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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

( १२२ ) चेटी- (विहस्योपविशति) विटः- (चषक्रमादाय) अरे चेडा सुमट्टिदं क्खु ए चसअं अरे चेट ! सुमृष्टं खल्वेतं चषकं करेहि अच्छसुराए । कुरु अच्छसुरया । चेटः- (नाट्येन चषकभरणं करोति) विटः- (स्वशिरः शेखरगत् पुष्पाणि गृहीत्वा चषके विन्यस्य जानुभ्यां स्थित्वा नवमालिकाया उपनयति) णोमालिए! चक्खिअ देहि एदं एदस्स । नवमालिके ! आस्वाद्य देह्येतदेतस्य ! चेटी- (सस्तिमम्) जं सेहरओ भणादि । यच्छेखरको भणति । [ तथा कृत्वा विटस्यार्पयति ] विटः - ( विदूषकस्य चषकमर्पयति ) एदं णोमालिआ- एतन्नवमालिका- मुहसंसग्गमविसेसवामिअरसं सेहरआअण्णेण मुखसंसर्गसविशेषवासितरसं शेखरकादन्येन केणवि अणासादिदपुरुव्वं ता पिवेहि एदं । किं केनाप्यनास्वादितपूर्वं, तत् पिवैतत् । किं दे अवरं सम्माणं करिस्सं ? तेऽपरं सम्मानं करिष्यामि ? विदूषकः- (सवैलक्ष्यस्मितं¹ कृत्वा ) सेहरअ ! बम्हणो क्खु अहं । शेखरक ! ब्राह्मणः खल्वहम्² ।

( १२३ ) चेटी— (हँसती हुई बैठ जाती ) विट— (शराब का प्याला लेकर) अरे चेट ! इस प्याले को बढ़िया शराब से अच्छी तरह भर दे । चेट— (प्याला भरने का अभिनय करता है) विट— (अपने सिर के मुकुट से फूल लेकर प्याले में डाल कर, घुटनो के बल बैठ कर नवमालिका के पास ले जाता है) नवमालिका !' चख कर यह इसे दो । चेटी—(मुस्कराते हुए)—जैसे शेखरक कहे । [वैसा ही कर के विट को दे देती है ] विट— (विदूषक को प्याला देता है)—नवमालिका के मुख के सम्पर्क से विशेष रूप से सुगन्धित इस रस को पिओ जिसका स्वाद शेखरक को छोड़ अभी तक और किसी ने नहीं लिया ! इस से बढ़ कर और मैं तेरा क्या आदर कर सकता हूँ । विदूषक—(विचित्र अथवा बनावटी हँसी के साथ) शेखरक ! मैं (तो) ब्राह्मण हूँ । ————————————————————————

  1. घबराहट की हँसी; कृत्रिम हँसी; दिखावे की हँसी; विचित्र हँसी ।
  2. ब्राह्मण के लिए मद्यपान वर्जित है—‘‘ब्राह्मणो मद्यपानाद्धि ब्राह्मण्यादेव हीयते’’।

( १२४ ) विटः- जइ तुम बम्हणो, ता कहिं दे बम्हसुत्तं ? यदि त्वं ब्राह्मणः, तत्क्व ते ब्रह्मसूत्रम् ? विदूषकः - (यज्ञोपवीतं स्वशरीरेऽदृष्ट्वा) तं क्खु मे इमिणा तत्खलु मेऽनेन चेटेण कट्टीअमाणं छिन्नं । चेटेन कृष्यमाणं छिन्नम् । चेटो-(विहस्य) जइ एवं ता वेइक्खराईं पि दाव कतिवि उदाहरा यद्येवं तद्वेदाक्षराण्यपि तावत् कत्यप्युदाहर । विदूषकः-भोदि ! इमिणा शीधुगन्धेण पिणद्धाईं मे वेइक्खराईं । भवति ! अनेन शीधुगन्धेन पिद्धानि मे वेदाक्षराणि । अहवा, किं मम भोदीए समं विवादेण । एसो दे अथवा, किं मम भवत्या समं विवादेन । एष ते बम्हणो पादेसु पडदि । ब्राह्मणः पादयोः पतति । [ इति पादयोः पतितुमिच्छति ] चेटो- (हस्ताभ्यां निवार्य) मा क्खु एवं करेदु अज्जो । सेहरअ मा खल्वेवं करोत्वार्यः । शेखरक ! ओसर ओसर । सच्चं बम्हणो क्खु एसो । अपसरापसर । सत्यं ब्राह्मणः खल्वेषः । (विदूषकस्य पादयोः पतति) अज्ज ! ण तुए कुविदव्वं । आर्य ! न त्वया कुपितव्यम् । सम्बन्धिआणुरूओ क्खु एसो मए परिहासो किदो । सम्बन्धिकानुरूपः खल्वेष मया परिहासः कृतः ।

( १२५ ) विट—यदि तू ब्राह्मण है तो तेरा यज्ञोपवीत कहाँ है ? विदूषक—(अपने शरीर पर यज्ञोपवीत न देखकर) उस मेरे यज्ञोपवीत को इस चेट ने खींचते हुए तोड़ डाला है । चेटी—(हँसते हुए) यदि ऐसा ही है तो कुछ वेद के मन्त्र ही बोल । विदूषक— भद्रे ! इस शराब की बू से मेरे वेद मन्त्र भी बन्द हो गए हैं । अथवा, आप के साथ विवाद करने से मुझे क्या लाभ ? (लो) यह ब्राह्मण आप के पैरों पड़ता है । [यह कह कर उसके पैरों पर गिरना चाहता है] चेटी—(हाथो से रोक कर)— आर्य ! ऐसा मत करें । शेखरक ! हटो, हटो ! यह सचमुच ब्राह्मण ही है । (विदूषक के पैरों पर गिरती है) आर्य, आप नाराज़ न हों । सम्बन्धी के अनुरूप ही मैं ने ऐसा मज़ाक किया है ।

  1. बन्द हो गए हैं; मानों उन पर पर्दा पड़ गया है; मैं भूल गया हूँ । वस्तुतः उसे कोई वेद मन्त्र याद नहीं । शराब की बू का तो केवल बहाना ही है । इसी लिए अगले ही वाक्य में हथियार डाल देता है ।

( १२६ ) विटः — अहम्पि णं पसादेमि । [पादयोर्निपत्य] मरिसेदु अहम्प्येनं प्रसाद्यामि । मर्षयतु, मरिसेदु अज्जो, जं मए मदपरवसेण अवरद्धं, जेण अहं मर्षयतु, आर्यः, यन्मया मदपरवशेनापराद्धम् ; येनाहं णोमालिए सह आवाणअं गमिस्सं । नवमालिकया सहापानकं गमिष्यामि । विदूषकः—मरिसीदं मए, गच्छ तुम्हे, अहंपि पिअवअस्सं मर्षितं मया, गच्छतं युवाम् । अहमपि प्रियवयस्यं पेक्खामि । प्रेक्षे । [निष्क्रान्तो विटश्चेट्या सह चेटश्च] विदूषकः— अदिक्कंतो बम्हणस्स अकालमित्तू । ता जाव अतिक्रान्तो ब्राह्मणस्याकालमृत्युः । तद्याव- अहंपि मत्तवालअस्सङ्गदूसिदो इध दिग्धिकाए ण्हाइस्सं । दहमपि मत्तवालकसङ्गदूषित इह दीर्घिकायां स्नास्यामि । [तथा करोति । नेपथ्याभिमुखमवलोक्य]—एसो पिअवअस्सोवि एष प्रियवयस्योऽपि रुक्किणीं विअ हरी मलयवदीं अवलम्बिअ इदो जेव्व रुक्मिणीमिव हरिर्मलयवतीमवलम्ब्य इत एव- आगच्छदि । ता जाव पासपरिवित्ती होमि । आगच्छति । तद्यावत्पार्श्ववर्ती भवामि । [ततः प्रविशति गृहीतवरनेपथ्यो नायको मलयवती विभवतश्च परिवारः]

An exact line-by-line transcription of the page into Devanagari script:

( १२७ ) विट- मैं भी इन को मनाता हूँ। (पैरों पर गिरकर) क्षमा करें आर्य ! जो कुछ मैं ने नशे के जोश में अपराध किया है उसे आप क्षमा करें ताकि मैं नवमालिका के साथ मधुशाला को जाऊं । विदूषक-मैं ने, क्षमा किया। आप दोनों जाइए। मैं भी अपने प्रिय मित्र को देखता हूँ। [चेट्टी के साथ विट और चेट का प्रस्थान] विदूषक- (सुफ) ब्राह्मण की अकाल मृत्यु टल गई। तो मैं शराबी के सम्पर्क से दूषित हुआ इस तालाब में स्नान करता हूँ। [वैसा ही करता है। (फिर) पर्दे की ओर देखकर] यह मेरा प्रिय मित्र, रुक्मणी को लिए कृष्ण के समान, मलयवती के साथ इधर ही आ रहा है। तो मैं भी इनके पास ही जाता हूँ। [वर वेष में नायक, मलयवती और वैभव के अनुरूप नौकरों का प्रवेश]

  1. आपानकं = पानशाला; भट्टी; मधुशाला; शराब पीने की जगह; शराब की दुकान ।
  2. अवलम्ब्य = सहारा लेकर; हाथ पकड़ कर; उसके सङ्ग ।

( १२८ ) नायकः—(मलयवतीमवलोक्य सहर्षम् ) दृष्टा दृष्टिमधो ददाति, कुरुते नालापमाभाषिता, शय्यायां परिवृत्य तिष्ठति, बलादालिङ्गिता वेपते। निर्यान्तीषु सखीषु ^1वासभवनान्निर्गन्तुमेवेहते । जातो ^2वामतयैव मेऽद्य सुतरां प्रीतयै नवोढा प्रिया ॥४॥ (मलयवतीं पश्यन्) हुङ्कारं ददता मया प्रतिवचो यन्मौनमासेवितं, यद्दावानल दीप्तिभिस्तनुरियं चन्द्रातपैस्तापिता ध्यातं यत्सुबहून्यनन्यमनसा नक्तन्दिनानि प्रिये ! तस्यैतत् तपसः फलं मुखमिदं पश्यामि यत्तेऽधुना ॥ ५ ॥ नायिका—(अपवार्य) हञ्जे चतुरिए ! ण केवलं दंसणीओ, हञ्जे चतुरिके ! न केवलं दर्शनीयः, श्लोक नं०: ४, अन्वयः— दृष्टा दृष्टिमधो ददाति, आभाषिता आलापं न कुरुते; शय्यायां परिवृत्य तिष्ठति, बलात् आलिङ्गिता वेपते । वासभवनात् सखीषु निर्यान्तीषु निर्गन्तुम् इव ईहते, वामतया एव अद्य मे नवोढा प्रिया सुतरां प्रीत्यै जाता ॥ श्लोक नं०: ५ अन्वयः— यत् प्रतिवचः हुङ्कारं ददता मया मौनम् आसेवितम् ; यत् दावानलदीप्तिभिः चन्द्रातपैः इयं तनुः तापिता; यत् सुवहूनि नक्तन्दिनानि अनन्यमनसा (मया) ध्यातम्; (हे) प्रिये ! तस्य तपसः एतत् फलं यत् ते इदं मुखं अधुना पश्यामि ॥-

( १२६ ) नायक—(मलयवती को देख कर, हर्षपूर्वक) जब मैं इसे देखता हूँ तो यह अपनी दृष्टि नीचे कर लेती है; यदि मैं बातचीत करता हूँ तो यह बोलती ही नहीं; शय्या पर यह अपना मुख दूसरी ओर किए रहती है; बलात् (ज़बरदस्ती) आलिङ्गन करने पर काँपने लगती हैं; जब इसकी सहेलियां कमरे से जाने लगती हैं तो यह भी मानों निकल जाना चाहती है; इस प्रतिकूल आचरण से मेरी नवविवाहिता प्रिया और भी अधिक आनन्द का कारण बन गई है । (मलयवती को देख कर)— हे प्रिये ! (लोगों की) प्रत्येक बात के उत्तर में केवल हुङ्कार (हूँ, हूँ) करते हुए जो मैं ने मौनव्रत का पालन किया, दावाग्नि के समान गरम चन्द्रमा की किरणों से जो अपने इस शरीर को तपाया, बहुत काल तक रात-दिन एकाग्रचित्त से जो (तेरा ही) ध्यान किया— उसी तपस्या का यह फल है कि तेरा यह मुख अब देख रहा हूँ । नायिका—(अलग) सखी चतुरिका ! यह केवल सुन्दर ही नहीं, अपितु

  1. वासभवनं = रहने की जगह; घर; अथवा कमरा; शयनगृह ।
  2. वामता = विरुद्ध आचरण; इच्छा के प्रतिकूल आचरण ।

( १३० ) पिअंपि भणितुं जाणादि । प्रियमपि भणितुं जानाति । चेटी - (विहस्य) अयि पडिपक्खवादिणि ! सच्चं जेव एदं, अयि ¹प्रतिपक्षवादिनि ! सत्यमेवैतत् । किं एत्थ पिअवअणं ? किमत्र प्रियवचनम् ? नायकः—चतुरिके ! आदेशय मार्गं कुसुमाकरोद्यानस्य । चेटी - एदु एदु भट्टा । एतु एतु भर्त्ता । नायकः-(परिक्रामन्नायिकां निर्दिश्य) स्वैरं स्वैरमागच्छतु भवती । खेदाय स्तनभार एव, किमु ते मध्यस्य हारोऽपरः ? ²ताम्यत्यूरयुगं नितम्बभरतः, काञ्च्याऽनया किं पुनः ? शक्तिः पादयुगस्य नोरुयुगलं वोढुं, कुतो नूपुरौ ? स्वाङ्गैरैव विभूषिताऽसि, वहसि क्लेशाय किं मण्डनम् ? ॥६॥ चेटी-एदं क्खु तं कुसुमाअरुज्जाणं ता पविसदु भट्टा एतत्खलु तत्कुसुमाकरोद्यानम् । तत्प्रविशतु भर्त्ता । [सर्वे प्रविशन्ति] श्लोक नं०: ६, अन्वयः - स्तनभार एव ते मध्यस्य खेदाय, किमु अपरः हारः ? नितम्बभरतः (एव) ऊरुयुगं ताम्यति, अनया काञ्च्या पुनः किम् ? ऊरुयुगलं वोढुं पादयुगस्य शक्तिः न, कुतो नूपुरौ ? स्वाङ्गैः एव विभूषिताऽसि, (तत् ) क्लेशाय मण्डनं कि वहसि ?

( १३१ ) मीठा बोलना भी जानते हैं । चेटी - (हँसकर) अरी उल्टी बातें कहने वाली ! यह तो सच्चाई है । इस में मीठा बोल (चापलूसी) क्या है ? नायक - चतुरिका ! कुसुमाकर उद्यान का मार्ग बता । चेटी - आइए, स्वामी ! आइए । नायक - (घूमते हुए, नायिका से) देवी ! ज़रा धीरे धीरे आइए । तुम्हारे स्तनों का भार ही तुम्हारी कमर को कष्ट देने के लिए (पर्याप्त) है, फिर दूसरे हार से क्या (लाभ) ? नितम्बों के भार से ही दोनों जंघाएँ खिन्न हैं; फिर इस मेखला से क्या (लाभ) ? दोनों जँघाओं को वहन करने की शक्ति (भी) तेरे पैरों में नहीं फिर यह नूपुर (पाज़ेब) क्यों ? तुम तो अपने (सुन्दर) से ही विभूषित (सजी हुई) हो, फिर (इन अङ्गों को) क्लेश देने के लिए इन आभूषणों को क्यों धारण कर रही हो ? चेटी - यही वह कुसुमाकर उद्यान है । तो स्वामी प्रवेश करें । [सब प्रवेश करते हैं]

  1. विरोधी पक्ष का समर्थन करने वाली; विरुद्ध, विपरीत अथवा प्रतिकूल भाषिणी; उल्टी बातें करने वाली ।
  2. थक गई हैं; खिन्न हैं; क्लेश अनुभव कर रही हैं ।

( १३२ )

नायकः- (विलोक्य) अहो नु कुसुमाकरोद्यानस्य परा श्रीः ! इह हि- निष्यन्दश्चन्दनानां शिशिरयति लतामण्डपे ^1कुट्टिमान्तान्, आराद् धारागृहाणां ^2 ध्वनिमनु तनुते ताण्डवं नीलकण्ठः। यन्त्रोन्मुक्तश्च वेगाच्चलति विटपिनां पूरयन्नालवालान्, आपातोत्पीडहेलाहृतकुसुमरजः ^3पिञ्जरोऽयं जलौघः ॥७॥ अपि च- अमी गीतारम्भैर्मुखरितलतामण्डपभुवः, परागैः पुष्पाणां ^4प्रकटपटवास^5व्यतिकराः पिबन्तः पर्याप्तं सह सहचरीभिर्मधुरसं, समन्तादापानोत्सवमनुभवन्तीह मधुपाः ॥८॥ विदूषकः- (उपसृत्य) जेदु जेदु भवं । सोत्थि भोदिए । जयतु जयतु भवान् । स्वस्ति भवत्यै ।

श्लोक नं०: ७, अन्वयः- चन्दनानां निष्यन्दः लतामण्डपे कुट्टिमान्तान् शिशिरयति; आराद् धारागृहाणां ध्वनिमनु नीलकण्ठः ताण्डवं तनुते । यन्त्रोन्मुक्तश्च आपातोत्पीडहेलाहृतकुसुमरजः पिञ्जरोऽयं जलौघः विटपिनाम् आलवालान् पूरयन् वेगात् चलति । श्लोक नंः ८, अन्वयः- गीतारम्भैः मुखरितलतामण्डपभुवः, पुष्पाणां परागैः प्रकटपटवासव्यतिकराः, सहचरीभिः सह पर्याप्तं मधुरसं पिबन्तः, अमी मधुपाः इह समन्ताद् आपानोत्सवम् अनुभवन्ति ।

( १३३ ) नायक— (देखकर) अहा, इस कुसुमाकर उद्यान की शोभा कितनी उत्कृष्ट है ! यहाँ— चन्दन वृक्षों से चूता हुआ रस लताकुञ्ज में वेदी के किनारों को ठण्डा कर रहा है; समीप ही फ़व्वारों की ध्वनि के पश्चात् मोर नाचने लगा है; जल यन्त्रों से निकला हुआ, ज़ोर से गिरने से पीड़ित फूलों की धूलि को हरण करने से पीला हुआ, यह जल का समूह प्रवाह) वृक्षों की क्यारियों को भरता हुआ बड़े वेग से बह रहा है। और भी— गाना शुरू करने से लताकुञ्जों के (भीतरी) भागों को शब्दायमान करने वाले, फूलों की धूलि से स्पष्ट अङ्गराग धारण करने वाले, अपनी प्रियाओं के साथ मधु-रस का पर्याप्त पान करते हुए ये भौंरे यहां चारों ओर (मानों) पान महोत्सव (शराब पीने का उत्सव) मना रहे हैं । विदूषक- (पास जाकर) महाराज की जय हो । देवी, आपका कल्याण हो ।

  1. वेदी अथवा फ़र्श । चबूतरा ।
  2. फ़व्वारों का घर । फ़व्वारे । प्रपात गृह ।
  3. पीला; लालपीला; सुनहरी । 4. सुगन्धित पाऊडर; अङ्गराग ।
  4. व्यतिकर: = मेल; सम्पर्क; अदला बदली ।

( १३४ ) नायकः — वयस्य ! चिरादागतोऽसि । विदूषकः —भो वअस्स ! लहुं जेव्व आअदोम्हि । किं उण भो वयस्य ! लघ्वेवागतोऽस्मि । किं¹ पुन- विआहमहूसव मिलिदसिद्धविज्जाहराणं आपाणदंसणकोदूहलेण विवाह महोत्सवमिलितसिद्धविद्याधराणामापानदर्शनकौतूहलेन परिब्भमंतो एत्तिअं वेलं चिट्ठिदोम्हि । ता तुमं पि दाव परिभ्रमन्नेतावतीं वेलां स्थितोऽस्मि । तत्त्वमपि ताव- पेक्ख । त्प्रेक्षस्व । नायकः—एवं यथाह भवान् । (समन्तादवलोकयन् ) वयस्य ! पश्य, पश्य— दिग्धाङ्गा ²हरिचन्दनेन, दधतः सन्तानकानां स्रजो माणिक्याभरणाप्रभाव्यतिकरै³श्चित्रीकृताच्छांशुकाः । सार्धं⁴ सिद्धजनैर्मधूनि दयितापीतावशिष्टान्यमी मिश्रीभूय पिबन्ति चन्दनतरुच्छायासु विद्याधराः ॥६॥ तदेहि वयमपि तां तमालवीथिकां गच्छामः । [सर्वे परिक्रामन्ति] श्लोक नं०: ६, अन्वयः — हरिचन्दनेन दिग्धाङ्गाः, सन्तानकानां स्रजो दधतः, माणिक्याभरणप्रभाव्यतिकरैः चित्रीकृताच्छांशुकाः अमी विद्याधराः सिद्धजनैः सार्धं मिश्रीभूय दयितापीतावशिष्टानि मधूनि चन्दनतरुच्छायासु पिबन्ति ।

( १२७ ) विदूषक— यह रही तमालवीथी । यहां फिरते फिरते मानों श्रीमती जी थकी हुई सी दिखाई दे रही हैं । अतः यहीं स्फटिक मणि- शिला के ऊपर बैठ कर विश्राम कर लें । नायक — मित्र ! आप ने खूब देखा— प्यारी का यह मुख अपनी गालों की शोभा से चन्द्रमा को जीतकर, गरमी से लाल होकर निश्चय अब मानों (लाल) कमल को भी जीतना चाहता है । (मलयवती का हाथ पकड़ कर)- प्रिये ! (आओ) यहां बैठें । नायिका — जैसे आर्यपुत्र की आज्ञा । [ सब बैठ जाते हैं.] नायक — (नायिका का मुख ऊँचा करके, देखते हुए)-हे प्रिये ! हम ने कुसुमाकर उद्यान को देखने की उत्सुकता से तुम्हें व्यर्थ ही कष्ट दिया । क्योंकि— भौंहों रूपी लताओं से सुशोभित और लाल होंठ रूपी कोमल पत्तों से युक्त यह तुम्हारा मुख ही नन्दन वन है । इस से अति- रिक्त दूसरा बाग़ तो जङ्गल ही (के समान) है ।

  1. परिखेदिता = दुःखी, क्लेश युक्त, थकी हुई ।
  2. आर्यपुत्रः = प्राणनाथ, आप । आर्य ( = सज्जन, पूज्य, ससुर) का पुत्र । संस्कृत नाटकों में स्त्रियां अपने पतियों को प्रायः इसी नाम से पुकारती हैं ।
  3. 'अधर' प्रायः निचले होंठ के लिए प्रयुक्त होता है।
  4. नन्दन = सब को आनन्द देने वाला; इन्द्र का प्रसिद्ध बाग़ ।

( १३८ ) चेटी-(सस्मितं विदूषकं निर्दिश्य) सुदं तुए, भद्दिदारिआ कहं वण्णिदेत्ति । श्रुतं त्वया; भर्तृदारिका कथं वर्णितेति । विदूषकः- (सस्मितम् ) चउरिए ! मा एवं गव्वं उव्वह । चतुरिके ! मैवं गर्वमुद्वह । अम्हाणं पि मज्झे दंसणीओ जणो अत्थि एव्व । अस्माकमपि मध्ये दर्शनीयो जनोऽस्त्येव । केवलं मच्छरेण को वि ण वण्णेदि । केवलं मत्सरेण कोऽपि न वर्णयति । चेटी-(सस्मितम्) अज्ज ! अहं तुमं वण्णामि । आर्य ! अहं त्वां वर्णयामि¹ । विदूषकः- (सहर्षम्) भोदि ! जीविदोम्हि । ता करेदु भोदि भवति ! 'जीवितोऽस्मि । तत्करोतु भवती पसादं, जेण एसो मं पुणोवि ण भणादि, जहा- प्रसादं, येनैष मां पुनरपि न भणति, यथा- तुमं ईदिसो तादिसो कविलमंकडाआरो त्ति । त्वमीदृशस्तादृशः कपिङ्गलमर्कटाकार इति । चेटी- अज्ज ! तुमं मए विआहजाअरणे णिद्दाअमाणो आर्य ! त्वं मया विवाहजागरणे निद्रायमाणो णिमीलिअ अच्छो सोहणो दिट्ठो । ता तह ज्जेव्व चिट्ठ, निमीलिताक्षः शोभनो दृष्टः । तत्तथैव तिष्ठ, जेण वण्णेमि । येन वर्णयामि ।

( १३६ ) चेटी — (मुस्कराते हुए, विदूषक से) क्या तुम ने सुना किस प्रकार राजकुमारी का वर्णन किया गया है। विदूषक — (मुस्कराते हुए) चतुरिका ! इस प्रकार गर्व न कर । हमारे बीच भी सुन्दर व्यक्ति है। केवल ईर्ष्या से कोई (उसका) वर्णन नहीं करता । चेटी — (मुस्कराते हुए) आर्य ! मैं आप का वर्णन (गुणों की प्रशंसा, अथवा, रंगना) करती हूँ। विदूषक — (हर्षपूर्वक) श्रीमति, मानों मैं जी पड़ा। अतः मुझ पर कृपा कीजिए जिस से यह फिर मुझे यह न कह सके कि 'तू ऐसा है, वैसा है, भूरे बन्दर की शक्ल वाला है' इत्यादि । चेटी — आर्य ! विवाह में जागरण के समय आँखें बन्द कर के ऊंघते हुए आप मुझे बड़े सुन्दर दिखाई दे रहे थे। अतः उसी अवस्था में बैठे रहो ताकि मैं वर्णन करूं ।

  1. 'वर्णयामि' के दो अर्थ हैं। विदूषक इस का 'गुणों की प्रशंसा' अर्थ लेता है। परन्तु चेटी 'रंगना' अर्थ में इस का प्रयोग करती है।
  2. मेरी जान में जान आ गई।

( १४० ) विदूषकः - ( तथा करोति ) चेटी - (स्वगतम्)- जाव एसो णिमीलिअअच्छो चिट्ठदि यावदेष निमीलिताक्षस्तिष्ठति, दाव णीलरसाणुआरिणा तमालपल्लवरसेण मुहं से तावन्नीलरसानुकारिणा तमालपल्लवरसेन मुखमस्य कालीकरिस्सं । कालीकरिष्यामि । [उत्थाय तमालपल्लवग्रहणं तन्निपीडनं च नाटयति । नायको नायिका च विदूषकं पश्यतः।] नायकः- वयस्य ! धन्यः खल्वसि, योऽस्मासु १ तिष्ठत्सु त्वमेवं वर्ण्यसे । [ चेटी तमालरसेन विदूषकस्य मुखं कालीकरोति, ] नायिका--[सस्मितं विदूषकं दृष्ट्वा नायकं पश्यति] नायकः-(नायिकामुखं दृष्ट्वा)- स्मितपुष्पोद्गमोऽयं ते दृश्यतेऽधरपल्लवे । २ फलं त्वन्यत्रमुग्धाक्षि ! चक्षुषोर्मम पश्यतः ३ ॥ १२ ॥ विदूषकः - भो दे ! किं तुए किदं ? भवति ! कि त्वया कृतम् ? श्लोक नं : १२, अन्वयः- (हे) मुग्धाक्षि ! अधरपल्लवे तेऽयं स्मितपुष्पोद्गमो दृश्यते । (परमस्य पुष्पोद्गमस्य) फलं तु अन्यत्र पश्यतः मम चक्षुषोः (जातम्) ।

( १४७ ) विदूषक - (वैसा ही करता है) चेटी - (मन ही मन) जब तक यह आँखें बन्द किए ठहरा है तब तक नीले रस के समान तमाल पत्र के रस से इस का मुंह काला करती हूँ। [उठ कर तमाल पत्र को लेने तथा उसे निचोड़ने का अभिनय करती है। नायक तथा नायिका विदूषक को देखते हैं] नायक - मित्र ! तुम सचमुच धन्य हो जो हमारे रहते हुए भी तुम्हारा (ही) इस तरह से वर्णन किया जा रहा है। (तुम रंगे जा रहे हो)। [चेटी तमाल रस से विदूषक के मुख को काला कर देती है] नायिका - (मुस्कराते हुए विदूषक को देख कर नायक को देखती है) नायक - (नायिका के मुख को देखकर - हे सुन्दर आंखों वालो ! तुम्हारे होंठ रूपी कोमल पत्तों में यह मुस्कान रूपी फूलों का निकलना दिखाई दे रहा है। परन्तु (इस फूल का) फल तो कहीं और मुझ देखने वाले की आंखों में (हो रहा है)। (अर्थात् तुम्हारी मुस्कान को देखकर मेरी आंखें सफल हो गईं) विदूषक - भद्रे ! तुमने क्या किया ?

  1. सती सप्तमी ।
  2. यह साधारण नियम है कि जहां फूल लगता है फल भी वहीं लगता है; परन्तु स्मित रूपी फूल तेरे ओष्ठ रूपी पल्लव पर खिला है, परन्तु सफल (फलयुक्त) मेरी आंखें हो रही हैं। 'फल' पर श्लेष है - (i) फल, अथवा (ii) परिणाम। यहां फल, आंखों को होने वाला आनन्द है।
  3. पश्यतः = दृश् + शतृ + पु० + षष्ठी एक वचन । 'मम' का विशेषण ।

( १४२ ) चेटी- णं वञ्चिणादोसि । ननु वञ्चितोऽसि । विदूषकः- (हस्तेन मुखं प्रमृज्य हस्तं दृष्ट्वा सरोषं दण्डकाष्ठमुद्यम्य) आः दासीए धीए ! राअउलं क्खु एदं । किं क्ख करिस्सं ? आः दास्याः पुत्रि ! राजकुलं खल्वेतत् । किं तव करिष्यामि ? (नायकमुद्दिश्य) भो ! तुम्हाणं पुरदो एव्व अहं दासीए- भो ! युवयोः पुरत एवाहं दास्याः- धीआए खलीकिदो । ता किं मम इध ट्ठिदेण ? अण्णदो पुत्र्या खलीकृतः¹ । तत्किं ममेह स्थितेन ? अन्यतो गमिस्सं । गमिष्यामि । [निष्क्रामति] चेटी-कुविदो मे अज्जअत्तेओ, जाव णं गदुअ पसादइस्सं । कुपितो मे आर्यात्रेयः, यावदेनं गत्वा प्रसादयिष्यामि । [गन्तुमिच्छति] नायिका-हञ्जे चदुरिए ! कहं मं एआइणीं उज्झिअ हञ्जे चतुरिके ! कथं मामेकाकिनीमुज्झित्वा गच्छसि ? गच्छसि ? चेटी-(नायकमुद्दिश्य सस्मितम् ) एव्वं एआइणी चिरं होहि । एवमेकाकिनी चिरं भव । [इति निष्क्रान्ता]

( १५३ ) चेटी - सचमुच तुम्हारा वर्णन (रंगन) किया है। विदूषक- (हाथ से मुंह पोंछ कर, हाथ को देखकर; क्रोध से डण्डा उठा कर) अरी दुष्टा ! यह राजकुल है। तुम्हारा क्या करूँ ? (नायक से) आप लोगों के सम्मुख ही इस नीच ने मेरा अपमान किया है। तो मेरे यहाँ ठहरने से क्या लाभ ? वहीं और चला जाता हूँ। (निकल जाता है) चेटी- आर्य आत्रेय मुझ से नाराज़ हो गए ? अतः जाकर उन्हें मनाती हूँ। (जाना चाहती है) नायक - सखी चतुरिका ! क्या मुझे अकेली छोड़ कर जा रही हो ? चेटी- (नायक की ओर देखकर मुस्कराती हुई) ऐसी अकेली (तो) तू चिरकाल तक रह। [यह कह कर प्रस्थान]

  1. खलीकृत = उल्लू बनाया गया हूँ। इस ने बुरा सलूक किया है।