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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

३६० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

अन्य - केन्द्र में गुरु, मीन का सूर्य लग्न से त्रिकोश में हो या चन्द्रमा लग्न में हो

तो रक्त पूर्ण पृथ्वी का पालक हो (मान०) ।

१०५-केद्धमे गुरु हो तो अनेक कुयोगों को दूर करता है (मान०) केन्द्रमै गुरु भी

न हो, लग्न में शुक्र बुध न हो,दशम में मंगळ भी न हो तो जातक कुछ न कर सकेगा ।

अकेला गुरु केन्द्र या त्रिकोण में हो या लग्न में या लाभ में हो तो सब कार्य करने

में समर्थ हो और दीघं जीवो हो (मान०) ।

१०६--कोई बलो शुभ ग्रह केन्द्र में हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो सव दुःख दूर कर

सकेगा (छ० च०) ।

१०७--चंद्र सहित गुरु केन्द्र में हो, शुक्र से दृष्ट हो और कोई ग्रह नीच का न

हो तो यशस्वो राजा हो (शंभु०) ।

१८-बली होकर गुरु शुक्र या लग्नेश केन्द्र में होकर दीर्घायु और राजवल्लभ

होता है (मान०) । :

१०९-- गुरु बुध शुक्र इनमें से एक भी ग्रह केन्द्र में हो तो दीर्घायु गुणवान्‌ और

राजप्रिय हो (जैमिनि) ।

११०--बली गुर केन्द्र में हो तो सुवर्ण वस्त्र सम्पत्ति युक्त सुखी सत्कर्मी हो

जा० सं०) ।

११२--चारों केन्द्र में गुरु बुध शुक्र और शनि से युक्त राहु हो तो लक्ष्मी आरोग्य,

पुत्र, मान, आदि प्राप्त हों (मान०) ।

( Co बुध) शुक्र, शनि चारों ग्रह सहित राहु हो तो उपरोक्त फल

ल० च०) ।

११३--तीनों केन्द्रों में शुक्र बुध गुरु हो ओर दशम में मंगल हो तो कुछ दीपक

हो (मान०) ।

केन्द्र में गुरु लग्न में बुध या शुक्र, दशम मंगल हो तो कुल दीपक हो ।

११४--ग्रुरु केन्द्र त्रिकोण या उच्च में, चन्द्र बुध, शुक्र से युक्त या दृष्ट हो तो

सार्व भौम राजा हो (मान० ) ।

११५--गुरु बुध शुक्र केन्द्र और त्रिकोण में हो तो वह धर्म अर्थ विद्या कीर्ति युक्त शांत सुशील राजा हो (जा० सं०) 1

११६--गुरु शुक्र या नवमेश केन्द्र कोण या लाभ में हों तो अनेक वाहन युक्‍त

संडळ का राजा हो (जा० पारि०) ।

११७--गुरु शुक्र या चतुर्थेश केन्द्र या लाभ में हो तो वाहनों का स्वामी और

राजा हो (छ० चं०) । ११८--गुरु शुक्र बुध केन्द्र त्रिकोण में हो ३, ६, ११ भाव में बुध शनि हो, सप्तम में पूर्ण बली चन्द्र हो तो राजा के समान हो ( मान० ) ( जा० सं० ) |

र १ | ९ गुरु सूर्य बुघ शनि त्रिकोण में मंगल दशम में हो तो राजयोग होता है

मान०) ।

'राजयोग : ३६१

१२०--त्रिकोण में गुरु सूर्य, लर्न में शनि चंद्र, दशम मंगल हो तो राज योग होता है (छ० चं०) । १२१-गुरु स्वक्षेत्री हो तो बन में भी मित्र मिले (जैमिनि) ।

१२२-गुरु बुध शनि तीनों स्वक्षेत्री हों तो दीर्घायु हो अपने-अपने पद में धन

सम्पादन करने वाला हो ( छ० चं० ) ।

१२३-गुरु शुक्र मंगल वर्गोत्तम में हों और पाप ग्रह केन्द्र में हो तो राजा हो

(जा० पा०) ।

१२४-वर्गोत्तम या पुष्करांश में गुरु मंगल चंद्र साथ हों तो राजां हो (जा.पा.) ।

१२६-गुरु लाभेश हो ओर चंद्र से केन्द्र में धनेश नवमेश लाभेश में से कोई एक

हो तो राजा हो ( जा० पा० )।

१२७-गुरु पर मंगल की दृष्टि हो और मंगल पर गुरु की दृष्टि हो तो देव

पूजित परोपकारी मंत्री हो ( जैमिनि ) ।

१२८-बुध गुरु युक्त या दुष्ट हो तो उसकी आज्ञा राजा लोग माने (स०चि० )॥

गुर विद्या का कारक है.और वुध ज्ञान का कारक है । दोनों का योग प्रभावशाली

होता है परन्तु भिन्त-भिन्न राशियों में भिन्न-भिन्न फल देगा जैसे मकर में जहाँ गुरु

नीच का है या मौन में जहाँ बुध नीच का है या करं का गुरु जो उच्च का हैया `

कन्या का बुध जो उच्च का है।

१२९-लगन में गुरु हो, बुध कोई केन्द्र में हो दोनों पर नवमेश और लाभेश की

दृष्टि हो तो राजा के समान हो ( स० चि० )।

१३०-लन में गुरु, केन्द्र में वुध हो नवमेश से दृष्ट हो तो राजा के बराबर

धनी हो ( जा० पा० ) ।

१३१-छरन में गुरु, दशम या पंचम में चन्द्र हो तो राजमान्य, महा वुद्धिमान्‌,

और तेजस्वी हो (मान०) ।

१३२-लग्न या पंचम में गुर हो, द्वादश में चन्द हो तो राजमान्य विशाळ बुढि,

तेजस्वी, जितेन्द्रिय हो (जा० सं०) ।

१३३-लग्न या पञ्चम में गुरु हो दशम में चन्द्र हो तो इन्द्रियजित्‌ बुद्धिमान्‌

राजा हो (जा० सं०) |

१३४-मकर राशि छोड़कर और कोई राशि में लग्न में गुरु हो तो मतवाले

हाथी युक्त राजा हो (जा० भ०) ।

१३४-गुर, बुध, या शुक्र चन्द्र के साथ लग्न में हो तो राज लक्षण से युक्त हो ।

१३६-छरन में गुरु और व्यय में शनि हो बीच में सब ग्रह हों तो कुटुम्ब ओर

चल्धुक्त राजा होता है (मान०) ।

१३७-छरन में गुरु, तीसरे चन्द्र, नवम बुध, लाभ में शुक्र, मकर का शनि हो तो

चक्रवर्ती राजा हो (जा० भ०) ।

१३८-छू्न में गुरु, ढितीय बुध मंगल, चतुर्थ में शुक्र सूयं दोनों हाँ दशम में

३६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

चन्द्र, लाभ में शनि हो तो राजपुत्र राजा हो अन्य धनी हो (जा० सं०) ।

१३९-छरन में मकर राशि छोड़कर और किसी राशि में गुरु हो और शुक्र पर

गुरु की दृष्टि हो तो राज घरों में उत्पन्न हाथियों से युक्त राजा हो (फल०) ।

१४०-छरन में गुरु बुध या शुक्र में से कोई हो शनि सप्तम हो सूर्यं दशम हो तो

भोग वाले का जन्म जानो (जा० सं०) ।

अन्यमत-गुरु, बुध शुक्र, की राशियाँ लग्न में हों सप्तम शनि दशम सूर्य हो तो

धन हीन मनुष्य को भोगवान्‌ वनाता है (वृ० जा०) ।

१४१-दूसरे भाव में गुरु शुक्र युक्त हो तो शत्रु को जीतने वाला भूप॑ति हो

(जा० पारि०) ।

१४२-द्वितीय भाव में गुरु बुध शुक्र हो सप्तम में शनि चन्द्र मंगल हो तो बड़ा राजा हो शत्रु का नाश करता हो (जा० भ०) ।

१४३-सू्यं से दूसरे भाव में गुरु बुध शुक्र हो अस्त न हो और शत्रु ग्रह की दृष्टि न हो तो उस राजा के सामने शत्रु की फोज भाग जाती है (शंभु०) ।

१४४-तीसरे भाव में गुरु, अष्टम में शुक्र हो बीच में द अन्त में और २ ग्रह हों तो निश्‍चय राजा हो । अन्यप्रत-तीसरे में गुरु अष्टम में शुक्र हो शेष ग्रह बीच में हों तो निश्चय राजा हो (जैमिनि) ।

१४५-तीसरे गुरु छाभ में चन्द्र हो तो कुछ दीपक प्रसिद्ध राजा हो (मांन०) ! ड

१४६-छरन से तृतीय भाव में गुरु हो या चन्दर सूये से पञ्चम नवम में हो तो राजा हो।

१४७-अंगल से ३,५,९ भाव में गुरु सूर्य चन्द्र हो तो अनेक सम्पदा और वाहुन युक्त राजमान्य हो (जा० भ०) ।

अन्यमत-३,५,९ भाव मे गुरु सूयं बली हों तो अनेक सम्पदा और वाहन युक्‍त राजा हो ।

अन्यमत--३,५,९ भाव में शुक्र सूये चन्द्र हो तो उपरोक्त फल (शंभु०) ।

१४८-चतुथं भाव में गुरु शुक्र बलवान्‌ हो तो राजा हो (जा० भ०) । १४९-चतुर्थ में गुर चन्द्र शुक्र, पञ्चम में मंगल शनि हो, कन्या लग्न में बुध. हो तो गुणवान्‌ राजा हो (जा० सं०)।

१५०-चतुथं में गुरु, छन्त में शनि, दशम में सूर्य चंद्र, लाभ में मंगळ बुध शुक्र हो तो राजपुत्र राजा हो अन्य धनी हो (बु जा०) । अन्यमत-शनि मकर छनन में हो (प्रा० यो०) । १५१-चतुथं में गुरु शुक्र मंगल चंद्र ये चारों सूयं चंद्र से युक्त हों तो राजा हो (मान०) ।

जतांतर-तु्थं में गुर शुक्र मंगळ चंद्र ये सुयं शनि इनसे युक्त हों (० चं०) ।

|

राजोगय : ३६३

१५२--चतु्े में गुरु हो, लग्न में मेष का सूयं, दशम में मंगल हो तो संसार का स्वामी हो (ल. चं.) ।

1१५३--चतुर्थ में गुरु, लग्न में चन्द्र, दशम शुक्र हो और शनि अपने उच्च का या | स्वक्षेत्री हो तो राजा के तुल्य हो ( स. चि. ) ।

१५४--चतुर्थ में गुरु, लग्न में उच्च का सूर्य, दुसरे में चन्द्र, तीसरे शुक्र और राहु, बारहरवे बुध हो, लाभ या छठे घर में शनि हो तो चक्रवर्ती राजा हो (मान०) ।

१५५--चतुर्थ में उदय गुरु हो, वृष में शुक्र हो और ग्रह नीच शत्रु नवांश से

(व न प्रकाशवान्‌ कांति वाले हों तो देव तुल्य बलवान्‌ क्रोध रहित हो जा. भ. ) ।

१५६--पंचम में गुरु और दशम में चन्द्र हो तो बड़। बुद्धिमान्‌, तपस्वी, जितेन्द्रिय राजा हो ( मान.) ।

१५७--लग्न से पंचम में गुरु नवम में चन्द्र तृतीय में सूयं हो तो कुबेर समान राजा हो ( जा. सं. ) । ५

१५८--गुरु पंचम भाव में हो चन्द्र उससे केन्द्र में हो और यदि लग्न स्थिर राशि में हो और दशम हो तो राजा हो (स. चि.) ।

१५९--पंचम भाव में गुरु शुक्र हो अस्त न हो, सूर्य से रहित मकर में मंगल हो, नवम में शनि हो तो प्रतापी राजा हो ( शंभु. ) ।

१६०--लग्न से पंचम या नवम गुरु व सूर्य हो अष्टम में मंगल हो तो घनवानु राजा हो ( लू. चं. )।

१६१--छठे भाव में गुरु हो, ककं में सूर्य चन्द्र हो, बुध उच्च का हो लग्न में कोई ग्रह बली हो तो राजाधिराज हो (जा. भ. ) ।

१६:--छठे भाव में गुरु लग्न में चन्द्र हो तो विख्यात कुछ दीपक हो (मान.) ।

१६३--गुरु सप्तम हो साथ में त्रिकोणेश भी हो और लग्नेश की दृष्टि हो तो राजा के तुल्य हो ( स. चि. )।

१६४--सप्तम गुरु, लग्न में मेष का बुध, चतुर्थ चन्द्र, दशम शुक्र हो तो कीतिमान्‌ राजा हो ( शंभू. ) ।

१६५--सप्तम गुरु, लग्न में वृष का चन्द्र, चतुर्थ में सूयं, दशम में शनि हो तो बडी सेना युक्त राजा हो ( जा. भ. ) ।

१६६--सप्तम में गुरु, लग्न में कन्यो का वुध, तीसरे सूर्य मंगल, छठे शनि,

चतुर्थं शुक्र हो तो महाराजा हो उसे सब मस्तक नवावें ( शंभु ) ।

१६७--सप्तम में गुरु चन्द्र हो, लग्न में कन्या का बुध हो, पंचम शनि मंगल,

दशम शुक्र हो तो राजा हो ( वृ. जा. ) ।

१६८--सप्तम गुरु, लग्न में मंगल शनि, चतुर्थं चन्द्र, नवम शुक्र, दशभ सूर्य, लाभ में बुध हो तो राज वंशी राजा हो अन्य धनी हो ( वृ. जा. ) ।

: ३६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१६९--सप्तम में गुरु, लर्न में बुध, चतुर्थ में पूर्ण चन्द्र कर्क का, दशम में शुक्र

हो तो पृथ्वी का राजा हो (जा. पारि. ) ।

१७०--गुरु अष्टम में हो और शनि दशम में हो तो ३० वर्षं में राज्य धन प्राप्त

करे ( जा. सं.) ।

१७१--गुरु नवम स्थान में हो तो मंत्री या राजा तुल्य हो ( शंभु ) ।

१७२--गुरु नवम म हो सूर्य से दृष्ट हो तो उपरोक्त फल ( जा. स. ) ।

१७३--बली गुरु व शुक्र नवम में हो, वली बुध ठग्न में हो अन्य कोई ग्रह चतुर्थ में हो शेष ग्रह ९,२,३,६,१०,११ भाव में से किसी में हो तो राजपुत्र धर्मात्मा राजा

हो अत्य धनी हो ( व. जा. ) ।

१७४--चेष्टाबली गुरु बुध शुक्र नवम में हो मित्र ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो प्रतापी राजा हो ( ज॑मिनि. )। |

अन्यमत--नवम में चेष्टावली गुरु बुध शुक्र चन्द्र मित्र ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो 'तो प्रतापी राजा हो ।

अन्यमत--नवम में गुरु बुध शुक्र चन्द्र प्रकाशित किरणों वाले हों अस्त न हों, मित्र ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो वड़ा राजा हो जनता देव तुल्य पुजे ( फल. ) । १७५-नवम में गुरु, पंचम में बुध, ककं में चन्द्र हो तो राजयोग होता है (जैमिनि) । अन्यमत-नवम में कोई शुभ ग्रह हो पंचम में बुध, ककं में चन्द्र हो तो राजयोग होता है ( मान. ) ।

१७३--नबम या चतुर्थ में गुरु शुक्र और नवमेश हो तो राजा, सेनापति या धनी हो ( जा. सं. ) ।

१७७ -दशम में गुरु शुक्र बुध चन्द्र चारों हों तो उसके सवं कार्य सिद्ध हों राज मान्य हो, राजाओं में पुज्य हो ( मान. ) ।

१७८-दशम में गुरु स्वगृही हो या बुध या शुक्र स्वगृही हो और पूर्ण चन्द्र भी हो तो कुलानुमान राजा हो ( शंभु. ) ।

१७९--दशम में गुर, घन भाव में शुक्र, छठे राहु हो तो पराक्रमी राजा हो ( मान. ) |

१५०--दशम ओर लग्न में गुरु शुक्र हो या लाभ में बुध शुक्र दोनों हों और मेष का सूर्य हो तो राजा हो (जा. सं. ) | > १८१--दशम में गुरु या शुक्र हो कन्या लग्न में बुध, सप्तम में चन्द्र पंचम में मंगल हो तो राजा हो या रानी का कामदार हो (प्रा. यो. ) । १८२--दशम या लाभ में गुरु चन्द्र शनि, लग्न में बुध, तृतीय मंगल, चतुर्थ सूर्य ` शुक्र हो तो साहुकार या राजा के घर का कार्यवाही हो ( प्रा. यो. ) । १८३--व्यय में गुरु, तृतीय में चन्द्र, षष्ट में शुक्र, लाभ में बुध हो लग्न में मकर का शदि हो तो एक छत्र राज्य भोगे ( शंभु. ) ।

राजयोग : ३६५

१८४--अन्यमत---व्यय भें गुरु, तृतीय में चन्द्र, छठे मंगल, नवम बुध हो मकर का शनि लग्न में हो तो विख्यात गुण वाला राजा हो (बु० जा०) । १८५--व्यय में गुरु, तृतीयेश होकर शनि लाभ में हो सूर्य लाभ में हो, गुरु लग्नेश होकर बारहवें हों तो भूमि फल राजा हो (जा० पारि०) 1 १८६--वारहवें गुरु, उच्च का सूर्य लग्न में, दूसरे चन्द्र, तीसरे शुक्र, चतुर्थ में राहु, लाभ में बुध, षष्ठ में शनि हो तो राज कुल में उत्पन्न राज समूह में सम्राट पद को पाता है (जा० सं०) ।

१८७--बा रहवें गुरु, ग्यारहवें शनि व सूर्य या तृतीयेश हो लग्न से ग्यारहवें लग्नेश हो या गुरु से लग्नेश बांरहवें हो तो राजाओं का राजा हो (स० चि०) । १८८--मेष का गुरु, सातवें चन्द्र, चतुर्थ या दशम में शुक्र हो तो प्रतापी कीति- मान राजा हो (जा० भ०) ।

१८९--मेष का गुरु और सूर्य लग्न में हो दशम में मंगल हो और नवम में शुक्र बुध चन्द्र हो तो बड़ा राजा हो (शंभु०) । ८

१९०--मेष में गुरु शुक्र शनि हो, लगभग पूर्ण होकर चन्द्र उच्च का हो सूर्य पर मंगल की दृष्टि हो, मेष राशि उदय हो रही हो तो बहुत सेना युक्त राजा हो (फल० )

१९१--मेथ का गुरु, धन भाव में चन्द्र बुध, दशम में राहु शुक्र हो तो राज योग होता है (मान०) । :

१९२--सिंह में गुर और ७, ४, ९, १० राशि में सब ग्रह हों तो देश का भोगी

राजा हो (जा० सं०)।

अन्यमत--सिह में गुरु ओर ७, ८, ९, १० राशि में सब ग्रह हों तो देश का भोगी राजा हो (मान०) ।

१९ ३-क्षिह का गुरु, कन्या का शुक्र, मिथुन का शनि और चतुर्थ में स्वक्षेत्री

मंगल हो तो राजा हो (ल० चं०) ।

१९४--सिह का गुरु, कन्या में शनि चन्द्र, कुभ में राहु, मकर का मंगल हो तो

विश्व का पालन करता हो (मान०)।

१९५- वृष में गुरु चन्द्र हो ओर वली लग्नेश त्रिकोण में हो यदि शनि मंगल से

दृष्ठ न हो तो राजा हो (जा० पा०)।

१९६--वृष लग्न में गुरु चन्द्र हो, शनि, सूर्य, बुध मंगल शुक्र ये १,३,६, व १२

स्थान में हों तो राजा हो या धनवान्‌ हो (प्रा० यो०) ।

१९७--वृष में गुरु मिथुन मों चन्द्र, मकर का मंगल, सिंह का शनि कन्या मां

बुध सूर्य, तुला में शुक्र हो तो महाराजा होता है ८ या १२ वषं जीता रहे तो विश्व का पालक सार्वभौम राजा होता है (ल? चं०) ।

१९८--मिथुन का गुरु, तुला का शनि, लग्न में वृष का बन्द्र हो मीन राशि में सूर्य मंगळ बुध शुक्र हो तो राजपुत्र राजा हो अन्य धनी हो (वृ० जा०) ।

३६६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१२९--वृश्चिक का गुरु, कुम्भ का शनि, सिंह का सूर्य हो, वृष का चन्द्र लग्न में हो तो अवश्य राजा हो या वकील, मजिस्ट्रेट या व्यापारी हो (वृ० जा०) । २००--धनु राशि में गुरु चन्द्र हो, लग्न में बुध या शुक्र उच्च का हो मकर का मङ्गल हो तो इन्द्र के समान धरती का स्वामी हो। इसमें १२ और ६ लग्न से २ भेद 'हो जाते हैं (जा० भ०) ।

२०१- धनु राशि में गुरु,लग्न में मेष का सूर्य, सप्तम में शनि चन्द्र हों तो राजा हो (बृ० जा०) ।

२०२--धनु राशि में गुरु, लग्न में मेष का सूर्य चन्द्र हो, मकर का मंगल कुम्भ का शनि हो तो राजा हो (वृ० जा०) ।

२०३--अन्य मत से धनु का गुरु, लग्न में सिंह का सूर्य, मेष का चन्द्र, मकर का मंगल, कुम्भ का शनि हो तो राजाओं का राजा हो (शंभु०) ।

२०४--धनु राशि में गुरु, लगन में मेष का चन्द्र, मङ्गल उच्च का, शनि कुम्भ 'का हो, सूर्य मर्द्ठोदय स्थिति में हो तो राजपुत्र राजा हो (जा० सं०) ।

२०५--धनु के ३ अंश पर गुरु हो, कुम्भ के १५° पर शनि हो, कर्क के १० पर चन्द्र हो तो राजा हो । इसी योग में चन्द्रमा सिह का हो तो भी राजा हो (शंभु०) । १०६--धनु में गुरु, ककं में बुध हो दोनों सूयं और मंगल से दृष्ट हों तो राजा हो (जा० भ०) 1

२०७--धनु का गुरु नवम भाव में पञ्चमेश या शुक्र से युक्त हो तो राजा हो (बृ० पा०) । २०८--धनु का गुरु, तुला में शुक्र व सूर्य हो, लग्न में मकर का शनि, मीन का चन्द्र, मिथुन का मंगल, कन्या का बुध हो तो कीतिमान्‌ राजा हो या राज घराने में न्ययाधीश डाक्टर आदि हो धमंशील व उदार हो (प्रा० यो०) । १० ५-7 धनु का गुर या चन्द्र, मकर या मंगल, अपने उच्च में शुक्र या बुध हो, मीन ऊर्न हो तो राजयोग होता है (प्रा० यो० )1 २१०--धन का गुरु, चन्द्र या शुक्र हो, कन्या लग्न हो, मकर का शनि और मंगल हो तो राजकुल के वाहन का स्वामी हो, या कामदार दुकानदार आदि हो (प्राण्या०) २११--धन का गुरु चन्द्र शुक्र युक्त हो, लग्न में उच्च का बुध हो मकर में शनि मंगळ हो तो सेवा वाहन युक्त राजा हो (जा० भ०) ।

२१२->धन का गुरु सप्तम, व उच्च का सूर्य लग्न में हो या मंगल चन्द्र के साथ उच्च का हो या शनि चन्रयुक्त उच्च का हो तो पराक्रमी राजा हो (प्रा० यो०) । २१३-११ राशि में गुरु, मेष में सूर्य, मकर में मंगल हो तो राजा हो (जा० पारि०) |

२१४--भकर में गुरु, कुंभ में सूये, मीन में मंगल, घन में शुक्र हो तो ३० वर्ष में सब काम करने में समय हो (७० चं०) ।

राजयोग : ३६७

। २ शमीन में गुरु शुक्र और चन्द्र तीनों हों तो राजा हो अनेक पुत्र हों

मान०) ।

२१६--मीन लग्न में गुरु शुक्र हो, मेष का सूर्य मकर का मंगल हो तो छत्रधारी राजा हो (मान०) ।

२१७--मीन में गुरु, घन भाव में शुक्र और मंगल हो, कुम्भ में बुध या सूर्य के साथ i का चन्द्र हो तो विभवयुक्त राजा हो दान भोग में सामान्य विख्यात हो (मान०) ।

२।८--मीन में गुरु, घन भाव में शुक्र मंगल, तुला में बुध हो और शनि चन्द्र

नीच स्थिति में हों तो राजयोग होता है । धन रहित राजा हो, दाता, योगी, पूज्य

और मंडल भर का नायक हो (छ० चं०) ।

२१९--मीन में गुरु चन्द्र शुक्र हों, लग्न में उच्च का बुध हो वक्री शनि मकर

का हो तो राजा हो (जैमिनि) । २२०--मीन में गुरु चन्द्र, मिथुन में शुक्र, लग्न में कन्या का बुध, मकर का

मंगल शनि हों तो शत्रुओं का नाशक बड़ा राजा हो (जा० भ०)।

२२१--छरन लाभ या दशम में गुरु, शनि, मंगल हों, चन्द्र से केन्द्र मों लाभेश,

नवमेश, द्वितीयेश में से कोई हो ओर यदि गुरु २, ५ या ११ भाव का स्वामी हो तो

वह समाज का स्वामी हो (फल०) ।

शुक्र के योग (गुरु के योग छोड़कर)

२२२--उच्च में शुक्र बुध हो तो राजाधिराज हो (जा० सं०)"।

२२३--केन्द्र में शुक्र बुध हो तो वह वाहन, सेवक, रत्न, बगीचा आदि से परि-

पूर्णं समुद्र तट का रहने वाला सत्यवादी राजा होता है (जा० सं०) ।

२२४ केन्द्र में शुक्र हो तो सुन्दर दीर्घायु सब में समर्थ धन सुवणं वाहन से पुणे

हो (मान०) ।

२२५--अकेला शुक्र केन्द्र, लाभ, जन्म राशि में, तीसरे स्थान में या त्रिकोण में

हो तो विद्या और विज्ञान से युक्त विख्यात कीति, दानी, मानी, शूरवीर, अश्वविद्या

जानने वाला, हाथियों से सेवित राजा हो (मान०) ।

२२६- शुक्र बुध सूर्यं अपने नवांश में होकर चन्द्र से ३,६,८, घर में हों, सूर्य

मूल त्रिकोण या उच्च में हो तो अन्य कुल का भी राजा हो (जा० पारि०)।

२२७--लग्न या दशम में शुक्र बुध हो तो बहुत धनवान्‌ हो (प्रा० यो०)।

२२८--दूसरे भाव में शुक्र युक्त बली लग्नेश हो वह उसका नीच या शत्रु घर

न हो तो राजा हो (फल०) ।

२२९-२, ३, ४ भाव में कहीं शुक्र हो ओर ६-१० भाव में सब ग्रह हों तो

राजयोग होता है । तुच्छ कुळ का भी राजा हो (जा० सं०) ।

२३०--द्वितीय भाव में शुक्र हो शत्रू, या नीच घर में न हो, लग्नेश बली हो तो

राजा हो (जा० पारि०) ।

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३६८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२३१-३, ११, घर में परस्पर दृष्ट शुक्र चन्द्र हो या कहीं पर परस्पर दृष्ट

हो तो राजयोग होता है (वृ० पा०) । ee

परस्पर दृष्टि तृतीय एकादश में, यदि एक स्थिर में दूसरा चर में हो तो राशि

दृष्टि वश परस्पर दृष्टि होती है जैसे एक वृष में दूसरा कर्क में ।

२३२-_चतुथं में शुक्र, तीसरे में सूर्य, २ या ५ में बुध हो पर कोई नीच के ग्रह

न हों जो १० या १२ भाव में न बंठ हों तो समुद्र पर्यन्त भूमि का पालन करता राजा

होता है (मान०) ।

अन्यमत--४ घर में शुक्र, ३ में सूयं, २ या ५ घर में बुध हो पर नीच दो शत्रू,

गृही ग्रह न हों तो उपरोक्त फल हो (जा० सं०)।

२३३--चतुर्थ में स्वगृही शुक्र, नवम में चन्द्र शेष ग्रह सूर्यं मंगल बुध गुरु शनि

३,१,११ भाव में यथा सम्भव हों तो राजवंशी राजा हो अन्य धनी हो । इसमें कुम्भ

और कक लग्न से २ भेद हो जाते हैं (वृ० जा०) ।

२३४--चतुर्थ में शुक्र बुध हो, तीसरे सूर्य शेष ग्रह पंचम में हों पर शत्रु गृही न

हों तो एक छत्रधारी राजा हो (जा० भ०) ।

२३५--चतुर्थं में शुक्र, दशम में मंगल सूर्य शनि युक्त हो तो राजा हो (मान०)

२३६--चतुर्थ में शुक्र ओर सूर्यं ह तो राजयोग होता है (फल०) । २३७--अष्टम में शुक्र, लग्न मों मकर का शनि, सप्तम सूर्य चन्द्र, लाभ में मंगल

हो तो राजवंशी राजा हो (जा० भ०) ।

२३८--अष्टम में शुक्र, लग्न में शनि और चंद्र हो तो मानी, बहुत मित्रों वाला, अभिमानी, स्त्री में रत राजा हो (मान०) ।

२३९--अष्टम में शुक्र, नवम में सूर्य, पंचम मंगल, छठे राहु हो तो कुल का पालक हो (ल० चं०) |

२४०--नवम शुक्र, दशमं पूर्ण चन्द्र, छाभ में शेष ग्रह हों तो राजवंशी राजा हो (शंभुः) । २४१--दशम में मित्रांश में शुक्र सूय चन्द्र बुध हो, शत्र, गृही, अस्त या नीच में न हो तो हाथी आदि युक्त राजा हो (जा० पारि०) । २४२--दशम में स्वगृही शुक्र या मंगल हो शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो राजा हो (शंभु०) ।

र४३--छाभ या व्यय में शुक्र हो, धनु लग्न में वली सूर्य हो, दशम में चन्द्र और मंगल हो तो इन्द्र के समान राजा हो । यह योग पृष के महीने में होना सम्भव है (जा० पारि०) ।

२४४--बली शुक्र ११ या १२ भाव में हो तो राजा हो (जा० पारि०) । २४५--व्यय में मीन का शुक्र बुध हो लग्न में सूर्य, द्वितीय में चन्द्र, तीसरे में राहु हों तो राज योग होता है (मान०) ।

राजयोग : ३६९

२४६-णवृप का शुक्र, तुला का चन्द्र हो शेष ग्रह क्रम से १,११,९ रोशियों में हों तो साहुकार या जज हो (प्रा० यो०) ।

२४७-वृप में शुक्र उदय हो और ग्रह नीच, शत्रुगृही या अस्तंगत न हों बलवान्‌ हों शतरुयुक्त न हों तो बलवान्‌ देव तुल्य क्रोध रहित राजा हो (जा० भ>) । २४८--केन्या का शुक्र राहु मंगल शनि हो तो कुवेर से भी अधिक धन मिले (मान०) । ५ २४९-कन्या राशि में शुक्र बुध हो, मकर लग्न हो, शुक्र नीच का हो बुध नोच भंग और राजयोगकारी है उसके बल से शुभ फल देगा (ज्यो० शा०) । २५०-तुला में शुक्र, मकर लग्न में शनि, सिंह का सूर्य, मिथुन में बुध, मेष का मंगल, कर्के में चंद्र हो तो समुद्र तक पृथ्वी का राजा हो (वृ० जा०) । २५१-तुला का शुक्र हो, कर्के लग्न हो, मोन का चंद्र हो शेष ग्रह ५, ध्या २ राशियों में हों तो राज कार्यवाही या साहुकार हो (प्रा० यो०) । २५२-तुला का शुक्र हो, सूर्य स्वगृही हो, मिथुन में शनि हो तो राजयोग होता है (मान०) ।

२५३-मीन पर शुक्र, व्यय में बुध, लग्न में सूर्य, धनभाव में चंद्र, तोसरे में राहु हो तो राजयोग होता है (जा० सं०) । : २५४-मीन पर शुक्र, ब्यय में बुध, लग्न में सूर्य, घन में राहु और तीसरे भाव में मंगळ हो तो राजयोग होता है (ल० चं०) ।

२५५-मीन का शुक्र केन्द्र में हो तो विद्या कला तथा गुणों से सुशोभित, भोग से पूर्ण अपने देश रियासत शहर या ग्राम आदि में दौरा करने से धान्त, सम्पूणं मंडल भर में जिसका शासन हो ऐसा होता है (मान०)।

२५६-लग्न में मीन का शुक्र प्रकाशवान्‌ हो तो विद्या कळा अनेक भोगों से युक्त देशकी अधिकता और पुरजनों में विराजमान हो (जा० सं») ।

२५७-छग्न में मीन राशि में मीन नवांश में शुक्र हो तो राजा हो (जा.पारि.) ।

२५८-जिक भाव को छोड़ कर अन्य भाव में शुश लग्नेश युक्‍त हो तो राज पूज्य

हो इच्छित फल प्राप्त करे (जा० ल॑०) ।

२५९-१,२,७,१२ राशि में शुक्र हो तो राजाओं से मान पाने वाला कला कौतुक का ज्ञाता हो आयु २३ वर्ष (मान०) !

२६०- ',७,२,१२ राशि में शुक्र हो तो राज मान्य कला कौशल युक्त हो ३ पुत्र हों २२ वर्ष में भोग को प्राप्त करता है (जा० सं०) ।

२६१-शुक्र कर्क का हो, लग्नगत क्रुर ग्रह हो गुरु से दृष्ट हो तो देव ब्राह्मणों का

भक्त हो, महल, बावली, नगर बनाने वाला राजा हो (शभु०) ।

२६२-शुक्र अश्विनी, कृतिका, पुष्य, रेवती इन नक्षत्रों में हो तो राजा हो

(जा० म०) ।

२६३-शुक्त अश्विनी नक्षत्र में लग्न में हो ओर सभी ग्रह उसे देखते हों तो राजा

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३७० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

हो राजकुल में अग्रज शत्रु संहारक बहुत स्त्रियों से विलास करने वाला हो (जा.सं.) ।

२६४-अश्विनी में शुक्र हो तो राजा होता है (जा०भ०) ।

२६५-अश्विनी नक्षत्र में शुक्र लग्न में हो या अधिक ग्रहों की दृष्टि हो तो शत्रु

नाशक राजा हो (फल०) । ८

बुध से राजयोग ( गुरु और शुक्र का फल छोडकर )

२६६-केन्द्र में बुध हो और चन्द्र जिसकी राशि या नवांश में हो वह केन्द्र कोण

या लाभ में हो तो राजाओं का राजा हो (स० चिं०) ।

२६७-वुध. गुरु की दृष्टि हो और पूर्णं बली लग्नेश केन्द्र में हो तो वह राजा हो जिसकी आज्ञा सब मानें (स० चिं०) ।

२६८-बुध को गुरु देखता हो तो वह राज कुल में उत्पन्न राजा विचित्र सम्पत्ति युक्त हो (शंभु०) । २६९-बुध सूर्य एक भाव में हों तो बुधादित्य योग होता है वह धर्मात्मा पंडित नवान्‌, बहु पुत्रवान्‌, भृत्यों सहित जितेन्द्रिय हो (जैमिनि) । २७०-बुध सूर्य के साथ अक्त होकर भी यदि स्वगृही या मूल त्रिकोण में हो तो प्रत्येक विद्या का जानने वाला हो (जा० पारि०) । २७१-छण्न में बुध, नवम पंचम में शुभ ग्रह, शेष ग्रह उपचय में हों तो बड़ा साहुकार जज आदि हो ( प्रा० यो०) । २७२-दुसरे भाव में बुध मंगल हो तो राज योग होता है (फल०)। २७३-चतुर्थ भाव में बुध और सूयं हो, दशम में शनि चंद्र, लग्न में मंगल हो तो राजा हो (जा० पारि०) ।

२७४-दशम में बुध सूर्य, षष्ठ में मंगल राहु हो तो राजा हो (जा० सं०) । २७१५-छाभ में बुध, मेष में सूर्य, ककं लग्न में चंद्र हो तो डाक्टर हो (प्रा.यो.) । २७६-बुध मिथुन के २१ अंश में हो,कुंभ के अंत्यांश अर्थात्‌ कुंभ कुंभांशक (वर्गोत्तम) में चन्द्रमा हो या त्रिकोण में १२-१ राशि का मंगळ हो तो राज वंशी राजा हो (शंभु) ।

२७७--मिथुन के ११वें अंश में बुध हो, त्रिकोण में चन्द्र कुम्भ राशि के अष्टम नर्वाश में हो, मेष के ७वें अंश में मंगल हो तो राजा हो (जा० भ०) । २७० कन्या राशि में बुध चन्द्र युक्त हो तो मगध देश का राजा हो (जा०भ०) ! २७९-कन्या में बुध हो, सिंह में सूर्य हो परन्तु शुक्र के नवांश में हो तो नीच कुल का भी राजा हो। भाद्र मास में इस योग की संभावना रहती है (जा० पारि०)। २८०--वुध, चन्द्र मंगल शनि क्रमशः ६, १२, ४, ९, १० राशि में हों तो राजा हो (जा० पारि०) । चन्द्र का राजयोग (उपरोक्त योग छोड़कर) २८१--पूण चन्द्र अकेला प्रधान बल से युक्त हो तो शत्रुओं का दमन कर्ता राजा हो (जा० पारि०)।

राजयोग ३७१

२८२--चन्द्र उच्च में हो तो सहस्रपति हो, यदि नीच में या अन्य राशि में हो

तो अनुपात से फल जानना ।

२८३--षड़ वर्ग में शुभ ग्रह उच्च के समान फल देते हैं ( जा० सं० ) ।

२८४--चन्द्र वर्गोत्तम नवांश में हो या लग्न में वर्गोत्तम नवांश उदय हो रहा

हो, चन्द्र को छोड़ कर और किसी ग्रह से दृष्ट हो तो नीच कुल का राजा हो (फल०)।

२८५--चन्द्र वर्गोत्तम होकर बली ग्रह से दृष्ट हो लग्न में कोई पाप ग्रह न हो

तो सुन्दर शरीर हो और राजाधिराज हो ( फल० ) ।

२८६ - वर्गोत्तम चन्द्र पुष्य, अश्विनी या कृतिका में हो तो धरती का राजा हो ( शंभु० )। हु

२८७--पूर्ण चन्द्र वर्गोत्तम हो तो शक्ति मान राजा हो बहुत वाहन युक्त कीति-

मान्‌ हो ( फल० ) ।

२८८--पूर्ण चन्द्र वर्गोत्तम नवांश में हो और उस पर ३ या अधिक ग्रहों की

दृष्टि हो तो राजा हो ( वु० पा० )।

२८९--बली चन्द्र केन्द्र त्रिकोण में हो तो दोनों कुल को आनन्द देनेवाला पृथ्वी

का राजा होता है | सबं विघ्न नाश होते हैं ( जा० सं० ) ।

२९०--केन्द्र या त्रिकोण में वली चन्द्र हो उस पर गुरु की दृष्टि हो तो धन

शक्ति और प्रभाव में राजा के वराबर हो । पूर्ण चन्द्र हो, शुक्र के गृह या भश में हो

कोई पाप दृष्टि या-योग न हो और गुरु या शुक्र से दुष्ट हो या उच्च में हो तो वस्त

बलवान्‌ होता है ( जेमिनि ) ।

२९१--चन्द्र का नवांशेश लग्न से केन्द्र या कोण में हो या बुध से केन्द्र में हो तो

राजा के वरावर हो राजा द्वारा मान प्राप्त करे ( स० चि० ) ।

२९२--पूर्ण बली चन्द्र लग्न से अतिरिक्त ४,७,१० भाव में हो तो विक्रम, सेना,

वाहन युक्त राजा हो ( शंभु० ) ।

२९३- पूर्ण बली चन्द्र केन्द्र में हो उस पर गुरु शुक्र की दृष्टि हो तो राजा हो

(जा० पारि०) ।

२९४---पूर्ण बली चन्द्र लग्न को छोड़कर केन्द्र में उच्च का हो तो राजा दो

(जा० भ०) । 6

Ma राशि या लग्नेश वक्री होकर केन्द्र में हो तो नीच कुल में भी

उत्पन्न हुआ, उदार पवित्र आचरण करने वाला राजा हो (जैमिनि) ।

२९६--केन्दर में चंद्रमा त्रिकोण में सूर्य हौ तो दास कुछ में भी उत्पन्न हुआ राजा

हो (मान-) |

२९७--केन्द्र में चन्द्र हों तो रूपवती स्त्री मिले धन सुवण रत्न युक्त चन्दन लगाने

वाला हों (मान०) । न

१९८--पूर्ण चन्द्र सूर्यं के नवांश में हो शुभ ग्रह केन्द्र में पाप रहित हो तो कई

हाथी युक्त हो (फल०) ।

oe ६4: SECPP

३७२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२९९--त्रिकोण या लाभ में चन्द्र हो तो दोनों कुछों को आनन्द दायक, अंधकार नाश करने में दीपक के समान हो (मान०) ।

३००--४,१०,११ भाव में चन्द्र शनि युक्त हो तो राज कुल में उत्पन्न होने वाला राजा हो । अन्य राजा के सदृश धनी हो (जा० पारि०) । ३०१--६,७,८ भाव में चन्द्र हो उसे सूर्य को छोड़कर सब ग्रह देखते हों तो दीर्घायु राजा हो (मान.) । २

३०२--६,७,८ भाव में चन्द्र हो वृश्चिक राशि में न हो ओर सब ग्रहों से दृष्ट हो तो दीर्घायु राजा हो (ल० चं०) । १ द ३०३--६:८ भाव में चन्द्र हो सूर्य को छोड़कर सब ग्रह देखते हों तो दीर्घायु राजा हो (जा. सं.) ।

३०४- चन्द्रमा सूयं से युक्त हो उच्चादि वर्ग में हो सप्तम भाव में हो शुभाशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो चञ्चल राजा हो या राजा के समान हो (जा. पारि.) । ३०५-उपचय में चन्द्र हो और सब ग्रह अपने-अपने घर या नवांश में या केन्द्र में हों और पाप ग्रह निर्बल होकर कहीं भी बैठे हों तो विशेष कर सेना से युक्त इन्द्र के समान राजा हो (मान.)

३०६--चन्द्र उपचय में हो तो इन्द्र के समान राजा हो (जैमिनि) । ३०७--उपचय में स्वगृही या स्वनवांश का चन्द्र हो (शुभ ग्रह केन्द्र में हो पाप ग्रह निर्वळ हों तो इन्द्र के समान वली राजा हो (जा. सं.) । ३०८--ऊम में चन्द्र हो लग्नेश नवम-दशम में हो तो राजा हो (जा, पारि.) । ४३०९--छनन में पूर्ण चन्द्र हो, ३ शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो शत्र गृही या नीच के वर्ग में न हो परन्तु अपने वर्ग में होने से वली हो तो शत्रु ओं को दमन करता राजा हो (फल.) ।

३१०--लग्न में जल राशि या अंश में चन्द्र हो या अपने वर्ग में हो तो प्रजा की भलाई करने वाला राजा हो (फल.) । ३११--धन भाव में चन्द्रमा दशमेश युक्त हो और समस्त ग्रह लग्न से ६ भाव तक हों तो राजा हो: (स. चि.) । ३१२--चतु्थ में चन्द्र, छठे मंगळ, अष्टम शनि हो तो रुजा के दर्शन करने वाला हो (जा. सं.) ।

रै१३--र या ३ भाव में चन्द्र मंगल युक्त हो और राहु पञ्चम हो तो राजा के बरावर हो (स. चिं.) ।

३१४--सप्तम में चन्द्र सूर्य युक्त हो, मकर में बली मंगल, ९ या १० भाव में शनि हो तो चञ्चल ।चत वाळा हो (जा. पारि.) । ३३५--नबम में चन्द्र हो, लग्नेश उपचय में हो शुभ ग्रह वळवान्‌ होकर केन्द्र में शुभ नगे में हो तो राजा हो ( जा० पारि० ) । ३१६-गबय में यूज चन्द्र युक्त गनि या मंदरू हो या दोणों हों तो राजा हो (शंभू)

राजयोग : ३७३

३१७--नवम में पूर्ण चंद्र सूर्य मंगल युत बल युक्त हो शुभ दृष्ट हो तो राजा या मंत्री हो ( जा० भ० )1

३१८--पूर्ण चन्द्र नवम में उच्च का या मित्र गृही हो लग्न से २ या १० स्थान

में शनि और मंगल हों तो राजा हो ( जा० पा० ) |

३१९--नवम में सूर्यं ओर चन्द्र दोनों हों राहु बारहवें हो तो राजा के समीप रहने

चाला हो ( जा० सं० )। न

३२०--दशम भाव में चन्द्र हो व्यय भाव में कोंई शुभ ग्रह हों और क्रूर ग्रह की

राशि का चन्द्र हो तो राज्य प्राप्ति हों ( मान० ) ।

३२९--दशम में चन्द्र हो नवम में भी शुभ ग्रह हो पंचम में भी शुभ प्रह हो तो राज योग होता है ( ल० चं. ) |

३२२--दशम में पूर्ण चन्द्र हो शुभ ग्रहों से युक्त व दृष्ट हो तो राजा हो (जा. पा.) । ३२३--प्रकाशित चन्द्र पर उच्च या स्वगृही ग्रह की दृष्टि हो पूर्ण चन्द्र लग्न को छोड़कर केन्द्र में हो तो नीच कुछ का भी वाहन युक्त राजा हो ( जा. भ. ) । ३२४-पूर्णे चन्द्र को गुरु, वुध, शुक्र तीनों देखते हों तो राज कुल में उत्पन्न हुआ राजा हो ( जा. भ. )

३२५--चन्द्रमा लगेश के अतिरिक्त ग्रह से युक्त हो और वुध गुरु शुक्र से दृष्ट हो तो राजा हो (जा. पा. ) ।

३२६--चन्द्र पर नवमेश की दृष्टि हो ओर सब ग्रह लग्न से ६ भाव तक हों चन्द्र भी इसी के भीतर हो तो राजा हो (स. चि. )।

ग्रह नीच का हो तो राज योग में अन्तर पड़ेगा ।

३२७--चन्द्र पर उच्चगत लग्नेश की दृष्टि हो तो वह हाथी घोड़े सेनाओं से परिपूर्ण अनेक शत्रुओं को जीतने वाला राजा हो ( जा. पा. ) ।

३२८--चन्द्र पर सूर्य बुध की दृष्टि हो और सूर्य पर चन्द्र की दृष्टि हो तो

पृथ्वी पति राजा हो ( मान.) ।

३२९--चन्द्र पर बुध की दृष्टि हो और सूर्य पर चन्द्र की दृष्टि हो या उसके मित्र ग्रह की दृष्टि हो तो राजा हो ( ज॑मिनि ) ।

३३०--चन्द्र जिस राशि में हो उसका स्वामी उसे देखे या उसके मित्र ग्रह देखें

तो राजा हो ( जैमिनि ) |

३३१--छग्न चन्द्रमा समस्त ग्रहों से दृष्ट हो तो राज्य देने वाले होते हैं (शंभु.) ।

३३२--चन्द्र सब ग्रहों से दृष्ट हो तो राज कुल में उत्पन्न राजा हो । अन्य कुल का भी कुल में श्रेष्ठ घन अन्न नोतियुक्त हो ( शंभु. ) ।

३३३--वष के चन्द्र पर गुरु और शुक्र की दृष्टि हो तो राजा हो (जा. भ.) ।

३३४--वृष लग्न में चन्द्र हो उसे अन्य ६ ग्रह देखें तो राजा हो (जा. पा.) ।

३३५--रात्रि का जन्म हो दशम भाव में ककं का चंद्र हो शुभ ग्रह अस्त नीच

३७४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

शत्रु गृही न हों और ३, ६, ११ घर में हों या परमोच्च के हों या सब केन्द्र में हों तो

राजाधिराज हो ( फल. ) ।

३३६--षड़ वर्ग शुद्धि चन्द्रमा ककं का पुनवंसु नक्षत्र पर हो या उच्च पंचम

नवंम में हो तो समुद्र तक धरती का राजा हो ( जा. भ. )।

३३७--कर्क का चन्द्र सिह का सूर्य हो दोनों गुरु से दृष्ट हों तो राजा हो (शंभु.)।

३३८--कर्क का चन्द्र हो, लग्न में सूर्य, शनि कुम्भ में हो शुक्र से दृष्ट हो तो

राजा हो ( जा. भ. ) ।

३३९--ककं का चन्द्र हो लग्न में मकर का मंगल हो तो राजा हो (जा. पा.) ।

३४०--क्क का चन्द्र हो शुभ ग्रह युत या दृष्ट हो और सभी ग्रह शोर्षोदय राशि

३, ५, ६, ७, ८. ११ में हों तो राजा हो ( जा. पा. ) ।

३४१--करक का चन्द्र मीन का सूर्य हो तो राजा हो ( जा. पा. )।

३४२--कर्क का चन्द्र हो सब शुभ ग्रह पंचम में या नवम में हों तो राजयोग

होता है ( जा. सं. ) ।

३४३--कन्या लग्न में चन्द्र हो सिंह में सुर्य, मकर में मंगळ, कुम्भ में शनि हो

तो बड़ा तेजस्वी राजा हो ( शंभु. ) ।

३४४---मीन लग्न में चन्द्र हो, सिंह का सूर्यं, मकर का मंगल, कुम्भ का शनि हो

तो तेजस्वी राजा हो ( जा. भ. ) ।

३४५--मेष का चंद्र हो, सिंह का सूरये लग्न में, कुम्भ का शनि, मकर में मंगल,

घन का गुरु हो तो राजाओं का राजा हो ( आ. भ. )।

३४६- धनु के पूर्वाद्ध में चन्द्र और सूर्य हो, लग्न में बली शनि हो, मकर में

मंगल हो तो महाराजा हो जिसे दूसरे प्रणाम करें (ल. चं. ) ।

३४७- धनु में सूयं चन्द्र, मकर लग्न में मंगल या शनि हो या कुंभ लग्न में

शनि हो तो (ये २ राजयोग हुए) मुन्सिफ वकील बड़ा साहूकार आदि हो (प्रा. यो.) ।

३४८--मकर लग्न में चन्द्र मंगल हो, सूर्य धन का हो तो राजा हो (वृ. जा.) ।

३४९--मीन में पुणं चन्द्र हो भित्र ग्रहों से दृष्ट हो तो महत्वपुर्ण राजा हो (फल.)

या सर्व ग्रहों की दृष्टि हो तो भी उपरोक्त फल हो ( जा. भ. ) ।

३५०--मीन में पूणं बली चन्द्र मकर का मंगल कुम्भ का शनि हो तो राजा हो

( जा. पारि. )।

३५१--पूणं चन्द्र गुरु के घर में हो शनि ओर मंगल १०,५ या १ भाव में हो

तो राजा हो ( जा. पारि. ) ।

३५२--बलवान्‌ चन्द्र शुभ राशि में हो तो राजा हो ( शंभु० ) ।

३५३--जळचर राशि का चन्द्र हो, लग्न में सूयं. कुम्भ में शनि हो शुक्र से दृष्ट

हो तो राजा हो ( शंभु० ) । `

३५४ भेष सिंह लग्न में चन्द्र सूय हों तो साधारण मजिस्ट्रेट आदि हो (प्रा.यो.) ।

राजयोग : ३७५

३ कय अधिमित्र के घर हो शुक्र की दृष्टि हो तो धनयुक्त राजा हो फल० ) ।

३५६--चन्द्र अधिमित्र के अंश में हो और गुरु से दृष्ट हो तो पृथ्वी भर का राजो हो ( फल० ) ।

चन्द्रमा स्वनवांश में हो गुरु से दृष्ट हो तो भी उपरोक्त फल हो ( जा० भ० )। ३५७--रात्रि का जन्म हो चन्द्र मित्र नवांश में हो शुक्र से दृष्ट हो। दिन का

जन्म हो चन्द्रमा स्वनवांश या अधिमित्र नवांश में हो गुरु से दृष्ट हो तो राजा हो ( जैमिनि ) । सूर्य से राज योग (उपरोक्त योग के अतिरिक्त) ३५८-~उच्चाभिलाषी सूर्य त्रिकोण में हो तो नीच कुल का भी धन पूर्ण राजा हो ( छ० चे )। ३५९--सूर्य शनि उच्च में हों तो सब का स्वामी हो ( जा० सं० ) ।

३६०-ूर्यं अपने स्वअंश में हो और अपने स्वक्षेत्र में हो तो घोड़ा, हाथी युक्त राजा हो ( फछ० ) ।

३६१--सूर्यं अपने अधिमित्र के घर में वैठा हो ओर चन्द्र से दुष्ट हो तो वह चोरों के समूह में श्रेष्ठ शील वाला निरन्तर राजा होता है ( जा? भ० ) । सूये अधिमित्र के अंश में हो चन्द्र से दृष्ट हो तो भी उपरोक्त फल हो (शंभु०) । ३६२--वली सूर्य पर पंचम स्थित गुरु की दृष्टि हो ओर एक भी उच्च का शुभ ग्रह केन्द्र में हो तो राजा हो ( जेमिनि० ) 1

३३३--वलवान्‌ सूर्य केन्द्र या त्रिकोण में हो तो सब दोषों को दूर कर बड़ी आयु

वाला रोग भय से रहित करता है ( जा० सं० ) ।

३६४--मेथ का सूर्यं चन्द्र युक्त हो तो राजा हो ( जा० भ० )।

३६५-स्वगृही सये नवम में हो तो भाई नहीं जीता जिये तो राजा तुल्य हो

( छ० चं० )।

३६६--दशम में सूर्य और मंगल, सप्तम में शनि ये अच्छे हूँ यद्यपि पाप ग्रह

केन्द्र कोण में बुरे होते हैं परन्तु वे अच्छे हैं।

दशम में सूर्यं मंगळ हो, दशमेश केन्द्र में हो तो कड़ी आज्ञा देने वाला हाकिम हो

स० चि० ) ।

३ ७ ३,१,७,४ राशि में से किसी में सूर्य हो मकर लग्न में शनि हो तो

यशस्वी राजा हो ( शंभु० ) 1 मङ्गल के राजयोग (उपरोक्त योगों के अतिरिक्त) । डु न

३६८--मंगल अनुराधा नक्षत्र या अश्‍विनी नक्षत्र में या अपने ऊंच मकर में या

वर्गोत्तम नवांश में हो तो राजवंशी राजा हो अन्य वंशी धनी या मंत्री हो (जा. भ.) ।

३६९-- मंगल उच्च का बली हो, सूर्य, चन्द्र या गुरु से युक्त हो तो समस्त भूमण्डल का पालक राजा हो ( जा० पारि० ) ।

३७६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२७०--बली मंगल केन्द्र में हो सूर्य चन्द्र तथा गुरु से दृष्ट हो तो राजा हो ( ज॑मिनि० )। ३७१-१, ५, ९, लगन में मंगल हो मित्र ग्रहों से दृष्ट हो तो राजा हो मान पाये ( फल० ) ।

३७२--सिंह में मंगल, मिथुन में राहु हो तो राजा पिता के सम्पूणं द्रव्य को प्राप्त हो हाथी घोड़ों का पालन करता राजा हो ( मान० ) । ३७३--मंगळ दशम हो तो राजयोग होता है ( जा० सं० ) । ३७४-९, ११ भाव में मंगल ओर शनि हो, १, ७, १० भाव में बली शुभ ग्रह हो तो गुणवान्‌ राजा हो ( जा० पारि० ) । २७५--चतुर्य भाव में मंगल युक्त चतुर्थेश हो या वली चतुर्थेश लाभ में हो, यदि मंगल की राशि में चतुर्थेश हो तो राज्य धन, सुख, वाहन, रत्न आदि प्राप्त हो ( स० चि० ) | शनि के योग ( उपरोक्त के अतिरिक्त ) ३७६--शनि उच्च का या स्वगृही केन्द्र में हो तो राजातुल्य हो ( मान० ) । ३७७- लग्न में शनि उच्च या स्वराशि का हो तो राजा के समान देश, पुर का स्वामी होता है । ( जा० सं० ) । उबत लक्षण हीन शनि हो तो दरिद्री, दुःख शत्रु से पीड़ित निदित होता है अर्थात्‌ शेष राशियों का शनि लग्न में हो तो अच्छा नहीं होता । ३७८--शनि उच्च या मूल त्रिकोण का केन्द्र या कोण में हो और दशमेश से दष्ट हो तो राजाके तुल्य हो ( स० चि० )1 ३७९- शनि उच्च या मूल त्रिकोण का केन्द्र या कोण में हो ओर छाभेश से दृष्ट हो तो राजा सम धनी हो ( जा० पारि० )। * ३८०--काभ में शनि हो नवमेश से दृष्ट हो, दशम में राहु हो, लग्नेश नीच गत या नीच ग्रह युक्‍त न हो तो राजा के तुल्य हो ( जा० पारि० ) । ३८१--१,७,९,१०,११, १२ राशि के लग्न में शनि हो तो सुन्दर शरोर वाला राजा विद्वान्‌ और पुर या ग्राम या मुखिया हो ( जा० पारि० )। ३ै८२--७,९, १२ राशि के लग्न में शनि हो तो राजा कुछ का राजा हो ( छ० चं० ) |

२८३--कग्न से दशम में बली शनि हो तो धनवान्‌ बुद्धिमान्‌ शूरवीर राजा का मन्त्री दण्ड देने वाला या नेता हो (मान,) । ३८४--शनि दशमेश युक्त हो तो क्र आज्ञा देने वाला हाकिम हो (स. चि.) । ३५५--शनि दशमेश ओर अष्टमेश युक्त होकर केन्द्र या कूर अंश में हो तो कठोर आज्ञा देने वाला हो (स. चिं.) । ३८६--दशमेश जिसके नवांश में हो वह शनि से सम्बन्धी हो पष्ठेश का भी सम्बन्धी हो तो उसके बहुत दास हों (स. चिः) ।

राजयोग : ३७७

३८७--दशम में शुभ ग्रह की दृष्टि हो या दशमेश शनि युक्‍त हो तो भी उपर -रोषत फल हो (स. चिं.) । ३८८--दशमेश का नवांशेश शनि युवत हो या किसी केन्द्र में हो तो दास दासियों पर हुकूमत करे (स. चिं) । ३८९~-शनि या राहु दशम में हो नवमेश से दृष्ट हो, लग्नेश नीच ग्रह के साथ हो तो राजा के बरावर हो (स. चिं.) । टिप्पणी--३८० और ३८९ में लग्नेश के विषय में एक मत कहता है नीच ग्रह युक्‍त न हो दूसरा मत कहता है नीच ग्रह युक्त हो इससे नीच ग्रह युक्त न हो ऐसा पाठ ठीक है । राहु के योग (उपरोक्त के अतिरिक्त) ३९०--उच्च का राहु हो तो हाथी घोड़ा नौकर चाकर जमीन आदि युवत बड़ा पंडित हो अपने कुल में उच्च हो (मान.) । ३९१--छरन में उच्च का राहु हो तो कुल दीपक हो (जा. सं.) । ३९२--राहु या केतु दशम या अष्टम में हो नवमेश नीच राशि में हो कूर आज्ञा वाला हाकिम हो (स. चि.) । हू ३९२--राहु दशम में मांदि युक्त हो या मांदि दशम में हो राहु केतु अष्टम हो और नवमेश नीच में हो तो क्रूर आज्ञा देने वाला हो (स. चिं.) । २९४-२,४,५,६ राशि में राहु हो वह बहुत लक्ष्मी सम्पन्न राजाधिराज हो(मान.) । २९५--२,४,६,१० राशि में राहु हो वह बहुत लक्ष्मीवान्‌ या राज्य का स्वामी, पृथ्वी नौका वाहन युक्त बुद्धिमान्‌ कुळ दीपक हो (जैमिनि)।

` ३९६--१,३,६ राशि का राहु केन्द्र त्रिकोण या ६,८,१२ भाव में हो वह कामी, शूर, वलवान्‌ भोगी, हाथी घोड़े छत्र वाला बहु पुत्र वाला हो (जा. सं.) ।

३९७-सप्तम घर में मेष या कन्या राशि हो केन्द्र या त्रिकोण या ८,१२ घर में

राहु हो तो बड़ा कामी शूर बलवान्‌ योगी, हाथी घोड़े छत्र युक्त हो अनेक पुत्र हों

मान०) ।

॥ ३९८--अन्य मत है कि राजयोग के विचार में राहु केतु का कोई विचार नहीं करना (ज्यो. रह.)

लग्नेश के राजयोग ( उपरोक्त के अतिरिक्त )

३९९--छग्नेश केन्द्र या नवम भाव में वर्गोत्तम नवांश में हो, नवमेश अपने

उच्च का या स्वक्षेत्री हो और इसी प्रकार अंश प्राप्त करे तो राजा हो । स्वर्ण के

वाहन में हाथी पर बैठे चेंवर डुले (फल.) ।

४००--लग्नेश बली होकर केन्द्र में हो तो राजयोग करता है वह मित्र ग्रह से

दुष्ट हो तो नीच वंश में उत्पन्न भी राजा हो, राजा से पुजने वाला हो (जा. पारि.) ।

४०१--छग्नेश केन्द्र में हो शत्रु, गृही या अस्त न हो, अन्य ग्रह से युत न हो तो

सावं भौम राजा हो (जा. पारि.) 1

३७८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

४०२--लग्नेश और जन्म राशीश बली होकर केन्द्र में हो तो नीच कुल में भी उत्पन्न, उदार पवित्र राजा हो (जा. भ०) ।

४०३--लग्नेश बली होकर लग्न में, केन्द्र त्रिकोण या ळाभ में हो तो राजा हो उत्तम शील वैभव युक्त हाथी और वाहनयुक्त, नीच कुछ में भी हो तो विभूति युक्त हो (मान.) ।

४०४--लग्तेश या कारक पञ्चमेश युक्त केन्द्र त्रिकोण में हो तो वह राजा का मित्र होता है (वू, पा.) ।

४०५--लग्नेश केन्द्र मों हो दशमेश केन्द्र चतुर्थ में हो नवमेश लाभ में हो तो दीर्घं जीवी राजा हो (जा. पारि.) । ४०६--छग्नेश मित्र गृही केन्द्र में मित्र ग्रह से दृष्ट हो तो शत्रू ओं को नाश करने वाला शुभ प्रताप को करता है (जा. सं.) ।

४०७--लग्नेश की दृष्टि लग्न पर हो लग्न में सिंह राशि हो तो सम्राट हो ४०८--ल्ग्नेश लग्न में, द्वितीयेश घन भाव में, चतुर्थेश चतुर्थ में हो या नवमेश भी लग्न में हो हाथी या गद्दी प्राप्त हो (जा. लं.) ।

४०९--लग्नेश स्वगृही या उच्च का होकर लग्न को देखता हो और ३,६,८ घर में अपने-अपने नीच के ग्रह हों तो राजा हो (वृ. पा.) । ४१०--लग्नेश स्वगृही या उच्च का होकर लग्न को देखता हो ६,८,१२ के भावेश नीच, शन्‌, गृही या अस्त हों तो राजयोग होता है (वृ. पा.) 1 ४११--लग्नेश उच्च का हो, नीच या शत्रु, नवांश में हो और केन्द्र में कोई ग्रह न हो राजा हो (जा. पारि.) । पा ४१२--छग्नेश ओर धनेश धन भाव में हो तो करोड़ पति हो (जेमिनि) अन्य- मतलग्नेश या धनेश धन भाव में हो तो करोड़पति हो ।

४१३--छग्नेश पञ्चमेश नवमेश युक्त १५४,१० भाव में हो तो राजवंशी राजा हो (मध्य परा.) ।

४१४--लग्नेश मित्र ग्रह युक्त या मित्र ग्रृही होकर ३,७ भाव में आ पड़े तो सब भुमंडळ का शत्र रहित राजा हो (मान०) । ४१५--लग्नेशे पञ्चम में हो पंचमेश लग्न में हो आत्म कारक और पुत्र कारक दोनों लग्न या पंचम में हों (कारकांश या उससे पंचम में हो) अपने उच्च राशि या नवांश में तथा शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो यह महाराज योग होता है इसमे विख्यात और सुखी होता है (वृ. पा.) । ४१६--ऊभनेश स्वक्षेत्री होकर दशम में हो तो उसे राज मंडल में सेवित करता है राजा लोग सेवा करें । सेनायुक्त देवताओं में इन्द्र के समान हो (जा. स.) । ४१७--१,४,१० के भावेश दशम में हों, दशमेश यदि लग्न का सम्बन्धी होतो सिंहासन का स्वामी हो (जा. पारि.) ।

४१८--१,४,९ के भावेश अस्त न हों दशम हों दशमेश लग्न में हो तो राजकीय

राजयोग : ३७९.

शक्ति प्राप्त हो जिससे सिंहासन मिले (स. चि) ।

४१९--१,४,९ के भावेश दशम में हों दशमेश लग्न में हो वलग्न को देखता होः

तो सिंहासन मिले (जा. पारि.) ।

४२०--लग्नेश ओर दशमेश यदि परस्पर स्थान में हों या दोनों एक ही साथ

लग्न या दशम में हों तो दोनों प्रकार से राजयोग होता है जगत प्रसिद्ध और विजयी

हो । लग्नेश या जिस भावेश से सम्बन्ध हो उसी प्रकार फल होगा (म. प.) ।

४२१--छग्नेश, चतुर्थेश, चञ्चमेश दशमेश किसी भी भाव में हो परन्तु इनमें से

कोई नवमेश के साथ हो तो राजयुक्त बहुत वाहनों से युक्त हो अपने प्रताप से समस्त

पृथ्वी व्याप्त करता है (म० प०) 1

४२२--१,४,६,७,९,१२ भाव के स्वामी सुखेश युक्त हो तो असंख्य देशों को

प्राप्त करे (जा० पारि०) ।

४२३--लग्नेश चतुर्थेश युक्त इष्ट हों तो धन वाहन का स्वामी हो (जा. पारि.) 1

४२४--१,४,९ के भावेश वाहन का कारक एक साथ हो तो सिंहासन मिले (प्रा० यो०) ।

४२५--लग्नेश चन्द्र से उपचय में हो शुभ ग्रह युक्त या शुभग्रह के नवांश में हो

तो इन्द्र के समान राजा हो (जा० पारि०) ।

४२६--लग्नेश शुभग्रह से दृष्ट हो और पापग्रह ३,६,११ भाव में हो तो पूजनीय

तेजस्वी राजा हो (जा० पारि०) ।

४२७--लग्नेश बली होकर पूर्ण चंद्र से दृष्ट हो तो वह शत्रुओं को जीतने वाला

राजा होता है (शंभू०) ।

४२८--लग्नेश शुभग्रह हो शुभग्रह से युक्त दृष्ट हो या शुभांशक में हो तो दूसरों कोः

आज्ञा देने वाला हाकिम होता है (स चि०)।

४२९--लग्नेश से ३,६ या ११ घर में पापग्रह हो तो राजयोग प्राप्त हो (फल.)

४३० --लग्नेश या कारक से २,४,१ भाव शुभग्रह युत हो तो राजा हों (यू.पा.) ।

४३१--लग्नेश या कारक में ३,६ भाव में पापग्रह हो ता राजा हो (वृ०पा०) ।

शुभ प्राप मिश्रित हो ता धनवान्‌ हा (वृ० पा०) ।

४३२---लग्नेश चर राशि चर नवांश में हा, लग्न चर राशि हा, नवमेश भी चर

राशि में हा ता राजयोग हा वह परदेश में जाकर राजा हा (स० चि०)।

४३३--लग्नेश की राशि का नवांशेश जिस घर में हा उस राशि का नवांश

` स्वामी यदि शक्तिशाली होकर सर्वोच्च विशेषिक अंश में हा ओर द्वितीयेश हा जावे

तो यह राजा हो । गृण में गुरु के समौन हो (स० चिं०)।

मान लो वृष लग्न है तो लग्नेश शुक्र हुआ लग्न कुण्डली में यह अष्टम में घनु

का है जिसका स्वामी गुरु है ! अब नवांश कुण्डली में देखा तो यह अष्टमेश गुरु लग्न

में मेष का है ता यह गुरु मंगल के घर में है यहाँ बताया है यदि यह मंगल उच्च

आदि में होकर दूसरे स्थान का स्वामी हो जावे तो उक्त फल होगा ।