भारतकोश
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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

दर्शनम् [ भाषाटीकासमेतः । ( ५१ )

सिद्धसेनवाक्यकारेण-" कृतप्रणाशाकृतकर्मभोगभवप्रमोक्ष- स्मृतिभङ्गदोषान् । उपेक्ष्य साक्षात् क्षणभङ्गमिच्छन्नहो महासाहसिकः परोऽसौ ॥" इति ॥ ५ ॥ ( नचेति ) सन्तानसे भिन्न सन्तान भी प्रमाणगम्य नहीं क्योंकि एकजातीय हो क्रमसे उत्पन्न हो परस्पर मिला हो ऐसे व्यक्तिको सन्तान कहते हैं वह एक ही कहा जाता है कार्यकारणभाव नियम भी अतिव्याप्तिको हटा नहीं सकता अन्यथा आचार्यके अनुभूत वस्तुका स्मरण शिष्यको होने लगेगा एवं आचार्यकृत कर्मका फल शिष्यको भोगना पड़ेगा । उपालम्भ करते हैं ( तदुक्तमिति ) कृतका नाश, अकृत कर्मका भोग, संसारका उच्छेद मोक्षभंग स्मरणानुपपत्त्यादि दोषोंकी उपेक्षा कर क्षणभंगको माननेवाला बौद्ध बड़ा साहसिक अर्थात् हठी है ॥ ५ ॥ किञ्च क्षणिकत्वपक्षे ज्ञानकाले ज्ञेयस्यासत्त्वेन ज्ञेयकाले ज्ञान- स्यासत्त्वेन च ग्राह्यग्राहकभावानुपपत्तौ सकललोकयात्रास्तमि- यात्। न च समसमयवर्त्तित्त्वं शङ्कनीया सव्येतरविषाणवत् कार्य्य- कारणभावासम्भवेनाग्राह्यस्यालम्बनप्रत्ययानुपपत्तेः । अथ भिन्नकालस्यापि तस्याकारार्पकत्वेन ग्राह्यत्वं, तदप्यपेशलम् क्ष- णिकस्य ज्ञानस्याकारार्पकताश्रयताया दुर्वचत्वेने साकारज्ञान- वादे प्रत्यादेशेन निराकारज्ञानवादेऽपि योग्यतावशेन प्रतिकर्म- व्यवस्थायाः स्थितत्वात् ॥ ६ ॥ दोषान्तर भी कहते हैं ( किञ्चेति ) क्षणिक पक्षमें ज्ञानकालमें ज्ञेय घटादि और ज्ञेयकी सत्ताकालमें ज्ञानको न रहनेसे ग्राह्य ( घटादि ) ग्राहक ज्ञान अनुपपन्न होगा तो तन्मूलक समस्त लोकव्यवहार भी नष्ट होगा ( नचेति ) ज्ञान और ग्राह्यको एक- कालवृत्तित्व भी नहीं कहसकते क्योंकि समकालोत्पन्न होनेसे वामदक्षिण शृङ्गके समान परस्पर कार्यकारणभाव असम्भव होगा अत ग्राह्य न होनेसे विषयालम्बन प्रत्ययत्व असम्भव होगा ( अथेति ) ज्ञानसे पूर्वकालमें ग्राह्यकी सत्ता होनेसे भी आकारार्पकत्व नहीं कहसकते क्योंकि क्षणिक ज्ञानमें आकारका आश्रयत्व ही दुर्निरूप है ज्ञानकालमें विषय और विषयकालमें ज्ञान दोनों न होनेसे ज्ञानमें विषयाकार सम- र्पकत्वके असम्भव होनेपर ज्ञानवैचित्र्य नहीं होसकेगा घटपटादि विचित्रज्ञान आकार वैलक्ष्ण्यमें ही होता है। कहा भी है "अर्थेनैव विशेषे हि निराकारतया धियामिति"

( ५२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- अतः ज्ञानवैचित्र्यके लिये क्षणिकत्व पक्षमें भी कथञ्चित् विषयाकार समर्पकत्व स्वीकार करना चाहिये इस आशङ्कासे कहते हैं (निराकारज्ञान वादऽपीति) तात्पर्य साकार- ज्ञानवादमें विषय नष्ट होनेपर भी घटपाटादिरूप नियत आकारको ग्रहण करता है अर्थात् घटज्ञान घटकेही आकारका ग्रहण करता है पट आकारको नही ग्रहण करता यह व्यवस्था जिस प्रकार होती है उसी प्रकार निराकार ज्ञानवादमें भी नियम हो जायगा अत साकारत्व मानना भी व्यर्थ हे ॥ ६ ॥ तथा हि-प्रत्यक्षेण विषयाकाररहितमेव ज्ञानं प्रतिपुरुषमहमित्या- क्या घटादिज्ञानमनुभूयते न तु दर्पणादिवत् प्रतिबिम्बक्रान्तम् । विषयाकारधारित्वे ज्ञानस्यार्थे दूरनिकटादिव्यवहाराय जला- ञ्जलिर्वितर्येत । न चेदमिष्टापादनमेष्टव्यं दवीयान् महीधरो नेदीयान् दीर्घो बहुरिति व्यवहारस्य निराबाधं जागरूकत्वात् । न चाकाराधायकस्य तस्य दवीयस्त्वादिशालितया तथा व्य- वहार इति कथनीयं दर्पणादौ नथानुप्लम्भात् ॥ ७ ॥ उसीको उपपादन करते है ( तथाहीति ) प्रत्यक्षसे जो ज्ञान होता है वह घटा दिविषयाकार रहित ही अहङ्काररूपसे घटादिज्ञान अनुभूत होता है दर्पणादिमें मुख जिस प्रकार प्रतिबिम्बित होता है उसी प्रकार विषयाकारप्रतिबिम्बित होकर ज्ञान नही प्रतीत होता । दूषणान्तर ( विषयाकारेति ) यदि ज्ञानमे विषयाकारार्पण मानो तो ज्ञान आत्मामें रहता है उसी ज्ञानमें विषयाकार भी अर्पित होनेसे विषयमें दूरत्व समीपत्वादि व्यवहार गगनकुसुम समान होगा । यदि कहो यह दोष क्या देते हो क्षणिकवादीके मतमें इष्टापत्ति है ऐसा भी नहीं कहसकते क्योंकि शिंशपावृक्ष दूर है अमुक वट वृक्ष बहुत ऊंचा है इत्यादि बडे २ बुद्धिमानोंसे लेकर पामरपर्यन्तको प्रतीति होती है । यह शुक्ति रजतादिकी समान बाधित भी नहीं आकारसमर्पक वृक्षादिक दूर होनेसे ऐसा प्रतीत होता है सो भी नहीं कहसकते क्योंकि दृष्टान्तभूत दर्पणादिमें मुखादिक दूर होनेपर भी दर्पणादिसन्निहितही प्रतीत होता है ॥ ७ ॥ किञ्चार्थादुपजायमानं ज्ञानं यथा तस्य नीलाकारतामनुकरोति तथा यदि जडतामपि तर्ह्यर्थवत् तदपि जडं स्यात् । तथा च वृद्धिमिष्टवतो मूलमपि ते नष्टं स्यादिति महतकष्टमापन्नम् ॥८॥

दर्शनम् ]। भाषाटीकासमेत। ( ५३ ) दूषणान्तर ( किञ्चेति ) अर्थ ( घटादि ) से उत्पन्न ज्ञान जिस प्रकार नीलादि ( घटादि ) आकारका अनुकरण करेगा । अर्थात् जिस प्रकार विषयाकार ज्ञानमें अर्पित होता है । उसी प्रकार घटादि विषय वृत्ति जडताका भी अनुकरण करेगा तो विषयके समान ज्ञानभी जड होने लगेगा, इष्टापत्ति कह नहीं सकते क्योंकि ज्ञानका प्रकाशरूपत्व सर्वसम्मत है जड होगा तो घटादिवत् ज्ञान भी स्वयं प्रकाश नहीं रहेगा । तब तो सूदके लालचसे दीवालियाके पास रुपये जमा करनेसे जिस प्रकार मूलका भी नाश हो जाता है उसी प्रकार विषयका अनुकरण करने ज्ञानका स्वयंप्रकाशरूप स्वरूपभी नष्ट होजायगा ॥ ८ ॥ अथैतद्दोषपरिजिहीर्षया ज्ञानं जडतां नानुकरोतीति ब्रूषे हन्त तर्हि तस्याग्रहणं न स्यादित्येकमनुसन्धित्सतोऽपरं प्रच्यवत इति न्यायापातः । ननु माभूत् जडताया ग्रहणं कि न छिन्नं तद्ग्रहणेऽपि नीलाकारग्रहणे तयोर्भेदा नैकान्तो वा भवेत् । नीलाकारग्रहणे चागृहिता जडता कथं तस्यानुरूपं स्यात् अपरथा गृहीतस्य स्तम्भस्यागृहीत त्रैलोक्यमपि रूपं भवेत् । तदेतत् प्रमेयजात प्रतापचन्द्रप्रभृतिभिरर्हन्मतानुसारिभि प्रमे- यकमलमार्त्तण्डादौ प्रबन्धे प्रपञ्चितमिति ग्रन्थभूयस्त्वभयात्रो- पन्यस्तम् ॥ ९ ॥ ( अथेति ) इस दोषसे छूटनेके लिये यदि कहो ज्ञान जडताका अनुकरण नहीं करेगा वि तो जडताका ग्रहण भी नहीं होगा अर्थात् 'घटो जड' ऐसा ज्ञान होता रहा सो अब नहीं होगा इस प्रकार एककी रक्षा करनेपर दूसरा नष्ट होजायगा अर्थात् ज्ञान जडाकारताका अनुकरण करे तो स्वयंप्रकाशक नष्ट होगा यदि न अनुकरण करे तो विषयकी जडत्व प्रतीति न होगी । ( ननु इति ) जडताका ग्रहण न होनेपर भी घटका ग्रहण होनेसे घटाकार ओर जडताका अत्यन्त अभेद अर्थात् व्यभिचार न होनेसे जडताका भी ग्रहण हो जायगा यह कहना भी असंगत हे क्योंकि नीला- कारके ग्रहणसे अगृहीत जडताका ग्रहण कैसा होसकेगा, यदि ग्रहण होता हो तो घट जड हे ऐसा कहनेपर घटसे जन्य जड है ऐसी प्रतीति होने लगेगी क्योकि घटा- कार गृहीत होनेसे ज्ञानरूप होगा, जटाकार अगृहीत होनेमे उससे भिन्न होगा ( अपरथेति ) अगृहीत भी गृहीतका स्वरूप होगा तो जब स्तम्भ इत्यादि खमका

३. आर्हत / जैन दर्शन (स्याद्वाद व सप्तभङ्गी नय)

( ५४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- ग्रहण होनेपर समस्त संसार उसका रूप होनेसे समस्त संसारका ज्ञान होनेलगेगा यह विषय प्रमेयकमलमार्तण्डादिमें विस्तृत रूपसे निरूपित होनेसे यहां संक्षेप करके छोड देता हू ॥ ९ ॥ तस्मात् पुरुषार्थाभिलाषुकैः पुरुषैः सौगती गतिर्मानुगन्तव्या अपित्वार्हंत्येवार्हणीया । अर्हत्स्वरूपञ्च चन्द्रसूरिभिराप्तनिश्च- यालङ्कारे निरटङ्कि—“सर्वज्ञो जितरागादिदोषस्त्रैलोक्यपूजितः। यथास्थितार्थवादी च देवोऽर्हन् परमेश्वरः ”॥ इति । ननु न कश्चित् पुरुषविशेष सर्वज्ञपदवेदनीय प्रमाणपद्धतिम- ध्यास्ते सद्भावग्राहकस्य प्रमाणपञ्चकस्य तत्रानुपलम्भात् । तथा चोक्तं तौतातितैः । “सर्वज्ञो दृश्यते तावन्नेदानीमस्मदादिभिः । दृष्टो न चैकदेशोऽस्ति लिङ्गं वा योऽनुमापयेत् ॥ १० ॥ अर्हन्‌के स्वरूपका वर्णन सर्वज्ञ इत्यादि समस्त वस्तुको साक्षात्कार करनेमें समर्थ रागद्वेषादि शून्य सम्पूर्ण संसारमें पूजित, यथार्थ वक्ता, परमेश्वर जो देव है वही अर्हन् हे ( ननु इति ) सर्वज्ञ इत्यादि जो विशेषण दिया सो असंगत है क्योंकि प्रत्यक्षादि पांच प्रमाणोंमेंसे एक भी प्रमाण तादृश पुरुषविशेषके प्रतिपादक न होनेके कारण सर्वज्ञपदवाच्य पुरुषका मानना प्रमाण विरुद्ध है । ( तोतातीतै ) बौद्धधर्मप्रचारक प्रमाणभावका उपपादन करते हैं तत्र पूर्वार्धसे अस्मदादिके दृष्टि- गोचर न होनेसे प्रत्यक्षप्रमाणोद्भव कहा ( दृष्टो नचेकेति ) उत्तरार्धसे अनुमान- गम्यका भी अभाव कहा पूर्ववत् शेषवत् सामान्य तो दृष्टभेदसे अनुमानके तीन भेद सांख्योंने माने यथा है समुद्रजलकी एक बूंद पानकरके अवशिष्टको क्षारजल्त्वका अनुमान करते हैं यह शेषवत् अनुमान है मेघगर्जना सुनकर वृष्टिका अनुमान होता हे यह पूर्ववत् हे धूमध्वजका एकदेशधूमाको देखकर जो अग्निका अनुमान है वह समान्यतो दृष्ट है सर्वज्ञ विषयम ऐसा कोई दृष्टलिङ्ग नहीं है जिससे अनु- मान होसके ॥ १० ॥ न चागमस्त्विति कश्चिन्नित्यसर्वज्ञबोधक_ । न च तत्रार्थवादाना तात्पर्य्यमपि कल्पते॥न चान्यार्थप्रधानेस्तैस्तदस्तित्वं विधीयते । न चानुवदितुं शक्यं पूर्वमन्यैरबोधित ॥ अनादेरागमस्यार्थो न च सर्वज्ञ आदिमान् । कृत्रिमेण त्वसत्येन स कथं प्रतिपाद्यते ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ५५ ) अथ तद्वचनेनैव सर्वज्ञोऽन्यैः प्रतीयते । प्रकल्प्येत कथं सिद्धि- रन्योन्याश्रययोस्तयोः ॥ सर्वज्ञोक्ततया वाक्यं सत्यं तेन तद्- स्तिता । कथं तदुभयं सिद्ध्येत्सिद्धमूलान्तराहते ॥ असर्वज्ञप्र- णीतात्तु वचनान्मूलवर्जितात् । सर्वज्ञमवगच्छन्तस्तद्वाक्योक्तं न जानते ॥ ११ ॥ अब छह श्लोकोंसे शब्दप्रमाणका भी अविषय कहते हैं । नित्य सर्वज्ञ बोधक कोई आगम विधिवाक्य नहीं अर्थवाद भी ऐसा कोई नहीं जिसका सर्वज्ञमें तात्पर्य हो अर्थवादका स्वतःप्रामाण्य नहीं किन्तु ( विध्युपष्टम्भकत्व ) अर्थात् विधिनिषेधका प्राशस्त्य निन्दाबोधन द्वारा प्रामाण्य है अतः अयथार्थप्रधान होनेसे सर्वज्ञकी सत्ताका बोधन नहीं करसकता अनुवाद भी उक्तार्थका होता है अतः पूर्व किसी वाक्या- न्तरसे उक्त न होनेसे अनुवादवाक्य भी तादृश नहीं अनादि अपौरुषेय आगमका अर्थ सादि सर्वज्ञ हो भी नहीं सकता । तात्पर्य अर्थबोधनके लिये शब्दका प्रयोग होता है आगम ( वेद ) अनादि है उस कालमें आपका सर्वज्ञ नहीं है तब किस प्रकार बोधन करसकेगा । यदि कोई कृत्रिम आधुनिक वाक्य प्रमाण कहो तो उस वाक्यका सत्यत्वमे विश्वास न होनेमे वह कैसे बोधन करसकेगा । यदि कहो अर्हन्‌का बनाये आगमसे ही अस्मदादिका सर्वज्ञका ज्ञान होगा अर्थात् उन्हींके वचनसे ही सर्वज्ञ सिद्ध होगा यह भी अन्योन्याश्रयग्रस्त होनेसे असिद्ध है । अन्यो- न्याश्रयको दिखाते हैं ( सर्वज्ञोक्तेत्यादि ) सर्वज्ञके उक्ति होनेसे वचनकी सत्यता है वचनहीसे सर्वज्ञका अस्तित्व है अतः सर्वज्ञोक्तिसे अतिरिक्त प्रमाणान्तरके बिना दोनों सिद्ध नहीं होसकते असर्वज्ञप्रणीत निर्मूल वाक्यसे सर्वज्ञकी सिद्धि मानने- वाले स्ववचनविरोध भी नहीं जानते हैं ॥ ११ ॥ सर्वज्ञसदृशं किञ्चिद्यदि पश्येम सम्प्रति । उपमानेन सर्वज्ञं जानी- याम ततो वयम् ॥ उपदेशोऽपि बुद्धस्य धर्माधर्मादिगोचर अन्यथा नोपपद्येत सार्वज्ञ्यं यदि नाभवत्॥"इत्यादि । अत्र प्रतिविधीयते यदभ्य सर्वज्ञके सदृश कोई दृष्ट हो तो उपमानसे सर्वज्ञकी प्रतीति होती सोभी नहीं ( उप- देशोपीत्यादि ) श्लोकद्वयमे अर्थापत्तिका भी अविषय कहते हैं । यदि कोई सर्वज्ञ न हो तो बुद्धका धर्माधर्मादि विषयक उपदेश भी अनुपपन्न होगा अतः सर्वज्ञ मानना

( ५६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- चाहिये यह भी नही उपदशके सत्यत्वमें कोई प्रमाण नहीं हे अत केवल व्योमोहही से उपदेश किया है ॥ १२ ॥ धायि सद्भावग्राहकस्य प्रमाणपञ्चकस्य तत्रानुपसन्नादिति तद्- युक्तं तत्सद्भावादेकस्यानादे सद्भावात् । तथाहि, कश्चिदात्मा सकलपदार्थसाक्षात्कारी तद्ग्रहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्रति- बन्धप्रत्ययत्वाद् यद्यद्ग्रहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्रतिबन्ध- प्रत्ययं तत्तत्साक्षात्कारी । यथा अपगततिमिरादिप्रतिबन्धं लोच- नविज्ञानं रूपसाक्षात्कारी । तद्ग्रहणस्वभावत्वे सति प्रक्षीणप्र- तिबन्धप्रत्ययश्च कश्चिदात्मा । तस्मात् सकलपदार्थसाक्षात्का- रीत्ति न तावदशेषार्थग्रहणस्वभावत्वमात्मनोऽसिद्धं चोदनाबाला त्रिसिलार्थज्ञानात् ॥ १३ ॥ सर्वज्ञ सद्भाव समर्थक उत्तर ( अत्र प्रतिविधीयत इत्यादि ) क्षुद्रोपद्रवा विद्राव्या- इत्यन्त । प्रत्यक्षादि प्रमाण पञ्चकमेंसे एक भी सर्वज्ञ सद्भाव प्रयोजक नहीं है यह कहना अयुक्त है क्योंकि अनुमान ओर आगम दोनों सर्वज्ञमें प्रमाण हो सकते हैं प्रथम अनुमान दिखाते हैं ( तथा हीत्यादि ) कश्चिदात्मा ( कोई जीव ) यह पक्ष है सकल पदार्थ साक्षात्कारी ( समस्तवस्तुओंको जाननेवाले ) यह साध्य है । तद्ग- ह्णेत्यादि प्रतिबन्धप्रत्ययत्वात् यह हेतु है । समस्त वस्तु ग्रहण स्वभाव होते हुए प्रतिबन्धक सकल दुरित क्षीण होनेसे, जो जिस वस्तुका साक्षात्कार करनेमें समर्थ होकर प्रतिबन्धकज्ञानशून्य हो तब वह उसको प्रत्यक्ष करते हैं जिस प्रकार तिमिर अन्धकारादि प्रतिबन्धक न रहनेपर नेत्र रूपको प्रत्यक्ष करता है यह दृष्टान्त है एवम्भूत कोई आत्मा है यह उपनय है अतः सकलपदार्थको प्रत्यक्ष करनेवाले ( सर्वज्ञ ) हैं यह निगमन है । हेतुमें तद्ग्रहणस्वभावत्वरूप विशेषणासिद्धिकी आशङ्का करके परिहार करते हैं । ( न तावदित्यादि चोदनेति ) चोदनाविधि तथा च विविधास्रसे आत्माको अशेषार्थ ग्रहणस्वभावत्व सिद्ध है ॥ १३ ॥ नान्यथानुपपत्त्या सर्वमनेकान्तात्मक, सत्त्वादिति व्याप्तिज्ञा- नोत्पत्तेश्च । चोदना हि भूतं भवन्तं भविष्यन्तं सूक्ष्मं व्यवहितं १ बुद्धादयो ह्यवेदाज्ञा स्तेषां वेदायसम्भवात् । उपदेश कृतोऽन्येभ्यो मोहादेव केवलम् ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । (५७)

विप्रकृष्टमित्येवंजातीयकमर्थमवगमयतीत्येवंजातीयकैरध्वरमी- मांसागुरुभिर्विधिप्रतिषेधविचारणानिबन्धनं सकलार्थविषय- ज्ञानं प्रतिपद्यमानैः सकलार्थग्रहणस्वभावकत्वमात्मनोऽ- भ्युपगतम्। न चाखिलार्थप्रतिबन्धकावरणप्रक्षयानुपपत्तिः स- म्यग्दर्शनादित्रयलक्षणस्यावरणप्रक्षयहेतुभूतस्य सामग्रीविशे- षस्य प्रतीतत्वात् अनया मुद्रयापि क्षुद्रोपद्रवा विद्राव्याः ॥१४॥ यथा 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि विधिवाक्योंसे भूत भविष्यत् वर्तमान, एव सूक्ष्म, व्यवहित, दूर, निकटादि वस्तुज्ञान पूर्वमीमांसकोंने माना हे तैसे आर्हंत सिद्धान्तमें भी विधिप्रतिषेधात्मक आगमबलसे अतीतानागत सूक्ष्म व्यवहितादि निखिलार्थ ग्रहण सम्भव होगा किञ्च अर्हन्मुनिने स्याद्वाद ( अनेकान्तपक्ष ) अर्थात् अनि- श्चित पक्ष माना हे उसमें व्याप्तिज्ञानकी अपेक्षा होती हे अतः व्याप्तिज्ञान वस्तुप्र- त्यक्षके बिना अनुपपन्न है इससे भी सर्वज्ञ सिद्ध हो सकता है । विशेष्यासिद्धि- माशक्य परिहार ( नचाखिलार्थेत्यादि ) समस्तवस्तुसाक्षात्काका प्रतिबन्धक जो दुरित है उसका विनाश अनुपपन्न है यह नहीं कहसकते क्योंकि सम्यकदर्शन ज्ञानचारित्रादिसे प्रतिबन्धक आवरणविनाश सम्भव है ॥ १४ ॥ नन्वावरणप्रक्षयवशादशेषविषयं विज्ञानं विशदं मुख्यप्रत्यक्षं प्रभवतीत्युक्तम्। तदयुक्तम्, तस्य सर्वज्ञस्यानादिमुक्तत्वेनावर- णस्यैवासम्भवादिति चेत्तन्न, अनादिमुक्तत्वस्यैवासिद्धेन सर्वज्ञोऽनादिमुक्त मुक्तत्वादितरमुक्तवत् बद्धापेक्षया च मुक्त- व्यपदेश• तद्रहिते चास्याप्यभावः स्यादाकाशवत् ॥ १५ ॥ ( नन्विति ) आवरणक्षय होनेपर निखिलविषयक स्फुटावभासरूप प्रत्यक्ष होता है, यह कहना अयुक्त है कारण सर्वज्ञ जब अनादि और मुक्त है तब आवरण ही अस- म्भव है । निराकरण ( नेति ) अनादित्व और मुक्तत्व दोनों परस्पर बाधित हैं जैसे घटध्वंस अनादि नहीं होता किन्तु घट फूटनेपर होता हे तैसे ही मोक्ष भी बन्धनि- वृत्ति है न की सामान्यतः बन्धाभावमात्र अत. यदि मुक्त है तो अनादि नहीं हो सकता इसमे अनुमान भी दिखाते हैं सर्वज्ञ यह पक्ष है अनादि मुक्त नहीं यह साध्य है मुक्त होनेसे यह हेतु है अन्यमुक्तवत् दृष्टान्त है । उक्तार्थका उपपादनभी करते हैं बद्धके अपेक्षा मुक्त होता है यदि बद्ध न होता तो आकाशादिवत् कभी भी मुक्त नहीं हो सकता ॥ १५ ॥

( ५८ ) सर्वदर्शनसङ्ग्रहः । [ आर्हत- नन्वनादे क्षित्यादिकार्यपरम्परायाः कर्तृत्वेन तत्सिद्धिः । तथाहि क्षित्यादिकं सकर्तृकं कार्य्यत्वाद् घटवदिति, तदप्यस- मीचीनं कार्य्यत्वस्यैवासिद्धे । न च सावयवत्वेन तत्साधनमि- त्यभिधातव्यं यस्मादिदं विकल्पजालमवतरति ॥ १६ ॥ नैयायिकादिकाके अभिमत नित्य सर्वज्ञ ईश्वर साधक अनुमानको पूर्व पक्ष करके दूषित करते हैं (नन्वनादेरित्यादि) यह नियम है कि जो जो कार्य है वह सब सकर्तृक होते हैं तथाच पृथिव्यादि सभी घटादिवत् कार्य होनेसे सकर्तृक होगा. कर्ता वही होसकता है जो स्वकार्यके उपयुक्त उपादान सम्प्रदानादि निखिलवस्तु- ओके साक्षात्कारमें समर्थ हों अतः पृथिव्यादि समस्त कार्यके तादृश कर्ता सर्वज्ञ ही होसक्ते हैं उक्तानुमानको प्रयोजक हेतुको स्वरूपासिद्धि दोषसे दूषित करते हैं (तदप्यसमीचीनमिति) कार्यत्व ही असिद्ध है हेतुको स्वरूपासिद्धत्व परिहारके लिये अनुमानान्तरसे कार्यत्वसाधन शंका करते हैं (नचेति) जहां जहां सावयवत्व है वहा वहा कार्यत्व रहता है ऐसी व्याप्ति है तथा च पृथिव्यादिक पक्ष है, कार्यत्व साध्य है सावयवत्व हेतु है, घटवत् दृष्टान्त है इसको भी स्वरूपासिद्धिसे दूषित करते हैं (यस्मादित्यादि) ॥ १६ ॥ सावयवत्वे किमवयवसंयोगित्वम्, अवयवसमवायित्वम्, अव- यवजन्यत्वम्, समवेतद्रव्यत्वम्, सावयवबुद्धिविषयत्वं वा । न प्रथम आकाशादावनैकान्त्यात् । न द्वितीय सामान्यादौ व्यभिचारात्। न तृतीय साध्याविशिष्टत्वात् । न चतुर्थः विक- ल्पयुगलार्गल्यहगलत्वात्। समवायसम्बन्धमात्रवद्द्रव्यत्वं समवे- तद्रव्यत्वम् अन्यत्र समवेतद्रव्यत्वं वा विवक्षितं हेतु क्रियते । आद्ये गगनादौ व्यभिचार , तस्यापि गुणादिसमवायत्वद्रव्य- त्वयो संभवात् । द्वितीये साध्याविशिष्टता अन्यशब्दाथेषु सम- वायकारणभूतेष्ववयवेषु समवायस्य साधनीयत्वात् । अभ्युपग- म्येतदभाणि वस्तुतस्तु समवाय एव न समस्ति प्रमाणाभावात्। नापि पञ्चमः आत्मादिनानैकान्त्यात् तस्य सावयवबुद्धिविषय-

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( ५९ ) त्वेऽपि कार्य्यत्वाभावात् । न च निरवयवत्वेऽप्यस्य सावयवार्थ सम्बन्धेन, सावयवत्वबुद्धिविषयत्वमौपचारिकमित्यप्यन्य निरव- यवत्वे व्यापत्वाविरोधात् परमाणुवत् ॥ १७ ॥ विकल्पोंको दिखाते हैं ( सावयवत्वेति ) सावयवत्वंसं आपको क्या विवक्षित है अवयवोंका जिसमें संयोग हो वह विवक्षित है १ या अवयवका जिसमें समवाय हो वह विवक्षित है २ अथवा अवयवसे उत्पन्नत्व विवक्षित है ३ किंवा समवेत द्रव्यत्व विवक्षित है ४ यद्वा सावयवबुद्धि विषयत्व विवक्षित है ५ ? एक- एकको क्रमशः दूषित करते हैं ( न प्रथमेत्यादि ) आकाशको जितने अवयव हैं वह सब आकाशहीमे संयुक्त है परन्तु नैयायिकोंके मतमें आकाशमें कार्यत्व न होनेसे सावयवत्वरूप हेतु साध्याभावमें वर्तमान होनेके कारण अनैकान्त्य अर्थात् व्यभि- चारी होगया आकाशमें सावयवत्व नहीं है ऐसा तो नहीं कहसकते क्योंकि यदि सावयव नहीं होता तो परमाणुवत् व्यापक भी नहीं होसकता अथवा घटाकाशका जिस प्रकार संयोग है उस प्रकार घटावयव कपालादिकेसाथ भी संयोग होनेसे अव- यवसंयोगित्वरूप सावयवत्व आकाशमें गया कार्यत्व नहीं गया ( नाद्वितीयेोति ) पूर्ववत् घटत्वद्रव्यत्वादि सामान्य जिस प्रकार घटमें समवेत हैं तिस प्रकार घटावय- वमें भी समवेत है क्योंकि घटत्वादिक घटादिके सब अवयवोंमें व्याप्त है अत. अव- यवसमवायित्व सामान्यादिमें गया किन्तु कार्यत्व नहीं गया अतः यहभीसामान्यमें व्यभिचारी होगया ( न तृतीयेोति ) साध्यसे अविशिष्ट है । तात्पर्य-अवयव समुदाय ही घटादि कार्य है वस्त्वन्तर नहीं ऐसे कहनेवालोके मतमे कार्यत्ववत् अवयवजन्य- त्वरूप सावयवत्व भी साध्यनीय होनेसे साध्योपेक्षा कुछ भी विशेष नहीं हुआ । ( नचतुर्थोति ) विकल्पद्वयसे निरुत्तरित है तथाहि समवेत द्रव्यत्वसे क्या समवाय- सम्बन्धवान् होकर द्रव्यत्ववान् हो यही विवक्षित है, या अन्यत्र समवेत होकर द्रव्यत्ववान् हो यह विवक्षित है । प्रथम पक्ष आकाशमें व्यभिचारित है क्योकि आकाशमे भी गुणादिका समवायत्व और द्रव्यत्व दोनों हैं। यदि अन्यत्र समवेत- त्वादि द्वितीय पक्ष कहो सो भी ठीक नही कारण पटसे अन्यत्वेन अभिमत पटावयव-, तन्तुमें समवेत ( समवायसम्बन्धसे विद्यमान ) होनेके कारण पटादिको अन्यत्र समवेतत्व कहोगे परन्तु पटके कारणीभूत पटावयवत्वसे विवक्षित तन्तु पटसे अन्य है इसमें प्रमाण न होनेके कारण यह भी अनुमानान्तरसे साधन करना होगा, अतः कार्यत्ववत् अन्यत्र समवेतत्वरूप सावयवत्व भी साध्यनीय होनेसे साध्यसे विशेष कुछभी नहीं हुआ अर्थात् हेतुका स्वरूप ही असिद्ध है । " तुष्यतु दुर्जन "

( ६० ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ आर्हत- इस न्यायसे अनभिमतको भी मानकर इतना प्रपञ्च बढाया वस्तुत समवायसत्तामें कोई प्रमाण ही नही । पञ्चमका खण्डन करते हैं ( आत्मादिनेति ) सावयवबुद्धि- विषयत्व आत्मा सावयव है ऐसा ज्ञानवेद्यत्व आत्मामें है परन्तु कार्यत्व नहीं इस लिये हेतु व्यभिचारी होगा । आत्माके निरवयवत्वका खण्डन करते है ( नचेत्यादि ) आत्मा वस्तुत' निरवयव है तथापि सावयव घटादि अर्थके साथ सम्बन्ध होनेसे सावयवबुद्धिबोध्यत्व आरोपित है ऐसा भी नहीं कहसकते क्योंकि निरवयवपदार्थ व्यापक नहीं होसकता अन्यथा परमाणु भी व्यापक होनेलगेगा ॥ १७ ॥ किञ्च किमेक कर्त्ता साध्यते कि वा स्वतन्त्र । प्रथमे प्रासा- दादौ व्यभिचार स्थपत्यादीनां बहूनां पुरुषाणां तत्र कर्तृत्वो- पलम्भात् । न द्वितीय लाघवादेनेनैव सकलजगज्जनननोत्प- त्तावितरवैयर्थ्यापातात् ॥ १८ ॥ उक्तानुमानको प्रकारान्तरसे भी दूषित करते हैं ( किञ्चेत्यादि ) क्या कार्यत्व हेतुसे एक कर्ता सिद्ध करते हो १ या स्वतन्त्र कर्ता २ विशाल गृह प्रासादादि कार्य एकसे किया हुआ कहीं दृष्ट नहीं आता किन्तु तक्षकादि अनेक शिल्पियोंसे निर्मित ही दृष्ट हे अत एककर्तृकत्वरूप साध्य गृहादिकमें व्यभिचरित है यदि स्वतन्त्र कर्ता मानो तो घटपटादि समस्त कार्य उसीसे उत्पन्न हो जाते पुन' कुलालादि कर्ताकी आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिये ॥ १८ ॥ तदुक्त वीतरागस्तुतौ-“कर्त्तास्ति नित्यो जगत स चैक स सर्वग सन् स्ववश स सत्य । इमा कुहेवा कुविडम्बना स्यु- स्तेषां न येषामनुशासकस्त्वम् ॥ " इति ॥ अन्यत्रापि-कर्त्ता न तावदिह कोऽपि यथेच्छया वा दृष्टोऽन्यथा कटकृतामपि तत्प्रसङ्ग । कार्ये किमत्र भवतापि च तक्षकाद्यैराहत्य च त्रिभुवन पुरुष करोति ॥ " इति । तस्मात् प्रागुक्तकारणत्रि- तयमलादावरणक्षये सार्बज्ञ्यं युक्तम् ॥ १९ ॥ इसमें प्राचीन सम्मति भी कहते हैं ( तदुक्तमिति ) समस्त संसारका एक कर्ता है वह व्यापक सत् और स्वतन्त्र है । इत्यादि दुराग्रह और विडम्बना उन्हीं लोगोंकी है जिनके शिक्षक अर्हत न थे ( अन्यत्रापीति ) स्वेच्छासे इस संसारको बनानेवाला कोई नहीं दृष्टि आता है यदि सम्पूर्ण संसारका कर्ता अन्य किसीको मानो तो

घटपटादि कार्य भी उन्हीसे होजाता । बढई लोहार कुम्हार तन्तुवाय प्रभृतिसे आपको प्रयोजन ही क्या है यह ईश्वरकारणवादी ऊपर उपालम्भ है। उपसंहार (तस्मादिति ) पूर्वोक्त सम्यक्ज्ञान सम्यग्दर्शन सम्यक्चरित्ररूप कारणत्रयसे आवरण ( अविद्या ) निवृत्ति होनेसे सर्वज्ञत्व उपपन्न होता है यह सिद्ध हुआ ॥ १९ ॥ न चास्योपदेष्ट्रन्तराभावात् सम्यग्दर्शनादित्रितयानुपपत्ति- रिति भणनीयम् पूर्वसर्वज्ञप्रणीतागमप्रभवत्वादमुष्या शेषार्थ- ज्ञानस्य । न चान्योन्याश्रयतादिदोष आगमसर्वज्ञपरम्पराया बीजाङ्कुरवदनादित्वाङ्गीकारादित्यलम् ॥ २० ॥ यदि कहो अर्हन्को उपदेष्टा न होनेसे सम्यग्दर्शनादिका सम्भव नहीं सो भी नहीं पूर्वपूर्व सर्वज्ञप्रणीत आगमसे इनको भी सर्वज्ञत्व होसकता है यदि कहो आगमसे सर्वज्ञत्व होगा सर्वज्ञ होनेपर आगमप्रणयन और उसका प्रामाण्य पूर्वकारिकोक्त प्रकार अन्यो- न्याश्रयग्रहग्रस्त है सो भी नहीं जिस प्रकार बीजके बिना अङ्कुर और अङ्कुरके बिना बीज न होसकनेपर भी बीजाङ्कुर दोनों अनादि होनेसे अन्योन्याश्रय नहीं माने जाते हैं तिसी प्रकार सर्वज्ञ और तत्प्रणीत आगमपरम्परा दोनों अनादि होनेसे अन्योन्याश्रय दोष नहीं होता हे ॥ २० ॥ रत्नत्रयपदवेदनीयतया प्रसिद्धं सम्यग्दर्शनादित्रितयमर्हत्प्रवचन- संग्रहपरे परमागमसारे प्ररूपितं ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग 'इति। विवृतञ्च योगदेवेन येन रूपेण जीवाद्यर्थो व्यव- स्थितस्तेन रूपेणार्हता प्रतिपादिते तत्त्वार्थे विपरीताभिनिवेश- रहितत्वाद्यपरपर्यायं श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् । तथा च तत्त्वार्थ- सूत्रं “तत्त्वार्थे श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्” इति ॥ २१ ॥ सम्यग्दर्शनादि त्रितय मोक्षमार्गत्वेनाभिमत रत्नत्रयवाच्यं प्राचीनसम्मति कहते हैं ( परमागमसारे निरूपितमिति-विवृतचेति ) जो वस्तु जिस रूपसे वर्तमान हो उसी प्रकार जिनदेवप्रतिपादित तत्त्वार्थमें विपरीत अभिनिवेश छोडकर श्रद्धा सम्पादन करनेका नाम सम्यग्दर्शन हे सूत्रकारने भी कहा है “तत्त्वार्थश्रद्धान सम्यग्दर्शनम्” इति । तत्त्वसे निश्चित किया जाय वह तत्त्वार्थ है अथवा तत्त्वरूप अर्थ तत्त्वार्थ हे तच्च “जीवाजीवास्त्रवसंवरवन्धनिर्जरामोक्षास्तत्वम् ” इत्यादि सूत्रोक्त हे । यदि अर्थश्र- द्धा इतनाही कहते तो यावत् घटादि अर्थ श्रद्धाको भी मोक्षमार्गत्वप्रसङ्ग होगा इस के १ ध्वानस्त्यादिदोष । इति वा ।

( ६२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ आर्हत- वारण करनक लिए तत्त्वपद कहा। यदि तत्त्वश्रद्धा इतनाही कहदत तो किसीके मतमे द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादिसत्ता तत्त्व है "पुरुष एवेदम्" इत्यादिवचनोंसे किसी के मतमें एक पुरुषही तत्त्व है अत. व्यभिचारवारणार्थ तत्त्व अर्थ दोनोंका उपादान किया यद्यपि दर्शनका अर्थ चाक्षुषज्ञान है तथापि मोक्षमकरण होनेसे प्रसिद्धार्थ छोडकर श्रद्धारूपी अर्थ लियागया आत्मपरिणामरूप तत्त्वार्थ श्रद्धा मोक्षका साधन होसकता है प्रत्यक्षरूप दर्शन आलोक चक्षुगदि निमित्त होनेसे मोक्षका साधन नहीं होसकता ॥ २१ ॥ अन्यदपि-“रुचिर्जिनोक्ततत्त्वेषु सम्यक् श्रद्धानमुच्यते । जा- यते तन्निसर्गेण गुरोरधिगमेन वा ॥” इति । परोपदेशनिरपेक्षमा- त्मस्वरूपं निसर्गः । व्याख्यानादिरूपपरोपदेशजनितं ज्ञानम- धिगम । येन स्वभावेन जीवाद्य पदार्थाः व्यवस्थिता तेन स्वभावेन मोहसंशयरहितत्वेनावगम सम्यग्ज्ञानम् ॥ यथो- क्तम्- “यथावस्थिततत्त्वानां संक्षेपाद्विस्तरेण वा। योऽवबो- धस्तमत्राहु सम्यग्ज्ञानं मनीषिणः ॥” इति । तज्ज्ञानं पञ्चविध मतिश्रुतावधिमनःपर्य्यायकेवलभेदेन । तदुक्तम्- “मतिश्रुतावधिमन पर्य्यायकेवलानि ज्ञानम् ” इति । अस्यार्थ.-ज्ञानावरणक्षयोपशमे सति इन्द्रियमनसी पुरस्कृत्य व्यापृत सन् यथार्थं मनुते मतिः । ज्ञानावरणक्षयोपशमे सति मतिजनितं स्पष्टं ज्ञानं श्रुतम् । असम्यग्दर्शनादिगणज- नितक्षयोपशमनिमित्तम् अनच्छिन्नविषय ज्ञानमवधि. ॥ २२ ॥ ( अन्यदपीति ) जिनदेवके कहे हुए तत्त्वोंमें सम्यक्प्रीतिको नाम श्रद्धान है वह निसर्गसे अथवा गुरूपदेशसे होता है "तन्निसर्गादधिगमाद्वा” इति दर्शन मोहन क्षय ओग क्षयोपशमादि रहनेपर वाह्योपदेशनिरपेक्ष जो आत्मस्वरूपज्ञान है वह नि- सर्ग है परोपदेशसे ज्ञायमान जीवादिज्ञान अधिगम है । “प्रमाणनयैरधिगम” इति सम्यग्ज्ञानका निरूपण करते हैं ( येनस्वभावेनेति ) मोहमंशयरहित होकर यथावस्थित जीवादिज्ञान सम्यक्ज्ञान है वह भी मति आदिभेदसे पांच प्रकार है ज्ञान शब्दका प्रत्येकम सम्बन्ध है अर्थात् मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान इत्यादि ज्ञानकी आवरण अविद्याका नाश होनेपर इन्द्रिय ओर मनद्वारा वस्तुका यथावस्थित

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत. । ( ६३ ) स्वरूप ज्ञान जिससे हो वह मति है एव ज्ञानावरण क्षय होनेपर मननसे जायमान स्फुटतर ज्ञान श्रुत हे । (असम्यग्दर्शनादीति ) असम्यक्दर्शनादिसे जनित जो क्षय है उसके उपशम होनेपर नियत विषय ज्ञानका नाम अवधि है ॥ २२ ॥ ईर्ष्यान्तरायज्ञानावरणक्षयोपशमे सति परमनोगतस्यार्थस्य स्फुटं परिच्छेदकं ज्ञानं मनःपर्य्याय. । तपःक्रियाविशेषान् यदर्थं सेवन्ते तपस्विनस्तज्ज्ञानासंस्पृष्टं केवलम् । तत्राद्ये परोक्षं प्रत्यक्षमम्यत् । तदुक्तम्- "विज्ञानं स्वपराभासि प्रमाणं बाधवर्जितम् । प्रत्यक्षञ्च परोक्षञ्च द्विधा मेयविनिश्चयात् ॥ " इति । अन्तर्गतिकभेदस्तु सविस्तरस्तत्रैवागमेऽवगन्तव्यः॥२३॥ ( ईर्ष्यान्तरायादि ) ज्ञानका आवरण अविद्या शान्त होनेपर दूसरेके मनके अभि- प्रायका स्पष्ट प्रतिभास होना मनःपर्य्याय हे अर्थात् मन.शब्द लक्षणासे मनोवृत्तिको कहनेवाला है उस मनकी वृत्तिको जो पर्ययण अर्थात् प्राप्त करे वह मन पर्य्याय कहाता है । वाह्याभ्यन्तर क्रियाविशेषको तपस्वी लोग जिस लिये सेवन करते हों वह ज्ञानसे अस्पृष्ट अर्थात् असहाय केवल है । प्रत्यक्ष परोक्ष दो प्रमाण हैं तत्र मति और श्रुत दोनों परोक्ष हैं, अन्य तीन प्रत्यक्ष हैं. इस अभिप्रायसे कहते हैं. ( जाये परोक्षमिति ) भ्रमरहित स्वपरप्रतिभासक विज्ञान प्रमाण हे वह प्रत्यक्ष परोक्षभेदसे दो प्रकार है उपमानार्थापत्त्यादि व्यावृत्तिके लिये कहते हैं मेयविनिश्चयादि उक्त दो ही प्रमाणद्वारा पदार्थ निश्चय होनेसे अधिक कल्पना व्यर्थ हे इसका अवान्तरभेद सर्वार्थसिद्धिग्रन्यमें प्रपञ्चित है ॥ २३ ॥ संसरणकर्मोच्छित्तावुद्यतस्य श्रद्दधानस्य ज्ञानवतः पापगमन- कारणक्रियानिवृत्तिः सम्यक्चारित्रम् । तदेतत् सप्रपञ्चमुक्त- मर्हता ॥ "सर्वथावद्ययोगानां त्यागश्चारित्रमुच्यते । कीर्तितं तदहिंसादिव्रतभेदेन पञ्चधा । अहिंसासूनृतातयब्रह्मचर्याप- रिग्रहा ॥ न यत् प्रमादयोगेन जीवितव्यपरोपणम् । चराणां १ अवायन्ति व्रजन्तीति अवाया पुद्गला तान् दधाति जानाति इति अवधि अवग्धान वा। पुद्गल परिज्ञानसे अथवा द्रव्य क्षेत्र काल भावोंसे जो परिच्छिन्न किया जाय वह अवधि है । यह व्याख्या सर्वार्थसिद्धिस्य है

( ६४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [- आर्हत- स्थावराणां च तदहिंसाव्रतं मतम् ॥ प्रियं पथ्यं वचस्तथ्यं सूनृतं व्रतमुच्यते । तत्तथ्यमपि नो तथ्यमप्रियं चाहितं च यत् ॥ अनादानमदत्तस्यास्तेयव्रतमुदीरितम् । वाह्या प्राणा नृणामर्थो हरता तं हता हि ते ॥ दिव्यौदार्यिककामानां कृतानुमतका- रितै ॥ मनोवाक्कायतस्त्यागो ब्रह्माष्टादशधा मतम् ॥ २४ ॥ संसार हेतु कर्मकी निवृत्ति सम्यक् चारित्र है यह सब अर्हत्ग्रन्थमे प्रपंचित है (सर्वयेत्यादि) निन्दित कर्मका सर्वथा त्याग चारित्र है वह अहिंसादि व्रतभेदसे पाँच प्रकार है. अहिंसा १ अपरिग्रह २ अस्तेय ३ ब्रह्मचर्य ४ सूनृत ५ यह पाँच हैं चर, वा स्थावररूप प्राणियोंको प्रमाद् अर्थात् क्रोध, मान, माया, लोभरूप चतु- र्विध कषायमे जीवित (दश इन्द्रियोंका) वियोग न करना अहिंसाव्रत है । अतएव तत्त्वार्थसूत्र “प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इति ॥ प्रिय, हित, और सत्य- वचन सूनृत व्रत है तथ्य भी हो परन्तु अप्रिय ओर अहित हो तो उसको अस- त्यके समान जानना चाहिये । तथा च मनुः 'सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान ब्रूयात्सत्य- मप्रियम् । प्रियञ्च नानृतं ब्रूयादेष धर्म सनातन ॥” इति । तत्वार्थसूत्र “असदभिधानमनृतम्” इति । जो नहीं दिये हुए वस्तुको ग्रहण करना स्तेय (चोरी) है उससे भिन्न अस्तेय है क्योंकि धन प्राणियोंके बाह्य प्राण है अतः उस प्राणको हरनेसे प्राणी हत होता है । तथा च सूत्रम् 'अदत्तादानं स्तेयम्” इति । दिव्य और औदार्यिक कामको मन कर्म बचनसे त्यागना ब्रह्मचर्य है वह अठारह प्रकार है ॥ २४ ॥ सर्वभावेषु मूर्छायास्त्याग स्यादपरिग्रह । यदसत्स्वपि जायेत मूर्छया चित्तविप्लव ॥ भावनाभिर्भावितानि पञ्चभि पञ्चधा क्रमात् । महाव्रतानि लोकस्य साधयन्त्यव्ययं पदम् ॥” इति। भावनापञ्चकप्रपञ्चनं च प्ररूपितम् - "हास्यलोभभयक्रो- धप्रत्याख्यानैर्निरन्तरम् । आलोच्य भाषणेनापि भावयेत् सूनृतं व्रतम् ॥” इत्यादिना । एतानि सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मिलितानि । मोक्षकारणं न प्रत्येकं यथा रसायनसाधनानि सम्भूय रसायनफलं साधयन्ति न प्रत्येकम् ॥ २५ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( ६५ ) समस्त वस्तुओंमें मोहविशेषका त्याग अपरिग्रह है । क्योंकि मूर्च्छासे निन्दित वस्तुओंमेंभी मनकी आसक्ति होजाती है । उक्त पाँचों व्रत वक्ष्यमाण पाँच प्रकारकी भावनाओंमे अनुष्ठित होनेपर प्राणियोंका अव्यय पद प्राप्त कराते हैं। पाँच भावनाओंके कहते हैं। हास्य, लोभ, त्याग, भय और क्रोध इनका त्याग तथा सदा विचारपूर्वक भाष- णरूपी पाच भावनाओंसे सूनृत व्रतको सम्पादन करे एवं अन्य चारों व्रतोंमें भी प्रत्येक पाँच पाँच प्रकारकी भावना करे । जिस प्रकार रसायनादि औषधियोंके लिये जितनी सामग्री अपेक्षित हे वह सब मिलकर रसायनका फल उत्पन्न करती हैं न की केवल एक एकवस्तु तादृश फल देसकती है उसी प्रकार सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र मिलकर मोक्षकाकारण है ॥ २५ ॥ अत्र सङ्क्षेपतस्तावज्जीवाजीवाख्ये द्वे तत्त्वे स्तः। तत्र बोधात्मको जीवः, अबोधात्मकस्त्वजीवः। तदुक्तं पद्मनन्दिना "चिदचिद्वे परे तत्त्वे विवेकस्तद्विवेचनम्। उपादेयमुपादेयं हेयं हेयं च कुर्वतः ॥ हेयं हि कर्तृरागादि तत् कार्यमविवेकिनः। उपादेयं परं ज्योति- रुपयोगैकलक्षणम् ॥" इति। सहजचिद्रूपपरिणति स्वीकुर्वाण- ज्ञानदर्शने उपयोग । स परस्परप्रदेशानु प्रदेशन्बधात्कर्मणै- कीभूतस्यात्मनोऽन्यत्वप्रतिपत्तिकारणं भवति ॥ २६ ॥ सक्षेपत तत्त्वविचार-जीव और अजीव दो तत्त्व हैं बोधरूप अर्थात् चेतनालक्षण जीव है इससे विपरीत अचेतन अजीव है । ( चिदाचिद्वेति ) उक्तार्थ कर्तृत्व रागादि हेय है वह अविवेकका कार्य है । परज्योति उपादेय है वह मतिज्ञान श्रुतज्ञान मत्य- ज्ञान श्रुताज्ञानादि भेदयुक्त ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग स्वरूप है । वह उपयोग कर्मवश परस्पर प्रदेश संयोगसे एकीभूत आत्माको अन्यत्वप्रतीतिका कारण है ॥२६॥ १ तथा च तत्त्वार्थसूत्र " तत्स्थैर्यार्थ भावना पच पच " तत्स्थैर्य पूर्वोक्त व्रतपुष्टिके लिये प्रथमव्रतम " वाङ्मनोगुप्तिर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि पच " द्वितीयमें- " क्रोध लोभ भीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचिभापणञ्च पञ्च " इति । तृतीयमें- " शून्यागारे विमोचितावासे परोपरोधाकरणे भैक्ष्यशुद्धि सद्धर्माविसंवादा पञ्च " इति । ब्रह्मचर्यव्रतभावना " स्त्रीरागकथाश्रवण तन्मनोहराङ्गनिरीक्षण पूर्वतानुस्मरण वृष्येतरस स्वश- रीरसंस्कारत्यागा पच " इति । अपरिग्रहव्रत भावनाः-"मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्ज- नानि पञ्च " इति । इन सूत्रोंका विस्तृत व्याख्यान सर्वार्थसिद्धिमें है यहां केवल नामनिर्देश मात्र किया है ।

( ६६ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत- सकलजीवसाधारणं चैतन्यमुपशमक्षयक्षयोपशमवशादौपश- मिकक्षायात्मकक्षायोपशामिकभावेन कर्मोदयवशात् कालुष्या- कारेण च परिणतजीवपर्यायजीवविवक्षायां स्वरूपं भवति । यदवोचद्वाचकाचार्य्य - "औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रं च जीवस्य सत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ चेति । अनुदयप्राप्तिरूपे कर्मण उपशमे सति जीवस्योत्पद्यमानो भाव औपशमिकः । यथा पङ्के कलुषतां कुर्वति कतकादिद्रव्यसम्बन्धादधः पतिते जलस्य स्वच्छता । कर्मणः क्षयोपशमे सति जायमानो भाव- क्षायिकः । यथा मोक्षः । उभयात्मा भावो मिश्रः । यथा जलस्या- र्द्धस्वच्छता । कर्मोदये सति भवन् भाव औदयिकः । कर्मोपश- माद्यनपेक्षः सहजो भावश्चेतनत्वादिः पारिणामिकः । तदेतत् स्वतत्त्वं यथासम्भवं भव्यस्याभव्यस्य जीवस्य तत्त्वं स्वरूप- मिति सूत्रार्थः ॥ २७ ॥ समस्त जीव साधारण चैतन्य उपशम, क्षय, क्षयोपशम, निमित्तसे ओपशामिक क्षायिक, क्षयोपशामिक भाव वश कर्मोदय और कालुष्यसे अन्याकारमे परिणत जीवपर्यायका स्वरूप होता है इसमें तत्त्वार्थसूत्र प्रमाण भी देते हैं (यदवोचदित्यादि ) आत्मामें कर्मरूप स्वशक्तिका किसी कारणवश प्रादुर्भाव न होना उपशम है तादृश उपशमके अनन्तर जीवका उत्पद्यमान भाव औपशमिक है । जिस प्रकार जलको कलुषित करनेवाला कर्दम निर्मलीके संयोगसे जब नीचे बैठ जाता है तब जलकी निर्मलता होती है । अत्यन्त निवृत्ति क्षय है तथा च कर्मका क्षय होनेसे उत्पन्न भाव क्षायिक है जिस प्रकार स्फटिकादि पात्रमें रखे हुए जलमें कर्दमका अत्यन्त अभाव होता है वैसी जीवकी मोक्षदशामें कर्मोंका अत्यन्त अभाव है । उभयात्मक भाव मिश्र है जिस प्रकार जलमें आधी स्वच्छता द्रव्यादिनिमित्तसे कर्म फलप्राप्तिका नाम उदय है कर्मोद्यमे जायमान भाव औदयिक है कर्मोपशमनिरपेक्ष सहज होनेवाला चेतन त्वादि अर्थात् द्रव्यात्मलाभ मात्र निमित्तक परिणामिक हे उक्त पाँच भाव यथा- योग्य भव्याभव्यात्मक जीवका स्वरूप है ॥ २७ ॥ तदुक्तं स्वरूपसम्बोधने—“ज्ञानाद् भिन्नो न चाभिन्नो भिन्ना-

दर्शनम् ] . भाषाटीकासमेत. । ( ६७ ) भिन्नः कथञ्चन । ज्ञानं पूर्वापरीभूतं सोऽयमात्मेति कीर्तितः ॥" इति ॥ २८ ॥ ( तदुक्तमिति ) ज्ञानसे अत्यन्त भिन्न या अत्यन्त अभिन्न आत्मा नहीं है किन्तु भिन्नाभिन्न अर्थात् पूर्वापरोभूत ज्ञानको आत्मा कहते हैं ॥ २८ ॥ 'ननु भेदाभेदयोः परस्परपरिहारेणावस्थानादन्यतरस्यैव वास्त- वत्वादुभयात्मकमयुक्तमिति चेत्तदयुक्तम्, बाधे प्रमाणाभावात्। अनुपलम्भो हि बाधकं प्रमाणं न सोऽस्ति समस्तेषु वस्तुष्वने- करसात्मकत्वस्य स्याद्वादिनो मते सुप्रसिद्धत्वादित्यलम् ॥ २९ ॥ भेदाभेदका विरोधाभाव समर्थन-( ननु इत्यादि ) यथा घटसे भिन्न पट है घटमें पटका भेद अर्थात् अभाव है तहा घट नहीं रहसकता अभेद अर्थात् भेदाभाव घटमें पटका भेदाभाव पटरूपता है तथा च भेदाभेद परस्पर विरुद्ध होनेसे एकत्र नहीं रह सकते । नैयायिकोंने भी भेदका प्रतियोगितावच्छेदकके साथ और अभावका प्रतियोगीके साथ विरोध माना है अतः परस्पर विरुद्ध होनेसे एकको सत्यत्व और अन्यको मिथ्यात्व कहनाहोगा । उत्तर(तदयुक्तमिति ) सहानवस्थान लक्षण ही विरोध है विरोध होनेपर बाध्यबाधकभाव होता है बाधमें कोई प्रमाण ही नहीं घट जहापर है वहा घटाभाव उपलब्ध नहीं होता न घटाभाव व्यवहार भी नहीं होता है अत अनुपलब्धरूप ही प्रमाण कहोगे सो भी ठीक नहीं क्योंकि स्याद् वादियोंके मतमें समस्तवस्तुओंमें अनेकान्तात्मक अर्थात् ( स्यादस्ति स्यान्नास्ति ) इत्यादि अनिश्चयात्मक रहता है अतः आर्हत् मतमें कोई विरोध ही नहीं ॥ २९ ॥ अपरे पुन जीवाजीवयोरपरं प्रपञ्चमाचक्षते जीवाकाशधर्माधर्म- पुद्गलास्तिकायभेदात् । एतेषु पञ्चसु तत्त्वेषु कालत्रयसम्ब- न्धितया स्थितिव्यपदेशः, अनेकप्रदेशत्वेन शरीरवत् कायव्य- पदेशः । तत्र जीवा द्विविधाः, संसारिणो मुक्ताश्च । भवाद्भवा- न्तरप्राप्तिमन्त संसारिण । ते च द्विविधा , समनस्का अमन- स्काश्च । तत्र संज्ञिनः समनस्का , शिक्षाक्रियालापग्रहणरूपा संज्ञा, तद्विधुरास्त्वमनस्काः । ते चामनस्का द्विविधा , त्रस- स्थावरभेदात् । तत्र द्वीन्द्रियादय शङ्खगण्डोलकप्रभृतयश्चतु- र्विधास्त्रसाः ॥ ३० ॥

( ६८ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-

तत्त्वपञ्चक वादिका मत-(अपरेषु नास्त्यादि) जीव, आकाश, धर्म, अधर्म, पुद्गल अस्तिकायशब्दका प्रत्येकमे सम्बन्ध है अर्थात् जीवास्तिकाय आकाशास्तिकाय इत्यादि इन पांच तत्त्वोंमे कालत्रयसम्बन्धसे स्थिति व्यवहार और अनेक प्रदेश होनेसे शरीरवत् काय व्यवहार योग्य होनेसे अस्तिकाय कहा जाता है। संसारी और मुक्त भेदसे जीव दो प्रकार है ससरण अर्थात् परिवर्तनशील संसारी है वह भी मनो युक्त और मनोरहित भेदमे दो प्रकार है । शिक्षा क्रिया आलापादिरूप संज्ञायुक्त समनस्क है इससे शून्य अमनस्क है अमनस्क । भी त्रस, स्थावर भेदसे दो प्रकार है (द्वीन्द्रियादय इत्यादि) तथा च तत्त्वार्थसूत्र 'द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः' इति । दो तीन चार पांच इन्द्रिय जिसको हो वह त्रस है "कृमि पिपीलिका भ्रमर, मनुष्यादीनामे कैकवृद्धानि" इति । अर्थ पूर्वसूत्र "वनस्पत्यन्तानामेकम्" में वनस्पतियोंको एक मात्र स्पर्शनेन्द्रिय कहा है उसमेंसे स्पर्शका अधिकार इस सूत्रमे आता है उसके साथ क्रमशः एक एक बढानेसे (द्वीन्द्रियादि) कृमि शंख प्रभृतिको स्पर्श और रसना दो इन्द्रिय होतीहे पिपीलिका प्रभृतिको स्पर्श, रसना, घ्राण तीन इन्द्रिये हे भ्रमरादिको स्पर्श, रसना, घ्राण और चक्षु चार इन्द्रिये हे मनुष्यादिको श्रोत्र सहित पूर्वोक्त मिल कर पाच इन्द्रिय होती है ॥ ३० ॥ पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतय स्थावरा । तत्र मार्गगतधूलि पृ- थिवी, इष्टकादि पृथिवीकाय, पृथिवीकायत्वेन येन गृहीता स पृथिवीकायिक, पृथिवी कायत्वेन यो ग्रहीष्यति स पृथिवी- जीव । एवमब्वादिष्वपि भेदचतुष्टयं योज्यम् । तत्र पृथिव्यादि कायत्वेन गृहीतवन्तो ग्रहीष्यन्तश्च स्थावरा गृह्यन्ते न पृथि- व्यादिपृथिवीकायादय तेषा जीवत्वात् । ते च स्थावरा स्पर्श- नैकैन्द्रियाश्च भवान्तरप्राप्तिनिष्ठुरा मुक्ता• धर्मा धर्माधर्माका- शास्तिकायास्ते एकत्वशालिनो निष्क्रियाश्च द्रव्यस्य देशा- -न्तरप्राप्तिहेतु ॥ ३१ ॥ स्थावर निरूपण-पृथिवी, जल, तेज, वायु और वनस्पति ये स्थावर हे (मार्ग गतेति) अचेतन कठिन गुणयुक्त पृथिवी हे पृथिव्यादिके चार चार भेद आगममे कहे हैं पृथिवी पृथिवीकाय पृथिवीकायिक और पृथिवीजीव यही चार प्रकार हैं इस प्रकार जलादिमे भी चार भेद है काय शरीर है पृथिवीकाय इष्टकादि है पृथिवी

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ६३ ) कायिक मृतशरीरादि पृथिवीको शरीररूपसे जो ग्रहण करता है वह पृथिवी जीव है पृथिव्यादिको कायरूपसे ग्रहण करनेवाला स्थावर है पृथिवी वा पृथिवीकाय नहीं क्योंकि वह जीव है "वनस्पत्यन्तानामेकम्" इति सूत्रोक्त प्रकार पृथिव्यादि एक मात्र स्पर्शन इन्द्रिय है यह सब पुनः संसार प्राप्ति रहित होनेसे मुक्त कहा जाते हैं धर्म्म अधर्म और आकाशास्तिकायादिक एक और निष्क्रिय है द्रव्यको प्रदेशान्तर प्राप्तिमें हेतुभी है ॥ ३१ ॥ तत्र धर्माधर्मौ प्रसिद्धौ आलोकेनाविच्छिन्ने नभसि लोकाकाश- पदवेदनीये सर्वत्रावस्थितिगतिस्थित्युपग्रहो धर्माधर्मयोरुप- कार, अत एव धर्मास्तिकाय प्रवृत्त्यनुमेयः अधर्मास्तिकायः स्थित्यनुमेयः । अन्यवस्तुप्रदेशमध्येऽन्यस्य वस्तुन प्रवेशोऽ- वगाहः तदाकाशकृत्यम् । स्पर्शरसवर्णवन्त पुद्गला । ते च द्विविधा, । अणव स्कन्धाश्च । भोक्तुमशक्या अणव । द्व्यणु- कादयः स्कन्धाः । तत्र द्व्यणुकादिस्कन्धभेदादण्वादिरुत्पद्यते, अण्वादिसङ्घातात् द्व्यणुकादिरुत्पद्यते । क्वचिद्भेदसंघाताभ्यां स्कन्धोत्पत्ति, अतएव पूर्य्यन्त गलन्तीति पुद्गलाः । कालस्या- नेकप्रदेशत्वाभावेनाऽस्तिकायत्वाभावेऽपि द्रव्यत्वमस्ति तल्ल- क्षणयोगात् ॥ ३२ ॥ विहितकर्मानुष्ठानादि धर्म और निन्दित कर्मानुष्ठानादि अधर्मरूपसे प्रसिद्ध है आलोकविशिष्ट आकाश अर्थात् जिसको लोकाकाश कहते हैं उसमें सर्वत्र गति ओर स्थितिका उपकारक धर्माधर्म है । धर्माधर्म प्रवृत्ति और निवृत्तिके उपकारक होनेसे ही प्रवृत्ति स्थितिरूप कार्यसे धर्माधर्मका अनुमान होता है । आकाश अवकाशका हेतु है जैसे गृहमें घटादिका प्रवेश होता है । स्पर्श, रस, रूपगुणवाला पुद्गल है । वह अणु स्कन्ध भेदसे दो प्रकार है । उपभोगका अशक्य प्रदेशशून्य सूक्ष्म अणु है द्व्यणुक आदि स्कन्ध है स्कन्धका भेद न होनेसे अणु उत्पन्न होता है । अणुसमु- दायमें स्कन्ध उत्पन्न होता है कहीं कहीं अणु और संघात दोनों मिलकर स्कन्ध उत्पन्न होता है जैसे अणु द्व्यणुक मिलकर एक स्कन्ध उत्पन्न हुआ उसी स्कन्धमें पुन एक अणुका संयोग होनेमें पुनः स्कन्धान्तर उत्पन्न होता है एवं दो दो संघा- तसे भी संघातान्तर उत्पन्न होता है यथा द्व्यणुक त्रसरेणु प्रभृतिकी उत्पत्ति होती है

(७०) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ आर्हत अतएव पूरयन्ति गलन्ति इस प्रकार पुद्गलकी व्युत्पत्ति होती हे अर्थात् स्कन्धों अलग होजानेसे गलन ( विशीर्ण ) होता हे अणुसंयोगद्वारा स्कन्ध होनेसे पूर होता है ॥ ३२ ॥ तदुक्तं गुणपर्यायवद्द्रव्यमिति । द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणा । यथा जीवस्य ज्ञानत्वादिसामान्यरूपा पुद्गलस्य रूपत्वादिसामान्य- स्वभावा धर्माधर्माकाशकायानां यथासम्भव गतिस्थित्यवगाह- हेतुत्वादिसामान्यानि गुणा । तस्य द्रव्यस्योक्तरूपेण भवनमु- त्पाद तद्भाव परिणाम पर्याय इति पर्याया । यथा जीवस्य घटादि ज्ञानसुखक्लेशादय पुद्गलस्य मृत्पिण्डघटादय धर्मादीनां गत्यादिविशेषा , अतएव षट् द्रव्याणीति प्रसिद्धिः ॥ ३३ ॥ ( गुणपर्यायवदिति ) गुण एक द्रव्य द्रव्यान्तरसे जिसके द्वारा व्यावृत्त हो वह गुण है यथा नील घट इत्यादिमे नीलादि विशेषण नीलगुण घटान्तरसे व्यावृत्ति करता है यदि तादृश गुण न होता तो समस्त द्रव्य एकरूपहोनेसे सांकर्य होता जीव भी ज्ञानादि गुणद्वारा पुद्गलादिसे व्यावृत्त होता हे और पुद्गलादि भी रूपादिगुणसे व्यावृत्त रहता है अत अन्वयी गुण है उसके विकार अर्थात् विशेषरूपसे व्यावृत्त होनेवाले पर्याय हैं। क्रोध मान गन्धादि जो द्रव्यमे रहनेवाले हो और जिनपर गुण नहीं रहता हो वही गुण हे।धर्माधर्म आकाशकायके यथाक्रम गतिस्थिति अवकाशादि गुण हैं। द्रव्योंकी उक्तरूपसे उत्पत्ति को उत्पाद कहते हैं जिस द्रव्यका जो वास्तविक स्वभाव हो उस स्वरूपप्राप्तिरूप परिणामको पर्याय कहते हैं । अत एव जीवाजीव, धर्माधर्म, आकाश पुद्गल भेदसे किसीके मतमें द्रव्य हैं किसीके मतमें छह अजीवके स्थानपर काल मिलाकर छह हैं ॥ ३३ ॥ केचन सप्त तत्त्वानीति वर्णयन्ति । तदाह जीवाजीवास्रवबन्ध- संवरनिर्जरमोक्षास्तत्त्वानीति । तत्र जीवाजीवौ निरूपितौ । आ- स्रवो निरूप्यते । औदारिकादिकाय्यादिचलनद्वारेणात्मनश्चलनं योगपदवेदनीयमास्रव । यथा सलिलावगाहिद्वारं नद्यां स्रवणं कारणत्वादास्रव इति निगद्यते तथा योगप्रणाडिकया कर्मास्रव- तीति स योग आस्रवः ॥ ३४ ॥