रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
( २ ) द्वितीय अध्याय श्रीकामिल बुल्के की रामकथा १५-४८ वेद में राम के पूर्वजों का उल्लेख १५ वैदिक साहित्य में सीता १७ निर्विशेषण सीता और राम २९ स्यागरचर्चा २९ वेदों में सूत्रभूत वस्तुएँ ३० रामचन्द्रादि नामों की अनादिता ३० क्या देवता काल्पनिक हैं ? ३१ प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य की चर्चा ३२ शब्दार्थ-सम्बन्ध की अनादि परम्परा ३३ मीमांसकों का ज्ञानप्रामाण्य ३४ वेदमन्त्रों का स्वरूप निर्धारण ३४ मतभेद, असमन्वय और कालभेद ३५ सीता के नामों की गणना ३५ उत्तरोत्तर विकास का सिद्धान्त निस्सार ३५ रामायणीय राम और वैदिक राम ३६ पदार्थ-निर्णय में वाक्यशेषों का महत्त्व ३६ वैदिक साहित्य में रामकथा की सामग्री ३६ पाठसम्बन्धी विवेचना ४२ महाभारत प्रथम या रामायण प्रथम ४५ असभ्यता, एकपत्नीव्रत और विकासवाद ४५ उत्तरकाण्ड की अर्वाचीनता ४६ वैदिक दशरथ बनाम रामायणीय दशरथ ४६ तृतीय अध्याय पाठ-भेदादि समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ४९-८२ पाश्चात्यों का रोग—उनकी दृष्टि में ईसा के पूर्व सभ्यताविकास असम्भव ५० कुश और लव को गणिकाध्यक्ष कहना हृदयकालुष्यद्योतन ६१ वाल्मीकि ही भार्गव ६२ दस्यु वाल्मीकि ६३ पौर्वा-पर्यविरोध का समाधान ६७ महाभारत और रामायण ६७ भारत और महाभारत की कल्पना निर्मूल ६८ प्राचेतस मुनि ही वाल्मीकि ७१
( ३ ) आर्षज्ञानसम्पन्न वाल्मीकि की व्याकरणज्ञता अनुपपन्न नहीं ७४ वाल्मीकि के पूर्वजन्म की ( वल्मीक से उत्पत्ति के पूर्व की ) विभिन्न कथाओं का समन्वय ७४ वाल्मीकि का अभिधान समझाने के लिये पौराणिकों ने उनके सम्बन्ध में विविध कथाएँ गढ़ लीं, यह कथन निराधार ७७ यह कल्पना वेद, पुराण, महाभारत आदि के सर्वथा विरुद्ध ७८ अतीत घटनाओं के विषय में प्रामाणिक इतिवृत्त ही प्रमाण, अटकलबाजी विपरीत दिशा की प्रापक ७८ वाल्मीकि, वसिष्ठ, पराशर, व्यास आदि महर्षियों के ग्रन्थों में अप्रामाण्य की कल्पना निराधार ७८ महाभारत जिस विषय में मौन हो उसमें स्कन्दपुराणादि की बात स्वीकारने में कोई दोष नहीं कभी का दस्यु कालान्तर में महर्षि भी हो सकता है ७९ वाल्मीकि वैदिक काल के राम के समकालिक होते तो उन्हें वैदिक भाषा में ही अपनी रचना करनी चाहिये थी, यह कथन निस्सार है, क्योंकि वैदिक काल कोई खास काल नहीं ८१ वैदिक काल में संस्कृत भाषा और उससे भिन्न मानुषी भाषा की सत्ता में प्रमाण ८१ चतुर्थ अध्याय वाल्मीकिरामायण और महाभारतरामोपाख्यान ८३-९८ महाभारत-रामोपाख्यान रामायण का स्रोत नहीं रामायण ही रामोपाख्यान का स्रोत ८४ महाभारत का रामोपाख्यान ८५ रामोपाख्यान में सीता की अलौकिकता का वर्णन ८५ पुलस्त्य-वंश वर्णन ८५ रावण के उत्पात से त्रस्त देवताओं का ब्रह्मा से निवेदन ८६ ब्रह्मा की प्रार्थना से महाराज दशरथ के यहाँ भगवान् विष्णु का राम रूप में अवतार ८६ भगवान् राम के असाधारण सर्वलोकरञ्जक विशिष्ट गुण ८६ राज्याभिषेक की तैयारी करने पर रानी कैकेयी द्वारा विघ्न उपस्थित करने से राम का पिता की सत्यरक्षा के लिये वनगमन ८६ राम-वनगमन से प्रिय पुत्र के वियोग के कारण दुःखित राजा का देहान्त ८६ भरत द्वारा माता की भर्त्सना कर श्रीराम को लौटालाने के लिए सपरिकर राम के निकट वन गमन ८७ राम का प्रेमपूर्वक समझाबुझा कर भरत को लौटा देना ८७ श्रीराम का पुनः पौरों के आगमन की शङ्का से गोदावरी तट पर गमन ८७ शूर्पणखा के कारण खर से महान् वैर ८७ धर्मवत्सल राम द्वारा राक्षसों का वधकर दण्डकारण्य को धर्मारण्य बना देना ८७ विकृतानना शूर्पणखा का लङ्का जाकर भ्राता रावण के चरणों में मूच्छित हो गिर पड़ना ८७ क्रोधमूच्छित रावण का शुष्करुधिरानना शूर्पणखा से विकृतकारी के विषय में प्रश्न ८७ शूर्पणखा का रामविक्रम और खरदूषण सहित राक्षसों का पराभव बतलाना ८७ रावण का मारीच के निकट गमन, मारीच का रावण के आगमन का उद्देश्य जानकर उसे विरत करने का प्रयत्न ८७ रावण के हठ पर कनकमृग बनकर सीता के निकट जाना ८७
( ४ ) सीता के अनुरोध पर सीता की रक्षा में लक्ष्मण को नियुक्त कर राम का मृग पकड़ने जाना ८७ कनकमृग का कभी अन्तर्हित कभी प्रकट हो राम को बहुत दूर ले जाना ८७ राक्षस जान राम द्वारा अमोघ बाण मारने पर रामस्वर के तुल्य हा सीते, हा लक्ष्मण, चीखकर उसका धराशायी होना ८७ राम के अनिष्ट पर रोती हुई हतबुद्धि सीता का लक्ष्मण के प्रति शङ्का करना ८७ यतिवेष में प्रच्छन्न रावण का सीतापहरण ८८ जटायु के साथ रावण का युद्ध ८८ राम द्वारा जटायु का दाह संस्कार ८८ सीता की खोज में आगे बढ़ने पर कबन्ध से भेंट ८८ दोनों भ्राताओं द्वारा कबन्ध का वध ८८ शापमुक्त विश्वावसु गन्धर्व से सीतापहरणकर्ता का पता जान राम का पम्पातट पर गमन ८८ राम और लक्ष्मण का परिचय जानने के लिए सुग्रीव का हनुमान् को भेजनां ८९ हनुमान् से सुग्रीव का वृत्त जानकर राम का सुग्रीव के निकट गमन ८९ सुग्रीव और बाली का युद्ध ८९ राम द्वारा बाण से वाली का वध ८९ रावण का सीता को नन्दनोपम अशोक वाटिका में राक्षसियों के पहरे में रखना ८९ भीषण राक्षसियाँ सीता का तर्जन करतीं और कहतीं हम तुझे तिल-तिल कर खा जायेंगी । तू हमारे स्वामी की अवहेलना कर रही है ८९ सीता कहतीं—आर्याओ, मुझे खा जाओ नीलकुन्तल श्रीराम के वियोग में मुझे जीवन का मोह नहीं—त्रिजटा का सीता को सान्त्वना देना ८९ त्रिजटा का स्वप्न ९० भर्तृशोकाकुला दीना मलिनवसना पतिव्रता सीता को रावण ने देखा ९० पतिप्राणा सीता के सम्मुख रावण की दाल न गली ९० रावण का अपना अनुपम ऐश्वर्य बखान कर सीता के प्रलोभन का असफल प्रयास ९० शुभानना सीता ने मुख फेर कर और बीच में तृण रखकर कहा—राक्षसेश्वर, तुम्हारे मुख से मुझ अभागिनी ने कई बार अभद्र बातें सुनी हैं। मैं पतिव्रता परभार्या हूँ, मैं सर्वथा अलभ्य हूँ, तुम मेरी ओर से मन हटा लो । ९० रावण का सीता की फटकार सुनकर चला जाना ९० माल्यवान् पर्वत पर वर्षाऋतु बिताकर-शरत्काल के आगमन पर श्रीराम की सीताविषयक स्मृति का उद्बोधित होना ९१ श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—वत्स, देखो तो सुग्रीव ग्राम्यधर्मों से प्रमत्त हो कृतघ्न तो नहीं हो गया ? ९१ सक्रोध लक्ष्मण किष्किन्धा पहुँचे, सुग्रीव ने कहा मैंने विनीत वानर सीतान्वेषणार्थ विभिन्न दिशाओं में भेज दिये हैं, उनके लौटने का समय सन्निहित है ९१ पवनात्मज आदि द्वारा मधुवन विध्वंस की खबर से सुग्रीव का कार्यसिद्धि का अनुमान ९१ सीतान्वेषणार्थ दक्षिण की ओर गये हुए ऋक्ष और वानरों से राम के पूछने पर हनुमान् ने कहा— मैंने आर्या सीता के दर्शन किये ९२
( ५ ) यात्रा की तथा लङ्का में सीता दर्शन की सब बातें संक्षेपतः कहीं— लङ्का दहन एवं कई राक्षसों के हनन की बात भी कही ९२ शुभ मुहूर्त में सेना का व्यूह बनाकर सबका लङ्का की ओर प्रस्थान ९२ समुद्रलङ्घन का प्रश्न आने पर समुद्र ने स्वप्न में राम से कहा—मैं आपके मार्ग में विघ्न नहीं बनना चाहता। नल जिस पत्थर आदि को मुझपर रखेगा उसे मैं धारण करूँगा ९२ नल द्वारा सेना की सहायता से १० योजन चौड़े तथा १०० योजन लम्बे पुल का निर्माण ९२ शुक और सारण नाम के रावणचरों के तोह लेने आने पर उन्हें सेना दिखाकर छोड़ दिया गया ९२ अङ्गद का दूत के रूप में रावण के दरबार में जाना और निर्भय होकर राम का सन्देश सुनाना ९३ वायुवेग वानरों द्वारा लङ्का के प्राकार का तुड़वा देना ९३ वानरों का शिविर में प्रवेश करने पर राक्षसों द्वारा उनपर हमला करना ९३ सदलबल रावण का स्वयं युद्धभूमि में आना, श्रीराम के साथ घमासान युद्ध ९३ कुम्भकर्णवध ९३ इन्द्रजित् का रणक्षेत्र में आगमन, इन्द्रजित् का लक्ष्मण से घमासान युद्ध ९४ इन्द्रजित् द्वारा राम और लक्ष्मण को वरदान प्राप्त बाणों से चारों ओर से बाँध देना ९४ विशल्या ओषधि से दोनों क्षणभर में स्वस्थ और युद्धार्थ सन्नद्ध ९४ लक्ष्मण द्वारा इन्द्रजित् का वध ९४ मातलि द्वारा आनीत रथ पर आरूढ़ होकर राम का रावण पर आक्रमण ९४ राम और रावण का अनुपम युद्ध, अन्त में राम ने रावण को धराशायी कर दिया ९५ रावण के मरने पर महर्षियों सहित देवताओं द्वारा राम पर पुष्पवृष्टि ९५ सीता के प्रति राम की शङ्का एवं वायु, अग्नि आदि देवताओं तथा ब्रह्मा द्वारा सीता की विशुद्धि ९५ का वर्णन ९५ पञ्चम अध्याय बौद्धों तथा जैनों द्वारा विकृत रामचरित ९९-१७८ दशरथजातक की कथा ९९ अनामकजातक की कथा १०० दशरथकथानक की कथा १०१ राम की कहानी राम की जबानी १०२ छद्ममयी नीति से भदन्त आनन्द कौसल्यायन द्वारा राम का आधुनिक नास्तिक युवक के तुल्य चित्रण १०२ उक्त पुस्तक न राम की कहानी है और न राम द्वारा कही ही गयी है। वह मिथ्या वासुदेव निरी- श्वरवादी बौद्ध आनन्द कौसल्यायन के मस्तिष्क का फितूर है। उसमें छद्ममयी नीति का आश्रयण करते हुए वेदशास्त्रविरुद्ध, रामायणविरुद्ध अनेक अनर्गल कल्पनाएँ उल्लिखित हैं १०२ विश्वामित्र के कहने से हमने ताड़का-वध कर डाला, क्योंकि पिताजी की आज्ञा थी कि विश्वामित्र की हर बात का पालन करना, वाल्मीकि रामायण में कहीं ऐसा उल्लेख न होने पर कौसल्यायन का मिथ्या भाषण का यह एक नमूना १०५
( ६ ) परम पितृभक्त एवं सत्यनिष्ठ राम के द्वारा यह कैसा धर्मबन्धन था, यह सरासर मूर्खता का बन्धन नहीं था आदि अनार्य शब्द कहलाना कौसल्यायन का चरम अनौचित्य १११ इस बौद्ध की रामकहानी में भूल से ही शायद कोई एक आध बात सत्य निकले प्रायः सब बातें मनगढ़न्त दुष्कल्पनापूर्ण हैं ११२ जैन-मत में रामकथा १२८ विमल सूरि आदि का काल १२९ पउमचरियं की विस्तृत रामकथा १२९ अनेक जैन लेखकों द्वारा लिखित विकृतिमय रामकथा १३० रावणचरित १३० रावण-बालि-संघर्ष १३० धर्मान्तरण १३७ जैन अग्नि परीक्षा पुस्तक का परिचय १४५ बिना अपवाद के भी अग्नि-परीक्षा सम्भव १४७ वाल्मीकि के अनुसार सीता की अग्निशुद्धि १५५ वैदिक रामकथा और अग्निपरीक्षा १६० राम पर बहुपत्नीत्वारोप सर्वथा निराधार १६१ बौद्ध जातक साहित्य की रामकथाओं पर विचार १६३ शाक्यों की उत्पत्ति १६८ कोलियों की उत्पत्ति १६८ जयद्दिसजातक की कथाएँ १७२ सामजातक रामायण की प्रतिच्छाया १७२ वेस्संन्तरजातक १७३ संबुलाजातक १७४ महासुतसोमजातक १७५ जातकों के साहित्य से वाल्मीकि ने सामग्री ली दिनेशचन्द्र सेन के इस मत की प्रमाणशून्यता १७५ जातकों में रामकथा से सम्बन्धित सामग्री १७६ रामायण का आधार गाथाओं में ढूँढना व्यर्थ, उसके आधार प्राचीन रामकथा सम्बन्धी आख्यान काव्य— बुल्के का मत १७६ वाल्मीकि रामायण के आधार के सम्बन्ध में दिनेशचन्द्र सेन का अनुमान १७७ डॉ० ह्वीलर का मत १७७ राक्षस बौद्ध नहीं थे—बुल्के का मत १७७ दिनेशचन्द्र सेन तथा डॉ० ह्वीलर के मतों का बुल्के द्वारा खण्डन १७७ वेद-प्रामाण्यबाधक होने के ही कारण चोरतुल्य बौद्धादि नास्तिक दण्डनीय कहे गये हैं १७८ षष्ठ अध्याय रामायण के मूल स्रोत के सम्बन्ध में निराधार कल्पनाएँ १७९–२२२ डॉ० बेबर का मत १७९ डॉ० याकोबी का मत १७९
( ७ ) डॉ० हाप्किन्स का मत १८१ डॉ० वान नेगैलैन का मत १८१ डॉ० दिनेशचन्द्र का मत १८२ रामायण के मूल स्रोत वेद तथा उपनिषद् १८२ जैन साहित्य में उपलब्ध रामकथा स्पष्टतः वाल्मीकिरामायण पर आधारित १८३ बौद्ध लङ्कावतारसूत्र १८३ दीपवंश तथा महावंश सिंहल द्वीप के प्राचीनतम ऐतिहासिक काव्यों में रामकथा १८३ वानर और राक्षसों के सम्बन्ध में पाश्चात्यों के भ्रामक विचार १८८ वेदावतार वाल्मीकिरामायण में ईश्वर, देवता, राक्षस, असुर तथा ईश्वरावतार आदि का वर्णन वेदसंमत १९१ नाना अलङ्कारों से विभूषित कामरूपी रावण के सुन्दर रूप का वर्णन १९२ उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन १९३ राम साक्षात् विष्णु के अवतार थे इसके विरोधी वादों का खण्डन १९९ महर्षि विश्वामित्र का राम को विष्णु का अवतार कहना २०० वलगर्वित रावण के वधार्थ देवताओं की प्रार्थना पर विष्णु का रामरूप में अवतार २०१ राम की अतुल सामर्थ्य का ऋषि, मुनि, देव, राक्षस, मानव आदि अनेकों द्वारा मुक्तकण्ठ से वर्णन २०२ राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं, उनके लोकशिक्षार्थ मनुष्योचित कर्म युक्तियुक्त २०६ परब्रह्मरूप विष्णु इन्द्र की अपेक्षा अत्यन्त श्रेष्ठतम २१८ राज्यच्युत इन्द्र को पुनः राज्य में प्रतिष्ठित करने के लिए ही विष्णु का वामन (इन्द्रानुज) के रूप में अवतार २१९ तैत्तिरीयसंहिता की इन्द्रवृत्रविषयिणी आख्यायिका से विष्णु ही इन्द्र की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं और इन्द्र की सहायता करते हैं यह सिद्ध है २२१ विष्णु की परमेश्वरता एक नहीं बोसियों वैदिक मन्त्रों से सिद्ध २२२ सप्तम अध्याय रामकथा का प्रारम्भिक विकास २२३-२४८ वेद और वेदान्त के रहस्य से अनभिज्ञ पाश्चात्यों की नाराशंसी गाथा सम्बन्धी कल्पना अशुद्ध और निराधार २२३ नरों तथा उनके दान आदि के स्तुतिरूप मन्त्र नाराशंसी २२३ वेदमन्त्र नाराशंसी गाथाओं के गान में सूत का अधिकार नहीं २२३ पौराणिक गाथाओं के गान में सूत का भी अधिकार २२४ गाथाएँ वैदिक और लौकिक अनेक प्रकार की हैं २२४ रामायण प्राचीन रामकथा सम्बन्धी आख्यान काव्यों पर निर्भर—बुल्के २२७ बुल्के का उक्त कथन रामायणविरुद्ध २२८ बालकाण्ड के अनुसार नारदोपदिष्ट मूलरामायण तथा ब्रह्मा के आदेशानुसार समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा रामायण के आधार २२८
( ८ ) हरिवंश की गाथाओं का सम्बन्ध इतिहास पुराण प्रसिद्ध गाथाओं से ही २२८ हरिवंश यदि मान्य है तो तदनुसार राम का विष्णुत्व मान्य होना चाहिये २२८ हरिवंश में राम का ईश्वर हरि के अवतारत्वेन वर्णन २२८ सीता का लक्ष्मी के अवतारत्वेन वर्णन २२८ इक्ष्वाकु-वंश में रामसम्बन्धी गाथासाहित्य की उत्पत्ति—बुल्के २२९ ‘इक्ष्वाकूणामिदं तेषाम्’ श्लोक का अर्थ है—महात्मा इक्ष्वाकु राजाओं के वंश में रामायणरूप महान् आख्यान की उत्पत्ति हुई न कि बुल्के द्वारा उक्त अर्थ २२९ महाभारत के द्रोणपर्व तथा शान्तिपर्व का संक्षिप्त रामचरित आख्यान काव्य पर निर्भर प्रतीत होता है, बुल्के का यह कथन असङ्गत २२९ महाभारत के बहुत पहले आर्ष वाल्मीकिरामायण के रहते उसे भुलाकर अनुपलब्ध तथा अप्रामाणिक उपाख्यानों को आधार मानना तर्कविरुद्ध २२९ वैदिक काल के बाद चौथी शती ई० पूर्व के पहले सम्भवतः छठीं शती में रामकथासम्बन्धी आख्यान काव्य की उत्पत्ति हुई थी यह कथन निष्प्रमाण २२९ रामायण के अनुसार रामकाल में ही रामायण का निर्माण २२९ रामायण का निर्माण आर्ष-विज्ञान के आधार पर न कि आख्यानों के आधार पर २२९ आदि रामायण नाम की कोई पुस्तक प्रसिद्ध नहीं २३० उपलब्ध समग्र बालकाण्ड प्रामाणिक उसके बिना रामायण की अपूर्णता २३२ वाल्मीकि ने जिन शिष्यों को रामायण पढ़ाकर उसके गाने का आदेश दिया, उनमें कुश और लव ( सीता-पुत्र ) मुख्य २३३ कुश और लव काव्योपजीवी नहीं, रामपुत्र एवं सीतापुत्र २३४ निर्वासित सीता के करुण क्रन्दन से करुण रस महर्षि के हृदय से उच्छलित हो श्लोकरूप में परिणत २३५ सीता के विशुद्ध चरित के प्रख्यापनार्थ समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा से गुप्त और प्रकट निखिल वृत्त जानकर रामायण का निर्माण २३६ कुश और लव का चमत्कारपूर्ण रामायण-गान २३७ कुश और लव का स्व-पुत्ररूप में राम को परिचय २३८ देवता, ऋषि, महर्षि, राजा, प्रजा आदि की महती सभा में सीता का प्रत्यय प्रदान २३९ माधवी देवी का प्राकट्य, सीता को सादर सिंहासन पर बैठा कर रसातल प्रवेश २४० अपने अमर महाकाव्य के निर्माण द्वारा आदि कवि सीता के विशुद्ध चरित के प्रख्यापन में पूर्ण सफल २४१ कुश और लव के रूपसौन्दर्य, स्वरमाधुर्य, सङ्गीतकौशल आदि अपूर्व गुण २४१ नीति, प्रीति, परमार्थ और स्वार्थ के यथार्थ ज्ञाता राम २४२ मत्स्य, कूर्म, वराह तीनों अवतार आरम्भ में प्रजापति के माने जाते थे, विष्णु का महत्त्व बढ़ने से विष्णु के माने जाने लगे । बुल्के के ये विचार भारतीय ग्रन्थों की वास्तविकता न जानने के दुष्परिणाम २४६ भारत में काल्पनिक किसी विकास को महत्त्व नहीं दिया जाता २४७ विकासवादियों के विकासवत् मनुष्यमात्र राम में ईश्वरत्व का विकास नहीं हुआ, अनन्त कल्याण गुणगणास्पद राम में ईश्वरत्व परब्रह्मत्व स्वाभाविक २४७
( ९ )
रामकथा की लोकप्रियता राम के स्वाभाविक महत्त्व, परमेश्वरत्व तथा मर्यादामयी लीलाओं के कारण २४७ अनन्तगुण राम के गुणों का वर्णन अपनी शक्ति के अनुसार ब्रह्मादि तथा साधारण जन करते हैं पर उनका अन्त कोई नहीं पाता २४८
अष्टम अध्याय
अवतार-सामग्री २४९-२८७ शतपथ ब्राह्मण के वचनों से मत्स्यावतार की सिद्धि २४९ महाभारत के वचनों द्वारा कूर्मावतार का वर्णन २४९ महाभारत के ही वचनों द्वारा परशुराम, राम, बलराम, कृष्ण तथा हंस, कूर्म, मत्स्य आदि अव- तारों का वर्णन २५० भगवान् विष्णु ही प्रजापति, ब्रह्मा आदि शब्दों से उक्त २५१ मत्स्य, कूर्म, वराह आदि विष्णु के ही अवतार २५१ शास्त्रों के आधार पर ही विष्णु का महत्त्व, वह किसी की इच्छा या भावना से घटता या बढ़ता नहीं २५१ महाभारत, हरिवंश, विष्णुपुराण आदि प्रामाणिक ग्रन्थों में प्रजापति और विष्णु को एक (अभिन्न) मानकर मत्स्यादि सब अवतार विष्णु के उक्त ही हैं फिर हठधर्मिता क्यों ? २५१ ब्राह्मण ग्रन्थों तथा प्राचीन साहित्य में अवतारवाद के विद्यमान होने पर भी उन ग्रन्थों के रचनाकाल में न तो उनकी पूजा होती थी और न विष्णु का प्राधान्य ही था, यह कथन असंगत २५२ यज्ञ-यागों में देवताओं के रूप में प्रजापति तथा विष्णु का उल्लेख मौजूद कई स्थलों पर विष्णु और इन्द्र का साथ २ देवत्व एवं कई स्थलों पर विष्णु का प्राधान्य २५२ ब्राह्मणों द्वारा भागवतों के इष्टदेव कृष्ण को नारायणावतार मान लेने से अवतारवाद को प्रोत्साहन उससे विष्णु के महत्त्व की वृद्धि एवं अवतार की सारी भावना विष्णु पर केन्द्रित आदि कथन निष्प्रमाण २५२ नारायणीयोपाख्यान, भागवत तथा रामायण में वेद, यज्ञ तथा ब्राह्मणों का प्रभूत महत्त्व वर्णित होने से भागवतों के भक्तिसम्प्रदाय को बौद्धों के तुल्य वेद, यज्ञ और ब्राह्मण विरोधी समझना निरी भ्रान्ति २५३ विष्णुपुराण आदि ग्रन्थ ब्राह्मण सम्प्रदाय की स्वार्थपूर्ण कल्पना नहीं, किन्तु महर्षि व्यास द्वारा वेदार्थोपबृंहण या वेदभाष्यरूप में रचित २५३ पहली शती ई० पू० से रामावतार की भावना प्रचलित होने लगी, रामायण के प्रक्षेपों के अतिरिक्त महाभारत, वायु, ब्रह्माण्ड, विष्णु, मत्स्य, हरिवंश आदि प्राचीनतम पुराणों में अवतारों की तालिका में राम के नाम का अस्तित्व, यह कथन नितान्त भ्रम तथा दुरभिसन्धिपूर्ण, क्योंकि वेदों, उपनिषदों में अनादिकाल से रामावतार तथा उनकी उपासना वर्णित २५३ भारतीय साहित्य के अनुसार राम विष्णु के अवतार ही नहीं, किन्तु अनन्तानन्त ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रों की राम के अंश से उत्पत्ति २५४
( १० ) भक्ति का सूत्रपात ई० सन् के प्रारम्भ के आसपास हुआ, यह कथन सर्वथा असंगत, क्योंकि वेद एवं वेदोक्त भक्ति अनादि २५५ श्रीराम ने सेतुबन्धन पर रामेश्वर शिवलिङ्ग की पूजा की, शिवपूजा की प्राचीनता का यह सर्वोत्कृष्ट प्रमाण २५७ श्रीराम का अतुलित सर्वोत्कृष्ट, यश, ऐश्वर्य और माहात्म्य २५८ श्रीरामनाम का अनुपम माहात्म्य २५८ रामायण का सादर श्रवण करने से श्रद्धालु जितक्रोध होकर विविध आपत्तियों से निस्तार पाता है एवं ऐश्वर्यवान् और पुत्रवान् होता है २५९ राम का स्तवन तथा दर्शन अमोघ एवं ऐहिक और पारलौकिक सुख का मूल २६० विष्णुधर्मोत्तरपुराण तथा अग्निपुराण अर्वाचीन नहीं वेद एवं पुराण अनादि, अपौरुषेय वेदों की अनुपूर्वी नहीं बदलती, किन्तु पौरुषेय पुराणों की अनुपूर्वी में विभिन्न कल्पों में परिवर्तन सम्भव २६० सहस्रमुख रावणवध आदि भी कल्पनामात्र नहीं २६३ अतीत घटनाओं में इतिहास आदि ग्रन्थों का ही प्रामाण्य। अद्भुतरामायण द्वारा वर्णित उस घटना के अभाव में प्रमाणाभाव २६३ भारतीय भक्ति का इतिहास अतिप्राचीन काल से ही वेदों में वर्णित २६४ भागवत आदि में नमस्कार भी वन्दनरूप भक्ति २६४ उत्तररामचरित, जानकीहरण हनुमन्नाटक आदि में ही नहीं—वेदों, उपनिषदों और वाल्मीकि रामायण में भक्तिभावना से ही रामचरित-वर्णन २६५ अध्यात्मरामायणवर्णित राम की बाललीला पर कृष्ण-बाललीला का प्रभाव नहीं २६५ रामायण के राम, भागवत के कृष्ण तथा विष्णुपुराण के विष्णु वस्तुतः एक ही तत्त्व २६७ हरिवंश का काल ई० सन् ४०० के आसपास नहीं, महाभारत का काल ही उसका काल, क्योंकि वह महाभारत का खिल है २६७ भागवत का काल छठीं अथवा सातवीं शती नहीं। महाभारत, ब्रह्मसूत्र तथा १७ पुराणों के निर्माण के अनन्तर भी जब व्यासजी का चित्त प्रसन्न नहीं हुआ तब नारदजी के परामर्श से उन्होंने भागवत की रचना की, अतः महाभारत के आसपास का काल ही उसका काल २६८ कूर्मपुराण का समय भी व्यास का ही समय, ७वीं ई० शती नहीं २६९ महापुराणों, पुराणों तथा उपपुराणों के कर्त्तारूप से व्यास की प्रसिद्धि २७० लिङ्गपुराण को १०वीं शती ई० का मानना पूर्ववत् भ्रान्ति २७० वामनपुराण भी व्यास-कृति होने से अर्वाचीन नहीं २७१ प्रचलित नारदीय पुराण को १०वीं शती का कहना अनर्गल कल्पना २७१ पुराणों में प्रमुख स्कन्दपुराण प्रसिद्ध व्यासकृति ई० सन् से ३५०० वर्ष पूर्व रचित २७३ पद्मपुराण के विभिन्न खण्डों का रचना काल पृथक्-पृथक् कहना और उसके प्रचुररामकथासम्बन्धी सामग्रीवाले पातालखण्ड को १२वीं शती का कहना अटकलबाजी २७४ उपपुराण भी पुराणों के समसामयिक ही हैं उनका रचनाकाल, जो बुल्के ने निर्धारित किया है, अशुद्ध है २७५ पुराणों के लक्षण, नाम तथा श्लोक संख्या का विभिन्न पुराणों के अनुसार वर्णन २७८
( ११ ) काशीकेदारमाहात्म्य का कथन है कि वेद, आगम, पुराण, इतिहास आदि सभी अनादि एवं भगवान् के श्वासस्वरूप हैं, वे कभी मलिन और कभी विशद हो भगवान् की प्रपञ्चलीला का वर्णन करते हैं २८३ योगवासिष्ठ वाल्मीकिकृत होने से वाल्मीकिकालिक ही २८४ अध्यात्मरामायण व्यासकृत होने से ई० सन् से ३५०० वर्ष पूर्व का २८५ अद्भुतरामायण अति प्राचीन है, अर्वाचीन नहीं २८६ आनन्दरामायण की रचना का काल १५वीं शती कदापि नहीं, रामचरित वर्णन में पर्यवसित यह शतकोटिप्रविस्तर रामायण का ही अङ्ग एवं प्रामाणिक है २८६ नवम अध्याय महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंशी राजाओं के स्वभाव और महत्त्व का वर्णन २८८-३११ सम्राट् दिलीप की गोसेवा का वर्णन २९० नीति, प्रीति और परमार्थ के रहस्यज्ञ श्रीराम २९२ रावण गृहोषिता सीता के परिग्रह में कतिपय जनों की ही विप्रतिपत्ति २९२ सीतात्याग २९३ सीता के अनुपम उज्ज्वल चरित एवं पातिव्रत्य का प्रभाव २९६ राम द्वारा त्यागने पर भी पतिव्रता सीता की राम के प्रति अतीव उच्च धारणा २९७ रघुवंश के अनुसार रघुवंशी राजाओं की नीतिमत्ता २९९ तत्त्वसंग्रहरामायण आदि की प्राचीनता ३०३ कालनिर्णयरामायण की प्राचीनता ३०४ रामायण का वेदावतारत्व आदि महत्त्व ३०५ जैमिनिभारत की प्राचीनता ३०६ सत्योपाख्यान अर्वाचीन नहीं ३०७ धर्मखण्ड स्कन्दपुराण का अंश होने से व्यास कृति मानना ही उचित ३०८ हनुमत्संहिता की कथावस्तु शुद्ध वैदिक सिद्धान्तों पर आधारित ३०९ बृहत्कोशलखण्ड में वर्णित कथावस्तु को कृष्णलीला का अनुकरण कहना निराधार ३०९ हिन्दुत्व में वर्णित रामायणों में रामकथा ३१० दशम अध्याय संस्कृत ललितसाहित्य में वर्णित रामकथा ३१२-३२२ महाकाव्यों में निरूपित रामचरित ३१२ नाटकों में वर्णित रामकथाएँ ३१३ स्फुट काव्यों में वर्णित रामकथा ३२० कथासाहित्य में विस्तृत रामकथा के वर्णन का अभाव ३२१ चम्पूरामायण आदि चम्पूकाव्यों में रामकथा का वर्णन ३२२
( १२ ) एकादश अध्याय आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा ३२३-३३२ द्रविड़ भाषाओं के साहित्य में रामकथा ३२३ तमिलरामायण में रामकथा ३२३ तेलुगुरामायण में रामकथा ३२३ मलयालम में रामचरितसाहित्य ३२४ कन्नड़रामायण में रामकथासाहित्य ३२४ आदिवासियों में प्रचलित रामकथाएँ ३२४ नेपालीसाहित्य में रामकथा ३२५ सिंहलीरामकथा ३२५ काश्मीरीरामायण में रामकथाविस्तार ३२६ असमीयासाहित्य में रामकथा ३२६ बङ्गालीसाहित्य में वर्णित रामकथा ३२७ उड़ियासाहित्य में वर्णित रामकथा ३२७ हिन्दीसाहित्य में वर्णित रामकथा ३२८ गोस्वामी तुलसीदास वर्णित हिन्दीसाहित्य में रामकथा ३२८ तुलसीभिन्न हिन्दीसाहित्य में वर्णित रामकथा ३२९ मराठीसाहित्य में रामकथा ३३० सीतास्वयंवर ३३१ गुजरातीसाहित्य में रामकथा ३३१ उर्दू तथा फारसीसाहित्य में वर्णित रामकथा ३३२ द्वादश अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३३३-३७२ तिब्बती रामायण ३३३ खोतानी रामायण ३३३ हिन्देशिया की प्राचीनतम रामकथा ३३४ हिन्देशिया की अर्वाचीन रामकथा ३३४ मलयन की अर्वाचीन रामकथा ३३४ जावा की अर्वाचीन रामकथा ३३६ हिकायत सेरीराम में वर्णित रामकथा ३३६ पातानी रामायण ३३७ जावा के सेरतकाण्ड की रामकथा ३३७ हिन्दचीन, श्याम, ब्रह्मदेश की रामकथा ३३८ हिन्दचीन के रूमेरसाहित्य की सर्वाधिक कलात्मक रचना रामकेर्ति में रामकथा ३३९
( १३ ) श्यामदेश के रामकियेन की विस्तृत रामकथा ३३९ ब्रह्मदेश का रामकथासाहित्य ३६९ पाश्चात्य वृत्तान्त— ३६९ पाश्चात्य यात्रियों तथा मिशनरियों की भारतसम्बन्धी रचनाओं में रामकथा ३६९ रसियन भाषा में रामकथा ३७२ त्रयोदश अध्याय बालकाण्ड ३७३-४५५ देवताओं द्वारा विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना ३७३ दशरथ-वंशावली ३७४ दशरथ के पूर्वजन्म की चर्चा ३७५ दशरथ-विवाह ३७५ दशरथ की सन्तति ३७८ शान्ता दशरथ की औरसी पुत्री, रोमपाद की दत्ता पुत्री ३७९ अहल्योद्धार ३८३ अहल्या की स्थिति ३९२ गौतम द्वारा इन्द्र को प्रदत्त शाप के कई रूप ३९३ अहल्या की क्षमा प्रार्थना ३९९ गौतम का अहल्या को शाप देना तथा अहल्या की प्रार्थना पर शाप के अन्त का विधान ३९९ राम-परशुराम-संवाद ४०४ वैष्णव तेज, का परशुराम-देह से निकलकर राममुख में प्रवेश ४०७ अवतारवाद ४०८ अवतारवाद का विकास ४१० प्रामाणिक वाल्मीकिरामायण में नारद का उल्लेख नहीं था—बुल्के का विभ्रम ४२८ राम का बालचरित ४२९ भुशुण्डि-चरित ४३२ राम के प्रारम्भिक कृत्य ४३३ राम-सीताविवाह ४३७ विवाहोत्सव ४४१ विवाहकालिक राम की अवस्था ४४१ सीता का पूर्वराग ४४२ अयोनिजा सीता ४४४ पद्मजा सीता ४५२ रक्तजा सीता ४५३
( १४ ) चतुर्दश अध्याय अयोध्या काण्ड ४५६-४७१ उदीर्ण रावण के वधार्थी देववृन्द की प्रार्थना पर विष्णु का रामरूप में प्राकट्य ४५६ राम के विविध उत्तम गुणगण ४५६ मेदिनी की राम को पतिरूप में वरण करने की इच्छा ४५७ अयोध्याकाण्ड के प्रथमसर्ग को प्रक्षिप्त कहना निराधार ४५८ बालकाण्ड की प्रक्षिप्तता का खण्डन ४५८ राम का अयोध्या न लौटने का दृढ़ निश्चय ४६० पादुकाओं का वृत्तान्त ४६६ काकवृत्तान्त ४६७ राम का वनगमन ४६७ रामवनगमन के कारणों के विषय में अनेक रामायणों के अनेक मत ४६७ कौशल्या का रामबिछोहजनित दुःखावेश में अपने पूर्वजन्म के अनेक पापों की कल्पना करना ४६७ कैकेयी को वर-प्राप्ति का वृत्तान्त ४६९ कैकेयी का दोष निवारण ४७० मन्थरा के सम्बन्ध में विविध कथाएँ ४७१ पञ्चदश अध्याय अरण्यकाण्ड ४७२-५०३ अयोमुखीवृत्तान्त का दाक्षिणात्य पाठ में ही अस्तित्व ४७२ इन्द्र का सीता के पास पायस लाने का वृत्तान्त दाक्षिणात्य पाठ में प्रक्षिप्त तथा अन्य पाठों में अप्रक्षिप्त ४७२ याकोबी के आदिरामायण में चित्रकूटप्रस्थान के बाद अरण्यकाण्ड के आरम्भ का वर्णन, तदनन्तर पञ्चवटी आगमन का वर्णन ४७२ राम को जटायु का परिचय पहले न था पूर्वपक्ष का खण्डन ४७२ परम आस्तिक राम का ऋषियों से मिलन अत्यावश्यक ४७३ अनसूया-सीता-संवाद प्रक्षिप्त नहीं ४७३ प्रिय अतिथि राम के दर्शन किये बिना शरभङ्ग ऋषि की ब्रह्मलोकगमन की अनिच्छा ४७३ महर्षि अगस्त्य के समीप पहुँचकर राम का उन्हें प्रणाम करना उचित ४७३ लक्ष्मण का संयम ४७३ विश्वामित्र की वला और अतिबला विद्याओं के कारण क्षुधा और पिपासा की बाधा की निवृत्ति ४७४ बला और अतिबला राम के साथ लक्ष्मण को भी प्राप्त ४७४ लक्ष्मण सीता और राम को अपने माता पिता मानते थे ४७५ भारतीय संस्कृति और संस्कृत से अपरिचित बुल्के का अनेक स्थलों पर अर्थावगति में प्रमाद ४७५ लक्ष्मण की सेवापरायणता ४७५
( १५ ) लक्ष्मण का विद्रोह और पश्चात्ताप ४७६ उक्त कथा का तीर्थों के माहात्म्य-वर्णन में तात्पर्य ४७९ सेवाधर्म की परम गहनता ४७९ आर्ष इतिहास वाल्मीकिरामायण द्वारा वर्णित लक्ष्मण-स्वरूप तथ्य ४७९ शूर्पणखा का वृत्तान्त ४८० खर और दूषण शूर्पणखा के भाई ४८० शूर्पणखा के पति विद्युज्जिह्व का अज्ञानतः रावण द्वारा वध ४८० शूर्पणखा के सम्बन्ध में पउमचरियं की विकृति ४८० शूर्पणखा के पुत्र शम्बूक का लक्ष्मण द्वारा वध ४८० सारलादास के महाभारत के अनुसार लक्ष्मण शूर्पणखा से विवाह करें, इस विषय में सीता की इच्छा तथा राम की सहमति ४८० सीता पर आक्रमण करने के अनन्तर राम की आज्ञा से लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के नाक और कान काटना ४८१ विरूपित शूर्पणखा का खर के पास जाना ४८१ १४ हजार राक्षसों सहित खर और दूषण का अकेले राम द्वारा वध ४८१ जटायु का वृत्तान्त ४८२ जटायु राम का पूर्वपरिचित ४८२ जटायु और रावण का युद्ध ४८२ जटायु का सीता का रावण द्वारा अपहरण वृत्तान्त राम से कहकर प्राणत्याग ४८३ राम द्वारा जटायु का दाह संस्कार और उसे स्वधाम प्रदान ४८३ सीता की खोज ४८४ कबन्धवध ४८४ शबरी से भेंट ४८५ शबरी द्वारा राम और लक्ष्मण का आतिथ्य सत्कार ४८६ भक्ति में पुरुषत्व तथा स्त्रीत्व जाति का कोई महत्त्व नहीं ४८७ महर्षि मतङ्ग द्वारा श्रमणी शबरी को रामभक्ति की दीक्षा प्रदान ४८८ शबरी भिल्लिनी नहीं थी, शबरी उसका नाम था, वह भक्त थी ४८८ सीताहरण का मुख्य कारण सीता-सौंदर्य ४८९ सत्यसन्ध राम का तपस्वी के रूप में धनुष धारण प्रतिज्ञात ऋषिजन रक्षण के लिए ४९० कनकमृग-कथा, हिन्दीग्रन्थों में न मिलने से, प्रक्षेप नहीं ४९२ सीताहरण के विषय में वाल्मीकिरामायणविरुद्ध कथाएँ विकृति ४९८ छाया सीता का रावण द्वारा अपहरण ५०० असली सीता का अग्नि में अन्तर्धान ५०१ षोडश अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०४-५१८ किष्किन्धा काण्ड की कथावस्तु का विश्लेषण ५०४
( १६ ) शाखाभेद से वेदों के पाठभेदों के तुल्य वाल्मीकिरामायण के सभी पाठभेद प्रामाणिक ५०४ राम के प्रति तारा का शाप ५०४ अङ्गद को अपनी पीठ पर रख समुद्र पार ले जाने के लिए सम्पाति द्वारा अपने पुत्र का आह्वान प्रक्षिप्त नहीं ५०४ केसरी को दिग्गजधवल का वध करने पर वररूप मरुद्विक्रम पुत्र हनुमान् की प्राप्ति ५०४ बालि-वध सर्ग १७ और १८ प्रक्षिप्त नहीं ५०४ महाभारत-रामोपाख्यान वाल्मीकिरामायण का संक्षेप ५०४ बुल्के का प्रामाणिक पाठनिर्धारण वानरीय पङ्कजविश्लेषणमात्र ५०४ सर्ग ३१, ३२, ३५, ३७, ३९ आदि प्रक्षिप्त नहीं ५०४ भारतीय परम्परा में ये सभी प्रामाणिक ५०४ निशाकर ऋषि और सम्पाति की कथा विस्तृत होनेमात्र से प्रक्षिप्त नहीं ५०४ हनुमान् की जन्मकथावाले सर्ग को वाल्मीकिकृत न मानना अल्पज्ञ का सा मखौल ५०४ परस्परविरोधी उल्लेखों के कारण अन्य सर्ग भी प्रतिभाशाली कवि वाल्मीकि-कृत नहीं, प्रक्षिप्त हैं—बुल्के ५०४ भारतीय परम्परानभिज्ञ होने के कारण ही पाश्चात्य विद्वानों को शास्त्रों में भ्रान्ति ५०६ शास्त्रों में ही नहीं, वेद में भी भ्रान्ति होती है ५०६ वाल्मीकिरामायण के अनुसार सुग्रीव का राम-लक्ष्मण को देख वालिप्रेषित जानकर पता लगाने हनुमान् को भेजना ५०६ अन्य रामायणों के अनुसार हनुमान् की कथा ५०६ वाली और सुग्रीव की जन्मकथा ५०७ वाली और सुग्रीव की शत्रुता का कारण ५०९ वाली का वध ५१० राम के सम्मुख खड़े होने की इन्द्र, महेन्द्र, ब्रह्मा तथा त्रिपुरान्तक में भी क्षमता नहीं ५१२ अङ्गद और हनुमान् दोनों राम के परम प्रिय भक्त ५१२ बालिवध-दोष निवारण ५१२ राम की चातुर्मास्यसाधना ५१३ राम की नवरात्रोपासना ५१३ सीतान्वेषणार्थ वानरों का प्रेषण ५१३ अङ्गद आदि का ऋक्षबिल गुफा में प्रवेश ५१४ सम्पाति और जटायु का इन्द्रविजयार्थ स्वर्गगमन ५१५ इन्द्रविजय कर लौटते समय दर्प से दोनों का सूर्य के निकट गमन ५१५ निशाकर ऋषि के कथनानुसार रामदूतों के आगमन से पुनः पर उगने पर ऋषिजी के वचनों पर दृढ़ीभूत विश्वास से हर्षित हुए सम्पाति का पुनः विस्तार से कथा कहना ५१६ आदित्य-किरणों से दग्ध उसके पर मुनि के प्रभाव से पुनः उग गये ५१७ सप्तदश अध्याय सुन्दरकाण्ड ४१९-५३५ हनुमान् का लङ्का-प्रवेश तथा लङ्का-वर्णन आदि सुन्दरकाण्डीय सब विषयों का दिग्दर्शन ५१९
( १७ ) सुन्दरकाण्ड में भी बुल्के द्वारा पाठभेद की चर्चा, जो सिद्धान्ततः मान्य ५१९ सुन्दरकाण्ड में भी सर्ग २ से ११ तक १० सर्गों में पुनरावृत्ति के अतिरिक्त कुछ नहीं आदि बुल्के की अनेक कल्पनाएँ निस्सार ५१९ त्रिजटा का स्वप्न ५१९ सीता के विविध शुभ शकुनों का वर्णन ५१९ सर्ग २९ और ३० की परस्पर सङ्गति सुस्पष्ट एवं टीकाकारों द्वारा प्रामाणिक मानकर उनकी व्याख्या ५२० अचिन्त्यबुद्धि हनुमान् का दर्शन ५२० भीमसत्त्व वानर के दुरासद और दुर्निरीक्ष्य रूप को देखकर सीता का मोह ५२० सीता के विश्वस्त होने के पूर्व उन्हें हनुमान् का आत्मपरिचय देना अस्वाभाविक है, यह कथन ठीक नहीं ५२० परस्पर सम्बद्ध और सङ्गत सुन्दरकाण्ड के समग्र वृत्तान्त को असम्बद्ध कहना अनभिज्ञता ५२० अयोध्या लौटते समय भरद्वाजजी ने सभी घटनाओं का वर्णन किया, लङ्कादहन का नहीं यह कहना निस्सार है 'कर्म वातात्मजस्य' से समुद्रलङ्घन से लेकर लङ्कादहन पर्यन्त हनुमान् के कृत्य का वर्णन किया ही है ५२३ लङ्कादहन वाल्मीकिरामायण का अविभाज्य अङ्ग ५२३ लङ्कादहन किष्किन्धाकाण्ड का अंश नहीं ५२३ लङ्कादेवी की पराजय ५२५ लङ्का में सीता की खोज ५२५ सीता-रावण-संवाद ५२६ त्रिजटा-स्वप्न ५२८ सीता-हनुमान्-संवाद ५३१ अभिज्ञानप्रदान ५३२ लङ्कादहन ५३२ हनुमान् का राम के निकट अपनी लङ्कायात्रा का वर्णन ५३३ अष्टादश अध्याय युद्धकाण्ड ५३६-५८९ युद्धकाण्ड के समग्र वृत्तान्तों का संक्षेप में वर्णन ५३६ बुल्के का यह कथन कि गायकों ने युद्धकाण्ड का कलेवर बढ़ाने में संकोच नहीं किया, ठीक नहीं ५३६ सर्ग १-३, ६-८, १०-१५ तथा २० को प्रक्षेप मानना निराधार ५३६ याकोबी का तर्काभासों के आधार पर सर्ग २६-४० को प्रक्षिप्त कहना निस्सार ५३६ बुल्के, याकोबी आदि के मत में सभी काण्ड अप्रामाणिक एवं पाश्चात्यों के विचार से फिट अंश को छोड़कर सभी में प्रक्षेप ५३६ बुल्के के मन्तव्यानुसार सर्ग ४२-११२ में इतनी पुनरावृत्ति और नीरसता दृष्टिगोचर होती है कि उस समग्र सामग्री का वाल्मीकि जैसे महाकवि की कृति होना सम्भव नहीं ५३७ इन्द्रजित्कृत नागमय बाणों की वृष्टि द्वारा राम और लक्ष्मण का शरबन्धन ५३७ 3
( १८ ) नागपाशबद्ध राम का विशिष्टसत्त्वयोगवश कुछ क्षणों के लिए प्रबुद्ध हो लक्ष्मण की दशा परशोक करना ५३७ वैनतेय के आगमन पर त्रस्त बाणरूपी पन्नगों का पलायन एवं दोनों भ्राताओं की बन्धन से मुक्ति ५३८ अकम्पन तथा नरान्तक पूर्वहृत अकम्पन और नरान्तक से भिन्न ५३८ रावण का रणभूमि में उपस्थित हो लक्ष्मण से युद्ध एवं शक्ति द्वारा लक्ष्मण को घायल करना ५३९ राम-रावण संग्राम, राम ने उसके ऊपर ऐसा भीषण प्रहार किया कि उसके चक्र, अश्व, ध्वज, पताका, सारथि तथा वज्र, शूल और खङ्ग-सहित रथ नष्ट हो गया ५३९ राम ने रावण को विपन्न देख कहा—रात्रिञ्चर, तुम क्लान्त हो, लङ्का में जा विश्राम करो, पुनः रथी, धन्वी होकर आना तब मेरा बल देखना ५३९ पद्मपुराण, कालिकापुराण आदि के अनुसार युद्धकाल एवं योद्धाओं की तालिका ५४३ हनुमान् की हिमालय-यात्रा प्रक्षिप्त नहीं ५४९ अग्निपरीक्षा तथा पुष्पक द्वारा अयोध्यागमन का वृत्तान्त प्रक्षिप्त नहीं ५४९ आतिथ्यस्वीकार करने के निमित्त विभीषण की प्रार्थना पर राम का मेरा मन भाई भरत को देखने को अत्यन्त आतुर है, पुष्पक लाओं जिससे मैं शीघ्र अयोध्या पहुँचूं कहना ५५० राम का भरद्वाज आश्रम में आगमन ५५१ राम के बिना माँगे महर्षि द्वारा वर प्रदान ५५१ सभी वानरों के स्वागत-सम्मानार्थ राम द्वारा मार्ग के निकटस्थ अमृतोपमफल और मधुस्रावी वृक्ष होने का वरदान महर्षि से माँगना ५५१ भरद्वाज आश्रम से हनुमान को अयोध्या भेजना ५५२ सुग्रीव, विभीषण आदि के समुचित स्वागतार्थ हनुमान् को अयोध्या भेजना ५५२ विभीषण को शरणागति ५५७ उसकी ग्राह्यता या अग्राह्यता का विस्तृत विचार ५५८ विभीषणचरित ५६४ सेतुबन्ध ५६५ द्रुमकुल्य-विनाश ५६६ रामेश्वरप्रतिष्ठा ५६८ लङ्कावरोध ५६८ रामसेना की टोह लेने आये शुक, सारण और शार्दूल की सीता लौटा देने की रावण को सलाह ५६९ राम के मायाशीर्ष का वृत्तान्त ५७० नागपाशबन्धन ५७२ औषधि आनयनार्थ हनुमान् की हिमालय-यात्रा ५७३ कुम्भकर्ण-वध ५७५ इन्द्रजित् का मायासीता का सिर काटना ८७८ इन्द्रजित्-वध ५७८ रावण-वध ५७९ रावण का मर्मस्थान ५८२ रावण-मुक्ति ५८३
( १९ ) सीता की अग्निपरीक्षा ५८३ अयोध्याप्रत्यावर्तन ५८४ लङ्का की सुरक्षा की दृष्टि से सेतुभङ्ग ५८४ वाल्मीकिरामायण आदि महाकाव्य होने के साथ ही आर्य इतिहास भी है ५८५ राम का सबसे मिलना ५८६ भस्मलोचन का विनाश ५८६ अन्यान्य रामायणों के विभिन्न वृत्तान्त ५८६ एकोनविंश अध्याय उत्तरकाण्ड ५९०-६४९ रावण के पूर्वजों एवं रावण का भी वेद में नाम ५९० अथर्ववेद में दशशीर्ष ब्राह्मण का वर्णन ५९० रामाभिषेक के पश्चात् रामाभिनन्दनार्थ आये तपस्वियों द्वारा राक्षस-वंश का इतिवृत्त सुनाना ५९० रावण के भाई और बहन ५९१ रावण जन्मना ब्राह्मण ५९१ राम कथा के विकास के साथ क्षत्रिय रावण ब्राह्मण ही नहीं उत्तरकाण्ड में ब्रह्मा का वंशज हो गया, बुल्के का यह कथन प्रमाद ही है ५९१ वाल्मीकिरामायण के अनुसार रावण ब्रह्मपुत्र पुलस्त्य का पौत्र एवं विश्रवा का पुत्र है ५९१ महाभारत के अनुसार रावण के पूर्वज ५९२ काशीकेदारखण्ड के अनुसार शिवगण भद्र और सुभद्र ही जय-विजय हुए शापवश वे ही हिरण्य- कशिपु और हिरण्याक्ष हुए ५९३ दूसरे जन्म में वे ही रावण ओर कुम्भकर्ण हुए. ५९५ रावण आदि का तप और वरप्राप्ति ८९६ रावण का विवाह तथा सन्तति ५९७ रावण की अन्यान्य विजय-यात्राएँ ५९८ रम्भा-धर्षण के कारण रावण को नलकूवर का शाप ५९९ कार्तवीर्य द्वारा-रावण की पराजय ६०० उत्तरकाण्ड की कथावस्तु ६०१ उत्तरकाण्ड का विश्लेषण ६०२ सौदास की कथा ६०३ शम्बूक-वध ६०७ कार्य और अकार्य के विषय में शास्त्र प्रमाण ६०९ राम का अश्वमेध ६१० राम की यात्राएँ ६११ हनुमच्चरित ६१४
( २० ) हनुमांन् की कथा ६१४ हनुमान् का जन्म ६१८ हनुमान् का बालचरित ६२० हनुमान् की विद्या, बुद्धिमत्ता तथा पराक्रम ६२४ हनुमान् का ब्रह्मचर्य ६३१ राम द्वारा लोकापवाद की दृष्टि से सीता का त्याग ६४० अवास्तविक सीतात्याग ६४६ राम का सीता के प्रति पूर्ण अनुराग ६४६ कुश-लवचरित ६४६ राम का वैष्णव तेज में प्रवेश ६४७ विंश अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५०-७२१ विष्णुपरक वेदमन्त्रों की व्याख्या ६५० भगवान् विष्णु के दिव्य जन्म और कर्म का निर्देश ६५३ अवतारवाद एवं सीता और राम का महत्त्व ६५४ मत्स्यावतार, कूर्मावतार तथा बाराहावतार का संकेत ६५४ नृसिंहावतार का सूचन ६५४ वामनावतार, परशुरामावतार, कृष्णावतार का संकेत ६५४ वाराहावतार के सूचक वेदमन्त्र ६५५ वामनावतार के बोधकवेदमन्त्र ६५५ कूर्मावतार के बोधक वेदमन्त्र ६५६ कृष्णावतार के बोधक वेदमन्त्र ६५९ नारसिंहावतार के बोधक वेदमन्त्र ६५९ रामावतार के बोधक वेदमन्त्र, पुराण-वचन आदि ६५९ राम के गुण तथा स्वभाव ६६८ पाश्चात्यों की अवतार आदि के विषय में धारणा ६७२ . उसका समाधान ६७४ राम की ऐतिहासिकता ६७६ श्रीराम की नीति ६७७ श्रीराम की जन्मकुण्डली ६७८ श्रीराम की नीतिमत्ता ६७८ आदर्श रामराज्य ६७९ सत्पुरुषव्रती राम ६८१ सर्वलोकप्रिय राम ६८६ राम-नाम की अपार महिमा ६८९ रामवियोग से सारा पुर ही व्याकुल और संभ्रान्त ६९१
( २१ ) वृक्ष, नदियां, सरोवर तक रामवियोग से सन्तप्त ६९१ राम को गङ्गातट पहुँचा कर लौटते हुए रथाश्वों की दशा ६९२ कुश और लव की जन्मकथा ६९३ लक्ष्मण का परित्याग ६९६ रामायण की सुखान्त रामकथा ६९७ उपसंहार ६९९ रामायण का मूल उपनिषद्, ब्रह्मा का वरदान तथा महर्षि वाल्मीकि की समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा ७०१ कल्पभेद से कहीं कहीं रामकथा में भेद की प्रतीति ७०२ वाल्मीकिरामायण, आनन्दरामायण तथा पुराणों की मान्यता के अनुसार शतकोटिप्रविस्तर रामायण सब रामकथाओं का मूल ७०३ शतकोटिप्रविस्तर रामकथा का मूल स्रोत वेद ७०३ अवतारवाद और भक्ति दो तत्व कृष्णावतार तथा कृष्णभक्ति के अनुकरण पर ही रामकथा में प्रविष्ट यह कथन भ्रममूलक ७१० ईश्वर होने के कारण कृष्ण के समान ही राम की रामलीला भी वास्तविक, अनुकरण नहीं ७११ वाल्मीकिरामायण, महाभारत, भागवत आदि का प्रामाण्य मानने पर राम और कृष्ण के अस्तित्ववत् सीता, रुक्मिणी आदि की अभिन्नता की सिद्धि ७१२ स्फुट काव्य के आधार पर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की, यह कल्पना निराधार एवं वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध ७१३ राम का अनादिकाल से ही विष्णु-अवतार के साथ-साथ व्यावहारिक रूप मर्यादापुरुषोत्तम ७१५ रामकथा का मुख्यदृष्टिकोण धार्मिक न होकर शताब्दियों तक साहित्यिक ही रहा, यह कथन असत्य ७१६ भक्तिमार्ग का आविर्भाव वैदिक साहित्य में हो चुका था, वह शताब्दियों के पश्चात् भागवत धर्म में पल्लवित हो सका, यह विकासवाद मिथ्या अपसिद्धान्त में ही सम्भव है ७१७ पुराणों में विष्णु को परब्रह्मरूप माना गया है, विष्णु के अवतार होने से राम सुतरां परब्रह्म ७१७ रावण ने कामबुद्धि से सीताहरण किया यह उसका बाह्यरूप है, आन्तर रूप यह भी है कि उसने मुक्तिकामना से राम से वैर किया ७१८ राम के अवतार के मुख्य प्रयोजन ७१९ बाली द्वारा राम की निर्दोषता स्वीकार ७२० रामकथा भारतीय संस्कृति के आदर्शवाद का उज्ज्वलतम प्रतीक ७२१ एकविंश अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७२२-८५० मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् राम तथा जगज्जननी जानकी के प्रति वनमानव द्वारा प्रयुक्त अत्यन्त अशोभन, अभद्र शब्दों का उत्तर ७२२ रामचरित के सम्बन्ध में वर्तमान इतिहास का चञ्चुप्रवेश नहीं हो सकता ७२४ सेतुबन्धन कल्पना नहीं ७२५ समुद्रवर्णन तथा दक्षिण भारत की स्थिति ७२६