सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
२४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
( ३ ) भाव में जो राशि है उसका स्वामी कौन ग्रह है। अर्थात् ग्रहों का स्वस्थान सबसे पहिले जानना चाहिए।
( ४ ) ग्रहों के उच्च नीच स्थान, मूल त्रिकोण स्थानों का विचार कर देखना कि कोई ग्रह इन अधिकारों में है क्या ?
( ५ ) ग्रहों की नैसर्गिक तात्कालिक और पंचधा मैत्री का विचार कर ग्रहों का परस्पर मैत्री सम्बन्ध देखना।
( ६ ) ग्रह की दृष्टि प्रत्येक ग्रह और भाव पर विचार कर उसका दृष्टि द्वारा सम्बन्ध का विचार करना।
( ७ ) ग्रह गुण धर्म, राशि गुण धर्म और नक्षत्र गुणधर्म पर विचार करना।
( ८ ) ग्रहों के अस्त वक्त्री मार्गी पर विचार।
( ९ ) भिन्न-भिन्न भाव के पृथक नाम और सामूहिक रूप से उनका नाम जो हो, उनमें ग्रहों का विचार।
( १० ) प्रत्येक भाव से क्या क्या विचार किया जा सकता है, इसको जान कर विचारणीय विषय का भाव खोजना।
( ११ ) विचारणीय भाव का स्वामी कौन ग्रह है और किस स्थान में है ? जहाँ भाव स्वामी है उसके भाव से मैत्री सम्बन्ध का विचार करना।
( १२ ) विचारणीय भावपर भावेश या और किन ग्रहों की दृष्टि है। इन बातों के विचारने का प्रारम्भिक ज्ञान करा दिया गया है, परन्तु इसके अतिरिक्त फल विचारने के लिए और अनेक बातों को जानने की आवश्यकता है जिनको जानने पर फल कह सकते हैं।
( १ ) ग्रहों की भिन्न-भिन्न प्रकार की अवस्थाएँ और उनका फल।
( २ ) ग्रहों के भिन्न-भिन्न राशियों में रहने का फल।
( ३ ) भाव में भिन्न-भिन्न राशियों के रहने का फल।
( ४ ) प्रत्येक भाव के अनुसार प्रत्येक ग्रह का फल।
( ५ ) भाव स्वामी के भिन्न-भिन्न स्थानों में रहने का फल।
( ६ ) ग्रहों की मैत्री के अनुसार फल।
( ७ ) ग्रहों की ग्रहों पर दृष्टि के अनुसार फल।
( ८ ) प्रत्येक भाव पर पृथक पृथक ग्रहों की दृष्टि का फल।
( ९ ) भाव में एक से अधिक ग्रह रहने का पृथक पृथक फल।
( १० ) कारक ग्रह, भास्कर ग्रह, अरिष्ट योग, अरिष्ट भंग योग आदि का ज्ञान।
( ११ ) ग्रहों के विशेष योग—जैसे अल्पायु योग, दीर्घायु योग, मृत्यु योग, राज योग, राजसंग योग, राज बंद योग, धन योग, दारिद्र्य योग, अन्ध्या काना लंगड़ा आदि होने के विशेष योग और नामभ आदि अनेक योगों का विचार कर देखना कि कुण्डली में कौन कौन योग पड़े हैं और उनका क्या फल होता है।
फलित सम्बन्धी स्थूल विचार : २४१
( १२ ) ग्रह की विशेष परिस्थिति के अनुसार फल का विचार ।
( १३ ) जन्म समय का सम्बत, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, दिन आदि अनेक बातों के विचार से भिन्न-भिन्न फल ।
( १४ ) चन्द्र की राशि, नक्षत्र, चरण आदि के विचार के विशेष फल जानना ।
( १५ ) लून और लगनेश के विचार से विशेष फल जानना ।
( १६ ) आयुर्दाय का ज्ञान ।
इत्यादि अनेक बातों का विचार कर ग्रह और भाव के बलावल और परिस्थिति विचार कर देश, काल, आयु, प्रथा आदि पर विचार करते हुए फल कहना पड़ता है । फिर उनकी दशा निकाल कर वह फल होने का समय निश्चित किया जाता है ।
फल कहने के लिए विचार—
जिस सम्बन्ध का फल विचार करना है उसके लिये देखो वह फल किस भाव से सम्बन्ध रखता है । जैसे सन्तान का विचार करना है तो पंचम भाव से उसका विचार होगा क्योंकि पंचम भाव का नाम सुत भाव है । संतान विचारने के लिए मुख्य भाव तो पंचम है । परन्तु और भी भाव हैं जिनसे संतान का विचार होता है । इस प्रकार देखना कि उस भाव का विचार और कौन कौन भाव से सम्बन्ध रखता है ।
जिस भाव के सम्बन्ध से विचार करना है उस भाव के सम्बन्ध से इन बातों का विचार करना पड़ता है—
( १ ) भाव का कितना बल है ?
( २ ) भाव में कोई ग्रह है या नहीं ।
( ३ ) भाव में शुभ या अशुभ ग्रह है ।
( ४ ) भाव में लगनेश है क्या ?
( ५ ) भाव में कोई ग्रह हो तो उस भाव का बलावल उच्च-नीच आदि अधिकार का विचार ।
( ६ ) भावस्थ ग्रह, त्रिकोण, केन्द्र, त्रिक, आदि स्थानों के स्वामी होने का विचार ।
( ७ ) भाव में कौन २ ग्रहों की दृष्टि है और द्रष्टा ग्रह कैसा है ।
( ८ ) भाव में अनेक ग्रहों का योग पर विचार ।
( ९ ) भाव भावेश युक्त या दृष्ट है ?
( १० ) भावस्थ ग्रह और भावेश के योग दृष्टि में भी अदि सम्बन्ध का विचार ।
( ११ ) भाग, भावस्थ ग्रह और भावेश के सम्बन्ध से विशेष परिस्थिति और विशेष योगों पर विचार ।
( १२ ) भावेशों का परिवर्तन योग ( भावेश का परस्पर एक दूसरे के स्थान में होना ) ।
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२४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
( १३ ) भाव के कारण ग्रह की स्थिति और योग दृष्टि मैत्री आदि से भाव से सम्बन्ध होने का विचार ।
( १४ ) आयुर्दाय का विचार कर भास्केष का विचार ।
इन सब के विचार करने के प्रथम भावस्थ ग्रह या भावेष की पूरी स्थिति इस प्रकार विचार कर लेनी चाहिए ।
( १ ) भावेष पाप या शुभ या मिथ ग्रह है ।
( २ ) भावेष वक्की मार्गी अस्त आदि विचार से क्या है ?
( ३ ) भावेष के बलावल का विचार ।
( ४ ) भावेष का उच्च, मूल त्रिकोण स्वगृही आदि अच्छे अधिकार पर विचार ।
( ५ ) भावेष का नीच शत्रु-गृही अस्त आदि बुरे अधिकार पर विचार ।
( ६ ) भावेष की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं पर विचार ।
( ७ ) भावेष किसी ग्रह के साथ है या अकेला है ।
( ८ ) भावेष का शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट होने से अच्छी स्थिति पर विचार ।
( ९ ) भावेष का अशुभ ग्रह युक्त या दृष्ट होने से बुरी स्थिति पर विचार ।
( १० ) भावेष का मित्र ग्रह युक्त या दृष्ट होने से बल प्राप्त करने पर विचार ।
( ११ ) भावेष का शत्रु ग्रह युक्त या दृष्ट होने से निर्बलता आने पर विचार ।
( १२ ) भावेष केन्द्र कोण आदि शुभ स्थानों में होने से अच्छी स्थिति पर विचार ।
( १३ ) भावेष त्रिक ( ६-८-१२ ) स्थानों में होने या इनके स्वामी होने आदि की बुरी स्थिति पर विचार ।
( १४ ) भावेष का केन्द्र त्रिकोण स्वामियों के साथ रहने से अच्छी स्थिति पर विचार ।
( १५ ) भावेष का त्रिकेश के साथ रहने से बुरी स्थिति पर विचार ।
( १६ ) भावेष के वर्ग के अनुसार शुभ या अशुभ वर्ग में होने का विचार ।
( १७ ) भावेष का नवांश में उच्च-नीच आदि स्थिति में होने पर विचार ।
( १८ ) भावेष शुभ या अशुभ स्थान है ।
इत्यादि बातों का विचार कर ग्रहों की और भाव की पूरी स्थिति और सम्बन्ध आदि का विचार कर फल कहना पड़ता है ।
फलित विचार करने के लिए संक्षेप में कुछ साधारण विचार : २४३
अध्याय ४४
फलित विचार करने के लिये संक्षेप में कुछ साधारण नियम
( १ ) नीच का ग्रह अशुभ होता है जैसे मकर का गुरु ।
( २ ) उच्च का ग्रह (जैसे मेष का सूर्य)-शुभ फल देता है, फल में वृद्धि करता है ।
( ३ ) परमोच्च ग्रह (जैसे गुरु कर्क के ५° पर हो तो)-भाव फल उत्तम देता है ।
( ४ ) मूल त्रिकोण में ग्रह (जैसे शुक्र १२° पर)-यह उच्च से अधिकार में कुछ कम है, परन्तु उच्च के सद्गुण ही शुभ फल देता है ।
( ५ ) स्वक्षेत्री ग्रह (जैसे मिथुन का बुध)-फल की वृद्धि करता है । शुभ सद्गुण फल देता है । इसका फल मूल त्रिकोण से कुछ हल्का है ।
( ६ ) मित्र क्षेत्री ग्रह (जैसे मेष का सूर्य)-फल वृद्धि करता है, अशुभ फल कम देता है ।
( ७ ) अधिमित्र गृही ग्रह-शुभ फल दायक होता है ( पंचधा मैत्री के अनुसार अधि मित्र लेना ) ।
( ८ ) उच्च या मित्र, या बलवान ग्रह से युक्त या दृष्ट ग्रह-शुभ होता है । जैसे मीन का शुक्र उच्च का होता है, यह बुध के साथ चतुर्थ भाव में हो तो बुध अच्छा फल देगा । या बुध चतुर्थ में हो उस पर दसम भाव से उसका मित्र शुक्र पूर्ण दृष्टि से देखता हो तो शुभ है ।
( ९ ) सप्त क्षेत्री ग्रह (जैसे शनि की राशि मकर में बैठा मंगल)-सप्त फल देता है
( १० ) शत्रु क्षेत्री ग्रह-(जैसे बुध चंद्र के स्थान कर्क में हो)-अशुभ और हानि कारक होता है ।
( ११ ) ग्रह नीच का होकर शत्रु क्षेत्री भी हो-तो उस भाव का फल नाश करता है । जैसे तुला का नीच सूर्य अपने शत्रु शनि की राशि ११ में बैठा हो ।
( १२ ) मित्र राशि या उच्च राशि में स्थित पाप ग्रह भी-शुभ हो जाता है । जैसे मकर का मंगल जो उच्च का है या सिंह का मंगल अपने मित्र सूर्य के घर का ।
( १३ ) शुभ ग्रह यदि नीच या शत्रु गृही या अस्त हो तो बुरा फल देता है । जैसे नीच मकर का गुरु या शत्रु स्थानी मिथुन का गुरु या अस्त सूर्य के साथ गुरु ।
( १४ ) पाप ग्रह नीच का सब फल नाश करता है जैसे कर्क का मंगल ।
( १५ ) अस्त ग्रह ( जो सूर्य के साथ रहने से अस्त हो )-अशुभ है बुरा फल देता है ।
२४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
( १६ ) शुभ ग्रह उदय हो (अस्त न हो) और वक्त्री हो और निर्मल कांति हो अर्थात् देखने में प्रकाशवान दिखे तो अच्छा फल देता है ।
( १७ ) पाप ग्रह वक्त्री हो तो अशुभ है !
( १८ ) पाप ग्रह युक्त या भाव स्वामी के शत्रु से युक्त या दृष्ट ग्रह अनिष्ट फल देता है । जैसे चतुर्थ में वृश्चिक का बुध पाप ग्रह राहु से युक्त हो तो पाप युक्त होने से बुध बुरा हुआ । यदि दशम स्थान में वृष का राहु है जो चतुर्थम मंगल का शत्रु है तो बुध पर राहु की दृष्टि पड़ने से बुरा फल देगा ।
( १९ ) शुभ ग्रह जैसे शुभ या अशुभ स्थान में हो उसके शुभ या अशुभ फल को बढ़ाते हैं ।
पाप ग्रह अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के फलों को घटाते हैं । इसलिए शुभ ग्रह शुभ स्थान में अति शुभ और अशुभ ग्रह अशुभ स्थान में हो तो उसके अशुभ फल को कम करने के कारण अच्छे होते हैं और अशुभ ग्रह शुभ घर में बैठ कर उसके शुभ प्रभाव को घटाने के कारण हानिकारक होते हैं ।
( २० ) शुभ स्थान=१, ४, १०, ५, ९, ११ भाव । सदा अशुभ स्थान=६, ८, १२ अशुभ स्थान=२ और ७ घर मारक स्थान हैं । इनमें अशुभ ग्रह हों तो ये अशुभ होते हैं । परन्तु इनमें शुभ ग्रह हो तो समान भाव हो जाता है ।
सम स्थान=३ भाव ( यह न शुभ है और न अशुभ है ) ।
( २१ ) ग्रह जिस स्थान को देखता है उसके बल को बढ़ाता है । यदि भाव स्वामी होकर उस भाव को देखे तो अच्छा फल देता है । जैसे लाभ स्थान में मिथुन का गुरु पंचम भाव अपने स्वस्थान ( धन राशि ) को पूर्ण दृष्टि से देखता है तो पंचम भाव का फल अच्छा होगा ।
( २२ ) बुरे भी ग्रह हों परन्तु अच्छे घर में हों जैसे त्रिकोण, केन्द्र या लाभ में तो अच्छा फल देते हैं । जैसे सूर्य पाप ग्रह है परन्तु दशम ( केन्द्र ) स्थान में अच्छा होता है ।
( २३ ) शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तो अच्छा फल देते हैं ।
( २४ ) ग्रह जो ३, ६, ११ या, २, ७, ८ भाव के स्वामी न हों तो शुभ फल देते हैं ।
( २५ ) ग्रह जो एक दूसरे से १-१२ भाव में या ६-८ घर में हों तो बुरा प्रभाव करते हैं ।
अर्थात् एक ग्रह दूसरे भाव में हो और दूसरा उससे बारहवें भाव में हो तो उसका सम्बन्ध बुरा है । या एक छठे दूसरा वहाँ से आठवें स्थान में हो तो उनका सम्बन्ध बुरा होता है । जैसे लून में मंगल है और छठे स्थान में शनि है तो ये एक दूसरे से ६-८ स्थान में हुए । मंगल पूर्ण दृष्टि से शनि को देखता है तो दृष्टि द्वारा सम्बन्ध हो गया यह बुरा है ।
फलित विचार करने के लिए संक्षेप में कुछ साधारण नियम : २४५
( २६ ) भाव में पाप ग्रह हों या उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो उस भाव की वृद्धि होती है । जैसे पंचम भाव में शुक्र शुभ ग्रह हो या उसकी दृष्टि हो तो अच्छा है ।
( २७ ) भाव में पाप ग्रह हो या उस पर पाप दृष्टि हो तो बुरा फल देता है । जैसे चतुर्थ में शनि हो उसकी दृष्टि हो तो बुरा है ।
( २८ ) यदि भाव में शुभ और अशुभ ग्रह दोनों हों तो मिश्रित फल होगा । या भाव पर शुभ और अशुभ दोनों की दृष्टि हो तो मिश्रित फल होगा ।
( २९ ) जिस भाव में नीच या शत्रुक्षेत्री ग्रह हों उस भाव की हानि करते हैं । यदि स्वक्षेत्री; मूलत्रिकोण, उच्च के या मित्रक्षेत्री ग्रह हों तो वह भाव शुभ फल देता है ।
( ३० ) भाव, शुभ ग्रह या भावेश युक्त या दृष्ट हो और पापयुक्त या दृष्ट न हो तो शुभ फल होता है ।
यदि पाप युक्त या दृष्ट होने से शुभ फल देने वाले भी बुरे हो जाते हैं । और शुभ युक्त या दृष्ट होने से अशुभ फल देने वाले भी अच्छे हो जाते हैं ।
( ३१ ) भाव में, भाव स्वामी के अतिरिक्त यदि शुभ ग्रह अस्त, नीच या शत्रु स्थानी हो तो अच्छा फल नहीं देता ।
यदि पाप ग्रह अस्त नीच या शत्रुस्थानी हो तो भाव फल को पूर्ण नाश कर देता है ।
( ३२ ) भाव में शुभ स्थान का स्वामी हो या उसकी दृष्टि हो और वह भाव दुष्ट ग्रह या दुष्ट भावेश के साथ न हो या इनकी दृष्टि न हो तो अच्छा फल देता है ।
( ३३ ) बुरे या भले भाव किसी ग्रह से युक्त या दृष्ट न हों तो मध्यम फल देते हैं ।
( ३४ ) जिस भाव में लग्नेश हो उस भाव की उत्पत्ति होती है ।
( ३५ ) भावेश-मित्र गृही, स्वगृही, मूलत्रिकोण या उच्च का हो तो अच्छा फल देता है ।
यदि अष्टम में या अस्त या शत्रु या नीच राशि में हो और शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट न हो तो भाव फल नाश हो जाता है ।
( ३६ ) भावेश, पाप ग्रह भी हो परन्तु नीच, अस्त या शत्रुगृही न हो तो ऐसे भावेश से युक्त या दृष्ट भाव बुरा नहीं होता ।
( ३७ ) भावेश अपनी राशि में उच्च का हो परन्तु नवांश में नीच का हो तो अच्छा फल नहीं देता ।
इसी प्रकार अपनी नीच राशि में होकर अपने नवांश में उच्च राशि का हो जावे तो अच्छा फल देता है ।
२४६ : सचित्र ज्यो.तेष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
जैसे मीन का शुक्ल राशि में उच्च का है और अपने नवांश में कन्या राशि का अर्थात् नीच का हो जावे तो अच्छा फल नहीं देगा। यदि राशि में कन्या ( नीच ) राशि का शुक्ल हो परन्तु नवांश में मीन ( उच्च ) का हो जावे तो अच्छा फल देगा : (नवांश निकालना अन्त में बताया है)।
(३८) भावेष अस्तंतगत या नीच का हो तो केन्द्र या त्रिकोण में रहने पर भी शुभ फल विशेष रूप से नहीं देता, अङ्गचन और कष्ट के उपरान्त फल देता है।
( ३९ ) किसी भाव का फल, पहिले भावेष से विचारना, क्योंकि भावेष, उस भाव का स्वामी है और भावस्थित ग्रह उस भाव रूपी घर का किरायेदार ठहरा। भाव में बैठे शुभ ग्रह उस भाव को बाहरी चमक-दमक अवश्य देता है, परन्तु भावेष के बारे होने पर भाव से उत्पन्न फल की प्राप्ति में अङ्गचन होती है। इस कारण भावस्थ ग्रह से भावेष प्रबल है।
( ४० ) भावेष, लग्न से केन्द्र या त्रिकोण या लाभ में हो तो वह भाव फल की वृद्धि करता है।
( ४१ ) ३, ६, ८ या ११ भाव के स्वामी जिस भाव में हों, बारे होते हैं। ५ और ९ भाव के स्वामी अच्छे होते हैं।
केन्द्र स्थानों के स्वामी यदि शुभ ग्रह हों तो बारे फल देते हैं।
केन्द्र स्थानों के स्वामी यदि पाप ग्रह हो तो अच्छे फल देते हैं।
( ४२ ) लगनेश जिस भावेष के साथ हो उस भाव के फल की वृद्धि करता है, परन्तु लगनेश यदि अष्टमेश के साथ हो तो उस भाव की हानि करता है। लगनेश जिस भाव में हो या जिस भाव स्वामी के साथ हो उस भाव का वह फल देगा, परन्तु भाव स्वामी बली हो तब अच्छा फल देगा. यदि बलहीन हो तो दुःख देगा।
( ४३ ) लगनेश यदि अष्टशे मे भी हो जाय तो शुभ समझा जाता है।
( ४४ ) लगनेश ६, ८, १२ भाव के स्वामियों के साथ हो तो बुरा है। लगनेश जहाँ है उस भाव का स्वामी ६, ८, १२ भाव में हो तो बुरा है।
( ४५ ) लगनेश अष्टम में हो परन्तु शुभ दृष्टि हो तो बुरा फल नहीं देता।
( ४६ ) लगनेश जिस ग्रह से युक्त या दृष्ट है उस ग्रह का स्वस्थान क्या है मालूम करो, लगनेश के प्रभाव से उसी स्थान के फल में वृद्धि होगी, जैसे नवम स्थान में लगनेश बुध कुम्भ राशि का है वह चन्द्र से युक्त है, चन्द्र का स्वस्थान कर्क है, जो धन भाव में है तो बुध लगनेश के प्रभाव से नस स्थान की वृद्धि होगी।
( ४७ ) जिस भाव या भावेष या ग्रह के एक ओर पाप ग्रह हो और दूसरी ओर शुभ ग्रह हो तो मिश्रित फल देगा। यदि दोनों ओर शुभ ग्रह हैं तो शुभ फल देगा। यदि दोनों ओर पाप ग्रह हैं तो पाप ग्रहों से धिरा रहने के कारण बुरा फल देगा। जैसे तीसरा भाव लो, इसके एक ओर दूसरे भाव में मंगल हो और चौथे भाव में शनि हो तो यह भाव दोनों ओर पाप ग्रहों से धिरा जाने के कारण बुरा
फलित विचार करने के लिए संक्षेप में कुछ साधारण नियम : २४७
है। यदि दूसरे भाव में गुह है और चौथे भाव में शक्र हो तो यह शुभ ग्रहों से घिरा होने के कारण अच्छा है। यदि दूसरे भाव में शनि और चौथे भाव में गुह हो तो एक और शुभ और दूसरी ओर अशुभ से घिरा होने के कारण मिथित फल देगा।
( ४८ ) यदि कोई भाव स्वामी पाप ग्रह हो और तीसरे घर में पङ्ग जाय तो अच्छा फल देगा। परन्तु शुभ ग्रह तीसरे घर में पङ्ग जाय तो मध्यम फल देता है।
( ४९ ) त्रिषडाय ( ३, ६, ११ भाव ) ये अशुभ स्थान कहलाते हैं, क्योंकि इनके स्वामी शुभ ग्रह हों तो बुरे होते हैं और पाप ग्रह हों तो शुभ फल देते हैं।
( ५० ) त्रिक स्थान ( ६-८-१२ भाव )—दुष्ट स्थान है, शुभ ग्रह त्रिक में उस भाव के फल की हानि करते हैं और पापग्रह उस भाव की वृद्धि की हानि करते हैं।
( ५१ ) किसी भाव का स्वामी त्रिक में हो या त्रिकेश जिस भाव में हो उस भाव के फल का नाश होता है। परन्तु शुभ ग्रह उसे देखता हो तो शुभ हो जाता है। जिस भाव का स्वामी त्रिक में हो वह उस भाव के अच्छे फल को बुरा और बुरे फल को अच्छा करता है।
( ५२ ) कोई भाव स्वामी जिस राशि में हो उस राशि का स्वामी यदि दुष्ट स्थान में हो तो उस भाव की सब बातों में बुरा फल देगा।
( ५३ ) कोई दुष्ट स्थान (त्रिक) का स्वामी अपने स्वस्थान में हो और उसका यदि दूसरा भी स्वस्थान हो जो दुष्ट भाव में पड़ता हो तो वह दुष्ट स्थान का भी स्वामी कहलायगा, परन्तु उस दुष्ट स्थान का फल न देगा, अपने ही स्थान का जहाँ पर वह है, फल देगा। जैसे लाभ स्थान में मेष का मंगल स्वस्थानी है, इसका दूसरा स्वस्थान वृश्चिक छठे घर में पड़ने से यह मंगल षष्टेश भी हुआ, परन्तु उसका हानि कारक फल न देगा, लाभ स्थान का ही फल देगा।
( ५४ ) किसी भाव का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हो तो अच्छा फल देगा।
( ५५ ) केन्द्र में शुभ ग्रह हो यदि वे केन्द्र स्वामी न हों तो बहुत शुभ होते हैं। क्योंकि केन्द्र स्वामी शुभ ग्रह बुरा फल देता है और पाप ग्रह केन्द्रेश हो तो अच्छा फल देता है।
( ५६ ) यदि पाप ग्रह केन्द्रेश होकर त्रिषडाय पति भी हो तो पाप कारक होते हैं। यदि पाप ग्रह केन्द्रेश होकर त्रिकोणेश भी हों तो शुभ फल देने में बलवान होते हैं।
( ५७ ) चार शुभ ग्रहों में से केन्द्रेश होने पर कौन सब से बुरा है इसका विचार-गुह शुक्र में विशेष शुभता होने से विशेष बुरे है।
बुध कर्मों पाप ग्रह के साथ रङ्ग जाने से पाप ग्रह हो जाता है, इससे गुह शुक्र की अपेक्षा बुध में अल्प दोष आता है।
चन्द्रमा ये पूर्ण रहने से शुभ है कीग होने से पाप हो जाता है, इससे बुध की अपेक्षा चन्द्र का दोष न्यून होता है। अर्थात् सब शुभ ग्रहों में चन्द्रमा में बहुत कम बुरा फल होता है।
२४८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
( ५८ ) त्रिकोण में लग्न भी ली जाती है।
पंचम नवम भाव में चाहे शुभ या अशुभ ग्रह हों शुभ फल देते हैं।
( ५९ ) उच्च का ग्रह त्रिकोण में बहुत अच्छा होता है, परन्तु नीच का ग्रह त्रिकोण में बुरा फल देता है।
( ६० ) केन्द्र स्वामी का शुभ फल का परिणाम परिश्रम से होता है। परन्तु त्रिकोण में बुरा फल देता है।
( ६१ ) केन्द्रेश या त्रिकोणेश यदि त्रिक स्थान में हो तो अपने सम्बन्ध वाले भाव में अशुभ प्रभाव डालते हैं।
( ६२ ) कोई भावेश अपने भाव से केन्द्र या त्रिकोण में पड़े तो शुभ फल देता है। जैसे तृतीयेश बुध, तीसरे भाव से केन्द्र ( सप्तम ) में पड़े अर्थात् तीसरे भाव से सातवाँ, नवम भाव आया तो यदि नवम भाव में तृतीयेश बुध पड़े तो शुभ फल देगा।
( ६३ ) यदि केन्द्रेश त्रिकोणेश के साथ हो तो अच्छा है। यदि दूसरे त्रिकोण के स्वामी से भी योग या दृष्टि द्वारा सम्बन्धित हो तो बहुत अच्छा फल देता है। जैसे वृष लग्न है, चतुर्थ में सिंह का सूर्य और बुध हैं तो केन्द्रेश सूर्य है, त्रिकोणेश ( पंचमेव ) बुध का यहाँ साथ हो गया। तब दूसरा त्रिकोणेश ( नवमेव ) शनि है, यदि वह दशम स्थान में स्वस्थानी है, चतुर्थ के ग्रहों को देखता है तो अच्छा है।
( ६४ ) द्विदोष भाव ( १-१२ भाव ) विचार।
घनेश और व्ययेश अपने स्वभाव अनुसार फल नहीं देते। ये जिस शुभ या अशुभ घर में रहते हैं या जिस शुभ या अशुभ भावेश के साथ रहते हैं या जिस स्थान के वे स्वामी हैं वहाँ जैसी शुभ या अशुभ राशि हो उसीके अनुसार शुभ या अशुभ फल देते हैं। अर्थात् २ और १२ भाव के स्वामियों का स्वतः का कोई विशेष गुण दोष नहीं है, उनके गुण दोष विचारने को देखो कि इन भावेश की राशि का स्वामी किस भाव में है ये किस ग्रह के साथ है और ये भावेश किस भाव में पड़े हैं। इन तीनों रीति से इनका गुण दोष विचारना। अर्थात् २-१२ भाव के स्वामी शुभस्थान में या शुभ युक्त हो तो शुभ हैं। यदि अशुभ स्थान ( ६-८-१२ भाव ) में या अशुभ युक्त हों तो अशुभ हैं।
( ६५ ) छठा भाव यह श्लृण रोग शत्रु का प्रमुख स्थान है, यदि पाप ग्रह इसमें हो तो उस भाव के बुरे फल को नष्ट करेगा अर्थात् इनके नाश होने से वह सुखी होगा। यदि शुभ ग्रह हो तो इनको बढ़ने नहीं देंगा, परन्तु अधिक लाभ नहीं कर सकते। यदि छठे भाव का स्वामी अपने घर वृष में हो तो अच्छा समझा जाता है।
( ६६ ) अष्टम भाव में सूर्य चन्द्रमा बलवान नहीं होते, परन्तु ये अष्टमेव हों तो अच्छे समझे जाते हैं। और अष्टमेव यदि लगनेश भी हो तो वह अच्छा समझा जाता है।
फलित विचार करने के लिए संक्षेप में कुछ साधारण नियम : २४९
अष्टमेय अशुभ है परन्तु यह त्रिकोणश भी हो तो शुभ है । अष्टमेय त्रिपङ्क्य का भी स्वामी हो तो अशुभ कारक है । अष्टम में शुभ ग्रह हो तो अशुभता कम हो जाती है और कुछ शुभ भी हो जाता है । जिस भाव में अष्टमेय हो उस भाव का नाश हो जाता है ।
( ६७ ) व्ययेय व्यय भाव में हो तो शुभ समझा जाता है ।
( ६८ ) पाप ग्रह १, ८, १२ भाव में बुरा फल करते हैं । क्षीण चन्द्र १, ६, ८, १२ भाव में अशुभ है । पाप ग्रह ३, ६, ११ भाव में अच्छे हैं । शुभ ग्रह सब स्थानों में अच्छा फल देते हैं । गुरु शुक्र सदा शुभ हैं चाहे वे नीच के हों या ऐशों के साथ हों । परन्तु बुरी परिस्थिति में रहने के कारण उनकी शलाई करने की शक्ति घट जाती है ।
व्ययेय के विचार से स्थानों के स्वामियों की अच्छाई बुराई का विचार—किसी भी भाव के व्ययेय से उस भाव के स्वामी की स्थिति पर विचार ।
१ लगनेश—यह धन भाव का व्ययेय हुआ, धन अपने तन की रक्षा के लिए व्यय कराने में, लगनेश शुभ हुआ ।
२ द्वितीयेश—यह तृतीय भाव का व्ययेय हुआ । तृतीय भाव सहज पराक्रम और आयु का स्थान है । इस कारण इसके व्यय कारण होने से द्वितीयेश अशुभ और मारक कहलाता है ।
३ तृतीयेश—यह चतुर्थ का व्ययेय हुआ । चतुर्थ से सुख आदि का विचार होता है । इससे तृतीयेश यह सुख का व्ययकारक होने से अशुभ होता है ।
४ चतुर्थेश—यह पंचम का व्ययेय हुआ । पंचम विद्या का स्थान है यदि वह पापी होकर विद्या का नाश करता है तो उचित ही है । यदि शुभ होकर विद्या का नाश करता है तो अनुचित है । इस कारण चतुर्थेश शुभ हो तो अशुभ और पाप ग्रह हो तो शुभ कारक कहा जाता है ।
५ पंचमेय—यह षष्ठ भाव का व्ययेय हुआ । षष्ठ रोग, शत्रु आदि का स्थान है, उसका नाशक पंचमेय हुआ । इससे पंचमेय अच्छा कहा जाता है ।
६ षष्ठेश—यह सप्तम स्थान का व्ययेय हुआ । इस कारण सप्तम स्त्री का नाशक षष्ठेश हुआ ।
७ सप्तमेय—अष्टम का व्ययेय हुआ । अष्टम आयु का स्थान है जिसका नाशक सप्तमेय हुआ, जिससे सप्तमेय मारक कहलाया ।
८ अष्टमेय—यह नवम का व्ययेय हुआ । नवम भाग्य का स्थान है, जिसका व्ययकारक होने से अष्टमेय अशुभ हुआ ।
९ नवमेय—यह दशम भाव का व्ययेय है । दशम कर्म स्थान अर्थात् संसार का बन्धन है । इस कारण सांसारिक बन्धन अर्थात् कर्म का व्यय करने वाला होने के कारण नवमेय शुभ हुआ ।
२५० : सचिन ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
१० दशमेश—यह लाभ स्थान का व्ययेश है । लाभ का व्यय अर्थात् हानिकारक होने से यह अशुभ कहलाता है ।
दशमेश पाप ग्रह होकर अशुभत्व के फल का नाशक होने से शुभ समस्या जाता है और शुभ ग्रह अशुभ बढ़ाने के कारण बुरा समस्या जाता है ।
११ लाभेश—यह व्यय का व्ययेश हुआ । व्यय का नाश करता है । खर्च नहीं होने देने के कारण बुरा है, क्योंकि पैसा रहने पर भी व्यय नहीं करने दे तो आवश्यक सामग्री अन्य वस्त्र आदि प्राप्त करना कठिन हो जायगा । इससे लाभेश अशुभ कहा गया है ।
१२ व्ययेश—यह लग्न का व्ययेश है । लग्न शरीर है उसका व्ययकारक होने से यह अशुभ हुआ ।
इससे प्रगट हुआ कि—
त्रिषडाय—( ३-६-११ ) भाव के स्वामी पापकारक होते हैं ।
त्रिकोण—( ५-९ ) भाव के स्वामी शुभ कारक होते हैं ।
केन्द्र के स्वामी—शुभ हों तो अशुभकारक होते हैं । और पाप हों तो शुभकारक होते हैं ।
२-५-१२ भाव के स्वामी—अपने साथी और स्थान आदि के अनुसार फल देते हैं । २ और ७ भाव—मारक स्थान हैं—इनके स्वामी मारकेश कहलाते हैं ।
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अध्याय ४५
गोचर विचार
गो का अर्थ है तारा ( नक्षत्र या ग्रह ) और चर अर्थात् चलना । सूर्यादि नवग्रह प्रतिदिन दैनिक गति के प्रमाण से प्रमण करते हैं, जिनकी साप्ताहिक या दैनिक स्थिति पंचांग में दी रहती है ।
इन्हीं ग्रहों की गति के अनुसार भिन्न भिन्न समय में भिन्न राशियों पर ग्रह सदा चलते रहते हैं और उस प्रमण से जो प्रभाव भिन्न राशियों पर पड़ता है उसे गोचर फल कहते हैं ।
गोचर के अनुसार ग्रह का फल जानने की यह रीति है कि जन्म समय के चन्द्र की जो अपनी राशि हो, उसको प्रथम स्थान मान कर उसपर से प्रत्येक स्थान के फल का क्रमानुसार विचार होता है । उसी जन्म राशि को प्रथम स्थान मान कर उसपर प्रत्येक ग्रह का स्थान गिनकर जानना चाहिए । जैसे किसी की कुम्भ राशि है तो जब
गोचर विचार : २५१
कभी गोचर फल देखना हो तो पंचांग में जो कुण्डली ग्रहस्थिति के अनुसार दी रहती है उस कुण्डली में जहाँ कुम्भ राशि दी हो उसे पहिला स्थान माने और उसके आगे के स्थानों की क्रमानुसार गणना करो। तन धन आदि द्वादश स्थान लान-कुण्डली में जैसे गिनते हैं उसी प्रकार यहाँ भी पहिले स्थान को तन स्थान समझ कर स्थानों की गणना करना।
उदाहरण के लिए सम्वत् २००२ आषाढ़ कृष्ण अमावस्या की कुंडली पंचांग से ली। जन्म राशि कुम्भ का विचार करना है।
जन्म समय चन्द्र कुंभ राशि का था, इस कारण राशि कुंभ कहलाई। पंचांग की कुण्डली को घुमाकर इस प्रकार रखो कि अपनी राशि लान स्थान पर आ जावे।
पंचांग में दी हुई कुण्डली
अपनी गोचर कुण्डली
कुम्भ राशि को लान स्थान में लिख कर शेष राशियां क्रमानुसार बाईं ओर से लिख कर उसमें वे ही ग्रह स्थापित कर दो जो पंचांग की कुंडली में दिये हैं, तो अपनी गोचर कुंडली बन जायगी, जैसा यहाँ बताया है। जिस राशि पर जो ग्रह पंचांग की कुंडली में दिये रहते हैं उसी के अनुसार गोचर कुंडली में रहते हैं, केवल अन्तर यही रहता है कि पंचांग में सूर्य जिस राशि पर रहता है वह लान के स्थान में सबसे ऊपर दिया रहता है, अपनी गोचर कुंडली में लान स्थान पर अपनी राशि रहती है। अपनी इसी गोचर कुण्डली पर से फल का विचार करना पड़ता है।
अपनी कुण्डली में मेष का मंगल तीसरे स्थान में है और वृष का शुक्र चौथे स्थान में है। पंचम में मिथुन का सूर्य चन्द्र शनि और राहु हैं। षष्ठ में कर्क का वृध, अष्टम में कन्या का गुरु और लाभ स्थान में धन का केतु है। वस, इसी के अनुसार फल का विचार करना पड़ेगा।
गोचर फल विचारने का चक्र प्रत्येक पंचांग में दिया रहता है उससे देख लेना। इसका पूरा फल विचारना पृथक फलित खण्ड में दिया जायगा।
२५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
जन्म राशि और जन्म लग्न में क्या अन्तर है ध्यान में रखना चाहिए। जन्म समय जो राशि पूर्व में उदय हो रही है वह जन्म लग्न है और जन्म समय चन्द्रमा जिस राशि में रहता है वह राशि जन्मराशि कहलाती है। यहाँ गोचर फल जन्मराशि से विचार किया जाता है।
अध्याय ४६
शनि का विशेष विचार
साडेसाती शनि
शनि का प्रभाव इतर ग्रहों को अपेक्षा विशेष देखने में आता है, क्योंकि शनि अधिकतर दुःख प्रगट करता है। यह एक राशि में लगभग २।। वर्ष रहता है। शनि का पूरा फेरा २९ वर्ष ५ मास १५.६ दिन में होता है। शनि बुरे स्थान में होने से कोई बुरा प्रभाव उत्पन्न करता है तो सबसे अधिक समय तक शनि के प्रभाव से ही दुःख भोगना पड़ेगा। इस प्रकार शनि लगातार ऐसी ३ राशियों में रहता है जिनका प्रभाव जातक पर बुरा पड़ता है तो लगातार ७।। वर्षों तक शनि का बुरा प्रभाव जातक को भोगना पड़ता है। उस समय शनि की साडेसाती आई है ऐसा कहते हैं।
जन्म समय चन्द्रमा जिस राशि पर हो वह जन्मराशि कहलाती है। जब शनि अपनी जन्म राशि के समीप की राशि पर आता है तो वह पीड़ा देना आरम्भ करता है। यह राशि जन्मराशि से बारहवीं होती है। वहाँ २।। वर्ष शनि रहता है। फिर आगे चल कर शनि जब जन्मराशि में आता है तो यहाँ भी २।। वर्ष रहता है। उपरान्त जन्म राशि से दूसरी राशि पर भी शनि २।। वर्ष रहता है।
शनि का विशेष विचार : २५३
इस प्रकार जब लगातार ३ अशुभ स्थानों में शनि ७। वर्ष रहता है तब इसी को साड़ेसाती कहते हैं। इस कुण्डली में जहाँ-जहाँ पर शनि रहने से अशुभ स्थान शनि का माना गया है वहाँ + चिह्न देकर समझाया गया है। जब शनि की साड़ेसाती होती है तो इस साड़ेसाती में अशुभ फल होता है।
जिस राशि के जितने अंश पर जन्म समय चन्द्र रहता है उस राशि के समीप बारहवें स्थान पर जब शनि का प्रवेश होता है तो साड़ेसाती का आरम्भ होता है, और शनि नेश पर आया है ऐसा कहते हैं। शनि जब जन्मराशि और उसके अंश पर आ- है तो साड़ेसाती का मध्य भाग होता है उस समय शनि उदर में आया कहते हैं जन्म राशि के आगे के (दूसरे) स्थान में अंश के बराबर शनि आता है तो साड़ेसातों अन्त्य भाग में प्रवेश हुआ है या शनि चरणों में आया है ऐसा कहते हैं। इस प्रकार जन्मराशि से बारहवाँ, पहिला और दूमरा स्थान तक शनि रहने के काल को शनि की साड़ेसाती कहते हैं।
इस काल में नाना प्रकार के कष्ट और भिन्नर मनुष्यों को जन्म कुण्डली के अनुसार शनि के प्रभाव से भिन्नर प्रकार की आपत्तियाँ आती हैं। इस में किसी की मृत्यु होती है, किसी के माना पिता का मरण होता है, किसी की स्त्री की मृत्यु होती है, किसी का घर जलता है, किसी की जीविका जाती है इत्यादि अनेक प्रकार के संकटमय प्रसंग आते हैं। परन्तु विशेष परिस्थिति में यह कभीर शुभ फल भी देता है। जब शनि की अशुभ साड़ेसाती हो तो लोहे की अंगूठी पहिरना, शनि की उपासना करना, जप दान आदि करना चाहिए।
किसी को भी साड़ेसाती आने पर फिर ३० वर्ष में साड़ेसाती आती है। एक मनुष्य को ३ बार से अधिक साड़ेसाती नहीं आती। चौथी साड़ेसाती लाखों में बिरला मनुष्य भोगता है।
शनि की साड़ेसाती का शुभाशुभ जो फल मिलता है नीचे चक्र में बताया है कि किस राशि वाले को किस प्रकार पीडा आदि देता है।
| राशि समय और प्रभाव | राशि समय और प्रभाव |
|---|---|
| १ मेष बीच के २।। वर्ष अनिष्ट | ७ तुला अंत के २।। वर्ष अनिष्ट |
| २ वृष आरंभ के २।। वर्ष अनिष्ट | ८ वृश्चिक पहिले २।। वर्ष अच्छे शेष अनिष्ट |
| ३ मिथुन अन्तके " " | ९ धन अंत के २।। अच्छे शेष अनिष्ट |
| ४ कर्क पहिले २।। वर्ष अच्छे शेष अनिष्ट | १० मकर २।। वर्ष किंचित् अनिष्ट |
| ५ सिंह अन्त के २।। श्रेष्ठ शेष अनिष्ट | ११ कुंभ सब अच्छा |
| ६ कन्या पहिले २।। वर्ष अनिष्ट | १२ मीन अंत के २।। वर्ष अनिष्ट |
मतान्तर—कोई कहते है धन के पूर्ण ७।। वर्ष अनिष्ट, मकर के पहिले ५ वर्ष और कुंभ के पहिले २।। वर्ष अनिष्ट कारक होते है।
२५४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
विशेष अनुभव से यह सिद्ध हुआ है कि साढ़े सातों का शुभाशुभ फल जातक के जन्म शनि के ऊपर निर्भर है।
जब शनि जन्म राशि से
१२ वें स्थान में आता है तो—शरीर कष्ट, अधिक खर्च, व्यापार में अड़चन, धन की हानि और शरीर नेत्र में पीड़ा करता है।
जन्म स्थान में आता है तो—उदर विकार, जमीन-सम्पत्ति तथा पशु-वाहन की हानि, अधिकारियों से मनमुटाव और अपयश करता है।
दूसरे स्थान में आता है तो—निरर्थक आज्ञा, कुटुम्ब तथा शत्रु विरोध, कुटुम्ब वियोग, राजमार्ग में झंझट उत्पन्न हो।
शनि का स्वस्थान मकर और कुम्भ है। जब शनि अपने स्वस्थान या उच्च स्थान पर आता है तो जन्मकुण्डली की स्थिति के अनुसार वह जातक को लाभ भी करता है।
अर्द्धेया का चरण विचार—
जब शनि जन्मराशि से चतुर्थ या अष्टम स्थान में होता है तो उसे अर्द्धेया शनि कहते हैं। इसमें भी शनि कष्ट देता है, जिसका फल इस प्रकार होता है :—
चतुर्थ में—शरीर तथा माता पिता को कष्ट, राज मार्ग से चिता, सम्पत्ति सम्बन्धी झंझट, धन खर्च।
अष्टम में शरीर व शत्रु भय, मानसिक चिन्ता और धन का अपव्यय।
शनि का चरण विचार—
शनि जब एक राशि छोड़ कर दूसरी राशि में जावे उस समय देखो शनि अपनी जन्म राशि से कितने स्थान में है, उसके अनुसार निम्नलिखित फल का विचार करना।
१-६-११ स्थान में हो तो—शुवर्णपाद=फल=सौख्य फल।
२-५-९ ,, ,, =रजत पाद=फल=हर्ष काम फलप्रद।
६-७-१० ,, ,, =ताम्र पाद=फल=मध्यम फल प्रद।
४-८-१२ ,, ,, लोह पाद =फल दुःख दारिद्र्य दायक।
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अध्याय ४७
आयुर्दोष
आयु के ३ भेद हैं। ( १ ) अल्पायु, ( २ ) मध्यायु, ( ३ ) दीर्घायु। साधारण प्रकार से आयु का विचार लगनेश और अष्टमेश से होता है।
अनुदाँय : २५५
दीर्घायु मध्यमायु अल्पायु आयु ( ८० से १२० वर्ष तक ) ( ४० से ८० वर्ष तक ) ( ३० से ४० वर्ष तक ) लन्मेश चर स्थिर द्विस्वभाव चर स्थिर द्विस्वभाव चर स्थिर द्विस्वभाव अष्टमेश चर द्विस्व० स्थिर स्थिर चर द्विस्व० द्विस्व० स्थिर चर
स्पष्टीकरण
( १ ) दीर्घायु—लन्मेश अष्टमेश दोनों चर राशि में हों या एक स्थिर दूसरा द्विस्वभाव राशि में हों ।
( २ ) मध्यमायु—लन्मेश अष्टमेश में से एक चर दूसरा स्थिर में या दोनों द्विस्वभाव में हों ।
( ३ ) अल्पायु—लन्मेश अष्टमेश में से एक चर दूसरा द्विस्वभाव में हो या दोनों स्थिर राशि में हों ।
१ इस प्रकार राशि जिसमें लन्मेश ( लग्न स्वामी ) और अष्टमेश ( अष्टम स्थान का स्वामी ) हों, विचारना कि वह राशि चर स्थिर या द्विस्वभाव है । उस पर से ऊपर बताये चक्र के अनुसार आयु का विचार करना यह पहली रीति हुई ।
२ इसी प्रकार दूसरी रीति यह है कि लग्न या सप्तम भाव में चन्द्र हो तो लग्न और चन्द्र से विचार करना । यदि वहाँ चन्द्र न हो तो शनि और चन्द्र से ऊपर बताये अनुसार आयु का विचार करना ।
३ तीसरा प्रकार यह है कि लन्मेश और अष्टमेश की तरह लग्न और होरा लग्न से भी ऊपर बताये अनुसार विचार करना अर्थात् चर आदि उस राशि की संज्ञा का विचार कर आयु का विचार करना ।
इस प्रकार तीनों बताई हुई रीति से या २ प्रकार की रीति से जो आयु प्राप्त हो नीचे चक्र के अनुसार आयु का विचार करना ।
| आयु | दीर्घायु | मध्यमायु | अल्पायु |
|---|---|---|---|
| आयु वर्ष | १२० | १०८ | १३ |
| कितने प्रकार से | ३ | २ | १ |
| आई हुई आयु |
जैसे दीर्घायु ३ प्रकार से आने पर १२० वर्ष, २ प्रकार से १०८ वर्ष केवल एक प्रकार से ९६ वर्ष । इसी प्रकार ऊपर चक्र के अनुसार आयु का विचार करना ।
इसके आगे और भी गणित द्वारा आयु स्पष्ट की जाती है । यहाँ केवल प्रारंभिक ज्ञान के लिये दिया है । पूरी आयु निकालना व लग्न और होरा लग्न गणित द्वारा निकालना गणित खण्ड में दिया है : सूक्ष्म रूप से आयुदाँय गणित करने से ही निकलता है । आरंभ में विद्यार्थी को सबसे ऊपर बताये हुए स्थूल प्रकार से आयु निकाल कर संतोष भर लेना चाहिए । जैसे
( १ ) यह महात्मा गांधी जी की कुंडली है ।
२५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
( १ ) यहाँ लगनेश शुक्र लग्न में तुला राशि का है तुला चर लग्न है ( २ ) और अष्ट मेष भी शुक्र होने से चर लग्न में हुआ, दोनों चर आने पर दीर्घायु हुई।
( १ ) दीर्घायु योग
( २ ) में लगनेश चन्द्र वृष राशि में है जो स्थिर राशि है। अष्टमेश शनि मेष चर राशि में है। एक चर दूसरा स्थिर होने से मध्यमायु हुई।
( २ ) मध्यमायु योग
( ३ ) अल्पायु योग
( ३ ) लग्न मेष है लगनेश मंगल हुआ। यह मंगल सिंह राशि में है जो स्थिर राशि है। अष्टम भाव में वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल अष्टमेश हुआ। यह मंगल स्थिर राशि सिंह में है। दोनों स्थिर राशि में होने से अल्पायु हुई।
३
मारक स्थान और मारकेश विचार : २५७
अध्याय ४८
मारक स्थान और मारकेश बिचार
जन्म कुण्डली में विशेष स्थान जिस से मुत्यु होने का विचार होता है उसे मारक
स्थान कहते हैं । मारक स्थान का स्वामी मारकेश कहलाता है 1
ज्योतिष में मृत्यु शब्द का अर्थ विस्तीर्ण है ।
यहाँ मृत्यु शब्द में-व्यथा, दुःख, भय, लज्जा, रोग, शोक, मरण तथा अपमान भी
सम्मिलित है । मारक स्थाना
(१) लग्न से अष्टम स्थान ओर
अष्टम से अष्टम स्थान अर्थात् तीसरा
स्थान ।
इन दोनों का व्यय स्थान ( वारहवाँ
स्थान अर्थात् अष्टम, का व्यय स्थान सप्तम
हुआ और तीसरे का व्यय स्थान दूसरा
भाव हुआ । अर्थात् दूसरा तीसरा सप्तम
और अष्टम स्थान, कुंडली में जहाँ चिल्ल ८00 ! ४
हैं, मारक स्थान कहाते हैं । इन चारों में द्वितीय और सप्तम मुख्य और बलवान
मारक स्थान है । इन मारक स्थानों के स्वामी मारकेश कहलाते हैं ।
मारकेश विचार ( संक्षिप्त में )
कुण्डली में अल्प, मध्य, पूर्ण आयु के -विचार के उपरांत मारकेश का विचार
करना चाहिए.
(१ ) शनि और केतु की महामारक संज्ञा है। ये मारकेश होते हैं तो गति
अनिष्ट प्रभाव पहुंचाते हैं ।
(२) सूर्य और चन्द्र को छोड़ कर शेष सब ग्रह, राहु केतु भो मारक स्थान के
स्वामी होने पर मारकेश होते हैं । छ १
( ३ ) चन्द्र जब बुरे स्थान में हो तो उसकी अंतर्दशा में भी मृत्यु हो जाती है।
( ४ ) शनि जब पाप ग्रह के साथ होतो मारकेश होने पर सव ग्रहों को दबा
कर मृत्यु कारक होता है । पक
(५ ) मारकेश की मुख्य दशा व मारक स्थान में स्थित क्र्र ग्रह की अंतदेशा म
या, पाप ग्रह की महादशा में जब पाप ग्रह का अन्तर ( अन्तर्देशा ) हो तो मृत्यु होती है।
( ६ ) बलवान ग्रह की दशा में जब वह मारकेश होता है तो मृत्युतुल्य कष्ट,
रोग, भय, शोक, अग्नि भय, चोर भय, आदि दुःखद प्रभाव उत्पन्न करता हैत
१७
२५८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
अध्याय ४६
दशासाधन
ग्रहों का जो फल होता है उस फल की प्राप्ति का समय जानने को दशा साधन करना पड़ता है ।
दशा कई प्रकार की हैं परन्तु उनमें साधारण प्रकार से मुख्य ३ दशाएँ उपयोग में आती हैं । इतर दशाओं के साधन में कुछ गणित करना पड़ता है और कहीं कहीं अधिक गणित करना पड़ता है, इस कारण उनको यहाँ छोड़ देते हैं । गणित खंड में उनका वर्णन होगा ।
३ प्रकार की दशा ।
( १ ) विशोत्तरी दशा ( २ ) अष्टोत्तरी दशा ( ३ ) योगिनी दशा ।
जन्म पत्रिका में प्रायः विशोत्तरी या अष्टोत्तरी दशा निकाली जाती है । विशोत्तरी दशा में परम आयु १२० वर्ष की और अष्टोत्तरी दशा में १०८ वर्ष की मान कर दशा साधन की जाती है ।
इन दशाओं का फल जानने के लिये जैसा ग्रह का फल होगा वैसा फल उसकी दशा में होगा । उन ग्रहों के विषय में गुण दोष अच्छी तरह जान लेना चाहिये ।
विशोत्तरी या अष्टोत्तरी दशा में से एक कोई दशा का साधन करना चाहिये । यदि शुक्ल पक्ष में रात्रि समय जन्म हो तो विशोत्तरी दशा और कृष्णपक्ष में दिन का जन्म हो तो अष्टोत्तरी दशा लेनी चाहिये ।
शुक्ल पक्ष में दिन के समय या कृष्ण पक्ष में रात्रि के समय जन्म हो तो योगिनी दशा साधन करना चाहिये । परन्तु बहुधा ज्योतिषी लोग विशोत्तरी और योगिनीदशा दोनों साधन करते हैं । अष्टोत्तरी दशा अधिकतर दक्षिण तथा गुजरात में प्रचलित है । मुख्य दशा होने के कारण यहाँ केवल विशोत्तरी दशा निकालना बतलाते हैं ।
विशोत्तरी दशा साधन
विशोत्तरी दशा में परम आयु १२० वर्ष की मानी गई है । जिस नक्षत्र में अपना जन्म हुआ हो उस नक्षत्र के विचार से ग्रह की आरम्भ दशा निकाली जाती है ।
इस दशा में ग्रहों की दशा का क्रम और वर्ष एवम् उनके नक्षत्र नीचे चक्र में बताये गये हैं । कृत्तिका को आदि नक्षत्र मान कर एक एक नक्षत्र में एक एक ग्रह योगता है । इस प्रकार ९ ग्रह २७ नक्षत्र भोगने से प्रत्येक ग्रह को ३-३ नक्षत्र मिलते हैं ।
विशोत्तरी महादशा चक्र
| क्रम | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग्रह | आदित्य | चंद्र | शुक्र | राहु | बीज | शनि | बुध | केतु | शुक्र |
| (सूर्य) | (मंगल) | (गुरु) |
व्यासाघन : २५९
| संकेत | अक्षर | आ० | चं० | कु० | रा० | जी० | शा० | तु० | के० | मु० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वर्ष | ६ | १० | ७ | १८ | १६ | १९ | १७ | ७ | २० | |
| चंद्र नक्षत्र | कृतिका | रोहिणी | मृग. | आर्द्रा | पुन. | पुष्य | आश्ले. | मघा | प्रू. फा. | |
| उ. फा. | हस्त | चित्रा | स्वाती | विशा. | अनु. | ज्ये. | मूल. | प्रू. धा. | ||
| उ. धा. | श्रवण | धनि. | शत. | पू.शा. | उ.भा. | रेवती | अश्वि. | भरणी. |
ग्रहों का क्रम ऊपर दिये संकेताक्षर से पंडित लोग स्मरण रखते हैं।
ग्रह की दशा निकालना—
कृतिका नक्षत्र से अपने जन्म नक्षत्र तक गिनने में जो संख्या आवे उसमें ९ का भाग दो। जो शेष बचे आ० चं० कु० रा० जी० शा० तु० के० मु० इस प्रकार क्रम पूर्वक गिनो जो ग्रह आवे उस ग्रह की महादशा में जन्म हुआ ऐसा जानना।
जैसे आर्द्रा नक्षत्र में जन्म हुआ है तो कृतिका से आर्द्रा तक गिना ४ संख्या हुई। यह संख्या ९ से अधिक होती तो ९ का भाग देते, शेष ४ ही रहा। आ० १ चं० २ कु० ३ रा० ४ गिनने से चौथी राहु की महादशा आई।
ऊपर चक्र दिया है, उसमें गिनने की आवश्यकता नहीं है। जन्म नक्षत्र आर्द्रा के ऊपर क्रम का ४ दिया है, नीचे राहुलिखा है और नीचे १८ वर्ष लिखे हैं। इससे प्रगट हुआ कि राहु की महादशा में जन्म हुआ है और यह महादशा १८ वर्ष रहती है। आर्द्रा नक्षत्र कुछ भुक्त हो चुका होगा उसी अनुपात से राहु के वर्ष भी भुक्त हो गये होंगे। जन्म नक्षत्र कितना भुक्त हो चुका है और कितना भोगने को शेष है और पूरा नक्षत्र कितने घड़ी पल्ल का है जान कर उसी अनुपात से दशा के भुक्त वर्ष निकाले जाते हैं।
( भयात X महादशा वर्ष ) ÷ भभोग=भुक्त वर्ष मास दिन आदि।
( महादशा वर्ष—भुक्त वर्ष ) = भोग्य वर्ष महादशा के ( गणित आगे दिया है )
अंतर्दशा
महादशा का समय बहुत बड़ा रहता है। उससे सूक्ष्म समय निकालने को अंतर्दशा निकालनी पड़ती है। अंतर्दशा से भी सूक्ष्म समय प्रत्यंतर दशा में और उससे भी सूक्ष्म समय विदशा साधन करने से निकलता है। यह सब गणित खंड में दिया है। यहां केवल अंतर्दशा निकालना बतलाते हैं।
जिस ग्रह की महादशा में अंतर्दशा निकालनी हो तो पहिले उस ग्रह की अंतर्दशा होगी जिसकी महादशा है। उसके उपरान्त उसके आगे क्रमानुसार जो ग्रह चक्र में दिये हैं उनकी अंतर्दशा होगी।
अंतर्दशा के ग्रहों के वर्ष निकालने के लिये अंतर्दशा में जो ग्रह पड़ा है उस के वर्ष और महादशा के वर्ष की संख्या गुणा कर=३० १० का भाग दो तो अंतर्दशा के मास दिन आदि की संख्या निकल आयेगी। १२ मास से अधिक हो तो १२ का भाग देकर वर्ष बना लो। १० का भाग देने से जो बच रहे उसमें ३ का गुणा कर देने से