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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( २१५ ) ६ अ० १ पा० ६ खं०
वाचं पर्जन्यजिन्वितां प्रमण्डूका अवादिषुः ॥
[ऋ० सं० ५, ७, ३, १] ॥
संवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः– अब्रु-
वाणाः । अपि वा उपमार्थे स्यात्— ब्राह्मणा इव
व्रतचारिणः– इति । वाचं पर्जन्यप्रीतां प्रावादिषुः
मण्डूकाः ॥
अर्थः– "संवत्सरम्०" इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि है।
'संवत्सरम्' वर्ष भर 'शशयानाः' (शिश्यानाः) न बोलने
से सोये हुये जैसे 'ब्राह्मणाः' (ब्रुवाणाः सर्वथा सन्तो वक्तुम्)
सब प्रकार से बोलने वाले होकर भी 'व्रतचारिणः' (अब्रुवाणाः)
मौनी रहते हुये— अथवा (ब्राह्मण शब्द) उपमा अर्थ में हो–
ब्राह्मणों के समान व्रतधारी रहते हुये [जिस प्रकार ब्राह्मण
वर्षा में उपाकर्म करके हाथ में पवित्र धारण करके मेखला =
मूंज आदि विहित द्रव्य की तागड़ी पहिन कर नियत समय
तक वेद की वाणी को बोलते रहते हैं, वैसे ही] 'मण्डूकाः'
मेंढक 'पर्जन्यजिन्विताम्' मेघ से तृप्त हुई 'वाचम्' वाणी को
'प्र-अवादिषुः' (वदन्ति) बोलते हैं ॥
व्याख्या– उक्त निगम में भाष्यकारने 'ब्राह्मण' शब्द
से यौगिक वृत्ति ˙ ब्रुवाण (बोलने वाला) अर्थ तथा रूढिवृत्ति
से ब्राह्मण जातीय अर्थ लेकर व्याख्या धर्म का परिदर्शन किया
है। अर्थात्– मन्त्रों में प्रमाण के अविरुद्ध एक शब्द के नाना
अर्थ परिकल्पित करने में भी कोई हानि नहीं होती।
निरु०– वसिष्ठो वर्षकामः पर्जन्यं तुष्टाव । तं

हिन्दी निरुक्त ( २१६ ) ६ अ० १ पा० ७ खं०
मण्डूकाः अन्वमोदन्त । स मण्डूकान् अनुमोदमा-
नान् दृष्ट्वा तुष्टाव ।
तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति- ॥६॥
अर्थ:- वसिष्ठ ऋषि ने वर्षा की कामना से पर्जन्य (मेघ)
की स्तुति की । मण्डूकों ने (मेंढकों ने ) उसका अनुमोदन
किया = सराहा । उस ऋषि ने अनुमोदन करते हुये मण्डकों
को देखकर स्तुति की ॥
उसको कहने वाली यह ऋचा है-॥६॥
(खं० ७)
निरु०- "उप प्रवद मण्डूकि वर्ष मावद तादुरि ।
मध्ये ह्रदस्य प्लवस्व विगृह्य चतुरः पदः ॥”
[ ] इति सा निगदव्याख्याता ।
'अक्षाः' अश्नुवते एनान्- इतिवा। अभ्यश्नुवते
एभिः- इतिवा ।
तेषाम्- एषा भवति- ॥७॥
अर्थ- "उप प्रवद" हे 'मण्डूकि !' हे मेंढकी ! (त्वम्)
तू (मा) मेरे (उप) (गम्य) पास होकर 'प्रवद' खूब बोल 'वर्षम्'
वर्ष भर 'आ' सामने होकर 'वद' बोल 'तादुरि' हे तैरने
के स्वभाव वाली । 'ह्रदस्य' तलाव के 'मध्ये' बीच में 'चतुरः'
चारों 'पदः' पैरों को 'विगृह्य' फैलाकर 'प्लवस्व' तैर ।
यह ऋचा अपने उच्चारण से ही व्याख्यान की हुई है ।
'अक्षाः (४) (पासे) यह निर्वचन करने योग्य है ।
'अक्ष' क्यों ? 'अश्नुवते एनान्' जुवारिये इन्हें हाथों से

हिन्दी निरुक्त (२१७) ६ अ० १ पा० ८ खं०
अशन (व्यापन) करते हैं। अथवा इससे ज्वारिये दूसरे जुवा-
रिये से धन को अशन करते हैं- लेते हैं ।
उन (पासों) की स्तुति करने वाली यह ऋचा है- ॥७॥
(खं० ८)
निरु०- "प्रावेपा मा बृहतो मादयन्ति प्रवातेजा
इरिणे वर्वृतानाः । सोमस्येव मौजवतस्य भक्षो
विभीदको जागृविर्मह्यमच्छान्॥"[अ०७अ०८व३]
प्रवेपिणो मा महतो विभीदकस्य फलानि माद-
यन्ति । प्रवातेजाः प्रवणेजाः । इरिणे वर्त्तमानाः।
'इरिणं' निर्ऋणम् । ऋणातेः । अपार्णं भवति
अपरता ओषधयः अस्मात्- इतिवा ।
सोमस्येव मौजवतस्य भक्षः ।
'मौजवतः' मूजवति जातः ।
'मृजवान्' पर्वतः । मुञ्जवान् ।
'मुञ्जः' विमुच्यते इषीकया ।
'इषीका' इषतेर्गतिकर्मणः । इयमपि 'इषीका'
एतस्मादेव ।
'विभीदकः' विभेदनात् ।
'जागृविः' जागरणात् ।
मह्यम्- अचच्छत् । प्रशंसति एनान् प्रथमया
निन्दति उत्तराभिः, ऋषेः अक्षपारिचनस्य एतद्-

आर्षं वेदयन्ते ॥
'ग्रावाणः' हन्तेर्वा । गृणातेर्वा । गृह्णातेर्वा ॥
तेषाम्-एषा भवति- ॥ ८ ॥
अर्थः- "प्रावेपाः" यह ऋचा अक्षपुत्र मौजवंत ऋषि
की है ।
[ एते अक्षाः-] ये अक्ष या पासे 'प्रावेपाः' ( प्रवेपिणः )
बहुत कांपने वाले 'बृहत्तः' ( महतःवृक्षस्य ) बड़े वृक्षके हैं-
किसी बहुत कांपने वाले वृक्षसे उपजे हैं = बने हुए हैं। 'प्रवाते-
जाः' ( प्रवणोजाः ) बहुत वायुके या जलके स्थान में या काल
में उत्पन्न हुये हैं । 'इरिणे' (अपगतर्णे ) जहां पुत्र पौत्र आदि
तक ऋण नहीं जाता, किन्तु अपने तक ही रहता है, ऐसे
स्थान में उत्पन्न हुए हुए, 'मौजवतस्य' मूजवान् पर्वत में
उत्पन्न हुए हैं, 'सोमस्य' सोमके 'भक्षः-इव' भक्षण के समान
'मा' मुझे 'मादयन्ति' ( हर्षयन्ति ) हर्षित करते हैं अथवा
( तर्पयन्ति ) तृप्त करते हैं । और जो 'विभीदकः' कोष्ठ का
भेदन करने वाला 'जागृविः' जागरण का करने वाला तथा
'मह्यम्' मेरे लिये 'अच्छान् ( अच्छच्छदत् ) (प्रशंसति-एमान् )
इनकी प्रशंसा करता है, ( तस्य विभीदकस्य फलानि )
उस विभीदक वृक्ष के ये फल हैं॥
'इरिण' क्या ? निर्ऋण होता है । (क्योंकि-जूवा के
स्थान में हारने से जो ऋण होता है, वह हारने वाले के पुत्र
पौत्र पर नहीं जाता, किन्तु उस पुरुष तथा उस स्थान में ही
रहता है ।) 'ऋ' ( क्रया०प० ) धातु से है। अथवा 'इरिण'
ऊपर भूमि होती है । क्योंकि-'अपगता ओषधयः अस्मात्'
इससे ओषधि गई हुई होती हैं-इसमें कुछ उपजता नहीं ।

‘मौजवत’ क्या ? मूजवान् में उत्पन्न ।
‘मूंजवान ही क्या ? पर्वत वह क्यों ? मूंजवाला होने से
‘मुञ्ज’ क्यों ? इषीका से (तूली से) सिसोचन की
जाती है ।
‘इषीका’ कैसे ? गति अर्थ में ‘इष’ (तु०प०) धातु से ।
यह इषीका भी इसी से है ।
‘विभीदक’ क्यों ? भेदन करने से ।
‘जागृवि,’ क्यों ? जागरण से । क्योंकि-जो जूवामें हारता
है वह दुःख से जागता है, और जीतता है, वह सुख से =
हर्ष से जागता है ।
पहिली ऋचा से इनकी प्रशंसा करता है, और अगली
ऋचाओं से इसकी निन्दा करता है । इस ऋचा को अक्ष-
परिद्यून (अक्षपुत्र) ऋषि का आर्ष बताते हैं,-अक्षपुत्र ऋषि
इसका ऋषि है, ऐसा कहते हैं ।
‘ग्रावाणः’ (५) (पत्थर) कैसे ? हिंसार्थक ‘हन्’ (अदा०
प०) धातु से हैं । क्योंकि-इनसे हनन किया जाता है । शब्द
अर्थ में ‘गृ’ (क्र्या०प०) धातु से हैं । क्योंकि-इनसे शब्द
होता है अथवा ‘ग्रह’ (क्र्या०प०) धातु से हैं । क्योंकि-ये
कूटने आदि क्रिया के लिये ग्रहण किये जाते हैं ।
उन ग्रावों (पत्थरों) की स्तुति की यह ऋचा है-॥८॥
व्याख्या
“प्रावेपा०” मन्त्र में-जिस वस्तुमें जो गुण या दोष होते
हैं, वे सब प्रायः उसके कारण से ही आए हुए होते हैं, इसी
न्याय से अक्षों के सब गुण दोषों को उनके कारण भूत वृक्ष
में ऋषि देखता है । इन में जो कम्पन मादन जागरण और

हिन्दी निरुक्त ( ३२० ) ६ अ० १ पा० ६ खं०
भेदन आदि धर्म हैं वे सब उनके उत्पत्ति स्थान वृक्षसे आये
हुये हैं, इसी प्रकार संसार की अन्य २ वस्तुओं में या प्रा-
णिश्रों में देखना चाहिये यह मन्त्र का उपदेश है ॥८॥
( खं० ६ )
निरु०-प्रैते वदन्तु प्र॒वयं व॑दाम॒ ग्राव॑भ्यो॒ वाच॑
वदता वदद्भ्यः । यदद्र॑यः पर्वताः साकमाशवः
श्लोकं॒ घोषं॒ भरथेन्द्राय सोमिनः ॥” ( ऋ०सं० ८,
४, २९, १ ) ॥
प्रवदन्तु एते, प्रवदाम वयं, ग्रावभ्यो वाचं वदत
वदद्भ्यः यद्-अद्रयः पर्वताः आदरणीयाः सह
सोमम्-आशवः क्षिप्रकारिणः ।
‘श्लोकः’ शृणोतेः ।
‘घोषः’ घुष्यतेः ।
सोमिनो यूयं स्थ-इतिवा । सोमिनो गृहेषु इतिवा ।
येन नराः प्रशस्यन्ते स ‘नाराशमो’ मन्त्रः ।
तस्य-एषा भवति-॥९॥
अर्थ:-“प्रैते वदन्तु०” इस ऋचा का अर्बुद ऋषि है।
हे ग्रावो ! ( पत्थरों ) ‘यद्’ ( यस्मात् ) जिस से कि
( यूयम् ) तुम ‘अद्रयः’ ( आदरणीयाः ) आदर के योग्य हो,
‘पर्वताः’ ( पर्ववन्तः ) पर्वों वाले हो- ग्रन्थियों वाले हो,
‘साकम्’ ( सह ) साथ मिले हुए ‘आशवः’ ‘सोमम् अश्नीथ’
सोम को अशन करते हो-कूटते हो, और उस सोमको कूटते

हिन्दी निरुक्त ( २२१ ) ६ अ० १ पा० ६ खं०
हुए तुम 'इन्द्राय' इन्द्र के अर्थ 'श्लोकम्' श्रवणीय = मनको
लुभाने वाले 'घोषम्' (शब्दम्) शब्द को 'भरथ' धारण करते
हो, और जो (यूयम्) तुम 'सोमिनः' सोम वाले ( स्थ ) होते
हो अथवा सोम वाले यजमान के (गृहेषु) घरोंमें (एवं कुरुध्वे)
ऐसा करते हो [ इस कारण तुम से कहता हूँ-] 'एते' (उद्-
गातारः) ये उद्गाता = गाने वाले ऋत्विज् तुम्हारे अर्थ स्तु-
तिए' 'प्रवदन्तु' कहें या गावैं । और 'वयम्' हम होता लोग
'प्र-वदाम' स्तुतिए' कहें । और [अध्वर्युओं से भी हम कहते
हैं कि-] (यूयमपि) तुम भी 'वद्भ्यः' बोलते हुओं 'ग्रावभ्यः'
पत्थरों के लिये 'वाचम्' वाणी को 'वदत' बोलो ।
'नराशंस' (६) शब्द का निर्वचन कर्तव्य है ।
'नराशंस' कौन है ? येन नराः प्रशस्यन्ते सः नाराशंसो
मन्त्रः' जिस से नर (मनुष्य) स्तुति किये जाते हैं, वह 'ना-
राशंस' मन्त्र होता है-'नराशंस' एक प्रकार का मन्त्र होता
है । क्योंकि-उससे नरोंकी = मनुष्यों की प्रशंसा कीजातीहै ।
“तस्य०” उस नाराशंस मन्त्र की यह ऋचा उदाहरण
है, अथवा उस नर विशेष भावयव्य की प्राधान्य स्तुति की
यह ऋचा है ॥६॥
व्याख्या ।
इस देवता काण्ड में यह 'नराशंस नाम पढ़ा गया है,
और आचार्य ने स्वयम् यह व्याख्यान किया है कि-यह नाम
मन्त्र विशेष का है, इससे प्रकरण के अनुसार ऐसी प्रतीति
होती है कि- और पदार्थों के समान मन्त्र की स्तुति भी
मन्त्रों में आती होगी ? किन्तु ऐसा नहीं है । 'नराशंस'

हिन्दी निरुक्त ( २२२ ) ६ अ० १ पा० १० खं०
मन्त्र वही है, जिस में नरों की स्तुति हो इस से नरों की
प्राधान्यस्तुति वाली ऋचा ही इसका उदाहरण होसकती है।
यद्यपि जिसकी मन्त्र में स्तुति होती है, उसीका नाम
समाम्नाय में पढा जाता है, इससे मनुष्यों के ही नामों का
समाम्नाय में समाम्नान होना चाहिये था, तथापि नरों की
कोई सामान्य स्तुति = नरमात्र की स्तुति = नर जातीय की
अनुगत या व्यापक स्तुति मन्त्रों में नहीं आती, बल्कि-राजा-
ओं की स्तुति आती है, और उनकी भी राजामात्र की स्तुति
नहीं, बल्कि किसी किसी विशेष व्यक्ति की एक २ करके
स्तुति आती है, इसी से नरों के नामों का समाम्नान (पाठ)
न करके 'नाराशंस' मन्त्र का नाम ही पढ़ाया गया है, और उसके
उदाहरण के लिये भावयव्य राजा की स्तुति की ऋचा दी
जाती है ॥ ६ ॥
(खं० १०)
निघ०-“अमन्दान्स्तोमान्प्रभरे मनीषा सिन्धा-
वधि क्षियतो भाव्यस्य । यो मे सहस्रममिमीत
सवान्तूत्तौ राजा श्रव इच्छमानः ॥” [ऋ० सं०
२, १, ११, १] ॥
अमन्दान् स्तोमान् अबालिशान्,अनल्पान् वा।
‘बालः' बलवर्त्ती । भर्त्तव्यो भवति । अम्बा अस्मै
अलं भवति इति वा । अम्बा अस्मै बलं भवति
इतिवा । बलो वा प्रतिषेधव्यवहितः ।
प्रभरे मनीषा । मनसः ईषया, स्तुत्या, प्रज्ञया

हिन्दी निरुक्त (२२३) ६ अ० १ पा० १० खं०
वा । सिन्धौ अधिनिवसतः भावयव्यस्य राज्ञः
यः मे सहस्रं निरमिमीत सवान् अतूर्त्तो राजा ।
अतूर्णः इति वा। अत्वरमाणः इति वा । प्रशंसां
इच्छमानः ॥१०॥
इति नवमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥९,१॥
अर्थः- "अमन्दान्स्तोमान् "दान से संतुष्ट होकर
कक्षीवान् ऋषि कहता है -
(अहम्) मैं (तस्य) उस 'सिन्धौ-अधि' सिन्धु नदी के ऊपर
(समीप) 'क्षितयः' (निवसतः) बसने वाले 'भाव्यस्य' (भाव-
यव्यस्यराज्ञः)भावयव्य राजा के 'मनीषा' (मनीषया = मन-
सः ईषया = स्तुत्या = प्रज्ञया वा) मनकी प्रेरित या प्रेरणा
की हुई स्तुति से अथवा बुद्धि से 'अमन्दान्' (अबालिशान् )
अनल्पान् वा ) जो मूर्खों के योग्य नहीं , ऐसे अथवा बहुत
घने 'स्तोमान्' स्तोमों को = स्तुतियों को 'प्रभरे' ( प्रहरे =
उच्चारये ) उच्चारण करता हूं । 'यः' ( राजा ) जिस राजा ने
'अतूर्त्तः' (अतूर्णः इतिवा अत्वरमाणः इति वा)बिना वेग के
या बिना घबराहट के 'श्रवः ( प्रशंसां ) इच्छमानः' अपनी
प्रशंसा = अटल कीर्त्तिको इच्छा करते हुये ने 'मे' मेरे 'सह-
स्त्रं' हजार 'सवान्' यज्ञों को 'प्रमिमीत' (निरमिमीत) सिद्ध
किया है- बहुत यज्ञों के उपकरण = सामान दिये हैं ॥
'बाल' क्यों ? वह बलवर्त्ती = बल में रहने वाला होता
है । अथवा भर्त्तव्य (पालने योग्य) होता है । अथवा अम्बा
(माता) इस के लिये अलम् या पर्याप्त(बस) होती है, उससे

हिन्दी निरुक्त ( २२४ ) ९ अ० २ पा० १ खं०
'बाल' है । अथवा अम्बा (माता) इसके लिये बल होती है ।
इससे यह 'बाल' है । अथवा बल इसमें नहीं होता इससे यह
'बाल' है ॥ १० ॥
इति हिन्दी निरुक्ते नवमस्याध्यायस्य प्रथमः पादःसमाप्तः ९।१
द्वितीयः पादः ॥
( खं० १ )
निघ०— रथः॥७॥ दुन्दुभिः॥८॥ इषुधिः
॥६॥हस्तघ्नः ॥१०॥ अभीशवः ॥ ११ ॥
धनुः ॥१२॥ ज्या ॥१३॥इषुः॥१४॥अश्वा-
जनी ॥१५॥ उलूखलम् ॥१६॥
निरु०- यज्जसंभोगाद् राजा स्तुतिं लभेत ।
राजसंयोगाद् युद्धोपकरणानि । तेषां रथः
प्रथमागामी भवति ॥
'रथः' रंहतेर्गतिकर्मणः । स्थिरतेर्वा स्याद्
विपरीतस्य । रममाणःअस्मिन् तिष्ठति इतिवा ।
रपतेर्वा । रसतेर्वा ।
तस्य- एषा भवति-॥१(११) ॥
अर्थ:- यजक के संयोग से राजा स्तुति को प्राप्त हो या
होता है। राजा के संयोग से युद्ध के उपकरण = साधन [स्तुति,
को प्राप्त हों या होते हैं] ।
उन युद्ध के उपकरणों में 'रथ' प्रथम (मुख्य ) है । क्यो
िक और युद्ध के उपकरण उसी में रखे जाते हैं ।

४. दैवत काण्ड (उत्तराद्ध - अध्याय १०-१२): द्युस्थान देव, आत्म-विद्या, छन्दो-रहस्य व उपसंहार

हिन्दी निरुक्त ( २२५ ) ६ अ० २ पा० १ खं०
'रथ' कैसे ? गति अर्थ में 'रंह्' (भ्वा०प०) धातु से है।
क्यों कि-चलने के अर्थ ही उसकी उत्पत्ति है। अथवा उलटे
हुए 'स्थिर' (नामधा०) से हो।
अर्थात् 'स्थिर' होता हुआ 'रथ' कहा गया होसकता है।
क्यों कि उसमें बैठा हुआ योद्धा जैसा सुप्रतिष्ठित होता है,
वैसा अन्य अश्व आदि में नहीं। अथवा 'रप' (स्वा०प०)
धातु से है। क्यों कि-उससे शत्रु को रुपण या मोह होता
है। अथवा 'रस' (स्वा० प०) धातु से है। क्यों कि- उसमें
बैठे हुये को रस का आस्वादन जैसा होता है।
“तस्य” उस रथ की यह स्तुति है ॥१(११)॥
व्याख्या
देवता से अन्य वस्तुओं की स्तुति का हेतु
मन्त्रों में देवताओं की ही स्तुति होती है और होना
चाहिये, क्यों कि वेही स्तुति करने वाले की कामनाओं को
अपने माहाभाग्य से पूर्ण कर सकते हैं, किन्तु अन्य असमर्थ
राजा और रथ आदि नहीं, अतः उन की स्तुति मन्त्रों में
क्यों आती है।
इसी प्रश्न का उत्तर भाष्यकार "यज्ञसंयोगात्”
इस न्याय से देते हैं। क्या भाष्यकार यह उत्तर अपनी ओर
से देते हैं ? नहीं, यह 'अमन्दान्०” इस मन्त्रोक्त भाव-
यव्य राजा की स्तुति के हेतु का ही अनुवादमात्र करते हैं,
अर्थात्- जिससे कि- उसने कक्षीवान् के सहस्र (हजार)
यज्ञों का साधन किया था, इसी से उसकी उक्त ऋषि के
द्वारा मन्त्र में स्तुति है। यही यज्ञ के संयोग से स्तुति कह-

हिन्दी निरुक्त ( २२६ ) ९ अ० २ पा० १ खं०
लाती है । भाव यह कि— यह मुख्यतया राजा की स्तुति
नहीं, यज्ञ की ही है, उसी के संबन्ध से वह स्तुत होता है।
तथा इसके संस्रम्ध से युद्ध के साधन स्तुत होते हैं । ऐसा
कोई आचार्य मानते हैं ।
दूसरे आचार्य इसे “स्तुतिसंक्रमणन्याय” कहते हैं ।
उनका यह अभिप्राय है कि–उक्त मन्त्र में भावयव्य की स्तुति
का कारण वही है, जो युद्ध के उपकरणों की स्तुति का है,
किन्तु कोई पृथक् कारण नहीं है । इसी प्रयोजन को लक्ष्य
करके भाष्यकार–“यज्ञसंयोगात् राजा स्तुतिंलभते ।
राजसंयोगात् युद्धोपकरणानि” ऐसा कहते हैं ।
अर्थात्–यहां मन्त्र में राजस्तुति के प्रश्नका जो उत्तर
भाष्यकार ने दिया है, उसका अभिप्राय भगवद् दुर्गाचार्य कहते
हैं कि–पुराने टीकाकारों ने दो प्रकार से समझा है, उसमें
पहिले मतका अभिप्राय है कि– राजा की स्तुति का हेतु
वही है, जो मन्त्र में कहा हुआ है । अर्थात्–भावयव्य राजा
ने कक्षीवान् ऋषिके सहस्र यज्ञों में सहायता पहुंचाई, उसी
( यज्ञसंयोग ) से उसकी स्तुति मन्त्र में हुई और राजा के
संयोग से युद्धोपकरण रथ आदिकों की स्तुति मन्त्रों में आती
है । यहां इस प्रथम मत में, क्योंकि– यज्ञ कर्म प्रशंसायुक्त
है, इस से उस प्रशंसायुक्त कर्म के करने से राजा भी प्रशंसा-
युक्त होता है, इस लिये राजा भी मन्त्रों में स्तुति के योग्य
हो जाता है । अर्थात्–राजा की प्रशंसा यज्ञ की प्रशंसा के
अधीन है । एवम् युद्धोपकरण रथ आदिकों की जो मन्त्रों में
प्रशंसा आती है, उसका उत्तर भी इसी प्रकार से दिया जाता

हिन्दी निरुक्त ( २२७ ) ६ अ० २पा० १ खं०

है, कि राजा लोकमें प्रशंसा-युक्त होता है, उसके सम्बन्ध से
युद्ध के उपकरण रथ आदि भी प्रशंसा युक्त होते हैं। यहां
राजा की प्रशंसा के अधीन युद्धोपकरण रथ आदिकों की
प्रशंसा है, किन्तु स्वतः उनमें प्रशंसा की योग्यता नहीं है ।
दूसरे आचार्योंने इन पूर्वाचार्यों के हेतु को यों उचित
नहीं समझा कि वे मन्त्रों में राजा की स्तुतिका हेतु यज्ञसंयोग
बताते हैं, और रथ आदिकों की स्तुति का हेत उनमें राज-
संयोग को बताते हैं, सुतराम् दोनों स्थानोंमें अलग २ प्रशंसा
का हेतु आता है, किन्तु एक नही । तथा एक वस्तु रथ आदि
की प्रशंसा के कारण को पूछते हैं, तो उन में राजसंयोग को
हेतु बताते हैं, किन्तु राजा में भी क्या प्रशंसा का हेतु है ?
यह प्रश्न अवशिष्ट रहजाता है। जब उसका उत्तर उसमें यज्ञ
संयोग से देते हैं, तब वही प्रश्न उस यज्ञ में उपस्थित हो
जाता है, अतः उनके मतमें यह प्रश्न पूरा ही नहीं होता
तथा सब स्थानों में पृथक् २ ही हेतु रहता है । इस दोषकी
निवृत्तिके लिये दूसरे पण्डितों ने उस हेतु को खोज निकाला
जो सब स्थानों में समान रूप से मिलता है तथा वह सर्वो-
नुगत सर्वत्र व्यापक आत्मवस्तु ही है। जहां वह नहीं ऐसी
कोई वस्तु नहीं। अतः उस आत्मवस्तु के लक्ष्य से हम जिस
किसी वस्तु की भी स्तुति कर सकते हैं, और वह स्तुति
आत्म वस्तु से स्तुति संक्रमन्याय से सब बस्तुओं में धारा
प्रवाह रूपसे अनुवर्त्तमान होती है। यही वैदिक सनातन
सिद्धान्त है। यहां पर स्तुति संक्रमन्याय से राजा तथा रथ
आदिमें आत्मवस्तु से स्तुति किस प्रकार आती है, इस की
व्याख्या आगे पढ़िये ।

इस न्यायके अनुसार वे इस प्रकरण को इस प्रकार वर्णन
करते हैं कि-अश्वमेध यज्ञ में सब युद्ध के साधनों के
सहित रथ में बैठे हुए कवचको धारण किये हुये राजा की
“जीमूतस्येव भवति प्रतीकम्” इस मन्त्र से स्तुति की
जाती है। वह क्यों ? इस भूमिका को लेकर भाष्यकार कहते हैं
“यज्ञसंयोगाद् राजा स्तुतिं लभते” अर्थात्-
पहिले राजा यज्ञ के संयोग से स्तुति को प्राप्त होता है, और
उसके संबन्ध से युद्धोपकरण। ‘युद्धोपकरण’ क्यों हैं ? वे
युद्ध के लिये उपकृत = उपयुक्त होते हैं, या युद्ध में उपकार
करते हैं।
सो यह आचार्यने व्यापी = व्यापक “स्तुतिसंक्रमन्याय”
दिखाया है। अर्थात्- युद्ध के उपकरण राजा के संयोग से
स्तुति को प्राप्त होते हैं-उसके वे अङ्ग हैं, इस लिये उस के
संबन्ध से उनकी स्तुति होती है, राजा भी यज्ञ के संबन्ध
से, यज्ञ भी देवता के संबन्ध से और देवता भी आत्मा के
संबन्ध से स्तुति को प्राप्त होता है। सो यह आत्मा ही अङ्ग
और प्रत्यङ्ग (अङ्ग के अङ्ग) के रूप में स्थित हुआ सब अव-
स्थाओं में स्थित हुआ स्तुति किया जाता है। इस प्रकार यह
सब स्तुति आत्मा की ही है। सो कहा भी है-
“स्थाने स्थाने स्तुतिः सर्वा स्थानाधिपतिभागिनी।
आत्मप्रतिष्ठा बोद्धव्या तथोपकरणस्तुतिः ॥”
अर्थात्-स्थान स्थान में जो सब स्तुति है, वह स्थान के
अधिपति = स्वामी की है। वैसे ही उपकरणों (रथादिकों)
की स्तुति को आत्मा में समझना चाहिये प्रयोजन यह कि

हिन्दी निरुक्त ( २२९ ) ६ अ० २ पा० २ खं०
ऊपर दिखाई हुई प्रणाली के अनुसार यथासंभव मार्ग से
सब स्तुति क्रम २ से आत्मा में पहुंच जाती है । वह कहीं
बीच में नहीं रुकतीं । यही स्तुति संक्रमणन्याय का अभिप्राय
है, इस का उपयोग सब जगह करना चाहिये ॥ १ ( ११ ) ॥
( खं० २ )
निरु०-‘वनस्पते वीड्वङ्गो हिभूया अस्मत्सखा
प्रतरणः सुवीरः । गोभिः सन्नद्धो असिवीलयस्वा
स्थाता ते जयतुजेत्वानि ॥” (ऋ० सं० १,७.३५,१)॥
वनस्पते दृढाङ्गो हि भव अस्मत्सखा प्रतरणः
सुवीरः कल्याणवीरः गोभिः सन्नद्धो असि वीलयस्व
इति संस्तभस्व आस्थाता ते जयतु जेतव्यानि
‘दुन्दुभिः' इति शब्दानुकरणत् । द्रुमो भिन्नः
इति वा । दुन्दुभ्यतेर्वा स्यात् शब्दकर्मणः ।
तस्य- एषा भवति– ॥२ (१२) ॥
अर्थः- “वनस्पते” यह ऋचा गर्ग आर्षिकी है। ‘वन-
स्पते!’ हे वानस्पत्य ! बनस्पति के पुत्र रथ ! ‘ वीड्वङ्गः ’
( दृढाङ्गः ) दृढ अङ्गोंवाला ‘भूयाः’ ( भव ) हो। और फिर
‘अस्मत्सखा’ हमारा सखा ‘प्रतरणः’ संग्रामों के पार लेजाने
वाला ‘सुवीरः’ (कल्याणवीरः) नहीं डरने वाला तथा नहीं
खण्डित होने वाला आरोही (चढने वाले ) वाला हो। [और
तेरा बचाव हमने कर दिया है, क्योंकि-] तू ‘गोभिः’ गोओं
के चर्म से अथवा चर्बी से ‘सन्नद्धः सब ओर से मढाहुआ है,

हिन्दी निरुक्त । ( २३० ) ६ अ० २ पा० ३ खं०
इस कारण 'वीलयस्व' (संस्तम्भस्व) अपने को थाम । 'ते' तेरा
'आस्थाता' चढने वाला ' जेत्वानि ' ( जेतव्यानि ) जेय =
जीतने योग्य शत्रुओं 'जयतु' जीते ॥
'दुन्दुभिः' (८) यह शब्द के अनुकरण पर है जैसा ही
वह ताडित हुआ 'दुम् दुम् भि- दुम् दुम् भि'शब्द करता है,
वही उसका नाम है । अथवा 'द्रुमो भिन्नः' (वृक्ष कटा) इन
दो पदों से है- 'द्रुम' से पहिला भाग 'दुन्दु' और ' भिन्न '
से दूसरा भाग ' भि ', इस प्रकार 'दुन्दुभि' पद है । अर्थात्
द्रुम (वृक्ष) के एक भाग से छांटा हुआ और चर्म से मंढाहुआ
( बाजा ) है । अथवा शब्द अर्थ में ' दुन्दुभ ' ( दि० प० )
धातु से है ।
उसकी यह ऋचा है—॥ २ [१२] ॥
( ख० ३ )
निरु०– “उपश्वासय पृथिवी मुतद्यां पुरुत्रा ते
मनुतां विष्ठितं जगत् ।
सदुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवै ईराद्दवीयो अपसेध
शत्रून् ॥” [ऋ०सं०४,७,३५, ४] ॥
उपश्वासय पृथिवीं च दिवं च बहुधाते घोषं
मन्यतां विष्ठितं स्थावरं जङ्गमं च यत् स दुन्दुभे
सहजोषकः इन्द्रेण च देवैश्च दूराद् दूरतरम् अप-
सेध शत्रून् ॥
“इषुधिः” इषूणांनिधानम् ।
तस्य-एषा भवति-॥३ [१३] ॥

हिन्दी निरुक्त ( २३१ ) ६ अ० २ पा० ४ खं०
अर्थः- “उपश्वासय” यहां से सब ये युद्धोपकरण की
ऋचायें हैं । भारद्वाज ऋषि है ।
'दुन्दुभे,' हे दुन्दुभे ! (त्वम् तु 'पृथिवीम्' सारी पृथ्वी
को 'उत' और 'द्याम्' द्युलोक को उपश्वासय अपने शब्द से
पूरण करदे । जिससे कि- 'विष्ठितम्' स्थावर और 'जगत्,
जङ्गम ·ते' तेरे 'पुरुत्रा' बहुधा (घोषम्) शब्दको 'मनुताम् [मन्य-
ताम्] माने । 'सः' सो तू 'इन्द्रेण' इन्द्र के साथ 'देवैः' ( च )
और देवताओं के साथ 'सजूः' (सहजोषणाः) प्रीति युक्त होता
हुआ 'दूरात् दवीयः' ( दूराद् दूरतरम् ) दूर से भी बहुत दूर
'शत्रून्' शत्रुओं को 'अपसेध' हटादे, जिससे कि वे फिर न
आवे । (यह हम तुम से चाहते हैं) ॥
'इषुधि' (ह) क्या ? इषुओं का निधि- बाणों का कोश
= रखने का घर ।
“तस्य” उस बाणोंके घरकी स्तुतिकी यह ऋचाहै ॥१(१३)
( खं०४ )
निरु० - “बह्वीनां पिता बहुरस्य पुत्र श्चिश्चा
कृणोति समनावगत्य । इषुधिः सङ्काः पृतनाश्च
सर्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः ॥” (ऋ० सं०
५, १, १९, ५) ।'
बहूनां पिता, बहुः अस्य पुत्रः इति इषूनभि-
प्रेत्य प्रस्मयतेइव अपाव्रियमाणः। शब्दानुकरणवा।
'सङ्काः' सचेतः । सम्पूर्वाद् वा किरतेः ।
'• पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः ”- इति व्या-
ख्यातम् ॥

हिन्दी निरुक्त ( २३२ ) ६ अ ०२ पा० ४ खं०
'हस्तघ्नः' हस्ते हन्यतेः ।
तस्य एषा भवति- ॥४ [१४] ॥
अर्थः- “बह्वीनामू०” जो यह तूण 'बह्वीनां (बहूनाम्)
पिता बहुत बाणों का पिता = पालन करने वाला है, और
'अस्य' इसको (जिसका) 'बहुः' बहुत बाण समूह 'पुत्रः'
पुत्र = बहुत का त्राण करने वाला रक्षा करने वाला [पुत्र] है
(सः) सो यह 'चिश्चा कृणोति' (प्रस्मयते इव) (अपाव्रियमाणः)
खोला जाता हुआ मुसकिराता जैसा है। क्यों कि-चित्र विचित्र
रंग के बाणों के मुठिये होते हैं, जो कि-तूण के मुख की ओर
होते हैं और खोलते ही चमकते हैं, उन्हीं से तूण की ऐसी
शोभा वर्णन की गई है । इस पक्ष में 'चिश्चाति' धातु नया
कल्पित करना पड़ता है । क्यों कि- “विकारपक्षेष्वेतद-
र्थान्यधातूपादानम्” अर्थात्- 'शब्दों के अनित्यत्व पक्ष
में शब्द के अर्थ में और २ धातुओं का ग्रहण भी होता है'
यह आचार्यों की परिभाषा है । अथवा यह शब्द का अनु-
करण लेकर क्रिया पद है । 'चिश्चाकृणोति' 'चिश्चित्' शब्द
करता है' । कब ? 'समना' संग्राम में 'अवगत्य' जाकर (सः)
सो ऐसा 'इषुधिः' तूण 'पृष्ठे' पीठ में 'निनद्धः' बंधा हुआ
'प्रसूतः' धनुष् के धारण करने वाले से फेंका गया 'सर्वाः' सब
'सङ्गाः' संग्रामों को 'पृतनाश्च' और सब शत्रुओं की सेना-
ओं को 'जयति' जीत लेता है ॥
'हस्तघ्न' (१०) = कलापीपट्टक = हाथ की रक्षा के अर्थ
कलाई में बांधने का पट्टा = गोधा होता है। क्यों ? 'हस्ते

हिन्दी निरुक्त ( २३३ ) ६ अ० १ पा० १ खं०
हन्यते हाथ में बंधा हुआ धनुष की ज्या = तात से हत
होता है या ताडित होता है ।
‘तस्य” उसकी यह ऋचा है-॥४ (१४) ॥
( खं० ५ )
निरु०-“अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं
परिबाधमानः । हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान्
पुमान्पुमांसं परिपातु विश्वतः ॥” (ऋ०सं०५,१,२१,४)
अहिः इव परिवेष्टयति बाहुं ज्याया वधात्
परित्रायमाणः हस्तघ्नः सर्वाणि प्रज्ञानानि
प्रजानन् ।
‘पुमान्’ पुरुमना भवति । पुंसतेर्वा ।
‘अभीशवः’ व्याख्याताः ।
तेषाम्—एषा भवति- ॥५(१५)॥
अर्थः-“अहिरिव०” ( योऽयम् ) जो यह ‘ हस्तघ्नः ’
कलापोपट्ट ‘ज्यायाः’ प्रत्यञ्चा = धनुष् की तांत के ‘हेतिम्’
(वधात्) वध से ‘परिबाधमानः’ (बाहुं सर्वतः परित्रायमाणः)
भुजा को सब ओर से बचाता हुआ ‘अहिः’ (सर्पः) ‘इव’ सर्प
के समान ‘भोगैः’ कुटिल भावों से ‘बाहुम्’ भुजा को ‘पर्येति’
( परिवेष्टयति ) लपेट लेता है-सर्प के पकड़ने वाले पुरुष के
बाहु को जैसे वह लपेट लेता है, उसी प्रकार धनुष्मान् पुरुष
के हाथ में लिपटा हुआ = बंधा हुआ जो हस्तघ्न उस के
बाहुको धनुष की प्रत्यञ्चा के आघात से रक्षा करता है, वह

हस्तघ्न 'विश्वा' (सर्वाणि) सब 'वयुनानि' ( प्रज्ञानानि )
विज्ञानों को 'विद्वान्' (जानानः) जानते हुए 'पुमान्' पुरुष
के समान 'पुमांसम्' ( एतं धनुर्धरम् ) इस धनुष् के धारण
करने वाले पुरुष को 'विश्वतः' सब ओर से 'परिपातु' रक्षा
करे [ यह हम चाहते हैं ] ।
'पुमान्' क्या ? 'पुरुमनाः' वह स्त्री की अपेक्षा बड़े मन
वाला होता है । अथवा पुरुषार्थ अर्थ में 'पुंस' (भ्वा०प० )
धातु से है । क्योंकि-वह महाकार्यों के लिये उद्यम करता है ।
'अभीशवः' (११) ( अङ्गुलयः ) अङ्गुलियों का वाचक
'अभीशु' शब्द व्याख्यान किया जाचुका [अ०३पा०२खं०३में]
'तेषाम्०' उन अभीशुवों की = अङ्गुलियों की यह
ऋचा है-॥५(१५)॥
( खं० ६ )
निरु० “रथे तिष्ठन्नयति वाजिनः पुरो यत्र यत्र
कामयते सुषारथिः। अभीशूनां महिमानं पनायत
मनः पश्चादनुयच्छन्ति रश्मयः ॥” [ ऋ० सं० ५,
१, २०, १ ) ॥
रथे तिष्ठन् नयति वाजिनः पुरस्तात् सतो यत्र
यत्र कामयते सुषारथिः = कल्याणसारथिः ।
अभीशूनां महिमानं पूजयामि । मनः पश्चात्
सन्तः अनुयच्छन्ति रश्मयः ॥
'धनु;' धन्वतेर्गतिकर्मणः । वधकर्मणो वा ।
धन्वन्ति अस्माद् इषवः ।