सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
२९० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
खोटे आचरण को स्त्री से भोग करने वाला, बडा बकवादी, अनेक व्यसनो में आसक्त,
गाने बजाने के समय और पाप युक्त होता है । झूठ बोलने वाला (जा० qo) (मान०) ।
वृष के बुध सदृश फल (qo जा०) 1
८-बुध वृश्चिका का--कृपण स्त्रियों के साथ भोग में आसक्त, श्रेष्ठ कर्म और सुख
से होन, हानि और आलस्य युक्त, गुणों में दोष देने वाला, कृपण (जा० wo) (मान०)।
मेष के बुघ सदृश फल (qo जा०) ।
९-बुघ घनु का--दानो, धनी, कला कुशल, कुछ पालक, कमाई हुई श्रेष्ठ लक्ष्मी
युक्त, भाग्यशाली, योग्य स्त्रियों के साथ रमण करने वाला (जा० भ०) (मान०) । राज
पूजित, या राज बल्लभ, विद्वान्, व्यवहार जानने वाला, समय के अनुकूल बोलने घाला
० जा०) । 31 मकर का- शत्रु के भय से युक्त, दृष्ट बुद्धि, काम कला रहित, दूसरों का
काम करने वाला अर्थात् नोकर, व्यसनी, नम्र स्वभाव (मान०) (जा० भ०) शनि क्षेत्री
(१०-११ राशि का)--पराया काम करने वाला, दरिद्री, शिल्प कर्म करने वाला, कुणी,
पराई आशा पर रहने बाला (वु० जा०) ।
११-वुध कुम्भ का--घर में कलह हो, दीनता, हल्कापन, घन, पराक्रम सर घम से
होन, दुष्ट बुद्धि, शत्रु दारा ताप ( मान० ) ( जा० भ० ) । मकर के बुध समान फल
(बु? जा०) ।
१२-बुघ मीन का--दूसरे के घन आदि का रक्षक, देव ब्राह्मण का गनुझर, श्रेष्ठ
स्त्रियों के सुख का दर्शक ( मान० ) ( जा० भ० ) । पराई सेवा में तत्पर, उसके सेवक
जीते हुए रहें, पराया अभिप्राय जानने बाला, नीच, शिल्यी (या सेवक से पराजित )
(qo जा०) ।
गुरु का राशि फल
१-गुरु मेष का--अति उदार, उत्तम कर्म करने वाला, अघिक्र शत्रुओं वाला, अति
वैभव युक्त, मति पूर्वक काम करने वाला, प्रारब्धवान्, बडो बुद्धि (जा० wo) (मान०)
भौम क्षेत्री (६-८ राशि का)--सेनापति, घनाढय, बहुत स्त्री युक्त, दाता, अच्छे भूत्य,
क्षमावान्, तेजस्वी, गुणवतो स्तरा से युक्त, प्राख्यात कोति (qo जा०) ।
« २-गुरु वृष का--देव ब्राह्मण पुजक, ऐश्वयंवान्, घन वाहून ओर गौरव युक्त,
“अधिक शत्रु हों, पराक्रम से शत्रुओं को हराने वाला ( मान० ) (जा० भ०) गुक्र क्षेत्री
(२-७ राशि का)--स्वस्थ देह, सुखो, घन,१मित्रों से युक्त, सत्पुत्र वाला, उदार, सबका
प्यारा (व्० जा०) ।
३-गुरु मिथुन का--क्रषि, प्रिय बोलने वाला, पवित्र, निर्मळ स्वभाव में रुचि,निपुण,
अनेक मित्र (मान०) (जा० qo) । बुध क्षेत्रो (३-६ राशि का)--घर परिवार बहुत,
पुत्र और मित्र बहुत, सुख युक्त, मन्त्री हो (बु० जा०) ।
४-गुरु कक का--अनेक घन युक्त, कामदेव के मद से मत्त, अनेक शास्त्र ब कलाओं
भिन्न-भिन्न राशि में ग्रहो का फल : २९१
सें कुशल, प्रिय वचन भाषी, चतुर, घोडा आदि वाहन युक्त (मान०) (जा०भ०) । मणि,
युत्र, घन, स्त्री, ऐश्वर्य, बुद्धि, सुख इनसे युक्त (qo जा०) 1
५-गुरु सिह का--पहाड़ किला कोट का स्वामी, अपनी प्रभुता के कारण बन आदि
आप्त करने वाला, दृढ् शरीर, दानी, शत्रुओं के वेभव को हरने वाला, प्रिय वाणी (मान)
(जा० भ०) । सेना समूह में श्रेष्ठ या सेनापति । कक के गुरु में बताया फल भी होवे
(o जा०) ।
६-गुरु कन्या का--पुष्प गन्ध, उत्तम वस्त्रघारी, शुद्ध, धन ओर दान में बुद्धि, सुन्दर
स्वरूप, शत्रुओं को सदा तपा देने वाला (मान०) (जा० भ०) । मिथुन के गुरु समान
फल (qo जा०) 1
७-गुरु तुला का--उत्तम सत्पात्र, अनेक पुत्र, जप होम यज्ञादि में उत्सव मनाने वाला,
देव ब्राह्मण पूजक, दान करने में वृद्धि चतुर, शत्रु युक्त, घबड़ाहट युक्त, आतुर, अहित
करने वाला (मान०) (जा० भ०) 1 वृष के गुरु सदृश फल (qo जा०) 1
८-गुरु वृश्चिक का--घन नाश करने वाला, दोषों से उत्पन्न दुबे देह, वडा
'याखंडी, घर की ओर से और बाहर से भी सदा दुःखी (मान०) (जा० भ०)॥ मेष के
सदृश फल (qo जा०) 1
९-गुरु घन का--घन का दान करने का प्रेमी,नम्न, बहुत वैभव, घन वाहन युक्त,
तीव्र बुद्धि, श्रेष्ठ रुचि से सुन्दर आभूषण वाला (मान०) (जा० भ०)। स्वगृही (९-१२
राशि का) मांडलीय (कुछ गांवों का स्वामी) व प्रधान व सेनापति और धनवान्
(३० जा०) ।
१०-गुरु मकर का--भ्रष्ट बुद्धि, पराया काम करने वाला, कामदेव रहित, भय
"क्रोध युक्त, कमं मनोरथों वाला या परकार्य नष्ट कर अपना मनोरथ सिद्ध करने वाला
(मान०) (जा० भ०) । नीच कर्म करने वाला, अल्प घन, दुःखित (qo जा०) ।
११--गुरु कुम्भ का--सदा रोगी, अति कुबृद्धि, घन से रहित, अत्यन्त कृपण, पाप
युक्त, खराब भोजन, दाँत और उदर में पीड़ा, (मान०) (जा० भ०) । कर्क के गुरु
समान फल (वृ० जा०) ।
१२-गुरु मीन का--राजा की कृपा से धन प्राप्त, सुन्दर मुख, घर का साधन करने
चाला, दान में तत्पर, सत्पुरुषों का प्यारा, मित्रों को सोख्य देने वाला, अपने को पवित्र
मानने वाला, काम की उन्नति वाला, (जा० भ०) (मान०) । “घनु के गुरु के समान फल (ge जार) ।
६-- शुक्त का राशिफल
१--शुक मेष का--घर, वाहन समूह ओर नगर का स्वामी, परदेश जाने को मन,
कविजनों का साथी, शत्रुओं से रहित, आदर पाने वाळा, ( मान० ) ( जा० भ०)
सोम क्षेत्री शुक्र ( १-८ राशि का )-परस्त्रियों में आसवत, परस्त्रियो द्वारा उनका
'घन हरण करावे, कुल पर कलंक लगावे ( qo जा० ) ।
२९२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
२-शुक्र वृष का--बहुत स्त्री पुत्र, उत्सव तथा गौरव सहित, पुष्प गंघ में रुचि,
खेती का काम करने वाला, शत्रुओं से रहित या अल्प शत्रू, लक्ष्मी से सम्पन्न (यान०)
( जा० भ० ) स्वक्षेत्र ( २-७ रात्रि का )-अपने बल से घन पावे, राज पुज्य, अपने
बंघुजनों में प्रधान, विख्यात, निर्मय, (वृ० जा०) ।
३-शुक्र मिथुन का--सस्पूर्ण शास्त्र व कलाओं में कुशळ, सरल मनोहर वचन,
मिष्ठान्न भोजन का इच्छुक (मान०) (जा० भ०)। राज्य कायं करने वाळा, धनवान्,
गीत वाद्य आदि कला जानने वाला (qo जा०) ।
४-शुक्र कके का- श्रेष्ठ कर्मों में बुद्धि, गुण सम्पन्न, सबको कलायुक्त वचनों से वश
में करने वाला, मघुर वाणी ( मान० ) ( जा० भ० ) दो स्त्री हों, माँगने वाला, भय
युक्त, उन्मद; अति दुःखो (qo जा०) ।
५-शुक्र सिंह का--स्त्रियों से घन मान और सुख पाने वाळा, अपने मनुष्यों से दुःख
पाने वाला, मित्रों को संतोष करने वाला, शत्रुओं का नाश करने वाला (जा० wo)
(मान०)। स्त्री का कमाया घन पावे, स्त्री उसकी प्रधान रहे, अल्प संतान, (qo जा०)।
६-शुक्र कन्या का--अति धनवान्, तीर्थ करने वाला, अति लक्ष्मीवान्, अल्प बोलने
वाला (जा० भ०) (मान०) 1 अति नीच कमं करने वाला (वृ जा०) ।
७ शुक्र तुला का- पुष्प और विचित्र वस्त्रों का प्रेमी, घनयुक्त, देशान्तरों में आने
जाने वाला, उत्तम कवि (जा० भ०) (मान०) । वृष के शुक्र समान फल (वू०जा०) ।
८-शुक्र वृश्चिक का--कलह एवं हत्या करने का इच्छुक, निदा का पाश; विषय
इन्द्रियो में रोग, व्यसन युक्त, कभी कभी घन से युक्त (मान०) (जा० अ०)। मेष में
शुक्र समान फळ (वृ० जा०) ।
९-शुक्र घनु का--पुत्र स्त्रो युक्त, धन का आगमन व उत्सव सहित, राजा का
मंत्री, श्रेष्ठ शील, कवियों में प्रेम रखने वाला, घर में वैराग्य रखने वाला (जा० भ०)
(मान०) । बहुतों का पूज्य घनवान् (qo जा०) ।
१०-शुक्र मकर का--बड़ा कामी, स्त्री में प्रीति, व्यसनी, अधिक खचं, भय सहित,
अत्यन्त चितायुक्त, संगीत प्रेमी, कवि, जंगल में रहने का मन करने वाला (मान०)
(जा० wo) । शनिक्षेत्री (१०-११ राशि का) सब का प्यारा, स्त्रो के वश में रहने
चाला, कुत्सित स्त्री में आसक्त (qo जा०) ।
११-शुक्र कुम्भ का--वस्त्र भूषण आदि भोगों से हीन, सत्कर्म करने में आसो,
चनी होकर भी निघंन हो जाता हे (मान०) (जा० भ०) । मकर में शुक्र के समान
फूल (qo जा०) ।
१२-शुक्र मीन का--राजा की कृपा से वैभव प्राप्त, शत्रुओं पर आक्रमण करने
वाळा, घन को प्राप्त, दोन मनुष्यों को घन देने में मन, नम्रता युक्त, तैरने में प्रीठि + (जा० भ०) (मान०) । बिहान् और सम्पन्न, राजपूजक, सबका प्यारा (qo जा०) ।
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भिन्न-भिन्न राशि में ग्रहो का फल : २९३
७--शनि का राशिफल -
१-शनि मेष में--घन से होन, दुर्बळ देह, पुरुषों से विरोध करने वाला जिससे
मनोरथ की हानि, मित्रों से बिरोध, शांति रहित (मान०) (जा० भ०) । मूखं, फिरने
वाला, कपटी, नेत्र रहित (qo जा०) 1
२-शनि वृष का--स्त्री के सुख से होन, चुगलों या दुष्ट जनों का संग, बुद्धिहीन,
पुत्रोत्सव से रहित (जा० wo) (मान०) । बहुत स्त्री, अगम्या से गमन, ऐश्वर्य रहित (go जा०) ।
३-शनि मिथुन का--ज्यादा चलने से ओर निर्मलता से रहित, घर को छोड़ कर
बाहरी भोगों के कुतुहल से हीन, सज्जन पुरुषों से आनन्द कभी नहों प्राप्त, हास्य विलास
आनन्द करने वाळे सुख को नहीं पाता (जा० भ०) (मान०) । बुध क्षेत्री-निलंज्ज,
दुःखित, अपुत्र, लिखने में भूल करने वाला, रक्षा स्थान (कारागार) आदि का स्वामी
तथा प्रधान (qo जा०) ।
४-हानि कर्क का-<दुबंल देह, माता से रहित, लक्ष्मी के कारण उत्तम भोगविलास करने वाला, धनवान्, शत्रुओं का नाशक, समता रखने से हीन (जा० To)
(सान०) । दरिद्री, दंत रोगो, मातृ रहित, पुत्र रहित, मूर्ख (qo जा०) ।
५-शनि सिंह का--लिखने को विद्या में कुशल, कलह करने में मन, उत्तम शील
(स्वभाव) से हीन, नोति मार्ग से बहिष्कृत, पुत्र स्त्री से पीड़ा को प्राप्त (जा० भ०)
(मान०)। मूर्ख, दुःखित, पुत्र रहित, भार ढोने वाला या दास कर्म करने वाला
[वृ० जा०) ।
६-शनि कन्या का--जो कुछ काम करे असफलता पावे, विनय से हीन, चञ्चल,
स्नेह वाला, कभी बलयुक्त कभी बलहीन, चलायमान मन, नम्नताहीन (जा० To)
(मान०) । मिथुन के शनि सदृशफल (qo जा०) ।
७-शनि तुला का--अपने कुल में राजा के समान बलयुक्त, अधिक कामी, दरिद्रं
को दान देने वाला, राजा से सम्मान प्राप्त, (मान०) (जा० भ०)। प्रख्यात कीति,
समूह प्राम सेवा आदि में पुज्य और धनवान् (बु० जा०) ।
८-शनि वृश्चिक का--विष अग्नि तथा शस्त्र से भय, धन का नाशक, शत्रुओं तथा
रोग से पीडित, विफलता युक्त, इच्छित सुख से रहित ( मान० ) ( जा० भ० ) । मारने
आंघने वाला, हत्यारा, चपल, निदंय ( qo जा० ) ।
९--शनि घनु का-पुत्र गण से परिपूर्ण मनोरथ वाला, विख्यात कीति, उत्तम
जीविका, वैभव ओर संतोष युक्त ( मान० ) ( जा० भ० ) । गुरुक्षेत्री (९-१२ राशि का)
स्वयं अंत अवस्था में सुख पाने वाला, शुभ कमं से मृत्यु, दुर्मरण, अपघात, अत्पमृत्यु
जलप्रवाह, दुर्गपात, अग्नि विष शस्त्र आदि से न होगी । राजद्वार में उसकी प्रतीति हो,
अच्छी स्त्री युक्त, सत् पुत्र, सत् घन युक्त, सेवा या ग्राम का अघिनेता (qo जा०) ।
१०--शनि मकर का-राजा में प्रीति रखने से महत्त्व पाने वाला, अगर, पुष्प
कस्तुरी, उत्तम चंदन तथा उत्तम सुगंधित द्रव्यो से सुख ( जा० भ० ) ( मान सा० )1
२९४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
स्वक्षेत्री-पराई स्त्री व पराये धन से युक्त, ग्राम सेवा में अग्रणी ( मुख्य ), नेत्र मंद हो,
सदा मलिन शरीर, स्थिर घन व ऐइवयं वाला ( वृ० जा० ) 1
११- शनि कुम्म का- व्यसन करने वाला, शत्रु से हार पाने वाला, कर्तव्य कर्म करने
से रहित, अच्छे मित्र युक्त किन्तु छात्रुओं के मदंन करने में सहायता होन, वडा घनी
(जा० अ० ) ( मान० ) मकर के शनि सदृश फल (qo जा० ) ।
१२--मीन का शनि-विनय, व्यौहार तथा सुशीलता युक्त, सब मनुष्यो में विख्यात
गुण वाला, उपकार करने में निपुण, अनेक वैभव युक्त ( मानसा० ) ( जा० भ०) 1 घनु
के शनि सदुश फल ( qo जा० ) ।
राहु का राशि फल
राहु कन्या या मिथुन का ६ या ८ घर में, केन्द्र या त्रिकोण में हो तो--शूरवोर,
बलवान्, सुभोगी हो, घर में हाथी आदि वाहन पुत्र व रत्न आये और आनन्दित हो
( प्रारब्ध योग ) ।
७
अध्याय--१४
द्वादशा भावों में भिन्न-भिन्न राशियों का फळ
१ लग्न में राशियों का फल
१-लर्न में मेष-छाल शरीर. कफ प्रकृति, अधिक क्रोधी, कृतघ्न, मंद'ईडि, स्थिरता
युक्त, स्त्री तथा नोकरों से सदा पराजित । fA
२-लन् में वृप--मानसिक रोग; स्वजनों से अपमानित, प्रिय पुरुषों से वियोग,
कलह युक्त, सदा दुःखी, शस्त्र से घात, धन क्षय ।
3— में मिथुन-गोरांग, स्त्री में आसक्त, राजा से पीडित, दूत का कर्म करे, प्रिय
याणी, बड़ा नम्र, गान विद्या में प्रवोण, सिरके बाल उत्तम ।
४-हरूग्न में कर्क--गोर अ ग, मित्राषिक्य, पुरुषों को इच्छा पुरी करने वाला, हँसी,
नदी में तैरने का प्रेमी, बड़ा बुद्धिमान्, पवित्र, क्षमावान्, धमं में रुचि, सेवा करके
योग्य ।
५-छर्त में सिह--पांडुवर्ण, वायु ओर कफ से पीड़ा, मांस प्रिय, बड़ा तीक्षण, शुरवीर, बड़ाढीठ, निरंतर भ्रमण करने वाला ।
६-लग्न में कन्या--वात पित्त इलेष्म युक्त, प्रिय स्त्रो से पराजित, वासना से डरपोक, मायावी, शुभ कांता को भावना करने वाला, काम से पीड़ितांग ।
७-लग्न में तुला--कफ युक्त, सत्य वक्ता, सदा स्त्रियों से स्नेह, राजा से मान, देव
पुजन में तत्पर ।
< न ¿—s में वृश्चिक--क्रोघी, वृद्धता युक्त, राजा से पीड़ित, गुणों से युक्त, शास्त्रः
क्ता में अनुरागी, शत्रुगणो को मारने वाला ।
९-लनन में धनु--राजा से सम्बन्ध रखने वाला, काय करने में प्रवीण, देव ब्राह्मण
है 7 “° क
द्वादश भावों में भिन्न-भिन्न राशियों का फल : २०५
णनुरागी, घोड़ों को रखने वाला, सुहृदजनों का काम करने वाला, घोड़े के समान जंघा ।
१०-लग्न में मकर--संतोषी, बड़ा डरपोक, पाप करने में निरत, कफ और वायु को
पीडा, लंधा शरोर, शत्र जनों से ठग विद्या करने वाला ।
११-लग्न में कुभ--धैर्य युक्त, वात प्रकृति, अविक जलसेवो, मित्र के उपकार को
शरीर समर्पण, मैंथुन प्रिय, सज्जन अनुरागी, सब पुरुषों का प्रेमी |
सत्याचार्य ने कुम्भ लग्न अच्छा नहों कहा है । यवनाचार्य ने समस्त कुम्भ लग्न को
. नहीं किन्तु लग्न में कुम्भ के द्वादशांश को अशुभ कहा है । विष्णुदत्त कहते Q कि यवन
मत से कुम्भ द्वादशांश बुरा है तो वह सभी लग्नों में आयेगा तो क्या सभो बुरे हो जायेंगे
इसीलिये उचित यही है कि कुम्म लग्न हो जन्म म अशुभ है केवल कुम्भांशक बुरा
नहीं है ।
१२-लरन में मीन--जलक्रीडा प्रेमी, बडा विनोत, स्त्री सहवास को उत्सुक, वडा
पंडित, छोटा शरीर, बडा प्रचण्ड, पित्ताधिक्य, बडा यशस्वी ।
२ धन भाव में राशि फल
१-घन में मेष राशि--पुण्य से एकत्र घन, सुन्दर नातिवान्, चतुष्पद पालन से धन,
पंडित, एक अच्छा पुत्र हो ।
२-घन में वृष--खेती से घन प्राप्त, चौपाये, अन्न मणियों से सदा घन प्राप्त या
इनको पास रखने वाला ।
३-घन में मिथुन--स्त्री के निमित्त से घन प्राप्त करे, सुवर्ण चाँदी के आभूषण और
बहुत वाइन युक्त, साधुजनों का प्रिय ।
४-घन में कर्क--वृक्ष, जल से उत्पन्न किया घन, जल से भय, वन के कंद मूल आदि
भोजी, न्याय से धन संग्रह कर्ता, पुत्रों से प्रीति ।
५-घन में सिह--बनवासी, घनवान्, तप करने वाला, मान पाने वाला, सब का
उपकारो, अपने पराक्रम से घन एकत्र करने वाला ।
६-चन में कन्या--राजा से घन प्राप्त, सुवर्ण मोतो आदि तथा हाथी घोड़े आदि
से उत्पन्न किया घन होता है ।
७-घन में तुला--पुण्य प्रताप से पाषाण से भी घन निकले, मही के व्यापार से
शारीरिक पीडा से तथा खेती द्वारा उत्पन्न घन को एवं कर्म द्वारा उत्पन्न घन को पाता
है । खरीदने बेचने से या न्याय से इकट्ठा किया घन होता है ।
८-घन में वृश्चिक--स्वघमे पालन, काम इच्छुक, सदा विचित्र बात कहने वाला,
ब्राह्मण देव भक्त ।
९-घन में घनु--स्थिर विधान से उत्पन्न किये घन का पाने वाला, उत्तम चतुष्पद
पालन से घन, यशस्वी, रस से उत्पन्न वस्तुओं को खाने वाला, घर्म विघान का लोमी ।
१०-धन में मकर--अनेक प्रपंच से तथा अनेक उपायों से घन पाने वाळा एवं राज
सेवा से, खेती से, विदेश जाने से घन प्राप्त करने वाला ।
२९६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
११-घन में कुम्भ--फूळ फल से तथा जल से अधिक घन हो । किसी धनिक से प्राप्त
घन को साघु सेवा और परोपकार में लगावे ।
१२-धन भाव में मीन--नियम उपवास करने से, विद्या के प्रभाव से, किसी जगह
खजाने के मिल जाने से ओर माता-पिता के संचित घन के प्राप्त होने से बड़ा
घनवान् हो ।
तृतीय भाव में राशि फल
१-तृतीय भाव में मेष--ब्नाह्मणों का मित्र, परोपकारी, कथा श्रवण में पवित्र,
विद्वान्, राजपुज्य ।
२-तृतोय में वृष--राजा का मित्र, प्रतापी, अतिथि को घन देने वाळा, यशस्वी,
विद्वान्, कवि, विप्र अनुरागो, अच्छे घन वाला, भूमि पशु खजाने वाला ।
३-तृतीय में सिथुन--श्रेष्ठ वाहन, स्त्रियों को प्रिय, सत्यवक्ता, उदार चित्त, कुलोन
राजपुज्य ।
४- तृतीय में कर्के वैश्य के घर मित्र लाम करे, कृषक, धर्म कथा अनुरागी,
र शील, अहंकारो ।
५-तृतीय में सिह--श्रवोर, दुष्ट मित्र, श्रेष्ठ घन का लोभो, प्राणियों के मारने की
चेष्टा करने वाला, पाप चर्चा करने वाला, प्रचंड वाक्य भाषो, गवे रहित ।
६-तृतीय में कन्या--शास्त्र विद्या अनुरागो, सुशील, मित्रों से स्तुति प्राप्त, विन्न
प्रिय, अति क्रोधी, देव गुरु भकत ।
७-तृतीय में तुला-पापी मित्र, चंचळ स्वभाव, चपळता की बातें करने वाला,
अनेक मनुष्य युक्त, अल्प सन्तान ।
८-तृतोय में वृश्चिक--इसकी मित्रता पापी से, दरिद्री से, कृतघ्न से, कलही से, अकारण झगडा करने वालों से, बिरुद्ध आचरण करने वालों से होती है । ९-तुतीय में घनु--राजा का मन्त्रो, श्रवोर, राजा का सेवक, धर्मात्मा, प्रसन्न मूति, जित चित्त, दयालु, युद्ध कोविद, मनुष्यों से घन प्राप्त करने वाला 1
=s ०-तुतीय में मकर- शांत प्रकृति, अनेक पुत्र, देव गुरु मित्र का प्रेमी, धनो ' पंडित l
११-तृतीय में कुम्म--ब्रती, कीति युक्त, क्षमाशील, सत्यवक्ता, सुशील, गीत प्रिय, ग्राम का अधिकारी और खल होता हैं ।
१२-तृतीय में मीन--बड़ा घनी, अनेक पुत्र, पुण्य और घन सम्पन्न, अतिथि प्रिय सबको आनन्द दाता ।
र चतुथे भाव में राशि फल
; (१) चतुर्थ में मेष---चतुष्पदों से, दो स्त्रो जनों से, विचित्र भोगों से, अन्नपान आदि से अपने परुषार्थ से उपाजित घन ने सोस्य प्राप्त, नोकरों से सुख प्राप्त हो ।
द्वादश भावों में भिन्न-भिन्न राशियों का फल : २९७
(२) चतुर्थ में वृष--अनेक मान्य पुरुषों से, श्रवीरता से, राज सेवा से, प्रिय उपचारों से, अनेक नियम ब्रत करने से सुख पाने वाला ।
(३) चतुर्थ में मिथुन--स्त्रियों के लिये विविध सुखों को प्राप्त, जलक्रीडा तथा वन
फूलफळ आदि से तथा बहुत से पुष्प और वस्त्रों से सुख प्राप्त ।
(४) चतुर्थ में कक--छूपवान्, सुभग, सुशील, स्त्रियों को सम्मत, सवं गुण सम्पन्न
विद्या में प्रवीण, मनुष्यों को प्रिय, तथा जल से उत्पन्न, कूप तालाब आदि से व बगीचा
आदि से सुख ।
(५) चतुर्थ में सिहत क्रोध के कारण कभो सुख'न पावे, कन्या संतान हो,
दरिद्रता हो, शोल रहित ।
(६) चतुर्थ में कन्या--बहुत घन होने के कारण कुमित्र संगी, चुगलों के संग से चोरो
के निमित्त से और मोहन उच्चाटन आदि से सुख नहीं पाता ।
(७) चतुर्थ में तुला--सौम्य सरल स्वभाव, गुम कम में दक्ष, विद्या विनीतवान्,
सुख सम्पन्न, प्रसन्न चित्त, अनेक घन सम्पन्न ।
(८) चतुर्थ में वुष्विक--विपत्ति युक्त, तीक्ष्ण शत्रु से भयभीत, बहुत सेवा करने वाला, पराक्रम के घमंड से रहित, बडा चतुर, बुद्धिमान् मनुष्यों से हीन ।
(९) चतुर्थ में घन--संग्राम में सुखी, संग्राम कोर्तन से, विचित्र घोड़ों से, अपने
उद्यम से सुख पावे या घन प्राप्त करे ।
(१०) चतुर्थ में मकर--जल सेवन से, बावली तालाब बगीचा आदि के सम्बन्ध
से सुख, प्रधान मित्रों के उपचारों से व पिता की सेवा से सुख का भागो हो ।
(११) चतुर्थ में कु म--स्त्री के आश्रय से, मिष्ठान्न पान से, फळ शाक पत्र से,
न्वछुराई के वाक्यों से, उत्साह करने वाले उत्तम वाक्यों से अनेक प्रकार सुख पाने वाला t
(१२) चतुर्थ में मोन--जल के आसरे से, देवताओं के निमित्त से, सुन्दर वस्त्रों से,
विचित्र सुंदर धनों से सुख पाने वाला, मन्द गमन करने वाला 1
पंचम भाव में राशि फल
(१) पंचम में मेष राशि--प्रिय मित्र के साथ, पुत्रों के साथ एक सम्मति होने के
कारण, एवं देव पूजा के आश्रय से अनेक आनन्द मिले तब मी पापों में फेंसने के कारण
उसका मन व्याकुल रहे ।
(२) पंचम में वृष--स्त्रो भाग्यवती, रूपवती, संतति रहित, तेजस्वी पतित्रता मिले ।
(३) पंचम में मिथुन--पुत्र मन को सुख देने वाले, शील युक्त, गुणवान्, परस्पर
श्रीति युक्त विनय करने वाले महाबली ऐसे अनेक पुत्र हों ।
(४) पंचम में कर्क--बड़ी कीतियुक्त, महानुभाव, घन युक्त, विनय युक्त, सर्वत्र
असिद्ध पिता को प्रसन्न करने वाले कई पुत्र हो 1
(५) पंचम में घिह--ऋूर स्वमाव वाले) विशाल नेत्र वाले, मांस प्रेमी, कस्या उत्पन्न करने वाले, विदेश में रहने वाळे बड़े तीव्र ओर भुधायुक्त पुत्र हो ।
२९८ t ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय खण्ड फलित
(६) पंचम में कन्या--पुत्र संतान से रहित, अपने पति को प्यारी, पुण्यवती, बड़ी ढीठ, शांत, पाप वाली, आभूषण की प्रेमी, अनेक कन्यायें हों ।
(७) पंचम में तुछा--अति सुशील, मनोहर, रूपवान्, क्रियावान् और विशाल
नेत्र वाले पुत्र हों । (८) पंचम में वृशचिक- बड़े सुन्दर सुशील, अज्ञात दोष, स्वघमं स्नेही, पुत्र हों स्वयं घर्म में तत्पर हो ।
(९) पंचम में घन--अति विचित्र, घोड़ों से स्नेह रखने वाला, धनुविद्या का ज्ञाता,
शत्रु नाशक, गुरु सेवी, राजमान्य पुत्र हो ।
१०) पंचम में मकर--पाप में बुद्धि वाळे, कुरूप, नपुंसक, कुत्सित भाव युक्त
प्रमाद से रहित, अति निष्ठुर और प्रेम रहित पुत्र हों ।
(११) पंचम में कुभ--स्थिरता युक्त, गंभीर चेष्टा वाले, अति सत्य वक्ता, सर्वत्र
प्रसिद्ध, कष्टों के सहने वाले, बहुत प्रिय, यश से युक्त पुत्र हों । (१२) पंचम में मोन--ऐसे पुत्र हों जो स्त्री संग करने से ललित, गोरे रंग वाले, रोगी, कुरूप, हास्ययुक्त स्त्री सहित (सब पुत्रों के विवाह हो जावे) ऐसे पुत्र हों । षष्ठ भाव में राशि फल
(१) षष्ठ भाव में मेष राशि--मनुष्य शत्रु से वैर करने वाले ।
(२) षष्ठ में वृष--कुटुम्बी स्त्रियों से (पुत्र बघू आदि से) भोग करने के कारण
भाई बंदों से बैर।
(३) षष्ठ में मिथुन--अपनी स्त्री से वैर करने वाला, पापो, मनुष्यों से, बनिये से
आर नीच जनों से अनुराग रखने वाले मनुष्यों से वेर करने वाला । (४) षष्ठ में कर्क--पुत्र निमित्त से आतु र होने के कारण, ब्राह्मणों से, राजाओं से महाजनों से झगड़ा हो जाने से भय प्राप्त । यह सब दूसरों के अनुरोध से होता है ।
(५) षष्ठ में सिह--पुत्रों से, भाई वंदों से वैर, वेश्याओ से भोग करने के कारण सारा घन नष्ट ।
(६) षष्ठ में कन्या--कोई वरी न हो परन्तु दुष्टा व्यभिचारिणो, नीच जाति की और निराश्रित रहने वाली अनाथ विधवा तथा वेश्या के संग रहने के कारण कंगाली आ जावे ।
(७) षष्ठ में तुला--रखे घन के कारण पूर्ण धनी होता हुआ भी घर्म कार्य में साघु मनुष्यों से व अपने बंधु वर्ग से एवं अपने घरवार से भी वर होता है । (८) षष्ठ में वृशचिक--सर्पो से व चुगुलखोरों से, बिच्छ कनखजर आदि से, काळ गणों से, हरिणो से, चोर गणों से तथा घनिकों से ओर विलासी परुषों से वेर । (९) षष्ठ में घनु--राग में फेसे हुए, घनुष बाण घारण करने वाले परुषों से और हाथी घोड़ा आदि से और पुण्य करने वाले मनुष्य से एवं ठग से वेर हो जाता है।
(१०) षष्ठ में मकर--घन का सूद लेने के कारण वैर साघुजनो के सहायक
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द्वादश भावों में भिन्न-भिन्न राशियों का फल : २९९
होने पर भी मित्रों के साथ वेर होता है । किसी समय उस मनुष्य को घर को प्राप्ति
होती है ।
(११) षष्ठ में कुभ--राजाओं से, जल जोवों[ुसे, वापी तालाब के निमित्त बड़े
जागीरदारों से और भी बड़े-बड़े घनीमान्य वृद्धजनो से वैर होता है ।
(११) षष्ठ में मोन--सदा अपने पुत्र पुत्रियो के साथ कलह होता है, स्त्री के
निमित्त से वस्त्र आभूषण आदि के कारण अपने खुद के. कारण से तथा परस्पर प्रिय
पुरुषों से वेर होता है ।
सप्तम भाव का राशि फल
१-सप्तम में मेष राशि--स्त्री अति दुष्ट क्रूर स्वभाव वाळो, पापिनी, बड़ी कठिन,
नृशंस, घनप्रिया ओर अत्यंत दुष्टा हो ।
२-सप्तम में वुष--अति स्वरूपा, नम्र भाषो, सोने पिरोने में चतुर, शांत प्रकृति
वाली, पतिब्रता, सुन्दर गुणों से युक्त, लक्षण वंती, ब्राह्मण देव की भक्त स्त्रो होवे ।
३-सप्तम में मिथुन--स्त्रो युक्त, सुन्दर बर्ताव वाला, रूपवान्, सद्गुण सम्पन्न
विनीत वेष वाला, गुण रहित स्त्रो संयुक्त हाता है ।
४-सप्तम में कर्क--अति मनोहरा, सौभाग्य युक्ता, गुण सम्पन्ना, सोम्यख्पा,
कुलहीना प्रिय पत्नी मिले । ;
५-सप्तम में सिह--तीव्र स्वभाव वालो, कर्कशा, अति दुष्टा, सुंगार होन, दूसरों
क्ले घर में रहने वाली, घन की इच्छा करने वाली, थोड़ा काम करने वालो, अति
दुर्बलांग स्त्री मिळे ।
६-सप्तम में कन्या--सुन्दर स्वरूप वालो, पुत्रों से रहित, सोभाग्य, भोग्यघन,
नीति से युक्त, प्रिय वचन भाषी, सत्यवादिनो, दृढ़ चित्त वालो पत्नी मिले ।
७-सप्तम में तुला--गुणों के गवं से युक्त अनेक प्रकार की स्त्रियों को प्राप्त, पुण्य
जिसको प्यारा, घमं तत्पर, इन्द्रियों को दमन कर्ता, पृथ्वी की तरह अति विनीत जिसके .
अनेक पुत्र हों ।
८-सप्तम में वृश्चिक--सुन्दर स्त्रो, कलाओं से अनभिज्ञ, अति कृपण, सुणिक्षित,
नम्रता से रहित, अनेक दुर्भाग्य सूचक दोषों से सम्पन्न ऐसी स्त्री मिले 1
९-सप्तम में घन--अति दुष्टा, दुष्ट स्वभाव वाली, निलंज्जा, पर के दोषों को
याद करने वाली कलह प्रिया ईर्ष्या युक्त पत्नी मिले ।
१०-सप्तम में मकर--कपटी स्त्री, नीच, निलंज्ज, अति लोभी, कूर, बड़े मिजाज
वाली, पापिनी, अधिक दुःख भोगने वाली स्त्रो मिले ।
११-सप्तम में कुम--स्त्री अति.दुष्टा, कठोर स्वभाव वालो, देव ब्राह्मण पर प्रसन्न
रहे, घ्म की घ्वजा सत्य और दया से युक्त स्त्रो मिले ।
१२-सप्तम में मीन--अनेक विकारों से.युक्त, दुष्ट स्वभाव वाली, किसो का विश्वास.
न करने वाली, विशेष कलाओं से अनभिज्ञ स्त्रो मिरे 1
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३०० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अष्टम भाव में राशि फल
१-अष्ठम में मेष राशि--विदेश वासी, रोगो, अनेक आत्मा सम्बन्धी बातों फो
याद करने के कारण मूच्छित हो, बड़ा घनी, अत्यंत दुःखों से युक्त ।
२-अष्टम में qq— के विकार से घर में मृत्यु, अति भोजन से, चौपाये से या
रात्रि समय दुष्ट जन सम्पकं से मृत्यु ।
३-अध्टम में मिथुन- शत्रुओ के संग से या लाभ के कारण या रस संभव वस्तुओं
के खाने से या गुदा रोग से या प्रमेह से मृत्यु ।
४-अष्टम म कक--जल में इब कर या किसी भयंकर कीड़ा के निमित्त से या अन्य प्रकार के पुरुष के हाथ से परदेश में मृत्यु ।
५-अष्टम में सिह--किसी रेंगने वाळे से या जंगल में रहने से या चोरों के कारण
या किसी चतुष्पद के निमित्त से बन में मृत्यु ।
६-अष्टम में कन्या--अति भोग विछूस करने से या स्वचित्त को भावना से, स्त्री
की हत्या करने से, विषम आसन से या पर स्त्रियों के निमित्तं से अपने घर पर मृत्यु ।
७-अष्टम में तुला--किसी मनुष्य के हाथ से, रात्रि के समय अधिक उपवास करने
के कारण कोप करने से या अति पराक्रम करने से मृत्यु हो ।
८-अष्टम में वृष्चिक--कुष्ट आदि रुघिर रोग से या पेट में कीड़ा होने से या विष
खाने से अपने ही घर में मृत्यु ।
९-अष्टम में घनु--अति ताप देने बाले गुह्य स्थान के दोष से या किसी चतुष्पद
से या बाण से या जल से अपने हो घर में मृत्यु हो ।
१०-अष्टम में मकर--विद्या से युक्त, मान तथा गुणों से सम्पन्न, अति कामी
शूरवीर, वक्ष:स्थल चोड़े, शास्त्रार्थ करने वाला, सब कलाओं में प्रवीण ।
११-अष्टम में कुम--घर में अग्नि के लग जाने से, सारी सम्पत्ति नाश हो या
अजोब घावों से या वायु जन्य विकारों से या अधिक शुभ से विदेश में मृत्यु ।
१२-अष्टम में मोन--अतिसार की बीमारो से बड़े कष्ट से या पित्त विकार से या जल के सम्बन्ध से या रक्त प्रकोप से या शस्त्र से मृत्यु हो ।
नवम भाव में राशि फल
१-नवम में मेष--चौपायों के दान या पोषण, दया विवेक द्वारा पालन आदि
क्रिया से धर्म करने वाला ।
२-नवम में वृष--धर्मात्मा, विचित्र दान दे, अनेक गौदान से, आभूषण वस्त्र और
भोजन दान करनें से सुशोभित होता है ।
३-नवम में मिथुन--धमंमति, सरळ स्वभाव, अम्यागतों ब्राह्मणों का भोजन द्वारा
सत्कार करने वाला ।
४-नवम में कर्क- कठिन व्रत उपवास से या तीथे भ्रमण से या वन में तपस्या करने से सदेव घर्म करते रहता है ।
द्वादश भावों में भिन्न-भिन्न राशियों का फल : ३०१
५-नवम में सिह--किसी अन्य घर्म का मानने वाला, कुकमों, द्वारा अपने धर्म से दोन, अपने को ही तीथं स्वरूप मानने वाळा, विनय से रहित । ६-नवम में कन्या--स्त्रो धर्म का कट्टर पक्षपाती, कई जन्म से भक्ति रहित, पाखण्ड फा आश्रय करके या {कसो अन्य पक्ष का आश्रय करके घमं करने वाला । /°~नवम में तुछा--सदा प्रसिद्ध, धर्मात्मा, देव ब्राह्मणों की प्रसन्नता रूप और मनुष्यों के अनुराग से अनेक अद्भुत धर्म को करता gl
८-नवम में वृश्चिक--पाखण्ड धर्म में लीन, पुरुषों को पीड़ा देने वाला, भक्ति से रहित, पर पोषण आदि से हीन ।
९-नवम में घनु--सदा घमं करने वाला, देव ब्राह्मण भक्त, शास्त्रोक्त विख्यात धर्म ( सनातन ) के अनुसार संघ्यादि क्यों के लिये अधिक जल का उपयोग होता हो ऐसे धर्म को करता है ।
१०-नवम में मकर--अघमं करने वाला, प्रताप शाली, अनेक विडम्बना फे कारण वैराग्य युक्त तथा अपने कुल का आश्रय करता Ë ।
११-नवम में कुभ--देव समूह निमित्त से होने वाळे सुख को पावे, वृक्ष सम्बन्धी या बगीचा वावड़ी आदि घर्म कमं से प्रेम करने वाला ।
१२-नवम में मीन--अनेक घमं करे, सत्पुरुषों की सेवा, बगीचा तालाब आदि. निर्माण कराने से या तोर्थाटन से अनेक प्रकार से आर्थिक सुख पावे । दशम भाव में राशियों का फल
१-दशम में मेष--अघमं करने वाला, वडा दुष्ट, चुगलखोर, विनय रहित लोक में साधुजनों द्वारा निन्दित ।
२-दशम में वृष--अघिक खरचं करने वाला, साघुजनों पर दया करने वाला, देव ब्राह्मण अतिथि जनों का श्रेणी अनुसार सत्कार करने वाला ।
३-दशम में. मिथुन कर्म को प्रधान करने वाळा, गुरुजनों की आश्ञानुसार चलने
वाळा, कीति युक्त जनों से प्रीत करने वाला, बड़ा प्रतापी, खेती से जीविका ।
४-दशम में कर्क--ण्याऊ बगीचा तालाब वावड़ी आदि सम्बन्धी कर्मों को करता है,
दयालु और निष्पाप ।
५-दशम में सिह--अति पापी, अपने बलानुसार प्राणी वध रूप विकृत कर्म करने
में नित्य निदा पावे ।
६-दशम में कन्या-अज्ञ कमं करने वाला, उसके घर में स्त्री ही मालिक हो, भवित
के विरुद, तुच्छ वीर्य वाला, राजा के दरबार में मंत्री रहकर भी निघंनी हो।
७-दशम में तुला-वणिज्य के कायं को बहुतायत से करने वाला, घमं, रूप, मति
युक्त, सज्जन प्रिय, दूसरों की सम्पत्ति को प्राप्त करता ë । ë
८-दशम में वृश्चिक--सबकी भलाई के लिये कर्म करने वाला, सबों का सम्मत,
देव गुरु ब्राह्मणों के लिये खुब खच करने वाला परन्तु अति निर्दय और नीति रहित ।
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३०२ : ज्योतिश-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
९-दषाम में घन--लाभ युक्त-सब काम करने वाला, जेल से छुड़ाने आदि परोपकार
का काम करने वाला, राजा के समान भूमि और यश प्राप्त करता है ।
१०-दशम में मकर--बड़ा प्रतापी, कर्म को प्रधान मानने वाला, दया रहित, भाई
बंदों से युक्त, घमं रहित, दुष्ट सम्मत कम को करता š!
११-दशम में कु मकं को प्रधान मानने वाला, शत्रु तथा दूसरों को Sra, के
“लिये पाखंड घमं से युक्त, इष्ट लोभ से विश्वास रहित, अपने मनुष्यों के विरुद्ध काम
करता है ।
१२-दशम में मोन---सत्र कुल घामिक गुरुजनों से उपदिष्ट को करने वाला, कीर्ति
युक्त धैय शालो, आदर के साथ अनेक ब्राह्मणों को आराघन में तत्पर ।
लाभ भाव में राशियों का फल
१-लाभ में मेष--चतुष्पदों के व्यापार या राज सेवा से या देशान्तर सेवन से पूरा
-लाम हो । p
२-छाभ में वृष--सज्जनों से या स्त्रियों से, खेती करने से, या गाय आदि की सेवा
से अति लाभ ।
३-लाम में मिथुन--सदा लाम युवत, स्त्रियों को अति प्रिय, अच्छी वस्तुएं घन
“एवं सुन्दर-सुन्दर मुख्य आसन, खान पान से अनेक प्रकार का लाभ हो 1 पंडितों से भी
खूब प्रसिद्धि हो 1
४-लाम में कक--सेवा करने से या खेती से या शास्त्र को वृत्ति से, साधु जन
सम्बन्ध से अति लाभ हो ।
७ - लाभ में सिह--निदा से या अनेक पुरुषों के बध, बन्धन से या देशान्तर में
नौकरी के आश्रय से या व्यायाम से भी घन का पर्याप्त लाभ हो ।
६-लाभ में कन्या--शस्त्र से, वेद आदि से, विनय भौर अद्भुत ज्ञान से अनेक लाभ
हो और पूजा को प्राप्त हो ।
७-डाभ में तुला--विचित्र तरीके के व्यापार से पूर्ण घन लाभ हो । साघु सेवा से,
विनय से, बडे सुख को प्राप्त हो ।
८-लाभ में वृश्चिक--छल करने से, पाप करने से, अच्छे बोलने से, दूसरों की
चुगली करने झादि अनेक विकारों से अत्यंत लाभ हो ।
९-लाम में घनु--राजाओं के आश्रय से, अनेक प्रकार के भोग विलास करता है ।
संत पुरुषों की सेवा करने से या अपने ही पुरुषार्थ से और किसी साम्राज्य के मुख्य गुप्तचर
के आराधन करने से पूणे धन लाम हो ।
१०-छाभ में मकर--जहाज द्वारा, या परदेश में जाकर नौकरी करने से और
राजसेवा से बहुत घन का लाभ हो परन्तु सब लाभ अत्यन्त व्यय हो जाता Š 1 ११-छाम में कुम्भ--कुकमं करने से, दान करने से, घर्म करने से, पराक्रम से ओर.
द्वादश भावों में भिन्न-भिन्न राशियों का फल : ३०३
१२-लाभ में मीन--मित्रों के आश्रय से स्नेह से नित्य अनेक लाभ हो। व्यय भाव में राशियो' का फल (१) व्यय में मेष--सुख पुर्वक भोजन वस्त्र में, चोपाये जीवों की «अधिक संख्या बढ़ाने में और नाना प्रकार के पुरुषार्थ में अर्थात् घन वृद्धि के लिए कार्यालय आदि खोलने में बहुत खर्च हो।
(२) व्यय में वृष--किसी रियासत की प्राप्ति के उद्देश्य से, अपने पराक्रम के जताने अनेक घातु वादों से, कई पण्डितों के साथ विवाद होने से, मुकदमा मादि लग जाने विचित्र वस्त्र और स्त्रियों के निमित्त से बहुत खर्च होता है । (३) व्यथ में मियुन-स्मो निमित्त व्यसन से, भूत-प्रेत देव आदि की बाधा हटाने के अनुष्ठान पुजा आदि में, खोटे विभव से, पापी मनुष्यों के संग करने से, हाथी आदि के खरीदने में फिजूल खर्ची हो ।
(४) व्यय में कक--ब्राह्मणों देवताओं के निमित्त, यज्ञ के निमित्त, घमे काम में जैसे पाठशाला, मन्दिर आदि बनवाने में, साधुजनों द्वारा प्रशंसित कायं में बहुत खर्च हो । (५) व्यय में सिंह--संगय न करने-वाळा, अति क्रोधी, अपने रूप की सजघज बनाने में, दुष्ट कर्म के निमित्त से, सदा राजा या चोर से, पुत्रोत्पत्ति के अवसर पर संस्कार आदि सम्बन्ध में अति खर्च होता Š, सज्जनो से निद्य ।
(६) व्यय में कन्या--स्त्रियो के निमित्त से प्रसन्नतापुर्वक खर्च करने वाला, विवाह, यज्ञोपवीत आदि स्वकार्य या जातीय मांगलिक मुख्य कर्मो के निमित्त से या साघुसंग से
या राजमान से, विचित्र वाक्यों से और
से, से,
“खर्च करने वाला ।
(७) व्यय में तुला--देव ब्राह्मण का सेवक, श्रुति स्मृति के अनुकूल धर्म करने में खर्च करने बाला, अनेक यम नियम ब्रतोपवास के निमित्त से, पुत्रों के कारण से, सेवा के कारण अधिक खर्च करे जिससे संसार में खूब नाम.हो ।
(८) व्यय में वुश्चिक--दीन दुःखियों को अन्न सस्त्रादि देने से, अनेक विडम्बनाओं
से, या दुष्ट मित्र की सेवा कुबुद्धि निमित्त और चोर मनुष्य के अधिकार से बहुत खर्च
होता है ओर लोक में वह निदित समझा जाता ë 1
(९) व्यय में घनु--पापी जनों के संग से या जाति के अधिकारी मनुष्यों से क्षगड़ा
करने से मुकदमा में अधिक खर्च हो या खेती में या सेवा करने में खर्च हो ।
(१०) व्यय में मकर--पापी मनुष्यों के भोजन कराने के निमित्त से खचं, अपने
अगं के मनु्य का पूजक, थोड़ी खेती करने बाळा, अत्यन्त होन, सर्वत्र निदित ।
(११) व्यय में कुम्म--देव सिद्ध मनुष्य, ब्राह्मण, तपस्वो, वंदी जनों के निमित्त खर्च
होता है, साघुजनो के सेवन से तथा शास्त्र प्रसिद्ध करमो से विख्यात होता है । हि.
(१२) व्यय में मोन--जलयात से या कुसंग से ओर maqa पुत्रों के निमित्त से, खाने-
पीने के निमित्त से, विवाद या यात्रा के निमित्त से घन खर्च हो। . ५
३०४ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड
अध्याय १५
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल
लग्न में प्रत्येक ग्रह का GS
१--लग्न में सूयं Š
वाल्यावस्या में रोगी, नेत्र से दुःखी, नीच सेवा अनुरक्त,- प्रारब्ध से गृहस्थ सुख से
हीन, विकल रूप होकर पुत्र पोत्रों से रहित, सर्वत्र भ्रमण करने वाला ( मान० ) ।
अल्प केश, काम करने में अधिक अकमंण्यता (आळसी), क्रोधी, प्रचंड, ऊँचा कद,
घमंडी, रूक्ष लोचन, दुबला देह, शूर, अशांत, निर्दय । लग्न में कके का सूयं--नेत्र मे
मोतिया बिद हो । मेष का- नेत्र रोगी । सिंह का--रतोंघ वाला । तुला का--गरीदः
सन्तान हानि. का दुःख (फलदीप) (जा० म०) ।
शूरमा, विलम्ब से काम करने वाला । मेष का--धनवान्, नेत्र रोगी । कर्क का--
टेढ़ी दृष्टि वाला । सिह का--रात्रि अंध । तुळा--अंघा, दरिद्री (zo जा०) ।
थोड़े पुत्र वाला, सुखी निदंय, अल्प भोजी, विकल नेत्र, रण का इच्छुक-सुशोरू,
नाटक करने वाला । मेष का-ज्ञानाचार में रत। सुन्दर नेत्र, यशस्वी, स्वतन्त्र । सिंह
का- रात्रि अंध, वीयंवान् । मीन--स्त्री जन से सेवित (जा० पारि०) ।
अति तीव्र, चंचळ आत्मा, काम में व्याकुल, नेत्र रोगी, पीड़ा युक्त अंग, रक्त वर्ण
की आकृति (लग्न-चं०) ।
दुबला, स्त्री-पुत्र होन । तुला कामान हानि, विना विचारे काम फरे ( खान० खा० ) ।
प्रचंड रूप वाला, विकराल नेत्र, रतोंध याला, फुली युक्त नेत्र, कठ में ग्रह वाळा,
छाल नेत्र रुधिर नेत्र ( जातक संग्रह ) ।
या सूर्य की दृष्टि हो--क्रोघी, शरीर में वात पित्त से पीड़ा, सिर में पत्थर आदि के
चोट से कष्ट, कंठ या गुदा में व्रण या तिळ, बालपन में अनेक पीड़ा दुःख होते हैं. (जा० सं?) ।
२-- ग्न में चन्द्र का फल
घन से सम्पन्न, सुख भोगी, बलवान्, सुन्दर देह । नीच का या पाप युक्त हो--
जड़ बुद्धि, अति दोन, घन से हीन (मान सा०) ।
चन्द्र वृद्धि में-दुढ़ शरीर, दीघं जीवी, निर्भय, शक्तिशाली, घनी । क्षीण चन्द्र हो . तो-फल उल्टा हो (फल दोप०) ।
कर्क, वृष, मेष का-चतुर, रूपवान्, घनवान्, भोगों में श्रेष्ठ, गुणों से रहित । अन्य
राशि का- उन्मत्त, नीच, बहरा, Tr, विकल देह (जातकाभ्रण) । जड़ बुद्धि, प्रसन्न, धनी, स्त्री का प्यारा, धर्मवान्, कृतज्ञ, (लग्न-चन्द्रिका) 2 चन्द्र मेष छून का--बहु पुत्र । वुष--धनी । कर्क-घनवान् । अन्य राशि का-- यूया, पागल, या मूख, अन्धा, नीच कर्म करने वाला (qo जा०) ।
भिन्न-भिन्न भावों Š ग्रहों का फल : ३०५
पूर्ण चन्द्र" दीर्घायु, विद्वान् । क्षीण चन्द्र--वधिर, अंगहीन । पाप युक्त चन्द्र---
दुत और अल्पआयु । उच्च का--घनी, यशस्वी, बहुत रूपवान् (जा० पारि०) ।
धनवान्, रूपवान्, पुष्ट, कायं सिद्ध । नीच या शत्रु क्षेत्री या शत्रु दृढ हो तो-- विपरीत फळ (खान०) ।
पुर्ण चन्द्र--सुरूप, घनवान् तथा कोमल शरीर । क्षीण चन्द्र -मलिन और areq
पराक्रमी 1 मेष, वृष, ककं का चन्द्र--रूपवान, घनी । शेष राशियों का--जड़ता ध्याधि
दरिद्रता हो ।
चन्द्र हो या चन्द्र को पूर्ण दृष्टि हो--सिर में पीड़ा वात वाघा, शीतता, गौरवर्णता
हो, स्वास कास पीड़ा, शरीर में वात भ्रम और घोडा आदि पशुओं से व राजा व चोरी
से हृदय में प्रहार हो (जा० सं०) ।
3— में मंगल का फल
बाल्य काल में पेट में तथा दाँतों में रोग हो, चुगल हो, कृशांग, पापों का जानने
चाळा, शरीर श्याम वणं, चपल चित्त, नोच सेवी, मलीग वस्त्रघारी, सुख रहित, पाप
शीळ (मान सागरी) ।
क्षत ( घायल ) शरीर, अल्पायु, अतिसाहसी, विमुख, विद्या रहित, घन सहित,
कुजन के आश्रित (फल दोप) ।
बुद्धि में भ्रम, घाव युक्त देह, हठ युक्त, आने जाने का काम करने वाला
(जातकाभरण) ।
कुरूप, रोगी, वन्यु रहित, असत्य भाषी, द्रव्य हीन, परस्त्रोगामी (छ० चं०) 1
शत्रु या स्वामी से झगड़ा करने वाला, भारी रोग से पीडित, वेकार या दुःखी,
विरोधी, दुर्वल, कुटुम्ब, स्त्रो पुत्र से वियोग ( खान० ) ।
क्रूर, साहसी, घूमने वाला, अत्यन्त चंचल, रोगी ( जा० पारि० ) ।
शरीर में प्रहार आदि के घाव हो ( वृ० जा० ) ।
गुदा में रोग, कलल नाभि में कंडू खुजली कुष्ट आदि से युक्त, मध्यदेश में अंग हीन।
लग्न में भोम हो या भौम की पूर्ण दृष्टि हो-लोह या पत्थर आदि से शरीर में पीड़ा,
अत्यंत क्रोध, बालपन में रक्त पोड़ा, तथा वात रक्त रोग, मस्तक, मध्य कंठ या गुह्य अंग
में ब्रण होता है ( जा० सं० )।
४-लग्न में बुध का फल
सुन्दर स्वरूप, अति प्रसन्न, बुद्धिमान्, लम्बा, पंडित, त्यागी, थोड़ा कोमल पवित्र
भोजी, सत्य वक्ता, अति सुख भागी, सदा परदेश वासी ( मान? )!
दोघें जीवी, मिष्ट भाषी, कुशाग्न बुद्धि, शास्त्राथं में विद्वान् ( फल० ) 1
रूपवान्, दयावान्, नीतिज्ञ, साहसी, दानी, पुत्र सुख प्राप्य ( खान? ) । शांत, नम्रता युक्त, उदार, आचार में तत्पर, घैयंवान्, विद्वान्, कलाओं का जानने
वाला, बहुत पुत्रों वाला ( जा? भरण ) 1 š
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३०६ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड
गीता का जानने वाला, निष्पाप, राजाओं में पुज्य, रूप ज्ञान और यश से युक्त
और प्रगलम ( लग्न चंद्रि० ) । विद्वान् ( वृ० जा० ) । विद्या घन तप से युक्त
१ जा० पारि० ) ।
लग्न मे बुघ हो ओर कोई क्रूर ग्रह न हो-सुन्दर मति, चतुर तथा शाम्त, मेघावी गौर
प्रिय वचन भाषो, विद्वान्, अति दयालु ।
या बुघ की दृष्टि हो तो शरीर मिन्न वर्ण हो । मध्य भाग में स्त्री का सुख होवे,
शरीर में पीड़ा हो, क्रीड़ा आदि से दुःख उत्पन्न, शरीर में मसा व तिळ होवे । पेट में
गुल्म विकार 1 अल्प भोजी ( जा० सं० ) ।
५-लग्न में गुरु का फल
अनेक वस्त्रों से परिपूर्ण देह, सुवणं रत्न आदि बहु मूल्य घनों से एणं देखने में सुंदर,
राज कुलजनों का प्यारा ।
सुंदर भाग्यवान्, दीर्घजीवी संतान युक्त (फळ दो० )।
बड़ा आदमी, दिल खुश, ईश्वर भक्त, दाता, सर्दार, तेजस्वी ( खान० ) 1
विद्या युक्त, राजाओं का प्यारा, चतुर, निरंतर उदार, सुंदर शरीर ( जा० qo } 1
सुशील, प्रगल्म, रूपवान्, राजा का अभीष्ट, रोगहीन, ज्ञानी, सौम्य ( छ० चं० }।
पंडित ( qo जा० ) ।
बडो आयु, स्वच्छ ज्ञानी, घनी और ख्पवान् ( जा ० पारि० ) 1
कविता करने वाळा, सुन्दर गोत वाला, प्रिय दर्शन और दानी, योगी, राजा से
सत्कार पाने वाळा, सुख सम्पन्न, घनी, देव पूजन में तत्पर ।
गोर वणं शरीर, शरीर में वात-कफ, वालपने में सुख. सम्पदा होती है, शत्रु के द्वारा
विषयादिक झूठी निन्दा से पीड़ा होवे । राज्य से अतुळ मान ओर अनेक घन प्राप्त होवे ।
लग्न में गुरु हो उस पर क्रूर दृष्टि होतो कोई व्यथा सो उत्पन्न होवे और जो जो
विघ्न उत्पन्न होते हैं तत्काळ नष्ट हो जाते हैं ( जा० संग्रह ) 1
६-लग्न में शुक्र का फल
कार्य करने में तत्पर, बड़ा पंडित, अनेक कलायों में कुशळ, गृह में शासक्त (मान०) ।
स्वस्थ और सुंदर शरीर, सुखो, दाघंजीवन ( फल० ) 1
तेजस्वी, बुद्धिमान्, घनो, रूपवान् ( खान खा० ) ।
बहुत कलाओं में चतुर, सुन्दर वाणी, श्रेष्ठ स्त्रो से काम कला युक्त, राजा से सान
और घन ( जा० म० ) ।
सुशील, दयाबान्, सुन्दर, शुचि, विद्वान्, मनोज्ञ, कृतज्ञ ( छ० च०)
काम कला निपुण, सुखी ( qo जा० ) कामी, सुन्दर शरीर, स्त्र पुत्र युक्त, विद्वान् ( जा० पारि० )
. बहुत बोलने वाला, अनेक प्रकार को कारीगरी से युक्त, विनय सम्पन्न, गान विद्या
मं तत्पर, काव्य शास्त्र में विलास वाला, धर्मात्मा ।
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३०७
लग्न में शुक्र हो या शुक्र की दृष्टि हो-गौरवणं शरीर वातपित्त युक्त, कमर, mie, -
सेट ओर गुह्य अंग इनमें ब्रण या तिल । कुत्ता व सींग वालों से और पवन से शरीर में
पीड़ा ( ज० सं० ) ।
७--लग्न में शनि का फल
घीरे-घीरे चलने वाला, ( अति दोघे सूत्री ) मन में. पीडित, महा अघम, मस्तक के
दा से 00 दुर्बळ अंग । शत्रुगृह, हो तो अपने कुटुम्बियों से विग्रह करने वाला हो मान० ) ।
उच्च या स्वगुही--राजा तुल्य या नगर का मुखिया ।
अन्य राशि में--दुःखी, बचपन से कंजूस, दरिद्री, मलिन, आलसी ( फल० ) ।
निवुद्धि, निर्बेळ शरीर, दुष्ट, कुरूप, दयाहीन, उल्टी अकल ( खान० ) ।
सदा रोगी, कुरूप, कृपण, कुशील, पाप बुद्धि, निश्चय मूख ( छ० चं० ) ।
तुळा, मकर, कुंभ का--देश नगर का स्वामी या राजा हो !
अन्य राशि का--दुःखो, रोग युक्त, दरिद्री ( जा० qo ) ।
१, २, ३, ४, ५, ६, ८ राशि का--नित्य दरिद्री, रोगी, अति कामी, मलिन 1
७, ८, १०, ११, १२, राशि का--राजा तुल्य, . ग्राम नगर का स्वामी या पंडित
हो, अंग सुस्वरूप हो ( qo जा० ) ।
दुर्नासिका, वृद्ध स्त्री वाला, रोगी, अंगहीन । उच्च का हो तो राजा के समान सुंदर
गुण हो ( जा० पारि० ) 1
खुजली से परिपूर्ण अंग, कफ प्रकृति ! न्यून अधिक अंग, कर्ण के मध्य भाग में
बात रोग ।
दानि हो या शनि की दृष्टि--छश देह, दुःखी, मूर्ख, कामी, शरीर भिन्न वर्ण का ।
लोहादि से शरीर में पीड़ा, निरंतर आत्मा की चिता ।
तुला, घनु, मीन, का शनि--राजा हो । दोष राशियों का हो तो अल्पायु हो।
<-हछग्न में. राहु फल
सदा रोगी, जुल का घारण करने वाला, बड़ा वकवादी, लाऊनेत्र, अतिपापी, चोरी
आदि बुरा काम करने वाला, साहस का काम करने में सदा, तत्पर, बडा चतुर (मान०) ।
अल्प जीवन, घनी, बली शरीर, ऊँचा अंग, सिर चेहरा आदि में रोग ( फल० )1
दुष्ट बुद्धि, खोटा स्वभाव, अपने सम्बन्धियों को ०गने वाला, शिर में रोग, वीये युक्त, .
झगड़े में जीत, रोगी ( जा० qo ) ।
दुःखी, आलसी, कुरूप, स्वार्थ परायण, रोगी, मुखं ( खान० ) । š
क्रूर स्वभाव, दयाघर्म हीन, शक्तिमान, रोगी । सिंह छनन में राहु-जल्द राज मोग
प्राप्त करता है ( जा० पारि० ) ।
इसका शनि समान फल है । सर्वांग में रोग वाला, विकल, कुरूप, बुरे केश, बुरे नख,
कुकर्मी, अधर्मी, परन्तु साहस के काम में बडा चतुर, लालनेत्र । राहु संचय. करता है ।
सिंह ककं मेष का राहु-सुवणं लाभ के लिये मंगळ कर्म करता है ( जा० सं० ) ।
३०८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित छण्ड
९.--लग्न में केतु का फल
बांघवों को कष्ट देने वाला, दुजंन से भय, मन में व्याकुलता, स्त्री पुत्र आदि के विषय
में चिता, सब कार्य में घबडाहट, शरीर में पीड़ा, वात रोग ( मान० ) ।
राहु के समान फल ( खान० ) ।
mas, दुःखी, चुगुल खोर, जाति च्युत, स्थान च्युत, विकल देह ( अंग में दोष )
दुष्ट की संगति ( फल दीप ) ।
रोगादि से युक्त, भय से व्यग्र चित्त, उद्वेग युक्त, स्त्रियों को चिता, वात विकार
युक्त शरीर ( जात० भरण ) ।
रोगी, लोभी, यदि शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो राजा समान भोगी । लग्न में शनि फे
गृह में केतु स्थिर घन पुत्र दायक है ( जा० पारि० ) ।
स्त्री नष्ट हो जावे, भुजा में रोग शरीर में व्याधि ( जा० सं० ) ।
२-धन भाव सें ग्रहों फल
१-धन भाव में सूर्यं का फल
पुत्र तथा स्त्री से हीन, दुबंलांग, अत्यन्त हीन, रक्त नेत्र, बुरे केश, ताम्वे के व्यापार
से घनवान्, दुःखों को भोगने वाला, गृहस्थ सुख कभी नहीं पाता है ( मान० ) ।
विद्या रहित, विनय व घन रहित, तोतली वाचा ( फल० ) 1
क्रोधी, बुद्धि होन, कृपण, द्रव्यहोन, रोगी ( खान० ) ।
घन ओर पुत्र व अच्छे वाहन से रहित, बुद्धि नष्ट, मित्रता हीन, पराये घर में बास
( जा० भ० ) |
घनी, राजा का घन हरे, मुख में रोग ( qo जा० ) ।
विवाद, बहुत शत्रु, निधन, ईर्ष्यायुक्त, पर का अपकार करनेवाला, कृतघ्न (ल. च.) 1
दानी, धातु द्रव्य वाला, इष्ट शत्रु वाला, वाचाळ ( जा० पारि० ) ।
घन में सूयं हो या सूर्य की दृष्टि हो--चोर हो, घर का घन राजा द्वारा हरण कर
लिया जावे ( जा० सं० ) । :
सदा घन को नाश करता है निर्धन करता है ताम्रघन को देता है। घन में सूय हो शनि
की दृष्टि न हो तो अतीव घन देता है, शनि को दृष्टि हो तो निर्धनता लाता है 1 अन्य
ग्रहों की दृष्टि हो तो शुभ है ( जा० संग्रह ) ।
बहुत घन मिळे परन्तु राजा उसका वन हरण करे, मुख रोग हो ( प्रा यो०1) । २-धन भाव में चन्द्र का फल
बड़ा त्यागी, बुद्धिमान्, घन से पूर्ण कोष, चंचल मन, अति दुष्ट, कोतिमान्, सुन्दर भोगी, यशस्वी, सहनशील, कमल सा मुख ( मान० ) । घनी अति विद्वान्, विषय सुखमान्, कोई अंग दोष पूर्ण ( फल० ) 1 = कामी, तेजस्वरूप, सुन्दर वचन, बुद्धिमान्, विद्याशील, घनवान् ( जा० पारि०,) 1 ओ। घनवान्, मिष्ट भाषी, नीच का हो तो विपरीत फल ( खान० )1
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भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३०९
पूर्ण चंद्र--घन पुत्र सुख युक्त, नम्रता युक्त, श्रेष्ठ, क्षीण चन्द्र-_तोतला, घन रहित, थोड़ी बुद्धि । मघ्यवली चन्द्र हो तो बल के अनुसार घट बढ़ फल का अनुमान करना ( जा० भ० )।
. धनी, राजाओं से पूज्य, गुणी, शास्त्र प्रेमी, सौभाग्यवान् मनुष्यों से प्रीत करने वाळा ( =° चं० ) । बड़ा कुटुम्ब वाला ( वृ० जा० )।
सुवर्ण सहित, चांदी तथा मणि रत्न घन बहुत हों कपूर चन्दन गंध आदि हों ( जा० सं० ) 1
धन में चन्द्र हो या चन्द्र को दृष्टि हो-धनी हो परन्तु उसकी बहिन और कन्या का
घन नाश हो ( जातक रत्न )। .
क्षीण चन्द्र हो ओर बुघ की दृष्टि हो-पूवं संचित घन का नाश और अन्न घन कौ
रोक करता 1 चन्द्रमा सन्निपात से उत्पन्न होने वाले शीत सम्बन्धी रोग देता है
( जा० सं०) ।
चन्द्र घनेश घन में--धर्म सम्बन्धी सूत्र प्रयोग व योग विद्या आवे, चपल हो, लाल
नेत्र केश भूरे हो ( प्राण यो० ) ।
३--धन भाव में मंगल का फल
घातु वाद करने वाला, परदेश वासो, कर्ज घन में प्रीत, जुआडी, सहन शील, खेती
के कार्य में समथं, पराक्रमी, दुर्बल देह, सदा सुख भोगी ( मान० ) ।
विमुख, विद्या रहित, घन रहित, दुष्ट जन के आश्रित ( फल० ) ।
घातु बाद (धातु का व्यापारी), खेती और घूमने में तत्पर, क्रोधी (जा० पारि०) ।
वेसुध, पुत्र, जन, स्त्रो सुख से हीन, युद्ध में शूर, चिता युक्त, कुरूप, शक्ति हीन,
निर्दय, दुष्ट बुद्धि, सदा क्रणी ( खान० ) ।
घन हीन, दृष्टजनों का आश्रय करने वाला, दुष्ट बुद्धि, कृपा रहित ( जा० भ० )।
घन हीन, क्रिया होन, दीघं सूत्री, सत्यवादी, पुत्रवान् ( छ० चं० ) ।
दुष्ट अन्न बाजरा मड्वा आदि खाने वाला ( qo जा० ) ।
खेती करने वाला तथा बेचने वाला, भोग मोगने वाला, परदेश वासी, लाल रंग के
घनों से युक्त, वादी तथा बुद्धि नाश युक्त तथा जुआड़ी ( गगं मत ) ।
घन में मंगल हो या मंगल की दृष्टि हो--निरन्तर घन हानि, देह ओर नेत्र में पीड़ा,
स्त्री बंधु जनों के साथ कलह ( जातक रत्न ) ।
घन में मंगल--विष शस्त्र या रक्त प्रकोप से मरण ( जा० सं०.)।
४--धन भाव में वुध का फल
पिता भक्त, अति स्थिर, पाप से डरे, कोमल शरीर, कठोर रोम, छम्बें केश, अति
गोरा, सत्य वक्ता, विहार करने वाला, रत्नादिकों का भागी, सदा परदेश में रहने वाळा
( मान० ) ।