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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

( १२ ) एकादश अध्याय आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा ३२३-३३२ द्रविड़ भाषाओं के साहित्य में रामकथा ३२३ तमिलरामायण में रामकथा ३२३ तेलुगुरामायण में रामकथा ३२३ मलयालम में रामचरितसाहित्य ३२४ कन्नड़रामायण में रामकथासाहित्य ३२४ आदिवासियों में प्रचलित रामकथाएँ ३२४ नेपालीसाहित्य में रामकथा ३२५ सिंहलीरामकथा ३२५ काश्मीरीरामायण में रामकथाविस्तार ३२६ असमीयासाहित्य में रामकथा ३२६ बङ्गालीसाहित्य में वर्णित रामकथा ३२७ उड़ियासाहित्य में वर्णित रामकथा ३२७ हिन्दीसाहित्य में वर्णित रामकथा ३२८ गोस्वामी तुलसीदास वर्णित हिन्दीसाहित्य में रामकथा ३२८ तुलसीभिन्न हिन्दीसाहित्य में वर्णित रामकथा ३२९ मराठीसाहित्य में रामकथा ३३० सीतास्वयंवर ३३१ गुजरातीसाहित्य में रामकथा ३३१ उर्दू तथा फारसीसाहित्य में वर्णित रामकथा ३३२ द्वादश अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३३३-३७२ तिब्बती रामायण ३३३ खोतानी रामायण ३३३ हिन्देशिया की प्राचीनतम रामकथा ३३४ हिन्देशिया की अर्वाचीन रामकथा ३३४ मलयन की अर्वाचीन रामकथा ३३४ जावा की अर्वाचीन रामकथा ३३६ हिकायत सेरीराम में वर्णित रामकथा ३३६ पातानी रामायण ३३७ जावा के सेरतकाण्ड की रामकथा ३३७ हिन्दचीन, श्याम, ब्रह्मदेश की रामकथा ३३८ हिन्दचीन के रूमेरसाहित्य की सर्वाधिक कलात्मक रचना रामकेर्ति में रामकथा ३३९

( १३ ) श्यामदेश के रामकियेन की विस्तृत रामकथा ३३९ ब्रह्मदेश का रामकथासाहित्य ३६९ पाश्चात्य वृत्तान्त— ३६९ पाश्चात्य यात्रियों तथा मिशनरियों की भारतसम्बन्धी रचनाओं में रामकथा ३६९ रसियन भाषा में रामकथा ३७२ त्रयोदश अध्याय बालकाण्ड ३७३-४५५ देवताओं द्वारा विष्णु से अवतार लेने की प्रार्थना ३७३ दशरथ-वंशावली ३७४ दशरथ के पूर्वजन्म की चर्चा ३७५ दशरथ-विवाह ३७५ दशरथ की सन्तति ३७८ शान्ता दशरथ की औरसी पुत्री, रोमपाद की दत्ता पुत्री ३७९ अहल्योद्धार ३८३ अहल्या की स्थिति ३९२ गौतम द्वारा इन्द्र को प्रदत्त शाप के कई रूप ३९३ अहल्या की क्षमा प्रार्थना ३९९ गौतम का अहल्या को शाप देना तथा अहल्या की प्रार्थना पर शाप के अन्त का विधान ३९९ राम-परशुराम-संवाद ४०४ वैष्णव तेज, का परशुराम-देह से निकलकर राममुख में प्रवेश ४०७ अवतारवाद ४०८ अवतारवाद का विकास ४१० प्रामाणिक वाल्मीकिरामायण में नारद का उल्लेख नहीं था—बुल्के का विभ्रम ४२८ राम का बालचरित ४२९ भुशुण्डि-चरित ४३२ राम के प्रारम्भिक कृत्य ४३३ राम-सीताविवाह ४३७ विवाहोत्सव ४४१ विवाहकालिक राम की अवस्था ४४१ सीता का पूर्वराग ४४२ अयोनिजा सीता ४४४ पद्मजा सीता ४५२ रक्तजा सीता ४५३

( १४ ) चतुर्दश अध्याय अयोध्या काण्ड ४५६-४७१ उदीर्ण रावण के वधार्थी देववृन्द की प्रार्थना पर विष्णु का रामरूप में प्राकट्य ४५६ राम के विविध उत्तम गुणगण ४५६ मेदिनी की राम को पतिरूप में वरण करने की इच्छा ४५७ अयोध्याकाण्ड के प्रथमसर्ग को प्रक्षिप्त कहना निराधार ४५८ बालकाण्ड की प्रक्षिप्तता का खण्डन ४५८ राम का अयोध्या न लौटने का दृढ़ निश्चय ४६० पादुकाओं का वृत्तान्त ४६६ काकवृत्तान्त ४६७ राम का वनगमन ४६७ रामवनगमन के कारणों के विषय में अनेक रामायणों के अनेक मत ४६७ कौशल्या का रामबिछोहजनित दुःखावेश में अपने पूर्वजन्म के अनेक पापों की कल्पना करना ४६७ कैकेयी को वर-प्राप्ति का वृत्तान्त ४६९ कैकेयी का दोष निवारण ४७० मन्थरा के सम्बन्ध में विविध कथाएँ ४७१ पञ्चदश अध्याय अरण्यकाण्ड ४७२-५०३ अयोमुखीवृत्तान्त का दाक्षिणात्य पाठ में ही अस्तित्व ४७२ इन्द्र का सीता के पास पायस लाने का वृत्तान्त दाक्षिणात्य पाठ में प्रक्षिप्त तथा अन्य पाठों में अप्रक्षिप्त ४७२ याकोबी के आदिरामायण में चित्रकूटप्रस्थान के बाद अरण्यकाण्ड के आरम्भ का वर्णन, तदनन्तर पञ्चवटी आगमन का वर्णन ४७२ राम को जटायु का परिचय पहले न था पूर्वपक्ष का खण्डन ४७२ परम आस्तिक राम का ऋषियों से मिलन अत्यावश्यक ४७३ अनसूया-सीता-संवाद प्रक्षिप्त नहीं ४७३ प्रिय अतिथि राम के दर्शन किये बिना शरभङ्ग ऋषि की ब्रह्मलोकगमन की अनिच्छा ४७३ महर्षि अगस्त्य के समीप पहुँचकर राम का उन्हें प्रणाम करना उचित ४७३ लक्ष्मण का संयम ४७३ विश्वामित्र की वला और अतिबला विद्याओं के कारण क्षुधा और पिपासा की बाधा की निवृत्ति ४७४ बला और अतिबला राम के साथ लक्ष्मण को भी प्राप्त ४७४ लक्ष्मण सीता और राम को अपने माता पिता मानते थे ४७५ भारतीय संस्कृति और संस्कृत से अपरिचित बुल्के का अनेक स्थलों पर अर्थावगति में प्रमाद ४७५ लक्ष्मण की सेवापरायणता ४७५

( १५ ) लक्ष्मण का विद्रोह और पश्चात्ताप ४७६ उक्त कथा का तीर्थों के माहात्म्य-वर्णन में तात्पर्य ४७९ सेवाधर्म की परम गहनता ४७९ आर्ष इतिहास वाल्मीकिरामायण द्वारा वर्णित लक्ष्मण-स्वरूप तथ्य ४७९ शूर्पणखा का वृत्तान्त ४८० खर और दूषण शूर्पणखा के भाई ४८० शूर्पणखा के पति विद्युज्जिह्व का अज्ञानतः रावण द्वारा वध ४८० शूर्पणखा के सम्बन्ध में पउमचरियं की विकृति ४८० शूर्पणखा के पुत्र शम्बूक का लक्ष्मण द्वारा वध ४८० सारलादास के महाभारत के अनुसार लक्ष्मण शूर्पणखा से विवाह करें, इस विषय में सीता की इच्छा तथा राम की सहमति ४८० सीता पर आक्रमण करने के अनन्तर राम की आज्ञा से लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के नाक और कान काटना ४८१ विरूपित शूर्पणखा का खर के पास जाना ४८१ १४ हजार राक्षसों सहित खर और दूषण का अकेले राम द्वारा वध ४८१ जटायु का वृत्तान्त ४८२ जटायु राम का पूर्वपरिचित ४८२ जटायु और रावण का युद्ध ४८२ जटायु का सीता का रावण द्वारा अपहरण वृत्तान्त राम से कहकर प्राणत्याग ४८३ राम द्वारा जटायु का दाह संस्कार और उसे स्वधाम प्रदान ४८३ सीता की खोज ४८४ कबन्धवध ४८४ शबरी से भेंट ४८५ शबरी द्वारा राम और लक्ष्मण का आतिथ्य सत्कार ४८६ भक्ति में पुरुषत्व तथा स्त्रीत्व जाति का कोई महत्त्व नहीं ४८७ महर्षि मतङ्ग द्वारा श्रमणी शबरी को रामभक्ति की दीक्षा प्रदान ४८८ शबरी भिल्लिनी नहीं थी, शबरी उसका नाम था, वह भक्त थी ४८८ सीताहरण का मुख्य कारण सीता-सौंदर्य ४८९ सत्यसन्ध राम का तपस्वी के रूप में धनुष धारण प्रतिज्ञात ऋषिजन रक्षण के लिए ४९० कनकमृग-कथा, हिन्दीग्रन्थों में न मिलने से, प्रक्षेप नहीं ४९२ सीताहरण के विषय में वाल्मीकिरामायणविरुद्ध कथाएँ विकृति ४९८ छाया सीता का रावण द्वारा अपहरण ५०० असली सीता का अग्नि में अन्तर्धान ५०१ षोडश अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०४-५१८ किष्किन्धा काण्ड की कथावस्तु का विश्लेषण ५०४

( १६ ) शाखाभेद से वेदों के पाठभेदों के तुल्य वाल्मीकिरामायण के सभी पाठभेद प्रामाणिक ५०४ राम के प्रति तारा का शाप ५०४ अङ्गद को अपनी पीठ पर रख समुद्र पार ले जाने के लिए सम्पाति द्वारा अपने पुत्र का आह्वान प्रक्षिप्त नहीं ५०४ केसरी को दिग्गजधवल का वध करने पर वररूप मरुद्विक्रम पुत्र हनुमान् की प्राप्ति ५०४ बालि-वध सर्ग १७ और १८ प्रक्षिप्त नहीं ५०४ महाभारत-रामोपाख्यान वाल्मीकिरामायण का संक्षेप ५०४ बुल्के का प्रामाणिक पाठनिर्धारण वानरीय पङ्कजविश्लेषणमात्र ५०४ सर्ग ३१, ३२, ३५, ३७, ३९ आदि प्रक्षिप्त नहीं ५०४ भारतीय परम्परा में ये सभी प्रामाणिक ५०४ निशाकर ऋषि और सम्पाति की कथा विस्तृत होनेमात्र से प्रक्षिप्त नहीं ५०४ हनुमान् की जन्मकथावाले सर्ग को वाल्मीकिकृत न मानना अल्पज्ञ का सा मखौल ५०४ परस्परविरोधी उल्लेखों के कारण अन्य सर्ग भी प्रतिभाशाली कवि वाल्मीकि-कृत नहीं, प्रक्षिप्त हैं—बुल्के ५०४ भारतीय परम्परानभिज्ञ होने के कारण ही पाश्चात्य विद्वानों को शास्त्रों में भ्रान्ति ५०६ शास्त्रों में ही नहीं, वेद में भी भ्रान्ति होती है ५०६ वाल्मीकिरामायण के अनुसार सुग्रीव का राम-लक्ष्मण को देख वालिप्रेषित जानकर पता लगाने हनुमान् को भेजना ५०६ अन्य रामायणों के अनुसार हनुमान् की कथा ५०६ वाली और सुग्रीव की जन्मकथा ५०७ वाली और सुग्रीव की शत्रुता का कारण ५०९ वाली का वध ५१० राम के सम्मुख खड़े होने की इन्द्र, महेन्द्र, ब्रह्मा तथा त्रिपुरान्तक में भी क्षमता नहीं ५१२ अङ्गद और हनुमान् दोनों राम के परम प्रिय भक्त ५१२ बालिवध-दोष निवारण ५१२ राम की चातुर्मास्यसाधना ५१३ राम की नवरात्रोपासना ५१३ सीतान्वेषणार्थ वानरों का प्रेषण ५१३ अङ्गद आदि का ऋक्षबिल गुफा में प्रवेश ५१४ सम्पाति और जटायु का इन्द्रविजयार्थ स्वर्गगमन ५१५ इन्द्रविजय कर लौटते समय दर्प से दोनों का सूर्य के निकट गमन ५१५ निशाकर ऋषि के कथनानुसार रामदूतों के आगमन से पुनः पर उगने पर ऋषिजी के वचनों पर दृढ़ीभूत विश्वास से हर्षित हुए सम्पाति का पुनः विस्तार से कथा कहना ५१६ आदित्य-किरणों से दग्ध उसके पर मुनि के प्रभाव से पुनः उग गये ५१७ सप्तदश अध्याय सुन्दरकाण्ड ४१९-५३५ हनुमान् का लङ्का-प्रवेश तथा लङ्का-वर्णन आदि सुन्दरकाण्डीय सब विषयों का दिग्दर्शन ५१९

( १७ ) सुन्दरकाण्ड में भी बुल्के द्वारा पाठभेद की चर्चा, जो सिद्धान्ततः मान्य ५१९ सुन्दरकाण्ड में भी सर्ग २ से ११ तक १० सर्गों में पुनरावृत्ति के अतिरिक्त कुछ नहीं आदि बुल्के की अनेक कल्पनाएँ निस्सार ५१९ त्रिजटा का स्वप्न ५१९ सीता के विविध शुभ शकुनों का वर्णन ५१९ सर्ग २९ और ३० की परस्पर सङ्गति सुस्पष्ट एवं टीकाकारों द्वारा प्रामाणिक मानकर उनकी व्याख्या ५२० अचिन्त्यबुद्धि हनुमान् का दर्शन ५२० भीमसत्त्व वानर के दुरासद और दुर्निरीक्ष्य रूप को देखकर सीता का मोह ५२० सीता के विश्वस्त होने के पूर्व उन्हें हनुमान् का आत्मपरिचय देना अस्वाभाविक है, यह कथन ठीक नहीं ५२० परस्पर सम्बद्ध और सङ्गत सुन्दरकाण्ड के समग्र वृत्तान्त को असम्बद्ध कहना अनभिज्ञता ५२० अयोध्या लौटते समय भरद्वाजजी ने सभी घटनाओं का वर्णन किया, लङ्कादहन का नहीं यह कहना निस्सार है 'कर्म वातात्मजस्य' से समुद्रलङ्घन से लेकर लङ्कादहन पर्यन्त हनुमान् के कृत्य का वर्णन किया ही है ५२३ लङ्कादहन वाल्मीकिरामायण का अविभाज्य अङ्ग ५२३ लङ्कादहन किष्किन्धाकाण्ड का अंश नहीं ५२३ लङ्कादेवी की पराजय ५२५ लङ्का में सीता की खोज ५२५ सीता-रावण-संवाद ५२६ त्रिजटा-स्वप्न ५२८ सीता-हनुमान्-संवाद ५३१ अभिज्ञानप्रदान ५३२ लङ्कादहन ५३२ हनुमान् का राम के निकट अपनी लङ्कायात्रा का वर्णन ५३३ अष्टादश अध्याय युद्धकाण्ड ५३६-५८९ युद्धकाण्ड के समग्र वृत्तान्तों का संक्षेप में वर्णन ५३६ बुल्के का यह कथन कि गायकों ने युद्धकाण्ड का कलेवर बढ़ाने में संकोच नहीं किया, ठीक नहीं ५३६ सर्ग १-३, ६-८, १०-१५ तथा २० को प्रक्षेप मानना निराधार ५३६ याकोबी का तर्काभासों के आधार पर सर्ग २६-४० को प्रक्षिप्त कहना निस्सार ५३६ बुल्के, याकोबी आदि के मत में सभी काण्ड अप्रामाणिक एवं पाश्चात्यों के विचार से फिट अंश को छोड़कर सभी में प्रक्षेप ५३६ बुल्के के मन्तव्यानुसार सर्ग ४२-११२ में इतनी पुनरावृत्ति और नीरसता दृष्टिगोचर होती है कि उस समग्र सामग्री का वाल्मीकि जैसे महाकवि की कृति होना सम्भव नहीं ५३७ इन्द्रजित्कृत नागमय बाणों की वृष्टि द्वारा राम और लक्ष्मण का शरबन्धन ५३७ 3

( १८ ) नागपाशबद्ध राम का विशिष्टसत्त्वयोगवश कुछ क्षणों के लिए प्रबुद्ध हो लक्ष्मण की दशा परशोक करना ५३७ वैनतेय के आगमन पर त्रस्त बाणरूपी पन्नगों का पलायन एवं दोनों भ्राताओं की बन्धन से मुक्ति ५३८ अकम्पन तथा नरान्तक पूर्वहृत अकम्पन और नरान्तक से भिन्न ५३८ रावण का रणभूमि में उपस्थित हो लक्ष्मण से युद्ध एवं शक्ति द्वारा लक्ष्मण को घायल करना ५३९ राम-रावण संग्राम, राम ने उसके ऊपर ऐसा भीषण प्रहार किया कि उसके चक्र, अश्व, ध्वज, पताका, सारथि तथा वज्र, शूल और खङ्ग-सहित रथ नष्ट हो गया ५३९ राम ने रावण को विपन्न देख कहा—रात्रिञ्चर, तुम क्लान्त हो, लङ्का में जा विश्राम करो, पुनः रथी, धन्वी होकर आना तब मेरा बल देखना ५३९ पद्मपुराण, कालिकापुराण आदि के अनुसार युद्धकाल एवं योद्धाओं की तालिका ५४३ हनुमान् की हिमालय-यात्रा प्रक्षिप्त नहीं ५४९ अग्निपरीक्षा तथा पुष्पक द्वारा अयोध्यागमन का वृत्तान्त प्रक्षिप्त नहीं ५४९ आतिथ्यस्वीकार करने के निमित्त विभीषण की प्रार्थना पर राम का मेरा मन भाई भरत को देखने को अत्यन्त आतुर है, पुष्पक लाओं जिससे मैं शीघ्र अयोध्या पहुँचूं कहना ५५० राम का भरद्वाज आश्रम में आगमन ५५१ राम के बिना माँगे महर्षि द्वारा वर प्रदान ५५१ सभी वानरों के स्वागत-सम्मानार्थ राम द्वारा मार्ग के निकटस्थ अमृतोपमफल और मधुस्रावी वृक्ष होने का वरदान महर्षि से माँगना ५५१ भरद्वाज आश्रम से हनुमान को अयोध्या भेजना ५५२ सुग्रीव, विभीषण आदि के समुचित स्वागतार्थ हनुमान् को अयोध्या भेजना ५५२ विभीषण को शरणागति ५५७ उसकी ग्राह्यता या अग्राह्यता का विस्तृत विचार ५५८ विभीषणचरित ५६४ सेतुबन्ध ५६५ द्रुमकुल्य-विनाश ५६६ रामेश्वरप्रतिष्ठा ५६८ लङ्कावरोध ५६८ रामसेना की टोह लेने आये शुक, सारण और शार्दूल की सीता लौटा देने की रावण को सलाह ५६९ राम के मायाशीर्ष का वृत्तान्त ५७० नागपाशबन्धन ५७२ औषधि आनयनार्थ हनुमान् की हिमालय-यात्रा ५७३ कुम्भकर्ण-वध ५७५ इन्द्रजित् का मायासीता का सिर काटना ८७८ इन्द्रजित्-वध ५७८ रावण-वध ५७९ रावण का मर्मस्थान ५८२ रावण-मुक्ति ५८३

( १९ ) सीता की अग्निपरीक्षा ५८३ अयोध्याप्रत्यावर्तन ५८४ लङ्का की सुरक्षा की दृष्टि से सेतुभङ्ग ५८४ वाल्मीकिरामायण आदि महाकाव्य होने के साथ ही आर्य इतिहास भी है ५८५ राम का सबसे मिलना ५८६ भस्मलोचन का विनाश ५८६ अन्यान्य रामायणों के विभिन्न वृत्तान्त ५८६ एकोनविंश अध्याय उत्तरकाण्ड ५९०-६४९ रावण के पूर्वजों एवं रावण का भी वेद में नाम ५९० अथर्ववेद में दशशीर्ष ब्राह्मण का वर्णन ५९० रामाभिषेक के पश्चात् रामाभिनन्दनार्थ आये तपस्वियों द्वारा राक्षस-वंश का इतिवृत्त सुनाना ५९० रावण के भाई और बहन ५९१ रावण जन्मना ब्राह्मण ५९१ राम कथा के विकास के साथ क्षत्रिय रावण ब्राह्मण ही नहीं उत्तरकाण्ड में ब्रह्मा का वंशज हो गया, बुल्के का यह कथन प्रमाद ही है ५९१ वाल्मीकिरामायण के अनुसार रावण ब्रह्मपुत्र पुलस्त्य का पौत्र एवं विश्रवा का पुत्र है ५९१ महाभारत के अनुसार रावण के पूर्वज ५९२ काशीकेदारखण्ड के अनुसार शिवगण भद्र और सुभद्र ही जय-विजय हुए शापवश वे ही हिरण्य- कशिपु और हिरण्याक्ष हुए ५९३ दूसरे जन्म में वे ही रावण ओर कुम्भकर्ण हुए. ५९५ रावण आदि का तप और वरप्राप्ति ८९६ रावण का विवाह तथा सन्तति ५९७ रावण की अन्यान्य विजय-यात्राएँ ५९८ रम्भा-धर्षण के कारण रावण को नलकूवर का शाप ५९९ कार्तवीर्य द्वारा-रावण की पराजय ६०० उत्तरकाण्ड की कथावस्तु ६०१ उत्तरकाण्ड का विश्लेषण ६०२ सौदास की कथा ६०३ शम्बूक-वध ६०७ कार्य और अकार्य के विषय में शास्त्र प्रमाण ६०९ राम का अश्वमेध ६१० राम की यात्राएँ ६११ हनुमच्चरित ६१४

( २० ) हनुमांन् की कथा ६१४ हनुमान् का जन्म ६१८ हनुमान् का बालचरित ६२० हनुमान् की विद्या, बुद्धिमत्ता तथा पराक्रम ६२४ हनुमान् का ब्रह्मचर्य ६३१ राम द्वारा लोकापवाद की दृष्टि से सीता का त्याग ६४० अवास्तविक सीतात्याग ६४६ राम का सीता के प्रति पूर्ण अनुराग ६४६ कुश-लवचरित ६४६ राम का वैष्णव तेज में प्रवेश ६४७ विंश अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६५०-७२१ विष्णुपरक वेदमन्त्रों की व्याख्या ६५० भगवान् विष्णु के दिव्य जन्म और कर्म का निर्देश ६५३ अवतारवाद एवं सीता और राम का महत्त्व ६५४ मत्स्यावतार, कूर्मावतार तथा बाराहावतार का संकेत ६५४ नृसिंहावतार का सूचन ६५४ वामनावतार, परशुरामावतार, कृष्णावतार का संकेत ६५४ वाराहावतार के सूचक वेदमन्त्र ६५५ वामनावतार के बोधकवेदमन्त्र ६५५ कूर्मावतार के बोधक वेदमन्त्र ६५६ कृष्णावतार के बोधक वेदमन्त्र ६५९ नारसिंहावतार के बोधक वेदमन्त्र ६५९ रामावतार के बोधक वेदमन्त्र, पुराण-वचन आदि ६५९ राम के गुण तथा स्वभाव ६६८ पाश्चात्यों की अवतार आदि के विषय में धारणा ६७२ . उसका समाधान ६७४ राम की ऐतिहासिकता ६७६ श्रीराम की नीति ६७७ श्रीराम की जन्मकुण्डली ६७८ श्रीराम की नीतिमत्ता ६७८ आदर्श रामराज्य ६७९ सत्पुरुषव्रती राम ६८१ सर्वलोकप्रिय राम ६८६ राम-नाम की अपार महिमा ६८९ रामवियोग से सारा पुर ही व्याकुल और संभ्रान्त ६९१

( २१ ) वृक्ष, नदियां, सरोवर तक रामवियोग से सन्तप्त ६९१ राम को गङ्गातट पहुँचा कर लौटते हुए रथाश्वों की दशा ६९२ कुश और लव की जन्मकथा ६९३ लक्ष्मण का परित्याग ६९६ रामायण की सुखान्त रामकथा ६९७ उपसंहार ६९९ रामायण का मूल उपनिषद्, ब्रह्मा का वरदान तथा महर्षि वाल्मीकि की समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा ७०१ कल्पभेद से कहीं कहीं रामकथा में भेद की प्रतीति ७०२ वाल्मीकिरामायण, आनन्दरामायण तथा पुराणों की मान्यता के अनुसार शतकोटिप्रविस्तर रामायण सब रामकथाओं का मूल ७०३ शतकोटिप्रविस्तर रामकथा का मूल स्रोत वेद ७०३ अवतारवाद और भक्ति दो तत्व कृष्णावतार तथा कृष्णभक्ति के अनुकरण पर ही रामकथा में प्रविष्ट यह कथन भ्रममूलक ७१० ईश्वर होने के कारण कृष्ण के समान ही राम की रामलीला भी वास्तविक, अनुकरण नहीं ७११ वाल्मीकिरामायण, महाभारत, भागवत आदि का प्रामाण्य मानने पर राम और कृष्ण के अस्तित्ववत् सीता, रुक्मिणी आदि की अभिन्नता की सिद्धि ७१२ स्फुट काव्य के आधार पर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की, यह कल्पना निराधार एवं वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध ७१३ राम का अनादिकाल से ही विष्णु-अवतार के साथ-साथ व्यावहारिक रूप मर्यादापुरुषोत्तम ७१५ रामकथा का मुख्यदृष्टिकोण धार्मिक न होकर शताब्दियों तक साहित्यिक ही रहा, यह कथन असत्य ७१६ भक्तिमार्ग का आविर्भाव वैदिक साहित्य में हो चुका था, वह शताब्दियों के पश्चात् भागवत धर्म में पल्लवित हो सका, यह विकासवाद मिथ्या अपसिद्धान्त में ही सम्भव है ७१७ पुराणों में विष्णु को परब्रह्मरूप माना गया है, विष्णु के अवतार होने से राम सुतरां परब्रह्म ७१७ रावण ने कामबुद्धि से सीताहरण किया यह उसका बाह्यरूप है, आन्तर रूप यह भी है कि उसने मुक्तिकामना से राम से वैर किया ७१८ राम के अवतार के मुख्य प्रयोजन ७१९ बाली द्वारा राम की निर्दोषता स्वीकार ७२० रामकथा भारतीय संस्कृति के आदर्शवाद का उज्ज्वलतम प्रतीक ७२१ एकविंश अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७२२-८५० मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् राम तथा जगज्जननी जानकी के प्रति वनमानव द्वारा प्रयुक्त अत्यन्त अशोभन, अभद्र शब्दों का उत्तर ७२२ रामचरित के सम्बन्ध में वर्तमान इतिहास का चञ्चुप्रवेश नहीं हो सकता ७२४ सेतुबन्धन कल्पना नहीं ७२५ समुद्रवर्णन तथा दक्षिण भारत की स्थिति ७२६

( २२ ) लङ्का की स्थिति ७२८ निगमागमसार मानस का प्रत्येक पद पापराशिनाशी एवं अकाट्य ७२९ महाभारत केवल इतिवृत्त ही नहीं ज्ञानमय प्रदीप है ७३३ भगवान् व्यास की तुलना सामान्य इतिहासकारों से करना अन्याय ७३५ इतिहास का वास्तविक स्वरूप ७३५ इतिहास और पुराण पञ्चम वेद ७३६ यदि पाठक इतिहास का अभिप्राय न समझें तो वह इतिहास का दोष नहीं ७३९ महाभारत का अध्ययन अन्तःकरण-शोधक ७४५ वाल्मीकिरामायण के एक-एक अक्षर में महापातक दूर करने की क्षमता व्यासादि सम्मत होने से तदन्तःपाती रावणचरित भी पापनाशक ७४६ राम का ऐतिहासिक स्वरूप मानना दलदल में फँसना नहीं, न मानना ही नास्तिकता के दलदल में फँसना है ७४३ राम ब्राह्मणों के उपासक ७५० राम जातिपाँति नहीं मानते थे, कहना सत्य का अपलाप ७५१ जिस सम्बन्ध में पूर्ण परिचय न हो उस सम्बन्ध में प्राणी को अनधिकार चेष्टा नहीं करनी चाहिए ७५३ पार्वती और परमेश्वर में श्रद्धा और विश्वास का आरोप ७५३ धर्म और ब्रह्म वेदैकवेद्य ७५४ कोई भी प्रमाण प्रत्यक्ष का स्थान नहीं ले सकता, कहना सर्वथा असंगत ७५५ वेदोपनिषत् शास्त्राचार्योपदेश से संस्कृत निर्मल मन या एकाग्रमनःसहकृत उपनिषद्-महावाक्य ही ब्रह्मसाक्षात्कार के साधन ७५५ असम्भावना आदि दोषों के कारण निर्दोष प्रमाण से उत्पन्न प्रमाज्ञान भी यदा कदा निरर्थक ७५६ तर्क, बुद्धि, श्रद्धा आदि का वास्तविक अर्थ। मा० मु० के लेखक द्वारा प्रदर्शित अटकल पच्चू अर्थ भिड़न्तभिड़ाना मात्र ७५७ संस्कृत पर मिथ्या आक्षेप ७६० तुलसीरामायण बन जाने पर भी जनता को कथा चाहिए, फलतः मूल वेद, वाल्मीकिरामायण, महाभारत, भागवत आदि के स्थान में मानस की कथा चल पड़ी ७६१ देववाणी परम पवित्र एवं पुण्यजनक है, यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है ७६२ वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार न करने पर ब्रह्मसाक्षात्कार वैसे ही असम्भव जैसे नेत्रों के बिना रूपसाक्षात्कार ७६४ श्रीराम ने वर्णाश्रमधर्म का पालन और उपदेश करते हुए गीध, कोल, भिल्ल, किरात आदि से मैत्री कर उनका परम कल्याण किया था ७६४ तुलसी के निर्मल पवित्र भावपर जो उन्हें वर्णाश्रम धर्म पर छीटाकसी करनेवाला बताना चाहते हैं उन वक्ताओं से जनता का त्राण ईश्वर करे ७६५ समाज ने किसी पर कोई चीज लाद दी, यह कथन निष्प्रमाण ७६५ वाल्मीकि, व्यास, भवभूति और कालिदास के काव्यों एवं तुलसी के “गिराग्राम्य सियाराम जस” के तारतम्य का प्रयास व्यर्थ ७६६ ऊँचे से ऊँचे वेदान्तवेद्य ब्रह्म का निरूपण कर उसे शिवजी अवधपति कहते हैं ७६९

( २३ ) रघुकुलमणि आदि राम के असाधारण नाम ७७० रामादि अवतारों के जन्म और कर्म दिव्य ७७० कार्य अकार्य की व्यवस्था में शास्त्र प्रमाण ७७१ सत्य बोलना परमधर्म है, यदि सत्य से किसी गौ या ब्राह्मण की हत्या होती हो तो गोहत्या तथा ब्रह्महत्या रोकने के लिए झूठ बोलना उचित ७७२ सहस्रों ललनाओं के पातिव्रत्य-भङ्ग का हेतु वृन्दा का पातिव्रत्य अधर्मप्राय ७७७ कुब्जा-कृष्ण-प्रसङ्ग का रहस्य जीव का भगवान् के साथ रमण ७७९ हरिश्चन्द्र पर मा०मु० के लेखक का दोषारोपण निरर्थक ७८२ विश्वामित्र के सम्बन्ध में उक्त लेखक की अनेक अनर्गल कल्पनाएँ ७८३ वसिष्ठ के सम्बन्ध में भी लेखक की अनेक लोगों की तरह विविध दुष्कल्पनाएँ ७८३ दाक्षायणी के सम्बन्ध में भी कतिपय अनर्गल प्रलाप ७८४ वेद समुद्रवत् गम्भीर और अगाध एवं सर्वसाधारण के लिए अगम्य ७८५ गुरुपरम्परा से ही वेदों का अध्ययन कर्तव्य मनमाने ढङ्ग से नहीं ७८७ वेदपरम्परा किसी नदी या गङ्गा के तुल्य भी मान्य नहीं ७८७ वेदों की आनुपूर्वी का किसी कल्प में परिवर्तन नहीं, वेद अनादि और अपौरुषेय ७८७ पौरुषेय इतिहास-पुराणों में आनुपूर्वी में परिवर्तन होने पर भी उनके विचार और सिद्धान्त अनादि ही रहते हैं ७८८ नामापराधराहित्य का अभाव ही नामजप से सिद्धि न मिलने के कारण ७८९ वेद और पुराणों को नीचा दिखाने की दुश्चेष्टा से तुलसी या मानस की प्रतिष्ठा बढ़ेगी नहीं, प्रत्युत घटेगी ७९१ वेद, रामायण और मानस समन्वय एवं वेदों से एकमात्र भगवान् ही वेद्य ७९१ परमात्मा के विकार होने से इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि का प्रतिपादन परमात्मा का ही प्रतिपादन ७९२ इन्द्रादि देव ईश्वर के ही अंश हैं, उनका ऐश्वर्य निस्सीम नहीं ७९२ भगवच्चरणपङ्कज में समर्पण बुद्धि से किये जा रहे कर्मों से बुद्धि शुद्ध होने पर निष्काम उपासना में मन की एकाग्रता होती है ततः ब्रह्मात्मसम्बन्धी आवरणभङ्ग होने पर ब्रह्मसाक्षात्कार होता है ७९४ रामायण के राम और भागवत के कृष्ण, विष्णुपुराण के विष्णु एवं शिवपुराण के शिव कारणब्रह्म ७९४ वेदों में ब्रह्म का महत्त्वपूर्ण स्थान है, वही ब्रह्म विष्णु, राम और कृष्ण हैं ७९५ हरिश्चन्द्र सत्यवादिता के प्रतीक रूप में सर्वमान्य ७९५ हरिश्चन्द्र के जीवन का दूसरा पक्ष निम्नतम भावों एवं दुर्बलताओं का परिचायक-मा० मु० ७९५ हरिश्चन्द्र का आख्यान पुत्रेष्टियाग का अर्थवाद है। उसका पुत्रेष्टियाग की प्रशंसा में ही तात्पर्य है, अतः उसपर उक्त दुष्कल्पनाएँ असम्भव ७९८ विश्वामित्र ने तपस्या द्वारा केवल अपने को ही नहीं, अपने पिता, पितामह और प्रपितामह को भी ब्राह्मण बना दिया। तपस्या से सब कुछ सम्भव ८०० बाल्मीकि, नारद और अगस्त्य ने अपनी-अपनी जन्म-कथा अपने मुँह से कही है, ऐसी स्थिति में अन्तिम स्थिति का ही स्वरूप देखना चाहिये पूर्वरूप देखना व्यर्थ है ८०० मर्त्य-शिक्षण के लिए अवतीर्ण भगवान् ने धर्म के सम्बन्ध में शास्त्र को ही प्रमाण माना है ८०० वेदविरुद्ध भगवान् की भी वाणी अमान्य जैसे बुद्धवाणी ८०१

( २४ ) वेद और शास्त्र ही धर्म और ब्रह्म के स्वरूप के प्रतिपादक ८०१ अधर्म के कारण ही अशुद्ध अन्तःकरण में वासना और स्वार्थ का अधिकार ८०१ ‘श्रुति पुराण बहु कहेउ उपाई’ चौपाई का इतना ही अर्थ है कि भगवदनुग्रह के बिना केवल श्रुति और पुराणों के बताये हुए उपायों के अनुष्ठान में अनेक बाधाएँ उपस्थित होती हैं ८०२ श्रीराम की तरह ही भरत भी शास्त्रानुयायी तथा परम धर्मनिष्ठ ८०३ गुरु वसिष्ठ के निर्णीत धर्म पर कुचोद्य करना सर्वाधिक दुर्बुद्धिका लक्षण ८०३ महर्षि वसिष्ठ चक्रवर्ती दशरथ महाराज को परम धार्मिक एवं सत्य के रक्षक मानते हैं ८०३ मानसमुक्ता० का लेखक अपने ज्ञानगुमान में उन्मत्त होकर श्रीराम के पूर्वज हरिश्चन्द्र की भी छीछालेदर करता है ८०४ महर्षि वसिष्ठ का धर्मसम्मत ही कथन है कि महाराज ने तुमको राज दिया है उनके वचन को सत्य बनाना तुम्हारा कर्तव्य ८०४ श्रीदशरथ परमभक्त तो थे ही तभी तो राम की विरहाग्नि में उन्होंने प्राण त्याग दिये ! इस दृष्टि से दशरथ के सदृश दशरथ ही ८०५ यद्यपि बड़े भाई के रहते छोटे भाई का राजा होना अनुचित है तथापि पिता के अनुसार राजा बनने में भरत को कोई दोष नहीं ८०५ ‘अनुचित उचित विचार तजि जे पालहिं पितु बैन’ इत्यादि वचन भी निर्विवाद हैं ८०५ ‘पितु सुरपुर सियराम वन करन कहहु मोहि राज’ इत्यादि वचनों में भरत के निष्कपट हृदय के भावों की स्पष्ट अभिव्यक्ति ८०७ वे कहते हैं, कोई मनुष्य भूतादि ग्रहों से गृहीत हो, उसपर उसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो, उसपर भी उसे वारुणी पिला देना क्या उसका उपचार है ? ८०८ मेरी इच्छा यही है कि मैं राम के पास जाऊँ उनकी शरण ही मेरा सर्वस्व है ८०९ विवेक के समुद्र गुरु महाराज भी मुझे राजतिलक देने की बात करते हैं, विधाता के विमुख होने पर सब मानो विमुख हो गये ८०९ भरत राम के मूर्त्तिमान् प्रेम ही हैं किसी पामर प्राणी की ही अपनी जड़ता से उनके प्रति कुटिलता की शङ्का हो सकती है ८०९ वसिष्ठ जैसे महापुरुष महाराज दशरथ की प्रशंसा कर रहें कि महाराज दशरथ के तुल्य न कोई हुआ न है और न होगा ८१० धर्मशास्त्र के अनुसार रामप्रेम में मृत्यु होना प्रेम की पराकाष्ठा है ८११ धर्म रूढ़िगत वाक्यों से नहीं वेदवाक्यों से सिद्ध होता है ८११ गुरुदेव ने कहीं भी रूढ़िगत वाक्यों की दुहाई नहीं दी ८११ महाराज दशरथ के लिए शराबी स्वामी का दृष्टान्त नहीं दिया जा सकता, उन्हें आवेशजन्य भावना ग्रस्त भी नहीं कहा जा सकता एवं उन्हें काम, क्रोध या ममता से ग्रस्त भी नहीं कहा जा सकता ऐसी स्थिति में उनकी आज्ञा स्वीकार करने में धर्म का उपहास होगा यह कैसे कहा जा सकता है ? ८११ ऊँची धर्मनिष्ठा में आज्ञापालन सर्वोपरि धर्म है। क्या इन दो पंक्तियों का कोई खण्डन कर सकता है— ८१२ परशुराम पितु आज्ञा राखी । मारी मात लोक सब साखी ॥ ८१२

( २५ ) भरतजी कहते हैं—‘गुरु पितु मातु स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिय भल जानीं ॥ उचित कि अनुचित किये बिचारू । जाइ धर्म सिर पातक भारू ।।' महाराज की आज्ञा को तो अनुचित कहा ही नहीं जा सकता ८१२ पहले दशरथ ने कहा था ज्येष्ठ को ही राजा बनने का अधिकार है और अब भरत से राजा बनने को कहा जा रहा है, यह कहना अनुचित है, क्योंकि सामान्य नियम की विशेष नियम द्वारा बाध्यता सिद्ध है ८१३ कैकेयी के लोभग्रस्त होने पर भी महाराज लोभग्रस्त नहीं । यदि पहले वर प्रदत्त न होता तो महा- राज कदापि कैकेयी के दबाव से प्रभावित न होते ८१४ राम और भरत कोई भी ऐसे नहीं जो गुरु वसिष्ठ के वचनों में सन्देह करें ८१४ मर्यादापालक राम सूर्यवंश की परम्परा की किसी बात को अनुचित कैसे कह सकते हैं ? उनका “जनमे एकसंग सब भाई” आदि कथन का तात्पर्य भक्तों के मन की कुटिलता हरण में है ८१५ राजा के सभी पुत्र राज्य के अधिकारी नहीं हो सकते ८१५ भरत ने किसी भी धर्मव्याख्या के प्रति अपनी असम्मति प्रकट नहीं की ८१५ भरत के राज्य न करने से भरत पर किसी दोष की सम्भावना भी नहीं । भरत राज्य करते तो दोष न होने पर भी उसका कोई बड़ा महत्त्व न था । महत्त्व तो भरत के त्याग का ही है ८१६ धर्म का नया अर्थ किसी को भी मान्य नहीं, धर्म में तर्क का भी कोई आदर नही । भगवान् राम, कृष्ण, वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि कोई भी धर्मनिर्माता नहीं हो सकते ८१६ उत्तराधिकारप्राप्त धन एवं राज्य उपयोग के लिए होता है । यथेष्ट विनियोग-क्षमता ही सत्त्व है ८१७ उत्तराधिकारप्राप्त धन एवं भूमि का राजा लोग दान करते ही हैं । श्रीराम ने तथा उनके पूर्व पुरुषों ने भी किया था ८१७ वरदान देनेवाला यदि मुकरता है तो उसका सत्यभङ्ग होता है । कोई भी प्रतिग्रहीता वचनबद्ध न होने पर प्रतिग्रह के लिए बाध्य नहीं ८१८ चित्रकूट-यात्रा का तात्पर्य—भगवान् राम से यह स्वीकार करा लेना कि वे अयोध्या के वास्तविक स्वामी हैं, यह कथन भी गलत है, क्योंकि उनका धर्म-विरुद्ध बात स्वीकार करना कदापि सम्भव नहीं ८१९ भगवदाराधन बुद्धि से निःसङ्ग होकर वेदोक्त कर्म करता हुआ मानव सर्वकर्मनिवृत्तिरूप ब्रह्मात्मज्ञान प्राप्त कर लेता है । विविध फलों की श्रुति तो कर्मों में रुच्युत्पादनार्थ है ८२० सत्पुरुषों के समागम तथा सच्छास्त्रों के अभ्यास से स्वाभाविक रागद्वेष मिटाकर प्रकृतिपारतन्त्र्य मिटाना चाहिए, तभी पुरुषार्थ को अवकाश मिलता है, भगवत्कृपा तो सर्वोपरि है ही ८२० श्रीराम का कैकेयी और महाराज के सम्मुख कथन—परमपूज्य पिताजी के लिए जो भी प्रिय किया जा सकता है वह सब प्राणों का त्याग कर करने के लिए मैं कृतसङ्कल्प हूँ । पिताजी की शुश्रूषा तथा उनके आज्ञापालन से बढ़कर पुत्र के लिए दूसरा कोई भी महत्तर धर्माचरण नहीं ८२१ कैकेयी की वरप्राप्ति का पूर्ववृत्तान्त ८२२ कैकेयी के पिता ने कैकेयी का विवाह महाराज के साथ इस शर्तपर किया था कि इससे जो पुत्र होगा वही राज्य का भागी होगा ८२२ राम की परमोत्कृष्ट पितृभक्ति ८२३ उनके आज्ञापालन में अविचलता ८२३ लक्ष्मण द्वारा महाराज के प्रति कुछ विरुद्ध रुख प्रकट करने पर राम द्वारा लक्ष्मण की भर्त्सना ८२५ 9

( २६ ) भरत की महिमा अपने आप में लोकोत्तर ८२५ चित्रकूट की प्रथम सभा में वस्तुस्थिति का वर्णन करते हुए गुरु वसिष्ठ महाराज की सबकी राय जानने की इच्छा ८२५ मुनिवर वसिष्ठ की चित्रकूट की प्रथम सभा की वाणी नीति, परमार्थ और स्वार्थ से युक्त थी ८२६ गुरु वसिष्ठजी के वचनों की महत्ता ८२६ राम और लक्ष्मण अयोध्या लौट जाँय उनके बदले भरत और शत्रुघ्न वन जाँय, मुनि की यह बात भरत को अति प्रिय लगी ८२७ मुनि ने धर्म, नीति, गुण और ज्ञान के निधान राम से कहा जिससे पुरवासियों, माताओं और भरत का हित हो वही करें ८२७ सब उपाय आपके हाथ में है, प्रसन्नता से आपकी आज्ञा का पालन करने और सत्य बोलने में सबका हित, यह राम का कथन ८२८ भरत की गुरुभक्ति से भगवान् राम को अपार हर्ष भरत के कथनानुसार कार्य करने में सबकी भलाई है यह राम को स्वीकार ८२८ भरत का गुरु की आज्ञा पाकर गुरु और अपने इष्टदेव की सन्निधि में अपने हृदय की दीनता भरे भावों को अभिव्यक्त करना ८२९ राम द्वारा भरत की सराहना ८२९ राम के सम्बन्ध में कौशल्या की दृष्टि और ही विलक्षण ८३० कौशल्या का सन्देश सुनकर श्रीजनकजी द्वारा भरत के व्यवहार की अत्यन्त श्लाघा ८३० श्रीजनकजी की दृष्टि में महाराज दशरथ की आज्ञा में कोई दूषण नहीं ८३१ “राखि राम रुख धरम ब्रत पराधीन मोहि जानि । सबके सम्मत सर्वहित करिय प्रेम पहिचानि ॥” इस कथन से भरत की दृष्टि स्पष्ट ८३१ भरत को किसी नये धर्म, पन्थ का प्रचार अभीष्ट नहीं था । महाराज दशरथ और महर्षि के वेदादिशास्त्रसम्मत सिद्धान्त से भिन्न उनका कोई सिद्धान्त नहीं ८३१ भरत के चित्रकूट सभा में उक्त—‘प्रभु पित मात सुहृद गुरु स्वामी ।' आदि वचन गङ्गाजलवत् निर्मल, निष्छल तथा परम पवित्र ८३१ भरत के परम पवित्र दैन्यपूर्ण भक्तिसुधासमुद्र में नयी धर्मव्याख्या का स्थान ही कहाँ ? ८३२ श्रीराम ने—‘तात भरत तुम्ह धर्म धुरीना । लोकवेदविद प्रेम प्रवीना ।।' जो कहा वह उनके अनुरूप ही है ८३२ गुरु, पिता, माता और स्वामी की आज्ञा का पालन करना सब धर्मों का आधार ८३३ उक्त आज्ञा का तुम भी पालन करो और हमसे भी पालन कराओ ८३३ प्रभु की प्रेमामृत समुद्रमयी वाणी सुनकर सम्पूर्ण समाज स्नेह-शिथिल और समाहित एवं भरत को परम-सन्तोष ८३३ गोस्वामीजी के मानस में महाराज दशरथ के प्रति महर्षि वसिष्ठ, भरद्वाज, मन्त्रिपरिषद्, परिजन एवं पुरजन सहित भरत तथा श्रीराम की परम श्रद्धा प्रकटित ८३३ वेद अनन्त ईश्वर के निःश्वास रूप होने से ईश्वरांश ८३४

( २७ )

शतकोटिरामायण की मान्यता तुक्कों द्वारा स्थापित नहीं किन्तु पुराणों द्वारा स्थापित ८३५ पुराण वेदों का विभाजन नहीं, वेदों का उपबृंहण है ८३५ आठ प्रकार के ब्राह्मणों में आनेवाले इतिहास और पुराण तो वेद ही हैं, किन्तु छान्दोग्योपनिषद् में वर्णित इतिहास-पुराण विष्णु, पद्म आदि पुराण हैं ८३५ वेदों में ही इन्द्र शब्द का एक अर्थ परमेश्वर भी है, अन्यत्र देवता विशेष इन्द्र है। प्रथम की शक्ति निःसीम और द्वितीय की सीमित ८३५ "इदमित्थं कहि जात न सोई" यह अर्धाली ब्रह्म का अवतार क्यों होता है, इस अंश के लिए है ८३६ वेद सर्वज्ञ ईश्वर के निःश्वास होने से सर्वथा निर्भ्रान्त सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं ८३८ गोस्वामीजी वेद-वेदान्त सिद्धान्त के घेरे में रहकर गर्व का अनुभव करते हैं। श्रीराम उनकी दृष्टि में परम सत्य हैं, पूर्ण सत्य हैं ८३८ 'कोउ कह सत्य झूठ कह कोऊ' का वास्तविक अर्थ है—कुछ लोग जगत् को सत्य (अत्यन्ताबाध्य) कहते हैं। कुछ झूठ बन्ध्यापुत्र तथा खपुष्पवत् अत्यन्त

( २८ ) एक ब्रह्म भगवान् ही परम सत्य हैं तद्भिन्न सब मोहमूलक ८४५ श्रीराम परमार्थ सत्य हैं, उनसे भिन्न सब अपरमार्थ। व्यावहारिक या सीमित सत्य ८४५ प्रतिज्ञामात्र से वस्तुसिद्धि नहीं होती, उसके लिए प्रमाण अपेक्षित है, आन्तर वर्ण व्यवस्था, किसी विशेष गुण का सदा सब में स्थायी रूप से अस्तित्व विनिगमक न रहने के कारण, असम्भव ८४६ वाजपेय यज्ञ में ब्राह्मण और क्षत्रिय का अधिकार, राजसूय में केवल जन्मना क्षत्रिय का अधिकार और वैश्यस्तोम में वैश्य का इन सबका गुण और वृत्ति से सम्बन्ध नहीं ८४६ विद्या, तप और योनि तीनों होने से मुख्य ब्राह्मण, विद्या और तप न होने केवल जाति ब्राह्मण ८४६ शास्त्र में साङ्कर्य महान् दोष माना गया है। यदि वृत्ति से ही ब्राह्मणादि वर्ण माने जायें तब तो ब्राह्मण पति-पत्नी में भी समय-समय पर वृत्ति एवं गुणों का परिवर्तन होने के कारण प्रतिलोम सङ्करों की सृष्टि सम्भव ८४६ वेद मन्त्रानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमशः भगवान् के मुख, बाहु, ऊरु और पैर से उत्पन्न हैं ८४७ छान्दोग्योपनिषद् में श्वयोनि सूकरयोनि के समान ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि, वैश्ययोनि और शूद्रयोनि का वर्णन किया गया है। जैसे श्वयोनि या शूकरयोनि पाने पर जब तक वह शरीर रहता है जाति नहीं बदलती वैसे ही ब्राह्मणादि जातियों में भी यावद्देह जाति रहती है ८४७ हनुमान् पर रावण के बगीचे के फल खाने पर चौर्य का आरोप नहीं हो सकता, क्योंकि युद्ध ठन जाने पर एक राजा का दूसरे राजा की प्रभुसत्ता अस्वीकार करना वैध है ८४३ रावण का मुख्य प्रश्न था - तू कौन है, किसके बल पर तूने बन उजाड़ा और किस अपराध पर राक्षसों को मारा। हनुमान् ने उसका उचित उत्तर दिया ८४८ भगवान् वामन ने बलि की सम्पत्ति, जो उसे विजय द्वारा प्राप्त थी, दान लेकर इन्द्र को प्रदान की। यदि बलि की उसमें प्रभुसत्ता नहीं थी तो दान लेने की अपेक्षा क्यों हुई ? ८४९ जैसे स्वामी द्वारा प्रदत्त वस्तु का सेवक स्वामी होता है वैसे ही अपने कर्मों द्वारा और जैव मार्ग दाय, जय, क्रय आदि द्वारा प्राप्त सम्पत्ति का स्वामी जीव भी है ८४९ भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ इत्यादि वचनों से यह नहीं समझना चाहिए कि श्रद्धा और विश्वास ही भवानी और शङ्कर हैं, उनसे अतिरिक्त भवानी-शङ्कर नहीं हैं ८४९ श्रीराम, जानकी और लक्ष्मण के लिए जीव, ब्रह्म और माया का दृष्टान्त दिया गया है, वस्तुतः जीव, ब्रह्म तथा माया या विधु, बुध और रोहिणी रूप ही राम, सीता और लक्ष्मण नहीं हैं ८४९ द्वाविंश अध्याय रामायण आदि का रचनाकाल महाभारत और पाश्चात्य विद्वान् ८५१-८९९ वेदादि प्रमाणों के आधार पर कृष्ण वस्तुतः परब्रह्म थे, उन्हें किसी ने ब्रह्मपद प्रदान नहीं किया ८५४ भाषा की दृष्टि से वेदकाल-आधुनिक दृष्टि में ८५४ वस्तुतः वेद, उपनिषद् सब अनादि और अपौरुषेय ८५४ लोकमान्य के अनुसार वैशम्पायन ने जनमेजय को गीतासहित भारत सुनाया ८५४ लोकमान्य के दृष्टिकोण से महाभारतकाल-निर्णय ८५५ बौद्धधर्म ८५६

( २९ ) जैन और बौद्ध दोनों ही धर्म वैदिक धर्म के पुत्र ८५७ गीता और ईसाई ८५७ बाइबिल-काल ८५९ सर विलियम जोन्स, जनरल प्रिंसेप आदि पाश्चात्य विद्वानों का मेगस्थनीज की पुस्तक में लिखित सैण्ड्राकोट्स को मौर्य्यचन्द्रगुप्त और उसकी राजधानी पालीबोथ्रा को पाटलिपुत्र मानकर महाभारत- युद्धकाल को १७०० वर्ष पीछे हटाना भ्रम ८६० पालीबोथ्रा नगरी पाटलिपुत्र और सैण्ड्राकोट्स चन्द्रगुप्त का अपभ्रंश न हो ८६० वायुपुराण के अनुसार दशक-पुत्र उदायी ने ई० पू० १३१३ में कुसुमपुर बसाया ८६० पालिबोथ्रा हेराक्लीज द्वारा ई० पू० ३०८२ में बसाया गया ८६१ पालिबोथ्रा का राजा सैण्ड्राकोट्स पौराणिक मौर्य्यचन्द्र गुप्त नहीं हो सकता । सैण्ड्राकोट्स का शासन- काल मौर्य्यचन्द्र गुप्त के शासन से ११८० वर्ष पीछे ८६१ जोन्स के वक्तव्य के समर्थन में खोज निकाले गये गुहाभिलेखों तथा स्तम्भाभिलेखों का अशोक के होना भी अनिश्चित ८६१ अशोकवर्धन का राजत्वकाल विक्रम संवत् पूर्व १३९६ से विक्रम सं० पूर्व १३७० तक २६ वर्ष है ८६१ अन्तियोकस, तुरमय ये नाम भारत के पश्चिमोय राज्यों के हैं, जो वारुण भारत के पञ्चगण नाम से महाराज सगर के पूर्वकाल से प्रसिद्ध हैं ८६२ इन्हीं का उल्लेख तथाकथित अशोक शिलालेख के दूसरे पाँचवें और तेरहवें विज्ञापनों में है ८६२ पाश्चात्यों के मतानुसार भारतीय ज्योतिष ज्ञान की महास्थूल गणना वेदाङ्गज्योतिष से भी स्थूल ८६२ सिद्धान्तगणित का ज्ञान भारत का यूनान से प्राप्त ८६२ ययाति के पुत्र तुर्वसु से यवन हुए। इस तरह ययाति के पौत्र यवनों के वंशधर यवन हैं, यूनानी नहीं, राजा बाहुपर हैहयादि राजाओं के आक्रमण के समय पञ्चगणाधिपति यवन भी उनके साथ थे ८६३ महाराज सगर ने पितुशत्रुभूत पञ्चगणों को पराजित किया। उनके शरणागत होने पर उन्हें धर्म- भ्रष्ट तथा आर्यसंस्कृतिविहीन कर निर्वासित कर दिया ८६३ यवनों का नाम देखकर उन्हें यूनानी समझना अत्यन्त भ्रांति ८६३ भारतीय कालगणना की सृष्टि के आदि से अन्त तक समान स्थिति ८६३ चान्द्र, सावन, और सौर भेद से मास तथा संवत्सर तीन प्रकार के होते हैं ८६३ भारतीय विद्वानों ने नक्षत्रमण्डल के १२ विभाग कर १२ राशियों और सात वारों का ज्ञान यूनान से सीखा, पाश्चात्यों का यह कथन सर्वथा निराधार ८६४ संक्रान्तियों का अयन, विषुव, षडशीति तथा विष्णुपद नामों से वर्णन महाभारत में वर्तमान ८६५ पञ्चाङ्गों में तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण यह ज्योतिषपञ्चाङ्ग प्रसिद्ध ८६५ पञ्चाङ्गों के अनुसार आज से २०२९ वर्ष पूर्व विक्रम संवत् तथा ५०७३ वर्ष पूर्व युधिष्ठिर संवत् एवं कलिसंवत्सर का आरम्भ धृतराष्ट्र के दिवंगत होने के अनन्तर युधिष्ठिरशासनकाल में ही महाभारत का निर्माण हुआ संवत् ९७७ में शिशुपालवध काव्य के टीकाकार वल्लभदेव ने महाभारत-श्लोक-संख्या सवा लक्ष कही है सवा लक्ष संख्या हरिवंशसहित महाभारत की समझनी चाहिये राजशेखर, आनन्दवर्धन, दण्डी, बाण, जयादित्य, कालिदास आदि कवि एवं विद्वानों ने अपने अपने ग्रन्थों में महाभारत की चर्चा या स्मरण किया है

( ३० ) जयादित्य से प्राचीन कुमारिल ने व्यास और उनके श्लोक का स्मरण किया है ८६७ धर्मकीर्ति ने भी भारत की चर्चा की है ८६७ भर्तृहरि, सुबन्धु एवं योगभाष्यकार द्वारा अपने-अपने ग्रन्थों में महाभारत के श्लोक उद्धृत ८६७ महाराज सर्वनाथ के संवत् १९१-२१४ तक के उपलब्ध शिलालेखों एवं ताम्रलेख में महाभारत के एक लाख श्लोक मान्य ८६७ उनसे भी प्राचीन शबरस्वामी तथा वात्स्यायन द्वारा महाभारत-श्लोक उद्धृत ८६७ स्कन्दस्वामी से पूर्ववर्ती आचार्य दुर्ग द्वारा निरुक्त-भाष्य में महाभारत-श्लोक उद्धृत ८६८ सन् ५७ ई० में हुए लङ्कावतार सूत्र के चीनी अनुवाद में उद्धृत श्लोकों में व्यास और महाभारत का नाम ८६८ वररुचि के वाररुच निरुक्त समुच्चय में 'इति व्यासवचनम्' वर्णित ८६८ बृहत्कथा के लेखक गुणाढ्य के समय महाभारत विद्यमान था ८६८ अतएव उसके अनुवादभूत कथासरित्सागर में महाभारत की कई कथाओं का उल्लेख ८६८ विक्रमादित्यस्थापित संवत् के सम्बन्ध में शङ्का-समाधान ८६८ विक्रमसंवत्, शकसंवत्, सन्संवत् तथा गुप्तसंवत् भी प्रारम्भिक शताब्दियों में तत्तत् न.मों के रूप में उत्पन्न ८७० मेरुतुङ्गाचार्य ने विचारश्रेणी नामक अपने ग्रन्थ में उज्जयिनी का वर्णन करते हुए कहा है कि महावीर-निर्वाण ईसवीय सन् के प्रारम्भ से ५२७ वर्ष पूर्व हुआ था : उसके ५७० वर्ष बाद शकों का उन्मूलन कर मालव के राजा विक्रमादित्य का उदय होगा ८७१ विक्रमादित्य की पण्डितभूयिष्ठा परिषत् एवं धन्वन्तरि आदि नवरत्नों का वर्णन तथा उनमें से कतिपय के ग्रन्थों का परिचय ८७१ वराहमिहिर का काल, पञ्चतन्त्र के फारसी भाषा में अनुवाद का काल एवं प्रचलित शकसंवत् से अतिरिक्त शकसंवत् का साधन ८७२ वराहमिहिर विरचित पञ्चसिद्धान्तिका का काल ८७२ उसकी परीक्षा पं० सुधाकर द्विवेदी द्वारा प्रचलित शकसंवत् में ४२७ घटाने से की तो वार ठीक नहीं निकला । प्रसिद्ध गणितज्ञ श्रीवेङ्कटाचार्य ने ईस्वी पूर्वभावी शक को ही शक शब्द से लेकर परीक्षण किया तो सब ठीक निकला ८७३ वराहमिहिर का जन्मकाल ८७४ पुष्पमित्र के पुरोहित महाभाष्यकार पतञ्जलि ने प्राचीन नाटक का श्लोक उद्धृत किया है जो महाभारत-श्लोक से मिलता है ८७४ 'कालः पचति भूतानि' इत्यादि महाभारत का श्लोक पा० सू० ३।३।१६७ के महाभाष्य से उद्धृत ८७४ चरकसंहिता में विष्णुसहस्रनाम का विधान है ८७५ विष्णुसहस्रनाम में 'रामो विरामो विरतः' राम का नाम है, अतः राम और रामायण अतिप्राचीन ८७५ विष्णुगुप्त के अर्थशास्त्र में महाभारत की छायावाले श्लोकों का अस्तित्व, उनसे भी प्राचीन, पाणिनि ने महाभारत तथा तत्सम्बन्धी शब्दों की सिद्धि की है, अतः उनसे महाभारत प्राचीन ८७५ आश्वलायन के गुरु शौनक महाभारत-युद्ध के ३०० वर्ष पश्चात् दीर्घ सत्र कर रहे थे । आश्वलायन गृह्यसूत्र में भारत और महाभारत दो नाम है कौषीतकिगृह्यसूत्र में महाभारत का नाम आया है । इससे निश्चित है महाभारत युद्ध के पश्चात् ३०० वर्षों के भीतर महाभारत प्रख्यात था ८७५

( ३१ ) बेबर आदि का महाभारत में यवन शब्द देखकर महाभारत सिकन्दर के आगमन के बाद का कहना भ्रम है। यवन शब्द यूनानियों के अर्थ प्रयुक्त नहीं ८७५ महाभारत में प्राचीन पुरुषों का उल्लेख होने और आधुनिकों को उल्लेख न होने से महाभारत की प्राचीनता सिद्ध ८७६ भास के नाटक बालचरित में कृष्णलीलाओं तथा गोपियों का उल्लेख होने से भास के पूर्व महाभारत की कथाएँ प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी थीं, यह सिद्ध ८७६ बौधायनगृह्यसूत्र में विष्णुसहस्रनामस्तव का उल्लेख तथा 'पत्रं पुष्पं फलं तोयमम्' आदि गीता- श्लोक का उल्लेख होने से ईस्वी सन् से अति प्राचीन बौधायन गृह्यसूत्र से भी महाभारत प्राचीन ८७६ अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग परीक्षणों से महाभारत ५००० वर्ष प्राचीन सिद्ध ८७६ महाराज जनमेजय केताम्रशासन पत्र से श्रीरामपूजा हजारों वर्षों से प्रचलित एवं भारत की हजारों वर्ष प्राचीनता सिद्ध बुद्ध के पश्चात् ईसा से पूर्व तीसरी शती में रामायण का निर्माण हुआ, यह पाश्चात्य कल्पना असङ्गत ८७७ चालुक्य वंशीय महाराज पुलकेशिन् द्वितीय के ऐहोल नामक पर्वतीय क्षेत्र में स्थित जैन मन्दिर में उत्कीर्ण शिलालेख से महाभारत-संग्राम का यही समय सिद्ध है। उसमें महाभारत युद्ध के ३७३५ वर्ष बीतने पर यह शिलालेख ५५६ शकाब्द में उत्कीर्ण हुआ लिखा है ८७८ पुराणों की मान्यता ८७८ बौद्धपरम्परा में बुद्धनिर्वाण के विषय में अनेक मतभेद ८८० वेदों में रामायणसम्बन्धी व्यक्तियों के उल्लेख ८८० भारतीय दृष्टिकोण से काल का पैमाना ८८१ सत्ययुग-काल का परिमाण ८८२ त्रेतायुग-काल का ,, ,, द्वापरयुग-काल काल का ,, ,, कलियुग-काल का ,, ,, ब्रह्मा का इस संवत् २०२९ तक का काल ८८३ रामायण के अनुसार समुद्र-मन्थन ११ करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था ८८३ शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत। भागवत के अनुसार अजनाभ नाम से पहले प्रसिद्ध इस देश का ऋषभ-पुत्र भरत के नाम से भारत नाम हुआ। कल्पभेद से दोनों पक्ष सत्य ८८३ वृत्रवध होने के बाद सतयुग में तारकामय देवासुरसंग्राम हुआ, उसमें वृहस्पति देवताओं के सहायक थे, अतः वृहस्पति को ई० शती २-४ के मध्य मानना अत्यन्त असंगत ८८४ वैवस्वत मन्वन्तर की सन्धि में उत्पन्न बौधायन, आपस्तम्ब आदि प्राचीन भृगु, पुलस्त्य आदि सप्तर्षि त्रेतायुग में उत्पन्न उन्हें वेदमन्त्र बिना बुद्धि और प्रयत्न के अपने आप अनायास प्रस्फुरित ८८४ प्रथम त्रेता में अत्रिपुत्र सोम, सोमपुत्र बुध और बुधपुत्र पुरूरवा हुए ८८५ त्रेता में ही परशुराम का आविर्भाव हुआ ८८६ २४ वें त्रेता में पुरोहित वसिष्ठ के साथ दशरथ-पुत्र राम विष्णु के अवतार रावणवधार्थ होंगे ८८६ महाभारत केवल व्यास निर्मित ८८६ सुमन्तु, जैमिनी, वैशम्पायन, पैल, सूत्र, भाष्य, भारत और महाभारत धर्माचार्य हैं ८८८