निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( १७६ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० “तव प्रयाजा अनुयाजाश्च केवल ऊर्जस्वन्तो हविषः सन्तु भागाः । तवाग्ने यज्ञोऽयमस्तु सर्व- स्तुभ्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रः ॥” ( ऋ० सं० ८, १, ११, ३ ) “आग्नेया वै प्रयाजा आग्नेया अनुयाजाः” इति च ब्राह्मणम् । ( ख ) छन्दोदेवताः-इत्यपरम् । “छन्दांसि वै प्रयाजाश्छन्दांस्यनुयाजाः” इति च ब्राह्मणम् । (ग) ऋतुदेवताः- इत्यपरम्। “ऋतवो वै प्रयाजा ऋतवोऽनुयाजाः-” इति च ब्राह्मणम् ॥ (घ) पशुदेवताः-इत्यपरम् । “पशवो वै प्रयाजाः पशवोऽनुयाजाः”- इति च ब्राह्मणम् । (ङ) प्राणदेवताः-इत्यपरम् । “प्राणा वै प्रयाजाः प्राणा वा अनुयाजाः” इति च ब्राह्मणम् । (च) आत्मदेवताः- इत्यपरम् । “आत्मा वै प्रया- जाः आत्मा वा अनुयाजाः” इति च ब्राह्मणम् । आग्नेयाः- इति तु स्थितिः । भक्तिमात्रमितरत् ॥ किमर्थ पुनरिदमुच्यते ? “यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात् तां मनसा
हिन्दी निरुक्त ( १८० ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० ध्यायेत् वषट् करिष्यन्"-इति ह विज्ञायते । इति इमानि एकादश आप्रीसूक्तानि । तेषां- वासिष्ठम्, आत्रेयं, वाध्यश्वं, गार्त्समदम्, इति नराशंसवन्ति । मैधातिथं, दैर्घतमसं, प्रैषिकम्, इति उभयवन्ति । अतोऽन्यानि तनूनपात्वन्ति तनूनपात्वन्ति ॥७(२२)॥ इति अष्टमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥८,३ अर्थः- प्रयाज और अनुयाजों के मत भेद से भिन्न ३ प्रकार के देवता हैं, उन्हीं को क्रमपूर्वक दिखाते हैं, तहां पहिले कोई आचार्यों का मत है कि-प्रयाज और अनुयाज अग्नि देव के हैं-उनका अग्नि देवता है। क्योंकि- "आग्नेया वै प्रयाजा आग्नेया अनुयाजाः" अर्थात्- प्रयाजों का अग्नि देवता अनुयाजों का अग्नि देवता है । यह ब्राह्मण प्रमाण है । इसके अतिरिक्त दो ऋचाएं और नीचे दी जाती हैं, जिनमें सौचीक अग्नि और विश्वेदेवों के संवाद से यही बात सिद्ध होती है । सौचीक अग्नि से विश्वे देवों ने कहा कि- 'आ हमारे हविः ला' उसने उनसे कहा कि-'मेरा यज्ञमें भाग हो' फिर उन्हों ने उससे कहा कि-वर मांग, इस के अनन्तर वह सौ- चीक अग्नि विश्वेदेवों से इस ऋचा से वर लेता है- "प्रयाजान्मे०" 'देवा !' हे विश्वे देवो ! 'मे' मुझे 'केवलान्' निराले (दूसरे देवता के सम्बन्ध से रहित) प्रयाज
हिन्दी निरुक्त ( १८१ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० होमों को 'दत्त' तुम दो । 'अनुयाजान्-च' और अनुयाज होमों को दो । 'ऊर्जस्वन्तम्' सारभूत 'हविषः' हवि के 'भागम्' भाग को दो । 'अपां ( सारं ) घृतं च' और जलों के सारभूत घृत को दो । 'ओषधीनां पुरुषं-च' और ओषधियों के सार पुरोडाश को दो । 'अग्नेः-च' ( मम ) और मुझ अग्नि का 'दीर्घम्' बड़ा 'आयुः' आयु 'अस्तु' हो [ किन्तु जिस प्रकार मेरे पहिले भाई हविः को वहन करते हुए-देवताओं के अर्थ हविः को ढोते हुए वषट्कार मन्त्र से छिन्न होकर मर गए, वैसे मैं न मरूं ] ॥ इसके उत्तर में विश्वे देवताओं ने उसे इस दूसरी ऋचा से वर दिये हैं - “तव प्रयाजाः०” हे 'अग्ने !' अग्निदेव ! 'तव प्रया- जाः सन्तु' तेरे प्रयाज हों, 'अनुयाजाश्च केवलाः' और नि- राले अनुयाज हों, 'ऊर्जस्वन्तः हविषः भागाः सन्तु' और सारभूत हविः के भाग हों, हे अग्ने ! और क्या ? 'अयम् सर्वः यज्ञः तव अस्तु' यह सारा यज्ञ तेरा हो, 'चतस्रः प्रदिशः तुभ्यं नमन्ताम्' चारों दिशाएं तेरे लिये झुकें, [ जो कुछ तू चाहता है, सब तुझे प्राप्त हो ? इस प्रकार उपर्युक्त ब्राह्मण और ऋचाओं के अक्षरार्थ से यह स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है कि-प्रयाज और अनुयाज अग्नि देवता के हैं ॥ (ख) छन्द देवताओं के हैं, ऐसा और मत है । क्यों कि- “छन्दांसि०” अर्थात्- छन्द प्रयाज हैं और छन्द अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है । (ग) ऋतु देवताओं के हैं, यह और मत है । क्यों कि- “ऋतवो वै०” अर्थात्- ऋतु प्रयाज हैं और ऋतु अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है ।
हिन्दी निरुक्त ( १८२ ) ८ अ० ३पा० ७खं (घ) पशु देवताओं के हैं, यह और मत है। क्यों कि- “पशवोवै०” अर्थात्- पशु प्रयाज हैं और पशु अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है। (ङ) प्राण देवताओं के हैं, यह और मत है। क्यों कि- “प्राणावै०” अर्थात्- प्राण प्रयाज हैं और प्राण अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है। (च) आत्मा देवता के हैं, यह और मत है। क्यों कि- “आत्मावै” आत्मा प्रयाज हैं और आत्मा अनुयाज हैं, यह ब्राह्मण वाक्य है। प्रयाज और अनुयाजों का अग्नि ही देवता है, यह स्थिति = सिद्धान्त है। और सब भागमात्र- अंशमात्र-गौण है। क्यों फिर यह कहाजाता है ! “यस्यै०” 'जिस देवता के अर्थ हविः ग्रहण किया हुआ हो, वषट् कार करने वाला होता ऋत्विज् उसको देवतामनसे ध्यान करे यह ब्राह्मण ग्रन्थ में जाना जाता है। ये ग्यारह आप्री सूक्त है। उन में 'वासिष्ठ = वसिष्ठ का आत्रेय = अत्रिका, वाध्र्यश्व = वध्र्यश्व का, गार्त्समद् = गृत्समद् का, ये चार सूक्त नाराशंस वाले होते हैं। मेधातिथ = मेधातिथि का दैर्घतमस = दीर्घतमा का और प्रैषिक = प्रैष ग्रन्थ का सूक्त ये तीन उभयवान् = नराशंस और तनून- पात् दोनो देवताओंवाले होते हैं। इनसे अन्य तनूनपात् देवता वाले हैं = ७(२२) ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते अष्टमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ८,३॥
हिन्दी निरुक्त \qquad ( १८३ ) \qquad ८ अ० ३ पा० ७ खं०
व्याख्या ।
द्वितीय और तृतीयपाद ।
आप्री देवताः ।
इस अध्याय के इन अवशिष्ट दो पादों में आप्री देवता ओं की ही भाष्यकारने व्याख्या पूरी की है। इद्ध्मः (१) तनूनपात् (२) नराशंसः (४) ईलः (५) बर्हिः (६) द्वारः (७) उषासानक्ता (८) दैव्याहोतारा (६) तिस्रो देवीः (१०) त्वष्टा [११] वनस्पतिः (१२) स्वाहाकृतयः (१३) इन बारह देवताओं की आप्रीसंज्ञा है। इसके अतिरिक्त इन देवताओं की जो ऋचाएं हैं, उनको भी 'आप्री' नाम से बोधित करते हैं। जैसे कि- "आप्रीभिराप्रीणाति" (ऐ० ब्रा० अ० ६ खं०४) इस ऐतरेय श्रुति में 'आप्री' शब्द इन देवताओं की ऋचाओं के लिये ही आया है। इन आप्री देवताओं को प्रयाज देवता भी कहते हैं। क्यों कि- ये ही देवता प्रायः यज्ञों में प्रयाज होमों के देवता होते हैं। ऋ- ग्वेद की मन्त्र संहिता में जहां इनके मन्त्र आते हैं तो वे प्रायः एक साथ तथा यथोक्त क्रम से ही आते हैं। इनकी स्तुतियों के मन्त्र समूह आप्रीसूक्त कहलाते हैं तथा मन्त्र संहिता में वे दश स्थानों में आते हैं, अथवा यों समझिये कि इन देवताओं के ऋग्वेद की मन्त्र संहिता में दश (१०) सूक्त (आप्रीसूक्त) हैं, जिस क्रम से निघण्टु में इनके इध्म आदि नाम पढे हैं, उसी क्रम से इनके मन्त्र भी दशों स्थानों में आते हैं, यह नहीं कि- वे ही मन्त्र फिर २ आते हैं, बलकि— यों कहिये कि- वे सब भिन्न २ प्रकार के हैं और भिन्न २
हिन्दी निरुक्त ( १०४ ) द० अ० ३ पा० ७ खं०
ही ऋषि उनके द्रष्टा या साक्षात्कर्ता हैं। हां इन सूक्तों में तनून्पात् और नराशंस देवताओं को लेकर तीन भेद होगये है। जैसे किसी ऋषिको तनूनपात् देवता का ही मन्त्र दिखाई दिया, किन्तु नराशंस देवता का नहीं, सुतराम् उसको ग्यारह (११) ही ऋचाओं का सूक्त दिखाई दिया और वह नराशंस रहित है। एवम् किसी ऋषि को आप्री देवताओं के अन्य मन्त्रों के साथ नराशंस देवता का ही मन्त्र दृष्टिगोचर हुआ, किन्तु तनूनपात् का नहीं। वह सूक्त तनूनपात् रहित ग्यारह (११) ऋचाओं का है। और इसी प्रकार किसी ऋषि को दोनों ही तनूनपात् तथा नराशंस देवताओं के मन्त्र दिखाई दिये, अतः वह सूक्त बारह ऋचाओं का है। इस प्रकार इन सूक्तों में तीन भेद होगये। अर्थात्- (१) कोई तनूनपात् वाले हैं [२] कोई नराशंस वाले हैं और (३) कोई तनूनपात् तथा नराशंस दोनों देवताओं वाले हैं। यह पहिले कहा जाचुका है कि- ऋग्वेद मन्त्र संहिता में दश स्थानों में दश आप्रीसूक्त आये हैं, इनके अतिरिक्त इनका एक ग्यारहवां प्रैषसूक्त और है, जो उक्त मन्त्र संहिता के परिशिष्ट के प्रैषाध्याय में पठित है। यह सूक्त १३ मन्त्रों का है और वह प्रयाज प्रैष नामसे प्रसिद्ध है। इस सूक्त में १३वां मन्त्र इन्द्र देवता का है, जो आप्री देवताओं से पृथक् है। इसी प्रकार मन्त्र संहिता में भी दूसरा आप्रीसूक्त १३ ऋचा ओं का है और उसमें भी १३ वीं ऋचा इन्द्र देवता की ही है, तथा वह आप्री देवता भी नहीं है। इस रीति से सब मिला कर ग्यारह (११) आप्री सूक्त हैं। अतएव भगवान् यास्क इस पूर्वोक्त अर्थसमूह को संक्षेप से यों कहते हैं—
हिन्दी निरुक्त ( १८५ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० “इति- इमानि- एकादश- आप्रीसूक्तानि। तेषां वासिष्ठम्, आत्रेयं, वाध्यश्वं, गार्त्समदम्- इति नाराशंसवन्ति। मैधातिथं, दैर्घतमसं, प्रैषिकम्- इति- उभयवन्ति। अतोऽन्यानि तनूनपात्वन्ति तनूनपात्वन्ति”(नि०अ०८पा०३ खं०७) अर्थात्-ये ग्यारह आप्री सूक्त हैं। उन में- (१) वसिष्ठ ऋषि का सूक्त, (२) अत्रि ऋषि का सूक्त, (३) वध्यश्व ऋषि का सूक्त (४) गृत्समद् ऋषि का सूक्त,-ये चार सूक्त नाराशंस ] वाले हैं। (१) मेधातिथि का सूक्त, (२) दीर्घतमस् का सूक्त, (३) प्रैष सम्बन्धि ( परिशिष्ट वाला ) सूक्त ये तीन दोनों (तनूनपात् तथा नराशंस) देवताओं वाले हैं। [ १-४ ] इन से अन्य चार सूक्त तनूनपात् देवताओं वाले हैं। इन सब के परिज्ञान के अर्थ हम एक संक्षिप्त चित्र देते हैं, उससे पाठकों के प्रत्यक्ष में पूर्वोक्त सब अर्थ भले प्रकार से आजायगा । होतृ पठनीय १० सूक्त और उनके ऋषि आदि। (१) सुसमिद्धोन इत्यादि (१-१-२४) सूक्त १२ ऋचा- ओं का है। इसका काण्व मेधातिथि ऋषि और गायत्री छन्द है। इन सब ऋचाओं के क्रम से इध्मः, वा समिद्धोऽ- ग्निः आदि १२ देवता हैं। और पशु कर्म में कण्व गोत्रों का
हिन्दी निरुक्त ( १८६ ) ८ अ० ३पा० ७खं आप्री सूक्त है । अर्थात्-उनके पशु कर्म में प्रयाज होमो' में होता इन मन्त्रो' को याज्या करता है ( पढता है ) ॥ ( २ ) समिद्धोऽग्न इत्यादि ( २-२-१०) सूक्त १३ ऋचाओं का है । इसका औचथ्य दीर्घतमा ऋषि और अनु- ष्टुप् छन्द है। यहां प्रथम ऋचा का समिध् (१) नामक अग्नि अथवा समिद्ध अग्नि देवता है । और द्वितीयादि ऋचाओं के तनूनपात् ( २ ), नराशंसः (३), इलः (४), बर्हिः (५), देवी- द्वारः (६), उषासानक्ता (७), दैव्यौ होतारौ प्रचेतसौ (८), ति- स्रो देव्यः ( ६ )-सरस्वतीलाभारत्यः, त्वष्टा (१०) वनस्पतिः ( ११ ) स्वाहाकृतिः ( १२ ),- ये क्रम से देवता हैं । अन्तिम ( १३वीं ) ऋचा का इन्द्र देवता है । 'देवीर्द्वारः' ये बहुत देवता हैं। उषासानक्ता और दैव्यौ होतारौ प्रचेतसौ, दो देवता हैं, तथा तिस्रो देव्यः ( तीन देवियें ) इसी की व्याख्या सरस्वती, इला और भारती, यह है । यहां एक स्थान में अनेक देवता भी एक देवता के रूप में समझे जाते हैं । यहां 'इध्म' (इन्धन) और 'तनूनपात्' ( आज्य = घृत ) आदि यज्ञ के अवयव या साधनरूप वस्तुओं से यज्ञ ही उक्त होता है, इस कारण उनके मन्त्रों का यज्ञ ही देवता है,-यह कात्थक्य आचार्य्य का मत है। समिध् आदि शब्दों से अग्नि ही उक्त होता है, अतः वही देवता है,- यह शाकपूर्णि का मत है । ( सा० भा० ) पशु कर्म में अङ्गिरो गोत्रोत्पन्नों का यह आप्रीसूक्त है ॥ ( ३ ) समिद्धोऽअद्य-इत्यादि ( अ २ अ०५ व८ ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका अगस्त्य ऋषि और गायत्री छन्द है। इसकी ११ ऋचाओं के क्रम से समिद्ध अग्नि और तनू-
हिन्दी निरुक्त ( १८७ ) ८ अ० ३ पा० ७ क नपात् आदि नराशंस वर्जित ग्यारह ( ११ ) देवता हैं, पशु- कर्म में अगस्त्य के गोत्रों का एकादश प्रयाज रूप यह आप्री सूक्त है ॥ ( ४ ) समिद्धोऽग्निः-इत्यादि ( अ० २ अ० ५ व २२ ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका गृत्समद ( शौनक ) ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । ७वीं ऋक् जगती छन्द है । समिद्ध अग्नि और तनूनपात्-वर्जित नराशंस आदि ११ देवता हैं । पशु कर्म में शुनकों का यह आप्री सूक्त है ॥ ( ५ ) समिसमित्-इत्यादि ( अ०२अ०८व२२ ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका विश्वामित्र ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । इध्म आदि स्वाहाकृतिपर्यन्त नराशंसवर्जित क्रम से ११ देवता हैं । पशु कर्म में विश्वामित्र गोत्रों का यह आप्रीसूक्त है । इस सूक्त की 'तनः'-यह ऋचा दर्श पौर्ण- मास यागों में पत्नीसंयाज होमों में त्वष्टा देवता की याज्या है । तथा यही ऋचा त्वष्टा देवता के पशु में पुरोडाश की अनुवाक्या है ॥ ( ६ ) सुसमिद्धाय-इत्यादि ( अ०३अ०४व२० ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका आत्रेय वसुश्रुत ऋषि और गा- यत्री छन्द है । इध्म आदि तनूनपात्-वर्जित ११ देवता हैं । पशु में अत्रिगोत्रों का यह आप्री सूक्त है । (७) जुषस्वनः-इत्यादि ( अ०६अ०७व२४ ) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका वसिष्ठ ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है। समिद्ध आदि तनूनपात्-वर्जित क्रम से प्रत्येक ऋचाओं के ११ देवता हैं । पशु में वसिष्ठ गोत्रों का यह आप्री सूक्त है ।
हिन्दी निरुक्त ( १८८ ) ८ अ० ३ पा० ७ ख० तथा प्रथम ऋचा पत्नीसंयाज में त्वष्टा के याग की याज्या और त्वष्टा के पशु में पुरोडाश की अनुवाक्या भी है ॥ (८) समिद्ध-इत्यादि (अ० ६ अ० ७ व २४) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका काश्यप असित अथवा देवल ऋषि ८वीं ६वीं १०वीं ११वीं इन चार ऋचाओं को अनुष्टुप् तथा शेष ७ ऋचाओं का गायत्री छन्द है । समिद्ध आदि नराशंस वर्जित प्रत्येक ऋचा के क्रम से ११ देवता हैं काश्यपों का पशु में यह आप्री सूक्त है ॥ (६) इमाम्-इत्यादि (अ० ८ अ० २ व २१) सूक्त ११ ऋचाओं का है । वाध्यश्व सुमित्र ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । समिध् आदि तनूनपात्-वर्जित क्रम से ऋचाओं के देवता हैं, वध्यश्व गोत्रों का पशु में यह आप्री सूक्त है ॥ (१०) समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे-इत्यादि (अ० ८ अ० ६ व ८) सूक्त ११ ऋचाओं का है । इसका भार्गव जमदग्नि अथवा उसका पुत्र राम जो परशुराम नाम से प्रसिद्ध है ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द है । समिध् आदि नराशंस वर्जित ११ देवता हैं । पशु में जामदग्न्यों का यह आप्रीसूक्त है ॥ (११) मैत्रावरुण पठनीय ११वां आप्री प्रैष सूक्त देवता मन्त्र (१) इध्मः । होतायक्षदग्नि समिधा सुसमिधा० वेत्वाज्यस्य होतर्यज ॥१॥ (२) तनूनपात् । होतायक्षत्तनूनपातमदितेर्गर्भे० वेत्वा० ॥२॥ (३) नराशंसः । होतायक्षन्नराशंसं नृशंसं नृः प्रशस्तं० वे- त्वा० ॥ ३ ॥
हिन्दी निरुक्त ( १८६ ) ८ अ० ३ पा० खं० ७ (४) ईलः । होतायक्षदग्निमीलींलितो०वेत्वा० ॥४॥ (५) बर्हिः । होतायक्षद्बर्हिः सुष्टरीमोर्णम्रदा० वेत्वों० ॥५॥ (६) द्वारः । होतायक्षहुँ ॠष्वाः० व्यंत्व० ॥६॥ (७) उषासानक्ता । होतायक्षदुषासानक्ता० वीतामाज्य- स्यः ॥ ७ ॥ (८) दैव्याहोतार। । होतायक्षदैव्याहोतार। ०वीतामाज्यस्य०॥८ (६) तिस्रोदेवीः । होतायक्षत्तिस्रोदेवीः२पसा० व्यन्त्वाज्य- स्य० ॥ ९ ॥ (१०) त्वष्टा । होतायक्षरैत्वष्टारमचिष्टमपाकं० वेत्वाज्यस्य०॥१० (११) वनस्पतिः । होतायक्षद्वनस्पतिमुपावस्रक्ष० वेत्वाज्य- स्य० ॥११॥ (१२) स्वाहाकृतयः । होतायक्षदग्निस्वाहाज्यस्यस्वाहामेदसः स्वाहा स्तोकानां स्वाहा स्वाहाकृ- तीनां स्वाहा० व्यंतु होतर्यज ॥१२॥ आप्री सूक्तों के विनियोग की व्यवस्था ॥ १ मकल्प । ,,समिद्धो अग्नि रिति शुनकानां जुषस्वनः समिधमिति वसिष्ठानां समिद्धो अद्येति सर्वेषाम्" (आश्व० ३,२) (१) "समिद्धो अग्निः" (ऋ० २- ऋ०५- व २२) यह सूक्त गृत्समद् या शुनकों के पशु कर्म में आप्री सूक्त होगा
हिन्दी निरुक्त ( १६७ ) ८ अ० ३. पा० ७ खं०
अर्थात् शुनक गोत्र यजमानों के पशु कर्म में एकादश प्रयाज देवताओं के यजन में होता- ऋत्विज् इस सूक्त की ग्यारह (११) ऋचाओं को याज्या करेगा । एक २ देवता के लिये एक २ ऋचा को क्रम से पढेगा । यह सूक्त पूर्वोक्त आप्री सूक्तों में ४ था है ॥ (२) “जुषस्वनः समिधम्” (ऋ० ३ अ० ८ व २०) यह सूक्त वसिष्ठगोत्रों का पशु कर्म में आप्री सूक्त होगा । यह दश आप्री सूक्तों में ७ वां है ॥ (३) “समिधो अद्य मनुषोदुरोणे” (ऋ०८ अ०६ व ८) यह सूक्त शुनकों और वसिष्ठों के अतिरिक्त सभी गोत्रों के लिये पशु कर्म में आप्री सूक्त होगा। दश आप्री सूक्तों में यह १० म है ॥ इस कल्प (विधान) में प्रयाज देवताओं के यजन में पूर्वो- क्त ऋग्वेद मन्त्र संहिता के दश (१०) आप्री सूक्तोंमें से तीन (३) आप्री सूक्तों का ही उपयोग होता है और सात (७) आप्री सूक्त रह जाते हैं, तथा इन तीन ही सूक्तों से सकल गोत्रों के,अनुष्ठान का निर्वाह होजाता है। क्यों कि- शुनकों के लिये चौथा सूक्त है; वसिष्ठों के लिये (७) सातवां सूक्त है । और सभी गोत्रों के लिये दशम सूक्त विहित हुआ है । अतः कोई गोत्र भी आप्री सूक्त से,रहित नहीं रहता है । किन्तु- जो यह दशम सूक्त अन्य सब गोत्रों के लिये विहित हुआ है उसमें तनूनपात् देवता की ऋचा है । नरा- शंस देवता की नहीं । इससे जो गोत्र नराशंस याजी हैं, अथवा उभययाजी हैं
हिन्दी निरुक्त (१६१) ८ अ० ३ पा० ७ खं० उनके लिये नराशंस दैवत की ऋचा ;अपेक्षित' होती है। वह कहां से लीजाय ' इस प्रश्न के उत्तर में आश्वलायन सूत्र के वृत्तिकार नारायण वासिष्ठी नाराशंसी ऋचा के ग्रहण को बताते हैं। वसिष्ठ का "जुषस्वनः" (अ०५ अ० २-व १ ) यह पूर्वोक्त सातवां सूक्त है, उसी से वह ऋचा लेनी चाहिये। २ यकल्प । "यथ ऋषि वा" (आश्व०३-२) जो जिस यजमान का ऋषि हो उसी ऋषि का उसको आप्री सूक्त लेना चाहिये। इसी पक्षमें भगवान् शौनक आप्री विवेक के लिए ही यह श्लोक देते हैं। कण्वोऽङ्गिरोगस्त्यशुनका विश्वामित्रोऽत्रिरेवच। वसिष्ठः कश्यपोवाध्युर्वा जमदग्नि रथोत्तमः” अर्थात् दश सूक्तों में- (१) कण्व गोत्रों का "सुसमिद्धो न आवह" [अ०१ अ०१- व २४) यह प्रथम आप्री सूक्त है ॥ [२] कण्ववर्जित अङ्गिरस् गोत्रों का "समिद्धो- अग्न आवह" (अ०२ अ०२ व १०) यह दूसरा आप्री सूक्त है ॥ (३) अगस्त्य गोत्रों का "समिद्धो अद्य राजसि" (अ०२ अ०५ व ८) यह तीसरा आप्री सूक्त है ॥ (४) गृत्समद या शुनकों का 'समिद्धो अग्निर्न'
हिन्दी निरुक्त ( १९२ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० हितः पृथिव्याम्” (अ०२ अ०५ व २२-) यह चतुर्थ आप्री सूक्त है ॥ (५) विश्वामित्र गोत्रों का “समित्समित्सुमनाः” (अ०२ अ०८ व२२) यह ५वां आप्री सूक्त है ॥ (६) आत्रेय वसुश्रुत गोत्रों का सुसमिद्धाय शोचिषे” (अ०३ अ०८ व१०) यह ६ठा आप्री सूक्त है ॥ [७] वसिष्ठ गोत्रों का “जुषस्वनःसमिधमग्नेअद्य” (अ०५ अ०१ व१ ) यह सातवां आप्री सूक्त है ॥ [८] काश्यप सित गोत्रों का “समिद्धोविश्वतस्पतिः” (अ०६ अ०७ व२४) यह आठवां आप्री सूक्त है ॥ (९) वाध्यश्व सुमित्र गोत्रों का “इमा॑मे अग्ने जुष- स्वेति” (अ०२ अ०२ व२१) यह ९वां आप्री सूक्त है ॥ (१०) शुनकों और वाध्यश्वों को छोड़ कर अन्य सबभृगु गोत्रों का “समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे” [अ०८ अ०६ व८) यह १० वा आप्रीसूक्त है ॥ ३ यकल्प विषय विशेष में । “प्राजापत्ये तु जामदग्न्यः सर्वेषाम्” (आश्वश्रौ०-३-२) १- प्रजापति देवता के पशु में सभी गोत्रों के लिये “समिद्धो अद्यमनुषो दुरोणे” (अ०८ अ०६- व.) यही एक आप्री सूक्त होता है । इस पक्षमें प्रथम और द्विती- य कल्प की विधियें बाधक नहीं होती हैं । इससे वसिष्ठ और शुनक आदि के लिये भी पूर्वोक्त आप्री सूक्तों की कोई आपत्ति न उठानी चाहिये ॥
हिन्दी निरुक्त ( १९३ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० यास्कने दशम सूक्त ही निरुक्त में क्यों लिया ? यास्क मुनि स्वयम् “इति इमानि एकादश आप्री- सूक्तानि” ऐसा उल्लेख करके यहां पर ग्यारह (११) आप्री सूक्तों को स्मरण कर रहे हैं, तथा उनमें से संहितास्थ दशम आप्री सूक्त को ही यहाँ पर इध्म आदि नामों के लिये निगम देते हैं। इस कारण यहां ऐसा प्रश्न स्वतः ही उत्पन्न होता है कि-जब सभी सूक्तों में इध्म आदि देवताओं के निगम विद्यमान हैं, तो अन्तिम सूक्त को ही वे क्यों लेते हैं इसका उत्तर हमें यही प्रतीत होता है, कि संहितास्थ अन्य सब सूक्त सब गोत्रों के लिये उपयुक्त नहीं होते किन्तु वे एक- एक गोत्र के लिए ही प्रयोजनीय होते हैं अतः सर्व प्रसिद्ध होने से यही सूक्त आचार्य ने उल्लिखित किया है। प्रैष सूक्त यद्यपि साधारण है तथापि जैसे (संहितास्थ) निगम प्रायः यहां दिये जाते हैं, उनसे वह विजातीय है, उसका देना भी उन्होंने उचित नहीं समझा। अथवा प्रैषसूक्त में जितने मन्त्र हैं उन सब में प्रधान देवता के नाम के अति- रिक्त प्रायः सब शब्द समान ही आते हैं इस लिए उन सब को उदाहृत करने से प्रति मन्त्र में छात्रों को विलक्षण २ अर्थों का लाभ न होगा, निर्वचन की सामग्री में अल्पता होगी और यहां पर व्यर्थ शब्दों का गौरव होगा। यही सब सोच विचार कर आचार्य ने संहितास्थ दशम सूक्त ही यहां पर दिया है॥ “प्रैष सूक्त और दश सूक्तों का सम्बन्ध” पशु कर्म में जहां ग्यारह प्रयाज होम होते हैं, वहां प्रथम
हिन्दी निरुक्त (१६५) ८ अ० ३ पा० ७ खंड
के अर्थ “प्रेष्य” एतावन्मात्र ही मन्त्र पढ़ेगा किन्तु प्रथम मन्त्र के समान देवता का चतुर्थ्यन्त नाम उसके पूर्व में उच्चारण नहीं करेगा, यह विशेष विधि “आपस्तम्ब” महर्षि कहते हैं- “समिद्भ्यः प्रेष्येति प्रथमं संप्रष्यति प्रेष्य प्रेष्ये- तीतरान् इति” जामदग्न्य सूक्त में अन्य ऋचाएं और उनका प्रयोजन यास्काचार्य ने यहां आप्री देवताओं के निर्वचन प्रकरण में दश आप्रीसूक्तों में से जामदग्न्य ही आप्रीसूक्त दिया है। यह सूक्त ऋग्वेद संहिता में अन्य सब आप्रीसूक्तों में अन्तिम है। इसके चुनाव का प्रयोजन पहिले दिया जा चुका है, अब उसके बीच २ में कुछ और ऋचाएं भी दी गई हैं उनका प्रयोजन भी ज्ञातव्य है, इसी से नीचे उनका प्रयोजन कहा जाता है -- (१) जिस प्रकार आचार्य ने सर्व प्रधान देवताओं के व्याख्यान के अनुरोध से सम्पूर्ण इध्म आदि आप्री देवताओं के नामों का अपने निघण्टु ग्रन्थ में संग्रह किया है, तथा जिस प्रकार सर्वगोत्री याजकों के अनुष्ठानोपयोग के अनुरोध से उन्होंने जामदग्न्य आप्रीसूक्त ही निगम स्थान में रखा है, उसी प्रकार क्रमागत नराशंस देवता के निर्वचन के अनु- रोध से उन्हें नराशंस देवता का भी निगम देना योग्य है। क्योंकि प्रकृत जामदग्न्य सूक्त में नराशंस देवता की ऋचा
हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० का अभाव है, इससे उन्होंने वसिष्ठगोत्रों के “जुषस्वनः” (अ० ५ क्र० २ व १ ) आप्री सूक्त से उक्त देवता की ऋचा का यहां पर समावेश किया । यहां पर आचार्य के इस नारा- शंसी ऋचा के चुनाव का यह और भी महत्त्व है कि अन्य पांच सूक्तों में अन्य २ पांच नाराशंसी ऋचाओं के होने पर भी आप वासिष्ठी नाराशंसी ऋचा का ही आहरण करते हैं इस में विधि का अनुग्रह भी होता है। अर्थात्- जब नराशंस- याजी कोई गोत्र जामदग्न्य सूक्त की आप्री सूक्त करते हैं, तब उन्हें विधि के अनुसार वासिष्ठी नाराशंसी ही लेनी पड़ती है, किन्तु अन्य नाराशंसी नहीं। यद्यपि यहां निर्व- चन के प्रयोजन से वासिष्ठी तथा अन्य नाराशंसी में कोई फल भेद नहीं, तथापि एक कार्य के साथ एक ही यत्न से आवश्यक कार्योन्तर की सिद्धि भी की गई है, यह आचार्य के विचार कौशल का महत्त्व ही है। इस वासिष्ठी नाराशंसी ऋचा को यहां समावेश करने के सम्बन्ध में नारायण वृत्ति- कार खण्डसूत्र ( ३, २ ) पर यों कहते हैं, कि- “तत्रात्र्यादीनां नाराशंस्थेव वासिष्ठ्या हर्तव्या, प्रैष सालिङ्गाभिरित्युक्तत्वात्” अर्थात्- अत्रि आदिकों को जब प्रथम कल्प या तृतीय कल्प के अनुसार जामदग्न्य आप्री सूक्त लेना होगा, तब वे नाराशंस याजी होने के कारण नाराशंसी ऋचाकी अपेक्षा करेंगे, तथा प्रकृत सूक्त में वह ऋचा है नहीं, अतः उन्हें और कहीं से नाराशंसी ऋक् लानी होगी, उस अवस्था में नारायण कहते हैं कि उन्हें वासिष्ठी (वसिष्ठ सूक्त अ० ५- अ० २ व १ से) नाराशंसी ही लानी चाहिये, क्यों कि- सूत्र-
हिन्दी निरुक्त ( १६७ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० कार “होता यजत्याप्रीभिः प्रैषसलिङ्गाभिः” (आश्व० ३, २) इस सूत्र में कहते हैं कि— होता को यजन में ऐसी आप्री ऋचाएं लेनी चाहिये, जो मैत्रावरुण के प्रैष मन्त्रों के समानलिङ्ग हों— “होता यक्षद् ०” इत्यादि मन्त्र जिस क्रमसे जिस २ देवता के मैत्रा वरुण के द्वारा पठित हों, उसी क्रम से उस २ देवता की आप्री संज्ञकयाज्याकोवह पढे। नारायण समझते हैं कि- व्याकरण में जिस प्रकार “स्थानेऽन्तरतमः” (पा० सू ) सूत्र में जितना ही स्थानी और आदेशका सादृश्य मिले, उतना ही लेना चाहिये, उसी प्रकार जहां तक हो, आप्री मन्त्र प्रैष मन्त्र के सदृश हों ।अभिप्राय केअनुसार अन्य नारा- शंसी ऋचाओं की अपेक्षा वासिष्ठी नाराशंसी ऋचा में नराशंस के प्रैष मन्त्र का अधिक सादृश्य है, इससे वासिष्ठीनाराशंसी काही आवाप (समावेश) करना चाहिये । इस अर्थ में नारायण वृत्तिकार के अभिमत के सहायक यास्क मुनि भीबनते हैं, क्यों कि— उन्हों ने भी जामदग्न्य आप्री सूक्त में वासि- ष्ठी नाराशंसी ऋचा का आहरण किया है । यद्यपि “प्रैष सलिङ्गाभिः” (आ० ३, २) इसमें देवता और पाठ क्रम दोका सादृश्य तो स्थूलतर है ही, जिसके अनुसार प्रैष मन्त्रों और आप्री मन्त्रों का क्रम अनुष्ठान में समान रहता है । किन्तु ये दो सादृश्य वासिष्ठी नाराशंसी के समान अन्य २ आप्री नाराशंसियों में भी हैं । वासिष्ठी में जो अन्य ऋचाओं की अपेक्षा अधिक सादृश्य है, उसके लक्षित करने के लिये हम नीचे प्रैष मन्त्र तथा सब नाराशंसी आप्री ऋचाओं को स्वरूपतः उद्धृत करदेते हैं, प्रज्ञाता पुरुष उन्हें प्रत्यक्ष करके सादृश्या कनिरूपणभी करसकेंगे—
हिन्दी निरुक्त ( १६८ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० (१) नराशंस का \ “होता यक्षन्नराशंसं नृशंसं नॄंः प्रैषमन्त्र { प्रणेतं । गोभिर्वैपावान्त्स्याद्वारैः { शक्तीवान्प्रथैः प्रथमयावा हिरण्यै- { श्रन्द्री वेत्वाज्यस्य होतर्यज” ।३। (२) काण्व मेधा- \ “नराशंसमिह प्रियमस्मिन्यज्ञऽ तिथि उभययाजी { उपह्वये । मधुजिह्वं हविष्कृतम्” । की नाराशंसी { (अ०१अ०१व२४) आप्री / (३) औचथ्य दीर्घ- \ “शुचिः पावकोऽअद्भुतो मध्वायज्ञं तमा उभययाजी { मिमिक्षति। नराशंस स्त्रिरादिवो की नाराशंसी { देवो देवेषु यज्ञियः।(अ०२अ०२व१०) आप्री / (४) गृत्समद शु- \ नराशंसः प्रतिधा मान्यंजन्र्तिस्रो नक नराशंस याजी { दिवः प्रतिमन्हा स्वर्त्तिः। घृतप्रुषा की आप्री { मनसा हव्यमुंदन्मूर्धन्यज्ञस्य समनक्तु देवान्। (अ०२अ०५व२२) (५) आत्रेय वसु- \ नराशंसः सुषूदतीमं यज्ञमदाभ्यः श्रुत नराशंस- { कवि र्हिं मधुहस्त्यः ॥ (अ० ३ याजी की आप्री / अ० ८ व २० ) (६) मैत्रावरुणि \ नराशंसस्य महिमानमेषा मुपस्तो- वसिष्ठ नराशंस- { षाम यजतस्ययज्ञैः। ये सुक्रतवः याजी की आप्री { शुचयो धियंधाः स्वदन्ति देवाऽ / उभयानिहव्या। (अ०५अ०२व१)
हिन्दी निरुक्त ( १६६ ) ८ अ० ३ पा० ७ खं० $(७) वाध्यश्व सु- मित्र नराशंस- याजी की आप्री$ $आ देवानां मन्मथा वोह्य१स्तु नरा- शंसो विश्वरूपेभिरश्वैः। ऋतस्य पथा नमसामियेधो देवेभ्यो देवतमः सुषदत् ॥ (अ०८अ०२व२१)$ (२) 'त्वष्टा' १० वां आप्री देवता है। उसके निर्वचन में जामदग्न्य सूक्त की "यहमे०" (अ० ८ अ० ६ व० ६) जो यह ऋचा दी है। उसमें त्वष्टा का नामोल्लेख यद्यपि है तथापि उसके स्वरूप का निरुपण कुछ भी नहीं, है अतः उसके स्वरूप बोधन के लिये दूसरी ऋचा (अ० १ अ० ७ व० १) का उल्लेख आचार्य को आवश्यक हुआ। इस ऋचा में प्रकाशन और ऊर्ध्वज्वलन पार्थिव अग्नि के स्पष्ट बोधक हैं। (३) वनस्पति आप्री देवता का दूसरा, तीसरा और चौथा निगम। क्यों कि- वनस्पति कात्थक्य के मत से यूप और शाकपूर्णि के मत में अग्नि है, तथा जामदग्न्य आप्री सूक्त की ऋचा जो प्रथम निगम के स्थान में दी है, वह किसी एक मत को भी पुष्ट नहीं करती अतः दूसरा निगम यूप रूप को और तीसरा तथा चौथा निगम अग्नि रूप का बोधन करने के लिये दिया गया है॥ भाष्यकार की एक पङ्क्ति। भाष्यकार यास्क मुनि इस अध्याय के अन्त में "इति इमानि एकादश आप्रीसूक्तानि" ऐसा लिखते हैं जिससे यह प्रतीत होता है जैसे वे ग्यारहों आप्रीसूक्तों का यहां उपप्रदर्शन करा चुके हैं और उनकी कोई विशेष व्य-