संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३
५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३ [संस्कृत श्लोक] तयैवमुक्तः सावित्र्या भिक्षामदाय सोऽग्रतः। चिन्तयन् मनसा तस्याः शक्तिं दूरार्थवेदिनीम्॥ ३१ एत्याश्रमे मठे स्थाप्य भिक्षापात्रं प्रयत्नतः। पतिव्रतायां भुक्तायां गृहस्थे निर्गते पतौ॥ ३२ पुनरागम्य तद्गेहं तामुवाच पतिव्रताम्। ब्रह्मचार्युवाच प्रब्रूह्येतन्महाभागे पृच्छतो मे यथार्थतः॥ ३३ विप्रकृष्टार्थविज्ञानं कथमाशु तवाभवत्। इत्युक्ता तेन सा साध्वी सावित्री तु पतिव्रता॥ ३४ तं ब्रह्मचारिणं प्राह पृच्छन्तं गृहमेत्य वै। शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ ३५ तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि स्वधर्मपरिबृंहितम्। स्त्रीणां तु पतिशुश्रूषा धर्म एषः परःस्थितः॥ ३६ तमेवाहं सदा कुर्यां नान्यमस्मि महामते। दिवारात्रमसंदिग्धं श्रद्धया परितोषणम्॥ ३७ कुर्वन्त्या मम सम्भूतं विप्रकृष्टार्थदर्शनम्। अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि निबोध त्वं यदीच्छसि॥ ३८ पिता यायावरः शुद्धस्तस्माद्वेदमधीत्य वै। मृते पितरि कृत्वा तु प्रेतकार्यमिहागतः॥ ३९ उत्सृज्य मातरं द्रष्टुं वृद्धां दीनां तपस्विनीम्। अनाथां विधवामत्र नित्यं स्वोदरपोषकः॥ ४० यया गर्भे धृतः पूर्वं पालितो लालितस्तथा। तां त्यक्त्वा विपिने धर्मं चरन् विप्र न लज्जसे॥ ४१ यया तव कृतं ब्रह्मन् बाल्ये मलनिकृन्तनम्। दुःखितां तां गृहे त्यक्त्वा किं भवेद्विपिनेऽटतः॥ ४२ मातृदुःखेन ते वक्त्रं पूतिगन्धमिदं भवेत्। पित्रैव संस्कृतो यस्मात् तस्माच्छक्तिरभूदियम्॥ ४३ [हिन्दी अनुवाद] सावित्रीके यों कहनेपर उससे भिक्षा लेकर वह आगे चला और उसकी दूरवर्ती घटनाको जान लेनेवाली शक्तिका मन-ही-मन चिन्तन करता हुआ अपने आश्रमपर पहुँचा। वहाँ भिक्षापात्रको यत्नपूर्वक मठमें रखकर जब पतिव्रता भोजनसे निवृत्त हो गयी और जब उसका गृहस्थ पति घरसे बाहर चला गया, तब वह पुनः उसके घर आया और उस पतिव्रतासे बोला॥ ३१-३२१/२॥ ब्रह्मचारीने कहा— महाभागे! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, तुम मुझे यथार्थरूपसे बताओ, तुम्हें दूरकी घटनाका ज्ञान इतना शीघ्र कैसे हो गया?॥ ३३१/२॥ उसके यों कहनेपर वह साध्वी पतिव्रता सावित्री घर आकर प्रश्न करनेवाले उस ब्रह्मचारीसे यों बोली—'ब्रह्मन्! तुम मुझसे जो कुछ पूछते हो, उसे सावधान होकर सुनो—स्वधर्म-पालनसे बढ़े हुए अपने परोक्षज्ञानके विषयमें मैं तुमसे भलीभाँति बताऊँगी। पतिकी सेवा करना ही स्त्रियोंका सुनिश्चित परम धर्म है। महामते! मैं सदा उसी धर्मका पालन करती हूँ, किसी अन्य धर्मका नहीं। निस्संदेह मैं दिन-रात श्रद्धापूर्वक पतिको संतुष्ट करती रहती हूँ, इसीलिये मुझे दूर होनेवाली घटनाका भी ज्ञान हो जाता है। मैं तुम्हें कुछ और भी बताऊँगी; तुम्हारी इच्छा हो, तो सुनो—'तुम्हारे पिता यज्ञशर्मा यायावर-वृत्तिके शुद्ध ब्राह्मण थे। उनसे ही तुमने वेदाध्ययन किया था। पिताके मर जानेपर उनका प्रेतकार्य करके तुम यहाँ चले आये। दीन-अवस्थामें पड़कर कष्ट भोगती हुई उस अनाथ विधवा वृद्धा माताकी देख-भाल करना छोड़कर तुम यहाँ रोज अपना ही पेट भरनेमें लगे हुए हो। ब्राह्मण! जिसने पहले तुम्हें गर्भमें धारण किया और जन्मके बाद तुम्हारा लालन-पालन किया, उसे असहायावस्थामें छोड़कर वनमें धर्माचरण करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती? ब्रह्मन्! जिसने बाल्यावस्थामें तुम्हारा मल-मूत्र साफ किया था, उस दुखिया माताको घरमें अकेली छोड़कर वनमें घूमनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? माताके कष्टसे तुम्हारा मुँह दुर्गन्धयुक्त हो जायगा। तुम्हारे पिताने ही तुम्हारा उत्तम संस्कार कर दिया था, जिससे तुम्हें यह In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय १३ ] पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद ५५ पक्षी दग्धः सुदुर्बुद्धे पापात्मन् साम्प्रतं वृथा। शक्ति प्राप्त हुई है। दुर्बुद्धि पापात्मन् ! तुमने व्यर्थ ही वृथा स्नानं वृथा तीर्थं वृथा जप्तं वृथा हुतम् ॥ ४४ पक्षियोंको जलाया। इस समय तुम्हारा किया हुआ स्नान, तीर्थसेवन, जप और होम—सब व्यर्थ है। ब्रह्मन् ! जिसकी स जीवति वृथा ब्रह्मन् यस्य माता सुदुःखिता। माता अत्यन्त दुःखमें पड़ी हो, वह व्यर्थ ही जीवन धारण यो रक्षेत् सततं भक्त्या मातरं मातृवत्सलः ॥ ४५ करता है। जो पुत्र मातापर दया करके भक्तिपूर्वक निरन्तर उसकी रक्षा करता है, उसका किया हुआ सब कर्म यहाँ तस्येहानुष्ठितं सर्वं फलं चामुत्र चेह हि। और परलोकमें भी फलप्रद होता है। ब्रह्मन् ! जिन उत्तम मातृश्च वचनं ब्रह्मन् पालितं यैर्नरोत्तमैः ॥ ४६ पुरुषोंने माताके वचनका पालन किया है, वे इस लोक ते मान्यास्ते नमस्कार्या इह लोके परत्र च। और परलोकमें भी माननीय तथा नमस्कारके योग्य हैं। अतस्त्वं तत्र गत्वाद्य यत्र माता व्यवस्थिता ॥ ४७ अतः जहाँ तुम्हारी माता है, वहाँ जाकर उसके जीते-जी उसीकी रक्षा करो। उसकी रक्षा करना ही तुम्हारे लिये तां त्वं रक्षय जीवन्तीं तद्रक्षा ते परं तपः। परम तपस्या है। इस क्रोधको त्याग दो; क्योंकि यह क्रोधं परित्यजैनं त्वं दृष्टादृष्टविघातकम् ॥ ४८ तुम्हारे दृष्ट और अदृष्ट—सभी कर्मोंको नष्ट करनेवाला है। उन पक्षियोंकी हत्याके पापसे अपनी शुद्धिके लिये तयोः कुरु वधे शुद्धिं पक्षिणोरात्मशुद्धये। तुम प्रायश्चित्त करो। यह सब मैंने तुमसे यथार्थ बातें कही याथातथ्येन कथितमेतत्सर्वं मया तव ॥ ४९ हैं। ब्रह्मचारिन् ! यदि तुम सत्पुरुषोंकी गतिको प्राप्त करना चाहते हो तो मेरे कहे अनुसार करो' ॥ ३४-४९१/२ ॥ ब्रह्मचारिन् कुरुष्व त्वं यदीच्छसि सतां गतिम्। इत्युक्त्वा विररामाथ द्विजपुत्रं पतिव्रता ॥ ५० ब्राह्मणकुमारसे यों कहकर वह पतिव्रता चुप हो गयी। तब ब्रह्मचारी भी पुनः अपने अपराधके लिये सोऽपि तामाह भूयोऽपि सावित्रीं तु क्षमापयन्। क्षमा माँगता हुआ सावित्रीसे बोला—'वरवर्णिनि ! अनजानमें अज्ञानात्कृतपापस्य क्षमस्व वरवर्णिनि ॥ ५१ किये हुए मेरे इस पापको क्षमा करो। महाभागे! पतिव्रते ! तुमने मेरे हितकी ही बात कही है। मैंने जो क्रोधपूर्वक मया तवाहितं यच्च कृतं क्रोधनिरीक्षणम्। तुम्हारी ओर देखकर तुम्हारा अपराध किया था, उसे तत् क्षमस्व महाभागे हितमुक्तं पतिव्रते ॥ ५२ क्षमा कर दो। शुभव्रते ! अब मुझे माताके पास जाकर जिन कर्तव्योंका पालन करना चाहिये, उन्हें बताओ, तत्र गत्वा मया यानि कर्माणि तु शुभव्रते। जिनके करनेसे मेरी शुभगति हो' ॥ ५०-५३ ॥ कार्याणि तानि मे ब्रूहि यथा मे सुगतिर्भवेत् ॥ ५३ उसके इस प्रकार कहनेपर उस पूछनेवाले ब्राह्मणसे तेनैवमुक्ता साप्याह तं पृच्छन्तं पतिव्रता। पतिव्रता सावित्री पुनः बोली— 'ब्रह्मन् ! वहाँ तुमको यानि कार्याणि वक्ष्यामि त्वया कर्माणि मे शृणु ॥ ५४ जो कर्म करने चाहिये, उन्हें बतलाती हूँ; सुनो— 'तुम्हें भिक्षावृत्तिसे जीवननिर्वाह करते हुए वहाँ माताका पोष्या माता त्वया तत्र निश्चयं भैक्षवृत्तिना। निश्चय ही पोषण करना चाहिये और पक्षियोंकी हत्याका अत्र वा तत्र वा ब्रह्मन् प्रायश्चित्तं च पक्षिणोः ॥ ५५ प्रायश्चित्त यहाँ अथवा वहाँ अवश्य करना चाहिये। यज्ञशर्माकी* पुत्री तुम्हारी पत्नी होगी। उसे ही तुम यज्ञशर्मसुता कन्या भार्या तव भविष्यति। धर्मपूर्वक ग्रहण करो। तुम्हारे जानेपर यज्ञशर्मा अपनी तां गृह्णीष्व च धर्मेण गते त्वयि स दास्यति ॥ ५६ कन्या तुम्हें दे देंगे। उसके गर्भसे तुम्हारी वंश-परम्पराको बढ़ानेवाला एक पुत्र होगा। पिताकी भाँति यायावर- पुत्रस्ते भविता तस्यामेकः संततिवर्धनः । यायावरधनाद्वृत्तिः पितृवत्ते भविष्यति ॥ ५७ वृत्तिसे प्राप्त हुए धनसे ही तुम अपनी जीविका चलाओगे।
- ये यज्ञशर्मा देवशर्माके पितासे भिन्न थे।
५६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १४ पुनर्मृतायां भार्यायां भविता त्वं त्रिदण्डकः। फिर तुम अपनी पत्नीकी मृत्युके बाद त्रिदण्डी (संन्यासी) स यत्याश्रमधर्मेण यथोक्त्यानुष्ठितेन च। हो जाओगे। वहाँ संन्यासाश्रमके लिये शास्त्रविहित नरसिंहप्रसादेन वैष्णवं पदमाप्स्यसि॥ ५८ धर्मका यथावत् रूपसे पालन करनेपर भगवान् नरसिंहकी प्रसन्नतासे तुम विष्णुपदको प्राप्त कर लोगे।' तुम्हारे भाव्यमेतत्तु कथितं मया तव हि पृच्छतः। पूछनेपर मैंने ये भविष्यमें होनेवाली बातें तुमसे बतला मन्यसे नानृतं त्वेतत् कुरु सर्वं हि मे वचः॥ ५९ दी हैं। यदि तुम इन्हें असत्य नहीं मानते, तो मेरे सब वचनोंका पालन करो'॥ ५४—५९॥ ब्राह्मण उवाच ब्राह्मण बोला—पतिव्रते! मैं माताकी रक्षाके लिये गच्छामि मातृरक्षार्थमद्यैवाहं पतिव्रते। आज ही जाता हूँ। शुभेक्षणे! वहाँ जाकर तुम्हारी सब करिष्ये त्वद्वचः सर्वं तत्र गत्वा शुभेक्षणे॥ ६० बातोंका मैं पालन करूँगा॥ ६०॥ इत्युक्त्वा गतवान् ब्रह्मन् देवशर्मा ततस्त्वरन्। ब्रह्मन्! यों कहकर देवशर्मा वहाँसे शीघ्रतापूर्वक संरक्ष्य मातरं यत्नात् क्रोधमोहविवर्जितः॥ ६१ चला गया और क्रोध तथा मोहसे रहित होकर उसने यत्न-पूर्वक माताकी रक्षा की। फिर विवाह करके एक कृत्वा विवाहमुत्पाद्य पुत्रं वंशकरं शुभम्। सुन्दर वंशवर्धक पुत्र उत्पन्न किया और कुछ कालके मृतभार्यश्च संन्यस्य समलोष्टाश्मकाञ्चनः। बाद पत्नीकी मृत्यु हो जानेपर संन्यासी होकर ढेले और नरसिंहप्रसादेन परां सिद्धिमवाप्तवान्॥ ६२ मिट्टीको बराबर समझते हुए उसने भगवान् नृसिंहकी पतिव्रताशक्तिरियं तवेरिता कृपासे परमसिद्धि (मोक्ष) प्राप्त कर ली। यह मैंने तुमसे धर्मश्च मातुः परिरक्षणं परम्। पतिव्रताकी शक्ति बतायी और यह भी बतलाया कि संसारवृक्षं च निहत्य बन्धनं माताकी रक्षा करना परम धर्म है। संसारवृक्षका उच्छेद छित्त्वा च विष्णोः पदमेति मानवः॥ ६३ करके सब बन्धनोंको तोड़ देनेपर मनुष्य विष्णुपदको प्राप्त करता है॥ ६१—६३॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे ब्रह्मचारिसंवादो नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'पतिव्रता और ब्रह्मचारीका संवाद' विषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३॥ चौदहवाँ अध्याय तीर्थसेवन और आराधनसे भगवान्की प्रसन्नता; 'अनाश्रमी' रहनेसे दोष तथा आश्रमधर्मके पालनसे भगवत्प्राप्तिका कथन व्यास उवाच व्यासजी बोले—महाबुद्धिमान् पुत्र शुकदेव! तुम शृणु वत्स महाबुद्धे शिष्याश्चैतां परां कथाम्। और मेरे अन्य शिष्यगण भी मेरे द्वारा कही जानेवाली मयोच्यमानां शृण्वन्तु सर्वपापप्रणाशिनीम्॥ १ इस पापहारिणी कथाको सुनो॥ १॥ पूर्वकालमें कोई वेदशास्त्रविशारद श्रेष्ठ ब्राह्मण अपनी पुरा द्विजवरः कश्चिद्वेदशास्त्रविशारदः। पत्नीकी मृत्यु हो जानेपर तीर्थमें गया और वहाँ उसने मृतभार्यो गतस्तीर्थं चक्रे स्नानं यथाविधि॥ २ विधिपूर्वक स्नान किया और विजन (एकान्त)-में रहकर तपः सुतप्तं विजने निःस्पृहो दारकर्मणि। उत्तम तपस्या की। तत्पश्चात् दारकर्म (विवाह)-की भिक्षाहारः प्रवसितो जपस्नानपरायणः॥ ३ इच्छा न रखकर वह परदेशमें रहता हुआ भिक्षा माँगकर In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण लिप्यन्तरण (Transcription) प्रस्तुत है:
अध्याय १४ ] तीर्थसेवन और आराधनासे भगवान्की प्रसन्नता ५७
[बायाँ स्तम्भ - मूल संस्कृत श्लोक]
स्नात्वा स गङ्गां यमुनां सरस्वतीं पुण्यां वितस्तामथ गोमतीं च। गयां समासाद्य पितॄन् पितामहान् संतर्पयन् सन् गतवान् महेन्द्रम्॥ ४ तत्रापि कुण्डेषु गिरौ महामतिः स्नात्वा नु दृष्ट्वा भृगुनन्दनोत्तमम्। कृत्वा पितृभ्यस्तु तथैव तृप्तिं व्रजन् वनं पापहरं प्रविष्टः॥ ५ धारां पतन्तीं महतीं शिलोच्चयात् संधार्य भक्त्या त्वनु नारसिंहे। शिरस्यशेषाघविनाशिनीं तदा विशुद्धदेहः स बभूव विप्रः॥ ६ विन्ध्याचले सक्तमनन्तमच्युतं भक्तैर्मुनीन्द्रैरपि पूजितं सदा। आराध्य पुष्पैर्गिरिसम्भवैः शुभै- स्तत्रैव सिद्धिं त्वभिकांक्ष्य संस्थितः॥ ७ स नारसिंहो बहुकालपूजया तुष्टः सुनिद्रागतमाह भक्तम्। अनाश्रमित्वं गृहभङ्गकारणं ह्यतो गृहाणाश्रममुत्तमं द्विज॥ ८ अनाश्रमीति द्विजवेदपारगा- नपि त्वहं नानुगृहामि चात्र। तथापि निष्ठां तव वीक्ष्य सत्तम त्वयि प्रसन्नेन मयेत्युदीरितम्॥ ९ तेनैवमुक्तः परमेश्वरेण द्विजोऽपि बुद्ध्या प्रविचिन्त्य वाक्यम्। हरेरलङ्घ्यं नरसिंहमूर्ते- र्बाधं च कृत्वा स यतिर्बभूव॥ १० त्रिदण्डवृक्षाक्षपवित्रपाणि- राप्लुत्य तोये त्वघहारिणि स्थितः। जपन् सदा मन्त्रमपास्तदोषं सावित्रीमिशं हृदये स्मरन् हरिम्॥ ११ यथाकथंचित् प्रतिलभ्य शाकं भैक्ष्याभितुष्टो वनवासवासी। अभ्यर्च्य विष्णुं नरसिंहमूर्तिं ध्यात्वा च नित्यं हृदि शुद्धमाद्यम्॥ १२
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]
जीवननिर्वाह करने और जप, स्नान आदि उत्तम कर्ममें तत्पर रहने लगा। गङ्गा, यमुना, सरस्वती, पावन वितस्ता (झेलम) और गोमती आदिमें स्नान करके वह गयामें पहुँचा और वहाँ अपने पिता-पितामह आदिका तर्पण करके महेन्द्र पर्वतपर गया। वहाँ उस परम बुद्धिमान् द्विजने पर्वतीय कुण्डोंमें स्नान करनेके पश्चात् ऋषिश्रेष्ठ भृगुनन्दन परशुरामजीका दर्शन किया; फिर पूर्ववत् पितरोंके लिये तर्पण करके चलते-चलते एक वनमें प्रवेश किया, जो पापोंका नाश करनेवाला था॥ २—५॥
वहाँ एक पर्वतसे बहुत बड़ी धारा गिरती थी, जो निश्शेष पापराशिका विनाश करनेवाली थी। उसके जलको लेकर ब्राह्मणने भक्तिपूर्वक भगवान् नृसिंहके मस्तकपर चढ़ाया। इससे उसी समय उसका शरीर विशुद्ध हो गया। फिर विन्ध्याचल पर्वतपर स्थित होकर भक्तों और मुनीश्वरोंसे सदा पूजित होनेवाले अनन्त अच्युत भगवान् विष्णुकी सुन्दर पर्वतीय पुष्पोंसे पूजा करता हुआ वह ब्राह्मण सिद्धिकी कामनासे वहीं ठहर गया॥ ६-७॥
इस तरह दीर्घकालतक उसने पूजा की। उससे प्रसन्न होकर वे भगवान् नृसिंह गाढ़ निद्रामें सोये हुए अपने उस भक्तसे स्वप्नमें दर्शन देकर बोले—‘ब्रह्मन्! किसी आश्रमधर्मको स्वीकार करके न चलना गृहस्थकी मर्यादाके भङ्गका कारण होता है; अतः यदि तुम्हें गृहस्थ नहीं रहना है तो किसी दूसरे उत्तम आश्रमको ग्रहण करो। ब्रह्मन्! जो किसी आश्रममें स्थित नहीं है, वह यदि वेदोंका पारगामी विद्वान् हो, तो भी मैं यहाँ उसपर अनुग्रह नहीं करता; परंतु साधुवर! तुम्हारी निष्ठा देखकर मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, इसीसे मैंने तुमसे यह बात कही है'॥ ८-९॥
उन परमेश्वरके इस प्रकार कहनेपर उस ब्राह्मणने भी अपनी बुद्धिसे नृसिंहस्वरूप श्रीहरिके उस कथनपर विचार करके उसे अलङ्घनीय माना और सम्पूर्ण जगत्का बाध (त्याग) करके वह संन्यासी हो गया॥ १०॥
फिर प्रतिदिन उस पापहारी जलमें डुबकी लगाकर तथा उसीमें खड़ा रहकर त्रिदण्ड और अक्षमाला धारण करनेसे पवित्र हाथोंवाला वह ब्राह्मण मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण करता हुआ निर्दोष गायत्री-मन्त्रका जप करने लगा। नित्यप्रति शुद्ध आदिदेव भगवान् विष्णुका हृदयमें ध्यान करके उनके नृसिंह-विग्रहका पूजन करता
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५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १५
५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १५
विविक्तदेशे विपुले कुशासने निवेश्य सर्वं हृदयेऽस्य सर्वम्। बाह्यं समस्तं गुणमिन्द्रियाणां विलीय भेदं भगवत्यनन्ते॥ १३
विज्ञेयमानन्दमजं विशालं सत्यात्मकं क्षेमपदं वरेण्यम्। संचिन्त्य तस्मिन् प्रविहाय देहं बभूव मुक्तः परमात्मरूपी॥ १४
इमां कथां मुक्तिपरां यथोक्तां पठन्ति ये नारसिंहं स्मरन्तः। प्रयागतीर्थप्लवने तु यत्फलं तत् प्राप्य ते यान्ति हरेः पदं महत्॥ १५
इत्येतदुक्तं तव पुत्र पृच्छतः पुरातनं पुण्यतमं पवित्रकम्। संसारवृक्षस्य विनाशनं परं पुनः कमिच्छस्यभिवाञ्छितं वद॥ १६
(हिन्दी अनुवाद): और वनवासी हो किसी प्रकार शाक आदि खाकर भिक्षावृत्तिसे ही संतोषपूर्वक रहता था। विस्तृत एकान्त प्रदेशमें कुशासनपर बैठकर वह इन्द्रियोंके समस्त बाह्य विषयों तथा भेदबुद्धिको हृदयस्थित भगवान् अनन्तमें विलीन करके विज्ञेय, अजन्मा, विराट्, सत्यस्वरूप, श्रेष्ठ, कल्याणधाम आनन्दमय परमेश्वरका चिन्तन करता हुआ आयु पूरी होनेपर शरीर त्यागकर मुक्त एवं परमात्मस्वरूप हो गया॥ ११-१४॥ जो लोग मोक्ष-सम्बन्धिनी अथवा मोक्षको ही उत्कृष्ट बनानेवाली इस कथाको भगवान् नृसिंहका स्मरण करते हुए पढ़ते हैं, वे प्रयागतीर्थमें स्नान करनेसे जो फल होता है, उसे पाकर अन्तमें भगवान् विष्णुके महान् पदको प्राप्त कर लेते हैं। बेटा! तुम्हारे पूछनेसे मैंने यह उत्तम, पवित्र, पुण्यतम एवं पुरातन उपाख्यान, जो संसारवृक्षका नाश करनेवाला है, तुमसे कहा है; अब और क्या सुनना चाहते हो? अपना मनोरथ प्रकट करो॥ १५-१६॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४॥
पंद्रहवाँ अध्याय
संसारवृक्षका वर्णन तथा इसे नष्ट करनेवाले ज्ञानकी महिमा
श्रीशुक उवाच श्रोतुमिच्छाम्यहं तात साम्प्रतं मुनिभिः सह। संसारवृक्षं सकलं येनेदं परिवर्तते॥ १ वक्तुमर्हसि मे तात त्वयैतत् सूचितं पुरा। नान्यो वेत्ति महाभाग संसारोच्चारलक्षणम्॥ २
श्रीशुकदेवजी बोले— तात! मैं इस समय मुनियोंके साथ संसारवृक्षका वर्णन सुनना चाहता हूँ, जिसके द्वारा यह परिवर्तनका सम्पूर्ण चक्र चलता रहता है। तात! आपने ही पहले इस वृक्षको सूचित किया है; अतः आप ही इसका वर्णन करनेके योग्य हैं। महाभाग! आपके सिवा दूसरा कोई इस संसारवृक्षका लक्षण नहीं जानता॥ १-२॥
सूत उवाच स पुत्रैणैवमुक्तस्तु शिष्याणां मध्यगेन च। कृष्णद्वैपायनः प्राह संसारतरुलक्षणम्॥ ३
सूतजी बोले— भरद्वाज! अपने शिष्योंके बीचमें बैठे हुए पुत्र शुकदेवजीके इस प्रकार पूछनेपर श्रीकृष्णद्वैपायन (व्यासजी)-ने उन्हें संसारवृक्षका लक्षण इस प्रकार बताया॥ ३॥
व्यास उवाच शृण्वन्तु शिष्याः सकला वत्स त्वं शृणु भावितः। संसारवृक्षं वक्ष्यामि येन चेदं समावृतम्॥ ४
श्रीव्यासजी बोले— मेरे सभी शिष्य इस विषयको सुनें; तथा वत्स! तुम भी सावधान होकर सुनो—मैं
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अध्याय १६ ] भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन ५९ अव्यक्तमूलप्रभवस्तस्मादग्रे तथोत्थितः । संसारवृक्षका वर्णन करता हूँ, जिसने इस सारे दृश्य- बुद्धिस्कन्धमयश्चैव इन्द्रियाङ्कुरकोटरः ॥ ५ प्रपञ्चको व्याप्त कर रखा है। यह संसारवृक्ष अव्यक्त परमात्मारूपी मूलसे प्रकट हुआ है। उन्हींसे प्रकट होकर महाभूतविशाखश्च विशेषैः पत्रशाखवान्। हमारे सामने इस रूपमें खड़ा है। बुद्धि (महत्तत्त्व) धर्माधर्मसुपुष्पश्च सुखदुःखफलोदयः ॥ ६ उसका तना है, इन्द्रियाँ ही उसके अङ्कुर और कोटर हैं, पञ्चमहाभूत उसकी बड़ी-बड़ी डालियाँ हैं, विशेष आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्म वृक्षः सनातनः। पदार्थ ही उसके पत्ते और टहनियाँ हैं, धर्म-अधर्म फूल एतद् ब्रह्म परं चैव ब्रह्म वृक्षस्य तस्य तत् ॥ ७ हैं, उससे 'सुख' और 'दुःख' नामक फल प्रकट होते हैं, प्रवाहरूपसे सदा रहनेवाला यह संसारवृक्ष ब्रह्मकी इत्येवं कथितं वत्स संसारवृक्षलक्षणम्। भाँति सभी भूतोंका आश्रय है। यह अपरब्रह्म और वृक्षमेनं समारूढा मोहमायान्ति देहिनः ॥ ८ परब्रह्म भी इस संसारवृक्षका कारण है। पुत्र ! इस प्रकार मैंने तुमसे संसारवृक्षका लक्षण बतलाया है। इस वृक्षपर संसरन्तीह सततं सुखदुःखसमन्विताः । चढ़े हुए देहाभिमानी जीव मोहित हो जाते हैं। प्रायः प्रायेण प्राकृता मर्त्या ब्रह्मज्ञानपराङ्मुखाः॥ ९ ब्रह्मज्ञानसे विमुख प्राकृत मनुष्य सदा सुख-दुःखसे युक्त होकर इस संसारमें फँसे रहते हैं, ब्रह्मज्ञानी विद्वान् इस छित्त्वैनं कृतिनो यान्ति नो यान्ति ब्रह्मज्ञानिनः। संसारवृक्षको नहीं प्राप्त होते । वे इसका उच्छेद करके कर्मक्रिये महाप्राज्ञ नैनं छिन्दन्ति दुष्कृताः ॥ १० मुक्त हो जाते हैं। महाप्राज्ञ शुकदेव ! जो पापी हैं, वे कर्म-क्रियाका उच्छेद नहीं कर पाते। ज्ञानी पुरुष ज्ञानरूपी एनं छित्त्वा च भित्त्वा च ज्ञानेन परमासिना । उत्तम खड्गके द्वारा इस वृक्षको छिन्न-भिन्न करके उस ततोऽमरत्वं ते यान्ति यस्मान्नावर्तते पुनः ॥ ११ अमरपदको प्राप्त करते हैं, जहाँसे जीव पुनः इस संसारमें नहीं आता। शरीर तथा स्त्रीरूपी बन्धनोंसे दृढ़तापूर्वक देहदारमयैः पाशैर्दृढं बद्धोऽपि मुच्यते । बँधा हुआ पुरुष भी ज्ञानके द्वारा मुक्त हो जाता है; अतः ज्ञानमेव परं पुंसां श्रेयसामभिवाञ्छितम्। श्रेष्ठतम पुरुषोंको ज्ञानकी प्राप्ति ही परम अभीष्ट होती है; तोषणं नरसिंहस्य ज्ञानहीनः पशुः पुमान् ॥ १२ क्योंकि ज्ञान ही भगवान् नृसिंहको संतोष देता है। ज्ञानहीन पुरुष तो पशु ही है। मनुष्योंके आहार, निद्रा, भय और आहारनिद्राभयमैथुनानि मैथुन आदि कर्म तो पशुओंके ही समान होते हैं; उनमें समानमेतत्पशुभिनराणाम् । केवल ज्ञान ही अधिक होता है। जो ज्ञानहीन हैं, वे ज्ञानं नराणामधिकं हि लोके पशुओंके ही तुल्य हैं ॥ ४-१३ ॥ ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः ॥ १३ । इति श्रीनरसिंहपुराणे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥ सोलहवाँ अध्याय भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन श्रीशुक उवाच | श्रीशुकदेवजी बोले- पिताजी ! जो संसारवृक्षपर संसारवृक्षमारुह्य द्वन्द्वपाशशतैर्दृढैः । आरूढ़ हो; राग-द्वेषादि द्वन्द्वमय सैकड़ों सुदृढ़ पाशों बध्यमानः सुतैश्वर्यैः पतितो योनिसागरे ॥ १ | तथा पुत्र और ऐश्वर्य आदिके बन्धनसे बँधकर योनि- In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १६
६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १६ यः कामक्रोधलोभैस्तु विषयैः परिपीडितः । | समुद्रमें गिरा हुआ है तथा काम, क्रोध, लोभ और बद्धः स्वकर्मभिर्गौणैः पुत्रदारैषणादिभिः ॥ २ | विषयोंसे पीड़ित होकर अपने कर्ममय मुख्य बन्धनों | तथा पुत्रैषणा और दारैषणा आदि गौण बन्धनोंसे आबद्ध स केन निस्तरत्याशु दुस्तरं भवसागरम् । | है, वह मनुष्य इस दुस्तर भवसागरको कैसे शीघ्र पार पृच्छामाख्याहि मे तात तस्य मुक्तिः कथं भवेत् ॥ ३ | कर सकता है ? उसकी मुक्ति कैसे हो सकती है ? | हमारे इस प्रश्नका समाधान कीजिये ॥ १-३ ॥ श्रीव्यास उवाच | | श्रीव्यासजी बोले- महाप्राज्ञ पुत्र ! मैंने पूर्वकालमें शृणु वत्स महाप्राज्ञ यज्ज्ञात्वा मुक्तिमाप्नुयात् । | नारदजीके मुखसे जिसका श्रवण किया था और जिसे तच्च वक्ष्यामि ते दिव्यं नारदेन श्रुतं पुरा ॥ ४ | जान लेनेपर मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है, उस दिव्य | ज्ञानका मैं तुमसे वर्णन करता हूँ। यमराजके भवनमें नरके रौरवे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिताः । | जहाँ घोर रौरव नरकके भीतर धर्म और ज्ञानसे रहित स्वकर्मभिर्महादुःखं प्राप्ता यत्र यमालये ॥ ५ | प्राणी अपने पापकर्मोंके कारण महान् कष्ट पाते हैं, | वहाँ एक बार नारदजी गये। उन्होंने देखा, पापी जीव महापापकृतं घोरं सम्प्राप्ताः पापकृज्जनाः । | अपने महान् पापोंके फलस्वरूप घोर संकटमें पड़े हैं। आलोक्य नारदः शीघ्रं गत्वा यत्र त्रिलोचनः ॥ ६ | यह देखकर नारदजी शीघ्र ही उस स्थानपर गये, जहाँ | त्रिलोचन महादेवजी थे। वहाँ पहुँचकर सिरपर गङ्गाजीको गङ्गाधरं महादेवं शंकरं शूलपाणिनम् । | धारण करनेवाले महान् देवता शूलपाणि भगवान् प्रणम्य विधिवद्देवं नारदः परिपृच्छति ॥ ७ | शंकरको उन्होंने विधिवत् प्रणाम किया और इस | प्रकार पूछा ॥ ४-७ ॥ नारद उवाच | | नारदजी बोले- 'भगवन् ! जो संसारमें महान् द्वन्द्वों, यः संसारे महाद्वन्द्वैः कामभोगैः शुभाशुभैः । | शुभाशुभ कामभोगों और शब्दादि विषयोंसे बँधकर शब्दादिविषयैर्बद्धः पीड्यमानः षडूर्द्मिभिः ॥ ८ | छहों ऊर्मियोंद्वारा * पीड़ित हो रहा है, वह मृत्युमय कथं नु मुच्यते क्षिप्रं मृत्युसंसारसागरात् । | संसार-सागरसे किस प्रकार शीघ्र ही मुक्त हो सकता भगवन् ब्रूहि मे तत्त्वं श्रोतुमिच्छामि शंकर ॥ ९ | है ? कल्याणस्वरूप भगवान् शिव ! यह बात मुझे बताइये। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा नारदस्य त्रिलोचनः । | मैं यही सुनना चाहता हूँ।' नारदजीका वह वचन सुनकर उवाच तमृषिं शम्भुः प्रसन्नवदनो हरः ॥ १० | त्रिनेत्रधारी भगवान् हरका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल | उठा। वे उन महर्षिसे बोले ॥ ८-१० ॥ महेश्वर उवाच | | श्रीमहेश्वरने कहा - मुनिश्रेष्ठ ! सुनो; मैं सब प्रकारके ज्ञानामृतं च गुह्यं च रहस्यमृषिसत्तम । | बन्धनोंका भय और दुःख दूर करनेवाले गोपनीय वक्ष्यामि शृणु दुःखघ्नं सर्वबन्धभयापहम् ॥ ११ | रहस्यभूत ज्ञानामृतका वर्णन करता हूँ। तृणसे लेकर तृणादि चतुरास्यान्तं भूतग्रामं चतुर्विधम् । | चतुरानन ब्रह्माजीतक, जो चार प्रकारका प्राणिसमुदाय चराचरं जगत्सर्वं प्रसुप्तं यस्य मायया ॥ १२ | है, वह अथवा समस्त चराचर जगत् जिनकी मायासे तस्य विष्णोः प्रसादेन यदि कश्चित् प्रबुध्यते । | सुप्त हो रहा है, उन भगवान् विष्णुकी कृपासे यदि स निस्तरति संसारं देवानापि दुस्तरम् ॥ १३ | कोई जाग उठता है - ज्ञानवान् हो जाता है तो वही | देवताओंके लिये भी दुस्तर इस संसार-सागरको पार भोगैश्वर्यमदोन्मत्तस्तत्त्वज्ञानपराङ्मुखः । | कर जाता है। जो मनुष्य भोग और ऐश्वर्यके मदसे संसारसुमहापङ्के जीर्णा गौरिव मज्जति ॥ १४ | उन्मत्त और तत्त्वज्ञानसे विमुख है, वह संसाररूपी
- भूख, प्यास, जरा, मृत्यु, शोक और मोह-ये छः दुःख 'ऊर्मि' कहे गये हैं।
अध्याय १६ ] भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन ६१ यस्त्वात्मानं निबध्नाति कर्मभिः कोशकारवत्। महान् पङ्कमें उस तरह डूब जाता है, जैसे कीचड़में तस्य मुक्तिं न पश्यामि जन्मकोटिशतैरपि॥ १५ फँसी हुई बूढ़ी गाय। जो रेशमके कीड़ेकी भाँति अपनेको कर्मोंके बन्धनसे बाँध लेता है, उसके लिये करोड़ों जन्मोंमें तस्मान्नारद सर्वेशं देवानां देवमव्ययम्। भी मैं मुक्तिकी सम्भावना नहीं देखता। इसलिये नारद! आराधयेत्सदा सम्यग् ध्यायेद्विष्णुं समाहितः॥ १६ सदा समाहितचित्त होकर सर्वेश्वर अविनाशी देवदेव भगवान् विष्णुका सदा भलीभाँति आराधन और ध्यान यस्तं विश्वमनाद्यन्तमाद्यं स्वात्मनि संस्थितम्। करना चाहिये॥ ११-१६॥ सर्वज्ञममलं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ १७ जो सदा उन विश्वस्वरूप, आदि-अन्तसे रहित, सबके आदिकारण, आत्मनिष्ठ, अमल एवं सर्वज्ञ भगवान् विष्णुका निर्विकल्पं निराकाशं निष्प्रपञ्चं निरामयम्। ध्यान करता है, वह मुक्त हो जाता है। जो विकल्पसे वासुदेवमजं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ १८ रहित, अवकाशशून्य, प्रपञ्चसे परे, रोग-शोकसे हीन एवं अजन्मा हैं, उन वासुदेव (सर्वव्यापी भगवान्) विष्णुका निरञ्जनं परं शान्तमच्युतं भूतभावनम्। सदा ध्यान करनेवाला पुरुष संसार-बन्धनसे मुक्त हो देवगर्भं विभुं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ १९ जाता है। जो सब दोषोंसे रहित, परम शान्त, अच्युत, प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले तथा देवताओंके भी उत्पत्ति- सर्वपापविनिर्मुक्तमप्रमेयमलक्षणम् । स्थान हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला निर्वाणमनघं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २० पुरुष जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है। जो सम्पूर्ण पापोंसे शून्य, प्रमाणरहित, लक्षणहीन, शान्त तथा अमृतं परमानन्दं सर्वपापविवर्जितम्। निष्पाप हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा चिन्तन करनेवाला ब्रह्मण्यं शंकरं विष्णुं सदा संकीर्त्य मुच्यते॥ २१ मनुष्य कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो अमृतमय, परमानन्दस्वरूप, सब पापोंसे रहित, ब्राह्मणप्रिय तथा सबका योगेश्वरं पुराणाख्यमशरीरं गुहाशयम्। कल्याण करनेवाले हैं, उन भगवान् विष्णुका निरन्तर नाम- अमात्रमव्ययं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २२ कीर्तन करनेसे मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो योगोंके ईश्वर, पुराण, प्राकृत देहहीन, बुद्धिरूप गुहामें शुभाशुभविनिर्मुक्तमूर्भिष्टकपरं विभुम्। शयन करनेवाले, विषयोंके सम्पर्कसे शून्य और अविनाशी अचिन्त्यममलं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २३ हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला पुरुष जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है॥ १७-२२॥ सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तं सर्वदुःखविवर्जितम्। जो शुभ और अशुभके बन्धनसे रहित, छः ऊर्मियोंसे अप्रतर्क्यमजं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २४ परे, सर्वव्यापी, अचिन्तनीय तथा निर्मल हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य संसारसे मुक्त हो अनामगोत्रमद्वैतं चतुर्थं परमं पदम्। जाता है। जो समस्त द्वन्द्वोंसे मुक्त और सब दुःखोंसे तं सर्वहृद्गतं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २५ रहित हैं, उन तर्कके अविषय, अजन्मा भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करता हुआ पुरुष मुक्त हो जाता है। जो अरूपं सत्यसंकल्पं शुद्धमाकाशवत्परम्। नाम-गोत्रसे शून्य, अद्वितीय और जाग्रत् आदि तीनों एकाग्रमनसा विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २६ अवस्थाओंसे परे तुरीय परमपद हैं, समस्त भूतोंके हृदय- मन्दिरमें विद्यमान उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान सर्वात्मकं स्वभावस्थमात्मचैतन्यरूपकम्। करनेवाला पुरुष मुक्त हो जाता है। जो रूपरहित, सत्यसंकल्प शुभ्रमेकाक्षरं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २७ और आकाशके समान परम शुद्ध हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा एकाग्रचित्तसे चिन्तन करनेवाला मनुष्य मुक्ति प्राप्त अनिर्वाच्यमविज्ञेयमक्षरादिमसम्भवम् । कर लेता है। जो सर्वरूप, स्वभावनिष्ठ और आत्मचैतन्यरूप एकं नूतं सदा विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २८ हैं, उन प्रकाशमान एकाक्षर (प्रणवमय) भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य मुक्त हो जाता है। In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १६
६२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १६ विश्वाद्यं विश्वगोप्तारं विश्वादं सर्वकामदम्। जो अनिर्वचनीय, ज्ञानातीत, प्रणवस्वरूप और जन्म- स्थानत्रयातिगं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥ २९ रहित हैं, उन एकमात्र नित्यनूतन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य मुक्त हो जाता है। जो विश्वके सर्वदुःखक्षयकरं सर्वशान्तिकरं हरिम्। आदिकारण, विश्वके रक्षक, विश्वका भक्षण (संहार) करनेवाले सर्वपापहरं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥ ३० तथा सम्पूर्ण काम्यवस्तुओंके दाता हैं, तीनों अवस्थाओंसे अतीत उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य ब्रह्मादिदेवगन्धर्वैर्मुनिभिः सिद्धचारणैः। मुक्त हो जाता है। समस्त दुःखोंके नाशक, सबको शान्ति योगिभिः सेवितं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥ ३१ प्रदान करनेवाले और सम्पूर्ण पापोंको हर लेनेवाले भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य संसार-बन्धनसे विष्णौ प्रतिष्ठितं विश्वं विष्णुर्विश्वे प्रतिष्ठितः। मुक्त हो जाता है। ब्रह्मा आदि देवता, गन्धर्व, मुनि, विश्वेश्वरमजं विष्णुं कीर्तयन्नेव मुच्यते ॥ ३२ सिद्ध, चारण और योगियोंद्वारा सेवित भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला पुरुष पाप-तापसे मुक्त हो जाता संसारबन्धनान्मुक्तिमिच्छन् काममशेषतः। है। यह विश्व भगवान् विष्णुमें स्थित है और भगवान् भक्त्यैव वरदं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते ॥ ३३ विष्णु इस विश्वमें प्रतिष्ठित हैं। सम्पूर्ण विश्वके स्वामी, अजन्मा भगवान् विष्णुका कीर्तन करनेमात्रसे मनुष्य व्यास उवाच मुक्त हो जाता है। जो संसार-बन्धनसे मुक्ति तथा सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति चाहता है, वह यदि भक्तिपूर्वक वरदायक नारदेन पुरा पृष्ट एवं स वृषभध्वजः। भगवान् विष्णुका ध्यान करे तो सफलमनोरथ होकर यदुवाच तदा तस्मै तन्मया कथितं तव ॥ ३४ संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २३-३३ ॥ श्रीव्यासजी कहते हैं—बेटा ! इस प्रकार पूर्वकालमें तमेव सततं ध्याहि निर्बीजं ब्रह्म केवलम्। देवर्षि नारदजीके पूछनेपर उन वृषभचिह्नित अवाप्स्यसि ध्रुवं तात शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ३५ ध्वजावाले भगवान् शंकरने उस समय उनके प्रति जो कुछ कहा था, वह सब मैंने तुमसे कह सुनाया। तात ! श्रुत्वा सुरर्षिर्विष्णोः प्राधान्यमिदमीश्वरात् । निर्बीज ब्रह्मरूप उन अद्वितीय विष्णुका ही निरन्तर ध्यान स विष्णुं सम्यगाराध्य परां सिद्धिमवाप्तवान् ॥ ३६ करो; इससे तुम अवश्य ही सनातन अविनाशी पदको प्राप्त करोगे ॥ ३४-३५ ॥ यश्चैनं पठते चैव नृसिंहकृतमानसः । देवर्षि नारदने शंकरजीके मुखसे इस प्रकार भगवान् शतजन्मकृतं पापमपि तस्य प्रणश्यति ॥ ३७ विष्णुकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन सुनकर उनकी भलीभाँति आराधना करके उत्तम सिद्धि प्राप्त कर ली। जो भगवान् विष्णोः स्तवमिदं पुण्यं महादेवेन कीर्तितम्। नृसिंहमें चित्त लगाकर इस प्रसंगका नित्य पाठ करता प्रातः स्नात्वा पठेन्नित्यममृतत्वं स गच्छति ॥ ३८ है, उसका सौ जन्मोंमें किया हुआ पाप भी नष्ट हो जाता है। महादेवजीके द्वारा कथित भगवान् विष्णुके इस पावन ध्यायन्ति ये नित्यमनन्तमच्युतं स्तोत्रका जो प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके पाठ करता हृत्पद्ममध्येऽथ कीर्तयन्ति ये। है, वह अमृतपद (मोक्ष)-को प्राप्त कर लेता है। जो उपासकानां प्रभुमीश्वरं परं लोग अपने हृदय-कमलके मध्यमें विराजमान अनन्त ते यान्ति सिद्धिं परमां तु वैष्णवीम् ॥ ३९ ॥ भगवान् अच्युतका सदा ध्यान करते हैं और उपासकोंके प्रभु उन परमेश्वर भगवान् विष्णुका कीर्तन करते हैं, वे परम उत्तम वैष्णवी सिद्धि (विष्णु-सायुज्य) प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३६-३९ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे विष्णोःस्तवराजनिरूपणे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीविष्णुस्तवराजनिरूपण' विषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
सत्रहवाँ अध्याय
यहाँ पृष्ठ की पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी प्रतिलिपि प्रस्तुत है:
अध्याय १७ ] $\qquad\qquad$ अष्टाक्षरमन्त्र और उसका माहात्म्य $\qquad\qquad$ ६३ सत्रहवाँ अध्याय अष्टाक्षरमन्त्र और उसका माहात्म्य
श्रीशुक उवाच किं जपन् मुच्यते तात सततं विष्णुतत्परः। संसारदुःखान् सर्वेषां हिताय वद मे पितः॥ १ व्यास उवाच अष्टाक्षरं प्रवक्ष्यामि मन्त्राणां मन्त्रमुत्तमम्। यं जपन् मुच्यते मर्त्यो जन्मसंसारबन्धनात्॥ २ हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं शङ्खचक्रगदाधरम्। एकाग्रमनसा ध्यात्वा विष्णुं कुर्याज्जपं द्विजः॥ ३ एकान्ते निर्जनस्थाने विष्ण्वग्रे वा जलान्तिके। जपेदष्टाक्षरं मन्त्रं चित्ते विष्णुं निधाय वै॥ ४ अष्टाक्षरस्य मन्त्रस्य ऋषिनारायणः स्वयम्। छन्दश्च दैवी गायत्री परमात्मा च देवता॥ ५ शुक्लवर्णं च ॐकारं नकारं रक्तमुच्यते। मोकारं वर्णतः कृष्णं नाकारं रक्तमुच्यते॥ ६ राकारं कुङ्कुमाभं तु यकारं पीतमुच्यते। णाकारमञ्जनाभं तु यकारं बहुवर्णकम्॥ ७ ॐ नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः। भक्तानां जपतां तात स्वर्गमोक्षफलप्रदः। वेदानां प्रणवेनैष सिद्धो मन्त्रः सनातनः॥ ८ सर्वपापहरः श्रीमान् सर्वमन्त्रेषु चोत्तमः। एनमष्टाक्षरं मन्त्रं जपन्नारायणं स्मरेत्॥ ९ संध्यावसाने सततं सर्वपापैः प्रमुच्यते। एष एव परो मन्त्र एष एव परं तपः॥ १० एष एव परो मोक्ष एष स्वर्ग उदाहृतः। सर्ववेदरहस्येभ्यः सार एष समुद्धृतः॥ ११ विष्णुना वैष्णवानां हि हिताय मनुजां पुरा। एवं ज्ञात्वा ततो विप्रो ह्यष्टाक्षरमिमं स्मरेत्॥ १२
[हिन्दी अनुवाद]
श्रीशुकदेवजी बोले—तात! पिताजी! मनुष्य सदा भगवान् विष्णुके भजनमें तत्पर रहकर किस मन्त्रका जप करनेसे सांसारिक कष्टसे मुक्त होता है? यह मुझे बताइये। इससे सब लोगोंका हित होगा॥ १॥ श्रीव्यासजी बोले—बेटा! मैं तुम्हें सभी मन्त्रोंमें उत्तम अष्टाक्षरमन्त्र बतलाऊँगा, जिसका जप करनेवाला मनुष्य जन्म और मृत्युसे युक्त संसाररूपी बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ २॥ द्विजको चाहिये कि अपने हृदय-कमलके मध्यभागमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णुका एकाग्रचित्तसे ध्यान करते हुए जप करे। एकान्त, जनशून्य स्थानमें, श्रीविष्णुमूर्तिके सम्मुख अथवा जलाशयके निकट मनमें भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए अष्टाक्षरमन्त्रका जप करना चाहिये। साक्षात् भगवान् नारायण ही अष्टाक्षरमन्त्रके ऋषि हैं, दैवी गायत्री छन्द है, परमात्मा देवता हैं, ॐकार शुक्लवर्ण है, 'न' रक्तवर्ण है, 'मो' कृष्णवर्ण है, 'ना' रक्त है, 'रा' कुङ्कुम-रंगका है, 'य' पीतवर्णका है, 'णा' अञ्जनके समान कृष्णवर्णवाला है और 'य' विविध वर्णोंसे युक्त है। तात! यह 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्र समस्त प्रयोजनोंका साधक है और भक्तिपूर्वक जप करनेवाले लोगोंको स्वर्ग तथा मोक्षरूप फल देनेवाला है॥ ३—७ १/२ ॥ यह सनातन मन्त्र वेदोंके प्रणव (सारभूत अक्षरों)- से सिद्ध होता है। यह सभी मन्त्रोंमें उत्तम, श्रीसम्पन्न और सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला है। जो सदा संध्याके अन्तमें इस अष्टाक्षरमन्त्रका जप करता हुआ भगवान् नारायणका स्मरण करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। यही उत्तम मन्त्र है और यही उत्तम तपस्या है। यही उत्तम मोक्ष तथा यही स्वर्ग कहा गया है। पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने वैष्णवजनोंके हितके लिये सम्पूर्ण वेद-रहस्योंसे यह सारभूत मन्त्र निकाला है। इस प्रकार जानकर ब्राह्मणको चाहिये कि इस अष्टाक्षर-मन्त्रका स्मरण (जप) करे॥ ८—१२॥
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६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १७
६४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १७
स्नात्वा शुचिः शुचौ देशे जपेत् पापविशुद्धये । जपे दाने च होमे च गमने ध्यानपर्वसु ॥ १३
जपेन्नारायणं मन्त्रं कर्मपूर्वे परे तथा। जपेत्सहस्रं नियुतं शुचिर्भूत्वा समाहितः ॥ १४
मासि मासि तु द्वादश्यां विष्णुभक्तो द्विजोत्तमः । स्नात्वा शुचिर्जपेद्यस्तु नमो नारायणं शतम् ॥ १५
स गच्छेत् परमं देवं नारायणमनामयम्। गन्धपुष्पादिभिर्विष्णुमनेनाराध्य यो जपेत् ॥ १६
महापातकयुक्तोऽपि मुच्यते नात्र संशयः । हृदि कृत्वा हरिं देवं मन्त्रमेनं तु यो जपेत् ॥ १७
सर्वपापविशुद्धात्मा स गच्छेत् परमां गतिम्। प्रथमेन तु लक्षेण आत्मशुद्धिर्भविष्यति ॥ १८
द्वितीयेन तु लक्षेण मनुसिद्धिमवाप्नुयात् । तृतीयेन तु लक्षेण स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥ १९
चतुर्थेन तु लक्षेण हरेः सामीप्यमाप्नुयात्। पञ्चमेन तु लक्षेण निर्मलं ज्ञानमाप्नुयात् ॥ २०
तथा षष्ठेन लक्षेण भवेद्विष्णौ स्थिरा मतिः । सप्तमेन तु लक्षेण स्वरूपं प्रतिपद्यते ॥ २१
अष्टमेन तु लक्षेण निर्वाणमधिगच्छति। स्वस्वधर्मसमायुक्तो जपं कुर्याद् द्विजोत्तमः ॥ २२
एतत् सिद्धिकरं मन्त्रमष्टाक्षरमतन्द्रितः । दुःस्वप्नासुरपैशाचा उरगा ब्रह्मराक्षसाः ॥ २३
जापिनं नोपसर्पन्ति चौरक्षुद्राधयस्तथा। एकाग्रमनसाव्यग्रो विष्णुभक्तो दृढव्रतः ॥ २४
जपेन्नारायणं मन्त्रमेतन्मृत्युभयापहम्। मन्त्राणां परमो मन्त्रो देवतानां च दैवतम् ॥ २५
स्नान करके, पवित्र होकर, शुद्ध स्थानमें बैठकर पापशुद्धिके लिये इस मन्त्रका जप करना चाहिये। जप, दान, होम, गमन, ध्यान तथा पर्वके अवसरपर और किसी कर्मके पहले तथा पश्चात् इस नारायण-मन्त्रका जप करना चाहिये। भगवान् विष्णुके भक्तश्रेष्ठ द्विजको चाहिये कि वह प्रत्येक मासकी द्वादशी तिथिको पवित्र-भावसे एकाग्रचित्त होकर सहस्र या लक्ष मन्त्रका जप करे ॥ १३-१४¹/₂॥
स्नान करके पवित्रभावसे जो ‘ॐ नमो नारायणाय' मन्त्रका सौ (एक सौ आठ) बार जप करता है, वह निरामय परमदेव भगवान् नारायणको प्राप्त करता है। जो इस मन्त्रके द्वारा गन्ध-पुष्प आदिसे भगवान् विष्णुकी आराधना करके इसका जप करता है, वह महापातकसे युक्त होनेपर भी निस्संदेह मुक्त हो जाता है। जो हृदयमें भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए इस मन्त्रका जप करता है, वह समस्त पापोंसे विशुद्धचित्त होकर उत्तम गतिको प्राप्त करता है ॥ १५-१७¹/₂॥
एक लक्ष मन्त्रका जप करनेसे चित्तशुद्धि होती है, दो लक्षके जपसे मन्त्रकी सिद्धि होती है, तीन लक्षके जपसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त कर सकता है, चार लक्षसे भगवान् विष्णुकी समीपता प्राप्त होती है और पाँच लक्षसे निर्मल ज्ञानकी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार छः लक्षसे भगवान् विष्णुमें चित्त स्थिर होता है, सात लक्षसे भगवत्स्वरूपका ज्ञान होता है और आठ लक्षसे पुरुष निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है। द्विजमात्रको चाहिये कि अपने-अपने धर्मसे युक्त रहकर इस मन्त्रका जप करे। यह अष्टाक्षरमन्त्र सिद्धिदायक है। आलस्य त्यागकर इसका जप करना चाहिये। इसे जप करनेवाले पुरुषके पास दुःस्वप्न, असुर, पिशाच, सर्प, ब्रह्मराक्षस, चोर और छोटी-मोटी मानसिक व्याधियाँ भी नहीं फटकती हैं ॥ १८-२३¹/₂॥
विष्णुभक्तको चाहिये कि वह दृढ़संकल्प एवं स्वस्थ होकर एकाग्रचित्तसे इस नारायण-मन्त्रका जप करे। यह मृत्युभयका नाश करनेवाला है। मन्त्रोंमें सबसे उत्कृष्ट मन्त्र और देवताओंका भी देवता (आराध्य) है।
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अध्याय १७ ] अष्टाक्षरमन्त्र और उसका माहात्म्य ६५
अध्याय १७ ] अष्टाक्षरमन्त्र और उसका माहात्म्य ६५ गुह्यानां परमं गुह्यमोंकाराद्यक्षराष्टकम् । यह ॐकारादि अष्टाक्षर-मन्त्र गोपनीय वस्तुओंमें परम गोपनीय आयुष्यं धनपुत्रांश्च पशून् विद्यां महद्यशः ॥ २६ है। इसका जप करनेवाला मनुष्य आयु, धन, पुत्र, पशु, विद्या, महान् यश एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको भी धर्मार्थकाममोक्षांश्च लभते च जपन्नरः। प्राप्त कर लेता है। यह वेदों और श्रुतियोंके कथनानुसार एतत् सत्यं च धर्म्यं च वेदश्रुतिनिदर्शनात् ॥ २७ धर्मसम्मत तथा सत्य है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये मन्त्ररूपी नारायण मनुष्योंको सिद्धि देनेवाले हैं। ऋषि, एतत् सिद्धिकरं नृणां मन्त्ररूपं न संशयः । पितृगण, देवता, सिद्ध, असुर और राक्षस इसी परम उत्तम ऋषयः पितरो देवाः सिद्धास्त्वसुरराक्षसाः ॥ २८ मन्त्रका जप करके परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। जो ज्योतिष एतदेव परं जप्त्वा परां सिद्धिमितो गताः । आदि अन्य शास्त्रोंके विधानसे अपना अन्तकाल निकट ज्ञात्वा यस्त्वात्मनः कालं शास्त्रान्तरविधानतः । जानकर इस मन्त्रका जप करता है, वह भगवान् विष्णुके अन्तकाले जपेन्नेति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ २९ प्रसिद्ध परमपदको प्राप्त होता है ॥ २४-२९ ॥ नारायणाय नम इत्ययमेव सत्यं भव्य बुद्धिवाले विरक्त पुरुष प्रसन्नतापूर्वक मेरी संसारघोरविषसंहरणाय मन्त्रः । बात सुनें—मैं दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर उच्चस्वरसे शृण्वन्तु भव्यमतयो मुदितास्त्वरागा यह उपदेश देता हूँ कि "संसाररूपी सर्पके भयानक उच्चैस्तरामुपदिशाम्यहमूर्ध्वबाहुः ॥ ३० ॥ विषका नाश करनेके लिये यह 'ॐ नारायणाय नमः' मन्त्र ही सत्य (अमोघ) औषध है"। पुत्र और शिष्यो ! भूत्वोर्ध्वबाहुरद्याहं सत्यपूर्वं ब्रवीम्यहम् । सुनो—आज मैं दोनों बाँहें ऊपर उठाकर सत्यपूर्वक हे पुत्र शिष्याः शृणुत न मन्त्रोऽष्टाक्षरात्परः ॥ ३१ कह रहा हूँ कि 'अष्टाक्षरमन्त्र' से बढ़कर दूसरा कोई मन्त्र नहीं है। मैं भुजाओंको ऊपर उठाकर सत्य, सत्य सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुत्क्षिप्य भुजमुच्यते । और सत्य कह रहा हूँ, 'वेदसे बढ़कर दूसरा शास्त्र वेदाच्छास्त्रं परं नास्ति न देवः केशवात् परः ॥ ३२ और भगवान् विष्णुसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं आलोच्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः । है।' सम्पूर्ण शास्त्रोंकी आलोचना तथा बार-बार उनका विचार करनेसे एकमात्र यही उत्तम कर्तव्य सिद्ध होता इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ॥ ३३ है कि 'नित्य-निरन्तर भगवान् नारायणका ध्यान ही इत्येतत् सकलं प्रोक्तं शिष्याणां तव पुण्यदम् । करना चाहिये'। बेटा ! तुमसे और शिष्योंसे यह सारा कथाश्च विविधाः प्रोक्ता मया भज जनार्दनम् ॥ ३४ पुण्यदायक प्रसंग मैंने कह सुनाया तथा नाना प्रकारकी कथाएँ भी सुनायीं; अब तुम भगवान् जनार्दनका भजन अष्टाक्षरमिमं मन्त्रं सर्वदुःखविनाशनम् । करो। महाबुद्धिमान् पुत्र! यदि तुम सिद्धि चाहते हो तो जप पुत्र महाबुद्धे यदि सिद्धिमभीप्ससि ॥ ३५ इस सर्वदुःखनाशक अष्टाक्षरमन्त्रका जप करो। जो पुरुष इदं स्तवं व्यासमुखात्तु निस्सृतं श्रीव्यासजीके मुखसे निकले हुए इस स्तोत्रका त्रिकाल संध्यात्रये ये पुरुषाः पठन्ति । संध्याके समय पाठ करेंगे, वे धुले हुए श्वेत वस्त्र तथा ते धौतपाण्डुरपटा इव राजहंसाः राजहंसोंके समान निर्मल (विशुद्ध)-चित्त हो निर्भयतापूर्वक संसारसागरमपेतभयास्तरन्ति ॥ ३६ संसार-सागरसे पार हो जायँगे ॥ ३०-३६ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे अष्टाक्षरमाहात्म्यं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'अष्टाक्षरमन्त्रका माहात्म्य' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥ 1113 Narsingpuran_Section_4_1_Front Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १८
६६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १८ अठारहवाँ अध्याय भगवान् सूर्यद्वारा संज्ञाके गर्भसे मनु, यम और यमीकी, छायाके गर्भसे मनु, शनैश्चर एवं तपतीकी उत्पत्ति तथा अश्वरूपधारिणी संज्ञासे अश्विनीकुमारोंका प्रादुर्भाव सूत उवाच सूतजी बोले—मुनिवरो तथा महामते भरद्वाज! इति श्रुत्वा कथाः पुण्याः सर्वपापप्रणाशिनीः। पूर्वकालमें श्रीकृष्णद्वैपायनसे इस प्रकार नाना भाँतिकी नानाविधा मुनिश्रेष्ठाः कृष्णद्वैपायनात् पुनः॥ १ पावन पापनाशक कथाएँ सुनकर महाभाग शुक अन्य सिद्धगणोंके साथ भगवान् नारायणकी आराधनामें तत्पर शुकः पूर्वं महाभागो भरद्वाजो महामते। हो गये। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने आपसे पाप-नाश सिद्धैरन्यैश्च सहितो नारायणपरोऽभवत् ॥ २ करनेवाली मार्कण्डेय आदिकी विचित्र कथाएँ कहीँ; अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ १-३॥ एवं ते कथिता विप्र मार्कण्डेयादिकाः कथाः। भरद्वाजजी बोले—सूतजी! आपने पहले मुझसे मया विचित्राः पापघ्न्यः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ ३ वसु आदि देवताओंकी सृष्टिका उस प्रकार वर्णन किया; परंतु अश्विनीकुमारों तथा मरुद्गणोंकी उत्पत्ति नहीं कही; भरद्वाज उवाच अतः अब उसे ही कहिये ॥४॥ वस्वादीनां तथा प्रोक्ता मम सृष्टिस्त्वया पुरा। सूतजी बोले—महामते ! पूर्वकालमें शक्तिनन्दन अश्विनोर्मरुतां चैव नोक्तोत्पत्तिस्तु तां वद ॥ ४ श्रीपराशरजीने विष्णुपुराणमें मरुद्गणोंकी उत्पत्तिका विस्तार- पूर्वक वर्णन किया है तथा वायुदेवताने वायुपुराणमें सूत उवाच अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति भी विस्तारपूर्वक कही है; मरुतां विस्तरेणोक्ता वैष्णवाख्ये महामते। अतः मैं यहाँ संक्षेपसे ही इस सृष्टिका वर्णन करूँगा, पुराणे शक्तिपुत्रेण पुरोत्पत्तिश्च वायुना ॥ ५ सुनिये ॥ ५-६॥ प्रजापति दक्षकी एक कन्या अदिति नामसे प्रसिद्ध अश्विनोर्देवयोश्चैव सृष्टिरुक्ता सुविस्तरात्। है। उनके गर्भसे 'आदित्य' नामक पुत्र हुआ। अदितिकुमार संक्षेपात्तव वक्ष्यामि सृष्टिमेतां शृणुष्व मे ॥ ६ आदित्यको त्वष्टा प्रजापतिने अपनी संज्ञा नामकी कन्या दक्षकन्यादितिः। अदितेरादित्यः पुत्रः। तस्मै ब्याह दी। आदित्य भी त्वष्टाकी रूपवती एवं मनोरमा त्वष्टा दुहितरं संज्ञां नाम कन्यां दत्तवान् ॥ ७॥ सोऽपि कन्या संज्ञाको पाकर उसके साथ सुखपूर्वक रहने लगे। संज्ञा अपने पतिके तापको न सह सकनेके कारण कुछ त्वाष्ट्रीं रूपवतीं मनोज्ञां प्राप्य तया सह रेमे। सा कालके बाद अपने पिताके घर चली गयी। उस कन्याको कतिपयात् कालात् स्वभर्तुरादित्यस्य तापमसहन्ती देखकर पिताने कहा—'बेटी ! तुम्हारे स्वामी सूर्यदेव पितुर्गृहं जगाम ॥८॥ तामवलोक्य सुतां पितोवाच तुम्हारा स्नेहपूर्वक पालन करते हैं या तुम्हारे साथ किं पुत्रि तव भर्त्ता सविता स्नेहात् त्वां रक्षत्युत कठोरतापूर्ण व्यवहार करते हैं?' पिताकी ऐसी बात परुष इति ॥ ९॥ एवं पितुर्वचनं श्रुत्वा संज्ञा तं सुनकर संज्ञा उनसे बोली—'तात! मैं स्वामीके प्रचण्ड प्रत्युवाच। दग्धाहुं भर्तुः प्रचण्डतापादिति ॥ १० ॥ तापसे जल गयी हूँ।' यह सुनकर पिताने उससे कहा— 'बेटी! तुम पतिके घर चली जाओ। पतिकी सेवा करना एवं श्रुत्वा तामाह पिता गच्छ पुत्रि भर्तुर्गृहमिति ही युवती स्त्रियोंका परम उत्तम धर्म है। मैं भी कुछ ॥ ११॥ युवतीस्त्रीणां भर्तुः शुश्रूषणमेव धर्मः दिनोंके बाद आकर जामाता आदित्यदेवकी उष्णताको श्रेयान्। अहमपि कतिपयदिवसादागत्या- उनके शरीरसे कुछ कम कर दूँगा' ॥ ७-१२॥ दित्यस्योष्णतां जामातुरुद्धरिष्यामि ॥ १२ ॥ 1113 Narsingpuran_Section_4_1_Back In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय १८ ] भगवान् सूर्यद्वारा संज्ञाके गर्भसे मनु, यम और यमीकी उत्पत्ति ६७
इत्युक्ता सा च पुनर्भातृगृहं प्राप्य कतिपय- | पिताके यों कहनेपर वह पुनः पतिके घर लौट आयी दिवसान्मनुं यमीं यमं चापत्यत्रयमादित्यात् प्रासूत। | तथा कुछ दिनोंके बाद क्रमशः मनु, यम और यमी पुनस्तदुष्णतामसहन्ती छायां भर्तुरुपभोगाय | (यमुना)—इन तीन संतानोंको जन्म दिया। किंतु पुनः स्वप्रज्ञाबलेनोत्पाद्य तत्र संस्थाप्य गत्वोत्तर- | जब सूर्यका ताप उससे नहीं सहा गया, तब संज्ञाने अपनी कुरूनधिश्चायाश्वी भूत्वा विचचार ॥ १३ ॥ | बुद्धिके बलसे स्वामीके उपभोगके लिये अपनी छाया | (प्रतिबिम्ब)-स्वरूपा एक स्त्रीको उत्पन्न किया तथा उसे | ही घरमें रखकर वह उत्तरकुरुदेशमें चली गयी और वहाँ | घोड़ीका रूप धारण करके इधर-उधर विचरने लगी ॥ १३ ॥ आदित्योऽपि संज्ञेयमिति मत्वा तस्यां जायां | अदितिनन्दन सूर्यने भी उसे संज्ञा ही मानकर उस पुनरपत्यत्रयमुत्पादयामास ॥ १४ ॥ मनुं शनैश्चरं तपतीं | अपनी जाया (भार्या)-रूपधारिणी छायाके गर्भसे पुनः च। स्वेष्वपत्येषु पक्षपातेन वर्तन्तीं छायां दृष्ट्वा यमः | मनु, शनैश्चर तथा तपती—इन तीन संतानोंको उत्पन्न स्वपितरमाह नेयमस्मन्मातेति ॥ १५ ॥ पितापि | किया। छायाको अपनी संतानोंके प्रति पक्षपातपूर्ण बर्ताव तच्छ्रुत्वा भार्यां प्राह। सर्वेष्वपत्येषु सममेव | करते देखकर यमने अपने पितासे कहा—'तात! यह वर्ततामिति ॥ १६ ॥ पुनरपि स्वेष्वपत्येषु स्नेहात् | हमलोगोंकी माता नहीं है।' पिताने भी जब यह सुना, तब प्रवर्तन्तीं छायां दृष्ट्वा यमो यमी च तां | उस भार्यासे कहा—'सब संतानोंके प्रति समानरूपसे ही बहुविधमपीत्थमूवाच। आदित्यसंनिधानात् तूष्णीं | बर्ताव करो।' फिर भी छायाको अपनी ही संतानोंके प्रति बभूवतुः ॥ १७॥ ततश्छाया तयोः शापं दत्तवती। | अधिक स्नेहपूर्ण बर्ताव करते देख यम और यमीने उसे यम त्वं प्रेतराजो भव यमि त्वं यमुना नाम नदी | बहुत कुछ बुरा-भला कहा, किंतु जब सूर्यदेव पास आये, भवेति ॥ १८ ॥ ततः क्रोधादादित्योऽपि छायापुत्रयोः | तब वे दोनों चुप हो रहे। यह देख छायाने उन दोनोंको शापं दत्तवान् हे पुत्र शनैश्चर त्वं ग्रहो भव | शाप देते हुए कहा—'यम! तुम प्रेतोंके राजा बनो और क्रूरदृष्टिर्मन्दगामी च पापग्रहस्त्वं च ॥ १९ ॥ पुत्रि | यमी! तू 'यमुना' नामक नदी हो जा।' छायाका यह तपती नाम नदी भवेति। अथादित्यो ध्यानमास्थाय | क्रूरतापूर्ण बर्ताव देखकर भगवान् सूर्य भी कुपित हो उठे संज्ञा क्व स्थितेति विचारयामास ॥ २० ॥ | और उसके पुत्रोंको शाप देते हुए बोले—'बेटा शनैश्चर! | तू क्रूरतापूर्ण दृष्टिसे देखनेवाला मन्दगामी ग्रह हो जा। तेरी | गणना पापग्रहोंमें होगी। बेटी तपती! तू भी 'तपती' | नामकी नदी हो जा!' इसके बाद भगवान् सूर्य ध्यानस्थ | होकर विचार करने लगे कि 'संज्ञा' कहाँ है ॥ १४-२० ॥ स दृष्ट्वानुत्तरकुरुषु ध्यानचक्षुषाश्वीभूय | उन्होंने ध्यान-नेत्रसे देखा, संज्ञा उत्तरकुरुमें 'अश्वा' का विचरन्तीम्। स्वयं चाश्वरूपेण तत्र गत्वा | रूप धारण करके विचर रही है। तब वे स्वयं भी अश्वका तया सह सम्पर्कं कृतवान् ॥ २१ ॥ | रूप धारण करके वहाँ गये। जाकर उन्होंने उसके साथ तस्यामेवादित्यादश्विनावुत्पन्नौ तयोरतिशयवपुषोः | समागम किया। उस अश्वरूपधारिणी संज्ञाके ही गर्भसे साक्षात् प्रजापतिरागत्य देवत्वं यज्ञभागत्वं मुख्यं च | सूर्यके वीर्यसे दोनों 'अश्विनीकुमार' उत्पन्न हुए। उनके देवानां भिषजत्वं दत्त्वा जगाम। आदित्यश्चाश्वरूपं | शरीर सब देवताओंसे अधिक सुन्दर थे। साक्षात् ब्रह्माजीने विहाय स्वभार्यां संज्ञां त्वाष्ट्रीं स्वरूपधारिणीं | वहाँ पधारकर उन दोनों कुमारोंको देवत्व तथा यज्ञोंमें भाग नीत्वा स्वरूपमास्थाय दिवं जगाम ॥ २२ ॥ | प्राप्त करनेका अधिकार प्रदान किया। साथ ही उन्हें | देवताओंका प्रधान वैद्य बना दिया। इसके बाद ब्रह्माजी चले | गये। फिर सूर्यदेवने अश्वका रूप त्यागकर अपना स्वरूप
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६८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १९
६८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १९ विश्वकर्मा चागत्य आदित्यं नामभिः स्तुत्वा | धारण कर लिया। त्वष्टा प्रजापतिकी पुत्री संज्ञा भी अश्वाका | रूप छोड़कर अपने साक्षात् स्वरूपमें प्रकट हो गयी। उस तदतिशयोष्णतांशतामपशातयामास ॥ २३॥ | अवस्थामें सूर्यदेव त्वष्टाकी पुत्री अपनी पत्नी संज्ञाको | आदित्यलोकमें ले गये। तदनन्तर विश्वकर्मा सूर्यके पास एवं वः कथिता विप्रा अश्विनोत्पत्तिरुत्तमा । | आये और उन्होंने विविध नामोंद्वारा उनका स्तवन किया | तथा उनकी अनुमतिसे ही उनके श्रीअङ्गोंकी अतिशय पुण्या पवित्रा पापघ्नी भरद्वाज महामते ॥ २४ | उष्णताके अंशको कुछ शान्त कर दिया ॥ २१-२३॥ | महामते भरद्वाज तथा अन्य ब्राह्मणो! इस प्रकार आदित्यपुत्रौ भिषजौ सुराणां | मैंने आपलोगोंसे दोनों अश्विनीकुमारोंके जन्मकी उत्तम, | पुण्यमयी, पवित्र एवं पापनाशक कथा कह सुनायी। दिव्येन रूपेण विराजमानौ। | सूर्यके वे दोनों पुत्र देवताओंके वैद्य हैं। अपने | दिव्यरूपसे सदा प्रकाशित होते रहते हैं। उन दोनोंके श्रुत्वा तयोर्जन्म नरः पृथिव्यां | जन्मकी कथा सुनकर मनुष्य इस भूतलपर सुन्दर रूपसे | सुशोभित होता है और अन्तमें स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ भवेत् सुरूपो दिवि मोदते च ॥ २५ | आनन्दका अनुभव करता है॥ २४-२५॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे अश्विनोरुत्पत्तिर्नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'दोनों अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति' नामक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥ उन्नीसवाँ अध्याय विश्वकर्माद्वारा १०८ नामोंसे भगवान् सूर्यका स्तवन भरद्वाज उवाच | भरद्वाजजी बोले-सूतजी! विश्वकर्माने जिन यैः स्तुतो नामभिस्तेन सविता विश्वकर्मणा । | नामोंके द्वारा भगवान् सूर्यका स्तवन किया था, उन्हें मैं | सुनना चाहता हूँ। आप सूर्यदेवके उन नामोंका वर्णन तान्यहं श्रोतुमिच्छामि वद सूत विवस्वतः ॥ १ | करें ॥ १ ॥ सूत उवाच | सूतजीने कहा- ब्रह्मन् ! विश्वकर्माने जिन नामोंद्वारा तानि मे शृणु नामानि यैः स्तुतो विश्वकर्मणा । | भगवान् सविताका स्तवन किया था, उन सर्वपापहारी सविता तानि वक्ष्यामि सर्वपापहराणि ते ॥ २ | नामोंको तुम्हें बतलाता हूँ, सुनो ॥ २ ॥ | १. आदित्यः - अदितिके पुत्र, २. सविता- | जगत्के उत्पादक, ३. सूर्यः- सम्पत्ति एवं प्रकाशके आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्। | स्रष्टा, ४. खगः - आकाशमें विचरनेवाले, ५. पूषा- | सबका पोषण करनेवाले, ६. गभस्तिमान् - सहस्रों तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्ड आशुगः ॥ ३ | किरणोंसे युक्त, ७. तिमिरोन्मथनः - अन्धकारनाशक,
अध्याय १९ ] विश्वकर्माद्वारा १०८ नामोंसे भगवान् सूर्यका स्तवन ६९ ८. शम्भुः—कल्याणकारी, ९. त्वष्टा—विश्वकर्मा अथवा विश्वरूपी शिल्पके निर्माता, १०. मार्तण्डः—मृत अण्डसे प्रकट, ११. आशुगः—शीघ्रगामी ॥ ३ ॥ १२. हिरण्यगर्भः—ब्रह्मा, १३. कपिलः— कपिलवर्णवाले अथवा कपिलमुनिस्वरूप, १४. तपनः— तपने या ताप देनेवाले, १५. भास्करः—प्रकाशक, १६. रविः—रव—वेदत्रयीकी ध्वनिसे युक्त अथवा हिरण्यगर्भः कपिलस्तपनो भास्करो रविः। भूतलके रसोंका आदान (आकर्षण) करनेवाले, १७. अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शम्भुस्तिमिरनाशनः॥ ४ अग्निगर्भः—अपने भीतर अग्निमय तेजको धारण करनेवाले, १८. अदितेः पुत्रः—अदितिदेवीके पुत्र, शम्भुः— कल्याणके उत्पादक, १९. तिमिरनाशनः—अन्धकारका नाश करनेवाले ॥ ४ ॥ २०. अंशुमान्—अनन्त किरणोंसे प्रकाशमान, २१. अंशुमाली—किरणमालामण्डित, २२. तमोघ्नः— अन्धकारनाशक, २३. तेजसां निधिः—तेज अथवा प्रकाशके भण्डार, २४. आतपी—आतप या घाम प्रकट अंशुमानंशुमाली च तमोघ्नस्तेजसां निधिः। करनेवाले, २५. मण्डली—अपने मण्डल या विम्बसे आतपी मण्डली मृत्युः कपिलः सर्वतापनः॥ ५ युक्त, २६. मृत्युः—मृत्युरूप अथवा मृत्युके अधिष्ठाता यमको जन्म देनेवाले, २७. कपिलः सर्वतापनः— भूरी या सुनहरी किरणोंसे युक्त होकर सबको संताप देनेवाले ॥ ५ ॥ २८. हरिः—सूर्य अथवा पापहारी, २९. विश्वः— सर्वरूप, ३०. महातेजाः—महातेजस्वी, ३१. सर्वरत्न- हरिर्विश्वो महातेजाः सर्वरत्नप्रभाकरः। प्रभाकरः—सम्पूर्ण रत्नों तथा प्रभापुञ्जको प्रकट करनेवाले, अंशुमाली तिमिरहा ऋग्यजुस्सामभावितः॥ ६ ३२. अंशुमाली तिमिरहा—किरणोंकी माला धारण करके अन्धकारको दूर करनेवाले, ३३. ऋग्यजुस्सामभावितः—ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद— इन तीनोंके द्वारा भावित या प्रतिपादित ॥ ६ ॥ ३४. प्राणाविष्करणः—प्राणोंके आधारभूत अन्न आदिकी उत्पत्ति और जलकी वृष्टि करनेवाले, प्राणाविष्करणो मित्रः सुप्रदीपो मनोजवः। ३५. मित्रः—'मित्र' नामक आदित्य अथवा सबके यज्ञेशो गोपतिः श्रीमान् भूतज्ञः क्लेशनाशनः॥ ७ सुहृद्, ३६. सुप्रदीपः—भलीभाँति प्रकाशित होनेवाले अथवा सर्वत्र उत्तम प्रकाश बिखेरनेवाले, ३७. मनोजवः—मनके समान या उससे भी अधिक तीव्र वेगवाले, ३८. यज्ञेशः—यज्ञोंके स्वामी नारायणस्वरूप, ३९. गोपतिः—किरणोंके स्वामी अथवा भूमि एवं गौओंके पालक, ४०. श्रीमान्—कान्तिमान्, ४१. भूतज्ञः—सम्पूर्ण भूतोंके ज्ञाता अथवा भूतकालकी बातोंको
७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १९
७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १९ भी जाननेवाले, ४२. क्लेशनाशनः — सब प्रकारके क्लेशोंका नाश करनेवाले ॥ ७ ॥ अमित्रहा शिवो हंसो नायकः प्रियदर्शनः । शुद्धो विरोचनः केशी सहस्त्रांशुः प्रतर्दनः ॥ ८ ४३. अमित्रहा — शत्रुनाशक, ४४. शिवः — कल्याणस्वरूप, ४५. हंसः — आकाशरूपी सरोवरमें विचरनेवाले एकमात्र राजहंस अथवा सबके आत्मा, ४६. नायकः — नेता अथवा नियन्ता, ४७. प्रियदर्शनः — सबका प्रिय देखने या चाहनेवाले अथवा जिनका दर्शन प्राणिमात्रको प्रिय है, ऐसे, ४८. शुद्धः — मलिनतासे रहित, ४९. विरोचनः — अत्यन्त प्रकाशमान, ५०. केशी — किरणरूपी केशोंसे युक्त, ५१. सहस्रांशुः — असंख्य किरणोंके पुञ्ज, ५२. प्रतर्दनः — अन्धकार आदिका विशेषरूपसे संहार करनेवाले ॥ ८ ॥ धर्मरश्मिः पतंगश्च विशालो विश्वसंस्तुतः । दुर्विज्ञेयगतिः शूरस्तेजोराशिर्महायशाः ॥ ९ ५३. धर्मरश्मिः — धर्ममयी किरणोंसे युक्त अथवा धर्मके प्रकाशक, ५४. पतंगः — किरणरूपी पंखोंसे उड़नेवाले आकाशचारी पक्षिस্বরূপ, ५५. विशालः — महान् आकारवाले अथवा विशेषरूपसे शोभायमान, ५६. विश्वसंस्तुतः — समस्त जगत् जिनकी स्तुति-गुणगान करता है, ऐसे, ५७. दुर्विज्ञेयगतिः — जिनके स्वरूपको जानना या समझना अत्यन्त कठिन है, ऐसे, ५८. शूरः — शौर्यशाली, ५९. तेजोराशिः — तेजके समूह, ६०. महायशाः — महान् यशसे सम्पन्न ॥ ९ ॥ भ्राजिष्णुर्ज्योतिषामीशो विजिष्णुर्विश्वभावनः । प्रभविष्णुः प्रकाशात्मा ज्ञानराशिः प्रभाकरः ॥ १० ६१. भ्राजिष्णुः — दीप्तिमान्, ६२. ज्योतिषामीशः — तेजोमय ग्रह-नक्षत्रोंके स्वामी, ६३. विजिष्णुः — विजयशील, ६४. विश्वभावनः — जगत्के उत्पादक, ६५. प्रभविष्णुः — प्रभावशाली अथवा जगत्की उत्पत्तिके कारण, ६६. प्रकाशात्मा — प्रकाशस्वरूप, ६७. ज्ञानराशिः — ज्ञाननिधि, ६८. प्रभाकरः — उत्कृष्ट प्रकाश फैलानेवाले ॥ १० ॥ आदित्यो विश्वदृग् यज्ञकर्ता नेता यशस्करः । विमलो वीर्यवानीशो योगज्ञो योगभावनः ॥ ११ ६९. आदित्यो विश्वदृक् — आदित्यरूपसे जगत्के द्रष्टा या साक्षी अथवा सम्पूर्ण संसारके नेत्ररूप, ७०. यज्ञकर्ता — जगत्को जल एवं जीवन प्रदान करके दानयज्ञ सम्पन्न करनेवाले, ७१. नेता — अन्धकारका नयन — अपसारण कर देनेवाले, ७२. यशस्करः यशका विस्तार करनेवाले । ७३. विमलः — निर्मलस्वरूप, ७४. वीर्यवान् — शक्तिशाली, ७५. ईशः — ईश्वर,
अध्याय १९ ] विश्वकर्माद्वारा १०८ नामोंसे भगवान् सूर्यका स्तवन ७१ ७६. योगज्ञः — भगवान् श्रीहरिसे कर्मयोगका ज्ञान प्राप्त करके उसका मनुको उपदेश करनेवाले*, ७७. योगभावनः — योगको प्रकट करनेवाले ॥ ११ ॥ ७८. अमृतात्मा शिवः — अमृतस्वरूप शिव, अमृतात्मा शिवो नित्यो वरेण्यो वरदः प्रभुः। ७९. नित्यः — सनातन, ८०. वरेण्यः — वरणीय — आश्रय धनदः प्राणदः श्रेष्ठः कामदः कामरूपधृक् ॥ १२ लेनेयोग्य, ८१. वरदः — उपासकको मनोवाञ्छित वर देनेवाले, ८२. प्रभुः — सब कुछ करनेमें समर्थ, ८३. धनदः — धनदान करनेवाले, ८४. प्राणदः — प्राणदाता, ८५. श्रेष्ठः — सबसे उत्कृष्ट, ८६. कामदः — मनोवाञ्छित वस्तु देनेवाले, ८७. कामरूपधृक् — इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले ॥ १२ ॥ ८८. तरणिः — संसारसागरसे तारनेवाले, तरणिः शाश्वतः शास्ता शास्त्रज्ञस्तपनः शयः। ८९. शाश्वतः — सनातन पुरुष, ९०. शास्ता — शासक वेदगर्भो विभुर्वीरः शान्तः सावित्रिवल्लभः ॥ १३ या उपदेशक, ९१. शास्त्रज्ञः — समस्त शास्त्रोंके ज्ञाता, तपनः — तपनेवाले या ताप देनेवाले, ९२. शयः — सबके अधिष्ठान या आश्रय, ९३. वेदगर्भः — शुक्लयजुर्वेदको प्रकट करनेवाले, ९४. विभुः — सर्वत्र व्यापक, ९५. वीरः — शूरवीर, ९६. शान्तः — शमयुक्त, ९७. सावित्रिवल्लभः — गायत्रीमन्त्रके अधिदेवता ॥ १३ ॥ ९८. ध्येयः — ध्यान करनेयोग्य, ९९. विश्वेश्वरः — सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर, १००. भर्ता — सबका भरण- ध्येयो विश्वेश्वरो भर्ता लोकनाथो महेश्वरः। पोषण करनेवाले, १०१. लोकनाथः — संसारके रक्षक, महेन्द्रो वरुणो धाता विष्णुरग्निर्दिवाकरः ॥ १४ १०२. महेश्वरः — परमेश्वर, १०३. महेन्द्रः — देवराज इन्द्र-स्वरूप, १०४. वरुणः — पश्चिम दिशाके अधिपति 'वरुण' नामक आदित्य, १०५. धाता — जगत्का धारण- पोषण करनेवाले अथवा 'धाता' नामक आदित्य, १०६. विष्णुः — व्यापक अथवा 'विष्णु' नामक आदित्य, १०७. अग्निः — अग्निस্বরূপ, १०८. दिवाकरः — रात्रिका अंधकार दूर करके प्रकाशपूर्ण दिनको प्रकट करनेवाले ॥ १४ ॥ एतैस्तु नामभिः सूर्यः स्तुतस्तेन महात्मना। उन महात्मा विश्वकर्माने उपर्युक्त नामोंद्वारा भगवान् उवाच विश्वकर्माणं प्रसन्नो भगवान् रविः ॥ १५ सूर्यका स्तवन किया। इससे भगवान् सूर्यको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे उन विश्वकर्मासे बोले ॥ १५ ॥ प्रजापते! आपकी बुद्धिमें जो बात है — आप जिस उद्देश्यको लेकर आये हैं, वह मुझे ज्ञात है। अतः आप भ्रमिमारोप्य मामत्र मण्डलं मम शातय। मुझे शाणचक्रपर चढ़ाकर मेरे मण्डलको छाँट दें; इससे त्वद्बुद्धिस्थं मया ज्ञातमेवमौष्ण्यं शमं व्रजेत् ॥ १६ मेरी उष्णता कुछ कम हो जायगी ॥ १६ ॥
- जैसा कि गीतामें कहा है — 'इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह....................॥'
७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २० इत्युक्तो विश्वकर्मा च तथा स कृतवान् द्विज। ब्रह्मन् ! भगवान् सूर्यके यों कहनेपर विश्वकर्माने शान्तोष्णाः सविता तस्य दुहितुर्विश्वकर्मणः ॥ १७ वैसा ही किया। विप्रवर! उस दिनसे प्रकाशस्वरूप सविता विश्वकर्माकी बेटी संज्ञाके लिये शान्त हो गये तथा उनकी उष्णता कम हो गयी। इसके बाद वे त्वष्टासे बोले ॥ १७१/२ ॥ संज्ञायाश्चाभवद्विप्र भानुस्त्वष्टारमब्रवीत्। अनघ! चूँकि आपने एक सौ आठ नामोंके द्वारा त्वया यस्मात् स्तुतोऽहं वै नाम्नामष्टशतेन च ॥ १८ मेरी स्तुति की है, इसलिये मैं प्रसन्न होकर आपको वर देनेके लिये उद्यत हूँ। कोई वर माँगिये ॥ १८१/२ ॥ वरं वृणीष्व तस्मात् त्वं वरदोऽहं तवानघ। भगवान् सूर्यके यों कहनेपर विश्वकर्मा बोले-देव! इत्युक्तो भानुना सोऽथ विश्वकर्माब्रवीदिदम् ॥ १९ यदि आप मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो यह मुझे वर वरदो यदि मे देव वरमेतं प्रयच्छ मे। प्रदान कीजिये- 'देव भास्कर! जो मनुष्य इन नामोंके एतैस्तु नामभिर्यस्त्वां नरः स्तोष्यति नित्यशः॥ २० द्वारा प्रतिदिन आपकी स्तुति करे, उस भक्तपुरुषके सारे तस्य पापक्षयं देव कुरु भक्तस्य भास्कर ॥ २१ पापोंका आप नाश कर दें' ॥ १९-२१ ॥ तेनैवमुक्तो दिनकृत् तथेति विश्वकर्माके यों कहनेपर दिन प्रकट करनेवाले त्वष्टारमुक्त्वा विरराम भास्करः। भगवान् भास्कर उनसे 'बहुत अच्छा' कहकर चुप हो संज्ञां विशङ्कां रविमण्डलस्थितां गये, तत्पश्चात् सूर्यमण्डलमें निवास करनेवाली संज्ञाको कृत्वा जगामाथ रविं प्रसाद्य ॥ २२ निर्भय करके, सूर्यदेवको संतुष्टकर विश्वकर्मा अपने स्थानको चले गये ॥ २२ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥ बीसवाँ अध्याय मारुतोंकी उत्पत्ति सूत उवाच श्रीसूतजी बोले- द्विजश्रेष्ठ! अब मैं मारुतोंकी साम्प्रतं मारुतोत्पत्तिं वक्ष्यामि द्विजसत्तम। पुरा उत्पत्तिका वर्णन करूँगा। पूर्वकालमें देवासुर-संग्राममें देवासुरे युद्धे देवैरिन्द्रादिभिर्दितैः ॥ १ ॥ पुत्राः पराभूता इन्द्र आदि देवताओंद्वारा दितिके पुत्र दैत्यगण पराजित दितिश्च विनष्टपुत्रा महेन्द्रदर्पहरं पुत्रमिच्छन्ती हो गये थे। उस समय दिति, जिसके पुत्र नष्ट हो कश्यपमृषिं स्वपतिमाराधयामास ॥ २ ॥ स च गये थे, महेन्द्रके अभिमानको चूर्ण करनेवाले पुत्रकी तपसा संतुष्टो गर्भाधानं चकार तस्याम्। इच्छा मनमें लेकर अपने पति कश्यप ऋषिकी पुनस्तामेवमुक्तवान् ॥ ३ ॥ यदि त्वं शुचिः सती आराधना करने लगी। तपस्यासे संतुष्ट होकर ऋषिने दितिके भीतर गर्भका आधान किया। फिर वे उससे इस प्रकार बोले- 'यदि तुम पवित्र रहती हुई In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय २१ ] सूर्यवंशका वर्णन ७३
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अध्याय २१ ] सूर्यवंशका वर्णन ७३
[अध्याय २० (अवशिष्ट भाग)]
[संस्कृत] शरच्छतमिमं गर्भं धारयिष्यसि ततश्च महेन्द्रदर्पहन्ता पुत्रो भविष्यति। इत्येवमुक्ता सा च तं गर्भं धारयामास ॥ ४ ॥ इन्द्रोऽपि तज्ज्ञात्वा वृद्धब्राह्मणरूपेणागत्य दितिपाश्र्वं स्थितवान्। किंचिदूनपूर्णे वर्षशते पादशौचमकृत्वा दितिः शयनमारुह्य निद्रां गता ॥ ५ ॥ सोऽपि लब्धावसरो वज्रपाणिस्तत्कुक्षिं प्रविश्य वज्रेण तं गर्भं सप्तधा चिच्छेद। सोऽपि तेन प्रच्छिद्यमानो रुरोद ॥ ६ ॥ मा रोदीरिति वदन्निन्द्रस्तान् सप्तधैकैकं चिच्छेद ॥ ७ ॥ सप्तधा ते सर्वे मरुतो यतो जातमात्रान्मा रोदीरित्युक्तवान्। महेन्द्रस्य सहाया अमी मरुतो नाम देवा बभूवुः ॥ ८ ॥
एवं मुने सृष्टिरियं तवेरिता देवासुराणां नरनागरक्षसाम् । वियन्मुखानामपि यः पठेदिदं शृण्वंश्च भक्त्या हरिलोकमेति सः ॥ ९ ॥
[हिन्दी अनुवाद] सौ वर्षोंतक इस गर्भको धारण कर सकोगी तो उसके बाद इन्द्रका दर्प चूर्ण करनेवाला पुत्र तुम्हारे गर्भसे उत्पन्न होगा।' कश्यपजीके यों कहनेपर दितिने उस गर्भको धारण किया ॥ १-४ ॥
इन्द्रको भी जब यह समाचार ज्ञात हुआ, तब वे बूढ़े ब्राह्मणके वेषमें दितिके पास आये और रहने लगे। जब सौ वर्ष पूर्ण होनेमें कुछ ही कमी रह गयी, तब एक दिन दिति (भोजनके पश्चात्) पैर धोये बिना ही शय्यापर आरूढ़ हो, सो गयी। इधर इन्द्रने भी अवसर प्राप्त हो जानेसे वज्र हाथमें ले, दितिके उदरमें प्रविष्ट हो, वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर दिये। उनके द्वारा काटे जानेपर वह गर्भ रोने लगा। तब इन्द्रने 'मा रोदीः' (मत रोओ)—यों कहते हुए पुनः एक-एकके सात-सात टुकड़े कर डाले। इस तरह सात-सात टुकड़ोंमें बँटे हुए वे सातों खण्ड 'मारुत' नामसे विख्यात हुए; क्योंकि जन्म होते ही इन्द्रने उन्हें 'मा रोदीः'-इस प्रकार कहा था। ये सभी इन्द्रके सहायक 'मरुत्' नामक देवता हुए ॥ ५-८ ॥
मुने! इस प्रकार मैंने तुमसे देवता, असुर, नर, नाग, राक्षस और आकाश आदि भूतोंकी सृष्टिका वर्णन किया। जो इसका भक्तिपूर्वक पाठ अथवा श्रवण करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है ॥ ९ ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे विंशतितमोऽध्यायः ॥ २० ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मरुतोंकी उत्पत्ति' नामक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
इक्कीसवाँ अध्याय
सूर्यवंशका वर्णन
भरद्वाज उवाच अनुसर्गश्च सर्गश्च त्वया चित्रा कथेरिता । वंशमन्वन्तरे ब्रूहि वंशानुचरितं च मे ॥ १ ॥
भरद्वाजजी बोले— सूतजी! आपने 'सर्ग' और 'अनुसर्ग' का वर्णन किया, विचित्र कथाएँ सुनायीं; अब मुझसे राजाओंके वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरितका वर्णन करें ॥ १ ॥
सूत उवाच राज्ञां वंशः पुराणेषु विस्तरेण प्रकीर्तितः । संक्षेपात् कथयिष्यामि वंशमन्वन्तराणि ते ॥ २ ॥
वंशानुचरितं चैव शृणु विप्र महामते । शृण्वन्तु मुनयश्चेमे श्रोतुमागत्य ये स्थिताः ॥ ३ ॥
सूतजी बोले— पुराणोंमें राजाओंके वंशका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है; यहाँ मैं राजाओंके वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरितका संक्षेपसे वर्णन करूँगा। महामते विप्रवर! इसे आप तथा अन्य मुनि भी, जो कथाश्रवणके लिये यहाँ आकर ठहरे हुए हैं, सुनें ॥ २-३ ॥