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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

इंद्र ने संसार में अंधकार फैलाने वाले शत्रु को महाविनाशकारी वज्र द्वारा हाथ काटकर मारा था. जिस प्रकार कुल्हाड़ी से काटी हुई शाखा गिर पड़ती है, उसी प्रकार वृत्र धरती पर सोया हुआ था. (५) अयोध्देव दुर्मद आ हि जुह्वे महावीरं तुविबाधमृजीषम्. नातारीदस्य संमृतिं वधानां सं रुजानाः पिपिष इन्द्रशत्रुः.. (६) अहंकारी वृत्र ने यह समझकर इंद्र को ललकारा कि मेरे समान कोई योद्धा है ही नहीं. इंद्र महान् पराक्रमी, बहुतों का ध्वंस करने वाले एवं शत्रुविजयी हैं. वृत्र इंद्र के विनाश से बच नहीं सका. इंद्र के शत्रु वृत्र ने गिरते समय नदियों के किनारे भी नष्ट कर दिए. (६) अपादहस्तो अपृतन्यदिन्द्रमास्य वज्रमधि सानौ जघान. वृष्णो वधिः प्रतिमानं बुभूषन्पुरुत्रा वृत्रो अशयद्व्यस्तः.. (७) बिना हाथपैर वाले वृत्र ने इंद्र को युद्ध में ललकारा. इंद्र ने पहाड़ की चोटी के समान वृत्र के पुष्ट कंधे में वज्र मारा. जिस प्रकार शक्तिशाली पुरुष की समानता करने वाले बलहीन व्यक्ति का प्रयत्न व्यर्थ जाता है, वही दशा वृत्र की हुई. वह कई जगह घायल होकर धरती पर गिर पड़ा. (७) नदं न भिन्नममुया शयानं मनो रुहाणा अति यन्त्यापः. याश्चिद् वृत्रो महिना पर्यतिष्ठत्तासामहिः पत्सुतः शीर्बभूव.. (८) सुंदर जल धरती पर पड़े हुए वृत्र को लांघकर उसी प्रकार आगे जा रहा है, जिस प्रकार सरिता टूटे हुए किनारों को पार करके बहती है. वह जीवित अवस्था में अपनी शक्ति से जिस जल को रोके हुए था, इस समय वह उसी जल के नीचे सो गया है. (८) नीचावया अभवद् वृत्रपुत्रेन्द्रो अस्या अव वधर्जभार. उत्तरा सूरधरः पुत्र आसीद्दानुः शये सहवत्सा न धेनुः.. (९) वृत्र की माता वृत्र को इंद्र के प्रहार से बचाने के लिए तिरछी होकर उसके शरीर पर गिर पड़ी. इंद्र ने वृत्र की माता के नीचे के भाग पर वज्र मारा. उस समय माता ऊपर और पुत्र नीचे था. जिस प्रकार गाय अपने बछड़े के साथ सो जाती है, उसी प्रकार वृत्र की माता दनु सदा के लिए सो गई. (९) अतिष्ठन्तीनामनिवेशनानां काष्ठानां मध्ये निहितं शरीरम्. वृत्रस्य निण्यं वि चरन्त्यापो दीर्घं तम आशयदिन्द्रशत्रुः.. (१०) एक स्थान पर न रुकने वाले जल में डूबकर वृत्र का शरीर नाममात्र को भी दिखाई नहीं दे रहा है. इंद्र से बैर करने वाला वृत्र चिरनिद्रा में लीन है और जल उसके ऊपर होकर बह रहा है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

दासपत्नीरहिगोपा अतिष्ठन्निरुद्धा आपः पणिनेव गावः. अपां बिलमपिहितं यदासीद् वृत्रं जघन्वाँ अप तद्ववार.. (११) जिस प्रकार पणि नामक असुर ने गायों को गुफा में बंद कर दिया था, उसी प्रकार वृत्र द्वारा रक्षित उसकी जल रूपी पत्नियां भी निरुद्ध थीं. जल बहने का मार्ग भी रुका हुआ था. इंद्र ने वृत्र को मारकर वह द्वार खोला. (११) अश्व्यो वारो अभवस्तदिन्द्र सृके यत्त्वा प्रत्यहन्देव एकः. अजयो गा अजयः शूर सोममवासृजः सर्तवे सप्त सिन्धून्.. (१२) हे इंद्र! सभी आयुधों के प्रहार में अद्वितीय वृत्र ने जब तुम्हारे वज्र के ऊपर प्रहार किया था, उस समय तुम घोड़े की पूंछ के समान घूम कर उसे बचा गए थे. हे शूर! तुमने पणि द्वारा पर्वत गुफा में छिपाई हुई गायों को जीता तथा सोम को भी जीत लिया. तुमने सात नदियों का प्रवाह बाधाहीन कर दिया. (१२) नास्मै विद्युन्न तन्यतुः सिषेध न यां मिहमकिरद्धादुनिं च. इन्द्रश्च यद्युयुधाते अहिश्चोतापरीभ्यो मघवा वि जिग्ये.. (१३) जिस समय इंद्र और वृत्र परस्पर युद्ध कर रहे थे, उस समय वृत्र ने माया से जिस बिजली, मेघगर्जन, जलवर्षा और अशनि का प्रयोग किया था, वे इंद्र को नहीं रोक सके. इसके साथ ही इंद्र ने वृत्र की अन्य मायाओं को भी जीत लिया. (१३) अहेर्यातारं कमपश्य इन्द्र हृदि यत्ते जघ्नुषो भीरगच्छत्. नव च यन्नवतिं च स्रवन्तीः श्येनो न भीतो अतरो रजांसि.. (१४) हे इंद्र! वृत्र को मारते समय तुम्हारे मन में कोई भी भय नहीं हुआ. उस समय तुमने सहायक रूप में किसी भी वृत्रहंता को नहीं देखा था. तुम निडर बाज पक्षी के समान शीघ्रता से निन्यानवे नदियों को पार कर गए थे. (१४) इन्द्रो यातोऽवसितस्य राजा शमस्य च शृङ्गिणो वज्रबाहुः. सेदु राजा क्षयति चर्षणीनामरान्न नेमिः परि ता बभूव.. (१५) वृत्र को मारकर वज्रधारी इंद्र स्थावर, जंगम, सींग रहित और सींग वाले पशुओं के स्वामी बने. इंद्र मनुष्यों के भी राजा बने. जिस प्रकार पहिए के अरे नेमि में स्थित रहते हैं, उसी प्रकार इंद्र ने सबको धारण किया. (१५) सूक्त—३३ देवता—इंद्र एतायामोप गव्यन्त इन्द्रमस्माकं सु प्रमतिं वावृधाति. ebook converter DEMO Watermarks*

अनामृणः कुविदादस्य रायो गवां केतं परमावर्जते नः.. (१) हम पणि असुर द्वारा रोकी हुई गायों को पाने की इच्छा से इंद्र के पास चलें. इंद्र हिंसारहित हैं एवं हमारी उत्तम बुद्धि को बढ़ाते हैं. इसके बाद वे इस गोरूप धन के विषय में हमें उत्तम ज्ञान देते हैं. (१) उपदेहं धनदामप्रतीतं जुष्टां न श्येनो वसतिं पतामि. इन्द्रं नमस्यन्नुपमेभिरर्कैर्यैः स्तोतृभ्यो हव्यो अस्ति यामन्.. (२) जिस प्रकार बाज अपने घोंसले की ओर तेजी से जाता है, उसी प्रकार मैं उत्तम स्तुतियों द्वारा पूजन करके धनदाता एवं अपराजेय इंद्र की ओर दौड़ता हूं. शत्रुओं के साथ युद्ध छिड़ने पर स्तोतागण इंद्र का आह्वान करते हैं. (२) नि सर्वसेन इषुधीँ रसक्त समर्यो गा अजति यस्य वष्टि. चोष्कूयमाण इन्द्र भूरि वामं मा पणिर्भूरस्मदधि प्रवृद्ध.. (३) समस्त सेना से युक्त इंद्र पीठ पर तरकस लगाए हुए हैं. सबके स्वामी इंद्र जिसे चाहते हैं, उसी की गाय पणि से छुड़ाकर उसके पास भेज देते हैं. हे उत्तम बुद्धिसंपन्न इंद्र! हमें पर्याप्त मात्रा में गोरूप धन देकर व्यापारी के समान हमसे उसका मूल्य मत मांगना. (३) वधीर्हि दस्युं धनिनं घनेनँ एकश्चरन्नुपशाकेभिरिन्द्र. धनोरधि विषुणक्ते व्यायन्नयज्वानः सनका प्रेतिमीयुः.. (४) हे इंद्र! शक्तिशाली मरुद्गण तुम्हारे साथ थे, फिर भी तुमने अकेले ही चोर एवं धनवान् वृत्र को कठोर वज्र द्वारा मारा. यज्ञविरोधी उसके अनुचर तुम्हें मारने के विचार से गए, पर उन्हें तुम्हारें धनुष से मृत्यु मिली. (४) परा चिच्छीर्षा ववृजुस्त इन्द्रायज्वानो यज्वभिः स्पर्धमानाः. प्र यद्दिवो हरिवः स्थातरुग्र निरव्रताँ अधमो रोदस्योः.. (५) हे इंद्र! जो लोग स्वयं यज्ञ नहीं करते हैं अथवा यज्ञ करने वालों का विरोध करते हैं, वे पीछे की ओर मुंह करके भाग गए हैं. हे इंद्र! तुम हरि नामक घोड़ों के स्वामी, युद्ध में पीठ न दिखाने वाले तथा उग्र हो. यज्ञ न करने वालों को तुमने स्वर्ग, आकाश और धरती से भगा दिया है. (५) अयुयुत्सन्रनवद्यस्य सेनामयातयन्त क्षितयो नवग्वाः. वृषायुधो न वध्रयो निरष्टाः प्रवद्भिरिन्द्राच्चितयन्त आयन्.. (६) वृत्र के अनुचरों ने दोषरहित इंद्र की सेना के साथ युद्ध करना चाहा था. उत्तम चरित्र वाले मनुष्यों ने इंद्र को युद्ध के लिए प्रेरित किया. जिस प्रकार शूर के साथ युद्ध छेड़ने वाले ebook converter DEMO Watermarks*

नपुंसक भाग जाते हैं, उसी प्रकार वे इंद्र के द्वारा अपमानित होकर अपनी निर्बलता का विचार करते हुए सरल मार्गों से दूर भाग गए. (६) त्वमेतान्रुदतो जक्षतश्चायोधयो रजस इन्द्र पारे. अवादहो दिव आ दस्युमुच्चा प्र सुन्वतः स्तुवतः शंसमावः.. (७) हे इंद्र! वृत्र के कुछ अनुचर तुम्हारी हंसी उड़ा रहे थे और कुछ तुम्हारे भय से रो रहे थे. तुमने उन सभी से आकाश में युद्ध किया एवं दस्यु वृत्र को स्वर्ग से लाकर भली-भांति सपरिवार नष्ट कर दिया. इस प्रकार तुमने सोमरस तैयार करने वालों एवं स्तुतिकर्त्ताओं की रक्षा की. (७) चक्राणासः परीणहं पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुम्भमानाः. न हिन्वानासस्तितिरुस्त इन्द्रं परि स्पशो अदधात्सूर्येण.. (८) उन वृत्रानुचरों ने धरती को सब ओर से व्याप्त कर लिया था. वे स्वर्ण एवं मणियों से सुशोभित थे. वे इंद्र को नहीं जीत सके. यज्ञ में विघ्न डालने वाले उनको इंद्र ने सूर्य की सहायता से भगा दिया. (८) परि यदिन्द्र रोदसी उभे अबुभोजीर्महिना विश्वतः सीम्. अमन्यमानाँ अभि मन्यमानैर्निर्ब्रह्मभिरधमो दस्युमिन्द्र.. (९) हे इंद्र! तुमने अपनी महिमा से धरती और आकाश को व्याप्त करके उनका भली प्रकार भोग किया है. जो यजमान मंत्रों का उच्चारण समझकर केवल पाठ करते थे, मंत्र उन्हें अपना समझकर उनकी रक्षा करते थे. ऐसे मंत्रों द्वारा तुमने उस चोर वृत्र को निकाल दिया. (९) न ये दिवः पृथिव्या अन्तमापुर्न मायाभिर्धनदां पर्यभूवन्. युजं वज्रं वृषभश्चक्र इन्द्रो निर्ज्योतिषा तमसो गा अदुक्षत्.. (१०) जब आकाश से धरती पर जल नहीं बरसा और धन देने वाली भूमि मानवोपकारक फसलों से युक्त नहीं थी, तब वर्षाकारक इंद्र ने अपने हाथ में वज्र उठाया और चमकते हुए वज्र की सहायता से अंधकार फैलाने वाले मेघ से नीचे गिरने वाला जल पूरी तरह दुहा. (१०) अनु स्वधामक्षरन्नापो अस्यावर्धत मध्य आ नाव्‍यानाम्. सध्रीचीनेन मनसा तमिन्द्र ओजिष्ठेन हन्मनाहन्नभि द्यून.. (११) इंद्र के स्वधा मंत्र के अनुसार पानी बरसने लगा. तब वृत्र उन नदियों के बीच में पहुंचकर बढ़ने लगा, जिनमें नाव चल सकती थी. इंद्र ने शक्तिशाली एवं प्राणसंहारक वज्र द्वारा उस स्थिर मन वाले वृत्र को कुछ ही दिनों में मार डाला. (११) न्याविध्यदिलीबिशस्य दृळ्हा वि शृङ्गिणमभिनच्छुष्णामिन्द्रः. ebook converter DEMO Watermarks*

यावत्तरो मघवन्द्यावदोजो वज्रेण शत्रुमवधीः पृतन्युम्.. (१२) इंद्र ने धरती पर छिपी हुई वृत्र की सेना को पूरी तरह वेध दिया था एवं संसार को दुःखी करने वाले एवं सींग के समान आयुध वाले वृत्र को अनेक प्रकार से मारा था. हे इंद्र! तुम्हारे पास जितना वेग और बल है, उसके द्वारा तुमने युद्धाभिलाषी वृत्र को वज्र की सहायता से काट डाला. (१२) अभि सिध्मो अजिगादस्य शत्रुन्वितिग्मेन वृषभेणा पुरोऽभेत्. सं वज्रेणासृजद्वृत्रमिन्द्रः प्र स्वां मतिमतिरच्छाशदानः.. (१३) इंद्र का कार्य सिद्ध करने वाला वज्र शत्रुओं पर गिरा था. इंद्र ने तीक्ष्ण एवं श्रेष्ठ वज्ररूपी आयुध से वृत्र के नगरों को तोड़ डाला था. इसके पश्चात् इंद्र ने अपना वज्र वृत्र पर चलाया और उसे मारते हुए भली-भांति अपना उत्साह बढ़ाया. (१३) आवः कुत्समिन्द्र यस्मिञ्चाकन्प्रावो युध्यन्तं वृषभं दशद्युम्. शफच्युतो रेणुर्नक्षत द्यामुच्छ्रैत्रेयो नृषाह्वाय तस्थौ.. (१४) हे इंद्र! तुम कुत्स ऋषि की स्तुति को पंसद करते थे. तुमने उनकी रक्षा की. तुमने युद्धरत एवं श्रेष्ठ गुणों वाले दशद्यु ऋषि की भी रक्षा की. तुम्हारे घोड़ों की टापों से उठी हुई धूल आकाश तक फैल गई थी. श्वैत्रेय ऋषि शत्रुओं के भय से पानी में छिप गए थे. मनुष्यों में श्रेष्ठ पद पाने की इच्छा से वे तुम्हारी कृपा के कारण ही बाहर निकले. (१४) आवः शमं वृषभं तुग्र्यासु क्षेत्रजेषे मघवञ्छिव्र्यं गाम्. ज्योक् चिदत्र तस्थिवांसो अक्रञ्छत्रूयतामधरा वेदनाकः.. (१५) हे इंद्र! तुमने शांतचित्त, श्रेष्ठ गुण वाले एवं जलमग्न श्वैत्रेय को क्षेत्र प्राप्ति के उद्देश्य से बचाया था. जो लोग हमारे साथ बहुत दिनों से युद्ध कर रहे हैं एवं हमसे शत्रुता रखते हैं, तुम उन्हें वेदना और कष्ट दो. (१५) सूक्त—३४ देवता—अश्विनीकुमार त्रिश्चिन्नो अद्या भवतं नवेदसा विभुर्वां याम उत रातिरश्विना. युवोर्हि यन्त्रं हिम्येव वाससोऽभ्यायंसेन्या भवतं मनीषिभिः.. (१) हे बुद्धिमान् अश्विनीकुमारो! तुम हमारे लिए आज तीन बार आओ. तुम्हारे रथ और दान व्यापक हैं. जिस प्रकार रश्मियों वाला सूर्य शीतल रात्रि से संबंधित है, उसी प्रकार तुम दोनों का भी नियमित संबंध है. तुम कृपा करके विद्वानों के वश में हो जाओ. (१) त्रयः पवयो मधुवाहने रथे सोमस्य वेनामनु विश्व इद्विदुः. ebook converter DEMO Watermarks*

त्रयः स्कम्भासः स्कभितास आरभे त्रिर्नक्तं याथस्त्रिर्वश्विना दिवा.. (२) समस्त देवता चंद्रमा और उसकी सुंदरी पत्नी वेना के विवाह में जा रहे थे, तब उन्हें पता लगा कि मधुर भोज्य-पदार्थ को ढोने वाले रथ में तीन पहिए हैं. उस रथ के ऊपर सहारा लेने के लिए खंभे हैं. हे अश्विनीकुमारो! इस प्रकार के रथ द्वारा तुम दिन में तीन बार आओ और रात में भी तीन बार आओ. (२) समाने अहन्नित्रवद्यगोहना त्रिराद्य यज्ञं मधुना मिमिक्षतम्. त्रिर्वाजवतीरिषो अश्विना युवं दोषा अस्मभ्यमुषसश्च पिन्वतम्.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम दिन में तीन बार आकर यज्ञकर्म की त्रुटियां दूर करो. आज यज्ञ का द्रव्य मधुर रस से तीन बार सींचो. रात और दिन में तीन-तीन बार बलकारक अन्न से हमारा पोषण करो. (३) त्रिर्वर्तिर्यातं त्रिरनुव्रते जने त्रिः सुप्राव्ये त्रेधेव शिक्षतम्. त्रिर्नान्द्यं वहतमश्विना युवं त्रिः पृक्षो अस्मे अक्षरेव पिन्वतम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! हमारे निवासस्थान में तीन बार आओ. हमारे अनुकूल कार्य करने वाले मनुष्य के पास तीन बार आओ. जो लोग तुम्हारे द्वारा रक्षणीय हैं, उनके पास तीन बार आओ. हमें तीन प्रकार से शिक्षा दो. हमें तीन बार प्रसन्नताकारक फल दो. जिस प्रकार मेघ जल देते हैं, उसी प्रकार तुम हमें तीन बार जल दो. (४) त्रिर्नो रयिं वहतमश्विना युवं त्रिर्देवताता त्रिरुतावतं धियः. त्रिः सौभाग्यत्वं त्रिरुत श्रवांसि नस्त्रिष्ठं वां सूरे दुहितारुहद्रथम्.. (५) हे अश्विनीकुमारो! हमें तीन बार धन प्रदान करो. हमारे देवों संबंधी यज्ञ में तीन बार आओ. तीन बार हमारी बुद्धि की रक्षा करो. तीन बार हमारे सौभाग्य की रक्षा करो. हमें तीन बार अन्न दो. तुम्हारे तीन पहिए वाले रथ पर सूर्य की पुत्रियां सवार हैं. (५) त्रिर्नो अश्विना दिव्यानि भेषजा त्रिः पार्थिवानि त्रिरु दत्तमद्भ्यः. ओमानं शंयोर्ममकाय सूनवे त्रिधातु शर्म वहतं शुभस्पती.. (६) हे अश्विनीकुमारो! स्वर्गलोक की ओषधि हमें तीन बार दो. पृथ्वी पर उत्पन्न ओषधि हमें तीन बार दो. आकाश से हमें तीन बार ओषधि दो. हे बृहस्पति के पोषको! हमें वात, पित्त, कफ—इन तीनों धातुओं से संबंधित सुख दो. (६) त्रिर्नो अश्विना यजता दिवेदिवे परि त्रिधातु पृथिवीमशायतम्. तिस्रो नासत्या रथ्या परावत आत्मेव वातः स्वसराणि गच्छतम्.. (७) हे अश्विनीकुमारो! तुम प्रतिदिन यज्ञ में बुलाने योग्य हो. तुम तीन बार धरती पर आकर ebook converter DEMO Watermarks*

वेदी पर तीन परतों के रूप में बिछी हुई कुशाओं पर शयन करो. शरीर में जिस प्रकार प्राणवायु आती है, उसी प्रकार तुम तीन यज्ञस्थानों में आओ. (७) त्रिरश्विना सिन्धुभिः सप्तमातृभिस्त्रय आहावास्त्रेधा हविष्कृतम्. तिस्रः पृथिवीरुपरि प्रवा दिवो नाकं रक्षेथे द्युभिरक्तुभिर्हितम्.. (८) हे अश्विनीकुमारो! सिंधु आदि सात नदियों के जल से तीन सोमाभिषेक हुए हैं. जलों के आधार तीन कलश और तीन सवनों से संबंधित तीन प्रकार की हवि तैयार है. तुमने पृथ्वी आदि तीनों लोकों से ऊपर जाकर दिवसरात्रियुक्त आकाश में सूर्य की रक्षा की थी. (८) क्व३त्री चक्रा त्रिवृतो रथस्य क्व३त्रयो वन्धुरो ये सनीळाः. कदा योगो वाजिनो रासभस्य येन यज्ञं नासत्योपयाथः.. (९) हे नासत्यो! तुम्हारे तीन कोने वाले रथ के तीन पहिए कहां हैं? रथ के ऊपर जो बैठने का स्थान है, उसके तीन बंधनाधार रूप डंडे कहां हैं? तुम्हारे रथ में बलवान् गधे न जाने कब जोड़े गए? उन्हीं के द्वारा तुम हमारे यज्ञ में आते हो. (९) आ नासत्या गच्छतं हूयते हविर्मध्वः पिबतं मधुपेभिरासभिः. युवोर्हि पूर्वं सवितोषसो रथमृताय चित्रं घृतवन्तामिष्यति.. (१०) हे नासत्यो! इस यज्ञ में आओ. मैं तुम्हें हवि देता हूं. तुम मधुर पदार्थों का पान करने वाले अपने मुखों से मधुर हवि पिओ. तुम्हारे विचित्र और धुरी में घी लगे हुए रथ को हमारे यज्ञ में आने के लिए उषा ने पहले ही प्रेरणा दी थी. (१०) आ नासत्या त्रिभिरेकादशैर्रिह देवेभिर्यातं मधुपयेमश्विना. प्रायुस्तारिष्टं नी रपांसि मृक्षतं सेधतं द्वेषो भवतं सचाभुवा.. (११) हे नासत्य अश्विनीकुमारो! तैंतीस देवताओं के साथ मधुर सोमरस पीने के लिए इस यज्ञ में आओ, हमें दीर्घायु करो, हमारे पापों का नाश करो, हमारे शत्रुओं को रोको और हमारे साथ रहो. (११) आ नो अश्विना त्रिवृता रथेनार्वाञ्चं रयिं वहतं सुवीरम्. शृण्वन्ता वामवसे जोहवीमि वृधे च नो भवतं वाजसातौ.. (१२) हे अश्विनीकुमारो! तीनों लोकों में चलने वाले अपने रथ द्वारा हमारे पास पुत्र, सेवक आदि सहित धन लाओ. तुम हमारी स्तुति सुनो. हम अपनी रक्षा के लिए तुम्हें बुलाते हैं. हमारी उन्नति करो और संग्राम में हमें शक्ति दो. (१२) सूक्त—३५ देवता—सविता ebook converter DEMO Watermarks*

ह्वयाम्यग्निं प्रथमं स्वस्तये ह्वयामि मित्रावरुणाविहावसे. ह्वयामि रात्रीं जगतो निवेशनीं ह्वयामि देवं सवितारमूतये.. (१) मैं अपनी रक्षा के लिए सबसे पहले अग्नि को बुलाता हूं. मैं अपनी रक्षा के लिए मित्र और वरुण को यहां बुलाता हूं. मैं संसार के सभी प्राणियों को विश्राम देने वाली रात को बुलाता हूं. मैं अपनी रक्षा के लिए सविता को बुलाता हूं. (१) आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च. हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्.. (२) सविता का रथ सोने का है. वे अंधकार से भरे आकाश में बार-बार भ्रमण करते हुए देवों और मानवों को अपने-अपने कर्मों में लगाते हुए सभी लोकों की यात्रा करते हैं. (२) याति देवः प्रवता यात्युद्वता याति शुभ्राभ्यां यजतो हरिभ्याम्. आ देवो याति सविता परावतोऽप विश्वा दुरिता बाधमानः.. (३) सविता देव प्रातःकाल से मध्याह्न तक उन्नत मार्ग से और मध्याह्न से संध्या तक अवनत मार्ग से चलते हैं. यज्ञ के योग्य सूर्य देव सफेद घोड़ों की सहायता से चलते हैं. वे समस्त पापों का नाश करते हुए दूर देश से यज्ञ में आते हैं. (३) अभीवृतं कृशनैर्विश्वरूपं हिरण्यशम्यं यजतो बृहन्तम्. आस्थद्रथं सविता चित्रभानुः कृष्णा रजांसि तविषिं दधानः.. (४) यज्ञ के योग्य एवं रंग-बिरंगी किरणों वाले सविता अपने तेज से लोकों में व्याप्त अंधकार को नष्ट करने के लिए स्वर्ण मूर्तियों से सुशोभित एवं सोने की कीलों वाले विशाल रथ पर सवार हुए. (४) वि जनाञ्छ्यावाः शितिपादो अख्यन्रथं हिरण्यप्रउगं वहन्तः. शश्वद्विशः सवितुर्देवस्योपस्थे विश्वा भुवनानि तस्थुः.. (५) सूर्य के सफेद पैरों वाले घोड़े सोने के जुए वाले रथ को खींचते हुए मनुष्यों को विशेष रूप से प्रकाश देते हैं. मनुष्य एवं सारा संसार प्रकाश के लिए सूर्य देवता के समीप जाता है. (५) तिस्रो द्यावः सवितुर्द्वा उपस्थाँ एका यमस्य भुवने विराषाट्. आणिं न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतु य उ तच्चिकेतत्.. (६) स्वर्ग आदि तीन लोक हैं. इनमें स्वर्गलोक और भूलोक दो सूर्य के अधिकार में हैं. एक आकाशलोक यमराज के घर जाने का मार्ग है. जिस प्रकार आणि नाम की कील के ऊपर रथ टिका रहता है, उसी प्रकार चंद्रमा आदि नक्षत्र सूर्य का सहारा लिए हुए हैं. जो सूर्य के विषय ebook converter DEMO Watermarks*

में जानते हैं, वे बोलें. (६) वि सुपर्णो अन्तरिक्षाण्यख्यद्गभीरवेपा असुरः सुनीथः. क्वे३दानीं सूर्यः कश्चिकेत कतमां द्यां रश्मिरस्या ततान.. (७) गंभीर कंपन वाली, सबको प्राण देने वाली और सरलता से सब जगह पहुंचने वाली सूर्य की किरणें आकाश आदि तीनों लोकों में फैली हुई हैं. यह कौन बता सकता है कि इस समय सूर्य कहां है? सूर्य की किरणें किस स्वर्गलोक में विस्तृत हैं? (७) अष्टौ व्यख्यत्ककुभः पृथिव्यास्त्री धन्व योजना सप्त सिन्धून्. हिरण्याक्षः सविता देव आगाद्दधद्रत्ना दाशुषे वार्याणि.. (८) सूर्य ने पृथ्वी की आठों दिशाएं, प्राणियों के तीनों लोक और सातों नदियां प्रकाशित की हैं. सोने की आंखों वाले सूर्य द्रव्य देने वाले यजमान को उत्तम धन देते हुए यहां आवें. (८) हिरण्यपाणिः सविता विचर्षणिरुभे द्यावापृथिवी अन्तरीयते. अपामीवां बाधते वेति सूर्यमभि कृष्णेन रजसा द्यामृणोति.. (९) हाथों में सोना लिए हुए एवं विविध पदार्थों को देखते हुए सूर्य आकाश और धरती दोनों लोकों में जाते हैं. वे रोगों को दूर भगाते हैं, उदय होते हैं और अंधकार को नष्ट करने वाले प्रकाश को लेकर सारे आकाश को व्याप्त करते हैं. (९) हिरण्यहस्तो असुरः सुनीथः सुमृळीकः स्ववाँ यात्वर्वाङ्. अपसेधन्नक्षसो यातुधानानस्थाद्देवः प्रतिदोषं गृणानः.. (१०) हाथों में सोना लिए हुए, प्राणदाता, अच्छे नेता, सुख और धन देने वाले सविता यज्ञ में सामने से आवें. सूर्य देव प्रतिरात्रि स्तुति सुनकर यातुधानों और राक्षसों को यज्ञ से निकालकर स्थित हुए. (१०) ये ते पन्थाः सवितः पूर्व्यासोऽरेणवः सुकृता अन्तरिक्षे. तेभिर्नो अद्य पथिभिः सुगेभी रक्षा च नो अधि च ब्रूहि देव.. (११) हे सविता! आकाश में तुम्हारा मार्ग निश्चित, धूलिरहित एवं भली प्रकार बनाया गया है. तुम उसी मार्ग से आकर आज हमारी रक्षा करो. हे देव! हमारी बातें देवताओं तक पहुंचा दो. (११) सूक्त—३६ देवता—अग्नि प्र वो यह्वं पूरूणां विशां देवयतीनाम्. अग्निं सूक्तेभिर्वचोभीरीमहे यं सीमिदन्य ईळते.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

देवों की कामना करने वाले हम बहुसंख्यक प्रजाजनों पर अनुग्रह के निमित्त सूक्तरूपी वचनों द्वारा महान् अग्नि की प्रार्थना करते हैं. अन्य ऋषिगण भी इसी अग्नि की स्तुति करते हैं. (१) जनासो अग्निं दधिरे सहोवृधं हविष्मन्तो विधेम ते. स त्वं नो अद्य सुमना इहाविता भवा वाजेषु सन्त्य.. (२) यज्ञ करने वाले लोगों ने शक्तिवर्धक अग्नि को धारण किया था. हे अग्नि! हम लोग हवि लेकर तुम्हारी सेवा करते हैं. तुम अन्नदान में तत्पर हो. आज इस यज्ञ में हम पर परम प्रसन्न होकर हमारे रक्षक बनो. (२) प्र त्वा दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्. महस्ते सतो वि चरन्त्यर्चयो दिवि स्पृशन्ति भानव:.. (३) हे अग्नि! तुम यज्ञ के होता एवं सर्वज्ञ हो. हम तुम्हें देवों का दूत समझकर वरण करते हैं. तुम महान् और नित्य हो. तुम्हारी चमक बढ़ती है. तुम्हारी किरणें आकाश को छूती हैं. (३) देवासस्त्वा वरुणो मित्रो अर्यमा सं दूतं प्रत्नमिन्धते. विश्वं सो अग्ने जयति त्वया धनं यस्ते ददाश मर्त्य:.. (४) हे अग्नि! वरुण, मित्र और अर्यमा—ये तीनों देव तुम्हें अपना प्राचीन दूत समझकर भली प्रकार चमकाते हैं. जो यजमान तुम्हें हवि देता है, वह तुम्हारे द्वारा सभी प्रकार की संपत्ति जीत लेता है. (४) मन्द्रो होता गृहपतिरग्ने दूतो विशामसि. त्वे विश्वा संगतानि व्रता ध्रुवा यानि देवा अकृण्वत.. (५) हे अग्नि! तुम देवों को बुलाने वाले, यजमान रूप प्रजाओं के पालक एवं हर्षित करने वाले हो. तुम देवताओं के दूत हो. पृथ्वी आदि देवता जो स्थिर कर्म करते हैं, वे तुम में मिल जाते हैं. (५) त्वे इदग्ने सुभगे यविष्ठ्य विश्वमा हूयते हवि:. स त्वं नो अद्य सुमना उतापरं यक्षि देवान्त्सुवीर्या.. (६) हे युवक अग्नि! तुझ परम सौभाग्यशाली को लक्ष्य करके सब हव्य दिए जाते हैं. तुम प्रसन्न मन होकर आज, कल और सर्वदा सुंदर एवं शक्तिशाली देवों का यज्ञ करो. (६) तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते. होत्राभिरग्निं मनुष: समिन्धते तितीर्वांसो अति स्रिध:.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

यजमान नमस्कार करते हुए अपने आप चमकने वाले उसी अग्नि को हवि देकर उपासना करते हैं. शत्रु को करारी हार देने के इच्छुक लोग होताओं द्वारा अग्नि को प्रज्वलित करते हैं. (७) घ्नन्तो वृत्रमतरन्रोदसी अप उरु क्षयाय चक्रिरे. भुवत्कण्वे वृषा द्युम्न्याहुतः क्रन्ददश्वो गविष्टिषु.. (८) हे अग्नि! तुम्हारी सहायता से देवों ने वृत्र को मारकर रहने के लिए स्वर्ग, पृथ्वी और आकाश को विस्तृत किया. जिस प्रकार संग्राम में हिनहिनाता हुआ घोड़ा गाएं प्राप्त करता है, उसी प्रकार भली प्रकार बुलाए जाने पर तुम कण्व ऋषि के लिए इच्छानुसार धन बरसाओ. (८) सं सीदस्व महाँ असि शोचस्व देववीतमः. वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम्.. (९) हे अग्नि! तुम भली प्रकार बैठो. तुम महान् हो. तुम देवताओं की प्रबल इच्छा करते हुए जलो. हे बुद्धिमान् एवं प्रशंसनीय अग्नि! तुम इधर-उधर फैलने वाले धुएं को विशेष रूप से बनाओ. (९) यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन. यं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुतः.. (१०) हे हव्यवाहक अग्नि! समस्त देवों ने मनु के लिए इस यज्ञस्थल में तुझ परम पूज्य अग्नि को धारण किया था. कण्व ने पूज्य अतिथियों के साथ धन द्वारा प्रसन्न करने वाले तुझ अग्नि को धारण किया था. वर्षा करने वाले इंद्र एवं अन्य स्तुतिकर्त्ताओं ने भी तुम्हें धारण किया था. (१०) यमग्निं मेध्यातिथिः कण्व ईध ऋतादधि. तस्य प्रेषो दीदियुस्तमिमा ऋचस्तमग्निं वर्धयामसि.. (११) पूज्य अतिथियों वाले कण्व ने जिस अग्नि को सूर्य से लेकर प्रज्वलित किया था, उसी अग्नि की फैलने वाली किरणें चमक रही हैं. हमारी ये ऋचाएं तथा हम उसी अग्नि को बढ़ाते हैं. (११) रायस्पूर्धि स्वधावोऽस्ति हि तेऽग्ने देवेष्वाप्यम्. त्वं वाजस्य श्रुत्यस्य राजसि स नो मृळ महाँ असि.. (१२) हे अन्न सहित अग्नि! हमें धन दो. तुम्हारी देवों से मित्रता है, तुम प्रसिद्ध अन्न के स्वामी एवं महान् हो. तुम हमें सुखी बनाओ. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता. ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे.. (१३) तुम हमारी रक्षा के लिए सूर्य के समान उन्नत बनो. ऊंचे उठकर तुम हमें अन्न देने वाले बनोगे, क्योंकि यूप गाड़ने वाले एवं यज्ञ पूर्ण करने वाले ऋत्विजों द्वारा हम तुम्हें बुलाते हैं. (१३) ऊर्ध्वो नः पाह्यंहसो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह. कृधी न ऊर्ध्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः.. (१४) तुम ऊंचे उठकर ज्ञान की सहायता से हमें पापों से बचाओ एवं समस्त राक्षसों को जला दो. संसार में घूमने-फिरने के लिए हमें उन्नत बनाओ तथा हमें जीवित रखने के लिए हमारा हविरूपी धन देवों के पास ले जाओ. (१४) पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेररावणः. पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठ्य.. (१५) हे विशाल किरणों वाले युवक अग्नि! हमें बाधक राक्षसों से बचाओ. धन दान न करने वाले धूर्त हिंसक पशु और मारने की इच्छा रखने वाले शत्रु से हमारी रक्षा करो. (१५) घनेव विष्वग्वि जह्यरावणस्पुर्जम्भ यो अस्मध्रुक्. यो मर्त्यः शिशीते अत्यक्तुभिर्मा नः स रिपुरीशत.. (१६) हे उष्ण किरणों वाले अग्नि! हम लोग जिस प्रकार डंडे, पत्थर आदि से मिट्टी का बर्तन फोड़ते हैं, तुम उसी प्रकार धन दान न करने वाले, हमसे द्वेष रखने वाले एवं हमें डराने- धमकाने वाले तथा शस्त्रप्रहार करने वाले शत्रु का सब प्रकार से संहार करो. (१६) अग्निर्वव्ने सुवीर्यमग्निः कण्वाय सौभगम्. अग्निः प्रावन्मित्रोत मेध्यातिथिम्नग्निः साता उपस्तुतम्.. (१७) अग्नि से शक्तिदायक अन्न की याचना की जाती है. अग्नि ने कण्व को सौभाग्य प्रदान किया, हमारे मित्रों की रक्षा की तथा पूज्य अतिथियों वाले ऋषि की रक्षा की. धन प्राप्ति के लिए जिस किसी ने अग्नि की स्तुति की, उसी को धन देकर अग्नि ने रक्षा की. (१७) अग्निना तुर्वशं यदुं परावत उग्रादेवं हवामहे. अग्निर्नयन्नववास्त्वं बृहद्रथं तुर्वीतिं दस्यवे सहः.. (१८) हम चोरों का दमन करने वाले अग्नि को तुर्वया, यदु और उग्रादेव ऋषियों के साथ दूर देश से बुलाते हैं. यह अग्नि न्वास्त्व, बृहद्रथ और तुर्वीत नामक राजर्षियों को इस यज्ञ में बुलावें. (१८) eBook converter DEMO Watermarks*

नि त्वामग्ने मनुर्दधे ज्योतिर्जनाय शश्वते. दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टय:.. (१९) हे प्रकाशरूप अग्नि! मनु ने समस्त जातियों के कल्याण के लिए तुम्हारी स्थापना की थी. हे अग्नि देव! तुमने यज्ञ के निमित्त उत्पन्न होकर हव्य से तृप्ति प्राप्त की और कण्व को प्रकाश दिया. मनुष्य तुम्हें नमस्कार करते हैं. (१९) त्वेषासो अग्नेरमवन्तो अर्चयो भीमासो न प्रतीतये. रक्षस्विनः सदमिद्यातुमावतो विश्वं समत्रिणं दह.. (२०) अग्नि की ज्वालाएं चमकीली, शक्तिशाली और भयानक हैं. इसलिए उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता. हे अग्नि देव! राक्षसों, यातुधानों एवं हमारे विश्व भक्षक शत्रुओं को जलाओ. (२०) सूक्त—३७ देवता—मरुद्गण क्रीळं वः शर्धो मारुतमनर्वाणं रथेशुभम्. कण्वा अभि प्र गायत.. (१) हे कण्व गोत्रोत्पन्न ऋषियो! विहरणशील एवं शत्रुरहित मरुतों को लक्ष्य करके स्तुति करो. वे अपने रथ पर सुशोभित होते हैं. (१) ये पृषतीभिरृष्टिभिः साकं वाशीभिरञ्जिभिः. अजायन्त स्वभानवः.. (२) बिंदुयुक्त हरिणियां मरुतों का वाहन हैं. उन्होंने इन वाहनों के साथ प्रकाशवान् होकर घोर गर्जन, आयुधसमूह तथा अलंकारों सहित जलग्रहण किया. (२) इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान्. नि यामञ्चित्रमृञ्जते.. (३) मरुतों के हाथ में रहने वाले चाबुक का शब्द हम सुन रहे हैं. चाबुक का वह शब्द युद्ध में हमारी शक्ति बढ़ाता है. (३) प्र वः शर्धाय घृष्वये त्वेषद्युम्नाय शुष्मिणे. देवत्तं ब्रह्म गायत.. (४) हे ऋत्विजो! तुम्हारे बल का समर्थन करने वाले, शत्रु दमनकारी, उज्ज्वलकीर्तिसंपन्न एवं शक्तिशाली मरुतों की स्तुति हवि ग्रहण के उद्देश्य से करो. (४) प्र शंसा गोष्वघ्न्यं क्रीळं यच्छर्धो मारुतम्. जम्भे रसस्य वावृधे.. (५) हे ऋत्विजो! दूध देने वाली गायों के बीच स्थित मरुद्गणों के अविनाशी, विहारशील एवं सहन करने योग्य तेज की प्रशंसा करो. वह तेज गाय का दूध पीने के कारण बढ़ा है. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

को वो वर्षिष्ठ आ नरो दिवश्च ग्मश्च धूतयः. यत्सीमन्तं न धूनुथ.. (६) हे धरती और आकाश को कंपित करने वाले मरुद्गणो! तुमसे कौन बड़ा है? तुम जैसे पेड़ की चोटी को कंपित कर देते हो, उसी प्रकार सब दिशाओं को कंपा दो. (६) नि वो यामाय मानुषो दध्र उग्राय मन्यवे. जिहीत पर्वतो गिरिः.. (७) हे मरुद्गणो! तुम्हारे चलने से घर गिर पड़ेगा, इस भय से लोगों ने घरों में मजबूत खंभे गाड़े हैं. तुम्हारी चाल उग्र एवं झकझोरने वाली है. तुम्हारी तेज चाल से चोटियों वाले अनेक पर्वत हिल जाते हैं. (७) येषामज्मेषु पृथिवी जुजुर्वाँ इव विश्पतिः. भिया यामेषु रेजते.. (८) हे मरुद्गणो! तुम्हारी चाल सभी पदार्थों को दूर फेंक देती है. वृद्ध एवं दुर्बल राजा शत्रु के भय से जिस प्रकार कांपता है, उसी प्रकार तुम्हारे चलने से धरती कांपती है. (८) स्थिरं हि जानमेषां वयो मातुर्रिरतवे. यत्सीमनु द्विता शवः.. (९) मरुतों की उत्पत्ति का स्थान आकाश स्थिर रहता है. आकाश मरुतों की माता के समान है. आकाश में होकर पक्षी निकल सकते हैं. मरुतों का बल धरती और आकाश को पृथक् करता है. (९) उदु त्ये सूनवो गिरः काष्ठा अज्मेश्वत्नत. वाश्रा अभिज्ञु यातवे.. (१०) शब्दों के जन्मदाता मरुद्गण चलते समय जल का विस्तार करते हैं और रंभाती हुई गायों को घुटने तक गहरे जल में प्रवेश करने को प्रेरित करते हैं. (१०) त्यं चिद्घा दीर्घं पृथुं मिहो नपातममृध्रम्. प्रच्यावयन्ति यामभिः.. (११) मरुद्गण अपनी तेज चाल से विस्तृत, मोटे, जल न बरसाने वाले, अपराजेय एवं प्रसिद्ध बादलों को भी कंपित कर देते हैं. (११) मरुतो यद्ध वो बलं जनाँ अच्युच्यवीतन. गिरीँ रचुच्यवीतन.. (१२) हे मरुतो! तुम शक्तिशाली हो, इसलिए समस्त प्राणियों को अपने-अपने काम में लगाते हो तथा मेघों को भी प्रेरित करते हो. (१२) यद्व यान्ति मरुतः सं ह ब्रुवतेऽध्वन्ना. शृणोति कश्चिदेषाम्.. (१३) मरुद्गण जब चलते हैं तो मार्ग में सब ओर ध्वनि अवश्य करते हैं. उस ध्वनि को चाहे जो सुन सकता है. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*

प्र यात शीभमाशुभिः सन्ति कण्वेषु वो दुवः. तत्रो षु मादयाध्वै.. (१४) हे मरुद्गणो! अपने तीव्रगामी वाहन के द्वारा यज्ञभूमि में शीघ्र आओ. बुद्धिमान् यजमानों के द्वारा की गई सेवा से उनके प्रति तृप्त बनो. (१४) अस्ति हि ष्मा मदाय वः स्मसि ष्मा वयमेषाम्. विश्वं चिदायुर्जीवसे.. (१५) हे मरुद्गणो! हमारे द्वारा दिया हुआ हवि तुम्हें तृप्त करने के लिए है. हम पूर्ण आयु जीने के लिए तुम्हारे सेवक बने हैं. (१५) सूक्त—३८ देवता—मरुद्गण कद्ध नूनं कधप्रियः पिता पुत्रं न हस्तयोः. दधिध्वे वृक्तबर्हिषः.. (१) हे मरुद्गणो! प्रार्थना चाहने वाले तुम लोगों के लिए कुश बिछा दिए गए हैं. जिस प्रकार पिता पुत्र को हाथों पर धारण करता है, क्या तुम भी हमें उसी प्रकार धारण करोगे? (१) क्व नूनं कद्धो अर्थं गन्ता दिवो न पृथिव्याः. क्व वो गावो न रण्यन्ति.. (२) हे मरुद्गणो! इस समय तुम कहां हो? तुम इस यज्ञ में कब आओगे? तुम यहां आकाश से आओ, धरती से मत आना. जिस प्रकार गाएं रंभाती हैं, उसी प्रकार यजमान तुम्हें यहां बुलाते हैं. (२) क्व वः सुम्ना नव्‍यांसि मरुतः क्व सुविता. क्वो३विश्वानि सौभगा.. (३) हे मरुद्गणो! तुम्हारी प्रजा पशुरूपी नवीन धन, मणि, मुक्ता आदि रूपी शोभन धन और गज, अश्व आदि रूपी सौभाग्य धन कहां है? (३) यद्द्यूं पृश्निमातरो मर्तासः स्यातने. स्तोता वो अमृतः स्यात्.. (४) हे पृश्नि नामक धेनु के पुत्र मरुद्गण! यद्यपि तुम मरणधर्मा हो, पर तुम्हारी स्तुति करने वाला अमर होगा. (४) मा वो मृगो न यवसे जरिता भूदजोष्‍यः. पथा यमस्य गादुप.. (५) घास के बीच में मृग जिस प्रकार सेवारहित नहीं रहता, अपितु घास खाता है, उसी प्रकार तुम्हारी स्तुति करने वाले तुम्हारी सेवा से कभी शून्य न हों. इस प्रकार वे यमराज के मार्ग पर नहीं जाएंगे. (५) मो षु णः परापरा निर्ऋतिर्दुर्हणा वधीत्. पदीष्ट तृष्णया सह.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

हे मरुद्गण! अत्यंत शक्तिशाली पाप की देवी निर्ऋति का कोई विनाश नहीं कर सकता. वह हमारा वध न करे और हमारी तृष्णा के साथ ही समाप्त हो जाए. (६) सत्यं त्वेषा अमवन्तो धन्वञ्चिदा रुद्रियासः. मिहं कृण्वन्त्यवाताम्.. (७) रुद्र द्वारा पालित, दीप्तिसंपन्न एवं बलशाली मरुद्गण मरुस्थल में भी वायुरहित वर्षा करते हैं, यह बात सत्य है. (७) वाश्रेव विद्युन्मिमाति वत्सं न माता सिषक्ति. यदेषां वृष्टिरसर्जि.. (८) दूध भरे स्तनों वाली रंभाती हुई गाय के समान बिजली गरजती है. गाय जिस तरह बछड़े को चाटती है, उसी प्रकार बिजली मरुद्गणों की सेवा करती है. इसी के फलस्वरूप मरुद्गणों ने वर्षा की है. (८) दिवा चित्तमः कृण्वन्ति पर्जन्येनोदवाहेन. यत्पृथिवीं व्युन्दन्ति.. (९) मरुद्गण जल ढोने वाले बादलों की सहायता से दिन में भी अंधेरा कर देते हैं. वे उसी समय धरती को सींचते हैं. (९) अध स्वनान्मरुतां विश्वमा सद्म पार्थिवम्. अरेजिन्त प्र मानुषाः.. (१०) मरुद्गणों के गरजने की ध्वनि से धरती पर बने सभी घर एवं उन में रहने वाले मनुष्य कांपने लगते हैं. (१०) मरुतो वीळुपाणिभिश्चित्रा रोधस्वतीरनु. यातेमखिद्रयामभिः.. (११) हे मरुद्गणो! जिस प्रकार विचित्र किनारों वाली नदी बहती है, उसी प्रकार तुम अपने शक्तिशाली हाथों की सहायता से बिना रुके हुए चलते रहो. (११) स्थिरा वः सन्तु नेमयो रथा अश्वास एषाम्. सुसंस्कृता अभीशवः.. (१२) हे मरुद्गणो! तुम्हारी नेमि, रथ और घोड़े शक्तिशाली हों. तुम्हारी उंगलियां सावधानी से घोड़ों की लगाम पकड़ें. (१२) अच्छा वदा तना गिरा जराये ब्रह्मणस्पतिम्. अग्निं मित्रं न दर्शतम्.. (१३) हे ऋत्विजो! मंत्र के पालक मरुद्गण, अग्नि एवं दर्शनीय मित्र की प्रार्थना के लिए हमारे सामने ऐसे मंत्रों से स्तुति करो जो उन देवताओं का स्वरूप बताने वाले हों. (१३) मिमीहि श्लोकमास्ये पर्जन्य इव ततनः. गाय गायत्रमुक्थ्यम्.. (१४) हे ऋत्विजो! अपने मुंह से स्तोत्रों की रचना करो. जिस प्रकार बादल वर्षा का विस्तार ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—३९ देवता—मरुद्गण

करते हैं, उसी प्रकार तुम उस स्तोत्र के श्लोकों को बढ़ाओ, तुम गायत्री छंद द्वारा निर्मित शास्त्रसम्मत स्तोत्र को पढ़ो. (१४) वन्दस्व मारुतं गणं त्वेषं पनस्युमर्किणम्. अस्मे वृद्धा असन्निह.. (१५) हे ऋत्विजो! प्रकाशयुक्त, स्तुतियोग्य एवं सब लोगों द्वारा अर्चित मरुद्गणों की तुम वंदना करो, जिससे वे हमारे इस यज्ञ में वृद्धि को प्राप्त हों. (१५) सूक्त—३९ देवता—मरुद्गण प्र यदिस्था परावतः शोचिर्न मानमस्यथ. कस्य क्रत्वा मरुतः कस्य वर्पसा कं याथ कं ह धूतयः.. (१) हे कंपनकारी मरुद्गणो! जिस प्रकार सूर्य आकाश से अपनी तेज रोशनी धरती पर फेंकता है, उसी प्रकार जब तुम दूर आकाश से अपनी शक्ति धरती पर डालते हो तो तुम किस यज्ञ में किस यजमान द्वारा आकर्षित किए जाते हो तथा किस यजमान के समीप जाते हो? (१) स्थिरा वः सन्त्वायुधा पराणुदे वीळू उत प्रतिष्कभे. युष्माकमस्तु तविषी पनीयसी मा मर्त्यस्य मायिनः.. (२) हे मरुद्गणो! तुम्हारे आयुध शत्रु विनाश के लिए स्थिर और शत्रुओं को रोकने के लिए दृढ़ हों. तुम्हारी शक्ति स्तुति करने योग्य हो, हमारे प्रति धोखा करने वाले शत्रुओं की शक्ति प्रशंसनीय न हो. (२) परा ह यत्स्थिरं हथ नरो वर्तयथा गुरु. वि याथन वनिनः पृथिव्या व्याशाः पर्वतानाम्.. (३) हे नेताओ! जब तुम वृक्षादि स्थिर वस्तु को तोड़ते हुए एवं पत्थर आदि भारी वस्तुओं को हिलाते हुए चलते हो, तब पृथ्वी पर खड़े वनों के बीच से तथा पर्वतों के बगल वाले मार्ग से चलते हो. (३) नहि वः शत्रुर्विविदे अधि द्यवि न भूम्यां रिशादसः. युष्माकमस्तु तविषि तना युजा रुद्रासो नू चिदाधृषे.. (४) हे शत्रुनाशकारी! धरती और आकाश में तुम्हारा कोई शत्रु नहीं हुआ. हे रुद्रपुत्रो! तुम सबकी सम्मिलित शक्ति शत्रुओं का दमन करने के लिए विस्तृत हो. (४) प्र वेपयन्ति पर्वतान्वि विञ्चन्ति वनस्पतीन्. प्रो आरत मरुतो दुर्मदा इव देवासः सर्वया विशा.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

मरुद्गण पर्वतों को भली प्रकार कंपित करते एवं वृक्षों को एक-दूसरे से अलग करते हैं. हे देवो! जिस प्रकार मतवाले लोग स्वेच्छा से सब जगह जाते हैं. उसी प्रकार तुम भी प्रजाओं के साथ सर्वत्र जाते हो. (५) उपो रथेषु पृषतीरयुग्ध्वं प्रष्टिर्वहति रोहितः. आ वो यामाय पृथिवी चिदश्रोदबीभयन्त मानुषाः.. (६) तुम बुंदकियों वाले हरिणों को अपने रथ में जोतते हो. लाल हरिण तुम्हारे रथ के जुए को खींचता है. तुम्हारे आने की ध्वनि धरती और आकाश ने सुनी है तथा मनुष्य भयभीत हो उठे हैं. (६) आ वो मक्षू तनाय कं रुद्रा अवो वृणीमहे. गन्ता नूनं नोऽवसा यथा पुरेत्था कण्वाय बिभ्युषे.. (७) हे रुद्रपुत्रो! हम पुत्र-प्राप्ति के लिए तुम्हारी रक्षणशक्ति की शीघ्र प्रार्थना करते हैं. पहले किए गए यज्ञों में हमारी रक्षा के लिए तुम जिस प्रकार आए थे, उसी प्रकार भयभीत एवं बुद्धिमान् यजमान की रक्षा के लिए उनके समीप आओ. (७) युष्मेषितो मरुतो मर्त्येषित आ यो नो अभ्व ईषते. वि तं युयोत शवसा व्योजसा वि युष्माकाभिरूतिभिः.. (८) हे मरुद्गणो! तुम्हारी अथवा किसी अन्य पुरुष की प्रेरणा से जो भी शत्रु हमारे सामने आवे, तुम उसका बल और अन्न छीन लो और उससे अपनी रक्षा भी वापस कर लो. (८) असामि हि प्रयुज्यवः कण्वं दद प्रचेतसः. असामिभिर्मरुत आ न ऊतिभिर्गन्ता वृष्टिं न विद्युत:.. (९) हे मरुद्गणो! तुम पूर्ण रूप से यज्ञपात्र एवं परम ज्ञानसंपन्न हो. तुम यजमान को धारण करो. जिस प्रकार बिजली वर्षा लेकर आती है, उसी प्रकार तुम अपनी पूरी शक्ति से हमारी रक्षा करने को आओ. (९) असाम्योजो बिभृथा सुदानवोऽसामि धूतयः शवः. ऋषिद्विषे मरुतः परिमन्यव इषुं न सृजत द्विषम्.. (१०) हे शोभन दान करने वाले मरुतो! तुम अपनी समस्त शक्ति धारण करो. हे कंपनकर्त्ताओं! ऋषियों से द्वेष करने वाले एवं क्रोधी शत्रु के प्रति बाण के समान अपना क्रोध व्यक्त करो. (१०) सूक्त—४० देवता—ब्रह्मणस्पति ebook converter DEMO Watermarks*

उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे. उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव इन्द्र प्राशूर्भवा सचा.. (१) हे ब्रह्मणस्पति! हम पर अनुग्रह करने के लिए अपने निवासस्थान से उठो. देवताओं की इच्छा करने वाले हम तुमसे याचना करते हैं. सुंदर दान करने वाले मरुद्गण तुम्हारे समीप जावें. हे इंद्र! तुम ब्रह्मणस्पति के सोमरस का सेवन करो. (१) त्वामिद्धि सहसस्पुत्र मर्त्य उपब्रूते धने हिते. सुवीर्यं मरुत आ स्वश्व्यं दधीत यो व आचके.. (२) हे परम बल पालक! शत्रुओं के बीच फंसे हुए धन को प्राप्त करने के लिए मनुष्य तुम्हारी ही स्तुति करते हैं. हे मरुद्गणो! धन का इच्छुक जो मनुष्य, ब्रह्मणस्पति सहित तुम्हारी स्तुति करता है, वह सुंदर अश्व एवं शोभन वीर्य संपन्न धन प्राप्त करता है. (२) प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता. अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः.. (३) ब्रह्मणस्पति एवं प्रिय सत्य रूपा वाग्देवी हमें प्राप्त हों. ब्रह्मणस्पति आदि देव वीर शत्रुओं को हमसे बहुत दूर ले जावें एवं हमें मानव हितकारी तथा द्रव्यपूर्ण यज्ञों में ले जावें. (३) यो वाघते ददाति सूनरं वसु स धत्ते अक्षिति श्रवः. तस्मा इळां सुवीरामा यजामहे सुप्रतूर्तिमनेहसम्.. (४) ऋत्विज् को उत्तम धन देने वाला यजमान अक्षय अन्न प्राप्त करता है. उस यजमान के निमित्त हम सुवीरा इला से याचना करते हैं. वह शत्रु का नाश करती है, पर उसे कोई नहीं मार सकता. (४) प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम्. यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे.. (५) ब्रह्मणस्पति होता के मुख में बैठकर निश्चय ही पवित्र मंत्र बोलते हैं. उस मंत्र में इंद्र, वरुण, मित्र और अर्यमा देव निवास करते हैं. (५) तमिद्द्रोचेमा विदथेषु शम्भुवं मन्त्रं देवा अनेहसम्. इमां च वाचं प्रतिहर्यथा नरो विश्वेद्वामा वो अश्नवत्.. (६) हे ब्रह्मणस्पति प्रभृति देवो! हम उसी इंद्र प्रतिपादक पवित्र मंत्र को बोलते हैं. हे नेताओ! यदि आप हमारे वचनों को चाहते हैं तो सभी शोभन वचन आपको प्राप्त होंगे. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

को देवयन्तमश्ववज्जनं को वृक्तबर्हिषम् प्रप्र दाश्वान्पस्त्याभिरस्थितान्तर्वात्वक्षयं दधे.. (७) देवों की अभिलाषा करने वाले एवं यज्ञ के निमित्त कुश तोड़ने वाले यजमान के समीप ब्रह्मणस्पति के अतिरिक्त कौन देवता आ सकता है? हव्यदाता यजमान ऋत्विजों के साथ भांति-भांति की संपत्तियों से युक्त घर से निकलकर यज्ञस्थल की ओर प्रस्थान कर चुके हैं. (७) उप क्षत्रं पृञ्चीत हन्ति राजभिर्भये चित्सुक्षितिं दधे. नास्य वर्ता न तरुता महाधने नार्भे अस्ति वज्रिण:... (८) ब्रह्मणस्पति अपने शरीर में शक्ति का संचय करें. वे वरुण आदि राजाओं के साथ शत्रुओं का नाश करते हैं एवं भयानक युद्ध में भी डटे रहते हैं. वज्रधारी ब्रह्मणस्पति को प्रभूत घर प्राप्ति के लिए होने वाले बड़े अथवा छोटे युद्ध में प्रेरित या उत्साहहीन करने वाला दूसरा नहीं है. (८) सूक्त—४१ देवता—वरुण आदि यं रक्षन्ति प्रचेतसो वरुणो मित्र अर्यमा. नू चित्य दभ्यते जन:... (१) उत्तम ज्ञान से संपन्न वरुण, मित्र और अर्यमा देवता जिसकी रक्षा करते हैं, वह शीघ्र ही सब शत्रुओं को मार डालता है. (१) यं बाहुतेव पिप्रति पान्ति मर्त्यं रिष:. अरिष्ट: सर्व एधते.. (२) वरुणादि देव जिस यजमान को अपने हाथ से धनसंपन्न करते एवं हिंसकों से बचाते हैं, वह सबसे सुरक्षित रहकर उन्नति करता है. (२) वि दुर्गा वि द्विषः पुरो घ्नन्ति राजान एषाम्. नयन्ति दुरिता तिर:... (३) वरुणादि राजा अपने यजमान के सामने स्थित शत्रु का दुर्ग तोड़कर शत्रुओं का नाश करते हैं. इसके पश्चात् वे यजमान के पापों को भी नष्ट कर देते हैं. (३) सुगः पन्था अनृक्षर आदित्यास ऋतं यते. नात्रावखादो अस्ति व:... (४) हे आदित्यो! तुम जिस मार्ग से यज्ञ में जाते हो, वह सुगम और निष्कंटक है. इस यज्ञ में ऐसा हवि नहीं, जिससे तुम्हें घृणा हो. (४) यं यज्ञं नयथा नर आदित्या ऋजुना पथा. प्र वः स धीतये नशत्.. (५) eBook converter DEMO Watermarks*