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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

श्लोकानुक्रमणिका

६४५

| सर्ग | श्लोकः | | सर्ग | श्लोकः | | :--- | :---: | :---: | :--- | :---: | :---: | | इतस्ततश्च वैदेहीम | १२ | ५९ | इत्युक्तवन्तं जनकात्म | १४ | ४३ | | इति क्रमात्प्रयुञ्जानो | १७ | ६८ | इत्युक्त्वा मैथिलीं भर्तु | १२ | ३८ | | इति क्षितीशो नवतिं न | ३ | ६९ | इत्युद्गताः पौरवधू | ७ | १६ | | इति जित्वा दिशो जिष्णु | ४ | ८५ | इत्यूचिवानुपहताभरणः | १६ | ८६ | | इति प्रगल्भं पुरुषा | २ | ४१ | इदमुच्छ्वसितालकं | ८ | ५५ | | इति प्रगल्भं रघुणा स | ३ | ४७ | इन्दीवरश्यामतनु | ८ | ६५ | | इति प्रतिश्रुते राज्ञा | १५ | ७४ | इन्दोरगतयः पद्मे | १७ | ७५ | | इति प्रसादयामासुस्ते | १० | ३३ | इन्द्राद्वृष्टिनिर्यमितगदो | १७ | ८१ | | इति वादिन एवास्या | १ | ८२ | इन्द्रियार्थपरिशून्यम | १९ | ६ | | इति विज्ञापितो राज्ञा | १ | ७३ | इमां तटाशोकलतां च | १३ | ३२ | | इति विरचितवाग्भिः | ५ | ७५ | इमां स्वसारं च यवीय | १६ | ८५ | | इति विस्मृतान्यकरणीय | ९ | ६९ | इयमप्रतिबोधशायि | ८ | ५८ | | इति शत्रुपु चेन्द्रियेषु | ८ | २३ | इप्सितं तदवज्ञाना | १ | ७९ | | इति शिरसि स वामं | ७ | ७० | उ | | | | इति संत्यज्यं शत्रुघ्नं | १५ | १९ | उत्खातलोकत्रयकण्टके | १४ | ७३ | | इति स्वसुर्भोजकुलप्र | ७ | २९ | उत्तस्थुषः सपदि पल्व | ९ | ५९ | | इत्थं क्षितीशेन वशी | २ | ६७ | उत्तिष्ठ वत्सेत्यमृता | २ | ६१ | | इत्थं गते गतघृणः | ९ | ८१ | उत्तिष्ठ वत्से ननु सानु | १४ | ६ | | इत्थं जनितरागासु | १७ | ४४ | उत्थापितः संयति रेणु | ७ | ३९ | | इत्थं द्विजेन द्विजराजं | ५ | २३ | उदकप्रस्थे स्थिरधीः | १५ | ९८ | | इत्थं नागस्त्रिभुवनगु | १६ | ८८ | उदधेरिव रत्नानि | १० | ३० | | इत्थं प्रयुज्याशिषम | ५ | ३५ | उदयमस्तमयं च | ९ | ९ | | इत्थं व्रतं धारयतः | २ | २५ | उदये मदवाच्यमुज्झ | ८ | ८४ | | इत्यध्वनः कैश्चिदहोभि | १६ | ३५ | उदायुधानापततस्तो | १२ | ४४ | | इत्यपास्तमखविघ्नयो | ११ | ३० | उद्बन्वकेशश्च्युतपत्र | १६ | ६७ | | इत्यर्घ्यपात्रानुमित | ५ | १२ | उद्गच्छमाना गमनाय | १६ | २९ | | इत्याप्तवचनाद्रामो | १५ | ४८ | उद्यतैकभुजयष्टिमा | ११ | १७ | | इत्या प्रसादादस्यास्त्वं | १ | ९१ | उन्नाभ इत्युद्गतनाम | १८ | २० | | इत्यारोपितपुत्रास्ते | १५ | ९१ | उन्मुखः सपदि लक्ष्मणा | ११ | २६ |

६४६ | रघुवंशमहाकाव्ये

| सर्गे | श्लोकः | | सर्गे | श्लोकः | | :--- | :---: | :---: | :--- | :---: | :---: | | उपकूलं स कालिन्द्याः पु | १५ | २८ | ए | | | | उपगतोऽपि च मण्डल | ९ | १५ | एकातपत्रं जगतः | २ | ४७ | | उपचितावयवा शुचि | ९ | ४४ | एको दाशरथिः कामं या | १२ | ४५ | | उपपन्नं ननु शिवं | १ | ६० | एतद्गिरेर्माल्यवतः | १३ | २६ | | उपययौ तनुतां मधु | ९ | ३८ | एतन्मुनेर्मानिनि शात | १३ | ६८ | | उपशल्यनिविष्टैस्तैश्च | १५ | ६० | एताः करोत्पीडितवारि | १६ | ६६ | | उपस्थितविमानेन ते | १५ | १०० | एता गुरुश्रोणिपयोधर | १६ | ६० | | उपस्थितां पूर्वमपास्य | १४ | ६३ | एतावदुक्तवति दाश | १३ | ६८ | | उपहितं शिशिरादग | ९ | ३१ | एतावदुक्त्वा प्रतिया | ५ | १८ | | उपात्तविद्यं विधिव | ५ | ३८ | एतावदुक्त्वा विरते | २ | ५१ | | उपान्तयोर्निष्कुषितं वि | ७ | ५० | एते वयं सैकतभिन्न | १३ | १७ | | उपान्तवानीरवनोप | १३ | ३० | एवं तयोक्ते तमवेक्ष्य | ६ | २५ | | उपेत्य मुनिवेषोऽथ कालः | १५ | ९२ | एवं तयोरध्वनि | ५ | ६० | | उपेत्य सा दोहददुःख | ३ | ६ | एवमात्तरतिरात्मसं | ११ | ५७ | | उभयमेव वदन्ति | ९ | ३ | एवमाप्तवचनात्स | ११ | ४२ | | उभयोरपि पार्श्ववर्ति | ८ | २९ | एवमिन्द्रियसुखानि | १९ | ४७ | | उभयोर्न तथा लोकः | १५ | ६८ | एवमुक्तवति भीमदर्शने | ११ | ७९ | | उभावुभाभ्यां प्रणतौ | १४ | २ | एवमुक्ते तया साध्व्या | १५ | ८२ | | उमावृषाङ्कौ शरज | ३ | २३ | एवमुद्यन्प्रभावेण शास्त्र | १७ | ७७ | | उरस्यपर्याप्तनिवेश | १८ | ४७ | एषा त्वया पेशलमध्यया | १३ | ३४ | | उवाच धात्र्या प्रथमोदि | ३ | २५ | एषा प्रसन्नस्तिमित | १३ | ४८ | | उषसि स गजयूथक | ९ | ७१ | एषोऽक्षमालावलयं | १३ | ४३ | | ऋ | | | ऐ | | | | ऋत्विजः स तथानर्घ्य दक्षि | १७ | ८० | ऐन्द्रमस्त्रमुपादाय | १५ | २२ | | ऋूढापर्णं राजपथं स | १४ | ३० | ऐन्द्रिः किल नखैस्तस्या | १२ | २२ | | ऋषिदेवगणस्वधाभु | ८ | ३० | ऐरावतास्फालनविशल | ६ | ७३ | | ऋषीन्विसृज्य यज्ञान्ते | १५ | ८६ | क | | | | ऋष्यशृङ्गादयस्तस्य | १० | ४ | कण्ठसक्तमृदुबाहु | १९ | २९ | | | | | कण्डूयमानेन कटं | २ | ३७ |

श्लोकानुक्रमणिका ६४७

श्लोकसर्गेश्लोकःश्लोकसर्गेश्लोकः
कथं नु शक्योऽनुनयो२५४किंतु वध्वां तवैत१६५
कराभिघातोत्थितकन्दु१६८३किमत्र चित्रं यदि का५३३
करेण वातायनलम्बि१३२१किमप्यहिंस्यस्तव२५७
कलत्रनिन्दागुरुणा१४३३किमात्मनिर्वादकथामु१४३४
कलत्रवन्तमात्मान१३२किवा तवात्यन्तवियोग१४६५
कलत्रवाहं वाले कनी१२३४कुमारभृत्याकुशलैरनु३१२
कलमन्यभृतासु भाषितं८५९कुमाराः कृतसंस्कारा१०७८
कल्याणबुद्धेरथवा१४६२कुम्भकर्णः कपीन्द्रेण१२८०
कश्चित्कराभ्यामुपगूढ६१३कुम्भपूरणभवः पटु९७३
कश्चिद्द्विषत्खड्गहृतो७५१कुम्भयोनिरलंकारं१२५५
कश्चिद्यथाभागमवस्थि६१९कुरुष्व तावत्करभो१३१८
कातरोऽसि यदि वोद्गता११७८कुलेन कान्त्या वयसा न६७९
कातर्यं केवला नीतिः१७४७कुशावतीं श्रोत्रियसात्स१६२५
का त्वं शुभे कस्य परिग्र१६८कुशेशयाताम्रतलेन६१८
काप्यभिख्या तयोरासी१४६कुसुमं कृतदोहदस्तव८६२
कामं कर्णान्तविश्रान्ते४१३कुसुमजन्म ततो नव९२६
कामं जीवति मे नाथ१२७५कुसुममेव न केवल९२८
कामं न सोऽकल्पत पैतृ१८४०कुसुमान्यपि गात्रसंग८४४
कामं नृपाः सन्तु सहस्र६२२कुसुमग्रंथितामपार्थि८३४
कामं प्रकृतिवैराग्यं स१७५५कुसुमोत्खचितान्वलीभृ८५३
कामरूपेश्वरस्तस्य४८४कूटयुद्धविधिज्ञेऽपि न१७६९
कामिनीसहचरस्य कामि१९५कृच्छ्रलब्धमपि लब्ध११२
काम्बोजाः समरे सोढुं४६९कृतदण्डः स्वयं राजा१५५३
कायेन वाचा मनसा५५कृतप्रतिकृतप्रीतंस्तयो१२९४
कार्तिकीषु सवितानह१९३९कृतः प्रयत्नो न च देव१६७६
कार्येषु चैककार्यत्वा१०४०कृतवत्यसि नावधीरणां८४८
कार्ष्णेन पत्रिणा शत्रुः स१५२४कृतसीतापरित्यागः स१५१
कालान्तरश्यामसुधेषु१६१८कृताञ्जलिस्तत्र यदम्ब१४१६
काषायपरिवीतेन१५७७कृताभिषेकैर्दिव्यायां१०६३

१४८ | रघुवंशमहाकाव्ये

श्लोकांशसर्गश्लोकःश्लोकांशसर्गश्लोकः
कृशानु रपधूमत्वा१०७४खर्जूरिस्कन्धनद्धानां४५७
क्लृप्तपुष्पशयनांल्लता१९२३ग
केवलं स्मरणेनैव१०२९गन्धश्च धाराहतपल्व१३२७
कैकेय्यास्तनयो जज्ञे१०७०गरुडापातविश्लिष्टमेघ१२७६
कैलासगोरं वृष२३५गर्भ दधत्यर्कमरीचयो१३४
कोशेनाश्रयणीयत्वमि१७६०गृणवत्सुतरोपितश्रियः८११
कौशिके न स किल क्षिती१११गुणैराराधयमासु१०८५
कौसल्य इत्युत्तरकोस१८२७गुप्तं ददृशुरात्मानं१०६०
ऋतुषु तेन विसर्जित९२०गुरोनियोगाद्वनितां१४५१
क्रथकौशिकवंशसंभ८८२गुरोयियक्षोः कपिलेन१३३
क्रमेण निस्तीर्य च३७गुरोः स चानन्तरमन्त१८१५
क्रियानिमित्तेष्वपि५७गुरोः सदारस्य निपी२२३
क्रियाप्रबन्धादयमश्व६२३गुर्वर्थमर्थी श्रुतपार५२४
क्रीडापतत्रिणोऽप्यस्य१७२०गृहिणी सचिवः सखी मिथः८६७
क्रोशाधं प्रकृतिपुरःसरेण१३७९गृहीतप्रतिमुक्तस्य४४३
क्लेशावहा भर्तुरलक्ष१४५गेये को नु विनेता वा१५६९
क्वचिच्च कृष्णोरगभूषणेव१३५७गौरवाद्यदपि जातु१९७
क्वचित्खगानां प्रियमान१३५५ग्रथितमोलिरसौ वन९५१
क्वचित्पथा संचरते१३१९ग्रामेष्वात्मविसृष्टेषु१४४
क्वचित्प्रभा चान्द्रमसी१३५६घ
क्वचित्प्रभालेपिभिरिन्द्र१३५४घ्राणकान्तमधुगन्ध१९११
क्व सूर्यप्रभवो वंशः१२च
क्षणमात्रसखीं सुजात८३७चकम्पे तीर्णलौहित्ये४८१
क्षतात्किल त्रायत२५३चतुर्भुजांशप्रभवः स१६३
क्षत्रजातमपकारवरि११७१चतुर्वर्गफलं ज्ञानं१०२२
क्षत्रियान्तकरणोऽपि११७५चन्दनेनाङ्गरागं च मृग१७२४
क्षितिरिन्दुमती च भामिनी८२८चमरान्परितः प्रवर्ति९६६
खचरणयोर्नखरागस९१३
खनिभिः सुषुवे रत्नं क्षेत्रैः१७६६चरतः किल दुश्चरं८७९

श्लोकानुक्रमणिका

६४९

श्लोक-प्रतीकसर्गश्लोक:श्लोक-प्रतीकसर्गश्लोक:
चारुनृत्यविगमे च१९१५ज्याघातरेखे सुभुजो६५५
चित्रकूटवनस्थं च कथि१२१५ज्यानिनादमथ गृह्णती१११५
चित्रद्विपाः पद्मवनाव१६१६ज्याबन्धनिष्पन्दभुजेन६४०
चुम्बने विपरिवर्तिता१९२७ज्येष्ठाभिगमनात्पूर्वं ते१२३५
चूर्णबभ्रु लुलितस्रगा१९२५त
छतं रागबन्धेष्ववितृप्तमे१८१९
छाया-मण्डललक्ष्येण४५तं राजवीध्यामधिहस्ति१८३९
छायाविनीताध्वपरिश्र१३४६तं वाहनादवनतोत्त९६०
जतं विनिष्पिष्य काकुत्स्थो१२३०
जगाद चैनामयमङ्ग६२७तं विस्मंतं धेनुरुवाच२६२
जगृहुस्तस्य चित्तज्ञाः१५९९तं वेधा विदधे नूनं१२९
जनपदे न गदः पद९४तं शरैः प्रतिजग्राह खर१२४७
जनस्य तस्मिन्समये वि१६५३तं श्लाघ्यसम्बन्धमसी५४०
जनस्य साकेतनिवा५३१तं सन्तः श्रोतुमर्हन्ति११०
जनाय शुद्धान्तचरा३१६तं कर्णभूषणनिपी५६५
जनास्तदालोकपथात्प्र१५७८तं कर्णमूलमागत्य रामे१२२
जयश्रियः संवननं१६७४तं कृतप्रणतयोऽनुजीवि१९८
जलानि वा तीरनिखात१३६१तं कृपामृदुरवेक्ष्य११८३
जहार चान्येन मयूर३५६तं गृहोपवन एव संग१९५४
जातः कुले तस्य किलोरु६७४तच्चात्मचिन्तासुलभं वि१४२०
जात्यस्तेनाभिजातेन१७४तच्चोदितश्च तमनु९७७
जाने विसृष्टां प्रणिधान१४७२ततः कक्ष्यान्तरन्यस्तं१७२१
जाने वो रक्षसाक्रान्ता१०३८ततः परं वज्रधरप्रभाव१८२१
जालान्तरप्रेषितदृष्टि७९ततः परं तत्प्रभवः१८३४
जिगमिषुर्घनदाघ्युषि९२५ततः परं तेन मखाय३३९
जुगुहू तस्याः पथि१४४९ततः परं दुःप्रसहं६३१
जुगोपात्मानमत्र१२१ततः परमभिव्यक्त१७४०
जेतारं लोकपालानां१२८९ततः प्रकोष्ठे हरिचन्द३५९
ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ१२२ततः प्रजानां चिरमात्म३३५

६५० रघुवंशमहाकाव्ये

सर्गेश्लोकःसर्गेश्लोकः
ततः प्रतस्थे कौवेरीं४६६तत्र सेकहृतलोचनाञ्जनं१११०
ततः प्रहस्यापभयः३५१तत्र सौधगतः पश्यन्य१५३०
ततः प्रियोपात्तरसेऽधरो७६३तत्र स्वयंवरसमा५६४
ततः स कृत्वा धनुरत१६७७तत्र हूणावरोधानां४६८
ततः सपर्यां सपशूपहा१६३९तत्राक्षोभ्यं यशोराशि४८०
ततः समाजापयदाशु१६७६तत्र भिषकप्रयता१४८२
ततः समानीय न मानि२६४तत्राचितो भोजपतेः७२०
ततः सुनन्दावचना६८०तत्रेश्वरेण जगतां१३७७
ततस्तदालोकनतत्प७५तत्रैनं हेमककुम्भेषु१७१०
ततो गौरीगुरुं शैल४७१तथा गतायां परिहास६८२
ततो धनुष्कर्षणमूढ७६२तथापि शास्त्रव्यवहार३६२
ततो भिषङ्गादसमग्र३६४तथेति कामं प्रतिशुश्रुवा३६७
ततो नृपाणां श्रुतवृत्त६२०तथेति गामुक्तवते२५९
ततो नृपेणानुगताः स्त्रियः१६६९तथेति तस्याः प्रणयं१६२३
ततो बिभेद पौलस्त्यः१२७७तथेति तस्याः प्रतिगृह्य१४६८
ततोऽभिषङ्गानिलविप्र१४५४तथेति तस्यावितथं५२६
ततो मृगेन्द्रस्य मृगे२३०तथेति प्रतिजग्राह१९२
ततो यथावद्विहिता५१९तथेति प्रतिपन्नाय१५९३
ततोऽवतीर्यांशु करेणु७१७तथेत्युपस्पृश्य पयः५५९
ततो वेलातटेनैव४४४तथैव सुग्रीवबिभीष१४१७
ततद्भूमिपतिः पत्न्यै१४७तदङ्गनिष्यन्दजलेन३४१
तत्प्रतीपपवनादिवैकृ११६२तदङ्गमग्र्यं मघवन्म३४६
तत्प्रसुप्तभुजगेन्द्रभी११४४तदञ्जनकलेदसमाकु७२७
तत्प्रार्थितं जवनवाजि९५६तदद्भुतं संसदि रात्रि१६२४
तत्र जन्यं रघोर्घोरं४७७तदपोहितुमर्हसि प्रिये८५४
तत्र तीर्थसलिलेन१९२तदन्यतस्तावदन५१७
तत्र दीक्षितमृषि ररक्ष११२४तदन्वये शुद्धिमति१९२
तत्र नागफणोत्क्षिप्तसि१५८३तदर्हसीमां वसतिं१६२२
तत्र यावधिपती मख११२७तदलं तदपायचिन्त८८३

श्लोकानुक्रमणिका ६५१

सर्गश्लोकःसर्गश्लोकः
तदात्मसंभवं राज्ये१७८तमर्चयित्वा विधि५३
तदाननं मृत्सुरभि३३तमलभन्त पतिं पति९१७
तदाप्रभृत्येव वन२३८तमशक्यमपाक्रष्टुं नि१२१७
तदीयमाक्रन्दितमा२२८तमश्रु नेत्रावरणं प्रमृज्य१४७१
तदेतदाजानुविलम्बि१६८४तमातिथ्यक्रियाशान्त१५८
तदेष सर्गः करुणाद्रं१४४२तमात्मसंपन्नमनिन्दि१८१८
तद्गतिं मतिमतां वरे११८७तदादौ कुलविद्यानाम१७३
तद्गीतश्रवणैकाग्रा१५६६तमाधूतध्वजपटं व्यो१२८५
तद्रक्ष कल्याणपरं२५०तमापतन्तं नृपते५५०
तद्व्योम्नि शतधा भिन्नं१२९८तमार्यगृह्यं निगृहीत२३३
तनुत्यजां वर्मभृतां७४८तमाहितौत्सुक्यमद२७३
तनुलतांविनिवेशित९५२तमीशः कामरूपाणा४८३
तं तस्थिवांसं नगरोप४६१तमुद्वहन्तं पथि भोज७३५
तं दधन्मैथिलीकण्ठनि१५५६तमुपाद्रवदुद्यम्य दक्षि१५२३
तं धूपाश्यानकेशान्तं१७२२तमृषिः पूजयामास१५१२
तन्मदीयमिदमायुधं११७७तं पयोधरनिषिक्तच१९४५
तं न्यमन्त्रयत संभृत११३२तं पितुर्वधभवेन म११६७
तपस्यानधिकारित्वात्प्र१५५१तं प्रमत्तमपि न प्रभाव१९४८
तपस्विवेषक्रिययापि१४९तं प्राप्य सर्वावयवान६६९
तपस्विसंसर्गविनीत१४७५तं प्रीतिविशदैर्र्नेत्रैरन्व१७३५
तपोरक्षन्स विघ्नेभ्यस्त१७६५तं भावार्थं प्रसवसमया१९५७
तमङ्कमारोप्य शरीर३२६तं भूपतिर्भासुरहे५३०
तमध्वराय मुक्ताश्वं१५५८तया स्रजा मङ्गलपुष्प६८४
तमध्वरे विश्वजिति५१तया हीनं विधातर्मा१७०
तमपहाय ककुत्स्थकुलो९१६तयोर्दिवस्पतेरासीदेकः१७७
तमब्रवीत्सा गुरुणा नव१६९तयोरपाङ्गप्रतिसारि७२३
तमभ्यनन्दत्प्रथमं प्र३६८तयोरुपान्तस्थितसिद्ध३५७
तमभ्यनन्दत्प्रणतं स१५४०तयोर्जगृहतुः पादा१५७
तमरण्यसमाश्रयोन्मुखं८१२तयोर्यथाप्रार्थितमिन्द्रि१४२५

६५२ रघुवंशमहाकाव्ये

प्रतीकसर्गेश्लोकःप्रतीकसर्गेश्लोकः
तयोश्चतुर्दशैकैन१२५तस्य कर्कशविहारसं९६८
तयोस्तस्मिन्नवीभूत१२५६तस्य कल्पितपुरस्क्रिया११५१
तद्वल्गुना युगपदु५६८तस्य जातु मरुतः प्रती११५८
तव निःश्वसितानुकारि८६४तस्य दाक्षिण्यरूढेन१३१
तव मन्त्रकृतो मन्त्रै१६१तस्य द्विपानां मदवारि१६३०
तवार्हतो नाभिगमे५११तस्य निर्दयरतिश्रमाल१९३२
तवाधरस्पर्धिषु विद्रु१३१३तस्य पाण्डुवदनाल्पभू१९५०
तवोरुकीर्तिः श्वशुरः१४७४तस्य पूर्वोदितां निन्दां१५५७
तस्मात्पुरःसरबिभीष१६६९तस्य प्रभानिर्जितपुष्प१७३२
तस्मात्समुद्रादिव मध्य१६७९तस्य प्रयातस्य वरूथि१६२८
तस्मादघः किंचिदिवाव१८४१तस्य प्रसह्य हृदयं कि८९३
तस्मिन्कुलापीडनिभे१८२९.तस्य मार्गवशादेका१५११
तस्मिन्क्षणे पालयितुः२६०तस्य संवृतमन्त्रस्य१२०
तस्मिन्गते द्यां सुकृतो१८२२तस्य सन्मन्त्रपूताभिः१७१६
तस्मिन्गते विजयिनं११९२तस्य संस्तूयमानस्य च१५२७
तस्मिन्नभिद्योतितबन्धु६३६तस्य सावरणदृष्टसंधयः१९१६
तस्मिन्नवसरे देवाः१०५तस्य स्तनप्रणयिभिर्मु९५५
तस्मिन्नात्मचतुर्भागे१५९६तस्य स्फुरति पौलस्त्यः१२९०
तस्मिन्नास्थदिषीकास्त्रं१२२३तस्य वीक्ष्य ललितं वपुः११३८
तस्मिन्प्रयाते परलोक१८१६तस्यां रघोः सूनुरुपस्थि६६८
तस्मिन्न्रामशरोत्कृत्ते१२४९तस्याः खुरन्यासपवित्र५२
तस्मिन्समावेशितचित्त६७०तस्याधिकारपुरुषैः५६३
तस्मिन्ह्रदः संहितमात्र१६७८तस्यानलोजास्तनयस्त१८५
तस्मिन्विधानातिशये६११तस्यानीकैर्विसर्पद्भि४५३
तस्मै कुशलसंप्रश्न१०३४तस्मान्मुच्ये यथा तात१७२
तस्मै निशाचरैश्वर्यं१२६९तस्यान्वये भूपतिरेष६४१
तस्मै विसृज्योत्तरकोस१८७तस्यापनोदाय फलप्र१४३९
तस्मै सभ्याः सभायाय१५५तस्यापरेष्वपि मृगेषु९५८
तस्मै सम्यग्घुतो वह्नि४२५तस्याः प्रसन्नेन्दुमुखः..२६८

श्लोकानुक्रमणिका

६५३

श्लोकसर्गश्लोकःश्लोकसर्गश्लोकः
तस्याः प्रतिद्वन्द्विभवाद्दि७६८तां देवतापित्नतिथि२१६
तस्याः प्रकामं प्रियदर्श६४४तान्हत्वा गजकुलबद्ध९६५
तस्याभवत्सूनुरुदार१८१७तां प्रत्यभिव्यक्तमनोर६१२
तस्याभिषेकसंभारं१२४ताभ्यस्तथाविधान्स्ना१०६४
तस्यामात्मानुरूपा१३३ताभिर्गर्भः प्रजामूत्यै१०५८
तस्यामेवास्य यामिन्याम्१५१३तामग्रतस्तारमरसान्त६३७
तस्यामन्तर्हितसौधमा१३४०तामङ्कमारोप्य कृशाङ्ग१४२७
तस्यालमेषा क्षुधितस्य२३९तामन्तिकन्यस्तबलि२२४
तस्यावसाने हरिदश्वधा१८२३तामभ्यगच्छद्रुदितानु१४७०
तस्याः स रक्षार्थमनल्प७३६तामर्पयामास च शोक१४८०
तस्याः स राजोपपदं१६४०तामेकभार्यां परिवाद१४८६
तस्यास्तथाविधनरेन्द्र१९५६तां पुण्यदर्शनां दृष्ट्वा१८६
तस्याः स्पृष्टे मनुजपति१६८७ताम्बूलीनां दलैस्तत्र४४२
तस्यैकनागस्य कपोल५४७ताम्बूलवल्लीपरिणद्ध६६४
तस्यैकस्योच्छ्रितं छत्रं१७३३ताम्रपर्णीसमेतस्य४५०
तस्यै प्रतिश्रुत्य रघुप्र१४२९ताम्रोदरेषु पतितं५७०
तस्यै भर्तुरभिज्ञानमङ्गु१२६२ता राघवं दृष्टिभिरापि७१२
तस्योत्सृष्टनिवासेषु४७६तावत्प्रकीर्णाभिनवोप७४
तस्योदये चतुर्मूर्तेः१०७३तावुभावपि परस्पर११८२
तस्योपकार्यारचिती५४१तासां मुखैरासवगन्ध७११
तस्योधमहती मूर्ध्नि१७१४तासु श्रिया राजपरम्प६५
तं स्वसा नागराज्यस्य१७६ताः स्वचारित्रमुद्दिश्य१५७३
तां शिल्पिसंघाः प्रभुणा१६३८ताः स्वमङ्कमधिरोप्य दो१९४४
तां सैव वेत्रग्रहणे६२६तिस्रस्त्रिलोकप्रथितेन७३३
ता इङ्गुदीस्नेहकृतप्र१४८१तीरस्थली बर्हिभिरुक्त१६६४
तात शुद्धा समक्षं नः स्नुषा१५७२तीर्थे तदीये गजसेतुब१६३३
ता नराधिपसुता नृपा११५६तीर्थे तोयव्यतिकरभ८९५
तां तामवस्थां प्रतिपद्य१३५तीव्रवेगधुतमार्गवृ१११६
तां दृष्टिविषये भर्तुर्मु१५७९ते चतुर्थसहितास्त्रयो११५५

६५४ रघुवंशमहाकाव्ये

सर्गेश्लोकःसर्गेश्लोकः
ते च प्रापुरुदन्वन्तं१०६तैः शिवेषु वसतिर्गता११३३
तेजसः सपदि राशिर्११६३तौ दंपती बहु विलप्य९७८
ते तस्य कल्पयामा१७९तौ निदेशकरणोद्यतौ११४
तेन कार्मुकनिषक्तमु११७०तौ पितुर्नयनजेन वारि११५
तेन दूतिविदितं निषे१९१८तौ प्रणामचलकाकपक्ष११३१
तेन द्विपानामिव पुण्य१८८तौ बलातिबलयोः प्रभा११९
तेन भूमिनिहितैकको११८१तौ समेत्य समये स्थिता११५३
तेन मन्त्रप्रयुक्तेन नि१२९९तौ सरांसि रसविद्गिर११११
तेनातपत्रामलमण्डले१६२७तौ सीतान्वेषिणौ गृध्रं१२५४
तेनाभिघातरभसस्य९३१तौ सुकेतुसुतया खिली१११४
तेनावरोधप्रमदास१६७१तौ स्नातकर्बन्धुमता च७२८
तेनार्थवांल्लोभपराङ्मु१४२३तौ विदेहनगरीनिवासि११३६
तेनावतीर्य तुरगात्प्र९७६त्यजत मानमलं बत९४७
तेनाष्टौ परिगमिताः८९२त्यागाय संभृतार्थानां१७
तेनोत्तीर्य पथा लङ्कां११७१त्याजितः फलमुत्खातं४३३
तेनोरुवीर्येण पिता प्रजायै१८२त्रस्तेन तार्क्ष्यात्किल कालिये६४९
ते पुत्रयोनैर्ऋतशस्त्र१४४त्रिदिवोत्सुकयाप्यवेक्ष्य८६०
ते प्रजानां प्रजानाथा१०८३त्रिलोकनाथेन सदा म३४५
ते प्रीतमनसस्तस्मै या१७१८त्रेताग्निधूमाग्रमनिन्द्य१३३७
ते बहुज्ञस्य चित्तज्ञं१०५६त्रैलोक्यनाथप्रभवं प्र१६८१
ते रामाय वधोपायामा१५५त्वं रक्षसा भीरु यतोऽप१३२४
ते रेखाध्वजकुलिशा४८८त्वचं स मेध्यां परिधाय३३१
ते सेतुवार्तागजवन्धमु१६२त्वया पुरस्तादुपयाचि१३५३
तेऽस्य मुक्तागुणोन्नद्धं१७२३त्वयैवं चिन्त्यमानस्य१६४
तेषां सदश्वभूयिष्ठा४७०त्वय्यावेशितचित्तानां१०२७
तेषा द्वयोर्द्वयोरवयं१०८२द
तेषां महार्हासनसंस्थि६६दक्षिणेन पवनेन सं१९४३
तैः कृतप्रकृतिमुख्यसं१९५५दधतो मङ्गलक्षोमे वसा१२८
तैस्त्रयाणां शितैर्वाणैयं१२४८दयितां यदि तावदन्व्८५०

श्लोकानुक्रमणिका

६५५

श्लोकःसर्गेश्लोकःश्लोकःसर्गेश्लोकः
दर्पणेपु परिभोगदर्शि१९२८द्वेष्योऽपि संमतः शिष्ट१२८
दशदिगन्तजिता रघु९५ध
दशरश्मिशतोपमद्यु८२९धनुर्भृतोऽप्यस्य दयार्द्रं२११
दशाननकिरीटेभ्य१०७५धरायां तस्य संरम्भं१५८५
दिगभ्यो निमन्त्रिताश्चैनम१५५९धर्मलोपभयाद्राज्ञी१७६
दिन दिने शैवलवन्त्य१६४६धातारं तपसा प्रीतं१०४३
दिनेषु गच्छत्सु नितान्त३८धारास्वनोद्गारिदरीमु१३४७
दिलीपसूनोः स बृह३५४धियः समग्रैः स गुणैरु३३०
दिलीपानन्तरं राज्ये४२घमधूमो वसागन्धी१५१६
दिवं मरुत्वानिव भो३४धूमादग्नेः शिखाः पश्चादु१७३४
दिशः प्रसेदुर्मरुतो ववुः३१४धृतिरस्तमिता रतिश्च्यु८६६
दिशि मन्दायते तेजो४४९ध्रुवमस्मि शठः शुचिस्मिते८४९
दिष्टान्तमाप्स्यति भवान९७९ध्वजपटं मदनस्य धनु९४५
दीर्घेष्वमी नियमिताः५७३न
दुकूलवासाः स वधूस७१९न किलानुययुस्तस्य१२७
दुदोह गां स यज्ञाय१२६न कृपणा प्रभवत्यपि९८
दुरितदर्शनेन ध्वंस्त१७७४न केवलं गच्छति तस्य१८४९
दुरितैरपि कर्तुमात्म८२न खरो न च भूयसा८९
दुर्गाणि दुर्ग्रहाण्यासंस्त१७५२न चावदद्भर्तुरवर्णं१४५७
दुर्जातिबन्धुरयमृक्ष१३७२न चोपलेभे पूर्वैषा१०२
दूरादयश्चक्रनिभस्य१३१५न तस्य मण्डले राज्ञो१७५८
दूरापवर्जितच्छत्रैस्तस्या१७७९नदत्सु तूर्येष्वविभाव्य७३८
दूर्वायवाङ्कुरप्लक्षकत्व१७१२नदद्भिः स्निग्धगम्भीरं१७११
दृढभक्तिरिति ज्येष्ठे१२१९न धर्ममर्थकामाभ्यां व१७५७
दृष्टदोषमपि तन्न१९४९न नवः प्रभुता फलोदया८२२
दृष्टसारमथ रुद्रका११४७न पृथग्जनवच्छुचो व८९०
दृष्टा विचिन्वता तेन१२६१न प्रसेहे स रुद्धार्कं४८२
दैत्यस्त्रीगण्डलेखानां१०१२न प्रहर्तुमलमस्मि निर्द११८४
द्विषां विपह्य काकुत्स्थ४४१नभश्चरैर्गीतयशाः स ले१८६

६५६ | रघुवंशमहाकाव्ये


पाद / श्लोकसर्गेश्लोकःपाद / श्लोकसर्गेश्लोकः
न मृगयाभिरतिर्न दु९७निर्वाप्य प्रियसंदेशैः१२६३
न मे ह्रिया शंसति किं३५निर्विष्टविषयस्नेहः स१२१
नमो विश्वसृजे पूर्वं१०१६निर्वृत्तजाम्बूनदपट्ट१८४४
नयगुणोपचितामिव९२७निर्वृष्टलघुभिर्मेघै४१५
नयविद्भिरनंवे राज्ञि४१०निवर्त्य राजा दयितां२३
नरेन्द्रमूलायतनाद३३६निवृते स महार्णव९१४
नवपल्लवसंस्तरेऽपि८५७निवातपद्मस्तिमिते३१७
नवेन्दुना तन्नभसोपमे१८३७निविष्टमुदधेः कूले तं१२६८
न संयतस्तस्य बभूव३२०निवेश्य वामं भुजमास६१६
नातिपर्याप्तमालक्ष्य म१५१८निशम्य देवानुचर२५२
नाभिप्ररूढाम्बुरुहास१३६निशाचरोपप्लुतभर्तृका१४६४
नाम राम इति तुल्यम११६८निशासु भास्वत्कलनूपु१६१२
नाम वल्लभजनस्य ते१९२४निःशेषविक्षालितधा५४४
नाम्भसां कमलशोभिनां१११२निसर्गभिन्नास्पदमक६२९
निगृह्य शोकं स्वयमेव१४८५नीपान्वयः पार्थिव एष६४६
निग्रहात्समुराप्तानां व१२५२नीवारपाकादि कडंग५९
निश्चित्य चानन्यनिवृत्ति१४३५नूनं मत्तः परं वंश्याः१६६
नितम्बगुर्वी गुरुणा७२५नृत्यं मयूराः कुसुमानि१४६९
निद्रावशेन भवता५६७नृपतिः प्रकृतीरवेक्षि८१८
निधानगर्भामिव सा३९नृपतेः प्रतिषिद्धमेव९७४
नियुज्य तं होमतुरंग३३८नृपतेर्व्यजनादिभिस्त८४०
निर्घातोयैः कुञ्जलीनाञ्जि९६४नृपं तमावर्तमनोज्ञ६५२
निर्दिष्टां कुलपतिना स१९५नृपस्य वर्णाश्रमपाल१४६७
निर्दोषमभवत्सवं१०७२नेत्रव्रजाः पौरजनस्य६७
निर्बन्धपृष्ठः स जगाद१४३२नेपथ्यदर्शनिष्ठछाया त१७२६
निर्बन्धसंजात रुषा५२१नैर्ऋतघ्नमथ मन्त्रव११२१
निर्यायावथ पौलस्त्यः पु१२८३न्यस्ताक्षरामक्षरभूमि१८४६
निर्वर्त्यते यंनियमा५८प
निर्वर्त्यैवं दशमुखशि१५१०३पक्षच्छिदा गोत्रभिदात१३७

श्लोकानुक्रमणिका

| सर्गे | श्लोकः | | सर्गे | श्लोकः | | :--- | :---: | :---: | :--- | :---: | :---: | | पञ्चमं लोकपालानाभूचुः | १७ | ७८ | पारसीकांस्ततो जेतुं | ४ | ६० | | पञ्चवट्यां ततो रामः | १२ | ३१ | पार्थिवीमुदवहद्रघु | ११ | ५४ | | पञ्चानामपि भूतानां | ४ | ११ | पिता पितृणामनृणस्तम | १८ | २६ | | पणबन्धमुखान्गुणान् | ८ | २१ | पिता समाराधनतत्परे | १८ | ११ | | पतिरङ्कनिषण्णया | ८ | ४२ | पितुः प्रयत्नात्स समग्र | ३ | २२ | | पत्तिः पदातिं रथिनं | ७ | ३७ | पितुरनन्तरमुत्तर | ९ | १ | | पयोघटैराश्रमबाल | १४ | ७८ | पितुर्नियोगाद्वनवास | १४ | २१ | | पयोधरैः पुण्यजनाङ्ग | १३ | ६० | पित्रा दत्तां रुदन्न्रामः | १२ | ७ | | परकर्मापहः सोऽभूद | १७ | ६१ | पित्रा विसृष्टां मदपेक्ष | १३ | ६७ | | परस्पराक्षिसादृश्य | १ | ४० | पित्रा संवर्धितो नित्यं | १७ | ६२ | | परस्पराभ्युक्षणतत्प | १६ | ५७ | पित्र्यमंशमुपवीतल | ११ | ६४ | | परस्परा विरुद्धास्ते | १० | ८० | पुण्डरीकातपत्रस्तं | ४ | १७ | | परस्परेण क्षतयोः | ७ | ५३ | पुत्रजन्मप्रवेश्यानां | १० | ७६ | | परस्परेण विज्ञात | ४ | ७९ | पुत्रो रघुस्तस्य पदं | ६ | ७६ | | परस्परेण स्पृहणीय | ७ | १४ | पुरंदरश्रीः पुरमु | २ | ७४ | | परात्मनोः परिच्छिद्य | १७ | ५९ | पुरं निषादाधिपते | १३ | ५९ | | पराभिसंधानपरं यद्य | १७ | ७६ | पुरस्कृता वर्त्मनि | २ | २० | | परार्ध्यवर्णस्तरणोप | ६ | ४ | पुराणस्य कवेस्तस्य | १० | ३६ | | परिकल्पितसांनिध्या | ४ | ६ | पुरा शक्रमुपस्थाय | १ | ७५ | | परिचयं चललक्ष्य | ९ | ४९ | पुरा स दर्भाङ्कुरमात्र | १३ | ३१ | | परेण भग्नेऽपि | ७ | ५५ | पुरुषस्य पदेष्वजन्मन् | ८ | ७८ | | परेषु स्वेषु च क्षिप्तैर | १७ | ५१ | पुरुषायुषजीविन्यो | १ | ६३ | | पर्णशालामथ क्षिप्रं | १२ | ४० | पुरूहूतध्वजस्येव | ४ | ३ | | पर्यन्तसंचारितचा | १८ | ४३ | पुरूहूतप्रभृतयः | १० | ४९ | | पवनस्यानुकूलत्वा | १ | ४२ | पुरोपकण्ठोपवना | ६ | ९ | | पश्यावरोधैः शतशो | १६ | ५८ | पुरोहितपुरोगास्तं जिष्णु | १७ | १३ | | पाण्ड्योऽयमंसार्पितलम्ब | ६ | ६० | पुष्पं फलं चार्तवमाह | १४ | ७७ | | पात्रीकृतात्मा गुरुसेव | १८ | ३० | पूर्वजन्मधनुषा समा | ११ | ८० | | पादपाविद्धपरिघः | १२ | ७३ | पूर्वं प्रहर्ता न जघान | ७ | ४७ |

४२ र० सम्पू०

१५८ | रघुवंशमहाकाव्ये

पादः / श्लोकःसर्गेश्लोकःपादः / श्लोकःसर्गेश्लोकः
पूर्ववृत्तकथितैः पुरा१११०प्रदक्षिणप्रक्रमणात्कृ७२४
पूर्वस्तयोरात्मसमे१८१२प्रदक्षिणीकृत्य पय२२१
पूर्वानुभूतं स्मरता च१३२८प्रदक्षिणीकृत्य हुतं२७१
पृक्तस्तुषारैर्गिरिनि२१३प्रबुद्धपुण्डरीकाक्षं१०९
पृथिवीं शासत्तस्तस्य१०१प्रभानुलिप्तश्रीवत्सं१०१०
पृष्टनामान्वयो राज्ञा स१५५०प्रभावस्तम्भितच्छायमा१२२१
पौत्रः कुशस्यापि कुशेश१८४प्रमदामनुसंस्थितः८७२
पौरस्त्यानेवमाक्रामं४३४प्रमन्यवः प्रागपि कोस७३४
पौरेषु सोऽहं बहुलीभव१४३८प्रमुदितवरपक्षमेक६८६
प्रजानामेव भूत्यर्थं११८प्रययावातिथेयेषु१२२५
प्रजानां विनयाधा१२४प्रलोभिताप्याकृतिलोभ६५८
प्रजावती दोहदशंसि१४४५प्रवृत्तमात्रेण पयांसि१३१४
प्रजास्तद्गुरुणा नद्यो१७४१प्रवृत्तावुपलब्धायां१२६०
प्रणिपत्य सुरास्तस्मै१०१५प्रवृद्धतापो दिवसोऽति१६४५
प्रतापोऽग्रे ततः शब्दः४३०प्रवृद्धो हीयते चन्द्रः स१७७१
प्रतिकृतिरचनाभ्यो१८५३प्रवेश्य चैनं पुरम५६२
प्रतिजग्राह कालिङ्गस्त४४०प्रशमस्थितपूर्वपार्थि८१५
प्रतिप्रयातेषु तपोध१४१९प्रसन्नमुखरागं तं स्मित१७३१
प्रतिशुश्राव काकुत्स्यस्ते१५४प्रसवैः सप्तपर्णानां४२३
प्रतियोजयितव्यवल्ल८४१प्रसादोदयादम्भः४२१
प्रत्यक्षोऽप्यपरिच्छेद्यो१०२५प्रसादसुमुखे तस्मिंश्च४१८
प्रत्यपद्यत चिराय११३४प्रसादाभिमुखे तस्मिंश्च१७४६
प्रत्यपद्यत तथेति११८८प्रसाधिकालम्बितमग्र७७
प्रत्यब्रवीच्चैनमिषु२४२प्रस्थितायां प्रतिष्ठेथाः१८९
प्रत्यभिज्ञानरत्नं च रामा१२६४प्रहारमूर्च्छापगमे७४४
प्रत्युवाच तमृषिर्न त११८५प्राजापत्योपनीतं१०५२
प्रत्युवाच तमृषिर्निश११४१प्रातः प्रयाणाभिमुखाय५२९
'प्रथमपरिगतार्थस्तं७७१प्रातर्गत्य परिभोगशोभि१९२१
प्रथममन्यभृताभिरु९३४प्रातर्यथोक्तव्रतपा२७०

श्लोकानुक्रमणिका

५५९

श्लोकसर्गेश्लोकःश्लोकसर्गेश्लोकः
प्राप्तानुगः सपदि शास९८२बिभ्रतोऽस्त्रमचलेऽप्यकु११७४
प्राप्य चाशु जनस्थानं१२४२बिभ्रत्या कौस्तुभन्यासं१०६२
प्रायः प्रतापभग्नत्वाद१७७०ब्राह्मे मुहूर्ते किल तस्य५३६
प्रायो विषाणपरिमोक्ष९६२भ
प्रासादकालागुरुधूम१४१२भक्तिः प्रतीक्ष्येषु कुलो५१४
प्राहिणोच्च महितं महा११४९भक्त्या गुरौ मय्यनुक२६३
प्रियतमाभिरसौ तिसृ९१८भगवन्परवानयं जनः८८१
प्रियंवदात्प्राप्तमसो७६१भज्यमानमतिमात्रक११४६
प्रियानुरागस्य मनः स३१०भयोत्सृष्टविभूषणां४५४
प्रेक्ष्य दर्पणतलस्थमा१९३०भरतस्तत्र गन्धर्वान्यु१५८८
प्रेमगर्वितविपक्षमत्स१९२०भर्तापि तावत्क्रयकैशि७३२
फभर्तुः प्रणाशादथ शोच१४१
फलमस्योपहासस्य१२३७भल्लापवर्जितैस्तेषां४६३
बभवति विरलभक्ति५७४
बन्धच्छेदं स बद्धानां१७१९भवानपीदं परवा२५६
बभूव रामः सहसा स१४८४भव्यमुख्याः समारम्भाः१७५३
बभौ तमनुगच्छन्ती वि१२२६भस्मसात्कृतवतः पितृ११८६
बभौ भूयः कुमारत्वादा१७३०भास्करश्च दिशमभ्युवा११६१
बभौ सदशनज्योत्स्ना१०३७भीमकान्तैर्नृपगुणैः११६
बलमार्तभयोपशान्त८३१भुजमूधोरुबाहुल्यादे१२८८
बलिक्रियावर्जितसैकता१६२१भुवं कोष्णेन कुण्डोष्णी१८४
बलैरध्युषितस्तस्य४४६भूतानुकम्पा तव२४८
बहुधाप्यागमर्भिन्नाः१०२६भूयस्ततो रघुपतिर्वि१३७६
बाढमेष दिवसेषु१९५२भूयस्तपोव्ययो मा भूदा१५३७
बाणभिन्नहृदया निपे१११९भूर्जेषु मर्मरीभूताः४७३
बालार्कप्रतिमेवाप्सु१२१००भोगिभोगासनासीनं१०७
बाहुप्रतिष्टम्भविदू२३२भोगिवेष्टनमार्गेषु४४८
बाहुभिर्विटपाकारै१०११भ्रमरैः कुसुमानुसारि८३५
भूभेदमात्रेण पदान्म१३३६

६६० रघुवंशमहाकाव्ये

म

सर्गेश्लोकःसर्गेश्लोकः
मखांशभाजां प्रथमो३४४मातलिस्तस्य माहेन्द्रमा१२८६
मणौ महानील इति प्रभा१८४२मातृवर्गचरणस्पृशी११७
मतङ्गशापादवलेप५५३मान्यः स मे स्थाव२४४
मत्तेभरदनोत्कीर्ण४५९मा भूदाश्रमपीडेति१३७
मत्परं दुर्लभं मत्वा१६६मार्गैषिणी सा कटकान्त१६३१
मत्स्यध्वजा वायुवशाद्वि७४०मित्रकृत्यमपदिश्य१९३१
मदिराक्षि मदाननार्पि८६८मिथुनं परिकल्पितं त्वया८६१
मदोदग्राः ककुद्मन्तः४२२मुक्तशेषविरोधेन१०१३
मनसापि न विप्रियं मया८५२मुखार्पणेषु प्रकृतिप्र१३९
मनुप्रभृतिभिर्मान्यै४७मुखावयवलूनां तां नै१२४३
मनुष्यवाह्यं चतुरस्र६१०मुरलामारुतोद्धूत४५५
मनोभिरामाः शृण्वन्तो१३९मृगवनोपगमक्षम९५०
मनोज्ञगन्धं सहकार१६५२मृग्यश्च दर्भाङ्कुरनिर्व्य१३२५
मन्त्रः प्रतिदिनं तस्य१७५०मैथिलः सपदि सत्यसं११४८
मन्दः कवियशःप्रार्थी१३मैथिलस्य धनुरन्यपा११७२
मन्दोत्कण्ठाः कृतास्तेन४९मोक्ष्यध्वे स्वर्गवन्दीनां११४७
मयि तस्य सुवृत्त वर्त८७७
मरणं प्रकृतिः शरीरिणां८८७### य
मरुतां पश्यतां तस्य१४१०१यः कश्चन रघूणां हि१५७
मरुत्प्रयुक्ताश्च मरुत्स२१०यच्चकार विवरं शिला१११८
मरुपृष्ठान्युदम्भांसि४३१यतिपार्थिवलिङ्गधारि८१६
मर्मरैरगुरुधूपगन्धि१९४१यत्कुम्भयोनेरधिगम्य१६७२
महार्हसिंहासनसंस्थितो७१८यत्स लग्नसहकारमा१९४६
महिमानं यदुत्कीर्त्य१०३२यथा च वृत्तान्तमिमं स३६६
महीं महेच्छः पारेकीर्य१८३३यथा प्रह्लादनाच्चन्द्रः४१२
महेन्द्रमास्थाय महोक्ष६७२यथाविधिहुताग्नीनां१६
महोक्षतां वत्सतरः३३२यदात्थ राजन्यकुमार तं३४८
मातंगनक्रैः सहसोत्स१३११यदुवाच न तन्मिथ्या१७४२
यदगोप्रतरकल्पोऽभूत्सं१५१०१
यन्ता हरेः सपदि संहृ१२१०३

श्लोकानुक्रमणिका

श्लोकःसर्गःश्लोकःश्लोकःसर्गःश्लोकः
यन्त्रप्रवाहैः शिशिरैः१६४९रघूणामन्वयं वक्ष्ये१९
यमात्मनः सद्यनि सनि६५६रघोरवष्टम्भमयेन३५३
यवनीमुखपद्मानां४६१रजः कणैः खुरोद्धूतैः१८५
यशोभिराब्रह्मसमं१८२८रजोभिः स्यन्दनोद्भूतै४२९
यः सुबाहुरिति राक्षसो११२९रणः प्रववृते तत्र भीमः१२७२
यस्मिन्महीं शासति वाणि६७५रतिस्मरो नूनमिमाव७१५
यस्यात्मगेहे नयनाभि६४७रतेर्गृहीतानु नयेन६२
यस्यावरोधस्तनचन्द६४८रथाङ्गनाम्नोरिव भाव३२४
यां सैकतोत्सङ्गसुखोचि१३६२रथात्स यन्त्रा निगृहीत१४५२
यासौ राज्यप्रकाशाभिर्व१५२९रथी निष्षङ्गी कवची७५६
यावत्प्रतापनिविधरा५७१रथो रथाङ्गध्वनिना७४१
यावदादिशति पार्थिव११३रसातलादादिभवेन१३८
यावन्नाश्यायते वेदिर्भि१७३७रसान्तराण्येकरसं१०१७
युधाजितश्च संदेशात्स१५८७राघवान्वितमुपस्थितं११३५
युवां युगव्यायतबाहुं३३४राघवास्त्रविदीर्णानां१२५१
यूपवत्यवसिते क्रिया११३७राघवोऽपि चरणौ तपो११८९
येनं रोषपरुषात्मनः११६५राघवो रथमप्राप्तां ना१२९६
योगनिद्रान्तविशदैः१०१४राजन्यप्रजासु ते कश्चिद१५४७
योषितामुडुपतेरिवा१९३४राजर्षिवंशस्य रविप्रसू१४३७
यौवनोन्नतविलासिनी१९९राजसत्वमवधूय मातु११९०
रराजापि तद्वियोगातंः१२१०
रक्षसा मृगरूपेण व१२५३रांत्रावनाविष्कृतदीपभा१६२०
रक्षोवघान्तो न च मे प्र१४४१रात्रिंदिवविभागेषु१७४९
रघुनाथोऽप्यगस्त्येन१५५४रात्रिर्गता मतिमतां५६६
रघुपतिरपि जातवे१२१०४राम इत्यभिरामेण१०६७
रघुमेव निवृत्तयौव८५रामं पदातिमालोक्य१२८४
रघुरश्रुमुखस्य तस्य८१३राममन्मथशरेण ता११२०
रघुर्भृ शं वक्षसि तेन३६१रामस्तवासनदेशत्वाद्भू१२२४
रघुवंशप्रदीपेन१०६८रामस्य मधुरं वृत्तं१५३४

६६२ रघुवंशमहाकाव्ये

सर्गश्लोकःसर्गश्लोकः
रामाज्ञाया हरिचमूपत१३७४वचसैव तयोर्वाक्यम१२९२
रामादेशादनुगता सेना१५९वत्सस्य होमार्थविधे२६६
रामोऽपि सह वैदेह्या१२२०वत्सोत्सुकापि स्तिमि२२२
रावणस्यापि रामास्तो१२९१वधनिर्धूतशापस्य१२५७
रावणावग्रहक्लान्त१०४८वधूर्भक्तिमती चैना१९०
रावणावरजा तत्र राघ१२३२वनान्तरादुपावृत्तः१४९
रुदता कुत एव सा८८५वनेषु सायंतनमल्लि१६४७
रूपं तदोजस्वि तदे५३७वन्यवृत्तिरिमां शश्व१८८
रूपे गीते च माधुर्यं१५६५वपुषा करणोज्झितेन८३८
रेखामात्रमपि११७वयसां पङ्क्तयः पेतुर्ह्रं१५२५
लवयोरूपविभूतीनामे१७४३
लक्ष्मणः प्रथमं श्रुत्वा को१२३९वयोवेषविसंवादिरा१५६७
लक्ष्मणानुचरमेव११६वर्जोदकैः काञ्चनशृङ्ग१६७०
लक्ष्यते स्म तदनन्तरं११५९वंशस्थितिं वंशकरेण१८३१
लक्ष्यीकृतस्य हरिणस्य९५७वसिष्ठधेनोरनुया२१९
लङ्केश्वरप्रणतिभङ्ग१३७८वसिष्ठमन्त्रोक्षणजा५२७
लताप्रतानोद्ग्रथितैः२८वशी विवेश चायोध्यां१५३८
लब्धपालनविधौ न१९३वशी सुतस्तस्य वशंव१८१३
लब्धप्रशमनस्वस्थ४१४वसन्स तस्यां वसतौ१६४२
लब्धान्तरा सावरणेऽपि१६७वसिष्ठस्य गुरोर्मन्त्राः सा१७३८
ललाटोदयमाभुग्नं१८३वस्वोकसारामभिभूय१६१०
ललितविभ्रमबन्धवि९३६वागर्थाविव संपृक्तौ११
लवणेन विलुप्तेज्यास्ता१५२वाङ्मनःकर्मभिः पत्यौ१५८१
लिङ्गैर्मुदः संवृतविक्रि७३०वाच्यमत्वात्प्रणति१३४४
लोकान्तरसुखं पुण्यं१६९वाच्यस्त्वया मद्वचनात्स१४६१
लोकेन भावी पितुरेव१८३८वापीष्विव स्रवन्तीषु१७६४
लौल्यमेत्य गृहिणी परि१९१९वामनाश्रमपदं ततः११२२
ववामेतरस्तस्य करः२३१
वङ्गानुत्खाय तरसा४३६वार्षिकं संजहारेन्द्रो४१६

श्लोकानुक्रमणिका ६६३

श्लोकःसर्गेश्लोकःश्लोकःसर्गेश्लोकः
विक्रमव्यतिहारेण सामा१२९३वीक्ष्य वेदिमथ रक्तवि११२५
विग्रहाच्चं शयने पराङ्मु१९३८वीचिलोलभुजयोस्तयो११८
वितानसहितं तत्र भेजे१७२८वीरासनैर्ध्यानजुषामृ१३५२
विदितं तप्यमानं च१०३९वृक्षेशयायष्टिनिवासभ१६१४
विद्धि चात्तबलमोजसा११७६वृत्तं रामस्य वाल्मीकेः१५६४
विद्वानपि तयोर्द्वास्थ्यः१५९४वृन्ताच्छ्लथं हरति५६९
विघ्नेरधिकसंभारस्ततः१५६२वेणुना दशनपीडिताध१९३५
विधेः सायन्तनस्यान्ते१५६वेलानिलः केतकरेणु१३१६
विनयंन्ते स्म तद्योधा४६५वेलानिलाय प्रसृताभु१३१२
विनाशात्तस्य वृक्षस्य१५२१वेश्मानि रामः परिवर्हं१४१५
विनीताध्वश्रमांस्त४६७वैदर्भनिर्दिष्टमसो कु६३
विन्ध्यस्य संस्तम्भयिताम६६१वैदेहि पश्यामलयादद्रि१३२
विप्रोषितकुमारं तद्राज्यं१२११वैमानिकाः पुण्यकृत१०४६
विभक्तात्मा विभुस्तासा१०६५वैवस्वतो मनुर्नाम१११
विभवेऽपि सति त्वया६६९व्याघ्रानभीरभिमुखोत्प९६३
विभावसुः सारथिनेव३३७व्यादिदेश गणशोऽथ११४३
विभूषणप्रत्युपहारह१६८०व्यूढोरस्को वृषस्कन्धः११३
विरक्तसंध्याकपिशं१३६४व्यूहावुभौ तावितरेत७५४
विरचिता मधुनोपव९२९व्यूह्य स्थितः किंचिदिवोत्त१८५१
विलपन्निति कोसलाधि८७०व्योमपश्चिमकला स्थिते१९५१
विललाप स बाष्पगद्गं८४३व्रणगुरुप्रमदाधर९३२
विलासिनीविभ्रमदन्त६१७व्रताय तेनानुचरेण२४
विलुप्तमन्तःपुरसुन्द१६५९श
विलोचनं दक्षिणमञ्ज७८शक्येष्वेवाभवद्यात्रा१७५६
विशश्रमुर्नमेरूणां४७४शङ्खस्वनाभिज्ञतया७६४
विशीर्णतल्पाट्टशतोनि१६११शतैस्तमक्षणामनिमेष३४३
विषादलुप्तप्रतिपत्ति३४०शत्रुघातिनि शत्रुघ्नः१५३६
विसृष्टपार्श्वानुचरस्य२९शब्दादिनिर्विविश्य सुखं१८३
विस्रस्तमसादपरो वि६१४शब्दादीन्विषयान्भोक्तुं१०२५

१६४ रघुवंशमहाकाव्ये

सर्गेश्लोकःसर्गेश्लोकः
शमितपक्षबलः शत९१२श्लाघ्यस्त्यागोऽपि वै१५६१
शय्यागतेन रामेण१०६९श्वगणिवागुरिकैः प्रथ९५३
शय्यां जहत्युभयप५७२श्वश्रूजनं सर्वमनुक्रमेण१४६०
शरीरमात्रेण नरेन्द्र५१५श्वश्रूजनानुष्ठितचारु१४१३
शरीरसादादसमग्र३२स
शरैरुत्सवसंकेता४७८स एवमुक्त्वा मघवन्त३५२
शशंस तुल्यसत्त्वानां४७२स कदाचिदवेक्षित८३२
शशाम वृष्ट्यापि वि२१४स किंवदन्तीं वदतां१४३१
शशिनमुपगतेयं कौ६८५स किल संयुगमूर्ध्नि स९१९
शशिनं पुनरेति शर्वरी८५६स किलाश्रममन्त्यमाश्रि८१४
शापोऽप्यदृष्टतनयान९८०स कीचकैर्मारुतपूर्ण२१२
शिरीषपुष्पाधिकसौकु१८४५स कुलोचितमिन्द्रस्य सा१७५
शिलीमुखोत्कृत्तशिरः७४९स क्षेमधन्वानममोघ१८९
शुशुभिरे स्मितचारु९३७सखा दशरथस्यापि१५३१
शुशुभे तेन चाक्रान्तं१७२९स गत्वा सरयूतीरं देहत्या१५९५
शैलोपमः शैवलम५४६स गुणानां बलानां च१७६७
शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां१८स गुप्तमूलप्रत्यन्तः४२६
शोचनीयासि वसुधे यां१५४३संगमाय निशि गूढचारि१९३३
श्मश्रुप्रवृद्धिजनिता न१३७१सङ्ग्रामनिर्विष्टसहस्र६३८
श्येनपक्षपरिधूसरा११६०सङ्ग्रामस्तुमुलस्तस्य४६२
श्रियः पद्मानिषण्णायाः१०८स चतुर्धा बभौ व्यस्तः१०८४
श्रुतदेहविसर्जनः८२५स च प्राप मधूपघ्नं कुम्भी१५१५
श्रुतस्य यायादयमन्त३२१स चानुनीतः प्रणते५५४
श्रुतिसुखभ्रमरस्वन९३५स चापकोटी निहितंक७६६
श्रुत्वा तथाविधं मृत्युं१२१३स चापमुत्सृज्य विवृद्ध३६०
श्रुत्वा तस्य शुचो हेतुं गो१५४४संचारपूतानि दिगन्त२१५
श्रुत्वा रामः प्रियोदन्तं मे१२६६संचारिणी दीपशिखेव६६७
श्रेणीबन्धाद्वितन्वद्भि१४१स च्छिन्नबन्धद्रुतयु५४९
श्रोत्राभिरामध्वनि२७२स च्छिन्नमूलः क्षतजेव७४३