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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

३५८ श्रीसाम्बपुराणम्

न सम्भाषेत वै शूद्रं प्रमादान् मन्त्रसाधकः।
अरक्तो रञ्जयेल्लोकान् कामी चेत्स्यादकामुकः ॥२३॥
मन्त्रसाधक प्रमाद के कारण भी कभी शूद्र से वार्त्ता न करे। अनासक्त होकर लोगों का मनोरञ्जन करे तथा (लोगों के) कामी होने पर भी स्वयं अकामुक निस्पृह ही रहे॥२३॥

गूढविद्याव्रतश्चापि प्रमादी स्यात् स साधकः।
क्रियां च सुदृढां कुर्यान्निविधि चेत्स साधकः ॥२४॥
गूढ़विद्या व्रताचरण में प्रमादी (?) हो जाय, सुदृढ़ क्रिया करे; किन्तु किसी की हिंसा न करे (यहाँ प्रमादी पद उचित नहीं लगता, इसे अप्रमादी होना चाहिये)॥२४॥

यावद् व्रतं तु यः कुर्यात्तस्य सिद्ध्यन्ति लौकिकाः।
जपित्वा संहितां मासं ततः साध्यं प्रयोजयेत् ॥२५॥
जो इतने दिनों तक व्रत करते हैं, उनके लौकिक कार्य सिद्ध हो जाते हैं। एक मास जप करने के उपरान्त साध्य का प्रयोग करना चाहिये॥२५॥

प्रसूतिं घातकं कृत्वा लवणस्याहुतिं क्रमात्।
सप्तरात्रं तथा हुत्वा वशे जन्तून् करोति सः ॥२६॥
प्रतिलोमैस्तथा वर्णैः साधको घातकस्य तु।
शृङ्गवेरविषे हुत्वा घातयेत् सर्वजन्तुकान् ॥२७॥
प्रसूति के घात का (?) समर्पण करके क्रमशः लवण की आहुति देनी चाहिये। सात रात्रि आहुति देने पर साधक सभी प्राणीगण को वश में कर लेता है। घातक के प्रतिलोम (?) वर्ण द्वारा साधक को शृंगवेर के विष की आहुति देनी चाहिये, इससे वह सभी जन्तुओं का विनाश कर सकता है॥२६-२७॥

अव्रती नैव संसिद्धेदजयः साधकः स वै।
मोहादारभते यस्तु हन्यते स विधानवित् ॥२८॥
जो व्रतानुष्ठान नहीं करते, उन्हें कभी भी सिद्धि प्राप्त नहीं होती। वह असंयमी है। जो मोहवशात् विधान जाने विना आरम्भ करता है, वह विनष्ट हो जाता है॥२८॥

वेधकामस्तु मन्त्रस्तु यदि रूपं समालिखेत्।
पूर्वोक्तेन विधानेन त्रिमुखान्तां चतुर्भुजाम् ॥२९॥
अष्टशक्तिपरो चैव दिक्पतीनां च रूपकैः।
रश्मयस्तु यथार्कस्य तथा मन्त्रस्य ताः स्मृताः ॥३०॥
यदि वेधकामना से मन्त्र का रूप अंकित किया जाय, तब पूर्वोक्त विधानानुसार त्रिमुखान्त चतुर्भुजा का अङ्कन करे। अष्टशक्ति तथा दिक्पाल का रूप, सूर्य की रश्मिसमूह जिस प्रकार से मन्त्र में स्मृत है, उसे अङ्कित करना चाहिये॥२९-३०॥

अष्टषष्टितमोऽध्यायः ३५९

यथा विष्णुस्तथा रुद्रो वीरभद्रश्च पार्श्वतः ।
एते मन्त्रस्य वै योज्याः सर्वकालं च मन्त्रवित् ॥३१॥
होमकाले तु मन्त्रस्य जपेन विनियोजयेत् ।
शान्तने चापि रोगाणामेष दृष्टो विधिः परः ॥३२॥

जैसे विष्णु हैं, उसी प्रकार से रुद्र हैं। पार्श्व में वीरभद्र रहते हैं। मन्त्रज्ञ व्यक्ति मन्त्र में सर्वदा इसी प्रकार से योग करे। होमकाल में मन्त्र को जपयुक्त करने से (मन्त्रजप द्वारा) रोगों के विनाश की यह श्रेष्ठ विधि है॥३१-३२॥

संशयी तु यदा स स्यात्तदा कुर्यादिमं विधिम् ।
साधयेत् कामतो ह्यर्थान् पतिः स्याद् बीजसत्तमः ॥३३॥

साधक जब संशयापन्न हो जाय, तब इस विधि का पालन करे। यथाकामना प्रयोजन साधन करे। पति (?) श्रेष्ठ बीज है॥३३॥

राष्ट्रभङ्गनिपाते वा स्थानत्यागे तथा बुधः ।
सम्पुटे स्थापयेन्मन्त्रं यावत्कालविपर्ययः ॥३४॥
संहारात्तं ततः कृत्वा मध्ये मन्त्रं तु योजयेत् ।
पुनः संहारमायोज्य मध्ये बीजेन वेष्टयेत् ॥३५॥

राष्ट्रभंग अथवा विपदा के समय, किंवा स्थानत्याग-काल में तत्त्वज्ञ व्यक्ति संपुट मन्त्र स्थापित करे, जब तक कालविपर्यय न हो जाय। तदनन्तर संहार-पर्यन्त करके मध्य में मन्त्र योजित करे। पुनः संहार करे। मध्य में बीज से वेष्टन करे॥३४-३५॥

दशवर्णेन बीजेन स्वङ्गप्रत्यङ्गयोजनम् ।
न्यस्तो भवति वै मन्त्रः कालमाकल्पमन्त्रिणाम् ॥३६॥
अधस्तात् प्रणवं कृत्वा प्लुतो भवति पादयोः ।
पुनः पुनस्तथा हस्ते व्योकारश्चापि वामके ॥३७॥
हृदये तु मकारः स्याद् व्योकारः जठरे स्थितः ।
पिकारः पृष्ठसंस्थो वै नकारो मुखसंस्थितः ॥३८॥
प्रणवं स्थापयेन्मूर्ध्नि स च दृष्टो विधिः परः ।
न्यस्तो भवति वै मन्त्रो यावत्कालं तु साधनम् ॥३९॥

दशवर्ण बीज द्वारा अंग प्रत्यङ्ग को योजित करना चाहिये। मन्त्र विन्यस्त हो जाने पर मन्त्र साधक के यावत् जीवन के लिये हो जाता है। निम्न में प्रणव करे। पादद्वय में दो प्लुतस्वर हो। ऐसा बारम्बार करते हुये बाँयें हाथ में व्योकार, हृदय में मकार, जठर में व्योकार, पृष्ठ में पिकार, मुख में नकार तथा मस्तक में प्रणव की योजना करनी चाहिये। यह श्रेष्ठ विधि है। जब तक साधन है, तब तक मन्त्र न्यस्त रहता है॥३६-३९॥

३६० | श्रीसाम्बपुराणम्

विधिरेष तु मन्त्राणां सूक्ष्मो वै सर्वतोमुखः।
असन्देहैन सिद्धेन विधिगुप्तेन मन्त्रवित् ॥४०॥

सर्वतोभाव से मन्त्र की यही सूक्ष्म विधि है। मन्त्रज्ञ व्यक्ति निःसंदेह विधि को गोपनीय रखकर सिद्धि प्राप्त करता है॥४०॥

ग्रहणे चापि मन्त्रस्य भिन्नकार्याश्च मन्त्रिणः।
मूलन्तु साधनं युञ्ज्यादाद्यन्तकविधिः क्रमात् ॥४१॥

सूर्य-चन्द्रग्रहण काल में मन्त्र का भिन्न कार्य होगा। मूल मन्त्र से साधन करनी चाहिये। क्रमशः आदि तथा अन्त की विधि युक्त करे॥४१॥

क्रमाद्वा नैव कुर्वन्ति कृतमित्यत्र साधनम्।
आमन्त्र्य तु विवर्त्तेत तन्त्रयुक्तं तु साधयेत् ॥४२॥

अथवा क्रमशः करे। यह न विचारे कि साधन किया जा रहा है। आमन्त्रण करके विवर्तन करना चाहिये। तन्त्रोक्त विधि से साधन करना उचित है॥४२॥

मन्त्रे जपे च ये लग्नास्तथा व्रतविधौ स्थिताः।
साधनं तु पुनस्तेषां यथाशास्त्रसमागमम् ॥४३॥

मन्त्र तथा जप में इस विधि से जो लग्न रहता है, यथाशास्त्र पुनः उसका साधन होता है॥४३॥

स्वल्पेऽपि साधने युञ्ज्याज्जपव्रतरतैस्तु वै।
अन्यथा हीयते मन्त्री कर्म वापि निरर्थकम् ॥४४॥

अल्प साधन में भी जप तथा व्रतपरायण होना चाहिये; अन्यथा साधक भ्रष्ट हो जाता है और उसका कर्म भी निरर्थक होता है॥४४॥

मासं साधनयोगेन जपित्वा चापि संहिताम्।
पञ्चरात्रव्रतं पश्चादसिधारं यथाक्रमम् ॥४५॥

एक मास साधन योग द्वारा संहित होकर जप करना चाहिये। पञ्चरात्र व्रत का अनुष्ठान करे। तदनन्तर यथाक्रमेण असिधार व्रत का पालन करना चाहिये॥४५॥

क्षुद्रान् रोगान् गृहांश्चापि तथा व्याधीनुपद्रवान्।
इच्छातः साधयेत् सर्वांस्तीक्ष्णव्रतरतो नरः ॥४६॥

तीव्र व्रतरत व्यक्ति क्षुद्र रोग, गृहदोष, व्याधि तथा उपद्रवों का इच्छामात्र से शमन कर सकता है॥४६॥

अष्टषष्टितमोऽध्यायः ३६१

महातपस्वी च जितेन्द्रियश्च न चान्यभक्तश्च महेश्वरादसौ । विद्यासु तत्त्वेषु महास्थितिंश्च प्राप्नोति विद्याधरमुक्तलक्ष्मीम् ॥४७॥

जो महातपस्वी, जितेन्द्रिय हैं, महेश्वर के ही भक्त हैं, वे विद्या तथा तत्त्वसमूहं की महास्थिति का तथा विद्याधरत्व का ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं॥४७॥

दशात्मकं तु तं बुद्ध्वा बीजतत्त्वन्तु कृत्स्नतः। नियोगं पदबीजानां बुद्धिसिद्धिं यथोदिताम् ॥४८॥

उसे दशात्मक जान लेने पर समग्र भाव से बीजतत्त्व तथा पदबीज में नियोग होता है। यथोदित बुद्धिसिद्धि प्राप्त होती है॥४८॥

सर्वमन्त्रात्मका देवाः सर्वदेवाः शिवात्मकाः। शिवतन्त्रपदैर्बीजैः कालकालकृपादिभिः। बुद्ध्या सम्यग्यथान्यायं सिद्धिं चाशु प्रवर्तते ॥४९॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे अष्टषष्टितमेऽध्याये सर्वसामान्यसाधनं नाम पञ्चदशं पटलम्

सभी देवगण मन्त्रात्मक हैं। सभी देवता शिवात्मक हैं। शिवोक्त तन्त्रोक्त बीज तथा काल में महादेव की कृपा से बुद्धि की सहकारिता से यथान्याय सिद्धि की शीघ्र प्राप्ति होती है॥४९॥

श्रीसाम्बपुराणान्तर्गत ज्ञानोत्तर अड़सठवें अध्याय में सर्वसामान्य-साधन नामक पन्द्रहवाँ पटल समाप्त

एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

(तत्त्वमण्डलवर्णनम्)

तत्त्वानुसारेण पथः क्रमशोऽथानुवर्ण्यते ।
शिवलोकं यथा येन प्रविशेद् गृहवद् गृही ॥१॥
तन्त्रानुसार पदों का क्रमशः वर्णन करता हूँ, जिसके द्वारा जैसे गृही घर में प्रवेश करता है, तदनुसार ही साधक शिवलोक (शिवगृह) में प्रवेश करता है॥१॥

गणमण्डलतत्त्वज्ञस्तेषु पापरतः सदा ।
अनेकशोऽभिषिक्तश्च शिववद्गुरुपूजकः ॥२॥
गणमण्डल के तत्त्व को न जानने वाला, उसमें सदा पापरत (?), अनेक बार अभिषिक्त व्यक्ति शिवतुल्य होता है॥२॥

अर्पितः शिवयोनौ च गर्भश्चाम्बिकया धृतः ।
योगेन जनितश्चैव योगात्मा योगसम्भवः ॥३॥
शिवयोनि में अर्पित होकर अम्बिका द्वारा जब गर्भ को धारण किया जाता है तभी योग द्वारा योगात्मा योगसम्भव की उत्पत्ति होती है॥३॥

जातकर्मगुणैर्युक्तः स्नानादिगतकल्मषः ।
कृतरक्षश्च धूपेन सत्यात्मा सत्यसम्भवः ॥४॥
जन्म-कर्म-गुण द्वारा युक्त होकर स्नान से पाप हटता है। धूप से रक्षित होकर सत्यात्मा सत्यसम्भव हो जाता है॥४॥

प्रसृतस्त्रिवृतान्तं च मूर्ध्न्याघ्रातः शिवात्मना ।
कर्तृवत् कृतचूड़ोऽयं मन्त्रशक्तितनुस्थितः ॥५॥
निर्गत त्रिवृत्तान्त शिवरूप में मस्तक द्वारा आघ्रात होने पर मन्त्रशक्ति का देहस्थित चूड़ाकरण होता है॥५॥

विधिना चोपनीतस्तु मुञ्जाजिनधरः शुचिः ।
देवव्रतधरो मुण्डी जटी वा भैक्ष्यभोजनः ॥६॥
विधिवत् उपवीत धारण करके, मुञ्जा, मृगचर्म धारण करके पवित्र होकर देवता का व्रत पालन करना चाहिये। मस्तक का मुण्डन करके जटाधारी होकर भिक्षालब्ध वस्तु का भोजन करना चाहिये॥६॥

एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ३६३

विधिनाऽधीतविद्यश्च सर्वज्ञो बीजवित्तमः ।
कृतात्मा कृतविद्यश्च कृतगोदानदक्षिणः ॥७॥
पाकयज्ञो हविर्यज्ञो सोमयाजी तथैव च ।
शिवमार्गानुसारि च धनवान् योगनिश्चयः ॥८॥

यथाविधि विद्याध्ययन तथा सर्वज्ञता लाभकर श्रेष्ठ बीजविद् कृतात्मा, कृतविद्य को जिन्होंने गोदान दिया है, जो पाकयज्ञ, हविर्यज्ञ तथा सोमयाग करता है, जो शिवमार्ग का अनुसरण करने वाले हैं, वे धनवान तथा योगविषय के ज्ञाता हो जाते हैं॥७-८॥

यथोक्तज्ञानकर्मस्थो गुणदोषविवर्जितः ।
नास्ति निर्माल्यदोषश्च सर्वतत्त्वेषु सिद्ध्यति ॥९॥

यथोक्त ज्ञान तथा कर्म में अवस्थित व्यक्ति गुण तथा दोष से रहित हो जाते हैं। उनको निर्माल्य दोष भी नहीं होता और वे सर्वतत्त्वों को सिद्ध कर लेते हैं॥९॥

एवंगुणविशिष्टात्मा तपस्वी द्वन्द्ववर्जितः ।
क्रोधादिभिर्वियुक्तश्च समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥१०॥

ऐसे गुणयुक्त तपस्वी द्वन्द्व-वर्जित (शीतोष्ण, सुख-दुःख रहित) क्रोधादि रहित होते हैं। वे लोष्ठ (मिट्टी), प्रस्तर तथा काञ्चन में समदृष्टि होते हैं॥१०॥

आत्मवत् सर्वभूतेषु सर्वमात्मनि पश्यति ।
प्राणायामादिभिः खिन्नस्तुत्या च पुटसंशयः ॥११॥

सभी प्राणियों को आत्मवत् देखते हैं तथा अपनी आत्मा में ही सब कुछ देख लेते हैं। प्राणायाम-प्रभृति द्वारा खिन्न होने पर भी संशयरहित हो जाते हैं॥११॥

विशुद्धाचार आचार्यों भावतः प्रणियुज्यते ।
अनेन क्रमयोगेन विशेद् देवं परं प्रभुम् ॥१२॥

विशुद्ध आचारयुक्त आचार्य भाव से (गुरुभक्ति से) युक्त हो जायें। इस क्रमयोग द्वारा प्रभु परम देवता में प्रवेश करे॥१२॥

प्रतिकर्तृ प्रतिध्यायी विधिना तत्तदात्मनः ।
ध्यायँश्च शिवमात्मस्थमाचार्य्यं चापि शेषयेत् ॥१३॥

विधिवत् तत्तदात्मा का एवं आत्मस्थ शिव का ध्यान करके आचार्य का भी ध्यान करना चाहिये॥१३॥

प्रवक्ष्यति प्रयुक्तश्च दीक्षया विमलीकृतः ।
ध्यानयुक्तः सदा गच्छेद् ध्यायिनं परमं पदम् ॥१४॥

३६४ श्रीसाम्बपुराणम्

दीक्षा से निर्मल होकर सर्वदा ध्यानयुक्त होकर ध्येय परम पद का लाभ करना चाहिये॥१४॥

चरेदुत्पन्नविज्ञानो मुक्तिव्रतमनिन्दितम्।
भूतव्रतादिसिद्ध्यर्थमेकान्ते सर्वतः क्षमी ॥१५॥

विज्ञानोत्पत्ति हो जाने पर अनिन्दित मुक्तिव्रत का आचरण करना चाहिये। सिद्धि के लिये भूतव्रताचरण करके सर्वतोभावेन धैर्यवान् होकर निर्जन में अवस्थान करना चाहिये॥१५॥

सन्त्यज्य सर्वकालात्मप्रधानहितवादिनम्।
मतानि विपरीतानि ध्यायेन्नित्यं सदाशिवम् ॥१६॥

सर्वकालात्म-प्रधान हितवादियों का तथा विपरीत मतसमूह का परित्याग करके नित्य सदाशिव का ध्यान करना चाहिये॥१६॥

निर्निमित्तं निराकारं वाग्विशुद्धं परात्परम्।
प्रमाणं विषयातीतमदृष्टान्तादिलक्षणम् ॥१७॥

वे निर्निमित्त, निराकर, विशुद्ध, परात्पर तत्त्व हैं। वे प्रमाणरूप, विषयातीत एवं दृष्टान्तरहित हैं॥१७॥

ज्योतिषां च परं धाम ज्ञानानां परमं पदम्।
तत्त्वानां परमं तत्त्वं गतीनां परमां गतिम् ॥१८॥

वे ज्योतियों के परम धाम (स्थान), ज्ञानसमूह के परमपद, तत्त्वसमूह के परमतत्त्व तथा गतियों की परमगति हैं॥१८॥

तत्त्वेन तन्तुतत्त्वं तन्तुता चैव सन्ततम्।
तेनैव तन्तुना नित्यं चिन्तयेत्तत्सुनिष्कलम् ॥१९॥

तत्त्व के द्वारा उनका तन्तुतत्त्वत्व है। ओत-प्रोतभाव से सर्वत्र उनकी सत्ता है। अतः तन्तु के द्वारा उन निष्कल सदाशिव का नित्य प्रति चिन्तन करना चाहिये॥१९॥

क्षुनिकाध्येययोगज्ञो बिन्दुनादतनुस्थितम्।
मुञ्चति क्षिप्रमात्मानं बुद्ध्वा ज्ञानमयं परम् ॥२०॥

क्षुनिका ध्येय योग (?) को जो जानते हैं, वे ज्ञानमय परमतत्त्व को जानते हैं और बिन्दु तथा नाद देहस्थ आत्मा का (देहबोध का) शीघ्र त्याग कर देते हैं॥२०॥

सतस्यास्य योगेन कालेन बहुधा नरः।
विधिना भावशुद्धेन देही बिन्दति सत्पदम् ॥२१॥

बहुधा निरन्तर अभ्यास के फल से देहधारी जीव भावशुद्ध विधान द्वारा सत्पद का लाभ करता है॥२१॥

एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ३६५

मुहूर्त्ताद्र्द्धार्द्धमात्रेण मन्त्रबीजकलादिभिः ।
दिवार्र्द्धं रविभागेन देही बिन्दति तत्क्षणात् ॥२२॥

मुहूर्त काल के आधे के आधे में मन्त्र, बीज तथा कला के द्वारा दिन के अर्द्धभाग रविभाग के द्वारा देही तत्क्षण उस सम्पत्ति को पाता है॥२२॥

प्राकृतानि च तत्त्वानि प्रकृत्या प्रकृतानि वै।
तीव्रं तत्त्वं परं सूक्ष्मं मन्त्रात्मा पञ्चविंशकम् ॥२३॥
तीव्रस्यात्मनि तत्त्वज्ञो योगवान् योगपण्डितः ।
अचिराल्लभते शान्तिं देही तत्त्वेन यो हितः ॥२४॥

तत्त्वसमूह प्राकृत हैं। प्रकृति द्वारा (तत्त्वसमूह) प्रस्तुत ये तीव्र तत्त्व परमसूक्ष्म, मन्त्रात्मा २५ हैं। आत्मा में तीव्रतत्त्व से अभिज्ञ योगयुक्त देही तत्त्वों से युक्त होकर शीघ्र शान्ति-लाभ करता है॥२३-२४॥

धारणात्ससततं योगो जपध्यानादिदीपितः ।
योजयंस्तु परं योज्यं लिलिहेत्पत्रमव्ययम् ॥२५॥

जप, ध्यानादि से दीप्त होकर निरन्तर धारणा योग से परम योज्य वस्तु में चित्त को युक्त करके अव्यय पत्र का लेहन करे॥२५॥

एवंगुणविशिष्टस्तु योजयेत्तत्त्वमण्डलम् ।
अगुणस्त्वेव योज्यः स्यान्मन्त्री विद्येश्वर्रादृते ॥२६॥
इति श्रीसाम्बपुराणे तत्त्वमण्डलवर्णनं नाम एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

ऐसा गुणयुक्त होकर तत्त्वमण्डल को युक्त करे। इससे साधक विद्येश्वर से व्यतीत (सगुण से परे) अगुण (निर्गुण) से युक्त हो जाता है॥२६॥

श्रीसाम्बपुराण में तत्त्वमण्डल-वर्णन नामक उनहत्तरवाँ अध्याय समाप्त

सप्ततितमोऽध्यायः

(बीजप्रसवः)

उक्तो जपो विधिर्विश्वो बीजं च सह कर्मभिः।
सहयोज्यं यथा बीजमिच्छते परमेश्वरः॥१॥
वक्तुमर्हस्य शेषेण भक्ताय सततं प्रभो।
एवमुक्तः प्रभुर्देवः प्राह तस्मै यथाविधि॥२॥

हे प्रभो! जप-विधि तथा समस्त कर्म के साथ बीज कहा गया है। परमेश्वर योज्य के साथ जैसे बीज की इच्छा की जाती है, वह भक्त से समग्र रूप से आप द्वारा कहना उचित है। ऐसा कहने पर सूर्यदेव ने साम्ब को यथाविधि बतलाना प्रारम्भ किया॥१-२॥

अक्षराणि दशत्रिंशद्योनिरुक्ता मया पुरा।
सर्वं वै चोच्यते तस्माद्यथाबीजं प्रसूयते॥३॥

दस अक्षर तथा ३० योनि की बात मैंने पहले बतलायी है। उसमें सब कुछ कह दिया गया है कि बीज कैसे उत्पन्न होता है॥३॥

त्रीणि चत्वारि च द्वे च त्रीणि पञ्च चतुष्टयम्।
त्रीणि चत्वारि द्वे त्रीणि पञ्च चैव चतुश्रुतुः॥४॥
तद्द्विकेन समायुक्तो योनिरेषा हि विश्वभुक्।
संपृक्तैषा प्रसूयेत अक्षरेण दशात्मकम्॥५॥

३, ४, २, ३, ५ तथा ४, ३, ४, २, ३, ५ एवं १६। दो के द्वारा युक्त होने पर योनि विश्वभुक् होती है। यह मिलित होकर अक्षर के साथ दशात्मक प्रसव करती है॥४-५॥

व्यञ्जनानि स्वरश्चैव परमेष्ठ्यादयस्तथा।
भूताधिपतयश्चैव तेभ्यो ज्योतिः परं ततः॥६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे बीजप्रसवे सप्ततितमोऽध्यायः

व्यञ्जनसमूह एवं स्वर का, ऐसे ही परमेष्ठि प्रभृति, भूताधिपति गण का तदनन्तर उससे परम ज्योति का प्रकाश होता है॥६॥

श्रीसाम्बपुराण में बीजप्रसव नामक सत्तरवाँ अध्याय समाप्त

एकसप्ततितमोऽध्यायः

(बीजप्रसवः)

कृष्णचक्रसमा कालमाग्नीष्टकसमायुतम्।
बीजानां परमं बीजं शङ्करं परमेश्वरम् ॥१॥
भिन्नं च मार्गमूलेषु विन्यस्तं च सबिन्दुकम्।
शरीरं देवदेवस्य अक्षरं बीजनिःसृतम् ॥२॥

कृष्णचक्र सदा अग्नीष्टक समायुक्त है। बीजसमूह के परम बीज परमेश्वर शङ्कर हैं। सभी मार्गमूल भिन्न हैं। वे बिन्दु के साथ विन्यस्त है। देव-देवीगण का शरीर बीज से उत्पन्न होता है॥१-२॥

धृतं परं स या भक्त्या प्रणवाद्यच्च संहतम्।
भिन्नं चतुर्भिर्वर्णैश्च सदृशश्चात्मनस्तथा ॥३॥

परम धृत भक्ति द्वारा प्रणव से जो संहत है, वह चारो से भिन्न हैं(?)। ऐसे ही वर्णसमूह आत्मा के सदृश हैं॥३॥

अकाराद्यं त्रिकं पूर्वे सुकारात्पूर्वदक्षिणे।
सम्यग्विज्ञाय मेधावी स्थापयेच्चतुरक्षकम् ॥४॥

अकारादि तीन पूर्व में तथा सुकार के पूर्व दक्षिण में है। मेधावी इसे सम्यक्रूपेण जानकर चतुरक्षर की स्थापना करते हैं॥४॥

पश्चिमे तु तकाराद्यं पदयोन्यां तु तत्त्ववित्।
हृदक्षरं पदविन्मन्त्री विन्यसेद् भूतये शुभम् ॥५॥

पश्चिम में तकाराद्य अक्षर है, इसे अयोनि में तत्त्वविद् स्थापित करते हैं। परसमूह का ज्ञाता मन्त्री मंगल-हेतु शुभ अक्षर का विन्यास करता है॥५॥

चकाराद्यन्तरे मार्गे पदमक्षरसंज्ञितम्।
आत्मप्रसूतिं प्राणांश्च विन्यसेत्तत्त्वविद् भुवि ॥६॥

चकारादि के मध्य में अक्षरसंज्ञक पद है। आत्मप्रसूति तथा प्राणसमूह का विन्यास तत्त्वज्ञाता पृथिवी में करता है॥६॥

पकारादि यकारान्ता पञ्चिका शक्तिसंज्ञिता।
शिवधात्री स्थिता मध्यं व्याप्य विश्वं जगत्पतिम् ॥७॥

३६८ | श्रीसाम्बपुराणम्

पकारादि चकारान्त पञ्जिका शक्ति है। शिवधात्री (शिव को धारण करने वाली) विश्व के तथा जगत्पति के मध्य में स्थित रहती है॥७॥

विशिष्टानि ततोऽन्यस्य बिन्दुना भूपतिः क्रमात्।
द्वे द्वे यथा पतत्वं वै चैशान्यां दिशि दक्षिणे ॥८॥

भूपतिक्रम से विन्दु द्वारा विशिष्ट समूह का विन्यास करके ईशान तथा दक्षिण में २-२ करके पातित करे॥८॥

अकारेकारभूताद्या रेफाद्याश्च ततः परम्।
एकाराद्ये तथा द्वे च शन्तर्योत्तरवर्मिकाः ॥९॥

इति श्रीसाम्बपुराणे बीजप्रसवे एकसप्ततितमोऽध्यायः

अकार, ईकार, भूतादि का, तदनन्तर रेफादि एवं एकाराद्य दो शन्तर्योत्तर (?) वर्म होगा॥९॥

श्रीसाम्बपुराण में बीजप्रसव नामक इकहत्तरवाँ अध्याय समाप्त

द्वितीयं नैर्ऋते स्थाप्यः तृतीयो वायुदैवते।

द्विसप्ततितमोऽध्यायः

(वर्णनाशविधिः)

वर्णनाशविधिस्तु स्याद्व्यञ्जनानि यथाक्रमम्।
सिद्धये सर्वरूपाणां प्रथमः पूर्वदक्षिणे ॥१॥
द्वितीयं नैर्ऋते स्थाप्यः तृतीयो वायुदैवते।
चतुर्थः सर्वदैवत्ये विन्यासं शृण्वतः परम् ॥२॥

वर्णनाश-विधि कहते हैं। यथाक्रमेण व्यञ्जन वर्णों को शब्दरूप की सिद्धि के विषय में पहले पूर्व दक्षिण में, द्वितीय नैर्ऋत में, तृतीय वायुदैवत में, चतुर्थ सर्वदैवत में श्रेष्ठ विन्यास होगा। अब आगे सुनो॥१-२॥

अन्तस्थाः प्रथमं च स्याद्विन्यस्य दक्षिणे तथा।
शेषास्तथा शकाराद्या विन्यस्य पश्चिमां दिशम् ॥३॥

अन्तःस्थ वर्णों को प्रथमतः तथा वैसे ही दक्षिण में विन्यास करे। अन्त में अवशिष्ट शकारादि का पश्चिम दिशा में विन्यास करे॥३॥

उत्तरस्यां च सन्न्यस्याश्चत्वारो मुखनासिकाः।
परतश्च सुरास्तेभ्यो बहिःस्थानं यथाक्रमम् ॥४॥

उत्तर में ष, स नासिकोद्भव, ४ मुख-नासिका, तत्पश्चात् देवगण को यथाक्रम से उनके बाहर स्थान प्रदत्त करे॥४॥

पूर्वेण तु समान्यस्य ह्रस्वदीर्घप्लुतास्त्रयः।
उत्तरेण त्रयस्त्वन्ये तदेवं द्वादशैव तु ॥५॥

पूर्व से ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत—ये तीन, उत्तर में अन्य तीन, सब १२ होंगे॥५॥

ऐकारो नैर्ऋते स्थाप्य उत्तरे वायुदैवतम्।
चक्रमेतद्धि शक्तिस्थं बीजं वै शब्दतां वरम् ॥६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे वर्णनाशविधिर्नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः

नैर्ऋत्य कोण में ऐकार को स्थापित करे। उत्तर में वायु दैवत को स्थापित करे। यह बीजशक्तिस्थ चक्र शब्दों में श्रेष्ठ हैं॥६॥

श्रीसाम्बपुराण-ज्ञानोत्तर में वर्णनाश-विधि नामक बहत्तरवाँ अध्याय समाप्त

त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

(बीजप्रसवः)

आद्यन्तं प्रणवं ज्ञेयं योनिबीजं पुनः पुनः।
न्यसेत् पञ्चाक्षरं भूमौ फलार्थी परमेष्ठिनम् ॥१॥
न्यसेदष्टाक्षरं तस्य बीजमादौ सबिन्दुकम्।
शेषाः स्युः प्रणवाद्यन्ताः परस्यां दिशि कारणम् ॥२॥

आदि तथा अन्त में प्रणव को जाने, बारम्बार योनिबीज का विन्यास करे। फलार्थी भूमि में परमेष्ठी रूप पञ्चाक्षर का विन्यास करे। अष्टाक्षर विन्यास करे। उसका बीज आदि में बिन्दुयुक्त होगा। शेष के आदि तथा अन्त में प्रणवयुक्त रहेगा। यह है—पश्चिम का कारण॥१-२॥

दक्षिणस्यां परो देवः परस्यां स्यात् सबिन्दुकः ।
ईशान्यादौ सबिन्दुः स्यात्तदन्यानि तु पूर्ववत् ॥३॥
न चाक्षरः परस्यां स्यात् सबिन्दूकारपूर्वकः ।
अष्टौ क्रिया यदन्यानि भूतात्मा नामतस्तु सः ॥४॥

दक्षिण दिशा में परमदेवता हैं। यह बिन्दुयुक्त होंगे। इनके आदि में बिन्दु होगा, अन्य पूर्ववत् होगा। परयोनि में बिन्दु तथा उकारयुक्त कोई अक्षर नहीं होगा। अन्य जो आठ क्रिया है, वह भूतात्मा है॥३-४॥

व्योमाद्यन्तं परो देवो विरामे प्रणवस्ततः ।
अक्षराणि च विज्ञेया बीजयोनिस्तु यादृशी ॥५॥

व्योमाद्यन्त परमदेवता है। तदनन्तर विराम में प्रणव है। जैसा योनिबीज होगा, वैसे ही अक्षर होंगे॥५॥

सुप्रणवादि च भवेद् व्यापिने मध्यतो भवेत् ।
प्रासूत्याख्यो यदा देवः वर्णा दश च सप्त च ॥६॥

आदि में प्रणव होगा। व्याप्ति होने पर मध्य में होगा। प्रसूति नामक देवता १० तथा ७ (अर्थात् १७) वर्णयुक्त होगा॥६॥

ओंकारावभितो यस्य व्योममध्ये ततः परः।
विन्यस्य सृष्टिसंज्ञोऽथ देवः पञ्चदशाक्षरः ॥७॥

त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ३७१

एषामादिपदैर्न्यस्य देवः सदसदात्मकः।
ऐशान्यां दशको धाता सृष्टिसंहारसंज्ञितः॥८॥

इति श्रीसाम्बपुराणे बीजप्रसवे त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

जिसके ऊपर की ओर २ ओंकार, व्योम मध्य में परयोनि हो। यह सृष्टि नामक पञ्चदशाक्षर देवता है। इनके आदि पद के द्वारा सत् तथा असत् रूप देवता का विन्यास करे। ईशान में १० सृष्टि-संहार नामक धाता रहते हैं॥७-८॥

श्रीसाम्बपुराण में तिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त

चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

(बीजप्रसवः)

उत्तरा योनयस्तेषां मन्त्रास्ताभ्यो विनिःसृताः।
अष्टाक्षरा तु भूत्यन्ते व्योमादि प्रथमा हि सा॥१॥
शिवयोनिः।

उत्तर में योनि, उनका मन्त्र उससे ही विनिःसृत हुआ है। अष्टाक्षरयुक्त (मन्त्र) भूति के अन्त में है। व्योमादि तथा वह प्रथमा है। इसे शिवयोनि कहते हैं॥१॥

ॐकारादि हकारान्ता अक्षराः परमाः पराः।
मुक्तये विहिता पुण्या योनिः शब्दवतां मता॥२॥
परयोनिः।

जिसके आदि में ॐ है, अन्त में ‘ह’ है, वह श्रेष्ठ परयोनि है। मुक्ति के लिये यह पुण्य योनि विहित है। यह शब्दविद् गण को ईप्सित है। यह पर योनि है॥२॥

दिशि कारणयोनिः स्याद् द्वन्द्ववाहो ह्यनन्तरम्।
सबिंद्वाकारपूर्वा सा भूत्यन्ताश्चतुरक्षराः॥३॥
कारणयोनिः।

दिक् में कारण योनि होती है। तदनन्तर द्वन्द्व वहनकारी गण हैं। वह बिन्दु के साथ आकार के पूर्व हैं तथा भूत्यन्त चतुरक्षरात्मक है। यह कारणयोनि है॥३॥

क्रियाशक्तिस्तथान्यस्य पञ्चवर्णैयमात्मनः।
इकारादिस्तकारान्ता भूतये त्रिगुणस्य तु॥४॥
क्रियायोनिः।

क्रियाशक्ति आत्मा की पञ्चवर्णात्मिका है। इकारादि तकारान्त त्रिगुण के मंगलार्थ है। यह क्रिया योनि है॥४॥

वारुणाभ्यां भूतयोनिः स्यादुकारादिषडक्षरम्।
भकारान्ता च सा ज्ञेया भुवनस्य वनस्य तु॥५॥
भूतयोनिः।

वारुणद्वय से भूतयोनि होती है। वह उकारादि अक्षरद्वययुक्त है तथा मकारान्त है। इसे भुवनत्रय के पालनार्थ जानना चाहिये। यही है—भूतयोनि॥५॥

चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ३७३

सप्ताक्षरपरा चास्याः भूतयोनेरनन्तरम्।
व्योमादिवायुदेवान्ता वायव्या बीजयोनिका ॥६॥
बीजयोनिः।

इस भूतयोनि के पश्चात् सप्ताक्षर-विशिष्ट, जिसके आदि में व्योम है तथा अन्त में वायुदेव है, वह वायव्या बीजयोनि है। यही है—बीजयोनि॥६॥

वकारादिमकारान्ता मध्ये व्योमसमीरणात्।
सृष्टियोनिः परा द्वे च दश चैकाक्षराणि तु ॥७॥
सृष्टियोनिः।

वकार जिसके आदि में है, अन्त में मकार है, मध्य में व्योम तथा वायु है, जिससे सृष्टि योनि उत्पन्न होती है। यह १३ अक्षरों से युक्त है। यह है—सृष्टि योनि॥७॥

संहारो द्वादशास्यां ते प्रणवाद्यन्तदीपितः।
सर्वस्य वाङ्मयस्यैष संहर्त्ता केवलः प्रभुः ॥८॥
संहारयोनिः।

द्वादश से संहार होता है। उसका आदि एवं अन्त प्रणव से दीपित है। यही है—संहार योनि॥८॥

क्षणपूर्णाविथोङ्कारौ द्वारपालौ तु बाह्यतः।
कुम्भाकृतिरुदग्द्वारं धृतं भूतैश्च सर्वतः ॥९॥
योनयः पार्थिवान्यस्थास्तन्त्रस्य त्रयमादितः।
पृथ्वी यः पूरयेत् सप्त विभक्तेः प्रणवाष्टकः ॥१०॥
पार्थिवयोनिः।

क्षणपूर्ण दो ओंकार हैं। बाहर वे द्वारपाल हैं। कुम्भाकृति, जलपूर्ण द्वारयुक्त धृतरूप है। वह सभी ओर से प्राणीगण से वेष्टित है। उसकी सभी योनि है—पार्थिव योनि। यह तन्त्र के आदि से ही तीन है। जो पृथिवीरूपा है, जो सप्तविंशति पूर्ण करती है तथा आठ प्रणवयुक्ता है। यह है—पार्थिव योनि॥९-१०॥

अक्षराणां च योनिः स्यादादिवर्णा यथाक्रमात्।
सर्वत्र बीजनं कार्यं बीजिनां प्रणवेन हि ॥११॥
अपां योनिः।

जो अक्षरसमूह की योनि है, यथाक्रमेण आदिवर्ण बीजधारी गण का प्रणव द्वारा सर्वत्र बीजन ही इसका कार्य है। यह है—जलयोनि॥११॥

३७४ श्रीसाम्बपुराणम्

योनिस्तु तेजसोऽम्भः स्याद् भूतये सर्वदेहिनाम्।
कादयस्त्वग्निवर्णानां प्रभवाय महात्मनाम्॥१२॥
योनिराग्नेयी।

सभी देहधारीगण के मंगलार्थ तेज की जलरूप (आग्नेयी) योनि है। कादि, अग्निवर्णा है तथा महात्मा गण की सृष्टि के लिये यह योनि है। यह है—आग्नेयी योनि॥१२॥

आकाशादिः गुणाकाराः शब्दाश्च बीजयोनयः।
सृष्टये शब्दरूपाणां कालादिवरताविधिः ॥१३॥
आकाशात्मिकायोनिः।

आकाश गुणयुक्त शब्दसमूह बीजयोनिसमूह शब्दरूप की सृष्टि के लिये कालादि श्रेष्ठ विधि है। यह है—आकाशात्मिका योनि॥१३॥

भूतानां परमां योनिं भकारादि तथा परा।
वाङ्मयस्य च सिद्ध्यर्थं भूतयोनिं विधापयेत् ॥१४॥
भूतसंहारयोनिः।

प्राणिसमूह की परमयोनि तकारादि अपरा है। वाङ्मय की सिद्धि हेतु भूतयोनि का प्रयोग करना चाहिये। यह है—भूतसंहार योनि॥१४॥

द्वादशे ते तु विन्यस्य चत्वारो यमसंज्ञकाः।
विषमं परमं देवं य एवं ध्येयमीश्वरम् ॥१५॥
नपुंसकयोनिः।

द्वारदेश में चार यमसंज्ञक का स्थापन करे तथा इस प्रकार विषम परमदेवता ईश्वर का ध्यान करे। यह है—नपुंसक योनि॥१५॥

विश्वयोनिरतोऽन्यस्याः सर्वज्ञा विश्वसृक्पराः।
द्वारपालनमस्कारवर्णा उक्ता ससंज्ञिता ॥१६॥
नमो नमो भवेन् मध्ये तत्त्वस्य प्रणवस्य तु।
एवं दीपितमेतत्तु विश्वसृग् भूतये मतम् ॥१७॥
विश्वयोनिः।

विश्वयोनि है अपर की स्रष्टा। सर्वज्ञ, विश्व सृजन-परायण। नाम के साथ द्वारपाल नमस्कार वर्णसमूह कहे गये हैं। प्रणव तत्त्व के मध्य में नमः नमः शब्द रहता है। इस प्रकार से दीपित होकर विश्वसृष्टि के मंगलार्थ पूजित होती है। यह है विश्वयोनि॥१६-१७॥

चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ३७५

परमं कारणं चैव क्रियाभूतात्मना सह।
बीजयोनिश्च सृष्टिश्च संहारश्चाष्टमः पुनः॥१८॥

बीजयोनि परम कारण है तथा भूतात्मा के साथ क्रियारूप, सृष्टिरूप और अष्टम संहार, रूप है॥१८॥

विधानं देवदेवस्य मनसाप्यथ कीर्त्तयेत्।
प्रविशेत् परमं देवं विमुक्तः सर्वबन्धनैः ॥१९॥

देवदेव (सूर्यदेव) के विधान का मन ही मन स्मरण रखना चाहिये। इससे समस्त बन्धनों से मुक्ति मिलती है तथा परमदेव की प्राप्ति होती है॥१९॥

एवमेव सदा देवः कृत्स्नस्य जगतो गुरुः।
पूज्यो ध्येयस्तथेज्यश्च विद्वद्भिः परमार्थकः॥२०॥

इति श्रीसाम्बपुराणे बीजप्रसवो नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

इस प्रकार से सूर्यदेव सर्वदा समस्त जगत् के गुरु हैं। वे विद्वद् गण द्वारा यथार्थतः पूज्य हैं। ध्येय तथा स्तुत हुये हैं॥२०॥

श्रीसाम्बपुराण में बीजप्रसव नामक चौहत्तरवाँ अध्याय समाप्त

पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

(बीजप्रसवः)

उक्तं तद्योनिबीजं च साङ्कुरं प्रसवं महत्।
तत्पुण्यफलदं मह्यं मुक्तिदं सर्वदेहिनाम्॥१॥

यह योनिबीज की कथा अंकुर तथा महत् की उत्पत्ति के साथ कही गयी, जो हमारे लिये पुण्यप्रद तथा फलप्रद है एवं सभी देहधारियों को मुक्ति देने वाली है॥१॥

पूर्वस्यां संशयश्चैवं दीप्तायामुच्यतां पुनः।
तं विधिं संशयं देव भक्तः स्यामहम्भास्करेः॥२॥

पूर्व में जो संशय था, दीप्त सूर्य के सम्बन्ध में उस संशय को दूर करिये। हे देव! वह विधि कहिये, जिससे मैं दुर्लभ भक्त हो जाऊँ॥२॥

श्रुत्वा विज्ञापनं तस्मै प्रोवाच विधिवत् प्रभुः।
समयादि यथातत्त्वं दीक्षां सम्यक्चतुर्विधाम्॥३॥
परीक्षिताय भक्ताय सुश्रूषणरताय च।
तपस्विने विनीताय क्रोधादिरहिताय च॥४॥

उनका निवेदन सुनकर प्रभु सूर्यदेव ने यथाविधि समयादि यथार्थ तत्त्व एवं सम्यक् चतुर्विध दीक्षा की बातें कहीं; क्योंकि साम्ब परीक्षित भक्त थे, वे शुश्रूषा में रत, तपस्वी, विनीति तथा क्रोधादि से रहित थे॥३-४॥

पूजयित्वाथ देवेशं प्रागुक्तेन विधानतः।
आवाहयत्ततस्तस्मिन् भूतयोनिदशात्मिकाम्॥५॥

सूर्यदेव कहते हैं—पूर्वोक्त विधान के अनुसार देवाधिपति सूर्यदेव की पूजा करे। उनमें दशात्मिका भूतयोनि का आवाहन करे॥५॥

दृष्ट्वा च सर्वभूतैश्च श्मशाने सकलीकृतम्।
सप्तकृत्वोऽथ संपात्य दर्भपुञ्जे स्थितस्ततः॥६॥
अन्यत्र स्थापितं शिष्यमाज्याद्यैश्च सुपूजितम्।
पावयेत्तत्तिरूर्ध्वं वै नार्यैः पिङ्गलकैरघः॥७॥
आहुतीर्जुहुयाद्भूतैः सर्वैरिव यथाक्रमम्।
सम्पातान् पातयेच्छिष्यो मुक्तदोषस्तथा भवेत्॥८॥

पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ३७७

श्मशान में सर्वभूतों द्वारा सकलीकृत देखे। दर्भपुञ्ज (कुश आदि के गुच्छे के ऊपर) ७ भाग में स्थापित करे। वहाँ से अन्यत्र स्थापित घृतादि से पूजित शिष्य को तीन बार पवित्र कराये। नाभि के ऊपर तथा पञ्जर के नीचे यथाक्रमेण सभी प्राणियों के लिये आहुति देनी चाहिये। शिष्य में सम्पात पातन करे। इससे वह दोषरहित हो जाता है॥६-८॥

सकलीकृत्य पश्चाच्च यजेच्चापि पुनः शुचिः।
संस्थाप्य दक्षिणेनाग्नेर्भूतैर्हुत्वा च किल्विषम्॥९॥
भस्ममुष्टिं ततस्तस्मिन् दद्यादादाय पावकम्।
एवं समयिनस्तस्य भवेत् संस्कारयोग्यता॥१०॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे बीजप्रसवे पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

सब एकत्र करके पवित्र होकर पुनः यजन करना चाहिये। अग्नि को दक्षिण में स्थापित करके भूत द्वारा पापों की आहुति देकर उसमें भस्ममुष्टि छोड़कर अग्नि ग्रहण करे। ऐसे नियमपालक में संस्कार-योग्यता होती है॥९-१०॥

श्रीसाम्बपुराण ज्ञानोत्तर में बीजप्रसव नामक पचहत्तरवाँ अध्याय समाप्त