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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

लक्ष्मीबाई ३६५ चूडे मँगवा कर गौस को अपने हाथ से पहिनाये । रानी हर्ष मे मग्न थी और गौस का खुरदरा चेहरा आसुओ से तर था । तीसरे पहर के उपरान्त कुमुक बदली । स्त्रियो ने तोपे हाथ में लीं और भीषण गोलाबारी शुरू कर दी । कामासिन टौरिया पर से रोज ने दूरवीन में से देखा । बगल में उसका फौजी डाक्टर लो था और पास ही मातहत जनरल स्टुअर्ट । रोज ने कहा, 'ओह ! स्त्रिया तोप चला रही हैं ! स्त्रिया गोला-बारूद ढो रही हैं । कुछ खाना-पानी बाट रही हैं । टूटी हुई दीवारो और कँगूरो की मरम्मत मे मदद दे रही हैं । इतनी तरतीब से, इतनी तेजी से हिन्दुस्थानियो को काम करते आज देखा ! अचरज होता है ।' लो ने दूरबीन हाथ में ली । देखते ही बोला, 'जनरल, पेड़ो की छाया में कुछ स्त्री-पुरुष काम कर रहे हैं । हमारा एक गोला उनके बीच में पडा । धूल फिकी । फिर भी वे सब वही के वही !' रोज ने और स्टुअर्ट ने भी निरीक्षण किया । स्टुअर्ट बोला, 'ये सब नेपोलियन हो गये क्या ?' लो ने कहा, 'तब झासी हमारा वाटरलू होगा ।' रोज ने मुस्कराकर झिडका, 'हिश, अभी बहुत घोर युद्ध करना पडेगा । यह रानी नेपोलियन नही, जोन आव आर्क सी जान पडती है ।' स्टुअर्ट ने कहा, इसको जिन्दा पकड सके तो कमाल होगा ।' उसी समय तार खटखटाया । मालूम हुआ कि पश्चिमी मोर्चा सबका सब तहस-नहस हो गया । स्टुअर्ट को पश्चिमी मोर्चे को फिर सँभालने की आज्ञा दी । वह चला गया । स्टुअर्ट के ब्रिगेड का अधिकाश दक्षिणी मोर्चे पर था । उसके दलनायक को रोज ने तार द्वारा आदेश दिया, 'बहुत जोर के साथ किले की दक्षिणी बुर्ज पर गोलाबारी करो । उस व्हिसलिंग् डिक को किसी तरह बन्द करो ।'

३६६ झाँसी की रानी गौस के 'घनगरज' तोपखाने के शोर और मृत्युवमन का नाम इन लोगो ने व्हिसलिंग् डिक—हल्ला करने वाला शैतान रखा था। आज्ञा पाते ही दक्षिणी ब्रिगेड ने अत्यन्त तीव्रता के साथ काम शुरू किया। उनके तोपखाने लगातार भयंकर आग और गोले उगलने लगे। बख्शिन जवाब पर जवाब दे रही थी बारूद और धुएँ से उसका सुन्दर चेहरा काला पड गया था। पसीने की रेखाओ से जितना चेहरा घुल गया था केवल उतना उसके स्वर्ण वर्ण को प्रकट कर रहा था। ब्रिगेड ने तोपो की रक्षा में किले की ओर दौड लगाई। घनगरज के तीपखाने ने उनका सहार कर दिया। बहुत अंग्रेजी फौज मारी गई। उसको लौटना पडा। परन्तु उनके तोपखाने ने एक काम कर लिया। एक गोला बुर्ज के कंगूरे को तोडकर बख्शिन के कन्धे पर लगा। कन्धा टूट गया, उड़ गया। वह अचेत होकर गिर पड़ी। बख्शी को पूर्वी बुर्ज पर समाचार मिला। निर्मम होकर बख्शी ने उत्तर दिया, 'उससे बढकर झासी और झासी की रानी हैं। शाम को देखूगा। तब तक दाह मत करना।' बख्शी अपने काम पर जुट गया। एक वार आकाश की ओर उसने देखा। गीता के कृष्ण को याद किया और अपने को कठोर से कठोर सकट में डालता हुआ तोपो को दुगुनी तेजी के साथ चलाने लगा। रोज का पूर्वी मोर्चा बुझ गया। परन्तु बख्शी का पलीता सुलगता और आग देता रहा। बख्शिन चली गई। रानी तुरन्त आईं। बख्शिन के रक्तमय शव को गोद में रख लिया। गला रुद्ध हो गया, एक शब्द भी मुह से नही निकल रहा था—और न आँख से एक आंसू। तोपखाना बन्द हो गया था। अङ्गरेजो के गोले घड़ावड़ बुर्जो और दीवारो से टकरा रहे थे और उनको ढा रहे थे। मुन्दर ने दूरवीन से अपनी बुर्ज पर से देखा। दौड़कर आई। घबराकर बोली, 'बाईसाहव !'

लक्ष्मीबाई ३६७ रानी के मुँह से केवल एक शब्द निकला, 'गौस ।' - सुन्दर समझ गई। दौड़कर पश्चिमी बुर्ज से गुलाम गौस को बुला लाई । गौस ने देखा झाँसी की रानी धूल मे बैठी बख्शिन के शव से लिपटी हुई हैं। गौस ने कहा, यह क्या सरकार, अभी न जाने कितने सरदार कुरबान होगे ? हुजूर हम लोगो को समझाती हैं कि स्वराज्य की लडाई किसी के मरने-जीने पर निर्भर नही है। और फिर बख्शिनजू तो अमर हो गई । उठिये । देखिये उस जवामर्द बख्शी को । वह अपने ठिये पर अटल है। आप ऐसा मोह करेगी तो हम लोग गोरो से कितने दिन लड सकेगे ? आप यहाँ से हट जाय और दीवान खास में बैठकर हुकुम भेजती रहे । मैं इनको मजा चखाता हूँ ।' रानी बख्शिन के शव का आवश्यक प्रबन्ध करके दीवान खास में चली गई । गौसखा ने 'बिसमिल्लाह' किया और घनगरज को सँभाला । तीन बाढो में ही अङ्गरेजी मोर्चे का तोपखाना, तोपची और तोपखाने पर काम करने वाले, सब स्वाहा हो गये । गौस ने अपने साथियो से कहा, 'यह तो मेरे साथी सरदार को मारने का बदला हुआ, अब कुछ प्रसाद भी देता हूँ। देखो भोखनबाग के पूर्व में गुसाइयो के मन्दिरो की आड से ये लोग सैयर-फाटक पर गोलाबारी कर रहे हैं। बिचारा खुदाबख्श मन्दिरो के लिहाज के कारण जवाब नही दे पाता, परन्तु मन्दिरो के बीच में सन्ध है। उसी सन्ध में होकर अङ्गरेजी तोपखाना काम कर रहा है। वह सन्ध खुदाबख्श की सीध में नही है, पर घनगरज की सीध में हैं।' साथी ने अनुरोध किया, 'मन्दिर पर गोला न पडे खासाहब । नही तो बड़ा अनर्थ हो जावेगा ।'

झांसी की रानी 'अगर मन्दिर की एक ईंट भी मेरे गोले से टूट जाय तो तलवार से मेरी गर्दन कलम कर देना।' गौस ने घनगरज का मुहरा मोड़ा, परन्तु वहा से सीध नही बैठती थी और न निशाना जमता था। तोप को ज्यो का त्यो करके वह रघुनाथसिंह वाली बुर्ज पर गया। 'दीवान साहब,' गौस ने विनय की, 'दो पल के लिये तोप मुझे बख्श दीजिये। सैयर-फाटक के सामने वाला अङ्गरेजी तोपखाना बन्द करना है।' 'तोप खुशी से लीजिये,' रघुनाथसिंह ने कहा, परन्तु अङ्गरेजी तोपखाने पीछे मिटेंगे, मन्दिर पहले।' गौस ने दृढ़तापूर्वक कहा, 'दूरबीन दीजिये, मुझको मन्दिरो की सन्ध से केवल अङ्गरेजी तोपखाना देखना है। मन्दिरो को मैं देखूंगा ही नही।' रघुनाथसिंह को गुलाम गौस की गोलन्दाजी का भरोसा था दूरबीन और तोप उसके हवाले करदी। गौस ने तोप के ठिये को संभाला, सुधारा और दूरबीन लगाकर निश्चिन्तता के साथ गोला छोड़ा। उसका जो कुछ फल हुआ उसे रघु- नाथसिंह ने दूरबीन से देखा। अङ्गरेज तोपची मारे गये। तोपें नष्ट हो गईं और मन्दिर बच गये। उसी समय गुलाम गौसखा को रानी ने अपनी तौल भर चांदी का तोड़ा पुरस्कार में दिया। जब लालता ने सुना उसका जी गिर गया। सन्ध्या समय बख्शिन के शव का दाह किया गया। बख्शी हर्षोन्मत्त था, परन्तु उसकी आंखो में पागलपन था। कभी कभी वह असंगत और अप्रासंगिक बात कहता था। 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।' और कोई समझा हो या न समझा हो, परन्तु रानी इस महावाक्य को समझती थी। रात हुई। लड़ाई ने कुछ शांति पकड़ी। पीरअली के पास वरहापु- द्दीन पहुंच गया।

लक्ष्मीबाई ३६६ पीरअली ने तुरन्त कहा, 'देखो मेरे पता लगाने के कारण गोलन्दाजो को कितना लाभ हुआ।' बरहामुद्दीन को शक हुआ। उसको दबाकर बोला, 'बेशक हुआ होगा, मगर किले में गोलन्दाजी नही कर रहा था, इसलिये कुछ कह नही सकता।' पीरअली ने शेखी मारी, 'हमारी खिडकी के सामने अङ्गरेजो का कोई मोर्चा नहीं पडता नही तो दात खट्टे कर देता।' बरहामुद्दीन ने खुशामद की, 'मीरसाहब कहिये दात और सिर तोड देते।' पीरअली ने प्रसन्न होकर कहा, 'एक ही बात है।' जब कुछ रात बीत गई पीरअली ने बरहामुद्दीन से धीरे से कहा, 'अब मै जासूसी पर जाता हूँ आप यहाँ होशियार रहना।' बरहाम ने मंजूर किया। पीरअली मुहरी के रास्ते से बाहर हो गया। और उसके पीछे पीछे चुपचाप बरहाम। आध मील चलने के बाद जब पहले छबीने के संत्री ने टोका तब पीरअली ने सकेत शब्द में उत्तर दिया। पीरअली आराम के साथ अङ्गरेज छावनी में दाखिल हो गया। बरहाम बहुत उदास धीरे २ सागर-खिडकी को लौट आया। जब पीरअली लौटा बरहाम ने प्रश्न किया, 'आज की क्या खबर लाये मीरसाहब?' उसने उत्तर दिया, 'ज्यादा पता नही लगा। सिर्फ इतना मालूम कर सका कि कल शहर पर गोलाबारी पश्चिम की तरफ से होगी।' 'आज तो सरदार गुलाम गौस ने कमाल कर दिया। जिधर की तोप संभाली उसी तरफ कहर बरसा दिया।' 'हमारी बारूद भी बहुत अच्छी है। धुआँ होता ही नही। अङ्गरेजो को पता नही लगता कि तोपखाने किधर लगे हुये हैं।'

४. काल्पी प्रयाण, ग्वालियर दुर्ग विजय, कोटा की सराय में महाबलिदान एवं उपसंहार

३७० झाँसी की रानी

‘तो भी वे लोग हमारे गोलन्दाज पर गोलन्दाज़ मार रहे हैं। खैर है कि हमारे यहाँ तोपचियो की कमी नही है वरना झासी का घण्टे भर भी बचना मुश्किल था।’ ‘बारूद कहा बनाई जाती है खासाहब ?’ ‘महल के उत्तर में इमली के पेड़ो के नीचे। आपने क्या नही देखा ?’ ‘नही तो मै उस तरफ नही गया खासाहब।’ ‘एक बात मुझको भी बतलाइये मीर साहब। आप अङ्गरेजी छावनी में पहुच कैसे जाते हैं ?’ ‘कुछ न पूछो खासाहब, गड्ढो, खाइयो और झाड झङ्खाड की आडे लेता हुआ जाता हूँ। ज़रा चूकूँ तो गोली सर पर पड़े। बडी जोखिम का काम है। सीटी का एक बँधा हुआ इशारा करता हूँ। मेरा रिश्तेदार आ जाता है और बाते बतला देता है। मै लौट आता हूँ। फिर वही मुहरी की मुसीबत। इतना बदबूदार कीचड है कि तोबा।’ बरहाम के पैरो में भी कीचड़ लगा हुआ था। पीरअली ने देख लिया। उसने पूछा, ‘खासाहब तुम्हारे पैरो मे कीचड कैसा ?’ उसने भोलेपन के साथ उत्तर दिया, ‘मै भी मुहरी में होकर बाहर थोडी दूर चला गया था। देखता था कि कैसा रास्ता है। आपके जाने के बाद गया और तुरन्त लौट आया।’ पीरअली को सन्देह हो गया। उसने एक निश्चय किया। बरहाम का सन्देह जाग्रत हुआ। उसने भी एक सकल्प किया।

लक्ष्मी बाई ३७१

[ ७० ]

सुन्दर को उस रात दूल्हाजू की कुमुक सौंपी गई। उसने दूल्हाजू से गोलन्दाजी सीखी थी, इसलिये वह उसका आदर करती थी। सन्ध्या के उपरान्त सुन्दर ओर्च्छा फाटक के ऊपर दूल्हाजू के पास पहुँच गई। दूल्हाजू ने दिन में खूब तोप चलाई थी। वह प्रसन्न था और सुन्दर उस दिन के काम पर सन्तुष्ट थी, केवल बख्शिन के देहान्त पर कभी कभी मन कसक उठता था। दूल्हाजू ने सुन्दर से कहा, 'आज तो बाई मै बहुत थक गया हूँ। सारा शरीर दुख रहा है।' 'आप विश्राम करिये। मै तो रात भर सावधान रहूँगी।' 'दिन भर फिर वही सब करना पडेगा।' 'मै दिन में भी आपकी जगह काम करती रहूगी।' 'और कल रात?' 'रात को भी काम कर दूंगी। तब तक आप सुस्ता लेंगे। परसो दिन में आप तोपखाना सँभाल लेना। मैं सो लूंगी। रात का काम फिर पकड़ लूंगी।' 'सुन्दर तुम बहुत प्रबल हो।' आपकी कृपा।' 'और अत्यन्त सुन्दर।' 'इसका उत्तर कुछ नही दे सकती। भगवान ने जैसा बनाया वैसी हूँ।' 'तुमको देखते ही, तुम्हारे दर्शन करते ही न जाने मेरा चित्त कैसा हो जाता है। तुम तो महले की रानी होने के योग्य हो।' 'रानी तो एक ही हैं—और एक ही हो सकती हैं।' 'सुन्दर मै तुमको अपने हृदय से लगाना चाहता हू। क्या कहती हो?' 'यही कि आप बहुत नीच हैं।' दूल्हाजू इस उत्तर की आशा नही कर रहा था। उसने अपनी ठेस को मुश्किल से सँभाला। उत्तेजित हुआ।

३७२ झाँसी की रानी बोला, 'जानती हो मै ठाकुर हू ।' सुन्दर ने दृढ सुहावने स्वर में कहा, 'जानते हो मै कुराभी हूँ, जिस जाति की सहायता से छत्रपति ने एक छत्र राज्य स्थापित किया था।' दूल्हाजू यकायक हँस पड़ा। बोला, 'मै सुन्दर बाई तुमसे परम प्रसन्न हुआ। मैने तुम्हारी परीक्षा लेने के लिये ही यह सब कहा था।' सुन्दर ने स्थिरता के साथ कहा, 'हर्ष है कि आपकी परीक्षा शीघ्र समाप्त हो गई।' दूल्हाजू की आँख से लौ छूट पड़ी, परन्तु सुन्दर ने नही देखा। 'तोपखाना सँभालो,' दूल्हाजू बोला, 'मै सबेरे काम पर आ जाऊँगा।' और अधिक वह कुछ न कह सका। चला गया। अब सुन्दर का क्षोभ जाग्रत हुआ। खीझ कर उसने अपने मन में कहा, 'दो जूते मुह पर न लगा पाये। बडा सरदार बना फिरता है। मेरे स्त्रीत्व को इतना दुर्बल समझा !' सबेरा होते ही दूल्हाजू अपने ठिये पर आ गया। सुन्दर से कोई बात नही हुई उसने ऐंठ के मारे क्षमा प्रार्थना तक नही की। सुन्दर ने रात का सब हाल रानी को सुनाया। रानी ने सुन्दर को वर्जित किया, 'और किसी से कुछ मत कहना। गोलन्दाज बहुत मारे गये हैं। यदि मेरे पास काफी आदमी होते तो दूल्हाजू को अपने हाथ से कोडे लगाती और झांसी बाहर कर देती, परन्तु इस समय ज़रा सह लेना चाहिये। तुझे अनुमति देती हूँ कि यदि वह फिर कोई बेहूदी बात कहे तो अकेले में जूते लगा देना। तू उसको कुश्ती मे पछाड़ सकती है।' सुन्दर को अच्छा लगा। चुप रही। रानी ने समझा कि इतने से सन्तुष्ट नही हुई। उन्होने दूल्हाजू को बुलाया और अकेले में काफी डांटा फटकारा।

लक्ष्मीबाई ३७३ कहा, 'अबकी बार तुमको क्षमा किया । अपना काम करो । ऐसा ओछापन न करना ।' दूल्हाजू काम पर शीघ्र लौट गया । उसने सोचा, 'एक ने नीच कहा, दूसरी ने ओछा । मेरे सच्चे प्रेम को किसी ने न पहिचाना । सुन्दर एक छोटी जाति की स्त्री है । मैं उसको खुल्लम खुल्ला रख लेता । ठकुराइन बन जाती । लेकिन बडी पाजी औरत है और रानी औरतो की तरफदार । मैने कहा ही क्या था ? विश्वास दिलाया कि उसकी परीक्षा कर रहा था, परन्तु रानी ने विश्वास नही किया । इस प्रकार का बर्ताव तो बडे बडे महाराज भी मेरे साथ नही कर सकते ।' दूल्हाजू उस बर्ताव को अपना अपमान समझता था । वह उस पहर अपना कर्तव्य, शिथिलता और अन्यमनस्कता के साथ करता रहा । कुशल यही थी कि पिछले दिन गुसाइयो के मन्दिरो के पास वाले तोपखाने के मिट जाने के कारण और रोज के पश्चिमी मोर्चे पर अधिक जोर देने के कारण, ओर्छा फाटक ने अधिक गोलाबारी का आवाहन नही किया । दोपहर के बाद धूप कडी हो गई । लू भी चल उठी । दोनो ओर के तोपखाने और सिपाही अवकाश लेने लगे । पीरअली दूल्हाजू के पास आया । रामरहीम होने के उपरान्त बात चीत होने लगी । पीरअली चाहता था कि कम से कम एक सरदार को अपने पक्ष में कर लू । पीरअली — 'दीवान साहब आपको तो बडा कडा परिश्रम करना पडता है आपकी वजह से मेरी खिडकी पर दुश्मन कोई दबाव ही नही डाल पाता । दूल्हाजू — 'परिश्रम तो, सचमुच, मीर साहब मुझको बहुत करना पडता है । मारे जाने पर मेरे परिश्रम का कोई मूल्य आका जायगा या नही इसमें सन्देह है ।'

३७४ झाँसी की रानी पीरअली—'रानी माहब तो इनाम खुले हाथ देती हैं । गुलाम गौस को सोने के कडे, अपनी तौल भर चांदी का तोडा और कुंवर का खिताब बख्शा है ।' दूल्हाजू—होगा । रानी पठानो और परदेसियो की केवल हेकडी पर ही प्रसन्न हो जाती हैं । खजाना उनके हाथ में है चाहे जिसको लुटावे । मै कितनी बार ओर्छा फाटक के सामने से अङ्गरेजो को हटा चुका हूँ, कितनी बार मैने उनके तोपखाने नष्ट किये, परन्तु मुझको तो एक पैसा भी पुरस्कार में नही मिला । जी चाहता है कि यह लड़ाई समाप्त हो या अवसर मिले तो अपने घर चला जाऊँ । पीरअली—'मैं ही, देखिये दीवान साहब, जासूसी मे कितनी जान खपा रहा हूँ । पता लगाने के लिये रात में इधर उधर अकेला भटकता हूँ । एक गोली, या तलवार का वार पड जाय कि बस खतम हू, मगर कोई पूछने वाला नही कि भैया तुम्हारा क्या हाल है । मेरे साथ एक गंवार पठान को और जोड दिया है । उसके मारे परेशान रहता हू ।' दूल्हाजू—'इधर मेरी भी यही परेशानी है । सुन्दर बाई मेरी नायबी में है । उसकी केवल परीक्षा लेने के लिये एक बात कही कि वह पाजी- पन पर आगई । मैने डाटा । उसने रानी से मेरी शिकायत कर दी । रानी ने मुझसे ऐसी बाते की हैं आज, कि दिल टूट रहा ।' पीरअली ने प्रयत्न किया अपने को रानी का जासूस प्रकट करने का, दूल्हाजू ने प्रयास किया अपने को दुखाया सताया निर्दोष सिद्ध करने का, दोनो के मन परस्पर निकट आये, परन्तु एक दूसरे की बात को उनमें से किसी ने नही समझा । दूल्हाजू ने कहा, 'मुझे दिखता है कि हम लोग अङ्गरेज़ो को हरा नही सकेंगे ।' पीरअली—'उन्होने दिल्ली और लखनऊ को सहज ही तोड लिया । कानपुर को भी पराजित कर लिया है । सच्ची बात तो दीवान साहब यह है कि झासी विचारी का कोई बिरता नही ।'

लक्ष्मीबाई ३७५ दूल्हाजू -'जी चाहता है कि आज ही इस्तीफा देकर, तुम्हारी मुहरी से घर चला जाऊँ।' पीरअली—'इस्तीफा देने की क्या जरूरत ? वैसे ही चले जाइये, परन्तु चारो तरफ तार लगे हुये है और सन्त्रियो के छबीने पड़े हुये हैं। जिनमे होकर छिपकर निकलना कठिन है।' दूल्हाजू—'आप मीर साहब, अङ्गरेजी छावनी में से खबर कैसे लेते हैं ?' पीरअली—'छावनी में मेरे कुछ रिश्तेदार भोपाली दस्ते में हैं। उनकी मदद से पहुँच जाता हूँ। और वहा का हाल ले आता हूँ—और— और दीवान साहब, में अङ्गरेज़ो के बड़े जनरल रोज साहब के सामने भी हो आया हू।' दूल्हाजू—'आप लडाई शुरू होने के पहले गये थे ?' पीरअली—'नही कल रात को ही तो पहुँचा था।' दूल्हाजू—'फिर बचे कैसे ?' पीरअली—'सीधी सी बात । उनसे कह दिया कि मैं तो आपकी तरफ से जासूसी कर रहा हू।' दूल्हाजू—'जनरल मान गया ?' पीरअली—'क्यो न मानता ? दो एक बाते बतलादी, उसको भरोसा हो गया । दूल्हाजू—'मैं भी जनरल के पास चलना चाहता हूँ।' पीरअली—'यदि रानी साहब को खबर लग गई तो ?' दूल्हाजू—तो जो हाल आपका होगा, वही मेरा भी।' पीरअली—'मैं तो जासूस हू।' दूल्हाजू—'मुझको भी उसी रंग में रंग लीजिये।' पीरअली—'मगर जनरल के सामने आप अपने को जासूस नही कह सकेंगे।' ε

३७६ झाँसी की रानी दूल्हाजू---'तब क्या कहूँगा ? जाना तो उसके सामने अवश्य चाहता हूँ । शर्त यह है कि बचकर लौट आऊँ और यहा भी कोई गडबड न हो ।' पीरअली—'जनरल ने यदि आपसे किसी काम के करने के लिये कहा तो ?' दूल्हाजू—'हा करनी पडेगी ।' पीरअली—'तो पहले हमारा आपका ईमान हो जाय और कही भी किसी प्रकार भी बात न फूटने पावे ।' पीरअली ने दीन की और दूल्हाजू ने धर्म की पक्की सौगन्ध खाई । पीरअली ने कहा, 'यदि अवसर मिला तो आज रात को, नही तो कल रात को चलेगे ।' दिन भर पश्चिमी और दक्षिणी मोर्चा पर घोर युद्ध होता रहा । उत्तर में, उनाव, भाडेरी और सूजेखा फाटको पर भी गोलाबारी हुई । इस दिशा मे ओर्च्छा की सेना रोज के दस्ते के साथ काम कर रही थी, परन्तु इस ओर झासी के सैनिक और गोलन्दाज ऐसी मुस्तैदी के साथ कर्तव्य पालन कर रहे थे कि रानी को इस दिशा से अङ्गरेजो का कोई भय ही न था । दतिया राज्य से अङ्गरेजो की सहायता के लिये कोई दस्ता नही आया था । इस राज्य को चरखारी-पराजय का पता लग गया था । राजा विजय बहादुर का देहान्त हो चुका था । उत्तराधिकारी नाबालिग था । रोज़ के आक्रमण के पहले दतिया को रानी का भय था और अब तात्या टोपे का । इसलिये दतिया राज्य भय-ग्रस्त तटस्थता में था । झाँसी का दतिया फाटक निर्भय था । किले की पश्चिमी बुर्ज का तोपखाना इसकी काफी रक्षा किये हुये था । यही हाल खडेराव फाटक का था । फिर भी इन फाटको के तोपची हाथ पर हाथ धरे न बैठे थे । सध्या हो गई । परन्तु रात में गोलाबारी बन्द न हुई । रात में गोले सर्राती हुई छोटी छोटी लाल गेदो की तरह मालुम पडते थे । इस गोला- बारी से शहर का थोडा सा नुकसान हुआ, परन्तु किले का कुछ नही

बिगडा । उस रात पीरअली बाहर नहीं जा पाया । दूल्हाजू कम सोया । उसने पीरअली की बाट जोही । दिन निकलने पर फिर जोर का युद्ध हुआ । अब तक गोरी पल्टनें आगे बढ बढकर मर रही थीं । अब अधिकांश देशी पल्टने दिखलाई पडी । परन्तु तोपखाने सब अङ्गरेजो के हाथ में थे । दोनो ओर के तोपची मर रहे थे और दूसरे तोपची उनकी जगह, पर आ रहे थे । संध्या के समय किले के पश्चिमी मोर्चे का तोपखाना बन्द हो गया, कारण था दीवार का धुस्स हो जाना । दीवार के टूट जाने से तोपखाना दिखलाई पडने लगा । मुश्किल से तोपो को आड़ में किया गया । पर पहाडी की ओर से एक दस्ता झपटा । खंडेराव फाटक पर से सागरसिंह ने देख लिया । फाटक पर ताले पड़े, थे । वैसे भी फाटक खोलने की आज्ञा न थी । सागरसिंह ने तोप चलाई, परन्तु वह जल्दबाज़ था, इसलिये निशाना ठीक न बैठता था । खीज उठा । अपने साथियो से बोला, 'आज बुन्देलो की नाक कटती है और कुँवर सागरसिंह की मूँछ जाती है । जो मेरे साथ इन गोरो का सामना कर सके वह तुरन्त नीचे उतरे ।' एक ने कहा, 'रानी साहब की या दीवान जवाहरसिंह की आज्ञा ले लो ।' सागरसिंह ने उत्तर दिया, 'बावले हुये हो ? जब तक किसी की आज्ञा आवेगी तब तक ये लोग किले में घुस जायेगे । तब उस आज्ञा को क्या हम चाटेगे ?' रस्से की सीढ़ी लगाकर धडाधड सौ आदमी नीचे उतर गये । सबसे पहले सागरसिंह । ये लोग सपाटे से बगल वाली टोरिया की ओट में पहुंच गये । जैसे ही अंग्रेजी दस्ता आया इन लोगो ने बन्दूको की बाढ छोडी । दस्ते ने भी बन्दूक दागी । सागरसिंह की टुकडी को कोई हानि नही हुई, परन्तु अङ्गरेजी दस्ता छिन्नभिन्न हो गया । इकट्ठा होने ही को था कि सागरसिंह अपने साथियो सहित तलवार लेकर पिल पड़ा । अङ्गरेजी

३७८ झांसी की रानी दस्ता सब नष्ट हो गया । कुँवर सागरसिंह भी खंडेराव फाटक के पास ही मारा गया । उसके कुछ आदमी बच गये । भीतर वापिस आ गये । इन आदमियो की वीरता ने उस दिन झांसी का किला बचा लिया।

  • रात हो गई । रानी को सागरसिंह के शौर्य का समाचार मिल गया । रानी की आखो के सामने बरुआसागर की घटना का पूरा चित्र खिंच गया । रानी ने मन मे कहा, 'जिस देश में सागरसिंह सरीखे लोग जन्म लेते हैं वह स्वराज्य से बहुत दिनो वंचित नही रह सकता ।' रानी ने दीवार की मरम्मत अपने सामने करवाई । कारीगर कम्बल ओढ़ कर दीवारों की मरम्मत पर चिपट गये और रात भर में दीवार ज्यो का त्यो कर लिया । सवेरे पश्चिमी अंग्रेजी मोर्चे ने दूरबीन से देखा-जैसे दीवार का कभी कुछ बिगडा ही न था ! उस दिन अत्यन्त भीषण युद्ध हुआ । दोनो ओर निरन्तर और तीव्र गोलाबारी हुई । इधर दीवारे टूट रही थी । उधर अंग्रेजो के मोर्चे नष्ट हो रहे थे । इधर तोपची पर तोपची मारे जा रहे थे, उधर तोपखानो पर तोपखाने बन्द हो रहे थे । तुरन्त दूसरी तोपो को सँभाल लेते थे । रानी की स्त्री सेना इस तरह काम कर रही थी जैसे देवी दुर्गा ने अनेक शरीर और अनेक रूप धारण कर लिये हो । दीवार टूटी कि मरम्मत हुई । वह भी दिन दहाडे । मरम्मत करने का काम पुरुष कर रहे थे और पत्थर तथा चूना इत्यादि देने का काम स्त्रियाँ । गोले बरस रहे थे । ऐसे गोले जो फटकर अपने भीतर के कील काटे चारो ओर सनसना देते थे, परन्तु न तो झासी की हिम्मत टूट रही थी और न झांसी की रानी की । जैसे जैसे संकट बढता, तैसे तैसे इनका साहस बढता जाता ! यकायक गोला किले के भीतर वाले गणेश मन्दिर पर गिरा और वह ध्वस्त हो गया । केवल मूर्ति बची । दूसरा शंकर किले में गिरा । उस

लक्ष्मीबाई ३७९ समय आठ दस ब्राह्मण पानी भर रहे थे । उनमें से आधे मारे गये, बाकी भाग गये । ये गोले पश्चिमी मोर्चे से आये थे । पानी की टूट पडी । ३, ४ घण्टे लोगो को प्यासा रहना पड़ा । किले का पश्चिमी मोर्चा सँभाला गया । अङ्गरेजी मोर्चे का मुँह बन्द हुआ । तब कुये से पानी आ पाया । फिर रात हुई और बहुत कुछ शान्ति दोनो पक्ष थकावट में चूर थे । इस रात पीरअली और दूल्हाजू को अवसर मिला ।

३८० झाँसी की रानी [ ७१ ] बरहामुद्दीन सागर खिडकी की तोप पर पीरअली की जगह आ गया । पीरअली ने उससे कहा, 'आज बहुत से पते लगाने के लिये अङ्गरेज़ी छावनी में जाना है ।' 'शौक से जाइये,' बरहाम बोला, 'अकेले ही जाइयेगा ? बड़ा खतरनाक काम है ।' पीरअली ने उत्तर दिया, 'अकेला ही जाऊँगा । दो आदमी होने से खतरा बढ जायगा ।' पीरअली खिडकी पर से उतरा । थोडी देर ही ठहरा था कि दूल्हाजू आ गया । ओर्छा फाटक पर उसकी जगह सुन्दर आ गई थी । दूल्हाजू को बरहामुद्दीन ने नही देख पाया । पीरअली और दूल्हाजू मुहरी में धसे । धसते ही दूल्हाजू ने नाक दबाई । धीरे से कहा, 'मीरसाहब यह तो बहुत सकरी और गन्दी रास्ता है ।' पीरअली धीरे से बोला, 'दीवान साहब वहाँ पहुँचने का यही एक- मात्र मार्ग है ।' उन दोनो के निकल जाने पर धीरे से बरहामुद्दीन मुहरी में उतरा और आड ओट लेते हुये, पहले सन्त्री के छबीने तक चला गया । संत्री ने टोका । पीरअली ने बँधे हुये सकेत की भाषा में जवाब दिया । वे दोनो छावनी मे चले गये । बरहामुद्दीन ने सोचा, 'पीरअली, अवश्य कोई घातक षडयन्त्र रच रहा है । और वह झासी के लिये शुभ नही जान पड़ता । आज दूसरा आदमी इसके साथ कौन है ?' बरहामुद्दीन सावधानी के साथ लौट आया । हाथ पैर धोकर मुहरी की बगल में बैठ गया और पीरअली की बाट जोहने लगा । दूल्हाजू के साथ पीरअली रोज के सामने पेश हुआ । स्टुअर्ट पास था । पूछताछ शुरू हुई ।

लक्ष्मीबाई ३८१ रोज—'तुम्हारे साथ दूसरा आदमी कौन है ?' पीरअली—'दीवान दूल्हाजू ठाकुर साहब । ओर्छा-फाटक का तोपखाना इन्ही के हाथ में है ।' रोज—'मैं खुश हुआ । यह किसी राजपरिवार का पुरुष है ?' पीरअली—'जी हाँ ।' रोज—'आप क्या काम करोगे दीवान साहब ?' दूल्हाजू—'जो कहा जाय ।' पीरअली—'यह सच्चे आदमी हैं । साहब । गङ्गाजली की सौगन्ध लेंगे । रोज समझ गया । दूल्हाजू के पसीना छूट गया । निकल भागने को जी चाहा, परन्तु वहा बाल बराबर भी सास न थी । रोज ने एक हिन्दू सिपाही से लोटा भरकर मँगवाया । रोज ने कहा 'आपको गङ्गा जी की सौगन्ध खानी पडेगी ।' दूल्हाजू ने लोटा दोनो हाथो में ले लिया । आंखे बन्द कर ली । रानी का कुपित चेहरा सामने फिर गया । उसने आंखे खोल ली । रोज़ ने सोचा शपथ गम्भीरता पूर्वक ले रहा है । पीरअली ने अनुरोध किया, 'सौगन्ध ले लीजिये दीवान साहब ।' दूल्हाजू ने शपथ ली, 'गङ्गाजी मुझको मारे, जो मैं बेईमानी करूं ।' 'रोज—'बेईमानी किसके साथ ? शपथ लो कि कम्पनी सरकार के साथ, अंग्रेजो के साथ बेइमानी नही करूँगा ।' पीरअली—'ले लीजिये सौगन्ध दीवान साहब ।' दूल्हाजू ने शपथ ली, 'कम्पनी सरकार के साथ, अंग्रेज़ो के साथ बेईमानी नही करूँगा ।' और उसने लोटा नीचे रख दिया । रोज ने कहा, 'अभी नही । लोटा फिर हाथ में लीजिये और यह कहिये कि ओर्छा फाटक का तोपखाना या तो बेकार कर देंगे या तोपखाने से गोला नही छोड़ेगे और ओर्छा फाटक हमारे हवाले कर देंगे ।'

३८२ झाँसी की रानी दूल्हाजू ने तदनुसार कसम खाई । पीरअली ने विनय की, 'हुजूर को इनाम भी इसी समय बतला देना चाहिये ।' रोज ने तुरन्त वरदान दिया, 'दो गांव जागीर में दीवान साहब, हमेशा के लिये ।' दूल्हाजू ने क्षीण मुस्कराहट के साथ स्वीकार किया । दूल्हाजू ने प्रश्न किया, 'कब ?' रोज ने उत्तर दियो, 'जब हम झांसी पर अधिकार करके शान्ति स्थापित कर लेंगे ।' 'यह नही पूछा,' दूल्हाजू ने कहा, 'वह काम कब करना होगा ?' रोज और स्टुअर्ट ने सलाह की । रोज बोला, 'जब हमारे मोर्चे के पीछे लाल झण्डा देखो। लेकिन जब तक, लाल झण्डा न देखो तब तक गोले टेकड़ी के नीचे हिस्से में लगें, हमारे तोपखाने या दस्ते पर गोला न आवे और हमारे तोपखाने का गोला तुम्हारे ऊपर न गिरेगा । या तो दीवार की जड़ में पड़ेगा या तुम्हारे बगल में जो ऊँचाई पर बुर्ज है उसपर पडेगा । यदि तुमने हमारे साथ बेईमानी की तो सबसे पहले तुमको फाँसी दी जायगी ।' दूल्हाजू का चेहरा तमतमा गया । 'मैने बहुत बड़ी कसम खाई है। इन मीरसाहब को मालूम है कि रानी साहब से मेरा दिल बिलकुल फिर गया है।' पीरअली ने समर्थन किया । इसके उपरान्त वे दोनो चले गये । रोज ने स्टुअर्ट से कहा, 'राज-खानदान के लोगो को हाथ में रखना जरूरी है। डलहौजी ने इन लोगो को अपमानित करके हिन्दुस्थान को बिलकुल ही खो दिया होता ।' स्टुअर्ट — 'लेकिन आगे चलकर इन लोगो को सिर पर भी नही बिठलाना है ।'

लक्ष्मीबाई, ३८३

रोज़—'नही जी। वे सिर पर नही बैठना चाहते। वे तो अपनी मखमली गद्दियो पर बैठे रहना चाहते हैं। वही अडिग बने रहेगे।, पीरअली और 'दूल्हाजू मुहरी पर आ गये। दूल्हाजू ने फिर नाक दवाई। पीरअली ने मुहरी के सिरे पर पहुच कर कहा, 'दीवान साहव, लाल झन्डे वाली बात याद रखना।' दूल्हाजू धीरे से 'हूं' करके ओर्छा फाटक की ओर चला गया। उसके चले जाने पर पीरअली ने दीवार से सटा हुआ किसी को देखा। काप गया। बोला, 'कौन ?' बरहाम ने आगे बढकर उत्तर दिया, 'मैं हूं मीरसाहब।' हृदय की धडकन को दबाते हुये पीरअली ने कहा, 'म्यां खा साहब, यहाँ क्या कर रहे थे। 'मुहरी में छप छप की आवाज सुनकर शक हुआ, इसलिये यहा आ गया। आपके साथ दूसरा आदमी कौन था ?' 'होगा। आपको क्या मतलब ? पीरअली ने होश सँभालते हुये कहा, 'जासूसी मुकदमो की बातो में दखल नही देना चाहिये।' बरहाम—'आप तो कहते थे कि अकेले ही जायँगे। दो आदमी होने से खतरा बढ जायगा।' पीरअली—'आपको साथ ले जाता तो खतरा जरूर बढ जाता।' बरहाम—'यह दीवान साहव कौन आदमी था ?' पीरअली—'दीवान साहबो और खा साहबो की झाँसी में कोई कमी है ?' बरहाम—'हा, मीरसाहब अलबत्ता बहुत थोडे हैं।' पीरअली—'अपना काम देखिये। मैं तो जाकर सोता हूँ। इतना ख्याल रखिये कि किसी के राज़ में अपना पैर नही पटकना चाहिये।'

३८४ झांसी की रानी बरहाम—'मान लिया मीरसाहब, मान लिया। लेकिन इतना तो बतला दीजिये कि आज किस तरह पहुँचे और क्या क्या कर आये?' पीरअली—'आप पीछे पीछे क्यो न चले आये?' बरहाम—'गया था, लेकिन लाल झण्डे की बात समझ में नही आई।' पीरअली सन्नाटे में आ गया, परन्तु उसको मनोनिग्रह का काफी अभ्यास था। बोला, 'लाल झण्डे वाली बात रानी साहब को बतलाई जावेगी, आपको नही।' बरहाम ने कहा, 'रानी साहब से मे भी कुछ अर्ज करूँगा। पीरअली अपने शयनागार में चला गया। उसको नीद नही आई। दो दिन पहले उसने एक निश्चय किया था। सबेरा होते ही वह रानी के पास पहुँचा। पिछले रोज बहुत तोपची और सैनिक मारे गये थे। रानी ने रात में तोपचियो का प्रबन्ध कर लिया था। तडके के पूर्व ही वह नये सैनिको की भर्ती के उपायो में व्यस्त थी। जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह भी उसी चिन्तन में वही थे। पीरअली ने तुरन्त निवेदन किया, 'श्रीमन्त सरकार, आज पश्चिमी मोर्चे से बहुत जोर का हमला होगा। जब आपका ध्यान उस ओर फटक जायगा तब दक्षिणी मोर्चे से जो जीवनशाह की टौरिया के बगल में है, धावा बोला जायगा। रात की जासूसी का यही समाचार है।' रानी ने उपेक्षा के साथ कहा, 'देखूँगी। प्रबन्ध हो गया है।' वह किसी काम के लिये शहर में जाने को उद्यत थी। पीरअली हाथ जोड कर बोला, 'श्रीमन्त सरकार उस बरहामुद्दीन को मेरे ठिये से हटा दिया जाय। वह मेरे काम में बहुत दखल देता है। 'देखूँगी,' रानी ने कहा, 'कुछ और कहना है?' 'हुजूर,' पीरअली ने जरा थर्राये हुये स्वर में कहा, 'एक लाल झण्डे के बारे में निवेदन करना है।'