भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहो का फल : ३११

६--धन भाव में शुक्र का फल

पर घन से घनी, स्त्री को स्वतन्त्र घन देने में तत्पर, चांदी, शोशे का व्यापार

करने वाळा, बालकों के समान, गुणों से युक्त, पतली देह, मोठे वचन बालकों से

सुख युक्त ( मान० ) । कवि हो, घन युक्त ( फल० ) 1

मिष्ट भाषो, चतुर, दुशाला आदि वस्त्रों से युक्त ( खान० ) ।

श्रेष्ठ अन्न और पान में तत्पर, श्रेष्ठ वस्त्र भोर भूषण, घन वाहन युक्त, विचित्र

कार्य का जानने वाला ( जा० भ० ) ।

घनी, विद्वान, भाइयों से पूज्य, राजाओं से भी पूजित, यशस्वी, गुरु का भक्त, कृतज्ञ

( छ० चं०) । वाणो सुन्दर ( वृ०जा० ) 1

विद्या काम कला का ज्ञाता, घनवान्‌ ( जा० पारि० ) ।

शुभ राशि या शुभ दृष्टि युत हो--विद्या से इकट्ठे किये हुए घन वाला या स्त्री

जनों से घनो रहता है । बुध को दृष्टि हो तो घनो हो (गर्ग) ।

घन में शुक्र हो या शुक्र की दृष्टि हो--घनवान्‌, बहुत शास्त्र का ज्ञाता, मनोहर वाणी,

सभा में चतुर हो 1 घन में शुक्र हो पाप या शत्रु ग्रहों से युत या दृष्ट हो--राजा या चोरों

से घन हानि हो मार्ग में बिष्न हो ( जातक रत्न ) ।

घन मैं शुक्र हो और सूर्य चन्द्र की दृष्टि. हो--धन देने वाला हैँ ( छा० सं० ) ।

घन में शुक्र--कलह करने वाला, मैथुन प्रिय, साहित्य प्रेमी, सुनेत्र, नाना प्रकार की

कला जाने, खेती बगीचे आदि में प्रेम हो 1 मीठा अन्न व नाना प्रकार का रस प्रिय हो।

रत्न परीक्षा जाने । रत्न का संग्रह हो, बुघ के प्रभाव से विद्या आवे ( प्रा? यो० )।

७--धन भाव में शनि का फल व

दूसरे के वाक्यों को सहन करने वाला, घन से युक्त, चंचछ नेत्र, चोर (मान०) ।

सूयं समान फल, घनवान्‌, मुख रोगी, राजा का घन हरे (वु० जा०) ।

कुरूप चेहरा, घन रहित, कुमार्गी, उत्तर जीवन में वह विदेश में घन ओर दुसरे सुख

से युवत रहे (फल०) ।

उच्च, स्वक्षेत्र के बिना अन्य राशि मे--व्यसन युक्त, मनुष्यों से त्यागा हुआ, कुम्भ

राशि का--परदेश में वाहन और राज्य मान्यता, को प्राप्त (जा० भ०)।

घन हीन, वात पित्त और कफ से आतुर, देह में हाइ और पित्त रोग वाला, थोडे

गुण वाला । असत्य वादी, चंचल, घूमने वाला, दरिद्र और ठग (जा० पारि०) । -

लोहा घन वाला होकर काष्ठागार से घन का संचय करता है, नीच विद्यानुरागी व

दीन दुःखी (गगं) 1

घनों से हानि, निष्ठुर और दुःखी (जातक रत्न) ।

घन में शनि या मित्र और सौम्य ग्रह से युक्त दृष्ट हो, दया, घमं, सत्य से युक्त ।

घन में शनि पाप ग्रहों से या शत्रु ग्रहों से युक्त दुष्ट==घन का नाश, उसकी बहन

३१२: ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

आदि मृत संतान वाली या गर्भपात आदि वाली हो ओर समीप में घर आदि वालों के

बालकों का मरण हो (जातक रत्न) । .

घन में शनि हो बुघ से दृष्ट हो--महाघनी हो (सारावली) ।

घन में शनि--उसके पास के घन को शत्रु व चोर ले लेवें । कठोर, क्रोधी, मूखं,

ईर्ष्यालु, दृष्ट विद्या जाने, तेल के तले पदार्थ प्रिय हों (प्रा० योग) ।

<— भाव में राहु का फल

चोरी करने वाला, बहुत दुःख भोगने वाला, मत्स्य मांस से घन सम्पादन करने

वाला, सदा नोचो के घर रहने वाला (मान०) ।

शंका युक्त, अस्पष्ट भाषण, मुख व चेहरे में रोग, नम्र हृदय, राजा द्वारा घन

प्राप्त, रोष युक्त, सुखी (फल०) ।

अप्रिय वाणी बोलने वाला, घन नाशक, दरिद्री, भ्रमणशील (जा० भ०) ।-

कर्मच्युत, मतलबी, दुःखो, परदेश में धन युक्त (खान०) 1 विरोधी (जा० पारि०) ।

मछली मांस से धन वाला तथा नख चर्म आदि का बेचने वाला, चोर कमं से जीविका (गर्ग) 1 बड़े दांत वाला या दंत रोगी (जा० सं०) ।

तामसी, दुर्भाषी, बिल्ली सरीखी आँखें (ध्रा० यो०) ।

९-धन भाव में केतु का फल

सदा व्यग्रता हो, दुष्ट राजा के द्वारा धनधान्य नाश, मुख में रोग हो, कुटुम्ब का

विरोधी, वार्तालाप में सत्कार पाने वाला, केतु स्वगृही हो, शुभ गृही हो तो अत्यन्त

आनन्ददायक होता है (मान०) ।

विद्या घन रहित, महो बोली, कुदृष्टि, पर अन्न भक्षण (फछ०) । घनधान्य का नाश करने वाला, कुटुम्ब का विरोधी, राजा से घन की चिन्ता करने

वाला, मुख में सदा रोग, अपनी दशा में या शुभ ग्रह को दशा में अत्यन्त सौख्य (जा० भ०) ।

राहु के समान फल ( खान० ), (प्रा० यो० ) । लोगों का अपराधी हो (जा० पारि०) ।

घन हानि, नीच का संग, दुष्टात्मा, सुख सौभाग्य से वर्जित (जा० सं०) ।

३-तीसरे भाव में प्रहों का फल

१-तीसरे भाव में सूयं का फल

भाई से रहित, प्रियजनों का हितकारी पुत्र स्त्री युक्त, घनवान्‌, धेर्यवान्‌, साहस शील, अनेक प्रकार के घन से विहार करने वाला उत्तम नागरिक, स्त्रियों से प्रेम करने वाळा (मान०) 1 बली, श्र, घनो, उदार, अपने बंधुओ से शत्रु भाव रखे ( फल० ) । नामवर, किफायती, निरोग, घनाढ्य, स्त्री सुख (खान०) ।

बुद्धिमान्‌, पराक्रमी (qo जा०) ।

` पराक्रमी, दुजन सेवित, विशेष धनी, दानो (जा० पारि०) ।

भन्न-भिन्न भाव में ग्रहों का फल : ३१३

मिथ्या भाषी, घन वाहन युक्त, सत कर्मी, नोकरों से युक्त, थोडे भाई, अधिक

चलवान्‌ (जा० भ०) । प्रसिद्ध, रोग रहित, राजा, सुशील, दयालु (ल० चं०) 1

हानि दो डि ॥ व पराक्रम बा : युक्त हो परन्तु सूर्य को दशा में बड़ा भाई या बडी बहिन को

२-तीसरे भाव में चन्द्र का फल

हिंसक, बड़ा अभिमानी, कृपण, अल्प बुद्धि, बन्धु जनों का आश्रय करने वाला, दया

ओर भय से होन (जा०.भ०) । घन ओर विद्या से युक्त, कफ युक्त, कामुक, वंश में मुख्य (ल० चं०) |

प्राण घाती (वृ० जा०) ।

अल्प घनी, बन्धु प्रिय, सात्विक (जा० पारि०) ।

भाई हो, बली, शक्तिवान्‌, अति कृपण, कामुक (फल०) ।

चन्द्रमा यदि पापगृही हो तो--बहु भाषण करने वाला नहीं, मातृहता हो, शत्रु

सदृश । शुभग्रहो हो तो --सुख भोगी, घन युक्‍त, काव्य शास्त्र,का आनन्द पाने वाला

(सान०) । शत्रु का घात करे व क्र हो (प्रा० यो०) ३-तृतीय भाव में मंगल

भ्रातु हंता, दुबंछ शरीर, सुख का भागी । उच्च का हो तो- विलासी हो । नीच

या पाप गृही--धन सुख या मनुष्यों से होन, सम्पूर्ण पदार्थों के होते हुए भी टूटे wš

चर में वास (मान०) ।

अच्छे गुण युक्त, घनवान्‌, श्र, सुखी, माई होन, पराक्रमी (फल०) ।

घनी, सहज रोग, विपत्ति (खान०) 1

राजा की कृपा से उत्तम सुख, उदार, श्रेष्ठ परा»म, धनत्रान्‌, भ्रातृ सुख होन

{जा०म०) । बुद्धि और पराक्रम वाला (qo जा०) ।

प्रतापी, शील युक्त, लड़ाई में शुर, राजाओं से पूज्य, प्रसिद्ध (छ० चं०) ।

अपार पराक्रमी, शठ बुद्धि (जा० पारि०) ।

भाई या बहिन का घातक हो (प्रा० यो०) ।

४-तुतीय भाव में बुध का फल

साहसी, स्वजनों से युक्त, मलिनपन, सुख से होन, कल्याण हितार्थ शुभ कर्म का

हुच्छुक (मान०) ।

शुर, सावारण जीवन, अच्छे भाई हों, श्रम युक्त, निराश (फल०) ।

शीलवान्‌, दयालु, धनी, मित्र युक्त- स्त्री प्रिय, प्रसन्न चित्त (मान०) 1

मायावी, घूमने वाला, अत्यंत चंचल और दोन (जा० पारि०) 1

दुर्जन (वृ० जा०) (प्रा० यो०) ।

अच्छे बांघवों से पुज्य, घम को घ्वजा वाखा, यशस्वी, देव, गुरु पूजक (छ० चं०) ।

हठ से अपने सम्वस्थियो के साथ रहता ë । चित्त शुद्धि हीन, सौख्य qtaq, अपने

अन के अनुसार काम में चतुर (जा० मा०

३ १४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

५-तीसरे भाव Š गुरु का फल भाई बंदों के साथ गये हुए घन से युक्त, स्वाधीन घन हो, जब भी घन हानि से युक्त,

कंजूस, कुमार्गी (मान०) ।

अपमानित हो, कृपण हो , भाव दुष्ट पाप कर्ता हो (फल०) 1

लापरवाह, कटुवचन, कृपण, पराक्रमी, बहुजन पालक (खान०) ।

मित्रता रहित, कृपण, कृतघ्न, स्त्री पुरुषों की प्रीति रहित, मंदारिन रोग से वल हीन

(जा० भ०) ।

तेजस्वी, कर्म में निपुण, इद्धियजित्‌, मित्रों से सुख प्राप्त, तीथे की वार्ता में प्रसन्न

होने वाला (ल० चं०) । कृपण (qo जा०) (प्रा० यो०) ।

घन रहित, स्त्री से पराजित, पाप करने वाला (जा० पारि०) |

६-तृतोय भाव में शुक्र का फल _ i

मानजे से मोह करने वाला, नेत्र रोगी, घन सम्पन्न, प्रिय वचन, उत्तम वस्त्र धारण

कर्ता (मान०) । स्त्री रहित, दुःखो, गरीब, कृपण, अप्रिय (फल०) ।

नेक, जोरावर, आलसी, भ्रातृ सहित, घन रहित (खान०) 1

दुर्बल अंग, कृपण, दुष्टात्मा, घनहीन, काम देव से संतापित, संत पुरुषों को दुःख.

देने वाला, दुष्ट चेष्टा (जा० भ०) । $ र

घन घान्य और पुत्रों से युक्त, निरोगी, राजाओं में पूज्य, प्रतापी (छ० चं०) ।

कृपण (go जा०) (प्रा० यो०) ।

दोषयुक्त वचन, पापो, स्त्रो से पराजित (जा० पारि०) ।

७-तृतीय भाव में शनि का फ़ल

सहोदर भाइयों का नाशक, कुल में राजा के समान, पुत्र कलंक युक्त (मान०) ।

दान में उदार, स्त्री से सुखी, अकर्मण्य, भय युक्त (फल०) ।

सुर्य सरीखा फल, विद्वान्‌, पराक्रमी (qo जा०) 1

बलवान्‌, यशस्वी, प्रसन्न चित्त, सम्य, अनुचर वृन्द सहित (खान०) ।

राजा से माननीय, श्रेष्ठ वाहन युक्त, ग्राम पति, बड़ा वली, बहुत आदमियो का

पालन कर्ता (जा० qe) 1

प्रसर्न, गुण वत्सल, शत्रु मदन करने वाला, पूज्य, धनी और बीर. (ल० चं०) ।

अल्प भोजो, घन शील, वंश से युक्त, गुणवान्‌ (जा० पारि०) ।

भाई बहिन का घातक (sro यो०) 1 ८-तुतीय भाव में राहु का फल

जातु नाश, सुख भोगी, घन, पुत्र, कलत, मित्र से युक्त, उच्च में हो तो--हाथी घोड़े नौकर आदि हों (मान०) ।

घमण्डो, भाइयों का विरोधो, दृढ़ इच्छा शक्ति वाला, दोघंजोवी, धनी (फल०) ।

: भाइयों का नाश, पशुओं का मृत्यु करने वाला, दरिद्र, मित्र सौख्य व बल युक्त, शत्र

5 अय नाशक, यश कल्याण व ऐश्वर्य को प्राप्त, सौख्य, विछास आदि का लाभ (जा० भ०);४

भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३१५

बलवान्‌, यशस्वी, दाता, घनी (खान०) 1 अत्यन्त बली और धनी (जा० पारि०) ।

९-तृतीय भाव में केतु का फल

शत्रुओं का नाशक, विवाद (झगड़ा) करने वाला, घनवान्‌, अनेक भोग विलास युक्त,

ऐश्वयवान्‌, बड़ा तेजस्वी, मित्रों का नाश, सदा बाँह में पीड़ा, भय के कारण उद्वेग, चिता से व्याकुल (मान०) ।

दीर्घं जीवन, बल घन कोति युक्त, अपनी स्त्रो के साथ सुख पूर्वक रहे, अच्छा भोजन

करे, एक भाई! की. हानि (फल०) ।

शत्रुओं का नाशक, SIT ST से झगड़ा करने वाला, धन योग, ऐद्वर्य में तेन को

अधिक प्राप्ति, भाइयों का नाश करने वाला 1 सदा बांहों में पीड़ा । उच्च में--सुख देता है

व उद्वेग देता है (जा० भ०) । राहु के समान फल (खान ०) । गुणी घनो (जा० पारि०)

४--चतुर्थ भाव सें ग्रहों का फल

१-चतुथ भाव में सूर्यं का फल

अनेक मनुष्यों के साथ विहार करने वाळा, कोमल वाणी, गाने बजाने का प्रेमी,

संग्राम में जय, घन और कलत्र से सम्पन्न । राजाओं को प्रिय (मान ०) 1

नहीं, बंधु रहित, भूमि रहित, मित्र घर रहित, राजाको सेवा करे

पितरों की सम्पत्ति खरचं करे (फल०) ।

सुखहीन, वेश्या भोगी, छात्र, बहुत, पागल की तरह घूमे (खान०) ।

सौख्य वाहन, घन से हीन, पितृ वैरी. एक जगह निवास नहीं (चलनिवास) (जा०म०) ।

हृदय रोग, घन धान्य, बुद्धि रहित और क्रूर (जा० पारि") 1

दुबंल अंग, सुख रहित, अप्रभाव, निष्ठुर, दुष्ट संगो, दुर्वुद्धि (छ० च०) ।'

सुख रहित, मन में पीडित (go जा०) ।

बांधवों का नाश, संताप, नष्ट वाहन (गर्ग) ।

बहुत सुख, संग्राम में निशचलता, बहुत स्त्रो, दुबंछ (जा० सं०) !

उसके पास मोतियों का बाहुल्य हो (यवन) ।

अंतःकरण सदा उद्विरन हो, दुःखो हो (प्रा० यो०) ।

२--चतुथ में चन्द्र का फल

अनेक प्रकार से घन से पूर्ण, प्रिय जनों का हितेच्छुक, स्त्रियों का प्रेमी, निरन्तर

रोगी, मांस मछली खाने वाला, हाथो घोड़ा आदि वाहन युक्त, महलों में क्रीडा करने

बाला (मान०) । /

सुखी, भोगी, त्यागी, मित्र और वाहन युक्त, यशस्वो (फल०) ।

दानो, अधिकारी, मलिनचित्त, पंडित (खान?) ।

जलाशयों से उत्पन्न धन को प्राप्त करने वाला, खेती, स्त्रो, वाहन ओर पुत्रों से युक्त,

देव ब्राह्मण का भक्त (जा० भ०) ।

स्त्री पुत्र से युक्त, धनो, सुखी, यशस्वी, विद्यावान्‌ (७० चं०) 1

सुखी (वृ० जा०) 1

| ३१६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

विद्याशील, सुख से युक्त, पर स्त्री गामो (जा० पारि०) ।

नौकर चाकर, स्त्री वाहन का सुख, मंदिर (घर) वाहन, सम्पदा मिळे (जा० सं०) ।

चन्द्र और शुक्र हो, बहुत सा रौप्य घन देता है, बहुत अन्न और रस गुहु में इकट्ठा रहे (जा० सं०) । बहुत कर मनुष्य सुखो हो (प्रा यो०) ।

३-चतुर्थ में मंगल फल

जड बुद्धि, अति दीन, श्रेष्ठ कुल से हीन, बन्धु निमित्त से दुःखी, अति दुःखी, सव

देशों में भ्रमण करने वाला, नोच सेवा में तत्पर, पराये वश में रहने वाला, पर स्त्री पर

लुब्ध चित्त (मान०) 1

मित्र, माता, भूमि, सुख, घर, वाहन रहित (फल०) 1

दुःखी, संग्राम में धैय, निर्धनो, मजबूत, निर्देय, ऋणी (खान०) 1

मित्रों और वाहन से दुःख प्राप्त, परदेश वासी, शरीर में अधिक रोग, निर्बलदेह

) (जा० भ०) । सुख रहित (बु० जा०) ।

श्याम वर्ण, अधिक मित्र वाला, शत्रु से हारने वाळा, वृथा घूमने वाला पुत्र रहित

महाकामी (ल० चं०) ।

परिवार से होन, स्त्रो से निजित, पराक्रमी (जा०.पारि०) 1

( 5 पृथ्वी से जीविका, परदेश ब्रासी, कीच वाले देश में व गृह में निवास

(जा० सं०) ।

शस्त्रो से युक्त तथा ताम्बे से युक्त (यवन०) ।

अन्तःकरण सदा उद्विग्न हो, दुःखी हो (प्रा० यो०) ।

४-चतुथं भाव में बुध का फल

घन से रणं हो, पापाक्रांत हो, भाईयों का नाशक हो । अपने घर या उच्च में हो

न पत्तियों से पूणं, बुद्धि से युक्त, निर्लज्ज, क्षीण जंघा, दुर्वछांग, बाळपन में रोगी,

मान०) ।

विद्वान्‌, चाटुवाक्य, सुखो, मित्र, भूमि, अन्न सहित भोगी (फल०) ।

पुत्रहीन, दुष्ट शरोर, गोत प्रिय, दानी, मिष्टमाषी, आलसी (खान०) ।

श्रेष्ठ वाहन, ओर अन्न धन सहित, गान विद्या और नृत्य में राच, विद्या और भूषणों का प्राप्त कर्ता (जा० qo) ।

बहुत नोकर और यश से युक्त, प्रवीण बोलने वाला, भाग्यवान्‌, सत्यवादी (७० चं०) । पंडित (qo जा०) (प्रा० यो०) ।

परिवार रहित, श्रेष्ठ ज्ञानी, धनी, पंडित (जा० पारि०) 1

पापरहित, बहुत मित्र, बहुत घन, अनेक रस विलासी । पापयुक्त हो तो भिन्न प्रकार का फल (जा० So) । घर में सुवणं हो (यवन०) ।

५-चतुर्थं में गुरु का फल

सदा म पाने वाला, नाना प्रकार के घन ओर वाइन आदि से हृषित, राजा की कृपा से अधिक सम्पत्ति प्राप्त (मान०) । =: की

Mier

भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३१७

माता के साथ रहे, मित्र, दास, पुत्र, स्त्रो, अन्न आदि युक्त, सुखी (फल०) 1 थोड़ा घन, जरी वाले वस्त्र, रथ हाथो से युक्त, राजप्रिय, सम्पूर्ण सुख युक्त

(खान०) । सुखी (qo जा०) (प्रा० यो०) ।

सम्मान सहित, अनेक घन वाहन आदि युक्त, अनेक आनन्द प्राप्त, राज कृपा से सम्पदा प्राप्त (जा० भ०) ।

संसार में सुखी, सौभाग्य युक्त, राजाओं में पूज्य, शत्रुओं को जोतने वाला, कुल में

भुख्य, गुरु का भक्त, (ल० चं०) ।

वाचाल, घनो, सुख यश रूप वाला, शठ स्वभाव (जा० पारि०) ।

बाल मित्र हों, दिव्य माला वस्त्र क्रीडा तथा अनेक वाहन युक्त (जा० सं०) 1

घर बहुत रत्नों से युक्त (यवन) ।

६-चतुथ में शुक्र का फल

बहु स्त्री पतर युक्त, अति सुन्दर, राजमहल के समान घर में रमण करने वाला, वस्त्र तथा खाने पीने के विलास से युक्त (मान०) ।

अच्छे वाहन, अच्छा घर, भूषण, वस्त्र, गंध जादि प्राप्त (फछ०) ।

विलापी, प्रियमाषी, घनाढ्य, पंडित, अच्छा स्वभाव (खान०) À

मित्र स्थान, ग्राम और वाहनों का अनेक सुख प्राप्त, देवताओं का पुजक, सदा

आनन्द को प्राप्त (जा० भ०) |

सुखी, जानने वाला, बहुत स्त्री वाला, बहुत घनी, स्त्रियों का स्वामी, यशी और विवेकी (ल० चं०) । सुखी (qo जा०) ।

स्त्री से पराजित, सुख यश घन विद्यायुत और वाचाल (जा० पारि०)। :

दूसरों का मित्र, विचित्र कमं करने वाला, ग्राम वासी, विठास कर्ता, बहुत प्रकार से

भोगी, राज पूज्य, दीर्घायु वाला, सुन्दर स्त्री हो, सदा पराक्रम वाला (जा० सं०) । विशेष कर मोती रहते है । (यवन)

७-चतुर्थं में शनि का फल -

बंधुनाशक, स्वयं सदा रोगी हो, वक्री हो तो स्त्री पुत्र भूत्यो से अनादर व ग्रामान्वर

में दुःख देने वाला होता हे (मान०) । ८

दुःखी, गृहविहीन, वाहन रहित, मातृ रहित, आरम्भ जोवन में रोगी (फळ०) ।

पित्तवात से क्षोण बझ, दुष्ट शोलवानू, आलसो, झगडाळू, दुर्बल देह, दरिद्री

(जा० भ०) ।

सुखहीन, भाइयों ने जिसका द्रव्य छीन लिया हो, गुणो, कुसंगी, दुर्जनो से युक्त

ओर मूर्ख (ल० चं०) । सुख रहित, पीड़ित (qo जा०) 1

चिता युक्त, बेहोश, परितप्त, बंलहीन (खान०) ।

आचारहीन, कपटी, मातृक्लेश युक्त (जा० पारि०)।

टूटे हुए आसन और गृह वाला, विफल, दुःख से संतप्त, स्थाननाश (जा० सं०) ।

`

'३१८.: ज्योतिष-शिक्षा, तृताय फलित खण्ड

उसके पास लोहा और शस्त्र होता है (यवन) ।

अन्तःकरण सदा उद्विग्न भौर दुःखो (प्रा० यो०) 1

८-चतुर्थ में राहु का फल

घन और बंधु से रहित, गाँव के एक किनारे पर घर बना कर रहे, नीच से स्नेह,

अति चुगल खोर, बडा पापी, एक कन्या हो, दुर्बल स्त्री (मान०) ।

मूर्ख, दुःख उत्पन्न कर्ता, मित्र युक्त, अल्पायु, कभी-कभी सुखी (फल०) ।

सुख नाश, सज्जनता और मित्रों के सुख से हीन, सदा भ्रमण शील (जा० भ०)।

सदा दुःखी, परदेश में भ्रमण, मूख, विवादकारी, सुख हीन, मित्र विपक्ष में हो

जावे (मान०) । i -

स्त्री आदि जनों का अवरोध करने वाला (जा० पारि०) ।

बन्धु को पीडक, वृष ककं मेष इनका हो तो बंधु का देने वाला (जा० सं०) ।

९-चतुथ में केतु का फल

कभी माता का सुख नहीं हो या वाल्यावस्था में माता मरे, मित्रवर्गो के सुख ये

होन, पिता से प्राप्त किये गृह घनादि का नाश हो। उच्च का हो तो वांघवों से सुख

पावे अधिक समय तक परदेश में रहे । सदा व्यग्र अर्थात्‌ चिन्ता बलेश युक्त रहे 1

अपनो भूमि खोवे, वाहन और मातृ सुख नष्ट, अपना देश त्याग विदेश में रहे और

दूसरे के घर में रहे (फल०) ।

माता का सुख कभी न हो, भित्र वर्ग और पिता से नाश को प्राप्त, आतुहीच ।

उच्च का हो--तो पूर्वोक्त सव प्रकार के सौख्य की प्राप्ति :थोड़ा सुखी, सदा व्यग्रचित्त

(जा० भ०) । राहु के समान फल (मान०) । दूसरों को दोष लगाने वाला (जा० पारि०)।

माता पिता को कष्ट करता है। अति चिता से कष्ट, मित्र सुख से हीन (जा० सं०) 1

५-पंचस भाव सें ग्रहों का फल

१-पंचम में सूये का फल '

वाल्यावस्था में दुःख, घन हीन, युवावस्या सें व्याधि युक्त, एक पुत्र हो, अन्य पुरुषों

के घरों में रहने वाला, शूरवीर, चतुर, वुद्धिमान्‌, विलासी, क्रूर कर्म करने वाला, दुष्ट

मन वाला (मान०) ।

सुख घन संतान रहित, अल्पायु, बुद्धिमान्‌, जंगली देशों में भ्रमण (फल०) ।

मुर्ख, अल्प पुत्र, व्याधि युक्त, क्रो घी, धमंहीन (खान०) ।

राजा का प्रिय, चंचल बुद्धि, परदेश में रहने वाला (जा० पारि०) ।

~ पृंताम रहित, (A शिव पावंः यती का भक्त, सौख्य रहित, सत i कर्म और घन से होन,

क्रोधी, कुरूप, शील वर्जित, कुसंग से लब्घ वृत्ति वाला (go चं०) ।

घन और पुत्र रहित (qo जा०) 1

संतान न हो, होवे तो सूर्य की दशा में नष्ट हो । (प्रा० यो०) 1

स्थिर बुद्धि (सुयं जातक) ।

मिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३१९

सूर्य बली हो--पिता नष्ट । सूर्य स्थिर राशि में--पहिले पुत्र का नाश । सूर्य चर राशि मे--पुत्रो को नहीं मारता । सूर्य अन्य राशि में--पुत्र नाशक (जा० स॑०) 1 २.-पंचम Š चन्द्र का फल

सुख भोगी. अनेक पुत्र, वश्य स्त्रो सहित । क्षीण चंद्र होकर शत्रु क्षेत्री हो--स्त्री सुख, पुत्र पोत्रों के सुख से रहित (मान०) । अच्छे पुत्र, अतिशय बुद्धि, qg गति, मंत्री हो (फल०) तेजस्वी, असावघान चित्त (खान०) । इन्द्रियजितू, सत्यवादी, प्रसन्न, धन और पुत्रों से सब सुख प्राप्त, श्रेष्ठ संग्रह करने चाला, शीलवान्‌ (जा० wo) । | पुत्रों से युक्त, रोगी, कामी, भयानक, खेती के रसों से युक्त, विनयी (go चं०) à पुत्रवान्‌ (१० जा०) (प्रा० यो०) । Ë मंत्र क्रिया में आसक्त चित्त, दयावान्‌, धनी, मायावी (जा० पारि०) । चंचल बुद्धि (सूयं जातक) ।

कन्या संतान हो, पुत्र हीन । चन्द्र वली- -माता नष्ट । क्षीण.व पाप युक्त-चंचल कन्या हो (जा० सं०) ।

३-पंचम में मंगल का फल

पुत्र रहित, पाप में मन, अति दुःखी । स्वक्षेत्री या उच्च का--कृष तथा मलिन शरीर, एक पुत्र हो (मान०) 1

दुःखी, सन्तान रहित, अनथं प्राप्त, चुगल खोर, बलहोन मन का (फल०) । थोड़ा बोलने वाला, निर्वु'द्धि, पुत्र घन का सुख नहीं, बातकफ रोगी, क्रोधी, मुख्यतः थेट में रोग (खान०) ।

कर्क और बात रोग से पीडित, स्त्रो, मित्र, पुत्र सुख से होन, उल्टो बुद्धि वाला {जा० भ०) । पुत्र रहित, घन रहित (qo जा०) |

कुत्सित पुत्र वाला । सदा रोगी, भाइयों से विरक्त हो (go चं०) 1

क्रूर, घुमने वाला, चपळ, साहसी, विधर्मी, भोगी, घनी (जा० पारि०) 1

घोर बुद्ध (सूर्य जातक) ।

सन्तान न हो, हो तो सूर्य की दशा में नष्ट (प्रा० यो०) । ४-पंचम में बुध का फळ $ सुख युक्त, घनी, बुद्धिमान, सन्तोषी, रूपवान्‌, साहसी (खान०) । पुत्रों के सोख्य युक्त, बहुत मित्र, मंत्र वाद में चतुर, श्रेष्ठ शोल, लीला युक्त (जा० भ०) 1 ०] पुत्र और पात्रों से युक्त, सुंदर, बुद्धिमान्‌, सुखी (छ० चं०) ।

मन्त्री (qo जा०) । पुत्र a ४“ का पात्र, खिले कमल सा मुंह, सदा सुखी, बड़ा पवित्र, देव गुर

ब्राह्मण का भक्‍त (मान०) । š

३२० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

विद्वान्‌, सुखी, प्रतापी, कई सन्तान, मांत्रिक (फल) ।

मंत्र तथा अभिचार 'में कुशल, पुत्र स्त्री विद्या घन बल से युक्त (जा० पारि०) ।

सन्तान सुख हो । बुध बली--माया नष्ट, । अस्त या शत्रू ग्रह दृष्ट--उतन्न fst

हुए पुत्र का नाश हो ।

शिक्षक या हिसाब के काम पर घुरन्धर, कन्यावान्‌ (प्रा० यो०) ।

मंगल बली- पुत्र नष्ट । शत्र, ग्रह की राशि में या शत्रू ग्रह दृष्ट या नोच या पाफ

युक्त--पुत्र शोक का दुःख (जा सं०) ।

पंचम में बुध--सुन्दर बुद्धि (सूयं जातक) ।

५-पंचम में गुरुका फल

सबका सुहृद, सुहृद जनों में श्रेष्ठ, अनेक शास्त्र में बुद्धि, सुखी, सबका प्रिय

(मान०) ।

पुत्र द्वारा क्लेश हो, बुद्धिमान्‌, राजा का सचिव (फल०) ।

पंडित, पुत्र, पौत्र सहित, धन आदि चिन्ता युक्त (खान०) ।

श्रेष्ठ मित्र, श्रेष्ठ पुत्र, मंत्र शास्त्र और अनेक घन वाहन को प्राप्त, कोमल वाणी

(जा० भ०) ।

पुत्र युक्त, घर्मवान्‌, पंडित, सुखी, शुद्ध चित्तवाला, दयालु, नम्रता युक्त (ल० चं०) t

बुद्धिमान्‌ (वु० जा०) ।

मंत्री, गुणी, विमव सार से युक्त, अल्प सन्तान (जा० पारि०) 1

सुन्दर बुद्धि (सूयं जातक) ।

सुबुद्धि युक्त और बहु पुत्रोंबाला, दानी, भोगी, गुणी, घनी, मानी । गुरु बली हो

तो नाना कष्ट (जा० सं०) । विचारवान्‌, कन्यावान्‌ (प्रा० यो०) 1

६-पंचम में शुक्र का फल

बहु पुत्र पुत्रियो से युक्‍त, . जामाता से पूजा पाने वाला, बडा घनवान्‌, गुणी, नगर

के नेताओं में श्रेष्ठ, विलास शोला स्त्री को प्रिय (मान०) ।

अखंड धन का स्वामो, दूसरों का रक्षक, अति चतुर, संतान युक्त (फल०) ।

दाता, राजप्रिय, पुत्र घन घान्य युक्त (खान०) ।

सम्पूर्ण काव्य कला सहित, वाहन अन्न से युक्त, राजा से बड़ा गौरव प्राप्त

(जा० भ०) 1

समृद्ध, सुरूप, सदा उन्नत, पुत्र कन्या ओर पोत्रोंसे युक्त, सोभाग्यशाली(ल०चं०) ।

बुद्धिमान्‌ सुख्ली (बु० जा०) ।

सुपुत्रवान्‌, घनो, रूपवान्‌, सेना ओर घोड़ों का स्वामी (जा० पारि) ।

कोमल बुद्धि (सूयं जातक) ।

पुत्र सुख, विविध प्रकार से पुष्ट ओर परमघनो, पंडित, राजमंत्रो, दडपति । शुक्र

बली हो तो पिता नष्ट (जा० सं०) । कन्यावान्‌, सुखी (प्रा० यो०) ।

भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फछ : ३२१

७-पंचम में शनि का फल

पुच से हीन, घन से हीन, दुःख देने वाला । उच्च या मित्र गृही हो तो--खंगढा

होकर एक पुत्र वाला हो (मान०) ।

आंत (यहाँ वहाँ भटफने वाळा), ज्ञान संतान घन और सुख रहित, शठ और दुर्मति

(फुछ०) ।

सदा रोग से दुबल देह, घन हीन, कामदेव की हानि करने घाला, पुत्रों से भय (बा० म०) ।

पुत्र हीन, क्रिया और यश से रहित, द्रव्य हीन, कुरूप (so चं०) ।

पुत्र. और धन रहित, सूयं सरीखा फल (qo जा०) ।

नियु द्धि, चिंता युक्त, पुत्र सुख हीन, बालसी, qel, छोटा शरीर (खान०) ।

मत्त, चिरायु, सुख रहित, चंचल, घर्मारमा (जा० पारि०)।

कुटिल बुद्धि (सुयं जातक) ।

शनि बली हो--नष्ट पुत्र, शत्रु क्षेत्री--समस्त पुत्रों का नाश । उदय होकर स्व या

उच्च का--वड़ा तीक्ष्ण एक पुत्र हो 1

८-पंचम में राहु का फल

पुत्र का नाशक, महाक्रोधो, चंद्र युक्त राहु किसी अन्य स्थान में हो तो एक ही पुत्र

छो बह अति मलिन फटे कपड़े पहिनने वाळा हो (मान०) । "

नाक से वात करे, संतान रहित, कठोर हृदय, उदर पोडा हो (फल०) ।

पुत्र रहित, वेहोश, पीड़ा युक्त, मूर्ख (खान०) 1

सुखहीन, मित्रता रहित, उदर पीड़ा, विलास को हानि । .निश्वय करके प्रमको लाग करता है (जा० भ०) । डरपोक, दयाळु, दरिद्र (जा० पारि०) i कुटिछ बुढि,

(सूर्यं जातक) ।

होन मलीन पुत्र हो, सिंह व ककं का--संतान हो, अन्य राशि का--पुत्र हीन

(जा० सं०) 1

९-पंचम में केतु का फल š

सहोदर भाइयों में परस्पर लड़ाई, वायु के कोप के कारण कष्ट, अपनो बुद्धि

कारण व्यथा युक्त, थोड़े पुत्र वाळा, नौकरों से युक्त, अनेक प्रकार के बळ से पूर्ण (मा०) ।

संतान हानि, पेट में रोग, पिशाच पीड़ा, दुबु दि, खल प्रकृति (see) । दान उदर में क्षत, गिरने से कष्ट, भाइयों से प्यार करने वाछा, थोडे पुत्र वाला, सदा

बल युक्त (जा० भ०) । र

राहु समान फल (खान०) । शठ, जळ मोर, विशेष रोगी (बा० पारि०) 1

संतान हानि, विद्या ज्ञान से वित, मय त्रास को प्राप्त सदा दुःखी, विदेश के

गमन में तत्पर (जा० सं०) । $

२१

. ३२२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

६-छठे भाव मं ग्रहों का फल

१-छठे भाव में सूर्यं का फल

योगाम्यासी, बुद्धिमान्‌, स्वजनों का हितेच्छुक, स्व जाति को आनन्द देने वाळा,

दुबेल अंग, गृहस्थ घर्म पालन करने बाला, सुन्दर स्वरूप वाला, क्रीड़ा करने वाळा,

शत्रु जनों को जीतने वाला, शुभ कर्म करने के लिये पूजा पाने वाला, दुढांग (मा०) ।

राजा हो, प्रसिद्ध, अच्छे गुण युक्त, धनी और जयी (फळ०) ।

घनी, निरोगी, शत्रु नाशक, नाना के घर से लाम (खान०) ।

सदा सौर्य युक्त, शत्रु हंता, बलवान्‌, अच्छे वाहन युक्त, बहुत तेजवान्‌, राजा का

मंत्री (जा० भ०) ।

शत्रु रहित, प्रसिद्ध मान वाळा, सुखी, पवित्र, वोर, अनुरागो गोर राजा का

सलाहकार, बली और शत्रुओं को जोता हुआ (क ० चं०) ।

कामी, शूर, राज्य अभिमानो, ख्याति ओर श्रीमान्‌ (जा० पारि०)।

घर में बहुत से बेल होते हँ । उसके बकरी ओर गोधन रूप बहुत घन होता है

उसकी पशुशाला बडी होगो, अँटों आदि से भी युक्त हो ।

विष और शन, से संताप, क्षुद्र शत्रु, काष्ठों का नाश, काष्ठ ओर पत्थर के प्रहार

से विदोणं देह, कान, इनु, वाणी, दांत, नख घाव वाले अंग से युक्त (यवन) 1

शत्र, या रोग का नाश (प्रा० यो०) ।

२३ वर्ष में घन देता है (हिल्लाज) ।

२-छठे भाव में चंद्र का फल

क्षीण चंद्र--नाश होने वाला, भोगों को न भोगने वाला । अनेक व्याधि वथा दुःख

हो । पूर्ण चंद्र या स्वगृही अनेक सुख हो (मान०) ।

दुर्बल शरीर, कुरूप, रोगी, सदा परेशान (खान०) ।

मंदाग्नि रोगी, दया रहित, क्रूर, बड़ा आलसी, कठोर, दुष्ट चित्त. क्रोधवान्‌, बहुत

शत्रू, वाला (जा० भ०) ।

द्रव्य होन, कोमल देह, अति आलसी, मंदाग्नि, तोदण दृष्टि, वीर (go चं०) ।

बहुत पुत्र, शरीर सुकुमार, मंदारिन, उग्र स्वभाव, आळसी, कार्य करने में अवज्ञा

करने वाला, निरुद्यमी (qo जा०) ।

क्षीण चंद्र--अल्पायु । पूर्ण चंद्र--अति भोगी, दीर्घायु, (जा० पारि०) ।

जलोदर रोग से संतप्त, रोग ओर जल से उत्पन्न विकार से युक्त, कफ से संतप्त,

छरा चंद्र हजार दोष देता हे (यवन) ।

कन्या सन्तान वाला हो, भ्राता भगिनी तथा मामा का सुख हो, क्षीण चंद्र मृत्यु

देता है। चेंद्र बलवान्‌ हो तो गोषन देता है (जा० म०)

बहुत र सुकुमार, क्षा मंद, उग्र स्वभाव, आलती (प्रा० यो०) । शत्रु पीडा, कुछ देवता का कोप, आछसी (सोम सिद्धान्त) ।

भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३२३

३-छठे भाव में मंगल का फल i संग्राम में मृत्यु, नीच का या शत्रु दृष्ट हो--विकल मुति, निदित, me कमे करने चाळा, उच्च का--मित्र, घन से परिपूर्ण, सुखो, भोगी (मान०) । टॅ बलवान्‌ (वृ० जा०) ।

भयळ मदन युक्‍त, घनी, विख्यात, राजा हो, यद्ध में जय (फलछ०) 1 शत्रु नाणी, रूपवान्‌, ऐवो, घनयुक्त, गुणग्राही, कुल पुज्य, माता के पक्ष में कुठार के समान (खान०) ।

जठराग्नि अति प्रबळ, क्रोघ स्वरूप, शत्रुओं का नाशक, सतसंगी, सदा.काम कला में वृद्ध (जा० भ०) ।

प्र pn द्रव्यों से युक्त, स्त्री से लालसा प्राप्त करने बाळा, पृष्ट देह, शुद्ध

टा शनुनाशक, त्रनादा' प्रबल जठराग्नि, रि श्रीमान्‌, यक्ष बळ युक्त, रोग करने वाला

२४ वषं में पुत्र देता है । पापदृष्ट--शत्रु हो । नियम से शन्नु मय, शुम युक्‍त या ृष्ट--शत्रु कृत भय नहीं होता, शत्रु की मित्रता हो ।

शरीर में फोड़े होकर छेद पड़े, बडी व्याधि हो, लोगों से घिक्कारित (प्रा यो०) । रति विकार हो, परन्तु सबसे जय मिले (सोम सिद्धान्त) 1 “४-छठे भाव में बुध का फल

वक्री या शत्रु क्षेत्री--शत्रु से भय, शुभ गृही या णुम दृष्ट--शुमप्रद, शत्रु नाक है (मान०) 1 सदा दुःखी, आलसी, दुष्ट स्वभाव, धत्रुयुक्त (खान०) ।

झगडा करने में प्रीत, रोगी, कठोर हृदय, शत्रु से संतप्त चित्त, आलसी व्याकुल (जा० भ०) ।

नृशंस, भाइयों का विरोध, ईर्ष्यालु, काम में त र, विद्वान्‌ (ल० चं०) 1 शत्रु रहित (वृ० जा०) ।

विद्या विनोदो, कलह प्रिय, शील रहित, परिवार से उपकार होन (जा० पारि०) 1

चन्द्र के समान हजार दोष देता है (यवन) ।

३७ वर्ष में मृत्यु देता है (हिल्लाज) ।

चन्द्र के समान फल देता Š, मामा कन्या सन्तान वाला |

स्त्री व पुरुष के रोग, लोगों से कलह, सर्वकाल त्रास, बहुत घूमे (प्रा यो०) ।

५-षष्ठ भाव में गुरु का फल

हाथी-घोडा युक्‍त, दुबला अंग, शत्रु को जीतने वाला । वक्री-शत्रु से भय (मान०) ।

बहुत आकर्षण, अनादर प्राप्त, शत्रु दमनकर्त्ता, मन्त्राभिचार में चतुर (फल०)।

आसी, व्याधि युक्त, कटु वाक्य, मामा सुखहीन (खान०) ।

श्रेष्ठ गति और श्रेष्ठ विद्या से होन अर्थात्‌ दुष्ट ओर खोटो विद्या में तत्पर, यक्ष का अमी, शत्रुनाशक, प्रारब्ध कार्य में आलसी (जा० भ०) । :

३२४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

विध्न qaq, बहुत शत्रु वाला, निष्ठुर, उद्वेग वाल, बुतिद्दीन, कामुक (ल० चं०) ।

हात्रु रहित (qo जा०) 1 कामी, शत्रुओं को जीतने वाला और अवल (जा० पारि०) ॥

चंद्र समान फल, आता, भगिनी तथा मामाओं का बढ़ा सुख, मामा पुत्र युक्त,

सुखी व घनवान्‌ (जा० सं०) । ४० वर्ष में वैरियों को भय देता है (यवन) ॥

चंद्र के समान हजार दोष देता है (हिल्लाज) ।

सारसी, क्रोधी, दुष्ट वाक्य बोले, दूसरे से पराजय, स्त्रियों का प्रावल्य, अति

आहार (सोम सिद्धान्त) ।

६-षष्ठ में शुक्र का फल

अस्त हो तो दुष्ट कुछ में जन्म लेकर भी बडा पण्डित हो, उच्च का--शत्रु को जीत ने

बाळा, सुख पाने वाला (मान०) ।

शत्रु रहित, घन रहित, युवती स्त्रियों से भ्रष्ट, दुःखी (फल०) 1

रोगी, मूर्ख, दयाहीन, मित्र रहित (खान०) ।

स्त्रियों का प्यारा नहीं, कामदेव से हीन, fad, शत्रु का भय (जा० भ०) ।

दंभो, जड़, हानि जन्म से युक्त, दुष्ट संग वाला, लड़ाई करने वाला, पिता का बैरी

(€० चं०) i न रहित (qe जा०) । झोक अपवाद से युक्त (जा० पा०) ।

आता भगिनी तथा मामाओं का-सुख, मामा कन्या संतान वाला, पावों में रोग,

(जा० सं०) |

२१ वर्ष में शस्त्र से मृत्यु (हिल्लाज) ।

बुरे कर्म करे, दरिद्री, स्त्रियों से अति मित्रता, दुष्ट बुद्धि, डरपोक (सोम विद्वान) ॥

७-षष्ठ भाव में शनि का फल `

नीच का व शत्रु क्षेत्री हो-कुछ का क्षय करने वाला । उच्च fm या स्वगृहो 77

शनं फो मारने वाळा, घन ओर कामनाओं को सिद्धि को प्राप्त, qg कामो में धुण

मान०) । जल्दो-जल्दी खाने वाळा, घनी, शत्रुओं का दमन कर्ता, वृष्ट, मानी (फल०) 1

दानी दुःखी, शत्रुनाशी, राज प्रिय (खान०) 1

शत्रुओं को जीतने वाला, गुणों का जानने वाला, श्रेष्ठ कम, बहुतों का पाल कर्ता,

पृष्ट देह, प्रवल जठरारिन, श्रेष्ठ (जा० भ०) 1

विशेष भोजन करने वाला, विषय बुद्धि, शत्रु से भय, कामी, घनवान्‌ (जा० पारि०) ।

बेरियों के पक्ष से संतप्त, शूरवोर, विषय चेष्टा, बहु भोजो, कवि, शत्रुओं का दाहक

(जा० सं०) पावो में रोग (जा० सं०) ।

सिर पर पत्थर पड़ता, बिजली पड़ना, कोई का मरना (प्रा? यो०)।

८-बष्ठ में राहु का फल

« झंत्रु का नाश करे, घन पुत्र भोग प्राप्त, उच्च का-अनेक अनर्थों का नाशक, परस्त्रो

गमन अवश्य करे (मान०) ।

भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३२५

शन्रुओं द्वारा सताया जावे, या दुष्ट लोगों से दबाया जावे, गुदा में रोग, घनी गोर दीघंजोबी (Gso) ।

बैरियों का नाशक, घन लाभ, पशु पीडक, कमर में पीड़ा, म्लेच्छों से समागम, बड़ा घरूवान्‌ (जा० qo) ।

म्लेच्छ राजा से घन प्राप्त, उच्च हृदय, शत्रु नाशक (खान०) ।'

शत्रु संहारक, दीर्घायु, विशेष सुखी, कुलीन (जा० पारि०) ।

बहुत सी भैसों का घन हो (जा० qo) à

९-षष्ठ में केतु फल

मामा द्वारा मान हानि, वैरियों का नाश, चोपायों के कारण सदा सुखी, नीच

प्रकृति, शरीर किसो विकार से युक्त, सब व्याधियों का नाश (मान०) 1

ये उत्तम गुण युक्त, प्रसिद्ध, प्रभुता प्राप्त, शत्रु का दमन कर्ता, अमोष्ट सिद्धि प्राप्त

०) ॥

शत्रुओं का नाशक, मामा के पक्ष में मान भंग को प्राप्त, चोपायों से सुखी, सदा

घन लाभ, निरोगी देह, व्याधि नाद्य (जा० भ०) ।

राहु के समान फल (खान०) (जा० सं०) ।

बन्धु प्रिय, उदार, गुण प्रसिद्ध, विद्वान्‌, यशस्वी (जा० पारि०) ।

शत्रु से जय, बहुत आहार, शूर, विजयी (सोम सिद्धान्त) ।

७-सप्तस भाव सें ग्रहों का फल

१-सप्तम में सूयं का फल

स्त्रियों के साथ विहार करने वाला, अन्य सुखों से हीन, बडा चंचल, पाप कमं में

भ्रवृत्ति, फूला शरीर, न अति छम्बा न अति छोटा, कपिल नेत्र, कुरूप, पीले रंग के केश

(सान०) ।

राजा का कोप, कुरूप, बिना स्त्री के भटकता फिरे, अपमान सहे (फल०) 1

चिता व्याकुल, कामो, स्त्री हीन (खान०) ।

घन हीन, देह की शोमा रहित, भय और रोग युक्त, दुष्ट स्वभाव, राजक्रोघ से

दुःखी, कृश (जा० भ०) 1

दुष्ट स्त्री याला, दुष्टों से प्रसन्न, थोडे पुत्र वाळा, गुह्य रोगो, पाप सहित (go

चं०) । स्त्रियों से हारा हुआ (ge जा०) i

स्तौ वंष्या हो (go पा०) 1

स्त्रो का बैरो, विशेष कोपी, शठ (जा० पारि०) 1

सत्री से विलास करने वाला ओर सुख का भागी नहों होता, चंचल, पापी होता है ।

छायु के समान शरीर वाला न अति छोटा न अति बड़ा, कपिल वर्ण नेत्र, खूपवाळा,

[पिंग केशों से युक्त, छुमूति (जा० सं०) ।

“३२६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

सूर्य की दृष्टि हो या वर्गोत्तम हो--तो उत्तम है, साँवले रंग की, लाल नेत्र, चंचल

चित्त, मनमाने भाषण करने वाली, छम्बे हाथ, राजस गुण युक्त, पांडित्य करने वाली

ऐसी उत्तम स्त्री मिले, यदि उसमें पाप का योग हो तो-अरिष्ट हो (gre यो०) ।

२-सप्तम Š चन्द्र का फल

उत्तम स्त्रियों का स्वामी, सुवर्ण से सम्पन्न, सुंदर देह, क्षोण हो वा पापगृही या!

पाप दृष्टि हो--सुख का भागी न हो, स्त्री रोगिणी हो (मान०) ।

देखने में अच्छी, सुन्दर, स्त्री से प्यार किया गया अति सुभग (सुन्दर) (फछ०) १

बड़ा अभिमानी, कामातुर, घन और नम्रता रहित (जा० भ०) ।

निरोगी, घनवान्‌, सुन्दर व यशस्वी (खान०) ।

दुःखी, कुष्ट रोगी, वंचक, कृपण, बहु शत्रु, पराई स्त्री से संपक (go चं०) t

ईर्षावान्‌, दूसरे को मलाई को बुराई मानने वाला (qo जा०) ।

दयालु, भ्रमणशील, स्त्री के वश में रहने वाला, भोगवान्‌ (जा० पारि०) ।

राशि के सदृश स्वभाव वालो स्त्री हो (qo पा०) ।

पूर्ण चंद्र--सुन्दर स्त्री का स्वामी, सुवणं युक्त, तथा सुंदर शरीर वाला, क्षीण,

पापदुष्ट यां पापराशि में--स्त्रा रोगिणो हो, सुख भागी नहों होता (जा० सं०) ।

लोगों के संतति का द्वेष करे व स्त्रियों पर बहुत प्रेम करे । वर्गोत्तम हो तो मूद झरीर प्रिय बोलने वाळी स्त्री हो (प्रा० यो०) 1

३-सप्तम में मङ्गल का फल

नोच या शत्रु क्षेत्री--स्त्री के मरण का दुःख हो 1 मकर का या स्वक्षेत्री--एक ही

विवाहिता स्त्री जीवित रहे । चपल बुद्धि वाली, खम्बी, दुष्ट चित्त वाली और कुरूपा

पत्नी हो (मान०) ।

अनुचित कार्य कर्त्ता, रोग से ग्रसित, रास्ते से भटकता हुआ अपनो स्त्री को

खोवे (फर०) ।

कामी न हो, सदा दुःखो, मूखं, अत्याचार करने वाली, सदा छड़ाई में उद्यत, स्त्री

q जीये, यात्रा, स्त्रो सुख न हो (खान०) ।

अनेक अनथं से व्यर्थ चिता से ओर शत्रु समूह से पोडित, स्त्री जनित दुःख से संतापित (जा० भ०) ।

क्रोधी, नीच सेवी, वंचक और निटुर रुधिर से आरक्त (go चं०) ।

स्त्री का जीता हुआ (वृ० जा०) ।

रजस्वला ओर व्या स्त्रो का संग, सुंदर स्तन वाली स्त्रो (qo पा०) ।

स्त्री के कारण विलाप करने वाला, रण प्रेमो (जा० पारि०) ।

युवती स्त्री हो, स्त्री को लाल कांति हो, पुरुष स्वभाव वाली स्त्रो हो या स्त्री हीन

हो | नोच या शतु क्षेत्रो--स्त्रो मरण का दुःख हो । मकर या स्वराशि में-चं बल, बुद्धि से गति विणाळ, दुष्ट चित्त तथा विरूप, सत्कृत स्तरो को प्राप्त (जा० सं०) ।

भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३२७

मंगल की दृष्टि हो या वर्गोत्तम हो--सांवला शरीर, क्रूर नेत्र, दुष्टवाक्य, अति चंचळ, मनमें कपट, चोर, झूठी, मार खाने वाली, पति को दुःख देने वाली, ज्वर फोड़ा,

आदि रोग पीड़ित, खांरा तीखा, खट्टा खाने वाली, विशेष कामो स्त्री हो । इसमें पाप योग हो तो देह रोग, प्रदर परमा वगंरह रोग हो, इसमें पाप शनि का

योग हो तो मंगल में बताये फल से अधिक दुष्ट हो (प्रा० यो०) ।

४-सप्तम में बुध का फल

चंचल, मध्यम दृष्टि । शुभ क्षेत्र हो तो--उत्तम कुल की स्त्रो fas (मान०) ।

विद्वन्‌, सुन्दर वेश घारण करे, बड़प्पन प्राप्त हो, स्त्री घनवान्‌ मिले (फल०) ।

धनी, सत्यवगता, मुसाहिब, परोपकारी, रूपवान्‌, बुद्धिमान्‌, सुशील (खान०) ।

श्रेष्ठ शोलयुफ्त, वैभवयुक्त, सत्यवक्ता, स्त्री, सुवर्ण, पृत्रयुक्त, (जा० qo) 1

रूप. ओर विद्यायें अधिक, सुशील, कामशास्त्र का ज्ञाता, स्त्रियों में पुज्य हो

(छ० चं०) । घर्मज्ञ (qo जा०) ।

उसको वेश्या, नीच जाति या बनिया स्त्री से संग होता ë (go पा०) |

व्यंग शरीर, शिल्पकला का ज्ञाता, विनोदी और चतुर (जा० पारि०) ।

पुरुष चंचल वृत्ति से युक्त हो, पुरुष स्वभाव वाली स्त्रो मिळे, शुभ राशि का हो

तो--उत्तस वंश में उत्पन्न स्त्रो मिले (जा० सं०) ।

उत्तम स्वभाव वाली स्त्री हो, पुरुष स्त्री के आघोन हो, घमं जानने वाला हो

(प्रा० यो०) ।

५--सप्तम में गुरु का फल

राजा सम सुखी, अमृत तुल्य वाणी, उत्तम बुद्धि, दिञ्यमूमि दशन में प्रिय (मान०) ।

अच्छी स्त्री, पुत्र प्राप्त, अनेक सुभग, अपने पिता से अधिक उदार (फल०) 1

बड़ा पंडित, विनीत, सुखी, स्त्री सुखयुक्त, चतुर (खान०) ।

शास्त्र में अभ्यास करने वाला, नम्रता सहित, घन से अत्यन्त सोख्य प्राप्त, राजा

का मंत्री, काव्य करने वाला (जा० wo) ।

काम में चित्तवाला, बड़ा बली, घनो, दाता, प्रगल्म ओर चित्र कमं करने वाला

(छ? चं०) 1 ब्राह्मणी गर्भिणी का संग, कठोर स्तन वाली स्त्री हो, (qo पा०) 1

भीर, रमणीय स्त्री वाला, पितर गुरु का बैरी (जा० पारि०) 1

पित्ता से अधिक (चृ० जातक) 1

राजा के तुल्य सुख प्राप्त, अमृत सा मोठा वचन, पंडित, सुन्दर शरीर, प्रियदर्शन,

पुत्रों को उत्पन्न करने वाली मनोहर स्त्री हो । पुरुष स्वभाव वाली स्त्री हो, गुरु बली

हो, तो सुवर्ण समान वणं की स्त्री हो (जा० सं०)।

उत्तम स्वभाव की स्त्री हो, बाप को अपेक्षा अधिक गुण हो (प्रा० यो०) 1

३२८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

६-सप्तम में शुक्र का फल

बहुत पुत्र तथा घन सम्पन्न, कुलीन स्त्री हो (मान०) ।

अच्छी स्त्री हो परन्तु बुरी स्त्रो से संवन्ध रखे, स्त्री को खोये , घनी होवे (@se) i

दयावान्‌, चतुर, कलाज्ञ, स्त्री चिता युक्त (खान०) ।

बहुत कलाओं में चतुर, जल क्रोड़ा का प्रेमी, विषय करने गें बड़ा चतुर, अत्यन्त

चंचल, स्त्रियों से मित्रता करने वाळा (जा० भ०)।

घनी, सुन्दर स्त्री युक्त, निरोग, सुखी, बहुत भोग वाळा (छ० चं०) ।

कलह प्रिय, स्त्री अभिलाषो, पिता से अधिक गुणी (qo जा०) !

स्थूल सुन्दर स्तन वाली स्त्री हो (वृ० पारा०) ।

वेश्या का स्वामी, सुन्दर और व्यंग (जा० पारि०) ।

बहुत से पुत्र और घन से युक्त उत्तम वंश में उत्पन्न हुई स्त्री का स्वामी, सुन्दर

शरीर, प्रसन्न चित्त, सुखी, स्त्री स्वभाव वालो युवती स्त्री हो । शुक्र बलवान्‌ होतो

सुवर्ण समान वणं वाळी स्त्री मिले (जा० सं०) ।

उत्तम स्वभाव वाली स्त्री मिले, बाप की अपेक्षा अधिक गुण हों (प्रा० यो०) ।

७-स॒प्तम में शनि का फल

स्त्री की मृत्यु हो, अनेक रोग, बड़ा अभिमानी, अंगहीन, मित्र: के वश की कन्या के

साथ मित्रता करने वाला (मान०) ।

बुरी स्त्री से विवाह हो, गरीब हो, यहाँ वहाँ भटके और विह्वळू (meo) ।

रोग से निर्बळ, आजीविका तथा मनुष्यों से मित्रता रहित, स्त्री घर यौर छन्न स्त,

दुःखित (जा० भ०) ।

स्त्री सहित रोगी, बहुत शत्रु, विवरण, दुर्बळ, मलिन (se so) 1

सूयं समान फल, स्त्री के वश (qo जा०) ।

बुरे आचरण, कृश, कम बोलने वाला, निर्बुद्धि, पराधीन (खान०) ।

नीच जाति या रजस्वला का संग, रोगिणी दुनळी स्त्री हो (वृ० पारा०) ।

रास्ते के ओझा ढ़ोने या चलने से तप्त, धीर, धनिक (जा० पारि०) 1

वृद्धा स्त्री हो या नपुंसक स्वभाव वाली स्त्रो हो, स्याम वर्ण की स्त्री होवे (जा० सं०)॥

बिश्राम भूत स्त्री का नाश करता है, पुरष को कपटो और अंगहीन करता हैं । वह

मित्र के वंश से हारे हुए शत्रुओं वाला (जा० सं०) । स्त्री से पराभव पावे (प्रा० यो०) ।

८-सप्तम में राहु का फल

धन की हानि युक्त स्त्री हो, अनेक भोगों का देने वाला । पापग्रहों के साथ राहु

हो-महापापनो, कुटिला, कुशीला भार्या मिळे । (मान०) ।

५ स्त्रियों से सम्बन्ध करने के कारण घन Tara, अपनी प्रिया से वियोग, अवीयं,

स्वतंत्र, अल्पबुद्धि (फल०) ।

स्त्री से विरोध करने वाला या स्त्री को नाश करने बाला, प्रचंडरूप क्रोघो झगड़ाछू

भार्या (जा० भ०) ।

भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३२९

पागळ फी तरह घुमे, दूसरों को हानि पहुँचावे, क्रोधी, बुरे आचरण, कलह कारक (खान०) 1 नीच जाति या रजस्वला का संग (वृ० पा०) 1 अहंकारी, रोगवान्‌, व्यभिचारियों में शिरोमणि (जा० पारि०) 1 घन खर्चे करने वाळी स्त्री, अनेक विविध भोग प्राप्त, नपुंसक स्वभाव वाली श्याम वर्ण की स्त्री हो 1 हसमैं स्त्रो का योग नहीं होता, यदि स्त्री प्राप्त हो तो मृत्यु को प्राप्त हो (जा० सं०) । विष का प्रयोग करगे वाली दुष्ट स्त्रो हो (प्रा० यो०) । ९-सप्तम में केतु का फल

मागं चलने की अधिक चिन्ता, या जाना बन्द हो जाय तो अपने घन का नाश हो या जल से भय हो, वृश्चिक का हो--सदा लाम, स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा कारक अधिक खर्च तथा व्यग्रता हो (मान०) ।

अपमान सहे, बुरी स्त्रियों को संगति करे, अंत्र रोगी, पापयुक्त, स्त्री की हानि, घातु (शक्ति) हानि (फल०) 1 राहु के समान फल (खान०) । मार्ग की चिन्ता में चित्त को वृत्ति रखने वाला, शत्रुओं से सदा घन नाश । वृश्चिक 'का--सदा छाम करने वाला, कलत्रादि को पीड़ा ओर चित्त को विकार होता है (जा० भ०) ।

Rigs= स्त्रो बाला या स्त्री भोग रहित हो, शीर रहित, निद्रालु, दोन वचन बोलने Ter, सदा भ्रमण शील, मूखों में अग्रगण्य (जा० पारि०) 1

राहु सम फल (प्रा० यो०) ।

८-अप्ट्म भाव में ग्रहों का फल

१--अष्टम में सूये का फल

अति चंचल, त्यागी, निश्‍चय बुद्धिमान्‌ मनुष्यों की सेवा करने वाला, भाग्यहीन, शीलहीन, रति की अधिकता से मलिन वस्त्र पहिरने वाळा, नीचों की सेवा करने वाला, सदा परदेश सें रहने वाला (मान०) ।

घन हानि, मित्र हानि, अल्पायु, दोषपूर्ण दृष्टि (फल०) ।

दुबेल, उद्यम रहित, विदेश में वृत्ति (खान०) 1

दुबंल नेत्र, मंद दृष्टि, छात्र वृद्धि, भ्रष्ट, बड़ा क्रोधी, थोड़े घन याला, विशेष करफे चुबंल देह (जा० भ०) ।

कृतघ्न, हीन मनुष्य, शत्रुओं से डराया हुआ, वृया | चलने वाला, बन्धुहीन

{छ० चं०) 1 संतान थोड़ी, नेत्र चंचल (go हि ]

ब सुन्दर, में चतुर (जा० पारि०) 1

sss k: देवा है, अन्य राशि का-दुःख पूर्वक मरण, काष्ठ से कष्ट

देवा है । बली पापयुक्त या दुष्ट--उसे यमदूत होकर नाश करता ç ।

संतति थोड़ी हो, मन विकल हो, अंतर्दाह या अग्नि से मृत्यु, स्वक्षेत्र या उच्च का

सौल्य देता है, अन्य राखि का दुःख देता है । शत्र क्षेत्र हो तो बिजली या सर्प से मृत्यु, गुम राशि का हो तो तीर्थादि में मृत्यु (प्राश यो०) 1

३३० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

२-अष्टम में चन्द्र का फल

पापगृही हो तो अल्पायु में मरण । स्वक्षेत्री या सोम्यगुदी गुरु या शुक्र के घर का

पूर्ण चन्द्र हो--श्वास आदि रोगों से अति दुःख हो (मान०) रोगी अल्पायु (फल०) L

रोगी, क्रोधी, निर्दय, विदेश भ्रमण । (खान०) ।

अनेक रोगों से दुर्बल देह, घन हीन, चोर, शत्रु तथा राजा से संताप, भन उद्वेग से व्याकुल (जा० भ०) ।

दुःखी, थोड़ी आयु, कष्ट सहित, प्रगल्भ, दु बल अंग, पाप बुद्धि (ल० so) बुद्धि- मान्‌ (qo जा०) ।

लडाई में उत्सुक, दान-प्रमोद और विद्याशील (जा० पारि०) 1

क्षीण चन्द्र--बाल्यावस्था में मृत्यु, त्रिदोष ज्वर और मृत्यु (जा० सं०) ।

चपळ बुद्धि व रोगो, जल में मृत्यु, पापग्रह की राशि का हो तो--श्वास त्रिदोष

ज्वर सूजन होकार मरे (प्रा० यो) । `

३-अष्टम में मंगल का फल

क्षीण या नीच का--जल में डूब कर मरे। घन मीन का सूर्य हो तो--नित्य भोग

करने वाला, नीचे हाथ पैर वाला, अनेक भोगों को भोगे (मान०) 1

कुरूप शरीर, गरीब हो, अल्प जीवन, जन निदित (फल०) ।

हितवादी, गुप्त रोग, स्त्री सुख नहीं, सदा चिता aq, जौहरी, शरीर में घाव,

बुद्धि हीन, दुबला, रुधिर विकार (खान०) 1

नेत्रों में विकलता, दुर्भगता को प्राप्त, रक्त विकार से पीड़ित, नीच फर्म में परवृत्ति,

बुद्धि का अंधा (जा० भ०) 1

कुष्ठी, अल्पायु, सत्रुओं से पीडित, थोड़े द्रव्य वाळा, रोग युक्त, निर्गुणी (ल० चं०) +

थोड़ी संतान (go जा०) ।

विनीत वेब, घनवान्‌, मुखिया (जा० पारि०)।

शस्त्र आदि से व छूता आदि से व गरिन से मृत्यु, कुष्ट रोग से नाश, स्त्री को पीड़ा

(जा० सं०) ।

शस्त्र से, अग्नि, कुष्ठ वर्ण, स्त्रियों से रोग होकर या शस्त्रचिकित्सा से मृत्यु, अल्फ

संतान, विफल मन (प्रा० यो०) ।

४-अष्टम बुध का फल

मूत प्रतों की कृपा से सम्पूर्ण सम्पत्तियों को प्राप्त, बहु विरोध करने वाला, अभि- मानो, यत्न ऐ अन्य कमं क्रिया को करने वाला (जा० भ०) ।

दीर्घायु, अभिमानी, राजा से लाभ, लोगों से š< (खान०) 1

विश्‍्वासघातो, कुबुद्धि, परश्त्रो से भोग, कायं से आतुर, सत्यवादी, निरोग (छ० चं०) । विख्यात गुणवान्‌ (वृ० जा०) ।

सत्य भाषी, सुन्दर मूर्ति, शत्रु हंता, अतिथि जनों का सत्कार करने वाळा । पाप युक्तः था शु गृहो-कामदेव के वेग में अप्रतिष्ठा पाने वाला (मान०) ।