विष्णुपदं नाम निषधे पर्वतोत्तमे।<br>यस्मादग्रे प्रभवति गन्धर्वानुकुले च ते॥ ६६<br>मेरोः पार्श्वात् प्रभवति हृदश्चन्द्रप्रभो महान्।<br>जम्बूश्चैव नदी पुण्या यस्यां जाम्बूनदं स्मृतम्॥ ६७<br>पयोदस्तु ह्रदो नीलः स शुभः पुण्डरीकवान्।<br>पुण्डरीकात् पयोदाच्च तस्माद् द्वे सम्प्रसूतयाम्॥ ६८<br>सरसस्तु सरस्वैतत् स्मृतमुत्तरमानसम्।<br>मृग्या च मृगकान्ता च तस्माद् द्वे सम्प्रसूतयाम्॥ ६९<br>ह्रदाः कुरुषु विख्याताः पद्ममीनकुलाकुलाः।<br>नाम्ना ते वैजया नाम द्वादशोदधिसन्निभाः॥ ७०<br>तेभ्यः शान्ती च मध्वी च द्वे नद्यौ सम्प्रसूतयाम्।<br>किम्पुरुषाद्यानि यान्यष्टौ तेषु देवो न वर्षति॥ ७१<br>उद्भिदान्युदकान्यत्र प्रवहन्ति सरिद्वराः।<br>बलाहकश्च ऋषभो चक्रो मैनाक एव च॥ ७२ | वह धर्म, काम और अर्थके अनुसार परस्पर दुगुना फल देनेवाली होती है। हेमकूट पर्वतके पृष्ठभागपर जो सर्पोंका सरोवर बतलाया जाता है, उसीसे सरस्वती और ज्योतिष्मती नामकी दो नदियाँ निकली हैं। वे क्रमशः पूर्व और पश्चिम समुद्रमें जाकर मिली हैं। पर्वतश्रेष्ठ निषधपर विष्णुपद नामक सरोवर है, जो उसी पर्वतके अग्रभागसे निकला हुआ है। वे दोनों (नाग और विष्णुपद) सरोवर गन्धर्वोंके अनुकूल हैं। मेरुके पार्श्वभागसे चन्द्रप्रभ नामक महान् सरोवर तथा पुण्यसलिला जम्बू नदी निकलती है। जम्बू नदीमें जाम्बूनद नामक सुवर्ण पाया जाता है। वहीं पयोद और पुण्डरीकवान् नामक दो सरोवर और हैं, जिनका जल क्रमशः नील और श्वेत है। इन पुण्डरीक और पयोद सरोवरोंसे दो सरोवर और प्रकट हुए हैं। उनमें एक सरोवरसे निकला हुआ सर उत्तरमानस नामसे प्रसिद्ध है। उससे मृग्या और मृगकान्ता नामकी दो नदियाँ निकली हैं। कुरुदेशमें सागरके समान अगाध एवं विस्तृत बारह ह्रद हैं, जो कमलों और मछलियोंसे भरे रहते हैं, वे 'वैजय' नामसे विख्यात हैं। उनसे शान्ती और मध्वी नामकी दो नदियाँ निकली हैं। किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, उनमें इन्द्रदेव वर्षा नहीं करते, अपितु वहाँकी बड़ी-बड़ी नदियाँ ही अन्नोत्पादक जलको प्रवाहित करती हैं॥ ६१—७१ ½॥ |
| विनिविष्टाः प्रतिदिशं निमग्ना लवणाम्बुधिम्।<br>चन्द्रकान्तस्तथा द्रोणः सुमहांच्छ शिलोच्चयः॥ ७३ | बलाहक, ऋषभ, चक्र और मैनाक—ये चारों पर्वत क्रमशः चारों दिशाओंमें लवणसागरतक फैले हुए हैं। |
| उद्गायता उदीच्यां तु अवगाढा महोदधिम्।<br>चक्रो बधिरकश्चैव तथा नारदपर्वतः॥ ७४ | चन्द्रकान्त, द्रोण तथा सुमहान्—इन पर्वतोंका विस्तार उत्तर दिशामें महासागरतक है। |
| प्रतीचीमायतास्ते वै प्रतिष्ठास्ते महोदधिम्।<br>जीमूतो द्रावणश्चैव मैनाकश्चन्द्रपर्वतः॥ ७५ | चक्र, बधिरक और नारद—ये पर्वत पश्चिम दिशामें फैले हुए हैं। इनका विस्तार महासागरतक है। |
| आयतास्ते महाशैलाः समुद्रं दक्षिणां प्रति।<br>चक्रमैनाकयोर्मध्ये दिवि संदक्षिणापथे॥ ७६ | जीमूत, द्रावण, मैनाक और चन्द्र—ये महापर्वत दक्षिण दिशामें दक्षिण समुद्रतक विस्तृत हैं। दक्षिणापथके समुद्रमें चक्र और मैनाक पर्वतके मध्यमें संवर्तक नामक अग्निका निवास है। वह उस सागरके जलको पीता है। समुद्रमें निवास करनेवाला और्व नामक अग्नि है, |
१२३- गोमेदकद्वीप और पुष्करद्वीपका वर्णन
- अध्याय १२२ * ४१५
| तत्र संवर्तको नाम सोऽग्निः पिबति तज्जलम्।<br>अग्निः समुद्रवासस्तु और्वोऽसौ वडवामुखः<sup>१</sup>॥ ७७ | इसे बडवाग्नि कहते हैं। जिसका मुख घोड़ीके समान है। (वह भी समुद्रके जलको सोखता रहता है।) पूर्वकालमें जब इन्द्र पर्वतोंका पक्षच्छेदन कर रहे थे, उस समय ये चारों पर्वत इन्द्रके भयसे भीत होकर लवणसागरमें भागकर छिप गये थे। ये पर्वत चन्द्रमाके शुक्लपक्षमें आनेपर दीखते हैं एवं कृष्णपक्ष आनेपर समुद्रमें डूब जाते हैं। भारतवर्षके जो भेद दीख पड़ते हैं, उनका वर्णन यहाँ किया गया। अन्य वर्षोंका वर्णन अन्यत्र किया जा चुका है। इन वर्षोंमें प्रत्येक वर्ष एक-दूसरेकी अपेक्षा उत्तरोत्तर गुणोंमें अधिक है। इन वर्षोंमें सभी प्राणी विभागपूर्वक आरोग्य और आयुके प्रमाणसे तथा धर्म, काम और अर्थसे युक्त होकर निवास करते हैं। उन सभी वर्षोंमें उन प्राणियोंकी अनेकों जातियाँ भी हैं। इस प्रकार इस विश्व एवं इस जगत्को धारण करती हुई पृथ्वी स्थित है॥ ७२—८२॥ |
| इत्येते पर्वताविष्टाश्चत्वारो लवणोदधिम्।<br>छिद्यमानेषु पक्षेषु पुरा इन्द्रस्य वै भयात्॥ ७८ | |
| तेषां तु दृश्यते चन्द्रे शुक्ले कृष्णे समाप्लुतिः।<br>ते भारतस्य वर्षस्य भेदा येन प्रकीर्तिताः॥ ७९ | |
| इहोदितस्य दृश्यन्ते अन्ये त्वन्यत्र चोदिताः।<br>उत्तरोत्तरमेतेषां वर्षमुद्रिच्यते गुणैः॥ ८० | |
| आरोग्यायःप्रमाणाभ्यां धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>समन्वितानि भूतानि तेषु वर्षेषु भागशः॥ ८१ | |
| वसन्ति नानाजातीनि तेषु सर्वेषु तानि वै।<br>इत्येतद् धारयद् विश्वं पृथ्वी जगदिदं स्थिता॥ ८२ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे जम्बूद्वीपवर्णनं नामैकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णनमें जम्बूद्वीपवर्णन नामक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२१॥
एक सौ बाईसवाँ अध्याय
शाकद्वीप, कुशद्वीप, क्रौञ्चद्वीप और शाल्मलद्वीपका वर्णन<sup>२</sup>
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
|---|---|
| शाकद्वीपस्य वक्ष्यामि यथावदिह निश्चयम्।<br>कथ्यमानं निबोधध्वं शाकं द्वीपं द्विजोत्तमाः॥ १ | द्विजवरो! अब मैं शाकद्वीपका निश्चितरूपसे यथार्थ वर्णन कर रहा हूँ। आपलोग मेरे कथनानुसार शाकद्वीपके विषयमें जानकारी प्राप्त करें। शाकद्वीपका विस्तार जम्बूद्वीपके विस्तारसे दुगुना है और चारों ओरसे उसका फैलाव विस्तारसे भी तिगुना है। उस द्वीपसे यह लवणसागर घिरा हुआ है। शाकद्वीपमें अनेकों पुण्यमय जनपद हैं। वहाँके निवासी लम्बी आयु भोग कर मरते हैं। भला, उन क्षमाशील एवं तेजस्वी जनोंके प्रति दुर्भिक्षकी सम्भावना कहाँसे हो सकती है। |
| जम्बूद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः।<br>विस्तारात् त्रिगुणश्चापि परिणाहः समन्ततः॥ २ | |
| तेनावृतः समुद्रोऽयं द्वीपेन लवणोदधिः।<br>तत्र पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः॥ ३ |
१. आर्यभट्टीय आदिके अनुसार वडवामुख दक्षिणी ध्रुवके पास एक स्थान है, जिस मार्गसे लोग पातालमें प्रवेश करते थे। बडवाग्निको वडवाचक्र, वडवाभृगु; हुतृ आदि भी कहा गया है। महावीरचरितमें इसके रूप आदिका भी वर्णन है।
२. प्रायः सभी पुराणोंके भुवनकोश-प्रकरणमें इन सभी द्वीपोंका वर्णन है, पर मत्स्यपुराणसे उनके नामक्रमादिमें कुछ भेद है। W. Kirifel के भुवनकोश—(Das Pnrana Von, Weltge-banden P, III.F. Bharatvarsha 1931) ग्रन्थमें इन सबका एकत्र सूक्ष्म तुलनात्मक अध्ययन विशेष महत्त्वका है।
४१६ * मत्स्यपुराण *
| कुत एव च दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुतेष्विह।<br>तत्रापि पर्वताः शुभ्राः सप्तैव मणिभूषिताः॥ ४<br>शाकद्वीपादिषु त्वेषु सप्त सप्त नगास्त्रिषु।<br>ऋज्वायताः प्रतिदिशं निविष्टा वर्षपर्वताः॥ ५<br>रत्नाकूराद्रिनामानः सानुमन्तो महाचिताः।<br>समोदिताः प्रतिदिशं द्वीपविस्तारमानतः॥ ६<br>उभयत्रावगाढौ च लवणक्षीरसागरौ।<br>शाकद्वीपे तु वक्ष्यामि सप्त दिव्यान् महाचलान्॥ ७<br>देवर्षिगन्धर्वयुतः प्रथमो मेरुरुच्यते।<br>प्रागायतः स सौवर्ण उदयो नाम पर्वतः॥ ८<br>तत्र मेघास्तु वृष्ट्यर्थं प्रभवन्त्यपयान्ति च।<br>तस्यापरेण सुमहाञ्जलधारो महागिरिः॥ ९<br>स वै चन्द्रः समाख्यातः सर्वौषधिसमन्वितः।<br>तस्मान्नित्यमुपादत्ते वासवः परमं जलम्॥ १०<br><br>नारदो नाम चैवोक्तो दुर्गशैलो महाचितः।<br>तत्राचलौ समुत्पन्नौ पूर्वं नारदपर्वतौ॥ ११<br>तस्यापरेण सुमहाञ्श्यामो नाम महागिरिः।<br>यत्र श्यामत्वमापन्नाः प्रजाः पूर्वमिमाः किल॥ १२<br>स एव दुन्दुभिर्नाम श्यामपर्वतसंनिभः।<br>शब्दमृत्युः पुरा तस्मिन् दुन्दुभिस्ताडितः सुरैः॥ १३<br>रत्नमालान्तरमयः शाल्मलश्चान्तरालकृत्।<br>तस्यापरेण रजतो महानस्तो गिरिः स्मृतः॥ १४<br>स वै सोमक इत्युक्तो देवैर्यत्रामृतं पुरा।<br>सम्भृतं च हृतं चैव मातुरर्थे गरुत्मता॥ १५<br>तस्यापरे चाम्बिकेयः सुमनाश्चैव स स्मृतः।<br>हिरण्याक्षो वराहेण तस्मिञ्शैले निषूदितः॥ १६<br>आम्बिकेयात् परो रम्यः सर्वौषधिनिषेवितः।<br>विभ्राजस्तु समाख्यातः स्फाटिकस्तु महान् गिरिः॥ १७ | इस द्वीपमें भी मणियोंसे विभूषित श्वेत रंगके सात पर्वत हैं। शाकद्वीप आदि तीन द्वीपोंमें सात-सात पर्वत हैं, जो चारों दिशाओंमें सीधे फैले हुए हैं। ये ही वहाँ वर्षपर्वत कहलाते हैं। ये रत्नाकूराद्रि नामवाले वर्षपर्वत ऊँचे शिखरोंसे युक्त तथा वृक्षोंसे सम्पन्न हैं। ये द्वीप विस्तारके परिमाणकी समानतामें चारों दिशाओंमें फैले हुए हैं और एक ओर क्षीरसागरतक तथा दूसरी ओर लवणसागरतक पहुँच गये हैं। अब मैं शाकद्वीपके सातों दिव्य महापर्वतोंका वर्णन कर रहा हूँ। उनमें पहला पर्वत मेरु कहा जाता है, जो देवो, ऋषियों और गन्धर्वोंसे सुसेवित है। वह स्वर्णमय पर्वत पूर्व दिशामें फैला हुआ है। उसका दूसरा नाम 'उदयगिरि' है। वहाँ मेघगण वृष्टि करनेके लिये आते हैं और (जल बरसाकर) चले जाते हैं। उसके पार्श्वभागमें सम्पूर्ण ओषधियोंसे सम्पन्न जलधार नामक अत्यन्त विशाल पर्वत है। वह चन्द्र नामसे भी विख्यात है। उसी पर्वतसे इन्द्र नित्य अधिक-से-अधिक जल ग्रहण करते हैं॥ १—१०॥<br><br>वहीं महान् समृद्धिशाली नारद नामक पर्वत है, जिसे दुर्गशैल भी कहते हैं। पूर्वकालमें ये दोनों नारद और दुर्गशैल पर्वत यहीं उत्पन्न हुए थे। उसके बाद श्याम नामक अत्यन्त विशाल पर्वत है, जहाँ पूर्वकालमें ये सारी प्रजाएँ श्यामलतको प्राप्त हो गयी थीं। श्यामपर्वतके सदृश काले रंगवाला वहीं दुन्दुभि पर्वत भी है, जिसपर प्राचीनकालमें देवताओंद्धारा दुन्दुभिके बजाये जानेपर उसके शब्दसे ही (शत्रुओंकी) मृत्यु हो जाती थी। इसके अन्तःप्रदेशमें रत्नोंके समूह भरे पड़े हैं और यह सेमलके वृक्षोंसे सुशोभित है। उसके बाद महान् अस्ताचल है, जो रजतमय है। उसे सोमक भी कहते हैं। इसी पर्वतपर पूर्वकालमें गरुड़ने अपनी माताके हितार्थ देवताओंद्धारा संचित किये गये अमृतका अपहरण किया था। उसके बाद आम्बिकेय नामक महापर्वत है, जिसे सुमना भी कहते हैं। इसी पर्वतपर वराहभगवान्ने हिरण्याक्षक वध किया था। आम्बिकेय पर्वतके बाद सम्पूर्ण ओषधियोंसे परिपूर्ण एवं स्फटिककी शिलाओंसे व्याप्त परम रमणीय महान् पर्वत है, जो विभ्राज नामसे विख्यात है। इससे अग्नि विशेष उद्दीप्त होती है, इसी |
| * अध्याय १२२ * | ४१७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यस्माद् विभ्राजते वह्निर्विभ्राजस्तेन स स्मृतः।<br>सैवेह केशवत्युक्तो यतो वायुः प्रवाति च॥ १८ | कारण इसे विभ्राज कहते हैं। इसीको 'केशव' भी कहते हैं। यहींसे वायुकी गति प्रारम्भ होती है॥ ११–१८॥ |
| तेषां वर्षाणि वक्ष्यामि पर्वतानां द्विजोत्तमाः।<br>शृणुध्वं नामतस्तानि यथावदनुपूर्वशः॥ १९<br>द्विनामान्येव वर्षाणि यथैव गिरयस्तथा।<br>उदयस्योदयं वर्षं जलधारेति विश्रुतम्॥ २०<br>नाम्ना गतभयं नाम वर्षं तत् प्रथमं स्मृतम्।<br>द्वितीयं जलधारस्य सुकुमारमिति स्मृतम्॥ २१<br>तदेव शैशिरं नाम वर्षं तत् परिकीर्तितम्।<br>नारदस्य च कौमारं तदेव च सुखोदयम्॥ २२<br>श्यामपर्वतवर्षं तदनीचक्रमिति स्मृतम्।<br>आनन्दकमिति प्रोक्तं तदेव मुनिभिः शुभम्॥ २३<br>सोमकस्य शुभं वर्षं विज्ञेयं कुसुमोत्करम्।<br>तदेवासितमित्युक्तं वर्षं सोमकसंज्ञितम्॥ २४<br>आम्बिकेयस्य मैनाकं क्षेमकं चैव तत्स्मृतम्।<br>तदेव ध्रुवमित्युक्तं वर्षं विभ्राजसंज्ञितम्॥ २५ | द्विजवरो ! अब मैं उन पर्वतोंके वर्षोंका यथार्थरूपसे नामनिर्देशानुसार आनुपूर्वी वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। जिस प्रकार वहाँके पर्वत दो नामवाले हैं, उसी तरह वर्षोंके भी दो-दो नाम हैं। उदयपर्वतके वर्ष उदय और जलधार नामसे प्रसिद्ध हैं। उनमें जो पहला उदय वर्ष है, वह गतभय नामसे अभिहित होता है। दूसरे जलधार पर्वतके वर्षको सुकुमार कहते हैं। वही शैशिर वर्षके नामसे भी विख्यात है। नारदपर्वतके वर्षका नाम कौमार है। उसीको सुखोदय भी कहते हैं। श्यामपर्वतका वर्ष अनीचक्र नामसे कहा जाता है। उसी मङ्गलमय वर्षको मुनिगण आनन्दक नामसे पुकारते हैं। सोमक पर्वतके कल्याणमय वर्षको कुसुमोत्कर नामसे जानना चाहिये। उसी सोमक नामवाले वर्षको असित भी कहा जाता है। आम्बिकेय पर्वतके वर्ष मैनाक और क्षेमक नामसे प्रसिद्ध हैं। (सातवें केसर पर्वतके वर्षका नाम) विभ्राज है। वही ध्रुव नामसे भी कहा जाता है॥ १९–२५॥ |
| द्वीपस्य परिणाहं च ह्रस्वदीर्घत्वमेव च।<br>जम्बूद्वीपेन संख्यातं तस्य मध्ये वनस्पतिम्॥ २६<br>शाको नाम महावृक्षः प्रजास्तस्य महानुगाः।<br>एतेषु देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः॥ २७<br>विहरन्ति रमन्ते च दृश्यमानाश्च तैः सह।<br>तत्र पुण्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यसमन्विताः॥ २८<br>तेषु नद्यश्च सप्तैव प्रतिवर्षं समुद्रगाः।<br>द्विनाम्ना चैव ताः सर्वा गङ्गाः सप्तविधाः स्मृताः॥ २९ | शाकद्वीपका विस्तार तथा लम्बाई-चौड़ाई जम्बूद्वीपके परिमाणसे अधिक है। (यह ऊपर बतला चुके हैं।) इस द्वीपके मध्यभागमें शाक नामका एक महान् वनस्पति है। इस द्वीपकी प्रजाएँ महापुरुषोंका अनुगमन करनेवाली हैं। इन वर्षोंमें देवता, गन्धर्व, सिद्ध और चारण विहार करते हैं और उनकी रमणीयता देखते हुए प्रजाओंके साथ क्रीडा करते हैं। इस द्वीपमें चारों वर्णोंकी प्रजाओंसे सम्पन्न सुन्दर जनपद हैं। इनमें प्रत्येक वर्षमें समुद्रगामिनी सात नदियाँ भी हैं और वे सभी दो नामोंवाली हैं। केवल गङ्गा सात प्रकारकी बतलायी जाती हैं। |
| प्रथमा सुकुमारीति गङ्गा शिवजला शुभा।<br>अनुप्ता च नाम्नैषा नदी सम्परिकीर्तिता॥ ३०<br>सुकुमारी तपःसिद्धा द्वितीया नामतः सती।<br>नन्दा च पावनी चैव तृतीया परिकीर्तिता॥ ३१<br>शिबिका च चतुर्थी स्याद् द्विविधा च पुनः स्मृता।<br>इक्षुश्च पञ्चमी ज्ञेया तथैव च पुनः कुहूः॥ ३२ | मङ्गलमयी एवं पुण्यसलिला प्रथमा गङ्गा सुकुमारी नामसे कही जाती हैं। यही नदी अनुप्ता नामसे भी प्रसिद्ध है। दूसरी गङ्गा तपःसिद्धा सुकुमारी हैं। ये ही सती नामसे भी प्रसिद्ध हैं। तीसरी गङ्गा नन्दा और पावनी नामसे विख्यात हैं। चौथी गङ्गा शिबिका हैं, इन्हींको द्विविधा भी कहा जाता है। इक्षुको पाँचवीं गङ्गा समझना चाहिये। उसी प्रकार पुनः इन्हें कुहू भी कहते हैं। |
४१८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वेणुका चामृता चैव षष्ठी सम्परिकीर्तिता ।<br>सुकृता च गभस्ती च सप्तमी परिकीर्तिता ॥ ३३<br>एताः सप्त महाभागाः प्रतिवर्षं शिवोदकाः ।<br>भावयन्ति जनं सर्वं शाकद्वीपनिवासिनम् ॥ ३४<br>अभिगच्छन्ति ताश्चान्या नदनद्यः सरांसि च ।<br>बहूदकपरिस्रावा यतो वर्षति वासवः ॥ ३५ | छठी गङ्गा वेणुका और अमृता नामसे प्रसिद्ध हैं। सातवीं गङ्गाको सुकृता और गभस्ती कहा जाता है। कल्याणमय जलसे परिपूर्ण एवं महान् भाग्यशालिनी ये सातों गङ्गाएँ शाकद्वीपके प्रत्येक वर्षके सभी प्राणियोंको पवित्र करती हैं। दूसरे बड़े-बड़े नद, नदियाँ और सरोवर भी इन्हीं गङ्गाकी धाराओंमें आकर मिलते हैं, जिसके कारण ये सभी अथाह जल बहानेवाली हैं। इन्हींसे जल ग्रहण कर इन्द्र वर्षा करते हैं॥ २६-३५॥ |
| तासां तु नामधेयानि परिमाणं तथैव च ।<br>न शक्यं परिसंख्यातुं पुण्यास्ताः सरिदुत्तमाः ॥ ३६<br>ताः पिबन्ति सदा हृष्टा नदीर्जनपदास्तु ते ।<br>एते शान्तमयाः प्रोक्ताः प्रमोदा ये च वै शिवाः ॥ ३७<br>आनन्दाश्च सुखाश्चैव क्षेमकाश्च नवैः सह ।<br>वर्णाश्रमाचारयुता देशास्ते सप्त विश्रुताः ॥ ३८<br>आरोग्या बलिनश्चैव सर्वे मरणवर्जिताः ।<br>अवसर्पिणी न तेष्वस्ति तथैवोत्सर्पिणी पुनः ॥ ३९<br>न तत्रास्ति युगावस्था चतुर्युगकृता क्वचित् ।<br>त्रेतायुगसमः कालः सदा तत्र प्रवर्तते ॥ ४०<br>शाकद्वीपादिषु ज्ञेयं पञ्चस्वेतेषु सर्वशः ।<br>देशस्य तु विचारेण कालः स्वाभाविकः स्मृतः ॥ ४१<br>न तेषु सङ्करः कश्चिद् वर्णाश्रमकृतः क्वचित् ।<br>धर्मस्य चाव्यभीचारादेकान्तसुखिनः प्रजाः ॥ ४२<br>न तेषु माया लोभो वा ईर्ष्यासूया भयं कुतः ।<br>विपर्ययो न तेष्वस्ति तद्वै स्वाभाविकं स्मृतम् ॥ ४३<br>कालो नैव च तेष्वस्ति न दण्डो न च दाण्डिकः ।<br>स्वधर्मेण च धर्मज्ञास्ते रक्षन्ति परस्परम् ॥ ४४ | उन सहायक नदियोंके नाम और परिमाणकी गणना नहीं की जा सकती। ये सभी श्रेष्ठ नदियाँ पुण्यतोया हैं। इनके तटपर निवास करनेवाले जनपदवासी सदा हर्षपूर्वक इनका जल पीते हैं। उनके तटपर स्थित शान्तमय, प्रमोद, शिव, आनन्द, सुख, क्षेमक और नव—ये सात विश्व-विख्यात देश हैं। यहाँ वर्ण और आश्रमके धर्मोंका सुचारूरूपसे पालन होता है। यहाँके सभी निवासी नीरोग, बलवान् और मृत्युसे रहित होते हैं। उनमें अवसर्पिणी (अधोगामिनी) तथा उत्सर्पिणी (ऊर्ध्वगामिनी) क्रिया नहीं होती है। वहाँ कहीं भी चारों युगोंद्वारा की गयी युगव्यवस्था नहीं है। वहाँ सदा त्रेतायुगके समान ही समय वर्तमान रहता है। शाकद्वीप आदि इन पाँचों द्वीपोंमें ऐसी ही दशा जाननी चाहिये; क्योंकि देशके विचारसे ही कालकी स्वाभाविक गति जानी जाती है। उन द्वीपोंमें कहीं भी वर्ण एवं आश्रमजन्य संकर नहीं पाया जाता। इस प्रकार धर्मका परित्याग न करनेके कारण वहाँकी प्रजा एकान्त सुखका अनुभव करती है। उनमें न तो माया (छल-कपट) है, न लोभ, तब भला ईर्ष्या, असूया और भय कैसे हो सकते हैं? उनमें धर्मका विपर्यय भी नहीं देखा जाता। धर्म तो उनके लिये स्वाभाविक कर्म माना गया है। उनपर कालका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वहाँ न तो दण्डका विधान है, न कोई दण्ड देनेवाला ही है। वहाँके निवासी धर्मके ज्ञाता हैं, अतः वे स्वधर्मानुसार परस्पर एक-दूसरेकी रक्षा करते रहते हैं॥ ३६-४४॥ |
| परिमण्डलस्तु सुमहान् द्वीपो वै कुशसंज्ञकः ।<br>नदीजलैः परिवृतः पर्वतैश्चाभ्रसंनिभैः ॥ ४५<br>सर्वधातुविचित्रैश्च मणिविद्रुमभूषितैः ।<br>अन्यैश्च विविधाकारै रम्यैर्जनपदैस्तथा ॥ ४६ | कुश नामक द्वीप अत्यन्त विशाल मण्डलवाला है। उसके चारों ओर नदियोंका जल प्रवाहित होता रहता है। वह बादल-सदृश रंगवाले, सम्पूर्ण धातुओंसे युक्त होनेके कारण रंगे-बिरंगे तथा मणियों और मूँगोंसे विभूषित पर्वतोंद्वारा घिरा हुआ है। उसमें चारों ओर विभिन्न आकारवाले रमणीय जनपद तथा फूल-फलोंसे लदे हुए |
* अध्याय १२२ * ४१९
| वृक्षैः पुष्पफलोपेतैः सर्वतो धनधान्यवान्।<br>नित्यं पुष्पफलोपेतः सर्वरत्नसमावृतः॥ ४७<br>आवृतः पशुभिः सर्वैर्ग्राम्यारण्यैश्च सर्वशः।<br>आनुपूर्व्यात् समासेन कुशद्वीपं निबोधत॥ ४८<br>अथ तृतीयं वक्ष्यामि कुशद्वीपं च कृत्स्नशः।<br>कुशद्वीपेन क्षीरोदः सर्वतः परिवारितः॥ ४९<br>शाकद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्वितः।<br>तत्रापि पर्वताः सप्त विज्ञेया रत्नयोनयः॥ ५०<br>रत्नाकरास्तथा नद्यस्तेषां नामानि मे शृणु।<br>द्विनामानश्च ते सर्वे शाकद्वीपे यथा तथा॥ ५१<br>प्रथमः सूर्यसंकाशः कुमुदो नाम पर्वतः।<br>विद्रुमोच्चय इत्युक्तः स एव च महीधरः॥ ५२<br>सर्वधातुमयैः शृङ्गैः शिलाजालसमन्वितैः।<br>द्वितीयः पर्वतस्तत्र उन्नतो नाम विश्रुतः॥ ५३<br>हेमपर्वत इत्युक्तः स एव च महीधरः।<br>हरितालमयैः शृङ्गैर्द्वीपमावृत्य सर्वशः॥ ५४<br>बलाहकस्तृतीयस्तु भात्यञ्जनमयो गिरिः।<br>द्युतिमान् नामतः प्रोक्तः स एव च महीधरः॥ ५५<br>चतुर्थः पर्वतो द्रोणो यत्रौषध्यो महाबलाः।<br>विशल्यकरणी चैव मृतसंजीवनी तथा॥ ५६<br>पुष्यवान् नाम सैवोक्तः पर्वतः सुमहाचितः।<br>कङ्कस्तु पञ्चमस्तेषां पर्वतो नाम सारवान्॥ ५७<br>कुशेशय इति प्रोक्तः पुनः स पृथिवीधरः।<br>दिव्यपुष्पफलोपेतो दिव्यवीरुत्समन्वितः॥ ५८<br>षष्ठस्तु पर्वतस्तत्र महिषो मेघसंनिभः।<br>स एव तु पुनः प्रोक्तो हरिरित्यभिविश्रुतः॥ ५९<br>तस्मिन् सोऽग्निर्निवसति महिषो नाम योऽप्सुजः।<br>सप्तमः पर्वतस्तत्र ककुद्मान् स हि भाष्यते॥ ६० | वृक्षोंके समूह शोभायमान हो रहे हैं। वह धन-धान्यसे परिपूर्ण है। वह सदा पुष्पों और फलोंसे युक्त रहता है। उसमें सभी प्रकारके रत्न पाये जाते हैं। वह सर्वत्र ग्रामीण एवं जंगली पशुओंसे भरा हुआ है। उस कुशद्वीपका संक्षेपमें आनुपूर्वी वर्णन सुनिये। अब मैं तीसरे कुशद्वीपका समग्ररूपसे वर्णन कर रहा हूँ। कुशद्वीपसे क्षीरसागर चारों ओरसे घिरा हुआ है। यह शाकद्वीपके दुगुने विस्तारसे युक्त है। यहाँ भी रत्नोंकी खानोंसे युक्त सात पर्वत जानना चाहिये। यहाँकी नदियाँ भी रत्नोंकी भण्डार हैं। अब मुझसे उनका नाम सुनिये। जैसे शाकद्वीपमें सभी पर्वतों और नदियोंके दो नाम थे, वैसे ही यहाँके भी पर्वत एवं नदी दो नामवाली हैं। पहला सूर्यके समान चमकीला कुमुद नामक पर्वत है। वह पर्वत विद्रुमोच्चय नामसे भी कहा जाता है। वहाँ दूसरा पर्वत उन्नत नामसे विख्यात है। वह सम्पूर्ण धातुओंसे परिपूर्ण एवं शिला-समूहोंसे समन्वित शिखरोंसे युक्त है। वही पर्वत हेमपर्वत नामसे अभिहित होता है॥ ४५—५३ १/२ ॥<br><br>तीसरा बलाहक पर्वत है, जो अञ्जनके समान काला है। यह अपने हरितालमय शिखरोंसे सर्वत्र द्वीपको आवृत किये हुए है। यही पर्वत द्युतिमान् नामसे भी पुकारा जाता है। चौथा पर्वत द्रोण है। इस महान् गिरिपर विशल्यकरणी और मृतसंजीवनी आदि महाबलवती ओषधियाँ पायी जाती हैं। वही महान् समृद्धिशाली पर्वत पुष्यवान् नामसे विख्यात है। उनमें पाँचवाँ कङ्क पर्वत है, जो सारयुक्त पदार्थोंसे सम्पन्न है। इस पर्वतको कुशेशय भी कहते हैं। वहाँ छठा महिष पर्वत है, जो मेघ-सदृश काला है। वह दिव्य पुष्पों एवं फलोंसे युक्त तथा दिव्य वृक्षोंसे सम्पन्न है। वही पुनः हरि नामसे विख्यात है। उस पर्वतपर महिष नामक अग्नि, जो जलसे उत्पन्न हुआ है, निवास करता है। वहाँ सातवें पर्वतको ककुद्मान् कहा जाता है। उसीको मन्दर जानना चाहिये। वह |
मत्स्यावतार-कथा-प्रसङ्ग
४२० * मत्स्यपुराण *
| मन्दरः सैव विज्ञेयः सर्वधातुमयः शुभः।<br>मन्द इत्येष यो धातुरपामर्थे प्रकाशकः॥ ६१<br>अपां विदारणाच्चैव मन्दरः स निगद्यते।<br>तत्र रत्नान्यनेकानि स्वयं रक्षति वासवः॥ ६२<br>प्रजापतिमुपादाय प्रजाभ्यो विदधत् स्वयम्।<br>तेषामन्तरविष्कम्भो द्विगुणः समुदाहृतः॥ ६३<br>इत्येते पर्वताः सप्त कुशद्वीपे प्रभाषिताः।<br>तेषां वर्षाणि वक्ष्यामि सप्तैव तु विभागशः॥ ६४<br>कुमुदस्य स्मृतः श्वेत उन्नतश्चैव स स्मृतः।<br>उन्नतस्य तु विज्ञेयं वर्षं लोहितसंज्ञकम्॥ ६५<br>वेणुमण्डलकं चैव तथैव परिकीर्तितम्।<br>बलाहकस्य जीमूतः स्वैरथाकारमित्यपि॥ ६६<br>द्रोणस्य हरिकं नाम लवणं च पुनः स्मृतम्।<br>कङ्कस्यापि ककुन्नाम धृतिमच्चैव तत् स्मृतम्॥ ६७<br>महिषं महिषस्यापि पुनश्चापि प्रभाकरम्।<br>ककुद्मिनस्तु तद्वर्षं कपिलं नाम विश्रुतम्॥ ६८<br>एतान्यपि विशिष्टानि सप्त सप्त पृथक् पृथक्।<br>वर्षाणि पर्वताश्चैव नदीस्तेषु निबोधत॥ ६९<br>तत्रापि नद्यः सप्तैव प्रतिवर्षं हि ताः स्मृताः।<br>द्विनामवत्यस्ताः सर्वाः सर्वाः पुण्यजलाः स्मृताः॥ ७०<br>धूतपापा नदी नाम योनिश्चैव पुनः स्मृता।<br>सीता द्वितीया विज्ञेया सा चैव हि निशा स्मृता॥ ७१<br>पवित्रा तृतीया विज्ञेया वितृष्णापि च या पुनः।<br>चतुर्थी ह्रादिनीत्युक्ता चन्द्रभा इति च स्मृता॥ ७२<br>विद्युच्च पञ्चमी प्रोक्ता शुक्ला चैव विभाव्यते।<br>पुण्ड्रा षष्ठी तु विज्ञेया पुनश्चैव विभावरी॥ ७३<br>महती सप्तमी प्रोक्ता पुनश्चैषा धृतिः स्मृता।<br>अन्यास्ताभ्योऽपि संजाताः शतशोऽथ सहस्रशः॥ ७४<br>अभिगच्छन्ति ता नद्यो यतो वर्षति वासवः।<br>इत्येष संनिवेशो वः कुशद्वीपस्य वर्णितः॥ ७५<br>शाकद्वीपेन विस्तारः प्रोक्तस्तस्य सनातनः।<br>कुशद्वीपः समुद्रेण घृतमण्डोदकेन च॥ ७६ | सम्पूर्ण धातुओंसे युक्त और अत्यन्त सुन्दर है। जो यह मंद धातु है, वह जलरूप अर्थको प्रकट करनेवाली है, अतः जलका विदारण करके निकलनेके कारण इस पर्वतको मन्दर कहा जाता है। उस पर्वतपर अनेकों प्रकारके रत्न पाये जाते हैं, जिनकी रक्षा प्रजापतिको साथ लेकर स्वयं इन्द्र करते हैं। साथ ही स्वयं इन्द्र वहाँकी प्रजाओंकी भी देख-भाल करते हैं। इनके अन्तर-विष्कम्भ पर्वत परिमाणमें दुगुने बतलाये जाते हैं। कुशद्वीपमें ये सात पर्वत कहे गये हैं। अब मैं इनके सात वर्षोंका विभागपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ। कुमुद पर्वतके वर्षका नाम श्वेत है। इसे उन्नत नामसे भी पुकारते हैं। उन्नत पर्वतका लोहित नामक वर्ष जानना चाहिये। इसे वेणुमण्डलक भी कहते हैं। बलाहक पर्वतका वर्ष जीमूत है, इसीका नाम स्वैरथाकार भी है॥५४-६६॥<br>द्रोणपर्वतके वर्षका नाम हरिक है, इसे लवण भी कहते हैं। कङ्क पर्वतका वर्ष ककुद् है, इसे धृतिमान् भी कहा जाता है। महिष पर्वतके वर्षका नाम महिष है, इसे प्रभाकर नामसे अभिहित किया जाता है। ककुद्मी पर्वतका जो वर्ष है, वह कपिल नामसे विख्यात है। कुशद्वीपमें ये सातों विशिष्ट वर्ष तथा सात पर्वत पृथक्-पृथक् हैं। अब उन वर्षोंकी नदियोंको सुनिये। वहाँ प्रत्येक वर्षमें नदियाँ भी सात ही बतलायी जाती हैं। वे सभी दो नामोंवाली तथा पुण्यसलिला हैं। उनमें पहली नदीका नाम धूतपापा है, उसे योनि भी कहते हैं। दूसरी नदीको सीता नामसे जानना चाहिये। वही निशा भी कही जाती है। पवित्राको तीसरी नदी समझना चाहिये। उसीका नाम वितृष्णा भी है। चौथी ह्लादिनी नामसे पुकारी जाती है, यही चन्द्रमा नामसे भी प्रसिद्ध है। पाँचवीं नदीको विद्युत् कहते हैं, यही शुक्ला नामसे भी अभिहित होती है। पुण्ड्राको छठी नदी जानना चाहिये, इसको विभावरी भी कहते हैं। सातवीं नदीका नाम महती है, यही धृति नामसे भी कही जाती है। इनके अतिरिक्त अन्य भी छोटी-बड़ी सैकड़ों-हजारों नदियाँ हैं, जो इन्हीं प्रमुख नदियोंमें जाकर मिली हैं। इन्हींसे जल ग्रहण करके इन्द्र यहाँ वर्षा करते हैं। इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे कुशद्वीपकी संस्थितिका वर्णन कर दिया तथा उसके शाकद्वीपसे दुगुने सनातन विस्तारको भी बतला दिया। यह महान् कुशद्वीप चारों ओरसे चन्द्रमाकी भाँति घृत और मट्ठेसे |
१२४- सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन
| * अध्याय १२२ * | ४२१ |
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| सर्वतः सुमहान् द्वीपश्चन्द्रवत् परिवेष्टितः ।<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव क्षीरोदाद् द्विगुणो मतः ॥ ७७ | भरे हुए सागरसे घिरा हुआ है। यह विस्तार एवं मण्डल (घेराव)-में क्षीरसागरसे दुगुना माना गया है॥ ६७-७७॥ | | ततः परं प्रवक्ष्यामि क्रौञ्चद्वीपं यथा तथा।<br>कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः ॥ ७८<br>घृतोदकः समुद्रो वै क्रौञ्चद्वीपेन संवृतः ।<br>चक्रनेमिप्रमाणेण वृतो वृत्तेन सर्वशः ॥ ७९<br>तस्मिन् द्वीपे नराः श्रेष्ठा देवनो गिरिरुच्यते ।<br>देवनात् परतश्चापि गोविन्दो नाम पर्वतः ॥ ८०<br>गोविन्दात् परतश्चापि क्रौञ्चस्तु प्रथमो गिरिः ।<br>क्रौञ्चात् परः पावनकः पावनादन्धकारकः ॥ ८१<br>अन्धकारात् परे चापि देवावृन्नाम पर्वतः ।<br>देवावृतः परेणापि पुण्डरीको महान् गिरिः ॥ ८२<br>एते रत्नमयाः सप्त क्रौञ्चद्वीपस्य पर्वताः ।<br>परस्परस्य द्विगुणो विष्कम्भो वर्षपर्वतः ॥ ८३<br>वर्षाणि तस्य वक्ष्यामि नामतस्तु निबोधत ।<br>क्रौञ्चस्य कुशलो देशो वामनस्य मनोऽनुगः ॥ ८४<br>मनोऽनुगात् परे चोष्णास्तृतीयोऽपि स उच्यते ।<br>उष्णात् परे पावनकः पावनादन्धकारकः ॥ ८५<br>अन्धकारकदेशात् तु मुनिदेशस्तथापरः ।<br>मुनिदेशात् परे चापि प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः ॥ ८६<br>सिद्धचारणसंकीर्णो गौरप्रायः शुचिर्जनः ।<br>श्रुतास्तत्रैव नद्यस्तु प्रतिवर्षं गताः शुभाः ॥ ८७<br>गौरी कुमुद्वती चैव संध्या रात्रिर्मनोजवा ।<br>ख्यातिश्च पुण्डरीका च गङ्गा सप्तविधा स्मृता ॥ ८८<br>तासां सहस्रशश्चान्या नद्यः पार्श्वसमीपगाः ।<br>अभिगच्छन्ति ता नद्यो बहुलाश्च बहूदकाः ॥ ८९<br>तेषां निसर्गो देशानामानुपूर्व्येण सर्वशः ।<br>न शक्यो विस्तराद् वक्तुमपि वर्षशतैरपि ॥ ९०<br>सर्गो यश्च प्रजानां तु संहारो यश्च तेषु वै । | इसके बाद अब मैं क्रौञ्चद्वीपका यथार्थरूपसे वर्णन कर रहा हूँ। इसका विस्तार कुशद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। चक्केकी भाँति गोलाकार उस क्रौञ्चद्वीपसे घृतसागर चारों ओरसे घिरा हुआ है। श्रेष्ठ ऋषियो! इस क्रौञ्चद्वीपमें देवन नामक पर्वत बतलाया जाता है। देवनके बाद गोविन्द नामक पर्वत है। गोविन्दके बाद क्रौञ्च नामक पहला पर्वत है। क्रौञ्चके बाद पावनक, पावनकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद देवावृत् नामक पर्वत है। देवावृत्के बाद पुण्डरीक नामक विशाल पर्वत है। क्रौञ्चद्वीपके ये सातों पर्वत रत्नमय हैं। इस द्वीपके वर्ष पर्वतके रूपमें स्थित विष्कम्भ पर्वत परस्पर एक-दूसरेसे दुगुने हैं। अब इस द्वीपके वर्षोंका नाम बतला रहा हूँ, सुनिये। क्रौञ्च पर्वतके प्रदेशका नाम कुशल है। वामन पर्वतका प्रदेश मनोऽनुग कहलाता है। मनोऽनुगके बाद तीसरा उष्ण प्रदेश कहा जाता है। उष्णके बाद पावनक, पावनकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद दूसरा मुनिदेश है। मुनिदेशके बाद दुन्दुभिस्वन नामक देश कहा जाता है। यह द्वीप सिद्धों एवं चारणोंसे व्याप्त है। यहाँके निवासी प्रायः गौर वर्णके एवं परम पवित्र होते हैं। इस द्वीपके प्रत्येक वर्षमें मङ्गलमयी नदियाँ भी प्रवाहित होती हैं, ऐसा सुना गया है। वहाँ गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति और पुण्डरीका—ये सात प्रकारकी गङ्गा बतलायी जाती हैं। इनके अगल-बगलमें बहनेवाली अगाध जलसे भरी हुई हजारों अन्य नदियाँ भी हैं, जो इन्हीं प्रमुख नदियोंमें आकर मिली हैं। उन पर्वतीय प्रदेशोंकी सर्वथा आनुपूर्वी स्वाभाविकी स्थितिका तथा वहाँकी प्रजाओंकी सृष्टि एवं संहारका विस्तारपूर्वक वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता ॥ ७८-९० १/२ ॥ | | अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि शाल्मलस्य निबोधत ॥ ९१<br>शाल्मलो द्विगुणो द्वीपः क्रौञ्चद्वीपस्य विस्तरात् ।<br>परिवार्य समुद्रं तु घृतमण्डोदकं स्थितः ॥ ९२ | इसके बाद मैं शाल्मलद्वीपका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। शाल्मलद्वीप क्रौञ्चद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। यह घृतमण्डोदसागरको घेरकर स्थित है। इसमें पुण्यमय जनपद हैं। वहाँके निवासी क्षमाशील एवं तेजस्वी होते |
| ४२२ | * मत्स्यपुराण * |
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| तत्र पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः।<br>कुत एव तु दुर्भिक्षं क्षमातेजोयुता हि ते॥ ९३ | हैं तथा दीर्घायुका उपभोग कर मृत्युको प्राप्त होते हैं। वहाँ अकालकी कोई सम्भावना ही नहीं है। वहाँ पहले | | प्रथमः सूर्यसङ्काशः सुमना नाम पर्वतः।<br>पीतस्तु मध्यमश्चासीत् ततः कुम्भमयो गिरिः॥ ९४ | पर्वतका नाम सुमना है, जो सूर्यके समान चमकीला होनेके कारण पीले रंगका है। उसके बाद दूसरा कुम्भमय नामक पर्वत है। उसका दूसरा नाम सर्वसुख | | नाम्ना सर्वसुखो नाम दिव्यौषधिसमन्वितः।<br>तृतीयश्चैव सौवर्णो भृङ्गपत्रनिभो गिरिः॥ ९५ | है। वह दिव्य ओषधियोंसे सम्पन्न है। तीसरा स्वर्णसम्पन्न एवं भ्रमरके पंखके समान रंगवाला रोहित नामक विशाल पर्वत है। यह पर्वतश्रेष्ठ दिव्य है। सुमना | | सुमहान् रोहितो नाम दिव्यो गिरिवरो हि सः।<br>सुमनाः कुशलो देशः सुखोदर्कः सुखोदयः॥ ९६ | पर्वतका देश कुशल एवं दूसरे सर्वसुख पर्वतका देश सुखोदय है, जो सभी सुखोंको उत्पन्न करनेवाला है। तीसरे रोहित पर्वतका प्रदेश रोहिण नामसे विख्यात है। | | रोहितो यस्तृतीयस्तु रोहिणो नाम विश्रुतः।<br>तत्र रत्नान्यनेकानि स्वयं रक्षति वासवः॥ ९७ | वहाँ अनेकों प्रकारके रत्नोंकी खानें हैं, जिनकी रक्षा प्रजापतिको साथ लेकर स्वयं इन्द्र करते हैं और वे ही | | प्रजापतिमुपादाय प्रसन्नो विदधत् स्वयम्।<br>न तत्र मेघा वर्षन्ति शीतोष्णं च न तद्विधम्॥ ९८ | प्रसन्नतापूर्वक वहाँकी प्रजाओंके लिये कार्यका विधान करते हैं। वहाँ न तो मेघ वर्षा करते हैं, न शीत एवं उष्णकी ही अधिकता रहती है। इन तीनों द्वीपोंमें | | वर्णाश्रमाणां वार्ता वा त्रिषु द्वीपेषु विद्यते।<br>न ग्रहो न च चन्द्रोऽस्ति ईर्ष्यासूया भयं तथा॥ ९९ | वर्णाश्रमकी चर्चा चलती रहती है। अर्थात् यहाँ वर्णाश्रमका पूर्णरूपसे प्रचार है। यहाँ न ग्रहगण हैं, न चन्द्रमा हैं और न यहाँके निवासियोंमें ईर्ष्या, असूया और भय ही | | उद्भिदान्युदकान्यत्र गिरिप्रस्रवणानि च।<br>भोजनं षड्रसं तत्र तेषां स्वयमुपस्थितम्॥ १०० | देखा जाता है। यहाँ पर्वतोंसे झरते हुए जल ही अन्नके उत्पादक हैं। वहाँके निवासियोंके लिये षट्-रसयुक्त भोजन स्वयं ही प्राप्त हो जाता है। उनमें न तो ऊँच- | | अधमोत्तमं न तेष्वस्ति न लोभो न परिग्रहः।<br>आरोग्यबलवन्तश्च एकान्तसुखिनो नराः॥ १०१ | नीचका भाव है, न लोभ है और न परिग्रह (दान लेनेकी प्रवृत्ति) ही है। वे नीरोग एवं बलवान् होते हैं तथा एकान्त सुखका उपभोग करते हैं। वे लोग तीस हजार वर्षतककी | | त्रिंशद्वर्षसहस्राणि मानसीं सिद्धिमास्थिताः।<br>सुखमायुश्च रूपं च धर्मैश्वर्यं तथैव च॥ १०२ | मानसी सिद्धिको प्राप्त होकर सुख, दीर्घायु, सुन्दर रूप, धर्म और ऐश्वर्यका उपभोग करते हुए जीवन-यापन करते हैं। कुश, क्रौञ्च और शाल्मल—इन तीनों द्वीपोंमें | | शाल्मलान्तेषु विज्ञेयं द्वीपेषु त्रिषु सर्वतः।<br>व्याख्यातः शाल्मलानां द्वीपानां तु विधिः शुभः॥ १०३ | यही स्थिति समझनी चाहिये। इस प्रकार मैं इन तीनों द्वीपोंकी शुभमयी विधिका विवरण बतला चुका। इस |
| * अध्याय १२३ * | ४२३ |
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| परिमण्डलस्तु द्वीपस्य चक्रवत् परिवेष्टितः ।<br>सुरोदेन समुद्रेण द्विगुणेन समन्वितः ॥ १०४ ॥ | शाल्मलद्वीपका मण्डल (घेरा) दुगुने परिमाणवाले सुरोदसागरसे चारों ओर चक्रकी भाँति गोलाकार घिरा हुआ है॥९१-१०४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे द्वीपवर्णनं नाम द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णन-प्रसङ्गमें द्वीप-वर्णन नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १२२ ॥
एक सौ तेईसवाँ अध्याय
गोमेदकद्वीप* और पुष्करद्वीपका वर्णन
| सूत उवाच | |
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| गोमेदकं प्रवक्ष्यामि षष्ठं द्वीपं तपोधनाः ।<br>सुरोदकसमुद्रस्तु गोमेदेन समावृतः ॥ १ | सूतजी कहते हैं—तपोधन ऋषियो! अब मैं छठे गोमेदक द्वीपका वर्णन कर रहा हूँ। गोमेदक द्वीपसे सुरोदकसागर घिरा हुआ है। इसका विस्तार शाल्मलद्वीपके विस्तारसे दुगुना है। उस द्वीपमें उच्च शिखरोंवाले दो पर्वत हैं—ऐसा जानना चाहिये। उनमें पहलेका नाम सुमना है। यह पर्वत अञ्जनके समान काले रंगसे सुशोभित है। दूसरा पर्वत कुमुद नामवाला है, जो सभी प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न, सुवर्णमय, शोभाशाली और वृक्षादिकी समृद्धियोंसे युक्त है। यह गोमेदक द्वीप छठे सुरोदसागरकी अपेक्षा दुगुने परिमाणवाले इक्षुरसोदसागरसे घिरा हुआ है। इसमें धातकी और कुमुद नामक दो अत्यन्त विस्तृत प्रदेश हैं, जो ‘हव्यपुत्र’ नामसे विख्यात हैं। सुमना पर्वतका जो प्रथम वर्ष है, उसीको धातकीखण्ड कहते हैं। यही धातकी नामक प्रथम पर्वतका प्रथम वर्ष कहलाता है। गोमेद नामसे जो वर्ष कहा गया है, उसीको सर्वसुख भी कहते हैं। इसके बाद दूसरे कुमुदपर्वतका प्रदेश भी कुमुद नामसे विख्यात है। ये दोनों पर्वत अन्य सभी पर्वतोंसे ऊँचे हैं। इस गोमेदक द्वीपके पूर्वभागमें सुमना नामक पर्वत स्थित है, जो पूर्वसे पश्चिम समुद्रतक फैला हुआ है। इसी प्रकार इस द्वीपके पश्चिमार्ध भागमें कुमुद नामक पर्वत स्थित है। इन पर्वतोंके चरण-प्रान्तोंसे वह देश दो भागोंमें विभक्त हो गया है। इस द्वीपका दक्षिणार्ध भाग धातकीखण्ड कहलाता है |
| शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणस्तस्य विस्तरः ।<br>तस्मिन् द्वीपे तु विज्ञेयौ पर्वतौ द्वौ समाहितौ ॥ २ | |
| प्रथमः सुमना नाम भात्यञ्जनमयो गिरिः ।<br>द्वितीयः कुमुदो नाम सर्वौषधिसमन्वितः ॥ ३ | |
| शातकौम्भमयः श्रीमान् विज्ञेयः सुमहाचितः ।<br>समुद्रेक्षुरसोदेन वृतो गोमेदकश्च सः ॥ ४ | |
| षष्ठेन तु समुद्रेण सुरोदाद् द्विगुणेन च ।<br>धातकी कुमुदश्चैव हव्यपुत्रौ सुविस्तृतौ ॥ ५ | |
| सौमनं प्रथमं वर्षं धातकीखण्डमुच्यते ।<br>धातकिनः स्मृतं तद् वै प्रथमं प्रथमस्य तु ॥ ६ | |
| गोमेदं यत्स्मृतं वर्षं नाम्ना सर्वसुखं तु तत् ।<br>कुमुदस्य द्वितीयस्य द्वितीयं कुमुदं ततः ॥ ७ | |
| एतौ द्वौ पर्वतौ वृत्तौ शेषौ सर्वसमुच्छ्रितौ ।<br>पूर्वेण तस्य द्वीपस्य सुमनाः पर्वतः स्थितः ॥ ८ | |
| प्राक्पश्चिमायतः पादैरासमुद्रादिति स्थितः ।<br>पश्चार्धं कुमुदस्तस्य एवमेव स्थितस्तु वै ॥ ९ | |
| एतैः पर्वतपादैस्तु स देशो वै द्विधा कृतः ।<br>दक्षिणार्धे तु द्वीपस्य धातकीखण्डमुच्यते ॥ १० |
* इस द्वीपका वर्णन प्रायः अन्य पुराणोंमें नहीं है। पर सिद्धान्तशिरोमणि गोलाध्याय ३। २५ आदिमें इसका वर्णन है। अन्य पुराणमें गोमेद प्लक्षद्वीपमें एक मर्यादा पर्वतमात्र है।