श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 1/123-136 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भी कीर्तनमें सम्मिलित हो गये और कीर्तनके आवेशमें
उनका मन स्थिर हो गया॥ 123-126॥
श्रीरामानन्दका पुरीमें आकर महाप्रभुके साथ
कृष्ण-कथालोचना :—
पूर्वे यबे प्रभु रामानन्देर मिलिला।
नीलाचले आसिबारे ताँरे आज्ञा दिला॥ 127॥
राज-आज्ञा लञा तेँहो आइला कत दिने।
रात्रि-दिने कृष्णकथा रामानन्द-सने॥ 128॥
अनुवाद—पहले दक्षिण भारत यात्रामें जब महाप्रभु
श्रीराय रामानन्दसे मिले थे, तब उन्हें नीलाचल आनेकी
आज्ञा दी थी। राजा प्रतापरुद्रसे सेवा-निवृत्तिकी आज्ञा
लेकर श्रीराय रामानन्द कुछ दिनों बाद नीलाचल आ
गये। महाप्रभु रात-दिन श्रीराय रामानन्दके साथ
श्रीकृष्णकथाकी चर्चा करते॥ 127-128॥
काशीमिश्र और प्रद्युम्नमिश्र एवं परमानन्द पुरी,
श्रीगोविन्द और काशीश्वरके साथ मिलन :—
काशीमिश्रे कृपा, प्रद्युम्न मिश्रादि-मिलन।
परमानन्दपुरी-गोविन्द-काशीश्वरागमन॥ 129॥
अनुवाद—महाप्रभुने काशीमिश्रपर अपनी कृपा की
और फिर प्रद्युम्न मिश्र आदिसे उनकी भेंट हुई। तब
श्रीपरमानन्दपुरी, श्रीगोविन्द और श्रीकाशीश्वर नीलाचल
आये॥ 129॥
श्रीस्वरूप दामोदर और शिखि-माहितिके साथ मिलन :—
दामोदर स्वरूप-मिलने परम आनन्द।
शिखिमाहिति-मिलन, राय भवानन्द॥ 130॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरसे मिलकर महाप्रभुको
परम आनन्द हुआ। वे शिखिमाहिति और श्रीराय
भवानन्दसे भी मिले॥ 130॥
अनुभाष्य—मध्यलीला दसवाँ अध्याय देखें॥ 121-130॥
गौड़देशसे आये कुलीन ग्रामवासियोंके साथ मिलन :—
गौड़ हइते सर्व वैष्णवेर आगमन।
कुलीनग्रामवासि-सङ्गे प्रथम मिलन॥ 131॥
अनुवाद—गौड़देशसे सभी वैष्णवोंका नीलाचलमें
आगमन होने लगा। कुलीनग्रामवासी भक्तोंका महाप्रभुसे
यह पहला मिलन था॥ 131॥
खण्डवासी और शिवानन्दके साथ मिलन :—
नरहरि दास आदि यत खण्डवासी।
शिवानन्द-सङ्गे मिलिला सबे आसि'॥ 132॥
अनुवाद—नरहरि आदि खण्डवासी शिवानन्दसेनके
साथ आकर महाप्रभुसे मिले॥ 132॥
अनुभाष्य—मध्यलीला ग्यारहवाँ अध्याय
देखें॥ 131-132॥
भक्तोंके साथ स्नानयात्रा-दर्शन और गुण्डिचा मार्जन :—
स्नानयात्रा देखि' प्रभु-सङ्गे भक्तगण।
सबा लञा कैला प्रभु गुण्डिचा-मार्जन॥ 133॥
अनुवाद—महाप्रभुने सब भक्तोंके साथ स्नानयात्राका
दर्शन किया। रथयात्रासे एक दिन पूर्व महाप्रभुने सब
भक्तोंको लेकर गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया॥ 133॥
अनुभाष्य—मध्यलीला बारहवाँ अध्याय देखें॥ 133॥
रथके आगे नृत्य-कीर्तन :—
सबा-सङ्गे रथयात्रा कैल दरशन।
रथ-अग्रे नृत्य करि' उद्याने गमन॥ 134॥
अनुवाद—महाप्रभुने सबके साथ श्रीजगन्नाथदेवकी
रथयात्राके दर्शन किये और रथके आगे नृत्य करते हुए
चले। रथके आगे उद्दण्ड नृत्य करनेके बाद थोड़ा
विश्राम करनेके लिये वे मार्गके साथ एक उद्यानमें
गये॥ 134॥
प्रतापरुद्रपर कृपा और प्रति वर्ष
गौड़ीय-भक्तोंको आमन्त्रण :—
प्रतापरुद्रेर कृपा कैल सेइ स्थाने।
गौड़भक्ते आज्ञा दिल विदायेर दिने॥ 135॥
'प्रत्यब्द आसिबे रथयात्रा-दरशने।'
एइ छले चाहे भक्तगणेर मिलने॥ 136॥
28 ।
पहला अध्याय 1/134-144 ]
अनुवाद—उस उद्यानमें उन्होंने राजा प्रतापरुद्रपर
कृपा की। जब गौड़ीय भक्त वापिस लौटने लगे, तब
उन्हें विदा करते हुए महाप्रभुने आज्ञा दी कि वे प्रति
वर्ष श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्राके दर्शन करने आते रहें।
इस आज्ञाके छलसे महाप्रभु अपने भक्तोंसे मिलना
चाहते थे ॥ 135-136 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला तेरहवें अध्यायमें रथके आगे
नृत्य, चौदहवें अध्यायमें उद्यानमें जाना और प्रतापरुद्रपर
कृपा वर्णित है॥ 134-135 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुको भिक्षा देना, उनके
जामाता अमोघका अपराध और उद्धार :-
सार्वभौम-घरे प्रभुर भिक्षा-परिपाटी।
षाठीर माता कहे, याते राण्डी हउक् षाठी ॥ 137 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभुको अपने
घर प्रति मास पाँच दिन भिक्षा कराते थे। एक दिन
जब महाप्रभु प्रसाद पा रहे थे, तब श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यके दामादने महाप्रभुको खूब प्रसाद पाते देखकर
उन्हें बड़े अपशब्द कहे। यह सुनकर श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यकी पत्नीने कहा—“अच्छा हो कि षाठी (उनकी
पुत्री) विधवा हो जाय अर्थात् उनके दामादकी मृत्यु हो
जाय ॥" 137 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला पन्द्रहवाँ अध्याय देखें ॥ 137 ॥
दूसरे वर्ष श्रीअद्वैतादि भक्तोंका गौड़देशसे आगमन :-
वर्षान्तरे अद्वैतादि भक्तेर आगमन।
प्रभुरे देखिते सबे करिला गमन ॥ 138 ॥
अनुवाद—वर्षके अन्तमें अर्थात् दूसरे वर्ष श्रीअद्वैताचार्य
आदि सभी भक्त भारी संख्यामें महाप्रभुके दर्शनके लिये
नीलाचल आये ॥ 138 ॥
महाप्रभुके द्वारा सभीकी व्यवस्थाका सम्पादन :-
आनन्दे सबारे निया देन वासस्थान।
शिवानन्दसेन करे सबार पालन ॥ 139 ॥
अनुवाद—महाप्रभु सबसे मिलकर बड़े आनन्दित
हुए और उनके रहनेकी व्यवस्था की। श्रीशिवानन्दसेनने
सभीके भोजन, शयन आदिका उत्तरदायित्व सम्भाला॥ 139 ॥
शिवानन्दके साथ आये कुत्तेका महाप्रभुके
चरण दर्शनके बाद अन्तर्धान होना :-
शिवानन्देर सङ्गे आइला कुक्कुर भाग्यवान्।
प्रभुर चरण देखि' कैल अन्तर्धान ॥ 140 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्दसेनके सङ्ग एक कुत्ता भी
आया था और वह सौभाग्यवान् महाप्रभुके चरणोंके
दर्शन करते ही अन्तर्धान हो गया (अर्थात् शरीर
त्यागकर भगवद्-धामको चला गया) ॥ 140 ॥
पुरी आनेवाले भक्तोंका काशीकी ओर
जा रहे श्रीसार्वभौमके साथ मार्गमें मिलन :-
पथे सार्वभौम सह सबार मिलन।
सार्वभौम भट्टाचार्येर काशीते गमन ॥ 141 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य जब एक बार
काशी जा रहे थे, तब मार्गमें उनके साथ नीलाचल
आते हुए गौड़भक्तोंका मिलन हुआ था ॥ 141 ॥
भक्तोंके साथ जल क्रीड़ा :-
प्रभुरे मिलिला सर्व वैष्णव आसिया।
जलक्रीड़ा कैल प्रभु सबारे लइया ॥ 142 ॥
अनुवाद—नीलाचल आनेपर सभी वैष्णव महाप्रभुसे
मिले। महाप्रभुने सबको साथ लेकर जलक्रीड़ा की ॥ 142 ॥
रथके आगे नृत्य और गुण्डिचा-मार्जन :-
सबा लञा कैल गुण्डिचा-गृह-संमार्जन।
रथयात्रा-दरशने प्रभुर नर्त्तन ॥ 143 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने सभी भक्तोंको लेकर गुण्डिचा
मन्दिरका मार्जन किया और रथयात्रामें सभीने उनके
नृत्यका आनन्दसे दर्शन किया ॥ 143 ॥
विप्रलम्भ-भावमय महाप्रभुका विलास :-
उपवने कैल प्रभु विविध विलास।
प्रभुर अभिषेक कैल विप्र कृष्णदास ॥ 144 ॥
। 29
[ 1/144-151 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—रथयात्राके मार्गके साथ लगे उपवनमें
महाप्रभुने भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन-नृत्य आदि विविध
विलास किये। कृष्णदास नामक एक ब्राह्मणने महाप्रभुका
अभिषेक किया ॥ 144 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'उपवन'—जिस मार्गसे रथ गुण्डिचा
मन्दिर जाता है, उसका नाम बड़दाँड़ है; उसके दोनों
ओर जो सब उद्यान हैं, उन्हें 'उपवन' कहा जाता
है॥ 144 ॥
नृत्यके अन्तमें जलक्रीड़ा और हेरा-पञ्चमी :—
गुण्डिचाते नृत्य-अन्ते कैल जलकेलि।
हेरा-पञ्चमी देखिल लक्ष्मीदेवीरे केलि ॥ 145 ॥
अनुवाद—रथयात्राके गुण्डिचा मन्दिर पहुँचनेपर
महाप्रभुने नृत्य समाप्तकर जलक्रीड़ा की। हेरा पञ्चमीके
दिन उन्होंने लक्ष्मीदेवीकी लीलाका दर्शन किया ॥ 145 ॥
श्रीकृष्ण-जन्माष्टमीपर गोपलीला :—
कृष्णजन्म-यात्राते प्रभु गोपवेश हैल।
दधिभार वहिं' तबे लगुड़ फिराइल ॥ 146 ॥
अनुवाद—जन्माष्टमीके दिन महाप्रभुने गोपवेश धारण
किया और सिरपर दहीकी मटकियाँ धरकर हाथमें
लठिया घुमाते हुए चले ॥ 146 ॥
गौड़ीय भक्तोंको विदायी देना :—
गौड़ेर भक्तगणे तबे करिल विदाय।
सङ्गेर भक्त लञा करे कीर्त्तन सदाय ॥ 147 ॥
अनुवाद—तत्पश्चात् महाप्रभुने गौड़देशके भक्तोंको
विदा किया और नीलाचलमें रहनेवाले भक्तोंके साथ वे
सदा कीर्त्तन करते थे ॥ 147 ॥
वृन्दावनके उद्देश्यसे गौड़देश जाते समय
प्रतापरुद्रके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :—
वृन्दावन याइते कैल गौड़ेर गमन।
प्रतापरुद्र कैल पथे विविध सेवन ॥ 148 ॥
अनुवाद—महाप्रभु वृन्दावन जाते हुए गौड़देश गये।
उन्हें प्रसन्न करनेके लिये राजा प्रतापरुद्रने मार्गमें उनकी
अनेक प्रकारसे सेवाकी व्यवस्था की ॥ 148 ॥
महाप्रभुके साथ-साथ श्रीरायरामानन्दका
भद्रक तक आगमन :—
पुरीगोसाञि-सङ्गे वस्त्रप्रदान-प्रसङ्ग।
रामानन्द राय आइला भद्रक पर्यन्त ॥ 149 ॥
अनुवाद—मार्गमें एक स्थानपर महाप्रभुने पुरी गोसाईंको
शचीमाताको देनेके लिये श्रीजगन्नाथके प्रसादी वस्त्र
प्रदान किये। श्रीराय रामानन्द उनके साथ भद्रक तक
आये ॥ 149 ॥
गौड़देशके विद्यानगरमें आगमन :—
आसि' विद्यावाचस्पतिर गृहेते रहिला।
प्रभुरे देखिते लोकसंघट्ट हइला ॥ 150 ॥
अनुवाद—विद्यानगर (बङ्गाल) पहुँचकर वे
श्रीविद्यावाचस्पतिके घरपर रहे। उनसे मिलनेके लिये
आनेवाले लोगोंका ताँता लग गया ॥ 150 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभु वृन्दावन जाते समय
जब गौड़मण्डलमें आये, तब वे श्रीविशारदके पुत्र
अर्थात् श्रीसार्वभौमके भाई श्रीविद्यावाचस्पतिके घरमें
अर्थात् विद्यानगरमें रहे ॥ 150 ॥
कुलियामें आगमन :—
पञ्चदिन देखे लोक नाहिक विश्राम।
लोकभये रात्रे प्रभु आइला कुलिया-ग्राम ॥ 151 ॥
अनुवाद—पाँच दिनों तक वे लोगोंसे मिलते रहे
और उन्हें विश्राम करनेका अवसर ही नहीं मिला। तब
वे भीड़से बचनेके लिये रात्रिमें कुलिया-ग्राम आ
गये ॥ 151 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभु विद्यानगरमें पाँच दिन
रहे और वहाँ लोगोंकी भीड़ देखकर रात्रिकालमें
चुपकेसे कुलिया-ग्राम आ गये। श्रीचैतन्यभागवतके
अन्त्यखण्डके तृतीय अध्यायमें लिखा है,—
30 ।
पहला अध्याय 1/151-159 ]
“गङ्गा प्रति महा-अनुराग बाड़ाइया।
अति शीघ्र गौड़देशे आइला चलिया ॥ 272 ॥
सार्वभौम-भ्राता 'विद्या-वाचस्पति' नाम।273 (क)।
++आचम्बिते आसि' उत्तरिला तार घर ॥ 274 (ख) ॥
++नवद्वीप आदि सर्वदिके हैल ध्वनि।
वाचस्पति घरे आइलेन न्यासिमणि ॥ 286 ॥
++कुलियाय आइलेन वैकुण्ठ-ईश्वर। 345 (क)।
++सबे गङ्गा-मध्ये नदीयाय-कुलियाय।
शुनि मात्र सर्वलोक महानन्दे धाय ॥ 380 ॥ "
अर्थात् “गङ्गाके प्रति महा-अनुराग बढ़ाकर महाप्रभु
अति शीघ्र गौड़देशमें चले आये। महाप्रभु अचानक
श्रीसार्वभौमके भाई श्रीविद्यावाचस्पतिके घरमें आ पधारे।
नवद्वीप आदि सभी जगह यह बात फैल गयी कि
श्रीवाचस्पतिके घर संन्यासी शिरोमणि पधारे हैं। (अनेक
लोगोंकी भीड़के कारण श्रीवाचस्पतिको भी बिना बताये)
महाप्रभु कुलिया चले आये। नदीया और कुलियाके
बीचमें गङ्गा बहती हैं, महाप्रभुके कुलिया आनेका
समाचार पाकर सब लोग आनन्दसे उधर दौड़ पड़े।”
चैतन्यभागवतके इस अध्यायका श्रीलोचनदासके
वर्णनके साथ पाठ करनेसे यह स्पष्ट होता है कि
वर्तमान 'नवद्वीप' नामक जो स्थान है, वही प्राचीन
नवद्वीपके दूसरे पार स्थित उस समयका 'कुलिया-ग्राम'
था। उसी स्थानपर देवानन्द पण्डित, गोपाल चापाल
और अन्य कई लोगोंका अपराध भञ्जन (क्षमा) हुआ
था। तब विद्यानगरसे कुलिया आनेके लिये गङ्गाकी एक
धाराको पार करना होता था और कुलियासे नवद्वीप
जानेके लिये मूल भागीरथीको (गङ्गाको) पार करना
होता था। आजकल इन सब स्थानोंको देखनेसे ऐसा
लगता है कि उस समय कुलिया-ग्राममें 'चिनाडाङ्गा'
आदि पल्ली और 'कुलियार गञ्ज' जिसे अब 'कोलेर
गञ्ज' कहते हैं, वह समस्त भूमि उस समयके
कुलियाके बचे हुए अंशके रूपमें है ॥ 151 ॥
महाप्रभुके दर्शनके लिये लोगोंकी भीड़ :-
कुलिया-ग्रामेते प्रभुर शुनिया आगमन।
कोटि कोटि लोक आसि' कैल दरशन ॥ 152 ॥
अनुवाद-कुलिया ग्राममें महाप्रभुके आगमनका
समाचार सुनकर लाखों लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये
एकत्रित हो गये ॥ 152 ॥
कुलियामें देवानन्द और चापाल-गोपालके
अपराध-भञ्जन :-
कुलिया-ग्रामे कैल देवानन्देरे प्रसाद।
गोपाल-विप्रेरे क्षमाइल श्रीवासापराध ॥ 153 ॥
पाषण्डी निन्दक आसि' पड़िला चरणे।
अपराध क्षमि' तारे दिल कृष्णप्रेमे ॥ 154 ॥
अनुवाद-उन्होंने कुलिया ग्राममें देवानन्द पण्डितपर
कृपा की और गोपाल-चापाल नामक ब्राह्मणका श्रीवासके
चरणोंमें जो अपराध हुआ था, उसे क्षमा करवाया।
अनेक नास्तिक और भगवान् एवं भक्तोंकी निन्दा
करनेवालोंने महाप्रभुके चरणोंमें क्षमा याचना की और
महाप्रभुने उन्हें क्षमा करके श्रीकृष्णप्रेमका दान
किया ॥ 153-154 ॥
अनुभाष्य—'चापाल-गोपालका उद्धार'-आदिलीला
17/55-59 संख्या देखें ॥ 153 ॥
महाप्रभुकी व्रजयात्राको श्रवणकर श्रीनृसिंहानन्दके द्वारा
ध्यानमें कानाई-नाटशाला तक मार्ग-सजाना और उसे
रत्नोंके द्वारा जड़ना :-
वृन्दावन याबेन प्रभु शुनि' नृसिंहानन्द।
पथ साजाइल मने करिया आनन्द ॥ 155 ॥
कुलिया नगर हैते पथ रत्ने बान्धाइल।
निवृन्त पुष्पशय्या उपरे पातिल ॥ 156 ॥
पथे दुइदिके पुष्पबकुलेर श्रेणी।
मध्ये मध्ये दुइपाशे दिव्य पुष्करिणी ॥ 157 ॥
रत्नबन्ध-घाट, ताहे प्रफुल्ल कमल।
नाना पक्षि-कोलाहल, सुधा-सम जल ॥ 158 ॥
शीतल समीर बहे नाना गन्ध लञा।
'कानाइर नाटशाला' पर्यन्त लैल बान्धिञा ॥ 159 ॥
। 31
[ 1/155-166 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
आगे मन नाहि चले, ना पारे बान्धिते।
पथबान्धा ना याय, नृसिंह हैला विस्मिते॥160॥
अनुवाद—महाप्रभुके वृन्दावन जानेका समाचार सुनकर
श्रीनृसिंहानन्दने आनन्दित होकर उनके मार्गको मन-ही-मनमें
सजाया। उन्होंने मन-ही-मन कुलिया नगरसे वृन्दावनतक
सुन्दर मार्गकी कल्पना की और उसके ऊपर रत्न
जड़कर पुष्पोंकी कोमल पँखुड़ियोंका गद्दा बिछाया,
जिससे महाप्रभुके कोमल चरणोंको कोई कष्ट नहीं हो।
मार्गके दोनों ओर उन्होंने छायाके लिये बकुलादि
पुष्पोंके वृक्ष लगाये और उनके बीच-बीचमें दिव्य
निर्मल जलके सरोवर बनाये। उन अमृतके समान
जलवाले सरोवरोंके घाट रत्नोंसे जड़ित थे और उनमें
सुगन्धित कमल पुष्प खिले हुए थे। नाना प्रकारके पक्षी
मधुर कलरव कर रहे थे। पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर
शीतल समीर बह रहा था और इस प्रकार उन्होंने
'कानाइर नाटशाला' तक मार्गका निर्माण कर लिया।
परन्तु वहाँसे आगे उनका मन चल नहीं रहा था और
वे आगे मार्गका निर्माण करनेमें असमर्थ हो गये।
श्रीनृसिंहानन्द बड़े विस्मित हो गये कि वे आगे क्यों
नहीं बढ़ पा रहे हैं? ॥ 155-160 ॥
श्रीनृसिंहानन्दकी भविष्यवाणी :-
निश्चय करिया कहे,—"शुन, भक्तगण।
एबार ना याबेन प्रभु श्रीवृन्दावन ॥ 161 ॥
'कानाञ्जिर नाटशाला' हैते आसिब फिरिञा।
जानिबे पश्चात्, कहिलु निश्चय करिञा॥" 162 ॥
अनुवाद—तब उन्होंने यह निश्चित करके कहा,—"हे
भक्तों ! सुनो, महाप्रभु इस बार श्रीवृन्दावन नहीं जायेंगे।
वे 'कानाइर नाटशाला'से ही लौट आयेंगे, यह मैं
विश्वासपूर्वक कह रहा हूँ। इस बातकी सत्यताको आप
लोग बादमें स्वयं देखेंगे ॥" 161-162 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिस समय महाप्रभु कुलियासे
वृन्दावन जा रहे थे, तब ऐसा हुआ—उस समय
महाप्रभुके परमभक्त श्रीनृसिंहानन्दने ध्यानमें कुलियासे
वृन्दावनतक मार्गका निर्माण और उसे सजाना आरम्भ
किया। जब उन्होंने गौड़देशके निकटवर्ती 'कानाइ-नाटशाला'
तक पथ तैयार कर लिया, तब उनका चित्त विचलित
होनेसे ध्यान भङ्ग हो गया। तभी श्रीनृसिंहानन्दने
कहा,—इस बार महाप्रभु केवल कानाइ-नाटशाला तक
ही जायेंगे, वृन्दावन नहीं जायेंगे ॥ 160-162 ॥
अनुभाष्य—'कानाइ नाटशाला'—कोलकातासे लगभग
दो सौ मीलकी दूरी पर 'तिनपहाड़' स्टेशनपर उतरकर
फिर शाखा-लाईनसे राजमहल-स्टेशनसे प्राय छह मीलकी
दूरीपर है (वर्तमानमें 'तालझाड़ि' स्टेशनसे दो मीलकी
दूरीपर है) ॥ 162 ॥
महाप्रभुकी कुलियासे वृन्दावनकी यात्रा :—
गोसाञि कुलिया हैते चलिला वृन्दावन।
सङ्गे सहस्रेक लोक यत भक्तगण ॥ 163 ॥
अनुवाद—महाप्रभु कुलियासे वृन्दावनकी ओर चले
और उनके साथ हजारों भक्त लोग भी चले ॥ 163 ॥
महाप्रभुके दर्शनके लिये असंख्य लोगोंकी भीड़ :—
याहाँ याय प्रभु, ताँहा कोटिसंख्य लोक।
देखिते आइसे, देखि' खण्डे दुःख-शोक ॥ 164 ॥
अनुवाद—जहाँ-जहाँ महाप्रभु जाते, वहाँ असंख्य
लोग उनके दर्शनके लिये आते और उनके दर्शन
करके उनके सभी दुःख-शोक दूर हो जाते ॥ 164 ॥
याहाँ याहाँ प्रभुर चरण पड़ये चलिते।
से मृत्तिका लय लोक, गर्त्त हय पथे ॥ 165 ॥
अनुवाद—जहाँ-जहाँ महाप्रभुके चरण पड़ते, वहाँसे
लोग धूल उठाते और उन लोगोंके धूल उठानेसे मार्गमें
गड्ढे पड़ जाते ॥ 165 ॥
रामकेलिमें आगमन :—
ऐछे चलि' आइला प्रभु 'रामकेलि' ग्राम।
गौड़ेर निकट ग्राम अति अनुपम ॥ 166 ॥
32 ।
पहला अध्याय 1/166-175 ]
याँहा नृत्य करे प्रभु प्रेमे अचेतन।
कोटि कोटि लोक आइसे देखिते चरण ॥ 167 ॥
अनुवाद—इस प्रकार चलते हुए महाप्रभु 'रामकेलि'
ग्राम पहुँचे। गौड़देशकी सीमाके निकट यह ग्राम अति
मनोहर था। वहाँ नृत्य करते हुए महाप्रभु प्रेमके
आवेशमें मूर्च्छित हो गये थे। असंख्य लोग उनके
चरणकमलोंके दर्शन करनेके लिये आने लगे॥ 166-167 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'रामकेलिग्राम'—गौड़देशके निकट
गङ्गाके तटपर रामकेलिग्राम है, श्रीरूप-सनातन उस
समय वहीं रहते थे ॥ 166 ॥
बादशाहके द्वारा अपने कर्मचारियोंको महाप्रभुके
स्वतन्त्र भ्रमणमें बाधा न देनेका आदेश :-
गौड़ाध्यक्ष यवन-राजा प्रभाव शुनिञा।
कहिते लागिल किछु विस्मित हञा ॥ 168 ॥
“बिना दाने एत लोक याँर पाछे हय।
सेइ त' गोसाञा, इहा जानिह निश्चय ॥ 169 ॥
काजी, यवन इहार ना करिह हिंसन।
आपन-इच्छाय बुलुन, याहाँ उँहार मन॥”170 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके अद्भुत प्रभावके विषयमें सुनकर
बङ्गालका यवन-राजा विस्मित होकर ऐसा कहने
लगा,—“ये लोगोंको कुछ दान भी नहीं कर रहे हैं, तो
भी यदि इतने लोग उनके पीछे जा रहे हैं, तो निश्चय
ही ये पैगम्बर हैं। हे काजी! हे मुसलमानों! इन हिन्दू
पैगम्बरसे ईर्ष्या-द्वेष मत करना। अपनी इच्छानुसार वे
जहाँ जाना चाहें, उन्हें वहाँ जाने देना॥”168-170 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'गौड़ाध्यक्ष यवनराजा'—हुसेनशाह
बादशाह ॥ 168 ॥
क्षत्रिय केशवकी महाप्रभुके लिये शुभ इच्छा और
उसके अनुसार ही बादशाहको समझाना :-
केशव-छत्रीरे राजा वार्त्ता पूखिल।
प्रभुर महिमा छत्री उड़ाइया दिल ॥ 171 ॥
“भिखारी संन्यासी करे तीर्थ पर्यटन।
ताँरे देखिबारे आइसे दुइ चारि जन ॥ 172 ॥
यवने तोमार ठाञि करये लागानि।
ताँर हिंसाय लाभ नाहि, हय आर हानि ॥”173 ॥
अनुवाद—यवन-राजाने अपने सैनिक अधिकारी
केशव क्षत्रियसे महाप्रभुके प्रभावके बारेमें जिज्ञासा की,
तो उसने महाप्रभुकी महिमाको छिपाते हुए कहा,—“वह
एक भिखारी संन्यासी है और तीर्थ भ्रमण करता रहता
है। दो-चार लोग ही उससे मिलने आते हैं। आपके
मुसलमान सेवक उससे ईर्ष्याके कारण आपको उकसा
रहे हैं। उससे ईर्ष्या करनेमें मैं कोई लाभ नहीं देखता
हूँ, अपितु इसमें हानि ही हो सकती है॥”171-173 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—क्षत्रिय केशवको महाप्रभुके तत्त्वका
ज्ञान था। परन्तु यह विचार करके कि बादशाह यदि
अधिक अनुसन्धान करेगा, तो वह महाप्रभुसे शत्रुता
करने लगेगा,—इसी आशङ्कासे उसने बादशाहकी बातको
बढ़ने नहीं दिया ॥ 171 ॥
गुप्तचरके द्वारा महाप्रभुसे अन्य
स्थानपर चले जानेका अनुरोध :-
राजारे प्रबोधि' केशव, ब्राह्मण पाठाञा।
चलिबार तरे प्रभुके कहिल याञा ॥ 174 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 174 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—राजाको इस प्रकार समझाकर
सैनिक कर्मचारी केशवने एक ब्राह्मणको भेजकर
महाप्रभुसे वहाँसे शीघ्र चले जानेका अनुरोध किया॥ 174 ॥
श्रीरूपसे महाप्रभुके विषयमें बादशाहकी जिज्ञासा :-
दबिर खासरे राजा पुछिल निभृते।
गोसाञिर महिमा तेंहो लागिल कहिते ॥ 175 ॥
अनुवाद—यवन राजाने एकान्तमें दबिर खास (श्रीरूप
गोस्वामी)से महाप्रभुके विषयमें जिज्ञासा की, तो वे
कहने लगे ॥ 175 ॥
33
[ 1/175–185 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य—‘दबिरखास’—श्रीरूपको उस समयके
यवन राजाके द्वारा दिया गया नाम॥175॥
श्रीरूपके द्वारा महाप्रभुके माहात्म्यका कीर्तन :—
“ये तोमारे राज्य दिल, ये तोमार गोसाञा।
तोमार देशे, तोमार भाग्ये जन्मिला आसिञा॥176॥
तोमार मङ्गल वाञ्छे, वाक्यसिद्ध हय।
इहार आशीर्वादे तोमार सर्वत्रइ जय॥177॥
बादशाहकी प्रशंसा :—
मोरे केन पुछ, तुमि पुछ आपन–मन।
तुमि नराधिप हओ, विष्णु–अंश सम॥178॥
तोमार चित्ते चैतन्येरै कैछे हय ज्ञान।
तोमार चित्ते येइ लय, सेइ त’ प्रमाण॥”179॥
अनुवाद—“ये वही आपके अल्लाह (परमेश्वर) हैं,
जिन्होंने आपको यह राज्य दिया है और जिनको आप
पैगम्बर मान रहे हो। इनका आपके राज्यमें जन्म ग्रहण
करनेसे आपके सौभाग्यका उदय हुआ है। ये आपका
मङ्गल चाहते हैं, इनकी कृपासे आपके सभी वाक्य
सिद्ध हो जायेंगे और इनके आशीर्वादसे सर्वत्र आपकी
जय होगी। परन्तु, आप मुझसे यह सब क्यों पूछ रहे
हैं? आप स्वयं अपने मनसे पूछिये (वह आपको
यथार्थ उत्तर देगा) क्योंकि आप राजा होनेके कारण
भगवान् विष्णुके अंश समान हैं। आपके हृदयमें
श्रीचैतन्यके प्रति कैसे भाव आते हैं? जो भाव आपके
हृदयमें आते हैं, वे ही इस बातका प्रमाण हैं॥”176–179॥
अनुभाष्य—मनुसंहिता(7/8)—
“महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति॥”
अर्थात् “(राजा) ही नररूपमें महान् देवता है॥”178॥
बादशाहका महाप्रभुको ईश्वरके रूपमें मानना :—
राजा कहे,—“शुन, मोर मने येइ लय।
साक्षात् ईश्वर इँह, नाहिक संशय॥”180॥
अनुवाद—राजाने कहा,—‘सुनो! मेरे मनमें यही
विश्वास उठता है कि ये तो साक्षात् भगवान् हैं, इसमें
कोई संशय नहीं है॥”180॥
एत कहि’ राजा गेला निज अभ्यन्तरे।
तबे दबिर खास आइला आपनार घरे॥181॥
श्रीरूप-सनातनका विचार-विमर्श :—
घरे आसि’ दुइ भाइ युकति करिञा।
प्रभु देखिबारे चले वेश लुकाञा॥182॥
अनुवाद—यह कहकर राजा अपने महलके अन्तःपुरमें
चले गये। तब दबिर खास अपने घर आ गये। घरमें
आकर उन्होंने अपने भाई (श्रीसनातन)से विचार-विमर्श
किया और वे दोनों वेश बदलकर महाप्रभुके दर्शनके
लिये चल पड़े॥181-182॥
दोनोंका महाप्रभुके दर्शनके लिये जाना और सबसे
पहले श्रीनिताइ और हरिदासके साथ मिलन :—
अर्धरात्रे दुइ भाइ आइला प्रभु-स्थाने।
प्रथमे मिलिला नित्यानन्द-हरिदास-सने॥183॥
अनुवाद—वे आधी रातमें महाप्रभुके स्थानपर पहुँचे
और पहले श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीहरिदास ठाकुरसे
मिले॥183॥
ताँरा दुइजन जानाइला प्रभुर गोचरे।
रूप, साकरमल्लिक आइला तोमा’ देखिबारे॥184॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु और हरिदास ठाकुरने
महाप्रभुके पास आकर कहा कि रूप और साकरमल्लिक
(सनातन) आपके दर्शनके लिये आये हैं॥184॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘साकरमल्लिक’—जिस प्रकार
श्रीरूपका नाम दबिरखास हुआ था, उसी प्रकार
श्रीसनातनका भी उस समयके राजाके द्वारा दिया गया
नाम ‘साकर-मल्लिक’ प्रसिद्ध था॥184॥
दोनोंका दैन्य प्रदर्शन :—
दुइ गुच्छ तृण दुँहे दशने धरिञा।
गले वस्त्र बान्धि’ पड़े दण्डवत् हञा॥185॥
34 ।
पहला अध्याय 1/185–190 ]
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
अनुवाद—उन दोनोंने परम दैन्यभावसे अपने मुखमें
तृणके गुच्छे दबाकर और गलेमें वस्त्र बाँधकर (बिके
हुए पशुके समान मुखमें तृण और गलेमें रस्सीके
बन्धन जैसे) महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया॥185॥
दैन्य रोदन करे, आनन्दे विह्वल।
प्रभु कहे,—उठ, उठ, हइल मङ्गल ॥ 186 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके दर्शनसे वे आनन्दमें विह्वल
हो गये और दैन्यताके कारण रोने लगे। महाप्रभुने
कहा,—“उठो-उठो! तुम्हारा मङ्गल हुआ है॥” 186 ॥
श्रीरूप-सनातनका दैन्य और स्तव :—
उठि' दुइ भाइ तबै दन्ते तृण धरि'।
दैन्य करि' स्तुति करे करयोड़ करि' ॥ 187 ॥
“जय जय श्रीकृष्णचैतन्य दयामय।
पतितपावन जय, जय महाशय ॥ 188 ॥
नीच-जाति, नीच-सङ्गी, करि नीच काज।
तोमार अग्रेते प्रभु कहिते वासि लाज ॥ 189 ॥
अनुवाद—दोनों भाई उठकर दैन्यतासे दाँतोंमें तृण
दबाकर हाथ जोड़कर महाप्रभुकी स्तुति करने
लगे,—“पतितोंका उद्धार करनेवाले परम दयालु
श्रीकृष्णचैतन्यकी बारम्बार जय हो। परम पुरुषकी जय
हो, जय हो। हम नीच जातिके हैं, नीच लोगोंका सङ्ग
करते हैं और सदा नीच कार्योंमें रत हैं। आपके सामने
खड़े होनेमें हमें बड़ी लज्जा आ रही है॥187–189॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरूप और सनातनका विचार
था कि उन्होंने नीच जातिमें जन्में नीच लोगोंका सङ्ग
और उनकी सेवा करके नीच कार्य किया है॥189॥
अनुभाष्य— 'नीचजाति'—श्रीरूप-सनातन पवित्र
कन्नड़-ब्राह्मण कुलमें जन्में थे, परन्तु दैन्यवशतः
अपनेको नीचजातिका कहते थे। जन्म तीन प्रकारके
होते हैं—शौक्र, सावित्र और दैक्ष। नीच लोगोंका सङ्ग
करनेसे स्वभाव नीच होता है।
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
“म्लेच्छजाति, म्लेच्छसङ्गी, करि म्लेच्छकर्म।
गो-ब्राह्मण-द्रोहि-सङ्गे आमार सङ्गम॥”
अर्थात् “हम मलेच्छ जातिके हैं, क्योंकि हम
मलेच्छोंका सङ्ग करते हैं और मलेच्छों जैसे कर्म
करते हैं। हम गो और ब्राह्मणोंका वध करनेवालोंका
सङ्ग करते हैं।”
श्रीमद्भागवतके सातवें स्कन्धमें आदेश-मत है—
“यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्।
यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत् ॥”
अर्थात् “जिस व्यक्तिमें पूर्व वर्णित ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य और शूद्रके जो लक्षण दिखायी दें, चाहे उसने
किसी अन्य वर्णमें जन्म लिया हो, उसे लक्षणोंके
अनुसार वर्णका ही मानना चाहिये।”
श्रीरूप-सनातनने यवनकी सेवाके कारण स्वयंको
नीचजातिका कहा। ब्राह्मण-वृत्तिरहित नीचजातीयकी
नीच शूद्रवृत्तिको ग्रहणके कारण उसे उसी जातिका
कहा जाता है। भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें कहा गया
है—
“नीचजाति-सङ्गे सदा नीच व्यवहार।
एइ हेतु नीच-जात्यादिक उक्ति ताँर ॥”
अर्थात् “नीचजातिके सङ्गसे सदा नीच व्यवहार
होता है, इसलिये श्रीरूप-सनातन ऐसा कह रहे
हैं॥”189॥
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/154) :—
मत्तुल्यो नास्ति पापात्मा नापराधी च कश्चन।
परिहारेऽपि लज्जा मे किं ब्रुवे पुरुषोत्तम ॥ 190 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह-भाष्य देखें॥190॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मेरे जैसा कोई पापी नहीं है,
मेरे जैसा कोई अपराधी भी नहीं है। हे पुरुषोत्तम! मेरे
द्वारा किये गये पापों और अपराधोंका उल्लेख करने
और उन्हें क्षमा करानेकी चेष्टा करनेमें भी मुझे लज्जा
आ रही है॥ 190 ॥
अनुभाष्य—
हे पुरुषोत्तम (पुरुषश्रेष्ठ) मत्तुल्यः कश्चित् पापात्मा (पापी)
। 35
[ 1/190-197 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
नास्ति, कश्चन् अपराधी न (नास्ति); परिहारे (अपराधक्षमापणविषये)
अपि मे (मम) लज्जा (व्रीडात्मकः सङ्कोचः) [अतः अहं]
किं ब्रुवे (कथयामि) [-मम प्रार्थनावसरोऽपि नास्ति इत्यर्थः] ।
श्लोक-भावानुवाद-मेरे समान न तो कोई पापी है
और न ही कोई अपराधी भी है। हे पुरुषोत्तम ! क्या
कहूँ? अपने दोषोंको क्षमा करनेकी प्रार्थना करनेमें भी
मुझे लज्जा आती है अर्थात् मेरे पाप-अपराध अनन्त
और प्रायश्चितके अयोग्य हैं ॥ 190 ॥
पतितपावन-हेतु तोमार अवतार।
आमा-बइ जगते, पतित नाहि आर ॥ 191 ॥
जगाइ-मधाइकी अपेक्षा अपनेको
अधिक हीन और पापी समझना :-
जगाइ-माधाइ दुइ करिले उद्धार।
ताँहा उद्धारिते श्रम नहिल तोमार ॥ 192 ॥
ब्राह्मण-जाति तारा, नवद्वीपे घर।
नीच-सेवा नाहि करे, नहे नीचेर कूर्पर ॥ 193 ॥
नामाभासके द्वारा ही उनका पापनाश और उद्धार :-
सबे एक दोष तार, हय पापाचार।
पापराशि दहे नामाभासेइ तोमार ॥ 194 ॥
तोमार नाम लञा तोमार करिल निन्दन।
सेइ नाम हइल तार मुक्तिर कारण ॥ 195 ॥
अनुवाद-पतितोंका उद्धार करनेके लिये आपने
अवतार लिया है और हमसे अधिक पतित इस जगत्में
कोई नहीं है। हे प्रभो ! आपने जगाइ-मधाइ, दोनोंका
उद्धार किया है और उनका उद्धार करनेमें आपको
कोई परिश्रम भी नहीं करना पड़ा था। (क्योंकि) वे
दोनों जातिसे ब्राह्मण थे और उन्होंने पावन नवद्वीपमें
जन्म लिया था। उन्होंने नीच लोगोंकी सेवा भी नहीं
की थी और वे नीच लोगोंके अधीन भी नहीं थे।
उनका तो मात्र एक ही दोष था, वह था पापका
आचरण। आपके नामाभाससे ही कूट पापराशि जलकर
भस्म हो जाती है। आपका नाम लेकर उन्होंने आपकी
निन्दा की और वही नाम (नामाभास) उनकी (पापोंसे)
मुक्तिका कारण बन गया ॥ 191-195 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जगाइ-मधाइका उद्धार करनेमें
आपको अधिक श्रम नहीं हुआ। हम तो उनसे अधिक
अधम हैं, हमारा उद्धार करनेके लिये आपको विशेष
यत्न करना पड़ेगा। जगाइ-मधाइ तो उच्च ब्राह्मण
जातिके थे और वे महातीर्थ नवद्वीपमें वास करते थे।
हमारे जैसे उन्होंने कभी भी नीच लोगोंकी सेवा नहीं
की थी, वे नीच लोगोंके अधीन भी नहीं थे अर्थात्
उनका पालन नीच लोगोंने नहीं किया था; वे केवलमात्र
पापाचारी थे। आपके नामाभाससे ही सारे पाप जलकर
समाप्त हो जाते हैं; उन्होंने आपका नाम लेकर
आपकी निन्दा की थी, वह नाम ही उनकी पापोंसे
मुक्तिका कारण बन गया ॥ 192-195 ॥
अनुभाष्य-जगाइ और मधाइ यद्यपि पापी थे,
तथापि उन्होंने नीच व्यक्तिके सेवक बनकर स्वयंको
बेचकर स्वामीके लिये निन्दनीय कर्म नहीं किये थे।
हम उनकी अपेक्षा भी घृणित हैं, क्योंकि हम नीच
व्यक्तिके हाथोंकी कठपुतली हैं। हमारा स्वामी हमारे
द्वारा ही अनेक प्रकारके नीच कार्य करवाता है।
साधुकी निन्दा करनेसे अपराध होता है। विष्णुकी
निन्दासे जो अपराध होता है, वह उनका नाम ग्रहण
करनेसे विनष्ट हो जाता है ॥ 193-195 ॥
जगाइ-माधाइसे भी अपनेको अधम माननेकी उक्ति :-
जगाइ-माधाइ हैते कोटी कोटी गुण।
अधम पतित पापी आमि दुइ जन ॥ 196 ॥
म्लेच्छजाति, म्लेच्छसङ्गी, करि म्लेच्छकर्म।
गो-ब्राह्मण-द्रोहि-सङ्गे आमार सङ्गम ॥ 197 ॥
अनुवाद-जगाइ और मधाइसे भी करोड़ों-करोड़ों
गुणा हम दोनों अधम, पतित और पापी हैं। हम म्लेच्छ
जातिके हैं, क्योंकि हम म्लेच्छोंका सङ्ग करते हैं और
म्लेच्छों जैसे कर्म करते हैं। हाय! हम गो और
36 ।
ब्राह्मणोंका वध करनेवालोंका सङ्ग करते हैं॥ 196-197॥
अमृतप्रवाह भाष्य-म्लेच्छ दो प्रकारके हैं- जन्मके
द्वारा म्लेच्छ और सङ्गके द्वारा म्लेच्छ। म्लेच्छोंका सङ्ग
करनेके कारण हम भी जन्मसे म्लेच्छके जैसे हैं। हमने
पतित होकर अनेक प्रकारसे म्लेच्छ व्यवहार किया है,
विशेषतः जो सब गो-ब्राह्मणद्रोही म्लेच्छ हैं, हम उनके
सङ्गी हैं॥ 197॥
अति कातर स्वरसे दोनोंका दैन्य-विलाप :-
मोर कर्म, मोर हाते-गलाय बान्धिया।
कु-विषय-विष्ठा-गर्ते दियाछे फेलिया॥ 198॥
अनुवाद-हमारे पापकर्मोंने हमारे हाथ-गलेको
बाँधकर हमें विष्ठा-रूपी सांसारिक विषय भोगोंके
गर्तमें धकेल दिया है॥ 198॥
अनुभाष्य- 'कु-विषय-विष्ठा-गर्ते'– भोगके वशीभूत
होकर इन्द्रियोंकी चेष्टाओंके द्वारा संसारमें जिसे ग्रहण
किया जाता है, उसे ही 'विषय' कहते हैं। जिससे पुण्य
अर्जित होता है, उसे 'सुविषय' और जिससे पाप
अर्जित होता है, उसे 'कुविषय' कहते हैं। सब
जड़सुखभोग विष्ठा-जातीय (मलके समान) हैं। श्रीकृष्ण-
सेवा ही जीवके लिये परम कल्याणकारी होनेके कारण
ग्रहण करनेकी वस्तु है। इन्द्रिय-सेवा घृणित और
विसर्जनीय है, इसलिये मलके समान त्यागने योग्य है।
त्याग किये हुए मलमें जैसे केवल मलके कीड़ेका
अधिकार है, वैसे ही जीव अपनी वास्तविक स्थितिको
भूलकर उस मलके कीड़ेके समान विषयरूपी मलमें
रहनेको अपना श्रेय (कल्याण) मानकर मात्र मलके
कीड़ेकी रुचिका अनुसरण करनेवाला है। गड्ढेमें गिरा
व्यक्ति जिस प्रकार स्वयं उससे नहीं निकल सकता,
विषयी जीव भी वैसे श्रीकृष्णकी ओर उन्मुख होनेकी
चेष्टा करनेपर भी अपने बलपर विषय-मलके गड्ढेरूपी
जड़भोगोंको छोड़कर निकलनेमें समर्थ नहीं होता
है॥ 198॥
आमा उद्धारिते बली नाहि त्रिभुवने।
पतितपावन तुमि-सबे तोमा बिने॥ 199॥
आमा उद्धारिया यदि राख निज-बल।
'पतितपावन' नाम तबै से सफल॥ 200॥
अनुवाद-जो हमारा उद्धार कर सके, ऐसा महाबली
तो तीनों लोकोंमें नहीं है। आप ही एकमात्र पतितोंका
उद्धार करनेवाले हो, इसलिये आपके बिना हमारा और
कोई आश्रय नहीं है। हमारा उद्धार करके अपना दिव्य
बल दिखाओ, तभी त्रिभुवनमें प्रसिद्ध आपका 'पतितपावन'
नाम सार्थक होगा॥ 199-200॥
सत्य एक बात कहौं, शुन, दयामय।
मो-बिनु दयार पात्र जगते ना हय॥ 201॥
मोरे दया करि' कर स्वदया सफल।
अखिल ब्रह्माण्ड देखुक तोमार दया-बल॥ 202॥
अनुवाद-हे दयानिधान! हम एक सत्य बात
कहते हैं, उसे कृपा करके सुनें, - जगत्में आपकी
दयाका योग्यपात्र हमारे अतिरिक्त और कोई भी नहीं
है। हमपर दया करके अपनी दयाको सफल करो,
जिससे सारा ब्रह्माण्ड आपकी दयाका बल देखे ॥ 201-202॥
अमृतप्रवाह भाष्य- हम जैसे अत्यन्त पतित व्यक्तिपर
दया करके आप अपना स्वदया अर्थात् निज दयालु
नाम सफल करें ॥ 202॥
श्रीयमुनाचार्यपाद-कृत स्तोत्ररत्न-श्लोक (50) :-
न मृषा परमार्थमेव मे
शृणु विज्ञापनमेकमग्रतः।
यदि मे न दयिष्यसे तदा
दयनीयस्तव नाथ दुर्लभः ॥ 203 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 203॥
अमृतप्रवाह भाष्य-आपसे हम एक निवेदन कर
रहे हैं, इसमें कुछ भी मिथ्या नहीं है, अपितु यह
[ 1/203–208 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
परमार्थसे (सत्यसे) परिपूर्ण है; वह यह है कि यदि
आप हमारे प्रति दया नहीं करेंगे, तब हे नाथ! आप
उपयुक्त दयाका पात्र और कहाँ पायेंगे? ॥ 203 ॥
अनुभाष्य—
हे नाथ (प्रभो,) [तव] अग्रतः (पुरतः) मे (मम) एकं
परमार्थं (वास्तवं) एव विज्ञापनं (निवेदनं) शृणु, - न [तत्]
मृषा (मिथ्या); यदि मे (मम सम्बन्धे मयि) न दयिष्यसे
(दयां करिष्यसि), तदा तव दयनीयः (दयार्हः) दुर्लभः।
[सर्वार्धमत्वात् दयायोग्यपात्रत्वात् मम अपकृष्टत्वस्य आधिक्यम्]।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह-भाष्य देखें ॥ 203 ॥
आपने अयोग्य देखि' मने पाङ क्षोभ।
तथापि तोमार गुणे उपजय लोभ ॥ 204 ॥
वामन हञा चाँद धरिते इच्छा करे।
तैछे मोर एइ वाञ्छा उठये अन्तरे ॥"205 ॥
अनुवाद—अपनेको आपकी कृपाके अति अयोग्य
जानकर हमारे मनमें क्षोभ हो रहा है, परन्तु आपके
दिव्य गुणोंको देखकर हमारे हृदयमें लोभ भी उत्पन्न हो
रहा है। जैसे बौना व्यक्ति चाँदको पकड़नेकी असम्भव
इच्छा करे, वैसे ही हमारे मनमें भी ऐसी महत् कामना
जाग्रत हो रही है॥"204-205 ॥
श्रीमद्यमुनाचार्यपाद-कृत स्तोत्ररत्न-श्लोक (46) :—
भवन्तमेवानुचरन्निरन्तरः
प्रशान्तनिःशेषमनोरथान्तरः।
कदाहमैकान्तिकनित्यकिङ्करः
प्रहर्षयिष्यामि सनाथजीवितम् ॥ 206 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 206 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—आपकी निरन्तर सेवाके द्वारा
अन्य मनोरथोंसे सर्वथा रहित होकर प्रशान्तभावसे मैं
कब अपनेको आपके नित्यदास कहकर दास्यजीवनके
सहित आनन्दसे प्रफुल्लित होऊँगा ? ॥ 206 ॥
अनुभाष्य—
हे नाथ, (प्रभो,) प्रशान्तनिःशेष-मनोरथान्तरः (प्रशान्तं
निश्चलं निःशेषं सम्पूर्णं मनोरथानां वासनानां अन्तरं यस्य सः)
ऐकान्तिकनित्यकिङ्करः (दृढ़नित्यदासः सन्) सः अहं भवन्तं
(मम सेव्यं त्वम्) एव निरन्तरः (सान्द्रः) अनुचरन् (परिचर्यां
कुर्वन् घनमनुगच्छन्) कदा (कस्मिन्काले) जीवितं (प्राणान्)
प्रहर्षयिष्यामि (सर्वतोभावेन सुखयिष्यामि)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 206 ॥
श्रीरूपको लक्ष्य करके दोनोंके
लिये महाप्रभुके कृपामय वचन :—
शुनि' महाप्रभु कहे, — “शुन, दबिर खास।
तुमि दुइ भाइ—मोर पुरातन दास ॥ 207 ॥
आजि हैते दुँहार नाम 'रूप' 'सनातन'।
दैन्य छाड़, तोमार दैन्ये फाटे मोर मन ॥ 208 ॥
अनुवाद—उनकी प्रार्थना सुनकर महाप्रभु बोले,—
“सुनो, दबिर खास, तुम दोनों भाई मेरे प्राचीन (नित्य)
दास हो। आजसे तुम दोनोंके नाम रूप और सनातन
होंगे। अपनी दीनताका त्याग करो, तुम्हारे दैन्य भावसे
मेरा हृदय फटा जा रहा है॥ 207-208 ॥
अनुभाष्य—महाप्रभुने प्रसादके रूपमें दबिरखासका
नाम 'रूप' और साकर मल्लिकका नाम 'सनातन'
रखा। गुरुके द्वारा वैध कनिष्ठ-अधिकारीका नामकरण
एक संस्कार है। जो गुरुके द्वारा प्रदान किये नाम-प्रसादकी
अवज्ञा करते हैं अर्थात् उसका अनादर करते या
उसमें दोष देखते हैं, उनके द्वारा हरिभक्तिकी सम्भावना
नहीं है; वे जड़ जगत्की प्रतिष्ठामें मत्त रहते हैं।
“शङ्खचक्राद्यूर्ध्वपुण्ड्र
तन्नामकरणञ्चैव वैष्णवत्वमिहोच्यते ॥”
अर्थात् “शङ्ख, चक्र, पद्म, गदा आदि विष्णु चिह्न
और उर्ध्वपुण्ड्र
करना एवं गुरुके द्वारा उनका नामकरण—ये सभी
कनिष्ठ वैष्णवोंके लक्षण हैं।”
प्राकृत सहजियोंमें विष्णु-दास्यपरक नामकरण नहीं
होनेसे उन्हें अब 'गौड़ीय वैष्णव' नहीं कहा जा सकता।
अवैष्णव लोग वैष्णव-गुरुसे नाम नहीं प्राप्त करते।
38 ।
पहला अध्याय 1/208-216 ]
इसलिये वे देहात्मबुद्धिके वशीभूत होकर हरिसे अपने
सम्बन्धको न जाननेके कारण सामाजिक वर्णोचित
नामादिके संरक्षणमें ही प्रमत्त रहते हैं ॥ 208 ॥
दैन्यपत्री लिखि' मोरे पाठाले बार बार।
सेइ पत्रीद्वारा जानि तोमार व्यवहार ॥ 209 ॥
तोमार हृदय आमि जानि पत्र-द्वारे।
तोमा शिखाइते श्लोक कहिलुँ बारे-बारे ॥ 210 ॥
अनुवाद—तुमने अनेक दैन्यपत्र लिखकर मुझे भेजे
थे। उन्हें पढ़कर मैं तुम्हारे व्यवहारको अच्छी प्रकार
जान गया था। तुम्हारे हृदयके भावोंको पत्रोंके द्वारा
भली-भाँति जानकर मैंने तुम्हें शिक्षा देनेके लिये एक
श्लोक (निम्नलिखित) को बार-बार लिखकर भेजा
था ॥ 209-210 ॥
रागमार्गीय भक्तका लोक-व्यवहार :-
महाप्रभुके द्वारा उक्त श्लोक-
परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि गृहकर्मसु।
तमेवास्वादयत्यन्तर्नवसङ्गरसायनम् ॥ 211 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 211 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-परपुरुषमें अनुरक्त रमणी (नारी)
सभी गृहकर्मोंमें व्यग्रता दिखानेपर भी अन्तःकरणमें
(अपने प्रेमीके साथ) नूतन सङ्गरसका आस्वादन करती
है॥ 211 ॥
अनुभाष्य-
परव्यसनिनी (निजपतिभिन्नापरपुरुषसङ्गामोदिनी) नारी
(कुलरमणी) गृहकर्मसु व्यग्रा (पतिपुत्रसेवादिषु सेवैकपरताप्रदर्शनपरा)
अपि अन्तः (हृदयाभ्यन्तरे) तं नवसङ्गरसायनं
(नवनवकान्तसङ्गसुखरसस्थानम्) एव आस्वादयति। [यथा
पत्यन्तर-भजनपरा नारी स्व-गृहधर्मपरा भूत्वा संसारे स्थित्वापि
जारसङ्गसुखेन दिनानि यापयति, तथा वैधवर्णाश्रम-धर्मपालनेन
मूढान् वञ्चयित्वा, चतुराणां वैष्णवानां हरिदास्यमेव भजन-चातुर्यम्]।
श्लोक-भावानुवाद—जो कुलरमणी अपने पतिके
बदले किसी दूसरे पुरुषसे प्रेम करती है, वह पति-पुत्रादिकी
सेवामें अत्यन्त तत्परता दिखलाती है, परन्तु अपने
हृदयमें वह अपने प्रेमीसे मिलनेके नव-नव रसोंका
आस्वादन करती है। [जैसे पतिके स्थानपर अन्य
पुरुषसे प्रेम करनेवाली नारी अपने गृहधर्म पालन करके
संसारमें रहकर प्रेमीके सङ्गके सुखको हृदयमें आस्वादन
करती हुई दिन यापन करती है, वैसे ही वैध-वर्णाश्रम-
धर्मका पालन करके मूढ़ लोगोंकी वञ्चना करते हुए
चतुर वैष्णवोंका हरिदास्यमें ही भजन-चातुर्य है।]॥ 211 ॥
रूप-सनातनको देखनेके लिये महाप्रभुका
रामकेलिमें आगमन :-
गौड़-निकट आसिते नाहि मोर प्रयोजन।
तोमा-दुँहा देखिते मोर इँहा आगमन ॥ 212 ॥
एइ मोर मनेर कथा केह नाहि जाने।
सबे बोले, केने आइला रामकेलि-ग्रामे ॥ 213 ॥
उत्कण्ठित दोनों भाइयोंको महाप्रभुका आश्वासन देना :-
भाल हैल, दुइ भाइ आइला मोर स्थाने।
घरे याह, भय किछु ना करिह मने ॥ 214 ॥
जन्मे जन्मे तुमि दुइ-किङ्कर आमार।
अचिराते कृष्ण तोमाय करिबे उद्धार ॥" 215 ॥
अनुवाद-गौड़देशके निकट आनेका मेरा कोई
प्रयोजन नहीं था, मैं तो केवल तुम दोनोंसे मिलनेके
लिये यहाँ आया हूँ। मेरे मनकी यह बात कोई नहीं
जानता है, इसलिये सब मुझसे रामकेलि ग्राममें आनेके
कारणकी जिज्ञासा करते हैं। यह बहुत अच्छा हुआ
कि तुम दोनों भाई मुझसे मिलने आये। अब तुम
अपने घरको लौट जाओ और मनमें कोई भय मत
करो। तुम मेरे जन्म-जन्मके सेवक हो, श्रीकृष्ण शीघ्र
ही तुम्हारा उद्धार करेंगे॥" 212-215 ॥
दोनोंका महाप्रभुके श्रीचरणोंको शीशपर धारण करना :-
एत बलि' दुँहार शिरे धरिल दुइ हाते।
दुइ भाइ धरि' प्रभुर पद निल माथे ॥ 216 ॥
अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने अपने दोनों हाथ
। 39
[ 1/216-226 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
उन दोनोंके सिरपर रख दिये और उन दोनों भाइयोंने
महाप्रभुके चरणोंको अपने सिरपर धारण किया॥ 216॥
कृपासे द्रवित महाप्रभुका दोनोंपर भक्तोंसे
कृपा करनेका आवेदन :-
दौँ हा आलिङ्गिया प्रभु बलिल भक्तगणे।
“सबे कृपा करि' उद्धार' एइ दुइ जने॥” 217॥
अनुवाद—महाप्रभुने दोनोंको उठाकर उनका आलिङ्गन
किया और सभी भक्तोंको उन दोनोंपर कृपा करके
उनका उद्धार करनेको कहा॥ 217॥
भक्तोंका विस्मय और आनन्द :-
दुइजने प्रभुर कृपा देखि' भक्तगणे।
'हरि' 'हरि' बोले सबे आनन्दित-मने॥ 218॥
अनुवाद—उन दोनोंपर महाप्रभुकी कृपा देखकर
सभी भक्त आनन्दित होकर 'हरि' 'हरि' बोलने लगे॥ 218॥
सभी भक्तोंके चरणोंमें कृपाकी याचना
और सबके द्वारा धन्यवादकी प्राप्ति :-
नित्यानन्द, हरिदास, श्रीवास, गदाधर।
मुकुन्द, जगदानन्द, मुरारि, वक्रेश्वर॥ 219॥
सबार चरणे धरि' पड़े दुइ भाइ।
सबे बोले, -धन्य तुमि, पाइले गोसाञि॥ 220॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीवास
पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीमुकुन्द दत्त, श्रीजगदानन्द
पण्डित, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीवक्रेश्वर पण्डित आदि
महाप्रभुके जितने भक्त वहाँ उपस्थित थे, श्रीरूप और
सनातन, दोनों भाइयोंने गिरकर सबके चरणकमलोंको
पकड़ा और सभी भक्त उन्हें आशीर्वाद देते कहने लगे
कि तुम धन्य हो, क्योंकि तुमने महाप्रभुकी कृपा प्राप्त
की है॥ 219-220॥
विदायीके समय श्रीसनातनका महाप्रभुको सत्परामर्श :-
सबा-पाश आज्ञा मागि' चलन-समय।
प्रभु-पदे कहे किछु करिया विनय॥ 221॥
“इहाँ हैते चल, प्रभु, इँहा नाहि काज।
यद्यपि तोमारे भक्ति करे गौड़राज॥ 222॥
तथापि यवन जाति, ना करिह प्रतीति।
तीर्थयात्राय एत संघट्ट, भाल नहे रीति॥ 223॥
अपने भजन-क्षेत्रमें बहुत बहिरङ्ग
लोगोंका होना अप्रयोजनीय :-
याहाँ सङ्गे चले एइ लोक लक्षकोटि।
वृन्दावन याइबार ए नहे परिपाटी॥” 224॥
अनुवाद—चलते समय दोनोंने सभीसे जानेकी
आज्ञा माँगी और महाप्रभुके चरणकमलोंमें एक निवेदन
किया। (श्रीसनातन गोस्वामी) ने कहा, - “हे प्रभो! यद्यपि
बङ्गालका राजा आपका बहुत सम्मान करता है, तथापि
आपका अब यहाँ और कोई प्रयोजन नहीं है। इसलिये
आप यहाँसे प्रस्थान करें। राजा यवन जातिका है,
इसलिये उसका अधिक विश्वास नहीं किया जा सकता
है। तीर्थयात्रापर इतनी भीड़के साथ जानेकी रीति अच्छी
नहीं है। आपके साथ हजारों-लाखों लोग जा रहे हैं,
वृन्दावन जानेकी यह परिपाटी नहीं है॥” 221-224॥
स्वयं परमेश्वर होते हुए भी आचार्यरूपसे
कनिष्ठाधिकारीको शिक्षाका सुयोग प्रदान :-
यद्यपि वस्तुतः प्रभुर किछु नाहि भय।
तथापि लौकिकलीला, लोक-चेष्टामय॥ 225॥
अनुवाद—यद्यपि वास्तवमें महाप्रभुको किसीसे कोई
भय नहीं है, तो भी उन्होंने लौकिक लीलाके अनुरूप
जगत्में शिक्षा देनेके लिये साधारण मनुष्यके जैसा
आचरण किया॥ 225॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 16/265-276 संख्या
देखें॥ 221-225॥
दोनों भाइयोंका विदायी ग्रहण करना :-
एत बलि' चरण वन्दि' गेला दुइजने।
प्रभुर सेइ ग्राम हैते चलिते हैल मन॥ 226॥
40 ।
पहला अध्याय 1/226-235 ]
अनुवाद-ऐसा कहकर दोनों भाई महाप्रभुके चरणोंकी
वन्दना करके अपने घरको लौट गये। तब महाप्रभुने
रामकेलि ग्रामसे प्रस्थान करनेका निश्चय किया॥ 226 ॥
रामकेलिसे ‘कानाइ नाट्यशाला' :-
प्राते चलि' आइला 'कानाइर नाटशाला'।
देखिल सकल ताँहा कृष्णचरित्र-लीला ॥ 227 ॥
अनुवाद-प्रातः कालमें महाप्रभु ‘कानाइ-नाटशाला' में
आये और उन्होंने वहाँ श्रीकृष्णकी अनेक लीलाओंका
दर्शन किया॥ 227 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- ‘कृष्णचरित्र-लीला'-उस समयमें
गौड़देशके अनेक स्थानोंपर ‘कानाइ-नाटशाला' नामक
स्थानकी व्यवस्था थी। गौड़देशके निकट जो कनाइ-
नाटशाला थी, वहाँ महाप्रभुने कृष्णलीलाके नाना प्रकारके
चित्रवर्णन देखे॥ 227 ॥
सनातनके परामर्शके अनुसार महाप्रभुके द्वारा
वृन्दावन जानेकी इच्छाका त्याग :-
सेइ रात्रे ताँहा प्रभु चिन्ते मने मन।
'सङ्गे संघट्ट भाल নহে, बोले सनातन ॥ 228 ॥
मथुरा याइब आमि एत लोक सङ्गे।
किछु सुख ना हइबे, हवे रसभङ्गे ॥ 229 ॥
एकाकी याइब, किम्वा सङ्गे एक जन।
तबे से शोभय वृन्दावनेरे गमन ॥ '230 ॥
अनुवाद-उस रात्रिमें श्रीसनातनकी बातपर विचार
करके महाप्रभुने निर्णय लिया, - 'इतने लोगोंको साथ
लेकर वृन्दावन जाना उचित नहीं है। यदि मैं मथुरा
इतने लोगोंके साथ जाऊँगा, तो कोई आनन्द नहीं
आयेगा और रस भङ्ग हो जायेगा। यदि मैं अकेले
अथवा केवल एक व्यक्तिको लेकर जाऊँगा, तो
वृन्दावनकी यात्रा बड़ी सुखप्रद होगी ॥ '228-230 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 16/265-276 संख्या
देखें ॥ 229-230 ॥
नीलाचलकी ओर जाते हुए शान्तिपुरमें
आगमन और वहाँ पाँच-सात दिन ठहरना :-
एत चिन्ति' प्रातःकाले गङ्गास्नान करि'।
'नीलाचले याब' बलि' चलिला गौरहरि ॥ 231 ॥
एइमत चलि' चलि' आइला शान्तिपुरे।
दिन पाँच-सात रहिला आचार्येर घरे ॥ 232 ॥
अनुवाद-इस प्रकार चिन्तन करते हुए उन्होंने
प्रातःकाल गङ्गामें स्नान किया और अपनी यात्रा
आरम्भ करते हुए सबसे कहा, - 'मैं नीलाचल जाऊँगा।'
चलते-चलते वे शान्तिपुर आये और वे श्रीअद्वैताचार्यके
घरमें पाँच-सात दिन रहे ॥ 231-232 ॥
श्रीअद्वैताचार्यके घरमें शचीमाताके
द्वारा महाप्रभुकी सेवा :-
शचीदेवी आसि' ताँरे कैल नमस्कार।
सातदिन ताँर ठाञि भिक्षा-व्यवहार ॥ 233 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके शान्तिपुर आनेका समाचार
सुनकर शचीमाता भी वहाँ आयीं और महाप्रभुने उन्हें
प्रणाम किया। उन्होंने सात दिन वहाँ रहकर महाप्रभुके
लिये भोजन बनाया ॥ 233 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 16/212-216, 223, 234,
245-250 संख्या और चैः भाः अन्त्यखण्ड तीसरा
अध्याय देखें ॥ 232-233 ॥
सब भक्तोंको विदायी देना और रथयात्राके
समय पुरीमें मिलनेका आदेश :-
ताँर आज्ञा लञा पुनः करिला गमने।
विनय करिया विदाय दिल भक्तगणे ॥ 234 ॥
“जना दुइ सङ्गे आमि याब नीलाचले।
आमारे मिलिबा आसि' रथयात्रा-काले ॥ "235 ॥
अनुवाद-शचीमातासे आज्ञा लेकर महाप्रभु
नीलाचलकी ओर चले, तो भक्त लोग उनके पीछे-पीछे
चलने लगे। महाप्रभुने उनसे अनुनय-विनय करके
। 41
[ 1/234-243 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
वापिस लौट जानेको कहा और उनसे विदायी ली।
महाप्रभुने भक्तोंसे कहा,—“मैं नीलाचल केवल दो
लोगोंको साथ लेकर जाऊँगा और बाकी सभी लौट
जाँय और रथयात्राके समय मुझसे श्रीजगन्नाथपुरीमें
आकर मिलना॥” 234-235 ॥
बलभद्र और दामोदर पण्डितके साथ पुरीमें आगमन :-
बलभद्र भट्टाचार्य, आर पण्डित दामोदर।
दुइजन-सङ्गे प्रभु आइला नीलाचल ॥ 236 ॥
अनुवाद—महाप्रभु बलभद्र भट्टाचार्य और दामोदर
पण्डितको अपने साथ लेकर नीलाचल आये ॥ 236 ॥
अनुभाष्य—'दामोदर पण्डित'—आदिलीला 10/31 संख्या
और अन्त्यलीला तीसरा अध्याय देखें ॥ 236 ॥
कुछ दिन पुरीमें रहनेके बाद वृन्दावनकी यात्रा :-
दिन कत रहि' ताँहा चलिला वृन्दावन।
लुकाञा चलिला रात्रे, ना जाने कोन जन ॥ 237 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथपुरीमें कुछ दिन रहनेके बाद
एक रात्रिमें बिना किसीको बताये वे वृन्दावनकी ओर
चल पड़े ॥ 237 ॥
महाप्रभुके साथ एकमात्र बलभद्र भट्ट :-
बलभद्र भट्टाचार्य रहे मात्र सङ्गे।
झारिखण्ड-पथे काशी आइला नानारङ्गे ॥ 238 ॥
अनुवाद—उन्होंने केवल बलभद्र भट्टाचार्यको ही
अपने साथ लिया और झारखण्डके रास्तेसे होते हुए
वे आनन्दपूर्वक काशी पहुँचे ॥ 238 ॥
अनुभाष्य— 'बलभद्र'—आदिलीला, 10/146 संख्या
और 'झारिखण्ड पथसे महाप्रभुका काशीगमन'—मध्यलीला,
17/3-82 संख्या देखें ॥ 236-238 ॥
काशीमें आगमन और चार दिन तक
वास करनेके बाद मथुरा-गमन :-
दिन चारि काशीते रहि' गेला वृन्दावन।
मथुरा देखिया देखे द्वादश कानन ॥ 239 ॥
अनुवाद—वे चार दिनों तक काशीमें रहे और
फिर वे वृन्दावनकी ओर चले। मथुराके दर्शन करके
उन्होंने व्रजके बारह वन देखे ॥ 239 ॥
अनुभाष्य— 'द्वादशकानन'—काम्यवन, तालवन,
तमालवन, मधुवन, कुसुमवन, भाण्डीरवन, बिल्ववन,
भद्रवन, खदिरवन, लोहवन, कुमुदवन और गोकुल-
महावन ॥ 239 ॥
वृन्दावनमें प्रेमोन्माद, तत्पश्चात् मथुरा होकर प्रयाग :-
लीलास्थल देखि' प्रेमे हइला अस्थिर।
बलभद्र कैल ताँरे मथुरार बाहिर ॥ 240 ॥
अनुवाद—लीलास्थलियोंके दर्शन करके महाप्रभु
प्रेममें भावाविष्ट हो गये। बलभद्र उन्हें किसी प्रकारसे
मथुरासे बाहर लेकर आये ॥ 240 ॥
प्रयागमें दशाश्वमेधघाटपर श्रीरूपके साथ मिलन :-
गङ्गातीर-पथे लञा प्रयागे आइला।
श्रीरूप प्रभुरे आसि' तथाइ मिलिला ॥ 241 ॥
दण्डवत् करि' रूप भूमिते पड़िला।
परम आनन्दे प्रभु आलिङ्गन दिला ॥ 242 ॥
अनुवाद—मथुरासे निकलकर वे गङ्गाके किनारे
चलते-चलते प्रयाग पहुँचे और श्रीरूप गोस्वामी वहाँ
आकर उनसे मिले। श्रीरूप गोस्वामीने भूमिपर गिरकर
महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभुने बड़े
आनन्दसे उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन
किया ॥ 241-242 ॥
श्रीरूपको शिक्षा देकर वृन्दावन
भेजना और स्वयं काशीमें गमन :-
श्रीरूपे शिक्षा कराइ' पाठा'न वृन्दावन।
आपने करिला वाराणसी आगमन ॥ 243 ॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीको शिक्षा देकर उन्हें
वृन्दावन जानेकी आज्ञा दी और वे स्वयं वाराणसी आ
गये ॥ 243 ॥
42 ।
पहला अध्याय 1/241-253 ]
अनुभाष्य—'श्रीरूप-मिलन और शिक्षा'-मध्यलीला
उन्नीसवाँ अध्याय देखें ॥ 241-243 ॥
काशीमें श्रीसनातनके साथ
मिलन और उनको शिक्षा प्रदान :-
काशीते प्रभुके आसि' मिलिला सनातन।
दुइ मास रहि' ताँरे कराइला शिक्षण ॥ 244 ॥
श्रीसनातनको मथुरामण्डलमें भेजना
और प्रकाशानन्दका उद्धार :-
मथुरा पाठाइला ताँरे दिया भक्तिबल।
संन्यासीरे कृपा करि' गेला नीलाचल ॥ 245 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी काशीमें आकर
महाप्रभुसे मिले। महाप्रभुने दो महीने वहाँ रहकर उन्हें
शिक्षा दी। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीमें भक्तिका बल
सञ्चारित करके उन्हें मथुरा भेजा और काशीमें
प्रकाशानन्दादि मायावादी संन्यासियोंपर कृपा करके
उनका उद्धार किया और तब वे नीलाचल लौट
आये ॥ 244-245 ॥
अनुभाष्य—'श्रीसनातन-मिलन और शिक्षा'-मध्यलीला
बीसवाँ अध्याय देखें ॥ 244 ॥
छह वर्ष इधर-उधर गमनागमन रूप 'मध्यलीला' :-
छय वत्सर प्रभु ऐछे करिला विलास।
कभु इति-उति-गति, कभु क्षेत्रवास ॥ 246 ॥
पुरीमें भक्तोंके साथ नित्य कीर्तन
और श्रीजगन्नाथ दर्शन :-
आनन्दे भक्तसङ्गे सदा कीर्त्तन-विलास।
जगन्नाथ-दरशन, प्रेमेर विलास ॥ 247 ॥
अनुवाद—कभी पुरीमें रहकर और कभी अन्य
स्थानोंमें भ्रमण करके छह वर्ष महाप्रभुने ऐसी लीलाएँ
कीं। पुरीमें महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ सदा आनन्दमें
विभोर होकर सङ्कीर्तन करते और श्रीजगन्नाथजीके दर्शन
करके प्रेममें भावाविष्ट हो जाते ॥ 246-247 ॥
अन्त्यलीलाके सूत्रोंका आरम्भ :-
मध्यलीलार कैलुँ एइ सूत्र-विवरण।
अन्त्यलीलार सूत्र एबे शुन, भक्तगण ॥ 248 ॥
अनुवाद—मैंने (ग्रन्थकार कृष्णदास कविराज) अभी
तक मध्यलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन किया। हे भक्तों!
अब अन्त्यलीला सूत्ररूपमें सुनो ॥ 248 ॥
छह वर्षोंके बाद बाकी अठारह वर्षों
तक केवल पुरीमें वास :-
वृन्दावन हैते यदि नीलाचले आइला।
आठार वर्ष ताँहा वास, काँहा नाहि गेला ॥ 249 ॥
चातुर्मास्यमें गौड़ीयभक्तोंका महाप्रभुके
साथ पुरीमें वास :-
प्रतिवर्ष आइसेन ताँहा गौड़ेर भक्तगण।
चारि मास रहे प्रभुर सङ्गे सम्मिलन ॥ 250 ॥
नित्यकाल कृष्ण कीर्तन और प्रेमभक्तिका दान :-
निरन्तर नृत्य-गीत-कीर्त्तन-विलास।
आ-चण्डाले प्रेमभक्ति करिला प्रकाश ॥ 251 ॥
अनुवाद—महाप्रभु वृन्दावनसे लौटकर नीलाचल
आये और बाकी अठारह वर्षों तक केवल वहीं वास
किया और वहाँसे किसी और स्थानपर नहीं गये।
गौड़देशसे भक्त प्रतिवर्ष नीलाचल आते और चार मास
तक महाप्रभुके सङ्गमें रहते। पुरीमें महाप्रभु निरन्तर
नृत्य-गीत और सङ्कीर्तन विलासमें डूबे रहते। उन्होंने
अपनी अहैतुकी कृपासे चाण्डाल जैसे नीच लोगोंको भी
श्रीकृष्ण-प्रेमाभक्तिका दान किया ॥ 249-251 ॥
श्रीगदाधर पण्डितका क्षेत्र-संन्यास
और पुरीप्रवासी भक्तगण :-
पण्डित-गोसाञि कैल नीलाचले वास।
वक्रेश्वर, दामोदर, शङ्कर, हरिदास ॥ 252 ॥
जगदानन्द, भवानन्द, गोविन्द, काशीश्वर।
परमानन्दपुरी, आर स्वरूप-दामोदर ॥ 253 ॥
। 43
[ 1/252-260 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
क्षेत्रवासी रामानन्द राय प्रभृति।
प्रभुसङ्गे एइ सब नित्य कैल स्थिति ॥ 254 ॥
अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित क्षेत्र संन्यास लेकर
नीलाचलमें ही वास करने लगे। श्रीवक्रेश्वर पण्डित,
श्रीदामोदर, श्रीशङ्कर, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीजगदानन्द,
श्रीभवानन्द, श्रीगोविन्द, श्रीकाशीश्वर, श्रीपरमानन्दपुरी,
और श्रीस्वरूप दामोदर तथा नीलाचलवासी श्रीराय
रामानन्द आदिने महाप्रभुके साथ पुरीमें ही नित्यवास
किया और पुरीसे बाहर कभी भी नहीं गये ॥ 252-254 ॥
प्रतिवर्ष गौड़ीय भक्तोंका महाप्रभुके
साथ चातुर्मास्य-यापन :-
अद्वैत, नित्यानन्द, मुकुन्द, श्रीवास।
विद्यानिधि, वासुदेव, मुरारि,-यत दास ॥ 255 ॥
प्रतिवर्षे आइसे, सङ्गे रहे चारिमास।
ताँ-सबा लञा प्रभुर विविध विलास ॥ 256 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीमुकुन्द,
श्रीवास पण्डित, श्रीविद्यानिधि, श्रीवासुदेव, श्रीमुरारि गुप्त
आदि महाप्रभुके परिकर प्रतिवर्ष पुरीमें आकर चार
मास तक रहते और महाप्रभु उनके साथ अनेक
प्रकारसे लीला विलासका आनन्द लेते ॥ 255-256 ॥
ठाकुर हरिदासका पुरीमें निर्वाण :-
हरिदासरे सिद्धिप्राप्ति,-अद्भुत से सब।
आपनि महाप्रभु याँर कैल महोत्सव ॥ 257 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरका देह निर्वाण पुरीमें
हुआ। यह एक अद्भुत घटना थी, क्योंकि महाप्रभुने
स्वयं उनका विरह महोत्सव मनाया था ॥ 257 ॥
अनुभाष्य—'ठाकुर हरिदास निर्वाण'—अन्त्यलीला
ग्यारहवाँ अध्याय देखें ॥ 257 ॥
श्रीरूपका पुरीमें आगमन :-
तबे रूप-गोसाञिर पुनरागमन।
ताँहार हृदये कैल प्रभु शक्ति-सञ्चारण ॥ 258 ॥
अनुवाद—तब श्रीरूप गोस्वामी पुनः पुरी आये और
महाप्रभुने उनके हृदयमें अपनी दिव्य शक्ति सञ्चारित
की ॥ 258 ॥
अनुभाष्य—चिच्छक्ति अथवा अप्राकृत-बलसञ्चार;
चिच्छक्तिसे रहित होनेपर या मायाशक्ति-सञ्चारसे
भोगलालसाकी वृद्धि होती है। अन्त्यलीला प्रथम अध्याय
देखें ॥ 258 ॥
छोटा हरिदासको दण्ड और
दामोदर पण्डितका वाक्य दण्ड :-
तबे छोट हरिदासे प्रभु कैल दण्ड।
दामोदर-पण्डित कैल प्रभुके वाक्यदण्ड ॥ 259 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने छोटा हरिदासको दण्ड-स्वरूप
उसका बहिष्कार कर दिया और दामोदर पण्डितने
महाप्रभुको कुछ चेतावनीके वाक्य कहे ॥ 259 ॥
अनुभाष्य—'छोटा हरिदास'—अन्त्यलीला, दूसरा अध्याय
देखें। दामोदरका 'वाक्यदण्ड'—अन्त्यलीला, तीसरा अध्याय
देखें।
महाप्रभुको अज्ञानी लोग न समझकर यदि उनपर
कटाक्ष करेंगे, तो इस प्रकारका प्रदर्शन ही महाप्रभुके
प्रति वाक्य-दण्ड है। दामोदर-पण्डितका महाप्रभुके लिये
इस प्रकार वाक्यका प्रयोग भक्तोंके विचारानुसार दण्डात्मक
वाक्यमात्र है। यह निग्रह-अनुग्रह-समर्थ व्यक्तियोंको
दूसरोंके द्वारा सावधान किया जाना अनाधिकार-चर्चा
मात्र है ॥ 259 ॥
श्रीसनातनका पुरीमें आगमन :-
तबे सनातन-गोसाञिर पुनरागमन।
ज्येष्ठमासे प्रभु ताँरे कैल परीक्षण ॥ 260 ॥
अनुवाद—तब श्रीसनातन गोस्वामी पुनः पुरी आये
और महाप्रभुने ज्येष्ठ मासमें उनकी परीक्षा ली ॥ 260 ॥
अनुभाष्य—'श्रीसनातन गोस्वामी'—अन्त्यलीला चौथा
अध्याय देखें ॥ 260 ॥
44 ।
पहला अध्याय 1/261-266 ]
श्रीसनातन गोस्वामीको वृन्दावन भेजना
और श्रीअद्वैत-घरमें भिक्षा :-
तुष्ट हञा प्रभु ताँरे पाठाइला वृन्दावन।
अद्वैतेर हस्ते प्रभुर अद्भुत भोजन ॥ 261 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीसे सन्तुष्ट होकर महाप्रभुने उन्हें वृन्दावन वापिस भेज दिया। श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुको अपने हाथोंसे भोजन करानेकी अद्भुत लीला की ॥ 261 ॥
अनुभाष्य— 'श्रीअद्वैतगृहेमें महाप्रभुका अकेले भोजन'—अन्त्यलीला आठवाँ अध्याय देखें ॥ 261 ॥
गौड़देशमें श्रीनित्यानन्दको नाम-प्रेम-प्रचारार्थ भेजना :-
नित्यानन्द-सङ्गे युक्ति करिया निभृते।
ताँरे पाठाइला गौड़े प्रेम प्रचारिते ॥ 262 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने एकान्तमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ विचार-विमर्श करके उनको कृष्णप्रेमको वितरित करनेके लिये गौड़देशमें भेज दिया ॥ 262 ॥
अनुभाष्य— 'श्रीनित्यानन्द प्रभुको गौड़देशमें नाम-प्रचारकी आज्ञा देना'—मध्यलीला, 15/42, 16/59-67 संख्या देखें ॥ 262 ॥
वल्लभभट्टका गर्व-नाश और कृष्णनाम-महिमा-श्रवण :-
तबे त' वल्लभभट्ट प्रभुरे मिलिला।
कृष्णनामेर अर्थ प्रभु ताँहारे कहिला ॥ 263 ॥
अनुवाद—तब वल्लभभट्ट पुरीमें आकर महाप्रभुसे मिले और महाप्रभुने (उनका गर्वनाश करके) उन्हें महिमा सहित कृष्णनामके अर्थकी व्याख्या की ॥ 263 ॥
अनुभाष्य— 'वल्लभभट्ट'—अन्त्यलीला, सातवाँ अध्याय और मध्यलीला, उन्नीसवाँ अध्याय देखें।
श्रीगौरसुन्दरने अपने प्रियजन श्रीगदाधर पण्डितसे वल्लभभट्टको नाममन्त्र दिलवाया और स्वयं उसे अपने सम्प्रदायके अनुसार नामका अर्थ बतलाया। "विनीतानथ पुत्रादीन् संस्कृत्य प्रतिबोधयेत्" अर्थात् "विनीत शिष्योंको वैदिक दस संस्कारोंसे संस्कृतकर आचार्य अपने शिष्योंको ब्रह्मचारी बनाकर उनको मन्त्रके अर्थकी शिक्षा देवें।"—इस पञ्चरात्र वाक्यके अनुसार वल्लभभट्टने नामार्थ श्रवण करनेका अधिकार पाया था ॥ 263 ॥
ब्राह्मणकुल-उत्पन्न प्रद्युम्न मिश्रका ब्राह्मणकुलमें नहीं जन्मे वैष्णवाचार्य श्रीराय रामानन्दको गुरु रूपमें वरण :-
प्रद्युम्न मिश्रेरे प्रभु रामानन्द-स्थाने।
कृष्णकथा शुनाइल कहि' ताँर गुणे ॥ 264 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने (कायस्थकुलमें जन्में) श्रीराय रामानन्दके दिव्य गुणोंकी महिमा गान करके (ब्राह्मणकुलमें जन्में) प्रद्युम्न मिश्रको उनसे श्रीकृष्णकथा श्रवण करनेके लिये प्रेरित किया ॥ 264 ॥
अनुभाष्य—अन्त्यलीला, पाँचवाँ अध्याय देखें ॥ 264 ॥
राजाके क्रोधसे गोपीनाथका उद्धार :-
गोपीनाथ पट्टनायक—रामानन्द-भ्राता।
राजा मारितेछिल, प्रभु हैल त्राता ॥ 265 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दके भाई गोपीनाथ पट्टनायकके प्राणोंकी रक्षा की, जिसे राजाने मृत्यु दण्ड दिया था ॥ 265 ॥
अनुभाष्य—अन्त्यलीला, नौवाँ अध्याय देखें ॥ 265 ॥
विद्वेषी रामचन्द्र पुरीका महाप्रभुके प्रति शासन और भक्तोंका दुःख :-
रामचन्द्रपुरी-भये भिक्षा घटाइल।
वैष्णवेर दुःख देखि' अर्द्धेक राखिल ॥ 266 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके ऊपर रामचन्द्रपुरीके द्वारा अधिक प्रसाद ग्रहण करनेका दोषारोपण करनेपर उन्होंने बहुत अल्पमात्रामें प्रसाद पाना आरम्भ किया। इसे देखकर सभी वैष्णव लोग बहुत दुःखी हो गये, तब महाप्रभु दोषारोपणसे पूर्व जितना प्रसाद पाते थे, उसका आधा ग्रहण करने लगे ॥ 266 ॥
अनुभाष्य—अन्त्यलीला, आठवाँ अध्याय देखें ॥ 266 ॥
। 45
[ 1/267-278 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
ब्रह्माण्डवासी असंख्य जीवोंका
महाप्रभुके दर्शनसे उद्धार :—
ब्रह्माण्ड-भितरे हय चोद्दभुवन।
चोद्दभुवने बैसे यत जीवगण॥ 267 ॥
मनुष्येर वेश धरि' यात्रिकेर छले।
प्रभुर दर्शन करे आसि' नीलाचले ॥ 268 ॥
अनुवाद—इस ब्रह्माण्डमें चौदह लोक हैं और
जितने भी प्राणी इन लोकोंमें वास करते हैं, वे सभी
तीर्थयात्राके छलसे मनुष्य रूप धारण करके नीलाचलमें
महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये आते ॥ 267-268 ॥
श्रीवासादि भक्तोंके गौरकीर्त्तनमें महाप्रभुकी असहमति और
रोषाभास एवं कृष्ण-कीर्त्तन करनेकी आज्ञा :—
एकदिन श्रीवासादि यत भक्तगण।
महाप्रभुर गुण गाञा करेन कीर्त्तन ॥ 269 ॥
शुनि' भक्तगणे कहे सक्रोध वचन।
“कृष्ण-नाम-गुण छाड़ि, कि कर कीर्त्तन ॥ 270 ॥
औद्धत्य करिते हैल सबाकार मन।
स्वतन्त्र हइया सबे नाशा'ले भुवन॥" 271 ॥
अनुवाद—एक दिन श्रीवासादि सभी भक्त महाप्रभुके
गुणोंका कीर्त्तन कर रहे थे। अपनी प्रशंसा सुनकर
महाप्रभु क्रोधित होकर सभीको डाँटते हुए बोले,—
“कृष्णके नाम और गुणोंके कीर्त्तनको छोड़कर यह
कैसा कीर्त्तन हो रहा है? तुम अपने मनके अनुसार
स्वतन्त्रतापूर्वक आचरण करते हुए ऐसी धृष्टता कर रहे
हो जिससे सारे संसारका नाश हो जायेगा ॥" 269-271 ॥
असंख्य जीवोंके कण्ठसे गौर-जयध्वनि
और आर्त्ति ज्ञापन :—
दशदिके कोटि कोटि लोक हेन काले।
'जय कृष्णचैतन्य' बलि' करे कोलाहले ॥ 272 ॥
“जय जय महाप्रभु—व्रजेन्द्रकुमार।
जगत् तारिते प्रभु, तोमार अवतार ॥ 273 ॥
बहुदूर हैते आइनु हञा बड़ आर्त्त।
दर्शन दिया प्रभु करह कृतार्थ ॥" 274 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके इस प्रकार क्रोध प्रदर्शन करनेपर
भी दसों दिशाओंसे लाखों-लाखों लोग तुमुलघोष करने
लगे,—“श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो। महाप्रभुकी
बारम्बार जय हो, जो स्वयं व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं
और जगत्का उद्धार करनेके लिये अवतरित हुए हैं।
हे प्रभो! हम दुःखियारे लोग बहुत दूरसे आये हैं,
अपने दर्शन देकर हमें कृतार्थ करो ॥" 272-274 ॥
महाप्रभुकी करुणा :—
शुनिया लोकेर दैन्य द्रविला हृदय।
बाहिरे आसि' दर्शन दिला दयामय ॥ 275 ॥
श्रीमहाप्रभुके कृपादेशको प्राप्तकर असंख्य
लोगोंके कण्ठसे गौरहरिकी ध्वनि :—
बाहु तुलि' बोले प्रभु—बल' 'हरि' 'हरि'।
उठिल—श्रीहरिध्वनि चतुर्द्दिक भरि' ॥ 276 ॥
महाप्रभुकी स्तुति :—
प्रभु देखि' प्रेमे लोक आनन्दित मन।
प्रभुके ईश्वर बलि' करये स्तवन ॥ 277 ॥
अनुवाद—लोगोंकी दीन और दुःख भरी पुकार
सुनकर महाप्रभुका हृदय पिघल गया। बाहर आकर
परम कृपालु महाप्रभुने सभीको दर्शन दिया। महाप्रभुने
दोनों भुजायें उठाकर सभीसे कहा,—“हरि बोल! हरि
बोल!” सभी लोग अपनी भुजायें उठाकर 'हरि-हरि'
बोलने लगे और उनकी ध्वनिसे चारों दिशायें गुञ्जायमान
हो गयीं। महाप्रभुके दर्शन करके सभी लोग प्रेममें मग्न
होकर आनन्दसे उनको भगवान् कहकर उनकी स्तव-
स्तुति करने लगे ॥ 275-277 ॥
करोड़ों कण्ठोंसे महाप्रभुकी जयध्वनि सुनकर सुयोग
समझकर श्रीवासके द्वारा महाप्रभुको उलाहना देना :—
स्तव शुनि' प्रभुके कहेन श्रीनिवास।
“घरे गुप्त हञा, केने बाहिरे प्रकाश ॥ 278 ॥
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पहला अध्याय 1/278-285 ]
के शिखाल एइ लोके, कहे कोन् बात।
इहा-सबारे मुख ढाका दिया राख' हात ॥ 279 ॥
सूर्य येन उदय करि' चाहे लुकाइते।
बुझिते ना पारि तोमार ऐछन चरिते ॥" 280 ॥
अनुवाद-स्तव सुनकर श्रीनिवास ठाकुर महाप्रभुसे
परिहाससे कहने लगे, - “आप घरके भीतर तो अपनी
भगवत्ताको गोपन रखना चाहते हैं और बाहर आकर
इसे सबके सामने प्रकाशित कर रहे हैं। इन्हें किसने
यह शिक्षा दी है? वे लोग क्या कह रहे हैं? अब
आप इन सबके मुख अपने हाथोंसे ढककर बन्द कर
दीजिये। सूर्य जैसे उदित होकर स्वयंको छिपाना चाहे,
वैसे ही आप अपनेको गोपन रखना चाहते हैं। मैं
आपके ऐसे व्यवहारको नहीं समझ पा रहा हूँ।” 278-280 ॥
महाप्रभुकी लज्जा और श्रीवासको कृत्रिम शिकायत :-
प्रभु कहेन, - “श्रीनिवास, छाड़ विड़म्बना।
सबे मेलि' कर मोर कतेक लाञ्छना ॥” 281 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा-“प्रिय श्रीनिवास ! कृपा
करके इस उपहासको बन्द करो। तुम सब मिलकर
मुझे लज्जित कर रहे हो ॥” 281 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-किसी-किसी पाठमें दूसरी पंक्ति
परिवर्तित होकर इस प्रकारसे देखी जाती है, - “सेइ सब
कर याते आमार यातना” अर्थात् वे सब मुझे पीड़ा दे
रहे हैं॥ 281 ॥
प्रथम अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
महाप्रभुकी कृपा दृष्टि-वर्षणसे लोगोंका उद्धार :-
एत बलि' लोके करि' शुभदृष्टिदान।
अभ्यन्तरे गेला, लोकेर पूर्ण हैल काम ॥ 282 ॥
अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने लोगोंपर अपनी
कृपा दृष्टि डाली और वे अपने कक्षमें चले गये।
उनकी कृपा दृष्टिमात्रसे सभीकी सब कामनायें पूर्ण हो
गयीं ॥ 282 ॥
अनुभाष्य-अन्त्यलीला 9/7-12 संख्या
देखें ॥ 267-282 ॥
पाणिहाटीमें श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीनित्यानन्द
और उनके परिकरोंकी सेवा :-
रघुनाथ-दास नित्यानन्द-पाशे गेला।
चिड़ा-दधि-महोत्सव ताँहाइ करिला ॥ 283 ॥
तत्पश्चात् श्रीनित्यानन्दकी कृपासे रघुनाथदास गोस्वामीका
गृहत्याग तथा पुरीमें महाप्रभुके चरणोंमें आगमन और
स्वरूप दामोदरके निकट आत्मसमर्पण :-
ताँर आज्ञा लञा गेला प्रभुर चरणे।
प्रभु ताँरे समर्पिला स्वरूपेर स्थाने ॥ 284 ॥
अनुवाद-श्रीरघुनाथदास पाणिहाटीमें श्रीनित्यानन्द
प्रभुके पास गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनपर कृपा की
और उनसे सभी वैष्णवोंके लिये दही-चिड़वा महोत्सव
करानेकी आज्ञा दी। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञा लेकर
श्रीरघुनाथदास गृह त्यागकर महाप्रभुकी शरणमें गये और
महाप्रभुने उन्हें श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें सौंप
दिया ॥ 283-284 ॥
अनुभाष्य-इस सन्दर्भमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामी
अपने ग्रन्थ विलाप-कुसुमाञ्जलीमें लिखते हैं-
“यो मां दुस्तरगेहनिर्जलमहाकूपादपारक्लमात् सद्यः
सान्द्रदयाम्बुधिः प्रकृतितः स्वैरी-कृपारज्जुभिः।
उद्धृत्यात्म-सरोजनिन्दितचरणप्रान्तं प्रपाद्य स्वयं
श्रीदामोदरसाच्चकार तमहं चैतन्यचन्द्रं भजे ॥”
अर्थात् “मैं उन महाप्रभुके चरणकमलोंका भजन
करता हूँ, जिन्होंने अपनी कृपा-रज्जुके द्वारा मेरा
गृहरूपी सूखे (अन्धे) कुएँसे उद्धार करके श्रीस्वरूप
दामोदरकी शरण प्रदान करके मुझे दिव्यानन्दके समुद्रमें
निमम्जित कर दिया है।”
अन्त्यलीला, छठा अध्याय देखें ॥ 283-284 ॥
ब्रह्मानन्द भारतीका चर्मवस्त्र-त्याग :-
ब्रह्मानन्द-भारतीर घुचाइल चर्म्माम्बर।
एइ मत लीला कैल छव वत्सर ॥ 285 ॥
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