सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ३ (खण्ड १)
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 3 (Part 1)
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३२७
मंगल की दृष्टि हो या वर्गोत्तम हो--सांवला शरीर, क्रूर नेत्र, दुष्टवाक्य, अति चंचळ, मनमें कपट, चोर, झूठी, मार खाने वाली, पति को दुःख देने वाली, ज्वर फोड़ा,
आदि रोग पीड़ित, खांरा तीखा, खट्टा खाने वाली, विशेष कामो स्त्री हो । इसमें पाप योग हो तो देह रोग, प्रदर परमा वगंरह रोग हो, इसमें पाप शनि का
योग हो तो मंगल में बताये फल से अधिक दुष्ट हो (प्रा० यो०) ।
४-सप्तम में बुध का फल
चंचल, मध्यम दृष्टि । शुभ क्षेत्र हो तो--उत्तम कुल की स्त्रो fas (मान०) ।
विद्वन्, सुन्दर वेश घारण करे, बड़प्पन प्राप्त हो, स्त्री घनवान् मिले (फल०) ।
धनी, सत्यवगता, मुसाहिब, परोपकारी, रूपवान्, बुद्धिमान्, सुशील (खान०) ।
श्रेष्ठ शोलयुफ्त, वैभवयुक्त, सत्यवक्ता, स्त्री, सुवर्ण, पृत्रयुक्त, (जा० qo) 1
रूप. ओर विद्यायें अधिक, सुशील, कामशास्त्र का ज्ञाता, स्त्रियों में पुज्य हो
(छ० चं०) । घर्मज्ञ (qo जा०) ।
उसको वेश्या, नीच जाति या बनिया स्त्री से संग होता ë (go पा०) |
व्यंग शरीर, शिल्पकला का ज्ञाता, विनोदी और चतुर (जा० पारि०) ।
पुरुष चंचल वृत्ति से युक्त हो, पुरुष स्वभाव वाली स्त्रो मिळे, शुभ राशि का हो
तो--उत्तस वंश में उत्पन्न स्त्रो मिले (जा० सं०) ।
उत्तम स्वभाव वाली स्त्री हो, पुरुष स्त्री के आघोन हो, घमं जानने वाला हो
(प्रा० यो०) ।
५--सप्तम में गुरु का फल
राजा सम सुखी, अमृत तुल्य वाणी, उत्तम बुद्धि, दिञ्यमूमि दशन में प्रिय (मान०) ।
अच्छी स्त्री, पुत्र प्राप्त, अनेक सुभग, अपने पिता से अधिक उदार (फल०) 1
बड़ा पंडित, विनीत, सुखी, स्त्री सुखयुक्त, चतुर (खान०) ।
शास्त्र में अभ्यास करने वाला, नम्रता सहित, घन से अत्यन्त सोख्य प्राप्त, राजा
का मंत्री, काव्य करने वाला (जा० wo) ।
काम में चित्तवाला, बड़ा बली, घनो, दाता, प्रगल्म ओर चित्र कमं करने वाला
(छ? चं०) 1 ब्राह्मणी गर्भिणी का संग, कठोर स्तन वाली स्त्री हो, (qo पा०) 1
भीर, रमणीय स्त्री वाला, पितर गुरु का बैरी (जा० पारि०) 1
पित्ता से अधिक (चृ० जातक) 1
राजा के तुल्य सुख प्राप्त, अमृत सा मोठा वचन, पंडित, सुन्दर शरीर, प्रियदर्शन,
पुत्रों को उत्पन्न करने वाली मनोहर स्त्री हो । पुरुष स्वभाव वाली स्त्री हो, गुरु बली
हो, तो सुवर्ण समान वणं की स्त्री हो (जा० सं०)।
उत्तम स्वभाव की स्त्री हो, बाप को अपेक्षा अधिक गुण हो (प्रा० यो०) 1
३२८ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
६-सप्तम में शुक्र का फल
बहुत पुत्र तथा घन सम्पन्न, कुलीन स्त्री हो (मान०) ।
अच्छी स्त्री हो परन्तु बुरी स्त्रो से संवन्ध रखे, स्त्री को खोये , घनी होवे (@se) i
दयावान्, चतुर, कलाज्ञ, स्त्री चिता युक्त (खान०) ।
बहुत कलाओं में चतुर, जल क्रोड़ा का प्रेमी, विषय करने गें बड़ा चतुर, अत्यन्त
चंचल, स्त्रियों से मित्रता करने वाळा (जा० भ०)।
घनी, सुन्दर स्त्री युक्त, निरोग, सुखी, बहुत भोग वाळा (छ० चं०) ।
कलह प्रिय, स्त्री अभिलाषो, पिता से अधिक गुणी (qo जा०) !
स्थूल सुन्दर स्तन वाली स्त्री हो (वृ० पारा०) ।
वेश्या का स्वामी, सुन्दर और व्यंग (जा० पारि०) ।
बहुत से पुत्र और घन से युक्त उत्तम वंश में उत्पन्न हुई स्त्री का स्वामी, सुन्दर
शरीर, प्रसन्न चित्त, सुखी, स्त्री स्वभाव वालो युवती स्त्री हो । शुक्र बलवान् होतो
सुवर्ण समान वणं वाळी स्त्री मिले (जा० सं०) ।
उत्तम स्वभाव वाली स्त्री मिले, बाप की अपेक्षा अधिक गुण हों (प्रा० यो०) ।
७-स॒प्तम में शनि का फल
स्त्री की मृत्यु हो, अनेक रोग, बड़ा अभिमानी, अंगहीन, मित्र: के वश की कन्या के
साथ मित्रता करने वाला (मान०) ।
बुरी स्त्री से विवाह हो, गरीब हो, यहाँ वहाँ भटके और विह्वळू (meo) ।
रोग से निर्बळ, आजीविका तथा मनुष्यों से मित्रता रहित, स्त्री घर यौर छन्न स्त,
दुःखित (जा० भ०) ।
स्त्री सहित रोगी, बहुत शत्रु, विवरण, दुर्बळ, मलिन (se so) 1
सूयं समान फल, स्त्री के वश (qo जा०) ।
बुरे आचरण, कृश, कम बोलने वाला, निर्बुद्धि, पराधीन (खान०) ।
नीच जाति या रजस्वला का संग, रोगिणी दुनळी स्त्री हो (वृ० पारा०) ।
रास्ते के ओझा ढ़ोने या चलने से तप्त, धीर, धनिक (जा० पारि०) 1
वृद्धा स्त्री हो या नपुंसक स्वभाव वाली स्त्रो हो, स्याम वर्ण की स्त्री होवे (जा० सं०)॥
बिश्राम भूत स्त्री का नाश करता है, पुरष को कपटो और अंगहीन करता हैं । वह
मित्र के वंश से हारे हुए शत्रुओं वाला (जा० सं०) । स्त्री से पराभव पावे (प्रा० यो०) ।
८-सप्तम में राहु का फल
धन की हानि युक्त स्त्री हो, अनेक भोगों का देने वाला । पापग्रहों के साथ राहु
हो-महापापनो, कुटिला, कुशीला भार्या मिळे । (मान०) ।
५ स्त्रियों से सम्बन्ध करने के कारण घन Tara, अपनी प्रिया से वियोग, अवीयं,
स्वतंत्र, अल्पबुद्धि (फल०) ।
स्त्री से विरोध करने वाला या स्त्री को नाश करने बाला, प्रचंडरूप क्रोघो झगड़ाछू
भार्या (जा० भ०) ।
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३२९
पागळ फी तरह घुमे, दूसरों को हानि पहुँचावे, क्रोधी, बुरे आचरण, कलह कारक (खान०) 1 नीच जाति या रजस्वला का संग (वृ० पा०) 1 अहंकारी, रोगवान्, व्यभिचारियों में शिरोमणि (जा० पारि०) 1 घन खर्चे करने वाळी स्त्री, अनेक विविध भोग प्राप्त, नपुंसक स्वभाव वाली श्याम वर्ण की स्त्री हो 1 हसमैं स्त्रो का योग नहीं होता, यदि स्त्री प्राप्त हो तो मृत्यु को प्राप्त हो (जा० सं०) । विष का प्रयोग करगे वाली दुष्ट स्त्रो हो (प्रा० यो०) । ९-सप्तम में केतु का फल
मागं चलने की अधिक चिन्ता, या जाना बन्द हो जाय तो अपने घन का नाश हो या जल से भय हो, वृश्चिक का हो--सदा लाम, स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा कारक अधिक खर्च तथा व्यग्रता हो (मान०) ।
अपमान सहे, बुरी स्त्रियों को संगति करे, अंत्र रोगी, पापयुक्त, स्त्री की हानि, घातु (शक्ति) हानि (फल०) 1 राहु के समान फल (खान०) । मार्ग की चिन्ता में चित्त को वृत्ति रखने वाला, शत्रुओं से सदा घन नाश । वृश्चिक 'का--सदा छाम करने वाला, कलत्रादि को पीड़ा ओर चित्त को विकार होता है (जा० भ०) ।
Rigs= स्त्रो बाला या स्त्री भोग रहित हो, शीर रहित, निद्रालु, दोन वचन बोलने Ter, सदा भ्रमण शील, मूखों में अग्रगण्य (जा० पारि०) 1
राहु सम फल (प्रा० यो०) ।
८-अप्ट्म भाव में ग्रहों का फल
१--अष्टम में सूये का फल
अति चंचल, त्यागी, निश्चय बुद्धिमान् मनुष्यों की सेवा करने वाला, भाग्यहीन, शीलहीन, रति की अधिकता से मलिन वस्त्र पहिरने वाळा, नीचों की सेवा करने वाला, सदा परदेश सें रहने वाला (मान०) ।
घन हानि, मित्र हानि, अल्पायु, दोषपूर्ण दृष्टि (फल०) ।
दुबेल, उद्यम रहित, विदेश में वृत्ति (खान०) 1
दुबंल नेत्र, मंद दृष्टि, छात्र वृद्धि, भ्रष्ट, बड़ा क्रोधी, थोड़े घन याला, विशेष करफे चुबंल देह (जा० भ०) ।
कृतघ्न, हीन मनुष्य, शत्रुओं से डराया हुआ, वृया | चलने वाला, बन्धुहीन
{छ० चं०) 1 संतान थोड़ी, नेत्र चंचल (go हि ]
ब सुन्दर, में चतुर (जा० पारि०) 1
sss k: देवा है, अन्य राशि का-दुःख पूर्वक मरण, काष्ठ से कष्ट
देवा है । बली पापयुक्त या दुष्ट--उसे यमदूत होकर नाश करता ç ।
संतति थोड़ी हो, मन विकल हो, अंतर्दाह या अग्नि से मृत्यु, स्वक्षेत्र या उच्च का
सौल्य देता है, अन्य राखि का दुःख देता है । शत्र क्षेत्र हो तो बिजली या सर्प से मृत्यु, गुम राशि का हो तो तीर्थादि में मृत्यु (प्राश यो०) 1
३३० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
२-अष्टम में चन्द्र का फल
पापगृही हो तो अल्पायु में मरण । स्वक्षेत्री या सोम्यगुदी गुरु या शुक्र के घर का
पूर्ण चन्द्र हो--श्वास आदि रोगों से अति दुःख हो (मान०) रोगी अल्पायु (फल०) L
रोगी, क्रोधी, निर्दय, विदेश भ्रमण । (खान०) ।
अनेक रोगों से दुर्बल देह, घन हीन, चोर, शत्रु तथा राजा से संताप, भन उद्वेग से व्याकुल (जा० भ०) ।
दुःखी, थोड़ी आयु, कष्ट सहित, प्रगल्भ, दु बल अंग, पाप बुद्धि (ल० so) बुद्धि- मान् (qo जा०) ।
लडाई में उत्सुक, दान-प्रमोद और विद्याशील (जा० पारि०) 1
क्षीण चन्द्र--बाल्यावस्था में मृत्यु, त्रिदोष ज्वर और मृत्यु (जा० सं०) ।
चपळ बुद्धि व रोगो, जल में मृत्यु, पापग्रह की राशि का हो तो--श्वास त्रिदोष
ज्वर सूजन होकार मरे (प्रा० यो) । `
३-अष्टम में मंगल का फल
क्षीण या नीच का--जल में डूब कर मरे। घन मीन का सूर्य हो तो--नित्य भोग
करने वाला, नीचे हाथ पैर वाला, अनेक भोगों को भोगे (मान०) 1
कुरूप शरीर, गरीब हो, अल्प जीवन, जन निदित (फल०) ।
हितवादी, गुप्त रोग, स्त्री सुख नहीं, सदा चिता aq, जौहरी, शरीर में घाव,
बुद्धि हीन, दुबला, रुधिर विकार (खान०) 1
नेत्रों में विकलता, दुर्भगता को प्राप्त, रक्त विकार से पीड़ित, नीच फर्म में परवृत्ति,
बुद्धि का अंधा (जा० भ०) 1
कुष्ठी, अल्पायु, सत्रुओं से पीडित, थोड़े द्रव्य वाळा, रोग युक्त, निर्गुणी (ल० चं०) +
थोड़ी संतान (go जा०) ।
विनीत वेब, घनवान्, मुखिया (जा० पारि०)।
शस्त्र आदि से व छूता आदि से व गरिन से मृत्यु, कुष्ट रोग से नाश, स्त्री को पीड़ा
(जा० सं०) ।
शस्त्र से, अग्नि, कुष्ठ वर्ण, स्त्रियों से रोग होकर या शस्त्रचिकित्सा से मृत्यु, अल्फ
संतान, विफल मन (प्रा० यो०) ।
४-अष्टम बुध का फल
मूत प्रतों की कृपा से सम्पूर्ण सम्पत्तियों को प्राप्त, बहु विरोध करने वाला, अभि- मानो, यत्न ऐ अन्य कमं क्रिया को करने वाला (जा० भ०) ।
दीर्घायु, अभिमानी, राजा से लाभ, लोगों से š< (खान०) 1
विश््वासघातो, कुबुद्धि, परश्त्रो से भोग, कायं से आतुर, सत्यवादी, निरोग (छ० चं०) । विख्यात गुणवान् (वृ० जा०) ।
सत्य भाषी, सुन्दर मूर्ति, शत्रु हंता, अतिथि जनों का सत्कार करने वाळा । पाप युक्तः था शु गृहो-कामदेव के वेग में अप्रतिष्ठा पाने वाला (मान०) ।
भिन्न-भिन्न आवों में ग्रहों का फल : ३३१
( s". प्रसिद्ध, दीर्घ जीवो, अपने कुटुम्ब का पोषक, अधिपति, दंडपति (जज) फल०) ।
विनोत, विशेष गुणों में प्रसिद्ध, घनी, (जा० पारि०) ।
जंघा और पेट में शूळ रोग से पीड़ा, सुख पूवंक, तीथं में मृत्यु पापग्रह युक्त हो तो
मृत्यु (जा० सं०) । प्रख्यात व गुणी, ज्वर ताप झूल होकर तोथं में मरता है (प्रा० यो०) ।
५-अष्टम में गुरु का फल
उत्तम तोर्थ में जाने वाला, योगाम्यास करने में निरत (मान०) ।
गरीब नीच सदृश अपनी जीविका प्राप्त करे, पाप युक्त हो, दीर्घ जीवी (फल०) 1
दया रहित, परदेश वासी, मुखरोगी, क्रोधी (खान०) ।
दूत कमं की वृत्ति, मलिन, अत्यन्त दीन, विवेक रहित, नम्रताहीन, आलसी, दुबँल
देह (जा० भ०) ।
सदा रोगी, कृपण, शोक संयुक्त, बहुत शत्रु, कुकर्मी, कुरूप (छ० चं०) 1
नीच कर्म (qo जा०) । बुद्धिमान्, नीचकरमं, दीर्घायु (जा० पारि०) ।
( अ का या स्वगृहो--ज्ञान से तीथं में मरण, अन्यराशि *r— से मरण
जा० सं०) ।
उचित कर्म, रोग का ज्ञान नहीं होता परन्तु सावधान होकर मरे (प्रा० यो०)।
६-अष्टम में शुक्र का फळ
निबंल, घर्म में तत्पर, राजा का सेवक, मांस का प्रेमी, विशाल नेत्र, चोथी अवस्था
पें मृत्यु (मान०) 1 दोघं जीवो, घनी, पृथ्वी का शासक (फल०)।
स्त्री घन सौख्य रहित, कटुवादी, संग्राम प्रिय, अभिमानी (खान०) ।
प्रसन्न स्वरूप, राजा से दान प्राप्त, शठ, निर्भय, अभिमानी, स्त्री और पुत्र की
चिता से युक्त (जा० भ०) ।
रोगी, युद्ध प्रिय, वृथा चलने वाला, कायंहीन, मनुष्यों में प्रिय (७० चं०) ।
नीच (qo जा०) ।
दीर्घायु, सब सोस्य युक्त, अतुल बल, घनिक (जा० पारि०)।
पिता की अनृणता और तीथं में मरण, पिता के कुछ को पवित्र करता है.
(जा० qo) । उचित कर्म करे, प्यास से व्याकुल हो, तीर्थ में मरण (प्रा० यो०) L
७-अष्टस में दानि का फल š
दुःखभागी होकर देशान्तर में रहने वाला, चोरी के अपराध में नोच के हाथ सेः
, नेत्र रोगो (मान०) 1
के अस्वस्थ, - रहित, बवासोर का रोगी, दुष्ट प्रकृति का, बुभुक्षित, मित्रों से तिर”
स्कारित (फल०) ।
दुबल देह, ददु रोग, भय ओर संताप से हीन, आलसी, फुड़ियों का रोग (जा०-
we) । अल्प संतान, नेत्र कला रहित, सूर्य के समान ww (qo जा०) ।
:३३२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
क्रोघातुर, दरिद्र, बहुत रोग युक्त, मिथ्या विवाद करने वाळा, बात रोगी
(७० चं०) । वीर क्रोधियों में अग्रसर, विख्यात बल, धनवाला (जा० पारि०) ।
बिदेश में या नीच के समीप मृत्यु, हृदय शोक, खाँसी, विशूचिका आदि वाना
“प्रकार के रोग (जा सं०) ।
थोड़ी संतति, मन विकल, भूख ळगकर परदेश में मरे, अपने कुल व माया के कुछ
का नाश करे, क्षुघा तुषा से पीडित होकर मरे या शत्र, से, विष खाकर, सर्प या अग्नि
से जल कर मरे । क्रूर ग्रह युत हो ठो चोर से मरे (प्रा० यो०) 1
८-अष्टम में राहु का फल
सदा रोगी, पाप में निरत, दुष्ट, चोर, दुर्बल, कायर, घन से सम्पन्न, मायावी
“मान०) ।
अल्प जीवन, अशुद्ध कमं करना, अंग दाषपूर्ण, बात रोग से रोगी, अल्प सन्तान
(फल०) ।
अनिष्ट, नाश को प्राप्त, लिंग और गुदा में पीडा, प्रमेह रोग, अंड वृद्धि सहित
विकलता (जा० भ०) । !
सदा मुसाफिर, घर्म होन, क्रोधी, बुरे आचरण, दरिद्री (खान०) 1
क्लेशी, अपवादी, दीर्घसूत्री, रोगी (जा० पारि०) ।
दुष्ट, चोरी की निन्दा से मरण, कष्ट यातना (जा० सं०) ।
नाना प्रकार की वेदना होकर मरे (प्रा० यो०) ।
९-अष्टम में केतु का फल,
बवासीर, भगन्दर आदि रोग, हाथी घोड़ा आदि सवारी से गिरने का भय, घन की
रुकावट । १, २, ३, ६ या ८ राशि का हो-सदा घन लाभ (मान०) |
लघु जीवन, प्रिय जनों से वियोग, कलह में रत, शास्त्र में क्षति प्राप्त, सफळ कार्यों
में विरोध (फल०) ।
गुदा में पीड़ा । ३, ४, ६ राशि का--वाहन धन लाम। १,२, ८ राशिका
अत्यन्त लाभ (जा० भ०) । राहु समान फल (खान०) ।
पर द्रव्य, पर स्त्री में रत, रोगो, दुराचारी, विशेष लोभी । यदि शुभ ग्रह देखता
हो तो घनी, दीर्घायु (जा० पारि०) ।
नोना प्रकार की वेदना होकर मरे (प्रा० यो०) ।
९-नवस भाव में ग्रहों का फल
१-नवम में सुर्यं का फल
सत्य वक्ता, सुन्दर केश, कुटुम्ब का हितैषी, देव गुर का अनुरागी, पहली अवस्था
x में रोगी, युवावस्था में स्थिरता युक्त, धनवान्, दीर्घायु, दिव्य स्वरूप (मान० ) 1
पिता का द्वेषी, सन्तान और वंधु युक्त, गौ ब्राह्मण भवत (फल०) ।
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३३३
धर्म-कर्म में तत्पर, श्रेष्ठ बुढि, पुत्र और मित्र से सुख. प्राप्त, मातृ पक्षी छोगों से"
वैर करने वाला (जा० भ०)।
कुकर्मा, भाग्य रहित, विद्या और ज्ञान हीन, कुदाल (ल० चं०) ।
पुत्र य छन का सुखी, भोगी (qo जा०) ।
प्रसिद्ध, सुखी, दुसरे के घन से शोभित, ननहार से सुख नहीं (खान०) 1 पिता, गुरु का द्वेषी, विघर्म के आश्रम में रहने वाला (जा० पारि०) ।
भाग्य और पुण्य का विनाश । उच्च या स्वक्षेत्री--पुण्य व घमे करे (जा० सं०) । तीर्थं और घर्म करता है (हिल्लाज) ।
पुत्र, द्रव्य ओर सोल्य मिळे। पापयुक्त हो तो इन सबका नाश । परमोच्च हो--
राज पद देवे, तीथंयात्रा में पुण्य करता है (प्रा० यो०) ।
स-नवमसेंचन्द्रकाफळ *
अनेक प्रकार के सुख, कामिनी स्त्रियों से प्रेम | क्षोण चंद्र या नीच का हो तो
निर्मळ धर्म मार्ग का विरोधी हो, गुण रहित, मूढ़ चित्त (मान०) ।
उन्नतिशोळ, गुणो, संतान युक्त, जयो, व्यापार में आरम्भ से हो सफलता q (फल०) । तेजस्वी, धनो, ईश्वर मक्त (खान०) ।
स्त्री पुत्र, घन युक्त, पुराण कथा प्रेमी, सत्कर्मा, श्रेष्ठ तोर्थ करने वाला (जा०म०) ।
< चाद कांति दाला, अपने घमं में सदा निरत, सज्जनों में निपुण औरः पापी हो
(७० चं०) ।
सर्वजन प्रिय, पुत्रवान्, मित्रवान् वंघु, युक्त, धन युक्त (qo जा०)।
पितु कार्य तपण श्राद्ध आदि, देव कार्य पुजन आदि में युक्त, दानो (जा० पारि०) ।
यदि पुणं चंद्र हो मध्य माग धमं और पितृपक्ष युक्त । यदि क्षीण चंद्र हो तो.
सवका नाश करता है । (जा० सं०) । २० वषं में तीथं करता है (हिल्ळाज) 1
पूर्ण चन्द्र हो--सब का प्रिय, पुत्र मित्र व द्रव्य से युक्त । क्षीण चन्द्र हो तो कमी
करता 3 (घ्रा० यो०) ।
३-नवम में मङ्गल का फल :
अति रोगी, नेत्र, हाथ ओर शरीर में पीला, बहुत मनुष्यों से परिपूर्ण, भाग्य से
होन, फटे जोणे वस्त्र पढिने, विकल जनों कैसा मेष, शीलवान्, विद्यानुरागी (मान०) 1
पुत्र व घन सुख (वृ० जा०)।
यदि राजा का भी मित्र हो तो भो दूसरे से द्वेषित, पिता रहित, दूसरों को घातकः
फल०) ।
म, राजा से घोडा गौरब प्राप्त, पण्य बोर बन नाशक (qe म०) 1
राजा का मान्य, पर स्त्री रत, भाग्यवान् (खान०) । छ
कुकर्मी, पोरुष होन, नीचो से प्रेम, कर, कष्ट युक्त (छ० चं०) । `
पिता का अनिष्ट करने वाला, विख्यात (जा०, पारि०) ।
३३४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
लाल वस्त्रों को पहनने में आनन्द, महादेव का ब्रत करे, भाग्य हीन (जा० सं०) ।
१४ वर्ष में बात भय (हिल्लाज) ।
पाप करने वाला । मकर राशि का हो तो कुशल हो, घन जमा करे (प्रा० यो०) ।
४-नवम में बुध का फल
शुभगृही--घन, स्त्री पुत्र से युक्त । पाप युक्त-कुमार्गी, घर्म का निंदक, बड़ा
उद्यमी (मान०) ।
विद्या और घन प्राप्त, सत आचरण, प्रवीण, अति वाग्मो, खेलने में दक्ष (फळ०) ।
दाता, सत्य युक्त, प्रसन्न चित्त, घमं में तत्पर, प्रसिद्ध, शुभकर्मी (खान०) ।
उपकारी, श्रेष्ठ विद्या, आदर करने वाला, नौकर, घन पुत्र से हुर्ष। संसार से दरणे
का उद्यम करने वाला (जा० भ०) ।
घमंवान, कूआँ, बाग आदि का बनवाने वाला, सत्यवक्ता, निवृत्तं और पिता का
प्यारा (७० चं०) ।
सूये तुल्य फल, पुत्र घन सुख रुक्त (बु० जा०) (प्रा० यो०) ।
घर्म का घनिक, शास्त्री, शुभ आचारवान् (जा० पारि०) ।
पापग्रह हो तो मंद भाग्य, बोद्ध मतका अनुयायी । शुभग्रह हो तो भाग्यवान्,
बर्मात्मा (जा० सं०) 1 २९ बर्ष में माता का मरण (हिल्लाज) ।
५-नवम में गुरु का फल
श्रेष्ठ राजा के समान घनी, पवित्र रहुन, कृपण, सुख भोगी, अति घनी, स्त्रियों को
प्रिय (मान०) 1 प्रसिद्ध मंत्री, धन पुत्र युक्त, सत्कार्य में उत्सुक (फल०) ।
बडा आदमी, भाग्यवान्, रूपवान्, बहुप्रिय, सुकीवि, ईश्वर भक्त, (मान०) ।
राजा का मन्त्री, श्रेष्ठ कर्म, शास्त्रों के विचार में मन, ब्रत करने वाला, ब्राह्मणों
की सेवा करने में तत्पर (जा० भ०) !
घर्म करने वाला, साधुओं का संग, शास्त्र, चेष्टा रहित, तीथं सेवक, ब्रह्म का
जानने वाला (ल० च०) 1
तपस्वी (qo जा०) । ज्ञानी, धर्म में तत्पर, राजा का मन्त्रो (जा० पारि०) ।
अनेक तीथ कर्ता, सुन्दर शरीर, सुखी, गुणी, देवयज्ञ कर्ता, परमार्थी, अधिक कीति
कुल बढ़ाने वाला (जा० सं०) ।
भाग्यवान, तीर्थ यात्रा करे, माँ बाप का सेवक, व्रत, यज्ञ, याग, प्रेमी, धम कार्य
प्रिय) भाग्य बढ़े, अंत में साघु व तपस्वी हो (प्रा० यो०) ।
-नवम में शुक्र का फल
उत्तम तीथं में स्थान करने वाला, सुन्दर शरीर, सुख भोगी, देव ब्राह्मण भक्त,
पबित्र, स्वउपाजित घन से आनन्द (मान०) ।
स्त्रीयुक्त, मित्र सन्तान युक्त, राज कृपा से उन्नति शील (फल०) ।
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३३५
अच्छा काम करने वाला, रूपवान्, प्रसन्न चित्त (खान०) । अतिथि गुरु देव का पूजक, तीर्थ यात्रा में घन खर्च, प्रतिदिन घन ओर वाहन से हर्ष, मुनि के समान भेष, क्रोष होन (जा० wo) ।
घ्म पूणं, ज्ञानी, gar, घनो, राजाओं से पूजित, नम्र, जन प्रिय (go च०) À तपसी (वृ० जा०) । विद्या, घन, स्त्री पुत्र से युक्त (जा० पारि०) । भाग्य, विधि ओर धन प्रिय, गुणी, ब्राह्मण भक्त, अपने बल से एकत्र किए भाग्य ओर बड़े उत्साह वाला (जा० सं०) ।
१५वें वषं लक्ष्मी को पाता है (हिल्लाज) ।
७-नवम में शनि का फल
घर्म में पाखण्ड, घम तथा अथ से हीन, पिता के साथ कपट, मद से युक्त, घन रहित, रोगो, पापी स्त्रो में तत्पर, होन वीयं (मान०)।
भाग्य घन सन्तान, पिता और घर्म रहित (फल०) ।
“धर्म कमं युक्त विकल देह, दुष्ट बुद्धि, अत्यन्त सुन्दर, (जा० भ०)।
घमं हीन, विवेकी, शत्रुओं के वञ्च, झुठा, पराई स्त्री में रत (go च०) à
q, घन, सुख वाला । सूर्य सरीखा फल (वृ० जा०) (प्रा० यो०) ।
अपने जमाने में बड़ा आदमी , श्रीमान्, मिष्ठ भाषी, सुखी, दयालु (खान०) ।
रण में विख्यात, बिना स्त्री वाला, घनो, (जा० पारि०) ।
कपट प्रघान, अच्छा कार्य करने . वाळा, मित्र देव को ठगने वाला, क्षण भाग्य,
शुभ घर्म युवत (जा० qo) |
८-नवम में राहु का फल
. चण्डाल के समान कमं, चुगल खोर, जीर्ण फरे कपड़े पहिने, ज्ञाति जनों की प्रशंसा
करने वाळा, बड़ा दीन, शत्रु से सदा भयभीत (मान०) ।
प्रतिकूल भाषणं, अपने वंश का मुखिया, गाँव या शहर का मुखिया, अघमं कार्य
करे (जा० भ०) । घनी, सुखी (खान) । घार्मिक जनों का बैरी, यशस्वी (are पारि०) 1
पथिक घर्म का अनुरागी, सत्य ब शोच से हीन, भाग्य हीन, मंद बुद्धि (जा० सं०) 1
९-नवम में केतु का फल
क्लेश का नाश, पुत्रों का इच्छुक, स्लेच्छ से भाग्य वृद्धि, म्लेच्छों से पीड़ा भी हो,
वाँहों:में रोग, तप ओर दान से हास्य वृद्धि को प्राप्त (जा० we)
दुःखों से होन हो, पुत्र का इच्छुक, नीच जाति द्वारा भाग्य वृद्धि, सगे भाई बहुन
के न होने से कष्ट, बाँह में रोग, इन कुचेष्टाओं को सुधारने के निमित्त दान नियम
“करने से उपहास को प्राप्त (मान०) 1
पाप कर्मी, पितृ हीन, अमागा, दरिद्री, धमं कार्य में दूषण (फछ०) ।
राहु के सदृश फल (खान०) ।
३३६ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
झोषो, वाचाल, अघर्मी, पर निद, वीर, पिता का वैरी, विशेष उम्भी, आलस्थ
में छीन, अभिमानी (जा० पारि०) 1
बालपने में पिता को कष्ट, भाग्यहीन, घमं भ्रष्ट तथा म्लेच्छ से भाग्य वृद्धि
(जा० सं०) ।
१०-इशम भाव सें ग्रहों का फल
१-दशम में सूर्यं का फल
गुण युक्त, सुखी, अभिमानी, कोमळ चीजों में रुचि रखने वाला, नृत्य गीत में प्रेम,
अत्यन्त पूज्य, राजा होता है । इसके अतिरिक्त काल में रोग भोगने वाला होता है (मान०) ।
पुत्र, बाहन, स्तुति, ज्ञान, घन, बल, कोति प्राप्त, राजा हो (फल०) ।
घनाढ्य नामवर । नोच का सूर्य हो तो पिता से सुख न मिले (खान०) ।
श्रेष्ठ बुद्धि, श्रेष्ठ वाहन, निश्चय घन युक्त, राज कृपा, पुत्र और सोख्य युक्त,
साधु का उपकार कर्ता, मणियुक्त आमूषण वाला (जा० wo) ।
बन्धुहीन, कुकर्मी, शील रहित, चंचल स्त्री वाला, तेजहीन और खजाना रहित हो
(ल० चं०) । सुखी और घनवान् (qo जा०) ।
पिता का घन और झोल प्राप्त, विद्या, यश युक्त, राजा के समान (जा० पारि०) ।
१९ वर्ष में वियोग करता ë (हिल्लाज) ।
शूर वीर, वाहन, बुद्धि बल घन पुत्र इनसे युक्त, असह्य, प्रगल्म और कार्य का
सिद्ध करने वाला, पिता से घन प्राप्त (जा० सं०) ।
२-दशम में चंद्र का फल
धन सम्पन्न, पुत्र, स्त्री युक्त । शत्रु क्षेत्री या पाप गृही हो--छास रोग, दुव॑ंलांग,
घनो, माता तथा कर्म से हीन (मान०) ।
सत कमं करे, सत गुणी, लोगों का प्रिय (फल) ।
पिता तथा कुटुम्ब का सेवक, घनी, विद्वान्, द्यांत प्रकृति (खान०) ।
राजा से धन प्राप्त करे, यशस्वी, सुंदर रूप, ओर बल, संतोषी, बडी लक्ष्मी गोर शीळवती स्त्रो वाळा (जा० wo) ।
बहुत भाग्य युक्त, बड़ा धनी, मनस्वी, मनोहर, राजाओं में पूज्य (ल० चं०) । समस्त कायं की इतकायंता पावे, धमं, घन, बुद्धि, बल इनसे युक्त (qo जा०) 1
घन धान्य, वस्त्र, मूषण से युक्त, स्त्रियों का विलासी, कळा जानने वाला
(जा० पारि०) 1 ४३ वर्ष में घन देता है (हिल्लाज) ।
„ सुघमं स्थित और दास भाव करता है। सिद्धि आरंभ वाला, पवित्र और कर्म में तत्पर, शूर वीर, घनाढय, धर्मवान्, विवाद कर्ता, माता से घन प्राप्त (जा० सं०)। ३-दशम में मंगल का फल
इंद्रियों का दमन कर्ता, खजाने से रहित, अपने कुळ की जय करने वाला, स्त्री
u . ~
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३३७
चित्तचोर, उदर के समान शरीर वाळा, भूमि का काम करने वाला, बड़ा क्रोघो, ब्राह्मण गुरुजनों का भक्त, मध्यम कद (मान०) 1 कूर राजा, दाता, प्रधान जनद्वारा स्तुति प्राप्त (फल०) ।
घनी गुणी, शिफायत सार, संसार में मान्य, साहसी, दयावान्, सब पदार्थं घर में हों, दानी (खान०) ।
राजा के समान अत्यंत आनन्द प्राप्त, श्रेष्ठ साहस करने वाला, परोपकारी, सुंदर आमूषण मणि, अच्छे बुरे प्रकार से लाभ करता है (जा० qo) । शुभ कमं कर्ता, शुभ युक्त, अच्छे पुत्र, सुखी, वीर, अभिमानी (ल० चं०) । सुख व बल रहित (qo जा०) । प्रबल प्रताप, घन से प्रसिद्ध (जा० पारि०) । २७ वषं में शस्त्र से भय (हिल्लाज) ।
सेना बल से युक्त, प्रधान सेवक, शूरवीर, बडा प्रतापी, पुत्रवान्, कर्म में उद्योगी, पराजित न होने वाळा, शत्रु से द्रव्य प्राप्ति (जा० सं०)। ४ दशम में बुध का फल
सुर्य सरीखा फल, सुख और बल युक्त (qo जा०) ।
समस्त विद्या ज्ञाता, यशस्वी, धनी, बिनोदी (जा० पारि०) ।
गुरुजनो के साथ हित करने वाला, अपने कमाये घन से घोड़ा खरीदे । घनों से
सावधान, थोड़ा बोले (मान०) 1 :
कोई कार्य करे उसमें सफलता हो, अच्छी विद्या बल बुद्धि और सुख प्राप्त, सत्कर्मी,
सत्य युक्त (फल०) ।
धमी, बड़ा मालसी, मिष्ट भाषी, दयावान् (खान०) ।
ज्ञान में चतुर, श्रेष्ठ कर्म करने वाला, अनेक सम्पत्ति युक्त, राजमान्य, सुन्दर लीलाओं के सहित, वाणी के विलास में श्रेष्ठ (जा० भ०)। |
घन घान्य से युक्त, बहुत भाग्यवान्, नम्रता युक्त, कांति युक्त (ल० चं०) ।
१९ वषं में घन देता है (हिल्लाज) ।
वाक्य समूहों की रचनाओं से युक्त, बुद्धिमान्, धीर, घम में चेष्टा, मालिक के गुण,
अनेक आभरणों से युक्त, मित्र से घन प्राप्ति (जा० go) । ५-दशम में गुरु का फल
अश्व रत्नों से विभूषित घर, नीति गुणों में बुद्धिमान्, सञ्जनों की संगति, दूसरे की
भूमि और स्त्री से रहित, बड़ा धर्मात्मा (मान०) ।
आचरण का सत्य मागं ग्रहण करे, अपने गुणों से प्रसिद्ध, बहुत घनी, राजा का मित्र (फल०) 1
पालकी, जवाहरात, हाथी, घोड़ा युक्त, श्रेष्ठ (खान०) ।
श्रेष्ठ राजा के चिह्नं छत्र चामर आदि और उत्तम वाहनों से युक्त, मित्र, पुत्र,
लक्ष्मी ओर स्त्री के सुख से युक्त, बहुघा यन को वृद्धि (जा० म०) ।
पुण्य, यश, सुख युक्त, राजाओं के बरावर स्वरूप वाला, दयावान् (छ० चं०)।
२२
३३८ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड
घनवान् (qo जा०) 1 सिद्ध साधु चरित्र, स्वधर्मी, विद्वान्, घनो (smo पारि०) ।
१२ वर्ष में घन प्राप्ति (हिल्लाज) ।
शुभ कमे व घन युक्त, कीति, वाहन, सौख्य, घन, गुण, सत्य इनसे युक्त, सिद्ध
किये कमं वाला, चतुर, भ्राता से घन प्राप्ति (जा० सं०) ।
६-दशम शुक्र का फल
भाई बहरा, स्वयं भोगों को भोगने वाला, बन में भी राज्य फल पाने वाला, युद्ध के
योग्य, पुष्ट, सुन्दर शरीर (मान०) ।
अति प्रसिद्ध, मित्रयुक्त, सुख वृत्ति युक्त, स्वामी (फल०) 1
घृष्ट, घनो, पितृ गुरु भक्ठ, विद्वान्, मंत्री, वडा आदमी (खान०)।
सौभाग्य ओर सन्मान युक्त, स्नान, पुजन, घ्यान में मन, घनवान्, स्त्री पुत्रों में
नित्य प्रेम (जा० भ०) ।
कर्मवान्, निधि और रत्नों से युक्त, राजा को सेवा करने वाला, धर्मवान् ओर स्त्रो
का प्यारा (७० <o) । घनवानु (qo जा०) ।
खेती आदि कर्म से, स्त्री से, घन प्राप्त हो, विमु हो (जा० पारि०) ।
१२ वर्ष में सौख्य देता है (हिल्लाज) ।
आज्ञा में कुटिल या स्त्री-घन से युक्त, स्त्री से घन प्राप्ति, वादविवाद में एकत्र किया
मान अर्थ और प्रीति वाला, कीति युक्त, बुद्धिमान्, घनो, विख्यात (जा० सं०) à
७-ददाम में शनि का फल
बड़ा धनी, भूतको का अनुरागी, परदेश में जाकर राजा के घर में वास, अभिमानी,
छत्रु से भय नहीं पाता (मान०) ।
राजा का मन्त्री, नीति युक्त, बुद्धिमान्, नम्न, श्रेष्ठ ग्राम और नगर के भेद करने
का अधिकारी, चतुर, घन युक्त (जा० qo) 1
कुकर्मी, धन वर्जित, दया सत्य और गुणों से होन, चञ्चल (ल० चं०) ।
सूयंवत् फल, सुखी, बलवान् (qo जा०) । राजा या मन्त्री, सुकृती (खान०) ।
दंड कर्ता, मानो, धनो, निज कुल में वोर (जा० पारि०) .
राजा या मन्त्री हो, कृषि कार्यकर्ता, शुर, प्रसिद्ध (फल०) ।
अनाथ और दुःख युक्त, पुर, ग्राम इनका स्वामी या दंडपति, पंडित, शूरवीर,
घन युक्त, मन्त्रो, चाकर से घन प्राप्त, नीच या दात्रुक्षेत्री--पेवा से इकट्ठा किया घन
बाला, क्रूर, कृपण, पक्षियों को मारने वाला, जंघा में रोग ।
८-दशम में राहु का फल
काम में आतुर, परघन का इच्छुक, सब कामों में अग्रणी, अति हीन,
वैराग्य युक्त, सुख रहित, खेलने में मन, बड़ा चपल, दुष्ट (मान०) ।
प्रसिद्ध, अल्प सन्तान, दुसरे के व्यापार में स्वतः दत्त रहे, कोई सत्कार्य न करे, भय
रहित हो (फल०) 1
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३३९
पिता के सुख को नहीं प्राप्त, स्वतः दुष्ट भाग्य वाळा, वैरियो का नाशक, वाहनों
को रोग, दाता, वात पोड़ा युक्त, वृष या मोन का--सोख्य और कष्ट का भागी (जा० भ०) । ;
बलवान्, शत्रु नाशी, कलह प्रिय (खान०) ।
चोरी में निपुण, बुद्धिमान् और उद्धत हो (जा० पारि०) 1
वृंद पुर ग्राम इनका मीत, दंडनायक और पंडित, शूर मंत्री और घनी (जा० सं०) । ९-दशम में केतु का फल
अच्छे कार्य में विघ्न, अपवित्र, बुरे कार्य, तेजस्वी, शुर, प्रसिद्ध (फल०) ।
पिता द्वारा सुख न मिले, स्वयं कुरूप, अनेक कष्टो का पात्र, सवारी के कारण
दुःख । मेष, वृष, कन्या ओर वृद्चिक में--दात्रुनाश (मान०) ।
पिता का सौख्य नहीं, दुष्ट भाग्य, शत्रुनाशक, रोगयुक्त, वाहनों की पीडा, वावरोन ।
कन्या फा--सुख ओर दुःख दोनों का भागो (जा० wo) ।
राहु के समान फल (खान०) ।
विद्वात्, वला, शिल्पविद्, आत्मज्ञानो, जनानुरागो, विरोध वृद्धि, कलात्मक, वौरो
में श्रेष्ठ, सदा घुभने वाला (जा० पारि०)। .
गुदा में रोग, कफ प्रकृति, म्लेच्छों के समान कर्म, परस्त्रो गामी (जा० सं०) ।
११-लाभ भाव सें ग्रहो का फल
१-लाभ में सूयं का फल :
अत्यन्त घन का भोगी, राजगृह की सेवा करने वाला, भोगों के भोगने से होन,
गुण का ज्ञाता, दुर्बळ अंग, धन से सम्पन्न, कामिनी चित्तहारी, “चंचळ मूर्ति, जाति
अन्धुओं को आनन्द दायक्र (मान०) 1
उन्नति से ही घनी हो, दीर्घजीवी, दुःख रहित, राजा हो (फल०) ।
घनबान्, सुन्दर स्त्री, गायन विद्या में चतुर, सर्दार (खान०) ।
गाने में प्रीति, श्रेष्ठ कर्म में प्रवृत्ति, बडा यद्य, -सदा घन से पूर्ण, राजा से नित्य
'बन लाम करे (जा० भ०) ।
अनेक लाभयुक्त, सात्विक, धमंवान्, ज्ञानी, ख्यवान् (ल० चं०)।
घनवान् (qo जा०) । ;
विपुल घन स्त्री पुत्र और दास से युक्त (जा० पारि०)।
घन घान्य सुवर्ण आदि से युक्त, रूपवान्, कलायुक्त, ज्ञानी, विनीत, गीत में चतुर ।
सुर्य बलवान् अपने षड्वगं में--राजा चोर और पशुओं से घन प्राप्त (जा० सं०) ।
सूर्य योग्यता प्रमाण से गोचर में या अपनी दशा में पदवी, अधिकार, उन्नति, हाथी
घोडे वस्त्र रत्न, मिष्ठान्न, गाय भैस, टांगा आदि वाहन देता है (प्रा० यो०) ।
२-लाभ में चंद्र का फल i
बहुत घन का भोगी, सुखयुक्त, पत्नी तथा मृत्ययुक्त (मान०) 1
३४० : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
उच्च विचार का, दीघं जीवी, घन संतान सेवक युक्त (फल०) ।
घनवान्, रूपवान, दाता, बुद्धिमान् मिष्टमाषी (खान०) ।
झनेक संतान और घन वाहन प्राप्त (जा० भ०) ।
लाभयुक्त, प्रगल्भ, सुभग, सुमागंगामी, लज्जा युवत, प्रतापी और आग्यगान्
(७० चं०) । सर्वत्र विख्यात, नित्य लाभयुक्त (q o जा०) 1
संतुष्ट, विषादी, घनी, (जा० पारि०) ।
विख्यात, गुणवान्, पंडित, भोग लक्ष्मी युक्त, गौर वर्ण, स्नेहकर्ता, स्त्री का परमसुख, पुत्रो सुख । बलीचंद्र--कूप यज्ञादि करने वाला (जा० सं०) । ;
उत्तम स्त्री, नाना प्रकार के मोती रत्न, गाँव, खेत, बगीचा आदि का लाभ, राजा
से या बेचने खरोदने से, या समुद्र तालाब आदि के सम्बन्ध से व्यापार में लास
(प्रा० यो०) ।
३-लाभ में मंगल का फल
देवताओं का हितेच्छुक, राजा के समान, स्त्रोवाला, पीड़ित, mil । उच्च का”
सौभाग्ययुक्त, घनवान्, तेजयुक्त, पुण्य कर्मी, घन का लोमी (मान०) 1
घन और सुखयुक्त, शूर, दुःख रहित, अच्छे भाचरण वाला (फल०) ।
घनवान्, दयालु, विशेष कामी, पंडित, सत्यमाषी (खान०) ।
तांबा, मूँगा, सुवणं ; ; श्रेष्ठ, Dn ` mem weve
बड़े राम युक्त, अनेक प्रकार के पकत्रान्नों को खाने वाला; निरोगी, राजाओं में
पुज्य, देव ब्राह्मण में प्रेम (ल० चं०) । घनवान् (qo जा०) ।
चतुर वचन बोलने वाळा, कामो, घनी, पराक्रमी (जा० पारि०) ।
नाना प्रकार के यन्त्र कला घातु वस्त्र सोना चाँदी से लाभ व राजा से द्रव्य,
अधिकार उन्नति आदि का लाभ हो (प्रा० यो०)।
हाथी घोड़ों की पंक्ति होवे, धनवान्, मानयुक्त, सत्यमाषी, दृढ्व्रती, घोड़ों से
युक्त, गीत गाने में प्रवीण, प्रियभाषी, शूरवीर, धनधान्य मानयुक्त, धन अग्नि या चोरों
से नष्ट (जा० go) । ;
४-लाभ में बुध का फल
शास्त्र में बुद्धि, स्वकुल हितेषो, कृश, घनो, स्त्रियों का प्यारा, मनोहर, श्याम मुर्ति,
हुम नेत्र (मात०) । दोर्घायु, सत्ययुक्त, बहुत घनी, सुखो, नौकरों सहित (फल०) ।
घनी, पुत्र सुख युक्त, समझदार, सरदार, स्वच्छहूदय (खान०) ।
सूर्यवत् फल (घनवान्) (qo जा०)। ` मोगो में आसक्त, अति धनवान्, नञ्ज, सदा आनन्द को प्राप्त, श्रेष्ठ शील, बलवान्
#नेक विद्याओं का अम्यासी (जा० भ०) ।
सदा लाम, रोगहीन, सदा सुखी , मनुष्यों का प्रेमी, वृत्ति ओ र यशयुक्त (७० so) ।
निपुण बुद्धि, विद्या, यक्ष वाला, घनी (जा० पारि०) ।
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३४१
अक्षर लिखना, छापाखाना, कोष्टी, बढई आदि का काम, बनिया की दूकान, साहु- कार किवा राजा इनसे घन मिले, बड़ा सल्यत्व हो (प्रा० यो०) ।
शैया मुख हो, इच्छित विद्या सुख, स्त्री का प्यारा, अति गुणी, बुद्धिमान मित्रो का
प्रिय, मंदाग्नि वाला, बली बुध हो तो कूप यज्ञादि का सिद्धि करने वाला (जा० सं०) ।
५-लाभ में गुरु का फल
राजा के समान धनी, अपने कुळ को किसी प्रकार दाग लगाने वाला, सब धर्मों में
निरत, घनवान् (मान०) 1
घनी, भय रहित, अल्प सन्तान, दीर्घ जोवी, वाहन में चछने वाला (फळ०) ।
सन्तोषी, सृशरीर; धनी, विद्वान्, पराक्रमी, चतुर (खान०) ।
सामथ्यं युक्त, निश्चय घन लाभ हो, श्रेष्ठ . वस्त्र, उत्तम रत्न और वाहन प्राप्त,
राज कृपा युक्त (जा० भ०) ।
विवेकी, हाथी ओर घोड़ा आदि वाइन और घनयुक्ठ, चंचल, सुखरूप, गुणवान्,
(छ० चं०) । लाभवान् (qo जा०) ।
प्रबल बुद्धि, विख्यात नाम, धनी (जा० पारि) ।
राज आशय उत्तम लोगों की सङ्गति, नित्य मिष्ठान्न, नाना प्रकार का वस्त्र,
घान्य पदाथ, खेती, गांव घर आदि प्राप्त (प्रा० यो०) ।
पुत्र सुख, स्त्री सुख, रोगहीन, पराकमी, qg, मंत्रवेत्ता, शास्त्र का ज्ञाता, अल्पबिद्या, अल्प सन्तान (जा० सं०)।
६-लाभ में शुक्र का फल
गुणी, अग्नि होत्री, काम देव के समान दिव्य रूप, सुख का पात्र, हास्य में प्रीति, देखने में सुन्दर (मान०) 1
घनो, दूसरी औरतों के साथ रहने का प्रेमी, अनेक सुख (फल०) ।
घनी, तेजस्वी, शहीद, शीलवान् (खान५) 1
श्रेष्ठ, गीत भोर हास्य में प्रीति, नित्य यात्रा की चिता करने वाला, श्रेष्ठ कसं
और धर्म में चित्त (जा० भ०) ।
सदा लाभ, यशी, गुणी, घनी, भोगी, क्रिया में शुद्ध, मनुष्यों में उत्तम (ल० चं०) ।
लाभवान् (go जा०) 1
सुखी, पर स्त्रो रत, घूमने वाळा, धनो (जा० पारि०)।
वेश्या, रानी या नाना प्रकार को त्त्रियो से अनेक लाम, राजा से लाभ, विद्या व
फायदा इनकी परीक्षा पास हो (प्रा० यो०) ।
पुत्र सुख, पालको (वाहन) सुख, स्त्री रूप रत्न से युक्त, श्रेष्ठ रत्नों से युक्त,
स्वस्थ चित्त, शोक हीन, बहुत घन और सेवक (जा० सं०) ।
७-लाभ में शनि का फल
चनवान्, विचारवान्, भोगी, शोत प्रकृति, सदा प्रसन्न, बड़ा सुशील, बाळपन में
रोगी (मान०) ।
- <
३४२ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
दीर्घजीवी, अंत तक घनी, अच्छी आय, शूर, रोगहीन, घनो (फल०) ।
काले घोड़े और इन्द्रनील मणि, पुणं वस्त्र, बड़े हाथी इनका लाम (जा० भ०) t
सूयं समान फल (घनवान्) (qo जा०) ।
सर्व विद्याओं में निपुण, ऊंट, गौ और भेस से पूर्ण राजाओं में पूज्य और पवित्र
(छ० चं०)। दयावान्, नेक, भिष्ट भाषी, घनी, सन्तोषी, शत्रु नाशक (खान०) ।
भोगी, राजा से प्राप्त विपुल घनवान् हो (जा० पारि०) ।
चोरों से रिक्वत ले, खोटे काम से, झूठ बोलने से, वकीली करने से, बहुत घन य
पदार्थ मिले (प्रा० यो०) ।
हाथी घोड़े होवें, स्थिर सम्पदा, पृथ्वी से लाभ, शूरवीर, कारीगरी से युक्त, सुख
युक्त, बिना लाभ वाला, मुख्य जीविका वाला व सन्तान हीन, शरीर में कष्ट तथा णिला
प्रहार (जा० सं०) ।
<-लाभ में राहु का फल
इन्द्रियजित्, श्याम रंग, देखने में सुन्दर, थोड़ा बोलने वाळा, परदेश वासी, शास्त्रों का ज्ञाता, बड़ा चपल, बड़ा निलंज्ज (मान०) 1
उन्नतिशीळ, बहुत सन्तान, दीर्घायु, कमं रोगी (फल०) 1
सब प्रकार के घन का लाभ, अधिक सौख्य, राजाओं से अनेक मान, वस्त्रोदक सुवणं,
चोपार्यो के सोस्य का भागी, सौख्य, विजय और मनोरथ : प्राप्त । ऋणो, बेकार, कलह
प्रिय (खान०) । कणं रहित, रणोत्सुक, धनी, पंडित (जा० पारि०) ।
हाथी घोड़े होवें, म्लेच्छ और पतित आदि जनों से लाभ, नहीं स्थिर रहने बाला
पुत्र हो, यदि पुत्र हो तो जातक के वृद्ध होने तक जीवित रहे, शरीर में कष्ट तथा णिला प्रहार (जा० स०) ।
९-लाभ में केतु का फल
श्रेष्ठ वाणी, श्रेष्ठ विद्या, दर्शनीय स्वरूप, श्रेष्ठ भोगों से युवत, श्रेष्ठ तेज, सुन्दर
वस्त्रा सहित, गुदा में रोग, दुष्ट पुत्र (जा० भ०) ।
भाग्यशाली, अधिक विद्याओं का जानने वाला, दशनीय सुन्दर शरीर, शाल दुशाले
झादि सुन्दर वस्त्रों से परिपूर्ण, बडा प्रतापी, स्वयं डर से व्याकुल, सन्तान भाग्यहीन, सब वस्तुओं का लाभ (मान०) ।
घन संग्रह करे, कई सद्गुण प्राप्त करे, सुभोगी, अच्छे पदार्थ प्राप्त करने के लिये
सब सुविधाएँ प्राप्त (खान०) । राहु के समान फल (खान०) ।
प्रतापी, परप्रिय, अन्यजन से वंदित, सन्तुष्ट चित्त, समर्थ, अल्प भोगी, शुभ क्रिया
तया आचारवान् (जा० परि०) ।
१२-व्यय भाव में ग्रहों का फल १-व्यय में सुयं का फल १
मुखं, अति कामी, परस्त्री विलासी, पक्षियों को मारने वाला, दुष्ट चित्त, कुख्प,
SO TI णिणा >>: +
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३४२
राजा से प्राप्त घन, कथा वाचकों का विरोधी, कंधे में रोग, अति दुबंल अंग (मा०) ।
पिता का द्वेषी, नेत्र रोगी, पुत्र भौर घन रहित (फल०) ।
वाम नेत्र पीडा, बड़ा खर्चीछा, रोगी, शरारती (खान०) ।
नेत्र के तेज से रहित, पिता से वेर, सबसे विरुद्ध (जा० भ०) ।
रोगी, सत्त्व हीन, वृथा चलने वाळा, असत्य काम में खचं करमे वाला, पुत्र स्त्री
गौर भक्ति हीन (ल० चं०) 1 अपने कर्म से भ्रष्ट (qo जा०) 1
पुत्रवान्, व्यंग, सुन्दर, धीर, पतित, और घूमने वाला (जा० पारि० )!
खर्चीला, परस्त्री गामी, व्यसनी, बहुत खर्चीला, राजा से उसका घन हरण
(जा० सं०) ।
२-व्यय में चन्द्र का फल र
दुबेलांग, निरन्तर कफ रोग, क्रोधी, घन रहित 1 स्वक्षेत्री या गुरु क्षेत्री--इन्द्रियों
का दमन कर्ता, बडे दाँत वाला, त्यागी, दुर्बलांग, सुख भोगी, नोच का संग (मान०) ।
दोषी, दुःखी, अपमानित, अति अकमंशील (फल०) । ०)
नेत्र विकार, विरोधी, दुष्ट स्वभाव, दुष्क्रीति; अधिक खर्च (खान०) ।
श्रेष्ठ शील और मित्र रहित, आँखों में विफलता, क्रोधी, शत्रु वृद्धि (जा० पारि०)॥
पाप बुद्धि, बहु भक्षी, हरने वाला, कुल.में अवम, मद्य पोने वाला, विकारी (ल०
चं०) । क्षुद्र ओर अंग हीन (qo जा०) 1
विदेश वासी (जा० पारि०) ।
कृपणता और पद-पद में अविएवास, कृष्ण पक्ष में जन्म हो तो कृपणता -बढ्ती है 1
क्षीण चन्द्र हो--राजा उसका घन हरे । पूर्ण चन्द्र हो शुम दृष्ट हो- घन को वृद्धि
(जा० सं०) ।
३-व्यय में मंगल का फल
पर घन लेने का इच्छुक, चंचल नेत्र, चपल बुद्धि, विहार करने वाला, हास्य करने
वाला, बड़ा प्रचण्ड, सुखी, परस्त्री गामी, गवाही देने वाला, कर्मों से परिपूर्ण (मान०) ।
दोष युक्त नेत्र, क्रूर, स्त्री रहित, चुगल खोर, अघम (फल०) ।
कठोर व कटु यचन भाषी, जालिम, क्रोघी, सदा परेशान (खान०) ।
मित्रों से वर करने वाला, नेन्न रोगी, क्रोधो, शरीर में विफलता, घन का नाशक,
बन्धन का भागी, थोड़ा तेज वाळा (जा० wo) ।
असत् में खर्च करने वाला, नास्तिक, निष्ठुर, मूखं, बहुत वाद वाला, परदेश #
सदा ही जाने वाला (छ० चं०) 1 पतित (qo जा०) 1
विरोधी, घन स्त्री से हीन (जा० पारि०)।
क्रोषी, कामी, अङ्ग हीन, घमं में दूषण कर्ता, प्रिय बन्धुजनो से वैर (जा० सं०) 1
वाम कर्ण में रोग, वाम नेत्र में रोग, स्त्री को अधिक गंगता, कमर में घाव, कषत्रिय |
बगं से घन का खर्च, खोटे कर्म में wq आदि का भय (are सं०) । इन
३४४ : ज्योतिष-शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड
४ व्यय में बुध का फल
विकर शरीर (लूला लंगडा), दरिद्री, दूसरे के धन ओर स्त्री में बहुत मन, व्यसनों से अलग, सदा उपकारी (मान०) ।
दुःखो, विद्या रहित, अपमानित, क्रूर, अकर्मी (फल०) ।
अशुद्ध गुणवान्, नुकसान वाली बातें करे, किसी को बातों को न सहे; दया हीन, दुःखी, बेहूदा, घूमने वाला (खान०) ।
दयाहीन, स्वजन रहित, अपने काम में चतुर, अपने पक्ष को जीतने वाळा, निरंतर
घूर्त, मलिन (जा० भ०) ।
खर्चे करने वाला, रोगी, भाई से युक्त, पाप में रत, पराधीन, शत्रु का पक्ष करने
बाला (छ चं०) । सूर्यवत्, फल, पतित (बृ० जा०) ।
बन्धुओं से वर, घनी, बुद्धि रहित (जा० पारि०) ।
राज पीड़ा से संतप्त, निद्रा से मुक्त, m< (जा० सं०)
५-व्यय में गुरु का फल
बाल्यावस्था में हृदय रोग, उचित दान करने में बहिमुंख, कुल और घन ते युक्त ।
पापस्थानी हो तो--बड़ा दंभी, पाखण्डी (मान०) ।
दुसरे से घुणा करे, दुमुंखो, सन्तान हीन, पाप युक्त, आलसी, नीच (फळ० )! दरिद्री, कम बोलने वाला, मूर्ख, निर्लज्ज, बुरे वचन बोलने वाला, आलसी, बुरे कर्मों में खर्च (खान०) ।
अनेक प्रकार के चित्त के उद्योगों से क्रोध सहित, पापी, आलसी, लज्जाहीन, बुढि” हीन, मान रहित (जा० भ०) | 2 रोगी, परिश्रमी, पराये कर्म को करने वाला, बंधु बैरी, नोचों की सेवा, गुरु वैर (8० चं०) । दुर्जन (qe जा०) । चार्वाक मत, चञ्चल, घूमने वाला, खळ बुद्धि (जा० पारि”) 1 ऊँचा खर्चे करने वाला, सेवा करने में पण्डित, बड़ा क्रोधी, आरधी, लोक में विग्रह करने वाला (जा० सं०) ।
६- व्यय में शुक्र का फल
प्रथम रोग से मुक्त, पीछे कपट में तत्पर चित्त, हीन बल, सदा मलीन (मान०) । योगी, घनी और द्युतियुक्त (फल०) । बड़ा खर्चीला, वदकार, दुष्ट बुद्धि, क्रोधी (खान०) । श्रेष्ठ क्रमं के मार्ग को त्यागने वाळा, कामदेव में चित्त, दया और सत्य रहित (जा० qo) व्यय से युक्त, मित्र और गुरु का विरोघो, भाइयों में झूठ बोलने वाला, गुण होन (छ० चं०) । दुर्जन (qo जा०) । बंधु नाशक, व्यभिचार बुद्धि, दरिद्र (जा० पारि०) । अढाहीन, दयाहीन, रोगा, स्थूल देह (जा० सं०) 1
भिन्न-भिन्न भावों में ग्रहों का फल : ३४५
७-व्यय में शनि का फल
पंचायत का प्रधान, रोगी, हीनांग, अति दुःखी, जांघ में घाव, बड़ा क्रूर बुद्धि दुबंल अंग, पक्षियों को नित्य मारने बाला (मान०) ।
निर्लज्ज) दरिद्र, सन्तानहीन, अंग में दोष, मूख, शत्रुओं द्वारा भगाया हुआ (फल०) । दयाहीन, घनहीन, खच से दुःखी, सदा आलसो, नीच का संग, अंग-मंग से सौख्य (जा० भ०) ।
असत् म खर्च, कृतघ्न, द्रव्यहीन, भाइयों से वेर, कुवेष, चंचल (go चं०) सूरय
समान फल, पतित (go जा०) ।
तंगदस्त, बुरे आचरण, निर्घन, आलसी (खान०) ।
विकल बुद्धि, मूख, घनवान्, ठग (जा० पारि०)।
नीच कमं में मन, पापी, अंगहीन, भोग विलास की लालसा, दुष्टों से प्रीति
(जा० सं०) ।
<-व्यय में राहु का फल
धर्म अर्थ से रहित, अनेक दुःखों को भोगने वाला, स्त्रो होन, परदेशवासी, सुखहीन,
सुरे नख, बुरे वेष में रहना (मान०) 1
गुप्त पाप करने वाला, अधिक खर्च, पानी के रोग से पीड़ित (फल०) ।
नेत्रों का रोगी, पैरों में घाव, प्रपंच करने वाला, प्रीतियुक्त, दुष्ट जनों से प्रीति,
'अध्यम पुरुष की सेवा करता है (जा० भ०) ।
कलह प्रिय, बेकार, कर्जीला, गरीब, दुःखो (खान०) ।
शील रहित, सम्पत्तिवान्, विकल देह, साधु, पूर्व स्थित घन का नाशक (जा०
“पारि०) । नीच कर्म, अनर्थ में खच, पाप बुद्धि, कपट युक्त, कुछ का दोष देने वाला
(जा० सं०) ।
९-व्यय में केतु का फल
गुप्त रूप से पाप करे, बुरी वातों में घन खर्च, घन का नाशक, विरुद्ध गीत, नेत्र
“रोगी (फल०) ।
पेंडू लिंग गुदा चरण में पीडा, रोग से शरीर पीड़ित, मामा से किसी वस्तु को
श्राप्ति नहीं होती, राजा के समान भाग्यशालो, अच्छे कर्मो में व्यय करे, युद्ध में शत्रुओं
का नाशक (मान०) ।
पैर और नेत्रो में पीड़ा, राजा के तुल्य वेमव में खर्च करने वाला, शत्रु नाशक,
मन में सुखी नहीं, वस्ति और गुदा के रोग से पोड़ित (जा० भ०) ।
चञ्चल और शीळ रहित (जा० पारि०) ।
३४६ : ज्योतिष-शिक्षा, तुतीय फलित खण्ड
अध्याय १६
फलित में ग्रहों के फल का विचार
फलित में ग्रहों के फळ का विचार १२ भाव का ३ प्रकार से होता है ।
(१) लग्न से भाव फल विचार (२) चन्द्र से भाव फल विचार और (३) सूर्य से
भाव फल विचार । यहाँ तीनों प्रकार का भाव फल विचारना दिया ë 1
भाव के साधारण नियम
भाव फल आदि विचारने को आरम्भ में ही संक्षिप्त स्थुल विचार किए हैं । उनको
मनन कर फल विचारना । यहाँ और भी संक्षिप्त में विचार देते हैं ।
१-माव, भावेश और भाव का कारक बलवान् होने से उस भाव सम्बन्धी अच्छा
फल होता है 1 यदि वह भाव या भावेश या उसका कारक निबॅल हों तो उस भाव
सम्बन्धी फल कम हो जाता है 1
२-यदि भाव बलवान् हो, उसका भावेश और कारक एक दूसरे के साथ हों या
एक दूसरे पर दृष्टि हो तो अच्छा फल द्रोता हैं ।
३-भावेश के साथ शुभ ग्रह उसके बल को बढ़ावेगा जैसे धनेश से साथ शुम ग्रह
गुरु हो तो घन देगा और घन बढ़ावेगा ।
सप्तमेश के साथ शुभ ग्रह शुक्र हो, जो विवाह का कारक भी है, तो वह विवाह की
संख्या या स्त्रियां बढ़ावेगा ।
४-किसी भाव में मंगल और शनि दोनों हों तो उस भाव का नाश करता है ।
५-चन्द्र सूयं के साथ हो । द्वितीय भाव में भोम, चतुथं में बुघ, पंचम में गुरु, षष्ठ
में शुक्र, सप्तम में शनि ये दोष युक्त होते हैं प्रायः निष्फ होते हुँ । यदि घन कारक
होने की स्थिति में हों तो तब भी निष्फळ होते हँ । घन लाभ नहीं होगा । इन भावों में
उपरोक्त ग्रहों के साथ चन्द्र भी हो तो चन्द्र भी निष्फळ होता है।
६-पाप ग्रह लग्न या किसी भाव के त्रिक (६-८-१२ भाव) में हो तो उस भाव
के फल को तीक्ष्ण करता है ।
७-्रिकेश किसी भाव से केन्द्र कोण में हों तो भी उस भावका अच्छा फल नहीं
देते । त्रिकेश उस भाव से त्रिक में हो तो अच्छा फल देते ë ।
८-जिस राशि में कोई ग्रह हो वह राशि व उसका स्वामी बली हो और वह
राशिस्थ ग्रह भो बली हो तो उस राशि या भाव का पूर्ण फल होता है यदि इनमें से २
बली हों तो मध्यम फल, केवळ एक बली हो तो हीन फल होता Š 1
९-कोई भावेश पाप युक्त उस भाव से त्रिकमें हो तो उस भाव सम्बन्धो सुख
नहीं देता ।
१०-कारक ग्रह या भावेश बहुत पाप ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो या नोच आदि:
बुरे स्थानों में हो तो अच्छा फल नहीं देता ।