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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

नीतिशतकम् ३१

अन्वय- स्वजने दाक्षिण्यम्, परिजने दया, दुर्जने सदा शाठ्यम् साधुजने प्रीतिः, नृपजने नयः, विद्वज्जनेषु आर्जवम्, शत्रुजने शौर्यम्, गुरुजने क्षमा, नारीजने धूर्तता च ये पुरुषाः एवं कलासु कुशलाः तेषु एव लोकस्थितिः (वर्तते)।

अनुवाद- बंधुजनों में उदारता, सेवकों पर दया, दुष्टों के प्रति सदा शठता, सज्जनों के प्रति प्रेम, राजा के प्रति नीति, विद्वज्जनों के प्रति सरलता, शत्रुओं के प्रति वीरता, गुरुओं के प्रति क्षमा और नारियों के प्रति धूर्तता (का आचरण) जो पुरुष इस प्रकार कलाओं में कुशल हैं, उनमें ही लोकमर्यादा (बनी रहती है)।

व्याख्या- यदि मनुष्य इस संसार में सफल होना चाहता है तो उसे अपना व्यवहार भिन्न-भिन्न लोगों के साथ भिन्न-भिन्न प्रकार करना चाहिए, पुनः किसके साथ कैसा व्यवहार करे। इसी का कथन करते हुए कवि कहता है कि— व्यक्ति को अपने बन्धुओं, आत्मीयों के प्रति अत्यन्त उदारतापूर्वक व्यवहार करना चाहिए, अपने सेवकों के प्रति दयाभाव रखते हुए आचरण करना चाहिए क्योंकि क्रूरता के आचरण से सेवकों के विरोधी होने की सम्भावना रहती है।

इसी प्रकार दुर्जनों के प्रति दुष्टतापूर्वक आचरण से ही वे नियन्त्रित रहते हैं, सज्जनों के प्रति प्रेम पूर्ण व्यवहार ही उचित है। जब भी राजा के साथ व्यवहार करना हो तो नीति के अनुसार ही करना चाहिए, विद्वानों के साथ कभी भी व्यक्ति को कुटिल आचरण नहीं करना चाहिए, अपितु सरलतापूर्वक ही बर्तना चाहिए।

शत्रुओं के साथ वीरतापूर्वक व्यवहार ही व्यक्ति को सामर्थ्यशाली बनाता है, जो हमसे विद्या में बढ़े हुए हैं अथवा आयु में बड़े हैं, उन गुरुओं के प्रति, सदैव उनके द्वारा नाराज होने पर भी क्रोधित न होते हुए क्षमापूर्वक आचरण करना चाहिए। स्त्रियों के साथ सरलता का व्यवहार व्यक्ति के नाश का कारण बनता है। अतः उनके साथ धूर्तता, अत्यन्त चालाकी-पूर्वक व्यवहार करना चाहिए।

अन्त में कवि कहता है कि इस संसार में जो लोग इस प्रकार व्यवहार करने की कला में निपुण हैं, उनके कारण ही समाज में संतुलन रूप मर्यादा बनी रहती है, अन्यथा अव्यवस्था की पूरी-पूरी सम्भावना है।

विशेष- १. व्यक्ति को इस संसार में किसके साथ कैसा व्यवहार करना उचित है, इसका अत्यन्त सुन्दर चित्रण प्रस्तुत श्लोक में किया गया है।

२. स्त्रियों के प्रति धूर्तता के आचरण की बात सम्भवतः कवि ने अपनी जीवन में कटु अनुभव के कारण कही है।

३. दुर्जनों के प्रति शठता की बात "शठे शाठ्यं समाचरेत्" में भी कही गई है।

४. लोकव्यवहारकुशल बनने के लिए, जीवन में सफल होने के लिए, श्लोक के अनुसार आचरण अत्यावश्यक है।

५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है।

३२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

६ परिजन का अर्थ सेवक और सम्बन्धी दोनों किया जा सकता है। ७. काव्यलिंग अलंकार

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. दक्षिण + ष्यञ् (नपु. प्र.वि., ए.व.) दाक्षिण्यम् २. शठ + ष्यञ् (नपु., प्र.वि., ए.व.) शाठ्यम् ३. √प्रीञ् + क्तिन् (प्र.वि., ए.व.) प्रीतिः ४. √नी + अच् (पु., प्र. वि., ए.व.) नयः ५. ऋ+जु + अण् (नपु., प्र. वि., ए.व.) आर्जवम् ६. शूर + ष्यञ् (नपु., प्र. वि., ए.व.) शौर्यम् ७. धूर्त + तल् + टाप् = धूर्तता ८. लोकानाम् स्थितिः = लोकस्थितिः (षष्ठी तत्पुरुष) ९. √स्था + क्तिन् (स्त्री., प्र. वि., ए.व.) स्थितिः १०. विद्वत् + जनेषु + आर्जवम् (व्यञ्जन संधि, यण्, संधि इकोयणचि) ११. च + एवम् (वृद्धि - वृद्धिरेचि) १२. कुशलाः + तेषु + एव (विसर्गः यण् - इकोयणचि)

जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं,
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं,
सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥२४॥

अन्वय- (सत्संगतिः) धियः जाड्यम् हरति, वाचि सत्यम् सिञ्चति, मानोन्नतिम् दिशति, पापम् अपाकरोति, चेतः प्रसादयति, दिक्षु कीर्तिम् तनोति, कथय, सत्संगति पुंसाम् किम् न करोति।

अनुवाद- (सत्संगति मनुष्य की) बुद्धि की मन्दता का हरण करती है, वाणी में सत्य का संचार करती है, सम्मान और उन्नति को बढ़ाती है, पाप को दूर करती है, मन को प्रसन्न करती है, दिशाओं में कीर्ति फैलाती है, कहो तो सत्संगति मनुष्य का क्या नहीं करती ?

व्याख्या- सज्जनों की संगति से व्यक्ति का अनेक प्रकार से उपकार होता है, इसी का कथन करते हुए कवि कहता है कि- सत्संगति से बुद्धि की अज्ञानता, जड़ता दूर होती है, वाणी सज्जनों के साथ रहकर उनका अनुकरण करते हुए सदैव सत्य भाषण ही करती है। जब व्यक्ति सज्जनों के साथ रहता है तो उसका समाज में सम्मान व प्रतिष्ठा बढ़ती है, जिससे वह उन्नति को प्राप्त करता है।

नीतिशतकम् ३३

सज्जनों के साथ रहने से व्यक्ति पापपूर्ण कार्यों से दूर ही रहता है। अनुचित कार्य न करने तथा अच्छे-अच्छे कार्यों के करने से मनुष्य का मन प्रसन्न रहता है, अच्छे-अच्छे काम करने से संसार में व्यक्ति का नाम होता है, चारों दिशाओं में उसका यश फैलता है।

इस प्रकार मुझे जरा बताओ तो सही सत्संगति से मनुष्य का क्या भला नहीं होता अर्थात् सज्जन लोगों के साथ रहने में व्यक्ति को लाभ ही लाभ है, हानि तो एक भी दिखाई नहीं देती है।

विशेष- १. सत्संगति की अत्यन्त सुन्दर शब्दों में, तर्क पद्धति के द्वारा प्रशंसा की गई है।

२. यदि व्यक्ति को इस संसार में अपना जीवन सफल बनाना है तो उसे सज्जनों की संगति ही करनी चाहिए।

३. प्रस्तुत श्लोक में सत्संगति की प्रशंसा में अनेक हेतुओं का कथन किया गया है। अतः समुच्चय अलंकार लक्षण इस प्रकार है—

तत्सिद्धिहेतावेकस्मिन् यत्रान्यत् तत्करं भवेत्। समुच्चयोऽसौ॥ (काव्य प्रकाश)

४. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—

उक्ता वसन्ततिलका तभजाजगौगः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. धी + ङस् (षष्ठी वि., ए.व.)
२. मानस्य उन्नतिम्, मानोन्नतिम् (षष्ठी तत्पुरुष) √मन् + घञ् = मानः, उत् + √नम् + क्तिन् = उन्नतिः
३. √दिश् + तिप् = दिशति (लट् लकार, प्र. पु., ए.व.)
४. संताम् संगतिः = सत्संगति (षष्ठी तत्पुरुष) सत् + √गम् + क्तिन् (प्र.वि., ए.व.)
५. धियः हरति = धियोहरति (विसर्ग - हशि च)
६. √तनु - (विस्तरणे) + तिप् = तनोति (लट् लकार, प्र. पु., ए.व.)
७. जडस्य भावः, जाड्यम्, जड + ष्यञ्
८. प्र + √सद् + णिच् (लट् लकार, प्र. पु., ए.व.) प्रसादयति
९. अप + च्वि + √कृ + तिप् (लट् लकार, प्र. पु., ए.व.) अपाकरोति

जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः।
नास्ति येषां यशः काये जरामरणजं भयम्॥२५॥

अन्वय- ते सुकृतिनः रससिद्धाः कवीश्वराः जयन्ति, येषाम् यशःकाये जरा मरणजम् भयम् न अस्ति।

३४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अनुवाद- वे पुण्यात्मा, रस-सिद्ध, कविश्रेष्ठ सर्वोत्कृष्ट हैं। जिनके यश रूपी शरीर में वृद्धावस्था और मरण से उत्पन्न भय नहीं है।

व्याख्या- सभी प्रकार के काव्यरसों से युक्त रचना कर्म में कुशल, कवियों में अग्रणी वे पुण्यशाली महाकवि ही वस्तुतः सर्वोत्कृष्ट एवं प्रशंसा के योग्य हैं, जिनके नश्वर शरीर के विनाश होने के बाद भी यश रूपी शरीर की स्थिति बनी रहती है और इस यशः शरीर की एक विशेषता है कि यह शरीर न तो कभी बूढ़ा ही होता है और न ही इस का कभी मरण ही होता है।

कहने का तात्पर्य है कि उत्कृष्ट काव्यरचना में कुशल महाकवि वास्तव में पुण्यात्मा है अन्यथा काव्यशक्ति इस संसार में जन्म लेने वाले सभी लोगों को प्राप्त नहीं होती है और ऐसे अँगुलीगण्य महाकवि पञ्चतत्त्वों से बने इस नश्वर शरीर के नष्ट होने पर भी अपनी कीर्ति रूपी शरीर में सदैव युवावस्था में विद्यमान होकर जीवित रहते हैं।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में प्रयुक्त 'जयति' पद सर्वोत्कृष्टता का प्रतिपादन करने के लिए प्रयुक्त हुआ है।

२. यशः काये में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—

तद् रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।

३. पुण्यात्मा ही रससिद्ध महाकवि होता है। सभी को इस सौभाग्य की प्राप्ति नहीं होती।

४. यशः शरीर सदैव अमर और जरारहित रहता है। आज भी कालिदास जैसे महाकवि यशः शरीर से हमारे मध्य विराजमान हैं।

५. प्रस्तुत श्लोक का एक अन्य अर्थ वैद्य पक्ष में भी हो सकता है जो इस प्रकार है— “वे पुण्यात्मा रस रचना में निपुण वैद्यराज सर्वोत्कृष्ट हैं। जिनके शरीर में वृद्धावस्था और मृत्यु से उत्पन्न भय नहीं होते हैं।” इसी कारण—

६. प्रस्तुत श्लोक में समासोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है—लक्षण इस प्रकार है—

यत्रोक्ताद् गम्यतेऽन्योऽर्थस्तत्समान विशेषणः।
सा समासोक्तिरुदिता संक्षेपार्थतया बुधैः।। (अग्निपुराण)

७. श्लोक का द्वितीय चरण प्रथम चरण के कथन को पुष्ट करने के लिए हेतु रूप में प्रयुक्त होने से काव्यलिंग अलंकार—

हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्गमुदाहृतम्।। (साहित्यदर्पण)

८. प्रस्तुत श्लोक में अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है—

श्लोके षष्ठं गुरुज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः।।

नीतिशतकम् ३५

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √जि (जये) + झि = जयन्ति (लट् लकार, प्र. पु., बहु. व.)
२. सुकृत + इनि = सुकृतिन् (पु., प्र. वि., बहु. व.)
३. रसेषु सिद्धाः, रससिद्धाः (सप्तमी तत्पुरुष)
४. कविषु ईश्वराः, कवीनाम् ईश्वराः (षष्ठी या सप्तमी तत्पुरुष)
५. यशः एव कायः, यशः कायः, तस्मिन् यशः काये
६. √भी + अच् (नपु., प्र. वि., ए.व.)
७. जरा च मरणम् च जरामरणे, ताभ्याम् जायते इति जरामरणजम्
८. न + अस्ति = नास्ति (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः)
९. कवि + ईश्वराः = कवीश्वराः (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः)

को लाभो गुणिसङ्गमः किमसुखं प्राज्ञेतरैः सङ्गतिः,
का हानिः समयच्युतिर्निपुणता का धर्मतत्त्वे रतिः।
कः शूरो विजितेन्द्रियः प्रियतमा काऽनुव्रता किं धनं,
विद्या किं सुखमप्रवासगमनं राज्यं किमाज्ञाफलम्॥२६॥

अन्वय- लाभः कः ? गुणिसङ्गमः, असुखम् किम् ? प्राज्ञेतरैः सङ्गतिः, हानिः का ? समयच्युतिः, निपुणता का ? धर्मतत्त्वे रतिः, शूरः कः ? विजितेन्द्रियः, प्रियतमा का ? अनुव्रता, दानम् किम्? विद्या, सुखम् किम्? अप्रवासगमनम्, राज्यम् किम् ? आज्ञाफलम्।

अनुवाद- लाभ क्या (है)? गुणवानों की सङ्गति। दुःख क्या (है)? मूर्खों की सङ्गति। हानि क्या (है)? अवसर खो देना। निपुणता क्या (है)? धर्मतत्त्व में अनुराग। शूर कौन (है)? इन्द्रियों को जीतने वाला। प्रियतमा कौन (है)? अनुकूल आचरण करने वाली (स्त्री)। धन क्या (है)? विद्या। सुख क्या (है)? देश से बाहर न जाना। राज्य क्या (है)? आज्ञा का पालन।

व्याख्या- कवि सुख-दुःख, लाभ-हानि आदि की भिन्न, किन्तु अत्यन्त सुन्दर व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहता है कि—

इस संसार में यदि व्यक्तियों को गुणवान् लोगों का सान्निध्य प्राप्त हो सके तो इसे सबसे बड़ा लाभ मानना चाहिए। इसी प्रकार यदि मनुष्य को किसी भी कारण मूर्खों के साथ रहना पड़ता है तो यह उसके लिए सर्वाधिक कष्ट अथवा दुःख का विषय है।

ठीक इसी प्रकार यदि व्यक्ति किसी भी कार्य को करने का अवसर खो देता है तो यह उसके लिए सबसे बड़ी हानि है और यदि मनुष्य का धर्म के प्रति प्रेम है तो यह उसकी सबसे बड़ी निपुणता मानी जाएगी। जिस व्यक्ति ने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया वह सबसे बड़ा शूरवीर कहलाने का अधिकारी है।

३६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

इस प्रकार ही यदि कोई स्त्री पति के अथवा अपने प्रेमी के मन, वचन और कर्म से अनुकूल आचरण करने वाली है तो वही वस्तुतः प्रियतमा कहलाने की अधिकारिणी है। इसी प्रकार इस संसार में सबसे बड़ा धन, विद्या ही है और यदि किसी व्यक्ति को किसी भी कारण अपने देश, अपनी मातृभूमि को न छोड़ना पड़े वही सबसे बड़ा सुख है और यदि व्यक्ति की सर्वत्र आज्ञा प्रभावशाली होती है तो समझना चाहिए कि उसके पास सबसे बड़ा, विशाल राज्य है।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में लाभादि को आध्यात्मिक दृष्टि से अवलोकन किया गया है। २. कवि की सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है। ३. विद्या को अन्यत्र भी सबसे बड़ा धन बताया गया है— विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम्। ४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण— सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √लभ् + घञ् = लाभः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) २. गुणिभिः सह सङ्गमः, गुणिसङ्गमः ३. न सुखम् इति असुखम् (नञ् समास) ४. प्राज्ञेभ्यः इतरैः, प्राज्ञेतरैः ५. प्र + √ज्ञा + क = प्रज्ञः । प्रज्ञ + अण् = प्राज्ञः ६. √हा + क्तिन् = हानिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ७. समयात् च्युतिः = समयच्युतिः (पञ्चमी तत्पुरुष) ८. √रम् + क्तिन् = रतिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ९. विजितानि इन्द्रियाणि येन सः (बहुव्रीहि) विजितेन्द्रियः १०. आज्ञा एव फलम् = आज्ञाफलम् (कर्मधारय) ११. सम् + √गम् + क्तिन् = सङ्गतिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन

मानशौर्य पद्धतिः

क्षुत्क्षामोऽपि जराकृशोऽपि शिथिलप्रायोऽपि कष्टं दशा- मापन्नोऽपि विपन्नदीधितिरपि प्राणेषु नश्यत्स्वपि। मत्तेभेन्द्रविभिन्न कुम्भकवलग्रासैकबद्धस्पृहः, किं जीर्णं तृणमत्ति मानमहतामग्रेसरः केसरी॥२७॥

नीतिशतकम् ३७

अन्वय- मत्तेभेन्द्रविभिन्न कुम्भकवलग्रासैकबद्धस्पृहः, मानमहताम् अग्रेसरः केसरी, क्षुतक्षामः अपि, जरा- कृशः अपि, शिथिलप्रायः अपि, कष्टाम् दशाम् आपन्नः अपि, विपन्नदीधितिः अपि, प्राणेषु, नश्यत्सु अपि किम् जीर्णम् तृणम् अत्ति।

अनुवाद- मदमस्त गजराज के विदीर्ण मस्तक के कौर को खाने में बंधी हुई है एक मात्र चाह जिसकी, स्वाभिमानियों में अग्रणी केसरी, भूख से कमजोर होने पर भी, बुढ़ापे से दुर्बल होने पर भी, पूरी तरह ढीला होने पर भी, कष्टकारी दशा में पड़ने पर भी कान्ति के नष्ट होने पर भी (यहाँ तक कि) प्राणों के नष्ट होने पर भी क्या सूखे तिनके खाता है।

व्याख्या- स्वाभिमानियों में सदैव आगे रहने वाला केसरी शेर (गर्दन पर बड़े-बड़े आयालों वाला) भले ही भूख के कारण कितना भी कमजोर क्यों न हो जाए, वृद्धावस्था के कारण उठने लायक, शिकार करने योग्य भी क्यों न रहे, किसी भी रोगादि के कारण उसके अंग-अंग ढीले क्यों न पड़ जाएँ। कितनी भी कष्टकारी स्थिति में क्यों न फंस जाए। उसकी कान्ति एवं तेज पूर्णरूप से समाप्त क्यों न हो जाए। यहाँ तक कि उसके प्राण ही गले तक क्यों न आ जाएँ अर्थात् प्राण निकलने की नौबत भी क्यों न आ जाए। क्या अत्यधिक शक्तिशाली, जिसके गण्डस्थलों से मद बह रहा है ऐसे हाथी के विशाल मस्तक पर वीरतापूर्वक आक्रमण करके नोचे गए मांस के टुकड़े को खाने का इच्छुक केसरी शेर, सूखे तिनकों को खाकर अपनी भूख शान्त करता है अर्थात् नहीं।

ठीक इसी प्रकार स्वयं के परिश्रम, योग्यता एवं क्षमता से अर्जन करके खाने वाला स्वाभिमानी व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुरूप वस्तु को ही खाता है, किसी की कृपा से अपने स्वाभिमान के विपरीत आचरण नहीं करता है, भले ही भूख से कमजोर क्यों न हो जाए, उसके अंग-अंग ढीले क्यों न हो जाएँ, यहाँ तक कि प्राण ही क्यों न निकल जाएँ।

विशेष- १. यहाँ केसरी स्वाभिमानी व्यक्ति का प्रतीत है, जो किसी भी परिस्थिति में स्वाभिमान की रक्षा करता है।
२. केसरी का यह स्वभाव है कि वह किसी अन्य द्वारा मारे हुए अथवा छोटे-मोटे प्राणियों के मांस से अपनी क्षुधा शान्त नहीं करता, अपितु वह तो प्रत्येक परिस्थिति में शक्तिशाली हाथी पर आक्रमण करके अपना शिकार करता है।
३. केसरी शेर के गर्दन पर बड़े-बड़े बाल होते हैं, जिन्हें आयाल कहते हैं।
४. उत्कृष्ट श्रेणी के शक्तिशाली हाथी की कनपटियों से सुगन्धित द्रव बहता है, जिसे मद कहते हैं।
५. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. क्षुधया क्षामः (तृतीया तत्पुरुष) क्षुत्क्षामः + अपि = क्षुत्क्षामोऽपि
२. जरया कृशः (तृतीया तत्पुरुष) जराकृशः + अपि = जराकृशोऽपि

३८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

३. आ + √पद् + क्त (पुंल्लिग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) आपन्नः ४. विपन्ना दीधितिः यस्य सः (बहुव्रीहि) विपन्नदीधितिः। वि + √पद् + क्त = विपन्नः ५. √मद् + क्त = मत्तः ६. मत्त + इभ + इन्द्र (गुण, आद् गुणः) ग्रास + एक बद्धः (वृद्धि, वृद्धिरेचि) ७. वि + √भिद् + क्त = विभिन्नः ८. √ग्रस् + घञ् = ग्रासः ९. मानम् एव महत् येषाम् तेषाम् = मानमहताम् १०. अग्रेसरति इति अग्रेसरः ११. केसर + इनि = केसरिन् (पुंल्लिग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) केसरी १२. √जॄ + क्त (नपु. प्रथमा विभक्ति, एकवचन) १३. √अद् + तिप् = अत्ति (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) १४. √स्पृह + क्त = स्पृहः

स्वल्पस्नायुवसावशेष मलिनं¹ निर्मांसमपि अस्थिकं²,
श्वा लब्ध्वा परितोषमेति न तु तत्तस्य क्षुधाशान्तये।
सिंहो जम्बुकमङ्कमागतमपि त्यक्त्वा निहन्ति द्विपं,
सर्वः कृच्छ्र गतोऽपि वाञ्छति जनः सत्त्वानुरूपं फलम्॥२८॥

अन्वय- श्वा स्वल्पस्नायुवसावशेषमलिनम् निर्मांसम् अपि अस्थिकम् लब्ध्वा परितोषम् एति, तत् तु तस्य क्षुधाशान्तये न। सिंहः अङ्कम् आगतम् अपि जम्बुकम् त्यक्त्वा द्विपम् हन्ति। कृच्छ्रगतः अपि सर्वः जनः सत्वानुरूपम् फलम् वाञ्छति।

अनुवाद- कुत्ता, थोडे से स्नायु और चरबी के बचे हुए (भाग से) मलिन, मांस रहित भी छोटे से हड्डी के टुकड़े को प्राप्त करके संतुष्ट हो जाता है, किन्तु वह (टुकड़ा) उसकी भूख को शान्त करने के लिए नहीं होता (इसके विपरीत) शेर गोद में आए हुए भी गीदड़ को छोड़कर, हाथी को मारता है। विपत्ति में पड़े हुए भी सभी लोग (अपने) स्वाभिमान के अनुरूप ही फल चाहते हैं।

व्याख्या- इस संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं— प्रथम वे जो कुछ तुच्छ भी प्राप्त करके संतुष्ट होकर बैठ जाते हैं। इसके विपरीत दूसरे वे जो अपनी शक्ति एवं स्वभाव के अनुरूप ही वस्तु को प्राप्त करने पर संतुष्ट होते हैं, भले ही उसके लिए उन्हें कितना ही परिश्रम क्यों न करना पड़े।


१. स्वल्पं स्नायुवसावसेक (थोड़े से स्नायु और चर्बी से लिपटे)
२. अस्थिगोः (गाय की हड्डी)

नीतिशतकम् ३९

इसी बात को कवि कुत्ते और शेर का उदाहरण देकर समझाता है— कुत्ता ऐसे छोटे से हड्डी के टुकड़े को पाने पर ही संतुष्ट हो जाता है भले ही उसमें जरा भी मांस नहीं हो, कितना भी गंदा क्यों न हो तथा स्नायु और चरबी लेशमात्र ही क्यों न लगा हो, हालाँकि यह टुकड़ा उसकी भूख को शान्त करने में समर्थ नहीं होता। इस प्रकार का स्वभाव, स्वाभिमान रहित और आलसी व्यक्ति का होता है।

इसके विपरीत गीदड़ शेर की गोद में स्वयं ही आकर क्यों न बैठ जाए और उससे उसे खाने की स्वयं ही प्रार्थना क्यों न करे। वह उसे त्याग कर अपने स्वभाव एवं स्वाभिमान के अनुरूप हाथी को मारकर ही अपनी भूख को शान्त करता है। भले ही इसमें वह स्वयं भी घायल क्यों न हो जाए, उसे कितना ही कष्ट क्यों न उठाना पड़े।

इस प्रकार इस संसार में लोग अपने स्वभाव और स्वाभिमान के अनुरूप ही वस्तु को प्राप्त करना चाहते हैं।

विशेष- १. यहाँ शेर स्वाभिमानी एवं परिश्रमी व्यक्ति का और कुत्ता आलसी तथा स्वाभिमान रहित क्षुद्र व्यक्ति का प्रतीक है। २. कुत्ता हड्डी के टुकड़े को चबाने में मांस रहित होने पर भी अपने ही दांतों से निकले खून को पीकर अत्यन्त आनन्दित होता है। वह समझता है कि वह खून उस हड्डी से निकल रहा है। ३. शार्दूलविक्रीडित छन्द।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. स्वल्पयोः स्नायुवस्योः अवशेषः, स्वल्पस्नायुवसावशेषः तेन मलिनम्— स्वल्प स्नायुवसावशेषमलिनम्। २. निर्गतं मांसं यस्मात् तत् (अव्ययी भाव) ३. √लभ् + क्त्वा = लब्ध्वा ४. क्षुधायाः शान्तये = क्षुधाशान्तये (षष्ठी तत्पुरुष) ५. द्वाभ्याम् पिबति इति द्विपः तम् द्विपम् ६. नि + √हन् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) ७. कृच्छे गतः, कृच्छगतः (सप्तमी तत्पुरुष) ८. सत्त्वस्य अनुरूपम् सत्त्वानुरूपम्। ९. अस्थिकं में क प्रत्यय का प्रयोग तुच्छता मात्रा की, अल्पता की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है। १०. √त्यज् + क्त्वा = त्यक्त्वा ११. √वाञ्छ् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) = वाञ्छति १२. सिंहः + जम्बुक = सिंहोजम्बुक (विसर्ग, हशि च) १३. अङ्के आगतः अंकागतः तम् (सप्तमी तत्पुरुष)

४० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

लाङ्गूलचालनमधश्चरणावपातं,
भूमौ निपत्य वदनोदर दर्शनं च।
श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुङ्गवस्तु,
धीरं बिलोकयति चाटुशतैश्च भुङ्क्ते॥२९॥

अन्वय- पिण्डदस्य (प्रति) श्वा लाङ्गूलचालनम्, अधः चरणावपातम्, भूमौ निपत्य वदनोदर दर्शनम् च कुरुते, गजपुङ्गवः तु धीरं विलोकयति, चाटुशतैः च भुङ्क्ते।

अनुवाद- अन्न देने वाले के (प्रति) कुत्ता पूँछ हिलाना नीचे चरणों में गिरना और भूमि पर गिरकर मुँह और पेट दिखाना (आदि क्रियाएँ) करता है। (इसके विपरीत) गजश्रेष्ठ तो धैर्यपूर्वक देखता है और सैकड़ों खुशामदों से खाता है।

व्याख्या- क्षुद्र व्यक्ति मात्र अपना पेट भरने के लिए कितनी तुच्छ क्रियाएँ करता है, इस बात को कुत्ते के उदाहरण से तथा स्वाभिमानी व्यक्ति का इसी विषय में कैसा व्यवहार होता है, इसे हाथी के उदाहरण से बताते हुए कवि कहता है कि— कुत्ता मात्र थोड़ा सा अन्न प्राप्त करने के लिए अन्न देने वाले अपने स्वामी के प्रति बार-बार पूँछ हिलाता है, उसके पैरों में गिरकर भूमि पर लेट-लेट कर अपना मुँह और पेट दिखाते हुए अनेक तुच्छ क्रियाएँ करता है, ठीक इसी प्रकार नीच लोग मात्र अपना पेट भरने के लिए धनवानों के सामने अनेक प्रकार से गिड़गिड़ाते हैं तथा उनकी अनेक प्रकार से झिड़कियाँ भी सुनते रहते हैं।

किन्तु इसके विपरीत श्रेष्ठ गजराज जब उसे भोजन दिया जाता है तो वह उस पर टूट कर नहीं पड़ता, अपितु भोजन को दूर से ही अत्यन्त धैर्य के साथ देखता है और अपने अन्नदाता महावत द्वारा अनेक प्रकार की खुशामद किए जाने पर ही स्वाभिमान की रक्षा करते हुए, उस भोजन को खाता है। इसी प्रकार की क्रियाएँ स्वाभिमानी व्यक्तियों की होती हैं वे अपने स्वामी के सामने गिड़गिड़ाते नहीं, अपितु जहाँ तक होता है, प्राणों की बाजी लगाकर भी अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हैं।

विशेष- १. कुत्ते और हाथी के मनोविज्ञान को अत्यन्त सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
२. यहाँ कुत्ता निम्न स्वभाव वाले क्षुद्र व्यक्ति का तथा हाथी स्वाभिमानी व्यक्ति का प्रतीक है।
३. यहाँ अप्रस्तुत कुत्ते और हाथी के उदाहरण से प्रस्तुत क्षुद्र और स्वाभिमानी व्यक्ति की क्रियाओं की अभिव्यञ्जना की गई है। अतः अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार, लक्षण इस प्रकार है—

अप्रस्तुतस्य कथनात्, प्रस्तुतं यत्र गम्यते।
अप्रस्तुतप्रशंसेयं, सारूप्यादि नियन्त्रिता॥

नीतिशतकम् ४१

४. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
५. स्वाभिमानी व्यक्ति का स्वभाव होता है कि वे भूखों भले ही मर जाए, किन्तु अपने स्वाभिमान की पूर्णरूप से रक्षा करते हैं, महाराणा प्रताप इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. पिण्डम् ददाति इति पिण्डदः, तस्य पिण्डदस्य
२. लाङ्गूलस्य चालनम् इति (षष्ठी तत्पुरुष) लाङ्गूलचालनम्
३. चरणयोः अवपातम् (सप्तमी तत्पुरुष) चरणावपातम्
४. नि + √पत् + ल्यप् = निपत्य
५. अव + √पत् + घञ् = अवपातः
६. वदनं च उदरं च वदनोदरं तयोः दर्शनम् वदनोदरदर्शनम् (द्वन्द्व)
७. गजेषु पुङ्गवः गजपुङ्गवः (सप्तमी तत्पुरुष)
८. √भुज् + त (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन, आत्मने) भुङ्क्ते
९. चाटूनाम् शतैः चाटुशतैः। चाटुशतैः + च = स्तोःश्चुनाश्चुः
१०. √चल् + णिच् + ल्युट् = चालनम्
११. वि + √लोक् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विलोकयति
१२. गजपुङ्गवः + तु = गजपुङ्गवस्तु (विसर्ग— विसर्जनीयस्य सः)

परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते।
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्॥३०॥

अन्वय- परिवर्तिनि संसारे कः मृतः न (कः) वा (न) जायते, येन जातेन वंशः समुन्नतिम् याति, सः (एव वस्तुतः) जातः।
अनुवाद- परिवर्तनशील संसार में कौन मरता नहीं है और कौन उत्पन्न नहीं होता है। जिसके उत्पन्न होने से वंश उन्नति को प्राप्त होता है, वही वस्तुतः उत्पन्न हुआ है।
व्याख्या- यह संसार परिवर्तनशील है, यहाँ कोई भी व्यक्ति शाश्वत नहीं है, इसीलिए जो भी यहाँ जन्म लेता है उसका मरण निश्चित ही है। ऐसी कोई भी वस्तु इस संसार में नहीं है, जिसका विनाश नहीं होता हो, किन्तु वास्तव में उसका जन्म लेना ही सार्थक है, जिसके उत्पन्न होने से उसके वंश का नाम ऊँचा होता हो, वह उन्नति को प्राप्त करे।
इसलिए इस संसार में आने के पश्चात् अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए व्यक्ति को सदा ही ऐसे कार्य करने चाहिएँ जिनसे उसका, उसके वंश का इस संसार में यश फैले।

४२श्रीभर्तृहरिविरचितम्

विशेष- १. जन्म लेकर पेट भरते हुए जीवित रहना ही मनुष्य का लक्ष्य नहीं होना चाहिए, अपितु उसे यहाँ अच्छे-अच्छे कार्य करने चाहिएँ, जिनसे उसका वंश का यश दिग्दिगन्त में प्रसारित हो। २. संसार का शाश्वत नियम है, जो जन्म लेता है वह मरता अवश्य है। ३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है—

श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं, सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्वि चतुष्पादयोर्ह्रस्वं, सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥

४. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. परिवर्तन + इनि (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) परिवर्तनि
२. √मृ + क्त = मृतः
३. √जनि (प्रादुर्भावे) + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) जायते
४. √जन् + क्त = जातः (तृतीया विभक्ति, एकवचन) जातेन
५. सम् + उत् + √नम् + क्तिन् (द्वितीया विभक्ति, एकवचन) समुन्नतिम्
६. √इण् (गतौ) + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) याति

कुसुमस्तबकस्येव द्वयी वृत्ति१ र्मनस्विनः।
मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्यते वनेऽथवा॥३१॥

अन्वय- कुसुमस्तबकस्य इव मनस्विनः द्वयी वृत्तिः (भवति) ! (सः) सर्वलोकस्य मूर्ध्नि वा, अथवा वने विशीर्यते।

अनुवाद- पुष्प के गुच्छे के समान मनस्वी (व्यक्ति) की दो (ही) स्थितियाँ (होती हैं) (वह) या तो सभी लोगों के सिर पर (विराजमान रहता है) अथवा वन में नष्ट हो जाता है।

व्याख्या- जिस प्रकार पुष्प का गुच्छा देवताओं या अन्य व्यक्तियों द्वारा आभूषण के रूप में अपने सिर पर धारण किया जाता है या फिर अनुपयोग की स्थिति में वह अपने उत्पत्ति स्थान वन में ही खिल कर, वहीं नष्ट हो जाता है।

ठीक इसी प्रकार जो मनस्वी लोग होते हैं, वे या तो अपनी योग्यता, क्षमता आदि के कारण समाज में सर्वोच्च स्थान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं या फिर यदि समाज उनकी योग्यता का सम्मान नहीं करता है तो वैराग्य भाव को प्राप्त होकर वन का सेवन करते हैं और वहीं मृत्यु को प्राप्त होते हैं।


१. द्वे गती स्तो (दो गतियाँ होती हैं)

नीतिशतकम् ४३

विशेष- १. मनस्वी की पुष्प के गुच्छ से दी गई उपमा अत्यन्त सुन्दर है तथा भावबोध में सहायक है।
२. उपमालंकार का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
''प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।''
३. अनुष्टुप् छन्द, लक्षण पूर्ववत्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. कुसुमानां स्तबकः कुसुमस्तबकः तस्य, कुसुमस्तबकस्य
२. मनस् + विनि = मनस्विन् (पुंलिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) मनस्विनः
३. कुसुमस्तबकस्य + इव (गुण, आद् गुणः)
४. वि + √शॄ + णिच् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विशीर्यते
५. सर्वेषाम् लोकः सर्वलोकः तस्य सर्वलोकस्य (षष्ठी तत्पुरुष) सर्वस्य लोकस्य (अव्ययी भाव)

सन्त्यन्येऽपि बृहस्पतिप्रभृतयः सम्भाविताः पञ्चषा-
स्तान् प्रत्येव विशेषविक्रमरुची राहुर्न वैरायते।
द्वावेव ग्रसते दिवाकरनिशाप्राणेश्वरौ भास्वरौ,
भ्रातः! पर्वणि पश्य दानवपतिः शीर्षावशेषीकृतः॥३२॥

अन्वय- बृहस्पतिप्रभृतयः अन्ये अपि पञ्चषाः सम्भाविताः (ग्रहाः) सन्ति, विशेषविक्रमरुचिः एषः राहुः तान् प्रति न वैरायते। भ्रातः! पश्य, शीर्षावशेषीकृतः दानवपतिः पर्वणि भास्वरौ दिवाकरनिशा- प्राणेश्वरौ द्वौ एव ग्रसते।

अनुवाद- बृहस्पति आदि दूसरे भी पाँच छः सम्मानित (ग्रह) हैं, विशेष पराक्रम में रुचि रखने वाला यह राहू उन (ग्रहों) के प्रति वैरभाव नहीं रखता। भाई! देखो, सिर रूप में अवशेष हुआ (यह) दैत्यराज पर्व पर प्रदीप्त होते हुए सूर्य और चन्द्रमा दोनों को ही ग्रसता है।

व्याख्या- तेजस्वी व्यक्ति का स्वभाव होता है कि वह अपने से शक्ति में कमजोर के साथ संघर्ष नहीं करता है, इसी बात को राहू के उदाहरण द्वारा प्रतिपादित करता हुआ कवि कहता है कि— आकाश में बृहस्पति आदि दूसरे भी पाँच, छः बड़े प्रभावशाली ग्रह विराजते हैं, किन्तु यह राहू जिसकी पराक्रम में विशेष रुचि है, उन ग्रहों के साथ शत्रुता का भाव नहीं रखता, क्योंकि यह तो अपने सत्व के अनुरूप अत्यधिक तेजस्वी सूर्य और चन्द्रमा को पूर्णिमा और अमावस्या पर्वों पर आक्रान्त करता है। यदि सूर्य और चन्द्रमा जैसे परम तेजस्वी ग्रहों के स्थान पर वह दूसरे ग्रहों को आक्रान्त करता तो उसमें उसकी किसी प्रकार की प्रशंसा की बात नहीं होती। अतः उसके लिए यह अत्यन्त गौरव की

४४श्रीभर्तृहरिविरचितम्

बात है कि वह प्रथम तो केवल शीर्षमात्र अवशेष है और द्वितीय उस स्थिति में भी वह दैत्यराज जीवित है तथा परम तेजस्वी, यशस्वी सूर्य और चन्द्रमा के प्रति ही पराक्रम प्रदर्शित कर रहा है, क्योंकि अपने से कमजोर पर बल-प्रदर्शन करना प्रशंसा का नहीं, अपितु निन्दा का कारण ही बनता है।

विशेष- १. जो केवल सिरमात्र अवशिष्ट रह कर भी इतना प्रभावशाली है, उसके सामान्य स्थिति के शौर्य की स्थिति, कल्पनातीत अभिव्यंजित हो रही है।

२. महाकवि भर्तृहरि के काल में नवग्रह की कल्पना स्थिर नहीं हो पायी थी, ऐसा प्रतीत होता है।

३. यहाँ पर्व से अभिप्राय अमावस्या और पूर्णिमा से है।

४. तेजस्वी लोगों का स्वभाव होता है कि वे छोटे अपेक्षाकृत अपने से कमजोरों के प्रति वैरभाव नहीं रखते हैं।

५. अन्यत्र भी कहा गया है— "महान् महत्येव करोति विक्रमम्।"

६. शार्दूलविक्रीडित छन्द है, लक्षण पूर्ववत्।

७. अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—

१. सन्ति + अन्ये + अपि (यण् – इकोयणचि, पूर्वरूपं, एडः पदान्तादति)
२. प्रति + एषः (यण् – इकोयणचि) = प्रत्येषः
३. राहुः + न (विसर्ग – ससजुषोरुः) = राहुर्न
४. द्वावेव (अयादि – एचोऽयवायावः) द्वौ + एव
५. शीर्ष + अवशेष + आकृतिः (दीर्घ – अकःसवर्णे दीर्घः)
६. विशेष विक्रमे रुचिः यस्य सः, विशेषविक्रमरुचिः (बहुव्रीहि)
७. शीर्ष एव अवशेषः यस्य सः, (बहुव्रीहि) शीर्षावशेषः, (शीर्षाविशेषा तादृशी आकृतिर्यस्य सः)
८. √भास् + वरप् (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) = भास्वरौ
९. वैर + क्यङ् (य) (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) वैरायते, वैरं करोति इति
१०. बृहताम् पतिः, बृहस्पतिः (षष्ठी तत्पुरुष)
११. सम् + √भू + णिच् + क्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) सम्भाविताः
१२. दानवानाम् पतिः, (षष्ठी तत्पुरुष) दानवपतिः
१३. दनोः अपत्यम् पुमान् इति दानवः

वहति भुवनश्रेणीं शेषः फणाफलकस्थितां,
कमठपतिना मध्येपृष्ठं सदा स च धार्यते।

नीतिशतकम् ४५

तमपि कुरुते क्रोडाधीनं पयोधिरनादराद्,
अहह! महतां निःसीमानश्चरित्रविभूतयः॥३३॥

अन्वय- शेषः फणाफलकस्थिताम् भुवनश्रेणीम् वहति, स चं कमठपतिना सदा मध्ये पृष्ठम् धार्यते। तम् अपि पयोधिः अनादरात् क्रोडाधीनम् कुरुते। अहह! महताम् चरित्र-विभूतयः निस्सीमानः (भवन्ति)।

अनुवाद- शेषनाग (अपने) फणरूपी फलक पर स्थित, लोकों की पंक्ति को वहन करता है और वह कूर्मराज के द्वारा सदैव पीठ के मध्य में धारण किया जाता है (और) उसे भी समुद्र तिरस्कारपूर्वक अपनी गोद में रख लेता है। अहो! महान् लोगों के कार्यों की महिमा अपार (होती है)।

व्याख्या- महापुरुषों की सामर्थ्य सीमारहित एवं कल्पनातीत होती है, इसी बात की पुष्टि में शेषनाग, कूर्मराज और समुद्र के उदाहरण देते हुए कवि कहता है कि- प्रथम तो शेषनाग का चरित आश्चर्यचकित कर देने वाला है कि वह चौदह भुवनों के विशाल समूह को मात्र अपने फणों के फलक पर थामे हुए है, इस आचरण से उसके सामर्थ्य और शक्ति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। उससे भी बढ़कर आश्चर्य तब होता है कि उस चौदह भुवन सहित शेषनाग को भी कच्छपावतार अपनी पीठ के केवल मध्य भाग में ही धारण कर लेते हैं, किन्तु यह आश्चर्य की श्रृंखला यहीं पूरी नहीं होती, अपितु चौदहभुवन पंक्ति सहित शेषनाग एवं उन्हें धारण किए कच्छपराज को प्रलयकालीन समुद्र अत्यन्त सहज रूप में तिरस्कारपूर्वक अपनी गोद में इस प्रकार धारण कर लेता है जैसे कोई छोटी सी चीज हो।

इस प्रकार इस संसार में महापुरुषों की सामर्थ्य की कोई सीमा नहीं है अर्थात् इससे अधिक कार्य नहीं हो सकेगा अथवा यह अत्यन्त कठिन है ऐसा उनके विषय में नहीं कहा जा सकता है, यह सब देखकर वास्तव में अत्यन्त आश्चर्य होता है।

विशेष- १. पुराणों में उल्लेख हुआ है कि ये सम्पूर्ण लोक जिनकी संख्या चौदह बताई गई है। शेषनाग के फन पर टिके हुए हैं। उसी की ओर प्रस्तुत श्लोक में संकेत किया गया है।
२. 'अहह' अव्यय पद का यहाँ आश्चर्यातिशय की अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग हुआ है।
३. माना जाता है कि प्रलयकाल में सब कुछ जलप्लावित हो जाता है।
४. प्रस्तुत श्लोक में पूर्व-पूर्व वर्णित की अपेक्षा उत्तरोत्तर वर्णित का उत्कर्ष वर्णित होने से माला- दीपक अलंकार है। लक्षण इस प्रकार है-
मालादीपकमाद्यं चेद्यथोत्तरगुणावहम्।
५. हरिणी छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है-

४६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

रसयुगहयैन्सौँम्रौ स्लौ गो यदा हरिणी तदा॥

६. अर्थान्तरन्यास अलंकार का भी प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. भुवनानां श्रेणिः भुवन श्रेणिः तां भुवनानां श्रेणीम् (षष्ठी तत्पुरुष) २. कमठानां पतिः, कमठपतिः तेन कमठपतिना (षष्ठी तत्पुरुष) ३. पयस् + √धा + कि (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) पयोधिः ४. न आदरात् (नञ् समास) अनादरात् ५. चरित्राणां विभूतयः (षष्ठी तत्पुरुष) चरित्रविभूतयः ६. फणा एव फलकं, तस्मिन् स्थिताम्, फणाफलकस्थिताम् ७. √धृ + णिच् + त (लट् लकार, आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन) धार्यते ८. नास्ति सीमा यासां ताः, निःसीमानः (बहुव्रीहि) ९. पयोधिः + अनादरात् (विसर्ग, ससजुषो रुः) १०. निःसीमानः + चरित्रविभूतयः (विसर्ग, स्तोःश्चुना श्चुः) ११. √वह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन)


वरं पक्षच्छेदः¹ समदमघवन्मुक्तकुलिश-
प्रहारैरुद्गच्छद्वहल² दहनोद्गारगुरुभिः।
तुषाराद्रेः सूनोरहह! पितरि क्लेशविवशे
न चासौ सम्पातः पयसि पयसां पत्युरुचितः॥३४॥

अन्वय- उद्गच्छत् - वहलदहनोद्गारगुरुभिः समदमघवन् मुक्तकुलिशप्रहारैः तुषाराद्रेः सूनोः पक्षच्छेदः वरम् (आसीत्) अहह,! पितरि क्लेशविवशे पयसाम् पत्युः पयसि च असौ सम्पातः उचितः न (आसीत्)।

अनुवाद- ऊपर उठती हुई, घनी आग की चिनगारियों से प्रबल, मदयुक्त इन्द्र द्वारा छोड़े हुए वज्र के प्रहारों के द्वारा हिमालय के पुत्र (मैनाक) के पंखों का कट जाना अच्छा (था), (किन्तु) महान् दुःख है, पिता के क्लेश से विवश होने पर जलों के स्वामी (समुद्र) के जल में वह गिरना (छिपना) उचित नहीं (था)।

व्याख्या- प्रस्तुत श्लोक एक पौराणिक कथा की ओर संकेत कर रहा है, प्राचीनकाल में पर्वतों के भी पंख होते थे और वे पक्षियों के समान उड़ सकते थे, उस स्थिति में वे स्वेच्छा से कहीं भी बैठ जाते थे। जिससे धन एवं जन की अत्यधिक हानि होती थी। इससे क्रोधित इन्द्र ने उनके पंखों को अपने वज्र से काटना प्रारम्भ किया।


१. प्राणोच्छेदः (प्राणों का नष्ट होना)
२. बहुलदहनो (अत्यधिक अग्नि के)

नीतिशतकम् ४७

जिस समय पर्वतराज हिमालय के पंखों को काटा जा रहा था, तभी उसका पुत्र मैनाक स्वयं को बचाने के लिए समुद्र में जाकर छिप गया।

इसी घटना की ओर संकेत करते हुए कवि कहता है कि— शक्तिशाली इन्द्र के वज्र के द्वारा, पर्वतों के पंखों को काटते समय टकराने के कारण अग्नि की ऊँची-ऊँची चिनगारियाँ निकलती थी, ऐसे भयावह समय में जब पिता हिमालय के पंख काटे जा रहे थे तब उसका पुत्र मैनाक स्वयं को बचाने के लिए भाग कर समुद्र के जल में जाकर छिप गया। मैनाक के इस घृणित कार्य के प्रति ही निन्दा व्यक्त करता हुआ कवि कहता है कि भले ही मैनाक के पंख क्यों नहीं कट जाते, प्राण ही क्यों नहीं चले जाते, किन्तु उसका आपत्तिग्रस्त पिता को छोड़कर आत्मरक्षा के लिए समुद्र में जाकर छिपना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं था, क्योंकि पिता के आपत्ति में पड़ने पर पुत्र का कर्तव्य होता है कि वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी अपने पिता की रक्षा करे।

विशेष— १. वज्र जैसी कठोर वस्तु जब पर्वतों के कठोर पंखों से टकराई तो भयावह अग्नि की ज्वालाएँ निकलने लगी तब इस रक्तपात से डरकर पुत्र मैनाक अपने प्राण बचाने के लिए समुद्र जाकर छिप गया।
२. यहाँ मनुष्य की स्वार्थमयी वृत्ति की निन्दा की गई है।
३. शिखरिणीछन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।
४. अहह, अव्यय का प्रयोग यहाँ अत्यधिक दुःख की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है।
५. पर्यायोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—

१. √दह् + ल्युट् = दहन
२. उत् + √गम् + शतृ = उद्गच्छत्
३. √मुच् + क्त= मुक्तः
४. मदेन सहित समदः (अव्ययीभाव)
५. √छिद् + घञ् = छेदः
६. क्लेशेन विवशे क्लेशविवशे (तृतीया तत्पुरुष)
७. सम् + √पत् + घञ् = सम्पातः (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
८. उत् + √गृ + घञ् = उद्गारः
९. पक्षाणां छेदः (षष्ठी तत्पुरुष) पक्षच्छेदः
१०. बहलदहन + उद्गारगुरुभिः (गुण, आद् गुणः)
११. च + असौ (दीर्घ - अकः सवर्णे दीर्घः)
१२. पत्युः + उचितः (विसर्ग - ससजुषो रुः)
१३. सूनोः + अहह (विसर्ग - ससजुषो रुः)

४८ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

१४. प्रहारैः + उद्गच्छद् (विसर्ग - ससजुषो रुः)

यदचेतनोऽपि पादैः स्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरिनकान्तः।
तत्तेजस्वी पुरुषः परकृतनिकृतिं कथं सहते॥३५॥

अन्वय- सवितुः पादैः स्पृष्टः यत् अचेतनः अपि इनकान्तः प्रज्वलति, तत् तेजस्वी पुरुषः परकृतनिकृतिम् कथम् सहते।

अनुवाद- सूर्य की किरणों से स्पर्श किया गया जब अचेतन भी सूर्यकान्त मणि जल उठता है, तब (भला) तेजस्वी पुरुष दूसरे के द्वारा किए गए अपकार को किस प्रकार सहन कर सकता है।

व्याख्या- तेजस्वी व्यक्ति किसी दूसरे द्वारा किए गए अपकार को किसी भी स्थिति में सहन नहीं कर सकते हैं, इसी बात के औचित्य को सिद्ध करते हुए कवि सूर्यकान्त मणि का उदाहरण देते हुए कहता है कि जब पूरी तरह अचेतन, निष्प्राण, जड़ सूर्यकान्त मणि सूर्य जैसे तेजस्वी (व्यक्ति) के किरणों रूपी पैरों से ताडित, (अपमानित) होकर उत्तर में, अपने तेज को प्रदर्शित करते हुए प्रतिकार करती हैं।

यदि अचेतन, निष्प्राण वस्तु की यह स्थिति है तो फिर तेजस्वी व्यक्ति तो सचेतन है। अतः वह दूसरों द्वारा किए गए अपमान को कैसे सहन कर सकता है।

विशेष- १. स्वाभिमानी व्यक्ति कभी भी दूसरों द्वारा किए गए अपमान को सहन करने में असमर्थ रहता है।
२. सूर्यकान्त मणि की यह विशेषता होती है कि सूर्य की किरणों के सम्पर्क में आने पर वह जल उठती है।
३. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है—

यस्याः पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि।
अष्टादश द्वितीये, चतुर्थके पञ्चदश सार्या॥

४. यत् और तत् पदों का प्रयोग जब और तब अर्थ में हुआ है।
५. दृष्टान्त अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. यत् + अचेतनः + अपि (झलांजशोऽन्ते, अतो रोरप्लुतादप्लुते)
२. √स्पृश् + क्त = स्पृष्टः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
३. परैःकृतम् (तृतीया तत्पुरुष) परकृतम्
४. नि + √कृ + क्तिन् (द्वितीया विभक्ति, एकवचन) निकृतिम्
५. √सह् + त (आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन, लट् लकार)

सिंहः शिशुरपि निपतति मदमलिनकपोलभित्तिषु गजेषु।
प्रकृतिरियं सत्त्ववतां न खलु वयस्तेजसो हेतुः॥३६॥

नीतिशतकम् ४९

अन्वय- सिंहः शिशुः अपि मदमलिन कपोलभित्तिषु गजेषु निपतति, खलु इयम् सत्त्ववताम् प्रकृतिः, वयः खलु तेजसः हेतुः न (भवति)।

अनुवाद- शेर का बच्चा भी मद से मलिन गण्डस्थलों वाले हाथियों पर आक्रमण करता है, निश्चय ही यह तेजस्वियों का स्वभाव (है), आयु ही तेज का कारण नहीं (होती)।

व्याख्या- पराक्रम तेजस्वी प्राणी का स्वभाव ही होता है, चाहे वह किसी भी आयु का क्यों न हो। अतः पराक्रम प्रदर्शन का सम्बन्ध आयु से नहीं, अपितु व्यक्ति के स्वभाव पर निर्भर है।

यही कारण है कि शेर का बच्चा अल्पायु होने पर भी छोटे-मोटे प्राणियों को अपना शिकार नहीं बनाता है, अपितु ऐसे शक्तिशाली हाथी, जिनके गण्डस्थल मदजल के निरन्तर बहने के कारण मलिन हैं, पर ही शिकार करने के लिए आक्रमण करता है।

विशेष- १. पराक्रम का सम्बन्ध आयु से नहीं, अपितु व्यक्ति या प्राणी के स्वभाव से है। २. प्रस्तुत श्लोक में आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण पूर्ववत् है। ३. मद-शक्तिशाली एवं नवयुवक श्रेष्ठश्रेणी के हाथी की कनपटियों से निकलने वाला द्रव पदार्थ। ४. काव्यलिंग अलंकार।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. प्रकृतिः + इयम् (ससंजुषो रुः विसर्ग) प्रकृतिरियम् २. शिशुः + अपि (ससजुषो रुः, विसर्ग) शिशुरपि ३. नि + √पत् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) निपतति ४. सत्त्व + मतुप् = सत्त्वत् (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) ५. मदेन मलिनाः कपोलानाम् भित्तयः येषाम् तेषु ६. तेजसः + हेतुः (विसर्ग, हशि च)

मालतीकुसुमस्येव द्वे गती स्तो मनस्विनः।
मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य शीर्यते वन एव वा॥३७॥

अन्वय- मालती कुसुमस्य इव मनस्विनः द्वे गती स्तः। सर्वलोकस्य मूर्ध्नि वने एव वा शीर्यते।

अनुवाद- मालती पुष्प के समान मनस्वी की दो स्थितियाँ हैं। (वह या तो) सभी लोगों के ऊपर (रहता है) या (फिर) वन में ही नष्ट हो जाता है।

व्याख्या- जो लोग स्वाभिमानी होते हैं, उनकी स्थिति मालती के फूल के समान दो प्रकार की होती है— जिस प्रकार पुष्प, देवता आदि के मस्तक पर आरूढ होकर सम्मान

५० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

प्राप्त करता है या फिर वन में ही नष्ट हो जाता है। ठीक उसी प्रकार या तो वह सम्पूर्ण समाज अथवा राष्ट्र में सर्वोपरि पद पर रहकर शासन करते हुए सम्मान प्राप्त करता है अथवा फिर वह वैराग्य भावना से युक्त होकर वन में ही तपस्या करता हुआ प्राण त्याग देता है और संसार के लोग उसे जान भी नहीं पाते हैं।

विशेष- १. मनस्वी व्यक्ति की उपमा मालती पुष्प के साथ दी गई है। अतः उपमालंकार-लक्षण-

प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।

२. मनस्वी लोगों की विशेषता है कि वे निकृष्ट जीवन की अपेक्षा मर जाना अधिक श्रेष्ठ समझते हैं। ३. स्वाभिमानी व्यक्ति के स्वभाव का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया गया है। ४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है-

श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं, सर्वत्रलघुपञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. मनस् + विनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) मनस्विनः २. सर्वेषाम् लोकः सर्वलोकः तस्य सर्वलोकस्य ३. $\sqrt{\text{शृ}}$ + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) शीर्यते


एकेनापि हि शूरेण पादाक्रान्तं महीतलम्।
क्रियते भास्करेणेव परिस्फुरिततेजसा१॥३८॥

अन्वय- परिस्फुरिततेजसा भास्करेण इव एकेन अपि शूरेण हि महीतलम् पादाक्रान्तम् क्रियते।

अनुवाद- प्रखर तेज से युक्त सूर्य के समान अकेले शूर के द्वारा भी निश्चय ही (सम्पूर्ण) पृथ्वी तल पादाक्रान्त कर लिया जाता है।

व्याख्या- जिस प्रकार देदीप्यमान तेज से युक्त सूर्य अपनी किरणों से सम्पूर्ण संसार को आक्रान्त कर लेता है, ठीक उसी प्रकार एक अकेला शूरवीर भी अपनी शक्ति, तेज एवं यश के द्वारा सम्पूर्ण पृथिवीतल को आक्रान्त कर लेता है अर्थात उसका प्रभाव सम्पूर्ण संसार में सूर्य के समान प्रसारित होता है।

विशेष- १. शूरवीर की उपमा सूर्य के साथ दी गई है।
२. प्रस्तुत श्लोक में 'पाद' पद में श्लेष है, सूर्य के पक्ष में इसका अर्थ 'किरण' होगा तथा शूर के पक्ष में इसका 'चरण' अर्थ होगा। अतः श्लेष अलंकार है। लक्षण है-


१. स्फारस्फुरित