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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

थी और उन्हें अपनी विद्याका अभिमान भी था। सर्वज्ञ भगवान् महाप्रभु सभीके हृदयके भावोंको जानते थे॥110॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मुक्ति-वाञ्छा और विद्या-गर्व-इन दो दोषोंने रामदासको 'शुद्धवैष्णव' बनने नहीं दिया॥110॥ तेरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य समाप्त। रामदासके द्वारा काव्य-शास्त्र-अध्यापन :- रामदास कैला तबे नीलाचले वास। पट्टनायक-गोष्ठीके पड़ाय 'काव्यप्रकाश' ॥111॥ अनुवाद-तब रामदास विश्वास जगन्नाथ पुरीमें ही वास करने लगे। वे वहाँ पट्टनायक-परिवारको (श्रीभवानन्द रायकी सन्तानोंको) 'काव्य-प्रकाश' पढ़ाते थे॥111॥ अनुभाष्य- 'पट्टनायक-गोष्ठीके', -भवानन्दकी सन्तानोंको ॥ 111॥ श्रीरघुनाथको उपलक्ष्य करके महाप्रभुके द्वारा संसारमें प्रवेश करनेमें अनिच्छुक और अप्रविष्ट साधकोंको उनके अपने स्थानपर रहकर स्त्रीसङ्गके द्वारा इन्द्रियसुखकी स्पृहापर आधारित अत्याहार, प्रयास अथवा लौल्यादिका निषेध :- अष्टमास रहि' प्रभु भट्टे विदाय दिला। “विवाह ना करिह” बलि' निषेध करिला ॥ 112 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ पुरीमें आठ मास रहनेके बाद श्रीरघुनाथ भट्टको महाप्रभुने विदायी दी और “विवाह मत करना”-उन्हें ऐसा कहकर निषेध किया॥112॥ अनुभाष्य-श्रीमन्महाप्रभुने रघुनाथभट्टको संसारमें प्रवेश करनेसे पूर्व ही कृष्ण-परायण होते देखकर उन्हें 'अत्याहार'रूप विवाह करके भोगोंके स्थान मायामय संसारमें प्रवेश करनेसे निषेध किया। विषयी पत्नी-परायण सांसारिक लोग गृहव्रत-धर्मको अपनाकर भोक्ता पुरुषाभिमान और भोगबुद्धिके वशीभूत होकर अधिकांश कृष्णसेवाविमुख हो जाते हैं, इसलिये उनकी हरिभक्तिकी सम्भावना बहुत कम होती है॥ 112 ॥ काशीमें जाकर वैष्णवोंकी सेवा करनेका आदेश एवं अनर्थमुक्त श्रीकृष्णसुखतत्पर भागवतसे ही श्रीकृष्णकी सेवाके लिये चिन्मय-भागवत अध्ययन करनेका आदेश :- “वृद्ध माता-पितार याइ' करह सेवन। वैष्णव-पाश भागवत कर अध्ययन ॥ 113 ॥ पुरीमें एकबार आनेका आदेश; कण्ठमाला-प्रसाद देना :- पुनरपि एकबार आसिह नीलाचले।” एत बलि' कण्ठमाला दिला ताँर गले ॥ 114 ॥ अनुवाद- “तुम काशी जाकर अपने वृद्ध [वैष्णव] माता-पिताकी सेवा करना और किसी वैष्णवसे श्रीमद्भागवतका अध्ययन करना तथा तुम एकबार पुनः नीलाचलमें आना।” ऐसा कहकर महाप्रभुने अपने गलेकी माला उतारकर उनके गलेमें डाल दी॥113-114॥ अनुभाष्य-इस स्थानपर जगद्गुरु लोकशिक्षक आचार्य श्रीरघुनाथ भट्टको उपलक्ष्य करके साधकको एकान्तिक परमगौरभक्त वैष्णव पिता-माताको अपनी हरिसेवाके अनुकूलरूपमें सेवा करनेके लिये ही आदेश दिया है; कृष्णभजनके इच्छुक साधकमात्रको ही हरि-गुरु-वैष्णव- विमुख पिता-माताकी सेवा करनेका आदेश नहीं दिया। इस प्रसङ्गमें निम्नलिखित दो श्लोक विचारणीय हैं, (भाः 5/5/18)- “गुरुर्न स स्यात् स्वजनो न स स्यात् पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्। दैवं न तत् स्यात् न पतिश्च स स्यात् न मोचयेद् यः समुपेतमृत्युम्॥” [अर्थात् “भगवद्-सम्बन्धज्ञानके उपदेशके द्वारा जो सामने उपस्थित मृत्युरूपी संसारसे उद्धार नहीं करवा पाते, वे-‘गुरु’ नहीं हैं, वे-‘स्वजन’ नहीं हैं, वे-‘पिता’ नहीं हैं, वे-‘माता’ नहीं हैं, वे-‘देवता’ नहीं हैं, वे-‘पति’ नहीं हैं।”] और (भःरःसिः पूःविः 2/200)- “लौकिकी वैदिकी वापि या क्रिया क्रियते मुने। हरिसेवानुकूलैव सा कार्या भक्तिमिच्छता॥”

[ 13/113-123 तेरहवाँ अध्याय 345 [अर्थात् “हे मुने! जगत्में लौकिकी अथवा वैदिकी जो समस्त क्रियाएँ की जाती हैं, भक्तिको प्राप्त करनेके इच्छुक व्यक्ति उन समस्त क्रियाओंका हरिसेवाके अनुकूलरूपमें ही अनुष्ठान करेंगे।”] व्याकरणके ज्ञाता अवैष्णवसे भागवतको पढ़नेपर जड़ीय काव्यग्रन्थका ही पाठ-श्रवण होता है; क्योंकि ऐसे समस्त पाठक स्वयं ही भागवतके तात्पर्यको समझनेमें समर्थ नहीं होनेके कारण संसार भोग करते हैं, तो वे अन्योंको किस प्रकार अनर्थोंसे मुक्त करानेमें समर्थ होंगे? महाभागवत वैष्णवगण-गृह-बन्धनसे मुक्त होते हैं, इसलिये वे स्वयं ही 'भागवत' होनेके कारण भागवतके वास्तविक अर्थको जाननेवाले और भक्तिके प्रभावसे संसारसे मुक्त हैं॥ 113 ॥ श्रीभट्टको विदायी देना, महाप्रभुके विरहमें श्रीभट्टका क्रन्दन :- आलिङ्गन करि' प्रभु विदाय ताँरे दिला। प्रेमे गर गर भट्ट कान्दिते लागिला॥ 115 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरघुनाथ भट्टको आलिङ्गन करके उन्हें विदायी दी। श्रीरघुनाथ भट्ट भावी विरहके कारण प्रेमके अभिभूत होकर रोने लगे॥ 115 ॥ भक्तोंसे आज्ञा लेकर श्रीरघुनाथका काशीमें आगमन :- स्वरूप-आदि भक्त-ठाञि आज्ञा मागिया। वाराणसी आइला भट्ट प्रभुर आज्ञा पाञा॥ 116॥ काशीमें वैष्णव पण्डितसे भागवतका अध्ययन :- चारिवत्सर घरे पिता-मातार सेवा कैला। वैष्णव-पण्डित-ठाञि भागवत पड़िला॥ 117॥ पिता-माताकी धाम-प्राप्तिके बाद विरक्त होकर पुनः महाप्रभुके निकट पुरीमें आगमन :- पिता-माता काशी पाइले उदासीन हञा। पुनः प्रभुर ठाञि आइला गृहादि छाड़िया॥ 118॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ भट्टने श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंसे भी वाराणसी (काशी) जानेकी अनुमति माँगी। महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीरघुनाथ भट्ट वाराणसी आ गये। उन्होंने चार वर्षोँ तक अपने घरमें रहकर माता-पिताकी सेवा की और एक वैष्णव पण्डितसे श्रीमद्भागवतका अध्ययन किया। अपने माता-पिताके काशीमें देह-त्यागनेके पश्चात् वे विरक्त होकर पुनः अपना घर त्यागकर महाप्रभुके पास श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये॥ 116-118॥ पहलेकी भाँति श्रीरघुनाथका आठ मास तक रहनेके बाद महाप्रभुके द्वारा व्रजमें श्रीरूप-सनातनका सङ्गी बननेका आदेश :- पूर्ववत् अष्टमास प्रभु-पाश छिला। अष्टमास रहि' पुनः प्रभु आज्ञा दिला॥ 119॥ “आमार आज्ञाय, रघुनाथ, याह वृन्दावने। ताँहा याञा रह रूप-सनातन-स्थाने॥ 120॥ वृन्दावनमें नित्यकृत्य कर्त्तव्यका उपदेश :- भागवत पड़, सदा लह कृष्णनाम। अचिरे करिबेन कृपा कृष्ण-भगवान्॥”121॥ अनुवाद-वे पहलेकी भाँति महाप्रभुके पास आठ मास तक रहे। आठ मास रहनेके पश्चात् महाप्रभुने पुनः श्रीरघुनाथ भट्टको आज्ञा दी,-“हे रघुनाथ! तुम वृन्दावन जाओ। वहाँ जाकर तुम रूप-सनातनके सान्निध्यमें रहना। तुम भागवत पढ़ना और सदैव कृष्णनामका जप-कीर्तन करना, भगवान् श्रीकृष्ण शीघ्र ही तुमपर कृपा करेंगे॥”119-121॥ महाप्रभुका कृपालिङ्गन; श्रीरघुनाथकी कृष्णप्रेम-मत्तता :- एत बलि' प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैला। प्रभुर कृपाते कृष्णप्रेमे मत्त हैला॥ 122॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने श्रीरघुनाथ भट्टको आलिङ्गन किया। महाप्रभुकी कृपासे वे कृष्णप्रेममें मत्त हो गये॥ 122॥ जपके लिये तुलसी-माला आदि प्रदान :- चौद्द-हात जगन्नाथेर तुलसीर माला। छुटा-पान-बिड़ा महोत्सवे पाञाछिला॥ 123॥

346 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/123-131 ] अनुवाद-महाप्रभुको भगवान् श्रीजगन्नाथकी चौदह हाथ लम्बी तुलसीकी माला और मसाला-रहित विशेष पानका बीड़ा महोत्सवमें मिला था॥123॥ अनुभाष्य-‘छुटा-पान-बिड़ा,’-मसाला आदि सामग्रीसे रहित अन्य प्रकारका ताम्बुल (पान)॥123॥ श्रीरघुनाथके द्वारा प्रतिदिन मालाकी सेवा :- सेइ माला, छुटा-पान प्रभु ताँरे दिला। 'इष्टदेव' करि' माला धरिया राखिला॥ 124 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरघुनाथ भट्टको वह माला और पानका बीड़ा प्रदान किया और श्रीरघुनाथ भट्टने उस तुलसी-मालाको अपना 'इष्टदेव' मानकर रख लिया॥ 124 ॥ वृन्दावनमें आकर श्रीरूप-सनातनके साथमें रहना :- प्रभुर ठाञि आज्ञा लञा गेला वृन्दावने। आश्रय करिला आसि' रूप-सनातने ॥ 125 ॥ अनुवाद-महाप्रभुसे अनुमति लेकर श्रीरघुनाथ भट्ट वृन्दावन चले गये। उन्होंने वृन्दावन पहुँचकर श्रीरूप गोस्वामी और श्रीसनातन गोस्वामीका आश्रय ग्रहण किया॥ 125 ॥ श्रीरूपप्रभुके निकट रूपानुगवर श्रीरघुनाथके द्वारा भागवत-पाठ :- रूप-गोसाञिर सभाय करेन भागवत-पठन। भागवत पड़िते प्रेमे आउलाय ताँर मन ॥ 126 ॥ श्रीरघुनाथमें अष्टसात्त्विक भाव :- अश्रु, कम्प, गद्गद प्रभुर कृपाते। नेत्र रोध करे वाष्प, ना पारेन पड़िते ॥ 127 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ भट्ट श्रीरूप गोस्वामीके सान्निध्यमें श्रीमद्भागवतका पाठ करने लगे। श्रीमद्भागवतको पढ़ते समय उनका मन प्रेममें व्याकुल हो जाता। भागवतका पाठ करते समय महाप्रभुकी कृपासे उनके नेत्रोंसे अश्रुओँकी धारा, शरीरमें कम्पन और कण्ठ गद्गद हो जाता। नेत्रोंमें अश्रु भर जानेके कारण दिखना बन्द होनेपर वे श्रीमद्भागवतको पढ़ नहीं पाते थे॥ 126-127 ॥ अनुभाष्य- 'आउलाय,'-अलग्न, शिथिल, आकुल, अस्थिर, उन्मत्त होना ॥ 126 ॥ अतीव मधुर कण्ठवाले श्रीभट्टगोस्वामी :- पिकस्वर-कण्ठ, ताते रागेर विभाग। एकश्लोक पड़िते फिराय तिन-चारि राग ॥ 128 ॥ श्रीकृष्ण-स्मरणमें आत्मविस्मृत श्रीरघुनाथ :- कृष्णेर सौन्दर्य-माधुर्य यबे पड़े, शुने। प्रेमेते विह्वल तबे, किछुइ ना जाने ॥ 129 ॥ अनुवाद-कोयलके स्वरकी भाँति उनका मधुर कण्ठ था, उसपर भी वे अनेक प्रकारके रागोंमें अलाप करते थे। वे श्रीमद्भागवतके एक-एक श्लोकको तीन-चार प्रकारके रागोंमें पढ़ते थे। वे जब भी श्रीकृष्णके सौन्दर्य और माधुर्यके विषयमें पढ़ते अथवा सुनते, वे प्रेममें भाव-विभोर हो जाते, उन्हें अन्य किसी वस्तुका ज्ञान ही नहीं रहता ॥ 128-129 ॥ एकमात्र श्रीगोविन्दमें समर्पित प्राण श्रीरघुनाथ :- गोविन्द-चरणे कैला आत्मसमर्पण। गोविन्द-चरणारविन्द-याँर प्राणधन ॥ 130 ॥ अपने शिष्यके द्वारा श्रीगोविन्द-मन्दिर और विग्रहके आभूषणादिका निर्माण :- निज शिष्ये कहि' गोविन्देर मन्दिर कराइला। वंशी, मकर, कुण्डलादि 'भूषण' करि' दिला ॥ 131 ॥ अनुवाद-उन्होंने भगवान् श्रीगोविन्ददेवके श्रीचरणकमलोंमें आत्मसमर्पण कर दिया था। भगवान् श्रीगोविन्ददेवके चरणकमल ही उनके प्राणधन थे। उन्होंने अपने शिष्यसे कहकर भगवान् श्रीगोविन्ददेवका मन्दिर बनवाया। उन्होंने श्रीगोविन्ददेवके लिये वंशी,

[ 13/130-137 तेरहवाँ अध्याय 347

मकरके आकारके कुण्डलादि आभूषण बनवाकर दिये॥ 130-131॥

महाभागवत श्रेष्ठ विरक्तकुलचुड़ामणि श्रीरघुनाथभट्ट गोस्वामी :- ग्राम्यवार्त्ता ना शुने, ना कहे जिह्वाय। कृष्णकथा-पूजादिते अष्टप्रहर याय॥ 132॥

श्रीरघुनाथकी अन्योंकी निन्दादि-शून्यता, सर्वत्र कृष्णभक्त दर्शन और अनुभूति :- वैष्णवेर निन्द्य-कर्म नाहि पाड़े काणे। सबे कृष्ण भजन करे, - एइमात्र जाने॥ 133॥

अनुवाद-वे सांसारिक बातोंको न तो सुनते थे और न ही अपनी जिह्वासे वैसी बात कहते थे। भगवान् श्रीकृष्णकी कथा-पूजा आदिमें ही उनके आठों प्रहर व्यतीत हो जाते। वे कभी भी अपने कानोंसे किसी वैष्णवकी निन्दाको नहीं सुनते थे। वे केवल इतना जानते थे कि सभी श्रीकृष्णका भजन कर रहे हैं॥ 132-133॥

अनुभाष्य- 'वैष्णवेर निन्द्य-कर्म', -जिस अनुष्ठानके द्वारा वैष्णवताकी हानि होती है अर्थात् कृष्णभजनविमुखता और स्त्री-सङ्ग-ये वैष्णवोंके लिये दो प्रकारके दूषणीय विषय हैं। ये दो विषय वैष्णवताके विरुद्ध हैं। वैष्णव-आचार्योंका कर्त्तव्य है कि वे उपदेश देकर अपने आश्रित हरिभजनके उन्मुख वैष्णवों अथवा कृपापात्रोंकी रक्षाका प्रयास करें जिससे ये दो दुराचार उन्हें भजनसे विमुख नहीं करवा सकें। रघुनाथ भट्टका मध्यमाधिकारी भागवतकी भाँति किसी भी अश्रद्धालुके निन्दनीय चरित्रको शोधित करनेका प्रयास नहीं था। वे जानते थे कि सभी कृष्णभजन करते हैं अर्थात्- “केह माने, केह ना माने, सब ताँर दास। ये ना माने, तार हय सेइ पापे नाश॥” (आदिलीला 6/83) [“कोई माने अथवा ना माने, सब उनके दास हैं। जो यह नहीं मानता है, इस पापके (अपराधके) कारण उसका नाश हो जाता है।”]॥ 133 ॥

श्रीरघुनाथकी कृष्णस्मरणकी प्रक्रिया :- महाप्रभुर दत्त माला मननेर काले। प्रसाद-कड़ार-सह बान्धि' लेन गले॥ 134॥

अनुवाद-वे श्रीकृष्णके स्मरणके समय महाप्रभुके द्वारा दी गयी मालाको श्रीजगन्नाथजीके प्रसादी चन्दन आदिके साथ बाँधकर गलेमें धारण कर लेते थे॥ 134॥

अनुभाष्य- 'मननेर काले',-स्मरणके समयमें॥ 134॥

तेरहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।

श्रीरघुनाथका निरन्तर कृष्णप्रेम :- महाप्रभुर कृपाय कृष्णप्रेम अनर्गल। एइ त' कहिलुँ ताते चैतन्य-कृपाफल॥ 135॥

अनुवाद-इस प्रकार मैंने श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीके प्रति श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपाके फलके विषयमें वर्णन किया है जिसके द्वारा श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीमें निरन्तर कृष्णप्रेम उमड़ता था॥ 135 ॥

इस अध्यायमें वर्णित विषयोंकी संक्षेपमें पुनरुक्ति :- जगदानन्देर कहिलुँ वृन्दावन-गमन। तार मध्ये देवदासीर गान-श्रवण॥ 136 ॥

महाप्रभुर रघुनाथे कृपा-महाफल। एक परिच्छेदे तिन कथा कहिलुँ सकल॥ 137॥

अनुवाद-मैंने इस अध्यायमें श्रीजगदानन्द पण्डितके वृन्दावन जानेके विषयमें, बीचमें महाप्रभुके द्वारा एक देवदासीके गानको श्रवण करनेके प्रसङ्ग और श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीपर महाप्रभुकी कृपाके महाफलका वर्णन किया। इस प्रकार मैंने इस एक अध्यायमें तीन प्रसङ्गोंका वर्णन किया है॥ 136-137॥

348 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/138-139 ] श्रीगौर और श्रीगौरभक्तकथाके श्रवणसे इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे जगदानन्द- श्रीगौरकी कृपासे श्रीकृष्णप्रेमका उदय :- वृन्दावन-गमनं नाम त्रयोदशः परिच्छेदः । ये इसकल कथा सुने श्रद्धा करि'। ताँरे कृष्णप्रेमधन देन गौरहरि ॥ 138 ॥ अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी अनुवाद—जो व्यक्ति इन समस्त कथाओंका श्रद्धापूर्वक कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका श्रवण करता है उसे श्रीगौरहरि कृष्णप्रेमरूपी धन प्रदान वर्णन कर रहा है ॥ 139 ॥ करते हैं ॥ 138 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें जगदानन्द-वृन्दावन-गमन चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 139 ॥ नामक तेरहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।

चौदहवाँ अध्याय

कथासार—महाप्रभुका श्रीकृष्णविरहमें अधिरूढ़- दिव्योन्माद प्रलाप वर्णित हो रहा है। जिस समय महाप्रभु गरुड़-स्तम्भके निकट खड़े होकर श्रीजगन्नाथका दर्शन कर रहे थे, कोई एक वृद्धा उड़िया स्त्री उनके कन्धेपर पैर रखकर महा-आर्त्तिके साथ श्रीजगन्नाथको देखने लगी, श्रीगोविन्द उसे मना करनेका प्रयास करने लगे। महाप्रभु उसकी आर्त्तिकी प्रशंसा करके महाप्रेम प्रकाशित करने लगे। पहले महाप्रभुको प्रेममय अवस्थाके समय श्रीकृष्णका दर्शन हो रहा था, किन्तु इस स्त्रीके द्वारा ऐसा करनेपर महाप्रभु बाह्यदशामें आ जानेके कारण श्रीकृष्णको नहीं देखकर श्रीजगन्नाथ, बलदेव और सुभद्राको देखने लगे। स्वप्नमें प्राप्त कृष्णदर्शनको खो देनेपर महाप्रभुमें रागका उदय हुआ; उसके कारण उन्होंने स्वयंको योगीकी उपमा दी; और उस योगीभावमें किस प्रकार उनका वृन्दावन-वास हो रहा है, उसका वर्णन किया। समय-समयपर प्रसिद्ध दस दशाएँ महाप्रभुमें उपस्थित होने लगीं। एकदिन महाप्रभु तीन द्वार बन्द करके रात्रिमें भीतरके प्रकोष्ठमें सो रहे थे, कुछ समयके बाद श्रीगोविन्द और श्रीस्वरूपने देखा, —द्वार सब बन्द हैं, किन्तु महाप्रभु दिखायी नहीं दे रहे! ऐसा देखकर श्रीस्वरूपादि भक्तोंको सिंहद्वारकी उत्तर-दिशामें महाप्रभु अस्थियोंके जोड़ खुल जानेसे महा-दीर्घाकार और अचेतन अवस्थामें मिले। श्रीस्वरूपादि भक्त कृष्णनाम करते करते महाप्रभुके चेतन होनेपर उन्हें पुनः घरपर ले गये। अन्य किसी समय चटक-पर्वतमें गोवर्धनके भ्रमवशतः द्रुतगतिसे जाते-जाते स्तम्भित होकर कदम्बकी भाँति महाप्रभुकी रोमावली खड़ी होने आदि महाभावयुक्त एक दशा दिखलायी दी थी; तब भक्तगण हरिनाम-कीर्तन करके उन्हें शीतल करके घर ले आये। —(अमृतप्रवाह भाष्य)

महाप्रभुके विप्रलम्भ रसमें अधिरूढ़ महाभाव-वशतः दिव्योन्माद (उद्घूर्णा और चित्रजल्पादि)का वर्णन :— कृष्णविच्छेदविभ्रान्त्या मनसा वपुषा धिया। यद्यद्व्यधत्त गौराङ्गस्तल्लेशः कथ्यतेऽधुना ॥ 1 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौराङ्गचन्द्रने कृष्णवियोगमें भ्रमके द्वारा [सङ्कल्प-विकल्पात्मक] मन, [निश्चयात्मिका] बुद्धि और शरीरके द्वारा जो-जो कार्य किये थे, अब मैं उनका कुछ-कुछका वर्णन कर रहा हूँ॥ 1 ॥

अनुभाष्य— गौराङ्गः कृष्णविच्छेदविभ्रान्त्या (कृष्णस्य विच्छेदेन विरहेण या विभ्रान्तिः भ्रममयी चेष्टा तया सङ्कल्पविकल्पात्मकेन) मनसा वपुषा (देहेन) धिया (निश्चयात्मिकया बुद्ध्या) यत् यत् (अनुष्ठानं) व्यधत्त (चेष्टादिकं चकार), अधुना (साम्प्रतं) तल्लेशः (यत्किञ्चित्) कथ्यते (उच्यते)।

श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥

जय जय श्रीचैतन्य स्वयं भगवान्। जय जय गौरचन्द्र भक्तगण-प्राण ॥ 2 ॥

अनुवाद—स्वयं भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। भक्तोंके प्राण-स्वरूप श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो॥ 2 ॥

जय जय नित्यानन्द चैतन्य-जीवन। जयाद्वैताचार्य जय गौरप्रियतम ॥ 3 ॥

350 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/3-8 ] अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके जीवन-स्वरूप केवल वे ही उसे समझकर उसका वर्णन कर सकते श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीगौरहरिके हैं॥ ६॥ प्रियतम श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो॥ ३॥ श्रीस्वरूप और श्रीरघुनाथ-इन दो प्रभुओंका कड़चा ही चैतन्यचरित-वर्णन करनेके लिये गौरलीलाको वर्णित करनेका मूल-ग्रन्थ :— गौरभक्तोंसे कृपा-याचना :— स्वरूप-गोसाञि आर रघुनाथ-दास। जय स्वरूप, श्रीवासादि प्रभुभक्तगण। एइ दुइर कड़चाते ए-लीला प्रकाश ॥ ७॥ शक्ति देह',—करि येन चैतन्यवर्णन ॥ ४॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी और श्रीरघुनाथदास अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीवासादि महाप्रभुके गोस्वामी—इन दोनोंके कड़चामें ही महाप्रभुकी विरह-उन्मादकी भक्तोंकी जय हो। आप मुझे शक्ति प्रदान करें, जिससे दशाकी गम्भीर लीलाओंका प्रकाश हुआ है॥ ७॥ मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंका वर्णन कर सकूँ॥ ४॥ अनुभाष्य—श्रीदामोदर-स्वरूप और श्रीरघुनाथदास गौरकृपाके बिना महाविद्वान् व्यक्तिके लिये भी महाप्रभुके गोस्वामीके कड़चा अर्थात् निदर्शन-ज्ञापिका (प्रमाणित अप्राकृत दिव्योन्मादको समझनेमें असमर्थता :— करनेवाली) टिप्पणियोंमें ही महाप्रभुकी इन गम्भीर प्रभुर विरहोन्माद-भाव—गम्भीर। लीलाओंके उद्देश्य सूचित हुए हैं। जो इन दो बुझिते ना पारे केह, यद्यपि हय 'धीर' ॥ ५॥ गौरपार्षदोंके श्रीचरणोंका परित्याग करके अपनी-अपनी अनुवाद—महाप्रभुका विरह-उन्मादरूपी भाव अत्यन्त इन्द्रियोंके सुखकी लालसासे मायामय संसारमें, गौरभक्तिका गम्भीर है, प्राकृत बुद्धिमान व्यक्ति भी उसे नहीं समझ नाम लेकर मनोधर्मके द्वारा चालित होकर 'रङ्ग-बिरङ्ग' सकता ॥ ५॥ जैसे घूमते रहते हैं, वे श्रीमहाप्रभुकी लीलाको समझनेमें असमर्थ होकर गौरसेवासे विमुख होते हैं॥ ७॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुके कृष्णविरहसे उत्पन्न अप्राकृत अलौकिक गम्भीर उन्माद-भावको बुद्धिमान् व्यक्ति श्रीस्वरूप और श्रीरघुनाथ-दोनों प्रभुओंके अपने-अपने अक्षजज्ञानके द्वारा नहीं समझ पायेंगे। प्रमाणिक होनेका कारण :— वर्तमान समयमें नये भक्त-अभिमानियोंमें भक्तिसिद्धान्त- सेकाले ए दुइ रहेन महाप्रभुर पाशे। विरुद्ध व्यभिचारी 'नदीया-नागरी'-भाव और विष्णुप्रियादेवीकी आर सब कड़चा-कर्त्ता रहेन दूरदेशे ॥ ८॥ अभिनव कल्पित उपासना उनके गौरलीलामें प्रवेशके अभावको ही प्रकाशित करते हैं॥ ५॥ अनुवाद—महाप्रभुकी जब जगन्नाथ पुरीमें विरह-उन्मादकी दशा प्रकाशित हो रही थी, उस समय महाप्रभुकी कृपाके बलसे ही महाप्रभुकी श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरघुनाथदास गोस्वामी ही उनके अप्राकृत-लीलाकी उपलब्धि :— साथ रहते थे। अपने-अपने कड़चामें महाप्रभुकी बुझिते ना पारि याहा, वर्णिते के पारे? लीलाओंको लिखनेवाले अन्य सभी भक्त अन्यान्य दूर सेइ बुझे, वर्णे, चैतन्य शक्ति देन याँरे ॥ ६॥ स्थानोंपर रहते थे॥ ८॥ अनुवाद—महाप्रभुके भावोंकी गम्भीरता जो समझ अनुभाष्य—इस पद्यसे यह जाना जाता है कि ही नहीं सकता, वह उसका कैसे वर्णन कर सकता श्रीरघुनाथ और अन्यान्य अनेक भक्तोंने महाप्रभुकी है? श्रीचैतन्य महाप्रभु जिन्हें शक्ति प्रदान करते हैं, अन्तिम दिव्योन्माद-लीलाके सम्बन्धमें बहुत-सी कथाएँ

[ 14/8-12 चौदहवाँ अध्याय 351 अपने-अपने द्वारा रचित कड़चा-ग्रन्थोंमें लिखकर रखी थीं और उनके द्वारा जगत्का परम उपकार साधित होता। यह दुःखका विषय है कि वे सब कड़चा आज तक भी लोगोंके नेत्रोंके अगोचर रहकर जीवोंके दुर्भाग्यका ही परिचय प्रदान कर रहे हैं॥ 8 ॥ क्षणे क्षणे अनुभवि' एइ दुइ जन। संक्षेपे बाहुल्ये करेन कड़चा-ग्रन्थन ॥ ९॥ अनुवाद-महाप्रभुकी विरह-उन्माद दशाकी क्षण-क्षणकी लीलाओंको अनुभव करके श्रीस्वरूप दामोदर अपने कड़चामें उनको संक्षेपमें और श्रीरघुनाथदास गोस्वामी अपने कड़चामें उनको विस्तृतरूपमें लिखते थे ॥ ९॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'संक्षेपे बाहुल्ये', – स्वरूप-गोस्वामीने संक्षेपमें एवं रघुनाथदास-गोस्वामीने विस्तृत रूपसे कड़चाकी रचना की है॥ 9 ॥ अनुभाष्य-इन दो गोस्वामियोंने महाप्रभुकी लीलाओंको सदैव अनुभव करके उन लीलाओंकी थोड़ी-बहुत कड़चाके आकारमें रचना की है, परन्तु यथारीति (प्रचलित प्रथाके अनुकूल) ग्रन्थकी रचना नहीं की ॥ 9 ॥ स्वरूप- 'सूत्रकर्त्ता', रघुनाथ- 'वृत्तिकार' । तार बाहुल्य वर्णि-पाँजि-टीका-व्यवहार ॥ 10 ॥ अनुवाद - श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुकी लीलाओंके सूत्रकर्त्ता (सूत्ररूपमें लिखनेवाले) और श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी उन लीलाओंके वृत्तिकार (विस्तारसे लिखनेवाले) थे। मैं उन दोनों कड़चाके भावोंको ही कुछ विस्तार करके अब लिख रहा हूँ, जैसे रूईको धुननेसे वह कुछ फूल जाती है ॥ 10 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीस्वरूप गोस्वामीने सूत्र और श्रीरघुनाथने उनकी वृत्ति लिखी है; मैं उन दोनोंके द्वारा वर्णित विषयको ही थोड़ा-सा विस्तृत करके पाँजिटीकाकी (प्रस्तावनाकी) भाँति लिख रहा हूँ। 'पाँजिटीका' अथवा 'पञ्जितीका'का अर्थ यह है कि वृत्तिकारके मूल आकर-ग्रन्थके (ग्रन्थ जिसमें अनेक तथ्योंका विवरण दिया हो) विचारोंको रूईकी भाँति धुनकर कुछ वर्धित करके वर्णन किया गया है ॥ 10 ॥ अनुभाष्य- 'सूत्र',- “स्वल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद् विश्वतोमुखम्। अस्तोभमनवद्यञ्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥” [अर्थात् “सूत्र-बहुत कम अक्षरोंसे युक्त, सन्देहरहित, सारवान्, सर्वतोगामी (जिसका सम्पूर्ण ग्रन्थमें सर्वत्र अधिकार है), सफल और निर्दोष वचनोंको ही पण्डितगण 'सूत्र' कहते हैं।”] 'वृत्ति', – वृत्तिका अर्थ कारिका है; “कारिका यातना-वृत्त्योः” इत्यमरः ; [अर्थात् “अमरकोषमें 'कारिका'का अर्थ नरक-यातना और श्लोक कहा गया है।”] उसकी टीकामें- “संक्षेपेण श्लोकैर्विवरणं वृत्तिः ॥” [उसकी टीकामें कहा गया है, - “संक्षेपमें श्लोकसमूहके द्वारा विवरण ही 'वृत्ति' है।”] ॥ 10 ॥ अप्राकृत श्रद्धाके साथ अप्राकृत विप्रलम्भ-भाव श्रवण करके उसके अनुसरणसे ही प्रेमकी प्राप्ति :- ताते विश्वास करि' शुन भावेर वर्णन। हइबे भावेर ज्ञान, पाइबा प्रेमधन ॥ 11 ॥ अनुवाद-कृपापूर्वक आप सभी विश्वासके सहित महाप्रभुके विरह-उन्मादरूपी भावोंके वर्णनको श्रवण करें। इससे आपको विरह-उन्मादरूपी भावका ज्ञान होगा और आप प्रेमरूपी धनको प्राप्त करेंगे ॥ 11 ॥ अन्तर-दशामें महाप्रभुके हृदयमें कृष्णविरहिणी श्रीराधादि गोपियोंके भावोंका उदय, अन्तिम सात अध्यायोंमें ही 'गौरनागरवाद' का खण्डन :- कृष्ण मथुराय गेले गोपीर ये-दशा हैल। कृष्णविच्छेदे प्रभुर से-दशा उपजिल ॥ 12 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके मथुरा चले जानेपर गोपियोंकी जो सुदीर्घ विप्रलम्भमयी दशा हुई थी, श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुकी भी वैसी दशा उत्पन्न हुई ॥ 12 ॥

352 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/12-16 ] अनुभाष्य—'ये-दशा हैल',—सुदीर्घ विप्रलम्भ ॥ 12 ॥ उद्धव-दर्शने यैछे राधार विलाप। क्रमे क्रमे हैल प्रभुर से उन्माद-विलाप ॥ 13 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका सन्देश लेकर व्रजमें आनेपर उद्धवको देखकर जैसे श्रीराधाका विलाप था, महाप्रभु भी क्रमशः उसी प्रकारका उन्माद-विलाप करने लगे॥ 13 ॥ अनुभाष्य—'राधार विलाप',—भाः (10/47/12-21) श्लोकोंमें भ्रमरगीत देखें ॥ 13 ॥ कृष्णविरहिणी श्रीराधाके भावमें ही विभावित महाप्रभु, इसलिये उनमें कृष्णसे सम्भोग-आङ्काङ्क्षा-वृत्तिका अभाव :— राधिकार भावे प्रभुर सदा 'अभिमान'। सेइ भावे आपनाके हय 'राधा'-ज्ञान ॥ 14 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सदा श्रीराधिकाके भावमें ही विभावित रहते थे, उस भावको वे अपना भाव ही मानते थे, इसलिये वे स्वयंको श्रीराधा ही समझते थे॥ 14 ॥ अनुभाष्य—अभिमान—(उःनीः)— “अभिमानो निजप्रेमोत्कर्षाख्यानं तु भङ्गितः।”—(उःनीः 9/23) [अर्थात् “भङ्गिमापूर्वक स्वपक्षके प्रेमके उत्कर्षका वर्णन ही 'अभिमान' कहलाता है।”] “सन्तु रम्याणि भूरीणि प्रार्थ्यं स्यादिदमेव सः। इति यो निर्णयो धीरैरभिमानः स उच्यते॥”—(उःनीः 14/19) [अर्थात् “ 'संसारमें नाना प्रकारकी मनोरम वस्तुएँ हैं, वे रहें, किन्तु मेरे लिये केवल यही प्रार्थनीय हैं'—इस प्रकार स्थिरीकरणको पण्डितगण 'अभिमान' कहते हैं।”] 'सदा अभिमान',—सर्वदा अप्राकृत सेवकाभिमान। यद्यपि श्रीगौरसुन्दर—स्वयं कृष्ण हैं, तथापि श्रीमती राधिका-सम्मिलित तनु होनेके कारण सर्वदा श्रीमतीके भावमें अभिन्न भावसे निमग्न थे। सम्भोगमय श्रीकृष्णभावमें अवस्थित होनेसे उन्हें अपने उद्देश्यकी सिद्धिमें बाधा होती। वर्तमान समयमें श्रीगौरविद्वेषी अवैष्णव विपरीत बुद्धिसे उनके द्वारा आचरित और प्रचारित भजन-प्रणालीके विचारोंको उलटा समझकर, श्रीगौरसुन्दरको अपनी मनगढ़न्त कल्पनाके द्वारा 'प्राकृत नागर' बनाकर, स्वयंको 'रङ्गेर नदीयानागरी' कहकर कृष्णभक्तिसे विच्युत हो रहे हैं। वर्तमान समयमें 'Theosophist अर्थात् ब्रह्मविद्यावादी'-सम्प्रदायके कुछ व्यक्ति ऐसा मानते हैं कि श्रीगौरसुन्दर तो स्वयं भगवान् हैं और उनके द्वारा जीवोंके मङ्गलके लिये 'विप्रलम्भ साधनको ही सिद्धिका एकमात्र पथ' कहकर प्रदर्शित करनेपर भी वह पथ जीवोंके लिये दुर्लभ है। अतएव जिस जीवकी जैसी इच्छा है, वह उसीके अनुरूप उपादानसे श्रीगौरसुन्दरको बनाकर और सजाकर इन्द्रियतर्पण-परायण अपने-अपने मनोकल्पित उपादान अर्थात् जिस किसी भी प्रकारके उपायसे भजन कर सकता है। इसका निषेध करते हुए श्रीगौरसुन्दरने अप्राकृत-विप्रलम्भभावमें कृष्णसेवाकी परम चमत्कारिताको प्रदर्शित करके जगत्का मङ्गल विधान किया है ॥ 14 ॥ महाप्रभुका अधिरूढ़-महाभावमें दिव्योन्माद :— दिव्योन्मादे ऐछे हय, कि इहा विस्मय ? अधिरूढ़-भावे दिव्योन्माद-प्रलाप हय ॥ 15 ॥ अनुवाद—दिव्योन्माद अवस्थामें ऐसा ही होता है, इसमें आश्चर्यकी क्या बात है ? अधिरूढ़ भावमें दिव्योन्माद-प्रलाप ही होता है ॥ 15 ॥ दिव्योन्मादकी संज्ञा और उसके प्रकारका भेद :— उज्ज्वलनीलमणिमें स्थायिभाव-प्रकरणमें (190) श्लोक— एतस्य मोहनाख्यस्य गतिं कामप्युपेयुषः। भ्रमाभा कापि वैचित्री दिव्योन्माद इतीर्यते। उद्घूर्णा-चित्रजल्पाद्यास्तद्भेदा बहवो मताः ॥ 16 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 16 ॥

[ 14/16-24 चौदहवाँ अध्याय 353 अमृतप्रवाह भाष्य—मोहनाख्य-भावकी किसी प्रकारकी अवस्थामें भ्रमकी आभा होनेपर 'वैचित्री'-नामक दिव्योन्मादका उदय होता है। उद्घूर्णा और चित्रजल्पादि—दिव्योन्मादके बहुतसे विशेष भेद हैं॥ 16॥ अनुभाष्य— कामपि (अनिर्वचनीयां) गतिम् (अवस्थाम्) उपेयुषः (प्राप्तस्य) सतः एतस्य मोहनाख्यस्य (मोहनम् आख्या यस्य तस्य) भ्रमाभा (भ्रमस्य इव आभा यस्याः सा) कापि (अपूर्वा) वैचित्री (चमत्कारिता-प्रतिपादिका-वृत्तिविशेषरूपा) दिव्योन्मादः इति ईर्य्यते (कथ्यते); उद्घूर्णाचित्रजल्पाद्याः बहवः तद्भेदाः (दिव्योन्मादभेदाः) मताः (कथिताः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 16॥ श्रीराधाकी दासीके अभिमानमें महाप्रभुके दिव्योन्माद (उद्घूर्णा) का दृष्टान्त :— एकदिन महाप्रभु करियाछेन शयन। कृष्ण रासलीला करे,—देखिला स्वपन॥ 17॥ त्रिभङ्ग-सुन्दर-देह, मुरलीवदन। पीताम्बर, वनमाला, मदनमोहन॥ 18॥ मण्डलीबन्धे गोपीगण करेन नर्त्तन। मध्ये राधासह नाचे व्रजेन्द्रनन्दन॥ 19॥ देखि' प्रभु सेइ रसे आविष्ट हैला। 'वृन्दावने कृष्ण पाइनुं'—एइ ज्ञान कैला॥ 20॥ अनुवाद—एकदिन जब महाप्रभु शयन कर रहे थे, तब उन्होंने स्वप्नमें देखा कि श्रीकृष्ण रासलीला कर रहे हैं। श्रीकृष्णकी त्रिभङ्ग-सुन्दर देह है, उनके मुखपर मुरली विद्यमान है, उन्होंने पीताम्बर धारण किया हुआ है, उनके गलेमें वनमाला है और वे मदनको (कामदेवको) भी मोहित करनेवाले हैं। गोपियाँ मण्डलाकारमें नृत्य कर रही हैं और उनके मध्यमें श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीराधाके साथ नृत्य कर रहे हैं। इस लीलाको देखकर महाप्रभु उस रसमें आविष्ट हो गये और उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ—'मुझे वृन्दावनमें कृष्ण प्राप्त हुए हैं।'॥ 17-20॥ अनुभाष्य—'रसे आविष्ट हैला',—तन्मयता प्राप्त कर ली॥ 20॥ जागृत-अवस्थामें (बाह्यदशामें) महाप्रभुका कृष्ण-विच्छेदमें दुःख :— प्रभुर विलम्ब देखि' गोविन्द जागाइला। जागिले 'स्वप्न'-ज्ञान हैल, प्रभु दुःखी हैला॥ 21॥ अनुवाद—प्रातःकालमें महाप्रभुके उठनेमें देर होते देखकर श्रीगोविन्दने उन्हें जगाया। जागृत होनेपर महाप्रभु यह जानकर कि रासलीलामें उन्हें जो कृष्ण मिले थे, वह स्वप्न था, इसलिये वे बहुत दुःखी हुए॥ 21॥ अभ्यासवशतः नित्यकृत्य करना :— देहाभ्यासे नित्यकृत्य करि' समापन। काले याइ' कैला जगन्नाथ-दरशन॥ 22॥ अनुवाद—परन्तु महाप्रभुने अभ्यासवशतः देहसे सम्बन्धित नित्यकृत्य समाप्त करके समयपर जाकर भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन किया॥ 22॥ गरुड़-स्तम्भसे महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ-दर्शन :— यावत्काल दर्शन करेन गरुड़ेर आगे। प्रभुर आगे दर्शन करे लोक लाखे लाखे॥ 23॥ अनुवाद—जिस समय महाप्रभु गरुड़ स्तम्भके पीछे खड़े होकर भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन कर रहे थे, उस समय महाप्रभुके आगे खड़े होकर लाखों-लाखों लोग भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन कर रहे थे॥ 23॥ एक उड़िया स्त्रीके द्वारा अनजानेमें महाप्रभुके कन्धेपर पैर रखकर श्रीजगन्नाथ-दर्शन :— उड़िया एक स्त्री भीड़े दर्शन ना पाञा। गरुड़े चड़ि' देखे प्रभुर स्कन्धे पद दिया॥ 24॥ अनुवाद—एक उड़िया स्त्री भीड़में भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन नहीं कर पानेके कारण गरुड़-स्तम्भपर चढ़ गयी

354 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/24-30 ] और वह अपना एक पैर महाप्रभुके कन्धेपर रखकर जगन्नाथजीके दर्शन करने लगी ॥ 24 ॥ यह देखकर श्रीगोविन्दके द्वारा उस स्त्रीको मना करना :- देखिया गोविन्द व्यस्ते सेइ स्त्रीरे वर्जिला। तारे नामाइते प्रभु गोविन्दे निषेधिला ॥ 25 ॥ अनुवाद—यह देखकर श्रीगोविन्दने तुरन्त उस स्त्रीको ऐसा करनेसे मना किया। किन्तु महाप्रभुने श्रीगोविन्दको उस स्त्रीको नीचे उतारनेके लिये मना किया ॥ 25 ॥ अनुभाष्य—गरुड़के ऊपर चढ़नेसे वैष्णवापराध और महाप्रभुके कन्धेके ऊपर पैर रखनेसे भगवान्‌के चरणकमलोंमें अपराध—इस आशङ्कासे शीघ्रतापूर्वक गोविन्दने उस स्त्रीको मना किया अर्थात् उसे नीचे उतार दिया ॥ 25 ॥ कृष्णदर्शनके द्वारा कृष्णके सेवासुखका विधान करने हेतु स्त्री-मूर्तिको अप्राकृत कृष्णभक्त मानना :- “'आदिवस्या' एइ स्त्रीरे ना कर वर्जन। करुक यथेष्ठ जगन्नाथ-दरशन ॥” 26 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा, —“दर्शनके लिये अतिव्यग्र इस स्त्रीको ऐसा करनेसे मत रोको, उसे जी भरकर भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करने दो॥” 26 ॥ अनुभाष्य—'आदिवस्या',—अन्त्यलीला 10/116 संख्या देखें ॥ 26 ॥ उस स्त्रीका तत्क्षणात् नीचे उतरना और महाप्रभुको प्रणाम करके अपनी दैन्यरूपी उक्तिका ज्ञापन :- आस्ते-व्यस्ते सेइ नारी भूमेते नामिला। महाप्रभुरे देखि' ताँर चरण वन्दिला ॥ 27 ॥ अनुवाद—उस स्त्रीको अपने कियेका जब ज्ञान हुआ, तब वह तुरन्त ही नीचे उतर गयी और उसने महाप्रभुको देखकर उनके चरणकमलोंकी वन्दना की ॥ 27 ॥ उसकी प्रेम भरी उत्कण्ठाको देखकर उसे गुरु मानकर महाप्रभुके द्वारा दैन्यपूर्वक स्तुति :- तार आर्त्ति देखि' प्रभु कहिते लागिला। “एत आर्त्ति जगन्नाथ मोरे नाहि दिला ! ! 28 ॥ अनुवाद—उस स्त्रीकी भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शनोंके लिये उत्कण्ठा देखकर महाप्रभु कहने लगे, —“मुझे भगवान् जगन्नाथने अपने दर्शनके लिये इतना आग्रह प्रदान नहीं किया ! ! 28 ॥ अनुभाष्य—'आर्त्ति',—दर्शनका आग्रह; जगन्नाथके दर्शनके आग्रहके कारण [उस स्त्रीने] हित-अहितके विचारसे रहित होकर परम-वन्दनीय महाप्रभुके उत्तम अङ्गपर अनजानेमें चरण रखा था ॥ 28 ॥ इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञानके द्वारा श्रीकृष्णके सेवकको 'स्त्री-पुरुषादि' रूपी बाह्य परिचयसे देखनेके निषेधकी शिक्षा देना :- जगन्नाथे आविष्ट इहार तनु-मन-प्राणे। मोर स्कन्धे पद दियाछे, ताहा नाहि जाने ॥ 29 ॥ अनुवाद—इस स्त्रीके देह-मन और प्राण भगवान् श्रीजगन्नाथमें इतने आविष्ट हैं कि इसे यह तक भी पता नहीं चला कि इसने मेरे कन्धेपर अपना पैर रखा है॥ 29 ॥ अहो भाग्यवती एह, वन्दि इहार पाय। इहार प्रसादे ऐछे आर्त्ति आमार वा हय ! ! 30 ॥ अनुवाद—अहो ! यह परम सौभाग्यशालिनी है, मैं इसके चरणोंकी वन्दना करता हूँ। मुझमें भी इसकी कृपासे ऐसी उत्कण्ठा उत्पन्न हो ! ! 30 ॥ अमृताणुकणिका—महाप्रभु विचार कर रहे हैं कि यदि उस स्त्रीके समान मेरा आवेश हो, तो मेरा जीवन धन्य हो जाय। ऐसा ही आवेश जीवनका प्रयोजन होना चाहिये। इसे सिखलानेके लिये महाप्रभुने कहा कि श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये उस स्त्रीमें इतना आवेश आ

[ 14/30-36 चौदहवाँ अध्याय 355

गया था कि उसे यह भी नहीं पता चला कि वह स्तम्भ लकड़ीका है अथवा पत्थरका और उसका पैर किसके ऊपर है। वह तो आविष्ट होकर दर्शन करने लगी और जब आवेश समाप्त हो गया और उसे बाहरी ज्ञान आया, तब उसने महाप्रभुकी वन्दना की। महाप्रभु जब देवदासीके द्वारा गीत-गोविन्दका गान सुनकर उसकी ओर दौड़े, तब उन्हें काँटों अथवा मेड़का कोई ज्ञान नहीं था। उस समय क्या उस देवदासीमें ऐसा आवेश था अथवा महाप्रभुमें आवेश था? महाप्रभुमें आवेशके विषयमें सुना जाता है, किन्तु उस स्त्रीमें कोई आवेश नहीं था। इसलिये यदि महाप्रभु उसे स्पर्श कर लेते, तो फिर वे अपने प्राण त्याग देते। परन्तु श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये आविष्ट उस वृद्धा स्त्रीके चरणका स्पर्श होनेपर भी महाप्रभुको कोई ग्लानि नहीं हुई, अपितु उन्होंने उस स्त्रीके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया। श्रीराय रामानन्द देवदासियोंको भावकी शिक्षा देते थे, अपने हाथोंसे उनके अङ्गोंका मार्जन करते और उनको वस्त्र धारण करवाते तथा उनका शृङ्गार करते थे। महाप्रभुने उनकी इस कार्यके लिये निन्दा नहीं करके उनकी प्रशंसा की। महाप्रभुने स्त्रीसे बात करनेके लिये छोटे-हरिदासका त्याग कर दिया, किन्तु श्रीराय रामानन्दका त्याग नहीं किया। इसलिये जिसमें जिस प्रकारके गुण और भाव हैं, उसे उसी प्रकारसे समझना चाहिये। उस वृद्धा स्त्रीमें श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेका आवेश था, इसलिये उसके द्वारा महाप्रभुके कन्धेके ऊपर अपने पैरको रखना दोषपूर्ण नहीं है, किन्तु अन्य परिस्थितिमें ऐसा करना दोषपूर्ण है। परिस्थिति और परिवेशका विचार करके उसका निर्णय करना चाहिये।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी” ॥ 30 ॥ पूर्वे आमि यबे कैलुँ जगन्नाथ-दरशन। जगन्नाथे देखि—साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 31 ॥

श्रीकृष्णमें आविष्टचित्त गोपीभावमय महाप्रभुके द्वारा सर्वत्र श्रीकृष्णका दर्शन :— स्वप्नेर दर्शनावेशे तद्रूप हैल मन। याँहा ताँहा देखि सर्वत्र मुरली-वदन ॥”32 ॥ अनुवाद—इसके पूर्व मैं मन्दिरमें आकर जब श्रीजगन्नाथके दर्शन कर रहा था, तब मुझे वे श्रीजगन्नाथ साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन दिखलायी दे रहे थे। रात्रिमें स्वप्नमें जो व्रजेन्द्रनन्दनके दर्शन हुए थे, उसमें आविष्ट होनेके कारण मेरा मन उसी लीलाका स्मरण कर रहा था, इसलिये मुझे यत्र-तत्र-सर्वत्र ही मुरली-वदन दिखलायी देने लगे थे॥”31-32 ॥ महाप्रभुका बाह्यदशामें आना :— एबे यदि स्त्रीरे देखि' प्रभुर बाह्य हैल। जगन्नाथ-सुभद्रा-बलरामेर स्वरूप देखिल ॥ 33 ॥ कुरुक्षेत्रमें वासुदेवके दर्शनसे श्याम-विरहिणी गोपीभावमय महाप्रभु :— कुरुक्षेत्रे देखि' कृष्णे ऐछे हैल मन। 'काँहा कुरुक्षेत्रे आइलाङ, काँहा वृन्दावन??'34 ॥ अनुवाद—किन्तु अब जब उस स्त्रीको देखा तो महाप्रभु बाह्यदशामें आ गये और उन्हें श्रीजगन्नाथ- सुभद्रा-बलरामके स्वरूप दिखलायी देने लगे। उन तीनोंके दर्शन करके महाप्रभुके मनमें भाव आया कि मैं श्रीकृष्णको कुरुक्षेत्रमें देख रहा हूँ और वे सोचने लगे,—'कहाँ मैं कुरुक्षेत्रमें आ गया हूँ और कहाँ मैं वृन्दावनमें था?'33-34 ॥ श्रीकृष्णके सङ्गसे वञ्चित गोपीभावमें कातर महाप्रभु :— प्राप्तरत्न हाराञा ऐछे व्यग्र हइला। विषण्ण हञा प्रभु निज-वासा आइला ॥ 35 ॥ श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुकी महाभाव-चेष्टा :— भूमि उपर बसि' निज-नखे भूमि लिखे। अश्रुगङ्गा नेत्रे बहे, किछुइ ना देखे ॥ 36 ॥

356 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/35-42 ] “पाइनु वृन्दावननाथ, पुनः हाराइनु। के मोर निलेक कृष्ण? काँहा मुइ आइनु??”37॥ अनुवाद—महाप्रभु ऐसे व्यग्र हो गये जैसे एक व्यक्तिका मूल्यवान् रत्न खो गया हो। उदास होकर महाप्रभु अपने वासस्थानपर आ गये। वे भूमिके ऊपर बैठकर अपने नाखूनोंसे भूमिपर कुछ लिखने लगे। गङ्गाकी धाराकी भाँति उनके नेत्रोंसे अश्रु बहने लगे, उन्हें कुछ भी दिखलायी नहीं दे रहा था। वे विलाप करते हुए कहने लगे,—“मैंने वृन्दावन-नाथको प्राप्त करके पुनः खो दिया। मेरे कृष्णको कौन ले गया है? मैं कहाँ आ गया हूँ?”35-37॥ अर्द्धबाह्यदशाके लक्षण :- स्वप्नावेशे प्रेमे प्रभुर गर गर मन। बाह्य हैले हय—येन हाराइनु धन॥38॥ अनुवाद—स्वप्नमें रासलीलाके दर्शन करके उस आवेशमें महाप्रभुका मन प्रेममें विह्वल हो रहा था, परन्तु जैसे ही महाप्रभुकी स्वप्न टूटनेपर बाह्यदशा हुई, तो उन्हें लगा कि वे अपना समस्त धन खो बैठे हैं॥ 38॥ दिव्योन्मादग्रस्त महाप्रभुका अभ्यासवशतः नित्यकृत्य आदि करना :- उन्मत्तेर प्राय प्रभु करेन गान-नृत्य। देहेर स्वभावे करेन स्नान-भोजन-कृत्य॥39॥ अनुवाद—महाप्रभु उन्मत्त व्यक्तिकी भाँति गाने और नृत्य करने लगे। देहके स्वभावसे ही उनके स्नान-भोजन आदि कार्य होने लगे॥ 39॥ रात्रिमें श्रीस्वरूप-रामानन्दके निकट विलाप :- रात्रि हैले स्वरूप-रामानन्दे लञा। आपन मनेर भाव कहे उघाड़िया ॥40॥ अनुवाद—रात्रि होनेपर महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायको अपने मनके भाव खोलकर बतलाने लगे॥40॥ गोस्वामिपादोक्त श्लोक- प्राप्तप्रणष्टाच्युतवित्त आत्मा ययौ विषादोज्झित-देहगेहः। गृहीतकापालिकधर्मको मे वृन्दावनं सेन्द्रियशिष्यवृन्दः॥41॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरी आत्माने कृष्णरूपी धनको एकबार प्राप्त करके पुनः खोकर विषादके कारण देह-गृहको परित्याग करके कापालिक-योगीका धर्म ग्रहण करके अपने इन्द्रियरूपी शिष्योंके साथ वृन्दावनमें गमन किया था। इसमें 'उपमालङ्कार' द्रष्टव्य है॥ 41 ॥ अनुभाष्य- प्राप्त-प्रणष्टाच्युतवित्तः (आदौ प्राप्तं नयनसरणीलब्धं, पश्चात् प्रणष्टं पुनः नष्टम् अदृष्टम् च, अच्युतवित्तम् अच्युतरूपवित्तं येन सः) विषादोज्झितदेहगेहः (विषादेन कृष्णविरहज-क्लेशेन उज्झितः त्यक्तप्रायः देह एव गेहः येन सः) गृहीत-कापालिक- धर्मकः (गृहीतः अङ्गीकृतः कापालिकस्य योगिविशेषस्य धर्मः नैसर्गिकस्वभावादिकः येन सः) मे (मम) आत्मा (शुद्धमनः) सेन्द्रियशिष्यवृन्दः (इन्द्रियाण्येव शिष्यवृन्दानि तैः सह वर्तमानः) वृन्दावनं ययौ। श्लोक-भावानुवाद-पहले नयनपथपर गोचर होनेके बाद पुनः उनके अदृष्ट होनेपर अच्युतरूप धन खोकर कृष्णविरहसे उत्पन्न क्लेशसे प्राय देह और गेहको त्यागकर कापालिकके (विशेष योगीके) धर्मको (नैसर्गिक स्वभावादिको) ग्रहण करके मेरा शुद्धमन इन्द्रियरूपी शिष्योंके साथ वृन्दावन गया था॥ 41 ॥ श्रीकृष्णसङ्गसे वञ्चित महाप्रभुका दिव्योन्माद (चित्रजल्प) :- प्राप्तरत्न हाराञा, तार गुण सङरिया, महाप्रभु सन्तापे विह्वल। राय-स्वरूपेर कण्ठ धरि', कहे—“हाहा हरि हरि”, धैर्य गेल, हइला चपल ॥42॥

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[ 14/42-51 चौदहवाँ अध्याय 357 श्रीकृष्णमाधुर्यकी आकर्षणशक्तिके बलसे सब छाड़ि' गेला वृन्दावन ॥ 47 ॥ दशम-दशाकी प्राप्तिका वर्णन :- वृन्दावने प्रजागण, यत "शुन, बान्धव, कृष्णेर माधुरी। स्थावर-जङ्गम, यार लोभे मोर मन, छाड़िलेक वेदधर्म, वृक्ष-लता गृहस्थ-आश्रमे। योगी हञा हइल भिखारी ॥ 43 ॥ ध्रु॥ तार घरे भिक्षाटन, फल-मूल-पत्राशन, अनुवाद-श्रीकृष्णरूपी रत्नको प्राप्त करके उसे एइ वृत्ति करे शिष्यसने ॥ 48 ॥ खोकर श्रीकृष्णके गुणोंको स्मरण करते हुए महाप्रभु सन्तापसे विह्वल हो उठे। तब महाप्रभु श्रीराय रामानन्द कृष्णगुण रूप, रस, गन्ध, शब्द, परश, और श्रीस्वरूप दामोदरके गलेमें अपनी भुजाओंको से सुधा आस्वादे गोपीगण। डालकर 'हा हरि ! हा हरि !' कहते हुए चञ्चल हो उठे, ता-सबार ग्रास-शेषे, आनि' पञ्चेन्द्रिय शिष्ये, धैर्य खो बैठे और कहने लगे, "हे बान्धव ! श्रीकृष्णकी से भिक्षाय राखेन जीवन ॥ 49 ॥ माधुरीके विषयमें श्रवण करो, जिस माधुरीके लोभसे जागर-दशा :- मेरा मन लोकधर्म और वेदधर्मको छोड़कर योगी शून्यकुञ्जमण्डप-कोणे, योगाभ्यास कृष्णध्याने, बनकर भिखारी हो गया है ॥ 42-43 ॥ ताँहा रहे लञा शिष्यगण। कृष्णलीला-मण्डल, शुद्ध कृष्ण आत्मा निरञ्जन, साक्षात् देखिते मन, शङ्खकुण्डल, ध्याने रात्रि करे जागरण ॥ 50 ॥ गड़ियाछे शुक कारिकर। व्याधि, मोह और मृत्यु (प्रलय)-दशा; चित्रजल्प :- सेइ कुण्डल काणे परि', तृष्णा-लाउ-थाली धरि', मन कृष्णवियोगी, दुःखे मन हैल योगी, आशा-झुलि कान्धेर उपर ॥ 44 ॥ से वियोगे दश दशा हय। चिन्ता, मलिनाङ्गता और प्रलाप-दशा :- से दशाय व्याकुल हञा, मन गेल पलाञा, चिन्ता-कान्था उड़ि' गाय, धूलि-विभूति-मलिन-काय, शून्य मोर शरीर आउलय ॥" 51 ॥ 'हाहा कृष्ण' प्रलाप-उत्तर। अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 44-51 ॥ उद्वेग द्वादश हाते, लोभेर झुलि निल माथे, अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने आगे कहा, - श्रीकृष्णकी भिक्षाभावे क्षीण कलेवर ॥ 45 ॥ माधुरीके प्रति लोभ करके वेदधर्मको परित्यागकर मेरा तानव-दशा :- मन योगी होकर भिखारी हो गया है। योगी लोग जिस व्यास, शुकादि योगिगण, कृष्ण आत्मा निरञ्जन, प्रकार शङ्ख-कुण्डल धारण करते हैं, उसी प्रकार मेरे व्रजे ताँर यत लीलागण। मनरूपी योगीने कृष्णलीला-मण्डलको शुद्ध शङ्ख-मण्डलरूपमें भागवतादि शास्त्रगणे, करियाछे वर्णने, धारण किया है। सामान्य योगियोंके शङ्खकुण्डल शङ्खके सेइ तर्ज्जा पड़े अनुक्षण ॥ 46 ॥ कारीगर ही बनाते हैं, किन्तु मेरे मनरूपी योगीके उन्माद-दशा :- कृष्णलीला-मण्डलरूप भागवत-कुण्डलोंका साक्षात् बादरायण दशेन्द्रिये शिष्य करि', 'महा-बाउल' नाम धरि', श्रीशुकरूपी कारीगरने गठन किया है। सामान्य योगी शिष्य लञा करिल गमन। जो-जो चाहता है, मेरे मनरूपी योगीने उसे उसे स्वीकार मोर देह स्वसदन, विषय-भोग महाधन,

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[पृष्ठ ३५८]

358 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/44-53 ]


[बायाँ स्तम्भ]

किया है। सामान्य योगीके पास कद्दूसे बने कमण्डलु और थाली (भिक्षापात्र) रहते हैं, मेरे मनरूपी योगीने कृष्णतृणारूपी लौकीकी थाली बनायी है,—'कृष्णको प्राप्त करूँगा', इस आशारूपी झोलीको कन्धेके ऊपर झुला रखा है,—और 'किस उपायसे कृष्णको प्राप्त करूँगा' इस चिन्तारूपी [पुराने वस्त्रोंको जोड़कर बनाये हुए] कम्बलको शरीरपर ओढ़ा हुआ है। योगीगण राखकी विभूति धारण करते हैं, मेरा मनरूपी योगी धूलिकी विभूतिके द्वारा मलिन शरीरवाला हो गया है, प्रत्येक बातका 'हा हा कृष्ण' इस प्रकारके प्रलापमय वचनोंसे उत्तर देता है। सामान्य योगी लोग हाथमें बारह कड़े पहनते हैं, मेरे मनरूपी योगीके हाथमें अष्टसात्त्विक विकार, मनका वेग, कम्प-विकार, निश्वास, चपलता और चिन्ता, —ये बारह कड़े शोभा पा रहे हैं; [मेरे मनरूपी योगीने] कृष्णमाधुर्यकी लोभरूपी झोलीको मस्तकपर बाँध रखा है; और वह भिक्षा प्राप्त नहीं कर पानेके कारण दुबला हो गया है। व्यास-शुकादि जिन समस्त योगियोंने निर्मल आत्मारूपी कृष्णकी समस्त व्रजलीलाओंका भागवतादि शास्त्रोंमें वर्णन किया है, मेरा मनरूपी योगी उनके द्वारा रचित समस्त प्रेम-गीत और नृत्यका निरन्तर पाठ करता रहता है। बाउल योगी लोग जिस प्रकार दस-दस शिष्य बनाते हैं, उसी प्रकार मेरे मनरूपी योगीने 'महाबाउल' नाम धारण करके दस इन्द्रियोंको शिष्य बनाकर मेरे देहरूपी अपने घरमें विषय-भोगरूपी महाधनका परित्याग करके वृन्दावन गमन किया है। शिष्यगण (दस इन्द्रियाँ) वृन्दावनमें स्थावर-जङ्गमरूपी समस्त प्रजावर्ग एवं वृक्ष-लता आदि गृहस्थ-आश्रमियोंके घरमें भिक्षा माँगकर फल-मूल-पत्रके सेवनरूपी वृत्तिका आचरण कर रहे हैं। व्रजगोपियाँ श्रीकृष्णके गुण, रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श—इन सभी सुधाका सर्वदा आस्वादन करती हैं, उनके भोजनके अवशिष्टको लाकर ज्ञानेन्द्रियरूपी पाँच शिष्य उस प्रसादको खाकर जीवनकी रक्षा करते हैं। सामान्य योगी जिस प्रकार एक कोनेमें (एकान्तमें) बैठकर ध्यान


[दायाँ स्तम्भ]

करते हैं, उसी प्रकार मेरा मनरूपी योगी भी कृष्णशून्य कुञ्जमण्डपके कोनेमें अपने शिष्योंके साथ कृष्णध्यानमें योगका अभ्यास करता है। कृष्ण—निर्मल आत्मस्वरूप हैं; मेरा मनरूपी योगी उन्हें साक्षात् देखना चाहता है, उन्हें प्राप्त नहीं कर पानेके कारण ध्यानमें रात्रि-जागरण करता है। मन कृष्ण-वियोगी बनकर अति दुःखमें इस योगीकी दशाको प्राप्त करके उस कृष्ण-विरहकी अवस्थामें दस-दशाको प्राप्त करता है, उस दशामें नितान्त व्याकुल होकर मन फिर योगी बननेको विफल हुआ देखकर भाग गया है; मेरा शरीर शून्य होकर रह गया है। इस श्लेष अलङ्कारके प्रयोगसे प्रलयावस्था तकका वर्णन हुआ है॥ 44-51 ॥

अनुभाष्य—पाठान्तरमें, — 'लोभेर झुलनी माथे' ; 'झुलनी' शब्दका अर्थ सिरको ढकने योग्य वस्त्र है॥ 45 ॥ 'तर्ज'—(अरबी भाषामें तर्जा) दो दलोंके बीच सङ्गीतमें परस्परके उत्तरका खण्डन; कवि-गान और प्रेम-गीतके साथ नृत्यके समजातीय ॥ 46 ॥ 'कापालिकगण'—विशेष योगी; वे मनुष्यके कपाल अर्थात् मस्तककी खोपड़ीको लेकर विचरण करते हैं। उनके तान्त्रिक अनुष्ठानोंके साथ सादृश्य रखकर यह अंश वर्णित हुआ है। कापालिकगण—अवैदिक और अस्पृश्य हैं, इसलिये अवैष्णव हैं; उनके व्यवहारकी ही उपमा-मात्रको ग्रहण किया गया है॥ 51 ॥

श्रीकृष्णवियोगमें प्रोषितभर्तृका गोपियोंकी दस दशाओंसे युक्त कृष्ण-विरही महाप्रभु :- कृष्णेर वियोगे गोपीर दश दशा हय। सेइ दश दशा हय प्रभुर उदय ॥ 52 ॥

अनुवाद—जैसे श्रीकृष्णके वियोगमें गोपियोंकी दस दशाएँ उपस्थित होती हैं, उसी प्रकार महाप्रभुमें दसों दशाएँ उदित होती थीं ॥ 52 ॥

उज्ज्वलनीलमणिमें शृङ्गारभेद प्रकरणमें (167) श्लोक—

[ 14/53 चौदहवाँ अध्याय 359 चिन्तात्र जागरोद्वेगौ तानवं मलिनाङ्गता। प्रलापो व्याधिरुन्मादो मोहो मृत्युर्दशा दश ॥ ५३ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ५३ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चिन्ता, जागरण, उद्वेग, तनुक्षीणता (शरीरका दुबला होना), अङ्गोंका मलिन होना, प्रलाप, व्याधि, उन्माद, मोह और मृत्यु, —ये दस दशाएँ हैं॥ ५३ ॥ अनुभाष्य— [अत्र प्रवासाख्ये विप्रलम्भे दश दशाः कथिताः]—चिन्ता (अभीष्टलाभोपायध्यानं), जागरः (निद्राराहित्यः), उद्वेगः (मनःकम्पविशेषः), तानवं (कृशता), मलिनाङ्गता (अङ्गमालिन्यं), प्रलापः (असम्बद्धवचनं), व्याधिः, उन्मादः (विभ्रम-चेष्टासम्पन्नः) मोहः (चित्तविभ्रान्तिः) मृत्युः (स्पन्दनाभावः)। श्लोक-भावानुवाद—[यहाँ प्रवास कहे गये विप्रलम्भमें दस दशाएँ कही गयी हैं]—चिन्ता (अभीष्टको प्राप्त करनेके उपायका ध्यान), जागरण, उद्वेग (मनका विशेष कम्प), शरीरका दुबला होना, अङ्गोंका मलिन होना, प्रलाप (ऐसे वचन जिनका आपसमें सम्बन्ध नहीं हो), व्याधि, उन्माद (भ्रमित होकर चेष्टा), मोह (चित्तमें विभ्रान्ति) और मृत्यु (शरीरमें स्पन्दनका अभाव)। इन दस दशाओंकी उदाहरण-माला नीचे लिखी जा रही है; उनमेंसे— (1) 'चिन्ता'—जैसे हंसदूत (2) में— “यदा यातो गोपीहृदयमदनो नन्दसदना- न्मुकुन्दो गान्दिन्यास्तनयमनुरुन्धन् मधुपुरीम्। तदामाङ्गीच्चिन्तासरिति घनघूर्णापरिचयै- रगाधायां बाधामय-पयसि राधा विरहिणी ॥” अर्थात्— “अक्रूरेर अनुरोधे नन्दगृह हइते। गोपीहृदानन्द यबे गेल मधुराते॥ तबे विरहिणी राधा उद्घूर्णितमना। तीव्रपीडा-जलरूपा उत्कट भावना॥ निजेर विनाश-चिन्ता-व्याकुलता-फले। डुबिल अतलस्पर्श-चिन्तानदी-तले॥ 'आमार सन्धान लागि' प्रियतम कृष्ण। भावि काले ब्रजे आसि' हइया सतृष्ण॥ आमार मरण-कथा यबे लोकमुखे। शुनिबे, हृदये कभु ना पाइबे सुखे॥ दयितेर दुःख-भार विचार करिया। कभु मृत्यु-वाञ्छा नाहि करे मोर हिया॥” [अर्थात् जबसे गोपियोंके हृदयके आनन्दस्वरूप मुकुन्द अक्रूरके अनुरोधसे नन्दगृहको छोड़कर मथुरा चले गये, तभीसे विरहिणी श्रीराधाका चित्त उद्घूर्णा-ग्रस्त हो गया। अपने विनाशकी चिन्ताकी व्याकुलताके फलस्वरूप वे (श्रीकृष्ण विरहकी) तीव्र-पीडास्वरूप जलरूपा अगाध चिन्तानदीमें निमग्न होकर, इस प्रकार तीव्र चिन्ता करने लगीं, —“भविष्यमें मेरे प्रियतम कृष्ण सतृष्ण होकर मुझे ढूँढ़ते हुए जब व्रजमें आयेंगे, तब व्रजवासियोंके मुखसे मेरी मृत्युकी बातको सुनकर उनका हृदय कदापि प्रसन्न नहीं होगा अर्थात् अत्यन्त दुःखी होगा। अपने अत्यन्त प्रियतमके इस (भावी) दुःख रूपी भारका विचार करके ही मेरा चित्त कभी मृत्युकी कामना नहीं करता।”] (2) 'जागर:'—जैसे पद्यावली (322)में— “याः पश्यन्ति प्रियं स्वप्ने धन्यास्ताः सखि योषितः। अस्माकन्तु गते कृष्णे गता निद्रापि वैरिणी ॥” अर्थात्— “प्रिय सखी विशाखाके राधा-ठाकुराणी। निजे भाग्यहीना जानि कहिलेन वाणी॥ 'प्रियतम-दरशन स्वप्नेर काले। ये नारीर घटे, तार धन्य लिखे भाले॥ कृष्णेर गमन हले निद्रा-रूपा अरि। छाडियाछे मम सङ्ग साधितेछे वैरी॥'” [अर्थात् माथुरविरहकालमें स्वयंको भाग्यहीन जानकर श्रीराधा-ठाकुराणी अपनी प्रियसखी श्रीविशाखासे बड़े खेदके साथ कह रही हैं, —“जो नारियाँ अपने प्रियतमका स्वप्नमें भी दर्शन प्राप्त करती हैं, वे धन्य हैं।

360 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/53 ] श्रीकृष्णके मथुरा जानेपर निद्रा भी मेरी वैरिणी हो गयी है, अर्थात् मुझे त्यागकर दूर चली गयी है।”] (3) 'उद्वेगः',—जैसे हंसदूत (104) में— “मनो मे हा कष्टं ज्वलति किमहं हन्त करवै न पारं नावारं सुमुखि कलयाम्यस्य जलधेः। इयं वन्दे मूर्द्धा सपदि तमुपायं कथय मे परामृश्ये यस्माद्कृतिकणिकायापि क्षणिकया॥” अर्थात्— “ललिताके कहे राधा,—'सुमुखि ललिते। दहिछे हृदय मम, ना पारि बलिते॥ हाय कि करिबे, देखि,—जलधि अपार। नमि आमि तव पदे, करह विचार॥ उपदेश दाओ मोरे—किबा आमि करि। क्षणेकेर तरे किछु धैर्य किसे धरि॥'” [अर्थात् माथुरविरहकालमें परम-उद्विग्न श्रीराधा उनको सान्त्वना देनेवाली अपनी प्रिय सखी ललितासे दीनताके साथ कह रही हैं,—“हे सुमुखि ललिते! इस समय मेरा हृदय अति विरह ज्वालासे जल रहा है, मैं कुछ भी कह पानेमें असमर्थ हूँ। हाय! मैं क्या करूँ? मुझे इस विरह-समुद्रका ओर-छोर नहीं दिखायी दे रहा है। मैं नतमस्तक होकर तुम्हारे चरणोंमें प्रणाम करती हूँ। शीघ्र ही मुझे ऐसा कोई उपाय बतलाओ, जिससे मैं क्षणकालके लिये ही धैर्य धारण कर सकूँ।”] (4) 'तानवं', जैसे— “उदश्र्वद्वक्राम्भोरुहविकृतिरन्तःकलुषिता। सदाहाराभावग्लपितकुचकोका यदुपते। विशुष्यन्ति राधा तव विरहतापादनुदिनं निदाघे कुल्येव क्रशिमपरिपाकं प्रथयति॥” अर्थात्— “उद्धव फिरिया यबे कृष्ण-सन्निधाने। राधिका-विशाखा-वार्त्ता कृष्ण तार स्थाने॥ जिज्ञासिल, तदुत्तरे उद्धव कहिल। मथुराय कृष्णचन्द्र साग्रहे शुनिल॥ 'यदुपते, कि बलिब सेइ सब कथा। तोमार विरहे राधा पाय ये ये व्यथा॥ मलिन विवर्ण ताँर वदन-कमल। सुविषाद-दैन्ये ढाका अन्तरेर स्थल॥ आहार-अभावे वक्षश्चकोरिका द्वय। ग्लानियुक्त देखियाछि, शुन रसमय॥ निदाघे सलिल येन शुकाइया याय। तोमार विरहतापे राधा क्षीणकाय॥'” [अर्थात् उद्धव जब व्रजसे लौटकर मथुरामें श्रीकृष्णके पास पहुँचे, तब श्रीकृष्णने उनसे श्रीराधिका, श्रीविशाखा (आदि)के विषयमें जिज्ञासा की। उसके उत्तरमें उद्धव जो कहने लगे उसे श्रीकृष्ण आग्रहपूर्वक सुनने लगे,—“हे यदुपते! तुम्हारे विरहमें श्रीराधा जो-जो कष्ट अनुभव कर रही हैं, मैं उस विषयमें क्या कहूँ? उनका मुखकमल मलिन और कान्तिहीन हो रहा है। सुविषाद-दैन्यसे उनका अन्तःकरण आच्छन्न हो रहा है। आहारके अभावमें उनके दोनों कुचरूप चक्रवाक ग्लानियुक्त हो रहे हैं। हे रसमय! और भी श्रवण करो! तुम्हारे विरहतापसे वे ग्रीष्मऋतुमें शुष्क कृत्रिम क्षुद्रनदीकी भाँति सूखकर क्षीणताकी पराकाष्ठाका विस्तार कर रही हैं।”] (5) 'मलिनाङ्गता', जैसे— “हिमविसरविशीर्णाम्भोजतुल्याननश्रीः, खरमरुदपरज्यद्वन्धुजीवोपमौष्ठी। अघहर शरदर्कौत्तापितेन्दीवराक्षी तव विरहविपत्तिम्लापितासीद्विशाखा॥” अर्थात्— “उद्धव कहेन,—शुन, अघहर मम। खरतर-वायुभरे बन्धुतरु सम॥ विशाखार ओष्ठ शुष्क विरह-कातरा। हिमपुअशीर्ण-पद्मतुल्य-बिम्बाधरा॥ विरह-विपत्तिवशे विशाखा सुदीना। शारदीय-रवितप्त-कुमुदनयना॥” [अर्थात् (विशाखाकी विरह-दशाका वर्णन करते हुए) उद्धवने कहा,—“हे दुःखनाशक! सुनो! तुम्हारे विरहमें कातर श्रीविशाखाकी मुखकान्ति हिमसे जले हुए

[ 14/53 चौदहवाँ अध्याय 361 पद्मपुष्पकी भाँति हो रही है, उनके होंठ प्रखरतर तापयुक्त वायुके संस्पर्शसे जले हुए बन्धूक-पुष्पके समान हो रहे हैं। तुम्हारी विरह-वेदनाके फलस्वरूप उनकी अवस्था अत्यन्त दयनीय हो गयी है और उनके दोनों नेत्र भी शरत्कालीन सूर्यके प्रखर तापसे जले हुए कुमुदपुष्पकी भाँति मलिन हो रहे हैं।”] (6) 'प्रलाप:'—जैसे ललितमाधव (3/25) में— “क्व नन्दकुलचन्द्रमाः क्व शिखिचन्द्रकालंकृतिः, क्व मन्दमुरलीरवः क्व नु सुरेन्द्रनीलद्युतिः। क्व रासरसताण्डवी क्व सखि जीवरक्षौषधि- र्निधिर्मम सुहृत्तमः क्व तव हन्त हा धिग्विधिः॥” अर्थात्— “प्रोषितभर्तृका राधा विलाप-कातर। बोले,—'सखि, कोथा नन्दकुलशशधर॥ शिखिचन्द्र-अलङ्कार कोथा गेल बल। गम्भीरमुरली-रव्कारी कोथा गेल॥ इन्द्रनीलमणिद्युति पुरुष उत्तम। रासरसताण्डवी वा तव सुहृत्तम॥ मम प्राणरक्षौषधिनिधि कोथा बल। धिग् विधि, भाग्ये लिखेछिले एइ फल??'” [अर्थात् माथुरविरहमें दिव्योन्माद दशाको प्राप्त (प्रोषितभर्तृका) श्रीमती राधिका ललिताको सम्बोधन करके प्रलाप करते हुए कह रही हैं,—“हे सखि ललिते! नन्दकुलचन्द्रमा कहाँ हैं? शिखिपिच्छमौलि कहाँ हैं? जिनकी मुरलीका स्वर अत्यन्त गम्भीर है, वे कहाँ हैं? इन्द्रनीलकान्ति कहाँ हैं? अहो! वे रासमें रसताण्डवी कहाँ हैं? मेरे मृतसञ्जीवनी रसायन कहाँ हैं? हाय! मेरी अभिलषित दुस्त्यज निधि कहाँ हैं? तुम्हारे वे सुहृत्तम कहाँ हैं? हा विधि! तुमको शत-शत बार धिक्कार है॥”] (7) 'व्याधि:',—यथा ललितमाधवमें— “उत्तापी पुटपाकतोऽपि गरलग्रामादपि क्षोभणो, दम्भोलेरपि दुःसहः कटुरलं हृन्मग्नशूल्यादपि। तीव्रः प्रौढ़विषूचिकानिचयतोऽप्युच्चैर्ममायं बली, मर्मांण्यद्य भिनत्ति गोकुलपतेर्विश्लेषजन्मा ज्वरः॥” अर्थात्— “विरहिणी राधा कहे,—'शुन गो ललिते। कृष्णेर विरह-ज्वर ना पारि वर्णिते॥ मृण्मय सम्पुटे तप्त येरूप कनक। गरलादि हइतेओ क्षोभेर जनक॥ वज्र हइते सुदुःसह विद्ध शल्य। येन यन्त्रणाय तीव्रविषूचिकातुल्य॥ सजनि, आमार मर्म भेदितेछे येइ। अतिशय पराक्रमबले बली सेइ॥'” [अर्थात् दिव्योन्मादवती श्रीमती राधिका ललितासे बड़े उद्वेगके साथ कह रही हैं,—“हे सखि ! व्रजनवयुवराजके विरहसे उत्पन्न ज्वर जो पुटपाकसे (औषधि बनानेके लिये उनके पत्तोंको लपेटकर मिट्टीका लेप करके अग्निमें भूननेसे) भी अतिशय तापदायक है, विषराशिसे भी अधिक क्षोभजनक है, वज्रसे भी अत्यन्त दुःसह है, हृदयमें चुभे शूलसे भी अधिकतर कष्टप्रद है तथा अति विपुल हैजा आदि रोगसमूहसे भी अतिशय तीक्ष्ण है। अब वह अति बलवान होकर इस समय मेरे हृदयको भी बींध रहा है॥”] (8) 'उन्मादः', जैसे— “भ्रमति भवनगर्भे निर्निमित्तं हसन्ती, प्रथयति तव वार्त्तां चेतनाचेतनेषु। लुठति च भुवि राधा कम्पिताङ्गी मुरारे, विषमविरहखेदोद्वारिविभ्रान्तचित्ता॥” अर्थात्— “उद्धव कहेन,—'तव विरह-कातरा। हे मुरारे, राधा अकारणे हास्यपरा॥ गृहमध्ये भ्राम्यमाणा प्रश्न यारे तारे। सचेतन-अचेतने किछु ना विचारे॥ विषम विरह-खेदे विधुरा राधिका। विभ्रान्तेर वशे एबे लुटिछे मृत्तिका॥'” [अर्थात् उद्धव (श्रीकृष्णसे) कह रहे हैं,—“हे मुरारि ! तुम्हारी उत्कट विरहचिन्तासे श्रीमती राधिका

362 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/53-54 ] कभी घरमें इधर-उधर भ्रमण करती हैं, कभी अकारण हँसती हैं। कभी चेतन-अचेतन वस्तुमात्रसे तुम्हारी वार्त्ता पूछती हैं, कभी-कभी तो काँपती हुई भूमिपर लोटने लग जाती हैं॥”] (9) ‘मोहः’, जैसे— “निरुन्धे दैन्याब्धिं हरति गुरुचिन्तापरिभवं, विलुम्पत्युन्मादं स्थगयति बलाद्बाष्पलहरीम्। इदानीं कंसारे कुवलयदृशः केवलमिदं, विधत्ते साचिव्यं तव विरहमूर्च्छा सहचरी॥” अर्थात्— “ललिता कृष्णेर स्थाने लिखिल पत्रिका। 'तव सुविच्छेदे मूर्च्छा लभिया राधिका॥ हे कंसारे, साचिव्येरे विधाता हइया। दैन्यसिन्धु हरे, चित्त-विकार शमिया॥ बले बाष्प-तरङ्गेरे स्तम्भन करिया। राधा आछेन तव गुरुचिन्ता लइया॥ नारीवधरूप महानिधि आशा करि। श्रीराधा-विषये तुमि चिन्ता परिहरि'॥ आजि वा आगामी कल्य लभिबे सन्देश। सुखे अवस्थान कर, आनन्दे विशेष॥'” [अर्थात् मथुरामें निवास करनेवाले श्रीकृष्णको ललिता पत्रके द्वारा संवाद दे रही हैं,–“हे कंसारि! इस समय केवल तुम्हारी विरहमूर्च्छा ही तुम्हारी प्राणेश्वरीकी सहायता कर रही है। वह दैन्यसमुद्रको रोक रही है। गुरुतर चिन्ताजनित दुरावस्थाको हरण कर रही है, उन्मादको दूर रख रही है और बलपूर्वक वाष्पलहरीको भी स्थगित कर रही है अर्थात् रोदनको भी स्थगित कर रही है। श्रीराधा तुम्हारी अत्यधिक गम्भीर चिन्तामें नारीवधरूपी महानिधिकी आशा कर रही हैं। अब तुम श्रीराधाके विषयमें अपनी समस्त चिन्ताओंका त्याग कर सकते हो। आज अथवा आगामी कलमें ही तुम्हें (उनकी मृत्युका) सन्देश प्राप्त हो जायेगा। तुम मथुरामें विशेष आनन्दपूर्वक सुखसे अवस्थान करो।”] (10) 'मृत्युः',–जैसे हंसदूत (96)में– “अये रासक्रीड़ारसिक मम सख्यं नवनवा, पुरा बद्धा येन प्रणयलहरी हन्त गहना। स चेन्मुक्तापेक्षस्त्वमसि धिगिमां तूलसकलं, यदेतस्या नासानिहितमिदमद्यापि चलति॥” अर्थात्— “मथुरा-प्रवासी कृष्णे तिरस्कार करि'। हंसद्वारे कहे देवी ललिता-सुन्दरी॥ 'रासक्रीड़ा-रसमय, रसेरे कारणे। बेंधेछिले राधिकारे प्रणयबन्धने॥ मम प्रिय सखी-प्रति निरपेक्ष केन। राधिका एसब कथा सदा स्मरे येन॥ नासारन्ध्रे तुलाखण्ड परीक्षा करिब। श्वास बहिलेइ धिक् ताहाके जानिब॥'” [अर्थात् (ब्रजसे) मथुरा जाकर वास करनेवाले श्रीकृष्णका तिरस्कार करते हुए श्रीललिता-सुन्दरी हंसके द्वारा उन्हें सन्देश भेज रही हैं,–“हे रासक्रीड़ा रसिक! उस समयके विशेष सौभाग्यका क्या तुम्हें स्मरण है? पूर्वकालमें व्रजवासके समय तुमने मेरी सखीको नित्य नवनवायमान दुर्बोध प्रेम-परम्परामें आबद्ध कर लिया था। अहो! इस समय वही तुम यदि उनके प्रति निष्ठुर और निरपेक्ष व्यवहार करोगे, तो मैं इस हतभागिनी राधाको ही धिक्कार प्रदान कर रही हूँ, क्योंकि इसकी चरम दशा मृत्युके निकट होनेके कारण नाड़ीकी अत्यन्त क्षीणतावशतः श्वासोंका सञ्चार बोध करनेके लिये उसकी नासिकाके सामने रखा रुईका खण्ड अभी भी धीरे-धीरे हिल रहा है। इसका अभिप्राय यह है कि तुम्हारे आगमनकी आशासे इसके शरीरमें प्राण किसी प्रकारसे बचे हुए हैं। तुम निश्चित ही नहीं आओगे, यदि यह बात वह जान लेगी तो महा-अनर्थ हो जायेगा। इसलिये अनुरोध करती हूँ कि अविलम्ब ब्रजमें आगमनकर प्रियसखियोंसे परिवेष्टित प्रियसखीको सञ्जीवित करो॥”] ॥ 53 ॥ एइ दश-दशाय प्रभु व्याकुल रात्रि-दिने। कभु कोन दशा उठे, स्थिर नहे मने॥ 54 ॥ अनुवाद—महाप्रभु इन दस दशाओंमें रात-दिन व्याकुल रहते थे। कभी किसी भी दशाके उठनेसे

[ 14/43–54 चौदहवाँ अध्याय 363

उनका मन स्थिर नहीं रह पाता था॥ 54॥ अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णकी रूपमाधुरी, वेणुमाधुरी, लीलामाधुरी और गुणमाधुरी—इनको वैष्णवों अथवा गुरुसे श्रवण करके जो लोभ उत्पन्न होता है, वह लोभ ही पात्र है। महाप्रभुके मनरूपी योगीको श्रीकृष्णके रूप, लीलादिकी माधुरीके आस्वादन करनेके लिये प्रगाढ़ अवस्था तक लोभ हो गया है। जिसे ऐसा लोभ हो जाता है, तो वह रागानुगा भक्तिका अधिकारी हो जाता है और वह लौकिक, वैदिकादि जितने भी धर्म हैं, उन सबका परित्याग कर देता है। जैसे एक बैलको भूख लगी है, तो वह सुगम मार्गकी अपेक्षा न करके सीधा काँटोंवाली मेढ़ आदि बाधाओंको भी पार करके खेतमें चरने चला जाता है। इसी प्रकार जिस व्यक्तिको इसका लोभ हो जाता है, वह वेद-धर्मका परित्याग कर देता है। वेदके दो भाग हैं—एक रहस्यपूर्ण भाग है और दूसरा बाहरी भाग है। वह वेद-वेदान्त-उपनिषदादिके प्रतिपाद्य भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी भक्तिके रहस्यपूर्ण भागको ग्रहण करता है, किन्तु शरीर और मन सम्बन्धित वेदके बाहरी धर्मका त्याग कर देता है। साधारण योगी लोग कारीगरके द्वारा बनाये गये मोटे-मोटे कुण्डल अपने दोनों कानोंमें धारण करते हैं, किन्तु महाप्रभुके मनरूपी योगीने भागवतमें शुकदेव गोस्वामीके द्वारा वर्णित श्रीकृष्णलीला-मण्डलको शुद्ध शङ्ख-कुण्डलके रूपमें धारण किया है। सामान्य योगीके समस्त क्रियाकलापोंको महाप्रभुके मनरूपी योगीने भी स्वीकार किया है, किन्तु अन्य रूपमें। सामान्य योगी लोग सूखी हुई लौकीका पात्र बनाकर उसे साथ लेकर चलते हैं। उसीमें खाने-पीनेकी वस्तुएँ भर लेते हैं और बादमें निकालकर खा लेते हैं। महाप्रभुके मनरूपी योगीका तृणारूपी कृष्ण-माधुरीका लोभ उसके लिये कमण्डलु है। यही उसका भोजनका पात्र है। तृष्णा अर्थात् लोभ और 'कृष्णको मैं पाऊँगा' यह आशारूपी झोली है। तृष्णा और आशा—इसके द्वारा ही वह जीवित रहता है। 'किस प्रकार कृष्ण मिलेंगे'—उसकी एकमात्र यही चिन्ता है। यही उसके लिये गुदड़ी है। उसे अन्य कोई चिन्ता नहीं है। सांसारिक लोगोंकी सैकड़ों चिन्ताएँ हैं और मकड़ीके जालकी भाँति स्वयं ही वे उसे अपने चारों ओर बना लेते हैं। किन्तु महाप्रभुके मनरूपी योगीने तृष्णा या आशाकी झोली ली है कि कैसे कृष्ण मिलेंगे, कब कृष्ण मिलेंगे? बाउल योगी लोग जिस प्रकार दस-दस शिष्य बनाते हैं, उसी प्रकार महाप्रभुके मनरूपी योगीने 'महाबाउल' नाम धारण करके दस इन्द्रियोंको शिष्य बना लिया है। उनकी कोई इन्द्रिय किसी वेगके अधीन नहीं है। महाप्रभु अपने आचरणके द्वारा शिक्षा दे रहे हैं कैसे दस इन्द्रियोंको शिष्य बनाकर भोग-ग्रामसे निकालकर वृन्दावनमें ले जाना चाहिये। कृष्णविमुख मायाबद्ध जीवकी एक भी इन्द्रिय उसकी शिष्या नहीं है, अपितु वे उसकी स्वामिनी हैं। वह उनका शिष्य है। जैसा उसका मन कहता है, उसकी आँख कहती है, उसकी जिह्वा कहती है, वह वैसे ही करता है। विशेषकर जिह्वा उसकी स्वामिनी है, वह उसे वृन्दावनसे ठीक विपरीत दिशामें भोग-ग्राममें ले जाती है। वह सांसारिक विषय भोगोंको ही अपनी प्रचण्ड सम्पत्ति, महाधन समझता हैं। वह उसे ऐसे जकड़कर रखता है कि कभी कोई भिखारी, अतिथि अथवा वैष्णव भी आयें, तो उसमेंसे थोड़ा-सा भी धन नहीं देता। संसारमें कुछ दानी लोगोंका उदाहरण मिलता है। जैसे महाराज हरीशचन्द्रने अपने राज्यका, दधीचि ऋषिने वज्र बनानेके लिये अपने प्राणोंका और महाराज शिविने अपने शरीरके मांसका दान कर दिया। परन्तु उनका यह त्याग श्रीकृष्णकी प्रसन्नता अथवा प्रेमसेवाके लिये नहीं है। यह सात्त्विक त्याग है और उसके फलस्वरूप वे केवल इस जगत्में नश्वर उच्च लोकोंमें जानेके अधिकारी बने। परन्तु हम देखते हैं कि श्रीकृष्णकी प्रेमसेवा प्राप्तिके लिये श्रीरघुनाथदास गोस्वामी इन्द्रके समान ऐश्वर्य और अप्सराके समान पत्नीका त्याग