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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

४६४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथ दैवपरिव्ध्वस्ता दानवास्त्रिपुरालयाः।<br>हित्वा सत्यं च धर्मं च अकार्याण्युपचक्रमुः॥ ३९उनकी आँखें लाल हो गयीं। तदनन्तर दैव (भाग्य)-से परिच्युत हुए त्रिपुरनिवासी दानव सत्य और धर्मका परित्याग कर निन्द्य कर्मोंमें प्रवृत्त हो गये।
द्विषन्ति ब्राह्मणान् पुण्यान्न चार्चन्ति हि देवताः।<br>गुरुं चैव न मन्यन्ते ह्यन्योन्यं चापि चुक्रुधुः॥ ४०वे पवित्र ब्राह्मणोंसे द्वेष करने लगे। उन्होंने देवताओंकी अर्चना छोड़ दी। वे गुरुजनोंका मान नहीं करते थे और परस्पर क्रोधपूर्ण व्यवहार करने लगे।
कलहेषु च सज्जन्ते स्वधर्मेषु हसन्ति च।<br>परस्परं च निन्दन्ति अहमित्येव वादिनः॥ ४१वे कलहमें प्रवृत्त होकर अपने धर्मका उपहास करने लगे और 'मैं ही सब कुछ हूँ' ऐसा कहते हुए परस्पर एक-दूसरेकी निन्दा करने लगे।
उच्चैर्गुरून् प्रभाषन्ते नाभिभाषन्ति पूजिताः।<br>अकस्मात् साश्रुनयना जायन्ते च समुत्सुकाः॥ ४२वे गुरुजनोंसे कड़े शब्दोंमें बोलते थे। स्वयं सत्कृत होनेपर भी उन्होंने अपनेसे नीची कोटिवालोंसे बोलना भी छोड़ दिया। उनकी आँखोंमें अकस्मात् आँसू उमड़ आते थे और वे उत्कण्ठित-से जो जाते थे।
दधिसक्तून् पयश्चैव कपित्थानि च रात्रिषु।<br>भक्षयन्ति च शेरन्त उच्छिष्टाः संवृतास्तथा॥ ४३वे रातमें दही, सत्तू, दूध और कैथका फल खाने लगे। जूठे मुँह रहकर घिरे हुए स्थानमें शयन करने लगे।
मूत्रं कृत्वोपस्पृशन्ति चाकृत्वा पादधावनम्।<br>संविशन्ति च शय्यासु शौचाचारविवर्जिताः॥ ४४उनका शौचाचार ऐसा विनष्ट हो गया कि वे मूत्र-त्यागकर जलका स्पर्श तो करते, परंतु बिना पैर धोये ही बिछौनोंपर शयन करने लगे।
संकुचन्ति भयाच्चैव मार्जाराणां यथाऽऽखुकः।<br>भार्यां गत्वा न शुध्यन्ति रहोवृत्तिषु निस्त्रपाः॥ ४५वे अकस्मात् भयसे इस प्रकार संकुचित हो जाते थे, जैसे बिलावको देखकर चूहे हो जाते हैं। उन्होंने स्त्री-सहवासके बाद शरीरकी शुद्धि करना छोड़ दिया और गोपनीय कार्योंमें भी निर्लज्ज हो गये।
पुरा सुशीला भूत्वा च दुःशीलत्वमुपागताः।<br>देवांस्तपोधनांश्चैव बाधन्ते त्रिपुरालयाः॥ ४६वे त्रिपुरनिवासी दैत्य पहले सुशील थे, पर अब बड़े क्रूर हो गये तथा देवताओं और तपस्वियोंको कष्ट देने लगे।
मयेन वार्यमाणापि ते विनाशमुपस्थिताः।<br>विप्रियाण्येव विप्राणां कुर्वाणाः कलहैषिणः॥ ४७मयके मना करनेपर भी वे विनाशकी ओर बढ़ने लगे। उनके मनमें कलहकी इच्छा जाग उठी, जिससे वे ब्राह्मणोंका अपकार ही करते थे।
वैभ्राजं नन्दनं चैव तथा चैत्ररथं वनम्।<br>अशोकं च वराशोकं सर्वर्तुकमथापि च॥ ४८<br><br>स्वर्गं च देवतावासं पूर्वदेववशानुगाः।<br>विध्वंसयन्ति संक्रुद्धास्तपोधनवनानि च॥ ४९इस प्रकार जो पहले देवताओंके वशीभूत थे, वे दानवगण सम्प्रति त्रिपुरका आश्रय पानेसे संक्रुद्ध होकर वैभ्राजके नन्दन, चैत्ररथ, अशोक, वराशोक, सर्वर्तुक आदि वनों, देवताओंके निवास-स्थान स्वर्ग तथा तपस्वियोंके वनोंका विध्वंस करने लगे। उस समय देव-मन्दिर और आश्रम नष्ट कर दिये गये। देवताओं और ब्राह्मणोंके उपासक मार

१३४- देवताओंसहित शङ्करजीका त्रिपुरपर आक्रमण, त्रिपुरमें देवर्षि नारदका आगमन तथा युद्धार्थ असुरोंकी तैयारी

* अध्याय १३२ *४६५

| विध्वस्तदेवायतनाश्रमं च<br>सम्भग्नदेवद्विजपूजकं तु।<br>जगद्वभूवामरराजदुष्टै-<br>रभिद्रुतं सस्यमिवालिवृन्दैः॥ ५०॥ | डाले गये। इस प्रकार देवराज इन्द्रके शत्रुओंद्वारा विध्वस्त किया हुआ जगत् ऐसा लगने लगा, जैसे टिड्डीदलोंद्वारा नष्ट की हुई अन्नकी फसल हो॥ ३७—५०॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने दुःस्वप्नदर्शनं नामैकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें दुःस्वप्न-दर्शन नामक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३१॥


एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय

त्रिपुरवासी दैत्योंका अत्याचार, देवताओंका ब्रह्माकी शरणमें जाना और ब्रह्मासहित शिवजीके पास जाकर उनकी स्तुति करना

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
अशीलेषु प्रदुष्टेषु दानवेषु दुरात्मसु।<br>लोकेषूत्साद्यमानेषु तपोधनवनेषु च॥ १॥<br><br>सिंहनादे व्योमगानां तेषु भीतेषु जन्तुषु।<br>त्रैलोक्ये भयसम्मूढे तमोऽन्धत्वमुपागते॥ २॥<br><br>आदित्या वसवः साध्याः पितरो मरुतां गणाः।<br>भीताः शरणमाजग्मुर्ब्रह्माणं प्रपितामहम्॥ ३॥<br><br>ते तं स्वर्णोत्पलासीनं ब्रह्माणं समुपागताः।<br>नेमुरूचुश्च सहिताः पञ्चास्यं चतुराननम्॥ ४॥<br><br>वरगुप्तास्तवैवेह दानवास्त्रिपुरालयाः।<br>बाधन्तेऽस्मान् यथा प्रेष्याननुशाधि ततोऽनघ॥ ५॥<br><br>मेघागमे यथा हंसा मृगाः सिंहभयादिव।<br>दानवानां भयात् तद्वद् भ्रमामो हि पितामह॥ ६॥<br><br>पुत्राणां नामधेयानि कलत्राणां तथैव च।<br>दानवैर्भ्राम्यमाणानां विस्मृतानि ततोऽनघ॥ ७॥<br><br>देववेश्मप्रभङ्गाश्च आश्रमभ्रंशनानि च।<br>दानवैर्लोभमोहान्धैः क्रियन्ते च भ्रमन्ति च॥ ८॥ऋषियो! त्रिपुरनिवासी दानवोंका शील तो भ्रष्ट ही हो गया था, उनमें दुष्टता भी कूट-कूटकर भर गयी थी। उन दुरात्माओंने लोकों एवं तपोवनोंका विनाश करना आरम्भ किया। वे आकाशमें जाकर सिंहनाद करते, जिसे सुनकर सारे जीव-जन्तु भयभीत हो जाते थे। इस प्रकार जब सारी त्रिलोकी भयके कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी और सर्वत्र अन्धकार-सा छा गया, तब भयसे डरे हुए आदित्य, वसु, साध्य, पितृ-गण और मरुद्गण—ये सभी संगठित होकर प्रपितामह ब्रह्माकी शरणमें पहुँचे। वहाँ पञ्चमुख ब्रह्मा स्वर्णमय कमलासनपर आसीन थे। ये देवगण उनके निकट जाकर उन्हें नमस्कार कर (दानवोंके अत्याचारका) वर्णन करने लगे—'निष्पाप पितामह! त्रिपुरनिवासी दानव आपके ही वरदानसे सुरक्षित होकर हमलोगोंको सेवकोंकी तरह कष्ट दे रहे हैं, अतः आप उन्हें मना कीजिये। पितामह! जैसे बादलोंके उमड़नेपर हंस और सिंहकी दहाड़से मृग भयभीत होकर भागने लगते हैं, उसी प्रकार दानवोंके भयसे हमलोग इधर-उधर लुक-छिप रहे हैं। पापरहित ब्रह्मन्! यहाँतक कि दानवोंद्वारा खदेड़े जानेके कारण हमलोगोंको अपने पुत्रों तथा पत्नियोंके नामतक भूल गये हैं। लोभ एवं मोहसे अंधे हुए दानवगण देवताओंके निवासस्थानोंको तोड़ते-फोड़ते तथा ऋषियोंके आश्रमोंको विध्वस्त करते हुए
४६६* मत्स्यपुराण *

| यदि न त्रायसे लोकं दानवैर्विद्रुतं द्रुतम्।<br>धर्षेणानेन निर्देवं निर्मनुष्याश्रमं जगत्॥ ९<br>इत्येवं त्रिदशैरुक्तः पद्मयोनिः पितामहः।<br>प्रत्याह त्रिदशान् सेन्द्रानिन्दुत्तुल्याननः प्रभुः॥ १०<br>मयस्य यो वरो दत्तो मया मतिमतां वराः।<br>तस्यान्त एष सम्प्राप्तो यः पुरोक्तो मया सुराः॥ ११<br>तच्च तेषामधिष्ठानं त्रिपुरं त्रिदशर्षभाः।<br>एकेषुपातमोक्षेण हन्तव्यं नेषुवृष्टिभिः॥ १२<br>भवतां च न पश्यामि कमप्यत्र सुरर्षभाः।<br>यस्तु चैकप्रहारेण पुरं हन्यात् सदानवम्॥ १३<br>त्रिपुरं नाल्पवीर्येण शक्यं हन्तुं शरेण तु।<br>एकं मुक्त्वा महादेवं महेशानं प्रजापतिम्॥ १४<br>ते यूयं यदि अन्ये च क्रतुविध्वंसकं हरम्।<br>याचामः सहिता देवं त्रिपुरं स हनिष्यति॥ १५<br>कृतः पुराणां विष्कम्भो योजनानां शतं शतम्।<br>यथा चैकप्रहारेण हन्यते वै भवेन तु।<br>पुष्ययोगेन युक्तानि तानि चैकक्षणेन तु॥ १६<br>ततो देवैश्च सम्प्रोक्तो यास्याम इति दुःखितैः।<br>पितामहश्च तैः सार्धं भवसंसदमागतः॥ १७<br>तं भवं भूतभव्येशं गिरिशं शूलपाणिनम्।<br>पश्यन्ति चोमया सार्धं नन्दिना च महात्मना॥ १८<br>अग्निवर्णमजं देवमग्निकुण्डनिभेक्षणम्।<br>अग्न्यादित्यसहस्राभमग्निवर्णविभूषितम् ॥ १९<br>चन्द्रावयवलक्ष्माणं चन्द्रसौम्यतराननम्।<br>आगम्य तमजं देवमथ तं नीललोहितम्॥ २०<br>स्तुवन्तो वरदं शम्भुं गोपतिं पार्वतीपतिम्॥ २१ | घूम रहे हैं। यदि आप शीघ्र ही दानवोंद्वारा विध्वंस किये जाते हुए लोककी रक्षा नहीं करेंगे तो सारा जगत् देवता, मनुष्य और आश्रमसे रहित हो जायगा'॥ १—९॥<br>जब देवताओंने पद्मयोनि ब्रह्मासे इस प्रकार निवेदन किया, तब चन्द्रमाके समान गौरवर्ण मुखवाले सामर्थ्यशाली ब्रह्माने इन्द्रादि देवताओंसे कहा—'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ देवगण! मैंने मयको जो वर दिया था, उसका यह अन्त समय आ पहुँचा है, जिसे मैंने पहले ही उन लोगोंसे कह दिया था। श्रेष्ठ देवताओ! उनका निवासस्थान वह त्रिपुर तो एक ही बाणके प्रहारसे नष्ट हो जानेवाला है। उसपर बाण-वृष्टिकी आवश्यकता नहीं है, किंतु श्रेष्ठ देवगण! मैं यहाँ तुमलोगोंमेंसे किसीको भी ऐसा नहीं देख रहा हूँ, जो एक ही बाणके आघातसे दानवोंसहित त्रिपुरको नष्ट कर सके। देवाधिदेव प्रजापति शङ्करके अतिरिक्त अन्य कोई अल्प पराक्रमी वीर एक ही बाणसे त्रिपुरका विनाश नहीं कर सकता। इसलिये यदि तुमलोग तथा अन्यान्य देवगण भी एक साथ होकर दक्ष-यज्ञके विध्वंसक भगवान् शङ्करके पास चलकर उनसे याचना करें तो वे त्रिपुरका विनाश कर देंगे। इन पुरोंका विष्कम्भ सौ-सौ योजनोंका बना हुआ है, अतः पुष्य नक्षत्रके योगमें जब ये तीनों एक साथ सम्मिलित होंगे, उसी क्षण भगवान् शङ्कर एक ही बाणके आघातसे इसका विध्वंस कर सकते हैं।' यह सुनकर दुःखित देवताओंने कहा कि 'हमलोग चलेंगे।' तब ब्रह्मा उन्हें साथ लेकर शङ्करजीकी सभामें आये। वहाँ उन्होंने देखा कि भूत एवं भविष्यके स्वामी तथा गिरिपर शयन करनेवाले त्रिशूलपाणि शङ्कर पार्वतीदेवी तथा महात्मा नन्दीके साथ विराजमान हैं। उन अजन्मा महादेवके शरीरका वर्ण अग्निके समान उद्दीप्त था। उनके नेत्र अग्निकुण्डके सदृश लाल थे। उनके शरीरसे सहस्रों अग्नियों और सूर्योंके समान प्रभा छिटक रही थी। वे अग्निके-से रंगवाली विभूतिसे विभूषित थे। उनके ललाटपर बालचन्द्र शोभा पा रहा था और मुख (पूर्णिमाके) चन्द्रमासे भी अधिक सुन्दर दीख रहा था। तब देवगण उन अजन्मा नीललोहित महादेवके निकट गये और पशुपति, पार्वती-प्राणवल्लभ, वरदायक शम्भुकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—॥ १०—२१॥ |

* अध्याय १३२ * ४६७


देवा ऊचुःदेवताओंने कहा—
नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च।<br>पशूनां पतये नित्यमुग्राय च कपर्दिने॥ २२<br><br>महादेवाय भीमाय त्र्यम्बकाय च शान्तये।<br>ईशानाय भयघ्नाय नमस्त्वन्धकघातिने॥ २३<br><br>नीलग्रीवाय भीमाय वेधसे वेधसा स्तुते।<br>कुमारशत्रुनिघ्नाय कुमारजनकाय च॥ २४<br><br>विलोहिताय धूम्राय वराय क्रथनाय च।<br>नित्यं नीलशिखण्डाय शूलिने दिव्यशायिने॥ २५<br><br>उरगाय त्रिनेत्राय हिरण्यवसुरेतसे।<br>अचिन्त्यायाम्बिकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुताय च॥ २६<br><br>वृषध्वजाय मुण्डाय जटिने ब्रह्मचारिणे।<br>तप्यमानाय सलिले ब्रह्मण्यायाजिताय च॥ २७<br><br>विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते।<br>नमोऽस्तु दिव्यरूपाय प्रभवे दिव्यशम्भवे॥ २८<br><br>अभिगम्याय काम्याय स्तुत्यायार्च्याय सर्वदा।<br>भक्तानुकम्पिने नित्यं दिशते यन्मनोगतम्॥ २९भगवन्! आप भव—सृष्टिके उत्पादक और पालक, शर्व—प्रलयकालमें सबके संहारक, रुद्र—समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप, वरद—वरप्रदाता, पशुपति*—समस्त जीवोंके स्वामी, उग्र—बहुत ऊँचे, एकादश रुद्रोंमेंसे एक और कपर्दी—जटाजूटधारी हैं, आपको नमस्कार है। आप महादेव—देवताओंके भी पूज्य, भीम—भयंकर, त्र्यम्बक—त्रिनेत्रधारी, एकादश रुद्रोंमें अन्यतम, शान्त—शान्तस्वरूप, ईशान—नियन्ता, भयघ्न—भयके विनाशक और अन्धकघाती—अन्धकासुरके वधकर्ताको प्रणाम है। नीलग्रीव—ग्रीवामें नील चिह्न धारण करनेवाले, भीम—भयदायक, वेधाः—ब्रह्मस्वरूप, वेधसा स्तुतः—ब्रह्माजीके द्वारा स्तुत, कुमारशत्रुनिघ्न—कुमार कार्तिकेयके शत्रुओंको मारनेवाले, कुमारजनक—स्वामी कार्तिकेयके पिता, विलोहित—लाल रंगवाले, धूम्र—धूम्रवर्ण, वर—जगत्‌को ढकनेवाले, क्रथन—प्रलयकारी, नीलशिखण्ड—नीली जटावाले, शूली—त्रिशूलधारी, दिव्यशायी—दिव्य समाधिमें लीन रहनेवाले, उरग—सर्पधारी, त्रिनेत्र—तीन नेत्रोंवाले, हिरण्यवसुरेता—सुवर्ण आदि धनके उद्गम-स्थान, अचिन्त्य—अतर्क्य, अम्बिकाभर्ता—पार्वतीपति, सर्वदेवस्तुत—सम्पूर्ण देवोंद्वारा स्तुत, वृषध्वज—बैल-चिह्नसे युक्त ध्वजावाले, मुण्ड—मुण्डधारी, जटी—जटाधारी, ब्रह्मचारी—ब्रह्मचर्यसम्पन्न, सलिले तप्यमान—जलमें तपस्या करनेवाले, ब्रह्मण्य—ब्राह्मण-भक्त, अजित—अजेय, विश्वात्मा—विश्वके आत्मस्वरूप, विश्वसृक्—विश्वके स्रष्टा, विश्वमावृत्य तिष्ठते—संसारमें व्याप्त रहनेवाले, दिव्यरूप—दिव्यरूपवाले, प्रभु—सामर्थ्यशाली, दिव्यशम्भु—अत्यन्त मङ्गलमय, अभिगम्य—शरण लेने योग्य, काम्य—अत्यन्त सुन्दर, स्तुत्य—स्तवन करनेयोग्य, सर्वदा अर्च्य—सदा पूजनीय, भक्तानुकम्पी—भक्तोंपर दया करनेवाले और यन्मनोगतं नित्यं दिशते—मनकी अभिलाषा पूर्ण करनेवालेको अभिवादन है॥ २२—२९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे ब्रह्मादिसर्वदेवकृतमहेश्वरस्तवो नाम द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाह-प्रसङ्गमें ब्रह्मादि-सर्वदेवकृत महेश्वरस्तव नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३२॥


* पाशुपत—शैवागमानुसार जीवमात्र पाशबद्ध होनेसे पशु और पाशयुक्त शिव पशुपति कहे गये हैं।

१३५- शङ्करजीकी आज्ञासे इन्द्रका त्रिपुरपर आक्रमण, दोनों सेनाओंमें भीषण संग्राम, विद्युन्मालीका वध, देवताओंकी विजय और दानवोंका युद्धविमुख होकर त्रिपुरमें प्रवेश

४६८ * मत्स्यपुराण *


एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय

त्रिपुर-विध्वंसार्थ शिवजीके विचित्र रथका निर्माण और देवताओंके साथ उनका युद्धके लिये प्रस्थान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>ब्रह्माद्यैः स्तूयमानस्तु देवैर्देवो महेश्वरः।<br>प्रजापतिमुवाचेदं देवानां क्व भयं महत्॥ १सूतजी कहते हैं— ऋषियो! ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर देवाधिदेव महेश्वरने प्रजापति ब्रह्मासे यह कहा—'अरे! आप देवताओंको यह महान् भय कहाँसे आया?
भो देवाः स्वागतं वोऽस्तु ब्रूत यद् वो मनोगतम्।<br>तावदेव प्रयच्छामि नास्त्यदेयं मया हि वः॥ २देवगण! आपलोगोंका स्वागत है। आपलोगोंके मनमें जो अभिलाषा हो, उसे कहिये। मैं उसे अवश्य प्रदान करूँगा; क्योंकि आपलोगोंके लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।
युष्माकं नितरां शं वै कर्ताहं विबुधर्षभाः।<br>चरामि महदत्युग्रं यच्चापि परमं तपः॥ ३श्रेष्ठ देवगण! मैं सदा आपलोगोंका कल्याण ही करता रहता हूँ। यहाँतक कि जो महान्, अत्यन्त उग्र एवं घोर तप करता हूँ, वह भी आपलोगोंके लिये ही करता हूँ।
विद्विष्टा वो मम द्विष्ठाः कष्टाः कष्टपराक्रमाः।<br>तेषामभावः सम्पाद्यो युष्माकं भव एव च॥ ४जो आपलोगोंसे विद्वेष करते हैं, वे मेरे भी घोर शत्रु हैं। इसलिये जो आपलोगोंको कष्ट देनेवाले हैं, वे कितने ही घोर पराक्रमी क्यों न हों, मुझे उनका अन्त और आपका श्रेयःसम्पादन करना है।'
एवमुक्तास्तु देवेन प्रेम्णा सब्रह्मकाः सुराः।<br>रुद्रमाहुर्महाभागं भागार्हाः सर्व एव ते॥ ५महादेवजीद्वारा प्रेमपूर्वक इस प्रकार कहे जानेपर ब्रह्मसहित समस्त भाग्यशाली देवताओंने महाभाग शङ्करजीसे कहा—
भगवंस्तैस्तपस्तप्तं रौद्रं रौद्रपराक्रमैः।<br>असुरैर्वध्यमानाः स्म वयं त्वां शरणं गताः॥ ६'भगवन्! भयंकर पराक्रमी उन असुरोंने अत्यन्त भीषण तप किया है, जिसके प्रभावसे वे हमें कष्ट दे रहे हैं। इसलिये हमलोग आपकी शरणमें आये हैं।
मयो नाम दितेः पुत्रस्त्रिनेत्र कलहप्रियः।<br>त्रिपुरं येन तद्दुर्गं कृतं पाण्डुरगोपुरम्॥ ७त्रिलोचन! (आप तो जानते ही हैं) दितिका पुत्र मय स्वभावतः कलहप्रिय है। उसने ही पीले रंगके फाटकवाले उस त्रिपुर नामक दुर्गका निर्माण किया है।
तदाश्रित्य पुरं दुर्गं दानवा वरनिर्भयाः।<br>बाधन्तेऽस्मान् महादेव प्रेष्यमस्वामिनं यथा॥ ८उस त्रिपुरदुर्गका आश्रय लेकर दानव वरदानके प्रभावसे निर्भय हो गये हैं। महादेव! वे हमलोगोंको इस प्रकार कष्ट दे रहे हैं, मानो अनाथ नौकर हों।
उद्यानानि च भग्नानि नन्दनादीनि यानि च।<br>वराश्चाप्सरसः सर्वा रम्भाद्या दनुजैर्हृताः॥ ९उन दानवोंने नन्दन आदि जितने उद्यान थे, उन सबको विनष्ट कर दिया तथा रम्भा आदि सभी श्रेष्ठ अप्सराओंका अपहरण कर लिया।
इन्द्रस्य वाह्याश्च गजाः कुमुदाञ्जनवामनाः।<br>ऐरावताद्यापहृता देवतानां महेश्वर॥ १०महेश्वर! वे इन्द्रके वाहन तथा दिशागज कुमुद, अञ्जन, वामन और ऐरावत आदि गजेन्द्रोंको भी छीन ले गये।
ये चेन्द्ररथमुख्याश्च हरयोऽपहृतासुरैः।<br>जाताश्च दानवानां ते रथयोग्यास्तुरङ्गमाः॥ ११इन्द्रके रथमें जुतनेवाले जो मुख्य अश्व थे, उन्हें भी वे असुर हरण कर ले गये और अब वे घोड़े दानवोंके रथमें जोते जाते हैं।
* अध्याय १३३ *४६९
ये रथा ये गजाश्चैव याः स्त्रियो वसु यच्च नः।<br>तन्नो व्यपहृतं दैत्यैः संशयो जीविते पुनः॥ १२(कहाँतक कहें) हमलोगोंके पास जितने रथ, जितने हाथी, जितनी स्त्रियाँ और जो कुछ भी धन था, हमारा वह सब दैत्योंने अपहरण कर लिया है और अब हमलोगोंके जीवनमें भी सन्देह उत्पन्न हो गया हैं'॥ १-१२॥
त्रिनेत्र एवमुक्तस्तु देवैः शक्रपुरोगमैः।<br>उवाच देवान् देवेशो वरदो वृषवाहनः॥ १३<br>व्यपगच्छतु वो देवा महत् दानवजं भयम्।<br>तदहं त्रिपुरं धक्ष्ये क्रियतां यद् ब्रवीमि तत्॥ १४<br>यदीच्छथ मया दग्धुं तत्पुरं सहदानवम्।<br>रथमौपयिकं मह्यं सज्जध्वं किमास्यते॥ १५<br>दिग्वाससा तथोक्तास्ते सपितामहकाः सुराः।<br>तथेत्युक्त्वा महादेवं चक्रुस्ते रथमुत्तमम्॥ १६<br>धरां कूबरकौ द्वौ तु रुद्रपार्श्वचरावुभौ।<br>अधिष्ठानं शिरो मेरोरक्षो मन्दर एव च॥ १७<br>चक्रुश्चन्द्रं च सूर्यं च चक्रं काञ्चनराजते।<br>कृष्णपक्षं शुक्लपक्षं पक्षद्वयमपीश्वराः॥ १८<br>रथनेमिद्वयं चक्रुर्देवा ब्रह्मपुरःसराः।<br>आदित्यं पक्षयन्त्रं यन्त्रमेताश्च देवताः॥ १९<br>कम्बलाश्वतराभ्यां च नागाभ्यां समवेष्टितम्।<br>भार्गवश्चाङ्गिराश्चैव बुधोऽङ्गारक एव च॥ २०<br>शनैश्चरस्तथा चात्र सर्वे ते देवसत्तमाः।<br>वरूथं गगनं चक्रुश्चारुरूपं रथस्य ते॥ २१<br>कृतं द्विजिह्ननयनं त्रिवेणुं शातकौम्भिकम्।<br>मणिमुक्तेन्द्रनीलैश्च वृतं ह्यष्टमुखैः सुरैः॥ २२इन्द्र आदि देवताओं द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर त्रिनेत्रधारी, वरदायक, वृषवाहन, देवेश्वर शङ्करने देवताओंसे कहा—'देवगण! अब आपलोगोंका दानवोंसे उत्पन्न हुआ महान् भय दूर हो जाना चाहिये। मैं उस त्रिपुरको जला डालूँगा, किंतु मैं जो कह रहा हूँ, वैसा उपाय कीजिये। यदि आपलोग मेरे द्वारा दानवोंसहित उस त्रिपुरको जला देनेकी इच्छा रखते हैं तो मेरे लिये समस्त साधनोंसे सम्पन्न एक रथ सुसज्जित कीजिये। अब देर मत कीजिये।' दिग्वासा शङ्करजीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ब्रह्मासहित उन देवताओंने महादेवजीसे 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। फिर तो वे एक उत्तम रथका निर्माण करनेमें लग गये। उन्होंने पृथ्वीको रथ, रुद्रके दो पार्श्वचरोंको, दोनों कूबर मेरुको रथका शिरः-स्थान और मन्दरको धुरा बनाया। सूर्य और चन्द्रमा रथके सोने-चाँदीके दोनों पहिये बनाये गये। ब्रह्मा आदि ऐश्वर्यशाली देवोंने शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष—दोनोंसे रथकी दोनों नेमियाँ बनायीं। देवताओंने कम्बल और अश्वतर नामक नागोंसे परिवेष्टित कर दोनों बगलके पक्ष-यन्त्र बनाये। शुक्र, बृहस्पति, बुध, मङ्गल तथा शनैश्चर ये—सभी देवश्रेष्ठ उसपर विराजित हुए। उन देवताओंने गगन-मण्डलको रथका सौन्दर्यशाली वरूथ बनाया। सर्पोंके नेत्रोंसे उसका त्रिवेणु बनाया गया, जो सुवर्ण-सा चमक रहा था। वह मणि, मुक्ता और इन्द्रनील मणिके समान आठ प्रधान देवताओंसे घिरा था॥ १३-२२॥
गङ्गा सिन्धुः शतद्रुश्च चन्द्रभागा इरावती।<br>वितस्ता च विपाशा च यमुना गण्डकी तथा॥ २३<br>सरस्वती देविका च तथा च सरयूरपि।<br>एताः सरिद्वराः सर्वा वेणुसंज्ञा कृता रथे॥ २४<br>धृतराष्ट्राश्च ये नागास्ते च रश्म्यात्मकाः कृताः।<br>वासुकेः कुलजा ये च ये च रैवतवंशजाः॥ २५<br>ते सर्पा दर्पसम्पूर्णाश्चापतूणेष्वनूगनाः।<br>अवतस्थुः शरा भूत्वा नानाजातिशुभाननाः॥ २६गङ्गा, सिन्धु, शतद्रु, चन्द्रभागा, इरावती, वितस्ता, विपाशा, यमुना, गण्डकी, सरस्वती, देविका तथा सरयू—इन सभी श्रेष्ठ नदियोंको उस रथमें वेणुस्थानपर नियुक्त किया गया। धृतराष्ट्रके वंशमें उत्पन्न होनेवाले जो नाग थे, वे बाँधनेके लिये रस्सी बने हुए थे। जो वासुकि और रैवतके वंशमें उत्पन्न होनेवाले नाग थे, वे सभी दर्पसे पूर्ण और शीघ्रगामी होनेके कारण नाना प्रकारके सुन्दर मुखवाले बाण बनकर धनुषके तरकसोंमें अवस्थित हुए।

४७० * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुरसा सरमा कद्रूर्विनता शुचिरेव च।<br>तृषा बुभुक्षा सर्वोग्रा मृत्युः सर्वशमस्तथा॥ २७<br><br>ब्रह्मवध्या च गोवध्या बालवध्या प्रजाभयाः।<br>गदा भूत्वा शक्तयश्च तदा देवरथेऽभ्ययुः॥ २८<br><br>युगं कृतयुगं चात्र चातुर्होत्रप्रयोजकाः।<br>चतुर्वर्णाः सलीलाश्च बभूवुः स्वर्णकुण्डलाः॥ २९<br><br>तद्युगं युगसंकाशं रथशीर्षे प्रतिष्ठितम्।<br>धृतराष्ट्रेण नागेन बद्धं बलवता महत्॥ ३०<br><br>ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदस्तथापरः।<br>वेदाश्चत्वार एवैते चत्वारस्तुरगाऽभवन्॥ ३१<br><br>अन्नदानपुरोगाणि यानि दानानि कानिचित्।<br>तान्यासन् वाजिनां तेषां भूषणानि सहस्रशः॥ ३२<br><br>पद्मद्वयं तक्षकश्च कर्कोटकधनञ्जयौ।<br>नागा बभूवुरेवैते हयानां वालबन्धनाः॥ ३३<br><br>ओङ्कारप्रभवास्ता वा मन्त्रयज्ञक्रतुक्रियाः।<br>उपद्रवाः प्रतीकाराः पशुबन्धेष्टयस्तथा॥ ३४<br><br>यज्ञोपवाहान्येतानि तस्मिँल्लोकरथे शुभे।<br>मणिमुक्ताप्रवालैस्तु भूषितानि सहस्रशः॥ ३५<br><br>प्रतोदोङ्कार एवासीत्तदग्रं च वषट्कृतम्।<br>सिनीवाली कुहू राका तथा चानुमतिः शुभा॥ ३६<br><br>योक्त्राण्यासंस्तुरङ्गाणामपसर्पणविग्रहाः ॥ ३७<br><br>कृष्णान्यथ च पीतानि श्वेतमाञ्जिष्ठकानि च।<br>अवदाताः पताकास्तु बभूवुः पवनेरिताः॥ ३८<br><br>ऋतुभिश्च कृतः षड्भिर्धनुः संवत्सरोऽभवत्।<br>अजरा ज्याभवच्चापि साम्बिका धनुषो दृढा ॥ ३९<br><br>कालो हि भगवान् रुद्रस्तं च संवत्सरं विदुः।<br>तस्मादुमा कालरात्रिर्धनुषो ज्याजराभवत्॥ ४०<br><br>सगर्भं त्रिपुरं येन दग्धवान् स त्रिलोचनः।<br>स इषुविष्णुसोमाग्नित्रिदैवतमयोऽभवत्॥ ४१<br><br>आननं ह्यग्निरभवच्छल्यं सोमस्तमोनुदः।<br>तेजसः समवायोऽथ चेषोस्तेजो रथाङ्गधृक्॥ ४२<br><br>तस्मिंश्च वीर्यवृद्ध्यर्थं वासुकिर्नागपार्थिवः।<br>तेजः संवसनार्थं वै मुमोचातिविषो विषम्॥ ४३सबसे उग्र स्वभाववाली सुरसा, देवशुनी, सरमा, कद्रू, विनता, शुचि, तृषा, बुभुक्षा तथा सबका शमन करनेवाली मृत्यु, ब्रह्महत्या, गोहत्या, बालहत्या और प्रजाभय—ये सभी उस समय गदा और शक्तिका रूप धारण कर उस देवरथमें उपस्थित हुईं। कृतयुगका जूआ बनाया गया। चातुर्होत्र यज्ञके प्रयोजक लीलासहित चारों वर्ण स्वर्णमय कुण्डल हुए। उस युग-सदृश जूएको रथके शीर्षस्थानपर रखा गया और उसे बलवान् धृतराष्ट्र नागद्वारा कसकर बाँध दिया गया। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद—ये चारों वेद चार घोड़े हुए। अन्नदान आदि जितने प्रमुख दान हैं, वे सभी उन घोड़ोंके हजारों प्रकारके आभूषण बने। पद्मद्वय, तक्षक, कर्कोटक, धनञ्जय—ये नाग उन घोड़ोंके बाल बाँधनेके लिये रस्सी हुए। ओंकारसे उत्पन्न होनेवाली मन्त्र, यज्ञ और क्रतूरूप क्रियाएँ, उपद्रव, उनकी शान्तिके लिये प्रायश्चित्त, पशुबन्ध आदि इष्टियाँ, यज्ञोपवीत आदि संस्कार—ये सभी उस सुन्दर लोकरथमें शोभा-वृद्धिके लिये मणि, मुक्ता और मूँगेके रूपमें उपस्थित हुए। ओंकारका चाबुक बना और वषट्कार उसका अग्रभाग हुआ। सिनीवाली (चतुर्दशीय अमा), कुहू (अमावास्याकी अधिष्ठात्री देवी), राका (शुद्ध पूर्णिमा तिथि) तथा शुभदायिनी अनुमति (प्रतिपद्युक्ता पूर्णिमा)—ये सभी घोड़ोंको रथमें जोतनेके लिये रस्सियाँ और बागडोर बनीं। उसमें काले, पीले, श्वेत और लाल रंगकी निर्मल पताकाएँ लगी थीं, जो वायुके वेगसे फहरा रही थीं। छहों ऋतुओंसहित संवत्सरका धनुष बनाया गया। अम्बिकादेवी उस धनुषकी कभी जीर्ण न होनेवाली सुदृढ़ प्रत्यञ्चा हुईं। भगवान् रुद्र कालस्वरूप हैं। उन्हींको संवत्सर कहा जाता है, इसी कारण अम्बिकादेवी कालरात्रिरूपसे उस धनुषकी कभी न कटनेवाली प्रत्यञ्चा बनीं। त्रिलोचन भगवान् शङ्कर जिस बाणसे अन्तर्भागसहित त्रिपुरको जलानेवाले थे, वह श्रेष्ठ बाण विष्णु, सोम, अग्नि—इन तीनों देवताओंके संयुक्त तेजसे निर्मित हुआ था। उस बाणका मुख अग्नि और फाल अन्धकारविनाशक चन्द्रमा थे। चक्रधारी विष्णुका तेज समूचे बाणमें व्याप्त था। इस प्रकार वह बाण तेजका समन्वित रूप था। उस बाणपर नागराज वासुकिने उसके पराक्रमकी वृद्धि एवं तेजकी स्थिरताके लिये अत्यन्त उग्र विष उगल दिया था॥ २३—४३॥
* अध्याय १३३ *४७१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कृत्वा देवा रथं चापि दिव्यं दिव्यप्रभावतः।<br>लोकाधिपतिमभ्येत्य इदं वचनमब्रुवन्॥ ४४<br><br>संस्कृतोऽयं रथोऽस्माभिस्तव दानवशत्रुजित्।<br>इदमापत्यरित्राणं देवान् सेन्द्रपुरोगमान्॥ ४५<br><br>तं मेरुशिखराकारं त्रैलोक्यरथमुत्तमम्।<br>प्रशस्य देवान् साध्विति रथं पश्यति शङ्करः॥ ४६<br><br>मुहुर्दृष्ट्वा रथं साधु साध्वित्युक्त्वा मुहुर्मुहुः।<br>उवाच सेन्द्रानमरानमराधिपतिः स्वयंम्॥ ४७<br><br>यादृशोऽयं रथः कॢप्तो युष्माभिर्मम सत्तमाः।<br>ईदृशो रथसम्पत्त्या यन्ता शीघ्रं विधीयताम्॥ ४८<br><br>इत्युक्ता देवदेवेन देवा विद्धा इवेषुभिः।<br>अवापुर्महतीं चिन्तां कथं कार्यमिति ब्रुवन्॥ ४९<br><br>महादेवस्य देवोऽन्यः को नाम सदृशो भवेत्।<br>मुक्त्वा चक्रायुधं देवं सोऽप्यस्येषु समाश्रितः॥ ५०<br><br>धुरि युक्ता इवोक्षाणो घटन्त इव पर्वतैः।<br>निःश्वसन्तः सुराः सर्वे कथमेतदिति ब्रुवन्॥ ५१<br><br>देवेष्वाह देवदेवो लोकनाथस्य धूर्गतान्।<br>अहं सारथिरित्युक्त्वा जग्राहाश्वांस्ततोऽग्रजः॥ ५२<br><br>ततो देवैः सगन्धर्वैः सिंहनादो महान् कृतः।<br>प्रतोदहस्तं सम्प्रेक्ष्य ब्रह्माणं सूततां गतम्॥ ५३<br><br>भगवानपि विश्वेशो रथस्थे वै पितामहे।<br>सदृशः सूत इत्युक्त्वा चारुरोह रथं हरः॥ ५४<br><br>आरोहति रथं देवे ह्यश्वा हरभरातुराः।<br>जानुभिः पतिता भूमौ रजोग्रासश्च ग्रासितः॥ ५५<br><br>देवो दृष्ट्वाथ वेदांस्तानभीरुग्रहयान् भयात्।<br>उज्जहार पितॄनार्तान् सुपुत्र इव दुःखितान्॥ ५६<br><br>ततः सिंहरवो भूयो बभूव रथभैरवः।<br>जयशब्दश्च देवानां सम्बभूवार्णवोपमः॥ ५७इस प्रकार देवगण दिव्य प्रभावसे उस दिव्य रथका निर्माण कर लोकाधिपति शङ्करके निकट जाकर इस प्रकार बोले—'दानवरूप शत्रुओंके विजेता भगवन्! हमलोगोंने आपके लिये इस रथकी रचना की है। यह इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंकी आपत्तिसे रक्षा करेगा। सुमेरुगिरिके शिखरके समान उस उत्तम त्रैलोक्यरथको देखकर भगवान् शङ्करने उसकी प्रशंसा करके देवताओंकी प्रशंसा की और पुनः उस रथका निरीक्षण करने लगे। वे बार-बार रथके प्रत्येक भागको देखते और बार-बार उसकी प्रशंसा करते थे। तत्पश्चात् देवताओंके अधीश्वर स्वयं भगवान् शङ्करने इन्द्रसहित देवताओंसे कहा—'देवगण! आपलोगों ने जिस प्रकार मेरे लिये रथकी सारी सामग्रियोंसे युक्त इस रथका निर्माण किया है, इसीकी मर्यादाके अनुकूल शीघ्र ही किसी सारथिका भी विधान कीजिये।' देवाधिदेव शङ्करके ऐसा कहनेपर देवगण ऐसे व्याकुल हो गये, मानो वे बाणोंसे बींध दिये गये हों। उन्हें बड़ी चिन्ता हुई। वे कहने लगे कि अब क्या किया जाय। भला, चक्रधारी भगवान् विष्णुके अतिरिक्त दूसरा कौन देवता महादेवजीके सदृश हो सकता है, किंतु वे तो उनके बाणपर स्थित हो चुके हैं। यह सोचकर जैसे गाड़ीमें जुते हुए बैल पर्वतोंसे टकरा जानेपर हाँफने लगते हैं, वैसे ही सभी देवता लम्बी साँस लेने लगे और कहने लगे कि यह कार्य कैसे सिद्ध होगा? इतनेमें ही उन देवताओंके बीच देवदेव अग्रज ब्रह्मा बोल उठे—'सारथि मैं होऊँगा' ऐसा कहकर उन्होंने लोकनाथ शङ्करके रथमें जुते हुए घोड़ोंकी बागडोर पकड़ ली। उस समय ब्रह्माको हाथमें चाबुक लिये हुए सारथिके स्थानपर स्थित देखकर गन्धर्वोंसहित देवताओंने महान् सिंहनाद किया। तदनन्तर पितामह ब्रह्माको रथपर स्थित देखकर विश्वेश्वर भगवान् शङ्कर 'उपयुक्त सारथि मिला' ऐसा कहकर रथपर आरूढ़ हुए। भगवान् शंकरके रथपर चढ़ते ही घोड़े उनके भारसे व्याकुल हो गये। वे घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़े और उनके मुखमें धूल भर गयी। इस प्रकार जब शङ्करजीने देखा कि अश्वरूपधारी वेद भयवश भूमिपर गिर पड़े हैं, तब उन्होंने उन्हें उसी प्रकार उठाया, जैसे सुपुत्र आर्त एवं दुःखी पितरोंका उद्धार करता है। तत्पश्चात् रथकी भयंकर घरघराहटके साथ सिंहनाद होने लगा। देवगण समुद्रकी गर्जनाके समान जय-जयकार करने लगे॥ ४४-५७ ॥

४७२ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदोङ्कारमयं गृह्य प्रतोदं वरदः प्रभुः।<br>स्वयम्भूः प्रययौ वाहनानुमन्त्र्य यथाजवम्॥ ५८तदनन्तर सामर्थ्यशाली वरदायक ब्रह्मा ओंकारमय चाबुकको हाथमें लेकर घोड़ोंको पुचकारते हुए पूर्ण वेगसे आगे बढ़े।
ग्रसमाना इवाकाशं मुष्णन्त इव मेदिनीम्<br>मुखेभ्यः ससृजुः श्वासानुच्छ्वसन्त इवोरगाः॥ ५९<br>स्वयम्भुवा चोद्यमानाश्चोदितेन कपर्दिना।<br>व्रजन्ति तेऽश्वा जवनाः क्षयकाल इवानिलाः॥ ६०फिर तो वे घोड़े पृथ्वीको अपने साथ समेटते तथा आकाशको ग्रसते हुएकी तरह बड़े वेगसे दौड़ने लगे। उनके मुखोंसे ऐसे दीर्घ निःश्वास निकल रहे थे, मानो फुफकारते हुए सर्प हों। शङ्करजीकी प्रेरणासे ब्रह्माद्वारा हाँके जाते हुए वे घोड़े प्रलयकालिक वायुकी तरह अत्यन्त वेगसे दौड़ रहे थे।
ध्वजोच्छ्रयविनिर्माणे ध्वजयष्टिममुत्तमाम्।<br>आक्रम्य नन्दीवृषभस्तस्थौ तस्मिञ्छिवेच्छया॥ ६१शिवजीकी इच्छासे उस रथमें ध्वजको ऊँचा उठानेमें निपुण नन्दी वृषभ उस अनुपम ध्वजयष्टिके ऊपर स्थित हुए।
भार्गवाङ्गिरसौ देवौ दण्डहस्तौ रविप्रभौ।<br>रथचक्रे तु रक्षेते रुद्रस्य प्रियकाङ्क्षिणौ॥ ६२सूर्यके समान प्रभावशाली शुक्र और बृहस्पति—ये दोनों देवता हाथमें दण्ड धारण करके रुद्रका प्रिय करनेकी इच्छासे रथके पहियोंकी रक्षा कर रहे थे।
शेषश्च भगवान् नागोऽनन्तोऽनन्तकरोऽरिणाम्।<br>शरहस्तो रथं पाति शयनं ब्रह्मणस्तदा॥ ६३उस समय शत्रुओंका समूल विनाश करनेवाले अनन्त भगवान् शेषनाग हाथमें बाण धारण कर रथकी तथा ब्रह्माके आसनकी रक्षामें जुटे हुए थे।
यमस्तूर्णं समास्थाय महिषं चातिदारुणम्।<br>द्रविणाधिपतिर्व्यालं सुराणामधिपो द्विपम्॥ ६४यमराज तुरंत अपने अत्यन्त भयंकर भैंसेपर, कुबेर साँपपर और देवराज इन्द्र ऐरावत हाथीपर चढ़कर आगे बढ़े।
मयूरं शतचन्द्रं च कूजन्तं किन्नरं यथा।<br>गुह आस्थाय वरदो जुगोप तं रथं पितुः॥ ६५वरदायक गुह कार्तिकेय सैकड़ों चन्द्रवाले तथा किंनरकी भाँति कूजते हुए अपने मयूरपर सवार होकर पिताके उस रथकी रक्षा कर रहे थे।
नन्दीश्वरश्च भगवान्छूलमादाय दीप्तिमान्।<br>पृष्ठतश्चापि पार्श्वाभ्यां लोकस्य क्षयकृद् यथा॥ ६६तेजस्वी भगवान् नन्दीश्वर शूल लेकर रथके पीछेसे दोनों पार्श्वभागोंकी रक्षा करते थे। उस समय वे ऐसा प्रतीत होते थे, मानो लोकका विनाश कर देना चाहते हों।
प्रमथाश्चाग्निवर्णाभाः साग्निज्वाला इवाचलाः।<br>अनुजग्मू रथं शार्वं नक्रा इव महार्णवम्॥ ६७अग्निके समान कान्तिमान् प्रमथगण, जो अग्निकी लपटोंसे युक्त पर्वत-सदृश दीख रहे थे, शङ्करजीके रथके पीछे चलते हुए ऐसे लगते थे जैसे महासागरमें नाकगण तैर रहे हों।
भृगुर्भरद्वाजवसिष्ठगौतमाः<br>क्रतुः पुलस्त्यः पुलहस्तपोधनाः।<br>मरीचिरत्रिर्भगवानथाङ्गिराः<br>पराशरागस्त्यमुखा महर्षयः॥ ६८<br>हरमजितमजं प्रतुष्टुवुर्वचन-<br>विशेषैर्विचित्रभूषणैः।<br>रथस्त्रिपुरे सकाञ्चनाचलो<br>व्रजति सपक्ष इवाद्रिरम्बरे॥ ६९भृगु, भरद्वाज, वसिष्ठ, गौतम, क्रतु, पुलस्त्य, पुलह, मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पराशर, अगस्त्य—ये सभी तपस्वी एवं ऐश्वर्यशाली महर्षि विचित्र छन्दानलंकारोंसे विभूषित उत्कृष्ट वचनोंद्वारा अजन्मा एवं अजेय शङ्करकी स्तुति कर रहे थे। सुमेरुगिरिके सहयोगसे सम्पन्न हुआ वह रथ आकाशमें विचरनेवाले पंखधारी पर्वतकी तरह त्रिपुरकी ओर बढ़ रहा था।
करिगिरिरविमेघसंनिभाः<br>सजलपयोदनिनादनादिनः।<br>प्रमथगणाः परिवार्य देवगुप्तं<br>रथमभितः प्रययुः स्वदर्पयुक्ताः॥ ७०हाथी, पर्वत, सूर्य और मेघके समान कान्तिवाले प्रमथगण जलधर बादलकी भाँति गर्जना करते हुए बड़े गर्वके साथ देवताओंद्वारा सब ओरसे सुरक्षित उस रथके पीछे-पीछे चल रहे थे।
* अध्याय १३४ *४७३

| मकरतिमितिमिङ्गिलावृतः<br>  प्रलय इवातिसमुद्धतोऽर्णवः।<br>व्रजति रथवरोऽतिभास्वरो<br>  ह्यशनिनिपातपयोदनिःस्वनः ॥ ७१ | वह अत्यन्त उद्दीप्त श्रेष्ठ रथ प्रलयकालमें मकर, तिमि (एक प्रकारके महामत्स्य) और तिमिंगिलों (उसे निगलनेवाले महामत्स्य)—से व्याप्त भयंकर रूपसे उमड़े हुए समुद्रकी तरह आगे बढ़ रहा था। उससे वज्रपातकी तरह गड़गड़ाहट और बादलकी गर्जनाके सदृश शब्द हो रहा था॥ ५८—७१ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे रथप्रयाणं नाम त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाह-प्रसङ्गमें रथप्रयाण नामक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३३ ॥


एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय

देवताओंसहित शङ्करजीका त्रिपुरपर आक्रमण, त्रिपुरमें देवर्षि नारदका आगमन तथा युद्धार्थ असुरोंकी तैयारी

सूत उवाच
पूज्यमाने रथे तस्मिंल्लोकैर्देवे रथे स्थिते।<br>प्रमथेषु नदत्सूग्रं प्रवदत्सु च साध्विति ॥ १<br>ईश्वरस्वरघोषेण नर्दमाने महावृषे।<br>जयत्सु विप्रेषु तथा गर्जत्सु तुरगेषु च ॥ २<br>रणाङ्गणात् समुत्पत्य देवर्षिर्नारदः प्रभुः।<br>कान्त्या चन्द्रोपमस्तूर्णं त्रिपुरं पुरमागतः ॥ ३<br>औत्पातिकं तु दैत्यानां त्रिपुरे वर्तते ध्रुवम्।<br>नारदश्चात्र भगवान् प्रादुर्भूतस्तपोधनः ॥ ४<br>आगतं जलदाभासं समेताः सर्वदानवाः।<br>उत्तस्थुर्नारदं दृष्ट्वा अभिवादनवादिनः ॥ ५<br>तमर्घ्येण च पाद्येन मधुपर्केण चेश्वराः।<br>नारदं पूजयामासुर्ब्रह्माणमिव वासवः ॥ ६<br>तेषां स पूजां पूजार्हः प्रतिगृह्य तपोधनः।<br>नारदः सुखमासीनः काञ्चने परमासने ॥ ७<br>मयस्तु सुखमासीने नारदे नारदोद्भवे।<br>यथार्हं दानवैः सार्धमासीनो दानवाधिपः ॥ ८<br>आसीनं नारदं प्रेक्ष्य मयस्त्वथ महासुरः।<br>अब्रवीद् वचनं तुष्टो हृष्टरोमाननेक्षणः ॥ ९**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार उस लोकपूजित रथपर आरूढ़ होकर जब महादेवजी त्रिपुरपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थित हुए, उस समय प्रमथगण 'ठीक है, ठीक है' ऐसा कहते हुए उच्च स्वरसे सिंहनाद करने लगे। महान् वृषभ नन्दी भी शङ्करजीके सदृश स्वरमें गर्जना करने लगा। यूथ-के-यूथ विप्र जय-जयकार बोलने लगे तथा घोड़े हींसने लगे। इसी समय चन्द्रतुल्य कान्तिवाले सामर्थ्यशाली देवर्षि नारद युद्धस्थलसे उछलकर तुरंत त्रिपुर नामक नगरमें जा पहुँचे। दैत्योंके उस त्रिपुरमें निश्चितरूपसे उत्पात हो रहे थे। वहाँ तपस्वी भगवान् नारद सहसा प्रकट हो गये। श्वेत मेघकी-सी प्रभाववाले नारदजीको आया हुआ देखकर सभी दानव एक साथ अभिवादन करते हुए उठ खड़े हुए। तत्पश्चात् उन ऐश्वर्यशाली दानवोंने पाद्य, अर्घ्य और मधुपर्कद्वारा नारदजीकी उसी प्रकार पूजा की, जैसे इन्द्र ब्रह्माकी अर्चना करते हैं। तब पूजनीय तपस्वी नारदजी उनकी पूजा स्वीकार कर स्वर्णनिर्मित श्रेष्ठ आसनपर सुखपूर्वक विराजमान हुए। इस प्रकार ब्रह्मपुत्र नारदके सुखपूर्वक बैठ जानेपर दानवराज मय भी सभी दानवोंके साथ यथायोग्य आसनपर बैठ गया। इस तरह नारदजीको वहाँ सुखपूर्वक बैठे देखकर महासुर मयको बड़ी प्रसन्नता हुई। वह हर्षसे रोमाञ्चित हो उठा, उसके मुख एवं नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे, उसने नारदजीसे ये बातें कहीं॥ १—९॥

४७४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
औत्पातिकं पुरेऽस्माकं यथा नान्यत्र कुत्रचित्।<br>वर्तते वर्तमानज्ञ वद त्वं हि च नारद॥ १०<br>दृश्यन्ते भयदाः स्वप्ना भज्यन्ते च ध्वजाः परम्।<br>विना च वायुना केतुः पतते च तथा भुवि॥ ११<br>अट्टालकाश्च नृत्यन्ते सपताकाः सगोपुराः।<br>हिंस हिंसेति श्रूयन्ते गिरश्च भयदाः पुरे॥ १२<br>नाहं बिभेमि देवानां सेन्द्राणामपि नारद।<br>मुक्त्वैकं वरदं स्थाणुं भक्ताभयकरं हरम्॥ १३<br>भगवन् नास्त्यविदितमुत्पातेषु तवानघ।<br>अनागतमतीतं च भवाञ्जानाति तत्त्वतः॥ १४<br>तदेतन्मे भयस्थानमुत्पाताभिनिवेदितम्।<br>कथयस्व मुनिश्रेष्ठ प्रपन्नस्य तु नारद॥ १५<br>इत्युक्तो नारदस्तेन मयेनामयवर्जितः॥ १६मयने नारदजीसे कहा—'नारदजी! आप तो (भूत-भव्य और) वर्तमानकी सारी बातोंके ज्ञाता हैं, अतः आप यह बतलाइये कि हमारे पुरमें जैसा उत्पात हो रहा है, वैसा सम्भवतः अन्यत्र कहीं भी नहीं होता होगा। (ऐसा क्यों हो रहा है?) यहाँ भयदायक स्वप्न दीख पड़ते हैं। ध्वजाएँ अकस्मात् टूटकर गिर रही हैं। वायुका स्पर्श न होनेपर भी पताकाएँ पृथ्वीपर गिर रही हैं। पताकाओं और फाटकोंसहित अट्टालिकाएँ नाचती-सी (काँपती-सी) दीखती हैं। नगरमें 'मार डालो, मार डालो' ऐसे भयावने शब्द सुननेमें आ रहे हैं। (इतना होनेपर भी) नारदजी! भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले स्थाणुस्वरूप वरदायक एकमात्र शङ्करजीको छोड़कर मुझे इन्द्रसहित समस्त देवताओंसे भी कुछ भय नहीं है। निष्पाप भगवन्! इन उपद्रवोंके विषयमें आपसे कुछ छिपा तो है नहीं; क्योंकि आप तो (पूर्वोक्त वर्तमानके अतिरिक्त) भूत और भविष्यके भी यथार्थ ज्ञाता हैं। मुनिश्रेष्ठ! ये उत्पात हमलोगोंके लिये भयके स्थान बन गये हैं, जिन्हें मैंने आपसे निवेदित कर दिया है। नारदजी! मैं आपके शरणागत हूँ, कृपया इसका कारण बतलाइये।' इस प्रकार मयदानवने अविनाशी नारदजीसे प्रार्थना की॥ १०–१६॥
नारद उवाच<br><br>शृणु दानव तत्त्वेन भवन्त्यौत्पातिका यथा।<br>धर्मेति धारणे धातुर्माहात्म्ये चैव पठ्यते।<br>धारणाच्च महत्त्वेन धर्म एष निरुच्यते॥ १७<br>स इष्टप्रापको धर्म आचार्यैरुपदिश्यते।<br>इतरश्चानिष्टफलं आचार्यैर्नोपदिश्यते॥ १८<br>उत्पथान्मार्गमागच्छेन्मार्गाच्चैव विमार्गताम्।<br>विनाशस्तस्य निर्देश्य इति वेदविदो विदुः॥ १९<br>स ह्यधर्म रथारूढः सहैभिर्मत्तदानवैः।<br>अपकारिषु देवानां कुरुषे त्वं सहायताम्॥ २०<br>तदेतान्येवमादीनि उत्पातावेदितानि च।<br>वैनाशिकानि दृश्यन्ते दानवानां तथैव च॥ २१<br>एष रुद्रः समास्थाय महालोकमयं रथम्।<br>आयाति त्रिपुरं हन्तुं मय त्वामसुरानपि॥ २२(तब) नारदजी बोले—दानवराज! जिस कारण ये उत्पात हो रहे हैं, उन्हें यथार्थरूपसे बतला रहा हूँ, सुनो! 'धृ' धातु धारण-पोषण और महत्त्वके अर्थमें प्रयुक्त होती है। इसी धातुसे धर्म शब्द निष्पन्न हुआ है, अतः महत्त्वपूर्वक धारण करनेसे यह शब्द धर्म कहलाता है। आचार्यगण इष्टकी प्राप्ति करानेवाले इसी धर्मका उपदेश करते हैं। इसके विपरीत अधर्म अनिष्ट फल देनेवाला है, अतः आचार्यगण उसे ग्रहण करनेका आदेश नहीं देते। वेदज्ञोंका कथन है कि मनुष्यको उन्मार्गसे सुमार्गपर आना चाहिये; क्योंकि जो सुमार्गसे उन्मार्गपर चलते हैं, उनका विनाश तो निश्चित ही है। तुम इन उन्मत्त दानवोंके साथ महान् अधर्मके रथपर आरूढ़ होकर देवताओंका अपकार करनेवालोंकी सहायता करते हो। इसलिये इन सभी उत्पातोंद्वारा सूचित अपशकुन दानवोंके विनाशके सूचक हैं। मय! भगवान् रुद्र महालोकमय रथपर सवार होकर त्रिपुरका, तुम्हारा और समस्त असुरोंका भी विनाश करनेके लिये आ रहे हैं।

१३६- मयका चिन्तित होकर अद्भुत बावलीका निर्माण करना, नन्दिकेश्वर और तारकासुरका भीषण युद्ध तथा प्रमथगणोंकी मारसे विमुख होकर दानवोंका त्रिपुर-प्रवेश

* अध्याय १३४ *४७५

| स त्वं महौजसं नित्यं प्रपद्यस्व महेश्वरम्।<br>यास्यसे सह पुत्रेण दानवैः सह मानद॥ २३<br>इत्येवमावेद्य भयं दानवोपस्थितं महत्।<br>दानवानां पुनर्देवो देवेशपद्मागतः॥ २४ | इसलिये मानद! (तुम्हारे लिये यही अच्छा होगा कि) तुम महान् ओजस्वी एवं अविनाशी महेश्वरकी शरण ग्रहण कर लो, अन्यथा तुम पुत्रों और दानवोंके साथ यमलोकके पथिक बन जाओगे। इस प्रकार देवर्षि नारद दानवोंको उनके ऊपर आये हुए महान् भयकी सूचना देकर पुनः देवेश्वर शङ्करजीके पास लौट आये॥ १७—२४॥ | | नारदे तु मुनौ याते मयो दानवनायकः।<br>शूरसम्मतमित्येवं दानवानाह दानवः॥ २५<br>शूराः स्थ जातपुत्राः स्थ कृतकृत्याः स्थ दानवाः।<br>युध्यध्वं दैवतैः सार्धं कर्त्तव्यं चापि नो भयम्॥ २६<br>जित्वा वयं भविष्यामः सर्वेऽमरसभासदः।<br>देवांश्च सेन्द्रकान् हत्वा लोकान् भोक्ष्यामहेऽसुराः॥ २७<br>अट्टालकेषु च तथा तिष्ठध्वं शस्त्रपाणयः।<br>दंशिता युद्धसज्जाश्च तिष्ठध्वं प्रोद्यतायुधाः॥ २८<br>पुराणि त्रीणि चैतानि यथास्थानेषु दानवाः।<br>तिष्ठध्वं लङ्घनीयानि भविष्यन्ति पुराणि च॥ २९<br>नभोगतास्तथा शूरा देवता विदिता हि वः।<br>ताः प्रयत्नेन वार्याश्च विदार्याश्चैव सायकैः॥ ३०<br>इति दनुतनयानम्यस्तथोक्त्वा<br>सुरगणवारणवारणे वचांसि।<br>युवतिजनविषण्णमानसं तत्-<br>त्रिपुरपुरं सहसा विवेश राजा॥ ३१<br>अथ रजतविशुद्धभावभावो<br>भवमभिपूज्य दिगम्बरं सुगीर्भिः।<br>शरणमुपजगाम देवदेवं<br>मदनार्यन्धकयज्ञदेहघातम् ॥ ३२<br>मयमभयपदैषिणं प्रपन्नं<br>न किल बुबोध तृतीयदीप्तनेत्रः।<br>तदभिमतमदात् ततः शशाङ्की<br>स च किल निर्भय एव दानवोऽभूत्॥ ३३ | इधर नारद मुनिके चले जानेपर दानवराज मयदानवने (वहाँ उपस्थित) सभी दानवोंसे इस प्रकार शूरसम्मत वचन कहना आरम्भ किया—'दानवो! तुमलोग शूर-वीर हो, पुत्रवान् हो और (जीवनमें सुखका उपभोग करके) कृतकृत्य हो चुके हो, अतः देवताओंके साथ डटकर युद्ध करो। इसमें तुमलोगोंको किसी प्रकारका भय नहीं मानना चाहिये। असुरो! देवताओंको जीतकर हमलोग देवसभाके सभासद हो जायेंगे, अर्थात् देवसभा अपने अधिकारमें आ जायगी। तब इन्द्रसहित देवताओंका वध करके हमलोग लोकोंका उपभोग करेंगे। तुमलोग युद्धकी साज-सज्जासे विभूषित हो कवच धारण कर लो और हथियार लेकर तैयार हो जाओ तथा हाथमें शस्त्र धारण कर अट्टालिकाओंपर चढ़ जाओ। दानवो! तुमलोग इन तीनों पुरोंपर यथास्थान (सजग होकर) बैठ जाओ; क्योंकि देवगण इन तीनों पुरोंपर आक्रमण करेंगे। शूरवीरो! यदि देवता आकाशमार्गसे धावा करें तो तुमलोग तो उन्हें पहचानते ही हो, तुरंत उन्हें प्रयत्नपूर्वक रोक दो और बाणोंके प्रहारसे विदीर्ण कर दो।' इस प्रकार दानवराज मय दनु-पुत्रोंसे सुरगणरूपी हाथियोंको रोकनेके लिये बातें बताकर सहसा उस त्रिपुर-पुरमें प्रविष्ट हुआ, जहाँकी स्त्रियोंका मन भयके कारण उद्विग्न हो उठा था। तदनन्तर वह चाँदीके समान निर्मल भावसे भावित होकर सुन्दर वाणीद्वारा दिगम्बर भगवान् शङ्करकी पूजा कर उन कामदेवके शत्रु तथा अन्धक और दक्ष-यज्ञके विनाशक देवदेवेश्वरकी शरणमें गया। यद्यपि शङ्करजीके तृतीय नेत्रमें उद्दीप्त अग्निका वास है, तथापि उन चन्द्रशेखरके ध्यानमें यह बात न आयी कि यह मयदानव शरणागत होकर अभयपद प्राप्त करना चाहता है, अतः उन्होंने उसे अभीष्ट वरदान दे दिया, जिससे वह दानव निर्भय हो गया और आगसे भी सुरक्षित रहकर जीवित बच गया॥२५—३३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे नारदागमनं नाम चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाह-प्रसङ्गमें नारदागमन नामक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३४॥

४७६ * मत्स्यपुराण *


एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय

शङ्करजीकी आज्ञासे इन्द्रका त्रिपुरपर आक्रमण, दोनों सेनाओंमें भीषण संग्राम, विद्युन्मालीका वध, देवताओंकी विजय और दानवोंका युद्ध-विमुख होकर त्रिपुरमें प्रवेश

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर नारदजी त्रिपुरसे लौटकर पुनः युद्धस्थलमें देवताओंकी सेनामें सम्मिलित हो गये। वे स्वयं देव-सभामें उपस्थित हुए। इलावृत्त नामसे विख्यात विस्तृत वर्ष, जहाँ बलिकायज्ञ सम्पन्न हुआ था तथा जहाँ बलि बाँधे गये थे, तीनों लोकोंमें देवताओंकी जन्मभूमिके रूपमें प्रसिद्ध है। उसी इलावृत्तमें देवताओंके जातकर्म आदि संस्कार तथा यज्ञ और कन्यादान आदि कर्म सम्पन्न हुए हैं। यहाँ भगवान् शङ्कर अपने पार्षदगणोंको साथ लेकर नित्य विहार करते हैं। यहाँ लोकपालगण मेरुगिरिकी तरह सदा निवास करते हैं। इसी स्थानपर जिनके नेत्र मधुके समान पीले रंगके हैं तथा जो द्वितीयाके चन्द्रमाको भूषणरूपमें धारण करते हैं, उन्हीं भगवान् महेश्वरने देवराज इन्द्र और अपने गणेश्वरोंसे इस प्रकार कहा—'इन्द्र! तुम्हारे शत्रुओंका यह त्रिपुर दिखायी पड़ रहा है। यह विमानों, पताकाओं और ध्वजोंसे सुशोभित है। यह सुदृढ़ है तथा इसके विषयमें ऐसी प्रसिद्धि है कि यह अग्निकी तरह अत्यन्त तापदायक है। इसके निवासी दानव किरीट-कुण्डल धारण किये उन्हीं पर्वतके समान दीख रहे हैं। इन दानवोंकी अङ्ग-कान्ति बादलकी-सी है और इनके मुख टेढ़े-मेढ़े हैं। ये सभी परकोटों, फाटकों और अट्टालिकाओंपर तथा कक्षान्तमें स्थित हैं। (वह देखो) वे सभी दैत्य विजयकी अभिलाषासे हथियारोंसे सुसज्जित हो नगरसे बाहर निकल रहे हैं। इसलिये तुम सहायकोंसहित अपना श्रेष्ठ अस्त्र वज्र लेकर सैकड़ों देवताओं तथा मेरे भृत्योंके साथ आगे बढ़कर इन महासुरोंका संहार करो। मैं इस श्रेष्ठ रथपर निश्चल पर्वतकी तरह स्थित रहकर तुमलोगोंकी विजयके लिये त्रिपुरके सम्मुख उसके छिद्रकी खोजमें खड़ा रहूँगा। वासव! जब पुष्य-नक्षत्रके योगके साथ ये तीनों पुर एक स्थानपर स्थित होंगे, तब मैं एक ही बाणसे इन्हें दग्ध कर डालूँगा'॥ १—१२॥
ततो रणे देवबलं नारदोऽभ्यगमत् पुनः।<br>आगत्य चैव त्रिपुरात् सभायामास्थितः स्वयं॥ १<br>इलावृतमिति ख्यातं तद्वर्षं विस्तृतायतम्।<br>यत्र यज्ञो बलेर्वृत्तो बलिर्यत्र च संयतः॥ २<br>देवानां जन्मभूमिर्या त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>विवाहाः क्रतवश्चैव जातकर्मादिकाः क्रियाः॥ ३<br>देवानां यत्र वृत्तानि कन्यादानानि यानि च।<br>रेमे नित्यं भवो यत्र सहायैः पार्षदैर्गणैः॥ ४<br>लोकपालाः सदा यत्र तस्थुर्मेरुगिरौ यथा।<br>मधुपिङ्गलनेत्रस्तु चन्द्रावयवभूषणः।<br>देवानामधिपं प्राह गणपांश्च महेश्वरः॥ ५<br>वासवैतदरीणां ते त्रिपुरं परिदृश्यते।<br>विमानैश्च पताकाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृतम्॥ ६<br>इदं वृत्तमिदं ख्यातं वह्निवद् भृशतापनम्।<br>एते जना गिरिप्रख्याः सकुण्डलकिरीटिनः॥ ७<br>प्राकारगोपुराट्टेषु कक्षान्ते दानवाः स्थिताः।<br>इमे च तोयदाभासा दनुजा विकृताननाः॥ ८<br>निर्गच्छन्ति पुरो दैत्याः सायुधा विजयैषिणः॥ ९<br>स त्वं सुरशतैः सार्धं ससहायो वरायुधः।<br>सुहृद्भिर्मामकैर्भृत्यैर्व्यापादय महासुरान्॥ १०<br>अहं च रथवर्येण निश्चलाचलवत्स्थितः।<br>पुरः पुरस्य रन्ध्रार्थी स्थास्यामि विजयाय वः॥ ११<br>यदा तु पुष्ययोगेने एकत्वं स्थास्यते परम्।<br>तदेतन्निर्धहिष्यामि शरेणैकेन वासव॥ १२
* अध्याय १३५ *४७७
SanskritHindi
इत्युक्तो वै भगवता रुद्रेणेह सुरेश्वरः।<br>ययौ तत्त्रिपुरं जेतुं तेन सैन्येन संवृतः ॥ १३<br><br>प्रक्रान्तरथभीमैस्तैः सदेवैः पार्षदां गणैः।<br>कृतसिंहरवोपेतेरुद्गच्छद्भिरिवाम्बुदैः ॥ १४<br><br>तेन नादेन त्रिपुराद् दानवा युद्धलालसाः।<br>उत्पत्य दुद्रुवुश्चेलुः सायुधाः खे गणेश्वरान् ॥ १५<br><br>अन्ये पयोधररावाः पयोधरसमा बभुः।<br>ससिंहनादं वादित्रं वादयामासुरुद्धताः ॥ १६<br><br>देवानां सिंहनादश्च सर्वतूर्यरवो महान्।<br>ग्रस्तोऽभूद् दैत्यनादैश्च चन्द्रस्तोयधरैरिव ॥ १७<br><br>चन्द्रोदयात् समुद्भूतः पौर्णमास इवार्णवः।<br>त्रिपुरं प्रभवत् तद्वद् भीमरूपमहासुरैः ॥ १८<br><br>प्राकारेषु पुरे तत्र गोपुरेष्वपि चापरे।<br>अट्टालकान् समारुह्य केचिच्चलितवादिनः ॥ १९<br><br>स्वर्णमालाधराः शूराः प्रभासितवराम्बराः।<br>केचिन्नदन्ति दनुजास्तोयमत्ता इवाम्बुदाः ॥ २०<br><br>इतश्चेतश्च धावन्तः केचिदुद्धूतवाससः।<br>किमेतदिति पप्रच्छुरन्योऽन्यं गृहमाश्रिताः ॥ २१<br><br>किमेतन्नैनं जानामि ज्ञानमन्तर्हितं हि मे।<br>ज्ञास्यसेऽनन्तरेणेति कालो विस्तारतो महान् ॥ २२<br><br>सोऽप्यसौ पृथ्वीसारं सिंहश्च रथमास्थितः।<br>तिष्ठते त्रिपुरं पीड्य देहव्याधिरिवोच्छ्रितः ॥ २३<br><br>य एषोऽस्ति स एषोऽस्तु का चिन्ता सम्भ्रमे सति।<br>एहि ह्यायुधमादाय क्व मे पृच्छा भविष्यति ॥ २४<br><br>इति तेऽन्योन्यमाविद्धा उत्तरोत्तरभाषिणः।<br>आसाद्य पृच्छन्ति तदा दानवास्त्रिपुरालयाः ॥ २५<br><br>तारकाख्यपुरे दैत्यास्तारकाख्यपुरःसराः।<br>निर्गताः कुपितास्तूर्णं बिलादिव महोरगाः ॥ २६भगवान् रुद्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर देवराज इन्द्र उस विशाल सेनाके साथ उस त्रिपुरको जीतनेके लिये आगे बढ़े। चलते समय देवताओं और पार्षदगणोंके रथोंसे भीषण शब्द हो रहा था और वे सभी मेघकी गर्जनाके समान सिंहनाद कर रहे थे। उस शब्दको सुनकर दानवगण युद्धकी लालसासे अस्त्र लेकर त्रिपुरसे बाहर निकले और आकाशमें छलाँग मारते हुए गणेश्वरोंपर टूट पड़े। उनमें कुछ अन्य उद्दण्ड दानव, जो काले मेघके समान शोभा पा रहे थे, मेघकी तरह गर्जना कर रहे थे और सिंहनाद करते हुए बाजा बजा रहे थे। उस समय दैत्योंके सिंहनादसे देवताओंका सिंहनाद और सभी प्रकारके तुरही आदि बाजोंका महान् शब्द उसी प्रकार अभिभूत हो गया, जैसे बादलोंके बीच चन्द्रमा छिप जाते हैं। जैसे चन्द्रमाके उदय होनेपर पूर्णिमा तिथिको समुद्र वृद्धिंगत हो जाता है, वैसे ही उन भयंकर रूपवाले महान् असुरोंसे त्रिपुर उद्दीप्त हो उठा। उस पुरमें कुछ दानव परकोटोंपर तथा कुछ फाटकों और अट्टालिकाओंपर चढ़कर 'चलो, निकलो' ऐसा कहकर ललकार रहे थे। कुछ शूर-वीर दानव सुन्दर एवं श्रेष्ठ वस्त्र धारण किये हुए थे, उनके गलेमें स्वर्णकी जंजीर शोभा पा रही थी और वे जलसे भरे हुए बादलकी भाँति सिंहनाद कर रहे थे। कुछ वस्त्र फहराते हुए इधर-उधर दौड़ रहे थे और घरपर आकर परस्पर एक-दूसरेसे पूछ रहे थे—'यह क्या हो रहा है?' (दूसरा उत्तर देता था कि) 'क्या हो रहा है, यह तो मैं नहीं जानता; क्योंकि उसकी जानकारी मुझसे छिपी हुई है। कुछ समयके बाद तुम्हें भी ज्ञात हो जायगा। अभी तो बहुत समय शेष है। (देखो न) वहाँ पृथ्वीके सारभूत रथपर बैठा हुआ वह जो सिंह खड़ा है, वह त्रिपुरको उसी प्रकार पीड़ा दे रहा है, जैसे बढ़ी हुई व्याधि शरीरको कष्ट देती है। वह जो हो, सो रहे; ऐसे हलचलके उपस्थित होनेपर चिन्ता करना व्यर्थ है। अब हथियार लेकर मैदानमें आ जाओ, फिर मुझसे पूछनेकी आवश्यकता नहीं रह जायगी।' उसी समय त्रिपुरनिवासी दानव परस्पर एक-दूसरेको पकड़कर इसी प्रकार पूछते थे और परस्पर उत्तर-प्रत्युत्तर देते थे ॥ १३–२५ ॥<br><br>इधर तारकाक्षपुरके निवासी दैत्य क्रोधसे भरे हुए तारकाक्षको आगे करके तुरंत नगरसे उसी प्रकार बाहर निकले, मानो बिलसे विषधर सर्प निकल रहे हों।

४७८ * मत्स्यपुराण *


| निर्यावन्तस्तु ते दैत्याः प्रमथाधिपयूथपैः।<br>निरुद्धा गजराजानो यथा केसरियूथपैः॥ २७<br><br>दर्पितानां ततश्चैषां दर्पितानामिवाग्निनाम्।<br>रूपाणि जज्वलुस्तेषामग्नीनामिव धम्यताम्॥ २८<br><br>ततो बृहन्ति चापानि भीमनादानि सर्वशः।<br>निकृष्य जघ्नुरन्योऽन्यमिषुभिः प्राणभोजनैः॥ २९<br><br>मार्जारमृगभीमास्यान् पार्षदान् विकृताननान्।<br>दृष्ट्वा दृष्ट्वा हसन्नुच्चैर्दानवा रूपसम्पदा॥ ३०<br><br>बाहुभिः परिघाकारैः कृष्यतां धनुषां शराः।<br>भटवर्मेषु विविशुस्तडागानीव पक्षिणः॥ ३१<br><br>मृताः स्थ क्व नु यास्यध्वं हनिष्यामो निवर्तताम्।<br>इत्येवं परुषाण्युक्त्वा दानवाः पार्षदर्षभान्॥ ३२<br><br>बिभिदुः सायकैस्तीक्ष्णैः सूर्यपादा इवाम्बुदान्।<br>प्रमथा अपि सिंहाक्षाः सिंहविक्रान्तविक्रमाः।<br>खण्डशैलशिलावृक्षैर्बिभिदुर्देत्यदानवान् ॥ ३३<br><br>अम्बुदैराकुलमिव हंसाकुलमिवाम्बरम्।<br>दानवाकुलमत्यर्थं तत्पुरं सकलं बभौ॥ ३४<br><br>विकृष्टचापा दैत्येन्द्राः सृजन्ति शरदुर्दिनम्।<br>इन्द्रचापाङ्कितोरस्का जलदा इव दुर्दिनम्॥ ३५<br><br>इषुभिस्ताड्यमानास्ते भूयो भूयो गणेश्वराः।<br>चक्रूस्ते देहनिर्यासं स्वर्णधातुमिवाचलाः॥ ३६<br><br>तेऽथ वृक्षशिलावज्रशूलपट्टिशपरश्वधैः।<br>चूर्ण्यन्तेऽभिहता दैत्याः काचाष्टङ्कहता इव॥ ३७<br><br>तारकाख्यो जयत्येष इति दैत्या अघोषयन्।<br>जयतीन्द्रश्च रुद्रश्च इत्येव च गणेश्वराः॥ ३८ | बाहर निकलकर उन दैत्योंने देवसेनापर धावा बोल दिया, परंतु प्रमथगणोंके यूथपतियोंने उन्हें ऐसा रोक दिया, जैसे सिंहसमूह गजराजोंके दलको स्तम्भित कर देते हैं। उन गर्वीले दानवोंका रूप तो यों ही (क्रोधके कारण) अग्निकी तरह उद्दीप्त हो उठा था, इधर रोक दिये जानेपर वे धौंकी जाती हुई आगकी तरह जल उठे। फिर तो सब ओर भयंकर सिंहनाद होने लगा। दानवगण बड़े-बड़े धनुषोंपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर प्राण-हरण करनेवाले बाणोंद्वारा एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। प्रमथगणोंमें किन्हींके मुख बिलाव और किन्हींके मृगके समान भयंकर थे तथा किन्हींके मुख टेढ़े-मेढ़े थे। उन्हें देख-देखकर ठहाका मारकर सौन्दर्यशाली दानव हँसने लगे। परिघकी-सी आकारवाली भुजाओंद्वारा खींचे जाते हुए धनुषोंसे छूटे हुए बाण योद्धाओंके कवचोंमें उसी प्रकार घुस जाते थे, जैसे पक्षी तालाबोंमें प्रवेश करते हैं। उस समय दानवगण पार्षदयूथपतियोंको ललकारकर कह रहे थे—'अरे! अब तो तुमलोग मरे ही हो। हमारे हाथोंसे छूटकर कहाँ जाओगे! लौट आओ। हमलोग तुम्हें मार डालेंगे।' ऐसी कठोर बातें कहकर वे अपने तीखे बाणोंसे उन्हें इस प्रकार विदीर्ण कर रहे थे, जैसे सूर्यकी किरणें बादलोंको भेदकर पार कर जाती हैं। उधरसे सिंहके समान पराक्रमी एवं सिंह-सदृश नेत्रोंवाले प्रमथगण भी शिलाओं, शिलाखण्डों और वृक्षोंके प्रहारसे दैत्यों और दानवोंको चूर्ण-सा कर दे रहे थे। उस समय बादलोंसे आच्छादित एवं हंसोंसे व्याप्त आकाशकी तरह वह सारा पुर दानवोंसे व्याप्त होकर अत्यन्त सुशोभित हो रहा था। जैसे इन्द्र-धनुषसे चिह्नित मध्यभागवाले बादल जलकी वृष्टि कर दुर्दिन (मेघाच्छन्न दिवस) उत्पन्न कर लेते हैं, उसी प्रकार दैत्येन्द्रगण अपने धनुषोंकी प्रत्यञ्चाको कानतक खींचकर बाणोंकी वर्षा कर अन्धकार उत्पन्न कर रहे थे। दानवोंके बाणोंसे बारम्बार घायल होनेके कारण गणेश्वरोंके शरीरोंसे रक्तकी धार बह रही थी, जो ऐसी प्रतीत होती थी, मानो पर्वतोंसे सुवर्णधातु निकल रही हो। उधर गणेश्वरोंद्वारा चलाये गये वृक्ष, शिला, वज्र, शूल, पट्टिश और कुठारके प्रहारसे दैत्यगण ऐसे चूर-चूर कर दिये जा रहे थे जैसे कुल्हाड़ी या छेनीके प्रहारसे काच छिन्न-भिन्न हो जाता है। उधर दैत्यगण 'यह देखो, तारकाक्ष जीत रहा है'—ऐसी घोषणा कर रहे थे। तभी इधरसे गणेश्वर सिंहनाद करते हुए बोल रहे थे—'देखो-देखो, इन्द्र और रुद्र विजयी हो रहे हैं'॥ २६–३८॥ |

* अध्याय १३५ *४७९

| वारिता दारिता बाणैर्योधास्तस्मिन् बलोभये।<br>निःस्वनन्तोऽम्बुसमये जलगर्भा इवाम्बुदाः ॥ ३९<br>करैश्छिन्नैः शिरोभिश्च ध्वजैश्छत्रैश्च पाण्डुरैः ।<br>युद्धभूमिर्भयवती मांसशोणितपूरिता ॥ ४०<br>व्योम्नि चोत्प्लुत्य सहसा तालमात्रं वरायुधैः ।<br>दृढाहताः पतन पूर्वं दानवाः प्रमथास्तथा ॥ ४१<br>सिद्धाश्चाप्सरसश्चैव चारणाश्च नभोगताः ।<br>दृढप्रहारहर्षिताः साधु साध्विति चुक्रुशुः ॥ ४२<br>अनाहताश्च वियति देवदुन्दुभयस्तथा।<br>नदन्तो मेघशब्देन शरभा इव रोषिताः ॥ ४३<br>ते तस्मिंस्त्रिपुरे दैत्या नद्यः सिन्धुपताविव ।<br>विशन्ति क्रुद्धवदना वल्मीकमिव पन्नगाः ॥ ४४<br>तारकाख्यपुरे तस्मिन् सुराः शूराः समन्ततः ।<br>सशस्त्रा निपतन्ति स्म सपक्षा इव भूधराः ॥ ४५<br>योधयन्ति त्रिभागेन त्रिपुरे तु गणेश्वराः ।<br>विद्युन्माली मयश्चैव मग्नौ च द्रुमवद्रणे ॥ ४६<br>विद्युन्माली स दैत्येन्द्रो गिरीन्द्रसदृशद्युतिः ।<br>आदाय परिघं घोरं ताडयामास नन्दिनम् ॥ ४७<br>स नन्दी दानवेन्द्रेण परिघेण दृढाहतः ।<br>भ्रमते मधुनाऽव्यक्तः पुरा नारायणो यथा ॥ ४८ | उन दोनों सेनाओंमें बाणोंद्वारा रोके एवं घायल किये गये वीर इतने जोरसे सिंहनाद कर रहे थे जैसे वर्षाकालमें जलसे भरे हुए बादल गरजते हैं। कटे हुए हाथों, मस्तकों, पीले रंगकी पताकाओं और छत्रोंसे तथा मांस और रुधिरसे भरी हुई युद्धभूमि बड़ी भयावनी लग रही थी। दानव तथा प्रमथगण उत्तम अस्त्र धारण कर पहले तो सहसा ताड़-वृक्षकी ऊँचाई-बराबर आकाशमें उछल पड़ते थे और पुनः सुदृढ़रूपसे घायल होकर भूतलपर गिर पड़ते थे। गगनमण्डलमें स्थित सिद्ध, अप्सरा और चारणोंके समूह (दानवोंपर) सुदृढ़ प्रहार होनेसे हर्षित होकर 'ठीक है, ठीक है', ऐसा कहते हुए चिल्लाने लगते थे। उस समय आकाशमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बिना चोट किये ही बज रही थीं। उनसे मेघकी गर्जना तथा क्रुद्ध हुए शरभ (अष्टपदी)-की दहाड़के समान शब्द हो रहे थे। दैत्यगण उस त्रिपुरमें इस प्रकार प्रविष्ट हो रहे थे जैसे नदियाँ समुद्रमें और क्रुद्ध मुखवाले सर्प बिमवटमें प्रवेश करते हैं। इधर अस्त्रधारी, शूरवीर देवगण तारकाक्षके उस नगरके ऊपर चारों ओर इस प्रकार छाये हुए थे, मानो पंखधारी पर्वत मँडरा रहे हों। गणेश्वर त्रिपुरमें तीन भागोंमें विभक्त होकर युद्ध कर रहे थे। उस समय विद्युन्माली और मय—ये दोनों युद्धस्थलमें वृक्षकी भाँति डटे हुए थे। इसी बीच हिमालय-तुल्य कान्तिमान् दैत्येन्द्र विद्युन्मालीने अपना भयंकर परिघ उठाकर नन्दीपर प्रहार किया। दानवेन्द्रके उस परिघके आघातसे नन्दी विशेषरूपसे घायल हो गये और वे ऐसा चक्कर काटने लगे, जैसे पूर्वकालमें दैत्यराज मधुके प्रहारसे अव्यक्तस्वरूप भगवान् नारायण भ्रमित हो गये थे ॥ ३९–४८ ॥ | | नन्दीश्वरे गते तत्र गणपाः ख्यातविक्रमाः ।<br>दुद्रुवुर्जातसंरम्भा विद्युन्मालिनमासुरम् ॥ ४९<br>घण्टाकर्णः शङ्कुकर्णो महाकालश्च पार्षदाः ।<br>ततश्च सायकैः सर्वान् गणपान् गणपाकृतीन् ॥ ५०<br>भूयो भूयः स विव्याध गणेश्वरमहत्तमान् ।<br>भित्त्वा भित्त्वा रुरावोच्चैर्नभस्यम्बुधरो यथा ॥ ५१<br>तस्यारम्भितशब्देन नन्दी दिनकरप्रभः ।<br>संज्ञां लभ्य ततः सोऽपि विद्युन्मालिनमाद्रवत् ॥ ५२ | नन्दीश्वरके घायल होकर रणभूमिसे हट जानेपर विख्यातपराक्रमी घण्टाकर्ण, शङ्कुकर्ण और महाकाल आदि प्रधान पार्षदगण क्रुद्ध होकर एक साथ राक्षस विद्युन्मालीके ऊपर टूट पड़े। तब विद्युन्मालीने उन सभी गणेश्वरोंको जो गणेश-सदृश आकृतिवाले तथा गणेश्वरोंमें प्रधान थे, बाणोंद्वारा लगातार बींधना आरम्भ किया। वह उन्हें घायल करके इतने उच्च स्वरसे सिंहनाद करता था मानो आकाशमें बादल गरज रहे हों। उसके उस सिंहनादसे सूर्य-सरीखे प्रभाशाली नन्दीकी मूर्च्छा भंग हो गयी, तब वे भी विद्युन्मालीपर चढ़ धाये। |

१३७- वापी-शोषणसे मयको चिन्ता, मय आदि दानवोंका त्रिपुरसहित समुद्रमें प्रवेश तथा शङ्करजीका इन्द्रको युद्ध करनेका आदेश

४८० * मत्स्यपुराण *

रुद्रदत्तं तदा दीप्तं दीप्तानलसमप्रभम्।<br>वज्रं वज्रनिभाङ्गस्य दानवस्य ससर्ज ह॥ ५३<br>तन्नन्दिभुजनिर्मुक्तं मुक्ताफलविभूषितम्।<br>पपात वक्षसि तदा वज्रं दैत्यस्य भीषणम्॥ ५४<br>स वज्रनिहतो दैत्यो वज्रसंहननोपमः।<br>पपात वज्राभिहतः शक्रेणाद्रिरिवाहतः॥ ५५<br>दैत्येश्वरं विनिहतं नन्दिना कुलनन्दिना।<br>चुक्रुशुर्दानवाः प्रेक्ष्य दुद्रुवुश्च गणाधिपाः॥ ५६<br>दुःखामर्षितरोषास्ते विद्युन्मालिनि पातिते।<br>द्रुमशैलमहावृष्टिं पयोदाः ससृजुर्यथा॥ ५७<br>ते पीड्यमाना गुरुभिर्गिरिभिश्च गणेश्वराः।<br>कर्तव्यं न विदुः किंचिद्दुन्मद्याधार्मिका इव॥ ५८<br>ततोऽसुरवरः श्रीमांस्तारकाख्यः प्रतापवान्।<br>स तरूणां गिरीणां वै तुल्यरूपधरो बभौ॥ ५९<br>भिन्नोत्तमाङ्गा गणपा भिन्नपादाङ्किताननाः।<br>विरेजुर्भुजगा मन्त्रैर्वार्यमाणा यथा तथा॥ ६०<br>मयेन मायावीर्येण वध्यमाना गणेश्वराः।<br>भ्रमन्ति बहुशब्दालाः पञ्जरे शकुनो इव॥ ६१<br>तथासुरवरः श्रीमांस्तारकाख्यः प्रतापवान्।<br>ददाह च बलं सर्वं शुष्केन्धनमिवानलः॥ ६२<br>तारकाख्येण वार्यन्ते शरवर्षैस्तदा गणाः।<br>मयेन मायानिहतास्तारकाख्येण चेषुभिः॥ ६३<br>गणेशा विधुरा जाता जीर्णमूला यथा द्रुमाः॥ ६४<br>भूयः सम्पतते चाग्निर्गृहान् ग्राहान् भुजङ्गमान्।<br>गिरीन्द्रांश्च हरीन् व्याघ्रान् वृक्षान् सूमरवर्णकान्॥ ६५<br>शरभानष्टपादांश्च आपः पवनमेव च।<br>मयो मायाबलेनैव पातयत्येव शत्रुषु॥ ६६<br>ते तारकाक्षेण मयेन मायया<br>सम्मुह्यमाना विवशा गणेश्वराः।<br>न शक्नुवंस्ते मनसापि चेष्टितुं<br>यथेन्द्रियार्था मुनिनाभिसंयताः॥ ६७उस समय उन्होंने रुद्रद्वारा दिये गये एवं प्रज्वलित अग्निके समान प्रभावशाली चमकते हुए वज्रको वज्रतुल्य कठोर शरीरवाले दानवके ऊपर चला दिया। तब नन्दीके हाथसे छूटा हुआ मोतियोंसे विभूषित वह भयंकर वज्र विद्युन्मालीके वक्षःस्थलपर जा गिरा। फिर तो वज्रके समान ठोस शरीरवाला दैत्य विद्युन्माली उस वज्रसे आहत होकर उसी प्रकार धराशायी हो गया, मानो इन्द्रके प्रहारसे पर्वत गिर पड़ा हो। अपने कुल (वर्ग)-को आनन्दित करनेवाले नन्दीद्वारा दैत्यराज विद्युन्मालीको मारा गया देखकर दानवलोग चीत्कार करने लगे। तब गणेश्वरोंने उनपर धावा बोल दिया। विद्युन्मालीके मारे जानेपर दानव दुःख और अमर्षके कारण क्रोधसे भरे हुए थे। वे गणेश्वरोंने ऊपर बादलकी भाँति वृक्षों और पर्वतोंकी महान् वृष्टि करने लगे। विशाल पर्वतोंके प्रहारसे पीड़ित हुए सभी गणेश्वर ऐसे किंकर्तव्यविमूढ हो गये, जैसे अधार्मिक जन वन्दनीय गुरुजनोंके प्रति हो जाते हैं। तदनन्तर असुरनायक प्रतापी श्रीमान् तारकाक्ष वृक्षों एवं पर्वतोंके समान रूप धारण करके रणभूमिमें उपस्थित हुआ॥ ४९-६०॥<br><br>उस समय बहुतेरे गणेश्वरोंके मस्तक फट गये थे, किन्हींके पैर टूट गये थे और कुछके मुखोंपर घाव लगा था। वे सभी मन्त्रोंद्वारा रोके गये सर्पकी तरह शोभा पा रहे थे। मायावी मयद्वारा मारे जाते हुए गणेश्वर पिंजरेमें बंद पक्षीकी तरह अनेकों प्रकारका शब्द करते हुए चक्कर काट रहे थे। तत्पश्चात् असुरश्रेष्ठ प्रतापी श्रीमान् तारकाक्षने पार्षदोंकी सारी सेनाको उसी प्रकार जलाना प्रारम्भ किया, जैसे आग सूखे इन्धनको जला देती है। तारकाक्ष बाणोंकी वर्षा करके पार्षदगणोंको रोक देता था। इस प्रकार मयकी माया और तारकाक्षके बाणोंद्वारा गणेश्वर मारे जा रहे थे। वे पुरानी जड़वाले वृक्षोंकी तरह व्याकुल हो गये। पुनः मयने अपनी मायाके बलपर शत्रुओंके ऊपर अग्निकी वर्षा की तथा ग्रह, मकर, सर्प, विशाल पर्वत, सिंह, बाघ, वृक्ष, काले हिरन और आठ पैरोंवाले शरभों (गैंडों)-को भी गिराया, जलकी घनघोर वृष्टि की और झंझावातका भी प्रकोप उत्पन्न किया। इस प्रकार तारकाक्ष और मयकी मायासे मोहित होकर वे गणेश्वर मनसे भी चेष्टा करनेमें असमर्थ हो गये। वे ऐसे निरुद्ध हो गये जैसे मुनियोंद्वारा रोके गये इन्द्रियोंके विषय।
* अध्याय १३५ *४८१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
महाजलाग्न्यादिसकुञ्जरोरगै-<br>र्हरीन्द्रव्याघ्रर्क्षतरक्षुराक्षसैः<br>विबाध्यमानास्तमसा विमोहिताः<br>समुद्रमध्येष्विव गाधकाङ्क्षिणः॥ ६८<br>सम्मर्द्यमानेषु गणेश्वरेषु<br>संनर्दमानेषु सुरेतरेषु।<br>ततः सुराणां प्रवराभिरक्षितं<br>रिपोर्बलं संविविशुः सहायुधाः॥ ६९<br>यमो गदास्त्रो वरुणश्च भास्कर-<br>स्तथा कुमारोऽमरकोटिसंयुतः ।<br>स्वयं च शक्रः सितनागवाहनः<br>कुलीशपाणिः सुरलोकपुङ्गवः ॥ ७०<br>स चोडुनाथः ससुतो दिवाकरः<br>स सान्तकस्त्र्यक्षपतिर्महाद्युतिः ।<br>एते रिपूणां प्रवराभिरक्षितं<br>तदा बलं संविविशुर्मदोद्धताः॥ ७१<br>यथा वनं दर्पितकुञ्जराधिपा<br>यथा नभः साम्बुधरं दिवाकरः।<br>यथा च सिंहैर्विजनेषु गोकुलं<br>तथा बलं तत्रिदशैर्भिद्रुतम् ॥ ७२<br>कृतप्रहारातुरदीनदानवं<br>ततस्त्वभज्यन्त बलं हि पार्षदाः।<br>स्वर्ज्योतिषां ज्योतिरिषोष्णवान् हरि-<br>र्यथा तमो घोरतरं नराणाम्॥ ७३<br>विशान्तयामास यथा सदैव<br>निशाकरः संचितशार्वरं तमः।<br>ततोऽपकृष्टे च तमः प्रभावे<br>ह्यस्त्रप्रभावे च विवर्धमाने ॥ ७४<br>दिग्लोकपालैर्गणनायकैश्च<br>कृतो महान् सिंहरवो मुहूर्तम्।<br>संख्ये विभग्ना विकरा विपादा-<br>श्छिन्नोत्तमाङ्गाः शरपूरिताङ्गाः॥ ७५<br>देवेतरा देववरैर्विभिन्नाः<br>सीदन्ति पङ्केषु यथा गजेन्द्राः।<br>वज्रेण भीमेन च वज्रपाणिः<br>शक्त्या च शक्त्या च मयूरकेतुः ॥ ७६उस समय प्रमथगण जल और अग्निकी महान् वृष्टि, हाथी, सर्प, सिंह, व्याघ्र, रीछ, चीते और राक्षसोंद्वारा सताये जा रहे थे। मायाका इतना घना अन्धकार प्रकट हुआ, जिसमें वे ऐसे विमोहित हो गये, जैसे समुद्रके मध्यमें जलकी थाह लगानेवाले विमूढ़ हो जाते हैं। इस प्रकार गणेश्वर पीड़ित किये जा रहे थे और दानवगण सिंहनाद कर रहे थे। इसी बीच प्रधान-प्रधान देवता अस्त्र धारणकर गणेश्वरोंकी रक्षा करनेके लिये शत्रुसेनामें प्रविष्ट हुए। उस अवसरपर गदाधारी यमराज, वरुण, भास्कर, एक करोड़ देवताओंके साथ कुमार कार्तिकेय, श्वेत हाथी ऐरावतपर सवार हो हाथमें वज्र लिये हुए स्वयं देवराज इन्द्र, चन्द्रमा और अपने पुत्र शनैश्चरके साथ सूर्य तथा अन्तकसहित परम तेजस्वी त्रिलोचन रुद्र—ये सभी मदोद्धत देवता उत्कृष्ट बलवानोंद्वारा सुरक्षित शत्रुओंकी सेनामें प्रविष्ट हुए। जिस प्रकार मतवाले गजेन्द्र वनमें, बादलोंसे घिरे हुए आकाशमें सूर्य और निर्जन स्थानमें स्थित गोष्ठमें सिंह प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार देवताओंने उस सेनापर धावा बोल दिया। फिर तो पार्षदगणोंने शस्त्रप्रहार करके दानवोंको ऐसा व्याकुल और दीन कर दिया कि उनका वह विशाल सेना-व्यूह उसी प्रकार छिन्न-भिन्न हो गया जैसे स्वर्गीय ज्योतिःपुञ्जोंके महान् ज्योति उष्णरश्मि सूर्य मनुष्योंके अन्धकारका विनाश कर देते हैं तथा चन्द्रमा रात्रिके घने अन्धकारका प्रशमन कर देते हैं॥ ६१—७३ १/२ ॥<br><br>तदनन्तर अन्धकारका प्रभाव नष्ट हो जाने और अस्त्रका प्रभाव बढ़नेपर दिक्पालों, लोकपालों और गणनायकोंने दो घड़ीतक महान् सिंहनाद किया। फिर तो वे युद्धमें दानवोंको विदीर्ण करने लगे। वहाँ किन्हींके हाथ कट गये तो किन्हींके पैर खण्डित हो गये, किन्हींके मस्तक कट गये तो किन्हींके शरीर बाणोंसे घिर गये। इस प्रकार देवश्रेष्ठोंद्वारा घायल किये गये दानव ऐसा कष्ट पा रहे थे, जैसे दलदलमें फँसे हुए गजराज विवश हो जाते हैं। उस समय वज्रपाणि इन्द्र अपने भयंकर वज्रसे, मयूरध्वज स्वामिकार्तिक शक्तिपूर्वक अपनी शक्तिसे,

४८२ * मत्स्यपुराण *


| दण्डेन चोग्रेण च धर्मराजः<br>पाशेन चोग्रेण च वारिगोप्ता।<br>शूलेन कालेन च यक्षराजो<br>वीर्येण तेजस्वितया सुकेशः॥ ७७<br>गणेश्वरास्ते सुरसंनिकाशाः<br>पूर्णाहुतीसिक्तशिखिप्रकाशाः ।<br>उत्सादयन्ते दनुपुत्रवृन्दान्<br>यथैव इन्द्राशनयः पतन्त्यः॥ ७८<br>मयस्तु देवान् परिरक्षितार-<br>मुमात्मजं देववरं कुमारम्।<br>शरेण भित्त्वा स हि तारकासुतं<br>स तारकाख्यासुरमभाषे॥ ७९<br>कृत्वा प्रहारं प्रविशामि वीरं<br>पुरं हि दैत्येन्द्र बलेन युक्तः।<br>विश्राममूर्जस्करमप्यवाप्य<br>पुनः करिष्यामि रणं प्रपन्नैः॥ ८०<br>वयं हि शस्त्रक्षतविक्षताङ्गा<br>विशीर्णशस्त्रध्वजवर्मवाहाः ।<br>जयैषिणस्ते जयकाशिनश्च<br>गणेश्वरा लोकवराधिपाश्च॥ ८१<br>मयस्य श्रुत्वा दिवि तारकाख्यो<br>वचोऽभिकाङ्क्षन् क्षतजोपमाक्षः।<br>विवेश तूर्णं त्रिपुरं दितेः सुतैः<br>सुतैरदित्या युधि वृद्धहर्षैः ॥ ८२<br>ततः सशङ्खानकभेरिभीमं<br>ससिंहनादं हरसैन्यमाभौ।<br>मयानुगं घोरगभीरगह्वरं<br>यथा हिमाद्रेर्गजसिंहनादितम्॥ ८३ | धर्मराज अपने भयंकर दण्डसे, वरुण अपने उग्र पाशसे और पराक्रम एवं तेजसे सम्पन्न सुन्दर बालोंवाले यक्षराज कुबेर अपने काल-सदृश शूलसे प्रहार कर रहे थे। देवताओंके समान तेजस्वी एवं पूर्णाहुतिसे सिक्त हुई अग्निके समान प्रकाशमान गणेश्वर दानववृन्दपर उसी प्रकार झपटते थे मानो बिजलियाँ गिर रही हों। तत्पश्चात् मयने देवताओंकी रक्षामें तत्पर पार्वती-नन्दन एवं तारका-पुत्र सर्वश्रेष्ठ कुमार कार्तिकेयको बाणसे घायल कर तारकाक्षसे कहा—'दैत्येन्द्र! हमलोगोंके शरीर शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत हो गये हैं तथा हमारे शस्त्रास्त्र, ध्वज, कवच और वाहन आदि भी छिन्न-भिन्न हो गये हैं। इधर गणेश्वरों तथा लोकनायक देवोंके मनमें जयकी अभिलाषा विशेषरूपसे जागरूक हो उठी है, साथ ही वे विजयी भी हो रहे हैं, अतः अब मैं इस वीरपर प्रहार करके सेनासहित नगरमें प्रवेश कर जाता हूँ और वहाँ कुछ देर विश्राम कर शक्ति-सम्पन्न होकर पुनः अनुचरोंसहित युद्ध करूँगा।' मयकी ऐसी बात सुनकर उसका पालन करता हुआ रुधिर-सरीखे लाल नेत्रोंवाला तारकाक्ष तुरंत ही आकाशमार्गसे दिति-पुत्रोंके साथ त्रिपुरमें प्रवेश कर गया। उस समय देवगण रणभूमिमें हर्षके मारे उछल पड़े। फिर तो मयका पीछा करते हुए भगवान् शंकरके सैनिक विशेष शोभा पा रहे थे। उनके शङ्ख, नगाड़े और भेरियाँ बजने लगीं तथा वे सिंहनाद करने लगे। उस समय ऐसा भीषण शब्द हो रहा था मानो हिमालय पर्वतकी भयंकर एवं गहरी गुफामें गजराज और सिंह दहाड़ रहे हों ॥ ७४-८३ ॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे इलावृते देवदानवयुद्धवर्णने प्रहारकृतं नाम पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाहप्रसङ्गमें इलावृतमें देव-दानव-युद्ध-प्रसङ्गमें परस्पर प्रहार नामक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३५॥

१३८- देवताओं और दानवोंमें घमासान युद्ध तथा तारकासुरका वध

* अध्याय १३६ *४८३

एक सौ छत्तीसवॉँ अध्याय

मयका चिन्तित होकर अद्भुत बावलीका निर्माण करना, नन्दिकेश्वर और तारकासुरका भीषण युद्ध तथा प्रमथगणोंकी मारसे विमुख होकर दानवोंका त्रिपुर-प्रवेश


सूत उवाच
मयः प्रहारं कृत्वा तु मायावी दानवर्षभः।<br>विवेश तूर्णं त्रिपुरमभ्रं नीलमिवाम्बरम्॥ १<br><br>स दीर्घमुष्णं निःश्वस्य दानवान् वीक्ष्य मध्यगान्।<br>दध्यौ लोकक्षये प्राप्ते कालं काल इवापरः॥ २<br><br>इन्द्रोऽपि बिभ्यते यस्य स्थितो युद्धेप्सुरग्रतः।<br>स चापि निधनं प्राप्तो विद्युन्माली महायशाः॥ ३<br><br>दुर्गं वै त्रिपुरस्यास्य न समं विद्यते पुरम्।<br>तस्याप्येषोऽनयः प्राप्तो नादुर्गं कारणं क्वचित्॥ ४<br><br>कालस्यैव वशे सर्वं दुर्गं दुर्गतरं च यत्।<br>काले क्रुद्धे कथं कालात्राणं नोऽद्य भविष्यति॥ ५<br><br>लोकेषु त्रिषु यत्किञ्चिद् बलं वै सर्वजन्तुषु।<br>कालस्य तद्वशं सर्वमिति पैतामहो विधिः॥ ६<br><br>अस्मिन् कः प्रभवेद् यो वै ह्यसंधार्येऽमितात्मनि।<br>लङ्घने कः समर्थः स्यादृते देवं महेश्वरम्॥ ७<br><br>बिभेमि नेन्द्राद्वि यमाद् वरुणान्न च वित्तपात्।<br>स्वामी चैषां तु देवानां दुर्जयः स महेश्वरः॥ ८<br><br>ऐश्वर्यस्य फलं यत्तत्प्रभुत्वस्य च समंततः।<br>तदद्य दर्शयिष्यामि यावद्वीराः समंततः॥ ९<br><br>वापीममृततोयेन पूर्णां स्रक्ष्ये वरौषधीः।<br>जीविष्यन्ति तदा दैत्याः संजीवनवरौषधैः॥ १०**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! दानवश्रेष्ठ मायावी मय स्वामिकार्तिकपर प्रहारकर त्रिपुरमें उसी प्रकार तुरंत प्रवेश कर गया, जैसे नीले आकाशमें बादल प्रविष्ट हो जाते हैं। वहाँ आकर उसने लम्बी और गरम साँस ली तथा त्रिपुरमें भागकर आये हुए दानवोंकी ओर देखकर लोकके विनाशके अवसरपर दूसरे कालके समान मय कालके विषयमें विचार करने लगा—'अहो! रणभूमिमें युद्धकी अभिलाषासे सम्मुख खड़ा हो जानेपर जिससे इन्द्र भी डरते थे वह महायशस्वी विद्युन्माली भी कालका ग्रास बन गया। त्रिलोकीमें इस त्रिपुरकी समतामें अन्य कोई दुर्ग अथवा पुर नहीं है, फिर भी इसपर भी ऐसी आपत्ति आ ही गयी, अतः (प्राणरक्षाके लिये) दुर्ग कोई कारण नहीं है। (इसलिये मैं तो ऐसा समझता हूँ कि) दुर्ग ही क्यों? दुर्गसे भी बढ़कर सभी वस्तुएँ कालके ही वशमें हैं। तब भला कालके कुपित हो जानेपर इस समय हमलोगोंकी कालसे रक्षा कैसे हो सकेगी? तीनों लोकों तथा समस्त प्राणियोंमें जो कुछ बल है, वह सारा-का-सारा कालके वशीभूत है—ऐसा ब्रह्माका विधान है। ऐसे अमित पराक्रमी एवं असाध्य कालके प्रति कौन-सा उद्योग सफल हो सकता है? भगवान् शंकरके अतिरिक्त उस कालपर विजय पानेमें कौन समर्थ हो सकता है? मैं इन्द्र, यम और वरुणसे नहीं डरता, कुबेरसे भी मुझे कोई भय नहीं है, किंतु इन देवताओंके स्वामी जो महेश्वर हैं, उनपर विजय पाना दुष्कर है। फिर भी जबतक ये दानववीर चारों ओर बिखरे हुए हैं, तबतक ऐश्वर्य-प्राप्तिका जो फल होता है तथा स्वामी बननेका जो फल होता है, उसे मैं प्रदर्शित करूँगा। मैं एक ऐसी बावलीका निर्माण करूँगा, जिसमें अमृतरूपी जल भरा होगा। साथ ही कुछ श्रेष्ठ ओषधियोंका भी आविष्कार करूँगा। उन श्रेष्ठ संजीवनी ओषधियोंके प्रयोगसे मरे हुए दैत्य जीवित हो जायेंगे'॥१—१०॥