श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
364 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/43-54 ] करके महाप्रभुके पास जगन्नाथ पुरी चले गये। इसी प्रकार श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामीने भी उच्च पद और विपुल धनका त्याग किया। महाप्रभुने भी युवावस्थामें अपनी वृद्धा माता और युवा पत्नीको निःसहाय छोड़कर संन्यास ग्रहण कर लिया। महाप्रभुकी धारामें जितने भी आचार्य हुए हैं, उन्होंने भी अपना सर्वस्व त्याग किया है। उन्माद दशामें महाप्रभु कह रहे हैं कि मेरा मनरूपी योगी सबकुछ त्यागकर वृन्दावनमें चला गया है। ‘अन्येर हृदय-मन, मोर मन-वृन्दावन।' दूसरे लोगोंका जो हृदय है वह मन है, किन्तु मेरा मन वृन्दावन है। वृन्दावनमें जितने वृक्षादि स्थावर और पशु-पक्षी-मनुष्य आदि जङ्गम प्राणी हैं, वे सब गृहस्थ हैं। भूख-प्यास लगनेपर मेरा मनरूपी योगी अपने शिष्योंके सहित इन गृहस्थोंके आश्रममें भिक्षा करता है। यमुना व्रजेन्द्रनन्दनकी गृहिणी हैं। 'यामुन-जीवन केलि-परायण' प्यास लगनेपर यमुनाके निकट भिक्षा करता है, परन्तु भिक्षामें क्या माँगता है यामुन-जीवन। यमुनाके तटपर होनेवाली श्रीकृष्णकी केलि-लीलाएँ यमुनाका जीवन है, उन्हीं लीलाओंको यमुनाजीसे भिक्षाके रूपमें माँगता है। यमुना तटपर शृङ्गारवट जाकर भिक्षा माँगता है कि कब मेरा ऐसा दिन होगा जब श्रीकृष्ण अपनी प्रियतमाका शृङ्गार करते समय मुझसे कहेंगे, —'कंघी, सिन्दूर, आलता आदि ले आओ।' और मैं कितनी सौभाग्यवती होकर इन सबको लाकर उन्हें समर्पित करूँगी। सेवाकुञ्जमें श्रीकृष्ण ललिताजीसे अनुरोध कर रहे हैं, —'देखो! तुम्हारी आराध्या देवी मान नहीं रही है, मेरी सहायता करो।' तो ललिताजी राधाजीको समझाने लगीं, —'अरी दुर्भागी! क्या कर रही हो? यह नहीं जानती कि यदि ये अभी चले जायेंगे, तो फिर तुम क्या करोगी? मान उतना ही करना चाहिये जितना उचित है।' सेवाकुञ्जसे यह भिक्षा माँगता है कि जब ललिताजी इस प्रकारके वचन राधाजीसे कहेंगी, मैं उस समय वहाँ अपने कानोंके दोनेमें कब इसका पान करूँगी। ब्रजमें जहाँ-जहाँपर जैसी लीला होती है, उसी प्रकारसे यह भिक्षाकी झोली फैलाकर उनसे प्रार्थना करता है। ये लीलाएँ ही लीलास्थलियोंकी सम्पत्ति हैं और वे उन्हें भिक्षामें दान कर सकती हैं। उनसे यह भिक्षा माँगता है कि आपके यहाँ जो कृष्ण-लीलाएँ हुईं, मेरे हृदयमें वे सदा स्फुरित होती रहें और मैं इस प्रकारसे श्रीराधाकृष्णकी सेवा कर सकूँ। विशेषकर ब्रजमें कुछ गृहस्थ हैं जो सब कुछ देनेमें समर्थ हैं, जैसे राधाकुण्ड, श्यामकुण्ड, यमुना, गोवर्धन, तुलसी, वृन्दा, योगमाया, पूर्णिमा, निधिवन, सेवाकुञ्ज, वंशीवट, इमलीतट आदि। ब्रजकी धूलि भी साधारण नहीं है, यह राधा-कृष्णकी चरण-धूलि है, यह सबकुछ देनेमें समर्थ है। गोपियाँ कृष्णके नाम, रूप, गुण, रस, गन्ध, स्पर्शका आस्वादन करती हैं। जब उनका पूरा भोजन हो जायेगा और उसमें-से थोड़ा-सा अवशेष रह जायेगा, उसको यह योगी लेकर अपने शिष्योंको (केवल पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको, क्योंकि कर्मेन्द्रियाँ उसका आस्वादन नहीं कर सकतीं) देता है। गोपियोंके उस उच्छिष्टको प्राप्त करके ये शिष्य आनन्दसे उसकी सेवा करेंगे। सामान्य योगियोंका इष्टदेव अलख-निरञ्जन होता है। अलख अर्थात् जिसको देखा नहीं जाता, जिसका कोई रूप, नाम, गुण, लीला आदि नहीं है। उसके लिये वे कहते हैं कि मनमें ही उन अलख-निरञ्जनका दर्शन हो गया। किन्तु मेरे अभीष्ट कृष्णकी नाम, रूप, गुण, लीला आदि अनेक प्रकारकी मधुरियाँ हैं और मेरा मन उनका साक्षात् दर्शन चाहता है। उनकी लीला माधुरियोंका मैं आस्वादन करूँगा। सामान्य योगी ध्यान लगाते हैं और मेरा मनरूपी योगी ध्यान हटाकर जागरण करता है अर्थात् उन सब लीलाओंका ध्यान करता है। कब कृष्ण मिलेंगे, कब कृष्ण मिलेंगे, कब मेरा जीवन सफल होगा? इसी प्रकारसे महाबाउल होकर वृन्दावनमें यह विचरण करता है। कृष्ण जब ध्यानमें नहीं आते हैं, तब कृष्णके वियोगमें योगी
[ 14/43-61 चौदहवाँ अध्याय 365 अत्यन्त दुःखी हो जाता है और कृष्णविरहमें उसकी चिन्ता, जागरण, प्रलाप, उन्माद, मृत्यु आदि दस दशाएँ होती हैं। भक्तिमें मृत्यु नहीं होती। श्रीमती राधिका और महाप्रभुकी यह दस दशाएँ होती थीं जो अन्य किसीमें नहीं देखी जाती। कृष्णके मथुरा चले जानेपर उनके विरहमें उन्मत्त होकर श्रीमती राधिकाने कहा,–‘मेरी यह कामना है कि मेरे मर जानेपर मेरी भुजाओंके द्वारा तमाल वृक्षका आलिङ्गन करवा देना। और शरीर जलानेके बाद जब उसके पञ्चतत्त्व अलग हो जायेंगे, तब मेरे अन्दरकी अग्निको नन्दबाबाके आँगनमें सूर्यके प्रकाशमें मिला देना। मेरे शरीरकी जो मिट्टी है वह राख बन जायेगी, उसे नन्दबाबाके भवनकी भूमिके साथ मिला देना जिससे मुझे कृष्णके चरणोंका स्पर्श प्राप्त हो सके। शरीरके जलको पावन सरोवरमें मिला देना जिससे मैं कृष्णको स्नान करा सकूँ। शरीरकी वायुको चामरमें मिला देना जिससे मेरे शरीरकी वायु कृष्णके अङ्गोंसे मिले और आकाशको नन्दबाबाके आकाशमें मिला देना।’ किन्तु राधाजी पुनः विचार करती हैं कि जब मेरे प्रियतम कृष्ण मेरे मरनेके बाद व्रजमें आयेंगे और पूछेंगे कि राधा और अन्य गोपियाँ कहाँ हैं और लोगोंके मुखसे सुनेंगे कि राधा मर गयी, गोपियाँ भी मर गयीं, तो यह सुनकर वे भी मरनेको तत्पर होंगे। उन्हें अत्यन्त दुःख होगा। इस विचारसे गोपियाँ ‘मैं मर जाऊँ’ ऐसा नहीं सोचतीं। ‘कृष्ण व्रजमें आयेंगे’ वे एक यही आशा लेकर जीवित रहती हैं। महाप्रभुकी कब-कब कैसी-कैसी दशा होती है, कोई नहीं कह सकता। उनका चित्त स्थिर नहीं रहता, वे कभी विलाप करते हैं, कभी उनके अङ्गोंमें पुलक हो जाते हैं, कभी आँखोंसे आँसुओंकी वर्षा होती है और कभी रोमाञ्च हो उठता है।–“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी” ॥ 43-54 ॥ श्रीरायके द्वारा महाप्रभुके विप्रलम्भ-भावके उपयोगी-कालोचित श्लोकका पाठ :— एत कहि’ महाप्रभु मौन करिला। रामानन्द-राय श्लोक पड़िते लागिला ॥ 55 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा उनके भावके अनुसार गानके द्वारा महाप्रभुकी चेतनताका सम्पादन :— स्वरूप-गोसाञि करे कृष्णलीला-गान। दुइ जने किछु कैला प्रभुर बाह्य-ज्ञान ॥ 56 ॥ अनुवाद—महाप्रभु दिव्योन्मादकी दशामें अपने भावोंको कहकर मौन हो गये। श्रीरामानन्द राय विप्रलम्भ-भावोपयोगी श्लोक पढ़ने लगे और श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी कृष्णलीलाका गान करने लगे। इन दोनोंके इस प्रकार कुछ कहनेपर महाप्रभुको बाह्य-ज्ञान हुआ ॥ 55-56 ॥ घरमें महाप्रभुका शयन :— एइमत अर्द्धरात्रि कैला निर्यापण। भितर-प्रकोष्ठे प्रभुरे कराइला शयन ॥ 57 ॥ सभीका निर्दिष्ट स्थानपर शयन :— रामानन्द-राय तबे गेला निज घरे। स्वरूप-गोविन्द दुँहे शुइलेन द्वारे ॥ 58 ॥ अनुवाद—इस प्रकार अर्द्धरात्रि बीत जानेपर श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको भीतरके प्रकोष्ठमें लिटा दिया। तब श्रीरामानन्द राय अपने घर चले गये और श्रीस्वरूप दामोदर एवं श्रीगोविन्द महाप्रभुके कमरेके द्वारपर ही सो गये ॥ 57-58 ॥ महाप्रभुका सम्पूर्ण रात्रि जागकर कृष्णनामका कीर्तन :— सब रात्रि महाप्रभु करे जागरण। उच्च करि’ कहे कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 59 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सारी रात जागते रहे और उच्च स्वरसे कृष्णनाम-सङ्कीर्तन करते रहे ॥ 59 ॥ कीर्तन और शब्दके अभावमें महाप्रभुको सभीके द्वारा ढूँढ़ना और उनका नहीं मिलना :— शब्द ना पाञा स्वरूप कपाट कैला दूरे। तिनद्वार देओया आछे, प्रभु नाहि घरे ! ! 60 ॥ अनुवाद—कुछ समयके बादमें महाप्रभुका कीर्तन नहीं सुनकर श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुके कमरेका द्वार
366 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/61-70 ] खोला। उन्होंने देखा कि तीनों द्वार तो बन्द थे, किन्तु महाप्रभु कमरेके भीतर नहीं थे !60॥ चिन्तित हइल सबे प्रभुरे ना देखिया। प्रभु चाहिं बुले सबे व्याकुल हञा ॥ 61 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको उनके कमरेमें नहीं देखकर सभी भक्त चिन्तित हो गये। सभी व्याकुल होकर महाप्रभुको इधर-उधर ढूँढ़ने लगे ॥ 61 ॥ महाप्रभुकी अचेतन अवस्थामें प्राप्ति :- सिंहद्वारेर उत्तर-दिशाय आछे एक ठाञि। तार मध्ये पड़ि' आछेन चैतन्य-गोसाञि ॥ 62 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथ मन्दिरके सिंहद्वारकी उत्तर-दिशामें स्थित एक कोनेमें श्रीचैतन्य गोसाईं अचेतन अवस्थामें पड़े हुए थे॥ 62 ॥ श्रीस्वरूपादि भक्तोंका हर्ष और विषाद :- देखि' स्वरूप-गोसाञि आदि आनन्दित हैला। प्रभुर दशा देखि' पुनः चिन्तिते लागिला ॥ 63 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको वहाँ देखकर श्रीस्वरूप दामोदर आदि भक्त पहले तो आनन्दित हुए, किन्तु महाप्रभुकी अचेतन दशाको देखकर वे बहुत चिन्तित हुए॥ 63 ॥ वैसी अवस्थावाले महाप्रभुका वर्णन :- प्रभु पड़ि' आछेन दीर्घ हात पाँच-छय। अचेतन देह, नासाय श्वास नाहि बय ॥ 64 ॥ एक एक हस्त-पाद—दीर्घ तिन हात। अस्थिग्रन्थि भिन्न, चर्म्मे आछे मात्र तात ॥ 65 ॥ अनुवाद—महाप्रभु अचेतन होकर पड़े थे और उनकी देह पाँच-छह हाथ लम्बी हो गयी थी। नाकमें श्वास नहीं चल रही थी। महाप्रभुका एक-एक हाथ और पैर तीन-तीन हाथ लम्बे हो गये थे। उनकी अस्थियोंके जोड़ खुल गये, केवलमात्र त्वचासे ही अस्थियाँ टिकी हुई थीं। उनकी देहमें जीवनके अस्तित्वको दिखलानेवाली उष्णता भी थी॥ 64-65 ॥ अनुभाष्य— 'तात',—जीवनके अस्तित्वका ज्ञापक उष्ण-भाव (देहकी गर्मी) ॥ 65 ॥ हस्त, पाद, ग्रीवा, कटि, अस्थि, सन्धि यत। एक एक वितस्ति भिन्न हञाछे तत ॥ 66 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके हाथ, पैर, गर्दन, कमर आदिकी अस्थियोंके जितने जोड़ थे, वे सभी एक-एक वितस्ति (हथेली फैलाकर अँगूठे और कनिष्ठ अँगुलीके छोरके बीचकी दूरी) जितने दूर हो गये॥ 66 ॥ चर्ममात्र उपरे, सन्धि आछे दीर्घ हञा। दुःखित हइला सबे प्रभुरे देखिया ॥ 67 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके अङ्गोंके जोड़ खुलकर लम्बे हो गये, त्वचामात्र उन जोड़ोंके ऊपर दिखलायी दे रही थी। महाप्रभुकी ऐसी अवस्थाको देखकर सभी भक्त बहुत दुःखी हुए॥ 67 ॥ मुखे लाला-फेन प्रभुर उत्तान-नयन। देखिया सकल भक्तेर देह छाड़े प्राण ॥ 68 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके मुखसे फेनयुक्त लार निकल रही थी और उनके नेत्र ऊपरकी ओर उठ गये थे। उनकी ऐसी अवस्थाको देखकर सभी भक्तोंकी देहसे प्राण निकलनेवाले ही थे॥ 68 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'उत्तान-नयन',—नेत्र ऊपरकी ओर उठ गये॥ 68 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा उच्चस्वरसे महाप्रभुके कानमें कृष्णनामका उच्चारण :- स्वरूप-गोसाञि तबे उच्च करिया। प्रभुर काणे कृष्णनाम कहे भक्तगण लञा ॥ 69 ॥ अनुवाद—ऐसा देखकर श्रीस्वरूप दामोदर भक्तोंके साथ महाप्रभुके कानोंके निकट उच्चस्वरसे कृष्णनाम
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करने लगे ॥ ६९ ॥ महाप्रभुका बाह्यदशामें आना :- बहुक्षणे कृष्णनाम हृदये पशिला। 'हरिबोल' बलि' प्रभु गर्जिया उठिला ॥ ७० ॥ अनुवाद-उनके द्वारा बहुत देर तक कृष्णनाम करनेके पश्चात् वह महाप्रभुके हृदयमें प्रविष्ट हो गया, तब महाप्रभु 'हरिबोल' बोलकर गर्जन करते हुए उठे॥ ७० ॥ चेतन पाइते अस्थि-सन्धि लागिल। पूर्वप्राय यथावत् शरीर हइल ॥ ७१ ॥ अनुवाद-महाप्रभुमें चेतनता आनेपर उनकी अस्थियोंके जोड़ जुड़ गये और उनकी देह पहले जैसी हो गयी ॥ ७१ ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा अपने ग्रन्थमें इस वृत्तान्तका वर्णन :- एइ लीला महाप्रभुर रघुनाथदास। 'चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे' करियाछे प्रकाश ॥ ७२ ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी ऐसी लीलाको श्रीरघुनाथ दास गोस्वामीने स्वरचित 'चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष'में प्रकाशित किया है॥ ७२ ॥ काशीमिश्रके घरमें कृष्णविरहग्रस्त महाप्रभुकी दशा :- स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका चतुर्थ श्लोक- क्वचिन्मिश्रावासे व्रजपतिसुतस्योरुविरहात् श्लथच्छ्रीसन्धित्वादधदधिकदैर्घ्यं भुजपदोः। लुठन् भूमौ काक्वा विकलविकलं गद्गदवचा रुदन् श्रीगौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥ ७३ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ७३ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी समय श्रीकाशीमिश्रके घरमें श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुके समस्त जोड़ खुल गये, जिससे उनके हाथ और पैर बहुत लम्बे हो गये। भूमिपर काकुस्वरमें व्याकुल होकर गद्गद वचन बोलते हुए लोट-पोट खाते-खाते रोनेवाले वे गौराङ्ग मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त कर रहे हैं ॥ ७३ ॥ अनुभाष्य- क्वचित् मिश्रावासे (काशीमिश्रगृहे) व्रजपतिसुतस्य (नन्दनन्दनस्य) उरुविरहात् (अत्यन्तविच्छेदात्) श्लथच्छ्रीसन्धित्वात् (श्लथन् निजनिजाश्रयं त्यजन् श्रीः शोभा सन्धिश्च ययोः) भुजपदोः (बाहुचरणयोः) अधिकदैर्घ्यं दधत् (धारयन्) भूमौ लुठन् काक्वा (कातरया वाण्या) गद्गदवचा विकल-विकलम् (अतिशयेन विकलं) रुदन् सः गौराङ्गः मम हृदये उदयन् (प्रकटयन्) सन् मां मदयति (हर्षयति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ७३ ॥ अर्द्धबाह्यदशामें महाप्रभुके द्वारा लोगोंके एकत्रित होनेके कारणकी जिज्ञासा :- सिंहद्वारे देखि' प्रभुर विस्मय हइला। “क्या कर, किवा”-एइ स्वरूपे पुछिला ॥ ७४ ॥ अनुवाद-स्वयंको सिंहद्वारपर देखकर महाप्रभुको बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा,-“तुम लोग क्या कर रहे हो और क्यों कर रहे हो?" ७४ ॥ अनुभाष्य-'क्या कर, किवा', -क्या कर रहे हो, क्यों ॥ ७४ ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुको घरमें लाना और सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन :- स्वरूप कहे,-“उठ, प्रभु, चल निज-घरे। तथाइ तोमारे सब करिमु गोचरे ॥ "७५ ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-“हे महाप्रभु ! उठिये, अपने वासस्थानपर चलिये। वहींपर मैं आपको यह सब बतलाऊँगा ॥ "७५ ॥ एत बलि' प्रभुरे धरि' घरे लञा गेला। ताँहार अवस्था सब कहिते लागिला ॥ ७६ ॥ अनुवाद-यह कहकर श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुको
368 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/77–86 ] पकड़कर उनके वासस्थानपर ले गये। वहाँ उन्होंने महाप्रभुको उनकी सिंहद्वारपर जो अवस्था थी, उसके विषयमें सबकुछ बतलाया ॥ 76 ॥ बाह्यदशामें आकर महाप्रभुका विस्मय और अपनी अवस्थाका वर्णन :- शुनि' महाप्रभु बड़ हैला चमत्कार। प्रभु कहे,—“किछु स्मृति नाहिक आमार ! ! 77 ॥ सबे देखि—हय मोर कृष्ण विद्यमान। विद्युत्प्राय देखा दिया हय अन्तर्धान ॥”78 ॥ अनुवाद—अपनी उस अवस्थाके विषयमें सुनकर महाप्रभुको बहुत आश्चर्य हुआ। महाप्रभुने कहा,—“मुझे अपनी उस अवस्थाका कुछ भी स्मरण नहीं है। मुझे तो यही स्मरण है कि मैंने अपने कृष्णको देखा और वे विद्युतकी (बादलोंमें चमकनेवाली बिजलीकी) भाँति झलक दिखलाकर अन्तर्धान हो गये ॥” 77-78 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ-दर्शन :- हेनकाले जगन्नाथेर पाणि-शङ्ख बाजिला। स्नान करि' महाप्रभु दरशने गेला ॥ 79 ॥ अनुवाद—उसी समय श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें पाणि-शङ्ख बजा। महाप्रभु स्नान करके श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करनेके लिये चले गये ॥ 79 ॥ अनुभाष्य—'पाणि-शङ्ख',—हाथमें पकड़कर मुखसे बजानेवाला शङ्ख; अथवा द्वारको खोलनेके समय हाथ-तालीका शब्द; पाठान्तरमें—'पानी-शङ्ख',—(आचमन करनेवाला) शङ्ख ॥ 79 ॥ महाप्रभुका महाभाव-विकार विस्मयजनक :- एइ त' कहिलुँ प्रभुर अद्भुत विकार। याहार श्रवणे लोके लागे चमत्कार ॥ 80 ॥ महाप्रभुका अनदेखा-अनसुना महाभाव :- लोके नाहि देखे ऐछे, शास्त्रे नाहि शुनि। हेन भाव व्यक्त करे न्यासि-चूड़ामणि ॥ 81 ॥ अप्राकृत अधोक्षज-भावमुद्रा अक्षज ज्ञानीकी समझसे परे :- शास्त्रलोकातीत येइ येइ भाव हय। इतर-लोकेर ताते ना हय निश्चय ॥ 82 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने महाप्रभुमें प्रकाशित होने वाले अद्भुत विकारोंका वर्णन किया, जिन्हें सुनकर लोगोंको बहुत आश्चर्य होता है। क्योंकि लोगोंने न तो पहले किसीमें ऐसे विकार कभी देखे हैं और न ही शास्त्रोंमें सुने हैं, जिन्हें संन्यासी-चूड़ामणि महाप्रभुने प्रकाशित किया। शास्त्र और लोकातीत जो-जो भाव होते हैं, भगवद्-विमुख और साधारण लोगोंका उनमें विश्वास नहीं होता ॥ 80-82 ॥ अप्राकृत अनुभूतिसे श्रौत-पन्थामें ग्रन्थकारके द्वारा वर्णन :- रघुनाथ-दासेर सदा प्रभुसङ्गे स्थिति। ताँर मुखे शुनि' लिखि करिया प्रतीति ॥ 83 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी सदा महाप्रभुके पास रहते थे। महाप्रभुकी इन सब लीलाओंको उन्हींके मुखसे श्रवण करके उनके वचनोंमें दृढ़ विश्वास रखते हुए सब लिख रहा हूँ॥ 83 ॥ महाप्रभुके द्वारा चटक-पर्वतको गोवर्धन मानकर महाभावके आवेशमें उसकी ओर द्रुतगतिसे दौड़ना :- एकदिन महाप्रभु समुद्रे याइते। 'चटक'-पर्वत देखिलेन आचम्बिते ॥ 84 ॥ अनुवाद—एकदिन महाप्रभु समुद्रकी ओर जा रहे थे कि उन्हें अचानक 'चटक'-पर्वत दिखलायी दिया ॥ 84 ॥ अनुभाष्य—''चटक'-पर्वत',—बालूका पर्वत जैसा ऊँचा स्तूप; बालूका टीला ॥ 84 ॥ गोवर्धन-शैल-ज्ञाने आविष्ट हइला। पर्वत-दिशाते प्रभु धाञा चलिला ॥ 85 ॥
[ 14/86-97 चौदहवाँ अध्याय 369 अनुवाद—चटक-पर्वतको गिरिराज गोवर्धन मानकर उसमें आविष्ट होकर महाप्रभु पर्वतकी दिशामें दौड़ पड़े॥ 85॥ श्रीमद्भागवत (10/21/18) में— हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो यद्रामकृष्णचरण-स्पर्श-प्रमोदः। मानं तनोति सह-गोगणयोस्तयोर्यत् पानीय-सूयवस-कन्दर-कन्दमूलैः ॥ 86॥ अनुवाद—ये गोवर्धन पर्वत—वैष्णवप्रधान हैं, क्योंकि ये श्रीबलराम-कृष्णके चरणोंके स्पर्शके आनन्दसे प्रफुल्लित होकर गौओं और गोपोंके साथ श्रीराम-कृष्णको पीनेका जल और खानेकी वस्तुएँ—घास-कन्द-मूलादि प्रदान करके उनकी पूजा कर रहे हैं॥ 86॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 18/34 संख्या देखें॥ 86॥ साथी श्रीगोविन्दका उनके पीछे दौड़ना :— एइ श्लोक पड़ि' प्रभु चलेन वायुवेगे। गोविन्द धाइल पाछे, नाहि पाय लागे॥ 87॥ शोर मचाते हुए लोगोंका पीछे दौड़ना :— फुकार पड़िल, महा-कोलाहल हइल। येइ याँहा छिल, सेइ उठिया धाइल॥ 88॥ सभी भक्तोंका वहाँपर आगमन :— स्वरूप, जगदानन्द, पण्डित-गदाधर। रामाइ, नन्दाइ आर पण्डित-शङ्कर॥ 89॥ पुरी-भारती-गोसाञि आइला सिन्धुतीरे। भगवान्-आचार्य-खञ्ज, चलिला धीरे धीरे॥ 90॥ अनुवाद—इस श्लोकको पढ़ते हुए महाप्रभु वायुके वेगसे दौड़ रहे थे। श्रीगोविन्द भी महाप्रभुके पीछे दौड़े, किन्तु वे उनके निकट नहीं पहुँच पाये। कोई भक्त यह देखकर चिल्लाया और उसे सुनकर सभी कोलाहल करने लगे। जो जहाँपर भी था, वह उठकर महाप्रभुके पीछे दौड़ पड़ा। श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीरामाइ, श्रीनन्दाइ, श्रीशङ्कर पण्डित, श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारती गोस्वामी समुद्रतटपर आ गये। श्रीभगवान् आचार्य लँगड़ाकर चलते थे, इसलिये वे धीरे-धीरे चलने लगे॥ 87-90॥ मार्गमें स्तम्भ आदि विकारका वर्णन :— प्रथमे चलिला प्रभु,—येन वायुगति। स्तम्भभाव पथे हैल, चलिते नाहि शक्ति॥ 91॥ अनुवाद—पहले तो महाप्रभु वायुकी गतिसे दौड़े चले जा रहे थे, किन्तु मार्गमें उनमें स्तम्भ-भाव उदित हो आया, जिसके कारण उनमें चलनेकी शक्ति तक चली गयी॥ 91॥ प्रति रोमकूपे मांस-व्रणेर आकार। तार उपरे रोमोद्गम-कदम्बप्रकार॥ 92॥ प्रति-रोमे प्रस्वेद पड़े रुधिरेर धार। कण्ठे घर्घर, नाहि वर्णेर उच्चार॥ 93॥ दुइ नेत्रे भरि' अश्रु बहये अपार। समुद्रे मिलिला येन गङ्गा-यमुना-धार॥ 94॥ वैवर्ण्य शङ्खप्राय, श्वेत हैल अङ्ग। तबे कम्प उठे,—येन समुद्रे तरङ्ग॥ 95॥ महाप्रभुका गिरना :— काँपिते काँपिते प्रभु भूमेते पड़िला। तबे त' गोविन्द प्रभुर निकटे आइला॥ 96॥ अनुवाद—महाप्रभुका प्रत्येक रोमकूप मुँहासेकी भाँति हो गया और उसके ऊपर रोमाञ्चका होना ऐसा प्रतीत हुआ मानो कदम्बका पुष्प खिल रहा हो। उनके प्रत्येक रोमकूपसे पसीनेके साथ रक्तकी भी धारा प्रवाहित हो रही थी। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे, केवल उनके कण्ठसे घर-घरका शब्द निकल रहा था। उनके दोनों नेत्रोंसे अपार अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी, ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो गङ्गा और यमुनाकी धाराएँ समुद्रमें मिलने जा रही हों। उनकी अङ्गकान्ति शङ्खकी भाँति
370 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/97-107 ] श्वेत हो गयी, उनके दिव्य कलेवरमें समुद्रकी तरङ्गोंकी भाँति कम्पन होने लगा। वे काँपते-काँपते भूमिपर गिर पड़े। तब श्रीगोविन्द महाप्रभुके निकट आये ॥ 92-96 ॥ श्रीगोविन्दके द्वारा जल छिड़कना और पंखा झलकर महाप्रभुको चेतन करनेका प्रयास :- करङ्गेर जले करे सर्वाङ्ग सिञ्चन। बहिर्वास लञा करे अङ्ग संबीजन ॥ 97 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने महाप्रभुके समस्त अङ्गोंपर कमण्डलुके जलको छिड़का और बहिर्वाससे उन्हें पंखा झलने लगे ॥ 97 ॥ महाप्रभुकी अवस्थाको देखकर सभीके द्वारा रोना :- स्वरूपादिगण ताँहा आसिया मिलिला। प्रभुर अवस्था देखि' कान्दिते लागिला ॥ 98 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरादि भी वहाँ आ पहुँचे और वे महाप्रभुकी अवस्थाको देखकर क्रन्दन करने लगे ॥ 98 ॥ महाप्रभुके अष्टसात्त्विक विकारोंको देखकर सभीका विस्मय :- प्रभुर अङ्गे देखे अष्टसात्त्विक विकार। आश्चर्य सात्त्विक देखि' हैला चमत्कार ॥ 99 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने महाप्रभुके अङ्गोंमें अष्ट-सात्त्विक विकार देखे। वे इन सात्त्विक विकारोंको देखकर आश्चर्यचकित हो गये ॥ 99 ॥ अनुभाष्य—'अष्टसात्त्विक विकार',—स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभेद, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय ॥ 99 ॥ सभीके द्वारा उच्च-सङ्कीर्तन और श्रीगोविन्दादिके द्वारा जल छिड़कना :- उच्च सङ्कीर्त्तन करे प्रभुर श्रवणे। सुशीतल जले करे प्रभुर अङ्ग सम्मार्जने ॥ 100 ॥ अनुवाद—सभी भक्त महाप्रभुके कानोंके निकट उच्च स्वरसे सङ्कीर्तन करने लगे और सुशीतल जलसे महाप्रभुके दिव्य अङ्गोंका सम्मार्जन (स्वच्छ) करने लगे ॥ 100 ॥ अनुभाष्य—'श्रवणे',—कानके निकट ॥ 100 ॥ महाप्रभुका बाह्यदशामें आना :- एइमत बहुबार कीर्त्तन करिते। 'हरिबोल' बलि' प्रभु उठे आचम्बिते ॥ 101 ॥ अनुवाद—इस प्रकार बहुत देर तक कीर्तन करनेपर महाप्रभु अचानक 'हरिबोल' बोलते हुए उठ खड़े हुए ॥ 101 ॥ प्रसन्नतासे भरकर सभीके द्वारा हरिध्वनि :- सानन्दे सकल वैष्णव बोले 'हरि' 'हरि'। उठिल मङ्गलध्वनि चतुर्दिक भरि' ॥ 102 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके खड़े होनेपर सभी वैष्णव आनन्दसे 'हरि', 'हरि' बोलने लगे। उस मङ्गलमयी 'हरि' ध्वनिसे चारों दिशाएँ गूँज उठीं ॥ 102 ॥ महाप्रभुकी अर्द्धबाह्यदशा :- उठि' महाप्रभु विस्मित, इति उति चाय। ये देखिते चाय, ताहा देखिते ना पाय ॥ 103 ॥ अनुवाद—महाप्रभु उठकर आश्चर्यचकित होकर इधर-उधर देखने लगे, वे जो देखना चाहते थे, वे उसे नहीं देख पा रहे थे ॥ 103 ॥ 'वैष्णव' देखिया प्रभुर अर्द्धबाह्य हइल। स्वरूप-गोसाञिरे किछु कहिते लागिल ॥ 104 ॥ अनुवाद—वैष्णवोंको 'हरि' 'हरि' बोलते देखकर महाप्रभु अर्द्धबाह्यदशामें आ गये। वे श्रीस्वरूप दामोदरको कुछ कहने लगे— ॥ 104 ॥ अनुभाष्य—'अर्द्धबाह्य',—सम्पूर्ण बाह्य संज्ञा (चेतनता) प्राप्त नहीं करके ॥ 104 ॥
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[ 14/105–116 चौदहवाँ अध्याय 371 श्रीराधाकी दासीके अभिमानमें महाप्रभुके द्वारा अपनी अवस्थाका वर्णन :- “गोवर्धन हैते मोरे के इँहा आनिल? पाञा कृष्णेर लीला देखिते ना पाइल॥ 105 ॥ इँहा हैते आजि मुइ गेनु गोवर्धने। देखों,–यदि कृष्ण करेन गोधन-चारणे॥ 106 ॥ गोवर्धने चड़ि’ कृष्ण बाजाइला वेणु। गोवर्धनेर चौदिके चरे सब धेनु॥ 107 ॥ वेणुनाद शुनि’ आइला राधाठाकुराणी। सब सखीगण-सङ्गे करिया साजनि॥ 108 ॥ अनुवाद—“मुझे गोवर्धनसे यहाँपर कौन लाया ? मैं श्रीकृष्णकी लीलाको देख रहा था, परन्तु अब उसे देख नहीं पा रहा हूँ। आज मैं यहाँसे गोवर्धन यह देखने गया था कि क्या वहाँ श्रीकृष्ण गौओंको चरा रहे हैं? मैंने देखा कि श्रीकृष्ण गोवर्धनपर चढ़कर वेणु बजा रहे हैं और गोवर्धनके चारों ओर गायें चर रही हैं। वेणुकी ध्वनिको सुनकर श्रीराधा ठाकुराणी और उनके साथ सब सखियाँ सजकर वहाँ आ गयीं॥ 105-108 ॥ अनुभाष्य—‘करिया साजनि’,–सजकर ॥ 108 ॥ राधा लञा कृष्ण प्रवेशिला कन्दराते। सखीगण चाहे কেহ फुल उठाइते॥ 109 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण श्रीराधाको साथ लेकर एक गुफामें प्रवेश कर गये। उन सखियोंने पुष्प चयन करते समय उन्हें गुफामें प्रवेश करते देखा ॥ 109 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘कन्दराते’,–गुफामें ॥ 109 ॥ हेनकाले तुमि-सब कोलाहल कैला। ताँहा हैते धरि’ मोरे इँहा लञा आइला॥ 110 ॥ श्रीकृष्णसङ्गसे वञ्चित महाप्रभुका क्रन्दन, भक्तोंका भी क्रन्दन :- केने वा आनिला मोरे वृथा दुःख दिते। पाञा कृष्णेर लीला, ना पाइनु देखिते!!” 111 ॥ अनुवाद—तभी तुम सबने कोलाहल मचा दिया और वहाँसे पकड़कर मुझे यहाँ ले आये। आप लोग मुझे वृथा दुःख देनेके लिये यहाँ क्यों ले आये? श्रीकृष्णकी लीलाको देखनेका अवसर प्राप्त करके भी मैं उसे देख नहीं पाया ॥” 110-111 ॥ एत बलि’ महाप्रभु करेन क्रन्दन। ताँर दशा देखि’ वैष्णव करेन रोदन ॥ 112 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु क्रन्दन करने लगे। उनकी ऐसी दशाको देखकर सभी वैष्णव भी रोने लगे॥ 112 ॥ महाप्रभुका बाह्यदशामें मर्यादा-प्रदर्शन :- हेनकाले आइला पुरी, भारती,–दुइजन। दुँहे देखि’ महाप्रभु हइल सम्भ्रम ॥ 113 ॥ अनुवाद—उसी समय वहाँपर श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारती आ गये। उन दोनोंको देखकर महाप्रभुमें सम्भ्रम भाव आ गया ॥ 113 ॥ निपट्ट-बाह्य हइले प्रभु दुँहारे वन्दिला। महाप्रभुरे दुइजन प्रेमालिङ्गन कैला ॥ 114 ॥ अनुवाद—सम्पूर्ण बाह्यदशामें आनेपर महाप्रभुने उन दोनोंकी वन्दना की। तब उन दोनोंने महाप्रभुको प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया ॥ 114 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘निपट्ट-बाह्य हइले’,–अनाच्छादित बाह्य अर्थात् सम्पूर्ण बाह्यदशामें आनेपर ॥ 114 ॥ महाप्रभुके द्वारा उनके आगमनके कारणकी जिज्ञासा और पुरीका उत्तर :- प्रभु कहे,—“दुँहे केने आइला एत दूरे?” पुरीगोसाञि कहे,—“तोमार नृत्य देखिबारे॥” 115 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“आप दोनों इतनी दूर किसलिये आये हैं?” श्रीपरमानन्दपुरी गोस्वामीने कहा,—“हम
372 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/117-120 ] आपका नृत्य देखनेके लिये आये हैं॥" 115॥ महाप्रभुका लज्जित होना और भक्तोंके साथ समुद्र स्नानके पश्चात् प्रसादका सम्मान :- लज्जित हइला प्रभु पुरीर वचने। समुद्रघाट आइला सब वैष्णव-सने ॥116॥ अनुवाद-श्रीपरमानन्द पुरीके वचनको सुनकर महाप्रभु लज्जित हो गये और वे सभी वैष्णवोंके साथ समुद्रके तटपर आ गये॥116॥ स्नान करि' महाप्रभु घरेते आइला। सबा लञा महाप्रसाद भोजन करिला ॥117॥ अनुवाद-महाप्रभु स्नान करके सभी भक्तोंके साथ अपने वासस्थानपर आ गये और सभीने साथमें श्रीजगन्नाथके महाप्रसादका भोजन किया॥117॥ महाप्रभुका अप्राकृत दिव्योन्माद-ब्रह्माके भी अगोचर :- एइ त' कहिलुँ प्रभुर दिव्योन्माद-भाव। ब्रह्माओ कहिते नारे याहार प्रभाव ॥118॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने महाप्रभुके दिव्योन्माद-भावका वर्णन किया। ब्रह्मा भी उसके प्रभावका वर्णन नहीं कर सकते॥118॥ श्रीरघुनाथदासके द्वारा अपने ग्रन्थमें महाप्रभुकी यह लीला वर्णित :- 'चटक'-गिरि-गमन-लीला रघुनाथदास। चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे' करियाछेन प्रकाश ॥119॥ अनुवाद-महाप्रभुकी चटक-पर्वतकी ओर जानेकी लीलाको श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने स्वरचित 'चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष'में प्रकाशित किया है॥119॥ स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका आठवाँ श्लोक :- समीपे नीलाद्रेश्चटकगिरिराजस्य कलना- दये गोष्ठे गोवर्धनगिरिपतिं लोकितुमितः। व्रजन्नस्मीत्युक्तवा प्रमद इव धावन्नवधृतो गणैः स्वैर्गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥120॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नीलाचलके निकट समुद्रकी बालूके द्वारा बने पर्वतरूपी चटकपर्वतको देखकर
[ 14/120–123 चौदहवाँ अध्याय 373 'व्रजमें गोवर्धन गिरिराजका दर्शन करूँगा' ऐसा कहकर महाप्रभु द्रुतगतिसे चलने लगे। वैष्णवोंसे घिरे वे गौराङ्गदेव मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त कर रहे हैं॥ 120 ॥ चौदहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— नीलाद्रेः (नीलाचलस्य) समीपे (निकटे) चटक-गिरिराजस्य (सैकतस्तूपरूप-पर्वतस्य) कलनात् (ईक्षणात्) अये इतः (क्षेत्रात्) गोष्ठे गोवर्धनगिरिपतिं लोकितुं (द्रष्टुं) व्रजन् अस्मि (व्रजामि) इति उक्त्वा प्रमदः (प्रमत्तः) इव धावन् स्वैः गणैः (स्वरूपादिभिः) अवधृतः (पश्चादनुसृतः), स गौराङ्गः मम हृदये उदयन् मां मदयति (आनन्दयति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 120 ॥ चौदहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभुकी अलौकिक लीला :— एबे प्रभु यत कैला अलौकिक-लीला। के बुझिते पारे सेइ महाप्रभुर खेला ?? 121 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने जिन समस्त अलौकिक लीलाओंको प्रकाशित किया, महाप्रभुकी उन लीलाओंको कौन समझ सकता है ? 121 ॥ महाप्रभुके श्रीकृष्णविरहके अनुसरणमें ही जीवको श्रीकृष्णचरणोंकी प्राप्ति :— संक्षेपे कहिया करि दिक् दरशन। येइ इहा शुने, पाय कृष्णेर चरण॥ 122 ॥ अनुवाद—मैं महाप्रभुकी लीलाओंको संक्षेपमें वर्णन करके केवल दिग्दर्शन ही करवा रहा हूँ। जो कोई भी महाप्रभुकी इन लीलाओंका श्रवण करता है, उसे श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है॥ 122 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 123 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे चटकगिरि-गमनरूप-दिव्योन्मादवर्णनं नाम चतुर्दशः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 123 ॥ त्यखण्डमें चटकगिरि-गमनरूप- दिव्योन्माद-वर्णन नामक चौदहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
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पन्द्रहवाँ अध्याय कथासार-उपभोगके बाद महाप्रभुमें विलाप उपस्थित हुआ; [जगन्नाथमें] कृष्ण-रूपका भाव उदित हुआ। कृष्णके अदर्शनसे रासकी रात्रिमें गोपियोंने जिस प्रकार वन-वनमें कृष्णको ढूँढ़ा था, महाप्रभुमें भी वे समस्त भाव उदित होने लगे। श्रीस्वरूप गोस्वामीके द्वारा गीतगोविन्दसे एक गान करनेपर महाप्रभुमें भावोदय, भावसन्धि, भावशाबल्य और अष्टसात्त्विक विकारादि उदित होकर परम-आस्वादनके विषय बन गये। समुद्रके तटपर स्थित उपवनको देखकर वृन्दावनकी स्मृतिके उदित होनेसे ये सब भाव प्रबलरूपसे उदित होने लगे। -(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीकृष्णविरहरूपी महाभावसागरमें निमग्न महाप्रभु :- दुर्गे कृष्णभावाब्धौ निमग्नोन्मग्नचेतसा। गौरेण हरिणा प्रेममर्यादा भूरि दर्शिता ॥ 1 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[अक्षजज्ञानके वशीभूत ब्रह्मादि देवताओंके लिये] दुर्गम कृष्णभावसमुद्रमें निमग्न होकर तन्मय चित्त गौरहरिने अनेक प्रकारकी प्रेम-मर्यादा दिखलायी थी॥ 1 ॥ अनुभाष्य- दुर्गमे (ब्रह्मादीनां सूरीणामपि अक्षजज्ञानवशात् दुर्विगाहे) कृष्णभावाब्धौ (कृष्णभावरूपसिन्धौ) निमग्नोन्मग्नचेतसा (निमग्नम् उन्मग्नञ्च चेतो यस्य तेन) गौरेण हरिणा (गौर-हरिणा कृष्णचैतन्येन) प्रेममर्यादा (प्रेम्णः मर्यादा) भूरि (सुबहुलं) दर्शिता (प्रकटीकृता)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य अधीश्वर। जय नित्यानन्द पूर्णानन्द-कलेवर ॥ 2 ॥ अनुवाद-अधीश्वर श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। पूर्णानन्द स्वरूप कलेवरसे युक्त श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो ॥ 2 ॥ जयाद्वैताचार्य कृष्णचैतन्य-प्रियतम। जय श्रीवास-आदि प्रभुर भक्तगण ॥ 3 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुके अत्यन्त प्रिय श्रीअद्वैताचार्य प्रभुकी जय हो, महाप्रभुके भक्त श्रीवास पण्डित आदिकी जय हो॥3॥ अप्राकृत श्रीकृष्णविरहके प्रेमावेशमें अचैतन्य :- एइमत महाप्रभु रात्रि-दिवसे। आत्मस्फूर्त्ति नाहि कृष्णभावावेशे ॥ 4 ॥ अनुवाद-इस प्रकार रात-दिन कृष्णप्रेमके आवेशमें महाप्रभुको अपना कोई ज्ञान नहीं होता था ॥ 4 ॥ अन्तर्दशा, अर्द्धबाह्यदशा और बाह्यदशा :- कबहु भावे मग्न, कबहु अर्द्ध-बाह्यस्फूर्त्ति। कबहु बाह्यस्फूर्त्ति,-तिन रीते प्रभुस्थिति ॥ 5 ॥ अनुवाद-महाप्रभु तीन प्रकारकी अवस्थाओंमें रहते थे-कभी अन्तर्दशामें वे भावमें पूर्णतया मग्न, कभी अर्द्धबाह्यदशामें और कभी पूर्ण बाह्यदशामें रहते थे ॥ 5 ॥ स्वभाव और अभ्यासवशतः नित्य-नैमित्तिक क्रियाओंका अनुष्ठान :- स्नान, दर्शन, भोजन देह-स्वभावे हय। कुमारेर चाक येन सतत फिरय ॥ 6 ॥ अनुवाद-भावाविष्ट महाप्रभुका स्नान, दर्शन और भोजन आदि करना देहके स्वभाववशतः स्वतः ही होते थे जैसे कुम्हारका चक्र एक बार घुमा देनेपर बहुत देर तक अपने आप चलता रहता है ॥ 6 ॥
376 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/6-14 ] अनुभाष्य—'कुमाररेर चाक',—घड़े आदिके निर्माणके समय जिस प्रकार कुम्हारका चक्र पहले दिये गये बलसे अपने आप घूमता रहता है, सब समय उसको हस्तस्पर्श नहीं करना पड़ता, उसी प्रकार महाप्रभुकी दैहिक समस्त क्रियाएँ बाहरीरूपसे चेतनता नहीं रहनेके समय भी स्वभाववशतः सम्पन्न होती थीं। मुक्त, सिद्ध अर्थात् उत्तमाधिकारी महाभागवतके प्रपञ्चमें प्रकटित रहते समय उनके दैनिक कृत्यादिकी सुन्दर उपमाओंके रूपमें ब्रह्मसूत्र और उसके सर्वश्रेष्ठभाष्य भागवतमें इस विषयकी बहुत-सी कथाएँ हैं॥6॥ श्रीजगन्नाथरूपी श्रीकृष्णके प्रति आकृष्ट महाप्रभुकी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीगोविन्द-सेवा :— एकदिन करेन प्रभु जगन्नाथ-दरशन। जगन्नाथे देखे साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन॥7॥ एकबारे स्फुरे प्रभुर कृष्णेर पञ्चगुण। पञ्चगुणे करे पञ्चेन्द्रिय आकर्षण॥8॥ एकमन पञ्चदिके पञ्चगुण टाने। टानाटानि प्रभुर मन हैल अगेयाने॥9॥ अनुवाद—एक दिन जब महाप्रभु भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन कर रहे थे, तब उन्हें श्रीजगन्नाथमें साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन दिखायी देने लगे। महाप्रभुके सामने एक साथ ही श्रीकृष्णके पाँचों गुण स्फुरित हुए और ये पाँचों गुण उनकी पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करने लगे। महाप्रभुके एक मनको श्रीकृष्णके पाँच अप्राकृत गुण पाँच दिशाओंमें खींचने लगे, इस प्रकारकी खींचातानीसे महाप्रभुका मन अचेतन हो गया॥7-9॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पञ्चगुण',—नेत्रोंसे रूप, कानोंसे गीत, नाकसे घ्राण, जिह्वासे रस और त्वचासे स्पर्श,— कृष्णके इन पाँच अप्राकृत गुणोंने अप्राकृत पाँच इन्द्रियोंमें एक ही साथ स्फूर्त्ति प्राप्त की। मनको इन पाँचों विषयोंमें एक ही समयमें खींचनेपर मन अचेतन हो गया॥8-9॥ भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको घरमें लाना :— हेनकाले ईश्वरेर उपलभोग सरिल। भक्तगण महाप्रभुरे घरे लञा आइल॥10॥ अनुवाद—उसी समय भगवान् श्रीजगन्नाथका उपलभोग सम्पूर्ण हुआ, भक्तगण महाप्रभुको पकड़कर उनके घरपर ले आये॥10॥ स्वरूप, रामानन्द,—एइ दुइजन लञा। विलाप करेन दुँहार कण्ठेते धरिया॥11॥ अनुवाद—उस रात्रिमें महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायके गलेमें अपने हाथोंको डालकर विलाप करने लगे॥11॥ कृष्णेर वियोगे राधार उत्कण्ठित मन। विशाखारे कहे आपन उत्कण्ठा-कारण॥12॥ सेइ श्लोक पड़ि' आपने करे मनस्ताप। श्लोकेर अर्थ सुनाय दुँहारे करिया विलाप॥13॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके वियोगमें श्रीराधिकाका मन उत्कण्ठित होनेपर उन्होंने एक श्लोकके द्वारा श्रीविशाखाको अपनी उत्कण्ठाका कारण बतलाया था, उसी श्लोकका पाठ करते हुए अपने मनके तापको दिखलाने लगे और विलाप करते हुए उस श्लोकके अर्थको श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायसे कहने लगे॥12-13॥ कृष्णके विग्रहके माधुर्यके बलकी आकर्षण-क्षमता :— गोविन्दलीलामृत (8/3)में विशाखाके प्रति श्रीराधाके वचन— सौन्दर्यामृतसिन्धुभङ्गललना-चित्ताद्रिसंप्लावकः कर्णानन्दि-सनर्मरम्यवचनः कोटीन्दुशीताङ्गकः। सौरभ्यामृतसंप्लवावृतजगत् पीयूषरम्योधरः श्रीगोपेन्द्रसुतः स कर्षति बलात् पञ्चेन्द्रियाण्यलि मे॥14॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥14॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो सौन्दर्यके अमृतसिन्धुप्रवाहमें नारियोंके चित्तरूपी पर्वतको सम्पूर्ण रूपसे डुबो देनेवाले
[ 15/14-19 पन्द्रहवाँ अध्याय 377 हैं, जो कानोंको आनन्द प्रदान करनेवाले नर्म-रमणीय वचनोंसे युक्त होकर करोड़ों चन्द्रमाओंकी भाँति शीतल हैं और जिन्होंने सौरभरूपी अमृत-सागरके द्वारा जगत्को आवृत किया है एवं जो अमृतसे पूर्ण अधरोंसे युक्त हैं, हे सखि, वही गोपेन्द्रनन्दन कृष्ण मेरी पाँचों इन्द्रियोंको बलपूर्वक आकर्षित कर रहे हैं॥14॥ अनुभाष्य— हे आलि, (सखि,) यः सौन्दर्यामृतसिन्धुभङ्ग- ललनाचित्ताद्रिसंप्लावकः (सौन्दर्यम् एव अमृतसिन्धुः तस्य सुधारण्वस्य भङ्गैस्तरङ्गरूपैः जलच्छाताभिः ललनानां चित्तरूपाद्रिं सं सम्यक् प्लावयितुं शीलं यस्य सः) कर्णानन्दिसनर्मरम्यवचनः (कर्णम् आनन्दयितुं शीलं यस्य ततेन नर्म स्मितेन च सह रम्यं वचनं यस्य सः) कोटीन्दुशीताङ्गकः (कोटिचन्द्रात् अपि शीतं सुशीतलम् अङ्गं यस्य सः) सौरभ्यामृतसंप्लवावृतजगत् (सौरभ्यमेव अमृतं तस्य संप्लवः सागरः तेन आवृतम् आच्छादितं जगत् येन् सः) पीयूषरम्योधरः (पीयूषतः अमृतादपि रम्यः अधरो यस्य सः) सः श्रीगोपेन्द्रसुतः (ब्रजेन्द्रनन्दनः) बलात् (प्रसभेन) मे (मम) पञ्चेन्द्रियाणि (चक्षुकर्ण- नासाजिह्वात्वगादीनि) कर्षति (स्व-रूप-वंशीध्वनि-सौरभ्यास्वाद- स्पर्शादिषु नयति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥14॥ अमृताणुकणिका—श्रीचैतन्यचरितामृतमें इस श्लोकका वर्णन है और शीर्षकमें इस श्लोकको श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीकृत श्रीगोविन्दलीलामृतसे उद्धृत कहा गया है। तो इसके रचयिता कौन हैं? श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने महाप्रभुके अप्रकट होनेके अनेक वर्षोंके उपरान्त श्रीगोविन्दलीलामृतकी रचना की थी। किन्तु यहाँ वे कह रहे है कि महाप्रभुने इस श्लोकका उच्चारण किया, इसलिये यह श्लोक उनका अपना नहीं है। मूलतः यह श्लोक महाप्रभुने श्रीराधा-भावमें विभावित होकर कहा और उसको श्रीस्वरूप दामोदरने अपने कड़चेमें लिख लिया। श्रीस्वरूप दामोदर बहुत आश्चर्य-चकित होकर श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको सुनाते हुए इस श्लोकामृतका पान करवा रहे हैं कि देखो! आज महाप्रभुने इस श्लोकका पाठ किया है और इसका इतना सुन्दर अर्थ किया है, जिसकी जगत्के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते। श्रीगोविन्दलीलामृत वर्णन करनेकी अथवा श्लोकका अर्थ अर्थात् उसकी व्याख्या करनेकी शैली, श्रीकृष्णदास कविराजने कहाँसे प्राप्त की? उन्होंने श्रीरघुनाथदास गोस्वामीसे यह शैली सीखी। बादमें वृन्दावनमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने उस श्लोकको श्रीकृष्णदास कविराजको सुनाया, तब श्रीकृष्णदास कविराजने इस श्लोकको श्रीगोविन्दलीलामृतमें लिखा।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी”॥14॥ गोपीके द्वारा अप्राकृत पुष्पबाणके माधुर्यबलका वर्णन (चित्रजल्प) :— “कृष्ण-रूप-शब्द-स्पर्श, सौरभ अधर-रस, यार माधुर्य कहन ना याय। देखि’ लोभे पञ्चजन, एक अश्व—मोर मन, चड़ि’ पञ्च पाँचदिके धाय॥15॥ पुष्पबाणसे आकृष्ट गोपियोंकी इन्द्रियाँ :— सखि हे, शुन, मोर दुःखेर कारण। मोर पञ्चेन्द्रियगण, महा-लम्पट दस्युगण, सबे कहे,—हर’ परधन॥16॥ध्रु॥ गोपियोंकी कृष्णाधीन अवस्था :— एक अश्व एकक्षणे, पाँच पाँच दिके टाने, एक मन कोन् दिके धाय? एककाले सबे टाने, गेल घोड़ार पराणे, एइ दुःख सहन ना याय॥17॥ श्रीकृष्णके रूप-माधुर्यका बल :— इन्द्रिये ना करि रोष, इँहा-सबार काँहा दोष, कृष्णरूपादिरे महा आकर्षण। रूपादि पाँच, पाँचे टाने, गेल घोड़ार पराणे, मोर देहे ना रहे जीवन॥18॥ कृष्णरूपामृतसिन्धु, ताहार तरङ्गबिन्दु, एकबिन्दु जगत् डुबाय। त्रिजगते यत नारी, तार चित्त-उच्चगिरि, ताहा डुबाइ आगे उठि’ धाय॥19॥
378 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/15-23 ] श्रीकृष्णके वचनोंके माधुर्यका बल :- घोड़ेको लेकर (रूपादि) पाँच-पाँच (विषयों)की ओर कृष्णेर वचन-माधुरी, नाना-रस-नर्मधारी, खींचा-तानी करती है, इस प्रकार एक ही साथ खींचे तार अन्याय कहन ना याय। जानेके लाभके रूपमें केवल घोड़ेके ही प्राण चले जाते जगतेर नारीर काणे, माधुरीगुणे बान्धि' ताने, हैं,—मैं उसे किस प्रकार सहन कर सकती हूँ? यदि तानाटानि काणेर प्राण याय ॥ 20 ॥ कहो, तुम अपनी इन्द्रियोंका दमन क्यों नहीं करती? श्रीकृष्णके अङ्गोंके माधुर्यका बल :- हे सखि, इन्द्रियोंको भी भला किस प्रकारसे दोष दूँ? कृष्ण-अङ्ग सुशीतल, कि कहिमु तार बल, कृष्ण-रूपादि पाँच विषय-स्वभावसे ही महा-आकर्षणसे छटाय जिने कोटिन्दु-चन्दन। युक्त हैं; रूपादि पाँच वस्तुएँ पाँच इन्द्रियोंको अपनी-अपनी सशैल नारीर वक्ष, ताहा आकर्षिते दक्ष, ओर खींचती रहती हैं, मनरूपी घोड़ेके ऊपर चढ़ीं पाँच आकर्षये नारीगण-मन ॥ 21 ॥ ज्ञानेन्द्रियाँ उसी ओर ही आकृष्ट होकर दौड़ती हैं; श्रीकृष्णकी सुगन्धके माधुर्यका बल :- फलस्वरूप, घोड़ेके प्राणोंके नष्ट होनेपर मेरे भी प्राण कृष्णाङ्ग-सौरभ-भर, मृगमद-मनोहर, जाते हैं। तीनों लोकोंमें जितनी भी नारियाँ हैं, उनका नीलोत्पलेर हरे गर्व-धन। चित्त यद्यपि ऊँचे पर्वतके समान है, किन्तु कृष्णरूपामृत जगत्-नारीर नासा, तार भितर पाते वासा, सिन्धुकी तरङ्ग-बिन्दु उन ऊँचे पर्वतोंको भी डुबो रही नारीगणे करे आकर्षण ॥ 22 ॥ है। कृष्णकी रसनर्म (परिहास)-रूपी वचन-चातुरी श्रीकृष्णके अधरोंके स्पर्शके माधुर्यका बल :- नारियोंके प्रति ऐसा अन्यायपूर्ण आचरण करती है कि कृष्णेर अधरामृत, ताते कर्पूर मन्दस्मित, उसके विषयमें कुछ कहा नहीं जा सकता; नारियोंके स्व-माधुर्ये हरे नारीर मन। कानोंमें प्रवेश करके वह अपने माधुरी-गुणसे उनका अन्यत्र छाड़ाय लोभ, ना पाइले मने क्षोभ, बन्धन करके खींचा-तानी करती है, जिससे कानोंके व्रजनारीगणेर मूलधन ॥” 23 ॥ प्राण जाते हैं। कृष्णके अङ्ग अतिशय सुशीतल हैं, उनकी शीतल किरणें करोड़ों-करोड़ों चन्द्रमाओं और अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 15-23 ॥ चन्दनोंको पराजित करती हैं। कृष्णके अङ्ग-नारियोंके अमृतप्रवाह भाष्य-कृष्णके रूप, वचन, मुरलीध्वनि पर्वतरूपी वक्षको आकर्षित करनेमें अत्यन्त दक्ष हैं एवं आदि रूप, शब्द, स्पर्श, सौरभ और अधरका रस,—ये नारियोंके मनको आकर्षित करते हैं। कृष्णके अङ्गोंकी पाँचों महामाधुर्यसे परिपूर्ण हैं; मेरी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ सुगन्ध मनोहर मृगमद और नीलकमलके गर्वका भी श्रीकृष्णके उन-उन विषयोंके दर्शनसे लुब्ध होकर नाश करती है—वह जगत्की नारियोंकी नासिकामें प्रत्येक ही इन्द्रिय मेरे मनरूपी एकमात्र घोड़ेके ऊपर प्रवेश करके वहाँ वासस्थान बनाकर नारियोंको आकर्षित चढ़कर एक-ही-साथ पाँचों ओर दौड़ना चाहती हैं; हे करती है। कृष्णका अधरामृत मन्दहास्यरूपी कर्पूरके सखि, दुःखकी बात क्या बतलाऊँ? मेरी पाँचों साथ मिलकर अपने माधुर्यसे नारियोंके मनका हरण ज्ञानेन्द्रियाँ-अत्यन्त विषयलम्पट और डाकुओंकी भाँति करता है; वह कृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंमें हैं। कृष्ण परपुरुष हैं, ऐसा जाननेपर भी उन-उन लोभको छुड़ा देता है, किन्तु स्वयं दुर्लभतावशतः कृष्ण-विषयोंको हरण करनेमें प्रवृत्त हैं। मेरा मन तो अप्राप्य होकर मनमें क्षोभको उत्पन्न करता है, वही एक ही घोड़ा है; नेत्र आदि प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय ही उस अधरामृत ही व्रजकी नारियोंका मूल धन है ॥ 15-23 ॥
[ 15/12-23 पन्द्रहवाँ अध्याय 379 अनुभाष्य—कृष्णके प्रति आकृष्ट मेरी पाँच डाकूरूपी पाँच इन्द्रियाँ परस्पर सभी युक्ति करती हैं, —'चलो, सभी मिलकर इस पराये धन मनरूपी घोड़ेका अपहरण करें अर्थात् उसकी चोरी की जाय ॥'15-16॥ अमृताणुकणिका—महाप्रभु श्रीराधाजीके भावमें विभावित होकर श्रीकृष्णवियोगमें श्रीराधाके अधिरूढ़ महाभावका आस्वादन कर रहे हैं। श्रीकृष्णसे मिलनेकी उनकी इतनी तीव्र उत्कण्ठा है जिसका शब्दोंके द्वारा वर्णन करना सम्भवपर नहीं है। वे एक व्रजकी लीलाका स्मरण कर रहे हैं—एक दिन दोपहरके समय श्रीकृष्ण गोवर्धनकी तलहटीमें गौओंको चरा रहे थे। निकट ही किसी प्रकारसे उनका श्रीरूप-मञ्जरीसे मिलन हुआ। उन्होंने श्रीरूप-मञ्जरीको कमलकी एक माला दी। मालाके द्वारा वे इङ्गित कर रहे थे कि वे श्रीराधासे मिलनेके लिये उत्कण्ठित हैं। श्रीरूप-मञ्जरीने जावटमें जाकर वह माला श्रीराधाको दी। उस मालाको प्राप्त करके वे श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये इतनी उत्कण्ठित हुईं कि वे अपने धैर्यको धारण नहीं कर पा रही थीं। वे विशाखाजीको उपरोक्त श्लोकके द्वारा अपनी उत्कण्ठाको व्यक्त करने लगीं और महाप्रभु श्रीराधाके भावोंमें विभावित होकर उस श्लोकका पाठ कर रहे हैं और स्वयं ही उसका अर्थ बतला रहे हैं। 'सौन्दर्यामृतसिन्धुभङ्गललना-चित्ताद्रिसंप्लावकः'—जगत्में समुद्रका जल पासमें स्थित पर्वतके चरणोंको स्पर्श करता है। यदि हिमालय जैसा पर्वत भी उसके तटपर स्थित हो, तो भी समुद्रके जलकी तरङ्गैं उत्छलकर उसके चरणोंको छूकर वहाँसे शान्त होकर लौट जायेंगी। किन्तु पर्वत अटल-अचल रहता है। वह बहुत ऊँचा है और कभी भी हिलनेवाला नहीं है, वह धीर है। उसकी जड़ें बहुत दृढ़ हैं। उसके शिखरको झुका देना अथवा अपने जलमें डुबो देना समुद्रके लिये सम्भव नहीं है। किन्तु श्रीकृष्णके रूप-माधुर्यके अमृतका जो सिन्धु है, उसमें तरङ्गैं इस समुद्रसे भी कोटि गुणा अधिक ऊँची उठती हैं और नारियोंके चित्तरूपी पर्वतके शिखरको भी अपने अङ्कमें समा लेती हैं तथा उनकी रग-रगमें प्रवेश करके उनको जलमय बना देती हैं। यहाँ नारियोंका तात्पर्य व्रजगोपियोंसे है, अन्य किसी नारीसे नहीं और शिखरका तात्पर्य उनके पातिव्रत्य-धर्मसे है। अत्रिकी पत्नी अनसूया और वशिष्ठकी पत्नी अरुन्धती—इनका पातिव्रत्य-धर्म जगत्में प्रसिद्ध है। सीताजीके पातिव्रत्य-धर्मकी महिमा भी जगत्में सुनी जाती है। किन्तु गोपियोंका पातिव्रत्य-धर्म इनके पातिव्रत्य-धर्मसे भी बहुत ऊँचा है। अरुन्धती और अनसूयाका जो पातिव्रत्य-धर्म है, उसमें कुछ दोष है। इनका चित्त श्रीकृष्णमें और अपने-अपने पतिमें भी है, साथमें लौकिक धर्म और लोक-लज्जाके प्रति भी है। किन्तु गोपियोंका चित्त श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीमें भी नहीं है। गोपियोंके पातिव्रत्य-धर्मकी जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका कोई सन्धान नहीं है और ये कभी भी हिलनेवाली नहीं हैं। इसलिये अरुन्धती और अनसूया आदि भी गोपियोंके पातिव्रत्य-धर्मकी वाञ्छा या अभिलाषा रखती हैं ('याँर पतिव्रता-धर्म वाञ्छे अरुन्धती ॥'—मध्यलीला 8/183)। इसलिये गोपियोंका जो धैर्य है, उनका जो पातिव्रत्य-धर्म है, उनकी जो लज्जा है, वह एक-एक शिखर है। वे पर्वतके शिखरकी भाँति अपने धर्मको नहीं छोड़ सकतीं, किन्तु श्रीकृष्णके रूपरूपी सिन्धुकी एक तरङ्गसे ये शिखर चूर्ण होकर समुद्रमें गिर जाते हैं। इन गोपियोंमें भी श्रीमती राधिकाका पातिव्रत्य-धर्मरूपी शिखर सबसे ऊँचा है। उस शिखरकी ऊँचाईकी सीमा नहीं है, किन्तु श्रीकृष्णके रूप-माधुर्यके अमृतका जो सिन्धु है, उसकी एक तरङ्गका एक बिन्दु उसको अपनेमें डुबो देता है। इसलिये श्रीराधा कह रही हैं कि हे सखी, हमारा धैर्य, हमारा व्रत, हमारी लज्जा—ये सब न जाने कहाँ चले गये? ये सब एक क्षणमें ध्वंस हो जाते हैं। 'कर्णानन्दि-सनर्मरम्यवचन:'—कर्णको आनन्द देने वाले उनके परिहासमय, नर्म और कोमल वचन। चित्तको आह्लादित करनेवाले श्रीकृष्णके जो वचन हैं,
380 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/12-23 ] उन्हें श्रवण करके कोई भी स्त्री (गोपी) अपने सतीत्वको एक क्षणके लिये भी नहीं रख सकती, अपनी लोक-लज्जाको भी नहीं रख सकती। उनके चित्तका हरण हो जाता है। श्रीकृष्णके रूपमें जैसी शक्ति है, वैसी शक्ति उनके वचनमें भी है। बंसी मधुर-से-मधुर है, किन्तु श्रीकृष्णके मुखसे निकली हुई वाणी और भी अधिक मधुर है। श्रीकृष्णके मुखसे इतने प्रेमसे निकला हुआ वचन—‘हे प्रिये’ गोपियोंके चित्तका सम्पूर्ण हरण कर लेता है। उनका परिहासमय वचन कैसा है ? श्रीकृष्ण—‘तुम कौन हो? यहाँ क्यों आयी हो?’ श्रीराधा—‘तुम नहीं जानते कि मैं कौन हूँ?’ श्रीकृष्ण—‘यदि जानता तो पूछता क्यों ? मैं तो केवल यह जानता हूँ कि तुम चोर हो। मेरे उद्यानको तुमने रौंदकर नष्ट कर दिया और जितने अच्छे-अच्छे पुष्प हैं, उन्हें तुमने और तुम्हारी सखियोंने चुरा लिया है।’ श्रीराधा—‘अहा ! आज मैं परम धार्मिकको देख रही हूँ। आप तो बचपनसे ही परम धार्मिक हैं।’ श्रीकृष्ण—‘बचपनसे मैंने ऐसा क्या किया है कि मैं अधार्मिक हो गया, कुछ बताओ तो।’ श्रीराधा—‘आप बड़े धार्मिक हो। जन्म लेते ही पूतनाके प्राणोंको आपने चोरी किया। और व्रजमें ऐसा कोई घर नहीं, जहाँपर आपका यह धार्मिक भाव व्यक्त न हुआ हो। ऐसे आप धार्मिक हो। इन सबसे आपकी सन्तुष्टि नहीं हुई, तो कन्याओंके वस्त्र चुरा लिये—यह तो और भी उन्नत धर्म है। और इससे भी परम धर्म—समस्त व्रजकी कन्याओंको बुलाकर रास किया, यह तो आपका परम धर्म है।’ इस प्रकार परस्परका जो वार्तालाप है, वह परम हास्ययुक्त, परम मधुर, परम आनन्दमय है। एक-एक बात ऐसी मधुर है कि जो श्रीकृष्णको आनन्दसे भर देती है और श्रीराधा एवं गोपियोंको भी आनन्दसे भर देती है। अन्य एक प्रसङ्ग— श्रीराधाने कहा,—‘ललिते ! कुछ उपाय करो। ये धूर्त महाशयजी स्वयंको बहुत बलवान समझते हैं और पौरुषेय कार्यमें तो ये विजयी हो जायेंगे। इसलिये ऐसा कोई उपाय करो कि हम इनको जीत सकें।’ ललिता—‘यह तो बहुत सहजमें हो जायेगा।’ श्रीराधा—‘कैसे ?’ ललिता—‘अभी पासाका खेल प्रारम्भ कर दो।’ जब श्रीकृष्ण पासाके खेलमें हार गये, तो राधाजीने कहा कि ग्वाले तो गँवार होते हैं, पासा खेलनेके लिये बुद्धि चाहिये, यह ग्वालोंका काम नहीं है। आप तो गायोंके पीछे-पीछे लठिया लेकर चलो और उनके गोबरको लेकर इधर-उधर रखो। पासा तो बुद्धिमानोंका कार्य है। आपकी बुद्धिसे परेकी बात है। ऐसा श्रीकृष्ण और गोपियोंमें परस्पर परिहास होता है। इसको ही यहाँ ‘कर्णानन्दी’ कहा गया है। यहाँपर राधाजीका प्रसङ्ग है, इसलिये राधाजीके लिये ‘कर्णानन्दी’ कहा गया है—राधाजीके कर्णोंके आनन्दको वर्धित करनेवाला। माधुर्य-कादम्बिनी ग्रन्थमें श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुर कहते हैं—श्रीभगवान् सर्वप्रथम जातप्रेम भक्तके नेत्रोंके आगे अपने अपार चमत्कारितापूर्ण सौन्दर्यको प्रकाशित करते हैं। तत्पश्चात् उनके उस रूपमाधुर्यके द्वारा उस भक्तकी मन सहित समस्त इन्द्रियाँ प्रेममय हो उठती हैं और उसमें स्तम्भ, कम्प, वाष्पादि प्रेमके विकार उत्पन्न होते हैं, जिन्हें वह विघ्नके समान ही मानता है। इससे वह भक्त आनन्दरूपी मूर्च्छामें अपनी सुध-बुध खो देता है। तब श्रीभगवान् उस भक्तको सचेतन करनेके लिये उसके समीप उपस्थित होते हैं और उसकी घ्राणेन्द्रिय (नाक) में अपने दूसरे माधुर्य सौरभको प्रकाशित करते हैं। उस अपूर्व मधुर सौरभसे उस भक्तकी सारी इन्द्रियाँ घ्राणेन्द्रियका भाव प्राप्त कर लेती हैं जिससे वह भक्त पुनः दूसरी आनन्दमूर्च्छामें अचेतन हो जाता है। उस अवस्थाके प्रारम्भमें श्रीभगवान् यह कहते हुए—“मेरे प्यारे भक्त ! मैं तो सब प्रकारसे तुम्हारे अधीन हूँ, तुम
[ 15/12-23 पन्द्रहवाँ अध्याय 381
व्याकुल मत हो, मेरा अनुभवकर अपनी कामनाको पूर्ण करो।” भक्तके निकट उसके कर्णेन्द्रियके द्वारा ग्राह्य अपनी सुमधुर वाणीरूप तीसरे माधुर्यको प्रकाशित करते हैं। उस मधुर स्वरको सुनते ही उस भक्तकी समस्त इन्द्रियाँ श्रवणमय हो जाती हैं और वह फिर तीसरी आनन्द मूर्च्छामें पड़ने लगता है, उसी क्षण श्रीभगवान् कृपापूर्वक अपने श्रीचरणकमलोंसे या करकमलोंसे अपना अत्यन्त मधुर स्पर्श प्रदान करते हुए अथवा अपने हृदयसे लगाकर उस भक्तको अपने चौथे माधुर्य सौकुमार्यका अनुभव कराते हैं। तदनन्तर प्रेमीभक्तकी चतुर्थ मूर्च्छाके प्रारम्भमें श्रीभगवान् अपने अधरोंका सौरस्य नामक पाँचवाँ माधुर्य प्रकट करते हैं, जो भक्तकी रसनेन्द्रियके द्वारा ग्राह्य है। इस प्रकारसे भक्त श्रीकृष्णके पाँच रसोंका क्रमशः आस्वादन करता है। परन्तु महाप्रभु राधाजीके भावोंमें विभावित होकर कह रहे हैं कि एक ही समयमें समस्त इन्द्रियाँ कृष्णके इन पाँच रसोंमें एक साथ आकर्षित हो जाती हैं, इससे मनरूपी एक घोड़ा क्या करे? 'कोटीन्दुशीताङ्गकः'—करोड़ों चन्द्रमाओंकी शीतलताको पराभूत करनेवाली श्रीकृष्णके अङ्गोंकी जो शीतलता है, वह राधाजीके चित्तको प्लावित कर देती है। 'सौरभ्यामृतसंप्लवावृतजगत्'—श्रीकृष्णके अङ्गोंकी ऐसी निराली सुगन्ध है जो अन्य सभी वस्तुओंकी सुगन्धको पराभूत कर देती है। जैसे—श्रीकृष्णके द्वारा प्रेरित उद्धवजी व्रजमें आये। वे देखनेमें श्रीकृष्णके समान ही हैं और उन्होंने श्रीकृष्णके प्रसादी वस्त्र और माला धारण किये हुए थे। वे जब कदम्ब क्यारीमें गोपियोंके निकट आये, तो उन्हें देखकर गोपियाँ अनुमान लगाने लगीं कि यह कौन है? गोपियाँ परस्पर कहने लगीं कि यह देखनेमें तो श्यामसुन्दरके समान दिखता है, किन्तु श्यामसुन्दर नहीं है। ललिताजी कहने लगीं,—'मैं जानती हूँ, यह कृष्णका दूत है। कृष्णके अङ्गोंसे उतरे वस्त्र और माला पहन कर आया है। नेत्रोंसे देखनेसे तो भूल हो सकती है, किन्तु मेरी नाक अभ्रान्त है, वह कभी भूल नहीं कर सकती। इस मालासे कृष्णके अङ्गोंकी सुगन्ध आ रही है जो मालाके पुष्पोंकी सुगन्धको भी पराभूत करके अपना परिचय दे रही है। इसलिये यह कृष्णका दूत है।' श्रीकृष्णके द्वारका चले जानेपर राधाजी उनका चिन्तन कर रही हैं। विरहमें होते-होते वे ऐसी विप्रलम्भकी स्थितिमें पहुँच गयीं कि उनको यह भ्रम हुआ कि कृष्ण वापस आ गये हैं। वे भूल गयीं कि कृष्ण द्वारकामें हैं। उन्हें लगा कि कृष्ण वहीं कहीं छिप रहे हैं। तभी उन्हें लगा कि कोई उनकी आँखोंको अपने हाथोंसे ढक रहा है। पहले तो राधाजीने ललिताका नाम लिया कि वे उनकी आँखोंको ढक रही हैं, फिर विशाखाका नाम लिया। उस विरहमें भी तब वे मुस्कराने लगीं और कहा,–'मैं समझ गयी हूँ। अरे! यह तो कृष्णके अङ्गोंकी गन्ध आ रही है। यह तो अवश्य कृष्ण ही हैं, वे लम्पट, चोर ही हैं।' राधाजीने श्रीकृष्णके अङ्गोंकी गन्धके द्वारा उनको पहचान लिया। श्रीकृष्णके अङ्गोंकी ऐसी मतवाली सुगन्ध है जो गोपियोंको पागल बना देती है। और इसी पागलपनके कारण उनके द्वारा अपने लोकधर्म, लज्जा, शील आदि सभीका त्याग हो जाता है। श्रीकृष्णके अङ्गोंका सौरभ्यामृत अन्य सभी वस्तुओंकी सुगन्धको पराभूत करनेवाला है। 'पीयूषरम्योधरः'—श्रीकृष्णके मुखारविन्दका अधरामृत कैसा है? वह इतना मधुर है कि वह पीयूषको भी कोटि-कोटि बार पराभूत कर देता है। जगत्में पीयूषसे अधिक कोई भी सुस्वादु वस्तु नहीं है, किन्तु श्रीकृष्णका अधरामृत अपने एक कणके द्वारा उसके समस्त माधुर्यको पराभूत कर देनेवाला है। श्रीकृष्णकी ये पाँच प्रकारकी जो माधुरियाँ हैं, वे गोपियोंके पातिव्रत्य-धर्म, लोक-लज्जा, धैर्य, गुरुजनोंका भय आदि समस्त भावोंको क्षणमात्रमें भुलाकर उनका बलपूर्वक आकर्षण कर लेती हैं।
382 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 15/12-31 ]
[बायाँ स्तम्भ] और महाप्रभु इसका अर्थ करते हुए कह रहे हैं,—“‘सखि हे, शुन, मोर दुःखेर कारण।' पाँच दिशाओंमें मेरी पाँच इन्द्रियाँ जा रही हैं—आँख रूपकी ओर, नासिका सौरभ्यकी ओर, कर्ण मधुर शब्दकी ओर, त्वचा स्पर्शकी ओर तथा जिह्वा रसकी ओर। ये पाँचों एक घोड़ेपर बैठी हैं अर्थात् मनके सहारे ही समस्त विषयोंका रस लेती हैं। ये पाँचों इन्द्रियाँ एक मनरूपी घोड़ेको अपनी-अपनी दिशामें खींच रही हैं। इस प्रकार एक ही साथ खींचे जानेके लाभके रूपमें केवल घोड़ेके ही प्राण चले जाते हैं,—मैं उसे किस प्रकार सहन कर सकती हूँ?” श्रीकृष्णके इस माधुर्यका जो आस्वादन करता है, वह अमृतका पान करता है। इसमें जो बाहरसे दुःखके समान प्रतीत होता है, वह भी परमानन्द है। किन्तु इस जगत्के समस्त लोग इन पाँच प्रकारके जड़ीय विषयोंके पीछे अपनी इन्द्रियोंको लगाकर जड़ीय रसका अनुभव करना चाहते हैं और वे जिसे सुख मानते हैं, वास्तवमें वह केवल विषपान ही है।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी” ॥ 12-23 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णविरहमें अपने दो सङ्गियोंके निकट विलाप :— एत कहिं गौरहरि, दुइजनार कण्ठ धरि', कहे,—“शुन, स्वरूप-रामराय। काँहा करों, काँहा याङ, काँहा गेले कृष्ण पाङ, दुँहे मोरे कह से उपाय ॥” 24 ॥ अनुवाद—श्रीगौरहरिने यह कहकर श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी और श्रीरामानन्द रायके गलेमें अपने हाथ डालकर उनसे कहा,—“हे स्वरूप, हे रामराय ! सुनो। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मुझे कहाँ जानेपर कृष्ण मिलेंगे, आप दोनों मुझे उसका उपाय बतलाओ॥” 24 ॥ एइमत गौरप्रभु प्रति दिने-दिने। विलाप करेन स्वरूप-रामानन्द-सने ॥ 25 ॥
[दायाँ स्तम्भ] अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरहरि दिन-प्रतिदिन श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायके आगे विलाप करते थे॥ 25 ॥
महाप्रभुके विरहमें श्रीस्वरूप और रामरायके द्वारा सान्त्वना :— सेइ दुइजन प्रभुरे करे आश्वासन। स्वरूप गाय, राय करे श्लोक पठन ॥ 26 ॥
महाप्रभुके भावके उपयोगी प्रिय ग्रन्थसमूह :— कर्णामृत, विद्यापति, श्रीगीतगोविन्द। इहार श्लोक-गीते प्रभुर कराय आनन्द ॥ 27 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भावोंके अनुरूप श्रीस्वरूप दामोदर गान करते और श्रीरामानन्द राय श्लोकका पाठ करते, इस प्रकार वे दोनों महाप्रभुको आश्वासन देते। वे श्रीकृष्णकर्णामृतके श्लोकों, श्रीविद्यापतिके द्वारा रचित गीतों और श्रीगीत-गोविन्दके पदोंसे महाप्रभुको आनन्दित करते थे॥ 26-27 ॥
गोपियोंकी दासीके अभिमानमें महाप्रभुको सर्वत्र श्रीकृष्णलीलाका दर्शन और उसका अन्वेषण :— एकदिन महाप्रभु समुद्र याइते। पुष्पेर उद्यान तथा देखेन आचम्भिते ॥ 28 ॥ वृन्दावन-भ्रमे ताँहा पशिला धाञा। प्रेमावेशे बुले ताँहा कृष्ण अन्वेषिया ॥ 29 ॥ रासे राधा लञा कृष्ण अन्तर्धान कैला। पाछे सखीगण यैछे चाहि' बेड़ाइला ॥ 30 ॥ सेइ भावावेशे प्रभु प्रति-तरुलता। श्लोक पड़ि' चाहि' बुले यथा तथा ॥ 31 ॥ अनुवाद—एकदिन महाप्रभुने समुद्रकी ओर जाते समय मार्गमें अकस्मात् एक पुष्पोंके उद्यानको देखा। उस उद्यानमें वृन्दावनका भ्रम होनेसे महाप्रभु उसकी ओर दौड़कर उसमें प्रविष्ट हो गये और प्रेमाविष्ट होनेके कारण वहाँ श्रीकृष्णको ढूँढ़ते हुए भ्रमण करने लगे। रासलीलाके समय श्रीकृष्णके द्वारा श्रीराधाको
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लेकर अन्तर्धान हो जानेपर जैसे सखियाँ उन्हें ढूँढ़ते हुए भ्रमण कर रही थीं, उन सखियोंके भावोंके आवेशमें महाप्रभु श्रीकृष्णको इधर-उधर ढूँढ़ते हुए प्रत्येक वृक्ष-लताके निकट जाकर श्लोक पढ़ने लगे॥ 28-31॥
श्रीकृष्णविरहिणी गोपियोंके द्वारा सर्वत्र चेतनामय कृष्ण और कृष्णभक्तके प्रति दृढ़ विश्वासवशतः कृष्णको ढूँढ़ना (उद्घूर्णा); प्रत्येक वृक्षसे कृष्णके विषयमें पूछना :— श्रीमद्भागवत (10/30/9, 7, 8) में— चूतप्रियाल-पनसासनकोविदार- जम्ब्वर्कबिल्वबकुलाम्रकदम्बनीपाः। येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूलाः शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः॥ 32 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे चूत (आमकी एक विशेष जाति), प्रियाल, कटहल, पीतशाल, कचनार, जामुन, आक, बेल, मौलसिरी, आम, कदम्ब, धूलिकदम्ब आदि वृक्षों तथा हे अन्यान्य यमुनाताट-निवासी परम-मङ्गल चित्तवाले (अन्योंके हितका व्रत धारण करनेवाले) सभी वृक्षों! आत्म-स्वरूप-रहित (अर्थात् शून्य मनवाली) हम गोपियोंको कृष्ण कहाँपर हैं, यह बतलाओ॥ 32 ॥
अनुभाष्य—भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा गोपियोंके साथ रासलीला करते-करते अचानक अन्तर्धान होनेपर उन्हें नहीं देखकर एकान्तिक कृष्णमय चित्तवाली गोपियाँ उन्हें ढूँढ़ रही हैं— चूतप्रियालपनसासनकोविदारजम्ब्वर्कबिल्वबकुलाम्रकदम्बनीपाः (समीपवर्तिनः फलवृक्षादीन् आहुः—हे चूत, हे प्रियाल, हे कण्टक, हे पीतशाल, हे कोविदार, हे जम्बो, हे अर्क, हे बिल्व, हे बकुल, हे आम्र, हे कदम्ब, हे नीप, यूयं) ये अन्ये (ते च हे वृक्षाः) परार्थभवकाः (परार्थमेव भवः जन्म येषां ते,) यमुनोपकूलाः, (यमुनायाः कालिन्द्याः उपकूले तटभूमौ वर्त्तमानाः तरवः ते भवन्तः) रहितात्मनां (शून्य-मनसां) नः (अस्माकं) कृष्णपदवीं (कृष्णमार्गं) शंसन्तु (कथयन्तु)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 32 ॥
श्रीतुलसीसे श्रीकृष्णके विषयमें जिज्ञासा :— कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरणप्रिये। सह त्वालिकुलैर्विभ्रद्दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः॥ 33 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ओह कल्याणि, गोविन्दचरण-प्रिये तुलसी, तुम—अच्युतको अत्यन्त प्रिय हो; क्या तुमने कृष्णको भँवरोंके साथ तुम्हें धारण किये हुए जाते देखा है? 33 ॥
अनुभाष्य— हे कल्याणि, (सौभाग्यशालिनि,) गोविन्दचरणप्रिये, (गोविन्दस्य चरणप्रिये,) तुलसि, अलिकुलैः सह त्वा (त्वां) बिभ्रत् ते (तव) अतिप्रियः अच्युतः (गोविन्दः) क्वचित् [त्वया किं] दृष्टः? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 33 ॥
पुष्पोंके वृक्षोंसे श्रीकृष्णके विषयमें पूछना :— मालत्यदर्शि वः कच्चिन्मल्लिके जाति यूथिके। प्रीतिं वो जनयन् यातः करस्पर्शन माधवः॥ 34 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 34 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे मालति, हे मल्लिके (चमेली), हे मोगरा, हे जूहि, क्या तुमने तुम्हें अपने हाथोंसे स्पर्श करके तुम्हारे आनन्दको उत्पन्न करनेवाले कृष्णको जाते देखा है? 34 ॥
अनुभाष्य— हे मालति, हे मल्लिके, हे जाति, हे यूथिके, करस्पर्शन वः (युष्माकं) प्रीतिं जनयन् यातः (प्रस्थितः) माधवः वः (युष्माभिः) कच्चित् अदर्शि (दृष्टम्)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 34 ॥
श्लोकोंका अर्थ; श्रीकृष्णमें तन्मयी विरहिणी गोपियोंके द्वारा श्रीकृष्णको ढूँढ़ते हुए विलाप :— “आम्र, पनस, पियाल, जम्बु, कोविदार। तीर्थवासी सबे, कर पर-उपकार॥ 35 ॥