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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त । ४१ ध्यायतेर्वा । 'क्षीरं' क्षरतेः, घसेर्वा । 'ई' कारो नाम- करणः । 'उशीरम्'-इति यथा । “अंशुं दुहन्तो अध्यासते गवि” [ ऋ० सं०; ८, ४, ३०, ४] इति अधिषवण चर्मणः । 'अंशुः' शमष्ट- मात्रो भवति । अननाय शं भवति,-इति वा । 'चर्म' चरतेर्वा । उच्चृतं भवति-इति वा । अथापि-चर्म च श्लेष्मा च । [ यथा-] “गोभिः सन्नद्धो असिवोल यस्व” [ ऋ० सं०; ४, ७, ३५, १ ] इति-रथस्तुतौ । अथापि-स्नाव श्लेष्मा च । [ यथा-] “गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता”-इति-इषुस्तुतौ । ज्यापि 'गौः' उच्यते । गव्या चेत्, ताद्धितम् । अथ चेत्,-न गव्या, गमयति,-इषून् इति [यथा-] ॥१॥ अनुवाद । जिससे कि-सामान्य व्याख्या होचुकी इसीसे अब शब्दोंको विशेष व्याख्याके लिये अनुक्रमण करेंगे । 'गो' यह पृथिवीका नाम है, जिससे कि—दूर गई हुई है। और जिससे कि—इसमें प्राणी गमन करते हैं। अथवा 'गाङ्' गतौ ( भ्वा० आ० ) धातुसे है। 'ओ' प्रत्यय होजाता है। और-इसी धातु और व्युत्पत्तिसे यहाँ पशुका भी नाम होता है। और-इस गो पशुमें पूरे अर्थके समान गौण-रूपसे प्रयोग होनेमें [ मन्त्र ] निगम या ज्ञापक हैं। [ जैसे—]

४२ २ अ० २ पा० १ खं० । “गोभिः श्रोणीत मत्सरम्”-[ अर्थ-] दूधसे सोमको पकाओ । इस ऋचामें 'गो' नाम दूधका है। 'मत्सर' नाम सोमका है। तृप्ति अर्थमें 'मदि' [ भ्वा० आ० ] धातुसे है। 'मत्सर' यह लोभका नाम भी है। क्योंकि-लोभसे धन, और उससे मनुष्य उन्मत्त होता है। 'पयस्' शब्द 'पा' पाने (भ्वा० प०) धातुसे होता है। अथवा 'ओप्यायी' वृद्धौ (भ्वा० आ०) धातुसे । 'क्षीर' शब्द 'क्षर'- श्च्योतने (भ्वा० प०) धातुसे है। अथवा 'घस्लृ' अदने (भ्वा० प०) धातुसे । 'ईर' प्रत्यय होता है। जैसे-'उशीर' शब्दमें । 'अंशुं दुहन्तो अध्यासत गवि” इस ऋचामें 'गो' नाम अधि- षवण चर्मका है। 'अंशु' नाम यजमानको सम्बन्ध मात्रसे ही सुखका देनेवाला । अथवा सब प्राणियोंके जीवनके लिये सुखरूप होनेवाला। 'चर्म' शब्द 'चर' गतौ (भ्वा० प०) धातुसे है। अथवा शरीरसे उखाड़ा जाता है, इसीसे वह चर्म है। ['वृती' हिंसायाम् (तु० प०) धातुसे है।] और-'गो' नाम चर्म और श्लेष्माका भी है। जैसे- “गोभिः सन्नद्धो असिवौल यख” अर्थः-'हे रथ तू 'गो' नाम चर्मसे मढ़ा हुआ, अथवा चर्बीसे चुपड़ा हुआ है, तू चल' इस रथकी स्तुतिमें । स्नाव (नाड़ी) और श्लेष्मा (चर्बी) का भी वाचक है। [जैसे-] “गोभिः संनद्धा पतति प्रसूता” [अर्थः-] जो बाण गो या सूक्ष्म आँतोंके सूतोंसे बंधी हुई, और धनुष्मान्से प्रेरित हुई चलती है। ज्या-नाम धनुष्की तांत भी 'गो' कहलाती है। यदि वह गोके द्रव्यसे बनी हो, तो वहाँ 'गो' शब्द गौण है। और यदि गौकी नहीं है, तो 'बाणोंको चलाती है', इस व्याख्यासे मुख्य है ॥१॥

हिन्दी निरुक्त । ४३ व्याख्या । यास्क मुनिने जैसी प्रतिज्ञा की थी, कि-'मैं समाम्नायकी व्याख्या करूंगा।' उसके अनुसार आप सम्पूर्ण समाम्नायकी सामान्य व्याख्याको पूरी कर चुके हैं,-जैसे कि, 'यह सब नामोंका सामान्य लक्षण है'-'यह आख्यातोंका'-'यह उपसर्गोंका' और 'निपातोंका' एवम्, उसीके प्रसङ्गमें शास्त्रके आरम्भके प्रयोजन कहे, १ आगमका परिशोधन किया, वेद और वेदाङ्गोंका विस्तार प्रयोजन सहित कहा, निघण्टु समाम्नायको तीन प्रकरणोंके विभागोंसे विरचनाका उपदेश किया, तथा अनेक विस्तारोंके सहित निर्वचन- का लक्षण कहा । अब विशेष व्याख्यासे समाम्नायकी प्रतिपद व्याख्या करना है, उसीके लिये विशेष प्रतिज्ञा करते हैं—“अथातोऽनुक्रमिष्यामः” विशेष व्याख्याका परिचय । विशेष व्याख्यासे प्रयोजन एक एक शब्दकी व्याख्यासे है, सामान्य व्याख्यामें शब्दोंके बड़े बड़े समूहोंके साथ परिचय दिये जाते हैं, जैसे—आख्यात और नाम आदि । किन्तु यहाँ निघण्टुमें जो ‘गौः’ ‘ग्मा’ ‘ज्मा’ आदि “देवपत्नी” पर्य्यन्त शब्द परिगणन किये हैं, उनमेंसे एक एक शब्दकी पृथक् पृथक् व्याख्या होगी । जिस प्रकार सामान्य व्याख्यामें आपने अनेक प्रसङ्गोंकी आप- त्तियोंके साथ अनेक उत्तम विषयोंका प्रदर्शन कराया है, उसी प्रकार आपकी विशेष व्याख्या भी बहुत चमत्कारोंको अङ्कमें लिये हुए है । निरुक्त-शास्त्रको आद्यन्त देखनेसे प्रतीत होता है कि—इस शास्त्रके द्वारा वेदके जिस विभागकी पूरी व्युत्पत्ति होती है, वह १—मन्त्रोंके आनर्थक्यका आक्षेप और उसका समाधान ।

४४ २ अ० २ पा० १ ख० ।

दूसरे किसी वेदाङ्ग या शास्त्रसे नहीं हो सकती, सर्वथा यह अङ्ग अपने प्रयोजनके लिये स्वतन्त्र और महत्व-पूर्ण है । शब्दोंके अर्थके स्थिर करने तथा उनके ऐतिहासिक तत्वकी शिक्षा देनेमें अन्य, शास्त्रोंसे इसका प्रथम आसन है, इसमें कोई आपत्ति नहीं उठा सकता । जिस प्रकार इस समाम्नायमें 'नैघण्टुक' 'नैगम' और 'दैवत' यह तीन काण्ड अलग अलग स्थित हैं, उसी प्रकार इनकी विशेष व्याख्यायें भी पृथक् पृथक् प्रकारकी हैं। ऐसा होना भी चाहिये था, क्योंकि—जब उनमे पृथक् पृथक् जातिके शब्द हैं, तो उनकी व्याख्याके उपाय या साधन भी पृथक् पृथक् होगे । इस स्वाभाविक नियमके अनुसार प्रथम क्रमागत नैघण्टुक काण्डमें प्रत्येक शब्दकी व्याख्यामें आवश्यकतानुसार प्रायः सात बातें दिखाई जावेंगी। जैसे—तत्व या व्याख्येय शब्दका वाच्य-अर्थ (१) पर्याय शब्द जो उसका समानार्थक, और उसी अर्थमें प्रसिद्ध हो (२) भेद या व्याख्येय शब्दकी व्युत्पत्ति (३) संख्या या निघण्टुमें व्याख्येय शब्दके समान अर्थमें दिखाये हुए शब्दोंकी गणना (४) संदिग्ध, व्याख्येय शब्दका वह अर्थ जो दिखाये हुए अर्थसे भिन्न हो (५) सन्दिग्धोदाहरण, अर्थात्-वह उदाहरण, जिसमें उन दोनों अर्थोंका सम्भव हो (६) और उसका निर्वचन, अर्थात् जो मन्त्र या निगम उदाहृत किया है, उसकी व्याख्या (७) । वास्तवमें व्याख्या उसीको कहते हैं, कि-जिस वस्तुकी व्याख्या करना हो, उस वस्तुके सम्बन्धको लेकर जितने प्रश्न उठ सकें, उनमें प्रत्येकका उत्तर दिया जाय । परन्तु मैं जहां तक समझता हूं, संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं, जिसके सम्बन्धको लेकर उठनेवाले प्रश्नोंका अन्त हो, सुतराम्, संसारकी प्रत्येक वस्तुके सकल प्रश्नोके अन्त पर अपने प्रश्नोंके अन्तको निर्भर करती

हिन्दी निरुक्त । ४५ है। इस रीतिसे जो पुरुष किसी एक वस्तुकी व्याख्या करने बैठता है, मानो वह सकल संसारकी ही व्याख्या करेगा, किन्तु ऐसा करना सर्वथा असाध्य है, यदि साध्य होता तो अबतक कोई महापुरुष वैसा कर ही डालता, या, यो समझिये कि-संसारमें जितने पुस्तक हैं, वे सब उसी महाव्याख्याके भाग मात्र है। इस लिये मानना होगा कि-जिस वस्तुको व्याख्यामें वक्ताकी इच्छा- नुसार जितने प्रश्न आवश्यक या उपयुक्त हों, उनके उद्धारका ही नाम व्याख्या है। इसी प्रयोजनसे हमारे यास्क मुनि भी प्रत्येक व्याख्येय शब्दों- मे आवश्यक प्रश्नोंको दिखाते हैं, जिनके द्वारा अध्येता पुरुष शब्दोंके अर्थनिर्णयमें पूर्ण योग्यता प्राप्त कर लेता है। ऐसे व्याख्याके समझानेके लिये कोई कल्पित उदाहरण न रख कर यास्क मुनिके प्रथम व्याख्येय गो शब्द (गौः) तथा उसकी व्याख्याको ही हम लेते हैं, उसीके अनुसार सकल निघण्टुक शब्दोंमें कल्पना करना होगी। “गौः” व्याकरणके समान इस शास्त्रका भी प्राधान्यसे शब्दतत्व ही सामान्य व विशेष रूपसे व्याख्येय होता है, इस लिये यहाँ 'गौः' आदिके कहनेसे उसके अर्थकी व्याख्याका लक्ष्य न समझ कर शब्द- के स्वरूप पर ही ध्यान रखना होगा। यहाँ “गौः” या 'गो' शब्द, जिसका शरीर 'ग्-ओ'-इन दो अक्षरोंसे बना हुआ है, व्याख्येय है। (१) गो शब्दका तत्व क्या है, जिसका यह अभिधान करता है ? पृथिवीरूप द्रव्य। (२) गो शब्दका पर्याय क्या है, जो इसके अभिधेय अर्थको अभि- धान करता है ? 'पृथ्वी' शब्द।

४६ २ अ० २ पा० १ खं० । (३) गो शब्दकी व्युत्पत्ति क्या है, या वह क्या कारण है, जिससे यह गो शब्द अपने पृथिवीरूप द्रव्य अर्थ पर रहता है ? [ क ] यह दूर तक गई हुई है, “दूरं गता भवति” अर्थात् जहाँ तक मनुष्य जाय, वहां सब जगह मिलती है, इसका अन्त नहीं है । प्रयोजन यह है कि—‘ग्’ गमॢ गतौ (भ्वा० प०) का होनेसे गमन अर्थको बोधन करता है, और ‘ओ’ (उ० प्र०) सम्बन्धको, क्योंकि-पृथिवीमें गमनका सम्बन्ध है, इसीसे इन दोनों अक्षरोंका योगरूप ‘गो’ शब्द पृथिवी पर गया । [ ख ] जिससे कि-इस पर सब भूत ( प्राणी ) गमन करते हैं, इसीसे यह ‘गो’ है, इस व्युत्पत्तिमें भी दूसरे प्रकारसे गमनके सम्बन्धके कारण ही ‘गो’ शब्द पृथिवी द्रव्यमें रहता है । “यच्चास्यां भूतानि गच्छन्ति” । (४) क्या ‘गो’ शब्द ‘गमॢ गतौ’ ( भ्वा० प० ) धातुसे अतिरिक्त धातुसे भी बन सकता है ? हाँ, ‘गाङ् गतौ’ ( भ्वा० आ० ) धातुसे । इसमें भी ‘गम्’ के समान ‘ग्’ और गति अर्थ दोनों हैं । (५) क्या ‘गो’ शब्द ‘गम्’ या ‘गा’ धातुसे ही बनता है, इसमें किसी नामकरण प्रत्ययके योगकी आवश्यकता नहीं है ? नहीं, है,-इसमें ‘ओ’कार नामकरण प्रत्यय है । “ओकारो नामकरणः” । धातु केवल क्रियाहीको कहता है, किन्तु उसके सम्बन्धको नहीं, इसीसे वह अकेला किसी द्रव्यका नाम नहीं बन सकता, जैसे जो धातु खानेका नाम है, वह खानेवालेका नहीं हो सकता, उसके बोधनके लिये भाषामें खानेके सामने ‘वाला’ शब्दके समान किसी शब्दके योगकी अपेक्षा रहती है, ऐसे ही सम्बन्धके बोधक

हिन्दी निरुक्त । ४७ शब्दंशोंको कृत् प्रत्यय या नामकरण कहते हैं। इसी प्रकार धातुओं- से नामकरणोंके योग होनेसे सब नाम बनते हैं। यही नामकरण प्रत्ययोंकी नामकरणता है। (६) क्या निघण्टुके अनुसार 'गो' शब्दका पृथिवी द्रव्य ही अर्थ है, अन्य कोई नहीं ? नहीं, है, इन्हीं दोनों कारकोंमें तथा इन्हीं दोनों धातुओंसे 'गो' यह पशुका नाम होता है। अर्थात् यह भी स्वयम्, गमन करता है, तथा इसमें भी मनुष्य दुग्धादिके लिये गमन करते हैं। “अथापि पशुनामेह भवति” । (७) क्या यह 'गो' शब्द जिस प्रकार सम्पूर्ण 'गो', पशुको बोधन करता है, उसी प्रकार उसके किसी भाग विशेषको भी बोधन करता है ? हाँ, कहीं, गोके दूधका नाम भी हो जाता है। जैसे-'गोभिः श्रीणीत मत्सरम्' । [ ऋ० सं०-७, १, ३, ४ ] यह अनेक प्रकारसे शब्दकी वृत्तिका विषय इस लिये दिखाया जाता है कि-क्यों नहीं शिष्य, इस प्रकारसे शब्दकी वृत्तियोंको जान कर मन्त्रोंके अर्थोंका निर्वचन करेगा । “आधावता सुहस्त्यः शुक्राष्टभ्णीत मन्थिना । गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ॥” [ ऋ० सं०, ७, १, ३, ४ ] अथास्य आङ्गिरस ऋषि, गायत्री छन्दः, ग्राव (पाषाण) स्तुतिमें विनियोग । हे सुवर्णसे अलकृत हस्तवाले अध्वर्युओ ! दौड़ आओ, इन शुक्रा मन्थी नामक ग्रहोको, समयके बीतनेसे पहिले ही, ग्रहण करो, और गौओंसे निकले हुए दुग्धसे इस सोमको पकाओ, तथा एक कर ठण्डा होने पर उससे होम करो।

४८ २ अ० २ पा० १ ख० । यहाँ पर जिस सोम-पाकका विधान मन्त्रसे ही प्रतीत होता है, वह [सोम-पाक] साक्षात् गौओंसे शक्य नहीं, इस कारण गो शब्दसे, गौके दुग्ध का ही ग्रहण है ऐसी, प्रतीति होती है। १—उक्त मन्त्रमें “मत्सर” नाम सोमका है, क्योंकि-वह 'मन्द' [मदि स्तुति मोद मद स्वप्न कान्ति गतिषु] धातु [भ्वा० आ०] से बनता है। “मदन्ते तृप्यन्ति देवता अनेन इति मत्सरः” जिस- से देवता तृप्त होते हैं, वह 'मत्सर' कहा जाता है। २—'मत्सर' लोभका भी नाम है, क्योंकि, मनुष्यमें जब लोभ आ घुसता है, तब वह धनको ही सब कुछ देखता हुआ, अन्य जगत्- से विमुख होकर उन्मत्त हो जाता है। पहिला 'मत्सर' शब्द, उदाहरणमें आनेसे 'उदाह्रण-प्रसक्त' होकर व्याख्यामें आया, और दूसरा 'मत्सर' शब्द प्रथम 'मत्सर' शब्दके समान होनेसे ही आया है, ऐसे शब्दको 'शब्द-सामान्य प्रसङ्ग-प्रसक्त' कहते हैं। “पयः”—[क-] पिबतेर्वा पानार्थस्य” 'पयस्' शब्द 'पा' (भ्वा० प०) पाने, धातुसे बनता है, क्यों कि-वह पान किया जाता है। [ख-] “प्यायतेर्वा वृद्ध्यर्थस्य” अथवा वृद्ध अर्थ- वाले 'प्याय्' [भ्वा० आ०] धातुसे बनता है, क्योंकि, उससे प्राणी वृद्धिको प्राप्त होते हैं। उक्त मन्त्रमें जो 'मत्सर' शब्द आया है, उसीका पर्याय पयस् शब्द है, इससे, इसको व्याख्या की गई है। ऐसे शब्दको पर्याय-प्रसक्त कहते हैं। “क्षीर क्षरतेः” श्च्योतनार्थस्य । 'क्षीर' शब्द 'क्षर' (भ्वा० आ०) धातुसे बनता है, 'क्षर' का क्षरण या झरना अर्थ होता है, दुग्धको क्षीर इसीसे कहते हैं, कि—वह ऊधस् या ऊँढ़ीसे झरता है।

हिन्दी निरुक्त । ४६ (ख) अथवा 'क्षोर' शब्द भक्षण अर्थवाले 'घस' धातुसे बनता है, वास्तवमें यह शब्द 'अद्' भक्षणे (अदा० प०) धातुसे बनता है, 'घस' उसीका आदेशमात्र है। कोई आचार्य कहते हैं कि-'घस' धातु स्वतन्त्र है, किन्तु 'अद्' धातुका आदेश नहीं है। जब 'घस' धातुसे क्षीर शब्द बनाते हैं, तब उससे 'ईर' प्रत्यय जोड़ते हैं, जैसे कि, 'वश-कान्तौ' (अदा० प०) धातुसे 'ईर' प्रत्यय लग कर 'उशीर' शब्द बन जाता है। धातुके वकारको 'उ' सम्प्र- सारण आदेश होता है। उशीर नाम खसका है, उसमें सुन्दर गन्ध रहता है, इससे इस नामको 'वश-कान्तौ' धातुसे बनाना उचित हुआ। 'गो' शब्द अधिषवण चर्मका वाचक भी होता है, जिस पर कि-'सोमयाग' में सोमलता, का रस निकालनेके लिये अभिषव संस्कार होता है। तात्पर्य यह है कि-जिस प्रकार, यह गो शब्द सम्पूर्ण गोका वाचक है, उसी प्रकार गोके एक भाग-(अंश) रूप चर्मका भी वाचक है, इसीको 'कृत्स्नवत् अभिधायक' कहते हैं। उदाहरण-“ते सोमादो हरी इन्द्रस्य निस्वतेऽशुं दुहन्तो अध्यासत गवि। तेभिर्दुग्धं पपिवाञ् सोम्यं मध्विन्द्रो वर्द्धते प्रथते वृषायते । [ऋ० सं०-८, ४, ३०, ४] जगती छन्दः, अर्बुद नामका द्वेवेद्य ऋषि, ग्राव (पाषाण) स्तुतिमें विनियोग। ये सोमरसके भक्षण करनेवाले पाषाण जब अभिषव (कुट्टन) कर्ममें प्रवृत्त होते हैं, उस समय इन्द्रके घोड़े यज्ञमें आगमनके

५० २ अ० २ पा० १ खं० । अर्थ इनके शब्दको सुन कर सोमको संस्कृत हुआ जान कर रथमें जुड़नेकी इच्छा करते हुए स्वयम् ऋजीष या खूखसको भक्षण करने- के लिये, और इन्द्रको सोमरस पिलानेको आप ही आप जूएमें संयुक्त होनेके लिये अपनी गर्दनोंको झुकाते हैं, मानों सूचित करते हैं, कि-‘हे इन्द्र ! यज्ञस्थानमें चल, सोम तय्यार है’ । उधर ऋत्विज् लोग भी इन्द्रके आगमन-कालको जान कर शीघ्र शीघ्र गोके अवयवभूत अधिषवण चर्मके ऊपर सोमरसको निचोड़ते हुए डटे रहते हैं, मानों इस कर्मको करते हुए इसकी प्रतीक्षा ही कर रहे हैं, कि—इतनेमें इन्द्र आकर उनके दुहे हुए मधुर सोमरसको पान कर उससे तृप्त होता है। अनन्तर वीर्यसे बढ़ता है, पश्चात् शरीरसे विस्तृत होता है, और फिर विस्तीर्ण हो कर अपने वीर्यसे मेघको विदीर्ण करके वृष्टिको प्रवृत्त करता है । जिस सोमरसको पान करके इन्द्र देवता वर्षण आदि कर्मसे सब जगत्को अनुगृहीत करता है, उस सोमरसकी लोढी शिलपट्टों- से ही सिद्धि होतो है, इससे, इस सम्पूर्ण उपकारके मूल कारण ये ही हुए, इस रीतिसे मन्त्रोक्त स्तुति ग्रावोंकी ही होतो है। १ निगम प्रसक्तका निर्वचन । “अंशुः” शमष्टमात्रो भवति, 'अंशु' नाम सोमका है, तथा वह सुख-वाचक 'शम्' अव्यय और 'अशू व्याप्तौ' धातु [ स्वा० आ० ] से बनता है। इनसे यह अर्थ निकलता है कि-जैसे ही यजमान सोमको सम्पादन करके उस पर अपनी व्याप्ति कर लेता है, वैसे ही, वह, उसके लिये सुखरूप हो जाता है, अर्थात् सोमके कर लेनेसे सुखी हो जाता है कि,–मैंने सोम याग कर लिया, १ किसी शब्द पर दिये हुए निगम या मन्त्रमें व्याख्येय शब्दको निगम-प्रसक्त कहते हैं ।

हिन्दी निरुक्त । ५१ और जन्म लेनेका जो ऋण है, वह चुका दिया, मैं कृतकृत्य हो गया,—इस प्रकार उसके मनका दुःख जो अपने ऊपर ऋणका भार समझता है, दूर हो जाता है। अथवा 'शम्' अव्यय और 'अन-प्राणने' [ अदा० प० ] धातु- से अंशु शब्द बनता है। अर्थात्—सोम सब प्राणियोंके जीवनके लिये सुखरूप होता है, क्योंकि, यज्ञसे वृष्टि होती है, उससे सब प्राणी सुखसे जीवन करते हैं, इसीसे, इसका नाम 'अंशु' है। “गो' शब्द अधिषवण = चर्मका भी वाचक है”—ऐसी पूर्वो- क्त व्याख्यामें 'चर्म' शब्द भी एक ऐसा आगिरा जिसका निर्वचन कर देना भाष्यकार आवश्यक समझते हैं। ऐसे शब्द व्याख्या- प्रसक्त कहे जाते हैं। [ क ] “चर्म—चरतेर्वा” 'चर्म' शब्द 'चर-गतिमक्षणयोः' [ भ्वा० प० ] धातुसे बनता है। क्योंकि-वह सम्पूर्ण शरीर- में चरितनाम गत या व्याप्त होता है, इसीसे.वह चर्म कहलाता है । [ ख ]-'उच्च्त्तं भवति-इति वा” अथवा, वह, शरीरसे उघेड़ा जाता है, इससे 'चर्म' कहलाता है । 'वृती-हिंसाग्रन्थ- नयोः [ तु० प० ।] धातुसे बनता है। 'गो' शब्द चर्म व श्लेष्माका भी वाचक होता है। जैसे कि— ^१'गोभिः सन्नद्धो असिवीलयस्व” । [ ऋ० सं०, ४, ७,३५, १ ] यह रथस्तुति है। रथ चर्म से मढ़ा हुआ होता है, और उसके अरे, १—वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया अस्मत् सखा प्रतरणः सुवीरः । गोभिः सन्नद्धो असि वीलयस्वा स्थाताते जयतु जेत्वानि ॥ [ ऋ० सं०-४, ७, ३५, १ । य० वा० स०-२६, ५२ । अथर्व स०-६, १२, ५, १ । ]

५२ ८ अ० २ पा० १ ख० । श्लेष्मा या चर्बी से चुपड़े हुए होते हैं। यहां चर्म तथा श्लेष्माके अतिरिक्त अन्य किसी अर्थका संभव नहीं है। जैसे कि,— २ “गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता” [ ऋ० सं०, ५, १, २१, १ ] यह बाणकी स्तुति है। 'इषु' भी स्नाव (नाड़ी) से वेष्टित और श्लेष्मासे चुपड़ा हुआ होता है। 'ज्या' को भी 'गो' शब्दसे बोलते हैं। यदि वह गोसे ही बनी हुई हो तो वहां 'गो' शब्दको ताद्धित या गौण समझना। जो नाम जिस वस्तुका होता है, वह नाम जब उस वस्तुके किसी अवयव या उसके सम्बन्धी, किसी अन्य, वस्तुको कहे, तो उसे गौण समझना उसीको ताद्धित कहते हैं। जो शब्द, जिस अर्थमें प्रसिद्ध हो, उस अर्थमें उसकी मुख्यावृत्ति समझना, और उस शब्दको वहां मुख्य या अभिधायक जानना। यदि शब्द उस मुख्य अर्थके सम्बन्धसे ही, किसी अन्य अर्थमें चला जाय तो, वहां, उस शब्दको गौण, और उसकी वृत्तिको गौणी समझना। इसी रीतिसे गो, शब्द, गौ अर्थमें मुख्य है, और गोके चर्म, स्नाव तथा श्लेष्मा आदि अर्थमें गौण है। ऐसे ही अन्यत्र अन्यत्र भी ध्यान रखना चाहिये। यह शब्दका स्वभाव ही है, कि,—वह जिस अर्थमें प्रसिद्ध होता है, अविकृत होकर भी उससे हट कर उसके किसी भागमें चला जाता है। शब्दोंके व्याख्यानमे यह बात प्रायः देखी जाती है, इससे ऐसे स्थलोंमें आश्चर्य नहीं मानना। २—सुपर्णं वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता । यत्रानरः संच विच द्रवन्ति तत्रास्मभ्यः मिषवः शर्म यंसन् ॥ [ ऋ० सं०-५, १, २१, १ । य० वा० सं०-२६, ४७ । ]

हिन्दी निरुक्त । ५३ [ ख ] यदि वह ज्या गोसे बनी हुई न हो तो, वहां 'गो' शब्दकी “गमयति इषून्—इति गौः” 'बाणोंको फेंकनेवाली'— ऐसी व्युत्पत्ति करके अन्य द्रव्य ही लेना। इस व्युत्पत्तिमें 'गो' शब्द स्वतन्त्रतासे ज्या अर्थमें आता है, किन्तु किसो अन्य अर्थके द्वारा नहीं, इससे मुख्य है, गौण नहीं। जैसे, कि पूर्व, अर्थमें था ॥ १ ॥ [ खं० २ ] * “वृक्षे वृक्षे नियतामोमयीत् स्ततो वयः प्रपतान् पूरुषादः ।” [ ऋ० सं०-७, ७, १६, २, ] [ भाष्यम् ] वृक्षे वृक्षे धनुषि धनुषि । 'वृक्षः' व्रश्चनात् । नियताऽमोमयीद् गौः। शब्दं करोति । मीमयतिः शब्दकर्मा । ततो वयः प्रपतन्ति, पुरुषानदनाय । 'विः' इति शकुनिनाम । वेतेर्गति- कर्मणः । अथापि-इषु नाम-इह भवति एतस्माद्-एव । आदित्योऽपि 'गौः' उच्यते । [ यथा ] “उतादः परुषे गवि” [ ऋ० सं०-४, ८, २२, ३ ] [ भाष्यम् ] पर्ववति भास्वति,-इति औपमन्यवः ।

  • “अमीमयद् गौः” यहां वेद भगवान्ने एक उत्तम साहित्य भी दिखाया है, वह यह कि—धनुषकी ताँतको गो बनाया, वह उधर उसके शब्दको मिमाना कहा है।

५४ २ अ० २ पा० २ खं० । अथापि ऽअस्य एको रश्मिः चन्द्रमसं प्रति दीप्यते, तद्-एतेन उपेक्षितव्यम्, आदित्यतः-अस्य दीप्तिर्भवति,—इति । “सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः [ य० वा० सं० १८, ४० ] इत्यपि निगमो भवति । [ प्रयोजनम् ] सोऽपि गौः उच्यते । [ यथा ] “अन्वाह गोरमन्वत” इति तद् उपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः । सर्वेऽपि रश्मयः गावः उच्यन्ते ॥ २ ॥ [ यथा ] अनुवाद । [ मन्त्रार्थ ] 'प्रत्येक धनुषमें बँधी हुई गो, या ताँत मिमाती, है, फिर पुरुषोंको भक्षण करनेके लिये पक्षी या बाण गिरते हैं' [ भाष्य- ] वृक्ष वृक्ष, = धनुष धनुषमें । 'वृक्ष' व्रश्चन या काटने- से है । बधी हुई गो, या तांत शब्द करती है । मोमयति धातु शब्दा- र्थक है । फिर 'वि' पुरुषोंके खानेके लिये गिरते है । 'वि' यह पक्षी- का नाम है । 'वि' शब्द गत्यर्थक 'वी' [ अदा० प० ] धातुसे बनता है । और यहांपर इषु या वाण का नाम भी होता है । इसी धातु से । आदित्य भी 'गो' कहलाता है । [ जैसे- ] “उतादः परुषे गवि” [ ऋ० स०, —४, ८, २२, ३. ] [ मन्त्रार्थ-] 'धार' या प्रकाश वाले, गमन शील [मण्डल] मे' ।

हिन्दी निरुक्त । ५५ [ निरुक्तार्थ ] 'पर्ववाले [ या ] प्रकाश वालेमें'-यह उपमन्यु के पुत्र मानते हैं । और भी-इस [ सूर्य ] का किरण चन्द्रमा में प्रकाशित होता है, इसके साथ यह भी जानना चाहिये, कि-इस [ चन्द्रमा-] की दीप्ति या ज्योति आदित्य से होती है। [ प्रमाण- ] “सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः ।” [ य० वा० सं०-१८, ४०] [ मन्त्रार्थ-] सुषुम्ण-नामक सूर्यका किरण [ ही ] चन्द्रमा गन्धर्व है। यह निगम या जानने वाला भी है। [ प्रयोजन-] वह भी 'गो' कहा जाता है। [ जैसे-] "अत्राह गोर- मन्वत" । इसका व्याख्यान आगे करेंगे । सब रश्मि या किरणें भी 'गो' कहे जाते हैं ॥२॥ [ जैसे-] व्याख्या । उदाहरण-“वृक्षे॑ वृक्षे॒ निय॑ता मीमयद्गौ स्ततो॑ वयः॒ प्रप॑तान् पूरु॒षादः॑ । ऋ॒थे॒दं विश्वं॒ भुव॑नं भया॒त इन्द्रा॑य सुन्वद्दृष॒ये च॑ शिक्षत् । [ ऋ० सं०,—७, ७, १६ २ ] वसुक इन्द्रका पुत्र ऋषि। त्रिष्टुप्छन्दः। इन्द्र देवता। मरुत्व- तीय महाव्रत में, शस्त्र । भगवान् इन्द्र संग्रामोंमें अनेकबाहु होकर अनेक धनुष धारण करते हैं। उनको देखकर ऋषि इस प्रकार कहता है—'इन्द्र ने जितने धनुष धारण किये हैं, उनमें प्रत्येकमें नियत या बँधी हुई 'गौः' अर्थात् प्रत्यञ्चा [ तांत ] जो गो-से बनी है, अथवा बाणोंको चलाने वाली है, इन्द्रके भुजसे खिची हुई होकर शब्द करती है। “ततः”

५६ २ अ० २ पा० २ ख० । [ क- ] शब्द होनेके अनन्तर ही, 'वयः" [ क-] पक्षी संग्राम भूमि- में इन्द्रके बाणोंसे तत्काल ही गिरे हुए शत्रुओके मृत शरीरोंको भक्षण करनेके लिये गिरते हैं । "ततः" [ ख- ] अथवा उसी धनुष- से पक्षियोंके पत्र या पांख के लगे रहनेसे इषु [ बाण ] भी "वयः" पक्षी हैं, वे शत्रुओंके प्राण-भक्षण करनेके लिये गिरते हैं, अथवा "वयः" [ ग ] वी-गतौ ( अदा० प० ) धातुसे 'वि' शब्द बनता है, गति क्रियाके योगसे बाण भी 'वि' शब्दके वाच्य हैं, पहिले व्या- ख्यानमें बाण अर्थमें 'वि' शब्द गौण है, और दूसरेमे मुख्य है। 'ऐसा अति प्रभाववाला इन्द्र है'-यह जान कर सम्पूर्ण विश्व या प्राणि-मात्र यत्-किञ्चित् त्रुटिके लिये भी अपने अपने कर्ममें डरता है, तथा डर कर इन्द्रके लिये सोमका सवनरूप सस्कार करता हुआ ऋत्विज्को दक्षिणा देता है । भाव यह है कि-सब जगत् इन्द्रकी ओर मुख उठाये हुए और सब कार्यको छोड़ कर आदर सहित स्थित है, जो इन्द्र ऐसे प्रभाववाला है. उसको हम अपने वाञ्छित- की सिद्धिके लिये स्तुति करते हैं । १ निगम-प्रसक्त "वृक्ष" शब्दको व्याख्या करते हैं—"वृक्षो व्रश्च- नात्" इसी लिये वृक्षोंको वृक्ष कहते हैं, कि,-वह इन्धनके लिये काटा जाता है । और शब्द मन्त्रके व्याख्यानमें ही आ चुके हैं, इससे उनका निर्वचन नहीं किया जाता । इन पूर्वोक्त उदाहरणोंसे यह दिखाया गया कि, 'अवयवमें अवयवीके समान शब्दका प्रयोग होता है। इसके अनन्तर यह दिखाते हैं कि—'अन्य बहुतसे अर्थान्तरोंमें भी १—जो मन्त्र किसो शब्दके अर्थके साक्ष्यमें दिया जाता है, वह 'निगम' कहाता है, और उसमें आये हुए अन्य व्याख्येय शब्दको 'निगम-प्रसक्त' कहते हैं।

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'गो' शब्द आता है, जिनमें गोका सम्बंध बिलकुल ही नहीं है। यह विषय ऐकपदिक या नैगम काण्डमें कहने योग्य है, किन्तु यहाँ 'गो' शब्दके प्रसङ्गसे कहा जाता है,— [१] “आदित्योऽपि गौरुच्यते” आदित्यका नाम भी 'गो' है। जैसे— “उतादः परुषे गवि सूरश्चक्रं हिरण्ययम् । न्यैर- यद्रथी तमः ॥ [ऋ० सं०, ४, ८, २२, ३] भारद्वाज ऋषि । गायत्री छन्दः । पूषा देवता । नैरुक्तोंके मतमें पूषा नाम आदित्यका है, और अन्य मतमें भूमिकी । धारा विशेष या, प्रकाश अथवा अहोरात्रादि रूप पर्ववाले तथा निरन्तर गमन करनेवाले उस आदित्य-मण्डलमें स्थित होकर, रथीतम [जिसका रथ मुहूर्त्तमात्र भी विश्राम नहीं करता] सूर्यदेव तेजोमय मण्डलको, उदय, अस्तमय तथा मध्यान्हकालके विभाग करनेके लिये नियत मार्गसे नित्य ही घुमाता है। अथवा उस मण्डलमें अवस्थित जो आदित्यान्तरवर्ती सूर्य- भगवान्, वह—लव, क्षण, निमेष, त्रुटि, मुहूर्त्त, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन तथा संवत्सर रूप कालचक्रको प्रेरित करता है। वह ऐसे गुणोंवाला है, इससे हम उसकी अपने वाञ्छित अर्थकी सिद्धिके लिये स्तुति करते हैं। [२] सूर्य भगवान्‌का 'सुषुम्ण' नामक एक रश्मि या किरण होता है, वहो चन्द्रमण्डलमें जाकर लगता है, उसोसे चन्द्रमा दीप्तिमान् होता है, और अपनी ज्योत्स्नासे सब दिशाओंको प्रकाशित करता है। इससे यह बात समझने योग्य है कि—“आदित्य देवसे ही चन्द्रमामें प्रकाश आता है।” इस अर्थको निगम भी प्रमाणित करता है।

५८ २ अ० २ पा० ३ खं० । “सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः” [ य० वा० सं०-१८, ४० ] ‘सुषुम्ण’ नामक सूर्यका रश्मि चन्द्रमामें जाकर स्वयम् चन्द्रमा हो जाता है, तथा वही गन्धर्व होता है। जिस सुषुम्ण नामक सूर्यकी रश्मिका ऊपर परिचय दिया गया है, वही एक रश्मि ‘गो’ शब्दका वाच्य होता है। जिस प्रकार यह ‘रश्मि’ ‘गो’ नामसे बोला जाता है, वैसा ही यह उदाहरण है,— “अत्राह गो रमन्वत” उस आदित्यमण्डलमें ‘गो’ नाम सुषुम्ण नामक एक सूर्य रश्मिके अवस्थानको अन्य सूर्यके रश्मियोंने स्वीकार किया है। इस मन्त्रकी विशेष व्याख्या नैगम काण्ड [ ४, ४, ४ ] में होगी । [ ३ ] सब रश्मि भी ‘गो’ कहलाते हैं। इसके अनुसार यह ऋचा उदाहरण है ॥ २ ॥ [ खं० ३ ] “ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरि शृङ्गा अयासः । अत्राह तदुरु गायस्य वृष्णः परमं पद मवभाति भूरि ॥” [ ऋ० सं०-२, २, २४, ६ ] [ भा० ] तानिवां वास्तूनि कामयामहे, गमनाय, यत्र गावो बहु शृङ्गाः । ‘भूरि,-इति बहुनो नाम धेयम्, प्रभवति,-इतिसतः । ‘शृङ्ग’ श्रयते र्वा । शृणाते र्वा । शम्नाते र्वा । शरणाय उद्गतम्, इति वा । शिरसो निर्गतम्,-इति वा ‘अयासः’-अयनाः । तत्र तद्उरुगायस्य

हिन्दी निरुक्त । ५६' विष्णोः महागतः परमं पदं परार्ध्यस्थम्- अव भाति भूरि ॥ पादः पद्यतेः, तन्निधानात् पदम् । पशु पाद प्रकृतिः प्रभाग पादः । प्रभाग पाद-सामान्याद्- इतराणि पदानि । एवमन्येषामपि सत्वानां सन्देहा विद्यन्ते, तानि चेत् समान कर्माणि, समान निर्वचनानि, नाना कर्माणि चेत् नाना निर्वचनानि । यथार्थं निर्वक्तव्यानि, इति । इमानि एक विंशतिः पृथिवीनाम धेयानि अनु- क्रान्तानि, तत्र-‘निर्ऋतिः निरमणात् । ऋच्छतेः कृच्छ्रापत्तिः-इतरा । सापृथिव्या सन्दिह्यते । तयो- र्विभागः । तस्याएषा भवति ॥ ३ ॥— मन्त्रान्वयार्थः-हे दम्पति ! 'ता' तानि 'वास्तू- नि' गृहाणि 'वां' युवाभ्यां गमध्यै गमनाय वयम् 'उश्मसि' कामयामहे । किम्भूतानि । 'यत्र' येषु 'भूरिशृङ्गाः' बहुदीप्तयः 'अयासः' गमनशीलाः 'गावः' किरणाः सन्तीति शेषः । पुनः किम्भूतानि 'अत्राह' यत्र ( तत्र ) 'उरुगायस्य' महागतेः 'वृष्णः' विष्णोः

६० २ अ० २ पा० ३ खं० । 'तत्' प्रसिद्धं 'परमम्' उत्कृष्टं 'पदम्' स्थानम् 'भूरि' बहु 'अवभाति' सर्वम् अधः कृत्वा दीप्यते इत्यर्थः । अनुवादः । मन्त्रार्थ-हे दम्पती ! उन स्थानोंको तुम दोनोंके जानेके लिये हम चाहते हैं। जहां बहु प्रकाश गमनशील किरणें हैं । और जहां बड़ी गतिवाले विष्णुदेवका उत्तमोत्तम स्थान सब संसारको नीचे करता हुआ प्रकाश कर रहा है । [भा० र्थ०-] तुम दोनोंके लिये उन स्थानोंको चाहते हैं, गमनके अर्थ। जहां गो या किरणें बहु शृङ्गवालीं। [एक पद निरुक्त] 'भूरि यह बहुतका' नाम है। 'प्रभवति' समर्थ होता है, इस कर्तृवाच्य 'प्र' उपसर्ग 'भू' । [भ्वा० प० ] धातुसे । 'शृङ्ग' श्रिश्रू सेवायाम् (भ्वा० उ० ) धातुसे, अथवा 'शल' हिंसायाम् [क्या० प०] धातुसे । अथवा 'शम्' उपशमे .(क्या० प०) धातुसे अथवा शरण या हिंसाके लिये उठा है,-इससे या शिरसे निकला हुआ है, इससे[ शृङ्ग] है। 'अयासः' गमन करने वाले वहां वह 'उरु- गाय' या महागति 'वृषन्' या विष्णुका 'परम' या सबसे ऊंचा 'पद' स्थान सबको नीचा करता हुआ बहुत प्रकाश करता है । 'पाद' शब्द 'पद'गतौ ( दिवा० आ०) धातुसे है । उसके रख देनेसे पद होजाता है। पशुके पादके सादृश्यसे रुपये या मुहर आदि द्रव्य का पाद होता है। उसके पादके सादृश्यसे और क्षेत्र आदिके पद होते हैं । इसी प्रकार और द्रव्योंके भी सन्देह हैं। जो वे समान क्रिया वाले हों, तो उनके एकसे निर्वचन करना, यदि भिन्न भिन्न कर्म या क्रिया वाले होंतो,भिन्न भिन्न निर्वचन करना। प्रयोजन के अनुसार निर्वचन करना चाहिये।