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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ४ अ० ३ पा० १ खं०
चतुर्थेऽध्याये
तृतीयः पादः
( १ खं० )
[निरु०-] 'सुविते' (२८) । सुइते। सूते । सुगते।
प्रजायामिति वा । “सुविते माधा ।” [ य०वा०सं०
५, ५ ] इत्यपि निगमो भवति ।
'दयतिः' (२९) अनेककर्मा । “नवेन पूर्वं दय-
मानाः स्याम” [य०वा० २८, १६] इति उपदयाकर्मा
१“य एक इद् विदयते वसु” [ऋ०सं० १, ६, ६, २]
इति दानकर्मा वा विभागकर्मा वा । दुर्वर्तु र्भीमो
दयते वनानि” [ऋ०सं० १, ६, ८, ५] इति दहति
कर्मा । 'दुर्वर्तुः' दुर्वारः । “विदद्वसुर्दयमानो
विशत्रून्” [ऋ०सं०३,२,१५,१] इति हिंसाकर्मा ।
“ इमे सुता इन्दवः प्रातरित्वना सजोषसा
पिबतमश्विना तान् । अहं हि वामूतये वन्दनाय
मां वायसो दोषा दयमानो अबूबुधत् ” ॥
'दयमान' इति ।
'नूचित्' (३०) इति निपातः पुगणनवयोः ।
१ “यएक इद् विदयते वसु” इति राहुगणस्य गोतमस्या-
र्षम् । ऐन्द्री । उष्णिक् ।

हिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ४ अ० ३ पा० १ खं०
‘नूच’ (३१) इति च ।
“अद्याचि॒न्नूचि॒त्सद॑पोनदी॒नाम्” [ ऋ० सं० ४,
७, २, ३, ]
(भा०) अद्यच पुराच तदेव कर्म नदीनाम् ।
“नूच॒ पुरा॑च॒ सद॑नं रयी॒णाम्” [ऋ०सं०१,७,४,२]
भा०-) अद्यच पुराच सदनं रयीणाम् । ‘रयिः’-
इति धननाम । रातेर्दानकर्मणः ॥ १ (१७) ॥
अनुवादः ।
निरुक्तार्थः-‘सुविते’ (२८) इस के ‘सुइते’ ( सुन्दर गए
हुए में ) सूते (जनता है) इस प्रकार दो समानरूप शब्द हैं ।
जिससे सुन्दर गमन और प्रजा या जनने अर्थ में होता है ।
“सुविते माधाः” अर्थात् हे तानूनप्त्र! तू ‘मा’ मुझे ‘सुविते’
नाम ‘सुगते’ सुगत स्थान में ( जहां गमन सुगमन हो, ) ‘धाः’
धारण कर, अथवा ‘सुविते’ नाम ‘सूते’ प्रजा या सन्तान में
धारण कर जिससे कि-मैं बहु-सन्तान होऊं यह भी निगम
होता है । [ निगम और भी बहुत हैं, यह ‘भी’ से सूचित
होता है । ]
‘दयतिः’ (२६) शब्द अनेकार्थ है । उदाहरण—
“नवेन पूर्वं दयमानाः स्याम” [य०वा०२८,१६]अर्थात्
“ ‘नवेन’ नए धान्य से ‘पूर्वम्’ पुराणे धान्य की
‘दयमानाः’ रक्षा करते हुए ‘स्याम’ हम होवें ।”

हिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ४ अ० ३ पा० १ खंड

यह उपद्या या रक्षा अर्थ में है।
“यएक इद् विदयते वसु” [ ऋ० सं० १, ६, ६, २ ]
अर्थात् “'यः' जो 'एकः-इत्' एक ही (इन्द्र) 'वि'
नाना प्रकार से 'वसु' धन को 'दयते' देता है या
बांटता है।” इस प्रकार अथवा दान अर्थ में है, अथवा
विभाग (बांटने) अर्थ में है।
“दुर्वर्तुर्भीमो दयते वनानि” [ऋ० सं० ४, ६,
८, ५]। अर्थात् “'दुर्वर्तुः' नहीं हटने वाला 'भीमः'
सब प्राणियों को भय देने वाला अग्नि 'वनानि'
वनों को 'दयते' जलाता है” इस मन्त्र में दाह अर्थ
में है।
“विदद्वसु र्दयमानो विशत्रून्” [ऋ० सं० ३, २,
१५, २] अर्थात् “'विदद्वसुः' जिसे सब धन प्राप्त
हैं, वह इन्द्र 'वि' अनेक प्रकार 'शत्रून्' शत्रुओं
को 'दयमानः' मारता हुआ” इस मन्त्र में हिंसा अर्थ
में है।
“ इमे सुता इन्दवः दयमानो अबूबुधत् ”
अर्थात् हे अश्विना ! अश्विनौ ! 'इमे' ये 'सुताः' निचोड़े हुए
'इन्दवः' सोम हैं तुम दोनों 'सजोषसा' प्रीतियुक्त 'मातरि-
त्वना' प्रातःकाल ही गमन करने वाले इन्द्र के साथ 'तान्'
उन सोमरसों को 'पिबतम्' पीओ। 'हि' क्योंकि 'अहम्' मैं
'क्रतवे' वाञ्छित सिद्धि के लिये 'वाम्' तुम दोनोंकी 'अन्दनाय'

वन्दना करता हूं, या वन्दना के लिये उद्यत हूं । 'दयमानः'
आकाश देश से नीचे की ओर उड़ते हुए 'वायसः' काक ने
'दोषा' रात्रिके समय 'माम्' मुझे 'अबूबुधत्' नींद से उठाया ।
इस मन्त्र में 'दय' धातु का गति अर्थ है । [ इस मन्त्र में काक
के स्पर्श की अशुभ सूचकता और उस की शान्ति के लिये
अश्विनीकुमारों की स्तुति है। यह भी एक शकुन शास्त्र का
मूल है ॥ 'नूचित्' (३०) यह निपात पुराण और नवीन अर्थ
में है । और ' नूच ' ( ३१ ) यह भी इन्ही दोनों अर्थों में है
[ उदाहरण ] “अद्याचित्”०० [ऋ० सं० ४, ७, २, ३] अर्थात्
'अद्याचित्' अब 'नूचित्' पहिले 'तत्' वही 'नदीनाम' नदियों
का 'अपः' कर्म है ।
“नूच पुराच सदनं रयीणाम् ।” [ऋ० सं० १,
७, ४, २] 'नूच' अब 'पराच' और पहिले 'रयीणाम्' धनों का
'सदनम्' स्थान है । 'रयि' यह धन का नाम है । दानार्थक
'रा' (अदा० प०) धातु से है । १ ( १७ ) ॥
( २ खं० )
१ (३३) (३२)
[निरु०] “विद्याम तस्यतेवयमकूपारस्य दावने ।”
[ऋ० सं० ४, २, १०, २]
(भा०) विद्याम तस्य ते वयम्-अकुपरणस्य
दानस्य । आदित्योऽपि 'अकूपारः' उच्यते । अकू-
पारो भवति दूरपारः । समुद्रोऽपि ' अकूपारः '
१ “विद्याम तस्य” इति अत्रे भौमस्य द्वयमार्षम् ।
अच्छावाकस्य तार्तीयसवनिके आवापे नियुक्ता ।
६

हिन्दी निरुक्त (६६) ४ अ० ३ पा० २ खं०
उच्यते। अकूपारो भवति महापारः। कच्छपोऽपि
'अकूपारः' उच्यते। 'अकूपारः' 'न कूपम्-ऋच्छति'
इति। 'कच्छपः' कच्छंपाति। कच्छेन पाति-इतिवा।
'कच्छः' खच्छः, खच्छदः। अयमपि-इतरो नदी-
कच्छ एतस्मादेव। कम्-उदकं तेन छाद्यते।
(३४)
“शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे” [ऋ० सं०
३, ८, १५, ३]
(भा०) निश्यति शृङ्गे रक्षसो विनिक्षणाय।
'रक्षः' रक्षितव्यम्-अस्माद् रहसि। क्षणोति-इतिवा
रात्रौ नक्षते-इतिवा।
(३५)
“अग्निः सुतुकः सुतुकेभिरश्वैः” [ऋ०७,५,३१,७]
(भा०) सुतुकनः, सुतुकनैः-इतिवा। सुप्रजाः, --
सुप्रजोभिः-इतिवा।
(३६)
“सुप्रायणा अस्मिन् यज्ञे विश्रयन्ताम् ।”
[ य० का सं० वा सं० २८, ५]।
(भा०) सुप्रगमनाः २ (१८) ॥
अनुवादः।
'दावने' (३२) (दानस्य) और 'अकूपारस्य' (३३) (अकुपरणस्य) इन दो
अनवगत पदों का निम्न—

हिन्दी निरुक्त ( ६७ ) ४ अ० ३ पा० २ खं०
“विद्याम”०० [ ऋ० सं० ४, २, १०, २ ] अर्थात् हम
'तस्य' उस 'ते' तेरे 'अकूपारस्य' अकुपरण ( जिस की पूर्त्ति
निन्दित नहीं है ) 'दावने' दान की 'विद्याम' जानते हैं ।
निरुक्तार्थ-हम उस तेरे उत्तम दान को जानते हैं । आदित्य
भी 'अकूपार' कहा जाता है । 'अकूपार' क्यों? दूर पारं ( जिस
का पार या किनारा दूर है )। है । समुद्र भी 'अकूपार' कहा
जाता है। क्यों कि अकूपार नाम महापार या विस्तृत पार
वाला होता है । कछुआ भी 'अकूपार' कहा जाता है। क्यों
कि वह कूप को (अल्प जल के कारण) नहीं जाता है (किन्तु
बहुत फैले हुए जल को ही जाता है ।)
'कच्छप' क्यों ? 'कच्छ' नाम मुखसम्पुट को 'प' नाम
रक्षा करता है । [ क्योंकि वह किसी वस्तु को भी देख कर
अपने शरीर में ही मुख को छिपा लेता है । 'कच्छ' नाम मुख-
संपुट अर्थ में प्रसिद्ध है । ] अथवा कच्छ नाम कटाह ( कड़ा
ही ) से और अङ्गों को 'प' नाम रक्षा करता है । [ क्यों कि
वह कुछ भी देख कर अपने सब अङ्गों को कटाह ( कड़ाही
जैसे अङ्ग ) में प्रवेश करके कूर्म के रूप से अवस्थित हो जाता
है। अथवा 'कच्छ' नाम मुखसम्पुट से 'प' नाम पीता है । ]
'कच्छ' क्यों ? जिससे कि-'खच्छ', है । 'खच्छ' क्या !
खच्छद् खच्छद् अर्थात् ख नाम आकाश को छादन करता है ।
[ क्योंकि वह मध्यमें स्थिर होता है । यह भी दूसरा नदी-
कच्छ इसी निर्वचन से है । 'क' जल उस से छादन होता है ।
'शिशीते' (३४) का निगम-
“शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे” [ऋ०सं०३, ८, १५, ३].
अर्थात्-अग्नि देव 'रक्षसे' राक्षस के 'विनिक्षे' विनाश के अर्थ

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-वार लिप्यन्तरण दिया गया है:

हिन्दी निरुक्त ( ६८ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं०
'शृङ्गे' सींगों को ' शिशीते ' पैनाता है । [ जिस प्रकार वृष
(बैल) तटोंको फोड़ता हुआ अपने सींगों को पैनाता (तीक्ष्ण
करता) है, उसी प्रकार अग्नि काष्ठों को जलाता हुआ अपनीं
ज्वालाओं को तीक्ष्ण करता है । ]
निरुक्तार्थ—राक्षस के विनाश के लिये सींगों को तीक्ष्ण
करता है । 'रक्षस्' क्यों ? इस से एकान्त देश में रक्षा करना
योग्य होता है । अथवा रात्रिकाल में वह 'नक्षते' विचरता है ।
'सुतुके' (३५) अनवगत शब्द का निगम—
“अग्निः सुतुकः सुतुकेभिरश्वैः” [ऋ०सं०७,५३१, ७]
अर्थात्—'अग्निः' हे अग्ने ! (प्रथमान्त पद सम्बोधन में बदला
जाता है । क्योंकि-मन्त्रमें 'आवक्ष' मध्यम पुरुष की क्रिया है ।)
तू 'सुतुकेभिः' (सुतुकनैः) सुन्दर गमनकरने वाले 'अश्वैः' घोड़ों
से 'सुतुकः' (सुतुकनः) सुन्दर गमन करने वाला है ।
'सुप्रायणा.' (३६) इस अनवगत पद का निगम—
“सुप्रायणा अस्मिन् यज्ञे विश्रयन्ताम्” [ य० का०
सं० वा० सं० २८, ५ ] । अर्थात् 'अस्मिन्' इस 'यज्ञे' यज्ञ
में ('दुरः' ) द्वार 'सुप्रायणाः' ' सुप्रगमनाः ' अच्छे प्रकार से
गमन करने योग्य ' विश्रयन्ताम् ' खुलें ॥ २ (१८) ॥
( ३ खं० )
( ३७ )
[निरु०] “देवा॑नो॒ यथा॑ सद॒मिद्वृधे अस॒न्नप्रायुवो
रक्षितारो॑ दि॒वेदि॑वे” ॥ [ ऋ०सं० १, ६, १५, १ ]
१—“देवानो यथा” इति गौतमस्य इयमर्षम् । अग्निष्टोमे
महाव्रते तृतीयसवने वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यते ।

(भा०) देवा नो यथा सदावर्द्धनायस्युः, 'अप्रा-
युषः'(३७) अप्रमाद्यन्तः रक्षितारश्च अहनिअहनि ॥
‘व्यवनः’ ( ३८ ) ऋषिर्भवति । च्याचयिता
स्तोमानाम् । 'च्यवानम्'- इति । अप्यस्य निगमा
भवन्ति ।
“युवं च्यवानं सनयं यथा रथं पुन र्युवानं
चरथाय तक्षथुः ॥” [ ऋ० सं० ७, ८, १५, ४ ]
(भा०-) युवां च्यवनं सनयं पुराणं यथा रथं
पुन र्युवानं चरणाय ततक्षथुः । ‘युवा’ प्रयोति
कर्माणि । ‘तक्षतिः’ करोतिकर्मा ॥
'रजः' (३९) रजतेः । ज्योतिः रजः उच्यते ।
उदकं रजः उच्यते । लोकाः रजांसि उच्यन्ते ।
असृगहनी रजसी उच्येते । (“रजांसि चित्रा
विचरन्ति तान्यव” इत्यपि निगमो भवति ) ॥
‘हरः’ ( ४० ) हरतेः । ज्योति र्हरउच्यते ।
( उदकं हर उच्यते । ) लोकाः हरांसि उच्यन्ते ।
( असृगहनी हरसी ) उच्येते । “प्रत्यग्मे हंसा हरः
शृणीहि” [ ] इत्यपि निगमो
भवति । ) ॥
“'जुहुरे' (४१) विचितयन्तः” (ऋ०सं०४,१,११,२) ।

हिन्दी निरुक्त ( ७० ) ४ अ० ३ पा० ३ खं०
(भा०-) जुह्विरे विचेतयमानाः ॥
‘व्यन्तः’ (४२) इति एषः अनेककर्मा । “पदं
देवस्य नमसा व्यन्तः” [ऋ० सं०४,४,३५,४] इति
पश्यतिकर्मा । “वीहि शूर पुरोडाशम्” ( ऋ० सं०-
३, ३, ३, ३ ) इति खादतिकर्मा । “वीतं पातं
पयस उस्रियायाः ।” ( ऋ० सं०२, २, २३, ४ ] ।
( भा०- ) अश्नीतं पिबतं पयसः उस्रियायाः ।
‘उस्रिया’-इति गोनाम । उत्साविणोऽस्यां भोगाः।
( ‘उस्रा’-इति च । )
“त्वामिन्द्र मतिभिः सुते सुनीथासो वस्यवः ।
(४३)
गोभिः क्राणा अनूषत ।” [ ]
( भा०- ) गोभिः कुर्वाणाः अस्तोषत ॥
(४४)
“आतूषिञ्च हरिमींद्रोरुपस्थे वाशीभिस्तक्षता
इमन्मयीभिः ।” [ऋ०सं० ८, ५, १९, ४] (भा०-) आ-
सिञ्च हरिं द्रोणुपस्थे द्रुममयस्य । ‘हरिः’ सोमः,
हरितवर्णः । अयमपि इतरो हरिः एतस्मादेव ।
‘वाशीभिः’ तक्षताश्मन्मयीभिः । ‘वाशीभिः’ (४४)
अश्ममयीभिः इतिवा । वाग्भिः-इतिवा ।
(४५)
“सशर्द्धदर्यो विषुणस्य जन्तोर्माशिश्नदेवा

हिन्दी निरुक्त ( ७१ ) ४ अ० ३ पा० ३खं०
अपिगुर्ऋतंनः” [ऋ० सं० ५, ३, ३, ५] । (भा०)
सः उत्सहतां, यो विषुणस्य जन्तोर्विषमस्य । मा
शिश्नदेवाः अब्रह्मचर्याः । 'शिश्नं' श्रथतेः । “अ-
पिगुर्ऋतंनः ।" (भा०) सत्यंवा यज्ञंवा ॥३[१९]॥
अनुवादः ।
'अपायुवः' (३७) अनवगत पद का निगम—
“देवानो यथा००” [ऋ०सं १, ६, १५, १] अर्थात्
'यथा' जिस प्रकार 'नः' हमारी 'वृधे' वृद्धिके लिये 'सदम्-इत्'
सदा ही 'दिवे-दिवे' (अहनि अहनि) दिन दिन 'देवाः' देवता
'अपायुवः' (३७) (अप्रमाद्यन्तः) प्रमाद नहीं करते हुए 'रक्षि-
तारः (च)' और रक्षा करते हुए 'असन' (स्युः) होवें, [ उसी
प्रकार ये सोम यज्ञ या सगुण काम आवें । ]
'च्यवन' (३८) ऋषि होता है । क्यों कि-स्तोमों (मन्त्रों)
का चुवाने वाला या देखने वाला है ।
'च्यवान' इस नाम से भी इस (भृगु के पुत्र ऋषि) के
निगम हैं—
“युवं च्यवानं००” [ ऋ० सं० ७, ८, १५, ४ ] अर्थात्
हे 'अश्विनौ', अश्विनी कुमारो ! 'युवम्' (युवाम्) तुम
दोनों ने 'यथा' जैसे 'सनयम्' पुराने 'रथम्' रथ को [ कोई
शिल्पी नवीन या चलने योग्य बनादे, ] वैसे ही 'सनयम्'
बूढ़े ( चलने में असमर्थ ) 'च्यवानम्' च्यवन ऋषि को
'चरणाय' चलने के अर्थ पुनः' फिर 'युवानम्' युवा (जवान)
'तक्षथुः' (ततक्षथुः) बना दिया (कर दिया) ॥ 'युवा' क्यों?

वह कर्मों को जैसा चाहिए युवाता (सम्पादन करता है ।)
'तक्ष' (भ्वा० प०) धातु 'करोति' करना अर्थ में है ।
रजस् (३६) 'रञ्ज' रागे (भ्वा० प०) धातु से है । ज्योति
'रजस्' कहा जाता है । जल 'रजस्' कहा जाता है । लोक
'रजस्' कहे जाते हैं । असृक् (रक्त) और अहन् (दिन) रजस्
कहे जाते हैं । (“ रजांसि चित्रा विचरन्ति तान्यव”
यह भी निगम है ।) ॥
'हरस्' (४०) हरति 'हृञ्' हरणे (भ्वा० उ०) धातु से
है । ज्योति 'हरस्' कही जाती है । [ क्योंकि वह हर ली
जाती है, या वह स्नेह (चिकनाई) को हर लेती है । अथवा
तम (अंधेरे) को हर लेती है । ] जल 'हरस्' कहा जाता है
(क्योंकि लोक उसे जीवन के अर्थ ले जाते हैं ।) लोक 'हरस्'
कहलाते हैं । [ क्योंकि जिन के पुण्य क्षीण हो जाते हैं, वे
प्राणी वहां से हर लिये (हटा लिये) जाते हैं ।]
'जुहुरे' (४१) (जुह्वहिरे) इस अनवगत पद का निगम—
“जुहुरे विचितयन्तः” [ऋ० सं० ४, १, ११, २]
अर्थात् 'जुहुरे' (जुह्विरे) अग्नि में होम करते हैं 'विचितयन्तः'
(विचेतयमानाः) वेदान्त दर्शन से कर्त्ता, कर्म, और साधन
रूप कारकों के यथार्थ रूप को जानते हुए ॥
'व्यन्तः' (४२) यह (वी० अदा० प० धा०) अनेकार्थ
है । [निगम-]
“पदं देवस्य नमसा व्यन्तः” [ऋ० सं० ४, ४,
३५, ४] अर्थात् “'देवस्य' अग्निदेव के 'नमसा'
नमस्कार या मन्त्र से 'पदम्' यथार्थ (वास्तविक)

हिन्दी निरुक्त ( ७३ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं०
रूप को 'व्यन्तः' देखते हुए।” यहां दर्शन अर्थ में है।
“वीहि शूर पुरोडाशम्” [ ऋ० सं० ३,३,३,३ ]
अर्थात्—हे शूर ! इन्द्र ! ‘पुरोडाशम्’ पुरोडाश को ‘वीहि’
खा। इस मन्त्र में खाना (भोजन) अर्थ में है ।
“वीतं पातं पयस उस्रियायाः” [ ऋ० सं २, २,
२३, ४] अर्थात्-हे मित्रावरुणो ! ‘उस्रियायाः’ उस्रिया के
दूधसे बनी हुई ‘पयसः’ पयस्या के भाग को ‘वीतम्’ खाओ
‘पातम्’ पीओ । इस मन्त्र में भी भोजन अर्थ है। ‘उस्रिया’
यह गौका नाम है। क्योंकि- इस में भोग उत्पन्न होते हैं ।
(और ‘उस्रा’ यह भी गौका नाम है ।)
'क्राणा.' (४३) (कुर्वाणाः) इस अनवगत पद का निगम—
“त्वामिन्द्र ०० गोभिः क्राणा (४३) अनूषत”
[ ] अर्थात्-‘हे इन्द्र ! ‘मतिभिः’ बुद्धिमान्
पुरुषों से ‘सुते’ सोमके निचुड़ जाने पर ‘सुनीथासः’ सुन्दर
स्तुति करने में समर्थ ‘वसूयवः’ धन की कामना वाले पुरुष
‘गोभिः’ स्तुति की वाणियों से आभिमुख्य (सम्मुखता)
‘क्राणाः’ (कुर्वाणाः) करते हुए ‘अनूषत’ (अस्तोषत)
स्तुति करते हैं ।
'वाशी' (४४) अनवगत पचान्तर में अनेकार्थ है, उसका निगम—
“आतूषिञ्च ०० वाशीभिस्तक्षताश्मन्मयीभिः”
[ ऋ० सं० ८, ५, १६, ४ ] अर्थात्-हे अध्वर्यो ! ‘हरिम्’
इस हरे रंग के सोमको ‘द्रोः’ वृक्ष (काष्ठ) के ‘उपस्थे’ अधिष-
वण-फलक (पात्र) में ‘आ-सिञ्च’ डाल । ( ‘ईम्’ अनर्थक) हे
होतारः ! होताओं ! तुम भी ‘अश्मन्मयीभिः’ (अश्ममयीभिः)
१०

हिन्दी निरुक्त ( ७४ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं०
पत्थर की 'वाशीभिः' ग्रावों (पात्रविशेषों) से 'तक्षत'
संस्कार करो (कूटो) ।
दूसरा अर्थ-हे उन्नेतः ! 'हरिम्' उस हरे सोमरस को इस
कलश से 'द्रोः-उपस्थे' द्रोणकलशके ऊपर 'आसिञ्च' झार ।
और तुम भी हे होताओ ! सींचेजाते हुए इस सोम को 'अश्म-
न्मयीभिः' व्यापन होती हुई 'वाशीभिः' स्तुतियों से 'तक्षत'
संस्कार करो ।
निरुक्तार्थ—द्रुम-मय या काठ के पात्र के ऊपर हरिको
भली प्रकार सींच । 'हरि' नाम सोम हरे रंग का । यह दूसरा
भी 'हरि' (वानरका नाम) इसी व्याख्यान से है। [क्योंकि-
वह भी हरे रंग का होता है। रामायण में कहा है—
“शिरीषकुसुमप्रख्याःकेचित्पिङ्गलकप्रभाः, वानराः”
अर्थात् कोई सिरस के फूलके रंग के और कोई पीले वानर थे ।
“तक्षताश्मन्मयीभिः” इस मन्त्र में 'वाशीभिः' पदके
पत्थर के पात्रों से अथवा बाणियों (स्तुतियों) से इस प्रकार
दो अर्थ होते हैं ।
'विषुणा' (४५) (विषमः) इस अनवगत पद का निगम—
“ स शर्द्धदर्यो विषुणस्य ००” [ऋ० सं० ५, ३,
३,५ ] अर्थात्-हे इन्द्र ! 'सः' वह 'शर्द्धत्' (हमारे यज्ञ में)
आसके, जो 'अर्य्यः' जितेन्द्रियहो, और 'विषुणस्य' (विषमस्य)
यज्ञ के विध्वंस करने वाले 'जन्तोः' मनुष्य के (दबाने में
समर्थ हो ।) किन्तु-'शिश्नदेवाः' ब्रह्मचर्य्य से रहित पुरुष 'नः'
हमारे 'ऋतम्' यज्ञ में या सत्य में 'मा' न 'अपिगुः' आवें ।
निरुक्तार्थ-वह उत्साह करे जो विषुणा (विषम) यज्ञ
के विध्वंस करने वाले का। न शिश्नदेव या अब्रह्मचर्य से

हिन्दी निरुक्त ( ७५ ) ४ अ० ३ पा० ४ खं०
रहित । 'शिश्न' शब्द 'श्नथ' (भ्वा० प०) धातु से है ।
“अपि गुर्ऋतम्” यहां 'ऋत' नाम सत्य का है, अथवा
यज्ञ का है ॥ ३ (१६) ॥
(४ खं०)
१
[निरु०-] “आघातागच्छानुत्तरा युगानि यत्र
(४६)
जामयः कृणवन्नजामि । उपबर्बृहि वृषभाय बाहु-
मन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्।” [ऋ०सं०७,६,७,५]
(भा०) आगमिष्यन्ति तानि उत्तराणि युगानि,
यत्र जामयः करिष्यन्ति अजामिकर्माणि । 'जामि'
(४६) अतिरेकनाम । बालिशस्य वा । असमान-
जातीयस्य वा । उपजनः (मिः) । उपधेहि वृषभाय
बाहुम्, 'अन्यम्-इच्छस्व सुभगे ! पतिं मत्'-इति
व्याख्यातम् ॥ ४ (२०) ॥
अनुवादः ।
'जामि' (४६) यह अनेकार्थ अर्थात् भगिनी, मूर्ख, और पुनरुक्त अर्थ में है ।
इस का निगम नीचे है, जिसमें यमका उसकी बहिन यमी के प्रति वचन है
“आघाता गच्छा ००” [ऋ० सं० ७, ६, ७, ५]
अर्थात्- ('घा' अनर्थक) 'ता' (तानि) वे 'उत्तरा' (उत्तराणि)
१-“आघाता” इति यम ऋषिः । यमी देवता । त्रिष्टप्छन्दः ।

हिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ४ अ० ३ पा० ४ खं०


पिछले 'युगानि' युग 'आ-गच्छान्' (आगमिष्यन्ति) आवेंगे।
[वे भी काल अभी वर्त्तमान नहीं है।] 'यत्र' जिनमें 'जामयः'
भाइयों की बहिनें 'अजामि' बहिनों के अयोग्य मैथुन आदि
कर्मों को 'कृणवन्' (करिष्यन्ति) करेंगी। [क्योंकि-वैसा संकर
कलियुग के अन्त में होता है, और यह कलियुग नहीं है। इस
लिये अभी तक वर्णसंकर धर्म चला नहीं है। किन्तु सब प्रजा
अपने सदाचार ही में हैं। इससे मैं कहता हूं—
“उपबर्बृहि००” अर्थात्-तू 'वृषभाय' अन्य कुलमें उत्पन्न
हुए हुए योग्य वर के लिये 'बाहुम्' भुजाको 'उपबर्बृहि' फैला
[सर्वथा मैथुनधर्म के लिये प्रार्थना करने पर भी मैं तेरा पति
न हूूंगा।] [इसी से कहता हूं-]
“अन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्” अर्थात्-हे सुभगे !
'मत्' मुझसे 'अन्यम्'दूसरे 'पतिम्'पतिको'इच्छस्व' इच्छा कर।
इस प्रकार इस सूक्त में संवाद के अधिकार के कारण
'जामि' शब्द से भगिनी ही कही जाती है।
निरुक्तार्थ-आवेंगे वे उत्तर युग, जिनमें बहिनें अजामि-
कर्म जो उनके योग्य नहीं हैं, करेंगी।
'जामि' (४६) अतिरेक ( पुनरुक्त ) का नाम है। [इस
अर्थ में निगम खोजना होगा।] अथवा बालिश या मूर्खका
नाम है। अथवा असमानजातीय या भिन्न जातिके मनुष्य का
नाम है, 'जामि' इस शब्द में 'मि' यह प्रत्यय है। [जो ही
अर्थ 'जा' से होता है, वही 'जामि' से।] भुजा को वीर्य्य
देने वाले के लिये धारण कर। “अन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्”
यह अपने आप ही व्याख्या किया हुआ [स्पष्ट] है ॥ ४(२०) ॥

हिन्दी निरुक्त r ( ७७ ) ४ अ० ३ पा० ५ ख०
( ५ खं० )
१ (४७)
[निरु०] “द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे
माता पृथिवी महीयम् । उत्तानयो श्चम्वो ३ र्योनि-
रन्तरत्रापितादुहितुर्गर्भमाधात् ॥” [ ऋ० सं०
२, ३, २०, ३ ]
(४७)
(भा०) “द्यौर्मे पिता” माता ( पाता ) वा
पालयिता वा । जनयिता । “नाभिरत्र बन्धुर्मे
माता पृथिवी” महती “इयम्” । ‘बन्धुः’ सम्बन्ध-
नात् । ‘नाभिः’ सन्नहनात् । “नाभ्या सन्नद्धा
गर्भा जायन्ते” इत्याहुः । एतस्मादेव ज्ज्ञातीन्
‘सनाभयः’ इत्याचक्षते । ‘ सम्बन्धवः ’ इतिच ।
‘ज्ज्ञातिः’ सञ्जानात् । “उत्तानयोश्चम्वो३र्योनि-
रन्तः ।” ‘उत्तानः’ उत्तानः । ऊर्ध्वतानो वा ।
तत्र पिता दुहितुर्गर्भ दधातिपर्जन्यः पृथिव्याः ।
( शंयुः सुखंयुः । )
(४८)
“अथानः शंयोररणो दधात” (ऋ० सं० ७,
६, १७, ४ ) ।
१-“द्यौर्मेपिता” इति । द्वयम् अस्यवामीयं दीर्घतमसः
आर्षम् । तृतीयसवने वैश्वदेवे शस्यते ।

हिन्दी निरुक्त ( ७८ ) ४ अ० ३ पा० ५ खं०
(भा०) 'रपो' 'रिप्रम्' इति पापनामनी
भवतः । शमनं च रोगाणां, यावनं च भयानाम्
अथापि 'शंयुः' (४८) बार्हस्पत्य उच्यते ।
"तच्छंयोरावृणीमहे गातुं यज्ञाय गातुं
यज्ञपतये" इत्यपि निगमोभवति (भा०) गमनं
यज्ञाय, गमनं यज्ञपतये" ॥ ५ (२१) ॥
इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ४, ३ ॥
अनुवादः ।
'पिता' (४७) अनवगत शब्द का निगम—
"द्यौर्मे पिता"०[ऋ० सं० २, ३, २०, ३] अर्थात्
'द्यौः' ऊपर वाला द्यु लोक 'मे' मेरा 'जनिता' उत्पन्न करने
वाला, 'नाभिः' वीर्य के द्वारा नाभि देश में बांधने वाला,
'पिता' बाप है । 'अत्र' इस द्यु लोक रूप पिता के जल दान
से अनुगृहीता होने पर, 'बन्धुः' अङ्ग के सम्बन्ध को करने
वाली 'मही' पूजनीया 'इयम्' यह 'पृथिवी' पृथ्वी 'मे' मेरी
'माता' मा है । 'उत्तानयोः' ऊपर को उठे हुए 'चम्वोः'
द्यु लोक और पृथिवी लोक के 'अन्तः' बीच में 'योनिः'
अवकाश दान से मिलाने वाला अन्तरिक्ष (आकाश) लोक
है । 'अत्र' इस में 'पिता' द्युलोक ने 'दुहितुः' पृथिवी के
ऊपर 'गर्भम्' सब प्राणियों की उत्पत्ति का कारण रूप जल
(गर्भ) धारण किया ।
निरुक्तार्थ द्यु लोक मेरा 'पिता' पालने वाला है । अथवा

हिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ४ अ० ३ पा० ५ ख०
उत्पन्न करने वाला है । 'नाभि' नाभिदेश में बांधने वाला ।
इस द्यु लोक में अङ्ग सम्बन्ध को जोड़ने वाली यह बड़ी या
पूजनीय पृथिवी माता है । 'बन्धु' क्यों ? सम्बन्ध करने से ।
'नाभिः' क्यों? सन्नहन या बांध लेने से । [क्योंकि-] “ नाभि
[ सूंढी ] बंधे हुए गर्भ उत्पन्न होते हैं ” ऐसा विद्वान्
कहते हैं । इसी कारण से ज्जातियों को 'सनाभि' इस नाम से
बोलते हैं । और 'सम्बन्धु' यह भी (कहते हैं) 'ज्जाति' क्यों?
संज्ञान अच्छे प्रकार से ज्ञान या जानकारी से । ऊपर को
उठे हुए ःद्युलोक-पृथिवी लोक के बीच में अन्तरिक्ष है ।
उत्तान क्यों ? उत्तान है । अथवा ऊर्ध्वतान ऊपर
को तना हुआ है । उस में पिता पर्जन्य दुहिता [द्यु लोक
से जलको दोहने वाली] पृथिवी पर गर्भ धारण करता है ।
'शंयु.' (४८) अर्थात् सुखयु सुखी । निगम—
“अथानः शंयो ररपो दधात” [ऋ० सं० ७, ६,
१७, ७ ] । अर्थात्-हे पितरो ! ‘अथ’ और ‘नः’ हमारे अर्थ
'शम्' रोगों की निवृत्ति 'योः' भयों का नाश और 'अरपः' जो
कुछ पाप विना हित हो 'दधात' करो ।
निरुक्तार्थ-‘रपः’ 'रिम्रम्' यह दो पापके नाम हैं । शमन
रोगों का, और यावन ( भगाना ) भयों (डरों) का ।
और ‘शंयु’ वृहस्पति का पुत्र भी कहा जाता है । 'तत्'
( तदा ) तब ( हम ) ‘शंयोः’ वृहस्पति के पुत्र से 'आ-वृणी-
महे' सम्मुखभाव से मांगते हैं- ‘यज्ञाय’ यज्ञ के अर्थ 'गातुम्
देवताओं के प्रति जाने को, और ‘यज्ञपतये’ यजमान के
अर्थ ‘गातुम्’ देवताओं के प्रति जाने को । ' यह भी
निगम है ।

हिन्दी निरुक्त ( ८० ) ४ अ० ४ पा० १ खं०
निरुक्तार्थ—यज्ञ के लिये गमन । यज्ञपति (यजमान)
के लिये गमन ॥ ५ ( २१ ) ॥
इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ४, ३ ॥
चतुर्थेऽध्याये-
चतुर्थः पादः ।
( १ खं० )
[ निरु० ] ‘ अदिति ’ (४१) अदीना देव-
माता ॥ १ ( २२ ) ॥
अनुवादः ।
‘अदिति’ यह अनवगत पद है । १ (२२)
क्योकि-इसमे प्रकृति और प्रत्यय तथा अर्थ की प्रतीति
नहीं होती । ‘अदीना’ इसका अवगम और देवमाता इसका अर्थ है ।
निरुक्तार्थ-अदिति (४६) क्यों ? वह अदीना है, दीन
नहीं है, वह क्या? देवमाता। [यह अर्थ ऐतिहासिक पक्ष से है]
नैरूक्तो के मत मे ‘अदिति’ शब्द के उतने ही अर्थ है, जितने कही जाने
वाली ऋचा में दिखाए है । अर्थात्-द्यौ, द्युलोक अन्तरिक्ष, माता, पिता, पुत्र,
विश्व सर्व देव, पञ्चजन [ गन्धर्व आदि या ब्राह्मण आदि ] जात, भूत
जनित्व, [ भविष्यत् । ]
( २ खं० )
१ [निरु०] अदितिर्द्यौरदिति रन्तरिक्ष मदितिर्माता-
१ “अदितिर्द्यौः” इति राहूगणस्य गोतमस्य इयमार्षम् ।
तृतीयसवने सर्वस्तोमेष्वेव, वैश्वदेवस्य शस्तस्य परिधानीया
एषा ।

हिन्दी निरुक्त ( ८१ ) ४ अ० ४ पा० २ खं०

सपिता सपुत्रः । विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना
अदिति र्जातं मदितिर्जनित्वम्' ॥ [ ऋ० सं०१०,
६, १६, ५ ]
(भा०) इति अदिते र्विभूतिमाचष्टे । एनानि
अदीनानि-इतिवा ।
“यमेरिरे (५०) भृगवः” [ऋ०सं० २,२,२,४]
(भा०) एरिर इति 'ईर्त्तिः' ( अदा० आ० ) उप
सृष्टोऽभ्यस्तः २, ( २३ ) ॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थः-‘अदितिः’ देवमाता ही ‘द्यौः’ द्युलोक है ।
‘अदितिः’ देवमाता ही ‘अन्तरिक्षम्’ अन्तरिक्ष है । ‘अदितिः’
देवमाता ही ‘माता’ सब प्राणियों को उत्पन्न करने वाली
है । ‘सः’ वही ‘पिता’ पालक है । ‘सः’ वही ‘पुत्रः’ पुत्र है ।
‘अदितिः’ देवमाता ही ‘विश्वे’ सब ‘देवाः’ देवता हैं ।
‘अदितिः’ देवमाता ही ‘पञ्च’ पांच ‘जनाः’ जन हैं । ‘अदितिः’
देवमाता ही ‘जातम्’ बहुत क्या ? सर्वथा ही जो कुछ जगत्
में उत्पन्न हुआ हुआ है, सब है । ‘अदितिः’ देवमाता ही
‘जनित्वम्’ जो होनहार जगत् है, सब है ॥
इस मन्त्र में ऋषि ( जिसे मन्त्र का साक्षात्कार हुआ )
अदिति की विभूति को कहता है । [ क्योंकि देवता महाभाग्य
होता है, उसे सब सम्भव है । यह माहाभाग्य दैवत काण्ड में
कहा जावेगा । ]
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