सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
८. रसेश्वर दर्शन (पारद रसविद्या व देहमुक्ति)
( १६६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ शैव- लवज्ज्ञेयस्ताम्राश्रितकालिमावद्वा ॥ " इति । बलं रोधशक्तिः अस्या शिवशक्ते पाशाधिष्ठानेन पुरुषतिरोधायकत्वादुपचारेण पाशत्वम् । तदुक्तम्- "तासामह वरा शक्तिः सर्वानुग्राहिका शिवा । धर्मानुवर्त्तनादेव पाश इत्युपचर्य्यते ॥ " इति ॥ क्रियते फलार्थिभिरित कर्म धर्माधर्मात्मकं बीजाङ्कुरवत्प्रवाहरूपे- णानादि यथोक्तं श्रीमत्किरणे-"यथानादिर्मलस्तस्य कर्माप्यक- मनादिकम् । यद्यनादिरसंस्सिद्धं वैचित्र्यं केन हेतुना ॥ " इति । यात्यस्यां शक्त्यात्मना प्रलये सर्वं जगत् सृष्टौ व्यक्तं यतीति माया । यथोक्तं श्रीमत्सौरभेये-"शक्तिरूपेण कार्याणि तल्लीनानि महाक्षये । विकृतौ व्यक्तिमायाति सा कार्येण कला- दिना ॥" इति । यद्यप्यत्र बहु वक्तव्यमस्ति तथापि ग्रन्थभू- यस्त्वभयादुपरम्यते । तदित्थं पतिपशुपाशपदार्थास्त्रय- प्रदर्शिताः । "पतिविद्ये तथाविद्या पशुः पाशश्च कारणम् । तन्निवृत्ताविति प्रोक्ता पदार्था षट् समासतः ॥ " इत्यादिना प्रकारान्तरं ज्ञानरत्नावल्यादौ प्रसिद्धम् । सर्वं तत एवावगन्तव्य- मिति सर्वं समञ्जसम् ॥ २२ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे शैवदर्शनं समाप्तम् ॥ ७ ॥ मृगेन्द्रनेभी कहा है आच्छादनात्मक मल स्वतन्त्रताभिमानी, बल, कर्म, माया और चतुर्विध कार्य्यरूप पाशजालको संक्षेपत धर्मशब्दसे कहा है इसके अर्थको ग्रंथकारने स्वयं वर्णन करते हैं आत्माकी ज्ञान क्रियाको प्रकृष्टरूपसे जो आच्छादन करे सा प्रकृति अर्थात स्वाभाविक अशुचि मल है उसका स्वातन्त्र्याभिमानी प्रावृतीश है । कहाभी हे-जिस प्रकार भूसी तण्डुलको आच्छादन करती है जिस प्रकार ताँबेके पात्रको कालिमा आच्छादन करती है तिसी प्रकार एक मल पुरुषोंके अनेक शक्तिका ज्ञान और क्रियाका आच्छादक होता है निरोधशक्तिका नाम बल है यह पाशस- म्बद्ध होकर पुरुषकी तिरोधानकर्त्री होनेसे लक्षणया पाश कहाती है उक्त शक्तियोम में सबा पर अनुग्रह करनेवाली श्रेष्ठ शिवशक्ति ? । धर्ममें सम्वट
⁻दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १६७ ) होनेसे पाशशब्द औपचारिक है फल चाहनेवाले जो करते हैं वह कर्म्म है वह धर्मा- धर्मात्मक द्विविध प्रवाहरूपसे अनादि है जिस प्रकार मल अनादि है उसी प्रकार उसका कर्मभी अनादि है यदि कर्म अनादि न होता तो जगत्का वैचित्र्य कैसे होता ? प्रलयकालमें सम्पूर्ण जगत् शक्तिसहित जिसमें लीन हो और सृष्टिके समय जिसमें व्यक्त हो वह माया है अतएव सौग्भ्येमे कहा है कि महाक्षय ( प्रलय ) में शक्तिके साथ कार्यलीन और विकृति ( सृष्टि ) में कलादि कार्यरूपसे व्यक्त होते हैं यद्यपि इस विषयमें बहुत कहना है तथापि ग्रन्थविस्तर भीतिसे छोडे देता हूँ । पतिशब्दार्थ विद्या अविद्या इस प्रकार पति पशु और पाशरूप पदार्थ त्रयका दिग्दर्शन किया । पति, विद्या, अविद्या, पशु, पाश और पाशनिवृत्तिका कारण संक्षेपसे ये ६ पदार्थ निरूपण किये हैं । ये सब ज्ञानरत्नाल्ल्यादिमें प्रसिद्ध है । अत उससे जान लेना इति सर्वदर्शनसंग्रहे शैवदर्शन समाप्त । अथ प्रत्यभिज्ञादर्शनम् ॥ ८ ॥ अत्रापेक्षाविहीनाना जडाना कारणत्वं दुष्यतीत्यपरितुष्यन्तो मतान्तरमन्विष्यन्तः परमेश्वरेच्छावशादेव जगन्निर्माणं परि- घुष्यन्तः स्वसंवेदनोपपत्त्यागमसिद्धप्रत्यगात्मतादात्म्ये नानावि- धमानमेयादिभेदाभेदशालिपरमेश्वरोऽनन्यमुखप्रेक्षित्त्वलक्षणस्वा- तन्त्र्यभाक् स्वात्मदर्पणे भावान् प्रतिबिम्बवदभासयदििति भण- न्तो वाह्याभ्यन्तरचर्य्याप्राणायामादिक्लेशप्रयासकलावैधुर्य्येण सर्वसुलभमभिनवं प्रत्यभिज्ञामात्रं परापरसिद्धयुपायमभ्युपग- च्छन्तः परे माहेश्वरा प्रत्यभिज्ञाशास्त्रमभ्यस्यन्ति ॥ १ ॥ निरपेक्ष जडका कारणत्व असम्भव है इत्यादि वादमें धमन्तोप प्रकट करके मतान्तर स्थापनेच्छासे ईश्वरकी इच्छावश जगतकी सृष्टि होती है इस प्रकार उद्घोष करते हुए आत्मसंवेदन युक्ति और शास्त्र बलसे सिद्ध जो प्रत्यगात्माका जभेद उसमें अनेक विध प्रमाण प्रमेयादिके साथ भिन्नाभिन्नरूप परमेश्वर अन्यके अनपेक्षरूप स्वातन्त्र्ययुक्त आत्मरूपी दर्पणपे प्रतिबिम्बके समान भासित होते हैं इस प्रकार कहते हुए बाह्य चर्या ( सेवा ) आन्तर प्राणायामादिक्लेशके बिना ही सबको सुलभ
( १६८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ पत्यभिज्ञा- धर्माथ काम मोक्ष सिद्धिके उपाय अभिनव प्रत्यभिज्ञामात्र माननेवाले कोई माहेश्वर लोग प्रत्यभिज्ञाशास्त्रका वर्णन करते हैं ॥ १ ॥ तस्येयत्तापि न्यरूपि परीक्षकैः "सूत्रं वृत्तिर्विवृतिर्लघवो बृहती त्युभे विमर्शिन्त्या । प्रकरणविवरणपञ्चकमिति शास्त्रं प्रत्य- भिज्ञाया ॥” ॥ २ ॥ उन्होंने उस प्रत्यभिज्ञाशास्त्रका परिमाणभी दिखाया है । सूत्र वृत्ति विवृति प्रकरण, विवरण पञ्चक इतनाही प्रत्यभिज्ञाशास्त्रहै ॥ २ ॥ तत्रेद् प्रथमं सूत्रम्--"कथञ्चिदासाद्य महेश्वरस्य दास्यं जन- स्याप्युपकारमिच्छन् । समस्तसम्पत्समवाप्तिहेतुं तत्प्रत्यभि ज्ञामुपपादयामि” इति ॥ ३ ॥ उसमें प्रथमसूत्र (कथञ्चिदित्यादि) किसी प्रकार महेश्वरके दासत्वको प्राप्त कर लोककाभी उपकार करनेकी इच्छा करता हुआ (मैं) संपूर्ण संपत्तियोंकी प्राप्तिके हेतु- भूत प्रत्यभिज्ञादर्शनका प्रतिपादन करता हूं। (यह इस श्लोकका शब्दार्थ है) इसका विस्तृत अर्थ मूलहीमें करते हैं ॥ ३ ॥ कथञ्चिदिति परमेश्वराभिन्नगुरुचरणारविन्दयुगलसमाराधनेन परमेश्वरघटितेनैवेत्यर्थः। आसाद्येति आ समन्तात् परिपूर्णतया सादयित्वा स्वात्मोपभोग्यतां निरर्गलां गमयित्वा तदनेन विदितवेद्यत्वेन परार्थशास्त्रकरणेऽधिकारो दर्शित अन्यथा प्रतारणमेव प्रसज्येत ॥ ४ ॥ (कथञ्चित्) परमेश्वरस्वरूप गुरुचरणारविन्द शुश्रूषासे किंवा परमेश्वराराधनसे (आसाद्य) परिपूर्णरूपसे निर्विघ्न आत्मोपभोग्यताको प्राप्त करकेइन दोनों पदोंसे सर्वज्ञको परार्थके लिये शास्त्र निर्माणमें हेतु कहा गया अन्यथा वञ्चना हो जाती ॥ ४ ॥ मायोत्तीर्णा अपि महामायाधिकृता विष्णुविरिञ्चाद्या यदीये- श्वर्य्यलेशेनेश्वरीभूता सभगवाननवच्छिन्नप्रकाशानन्दस्वात- न्त्र्यपरमार्थो महेश्वरः। तस्य दास्यं दीयतेऽस्मै स्वामिना सर्व
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १६९ ) यथाभिलषितमिति दास परमेश्वरस्वरूपस्वातन्त्र्यपात्रमित्यर्थः । जनशब्देनाधिकारिविषयनियमाभाव प्रादर्शि । यस्य यस्य हीदं स्वरूपकथनं तस्य तस्य महाफलं भवति प्रधानस्यैव परमार्थफलत्वात् ॥ ५ ॥ ईश्वरस्य–मायासे परे होनेपरभी महामायाके अधिष्ठानभूत ब्रह्म विष्णु आदि जिनके ऐश्वर्यलेशसे ईश्वर हो गये हैं वही अनवच्छिन्न (अप्रतिहत) प्रकाश आनन्द स्वातन्त्र्ययुक्त भगवान् महेश्वर हैं उनके दास्य अर्थात् स्वामी अभिलषित सम्पूर्ण वस्तु जिसके लिये दे वह परमेश्वरस्वरूपका स्वातन्त्र्यपात्र दास है । जन इस पदसे अधिकारीविशेषका अनियम दिखाया जिन २का यह स्वरूपकथन हो उन सबको महा- फलहोता है प्रधानकोही परमार्थ फल होता है ॥ ५ ॥ तथोपदिष्टं शिवदृष्टौ परमगुरुभिर्भगवत्सोमानन्दनाथपादैः– एकवारं प्रमाणेन शास्त्राद्वा गुरुवाक्यतः । ज्ञाते शिवत्वे सर्व- स्थे प्रतिपत्त्या दृढात्मना ॥ करणेन नास्ति कृत्यं कापि भावन- या सकृत् । ज्ञाते सुवर्णे करणं भावनां वा परित्यजेत्॥” इति॥ अपिशब्देन स्वात्मनस्तदभिन्नतामाविष्कुर्वता पूर्णत्वेन स्वा- त्मनि परार्थसम्पत्त्यतिरिक्तप्रयोजनान्तरावकाशश्च पराकृतः । परार्थश्च प्रयोजनं भवत्येव तल्लक्षणयोगात् न ह्ययं देवशाप- स्वार्थ एव प्रयोजनं न परार्थ इति । अत एवोक्तमक्षपादेन– ‘यमर्थमधिकृत्य प्रवर्त्तते तत् प्रयोजनम् ’ इति ॥ ६ ॥ शिवदृष्टिमे सोमानन्दनाथने वैसाही उपदेश किया है–एक बार प्रमाण(प्रत्यक्षादि) शास्त्रद्वारा अथवा गुरुवाक्यसे अथवा दृढ युक्तियोंसे सर्वभावस्थ शिवत्वज्ञान होनेपर पुनः साधनोंका और भावनाका प्रयोजन नहीं है सुवर्णवर्णवस्तुका यथार्थ ज्ञान होनेपर उसके साधन कसौटी आदिको त्याग दिया जाता है । अपिशब्दसे अपनी आत्माको शिवके साथ अभेद प्रतिपादन होनेसे पूर्णतया स्वात्मामें परार्थसम्पत्तिसे अतिरिक्त प्रयोजनान्तरके प्रसंगका निषेध किया । प्रयोजन लक्षणसमन्वित होनेसे परार्थ प्रयोजन होताही है प्रयोजन स्वार्थही होता है परार्थ नहीं ऐसा कोई देवताका
( १७० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ प्रत्यभिज्ञा- ज्ञापमी नहीं है । अतएव अक्षपादने कहा है कि 'जिस उद्देश्यसे प्रवृत्त हो वही फल है ॥ ६ ॥ उपशब्द सामीप्यार्थ । तेन जनस्य परमेश्वरसमीपताकरण- मात्रं फलम् । अतएवाह समस्तेति, परमेश्वरतालाभे हि सर्वा सम्पदस्तन्निष्यन्दमय्य सम्पन्ना एव रोहणाचललाभे रत्नसम्पद् इव। एव परमेश्वरतालाभे किमन्यत् प्रार्थनीयम् । तदुक्तमुत्पला चार्यैः-“भक्तिलक्ष्मीसमृद्धाना किमन्यदुपयाचितम् । एनया वा दरिद्राणां किमन्यदपयाचितम् ॥ ” इति ॥ ७ ॥ उपशब्द सामीप्यार्थक है इससे परमेश्वरकी समीपताकरणमात्रही फल सूचित किया । अतएव कहा है कि (समस्तसपत्समवाप्ति इति ) जिस प्रकार रोहण पर्वतपर चढनेसे रत्नसम्पत्ति प्राप्त होती हैं उसी प्रकार महेश्वरप्राप्तिसे समस्त सम्पत्तियें प्राप्त होजाती है । अतएव उत्पलाचार्यने कहा है भक्तिरूपी लक्ष्मीसे सम्पन्नोंको याचनीय अन्य वस्तु क्या है अर्थात् कुछभी नही सब प्राप्त हे भक्तिमे जो दरिद्र ( शून्य ) हे उसको अयाचनीय क्या है अर्थात् सब याचनीय है ॥ ७ ॥ इत्थं षष्ठीसमासपक्षे प्रयोजनं निर्दिष्टम् ॥ बहुव्रीहिपक्षेतूपाय समस्तस्य वाह्याभ्यन्तरस्य नित्यसुखादेर्या सम्पत्तिसिद्धि तथा- त्वप्रकाशः तस्या सम्यगवाप्तिर्यस्याः प्रत्यभिज्ञाया हेतुः । सा तथोक्ता तस्य महेश्वरस्य प्रत्यभिज्ञा प्रतीमाभिमुख्येन ज्ञानम्। लोके हि स एवायं चैत्र इति प्रतिसन्धानेनाभिमुखीभूते वस्तुनि ज्ञानं प्रत्यभिज्ञेति व्यवह्रियते। इहापि प्रसिद्धपुराणसिद्धागमानु- मानाद्विज्ञातपरिपूर्णशक्तिके परमेश्वरे सति स्वात्मन्यभिमुखी- भूते तच्छक्तिप्रतिसन्धानेन ज्ञानमुदेति नूनं स एवेश्वरोऽहमिति । तामेतां प्रत्यभिज्ञामुपपादयामि । उपपत्तिः सम्भव सम्भवती तितत्समर्थाचरणेन प्रयोजनव्यापारेण सम्पादयामीत्यर्थ ॥ ८ ॥ षष्ठीसमास पक्षमे प्रयोजन दिखाकर अब बहुव्रीहि समाससे उपाय दिखाते हैं, वाह्याभ्यन्तर ज्ञान सुखादि समस्त सम्पत्तियोंकी सिद्धि और तत्त्व प्रकाश तथा
-दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १७१ )'
उसकी सम्यक् प्राप्ति जिस प्रत्यभिज्ञासे हो ऐसें महेश्वरकी प्रतिमाके अभिमुखज्ञानका नाम प्रत्यभिज्ञा हे यह बहुव्रीहिसमासमें उत्तरार्थका अर्थ है । लोकमें सोयं चैत्र इत्यादि प्रतिसंधानमे अभिमुख वस्तु विषयके जो ज्ञान है उसको प्रत्यभिज्ञा कहते है । इस शास्त्रमेंभी प्रसिद्ध पुराण आगम अनुमानादिसे ज्ञातपरिपूर्ण शक्तिमान् परमेश्वर अभिमुख होनेपर स्वकीय आत्माके विषयमें परमेश्वर शक्तिका अनुसन्धानद्वारा अवश्य वही परमेश्वर में हू ऐसा जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसी प्रत्यभिज्ञाको उप- पादन करता हू ॥ ८ ॥ यदीश्वरस्वभाव एवात्मा प्रकाशते तर्हि किमनेन प्रत्यभिज्ञाप्र- दर्शनप्रयासेनेतिचेत्-तत्रायं समाधि । स्वप्रकाशतया सततम्- वभासमानेऽप्यात्मनि मायावशाद्भागेन प्रकाशने पूर्णतावभा- संसिद्धये दृक्क्रियात्मकशक्त्याविष्करणेन प्रत्यभिज्ञा प्रदर्श्यते। तथा च प्रयोगः अयमात्मा परमेश्वरो भवितुमर्हति ज्ञानक्रिया- शक्तिमत्त्वात् यो यावति ज्ञाता कर्त्ता च स तावतीश्वरः प्रसि- द्धेश्वरवत् राजवद्वा आत्मा च विश्वज्ञाता कर्त्ता च तस्मादी- श्वरोऽयमिति अवयवपञ्चकस्याश्रयणं मायावादेन नैयायिक- मतस्य कक्षीकारात् ॥ ९ ॥ शंका-यदि ईश्वर स्वभावही प्रकाशमान आत्मा है तो प्रत्यभिज्ञाशास्त्र प्रदर्शन क्लेशभी विफल है । समाधान-सदा प्रकाशस्वरूप होनेपरभी आत्मामें मायाबलसे यत्किञ्चित् आकारसे प्रकाश होता है पूर्णरूपसे नहीं अतः पूर्णरूपसे अवभाससि- द्धिके लिये और ज्ञान क्रिया शक्तिके आविष्करणार्थ प्रत्यभिज्ञाप्रदर्शन आवश्यक है ज्ञान क्रिया और शक्तिमान् होनेसे आत्मा परमेश्वर है जो जबतक ज्ञाता और कर्ता रहता है वह तबतक ईश्वर रहता है प्रसिद्ध ईश्वरके समान अथवा राजाके समान आत्माभी जगत्का ज्ञाता और कर्ता है अतः ईश्वर है यद्यपि सिद्धान्तमें प्रतिज्ञा हेतु और उदाहरण है अथवा उदाहरण, उपनय, निगमन रूप अवयवत्रयही माना है तथापि अवयवपञ्चकका जो आश्रयण किया सो मायावादमें नैयायिक पक्ष स्वीकार करके किया है ॥ ९ ॥ तदुक्तमुदयकरसूनुना-'कर्त्तरि ज्ञातरि स्वात्मन्यादिसिद्धे महेश्व रे । अजडात्मा निषेधं वा सिद्धिं वा विदधीत कः ॥ किन्तु मोह-
( १७२ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ प्रत्यभिज्ञा- वशादस्मिन्दृष्टेऽप्यनुपलक्षिते । शक्त्याविष्करणेनेयं प्रत्यभि- ज्ञोपदर्श्यते'॥तथाहि--"सर्वेषामिह भूतानां प्रतिष्ठाजीवदाश्रया। ज्ञानं क्रिया च भूतानां जीवतां जीवनं मतम्॥ तत्र ज्ञानं स्वत सिद्धं क्रिया कर्त्राश्रिता सती । परैरप्युपलक्ष्येत तयान्यज्ज्ञा- नमुच्यते"॥ इति ॥ या चैषां प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता । अक्रमानन्दचिद्रूप प्रमाता स महेश्वर ॥ " इति च ॥१०॥ उक्तार्थमें उदयकरपुत्रकी सम्मतिभी कहते हैं आदिसिद्ध महेश्वर ज्ञाता तथा कर्त्ता आत्मामें कर्तृत्व ईश्वरत्वादिको कौनसा अजडात्मा अर्थात् बुद्धिमान् निषेध और विधान करेगा अर्थात् सिद्धका निषेध नहीं हो सकता है एव विधानभी व्यर्थ है तथापि स्वयंप्रकाशकतया प्रत्यक्षदर्शन होनेपरभी अविद्यावश अनुपलक्षित ( अप्रत्यक्ष ) आत्मामें शक्तिके आविर्भावार्थ प्रत्यभिज्ञाशास्त्रका उपदेश करते हैं सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रतिष्ठा जीवनके आधीन है ज्ञान और क्रिया जीनेवालोंका जीवन है उनमें ज्ञान स्वत सिद्ध है क्रिया कर्तामें आश्रित होनेसे अन्यकोभी उप- लक्षित ( प्रतीत ) होता हे ज्ञान दूसरेके उपलक्षित नहीं होता है आत्माकी प्रतिभा तत्तत्पदार्थके कर्माधीन है अर्थात् जिस कालमें अन्त करणवृत्ति यदाकार परिणत होगी उसकी प्रतिभा होगी महेश्वरका ज्ञान सदा प्रकाशित रहनेसे अक्रम आनन्द चिद्रूप और ज्ञाता है ॥ १० ॥ सोमानन्दनाथपादैरपि-“सदा शिवात्मना वेत्ति सदा वेत्ति सदा- त्मना " इत्यादि ॥ ज्ञानाधिकारपरिसमाप्तावपि-“ तदैक्येन विना नास्ति संविदा लोकपद्धति । प्रकाशैक्यात्तदेकत्वं मा- तैकः स इति स्थित ॥ स एवार्थभृशत्वेन नियतेन महेश्वर । विमर्श एव देवस्य शुद्धे ज्ञानाक्रियेयतः॥” इति॥विवृतं चाभिन- वगप्ताचार्यै । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमि दंविभातीतिश्रुत्या प्रकाशं चिद्रूपमहिम्ना सर्वस्य भानजातस्य भासकत्वमभ्युपेयते । ततश्च विषयप्रकाशस्य नीलप्रकाश पीतप्रकाश इति विषयोपरागभेदाद्भेदः । वस्तुतस्तु देशका-
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १७३ ) लाकारसङ्कोचवैकल्यादभेद एव । स एव चैतन्यरूप प्रकाश- प्रमातेत्युच्यते ॥ ११ ॥ निरन्तर शिवरूप और सदा द्रष्ट्रूप जाने इति वस्तुके साथ एकताके बिना लोकमें ज्ञानका व्यवहार नहीं होता है प्रकाशका ऐक्य होनेसे एकत्व प्रमाताके साथ भी एकत्व है यही सिद्धान्त है प्रकाश व जिनके प्रकाशसे समस्त प्रकाशित होते इत्यादि श्रुतियोंसे प्रकाश चिदानन्द ईश्वरकी महिमासे सम्पूर्ण पदार्थका प्रकाशकत्व है एवञ्च विषय प्रकाशका नीलपीतादि विषयोपरागभेदहीसे भेद है वस्तुत देश काल और वस्तुसकोच न होनेसे अभेद है वही चैतन्यरूप प्रकाश प्रमाता कहा जाता है ॥ ११ ॥
तथा च पठितं शिवसूत्रेषु "चैतन्यमात्मेति" । तस्य चिद्रू- पत्वमनवच्छिन्नविमर्शत्वमन्योन्मुखत्वमानन्दैकघनत्वं माहै- श्वर्य्यमिति पर्यायः । स एव ह्ययं भावात्मा विमर्शः शुद्धे पार- मार्थिक्यौ ज्ञानक्रिये । तत्र प्रकाशरूपता ज्ञानं स्वतो जग- न्निर्मातृत्वं क्रिया । तच्च निरूपितं क्रियाविकारे--"एष चानन्द शक्तित्वादेवमाभासयत्यमून । भावानिच्छावशादेषा क्रियानि- र्मातृताऽस्य सा॥" इति । उपसंहारेऽपि- "इत्थं तथा घटपटा- द्याकारजगदात्मना । तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुकर्तृकता क्रिया" ॥ इति । "तस्मिन् सतीदमस्तीति कार्य्यकारणतापि या । सा व्यपेक्षाविहीनानां जडानां नोपपद्यते" ॥ १२ ॥
चैतन्य आत्माके चिद्रूपत्व अपरिमिति विमर्श ( ज्ञान ) त्वन्योन्मुखत्व आन- न्दैकस्वरूपत्व महेश्वरत्व इत्यादि सब पर्याय शब्द हैं शुद्ध स्वरूपमें ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति पारमार्थिक है प्रकाशरूपत्व ज्ञान है स्वतः जगन्निर्मातृत्व क्रिया है ' ईश्वर आनन्दशक्तिमान् होनेसे स्वेतर सब भावको प्रकाश करते हैं स्वेच्छाधीन निर्मातृता क्रिया है इस प्रकार घटपटादि जगतरूपसे स्थित चाहनेवालेकी इच्छा और कर्तृत्व क्रिया है उन महेश्वरकी सत्तासे ( जगतकी सत्ता ) है जगतकी जो कार्य और कारणता है वह निरपेक्ष जडको नहीं हो सकते ॥ १२ ॥
( १७८ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ प्रत्यभिज्ञा- इति न्यायेन यतो जडस्य कारणता न वा अनीश्वरस्य चेतन- स्यापि तस्मात्तेन तेन जगद्भूतजन्मस्थित्यादिभावनिकारतत्त- द्भेदक्रियासहस्ररूपेण स्थातुमिच्छो स्वतन्त्रस्य भगवतो महे- श्वरस्येच्छैवोत्तरोत्तरमुच्चस्वभावा क्रिया विश्वकर्तृत्व वोच्यत इति । इच्छामात्रेण जगन्निर्माणमित्यत्र दृष्टान्तोऽपि स्पष्टं निर्दिष्टः । "योगिनामपि मृद्वीजे विनैवेच्छावशेन यत् । घटादि जायते तत्तत् स्थिरस्थार्थीक्रियाकरम् ॥" इति ॥ १३ ॥ अत' जड अथवा अनीश्वर चेतनमें कारणता नहीं हे अत' ससारके अन्तर्गत तत्तद्वस्तुकी उत्पत्ति स्थिति लय आदि भावविकार तद्देहेतु क्रियाद्वारा स्थिति चाइ- नेवाले स्वतन्त्र भगवान् महेश्वरकी इच्छामात्रसे उत्तरोत्तर उत्कृष्ट स्वभाव अथवा विश्वकर्तृत्व क्रिया है इच्छामात्रसेही जगत्का निर्माण होता है इसमें दृष्टान्तभी कहा है मृत्तिका बीजादि कारणके बिनाही योगियोंकी इच्छामात्रसे घटादि कार्य उत्पन्न हो जाता है अत' स्वार्थक्रियाकृत्व स्थिर है ॥ १३ ॥ यदि घटादिकं प्रति मृदाद्येव परमार्थतः कारणं स्यात् तर्हि कथं योगीच्छामात्रेण घटादिजन्म स्यात् । अथोच्यते अन्य एव मृद्वीजादिजन्मा घटाङ्कुरादयो योगेच्छाजन्यास्त्वन्या एवेति । तत्रापि बोध्यसे सामग्रीभेदात्तावत् कार्यभेद इति सर्वजनप्रसिद्धम् । ये तु वर्णयन्ति नोपादान विना घटायुत्प- त्तिरिति ॥ योगी त्विच्छया परमाणून् व्यापारयन् सङ्घटय- तीति । तेऽपि बोधनीया यदि परिदृष्टकार्यकारणभावविप- र्ययो न लभ्येत तर्हि घटमृद्दण्डचक्रादिदेहे स्त्रीपुरुषसंयोगादि- सर्वमपेक्षेत तथा च योगीच्छासमनन्तरसञ्जातघटदेहादिसम्भवो दु समर्थ एव स्यात् चेतन एव तु तथा भाति भगवान् भूरि- भगो महादेवो नियत्यनुवर्तनोलङ्घनतरस्वान्तन्द्य इति पक्षे न काचिदनुपपत्ति । अत एवोक्तं वसुगुप्ताचार्यैः -"निरुपादानसं-
म्भारमभित्तावेव तन्वते । जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्ला- घ्याय शूलिने ॥” इति ॥ १४ ॥ यदि घटादि कार्यके प्रति मृदादि परमार्थतः कारण होता तो योगियोंकी इच्छा- मात्रसे कैसे घटादि उत्पन्न होते ? यदि कहो मृदादिसे जायमान घटादि कार्य कुछ अन्य है और योगियोंकी इच्छासे उत्पन्न कार्य अन्य है उसमेंभी कारणभेदसे कार्य भेद प्रसिद्ध है जो लोग कहते हैं उपादान ( समवायिकारण ) के विना कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती । योगीलोग इच्छासे परमाणुको संघटित करते हैं उनसे कहना चाहिये कि प्रसिद्ध कार्यकारणभावका विपर्यय होता तो घटमृत्पिण्डचक्रादि देहके लिये स्त्रीपुरुषसंयोगादिकी भी अपेक्षा होगी एवञ्च योगियोंकी इच्छामात्रसे तत्काल घटादिकी उत्पत्ति कथमपिसम्भवित न होगी तथाच महाऐश्वर्यशाली भगवान् महादेव प्रारब्धकोभी उलङ्घनरूप स्वातन्त्र्ययुक्त कार्य करते हैं इस पक्षमें कोई झगडा ही नहीं है वसुगुप्ताचार्यनेभी कहा है उपादानादि सामग्री ओर भित्तिके विना जो संसाररूप चित्रका विस्तार करते हैं ऐसे कलाकुशल शूलीके लिये नमस्कार है ॥ १४ ॥ ननु प्रत्यगात्मन परमेश्वराभिन्नत्वे संसारसम्बन्धः कथं भवे- दिति चेत्तत्रोक्तमागमाधिकारे—“एष प्रमाता मायान्धः संसारी कर्मबन्धन । विद्यादिज्ञापितैश्वर्यश्चिद्घनो मुक्त उच्यते ॥” इति ॥ ननु प्रमेयस्य प्रमातृभिन्नत्वे बन्धमुक्तयोः प्रमेयं प्रति को विशेषः अत्राप्युत्तरमुक्तं तत्त्वार्थसंग्रहाधिकारे—“मेयं साधारणं मुक्तः स्वात्माभेदेन मन्यते । महेश्वरो यथा बद्धः पुनरत्यन्तभेदवत् ॥” इति ॥ १५ ॥ जीवात्मा यदि परमेश्वरसे अभिन्न हो तो संसारका सम्बन्ध कैसे होगा ? परमेश्वर विनिर्मुक्त है इस शंकाका समाधान आगमाधिकारमें कहा है कि उक्त प्रमाता ( चे- तन ) मायासे अज्ञानी होकर पुण्यपापरूप कर्मबन्धनयुक्त संसारी होता है विद्यासे स्वरूप और ऐश्वर्यादि बोधित होनेपर चिद्घनानन्द मुक्त होते हैं ? यदि प्रमेय (विषय) प्रमातासे भिन्न हो तो बन्ध ओर मोक्ष दशामें प्रमेयका विशेषही क्या होगा ? उत्तर-यद्यपि मेय उभयसाधारण है तथापि मुक्त महेश्वर अपनेसे अभिन्नरूपसे मानते हैं बद्ध संसारी अत्यन्त भेदरूपसे मानते हैं ॥ १५ ॥
( १७६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ प्रत्यभिज्ञा-
नन्वात्मन परमेश्वरत्व स्वाभाविक चेन्मार्थ प्रत्यभिज्ञाप्रार्थ- नया न हि वीजमप्रत्यभिज्ञातं सति सहकारिसाकल्ये अंकुर नोत्पादयति । तस्मात् कस्माद्वात्मप्रत्यभिज्ञाने निर्बन्ध इति चेत् ॥ १६ ॥ यदि आत्माका परमेश्वरत्व धर्म स्वाभाविक हे तो प्रत्यभिज्ञाकी प्रार्थना निष्फल हे क्योंकि पृथिवी जलादि सहकारीके संयोग होनेपरभी प्रत्यभिज्ञा न होनेके कारण बीज अंकुरको नहीं उत्पादन करेगा ऐसा कोई नियम नहीं दृष्ट होता हे अत- प्रत्यभिज्ञाका निर्बन्धमें क्या हेतु हे ॥ १६ ॥ उच्यते । श्रृणु तावदिदं रहस्यं, द्विविधा ह्यर्थक्रिया वाह्यांकु- रादिका प्रमातृविश्रान्तिचमत्कारसारा प्रीत्यादिरूपा च । तत्राद्या प्रत्यभिज्ञानं नापेक्षते, द्वितीया तु तदपेक्षत एव । इहाप्यहमीश्वर इत्येवम्भूतचमत्कारसारा परापरसिद्धिलक्षण- जीवात्मैकत्वशक्तिविभूतिरूपार्थक्रियेति स्वरूपप्रत्यभिज्ञान- मपेक्षणीयम् ॥ १७ ॥ इसका रहस्य सुनो अर्थ क्रिया वाह्य आन्तरभेदसे दो प्रकार हे अङ्कुरादि काय वाह्य हे उसमे प्रत्यभिज्ञाकी अपेक्षा नहीं । द्वितीय प्रमाताका विश्रामका चमत्कार प्रधान प्रीतिरूप हे इसमें प्रत्यभिज्ञाकी अपेक्षा होती हे यहामी में ईश्वर हू इत्यादि चमत्कारसार परापर सिद्धिलक्षण जीवात्मैकत्व शक्तिविभूतिरूप कार्य हे अतः स्वरूपप्रत्यभिज्ञान अवश्य चाहिये ॥ १७ ॥ ननु प्रमातृविश्रान्तिसारार्थक्रिया प्रत्यभिज्ञानेन विना दृष्टा सती तस्मिन् दृष्टेति क दृष्टम् । अत्रोच्यते, नायकगुणगणसं- श्रवणप्रवृद्धानुरागा काचन कामिनी मदनविह्वला विरहक्लेशम- सहमाना मदनलेखावलम्बनेन स्वावस्थानिवेदनानि विधत्ते तथा वेगात् तन्निकटमटत्यपि तस्मिन्नवलोकितेऽपि तदवलो- कन तदीयगुणपरामर्शाभावे जनसाधारणत्वं प्राप्ते हृदयङ्गम- भाव न लभते । यदा तु मूर्त्तिवचनात् तदीयगुणपरामर्शं
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( १७७ ) करोति तदा तत्क्षणमेव पूर्णभावमत्येति । एवं स्वात्मनि विश्वेश्वरात्मना भासमानेऽपि तन्निर्भासनं तदीयगुणपरामर्श- विरहसमयं पूर्णं भावं न सम्पादयति । यदा तु गुरुवचनादिना सर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वदिलक्षणपरमेश्वरोत्कर्षपरामर्शो जायते तदा तत्क्षणमेव पूर्णात्मतालाभ ॥ १८ ॥ शंका-प्रमाताके विश्रान्तिसारभूत कार्य प्रत्यभिज्ञानके बिना नहीं होता है प्रत्यभिज्ञान होनेसे होता है, ऐसा नियम क्या कही दृष्ट है ? उत्तर-जिस प्रकार नायकके गुणोंको सुन अत्यन्त अनुरागवाली नायिका कामातुर हो विरहपीडाके सहनेमें असमर्थ मदनलेखाका अवलम्बन करके अपनी अवस्थाको निवेदन करती है और आतुरतासे नायकके समीप जाकर उनको अवलोकन करनेपरभी पूर्व अप- रिचित और जन साधारणसे बोधित न होनेके कारण अपने हृदयके भावको नही प्रकट करसकती हे । जब किसीके द्वारा ' तुम्हारा अभिमत पुरुष यही है' ऐसा विदित हो जाय तब अपने हृदयके भावको उससे प्रकट करती है उसी प्रकार विश्वेश्वररूपसे आत्मा प्रकाशित होनेपरभी वह प्रकाश उनके गुणपरामर्शके विना पूर्णभावको संपादन नहीं कर सकता जब गुरुवचनादिसे सर्वज्ञत्व सर्वकर्तृत्वादि परमेश्वरका उत्कर्षज्ञात होता है तब पूर्णतया आत्मस्वरूप प्राप्त होजाता है ॥ १८ ॥ तदुक्तं चतुर्थे विमर्शे-“तैस्तैरप्युपयाचितैरुपन्नतस्तस्याः स्थितोऽप्यन्तिके कान्तो लोकसमान एवमपरिज्ञातो न रन्तुं यथा। लोकस्यैष तथानपेक्षितगुणः स्वात्मापि विश्वेश्वरो नैवायं निजवैभवाय तदियं तत्प्रत्यभिज्ञोदिता॥” इति॥ अभि नवगुप्तादिभिराचार्यैर्विहितप्रतानोऽपि अयमर्थः संग्रहमुपक्रम- माणैरस्माभिर्विस्तराभिया न प्रतानित इति सर्वं शिवम् ॥ १९ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे प्रत्यभिज्ञादर्शनं समाप्तम् ॥ ८ ॥ जिस प्रकार नायक अनेक प्रार्थनाओंद्वारा आकर नायिकाके समीपमें स्थितभी हो किंतु अपरिचित होनेके कारण अन्य पुरुषकी समान नायिकाके रमण करने योग्य नहीं होता है उसी प्रकार आत्मस्वरूपसे प्रकाशमान विश्वेश्वरभी पूर्व अपरिचित होनेसे लोगोंको स्वकीय वैभव प्रकट करने योग्य नहीं होते हैं अतः प्रत्यभिज्ञाशास्त्रकी आवश्यकता है। यह सब अभिनवगुप्ताचार्यादिके ग्रंथोंमें प्रपञ्चित है यहाँ केवल दिग्दर्शन मात्र है ॥ १९ ॥ इति प्रत्यभिज्ञादर्शन समाप्त । १२
( १७८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [रसेश्वर- अथ रसेश्वरदर्शनम् ॥ ९ ॥ अपरे माहेश्वरा परमेश्वरतादात्म्यवादिनोऽपि पिण्डस्थैर्ये सर्वाभिमता जीवन्मुक्ति सेत्स्यतीत्यास्थाय पिण्डस्थैर्योपायं पारदादिपदवेदनीय रसमेव सङ्गिरन्ते । रसस्य पारदत्वं संसार- परपारप्रमाणहेतुत्वेन । तदुक्तम्- ‘संसारस्य परं पारं दत्तेऽसौ पारदः स्मृतः ॥’ इति ॥ १ ॥ कोई माहेश्वर परमेश्वरके साथ तादात्म्य मानते हुए भी शरीरकी स्थिरता होने- हीसे सर्वाभिमत जीवन्मुक्ति होसकती है ऐसा मानकर शरीरकी स्थिरताके उपायभूत पारदरस ( पारे ) को मानते हैं संसारसे जो पार करदे उसको पारद कहते हैं ॥ १ ॥ रसार्णवेऽपि-पारदो गदितो यस्मात्परार्थं साधकोत्तमै । सुप्तोऽयं मत्समो देवि मम प्रत्यङ्गसम्भवः ॥ मम देहरसो यस्माद्रसस्तेनायमुच्यते ॥” इति ॥ २ ॥ रसार्णवमेंभी कहाहै-हे पार्वति ! हमारे अंगसे उत्पन्न ओर शोधन होनेपर हमारे समान फलदायी है इस कारण श्रेष्ठ साधकोंने उत्कृष्ट प्रयोजनके लिये पारदहीको कहा है । मेरी देहका रस ( वीर्य ) होनेसे पारद रस कहाता है ॥ २ ॥ प्रकारान्तरेणापि जीवन्मुक्तियुक्तौ नेयं वाचो युक्तिर्युक्तिमतीति चेन्न षट्सपि दर्शनेषु देहपातानन्तरं मुक्तेरुक्ततया तत्र विश्वासातुपपत्त्या निर्विचिकित्सप्रवृत्तेरनुपपत्तेः । तदप्युक्तं तत्रैव-“षड्दर्शनेऽपि मुक्तिस्तु दर्शिता पिण्डपातने । कराम- लकवत्सापि प्रत्यक्षा नोपलभ्यते । तस्मात्तं रक्षयेत्पिण्डं रसै- श्चैव रसायनै ॥” इति । गोविन्दभगवत्पादाचार्यैरपि-“ इति धनशरीरभोगात्मता नित्यान्सदैव यतनीयम् । मुक्तौ सा च ज्ञानात्तच्चाभ्यासात्स च स्थिरे देहे ॥” इति ॥ ३ ॥ यदि कहो जब प्रकारान्तरसेभी मुक्ति होती है तो यह युक्ति ठीक नहीं सोभी नहीं कह सकते षड्दर्शनोंमें शरीर नाशके अनन्तर मुक्ति कही है परन्तु मरनेपर मुक्ति होती है इसमें विश्वास न होनेसे उस विषयमें निःसन्देह प्रवृत्तिभी असम्भव है
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १७९) अतएव कहा है ३ दर्शनोंमें मरनेके बाद मुक्ति कही है परन्तु सोभी हाथके आमलेकी समान प्रत्यक्ष नहीं होती । जीवन्मुक्ति सबको प्रत्यक्ष है अतः रस और रसायनासे शरीरकी रक्षा करे। गोविन्दभगवत्पादाचार्यनेभी लिखा है धन शरीर और भोगको नित्य जानकर मुक्तिके लिये सदा यत्न करे मुक्तिभी ज्ञानसे होती है ज्ञान अभ्याससे होता है और अभ्यास शरीरकी स्थिरतासे होता है ॥ ३ ॥ ननु विनश्वरतया दृश्यमानस्य देहस्य कथं नित्यत्वमनुमीय- तइति चेन्मैवं मंस्था, पाट्कौशिकस्य शरीरस्यानित्यत्वे रसा- भ्रकपदाभिलप्यहरगौरीसृष्टिजातस्य नित्यत्वोपपत्तेः ! तथा च रसहृदये- "ये चात्यक्तशरीरा हरगौरीसृष्टिजान्तरं प्राप्ताः । वन्द्यास्ते रससिद्धा मन्त्रगणः किङ्करो येषाम् ॥" इति ॥ तस्माज्जीवन्मुक्ति समीहमानेन योगिना प्रथमं दिव्यतनुर्वि- धेया हरगौरीसृष्टिसंयोगजनितत्वञ्च रसस्य हरजत्वेनाभ्रकस्य गौरीसम्भवत्वेन तत्तदात्मकत्वमुक्तम् । "अभ्रकस्तव बीजं तु मम बीजं तु पारदः । अनयोर्मेलनं देवि मृत्युदारिद्र्यनाश- नम् ॥" इति ॥ ४ ॥ यदि कहो शरीरका नाश प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेसे उसको नित्य मानना अतीव असंगत है यहभी नहीं कह सकते क्योंकि पाट्कौशिक शरीर अनित्य होनेपरभी रस अभ्रकपदवाच्य हर गौरी सृष्टिसे उत्पन्न शरीरको नित्य माननेमें अनुपपत्ति नहीं है । रसहृदयमेंभी कहा है जिन्होंने शरीरको त्याग नही किया हो और हरगौरीसे कल्पान्तरमे प्राप्त हो मन्त्रगण जिनके किङ्कर हों ऐसे रससिद्ध अत्यन्त वन्दनीय है अतः जीवन्मुक्ति चाहनेवाले योगियोंको प्रथम दिव्य शरीर सम्पादन करना चाहिये रस हरसे और अभ्रक गौरीसे उत्पन्न होनेके कारण 'हरगौरी सृष्टि संयोगजनित कहाते हैं । हे ! पार्वती अभ्रक ( अबरक ) तुम्हारा बीज है और पारा मेरा बीज है इन दोनोंका सम्मेलन मृत्यु और दारिद्र्य नाशक होता है ॥ ४ ॥ अत्यल्पमिदमुच्यते देवदैत्यमुनिमानवादिषु बहवो रससामर्थ्या- द्दिव्यं देहमाश्रित्य जीवन्मुक्तिमाश्रिताः श्रूयन्ते । रसेश्वरसि- द्धान्ते--"देवा केचिन्महेशाद्या दैत्या कंसपुरःसराः । मुनयो
( १८० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रसेश्वर- वालखिल्याद्या नृपा सोमेश्वरादय ॥ गोविन्दभगवत्पादा- चार्यौ गोविन्दनायक । चर्वटि कपिलो व्यालि कापालि कन्दलायन ॥ एतेऽन्ये बहवः सिद्धा जीवन्मुक्ताश्चरन्ति हि । तनुं रसमयीमाप्य तदात्मककथाचणा ॥” इति ॥ ५ ॥ यह तो बहुतही अल्प बात है रसेश्वरसिद्धान्तमे देव, दैत्य, मनुष्य और मुनि- योंमें अनेक रसप्रभावसे जीवन्मुक्त वर्णित हैं यथा महेशादि देव, बल्यादि असुर, वालखिल्यादि मुनि और सोमेश्वरादि नृप रसके प्रभावसे जीवन्मुक्त होगये हैं । गो- विन्दभगवत्पाद, गोविन्दनायक, चर्वटि इत्यादि अनेक सिद्ध रसायनिक कथामे निपुण रसमय शरीर प्राप्त कर जीवन्मुक्त होकर विचरते हैं ॥ ५ ॥ अयमेवास्यार्थ परमेश्वरेण परमेश्वरी प्रति प्रपञ्चितः । “कर्म- योगेन देवेशि प्राप्यते पिण्डधारणम् । रसश्च पवनश्चेति कर्म- योगो द्विधा स्मृतः ॥ मूर्च्छितो हरति व्याधीन्मृतो जीवयति स्वयम् । बद्धः खेचरतां कुर्याद्रसो वायुश्च भैरवि ॥ ” इति । मूर्च्छितस्वरूपमप्युक्तम्-“ नानावर्णो भवेत्सूतौ विहाय घनचापलम् । लक्षणं दृश्यते यस्य मूर्च्छितं तं वदन्ति हि ॥ आर्द्रत्वञ्च घनत्वञ्च तेजो गौरवचापलम् । यस्यैतानि न दृश्यन्ते तं विद्यान्मृतसूतकम् ॥” इति ॥ अन्यत्र बद्धस्वरूपमप्यभ्य- धायि--“अक्षतश्च लघुद्रावी तेजस्वी निर्मलो गुरु । स्फोटनं पुनरावृत्तौ बद्धसूतस्य लक्षणम् ॥” इति ॥ ६ ॥ हे पार्वति ! कर्मयोगसे शरीरकी स्थिरता होती है रस और पवनभेदसे कर्म्मयोग दो प्रकार है । हे पार्वति ! रस और वायु मूर्छित होनेसे रोगोंको हरण करते हैं और मृत शुद्ध होनेसे स्वयं जिलाते हैं तथा बद्ध होनेसे गगनचारी बनाते हैं । मूर्छित स्वरूपको कहते हैं कि घन चापलको छोडकर नानावर्ण जब होते हैं तब उसको मूर्छित कहते हैं । आर्द्रत्व, घनत्व, तेज, गौरव, चापल ये जिसमें न हों उसको मृत सूतक जानना । बद्धस्वरूप कहते हैं-अक्षत, लघुद्रावी, तेजस्वी, निर्मल, गुरु पुनरावृत्तिमें स्फोटन, बद्धसूतका लक्षण है ॥ ६ ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( १८१) ननु हरगौरीसृष्टिसिद्धौ पिण्डस्थैर्यमास्थातुं पार्यते तत्सि- द्धिरेव कथमिति चेन्न अष्टादशसंस्कारवशात्तदुपपत्ते । तदुक्त माचार्यै --"तस्य हि साधनविधौ सुधियां प्रति कर्म निर्मला- प्रथमम् । अष्टादश संस्कारा विज्ञातव्याः प्रयत्नेन ॥ " इति । ते च संस्कारा निरूपिता " स्वेदनमर्द्दनमूर्च्छनस्थापन- पातननिरोधनियमाश्च । दीपनगमनग्रासप्रमाणमथ जारणा- पिधानम् ॥ गर्भद्रुतिबाह्यद्रुतिक्रारणसरागसारणाश्चैव । क्राम- णवेधौभक्षणमष्टादशेति रसकर्म ॥ " इति । तत्प्रपञ्चस्तु गोविन्दभगवत्पादाचार्यसर्वज्ञरामेश्वरभट्टारकप्रभृतिभिः प्राची- नैराचार्यैर्निरूपित इति ग्रन्थभूयस्त्वभयादुदास्यते ॥ ७ ॥ हरगौरीसृष्टि सिद्ध होगी तो शरीरभी स्थिर होगा परन्तु सिद्धि कैसे होती है सो कहते हैं । अष्टादश संस्कारसे सिद्धि होती है उसके साधनविधिमें प्रथम १८ उत्तम संस्कार बुद्धिमानोको जान लेने चाहिये । संस्कार-स्वेदन, मूर्च्छन, स्थापन, पातन, निरोधन, नियम, दीपन, गमन, ग्रासप्रमाण, जारण, पिधान, गर्भद्रुति, बाह्यद्रुति, क्षारण, सराग, सारण, क्रामण, वेध, और भक्षण ये अष्टादश रसकर्म हैं । इसका विस्तृत वर्णन गोविन्दभगवत्पादाचार्यप्रभृति प्राचीनआचार्योंने किया है ॥ ७ ॥ न च रसशास्त्रं धातुवादार्थमेवेति मन्तव्यं देहवन्धद्वारा मुक्तेरेव परमप्रयोजनत्वात् । तदुक्तं रसार्णवे-लोहबंधस्त्वया देव यद्वत्त- परमीशित । त्वं देहवेधमाचक्ष्व येन स्यात् खेचरी गति ॥ यथा लोहे तथा देहे कर्त्तव्य सूतक सता ॥ समानं कुरुते देवि प्रत्ययं देहलोहयो । पूर्वं लोहे परीक्षेत पश्चाद् देहे प्रयोजयेत्॥" इति ॥ ८ ॥ यह न समझना कि आचार्योंने रसायनशास्त्र केवल धातुपुष्टि प्रतिपाद कही है, किन्तु देहरक्षाद्वारा मुक्तिहीका परम प्रयोजक है । हे देव आपने लोहबन्ध तो दिया अब जिसमे आकाशमार्गमे गमन हो वह देहबन्ध बताइये देह और लोहमें समान
( १८२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रसेश्वर- सूतक करना चाहिये । हे देवि लोहे और देहमें समान विश्वास कर प्रथम लोहेमें परीक्षा कर पश्चात् देहमें प्रयोग करे ॥ ८ ॥ ननु सच्चिदानन्दात्मकपरतत्त्वस्फुरणादेव मुक्तिसिद्धौ किमनेन दिव्यदेहसम्पादनप्रयासेनेति चेत्तदेतदवातं वार्त्तशरीरालाभे तद्वार्त्ताया अयोगात् । तदुक्तं रसहृदये—“गलितानल्पविकल्पः सर्व्वाध्वविवक्षितश्चिदानन्द । स्फुरितोऽप्यस्फुरिततनोः करोति किं जन्तुवर्गस्य॥ इति। “ यं जरया जर्जरितं काशश्वा- सादिदु खविशदञ्च । योग्यं तं न समाधौ प्रतिहतबुद्धीन्द्रिय- प्रसरम् ॥ बाल षोडशवर्षो विषयरसास्वादलम्पट परत । यातविवेको वृद्धो मर्त्य कथमप्नुयान्मुक्तिम् ॥” इति च ॥ ९ ॥ सच्चिदानन्द आत्मतत्त्व प्रकाशसे ही मुक्ति हो जायगी दिव्यदेहप्राप्तिसे क्या प्रयोजन है ऐसा नहीं कह सकते क्योकि वार्त्तशरीर ( दिव्यशरीर ) न होनेसे मुक्ति की वार्त्ताभी असम्भव है । रसहृदयमे कहा है सम्पूर्ण विकल्प जालसे रहित हो ओर सर्व तीर्थंकरोका अभिमत चिदानन्द आत्मतत्त्व प्रकाशित होनेपरभी अप्रकाशित शरीरका क्या कर सकता है अर्थात् कुछभी नहीं कर सकता जो जरावस्थासे जर्ज- रित हो खाँसी श्वास आदि दु खसे पीडित हो बुद्धि और इन्द्रियोंके व्यापारसे कुण्ठित हो वह समाधिके योग्य नहीं हे, बालक, सोलह वर्षका युवा, विषयभोगमें लम्पट ओर अप्राप्तविवेक वृद्ध मनुष्य किस प्रकार मुक्ति पासक्ते हैं ॥ ९ ॥ ननु जीवत्वं नाम संसारित्वं तद्विपरीतत्वं मुक्तत्वं तथा च पर- स्परविरुद्धयो कथमेकायतनत्वमुपपन्नं स्यादिति चेत्तदनुपपन्नं विकल्पाानुपपत्ते । मुक्तिस्तावत् सर्वतीर्थंकरसम्मता । सा किं ज्ञेयपदे निविशते न वा चरमे शशविषाणकल्पा स्यात् । प्रथमे न जीवनं वर्जनीयमजीवतो ज्ञातृत्वानुपपत्तेः । तदुक्तं रसे- श्वरसिद्धान्ते-“रसाङ्गम्येमार्गोक्तो जिवमोक्षोऽस्त्यधोमना । प्रमाणान्तरवादेषु युक्तिभेदावलम्बिषु ॥ ज्ञानज्ञेयमिदं विद्धि सर्वतन्त्रेषु सम्मतम् । न जीवन् ज्ञास्यति ज्ञेयं यदतोऽस्त्येन जनिनम् ॥” इति ॥ १० ॥
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १८३ ) यदि कहो जीवित संसारी होता है संसाररहित मुक्त कहा जाता है तब परस्पर विरुद्ध जीवत्व मुक्तत्व एकमें कैसे रहेगा ? यह ठीक नही है मुक्ति सब दर्शनकारोको अभिमत है वह मुक्ति ज्ञानका विषय है या नही ? यदि न हो तो खरगोशके सींगके समान तुच्छ होगी । ज्ञानका विषय मानो तो जीवनके विना ज्ञातृत्व असम्भव होनेसे जीवन्मुक्तिभी सिद्ध होगी यह रसेश्वरसिद्धान्तमे प्रसिद्ध है रसाङ्गसिद्धान्तमें प्रति- पादित जीवन्मोक्षसे भिन्न २ मुक्ति और प्रमाणान्तरवादी विमुख रहते हैं परन्तु मुक्ति- को सब सिद्धान्तवादियोंके ज्ञानका विषय कहा है जीवनके विना ज्ञान नहीं हो सकता और ज्ञानके विना ज्ञेयभी नही हो सकता है अत जीवन्मोक्ष अवश्य मानना होगा ॥ १० ॥ न चेदमदृष्टचरमिति मन्तव्यं विष्णुस्वामिमतानुसारिभिः नृपञ्चास्यशरीरस्य नित्यत्वोपपादनात । तदुक्तं साकारसिद्धौ- “सच्चिन्नित्यनिजाचिन्त्यपूर्णानन्दैकविग्रहम् ॥ नृपञ्चास्यमहं वन्दे श्रीविष्णुस्वामिसम्मतम् ॥” इति ॥ ११ ॥ यह किसी सिद्धान्तमें नहीं देखा गया है ऐसा नही कह सकते क्योकि विष्णुस्वा- मिमतानुयायियोंने नृसिंहशरीरको नित्य माना है और साकारसिद्धिमे कहा है कि सत् चित् नित्य स्वकीय अचिन्त्य परिपूर्ण ज्ञान और आनन्दस्वरूप श्रीविष्णुस्वा- मीके सम्मत नरसिंहका मैं वन्दना करता हू ॥ ११ ॥ नन्वेतत् सावयवं रूपवदवभासमानं नृकण्ठीरवाङ्गं सदिति न सङ्गच्छत इत्यादिनाक्षेपपुरःसरं सनकादिप्रत्यक्षं सहस्रशीर्षा पुरुष इत्यादि श्रुति , तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं चतुर्भुजं शंख- गदार्युदायुधम् इत्यादिपुराणलक्षणेन प्रमाणत्रयेणसिद्धं नृपञ्चा- ननाङ्गं कथमसत् स्यादिति । सदादीनि विशेषणानि गर्भश्री- कान्तामिश्रै विष्णुस्वामिचरणपरिणतान्त करणे प्रतिपादि- तानि । तस्मादस्मदिष्टदेहनित्यत्वमत्यन्तादृष्टं न भवतीति पुरुषार्थकामुकै पुरुषैरैष्टव्यम् ॥ १२ ॥ रूपवान्के समान प्रतीयमान सावयव नृसिंह शरीर सत्य नहीं हो सकता इत्यादि आक्षेपोंका समाधानभी सनकादिकोंके प्रत्यक्ष, सहस्र शीर्षेति श्रुति ( अनेक
( १८४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रसेश्वर- शिर, पाद, नेत्र, अनेक पाठवान् पुरुष ) पुरुषसूक्त, तथा विकसित कमलके समान जिनके नेत्र चार भुजासे युक्त शंख, चक्र, गदादि आयुधोंको धारण किये पीताम्बर कौस्तुभ श्रीवत्सादि भूषणोंसे भूषित अद्भुत बालकको श्रीवसुदेवजी देखते हुए इत्यादि पुराण प्रमाणोंसे सिद्ध नरसिंह शरीर असत् नहीं हो सकता अत' हमारा अभिमत देहनित्यत्व अत्यन्त अदृष्ट न होनेसे मोक्षार्थियोंको रसायनसे शरीर स्थैर्य्यही सम्पादन करना चाहिये ॥ १२ ॥ अतएवोक्तम्-“आयतनं विद्यानां मूलं धर्मार्थकाममोक्षाणाम् । श्रेय पर किमप्यन्यच्छरीरमजरामरं विहायैकम्॥” इति । अजरा- मरीकरणसमर्थश्च रसेन्द्र एव । तदाह-“एकोऽसौ रसराज शरीरमजरामरं कुरुते” इति ॥ किं वर्ण्यते रसस्य माहात्म्यं दर्शनस्पर्शनादिनापि महत्फलं भवति । तदुक्तं रसार्णवे- “दर्शनात् स्पर्शनात्तस्य भक्षणात् स्मरणादपि । पूजनाद्रसदा- नाच्च दृश्यते षड्विधं फलम् ॥ १३ ॥ अतएव कहा है कि विद्याका स्थान धर्म अर्थ काम और मोक्षका मूल परमश्रेष्ठ अजर अमर शरीरको छोडकर अन्य श्रेष्ठ क्या हो सकता है अजर और अमरका साधक केवल रसन्द्रही है रसका माहात्म्य कहाँतक वर्णन करें। दर्शन, स्पर्शन, भक्षण, स्मरण, पूजन और रसदानसे षड्विध फल होते हैं ॥ १३ ॥ केदारादीनि लिङ्गानि पृथिव्यां यानि कानिचित् । तानि दृष्ट्वा तु यत्पुण्यं तत्पुण्यं रसदर्शनात् ॥” इत्यादिना॥ अन्यत्रापि- “काश्यादिसर्वलिङ्गेभ्यो रसलिङ्गार्चनं शिवम् । प्राप्यते येन तल्लिङ्गं भोगारोग्यामृतामरम् ॥ ” इति ॥ १४ ॥ पृथिवीमें केदारनाथ और विश्वनाथ प्रभृति जो शिवलिङ्ग हैं उनके दर्शनसे जो पुण्य होता है वह रसके दर्शनसे हो जाता है । काशीविश्वनाथादि शिवलिङ्गके अर्चनकी अपेक्षा रसलिङ्गका अर्चन बहुत श्रेष्ठ है। क्योंकि रसलिङ्गसे भोग आरोग्य और अमृत ( मोक्ष ) तीनों प्राप्त होते हैं ॥ १४ ॥ रसनिन्दायां प्रत्यवायोऽपि दर्शित । “ प्रमादाद्रसनिन्दायां श्रुतायेन स्मरेत् सुधी । द्राक् त्यजेन्निन्दकं नित्यं निन्द्या
दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत.। ( १८५) पूरितोशुभम् ॥" इति । तस्मादस्मदुक्तया रीत्या दिव्यं देहं सम्पाद्य योगाभ्यासवशात् परतत्त्वे दृष्टे पुरुषार्थप्राप्तिर्भा- वति । तदा- "भ्रुयुगमध्यगतं यत् शिखिविद्युत्सूर्य्यवज्जग- द्भासि । केषाञ्चित् पुण्यदृशामुन्मीलति चिन्मयं ज्योति. ॥ १५॥ रसकी निन्दा करनेका प्रायश्चित्त कहते हैं प्रमादवश रसकी निन्दा सुने तो रसका सम्यक् प्रकार ध्यान करे और निन्दकको त्याग दे क्योंकि निन्दायुक्त अशुभ होता है । अतः हमारे कथनानुसार दिव्य शरीर प्राप्त कर योगाभ्यासद्वारा साक्षात्कार करनेसे मुक्त होते हैं पुण्यशालियोंको पुण्यवश भृकुटीके मध्यमें प्राप्त अग्नि बिजली और सूर्यके समान जगत्को प्रकाश करनेवाली चिन्मयज्योति विकसित होती है ॥ १५ ॥ परमानन्दैकरसं परं ज्योतिः स्वभावमविकल्पम् । विगलित- सकलक्लेशज्ञेयं शान्तं स्वसंवेद्यम् ॥ तस्मिन्नाधाय मन स्फुर- दसिलं चिन्मयं जगत् पश्यन् । उत्सन्नकर्मबन्धो ब्रह्मत्वमि- हैव चाप्नोति ॥" इति । श्रुतिश्च- 'रसो वै स रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति' ॥ इति ॥ १६ ॥ परमानन्दैकरस परमज्योति समस्त विकल्प और समस्त क्लेशोंसे रहित स्वसंवेद्य रसतत्त्वमें ध्यानादि द्वारा चित्त लगाकर जगत्को प्रकाशमान चिन्मय देखनेवाले कर्म्मबन्धनसे रहित होकर इस संसारमेंही ब्रह्मरूप होते हैं । रस ( आस्वादन करने योग्य ) ईश्वर है रस प्राप्तिसे पुरुष आनन्दवान् होता है ॥ १६ ॥ तदित्थं भवेदन्दुःखभरतरणोपायो रस एवेति सिद्धम् । तथा च रसस्य परब्रह्मणा साम्यमिति प्रतिपादकः श्लोक । "यः स्यात् प्रावरणाविमोचनधियां साध्य प्रकृत्या पुन सम्पन्नो सहते न दीव्यति परं वैश्वानरे जाग्रति । जातो यद्यपरं न वेद- यति च स्वस्मात् स्वयं द्योतते यो ब्रह्मैव स दैन्यसंसृतिभयात् पायादसौ पारद ॥" इति ॥ १७ ॥ इति सर्वदर्शनसंग्रहे रसेश्वरदर्शनं समाप्तम् ॥ ९ ॥ इस प्रकार अन्यके दुःखभारके नाश करनेम समर्थ रसही है यह सिद्ध हुआ । यह पारद संसारबन्धनसे मुक्ति चाहनेवालोंको स्वभावसे साधनीय है जिस प्रकार