श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
आठवाँ अध्याय 8/55-57 ] महाप्रभुका प्रतिदिन तीन बार स्नान और सन्ध्याके समय महाप्रभुका श्रीरायके साथ मिलन :- प्रभु स्नान-कृत्य करि' आछेन बसिया। एकभृत्य-सङ्गे राय मिलिला आसिया ॥ 55 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जब स्नान और सन्ध्या करनेके बाद आसनपर बैठकर हरिनाम कर रहे थे और श्रीरामानन्द रायकी प्रतिक्षा कर रहे थे, तभी साधारण वेशमें श्रीरामानन्द राय एक सेवकके साथ उनसे मिलनेके लिये पधारे॥ 55॥ अमृतप्रवाह भाष्य-संन्यासी तीनों सन्ध्याओंमें स्नान करते हैं। उसी विधिके अनुसार महाप्रभु सन्ध्याके समय स्नान करके बैठे थे॥ 55॥ श्रीरायका प्रणाम और महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- नमस्कार कैल राय, प्रभु कैल आलिङ्गने। दुइ जने कृष्ण-कथा कय सेइस्थाने ॥ 56 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने आते ही महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभुने उठकर बड़े प्रेमसे उनका आलिङ्गन किया। इसके बाद दोनों एक निर्जन स्थानपर बैठकर परस्पर श्रीकृष्णकथा कहने-सुनने लगे॥ 56॥ महाप्रभु-रामानन्द संवाद; महाप्रभुके द्वारा साध्य-साधन जिज्ञासा; श्रीरायके उत्तर-(क) साधन (अभिधेय) स्तर- (1) सर्वप्रथम दैववर्णाश्रमरूप स्वधर्मके पालनसे सेश्वर-नैतिक अथवा धर्मजीवन-आरम्भ :- प्रभु कहे, -"पड़ श्लोक साध्येर निर्णय।" राय कहे,-"स्वधर्माचरणे विष्णुभक्ति हय ॥" 57 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 57॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने कहा, - "हे रामानन्दराय, साध्यतत्त्व-निर्णय करनेवाले शास्त्रके श्लोकोंका पाठ करो।" श्रीरायने कहा, - "मनुष्योंके द्वारा स्वधर्मका आचरण करनेसे विष्णुभक्ति होती है॥" 57॥ अनुभाष्य-श्रीरामानुजपादने 'वेदार्थ संग्रह'में कहा है- "एवंविध-परभक्तिरूप-ज्ञानविशेषस्योत्पादकः पूर्वोक्ता हरहरुपचीयमानज्ञानपूर्वक-कर्मानुगृहीत-भक्तियोग एव; यथोक्तं भगवता पराशरेण-'वर्णाश्रम" इति। निखिलजगदुद्धारणाया-वनितलेऽवतीर्णः परब्रह्मभूतः पुरुषोत्तमः स्वयमेतदुक्तवान्- "स्वकर्म निरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु। यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥" (गी० 18/45-46) इति यथोदितक्रमपरिणत-भक्त्येकलभ्य एव, भगवद्बोधायन-टङ्क-द्रविड़-गुहदेव-कपर्दि-भारुचि-प्रभृत्य-विगीत-शिष्टपरिगृहीत-पुरातन-वेद-वेदान्त-व्याख्यान-सुव्यक्तार्थ-श्रुतिनिकर-निदर्शिताेऽयं पन्थाः॥" मानवमात्रके लिये भक्ति ही अतिशय प्रिय और एकमात्र प्रयोजनीय है। इसके अतिरिक्त सभी कुछ अनपेक्षित एवं वितृष्णामय है। भक्तियुक्त आत्माके द्वारा ही श्रीभगवान् वरणीय हैं और भक्तोंको प्राप्त होते हैं। निरन्तर समृद्धिशील ज्ञानपूर्वक-कर्मानुगृहीत भक्तियोग ही धीरे-धीरे परम-भक्तिरूप विशेषज्ञानको उत्पन्न करता है। भगवान् पराशरने “वर्णाश्रमाचारवता" श्लोकमें इसी प्रकार कहा है। समस्त जगत्का उद्धार करनेके उद्देश्यसे पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर परब्रह्मभूत पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने स्वयं ही गीतामें कहा है, - "मनुष्य अपने-अपने कर्मानुष्ठानमें लगे रहनेसे जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त करेंगे, उसे श्रवण करो - जिन भगवान्से प्राणी उत्पन्न हुए हैं, जिन भगवान्के द्वारा यह जगत् विस्तृत हुआ है, मानव अपने कर्मके द्वारा उनका ही विशेष रूपसे अर्चन करके सिद्धि प्राप्त करेंगे।" यह सिद्धिका पथ कर्मानुगृहीत है, यथोचित-क्रमसे इसीके द्वारा भक्तिकी प्राप्ति होती है। भगवान् बोधायन, टङ्क, द्रविड़, गुहदेव, कपर्दि, भारुचि आदि सज्जनोंने भी इस प्रशंसनीय पथका ही अनुमोदन किया है। पुरातन वेद-वेदान्त-व्याख्या एवं सुन्दर रूपसे प्रकाशित (सुस्पष्ट) अर्थके द्वारा श्रुतियों भी इसी पन्थाका निर्देश करती हैं। रामानुजीय साम्प्रदायिक आचार्यगण कहते हैं, - "ब्रह्मप्राप्त्युपायश्च शास्त्राधिगत-तत्त्वज्ञानपूर्वक-स्वकर्मानुगृहीत-भक्तिनिष्ठासाध्यानवधिकातिशयप्रिय-विशदतममप्रत्यक्ष-तापन्नानुध्यान-रूप-परभक्तिरेव। वर्णाश्रमाचारवतेत्युक्तरीत्या न । 243
[ 8/57-58 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला संन्यासनीयता, नापि यत्किञ्चिदेकवर्ण-नियता, किन्तु ही तुम्हारे लिये प्रमाण हैं। इस कर्त्तव्य-विषयमें शास्त्रमें स्व-स्व-वर्णाश्रमनीयता। कर्माङ्गकं ज्ञानमेव, ज्ञानं न तु उपदिष्ट कर्मसे अवगत होकर उसे करनेके निमित्त नैष्कर्म्यं, नापि ज्ञानकर्मणोः सम-समुच्चयः।” योग्य होओ।” अर्थात् “शास्त्रोंका अध्ययनसे प्राप्त होनेवाले तत्त्वज्ञानके 'साध्य'का अर्थ है अभीष्ट वस्तु। इस अभीष्ट द्वारा वर्णाश्रम धर्मका पालन करते हुए भक्तिनिष्ठासे वस्तुको प्राप्त करनेकी चेष्टा साधन कहलाती है। साध्य होनेवाले असमोर्द्ध अतिशय प्रिय विभु-तत्त्वकी साध्य-तत्त्व अप्राकृत वस्तु है। यह तर्कादिसे परे है। प्रत्यक्ष निरन्तर ध्यानरूप पराभक्ति ही ब्रह्म-प्राप्तिका अप्राकृत विषयसे सम्बन्धित न होनेके कारण बद्धजीव उपाय है। 'वर्णाश्रमाचारवत्'-इस उक्ति के अनुसार भक्तिके इसका निर्णय नहीं कर सकता कि उसके लिये क्या लिये न तो संन्यासकी अनिवार्यता है और न ही भक्ति कल्याणकारी है। एकमात्र शास्त्रोंके द्वारा ही इसका किसी एक विशेष वर्णको ही प्राप्त होती है, अपितु निर्णय हो सकता है। (महाभारत, भीष्मपर्व 5/22)- अपने-अपने वर्णाश्रममें स्थित सभीके लिये प्राप्य है। “अचिन्त्या खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्। कर्मके अङ्ग ज्ञान अथवा ज्ञानके द्वारा प्राप्त नैष्कर्म्य प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम्॥” अथवा कर्म-ज्ञानके एकत्रित होनेसे भी भक्ति प्राप्त नहीं अर्थात् “जो भाव अचिन्त्य है, उसमें तर्क करना होती, क्योंकि भक्ति परम स्वतन्त्र है।” उचित नहीं होता। अचिन्त्यका लक्षण यही है कि वह 'साध्य'-जिसकी साधनके द्वारा सिद्धि होती है। प्रकृतिसे अतीत है।” भाः 1/2/13 श्लोक देखें॥ 57 ॥ इसलिये महाप्रभुने श्रीरामानन्दको शास्त्रके आधारपर अमृतानुकणिका-महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दसे ही साध्य-तत्त्व निरूपित करनेके लिये कहा।” कहा-‘शास्त्रानुसार साध्यका निर्णय करो।' केवल शास्त्रके -श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 57 ॥ द्वारा प्रमाणित साध्य ही मान्य है। शास्त्र भगवान्की दैववर्णाश्रमरूप स्वधर्मके पालनसे विष्णुकी सन्तुष्टि :- निज वाणी है। वेद, वेदान्त, उपनिषद्, पुराणादि अनेक विष्णुपुराण (3/8/9) में पराशरकी उक्ति- शास्त्र हैं और इनमें अमल-पुराण श्रीमद्भागवतम् ही वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। सर्वश्रेष्ठ है। इन शास्त्रोंका अनादर करके जो व्यक्ति विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्तोषकारणम्॥ 58 ॥ हरिभक्तिका कोई नया पथ आविष्कार करते हैं, वे अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 58 ॥ जगत्के लिये उत्पात-स्वरूप हैं। नारद पञ्चरात्रमें कहा अमृतप्रवाह भाष्य-परमेश्वर विष्णु वर्णधर्म और गया है- आश्रमधर्मके आचरणसे युक्त पुरुषके द्वारा आराधित “श्रुति स्मृति पुराणादिपञ्चरात्रविधिं विना। होते हैं। वर्णाश्रमके आचरणके बिना उन्हें पूर्णरूपसे ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते॥” सन्तुष्ट करनेका अन्य कोई कारण (उपाय) नहीं है। अर्थात् “श्रुति-स्मृति-पुराणादि और पञ्चरात्रकी विधिका तात्पर्य यह है कि भगवान्को परितुष्ट करना ही त्याग करके की गयी ऐकान्तिकी हरिभक्ति भी विघ्न साध्यतत्त्व है। मनुष्यके द्वारा अपने-अपने स्वभावके ही उत्पादन करती है।” अनुसार निर्णीत वर्ण-धर्म और अवस्थाके अनुसार श्रीकृष्णने गीता (16/24) में कहा है- निर्णीत आश्रमधर्मका पालन करनेसे भगवान् विष्णु “तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। सन्तुष्ट होते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-ये ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥” अर्थात् “कार्य-अकार्यकी व्यवस्थाके विषयमें शास्त्र 244 ।
आठवाँ अध्याय 8/58-59 ] चार वर्ण हैं। प्रत्येक वर्णके लिये जो धर्मशास्त्रोंमें (2) भगवान्में कर्मार्पणरूपी कर्ममिश्रा निर्णीत है, वैसा ही आचरण करके मनुष्य जीवनयात्रा भक्ति शुद्धभक्ति नहीं :– निर्वाह करेंगे। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास,–ये प्रभु कहे,–“एहो बाह्य, आगे कह आर।” चार आश्रम हैं। मनुष्य अपने-अपने आश्रमके लिये राय कहे,–“कृष्ण-कर्मार्पण—सर्वसाध्य-सार॥”59॥ कहे गये धर्मका आचरण करके भगवान्को सन्तुष्ट करेंगे। इसमें व्यभिचार होने अर्थात् शास्त्रकी आज्ञाका अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,–“यह तो उल्लङ्घन करनेसे मनुष्यको प्रत्यवाय (दोष) लगता है बाहरकी बात है, इससे आगे कुछ और कहो।” तब तथा नरककी प्राप्ति होती है। परमार्थ-पथपर चलनेके श्रीरामानन्दने कहा,–“श्रीकृष्णको समस्त कर्मोंका अर्पण लिये सर्वप्रथम धर्ममय जीवनकी आवश्यकता है। ही साध्यसार है॥”59॥ जीवन निर्वाहकारी धर्म भिन्न-भिन्न स्वभाववाले व्यक्तियोंके लिये स्वाभाविक रूपसे भिन्न-भिन्न है। अनुभाष्य—साध्य अर्थात् साधनयोग्य अथवा साधनीय भक्तिका निर्णय करनेमें प्रवृत्त होकर श्रीरामानन्दने सबसे मनुष्यका जन्म, सङ्ग और शिक्षासे स्वभावका पहले ब्रह्माण्डमें अवस्थित साधकों जैसी बुद्धि धारण उदय होता है। स्वभावके अनुसार वर्ण स्वीकार न की। उन्होंने अन्याभिलाषिताका (शुद्धभक्तिके लक्षणका) करनेसे कोई भी जीवन-यात्रामें चतुर नहीं हो सकता। खण्डन करके नीतिवादियोंका पक्ष लेते हुए वर्णधर्म स्वभाव बहुत प्रकारके होनेपर भी मूल विभागसे चार और आश्रमधर्म पालनके द्वारा ही विष्णुकी प्रसन्नता प्रकारके हैं–(1) ईश्वर और विद्या ही जिनका होती है,—इसे 'साध्य' प्रमाण बतलाया। ऐसे 'साध्य' स्वाभाविक विषय है, वे 'ब्राह्मण' हैं; (2) शौर्य और निर्णयकारीको अस्मिताके (मैं यह शरीर हूँ और राज्यशासन ही जिनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, वे 'क्षत्रिय' शरीरसे सम्बन्धित सब वस्तुएँ मेरी हैं, ऐसे अभिमानके) हैं; (3) कृषि, पशुपालन और वाणिज्य (व्यापार) क्रिया कारण जिस सम्बन्धकी उपलब्धि होती है, वह ब्रह्माण्डके ही जिनका स्वभावगत कर्म है, वे 'वैश्य' हैं; (4) तीनों अन्तर्गत है, इसलिये बाह्य (बाहरी) है। इसे बाहरी वर्णोंकी सेवामात्र ही जिनका स्वभाव है, वे 'शूद्र' हैं। कहनेका कारण यह है कि श्रीभगवान् गौरहरिने अपने अपने-अपने वर्णधर्म एवं अवस्था क्रमसे आराधना धाम वैकुण्ठ या गोलोकके बाहरी स्थानोंपर रहनेवाले करते-करते मानवकी स्वाभाविक उन्नति होती है; व्यक्तियोंकी बाहरी अनुभूतिको 'बाह्य साध्य' कहकर विपरीत आचरण करनेसे स्वाभाविक पतन होता है। उसका परित्याग करते हुए आगे कुछ और कहनेके इसलिये धर्मजीवन ही मानवके सभी उत्कर्षका मूल लिये कहा। श्रीरामानन्दने इस साध्यके विषयमें जो है॥ 58 ॥ श्लोक प्रमाण रूपमें कहा, उसमें विष्णुके 'सविशेष' या 'निर्विशेष' होनेका निर्देश नहीं किया। इसलिये इस अनुभाष्य— वर्णाश्रमाचारवता (ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रवर्णाचारपालनर्तेन श्रेणीके साधक कर्ममार्गमें 'निर्विशेष' और 'सविशेष' ब्रह्मचारि-गृहस्थ-वानप्रस्थ-भिक्ष्वाश्रमाचारपालनपरेण च दोनों प्रकारकी विष्णु-आराधनाको लक्ष्य कर सकते हैं। स्व-स्व-वर्णाश्रमधर्माचारवता) पुरुषेण परः पुमान् (पुरुषोत्तमः (श्रीरामानन्द रायने इस बातको समझकर) कर्म-उद्देश्यका विष्णुः) आराध्यते। तत् (तस्य विष्णोः) अन्यः (वर्णाश्रमधर्मविनाशी तात्पर्य निर्विशेष-तत्त्वके विचारको त्यागकर सविशेष-तत्त्व कोऽपि) पन्थाः (मार्गः) तोषकारणं (प्रीत्यर्थं) न भवति। ही है, उसके अनुरूप अगले श्लोकमें प्रमाण दिया॥ 59 ॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 58॥ अमृताणुकणिका—“श्रीरामानन्दने कहा कि श्रीकृष्णको अपने समस्त कर्मोंका अर्पण ही साध्यसार है। परन्तु । 245
[ 8/59-60 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णको कर्मार्पण करना—यह तो साधन दिखता है। कर्त्ताने कुछ कर्म करके उन्हें अर्पण किया—यह तो क्रिया है, साधन है। किन्तु यहाँ श्रीकृष्णके प्रति समस्त कर्मोंके अर्पणको 'सर्वसाध्य सार' कहा है, क्योंकि गीता (3/9) में कहा है— “यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥” अर्थात् “हे कुन्तीनन्दन! श्रीविष्णुके लिये अर्पित निष्काम कर्मके अतिरिक्त अन्य कर्मोंके द्वारा मनुष्यको कर्मबन्धन प्राप्त होता है। अतः तुम फलाकाङ्क्षारहित होकर भगवान् विष्णुके उद्देश्यसे कर्मका भली-भाँति आचरण करो।” विष्णुके लिये किये गये कर्मके अतिरिक्त अन्यान्य सभी कर्म लोक-बन्धक हैं अर्थात् उन कर्मोंसे लोग बद्ध हो जाते हैं। इसलिये उन कर्मोंसे जन्म-मरणके चक्रसे मुक्ति नहीं होती। इसके विपरीत परमेश्वरके लिये अर्पित कर्म बन्धनका कारण नहीं हैं। इसलिये कह रहे हैं—'यज्ञार्थात्'। श्रुतियोंमें यज्ञको ही विष्णु कहा गया है—'यज्ञो वै विष्णु'। भागवत (11/19/39)में भगवान्ने स्वयं उद्धवजीको कहा है—'यज्ञोऽहं भगवत्तमः' अर्थात् मैं वसुदेवनन्दन ही यज्ञ हूँ। श्रीविष्णुके लिये अर्पित निष्काम कर्म ही यज्ञ कहलाता है। परन्तु श्रीविष्णुको अर्पित धर्म भी यदि कामनाके साथ किया जाय, तो वह बन्धनकारी होगा। इसके लिये ही कहते हैं—'मुक्तसङ्गः' अर्थात् फलाकाङ्क्षारहित। 'तदर्थम् कर्म कौन्तेय' अर्थात् कर्म और सांसारिक वस्तुओंके प्रति आसक्तिको काटकर। भव-बन्धनसे मुक्ति ही श्रीकृष्ण-कर्मार्पणका फल है—यह साध्य है और श्रीकृष्ण-कर्मार्पण साधन है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥59॥ भोगलिप्त कर्मोंको श्रीकृष्णको कर्मार्पणका आदेश :— श्रीमद्भगवद्गीता (9/27)— यत् करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥60॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥60॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गीतामें कहा गया है, —“हे कौन्तेय! तुम जो कुछ भी करो, जो कुछ भी खाओ, जो कोई भी यज्ञ करो, जो कुछ भी दान करो और जो भी तपस्या करो, वह सभी मुझ कृष्णको अर्पण करो। श्रीरायके प्रथम उत्तरमें वर्णाश्रम-धर्मके अन्तर्गत की जानेवाली श्रीकृष्ण-आराधनाको 'साध्य' निर्दिष्ट करनेपर महाप्रभुने उसको 'बाह्य' कहकर अपने प्रश्नके यथार्थ उत्तरको प्रदान करनेके लिये सामान्य वर्णाश्रम- धर्मकी अपेक्षा जो श्रेष्ठ है, उसे बतानेकी आज्ञा दी। उसे सुनकर श्रीरायने उत्तर दिया, —उस वर्णाश्रमके अन्तर्गत किये जानेवाले सभी कर्मोंको श्रीकृष्णमें अर्पण करना ही 'सभी साध्योंका सार' कहा गया है॥59-60॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा— हे कौन्तेय (अर्जुन) यत् कर्म करोषि, यत् अश्नासि, यत् ददासि, यत् जुहोषि, यत् तपस्यसि, तत् सर्वं मदर्पणं कुरुष्व। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इस सन्दर्भमें भाः 11/2/36 श्लोक भी देखें॥60॥ अमृतानुकणिका—'नारद पञ्चरात्रमें कहा है— 'लौकिकी वैदिकी वापि या क्रिया क्रियते मुने। हरिसेवानुकूलैव सा कार्या भक्तिमिच्छता॥' अर्थात् हे मुने! मनुष्य लौकिक और वैदिक जिन समस्त कर्मोंको करते हैं, भक्त्याभिलाषी व्यक्ति वे सब कर्म जो हरिसेवाके अनुकूल हैं, उन्हींको करेंगे।' यहाँ कर्मोंमें लौकिक और वैदिक—दोनों ही कर्म कहे गये हैं। लौकिक कर्म हैं—भोजन-पान आदि और वैदिक कर्म हैं—दान, तप, होम आदि। भगवान् कह रहे हैं कि लौकिकी-वैदिकी सभी क्रियाएँ मुझे अर्पण करो। इसका यह अर्थ नहीं है कि हम जो कुछ करें, जो कुछ खायें-पीयें, सभी कुछ भगवान्के चरणोंमें समर्पण करनेसे दोष नहीं होगा। अथवा ऐसा भी नहीं 246 ।
आठवाँ अध्याय 8/60-62 ] समझना चाहिये कि वैदिक कर्म भी जिस किसी भी देवता या सङ्कल्पके साथ क्यों न हो, केवल स्मार्त्तोंकी भाँति 'श्रीकृष्णाय समर्पणमस्तु'– यह मन्त्र पढ़नेसे ही समर्पण हो जायेगा। दुर्योधनकी भाँति आसुरी बुद्धिवाले कहते हैं कि 'मेरे पाप इत्यादि जो भी हैं, आप करवानेवाले हैं। मैं निमित्त मात्र हूँ और आप मूल हैं।' यह ठीक नहीं है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुर 'यत्करोषि' श्लोककी टीकामें कहते हैं—कर्मी केवल वैदिक कर्मोंको भगवान्को अर्पित करते हैं, वह भी इसलिये कि उनकी कर्मकी कामना विफल न हो जाय। किन्तु भक्तगण 'भगवान् ही मेरे प्रभु हैं'– ऐसी भावनाकर अपने लौकिक, वैदिक, दैहिकादि समस्त कर्मोंको भगवान्की प्रीतिके लिये ही उनके चरणोंमें समर्पित करते हैं। दोनोंमें यही महान पार्थक्य है। इसलिये महाप्रभुने इसे बाह्य कहा है।"- श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 60 ॥ (3) केवल फलभोग-त्याग या नैष्कर्म्य शुद्धभक्ति नहीं :– प्रभु कहे, - "एहो बाह्य, आगे कह आर।" राय कहे, - "स्वधर्म-त्याग, - एइ साध्य-सार ॥" 61 ॥ अनुवाद–कर्मार्पणकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा, - "यह भी बाहरकी बात है, इससे आगे कुछ और बतलाओ।" तब श्रीरामानन्द रायने कहा, - "स्वधर्मका त्याग ही सभी साध्योंका सार है॥" 61 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कर्मार्पणकी बात सुनकर भी महाप्रभुने कहा, - यह भी बाहरी है, मेरे प्रश्नका उत्तर इसके भी आगे है, उसे बोलो। उसके उत्तरमें श्रीरायने कहा, - स्वधर्म-त्याग ही साध्यसार है, अर्थात् चारों वर्णोंमेंसे ब्राह्मण अपने (गृह) धर्मको त्याग करके संन्यास ग्रहण करता है एवं अन्य सब वर्ण उसके अनुसार वैराग्य-लक्षण ग्रहण करके गृहत्याग करते हैं। इस संन्यासका नाम स्वधर्मत्याग अथवा कर्मत्याग है। त्यागधर्मसे हरिको प्रसन्नता प्राप्त होती है ॥ 61 ॥ अनुभाष्य– 'मदर्पण'-शब्दसे यद्यपि जड़-निर्विशेषको छोड़कर स्वतन्त्र सविशेषतत्त्व-स्वरूप श्रीकृष्णको ही अर्पण करना समझा जाता है, तथापि साधककी मैं और मेरेपनकी उपलब्धि ब्रह्माण्डके अन्तर्गत है एवं साधनकी वृत्ति भी ब्रह्माण्डके अन्तर्गत है, इसलिये यह भी बाहरी है। अर्थात् कर्मी जीव अपनी बाहरी-अनुभूतिसे किये गये बाहरी-कर्मोंको श्रीकृष्णको प्रदान करनेका उपदेश-मात्र प्राप्त कर रहे हैं। तब श्रीरामानन्द इस भावका शोधन करके कर्मोन्नत जीवको जिस प्रकारकी उन्नति करनी होती है, उसी भावके अनुरूप होकर स्वधर्म त्यागके द्वारा जो साध्य प्राप्त होता है, ऐसा प्रमाण कहा ॥ 61 ॥ वर्णाश्रमरूप स्वधर्म-त्याग करके हरिभजन :– श्रीमद्भागवत (11/11/32) – आज्ञायैवं गुणान् दोषान्मयादिष्टानपि स्वकान्। धर्मान् संत्यज्य यः सर्वान् मां भजेत् स सत्तमः ॥ 62 ॥ अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 62 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-धर्मशास्त्रोंमें मुझ भगवान्ने जिनको 'धर्म' कहकर आदेश किया है, उनके गुण-दोषका विचार करके, उन सभी प्रकारके धर्मोंकी प्रवृत्तिको छोड़कर जो मेरा भजन करते हैं, वे ही सबसे श्रेष्ठ (साधु) हैं ॥ 62 ॥ अनुभाष्य–जब उद्धवजीने भगवान्के प्रिय साधुओंके लक्षण जाननेकी अभिलाषा दिखलायी, तब उसके उत्तरमें श्रीभगवान्ने कहा– यः (साधकः) गुणान दोषान् (प्राकृत-सदसद्भावादीन्) आज्ञाय (ज्ञात्वा) अपि मया (वैदिककर्मोपदेशकेन) [कर्मरतान्] आदिष्टान् (उपदिष्टान्) सर्वान् स्वकान् धर्मान् (लौकिक- विप्रक्षत्रियवैश्यशूद्र-वर्णधर्मान् ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थ- संन्यासाद्याश्रमधर्मांश्च) संत्यज्य (दूरे सम्यक् विहाय) मां (विशेषतत्त्वाश्रयं स्वतन्त्रं भगवन्तं कृष्णं) भजेत्, स तु सत्तमः (साधूनां श्रेष्ठः)। श्लोक-भावानुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 62 ॥ । 247
[ 8/63-64 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीमद्भगवद्गीता (18/66)— सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥63॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥63॥ अमृतप्रवाह भाष्य—समस्त धर्मोंका परित्याग करके एकमात्र, मैं जो भगवान् हूँ, मेरे शरणागत होओ। ऐसा करनेपर मैं तुम्हें समस्त पापोंसे मुक्त करूँगा। तुम शोक मत करो॥63॥ अनुभाष्य—श्रीभगवान्का अर्जुनको गुह्य उपदेश,— सर्वधर्मान् (ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रादि-ब्रह्माण्डान्तर्गतवर्णधर्मान् ब्रह्मचारि-गृहस्थ-वानप्रस्थतुर्याश्रमादिब्रह्माण्डान्तर्गताश्रमधर्मांश्च) परित्यज्य (दूरे विहाय) एकं (तदतीतम् अद्वयज्ञानम्) [अव्यभिचारिण्या मत्या] मां (सविशेषतत्त्वं भगवन्तं कृष्णं) शरणं व्रज (गच्छ); अहं त्वां सर्वपापेभ्यः (ब्रह्माण्डान्तर्गतेभ्यः प्राकृत-नित्यवैदिक-कर्मानुष्ठानपरित्यागजनिताधर्मेभ्यः) मोक्षयिष्यामि (उद्धारयामि)। मा शुचः (अनित्यधर्मजन्य-शोकं मा कुरु)। श्लोक-भावानुवाद—ब्रह्माण्डके अन्तर्गत वर्णाश्रमधर्म (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्रादि वर्णधर्म और ब्रह्मचारी- गृहस्थ-वानप्रस्थ-संन्यासादि आश्रमधर्म) का दूरसे ही त्याग करके अव्यभिचारिणी मतिसे एक मुझ अद्वयज्ञान सविशेष-तत्त्व भगवान् कृष्णकी शरणमें आ जाओ। मैं तुम्हें समस्त पापोंसे अर्थात् नित्य वैदिक अनुष्ठानरूपी धर्मके त्यागसे उत्पन्न पापोंसे मुक्त कर दूँगा। तुम अपने अनित्य धर्मोंको (लौकिक कर्त्तव्यको) त्याग करनेका शोक मत करो। श्रीरघुनाथ दासगोस्वामी प्रभुने स्वरचित 'मनःशिक्षा'में— “न धर्मं नाधर्मं श्रुतिगणनिरुक्तं किल कुरु, व्रजे राधाकृष्णप्रचुरपरिचर्यामिह तनु” आदि कहा है। भाः 4/29/46—“यदा यमनुगृह्णाति भगवान्आत्मभावितः। स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम्॥” इस प्रसङ्गमें भाः 1/5/17 श्लोक भी देखें। हे मेरे प्यारे मन! श्रुतियोंमें कथित धर्म और अधर्म (पुण्यजनक धर्म और पापमूलक अधर्म) कुछ भी मत करो, बल्कि श्रुतियोंने जिन्हें सर्वोपरि परमतत्त्व निर्धारित किया है, उन श्रीश्रीराधाकृष्ण-युगलकी व्रजमें प्रेममयी प्रचुर सेवा करो। जिस समय परिपूर्ण ऐश्वर्यशाली भगवान् किसी भी जीवात्माको आत्म-समर्पण करते देखकर उसपर प्रसन्न होकर अथवा उसकी आत्मवृत्तिके द्वारा सेवित होकर उसपर कृपा करते हैं, उस समय वह भक्त लौकिक-व्यवहार और वैदिक कर्मकाण्डमें अत्यधिक आसक्तिका परित्याग कर देता है॥63॥ अमृतानुकणिका—“महाप्रभुने भी इन दोनों प्रमाणोंको बाह्य बताया, क्योंकि धर्मका बुद्धिपूर्वक त्याग और षड्विधा शरणागतिमें श्रीकृष्ण-सेवाका कोई विचार नहीं है। यह जीवके स्वरूपसे सम्बन्धित नहीं है। यह भक्तिके लिये एक सीढ़ी मात्र है। वेद-विहित कर्मोंका त्याग तीन प्रकारके लोग करते हैं—1) मूर्ख, अज्ञानी— जिन्हें कर्त्तव्य-अकर्त्तव्यका कोई ज्ञान नहीं है। 2) नास्तिक—जिन्हें भगवान् और शास्त्रोंमें विश्वास नहीं है। 3) जिन्हें शास्त्र-वचनोंपर विश्वास है कि श्रीकृष्णभक्ति करनेसे ही सभी कर्म हो जाते हैं, जैसे मध्यलीला (22/62) में कहा गया है, 'कृष्णे भक्ति कैले सर्वकर्म कृत हय' अर्थात् 'कृष्ण भक्ति करनेसे सब कार्य करना हो जाता है।' परन्तु इसमें भी एक विचार है, जैसा भागवत (11/20/9) में कहा है 'तावत् कर्माणि कुर्वीत' अर्थात् जब तक कर्मसे निर्वेद न हो जाय, तब तक कर्म करो, अथवा अकस्मात् किसी महत् पुरुषकी कृपासे भगवत्-कथा श्रवण-कीर्तनमें आत्यन्तिक श्रद्धा हो जाय कि कृष्णभक्ति ही एकमात्र श्रेय है, तभी स्वधर्म-त्यागका अधिकार प्राप्त होता है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥63॥ (4) ज्ञानमिश्रा भक्ति शुद्धभक्ति नहीं :— प्रभु कहे,—“एहो बाह्य, आगे कह आर।” राय कहे,—“ज्ञानमिश्रा भक्ति—साध्यसार॥”64॥ 248 ।
आठवाँ अध्याय 8/64-65 ] अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"यह भी बाहरी है, इससे आगे कुछ और कहो।" श्रीरामानन्द रायने कहा,-"ज्ञानमिश्रा भक्ति सभी साध्योंका सार है॥"64॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने इस उत्तरको सुनकर इसको (सभी धर्मोंके त्यागको) भी बाहरी कहकर, इसकी अपेक्षा श्रेष्ठ बात कहनेकी आज्ञा दी। उसके उत्तरमें श्रीरायने कहा,-ज्ञानमिश्राभक्तिको 'साध्य-सार' कहा जाता है॥64॥ अनुभाष्य-ब्रह्माण्डसे परे विरजा नदीमें तीनों गुणोंकी प्रबलताका अभाव है, वहाँ उनकी साम्यावस्था अथवा अव्यक्त-अवस्थामात्र है। अन्तरङ्गा शक्तिके द्वारा प्रकटित वैकुण्ठ और बहिरङ्गाशक्तिके द्वारा प्रकटित ब्रह्माण्ड, इन दोनोंके बीच ब्रह्मलोक और विरजा नदी हैं। ये दोनों स्थान (ब्रह्मलोक और विरजा नदी) जड़-जगत्से विरक्त और जड़-निर्विशेष जीवोंकी उपलब्धिका आश्रय हैं, इसलिये ये स्थान वैकुण्ठ नहीं हैं और उससे बाहर स्थित होनेके कारण बाह्य हैं। ब्रह्माण्डके अन्तर्गत सब प्रकारके धर्मोंका त्याग करनेवाले साधकको वैकुण्ठ अथवा गोलोककी अनुभूति नहीं होती। सर्वधर्मत्याग साध्यवृत्तिसे जड़भोगोंका त्याग करनेपर भी वह अचित् निर्विशेषत्वकी ही प्रतिपादक है, इसलिये वह भी बाह्य है। श्रीरामानन्दने तब उस भावको बाह्य साध्यभाव जानकर ज्ञानमिश्रा भक्ति ही उससे उन्नत साध्य है, उस विषयमें प्रमाण बोला॥64॥ अमृताणुकणिका- "इसके पूर्व श्रीरामानन्दने कर्ममिश्रा भक्तिके बारेमें कहा था, अब वे ज्ञानमिश्राभक्तिको साध्य-सार बतला रहे हैं। ज्ञानमिश्राभक्ति अर्थात् 1) ज्ञानसे मिश्रित भक्ति और 2) भक्तिसे प्राप्त होने वाला ज्ञान (यह पूर्व कथितसे उत्तम है)। ज्ञानसे मिश्रित भक्ति सेविका है; वह भक्ति अपना फल देकर अन्तर्धान हो जायेगी। इसमें तीन प्रकारके ज्ञान सम्मिलित हैं-1) तत्-पदार्थका ज्ञान (परतत्त्व अथवा भगवत्-तत्त्वका ज्ञान। 2) त्वं-पदार्थका ज्ञान अर्थात् आत्म-तत्त्वका ज्ञान। जीव और ब्रह्मका परस्पर सम्बन्धज्ञान भी इसीके अन्तर्गत है और 3) जीव-ब्रह्म ऐक्य ज्ञान-यह अङ्ग भक्तिका नितान्त विरोधी है। इसके अन्तर्गत जीवका ब्रह्मके साथ स्वरूपगत सम्बन्ध ही स्फुरित नहीं हो सकता। अतः सेवाकी वासनाका भी उदय नहीं होगा। किन्तु प्रथम दो अङ्ग-भगवद्-तत्त्वका ज्ञान और आत्म-तत्त्वका ज्ञान भक्ति-विरोधी नहीं हैं। पयारमें कहे गये 'ज्ञान' शब्दके व्यापक अर्थको ग्रहण करनेसे इन तीनों अङ्गोंसे मिश्रित भक्तिको ही ज्ञानमिश्रा भक्ति कहा गया है। भगवत्-तत्त्व ज्ञान ऐश्वर्यका बोधक है, जो व्रजभक्तिके प्रतिकूल है, इसमें लौकिक-सद्बन्धुवत् भाव उदित नहीं होता। भक्तिके प्रारम्भमें यह ज्ञान सहायक है, किन्तु भक्तिमें अग्रसर होनेपर सहायक नहीं होगा।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥64॥ सम्बन्धज्ञानप्राप्त ब्राह्मण ही श्रीकृष्णभजनफलसे वैष्णव :- श्रीमद्भगवद्गीता (18/54)- ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ 65 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गीतामें कहा गया है, -अभेद ब्रह्मवादरूपी ज्ञानचर्चाके द्वारा स्वयं प्रसन्नात्माका शोक और कामनारहित होनेपर तथा सभी जीवोंमें समभावयुक्त ब्रह्मता प्राप्त करनेके बाद उसे मेरी पराभक्ति प्राप्त होती है। तात्पर्य यह है कि पहले कर्ममिश्रा-भक्तिका उल्लेख हुआ था, उसकी अपेक्षा ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ है॥65॥ अनुभाष्य-अर्जुनके प्रति श्रीभगवान्के वचन- ब्रह्मभूतः (ब्रह्माण्डान्तर्गतबोधमुक्तः निर्विशेषानुभवपरः) प्रसन्नात्मा (अभावधर्मरहितः) शोचति न (जड़ाभावे तस्य शोकः नास्ति) काङ्क्षति न (तस्य जड़भोगे आकाङ्क्षा च न वर्त्तते) सर्वेषु भूतेषु [मत्सेवासम्बन्धयोगं ज्ञात्वा] समः सन्, परां (परमां शुद्धां) मद्भक्तिं लभते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65 ॥ । 249
[ 8/65-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतानुकणिका—'‘ब्रह्मभूत’ अर्थात् जिनका सर्दी- गर्मी, मान-अपमान, सुख-दुःखादिमें समभाव है। सत्त्व, रज और तमोगुणकी उपाधिसे अनावृत होनेपर साधक जीव ब्रह्मभूत हो जाते हैं। अनावृत चैतन्य प्राप्त करके वे 'प्रसन्नात्मा' हो जाते हैं। वे नष्ट-विषयोंके लिये शोक नहीं करते और ‘न कांक्षति’—न ही अप्राप्त वस्तुकी अकाङ्क्षा करते हैं। 'समः सर्वभूतेषु’—वे भद्र-अभद्र सभी भूतोंमें बालकके समान समदर्शी हो जाते हैं। कोई लंगड़ा है, लूला है, गोरा है अथवा काला है—वे यह सब विचार नहीं करते, वह केवल आत्मदृष्टि रखते हैं।
एक समय अष्टावक्र ऋषि अपने हिमालयके आसनसे जनकपुरीमें महाज्ञानी जनकजीके दरबारमें आये। उनका टेढ़े शरीरको देखकर सब लोग हँसने लगे। जनकजी सबको हँसते हुए देखकर हँस दिये। तो अष्टावक्र भी लाठी रखकर बड़े ज़ोरसे हँसने लगे। तब राजा जनकने पूछा कि ये लोग तो आपके अङ्गके टेढ़ेपन, कुबड़ेपनपर हँस रहे हैं, किन्तु आप किसलिये हँस रहे हैं? अष्टावक्र बोले—मैं यह सुनकर महाराज जनकके दरबारमें आया था कि यहाँ बड़े-बड़े पण्डित लोग हैं, ब्रह्मतत्त्वको जाननेवाले हैं, सब प्राणियोंमें सम हैं। किन्तु मैं देखता हूँ कि यहाँ सब चमार-मोची हैं। वे लोग यह देखते हैं कि अच्छा चमड़ा है या खराब चमड़ा है। आत्म-तत्त्वका किसीको ज्ञान नहीं है, इसलिये मैं हँस रहा था।
यह ब्रह्मभूत ज्ञान उच्च-कोटिका साधन नहीं है। किन्तु यदि साधुसङ्ग प्राप्त हो जाय और अपराध न हों, तब पराभक्ति अर्थात् प्रेमाभक्ति प्राप्त होनेकी सम्भावना है। 'लभते' का तात्पर्य है कि साधकने पूर्वकालमें मोक्ष-सिद्धिके लिये ज्ञान-वैराग्यका अवलम्बन तो किया, परन्तु उसमें भक्ति आंशिक भावसे थी, उसकी उपलब्धि नहीं थी। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुर एक उदाहरण देते हैं—मूँग-उड़द दाल आदिमें यदि स्वर्ण-कणिका मिल जाय, तो दालमें आग लग जानेपर भी स्वर्ण-कणिका नष्ट नहीं होती। ज्ञानरूपी दालमें यह स्वर्ण कणिका संवित्-ह्लादिनीकी वृत्ति भक्ति है। यह कभी विनष्ट नहीं होती। कोई अपराध हो जानेपर अन्तर्धान हो जाती है। किन्तु यदि अपराध न हो तो साधुओंके सङ्गमें हरिकथा श्रवण करनेसे प्रेमाभक्ति प्राप्त होनेकी सम्भावना रहती है। कृष्णकी लीला-कथाओंका श्रवण, भागवत, भगवद्भक्तोंके चरित्र श्रवण करनेसे उनकी वह स्वर्ण-कणिकारूपी भक्ति विकसित हो उठती है, साथमें उनका ब्रह्म-ऐक्य ज्ञान नष्ट हो जाता है। सत्सङ्ग ही एकमात्र भक्तिप्रद सुकृति है। साधुजनोंके मुखसे निकली हरिकथाको श्रवण करनेसे ही भक्तिका क्रम विकास होता है। शुद्ध भक्तोंका सङ्ग जीवको प्रेम तक अवश्य ले जायेगा। शुद्ध गुरु और वैष्णवोंके सङ्गसे ज्ञानरूपी दाल श्रवण-कीर्तनरूपी आगमें जलकर भस्म हो जाती है और शुद्धभक्तिरूपी स्वर्ण-कणिका प्राप्त हो जाती है। किन्तु महाप्रभुने इसे भी बाह्य बतलाया, क्योंकि साधुसङ्ग सभीको मिलेगा—यह आवश्यक नहीं है।” —श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 65 ॥
(5) ज्ञानशून्य भक्ति ही शुद्धभक्ति-शब्दवाच्य :— प्रभु कहे,—“एहो बाह्य, आगे कह आर।” राय कहे,—“ज्ञानशून्या भक्ति—साध्यसार॥”66 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 66 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानमिश्राभक्तिकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा,–“यह भी बाह्य है; इसके परे जो है, उसे बोलो।” श्रीरायने कहा,—“ज्ञानशून्या भक्ति ही साध्योंका सार है॥”66॥
अनुभाष्य—इस (ज्ञानमिश्राभक्ति) अवस्थामें भी अस्मिता और उसकी वृत्ति शुद्ध-वैकुण्ठवाली अथवा वैकुण्ठको उद्देश्य नहीं करनेवाली होनेके कारण, यह भी बाह्य है। इस स्थितिमें साधक जड़से बाध्य नहीं रहनेपर अथवा उसको जड़से अतिरिक्त निर्मल अनुभव होनेपर भी उसे वास्तव सत्य-वस्तुकी (सविशेष भगवान्की) स्वतन्त्र
250 ।
आठवाँ अध्याय 8/66-67 ] और विशेष उपलब्धि नहीं होती। इसलिये उसकी अपनी अनुभूति और अपने मनकी वृत्ति-बहिर्मुखिनी है। वास्तवमें, वह भी शुद्धजीवका साध्य नहीं है। निर्विशेषत्वकी कल्पनामें सच्चिदानन्द-विशेष-समूह सुप्त रहता है। उससे पहले काल्पनिक विचारवाले वाक्योंका तात्पर्य भी निर्विशेषध्यान है, इसलिये वैसी भगवद्- सेवावृत्तिरहित काल्पनिक निर्विशेषपरक मुक्त अवस्था भी बाह्य है॥66॥ श्रीकृष्णके सम्पूर्ण शरणागतजन ही श्रीकृष्णवशकारी शुद्धभक्त :- श्रीमद्भागवत (10/14/3)- ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्त्ताम्। स्थानेस्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि- र्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम्॥67॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥67॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भागवतमें ब्रह्माने भगवान्को कहा,-“हे भगवन्! निर्भेद-ब्रह्मचिन्तारूपी ज्ञानचेष्टाको सम्पूर्णरूपसे दूर करके जो भक्तगण साधुओंके मुखसे निकली आपकी कथाका श्रवण करते हैं और काय-मन-वाक्यसे साधुपथमें स्थित होकर जीवनयात्रा निर्वाह करते हैं, त्रिलोकीमें आप दुर्लभ होनेपर भी उनके लिये सुलभ हो जाते हैं॥67॥ अनुभाष्य-बछड़ों-ग्वालबालोंको हरण करनेके फलस्वरूप श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माका गर्व चूर्ण होनेपर ब्रह्माजी श्रीकृष्णके एकान्त शरणागत होकर स्तव कर रहे हैं- ज्ञाने (ज्ञानार्थं) प्रयासं (चेष्टाजन्यक्लेशादिकम्) उदपास्य (दूरे विहाय) सन्मुखरितां (सद्भिः महाभागवतैः मुखरितां निसर्गप्रकटितां) श्रुतिगतां (कर्णकुहर प्राप्तां) भवदीयवार्त्तां (हरि- नामरूपगुणलीलामयीं कथां) ये स्थानेस्थिताः (स्वस्थाने साधुमार्गे स्थिताः सन्तः) तनुवाङ्मनोभिः (कायमनोवाक्यैः) नमन्तः (सर्वतोभावेन आत्मनिवेदनं कुर्वन्तः) एव जीवन्ति, हे अजित, (अधोक्षजत्वात् अभक्तैः अनभिभाव्य, अपराधीन, अपरिमेय) अपि त्रिलोक्यां तैः (त्वद्भक्तैरेव) प्रायशः [त्वं] जितः (वशीकृतः) असि। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥67॥ अमृतानुक्रमणिका-“श्रीरामानन्द रायने कहा ज्ञानशून्य भक्ति साध्यसार है। प्रमाणके रूपमें उन्होंने ब्रह्माजीके वचनको उद्धृत करते हुए कहा- 'ज्ञाने प्रयासमुदपास्य' अर्थात् जो साधुओंके मुखसे आपकी और आपके परिकरोंकी मधुर कथाओंको उनके पास रहकर श्रवण करते हैं, तन-मनसे विनम्र भावसे अवनत होकर (उन कथाओंका) सेवन करते-करते जीवन धारण करते हैं, त्रिलोकीमें अन्यान्य व्यक्तियोंके द्वारा अजित आपको ये भक्त जीतकर वशीभूत कर लेते हैं। परन्तु श्रुतिमें कहा गया है 'तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति' अर्थात् परमेश्वरको जानकर ही जीव संसारसे मुक्त होता है; श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (2/117)में कहा गया है- 'सिद्धान्त बलिया चित्ते न कर अलस', भक्तिरसामृतसिन्धुमें कहा गया है-'शास्त्रे युक्तौ च निपुण' अर्थात् शास्त्र सिद्धान्त जानना आवश्यक है। ऐसे अनेक शास्त्र-वाक्य ज्ञानकी आवश्यकतापर बल देते हैं। दोनों विचारोंमें विरोध दिखनेपर भी इसका सामञ्जस्य करते हुए श्रीजीव गोस्वामी कहते हैं कि भगवान्की कथाओं और लीलाओंमें अनेक गम्भीर तत्त्व निहित हैं। जैसे दाम-बन्धन लीला, ब्रह्म-विमोहन लीला आदि। जितने तत्त्व-ज्ञानकी आवश्यकता है, वह सब इन सब लीलाओंमें विद्यमान है; पृथक् रूपसे तत्त्व-ज्ञानके लिये प्रयास करनेकी आवश्यकता नहीं है। श्रीजीव गोस्वामीने क्रम-सन्दर्भमें कहा है-जो तत्त्व-ज्ञानमें ही फँसे रहते हैं, उनका लोभमयी भक्तिमें प्रवेश नहीं होता। भगवान्की लीला-कथाएँ भागवतके प्रत्येक श्लोकमें निबद्ध हैं, उनमें आनन्द है, रस है और वैष्णव लोग उनका आस्वादन करते हैं। हरिकथा हरिका ही स्वरूप है। अपनी कथा सुननेके लिये हरि सदैव उत्सुक रहते हैं। श्रवणके लोभसे स्वयं राधारानी एक बालिकाका रूप । 251
[ 8/67-68 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला धारण करके खीर बनानेके बहानेसे आकर श्रीरूप और श्रीसनातनकी इष्ट-गोष्ठीके मध्य कृष्णकथाको सुनती हैं। ‘स्थानस्थिताः’ अर्थात् जहाँ साधु हों, वहीं स्थित रहें। साधुजनोंके मुखसे विगलित हरिकथाको श्रवण करनेसे ही भक्तिका क्रम विकास होता है। गुरुपदाश्रयमें हरिकथा श्रवण करते हुए जीव भक्तिके सोपान—निष्ठा, रुचि, आसक्तिपर आरूढ़ होता है। हरिकथा श्रवण करते-करते जब अपराध-शून्य होकर जीवका चित्त निर्मल हो जाता है, तब उसमें कृष्ण-सेवाकी वासना, रति उत्पन्न होती है और उसके द्वारा श्रीकृष्ण वशीभूत हो जाते हैं। माठर-श्रुति-वचन—‘भक्तिवशः पुरुषः’ अर्थात् 'भगवान् भक्तिके द्वारा वशीभूत होते हैं।' भागवत (9/4/63) में स्वयं भगवान्ने दुर्वासा ऋषिके निकट स्वीकार किया है—‘अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज’ अर्थात् 'मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ, मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है।' प्रेमके तारतम्यानुसार रति पाँच प्रकारकी मानी गयी है—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर। भगवान्की वश्यतामें भी प्रेमके अनुरूप तारतम्य है। इसलिये जो ज्ञानके द्वारा मुक्ति लाभ करते हैं, उनके लिये भगवान् अजित ही हैं। शुद्धभक्तोंका सङ्ग जीवको प्रेम तक अवश्य ही ले जाता है। भगवान्की लीलाकथाएँ और उनके भक्तोंके चरित्र भगवद्-वशीकरण मन्त्र हैं।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 67 ॥ (ख) साधनकी सिद्धि—प्रेमभक्ति (भाव—प्रेमका अङ्कुर) :- प्रभु कहे,—“एहो हय, आगे कह आर।” राय कहे,—“प्रेमभक्ति—सर्वसाध्यसार ॥”68 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“यह साध्य हो सकता है, परन्तु इसके आगे कुछ कहो।” श्रीरामानन्द रायने कहा, —“प्रेमभक्ति सर्वसाध्योंका सार है॥”68॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह बात सुनकर महाप्रभुने कहा, —अब साध्य निर्णीत हुआ है, इसकी अपेक्षा अधिक जो है, उसे कहो। तात्पर्य यह है कि केवल वर्णाश्रमधर्मके पालनकी अपेक्षा कर्मार्पण श्रेष्ठ है, केवल कर्मार्पणकी अपेक्षा स्वधर्मत्याग अर्थात् अपने वर्णधर्मको त्याग करके संन्यास ग्रहण करना श्रेष्ठ है, उसकी अपेक्षा ब्रह्मानुशीलनरूपी ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ होनेपर भी, ये सभी बाह्य हैं, क्योंकि साध्यवस्तु जो शुद्धभक्ति है, वह पूर्वोक्त चारों प्रकारके सिद्धान्तोंमें नहीं है। ‘आरोपसिद्धा’ और ‘सङ्गसिद्धा’ भक्ति कभी भी ‘शुद्धभक्ति’ नहीं कहलाती। ‘स्वरूपसिद्धा भक्ति’—एक पृथक् तत्त्व है। वह कर्म, कर्मार्पण, कर्मत्यागरूपी संन्यास और ज्ञानमिश्रा-भक्तिसे सदा पृथक् है। अन्याभिलाषिताशून्य, ज्ञान-कर्मादिसे अनावृत, अनुकूलभावसे श्रीकृष्णका अनुशीलन—ये शुद्धभक्तिके लक्षण हैं। यही साध्य वस्तु है, क्योंकि साधन-अवस्थामें इसको देख पानेपर भी सिद्धावस्थामें ही यह निर्मलरूपसे लक्षित होती है। महाप्रभुके अन्तिम-प्रश्नके उत्तरमें श्रीरायने कहा, —प्रेमभक्ति ही सभी साध्योंका सार है। शुद्धभक्ति प्रथमावस्थामें शान्त-भक्तिके रूपमें प्रतीत होती है, उसमें श्रीकृष्णके प्रति ममता-बुद्धि नहीं रहती ॥ 68 ॥ अनुभाष्य—“ज्ञाने प्रयास” श्लोक साध्यनिर्णयमें कहे जानेपर महाप्रभुने इस वृत्तिको साध्यवृत्ति कहकर स्वीकार किया। यही ‘साधनभक्ति’के नामसे जानी जाती है। बादमें और भी अग्रसर होनेका आदेश करनेपर श्रीरामानन्द रायने साधनभक्तिके बाद भावभक्ति अर्थात् प्रेमभक्तिकी अङ्कुरावस्था और शान्तरसमें निरपेक्षतारूपी धर्म प्रधान होनेके कारण अन्य चार प्रकारके रसोंसे युक्त प्रेमभक्तिको ही साध्य कहा। ‘साधनभक्ति’ कहनेसे ‘श्रद्धा’, ‘साधुसङ्ग’, ‘भजनानुष्ठान’, ‘अनर्थनिवृत्ति’, ‘निष्ठा’, ‘रुचि’ और ‘आसक्ति’को समझना चाहिये ॥ 68 ॥ अमृताणुकणिका—“श्रीजीव गोस्वामीने भक्ति-सन्दर्भ (श्लोक 217)में भक्तिके तीन विभाग किये हैं—‘आरोप-सिद्धा भक्ति’, ‘सङ्ग-सिद्धा भक्ति’ और ‘स्वरूप-सिद्धा भक्ति।’ 252 ।
आठवाँ अध्याय 8/68 ] 'आरोप-सिद्धा भक्ति'—जिसमें कृष्णकी प्रीति-विषयक कोई क्रिया न हो, परन्तु अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये भगवान्में कर्मार्पण आदि किये जाँय, वह आरोप-सिद्धा भक्ति है। यह कर्मादि-रूपा है। (1) राजा हरिश्चन्द्रकी सत्यवादिता प्रसिद्ध है, परन्तु उन्होंने देहमें आत्माभिमान होनेके कारण शरीरको ही सत्य और अपने दानको ही भगवद्भक्ति मान लिया था। यही आरोप सिद्धा-भक्ति है। यह वर्णाश्रम धर्मके अन्तर्गत है और इसके द्वारा अधिकाधिक स्वर्गकी प्राप्ति हो सकती है। (2) दधीचि ऋषिने योगबलसे अपनी अस्थियोंका दान दिया, जिससे वज्र बनाया गया। इसमें शुद्धभक्तिकी कोई भी क्रिया नहीं है; योगके द्वारा भक्ति आरोपित हुई है। इसकी गति महर्लोकसे ऊपर नहीं है। (3) महाराज शिविने कबूतरकी रक्षाके लिये अपने मांसका दान किया। इसमें कृष्णसेवाका कोई भाव नहीं है, यह मात्र एक पुण्य कर्म है, यह फलस्वरूप स्वर्ग तक प्रदान कर सकता है। इन सभी उदाहरणोंमें श्रवण, कीर्तन, स्मरणादि भक्तिके अनुष्ठानकी कोई भी क्रिया नहीं है। अपने शरीरको ही श्रेष्ठ मानकर उसकी यातना सहन की गयी है। इन कर्मोंके मध्य जो भक्ति निहित है, उसके द्वारा ही स्वर्गादिकी प्राप्ति सम्भव होती है। यदि कर्ममें भक्ति न हो, तो वह कर्म भी निष्फल होता है, जैसे (मध्यलीला 24/87)— 'भक्ति बिनु कौन साधन दिते नारे फल। सब फल देय भक्ति स्वतन्त्र प्रबल॥' अर्थात् “भक्तिके बिना कोई भी साधन फल प्रदान नहीं कर सकता, किन्तु भक्ति अन्यान्य साधनोंकी अपेक्षासे रहित स्वतन्त्र तथा बहुत बलशाली है।" इन सभी प्रकारकी बिद्धा-भक्तिमें भक्ति मिश्रित अवश्य रहती है, किन्तु उसके परिणाममें भक्ति नहीं होती और न ही भगवत्-सेवा होती है। 'सङ्गसिद्धा भक्ति'—जहाँ भक्ति न होकर भक्तिके अङ्ग-रूपी दान, वैराग्य, ज्ञान आदिकी प्रधानता हो, वह सङ्गसिद्धा भक्ति कहलाती है। अधिकतर लोग इसीको शुद्धभक्ति समझ लेते हैं; विशेषकर स्मार्त्त-सम्प्रदायके अनुयायी इसीका अनुष्ठान करते हैं। भागवत (11/23)में कहा गया है—'सर्वप्रथम देह एवं दैहिक सम्बन्ध यथा—सन्तान आदिसे अनासक्त होना सीखें, फिर भगवान्के भक्तोंसे प्रेम करना सीखें। इसके पश्चात् प्राणियोंसे यथायोग्य मैत्री, दया और विनयकी शिक्षा लें।' ये सब ज्ञान-कर्म आदिके अङ्ग-समूह हैं, भक्ति नहीं है। भक्तिका उदय होनेसे ये सब लक्षण स्वतः ही प्रकट हो जाते हैं, इनका पृथक् रूपसे अनुशीलन करनेसे भक्तिमें कोई लाभ नहीं है। जीवोंपर दया करना सात्त्विक वृत्ति है। भरत महाराज युवावस्थामें राज-पाट, वैभव, परिवारको त्यागकर वनमें भगवद्भजन करने लगे। किन्तु एक हिरण-शावककी रक्षाकर उसका लालन-पालन करनेके कारण उसमें आसक्त हो गये और हिरणका स्मरण करते हुए ही उन्होंने देह-त्याग किया। इस कारण उन्हें अगला जन्म हिरणका मिला। परन्तु पूर्व जन्मकी प्रबल सुकृतिके कारण उन्हें अपना पूर्व इतिहास स्मरण रहा और उससे अगला जन्म जड़ भरतके रूपमें हुआ। सात्त्विक दयाके कारण उनको दो और जन्म ग्रहण करने पड़े। इसके अतिरिक्त केवल श्रीकृष्णके शरणागत होना भी भक्ति नहीं, अपितु वह भक्तिका द्वार-मात्र है। 'स्वरूप-सिद्धा भक्ति'—जिस अनुष्ठानके द्वारा भक्ति स्वतः ही निरूपित हो और उसमें श्रीकृष्णके प्रति अनुकूल रूपमें तैलधारावत् अविच्छिन्न-गतिसे वैष्णवोंके आनुगत्यमें अनुशीलन हो, उसे स्वरूप-सिद्धा भक्ति कहते हैं। भागवत (7/5/23-24)— “श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥ इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा। क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्॥” । 253
[ 8/68 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला इस भक्तिका अनुशीलन श्रवण, कीर्तन आदिके द्वारा किया जाता है। इस भक्तिकी विशेषता यह है कि जीवको उसके स्वरूप 'श्रीकृष्णके नित्यदास' की उपलब्धि करवा देती है। यदि कोई व्यक्ति श्रवण, कीर्तन आदि द्वारा नवधा-भक्तिका अज्ञानवशतः अनुकरण करते हुए भक्तिसे सम्बन्ध प्राप्त कर ले, तो उसे भक्तिका फल प्राप्त हो जाता है। प्रह्लाद महाराजने अपने पूर्व जन्ममें अज्ञानतावश ही श्रीनृसिंह चतुर्दशीका उपवास किया था, उस सुकृतिके बलसे उन्होंने अपने अगले जन्ममें हजारों वर्षों तक माताके गर्भमें महर्षि नारद गोस्वामीका सङ्ग प्राप्तकर उनसे हरिकथा श्रवण की। इसके फलस्वरूप उन्हें उत्तम-महाभागवत प्रह्लाद महाराजका जन्म प्राप्त हुआ। श्रीरूपगोस्वामीने पूर्व आचार्योंके द्वारा दी गयी भक्तिकी सभी परिभाषाओंको क्रोड़ीभूत करके उत्तमाभक्तिकी परिभाषाका एक अद्भुत श्लोक दिया है (भःरःसिः 1/1/11)— “अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येनकृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥” अर्थात् “श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त अन्य सभी कामनाओंसे रहित होकर निर्भेद-ज्ञान एवं नित्य-नैमित्तिक कर्म, योग, तपस्यासे अनावृत एवं अनुकूल भावसे श्रीकृष्णका जो अनुशीलन अर्थात् श्रीकृष्ण-सेवा की जाती है, उसे उत्तमा भक्ति कहते हैं।” इस सूत्रमें भक्तिके स्वरूप और तटस्थ—दोनों लक्षणोंका विशद विवेचन किया गया है। अनुकूल भावसे श्रीकृष्णका अनुशीलन अथवा उनकी सेवा—यह भक्तिका स्वरूप-लक्षण है। भक्ति जो अन्याभिलाषाओंसे रहित हो और उसमें ज्ञान-कर्म आदिकी प्रधानता न हो—यह तटस्थ-लक्षण है। इसे उत्तमा भक्ति अथवा शुद्धभक्ति कहा जाता है। इन्द्रियों, मन, वाणीकी समस्त चेष्टाओंके द्वारा और हृदयके समस्त भावोंके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवा हो, इसे कृष्णानुशीलन कहते हैं। ये चेष्टाएँ दो प्रकारकी होती हैं—प्रवृत्ति-मूलक और निवृत्ति-मूलक। इन्द्रियोंकी चेष्टाके द्वारा श्रवण, कीर्तन आदि भक्तिके अङ्गोंका पालन प्रवृत्ति-मूलक चेष्टा है। भक्ति-विरोधी-भाव, अपराध, आलस्य, अनर्थ आदिका त्याग निवृत्ति-मूलक चेष्टा है। भक्तिमें ये दोनों ही आवश्यक हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं—अपराधयुक्त नाम-कीर्तन छिद्रयुक्त पात्रमें रखे जलके समान निकल जायेगा, ठहरेगा नहीं। सावधानीपूर्वक अपराध-रहित होकर भक्तिके अङ्गोंका पालनसे सिद्धि होती है। भक्ति आनुगत्यमयी होती है। श्रीकृष्ण हेतु समस्त प्रकारकी चेष्टाएँ अनुकूल भावसे हो, उसमें प्रतिकूल भावना न हो और रसिक-तत्त्वज्ञ गुरु-वैष्णवोंके आनुगत्यमें इसका नित्य-निरन्तर इसका अनुष्ठान होना चाहिये। भक्तिकी सिद्धिके लिये अनुकूल अनुशीलनकी आवश्यकता है, क्योंकि प्रतिकूल आचरणसे सिद्धि नहीं होती। कोई-कोई महानुभाव कहते हैं कि अनुकूलका अर्थ है, जो कृष्णको रुचिकर हो। परन्तु इसमें अतिव्याप्ति और अव्याप्तिके दोष हो सकते हैं। 'अतिव्याप्ति-दोष'—श्रीकृष्ण चाणूर-मुष्टिकके सङ्ग युद्धमें अतिरुचिपूर्वक वीर-रसका आस्वादन कर रहे हैं। इससे असुरोंमें भक्ति व्याप्त लगती है, परन्तु उनमें श्रीकृष्णके प्रति द्वेष-रूप प्रतिकूल भाव होनेके कारण इसे भक्ति नहीं माना जा सकता। 'अव्याप्ति-दोष'—दूसरी ओर, स्तनपानमें श्रीकृष्णको अतृप्त छोड़कर माता यशोदा चूल्हेपर उफनते हुए दूधको उतारनेके लिये चली गयीं। माता यशोदाकी यह क्रिया श्रीकृष्णके लिये रुचिकर नहीं हुई। यहाँ ऐसा प्रतीत होता है, जैसे माता यशोदामें भक्ति अव्याप्त है अर्थात् उनमें भक्ति नहीं है। किन्तु श्रीकृष्णकी सेवामें उपयोग होनेवाली प्रत्येक वस्तुकी रक्षा करना परिपूर्ण भक्ति है; वह माताका श्रीकृष्णके प्रति वात्सल्यका प्रकाश है। श्रीकृष्णका जिसमें मङ्गल हो, वही भाव अनुकूल है। माता यशोदाका विचार है कि उनके दूधसे श्रीकृष्णकी पूर्ति नहीं होगी, उससे दही, मक्खन, छाछ और रबड़ी आदि मिष्ठान नहीं बनेंगे। 254 ।
आठवाँ अध्याय 8/68-70 ] [ बायाँ स्तम्भ ] इसलिये दूधकी रक्षा करनी चाहिये। यह प्रीतिका लक्षण है। श्रीकृष्णकी सेवामें उपयोगमें आनेवाली वस्तुओंमें भक्तोंकी श्रीकृष्णसे भी अधिक प्रीति होती है। केवल प्रातिकूल्य-रहित होना भी भक्ति नहीं है, क्योंकि घड़ेमें श्रीकृष्णके लिये प्रतिकूल भाव नहीं है, परन्तु साथ श्रीकृष्णकी सेवाकी कोई चेष्टा भी नहीं है। भक्ति भक्त-वृत्तिपर निर्भर करती है, श्रीकृष्ण-वृत्तिपर नहीं। ‘आनुकूल्येन कृष्णानुशीलन’—ये दोनों क्रियाएँ आवश्यक हैं। यह भक्तिका स्वरूप-लक्षण है। इसी स्वरूप-सिद्धा भक्तिका अनुष्ठान उत्तमा भक्तिमें पर्यवसित होता है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 68 ॥ भक्तके प्रेमसे ही श्रीकृष्ण वशीभूत :— पद्यावली 11वें अङ्कमें उद्धृत श्रीरामानन्द राय-कृत श्लोक— नानोपचार-कृतपूजनमार्त्तबन्धोः प्रेम्णैव भक्तहृदयं सुखविद्रुतं स्यात्। यावत् क्षुदस्ति जठरे जरठा पिपासा तावत् सुखाय भवतो ननु भक्ष्य-पेये ॥ 69 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 69 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जैसे पेटमें जब तक बहुत जोरकी भूख और प्यास रहती है, तब तक ही खाने-पीने योग्य सब वस्तुएँ सुखदायक होती हैं, उसी प्रकार आर्त्तबन्धुकी (दीनबन्धु श्रीकृष्णकी) नाना उपचारसे पूजा होनेपर भी जब वह प्रेमयुक्त होती है, तभी भक्तोंका हृदय आनन्दसे पिघल जाता है ॥ 69 ॥ अनुभाष्य— यावत् जठरे (उदरे) जरठा (अतिशयिनी) क्षुत् पिपासा च अस्ति, तावत् भक्ष्यपेये [यथा] सुखाय (आनन्दाय) भवतः, [तथा] आर्त्तबन्धोः (दीननाथस्य) नानोपचार-कृतपूजनं (विविध- षोडशोपचारसमन्विताचार्चनादिकम् अनुष्ठितमपि)) भक्तहृदयं प्रेम्णा (कृष्णोन्द्रिय-तोषणमया भक्त्या) एव सुख-विद्रुतम् (आनन्देन द्रवीभूतं) स्यात्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 69 ॥ [ दायाँ स्तम्भ ] रागमार्गके द्वारा ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति, सुकृतिसे उत्पन्न वैधभक्तिसे दुर्लभ :— (पद्यावली 12 अंकमें उद्धृत श्रीरामानन्द राय-कृत श्लोक)— कृष्णभक्तिरसभाविता मतिः क्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते। तत्र लौल्यमपि मूल्यमेकलं जन्मकोटिसुकृतैर्न लभ्यते ॥ 70 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—करोड़ों जन्मोंमें की गयी सुकृतियोंके द्वारा जिसे प्राप्त नहीं किया जा सकता, परन्तु लोभरूपी एक मूल्य देकर जिसे प्राप्त किया जा सकता है, ऐसी श्रीकृष्णभक्तिरसभावित मति जहाँसे भी मिले, उसे खरीद लो। उक्त दो श्लोकोंमें, पहला श्रद्धामूलक वैधीभक्तिको सूचित कर रहा है और दूसरा लोभमूलक रागानुगा-भक्तिको सूचित कर रहा है। इसके बाद इसी रागानुगा-भक्तिका अवलम्बन करके ही श्रीराय रामानन्दके द्वारा कहे जानेवाले वचन व्यवहार होंगे। अर्थात् अब यहाँसे वे रागभक्ति-सिद्धान्तका अवलम्बन कर रहे हैं और उन्होंने वैधी-भक्तिकी बातको छोड़ दिया है ॥ 70 ॥ अनुभाष्य— कृष्णभक्तिरसभाविता (कृष्णसेवारस-भावनामयी) मतिः (बुद्धिः) यदि कुतः (यत्र क्वापि देशकालपात्रतः अनुष्ठानात् वा) लभ्यते, तदा [युष्माभिः तादृशी मतिः] क्रीयतां (मूल्यप्रदानेन अवश्यमेव ग्रहणीया)। तत्र (मतिविक्रयवाणिज्ये) एकलं लौल्यं (लोभः) एव हि मूल्यं, [यतः तन्मतिः] जन्मकोटि-सुकृतैः (बहुजन्मजन्मान्तरसञ्चितभाग्यैः) न लभ्यते, [सा परमदुर्लभा एवेत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णसेवारस-भावनामयी मति यदि किसी स्थानपर, किसी समय भी, किसी भी व्यक्तिसे मिल रही हो, तो वैसी मति मूल्य देकर खरीद लो। लोभ ही उस मतिको खरीदनेके लिये एकमात्र मूल्य है, बहुत जन्म-जन्मान्तरके सञ्चित भाग्यसे भी । 255
[ 8/70-71 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला वह प्राप्त नहीं की जा सकती; इसका अर्थ यह है कि वह परम दुर्लभा है ॥ 70 ॥ अमृताणुकणिका-“ 'नानोपचार-कृतपूजनमार्त्तबन्धोः' —यहाँ ऐसा लगता है कि दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तिककी सङ्गति नहीं है। दृष्टान्त कहता है कि अन्न-जल उसीको सुखदायी होता है, जिसे भूख-प्यास हो; यहाँ भोजनका सुख भोक्ताको प्राप्त हो रहा है, उसे तीव्र भूख-प्यास है। परन्तु दाष्ट्रान्तिकमें देखा जाता है कि है—जो उपचारके साथ पूजा करेंगे, उनके हृदयमें यदि प्रेम रहे, तभी भगवान्का हृदय सुखसे द्रवित हो जाता है। परन्तु यह शङ्का निराधार है, क्योंकि जब भक्तका प्रेम आर्तिकी अवस्थामें पहुँचता है, तब भगवान् आर्त्तबन्धु होकर सेवा ग्रहण करते हैं। उन्हें विदुरानीके प्रेमके कारण भूख लग गयी, तो केलेके छिलके भी स्वाद लेकर खाये। किन्तु वे दुर्योधनका राजमहल और छप्पन भोग परित्याग करके चले आये, क्योंकि दुर्योधनमें प्रेम नहीं था। महाप्रभु श्रीधरकी दुकानसे केला, मोचा छीनकर लाते थे, श्रीरामचन्द्रने शबरीके झूठे बेर भी खाये, वे गोपियोंके घरसे माखन भी चुराकर खाते थे। क्योंकि भगवान् प्रेमके भूखे हैं। श्रीराय रामानन्दका यह उदाहरण वैधीभक्तिके अन्तर्गत है। 'कृष्णभक्तिरसभाविता मतिः'-यह उदाहरण अनुरागमयी रागानुगा भक्तिका है। कोटि जन्मोंकी सुकृतिसे साधुसङ्ग प्राप्त होता है और साधुसङ्गके द्वारा भक्ति होती है। किन्तु लोभमयी रागानुगा भक्ति कोटि जन्मोंकी सुकृतिसे भी नहीं मिलती। केवल साधुसङ्गमें रुचियुक्त हरिकथा श्रवणसे रुचियुक्त सेवा-वासना उदित होती है। उस समय वह कथा हृदय और कानोंके लिये रसायन हो जाती है। निरन्तर श्रवण करते-करते लोभमयी वासना आती है। भगवद्-कथाओंको सुनकर यदि लोभ हो जाय कि माता यशोदा, श्रीदाम, सुबल, गोपियाँ जैसे श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं, मैं भी वैसी सेवा करूँ—इस लोभके उदित होनेके साथ ही रागानुगा भक्ति आरम्भ होती है। यह अवस्था रुचिकी है। यहींसे साधकका भक्ति-साधन आरम्भ होता है। इसके पूर्वकी अवस्थाएँ, निष्ठा आदि इसमें अन्तर्निहित हैं। यह दुर्लभ भक्ति श्रीकृष्ण तथा उच्च कोटिके रागानुगा भक्तोंकी कृपासे मिलती है। जैसे-श्रीशुकदेव गोस्वामीके द्वारा परीक्षित महाराजको भागवत श्रवण करवाना। ईश्वर-कृपा महद्-कृपाकी अनुगामिनी होती है। दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर भावयुक्त भक्त रागानुग भक्तोंकी श्रेणीमें आते हैं। और श्रवण यदि किसी रूपानुग भक्तसे हो, तो अधिक लाभ है। रागानुगा भक्तोंमें भी रूपानुग भक्त विशेष हैं। ये श्रीरूप मञ्जरीके अनुगत हैं और मधुर-भावापन्न हैं। रूपानुग भक्त परम दुर्लभ हैं। साधनावस्थाके सभी सोपानोंमें श्रद्धासे आरम्भकर आसक्तिकी दशा तक श्रद्धा हर स्थितिमें रहती है। इसीसे साधक रतिकी अवस्था तक पहुँचता है। यही रति या भाव प्रेमका अङ्कुर है। रतिकी अवस्थाकी श्रद्धा दिव्य है। इस स्थितिको प्राप्त करके साधक एक भूत-ग्रस्त व्यक्तिकी भाँति प्रेम-ग्रस्त हो जाता है और सभी प्रकारकी शास्त्र-युक्तियोंको भूल जाता है; कैसे कृष्णसे मिलूँ-यही विचार प्रधान हो जाता है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 70 ॥ (1) 'दास्य-प्रेम' उत्तम नहीं :- प्रभु कहे,—“एहो हय, आगे कह आर।” राय कहे,—“दास्य-प्रेम—सर्वसाध्यसार॥” 71 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“यह ठीक है, इससे आगे और कुछ कहिये।” तब श्रीरामानन्द रायने कहा,—“दास्यप्रेम सब साध्योंका सार है॥” 71 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यहाँ तक सुनकर महाप्रभुने कहा,—यह ठीक है; किन्तु इसके बाद जो है, उसे बताओ। उसके उत्तरमें श्रीरायने कहा,—दास्यप्रेम ही सभी साध्योंका सार है। 'प्रेमलक्षणभक्ति'में 'ममता' जुड़ जानेसे 'दास्यप्रेम' होता है। साधारण प्रेममें भगवान् और 256
आठवाँ अध्याय 8/71-73 ] भक्तमें कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं होता। 'भगवान् ही मेरे प्रभु हैं'-इस प्रकारका ममता-भाव उसमें जुड़नेसे साधारण प्रेम 'दास्यप्रेम' हो जाता है, यह साधारण प्रेमकी अपेक्षा ऊँचा है ॥ 71 ॥ अनुभाष्य-ऊपर लिखे दो श्लोकोंमें प्रेमभक्तिको साधारण रूपसे 'साध्य' निर्णय करनेपर श्रीमहाप्रभुने श्रीरामानन्दको और भी अग्रसर होकर इस 'साध्य'की विशेष रूपसे धारावाहिककी भाँति व्याख्या करनेके लिये कहा। तब वे 'दास्यप्रेमभक्ति'को 'साध्य' कहकर प्रमाणित कर रहे हैं ॥ 71 ॥ श्रीकृष्ण-दास ही श्रीकृष्णके सर्व-ऐश्वर्यके अधिकारी :- श्रीमद्भागवत (9/5/16)- यन्नामश्रुतिमात्रेण पुमान् भवति निर्मलः। तस्य तीर्थपदः किंवा दासानामवशिष्यते ॥ 72 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 72 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमद्भागवतमें कहा गया है,-जिनके नाम-श्रवणमात्रसे ही जीव निर्मल होता है, उन तीर्थपद भगवान्के जो दास हैं, उनके लिये और क्या वस्तु प्राप्त करनी बाकी रहती है? ॥ 72 ॥ अनुभाष्य-स्वयंमें ब्राह्मण होनेका अभिमान और देहाभिमानके कारण दूसरोंमें दोष-दृष्टि रखनेवाले तथा वैष्णव-विरोधरूपी दुर्वासनासे ग्रस्त दुर्वासा, जिन्हें वैष्णवास्त्र श्रीसुदर्शन कष्ट दे रहे थे, उनकी महाभागवत अम्बरीषकी प्रार्थनासे श्रीसुदर्शन चक्रसे रक्षा हुई; ऐसा देखकर दुर्वासाकी जातिबुद्धि दूर हुई, तब उनके द्वारा की गयी शुद्धभक्त और भगवान्की ऐसी स्तुति- यन्नामश्रुतिमात्रेण (यस्य भगवतः नामश्रवणेनैव) पुमान् (जीवः) निर्मलः (शुद्धः) भवति, तस्य तीर्थपदः (तीर्थं पदे यस्य सः तस्य भगवतः) दासानां (किङ्कराणां) किं वा अवशिष्यते? [न किञ्चिदेवेत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद-जिनका नाम श्रवणमात्रसे ही जीव निर्मल हो जाता है, तब उन भगवान् जिनके चरणकमलोंमें समस्त तीर्थ वास करते हैं, उनके दासोंको क्या पाना शेष रह जाता है, अर्थात् कुछ भी बाकी नहीं रहता है-यह अर्थ है ॥ 72 ॥ भगवान्के दासकी दीनता :- यामुनाचार्यपाद-कृत स्तोत्ररत्न (46)- भवन्तमेवानुचरन्निरन्तरः प्रशान्तनिःशेषमनोरथान्तरः। कदाहमैकान्तिकनित्यकिङ्करः प्रहर्षयिष्यामि स नाथ जीवितम् ॥ 73 ॥ अनुवाद-हे नाथ! आपकी निरन्तर सेवाके द्वारा अन्य मनोरथोंसे सर्वथा रहित होकर प्रशान्तभावसे मैं कब अपनेको आपका नित्यदास कहकर दास्यजीवनके सहित आनन्दसे प्रफुल्लित होऊँगा? ॥ 73 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/206 संख्या देखें ॥ 73 ॥ अमृताणुकणिका-“शान्त भावमें निष्ठा है, परन्तु ममता नहीं है, इसलिये उसमें प्रेमका विकास भी नहीं है। शान्त रसके भक्त सनक-सनन्दनादि चार कुमार आदि हैं। ये ज्ञान-दृष्टिसे सभी कुछ जानते हैं। किन्तु उनका अपना रस कौन-सा है, वे किस रूपमें सेवा करते हैं, यह निश्चित नहीं है। उन्हें अपनी सेवाकी परिपाटी भी ज्ञात नहीं है। दास्यभावमें निष्ठाके साथ ममतासे सेवाभाव भी युक्त हो जाता है। सम्भ्रम और विश्रम्भ भावसे दास्य दो प्रकारका होता है। वैकुण्ठमें शुद्ध सम्भ्रमयुक्त दास्य है। अयोध्या तथा द्वारकामें भी गौरव-मिश्रित सम्भ्रम दास्य-रस है। किन्तु वह वैकुण्ठसे कुछ ऊँचा है। केवल व्रजमें ही शुद्ध विश्रम्भ-भावयुक्त दास्य प्रेम अवस्थित है। व्रजके दास्य भक्तोंमें ममतायुक्त सख्य और वात्सल्यका मिश्रण रहता है। दास्य प्रेममें श्रीकृष्ण विषय-आलम्बन हैं और वे भक्त-वात्सल्य आदि गुणोंसे युक्त हैं। श्रीकृष्णके दास आश्रय-आलम्बन हैं। श्रीकृष्णके दासोंमें नित्य-सिद्ध, । 257
[ 8/73-75 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला साधनसिद्ध और साधक—ये तीन प्रकारके भेद हैं। श्रीकृष्णकी कृपा, चरणरज और भुक्तावशेष (महाप्रसाद) आदि उद्दीपन हैं एवं श्रीकृष्णकी आज्ञा पालन करना अनुभाव है। दास्य-भक्तमें यह भावना होती है कि श्रीकृष्ण मेरे प्रभु हैं और मैं उनका दास हूँ।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 73 ॥ (2) ‘सख्यप्रेम’—उत्तम :- प्रभु कहे,—“एहो हय, किछु आगे आर।” राय कहे,—“सख्य-प्रेम—सर्वसाध्यसार॥” 74 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“दास्यप्रेम साध्य है, आपका यह कथन ठीक है, परन्तु इससे आगे और कुछ बतलाइये।” श्रीरामानन्द-रायने कहा,—“श्रीकृष्णके प्रति सख्य-प्रेम ही सभी साध्योंका सार है॥” 74 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह बात सुनकर महाप्रभुने कहा,—और कुछ आगे बढ़ पानेपर ही सर्वसार प्राप्त होगा। श्रीरायने उसके उत्तरमें कहा,—श्रीकृष्णमें ‘सख्यप्रेम’ ही सभी साध्योंका सार है। श्रीरायके कहनेका तात्पर्य यह है कि दास्यप्रेममें ‘ममता’ रहनेपर भी उसमें ‘भगवान्’—‘प्रभु’ हैं, इस प्रकारकी बुद्धि रहनेके कारण एक प्रकारका ‘भय’ और ‘सम्भ्रम’ अर्थात् गौरवका भाव सहज ही उदित होता है। उस ‘भय’ और ‘सम्भ्रम’का परित्याग करके ‘विश्रम्भ’ अर्थात् ‘एकान्त विश्वास’को ग्रहण कर पानेपर वही प्रेम ही ‘सख्यप्रेम’ होता है। इस प्रेममें श्रीकृष्ण और उनके सखाओंके बीचमें एक ‘समता भाव’ उदित होता है ॥ 74 ॥ व्रजके गोपालगणोंकी श्रीकृष्णसख्य-महिमा :- श्रीमद्भागवत (10/12/11)— इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या दास्यं गतानां परदैवतेन। मायाश्रितानां नरदारकेण सार्द्धं विजह्रुः कृतपुण्यपुञ्जाः ॥ 75 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 75 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीभागवतमें कहा गया है,—जो ज्ञानमार्गमें ब्रह्मसुखानुभूति स्वरूपमें, दास्यरसके भक्तोंको परदेवतारूपमें एवं मायाश्रित व्यक्तियोंको नरबालकके रूपमें प्रतीत होते हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके साथ व्रजके गोपबालकोंने बहुत सुकृतिके फलस्वरूप सख्यरसमें विहार किया था ॥ 75 ॥ अनुभाष्य—श्रीशुकदेव गोस्वामी परीक्षितको वन-भोजनके लिये निकले श्रीकृष्णके साथ विश्रम्भ-प्रेमके सूत्रमें बँधे सखा व्रज-गोपबालकोंके अतिशय सौभाग्यका वर्णन कर रहे हैं— इत्थम् (एवम्प्रकारेण) कृतपुण्यपुञ्जाः (कृतः अनुष्ठितः पुण्यानां पुञ्जः समूहः यैः ते गोपबालकाः) सतां (निर्विशेषज्ञानिनां) ब्रह्मसुखानुभूत्या (ब्रह्मानन्दानुभवैकस्वरूपेण), दास्यं गतानां (लब्धभजनानां भक्तानामिति यावत्) परदैवतेन (परमेश्वर-स्वरूपेण) मायाश्रितानां (भगवन्माया-मोहितानां) नरदारकेण (नरबालकरूपेण) [भगवता] सार्द्धं [सख्येन] विजह्रुः (विहाराणि चक्रु भाग्यं कृष्ण-सखानामिति भावः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 75 ॥ अमृताणुकणिका—‘सख्य दो प्रकारका होता है—ऐश्वर्ययुक्त तथा माधुर्य-युक्त। यहाँ श्रीराय रामानन्दका उद्देश्य शुद्ध माधुर्यमय व्रजके सख्यसे है, इसमें शान्तरसकी श्रीकृष्णमें एकनिष्ठता, दास्यकी सेवा तथा विश्रम्भ-सख्य है। प्रस्तुत श्लोकमें इसीका उदाहरण है। इसमें बतलाया है कि विभिन्न भावनावाले भक्त श्रीकृष्णको विभिन्न रूपोंमें देखते हैं। ‘सतां’—निर्विशेषवादी ब्रह्मज्ञानी भगवान्को ‘ब्रह्मसुखानुभूति स्वरूप’में जानते हैं। वे श्रीकृष्णके साथ विहार नहीं कर सकते, क्योंकि ब्रह्मसुखमें कोई अस्तित्व नहीं है, सत्ता नहीं है, वे परतत्त्व रूपमें ब्रह्मकी उपासनाकर ब्रह्मसायुज्यकी कामना करते हैं; निर्विशेष ब्रह्मके साथ क्रीड़ा करना सम्भव नहीं है। ‘दास्यं गतानां’—इनमें आराध्यका भाव है। इस गौरव-बुद्धिके कारण वे न तो श्रीकृष्णके साथ खेल सकते हैं और न अन्य क्रीड़ा ही कर सकते हैं। ‘मायाश्रितानां’—मायामोहित जीव श्रीकृष्णको एक नरबालकके 258 ।
आठवाँ अध्याय 8/75-77 ] रूपमें ही देखते हैं। उनका दृष्टिकोण विपरीत ही है। वे श्रीकृष्णको तुच्छ समझते हैं और उनकी श्रीकृष्णके साथ विहार करनेकी इच्छा भी नहीं होती। 'सार्द्धं विजहु कृतपुण्यपुञ्जाः'—व्रजके सखा हैं। न जाने इन सखाओंने कौन-से कोटि-कोटि पुण्य किये थे, जो वे श्रीकृष्णके साथ अत्यन्त लोभनीय विहार करते हैं। वनमें सखागण पत्र-पुष्पों और गैरिक धातुओंसे श्रीकृष्णका शृङ्गार करते हैं, श्रीकृष्ण भी सखाओंका शृङ्गार करते हैं। कभी वे वेणुको चोरी कर लेते हैं, फिर पीछे-पीछेसे एक-दूसरेको पकड़ा देते हैं। जब श्रीकृष्ण वेणुको खोजते हैं, तो सखा कहते हैं कि हमें कन्धेपर बैठाकर ले चलो, तब वेणु कहाँ है, बतलायेंगे। वे श्रीकृष्णको स्पर्श करनेकी होड़ लगाते हैं कि 'पहले मैं पकड़ूँगा', 'पहले मैं पकड़ूँगा'। कभी सखा श्रीकृष्णके साथ पशुओंकी बोली बोलते हैं; कोयल, मयूरके स्वरकी नकल करते हैं, मेंढकके समान फुदकते हैं, कभी बन्दरकी पूँछ पकड़ लेते हैं और जब बन्दर एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर छलांग लगाते हैं, तो वे भी उनकी पूँछ पकड़े होनेके कारण उनके साथ एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर जाते हैं। श्रीकृष्ण सखाओंके साथ विभिन्न प्रकारकी लीलाएँ करते हुए स्वच्छन्दरूपसे वन-विहार करते हैं। इस प्रकार वे सख्यरसका आनन्द लेते हैं। सखाओंको यह सौभाग्य कोटि-कोटि पुण्य करनेके कारण प्राप्त हुआ है। 'कृतपुण्यपुञ्जाः'—श्रीसनातन गोस्वामीके अनुसार 'पुञ्ज' शब्दका अर्थ है—'अक्षय' और 'पुण्य' शब्द 'भक्ति'का वाचक है, अर्थात् ये गोप-गण ऐसी 'अक्षय भक्ति'से सम्पन्न हैं। लौकिक पूजा-पाठ या तपस्या आदिसे कोई भी श्रीकृष्णका सहचर नहीं बन सकता। श्रीकृष्णके सखागण अक्षय भक्तिसे परिपूर्ण हैं और बलदेव प्रभुसे प्रकटित नित्य परिकर हैं; ये जीव तत्त्व नहीं हैं। इनकी लोभनीय क्रीड़ाओंकी कथाको सुनकर जीव रागानुगा भक्ति साधनके द्वारा श्रीकृष्णके सखा बन सकते हैं। ये जीव-तत्त्व साधन-सिद्ध होते हैं। सख्य रसमें सङ्कोचरहित स्वच्छन्द सेवा है और सेवा वासनाका विकास भी है तथा साथमें ममता भी है। इसलिये महाप्रभुने इसे उत्तम माना है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 75 ॥ (3) 'वात्सल्य-प्रेम' सख्यकी अपेक्षा उत्तम :— प्रभु कहे, — “एहो उत्तम, आगे कह आर।” राय कहे,—“वात्सल्य-प्रेम—सर्वसाध्यसार ॥” 76 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा—“यह तो उत्तम है, परन्तु इससे आगे कुछ और कहिये।” तब श्रीरामानन्द-रायने कहा,—“वात्सल्य प्रेम ही सर्वसाध्यसार है॥” 76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा,—'सख्यरस' यद्यपि 'दास्यरस'की अपेक्षा उत्तम है, तथापि थोड़ा और अग्रसर होनेसे ही साध्यसार प्राप्त होगा। श्रीरायने उसके उत्तरमें कहा,—'वात्सल्य'-भावका प्रेम ही सभी साध्योंका सार है। सख्यरसका जो विश्रम्भात्मक प्रेम है, उसमें और अधिक स्नेहयुक्त होनेपर 'वात्सल्यरस'का उदय होता है ॥ 76 ॥ अनुभाष्य—श्रीरामानन्दके 'सख्यप्रेम'के साध्य-निर्णयको सुनकर महाप्रभुने उसे 'दास्यप्रेम'की अपेक्षा 'उत्तम' कहा एवं और भी अग्रसर होनेके लिये अनुरोध करनेपर श्रीरामानन्दने तब 'वात्सल्य-प्रेम'को साध्य बतलाया ॥ 76 ॥ नन्द-यशोदाके वात्सल्यकी महिमा :— श्रीमद्भागवत (10/8/46)— नन्दः किमकरोद्ब्रह्मन् श्रेय एवं महोदयम्। यशोदा वा महाभागा पपौ यस्याः स्तनं हरिः ॥ 77 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमद्भागवतमें कहा गया है,—हे ब्रह्मन्! श्रीनन्द महाराजने ऐसी क्या सुकृति की थी, जिसके फलस्वरूप उन्होंने श्रीकृष्णको पुत्रके रूपमें प्राप्त किया था? महाभागा श्रीयशोदाने ही ऐसी क्या सुकृति की थी, जिससे साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्णने उनको 'माँ' कहकर उनका स्तन पान किया था? ॥ 77 ॥ । 259
[ 8/77-80 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— श्रीशुकदेवके द्वारा यशोदाजीके श्रीकृष्णवात्सल्यके वर्णनको सुनकर विस्मित राजा परीक्षितकी उक्ति— हे ब्रह्मन्, नन्दः एवं महोदयं (महान् श्रेष्ठः उदयः उत्कर्षः यस्मिन् तत् अपूर्वफलोदयं) श्रेयः (मङ्गलप्रदं कर्म) किम् अकरोत्, महाभागा (अतिशय-सौभाग्यशालिनी) यशोदा वा किम् अकरोत्, हरिः यस्याः (यशोदायाः) स्तनं पपौ? श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 77॥ यशोदाके यशका गान :— श्रीमद्भागवत (10/9/20)— नेमं विरिञ्चो न भवो न श्रीरप्यङ्गसंश्रया। प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत् प्राप विमुक्तिदात् ॥ 78 ॥ अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78॥ अमृतप्रवाह भाष्य— यशोदा गोपीने साधारण जीवोंके मुक्तिदाता श्रीकृष्णसे जिस कृपाको प्राप्त किया था, वह ब्रह्मा, शिव अथवा विष्णुके वक्षःस्थलपर आश्रित लक्ष्मीको भी प्राप्त नहीं हुई॥ 78॥ अनुभाष्य— रस्सी द्वारा बाँधनेके लिये उद्यत माताको असमर्थ और थकी हुई देखकर श्रीकृष्ण स्वयं ही बँध गये; यशोदाजीके इस श्रीकृष्ण-वशकारिता-गुणके दर्शनसे परीक्षितके प्रति शुकदेवकी उक्ति— गोपी (यशोदा) विमुक्तिदात् (श्रीहरेः सान्निध्यात्) यत् प्रसादं प्राप, तत् इमं प्रसादं विरिञ्चः (पुत्रो ब्रह्मापि) न, भवः (आत्मतुल्यः शम्भुः) न, अङ्गसंश्रया (पत्नी) श्रीः (लक्ष्मीः) अपि न लेभिरे। श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78॥ अमृतानुकणिका— गौड़ीय वेदान्त प्रकाशनसे प्रकाशित श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामीके द्वारा सम्पादित “श्रीरायरामानन्द-संवाद” ग्रन्थ देखें॥ 77-79॥ (4) ‘कान्तभाव’ ही सर्वश्रेष्ठ प्रेमभक्ति :— प्रभु कहे,—“एहो उत्तम, आगे कह आर।” राय कहे,—“कान्तभाव—प्रेमसाध्यसार ॥” 79॥ अनुवाद— महाप्रभुने कहा, — “यह वात्सल्यप्रेम उत्तरोत्तर उत्तम है, पर आगे और जो है, उसे कहिये।” श्रीरामानन्द रायने कहा, — “श्रीकृष्णके प्रति कान्तभाव ही सब साध्योंका सार है॥” 79॥ अमृतप्रवाह भाष्य— महाप्रभुने कहा, — यद्यपि यह उत्तरोत्तर उत्तम हुआ है, तथापि इसको पार करके और एक रस है, जिसको ही 'साध्यसार' कह सकते हो। श्रीरायने उत्तर दिया, — श्रीकृष्णके प्रति 'कान्तभाव' ही प्रेमकी पराकाष्ठा रूप साध्योंका सार है। तात्पर्य यह है, — साधारण-प्रेममें 'ममता'का अभाव, दास्यरसमें 'विश्रम्भ' अथवा 'विश्वास'का अभाव, सख्यरसमें 'स्नेहाधिक्य'का अभाव और वात्सल्यरसमें 'निःसङ्कोच-भाव'का अभाव होनेके कारण साध्यप्रेमकी पूर्णता उन-उन रसोंमें नहीं होती। श्रीकृष्णके प्रति जब कान्तभाव उदित होता है, तभी सभी अभावोंसे शून्य, सभी साध्योंके सार एक अखण्ड प्रेमतत्त्वको प्राप्त किया जा सकता है॥ 79॥ अनुभाष्य— सख्यप्रेमकी अपेक्षा 'वात्सल्यप्रेम' उत्तम है, किन्तु जब महाप्रभुने श्रीरायको और भी अग्रसर होनेके लिये कहा, तब श्रीरामानन्दने 'कान्तभाव'को ही प्रेमका 'साध्यत्व' कहकर उल्लेख किया॥ 79॥ व्रजगोपियोंका माहात्म्य :— (श्रीमद्भागवत 10/47/60)— नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः। स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ- लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम्॥ 80 ॥ अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 80॥ अमृतप्रवाह भाष्य— श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरियोंके प्रति जो कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे 260 ।
आठवाँ अध्याय 8/80-81 ] कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो क्या कहूँ? ॥ 80 ॥ अनुभाष्य-उद्धवजी व्रजमें आकर कुछ महीनों तक रहे। श्रीकृष्णकथा-कीर्तनके द्वारा हर्षोत्पादन करनेपर भी जिनका चित्त ऐकान्तिक रूपसे श्रीकृष्णमें ही आविष्ट था, उन श्रीकृष्ण-विरहसे तप्त गोपियोंके एकमात्र श्रीकृष्णमें तन्मय चित्तकी विकलताके दर्शन करके उद्धवजी उनके परम सौभाग्यकी प्रशंसा कर रहे हैं- रासोत्सवे (रासक्रीड़ाकाले) अस्य (श्रीकृष्णस्य) भुजदण्डगृहीतकण्ठलब्धाशिषां (भुजदण्डाभ्यां बाहुभ्यां गृहीतः आश्लिष्टः कण्ठः गलदेशः येन तस्मात् लब्धाः प्राप्ताः आशिषाः कल्याणमनोरथाः याभिर्गोपीभिस्तासां) व्रजसुन्दरीणां (गोपललनानां) यः (प्रसादः) उदगात् (आविर्बभूव), नलिनगन्धरुचां (नलिनस्य पद्मस्य इव गन्धो रुक् कान्तिश्च यासां तासां) स्वर्योषितां (देवरामाणां) न अभूत्; उ (अहो) अङ्के (वक्षसि) नितान्तरतेः (अनन्यात्यन्ताश्रितायाः) श्रियः (लक्ष्म्याः अपि) अयं प्रसादः न अभूत्; अन्याः (स्त्रियन्तु) कुतः [एवं कृष्णानुग्रहविषयाः भवन्ति ?] श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 80 ॥ व्रजगोपियोंका ही मदनमोहन-विग्रह-दर्शनमें अधिकार :- श्रीमद्भागवत (10/32/2)- तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः। पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः ॥ 81 ॥ अनुवाद-उसी समय उन रोदनकारी व्रजदेवियोंके बीचमें शूरवंशके शिरोमणि श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उनका मुखकमल मन्द-मन्द मुस्कानसे खिला हुआ था, वे गलेमें वनमाला और शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए थे। उनका वह रूप-सौन्दर्य सबके मनको मथ डालनेवाले साक्षात् कामदेवके मनको भी मथनेवाला था ॥ 81 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 5/214 संख्या देखें ॥ 81 ॥ अमृताणुकणिका-"कान्त और कान्ताका परस्पर प्रेम ही 'कान्तभाव' है। यहाँ श्रीकृष्णके प्रति 'कान्तभाव' ही प्रेम-पराकाष्ठा रूप साध्योंका सार है। श्रीराय रामानन्दने यहाँ कान्तभावको सर्वश्रेष्ठ न कहकर उसके प्रेमकी पराकाष्ठाको ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है। श्रीकृष्णके प्रति कान्तभावके उदय होनेसे सभी साध्योंके सार, अखण्ड प्रेम-तत्त्वको प्राप्त किया जा सकता है। कान्तभावकी स्थिति शृङ्गार या मधुर रसके अन्तर्गत है। इसमें श्रीकृष्ण ही व्रज गोपियोंके प्राण-प्रियतम विषयालम्बन हैं। मुरली ध्वनि, वसन्त ऋतु, कोकिलकी कूक, मयूर-कण्ठका दर्शन आदि उद्दीपन विभाव हैं। कटाक्ष और हास्यादि अनुभाव हैं, समस्त सात्त्विक भाव सुदीप्त अवस्था तक होते हैं। इस रसमें प्रेम-स्नेह-मान- प्रणय-राग-अनुराग-महाभाव आदि सभी अवस्थाएँ दृष्टिगोचर होती हैं, परन्तु केवल श्रीमती राधिकामें ही महाभावकी सर्वोच्च अवस्था मादन नामक महाभाव अवस्थित है। मधुररस स्वकीया और परकीया भावसे दो प्रकारका होता है। स्वकीया वैकुण्ठ-गत तत्त्व है और परकीया भाव केवल व्रजरमणियोंमें ही देखा जाता है। आदिलीला (4/46-49)- अतएव मधुर रस कहि तार नाम। स्वकीया-परकीया-रूपे द्विविध संस्थान ॥ परकीयभावे अति रसेर उल्लास। व्रज बिना इहार अन्यत्र नाहि वास ॥ व्रजवधूगणेर एइ भाव निरवधि। तार मध्ये श्रीराधार भावेर अवधि॥ प्रौढ़-निर्मलभाव प्रेम सर्वोत्तम। कृष्णेर माधुर्यरस-आस्वाद-कारण॥ इसी कारण व्रजगोपियोंमें श्रीकृष्णको पूर्णतः वशीभूत करनेका सामर्थ्य होता है। विभिन्न अन्य प्रेममें कुछ न कुछ न्यूनता रहती है, जैसे-शान्तप्रेममें ममताका अभाव, दास्यरसमें विश्रम्भ अथवा विश्वासकी कमी, सख्यरसमें स्नेहकी अधिकताकी कमी और वात्सल्यरसमें निःसङ्कोच भावकी न्यूनता होती है। इनके कारण । 261
[ 8/81 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला साध्यप्रेमकी पूर्णता इन रसोंमें नहीं होती। कान्तभावकी नायिकाओं व्रजगोपियोंमें एक अपूर्व भाव है। इन सभी न्यूनताओंकी पूर्ति करते हुए वे निजाङ्ग भी श्रीकृष्णसेवामें देकर श्रीकृष्णका सुख वर्धन करती हैं। यह विशेषता अन्य रसोंमें नहीं है। शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य-इन चार रसोंके गुण मधुर कान्तरसमें नित्य विद्यमान हैं और उन रसोंमें जो चमत्कारिताका अभाव है, वह मधुररसमें सुन्दर रूपसे प्रतिष्ठित है। व्रजमें दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर, जितनी भी प्रकारकी रति हैं, उन्हें दो भागोंमें विभक्त किया जा सकता है-सम्बन्धानुगा और कामानुगा। दास्य, सख्य और वात्सल्य प्रेमके भक्त अपने सम्बन्धसे बँधे हैं। इनकी अपनी मर्यादा है, जिसका वे उल्लङ्घन नहीं कर सकते। इनकी सेवा सम्बन्धकी अनुगामिनी है और उसीमें सीमित रहती है। द्वारकामें भी रुक्मिणी, सत्यभामा आदिका प्रेम उनके वैवाहिक सम्बन्धके अन्तर्गत है अर्थात् यह भी सम्बन्धानुगा है। उनके प्रेममें अपने सुखकी कुछ वासनाएँ भी सम्मिलित होती हैं; इसलिये वे श्रीकृष्णको पूर्णतया वशीभूत नहीं कर सकतीं। कामानुगा कान्तरतिमें गोपियोंके प्रेममें सम्बन्धकी प्रधानता न होकर सेवा-वासनाकी प्रधानता है जिसके द्वारा वे श्रीकृष्णकी सभी इच्छाओंकी पूर्ति करती हैं। गोपियोंका लोकधर्म, वेदधर्म, आर्यधर्म, गुरु-गौरव, सतीत्व, कुलधर्म-ये सब तृणकी भाँति कान्त-भावमें बह जाते हैं। उनका काम और सेवा तदात्म्यताको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् एक ही हो जाते हैं। गोपियोंकी सेवा, प्रीति और काम- पृथक्-पृथक् नहीं, एक ही हैं। वे श्रीकृष्णकी सेवाके लिये सब कुछ करती हैं। उनके प्रेममें अपनी इन्द्रिय-सुखकी इच्छा नहीं है। श्रीकृष्णसे प्रेम करनेके लिये वे विवाह-बन्धनके द्वारा आबद्ध नहीं हैं। कामानुगा रतिके दो विभाग हैं-सम्भोगेच्छामयी या कामात्मिका और तत्-तत्-भावेच्छात्मिका। सम्भोगेच्छामयी या कामात्मिका रति केलि तात्पर्यमयी होती है। इसकी अवस्थिति विभिन्न यूथेश्वरियोंमें होती है। तत्-तत् भावेच्छात्मिका-व्रजयूथेश्वरियोंका श्रीकृष्णके प्रति जो मधुर भाव होता है, उस मधुर भावकी कामनाका ही यह दूसरा विभाग है; श्रीराधाकी किङ्करियों, मञ्जरियोंमें यह भाव रहता है। जीवके पक्षमें यही भाव सर्वोच्च कोटिका है। 'नायं श्रियोऽङ्ग...'-इस श्लोकके द्वारा उद्धवजी श्रीकृष्ण प्रियाओं, व्रजगोपियोंके प्रेमकी महिमाकी उद्घोषणा करते हुए कह रहे हैं कि ऐसा अपूर्व और अदृष्टपूर्व भगवत्-प्रसाद अन्य किसीने प्राप्त नहीं किया। श्लोकमें 'उ' शब्दके द्वारा उद्धवजीका विस्मय प्रकट होता है। रासोत्सवमें श्रीकृष्णने उल्लसित होकर जिस प्रकार व्रजरमणियोंके कण्ठ-प्रदेशका आलिङ्गनकर उनका मनोरथ पूर्ण किया, वह सौभाग्य उनकी वक्षःस्थित लक्ष्मीदेवीको भी प्राप्त नहीं हुआ। यद्यपि लक्ष्मीदेवी श्रीकृष्णके वक्ष-स्थलपर स्वर्ण-रेखाके रूपमें विराजमान हैं और श्रीकृष्णसे उनका कभी विच्छेद नहीं है, तथापि गोपियाँ ही अधिक प्रशंसनीय हैं। इसका कारण है कि लक्ष्मीदेवी केवल सम्भोग रसमें स्थित हैं, किन्तु गोपियाँ कभी सम्भोग (मिलन) और कभी विप्रलम्भ (विरह)-युक्ता होती हैं। विप्रलम्भ ही सम्भोगकी पुष्टि करके उसमें चमत्कारिता प्रकाशित करता है। लक्ष्मी वक्ष-विलासिनी प्रेयसी हैं, किन्तु गोपियाँ केवल प्रेयसी ही नहीं, वे परकीया-भाव सम्पन्न रास-रङ्गिणी हैं और श्रीकृष्णकी प्रेम माधुरीका अपूर्व रूपमें विस्तार करती हैं। रासलीला महोत्सवमें श्रीकृष्ण अत्यन्त आनन्दपूर्वक प्रेमसमुद्रकी तरङ्गोंमें डूबते-उबरते हैं। इस प्रेमरूपी समुद्रकी गोपियोंके हाव-भाव, कटाक्षरूपी उत्ताल लहरियोंमें अपनेको संरक्षित करनेके लिये वे व्रज-देवियोंके कण्ठको धारण करते हैं। श्रीकृष्णको इस अपूर्व रसका आस्वादन एकमात्र गोपियाँ ही करवानेमें समर्थ हैं। 'तासामाविर्भूच्छौरि...'-प्रेम विवर्धनमें चतुर श्रीकृष्ण राससे अन्तर्धान हो गये। विरह-कातरा गोपियाँ अन्य कोई उपाय न देखकर रोती हुई यमुना पुलिनमें अत्यन्त करुण स्वरसे विलाप करने लगीं। व्रजरमणियाँ 262 ।