सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
“१८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड
:आदि रोग हो, सूयं अष्टम में हो तो नेत्र रोग, शनि हो तो जल से भय, अष्टमेश को
“पाप ग्रह देखता हो तो मृत्यु हो ।
लग्नेश-लग्नेश अष्टम में अस्तंगत हो, दशमेश छठे और धनेश बारहवें हो तो
“दरिद्र करता है ।
लग्नेश अष्टम, शनि दशम, चन्द्र पंचम, पापयुक्त मंगल दशम में हो तो विष से
“मृत्यु हो । `
सूये-सूर्यं अष्टम हो, अष्टमेश चंद्र युक्त हो, लग्नेश छठे हो, शनि दशम हो तों
: छाठी की चोट से अरिष्ट हो ।
गुरू_गुरु अष्टम में पापयुक्त हों, शनि युक्त चंद्र बारहवें हो तो राजा से अनेक
-कष्ट दण्ड से धन हानि हो ।
दश्मेश-नीच का दशमेश अष्टम हो, पापग्रह दशम में हो तो उस वर्ष में सुख न
"हो उसका राज्य हरण हो जायगा । :
दशमेश अष्टम हो, अध्टमेश् दशम में हो अष्टम क्रूर ग्रह युक्त हो तो अर्थ नाश
:हो । राजा से भय हो !
लग्नेश-लग्नेश अष्टम में हो अष्ठमेश केन्द्र में हो शनि और चंद्रमा छठे हो तों
“अनेक कष्ट हों ।
लग्नेश चम्द्र-चन्द्र युक्त लग्नेश अष्टम हो लग्न में पाप युक्त अष्टमेश हो तो
-रोग शोक आदि से शरीर क्षय हो ।
लग्नेश शुक्र-ऊग्नेश शुक्र अष्टम में पाप ग्रह युक्त व दृष्ट हो लग्न में मंगल हों
«तो तृषा आदि से कष्ट हो ।
गुरु चन्द्र-गुर चन युक्त अष्टम में हो मंगळ सप्तम हो, यह खल्छासर योग कष्ट
“देने वाला है।
चन्द्र युक्त गुरु अष्टम हो और शनि के साथ मुन्था हो तो मृत्यु हो
केतु चन्द्र-केतु युक्त चन्द्र अष्टम होया अष्टम पर दृष्टि हो तो स्त्री का वियोग
-या मनुष्य का मरण हो ।
चन्द्र-केतु युक्त चन्द्र अष्टम हो, अष्ठमेश केन्द्र में हो लग्नेश ६ या १२वाँ हो
"तो निर्धन हो । !
पाप युक्त चन्द्र अष्टम हो नीच का लग्नेश सप्तम हो तो भय, चिता दुःख
~निरुद्यम करे |
चन्द्र सूर्य मंगछ-चन्द्रमा या सूर्य से युक्त मंगल अष्टम हो शनि ७ या ९ स्थान
"में हो तो उस वर्ष ९वें महीने में अरिष्ट हो ।
चन्द्र मंगछ-चन्द्र युक्त मंगळ अष्टम हो तो अग्नि आदि से भय इवास कास रोग
“घात पात आदि का कष्ट हो ।
__ अष्टमेश-अष्ठमेश केन्द्र या त्रिकोण में हो तो विष बन्धन आदि से कष्ट, श्वास
मूळ दाह तन्द्रां आदि रोग हो ।
वर्षे फल में भाव फल विचार : १८९:
शनि चन्द्र-शनि और चन्द्र अष्टम हों तो शूल घात धातु क्षय शीतला आदि
अनेक रोग हो ।
लग्नेश शनि-लग्नेश शनि युक्त अष्टम हो चतुर्थ में वक्री पाप ग्रह हो, पाप'
ग्रह को दृष्टि हो तो अनेक प्रकार के दुष्टों से कष्ट हों ।
अष्टमेश-अष्टमेश अष्टम हो बलवान् हो लग्नेश सप्तम हो तो शूल दस्त दाह:
तन्द्रा आदि रोग से कष्ट हो ।
मंगल-मंगल अष्टम हो चन्द्र छठे हो तो शत्रु का उदय घात पात आदि हो ।
चन्द्र-अष्टम चन्द्र हो या मङ्गल शनि युक्त चन्द्र के वर्ग में हो तो बात कफ सेः
शरीर क्षय शस्त्र से ज्वर पीड़ा आदि हो ।
नीच कं ग्रह-जो ग्रह जन्म में नीच का हो वही ग्रह वर्ष में अष्टम भाव में हो
तो सुख घन आदि प्राप्त हो ।
५ ग्रह-अष्टम में ५ ग्रह हों या ६ से अधिक नीच युक्त हों तो वज्ञ से हत होने
का कष्ट हो ।
वर्षेश बुध-वर्षे् और बुध अष्टम हों शनि मङ्गल पाप युक्त सप्तम में हों चन्द्रः
की दृष्टि हो तो कण्ठादि रोग या मरण हो ।
पाप ग्रह-अष्टम क्रूर ग्रह युक्त दृष्ट हो सप्तमेश ४या५ भाव में हो तो मुत्यु हो।'
लग्नेश-लग्नेश अष्टम हो शनि चन्द्र के स्थान में हो चन्द्रमा पाप युक्त मकर
राशि में हो तो कष्ट हो जलोदर रोग हो ।
लग्नेश मज़्ल-लग्नेश और मङ्गल अष्टम हो अष्टमेश ६ या १२ भाव में होः
तो भृत्यादि का घात शत्रु विवाद अरिष्ट हो ।
लाभेश-अष्टम में लाभेश हो गुरु चतुर्थं हो चतुर्थश नीच का सप्तम हो तो ४
महिना में अरिष्ट हो ।
तृतीयेश-तृतीयेश् अष्टम में क्रूर ग्रह से दुष्ट हो तो शरीर पीड़ा हो भाई काः
वियोग हो ।
व्ययेश-व्ययेश अष्टम हो धनेश व्यय में हो तो स्व जाति में अधिक व्यय होः
ईश्वर की पूजा करे ।
पाप ग्रह-अष्टम में एक भी पाप ग्रह शत्रुग्रही हो पाप ग्रह से दुष्ट हो तोः
बालक नष्ट हो ।
नवम भाव का ग्रह फल
नवम में पाप ग्रह-सहोदर को भय, पशुओं को पीड़ा ।
सुर्य-अति हृषं प्रद ।
शुभ ग्रह-धन व धर्म की वृद्धि ।
अन्य मत है कि नवम में पाप ग्रह भी शुभ हैं ।
नवम सूर्य-धमे राज्य व यश को बढ़ावे, बन्धुओं को पीड़ा कारक, स्त्री पुत्र से:
विवाद क्लेश, मति मन्द ।
-१९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वषंफल खण्ड
नवम चन्द्र-भाग्योदय, धन का लाभ, घर में सौख्य, शत्रु नाश, व्यापार में
“सुख, पुण्य का उदय, यात्रा में सुख, यश की वृद्धि, चित में संतोष,राजा से सम्मान ।
नवम मङ्गल-पुण्य का उदय, धन का लाभ, प्रतिष्ठा एवं पाप में प्रीति, उद्वेग,
अपने जनों से कलह, धन व ऐडवर्य की हानि भी करे ।
नवम बुध-धर्म में बुद्धि, राजा से जय, भाग्योदय, कीर्ति की वृद्धि, शत्रुनाश,
“कार्य सिद्धि में विघ्न, उद्वेग और स्त्री को पीड़ा भी करता है।
नवम गुरु-अधिक धर्मे, सुख प्राप्ति, भाग्योदय, धन लाभ, तीर्थाटन, पुण्य कार्ये
“में बुद्धि, स्त्री विलास, मन प्रसन्न, राज सुख ।
नवम शुक्र-धर्म की बृद्धि, राजा तुल्य हो, वाहुन सुख, गौ भूमि भूषण वस्त्र का
मलाभ, आरोग्यता, स्त्री, पुत्र मित्र से सन्तोष, निर्बल बुद्धि, उन्नति ।
नवम शनि-जाया पुत्र मित्र को कष्ट, धन नादा, पाप बुद्धि, भाइयों से भय
:और पीड़ा एवं भाग्य का उदय, राजा से लाभ, कीति, शत्रु नादा ।
नवम राहु-शरीर पीड़ा, स्त्री से विरोध, धर्मे काम में विलम्ब, पशु व वन्धुओं
“को पीड़ा एवं अन्य मत से राजा से जय, भाग्योदय, रात्रुनाश ।
नवम केतु-धर्म नाह, पशु और भाइयों को पीड़ा, दातु नारा, भाग्यो दय, राजा
मसे जय ।
नवम सूर्य-तर्षेश सूर्ये अधिकार युक्त हो और चन्द्रमा से कम्बूली भी हो तथा
- स्वगृह उच्चादि में होवे तो अपनी इच्छा से मार्ग चलना पड़े मार्ग में सुख भी होवे ।
-यदि सूर्य स्वगृह आदि अधिकार युक्त न हो तो दूसरे की प्रेरणा से गमन होवे, मागं
-में सुख भी न हो ।
नवम चन्द्र-यदि चन्द्र या गुरु जन्म के शनि की राशि में वर्ष में नवम भाव में
“पाप युक्त हो तो बिना प्रयोजन दीर्घ मार्ग चलना पड़े ।
चन्द्रमा बलवान होकर नवम में हो और, मुन्था सप्तम हो तो विदेश सम्बन्धी
“मार्ग चलना पड़े ।
नवम मङ्गल-वर्षे्च मङ्गल ३ या ९ स्थान में बलवान हो पाप युक्त न हो तो
यात्रा गुणदायक होवे चर कायं भी स्थिर हो जावे अर्थात् कोई भी कार्यं अधिक
समय तक स्थिर रहता है । जड
जन्म में गुर जिस राशि में हो उती में वर्ष का मङ्गल नवम हो नौकर और
- धर्म की प्राप्ति होने वाली यात्रा होती है । टु
जन्म का बुध जिस राशि में हो उसी में वर्ष का मङ्गल हो और धनेश की दृष्टि
- उस पर हो तो यात्रा सुख देने वाली होगी । र
जन्म का मंगल स्व राशि में हो वर्ष में भी स्वराशि का नवम स्थान में हो और
लग्न को देखता हो तो शुभ कार्ये सम्बन्धी यात्रा हो और यात्रा में प्रसन्नता हो।
यदि गुरु से नवम स्थान में बली मङ्गल हो तो यात्रा शुभ होती है।
वर्षे फल में भाव फल विचार : १९१
नवम मंगल-जन्म के शनि की राहि ऐ वर्ष में मंगल ३-९ घर में वलहीन
अस्तंगत पाप युक्त दृष्ट हो तो पाप को वृद्धि हो ।
नवम मङ्गल-मङ्गल वषश होकर निर्व अधिकार रहित होकर नवम में हो तो
“उसे अपने सम्यन्धियों को छोड़कर दूर देश जाना पड़े।
नवम म० बु० गु०-मङ्गल और वुध बली होकर गुरु से युक्त हो अस्त न हों
-तो शत्रु सेना पर आक्रमण के लिए जाना पड़े और यश सुख देने वाला जय हो ।
नवम बुध-वर्षश बुध वली हो और पाप रहित होकर वक्री हो और ३-९ स्थान
में हो तो तीर्थ या देव सम्वन्धी यात्रा होवे ।
वैसा बुध वर्षे होकर पाप पीड़ित हो (क्रूर दृष्टि हो) नतो बुरी यात्रा हो ।
नवम वुध-बुध जन्म अधिकारी (छग्नेश) होकर वर्ष में उस राशि में हो जि
"में जन्म का शनि है और पाप युक्त हो तो शत्रु से कलह सम्वन्धीमार्ग चलना हो ।
नवम गुरु-बली वर्पेश गुरु पाप युक्त या दुष्ट रहित ३-९ घर में हो तो धमं
सम्बन्धी यात्रा होती है ।
यदि गुर निर्वेल होकर वर्षेश हो और पाप पीड़ित होकर ३-९ स्थान में हो तो
'कुयात्रा हो ।
अधिकार रहित गुरु नवम में हो तो दूर देश की यात्रा होती है वहाँ राजा से
"मिलन उससे लाभ प्रतिष्ठा होती है '
नवम शुक्र-वर्षेश शुक्र ३-९ घर में पाप रहित हो बलवान हो तो मागे में
सुख हो। यदि शुक्र अस्तंगत, व वक्री होकर ३-९ घर में -हो तो मार्ग गमन ठीक नहीं
होता इच्छा के विरुद्ध गमन हो ।
नवम शनि-यदि अधिकार रहित शनि नवम हो तो अशुभ यात्रा हो ।
शनि पंचाधिकारियों में होकर वषश होकर ३-९ घर में हो तो धर्म की वृद्धि
हो । पाप नाश हो।
शनि-वर्षेश शनि अस्त हो निर्बेल पाप युक्त हो तो पाप करने वाला नास्तिक हो
यदि ऐसा शनि ३ या ९ घर में हो ।
लग्नेश-लग्तेश यदि नवमेश को अपना तेज देता हो अर्थात् लग्नेश शीघ्र गति
चाला अल्प अंश में हो और नवमेश मन्द गतिवाला अधिक अंश में हो और दोनों
दीप्रांश के भीतर हों तो पूर्व निश्चित यात्रा होवे ।
यदि लग्नेश वर्षेश का इत्यश्ञाल होता हो या वषं लग्नेश और मुन्थेश का
इत्यशाल हो तो भी उपरोक्त फल हो ।
सब योगों में लग्नेश और नवमेश का इत्थशाळ होता हो तो अकस्मात् गमन
हो जहाँ संभावना न हो वहाँ जाता पड़े ।
वर्षेश-कोई बली ग्रह वर्षेश पंच अधिकारियों में कोई अधिकार प्राप्त होकर
१९२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड
केन्द्र में हो पाप युक्त दृष्ट नं हो अधिकार मिलने से परदेश में गमन होवे या सेनाः अध्यक्ष के पद पर होकर जाना पड़े।'
मुन्था-मुन्था यदि ३-९ घर में हो शुभ में आश्रय से पुण्य का आगम होता है और पाप के आश्रय से पाप का आगम होता है। सूर्य-सूर्य वर्षेश होकर क्षीण बळ पाप युक्त या दुष्ट होकर ३-९ घर में होतो पापकर्ता और धर्म का निन्दक हो ।
गुरु गुरु वर्षेश होकर अधिकारी हो ३-९ स्थान में हो तो अस्त वलहीन हो तो न्याय से धन पाता है ।
गुरु नवम में सौम्य ग्रहों से दृष्ट हो तो अरिष्ट का नाश करता है । ददाम साच में ग्रहों का फल -
दशम में शनि-पशु धन नाशक ।
दशम में सूय मंगल-व्यापार उद्योग को करते है । दशम में शुभ ग्रह-राजसमागम सुख धन व पुत्र का सुख । दशम सूयं-राजा से लाभ, धन की प्राप्ति, सुवर्ण गौ भुमि.वस्त्र का लाभ, कायं सिद्ध हो, मान बढ़े, पशुओं के अंग में रोग वृद्धि । ॥ दशम चन्द्रमा-शत्रु का नाश, प्रतिष्ठा कीति वृद्धि, पुत्र और वस्त्र का लाभ, व्यापार में सुख, रोग नाश, मित्र व स्त्री का सुख, राजा से धन प्राप्ति । दशम मंगल” भाग्य का उदय, धन लाभ, प्रतिष्ठा, मान सुख, राजा की कृपा, व्यापार में लाभ, आरोग्यता, पशुओं की वृद्धि दशम बुध-वाहन का सुख पुत्र वृद्धि, धन लाभ, राजा से जय, भाइयों से सुख, भोग विलास, सत्कार, देह सुख बल कांति वृद्धि । दशम गुरु-राजा की प्रसन्नता, शत्रु नाश, .भूमि गौधन का लाभ, कीति, मान वृद्धि, चित्त में आनन्द, घर में महोत्सव, सुहृद का सुख, कमं का उदय । दशम शुक्र-राजा से मान, सववत्र जय गौ धन धान्य लाभ, खेती तथा वाहन से सुख, शत्रु नाश, कार्य सिद्धि, भाइयों से सुख, व्यापार में लाभ । दशम शनि-खेती से हानि, पशु का भय, अपने जनों में उदरपीड़ा, राजा से भय, स्थान हानि, व्यापार से लाभ, प्रवास, दुःख व्याकुलता, धने हानि । दशम राहु-वाहन नाश, भुमि खेती आदि का नाश, व्यापार से लाभ, अन्यः मत- मंगल कार्य हो, धन लाभ, स्वजनों से वैर । दशम केतु--च्यापार में लाभ, राजा से जय, वाहन की हानि, मंगल कार्यं हो । दशम सूर्य-वर्षेश सुर्यं नीच राशि का पाप युक्त ददाम में हो तो राजा से मृत्यु या बन्धन हो, जिसका जन्म कातिक में हो उसे यह योग हो सकता है। जन्म का सूर्य सिंह राशि में हो और वर्ष में बलवान होकर दशम में हो तो नवीन स्थान प्राप्ति ओर राजा का आश्रय भी होवे । जन्म में सुयं दशमेरा हो (जन्म लग्न वुर्चिक हो) और वषं में दशाम हो और लग्नेश
वर्ष फल में भाव फल विचार : १९३
से इत्यशाल करता हो तो बल के अनुसार राज्य का लाभ हो । यदि धर्मेश कर्मे दोनों अस्तंगत या पाप पीडित हों तो धर्म का क्षय और राज्य नाश हो । छ चन्द्रमा-बली चन्द्रमा जन्म के मंगल की राशि में हो तो अन्य स्थान का लाभ ॥
दशम मंगल-यदि मंगल जन्म के शनि की राशि में रह कर वर्ष में दशम हो और मुन्या को देखे तो पाप कर्म आदि करने से राजदंड और धन नाश हो । दशम वर्षश-बलवान् वर्षेश दशम में हो तो राज्य लाभ, धन लाभ,यश लाभ हो । या बलवान वर्षश दशम को छोड़कर केन्द्र १, ४, ७ में हो तो घर सम्बन्धी
सुख प्राप्त हो ।
यदि वर्षेश, लग्नेश दशमेश इन सव का इत्थशाल होता हो तो राज्य दायक योग होता है ।
या वर्षेश राज्य सहम में हो सूर्य से इत्यशाल करता हो तो महाराजा हो । त ह मुन्या सूर्य युक्त हो या लग्न से दशम हो तो राज्य लाभ का सुख ।
शनि-अधिकारी शनि दशम हो तो लोह प्रहार से पीडा हो ।
दशम शनि-वर्षेश शनि, स्वगृही या उच्च में होकर दशम में हो तो निरोग रहे और धनागमन भी हो ।
दशम गुरु-वर्षेश गुरु स्वग्रही या उच्च का होकर दशम में हो तो निरोग रहे, धन मिले । ३
मंगल-वर्षेश मंगल स्वगृही या उच्च का होकर दशम में हो तो बाहुवल से घन प्राप्त हो ।
सूर्य-सूर्य वर्षेश स्वगृही या उच्च का होकर दशम में हो तो राजा से धन मिले। बुध-वर्षश बुध स्वगृही या उच्च का होकर दशम हो तो वैद्यक, ज्योतिष या शिल्प (कारी गरी) से लाभ हो ।
चन्द्र मंगळ-चन्द्र युक्त मंगल दशम हो तो घोड़ों आदि का नाश करता है । यय वर्षे होकर दशम हो तो निराशा हो तथा एक स्थान पर स्थिति ना होवे ' कपः -
यदि वर्षश सूर्य हो और जन्म के चन्द्रमा की राशि का वर्ष में शनि हो तो शुभ
कार्यों में विफलता हो । जन्म काल या वर्षकाल में बलहीन शनि हो या शनि वक्र या अस्तंगत हो तो भी उपरोक्त फल हो । " 2
दशमेश-यदि दशम स्थान, दशमेश तथा कमं सहमेश ये सब शनि से युक्त या
दृष्ट हो तो कार्य की हानि हो व्यर्थ परिश्रम हो ।
दशमेश दशम में शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो, लग्नेश केन्द्र में हो तो अरिष्ट नास हो, राजा से धन मिले ।
लग्नेश आदि-यदि धनेश, नवमेश, बुध, लग्नेश बलहीन होकर दशम में हों तो
धन नाश हो मरण तुल्य कष्ट हो बहुत दोष करता है ।
१३
~ SN
१९४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
॥ वर्षश-वर्षश दशम में बळी हो और सौम्य ग्रह युक्त हो तो राजा से अर्थ लाभ
हो शरीर सुख हो मन प्रसन्न रहे, वाहन का लाभ हो ।
- ददामेश-दशमेश दशम हो शुभ ग्रहों से युक्त हो लग्नेश केन्द्र में हो तो स्त्री का
सुख राजा पक्ष से लाभ शत्रु का नाश हो अरिष्ट का नाश हो ।
2 ददामेहा-दशमेश दशम हो और धनेश पंचम में हो तो धान्य का लाभ हो शत्रुक्षय हो अरिष्ट का नाश हो ।
, ५ दशमेश-दशमेञ्ष शुभ युक्त २, ३, ४ भाव में हो ओर चतुर्थेश केन्द्र में हो या
दशम में हो तो घोड़े की सवारी या वाहन प्राप्त हो ।
त्रिराशि पति-त्रिराशि पति दशम हो और दशमेश नवम पंचम, हो तों सब
अरिष्ट दूर हों ।
शमेश-दशमेश दशम सौम्य ग्रह युक्त हो लाभेश केन्द्र में हो तो स्त्री सुख, शत्रु
नाश, राजा से लाभ हो
एकादश (लाम). भाव में ग्रह फल
लाभ में-सब पाप या शुभ ग्रह्-धन वृद्धि, यश वृद्धि अच्छे मित्रों का संग, बल पुष्टि हो ।
बलहीन पाप ग्रह-पुत्र, घन, बुद्धि इन का नाश ।
बलहीन शुभ ग्रह-अपने शुभ फल को न्यून करते हैं ।
. लाभ में सूर्य-राजा से धन प्राप्ति, धान्य, वस्त्र, सुवर्णं इनकी प्राप्ति, भोग,सुख,
शंत्रु नाश, आरोग्यता, भाग्योदय, कामना सिद्धि, घोड़ा, बैल आदि से धन प्राप्ति,
पुत्र के शरीर में पीड़ा, शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो पुत्र सुख हो ।
लाभ में चन्द्रमा-व्यापार से लाभ, राजा से सुख, धन लाभ, पुत्र सुख, प्रतिष्ठा
वृद्धि, शत्रु नाश, पुत्र वस्त्र भूषण आदि प्राप्ति, बुद्धि बढ़े, श्वेत वस्तु का लोभ.
- लाभ में मंगल-राजा से सुख, शत्रु नाश, मित्र पक्ष से लाभ, विजय, घोड़ा हाथी
सुवणे वस्त्र की प्राप्ति, स्त्री, पुत्र, भाई का सुख, सम्पत्ति का आगमन । ०
लाभ में बुध-विजय सम्पत्ति, धान्य वस्त्र इनकी वृद्धि, कीति, मनोरथ सिद्धि,
पशुओं की वृद्धि, आरोग्यता, सुख, द्रव्य का छाभ, भाग्योदय ।
लाभ में गुरु-जय, हाथी घोड़ा आदि वाहन लाभ, शत्रु नाश, पुत्रोत्सव, प्रतिष्ठा वृद्धि, आरोग्यता, स्त्री पुत्र भाई का सुख ।
: लाभ में शुक्र-विजय, पुत्रों की वृद्धि, राज पक्ष से जय, शत्रु नाश, मित्रों की
वृद्धि, सुवर्ण लाभ जल मागं से धन प्राप्ति, ऐश्वर्य वृद्धि, सुख, व्यापार से लाभ ।
लाभ में शनि-सुवर्ण गो भूमि वाहन अदव आदि लाभ, कीति वृद्धि,स्त्री से सुख,
आरोग्यता, चित्त प्रसन्न, धेयं वृद्धि, संतान को पीड़ा ।
: लाभ में राहु-राजा तुल्य हो, शत्रु नाश, आरोग्यता, ऐश्वर्य, स्त्री सुख, नीचजन
से लाभ, सुवर्णे गो भूमि धन की वृद्धि, पुत्र को भय ।
. लाभमें केतु-राजा के समान करे, शत्रु नाश, सुवर्ण गो भूमि तथा धन का लाभ, पुत्र भय ।
वर्ष फल में भाव फल विचार : १९५
लाभ में शुभ ग्रह-यदि पाप ग्रह रहित शुभ ग्रह लाभ में हो तो लाभ कारक है। लाभ में लाभेश-लाभेश लाभ में हो तो वह विद्या के द्वारा लाभ कराने वाला ऱहोता है।
लाभ में लाभेश-लाभेश पाप ग्रह युक्त अस्तंगत हो तो हानि होती है । लग्नेश लाभेश-लाभेश और लग्नेश का इत्थशाल हो तो धन लाभ हो और 'स्वजनों में गौरव बढ़े । : लाभ में सूयं-बली वर्षेश सूर्ये लाभ में हो. तो राजा के मन्त्रियों से मित्रता हो लाभ में सहम-अर्थ सहम में शुभ ग्रह हो और वली बुध मुन्या के साथ लग्न में हो और लग्न पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो धातु आदि भूमि सम्बन्धी गडी हुई सम्पत्ति लाभ हो । यदि योग कारक ग्रह पर पाप दृष्टि हो तो उक्त लाभ नहीं होता । लाभ में ग्रह लाभ स्थान में बलवान शुभ या पाप ग्रह हो तो धन लाभ हो यदि ये निर्वल होकर लाभ में हों तो हानि होती है । लाभ में लामेश-लाभेश लाभ में हो अष्टमेश छठे हो तो दुःख और अरिष्ट हो परन्तु पुत्र स्त्री मित्रों का लाभ हो ।
धनेश-धनेश लाभ में हो शुक्र और गुरु नवम में हो तो राजा की मित्रता से स्वर्ण लाभ हो शत्रु का नाश हो ।
'द्वादश (व्यय) भाव में ग्रह फल
व्यय में पाप ग्रह-नेत्र रोग विवाद राजा से या चोर से धन हानि । व्यय में शुभ ग्रह-अच्छे कार्य में खर्चे ।
व्यय में शनि-हर्ष वृद्धि करता है ।
व्यय में सूयं-चित्त में उद्देग,स्त्री से विग्रह,व्यर्थं खर्च,मस्तक,उदर,नेत्रों में पीड़ा, चरण में रोग, शत्रु से विवाद, धन नाश, अनेक पीड़ा, मित्र से बेर, दुःख । व्यय में चन्द्र-पत्काये में धन खर्च, घर में क्लेश, शत्रु भय, कलह, चित्त चंचल, नेत्र रोग, कफ की पीड़ा, गुप्त रोग, भूख कम ।
व्यय में मंगल-व्यथं व्यय, राजा से भय, परिजनों से विरोध, स्त्री के शरीर में "रोग, नेत्र, कान व मस्तक में रोग, विषाद, विवाद, धन क्षय ।
व्यय में बुध-व्यर्थ घन हानि गुप्त चिता, शत्रु से विवाद, कलह, कान व नेत्र में “पीडा, कफ से कष्ट, थोड़ा लाभ । बुद्धि की मंदता ।
व्यय मेंगुरुराजा से भय, नेत्र रोंग, कफ रोग, शरीर में पीड़ा, विवाद, अपवाद, 'धन हानि, शोक भय व हानि, प्रवास, मित्रों से वैर, आपत्ति, स्थान हानि । व्यय में शुक्र-अच्छे काम में धन खर्च, राज भय, प्रवास, ज्वर, वमन, कर्ण रोग, मरण तुल्य कष्ट ।
` व्यय में शनि-व्यर्थ का खचं, शत्रु और धन का नाश, चित्त में विकलता, क्लेश चिता, सिर, नेत्र, हृदय व चरण में पीड़ा।
व्यय में राहु-शत्रु भय, धन की हानि, स्त्री सम्बन्धी चिता से व्याकुलता, आपस
में कलह, सिर, कान, नेत्र, व उदर में रोग, मृत्यु तुल्य कष्ट, स्थान त्याग ।
१९६ 3 सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड
व्यय में केतु-शत्रु से भय, स्त्री को पीड़ा, मनुष्यों से विवाद विकलता, कान,
नेत्र, उदर में पीड़ा ।
व्यय में सूयं-यदि सूर्य वर्षेश होकर वर्ष में पाप युक्त या दृष्ट होकर छठे घर में
चतुष्पद राशि ( १, २, ५, ९ उत्तराद्धे, १० पूर्वार्ध राशि ) में हो या ८-१२ स्थान में
हो तो नौकरों से कलह हो ।
व्यय में बुघ-वर्षेश बुध पाप युक्त होकर ६, ८, १२ घर में हो तो नीच कर्म
करता है । यदि यह वर्षश बुध पाप ग्रह से दृष्ट हो तो लाभ नहीं होता ।
यदि यह वर्षश बुध अस्तंगत हो तो लेखन कर्म से लाभ नहीं होता ।
व्यय में शनि-यंदि बली झनि वर्षश होकर ६-१२ घर में हो तो नई जमीन में
बसे, वृक्ष लगावे, जलाशय आदि का निर्माण करे ।
व्यय में वर्षश-वर्षेश तथा लग्नेश बलहीन होकर ६-८-१२ स्थान में चतुष्पद
आदि जैसी राशि में हो तो उसके सदुश फल देते हैं। जैसे चतुष्पद राशि में हो तो
चोपायों का नाश करते हैं। द्विपद से आश्रित मनुष्यों का नाश, जलचर राशि से
जल जीवों का नाश आदि ।
वर्षेश लग्न से ६-८-१२ में हो और जन्म और वषं में भी दशमेश बलहीन हो तो
शुभ नहीं होता ।
या वर्ष में अष्टमेश बलहीन होकर ६-८-१२ घर में हो तो शुम नहीं होता ।
व्यय में शुक़्-यदि बलहीन शुक्र छठे स्थान में पाप युक्त या दृष्ट हो और नर.
राशि में हो तो सेवकों की हानि हो यदि वह चतुष्पद राशि में हों तो चोपायों की
हानि करता है ।
ऐसा ही वर्षेश का ८-१२ स्थानगत होने का फळ है।
व्यय में चंद्र मंगू-यदि चन्द्र युक्त मंगळ पाप ग्रहों से युक्त होकर १२ भाव में
हो तो चोपायों में व्याकुलता होती है।
मंगल वर्ष में व्यय भाव में हो सूर्य दुसरे घर में हो तो विवाद में क्लेश हो ।
व्यय में पंचमेश-पंचमेश व्यय में हो व्ययेश की दृष्टि पंचम पर हो तो धन व्यय
हो पुत्रों को पीड़ा हो, कन्या हो । .
व्यय में व्ययेश छग्नेश-व्ययेश लग्नेश वारहवे में पाप ग्रह युक्त हों तो खर्चे बढ़े
दंड से पीड़ा हो ।
व्यय में शति-वलवान शनि व्यय में सौम्य ग्रह युक्त या दुष्ट हो तो सुख हो,
कष्ट नाश हो ।
व्यय में गुरु शनि स्र्य-बारहर्वे गुरु सूर्य और शनि हो तो उस वर्ष में अधिक
खचं हो, स्वजनों से बैर और परजनों को सुख देवे ।
व्यय में अष्टमेश-अष्टमेश वारहवें हो और शनि क्रूर ग्रह से युक्त दृष्ट हो तो
उस वर्ष में अपने वर्ग से शरीर को कष्ट हो ।
व्यय में सप्तमेश शनि-व्यय में शनि युक्त सप्तमेश हो तो उस वर्ष कलत्र को
पीड़ा, लोकापवाद, स्वजनों से बैर, मन में व्याकुलता, संतान पीड़ा हो ।,
बर्षे फल में भाव फल विचार : १९७
. व्यय में सूंयें मंगल-शुक्र लग्न में या वारहवें सूर्य मंगल के साथ हो तो नेत्र रोग हो ।
वर्षे में भाव फल का संक्षिप्त विचार
(१) जो भाव अपने स्वामी से या शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो या मित्र दृष्टि
से दृष्ट हो उस भाव की वृद्धि होती है, जैसे लग्नेश लग्न को पूर्ण दृष्टि से देखता हो
तो उत्तम फल होवे, धन भाव का स्वामी धन भाव को देखता हो तो धन की वृद्धि हो।
( २) कोई भाव पाप युक्त या दुष्ट हो तो उस भाव की हानि होती है यदि
सौम्य या पाप ग्रह मिश्रित हो तो मिश्रित फल होगा ।
( ३) भावेग जिस भाव को देखता हो वैसा कार्य करने वाला होता है ओर
आक्रांत होकर भी देखता हो तो पराये के साथ में कार्य सिद्ध करने वाला होता है।
(४) नीच का और शत्रु के घर में वैठा हुआ ग्रह उस भाव का नाश करता
है। उदासीन राशि में मध्यम फल करता है, मित्र का, स्वराशि का, त्रिकोण में गया
हुआ ग्रह अपने उच्च का या मित्र दृष्टि से दृष्ट हो, वह ग्रह भाव की अवश्य वृद्धि
करता है, अर्थात् उस भाव से होने वाला फल पूर्ण रूप से मिलता है ।
( ५) ६-३-१२ स्थानों में क्रूर ग्रह शुभ और सौम्य ग्रह अशुभ माने जाते हैं ।
अन्य मत है फि ६-८-१२ घर में सौम्य ग्रह इस प्रकार हानि करते हैं कि छठे में
शत्रु की हानि, आठवें में मृत्यु की हानि, वारहवें में व्यय की हानि करते हैं इससे
इनमें सौम्य ग्रह अच्छे और पाप ग्रह बुरे माने जाते हैं ।
( ६) भिम भाव में भावेश सहित लग्नेश हो उस भाव की वृद्धि होती है और
अष्टमेश से युकः जो भाव हो उसकी हानि होती है।
(७) जिम वर्ष में लग्न पंचम या धन स्यान इन तीनों स्थानों में सौम्य ग्रह बैठे हों, उस वर्ष में सुख और सम्पत्ति प्राप्त होती है ।
( ८ ) लग्नेश या राशीश उदयी हो और अपने उच्च का हो या दोनों एक
साथ वँठे हों, उत वर्ष में शुभ होता है ।
(९) लग्न में उच्च का ग्रह हो तो लक्ष्मी प्राप्त हो, चतुर्थं उच्च का ग्रह हो
तो सुख मिले, उच्च का ग्रह सप्तम में स्त्री की प्राप्ति, दशम में राज्य प्राप्ति
कराता है।
(१०) जन्म में जो ग्रह जिस भाव में हो, वर्ष में भी उसी प्रकार हो तो जन्म के
'अह अनुसार ही शुभ या अशुभ फल देते हूँ।
(११) जो ग्रह जन्म में बलवान परन्तु वर्ष में निबेळ हो तो वर्ष के पहिले भाग
सें शुभ फल मंत में अशुभ फल होता है । इसके वि रुद्ध हो तो वषं के पूर्व भाग में
अशुभ फल भंत में शुभ फल करता है। जब जन्म ओर वषं में समान वल हो तो
दोनों भागो में समान फल देता है।
(१२) स्वगृही उच्च का, मित्र ग्रही, शत्रु ग्रही, अस्त नीच भौर हुद्दादि में बैठे
हुए का अच्छी प्रकार बलाबल विचार कर उसके अनुसार फल का निर्णय करना ।
(१३) ग्रहों का फल उन ग्रहों की दशा में होता है।
बळ
१९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
(१४) दो भावों के मध्य में जो ग्रह हो तो उसी दशा का भाव फल देता है
जिसमें वह है । और दोनों संधियों से कम हो तो वरत॑मान भाव का और अधिक हो
तो आगे के भाव का फल देगा । यदि ग्रह संधि के समान हो तो कुछ फल नहीं देगा।
इसके लिए भाव की कुछ संधियाँ निकाल कर चलित भाव कुंडली वना लेना ।
(१५) किसी भाव के पोषक का योग कारक ग्रह और उस भाव का स्वामी ग्रह
बलहीन हो तो उसका नाश होता है ।
(१६) जो ग्रह जिस राशि में जन्म में रहतां है वह राशि उस ग्रह की' पद संज्ञक
है । वह पद संज्ञक राशि वर्ष में यदि वली हो तो जन्म में वह राशि जिप भाव में
रहती है उस भाव सम्वन्धी शुभ फल होता है । यदि वर्ष में वह राशि निर्बल हो तोः
अशुभ फल होता है ।
(१७) जन्म में केन्द्र में स्थित पाप ग्रह यदि वर्ष लग्न में हो तो रोग होता है ।,
(१५) जन्म में जिस राशि में गुरु और शुक्र हों, उसी राशि में वर्ष में मंगल हो;.
अस्तंगत भी हो तो पाप, तिल्ली, गलगंड, शीत, पित्त, सर्दी आदि के रोग होते हैं ।
(१९) वर्ष लग्न, मुंथा, मु थेश, वर्ष लग्नेश ये सव पाप ग्रहों के वीच में हों तों
रोग होवें ।
(२०) चंद्र जैसे-जैसे अंशो में बढ़ता है शुभ फल देता है और जैसे-जैसे घटता
जाता है, अशुभ फल करता है ।
(२१) पंचवर्गी बल के अनुसार ग्रहों के ३ प्रकार के बल इस प्रकार हैं ५ विश्वा
से कम-बलहीन । ५ से १० विशवाबल-मध्यवली । १० से २० विशवावल-पूर्णंबली ।
(२२) वर्ष लग्नेश, वषश, मु था, मु थेश ये सव अपने बल के अनुसार अपनी
दशा में फल देते हैं । >
(२३) वर्ष लग्न, जन्म लग्न से ६-८ भाव में हो तो आथिक हानि मृत्यु या मृत्यु
तुल्य कष्ट हो । (२४) जन्म में जो ग्रह शुभ भावों के स्वामी हों वे यदि वषे में केन्द्र त्रिकोण
या शुभ भाव में हों और वे पूर्ण बली हों तो वर्ष में उन-उन भावों की वृद्धि कर.
लाभ पहुंचायेगे । म (२५) त्रिकोण में गुरु सुर्य शनि या मंगल हो तो उस वर्ष धनहानि हो । (२६) शुक्र कन्या राशि में या अस्त हो और चंद्र भी वृश्चिक राशि में हो तो. वह वर्ष अशुभ हो ।
(२७) सूर्यं चंद्र एक राशि में हों या दोनों ६-८-१२ में हों तो वह वर्ष अनिष्ट: कारक होगा । 2
(२५) चंद्र पाप युक्त या दृष्ट हो तो उस वर्ष चित्त में अशान्ति हो चिन्ता हो । (२९) ३-४-७ भाव में पाप युक्त शनि हो तो उस वर्षो भर रोग होते रहें ।
(३०) जन्म में जिस राशि पर शुक्र हो, उस राशि पर वर्ष में वर्षेश हो तो बिवाह या स्त्री सुख हो ।
वर्षफल में भाव फल विचार : १९९
(३१) सूयं शनि मंगल ८ या १० में हों तो वाहन से चोट लगने की घटना हो ।
(३२) जन्म में सूर्य मेष या सिंह राशि का हो तथा वर्ष में बलवान होकर दशमं
हो तो पदोन्नति हो ।
(३३) जन्म का मंगल जिस राशि का हो, वर्ष में यदि चंद्र उसी राशि में हो तो धन लाभ एवं पदोन्नति हो ।
(३४) लाभेश लग्नेश का परस्पर इत्थशाळ हो तो उस वर्ष यश और सम्मान मिले कीति बढे ।
(३) वर्ष कुंडली में चंद्र लग्न में या ६-८-१२ घर में हो और सूर्य की दृष्टि
हो तो शत्रु भय । मंगल की दृष्टि-शस्त्र भय । शनि दृष्टि-रोग भय । बुध गुरु शुक्र
की दृष्टि हो तो लाभ हो, परन्तु रोग भी हो ।
(३६) ३-६-११ भाव में शनि, मंगल, राहु या सूर्य हो तथा चंद्र, गुरु, शुक्र,
केन्द्र या त्रिकोण में हों तो धन सुख सम्पत्ति आरोग्यता लाभ हो।
(३७) वर्ष में ३-१०-११ भाव में बली मंगल हो तो उस वर्षे भाई द्वारा यहां
एवं सुख सम्पत्ति प्राप्त हो ।
(३८) पाप युक्त शुक्र २ या १२ भाव में हो तो उस वषं नेत्र पीड़ा या नेत्रों की
शल्य क्रिया होने का योग होता है ।
(३९) वर्ष में मंगल चंद्र का दृष्टि आदि द्वारा सम्बन्ध हो या तृतीयेश से
इत्थशाल हो तो भ्रातु सुख में अल्पता हो ।
(४०) वर्ष लग्नेश पर ८ या १२ के स्वामी की दृष्टि हो तो वर्षभर दुःख और कष्ट भोगे ।
(४१) जन्म का धनेश वषे में पूर्ण वली हो या शुभ स्थान में हो तथा उसका सम्बन्ध वर्ष में धनेश से हो तो उस वर्ष आथिक लाभ हो, धन वढे । (४२) यदि मिवंल धनेश भाग्य भाव में हो तो संचित धन का नाश हो । (४३) धनेश भाग्येश बलवान होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो तो उस वर्ष आथिक लाभ हो ।
(>) घनेश मंगल व्यय भाव में हो तो भूमि सम्बन्धी कार्यों में संचित पूँजी खच हो ।
(४५) धनेश चंद्र व्यय में-मांगलिक कार्ये में खच हो। |
(४६) धनेश बुध या शुक्र व्यय में-उपरोक्त फळ । |
(४७) धन भाव में गुरु हो और शुम ग्रहों से दृष्ट हो तो उस वर्ष धन प्राप्त
करने में सहायक हो ।
(४८) धनेश पर बुध, गुरु, शुक्र की पूर्ण दृष्टि हो तो उस वर्ष धन प्राप्त हो ।
(४९) धनेश वर्षेश का परस्पर इत्यशाल हो तो अचानक धन प्राप्त हो ।
(५०) बली धनेश कहीं हो लाभ करायेगा ।
(५१) घनेश चतुर्थेश का सम्बन्ध हो तो वाहन खरीदने या बेचने से लाभ हो ।
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२०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थं वर्षफल खण्ड
(४२) चतुर्थेश की दृष्टि चतुर्थ पर हो तथा गुरु केन्द्र में हो तो उस वर्ष लाभ
हो अच्छा सम्वाद सुने ।
(५३) चतुर्थं में मंगल-माता का सुख न्यून हो ।
(५४) चंद्र वर्ष में ४-१० भाव में हो तो वह वषे लाभप्रद हो ।
(५५) जन्म में गुरु जिस राशि में हो वह राशि वर्ष में, पंचम भाव में हो उसमें
गुरु हो या उस पर वर्षेश या पंचमेश की दृष्टि हो तो उस वर्ष सन्तान लाभ हो । (५६) पंचम भाव में सूये शनि हो तो सन्तान कष्ट व दुर्घटना से दु.ख हो
(५७) पंचम में मंगल और शुक्र दोनों हों तो सन्तान का योग है ।
(५८) पंचम में बलवान गुरु चंद्र हो तो सन्तान का योग है ।
(५९) छठे भाव में पापग्रह हो तो आरोग्यता हो ।
(६०) छठे भाव में षष्ठेश हो तो स्त्री प्राप्ति में सहायक हो ।
(६१) जन्म में मंगल षष्ठेश हो तथा वर्ष में वह षष्ठ भाव में हो तो रक्त दोष
से रोग हो !
(६२) सप्तम में शुक्र हो उस पर मंगल की दृष्टि हो तो सन्तान हो ।
(६३) सप्तम पर पाप ग्रहों को दृष्टि हो तो उस वर्ष स्त्री रोगी हो या कष्ट भोगे ।
(६४) जन्म का सप्तमेश यदि वर्ष में मुंथेश या वर्षेश हो तो सुख प्राप्त हो ।
(६५) जन्म का अष्टमेश वर्ष में लग्न में हो या लग्नेश हो तो अनेक वाधा एवं
कठिनाइयाँ हों ।
(६६) वली अष्टमेश केन्द्र में हो या वर्ष लग्नेश अष्टम हों तो वह वर्ष अनिष्ट
कारक हो ।
(६८) अष्टम में सूर्य, बुध, मंगल धन-नाशकारी हैं ।
(६८) अष्टम भाव में चंद्र मंगल की युति कष्ट कारक है ।
(६९) जन्म का अष्टमेश शनि वर्ष में अष्टम भाव में होकर लग्न से इत्थशाल
करे तो उस वर्ष मृत्यु संभव हो ।
(७०) अष्टमे त्रिकोण या केन्द्र में हो तो उस वर्ष घातक दुर्घटना हो ।
(७१) नवम भाव में लग्नेश नवमेश वक्री हो और शनि या चंद्र अष्टम हो तो
वर्ष अनिष्ट कारक हो ।
(७२) शनि दशम हो तो धन हानि करे।
(७३) दशमेश अष्टमेश का सम्बन्ध हो तो स्थानांतर या राज्य पद की हानि करे।
(७४) जन्म में शनि जिस राशि में हो वह राशि वर्ष में दशम हो और मंगल
दशम हो तो जातक राज्य दंड प्राप्त करे या पदच्युति हो । (७५) छाभ भाव में कोई बली ग्रह हो तो उस ग्रह की दशा में घन लाभ हो ।
अध्याय २०
वषश फल विचार
वर्षेश--६-८-१२ भाव को छोड़कर अन्य भाव में हो तो धन, सुख और राज्य
के सुख आदि देता है। पूर्णवली का पूर्ण फल मध्य वली का मध्यम फल और हीन
'बली हो तो भय, शोक, दुःख, रोग आदि होते हैं ।
वर्षेश उपरोक्त स्थान के अतिरिक्त अन्य स्थान में हो र दित हो वर्ष और जन्म
में वल पाया हो तो अच्छा फल सुख, निरोगता लाभ आदि देता है।
वर्षेश ६-८-१२ भाव में हो या पाप ग्रह से युक्त दृष्ट हो तो अरिष्ट क्लेश
आदि करता है। शुभ फल नहीं देता ।
यदि केन्द्र में शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो सुख और लाभदायक होता है।
जो ग्रह वर्षेश होता है वह वर्ष भर दशापति रहता है, उसकी दशा का फळ
चष भर रहता है । इसलिए वर्षश का वल जन्म काल एवं वपं में भी विचारना ।
दोनों में पूर्ण बली-पूर्ण शुभ फल, दोनों में मध्य वली-मध्यम फल, दोनों में हीन
बली-अधम फल । जन्म में पूर्ण बल वपं में मध्यम बल-मध्यम फल । जन्म में पूर्ण
बल वपं में हीन वल-उस से कम फल होगा। इसी प्रकार दोनों का बल विचार कर
फल का अनुमान करना ।
वर्षेश का जिस ग्रह से इत्थशाल हो वह अपनी प्रकृति के अनुसार शुभ फल
देता है । शुभ ग्रह से इसराफ हो तो शुभ फल कुछ कम देता है । पाप ग्रह के
इत्यशाल से अशुभ फल होता है ।
जन्म वर्षे में जो ग्रह जैसी हुद्दा में होकर दुसरे का तेज ग्रहण कर्ता हो वपं में
“भी उसी प्रकार हुद्दा में हो तो अपना फल अपने सम्बन्धी ग्रह को दे देता है अर्थात्
जन्म में जिस हद्दा में ग्रह है उसी हद्दा में जो कोई ग्रह हो उसके साथ मुथशिली
होतो जन्म के उस ग्रह का तेज ले लेता है।
जो ग्रह जन्म में शुभ या अशुभ फल देने में समर्थ है वह वर्ष लग्नेश या वपंश
क्के साथ मूसदिक योग करता हो तो जन्म कालोक्त फल वर्ष में नहीं होता जो इन के
साथ इशराफ योग न हो तो उस ग्रह का जन्म कालिक फल वर्ष में होता है। यदि
-लग्नेश वर्पेश इन दोनों में किसी से इत्यशाळ करता हो तो विशेष रूप से फल
कहना । यदि उस ग्रह को वर्षेश या वषं लग्नेश से न तो इशराफ हो और न इत्यशाल
हो तो भी जन्म का फल होगा ।
यदि जन्म में पंचमेश पुत्र भाव को देखता हो या पुत्र भाव में हो तो अपनी
दशा में पुत्र देने में समर्थ होता है यदि यही जन्म का पुत्र भावेश वर्ष लग्नेश या
वर्षेश से या पंचमेश से मुसरिफ योग करे तो वर्ष में अवश्य पुत्र नाश करेगा ।
२०२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड
वर्षश गुरु हो और जन्म में गुरु से चन्द्रमा इत्यशाल करता हो परन्तु गुरु अपनी
हद्दा में हो और वर्ष में चन्द्र को देखे तो जन्म में चन्द्रमा गुरु को तेज देने से वह.
वर्ष शुभ फल देगा ।
इसी प्रकार जन्म का और वर्ष का शुभाशुभ फल योग कारक ग्रहों के वलछाबल:
विचार और इत्यशाल कम्बुल इसराफ इन योगों का विचार कर कहना ।
वषश केन्द्र या त्रिकोण में सौम्य ग्रह युक्त हो तो सम्पूर्ण वर्ष शुभ हो धन धान्यः
लाभ हो यश बढ़े शत्रु नाश हो । : वर्षेश वर्षलग्नेश और जन्मलग्नेश ये तीनों वर्ष कुण्डली में अष्टम हों तो मृत्यू,
या मृत्यु तुल्य कष्ट हो ।
वर्षेश वली हो और ऊऱ्नेश एवं गुरु की दृष्टि धन भाव पर हो साथ ही लाभेशः
ओर धनेश की युति हो तो बिना प्रयत्न के लाटरी आदि से धन मिले ।
वर्षश षष्ठ में वक्री मंगल-रक्त विकार । शुक्र-वात रोग । चंद्र-उदर या हृदय.
रोग । सूर्य-ज्वर पीडा हो । ॥
वर्षेश निर्बल हो तथा धनेश और भाग्येश अपनी-अपनी नीच राशि में हों तो:
वह वर्ष अनिष्ट दायक हो ।
वर्षेश बली सप्तम में हो तो विवाह हो या पत्नी सुख हो ।
वर्षेश गुरु पाप दृष्ट अष्टम हो तो झूठा कलंक लगे ।
वर्षेश मगल त्रिकोण में हो तो शस्त्र भय । केन्द्र में लग्नेश अष्टमेश की युति
हो उस पर मंगल की दृष्टि हो तो मृत्यु हो ।
वर्षेश लग्नेश दोनों निवे हों तो अनिष्ट हो, श्रम व्यर्थ हो ।
वर्षेश बुध ६-८-१२ में हो पाप ग्रह से दृष्ट हो तो उस वर्ष नीच कमं हो ।
वर्षश बली शनि ६ या १२ घर में हो तो पुराना घर लेने या बेचने से लाभ हो ॥'
वर्षेद शनि स्वग्रही या उच्च का दशम में हो तो धन प्राप्त हो ।
वषश सुयं-राज्योप्न ति, चन्द्र-शवेत वस्तु के व्यापार से लाभ । मंगल-सम्मान ।: बुध-व्यापार में उन्नति | गुरु-परीक्षा में सफलता । शुक्र-धन प्राप्ति हो । बळी वर्षश जिस भाव में हो उस भाव की वृद्धि हो ।
प्रत्येक वर्षश ग्रह का फल विचार
वर्षेश विचार करते समय ध्यान रहे कि उस ग्रह का बल जन्म में और वर्ष में:
क्या है। ग्रह का ५ विश्वा से कम बल हो तो वह हीन बली, ५ से १० तक मध्य वली और १० से अधिक हो तो ग्रह पूर्ण बली समझना । यदि जन्म और वर्ष में पुर्ण बली हो तो पूरा फल होता है एक में पूर्ण बली दूधरे में मध्य बली हो तो पूरा शुभ फल कुछ कम हो जाता है, एक में पूर्ण दूसरे में हीन तो मध्यम फळ, दोनों में मध्यः बली-मध्यम फल, एक में मध्यम दूसरे में हीन वल-न्यून शुभ, दोनों हीन बल-शुभ' फल न्युन, अशुभ फल विशेष । जैसे-जैसे शुभ की मात्रा घटेगी, अशुभ फल की मात्राः बढ़ेगी । इसी प्रकार यहाँ बताये वर्षेश के फल पर विचार करना ।
वर्षेश फल विचार : २०३४
(१) वर्षश सुर्य पूर्ण वली-राज्य, सुख, पुत्र, कुलोचित धन लाभ, कुल के अनुसार प्रतिष्ठा, -
परिवार में सुख, शत्रु नाश, भुमि, घन कीति, मित्र लाभ हो। ये सव पूर्णं बकी सूर्य:
के फल होते हैं ।
मध्यम बली-उपरोक्त सव सुख मध्यम होता है, थोड़ा सुख, स्वजनों से विवाद, .
स्थान का छूट जाना, देह में कृशता, कष्ट, राजा से भय । यदि शुभ ग्रह॒ से वर्षेश का.
इत्थशाल न हो तव उपरोक्त फल होता है । यदि मध्यवली ग्रह शुभ ग्रह से इत्यशाळः
करे तो शुभ फल होता है।
हीन बली-परदेश में यात्रा, धन नाश, रोग, शोक, शत्रु भय, आलस्य, लोक:
अपवाद (कलंक) क्लेश, पुत्र और मित्र से भय, पिता आदि से भी सुख नहीं मिलता
(२) वर्षे चन्द्र
पूर्णं वली-धन, स्त्री, पुत्र, घर का अनेक सुख, माला, सुगंधित द्रव्य, मोती, .
वस्त्र से सुख हो, कुलोचित पदवी या अधिकार लाभ हो, राजाओं से मित्रता हो
शरीर पुष्ट हो ।
चन्द्र वर्षश होकर किसी ग्रह से इत्थशाल करे तो वह वर्षश होता है । यदि वर्षेशचंद्र से कबुल करत है और रात का जन्म है तो वह वर्ष उत्तम होता है ।
मध्यवली-उपरोक्त फल साधारण, पुत्र मित्र वर्ग से शत्रुता, दूसरे स्थान में”
जाना पड़े, शरीर में दुर्वंछता हो । मध्य बली चंद्र होकर पाप ग्रह से इशराफ करता”
हो तो कफ का प्रकोप होता है।
हीन बली-या अस्तंगत हो तो शीत कफ यक्ष्मा खाँसी रोग हो, चोरी का डर.
स्वजनों से विरोध ।
अति हीन बळ हो तो पुत्र स्त्री का सुख नष्ट हो दूर देश जाना पड़े, मृत्यु तुल्य -
कष्ट हो।
(३) वर्षश मङ्गल
पूर्ण बली-कीति जय, शत्रु का नाश, संग्राम में प्रधान या सेनापति, कुलोचित.
धन सम्पत्ति की प्राप्ति, मित्र स्त्री पुत्र का सुख, छोगों में पूज्य, राजा से धन प्राप्त हो।' -
मध्यवली-उपरोक्त से साधारण फल, चोर भय, राजा आदि से भय। गाड़ी:
या शस्त्र से चोट या घाव, शरीर से रुधिर निकले, अधिक क्रोध, झगड़ा, रोग, .
विवाद, विरोध, धन क्षय; बल, गौरव आदि का मध्यम सुख हो । र
हीन बली-शत्रु, चोर, अग्नि, इन से भय, कलंक लगने का भय, बुद्धि नावा,..
काम-काज में वाधा, अग्नि रोग भय, परदेश गमन, स्त्री, पुत्र, मित्र से क्लेश, चरण; .
मुख, और नेत्र में रोग, दुष्ट एवं स्वजनों से भय यदि गुरु की दृष्टि न हो तो क्षय:
रोग का भी भय होता है ।
(४) वर्षश बुध टु
पूर्ण बली-धन लाभ नाना प्रकार की कलाओं में गणित या ज्योतिषशास्त्र में...
२२०४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड
“बैद्यक में ज्ञान की उन्नति हो विवाद में जय, लेखन में, अच्छे शास्त्र पढ़ने में, या
` “लिखा पढ़ी के काम में प्रतिष्ठा या धन लाभ हो, राजा के आश्रय से गौरव प्राप्त हो,
“राजाका मंत्री होवे ।
मध्य वली-पूर्वोक्त फल साधारण होगा । रास्ता चलना व्यापार में लाभ पुत्र
-व मित्र से सुख । यदि शुभ ग्रह से इत्यशाल हो तो यह फल होता है अन्यथा अच्छा
'फल नहीं होता ।
बल हीन-वल बुद्धि की हानि, धर्म का नाश अर्थात् अधर्म का उदय, अपने ही
“वचन के दोष से अनादर, झूठी गवाही देनी पड़े, दूसरों के व्यवहार से पुत्र, धन,
मित्र की हानि होती है चित्त में विक्षेप होने से आपत्ति, राजा, शत्रु या चोर से भय,
नेत्र, हृदय, गले में रोग ।
,(५) वर्षश गुरु
पूर्ण बली-परिवार में सुख, धर्म गुण-ग्राहकता. धन कीति पुत्र का सुख हो, जगत
“में विश्वास बढे, श्रेष्ठ बुद्धि हो, पराक्रम बढ़े, गड़े हुए धन का लाभ, राजा से गौरव
“बढे, शत्रु नाश हो ।
मध्यबली-पूर्वोकत फल साधारण हो, राजा से मिलाप, विज्ञान शास्त्र में प्रीति।
यदि पाप ग्रह से इसराफ योग होता हो तो दरिद्रता हो धन का नाश स्त्री को कष्ट
“ये अशुभ फल हों । हीन बल-धन, अर्थ और सुख की हानि, पुत्र स्त्री मित्र भी उसे छोड़ देवें, कलंक लगने का भय, व्याकुलता, कष्ट से निर्वाह, शरीर में कफ खाँसी दमा शत्रु से “भय, कलह भी हो । A
-(६) वर्षश शुक्र पुणं बली-शरीर निरोग, अनेक भोग विलास, अच्छे शास्त्र के पढ्ने में प्रेम,
“अनेक रत्नों का लाभ, मिष्ठान्न भोजन, सन्तोष एवं कल्याण प्रताप बढ़े, जय प्राप्त
- हो, स्त्री के साथ सुख हास्य, राजा से धन लाभ और सुख।
मध्य बली-उपरोक्त फल मध्यम होता है । आजीविका कम, गुप्त दुःख, बंधी हुई जीविका, पाप ग्रह या शरु ग्रह से युक्त दुष्ट हो तो अनेक प्रकार की विपत्ति हो, “धन नाश हो ।
बल हीन-मन में संताप, लोगों में हंसी होती है, विपत्ति हो अपनी आजीविका - नाश हो, स्त्री पुत्र मित्रों से विरोध, कष्ट से भोजन प्राप्ति, कार्य में असफलता, सुख
- नहीं मिले ।
. (७) वर्षद शनि
पूर्ण बली-नवीन भूमि घर खेत आदि का लाभ, म्लेच्छ राजा से धन समूह का “लाभ, बगीचा लगाना व जलाशय का सुख, शरीर पुष्टि, कुलोचित पद की प्राप्ति ~गुणियों में अग्रगण्य ।
मध्य बळी-उपरोक्त फल मध्यम, कष्ट से भोजन मिले, नौकर उँट भँ पालने
मासेश ओर दिनेश का फल : २०५.
वाले व अन्य के संसर्ग में आसक्त रहे, लाभ हो । पाप ग्रहों से युक्त या दुष्ट होने से
अशुभ फल हो ।
हीन बल्ली-कार्यों में असफलता, धन व्यय, विपत्ति शत्रु का भय, स्त्री पुत्र भित्रजनो '
से बेर, खराव अन्न का भोजन । शुभ ग्रह से इत्थशाल हो तो थोड़ा सुख भी मिले ।.
छे
अध्याय २१
मासेश ओर दिनेश का फल
मासेश और दिनेश का फल वर्षेश के समान होता है। परन्तु यहाँ मासेश का
फल संक्षेप से दिया है । प ८
(१) सूये मासेश-राजा से धन की प्राप्ति, मन में हषं, महत्व की वृद्धि निरंतर:
देशान्तरो में यश का प्रचार ।
(२) चंद्र मासेश-इवेत वस्त्रों का लाभ, मोती के हार की प्राप्ति, धनागम, .
राजा से एवं आत्मीय जनों से सुख, तीथं यात्रा आदि शुभ फल हो ।
(३) मंगल मासेश-संग्राम में विजय, रक्त वस्तु एवं धन की प्राप्ति, घर में”
सर्वत्र मंगल ।
(४) मासेश बुध-राजा से धन का लाभ, सुन्दर वस्त्रों का लाभ, कीति बढ़ें, .
अनेक भोग विलास से सुख ।
(५) मासेश गुरु श्रेष्ठ बुद्धि हो, लोक में आदर, देव कार्य में मन ।
(६) मासेञ्च शुक्र-जल क्रीड़ा में प्रसन्नता, काम क्रीडा में अधिक मन, कुटुम्बियों '
से आदर प्राप्त ।
(७) मासेश्च शनि-राजा से मान प्राप्ति, हास्य विलास, घमंड दुर करने में समर्थ ।
उपरोक्त फळ के विचार में इन का बल एवं पाप शुभ दृष्टि आदि पर विचार:
कर फल निर्णय करना ।
साव अनुसार सासेश का फल
(१) लग्न में मासेश-राजा से मान प्राप्ति, सन्तान सुख, धन का राभ;
भाग्योदय, वाहुवल का प्रताप, शत्रु का नाश ।
(२) द्वितीय में मासेश-हुषं, घन लाभ, वाहुबळ का प्रताप, वाहून घर आदि की
प्राप्ति, यदि शुभ युक्त या दृष्ट हो तो ये सव शुभ फल होते हैं ।
(३) तृतीय में मासेश-स्वतः के पराक्रम द्वारा सिद्धि प्राप्त करे, भाई के शरीर
में सुख हो । पाप युक्त या दुष्ट होने से ऐसा फल नहीं करता GE
(४) चतुर्थं में मासेश-शुभ युक्त या दुष्ट हो तो वाहन एव सुवर्ण का छाभ,.
सत संग, ब्राह्मण और देव में भवित ।
४२०६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफलखण्ड
(५) पंचम में मासेश-सन्तान का सुख, स्त्री से विलास,'घनागम, शत्रु और
रोग का नाश, सुख, अर्थ की सिद्धि ।
(६) षष्ठ में मासेश-कार्य नाश, शत्रु का उदय, रोग हो, वाहन और धन
को हानि.।
(७) सप्तम में मासेश-व्यापार में लाभ, धान्य की वृद्धि, स्त्री का सुख हो ।
*यदि शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तव उपरोक्त फल होता है ।
(८) अष्टम में मासेश-बलू बुद्धि की हानि, शरीर की हानि, लक्ष्मी का वियोग
“देश विदेश में भ्रमण, पुत्र और भाई को दुःख ।
(९) नवम में मासेश-धर्म की वृद्धि, भाग्योदय, मित्र लाभ, स्त्री विलास,
सन्तान सुख । |
(१०) दशम में मासेश-प्रताप की वृद्धि, पुत्र सुख, धन धान्य का लाभ, स्त्रियों
का विलास, सर्वे अर्थो की मिद्धि हो ।
(११) लाभ में मासेश-यदि शुभ युक्त या शुभ दृष्ट हों तो बहुत लाभ हो, हषं
हो, विलास, स्त्री और घर का सुख ।
(१२) व्यय भाव में मासेश-धन का खर्च, धान्य का नाश, स्त्री को कष्ट, पुत्र
सुख की हानि, शत्रु का आतंक, मस्तक एवं शरीर में पीडा ।
सास प्रवेश का मास फल का संक्षिप्त विचार
मास प्रवेशा काल में लग्न के नवांश के स्वामी की लग्नेश से या उसके नवांशेश
:से मित्र दृष्टि हो या दोनों एक साथ हों तथा चंद्रमा की उन दोंनों पर मित्र दृष्टि
(३, ५, ९, ११) हो तो उस महीने में मास प्रवेश जब तक हैं सुख और निरोगता रहे
यह बलाबल एवं दृष्टि योग से विचार कर फल का निर्णय करना ।
यदि वही लग्न नवांशेश और लग्नेश का नवांश स्वामी ये. दोनों परस्पर शत्रु
-दुष्टि से देखते हों या चंद्रमा भी शत्रु दृष्टि से देखे तो मानसिक दुःख देते हैं। यदि
लग्नेश या लग्नेश का नवांशेश में कोई नीच का या अस्तंगत हो तो बड़ा कष्ट भोग
-कर सुख पावे और यदि .दोनों नीच में या अस्तंगत हों और चंद्रमा शत्रु दृष्टि से देखे
“तो मरण हो । परन्तु इसी मास में जन्म तथा वर्ष का भी अरिष्ट हो तो मृत्यु होती
“है अन्यथा मृत्यु तुल्य कष्ट हो । यदि जन्म का अरिष्ट उस महीने में हो वर्ष में न हो
“तो मास के पूर्वाद्ध में मृत्यु तुल्य कष्ट हो और वर्ष का अरिष्ट हो जन्म का उस मास
“भै न हो तो मास के उत्तराद्ध में उक्त अरिष्ट होता है।
ऐसा ही सम्पूर्ण भावों का विचार करना कि जिस भाव का नवांशेश तथा उस
“भावेषा के नवांशेश परस्पर मित्र दृष्टि से देखें और चंद्रमा भी इनको मित्र दृष्टि से
“देखे तो इस मास में उस भाव सम्बन्धी शुभ फल होता है यदि उक्त ग्रह परस्पर शत्रु
दृष्टि से देखें या युक्त हों तथा चंद्रमा भी इन्हें शत्रु दृष्टि से देखे तो उस भाव सम्बन्धी
कष्ट होगा । ऐसे ही नीच या अस्तंगत में से एक या दोनों हों तो भी कष्ट होगा ।
"ऐसा सव भाव से विचारना ।
मासेश ओर दिनेश का फल : २०७
लग्नेश मासेश वर्षेश और लग्न नवांश स्वामी ये चारों या इनमें से कोई जिस “भाव नवांश पति से मित्र दृष्टि से युक्त या दुष्ट हों और चंद्रमा भो मित्र दृष्टि से युक्त या दुष्ट हो तो उस भाव के सम्वन्ध से सुख होता है। ऐसे योग में जो जन्म काळ में इस भाव सम्बन्धी अनिष्ट फल हो तो यहाँ मध्यम फल होगा । जो जन्म में “भी. शुभ फल देने वाला हो तो यहाँ अधिक शुभ होगा । एसे ही वलहीन होवे और शत्रु दृष्टि का होवे तो अनिष्ट का बुद्धि से विचार लेना ।
„ ६-८-१२ भाव के स्वामी और इनके नवांश स्वामी निर्वेल हों और भावों के
स्वामी सवल हों तो शुभ फल देते हैं । यदि ६-८-१२ के नवांश स्वामी सवल हों और
भावों के निर्वळ हों तो कष्ट होता है ।
लग्नेश मासेश वर्षश और मुंथेश ६-८-१२ भाव में हों पाप युक्त हो और ग्रहों से
"शत्रु दृष्टि से दुष्ट हों तो इस मास में रोग आदि से क्लेश हो और दानु द्वारा दुःख
प्राप्त हो ।
लग्नेश, “मासेश और वर्षश वलवान हो तथा केन्द्र त्रिकोण ओर लाभ में हो तो
“निरोग हो शत्रु नाश हो और कुलानुमान से राज्य लाभ हो, मानव कीति को प्राप्त हो।
मास प्रवेश कुण्डली में साव में ग्रह फल
(१ ) लग्न में सुर्य-मस्तक नेत्र और मुख में पीड़ा, चित्त में उद्वेग, स्त्री के
शारीर में पीड़ा, वहुत चिन्ता ।
लग्न में चंद्र-कास तथा स्वासादि का रोग मुख और नेत्र में पीड़ा । पूर्ण चंद्र हो
मतो धन का लाभ करे । शुभ युक्त या दृष्ट शुभ फल । पाप युक्त या दुष्ट दुष्ट फल ।
क्षीण चंद्र हो तो अशुभ फल ।
लग्न में मंगल-कलह, धन खर्च, रक्त पित्त का रोग, मस्तक मुख व नेत्र में रोग ।
- लग्न में बुध-राजा से मान यश, तेज बल की वृद्धि, वुद्धि की वृद्धि, देह सुख
"आप्त ।
लग्न में गुरु-पुत्र स्त्री से सुख, राजा से सम्मान, लाभ, वात रोग ।
लग्न में शुक्र-राजसमान, कुल की वृद्धि, हषं सुख, जगतप्रीति ।
लग्न में शानि-सिर मुख पेट में रोग, कफ बात की पीड़ा, मित्र से वेर, स्वगृही
ग्या उच्च का हो तो शरीर सुख देता है ।
लग्न में राहु-पुत्र मित्र आदि का कष्ट, धन नादा, कलह, वात पीड़ा, वस्त्र
आदि का कष्ट ।
लग्न में केतु-शिर में रोग ताप, विदेवा से भय, उद्वेग, स्त्री आदि की चिन्ता,
"चोट, शरीर में व्यथा ।
मास प्रवेश में धन में सुयं-धन नाश, राजा अग्नि चोर शत्रु से झगड़े में धन
हानि, कुटुम्ब में कलह । धन में चंद्र-इष्ट मित्रों से लाभ हो । पूर्ण चंद्र हो तो सवेत वस्तु के व्यापार से
अन लाभ हो ।