श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
बाइसवाँ अध्याय 22/7-15 ] शक्तिमान्-अभेद-तत्त्व हैं। 'शक्ति'-शब्दसे भूलकर भी किसीको जीवके स्वरूपका आवृत करनेवाली मायाशक्तिको नहीं समझना चाहिये। जो शक्ति श्रीकृष्ण-स्वरूपकी सेवामें ही केवलमात्र नियुक्त है, वह स्वरूपशक्ति उस मायाशक्तिसे पृथक् है। स्वरूपशक्ति और स्वरूपशक्तिमान् श्रीकृष्ण अभिन्न रूपमें अवस्थित हैं॥7॥ असंख्य वैकुण्ठोंमें स्वांश विष्णुरूपमें और ब्रह्माण्डोंमें जीवरूपमें लीला-विलास :- स्वांश-विभिन्नांश-रूपे हञा विस्तार। अनन्त वैकुण्ठ-ब्रह्माण्डे करेन विहार॥8॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण स्वांश और विभिन्नांश रूपमें अपना विस्तार करके असंख्य वैकुण्ठों एवं ब्रह्माण्डोंमें विहार करते हैं॥8॥ स्वांश-विलास चतुर्व्यूह और अवतारगण-श्रीकृष्णस्वरूप या शक्तिमान् हैं; जीव-विभिन्नांश या शक्तितत्त्व हैं :- स्वांश-विस्तार-चतुर्व्यूह, अवतारगण। विभिन्नांश जीव-ताँर शक्तिते गणन॥9॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण स्वांशका विस्तार चतुर्व्यूह और अवतारोंके रूपमें करते हैं। विभिन्नांश जीवोंकी गणना श्रीकृष्णकी शक्तिके रूपमें होती है॥9॥ दो प्रकारके जीव :- सेइ विभिन्नांश जीव-दुइ त' प्रकार। एक-'नित्यमुक्त', एक- 'नित्य-संसार' ॥10॥ अनुवाद-वे विभिन्नांश जीव दो प्रकारके हैं। एक-'नित्यमुक्त' और दूसरे 'नित्य-संसार' अर्थात् नित्यबद्ध हैं॥10॥ (1) नित्यमुक्तका चरित्र :- 'नित्यमुक्त'-नित्य कृष्णचरणे उन्मुख। 'कृष्ण-पारिषद' नाम, भुञ्जे सेवा-सुख॥11॥ अनुवाद-'नित्यमुक्त' जीव सदा श्रीकृष्णके उन्मुख रहकर उनके श्रीचरणोंकी सेवा करते हैं, वे श्रीकृष्णके परिकर कहलाते हैं और वे सेवारूपी सुखका आस्वादन करते हैं॥11॥ (2) नित्यबद्ध जीवका चरित्र :- 'नित्यबद्ध' - कृष्ण हैते नित्य-बहिर्मुख। 'नित्यसंसार', भुञ्जे नरकादि-दुःख॥12॥ अनुवाद-'नित्यबद्ध' जीव श्रीकृष्णसे अनादिकालसे बहिर्मुख हैं। इसलिये वे 'नित्यसंसार' अर्थात् भोक्ताभिमानसे सदा संसारमें ही बद्ध हैं और अपने कर्मोंके फलस्वरूप नरकादि दुःखोंका भोग करते हैं॥12॥ श्रीकृष्ण-विमुखताका फल अथवा दण्ड :- सेइ दोषे माया-पिशाची दण्ड करे तारे। आध्यात्मिकादि तापत्रय तारे जारि' मारे॥13॥ काम-क्रोधेर दास हञा तार लाथि खाय। भ्रमिते भ्रमिते यदि साधु-वैद्य पाय॥14॥ उद्धारका उपाय :- ताँर उपदेश-मन्त्रे पिशाची पलाय। कृष्णभक्ति पाय, तबे कृष्ण-निकट याय॥15॥ अनुवाद-श्रीकृष्णसे बहिर्मुखतारूपी दोषके कारण माया-पिशाची बद्धजीवोंको दण्डित करती है। वह उन्हें आध्यात्मिकादि (देह और मनके द्वारा प्रदत्त, दूसरे प्राणियोंके द्वारा प्रदत्त और दैविक प्रकोपके द्वारा प्रदत्त) तीन प्रकारके तापोंमें झुलसाकर कष्ट प्रदान करती है। बद्धजीव कामका दास बनकर और जब काम पूर्तिमें बाधा आती है, तब उससे उत्पन्न क्रोधका दास बनकर मायाकी ठोकरें खाता है। इस प्रकार ठोकरें खाते-खाते यदि उसे साधुरूपी वैद्यकी प्राप्ति होती है, तब साधुके उपदेशरूपी मन्त्रके द्वारा माया-पिशाची दूर भाग जाती है और वह जीव श्रीकृष्णभक्तिको प्राप्त करता है। भक्तिके प्रभावसे तब वह श्रीकृष्णके निकट पहुँच जाता है॥13-15॥ । 329
[ 22/8-18 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य—'स्वांश-रूपे'—अर्थात् चतुर्व्यूह हुई) और मेरी लज्जाकी भी उपशान्ति नहीं हुई। हे और उनके अवतारोंके रूपमें। स्वांश-अवस्थामें यदुपते! अन्तमें मैं उन्हें परित्याग करके सद्बुद्धि प्राप्त श्रीकृष्णका स्व-स्वरूपत्व सर्वत्र लक्षित होता है। करके आपके अभयचरणोंमें शरणागत हुआ हूँ, आप जीव—उनके विभिन्नांश रूप हैं। जीव भी श्रीकृष्णकी अब मुझे अपने दासके रूपमें नियुक्त करो॥16॥ शक्तिरूपमें गिने जाते हैं। जीव दो प्रकारके हैं—नित्यमुक्त अनुभाष्य— और नित्यसंसार (बद्ध)। नित्यमुक्त जीवोंने कभी भी कामादीनां (कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यादीनां) दुर्निदेशाः (दुष्टाः मायाके सम्बन्धका आस्वादन नहीं किया। वे श्रीकृष्णके आदेशाः) कतिधा (प्रकाराः) मया कति न पालिताः (अपि चिन्मय धाममें श्रीकृष्णचरणोंके उन्मुख रहकर तु पालिता एव); तेषां (कामादिरिपूणां) मयि करुणा (दया) 'श्रीकृष्ण-पार्षद'-नामसे जाने जाते हैं और श्रीकृष्णसेवा- न, त्रपा (ममापि लज्जा) न, उपशान्तिः (मम तद्विसर्जनेच्छापि) सुख ही उनका भोग है। नित्यबद्ध सभी जीव श्रीकृष्णसे न च जाता। अथ (अनन्तरं) हे यदुपते, साम्प्रतम् (इदानीं) नित्य बहिर्मुख रहकर संसारमें स्वर्ग-नरकादि सुख- तान् (कामादीन्) उत्सृज्य (रिपु-पारवश्यं त्यक्त्वा) लब्धबुद्धिः दुःखका भोग करते हैं। श्रीकृष्ण-बहिर्मुखता दोषके लिये (अभिज्ञः सन्) अभयम् (अकुतोभयं) त्वां शरणम् आयातः माया-पिशाची उन्हें स्थूल और सूक्ष्म आवरणमें बाँधकर (प्राप्तः); माम् आत्मदास्ये (निजकैङ्कर्ये) नियुङ्क्ष्व (नियोजय)। दण्ड प्रदान करती है अर्थात् आध्यात्मिकादि तीन श्लोक-भावानुवाद—काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद- प्रकारके ताप उन्हें बहुत ही जर्जरित करते हैं। वे मात्सर्य आदिके कितने दुष्ट आदेशोंका मैंने कितनी काम-क्रोधादि छः तरङ्गोंके वशीभूत होकर मायारूपी प्रकारसे पालन किया है, तो भी वे मेरे प्रति दया नहीं पिशाचीकी लातें खाते रहते हैं—यही जीवोंका रोग है। करते और [निर्लज्जकी भाँति उनकी सेवा करते हुए] संसारमें इस प्रकार ऊपर-नीचे (स्वर्ग-नरकमें) भ्रमण न ही मेरी लज्जा त्याग करनेकी इच्छा होती है। हे करते-करते जीव यदि कभी साधुरूपी वैद्यको प्राप्त यदुपते! अन्तमें अब मैं उन कामादि शत्रुओंकी करता है, तब उनके उपदेशरूपी मन्त्रसे माया-पिशाची वश्यताको त्यागकर सद्बुद्धि प्राप्त करके आपके भाग जाती है और जीव भी श्रीकृष्णभक्ति प्राप्त करके अभयचरणोंकी शरणमें आया हूँ, कृपा मुझे अपने श्रीकृष्णके निकट पहुँच जाता है॥8-15॥ दासके रूपमें नियुक्त कीजिये॥16॥
शरणागतकी प्रार्थना :- भक्ति ही निरपेक्ष अभिधेय और
भक्तिरसामृतसिन्धु (3/2/25)— कर्मज्ञानयोगादि भक्ति-सापेक्ष :-
कामादीनां कति न कतिधा पालिता दुर्निदेशा- कृष्णभक्ति हय अभिधेय-प्रधान। स्तेषां जाता मयि न करुणा न त्रपा नोपशान्तिः। भक्तिमुख-निरीक्षक कर्म-योग-ज्ञान॥17॥ उत्सृज्यैतानथ यदुपते साम्प्रतं लब्धबुद्धि- भक्तिके आश्रयके बिना कर्मज्ञानयोगादिकी निष्फलता :- स्त्वामायातः शरणमभयं मां नियुङ्क्ष्वात्मदास्ये॥16॥ एइ सब साधनेर अति तुच्छ बल। कृष्णभक्ति बिना ताहा दिते नारे फल॥18॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥16॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्, कामादिके कितने ही अनुवाद—श्रीकृष्णभक्ति ही प्रधान अभिधेय है। प्रकारके दुष्ट आदेशोंका ही मैंने (कितनी प्रकारसे) कर्म-योग-ज्ञान संसारसे मुक्तिके उपाय हैं, परन्तु फल पालन किया है। तथापि मेरे प्रति उनकी करुणा (नहीं देनेमें ये सब भक्तिपर निर्भर करते हैं। इस सब साधनोंका बल अति तुच्छ है और भक्तिके बिना ये
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बाईसवाँ अध्याय 22/17-20 ] स्वतन्त्ररूपसे फल देनेमें असमर्थ हैं॥17-18॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्रोंमें अनेक स्थानोंपर कर्मको, अनेक स्थानोंपर योगको और अनेक स्थानोंपर ज्ञानको ‘अभिधेय’ कहकर वर्णन किया गया है; तथापि सर्वत्र भक्तिको ही सर्वप्रधान ‘नित्य अभिधेय’ कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्णभक्ति ही परमपुरुषार्थ (प्रेम)को प्राप्त करनेका एकमात्र प्रधान अर्थात् 'साक्षात्' अभिधेय है; कर्म, योग और ज्ञानको जो अभिधेय रूपमें कहा है, वह—'गौण' है; क्योंकि, भक्तिके मुखकी अपेक्षा करके ही वे जो कुछ भी फलादि प्रदान कर सकते हैं। भक्तिके आश्रयके बिना कर्म, योग और ज्ञान कोई भी फल नहीं दे सकते। भक्तिका आश्रय प्राप्त करनेपर ही कर्म और हठ-योग भुक्ति-फल एवं ज्ञान और राजयोग मुक्ति और सिद्धि-फल दे सकते हैं॥17-18॥ भक्तिविहीन शुष्कज्ञान या निष्काम कर्म भी व्यर्थ :— श्रीमद्भागवत (1/5/12)में— नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाव-वर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे ना चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥19॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥19॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नैष्कर्म्यरूपी निर्मलज्ञान ही जब अच्युत भक्तिसे वर्जित होनेपर शोभा नहीं पाता, तब सदैव अभद्र (अशुभ) स्वभाववाले कर्म ईश्वरमें अर्पित नहीं होनेपर निष्काम होनेपर भी किस प्रकार शोभा पा सकते हैं?॥19॥ अनुभाष्य—श्रीव्यासदेवके द्वारा बहुत तप-अनुष्ठान और सभी शास्त्रोंका प्रणयन आदि करनेपर भी उनका चित्त प्रसन्न नहीं हुआ और वे सरस्वती नदीके तटपर अप्रसन्न चित्तसे मन-ही-मनमें अनेक प्रकारके तर्क-वितर्क और खेद कर रहे थे, तब उनके अन्तर्यामी गुरुदेव श्रीनारद गोस्वामी वहाँ आकर उपस्थित हुए। व्यासदेवने उनसे अपनी आत्माकी प्रसन्नताके अभावके कारणकी जिज्ञासा की, तब श्रीनारद कर्म और ज्ञान आदि सभी मार्गोंकी अपेक्षा शुद्ध हरिभक्तिके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं— अच्युतभाववर्जितम् (अच्युते कृष्णे भाववर्जितम् अनुकूलानुशीलनविहीनं चेत्) निरञ्जनं (निरुपाधिकं निर्मलमिति यावत्) नैष्कर्म्य (फलभोगराहित्यम् अपि) ज्ञानम् अलम् (अत्यर्थं) न शोभते (सम्यक् मोक्षाय न कल्पते); पुनः तथा शश्वत् (सर्वसमये साधनकाले प्राप्तिकाले च अतएव) अभद्रं (दुःखात्मकं) यत् च अकारणं कर्म (प्रवृत्तिपरं काम्य यद्यपि निवृत्तिपरम् अकाम्यं तच्चापि कर्म) ईश्वरे (विष्णौ) न अर्पितं (नोद्दिष्टं सत्) कुतः [शोभते? नैव हीति भावः]। श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके अनुकूल अनुशीलनसे विहीन फलभोगरहित निर्मलज्ञान ही जब शोभा नहीं पाता, तब जो सदैव (अर्थात् साधनकाल और फलप्राप्तिकाल, दोनोंमें) दुःख प्रदान करनेवाला है, वह कर्म विष्णुमें अर्पित नहीं होनेपर निष्काम होनेपर भी किस प्रकार शोभा पा सकता है? अर्थात् नहीं पा सकता—यह भाव है॥ ॥19॥ श्रीकृष्णको अर्पित किये बिना समस्त प्रकारके कर्मकाण्ड—संसारजनक :— श्रीमद्भागवत (2/4/17)में— तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मन्त्रविदः सुमङ्गलाः। क्षेमं न विन्दन्ति बिना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः॥20॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥20॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सभी तपस्वी, सभी दान-परायण व्यक्ति, सभी यशस्वी व्यक्ति, मनस्वी व्यक्ति, वेदोंके मन्त्रोंको जाननेवाले सभी व्यक्ति, उनके द्वारा किये गये वे कर्म सुमङ्गल होनेपर भी, जिन्हें अर्पण नहीं करनेसे कुछ भी मङ्गल प्राप्त नहीं कर सकते, उन सुभद्रश्रवा । 331
[ 22/20-22 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (मङ्गलकीर्तिवाले) भगवान्को पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ॥ 20 ॥ अनुभाष्य—परीक्षितके द्वारा मायाधीश श्रीहरिकी सृष्टि आदि लीलाके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर, श्रीशुकदेव श्रीहरि और उनकी सेवाके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं— तपस्विनः (तपोनिरताः ज्ञानिनः) दानपराः (वदान्याः) यशस्विनः (कीर्त्तिमन्तः) मनस्विनः (योगिनः) मन्त्रविदः (निगमागमविदः) सुमङ्गलाः (सदाचाराः) यदर्पणं (यस्मिन् श्रीहरौ पूर्वोक्त- तपादिना स्व-स्व-प्राप्यफलसमर्पणं) बिना (ऋते) क्षेमं (कल्याणं) न विन्दन्ति (न प्राप्नुवन्ति), तस्मै सुभद्रश्रवसे (मङ्गलकीर्त्तिविग्रहाय भगवते श्रीहरये) नमो नमः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 20 ॥ भक्तिविहीन ज्ञान मुक्तिप्रद नहीं; मुक्ति-भक्तिकी दासी :- केवल ज्ञान 'मुक्ति' दिते नारे भक्ति बिना। कृष्णोन्मुखे सेइ मुक्ति हय ज्ञान बिना॥ 21 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“ज्ञानतः सुलभा मुक्तिः”-इस शास्त्रवचनसे जाना जाता है कि ज्ञान ही मुक्ति दे सकता है, किन्तु उसमें एक गूढ़ बात यह है कि भक्तिके आश्रयसे ही ज्ञान मुक्ति दिया करता है। पक्षान्तरमें, श्रीकृष्णोन्मुखी भक्तिके उदित होनेपर किसी भी प्रकारकी ज्ञानकी चेष्टा नहीं करनेपर भी मुक्ति स्वयं ही उपस्थित होती है॥ 21 ॥ अनुभाष्य-केवल-ज्ञान अर्थात् भक्तिरहित सम्विद् वृत्तिका अनुभव जीवको जड़-बन्धनसे मुक्त नहीं करा सकता। ब्रह्मको जाननेके लिये जीव कितना ही (संसारकी सभी वस्तुओंको नकारते हुए) यह ब्रह्म नहीं है, यह ब्रह्म नहीं है क्यों न करे, उसमें श्रीकृष्ण-स्वरूपकी अज्ञानताके कारण अहंग्रहोपासना (जिसकी मैं उपासना कर रहा हूँ, मैं वही हूँ, यह बुद्धि) ही प्रबल हो जाती है और वह अधःपतित हो जाता है। ज्ञानानुशीलन नहीं करनेपर भी श्रीकृष्णकी सेवामें तत्पर होनेपर वह जीव ज्ञानके फल जड़-बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करके श्रीकृष्णके स्वरूपके अनुभवको प्राप्त करता है। श्रीकृष्णकर्णामृतमें- “भक्तिस्त्वयि स्थिरतरा भगवन् यदि स्याद्देवेन न फलति दिव्य-किशोरमूर्त्तिः। मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलिः सेवतेऽस्मान् धर्मार्थकामगतयः समय-प्रतीक्षाः॥” [अर्थात् “हे भगवन्! आपमें यदि हमारी अचला भक्ति रहे, तब आपकी अप्राकृत किशोरमूर्ति स्वतः ही हमारे हृदयमें उदित होती है। उस समय मुक्ति स्वयं हाथ जोड़कर हमारी सेवामें रत होती है और धर्म, अर्थ और काम भी सेवाके लिये आदेशके समयकी प्रतीक्षा करते हैं।”]॥ 21 ॥ भक्तिमार्गमें ही एकमात्र नित्य कल्याण, उसके अतिरिक्त शुष्क ज्ञानसे वृथा परिश्रम ही सार (फल) :- श्रीमद्भागवत (10/14/4)में— श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये। तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद् यथा स्थूलतुषावघातिनाम्॥ 22 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 22 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे विभो! आपमें भक्ति ही कल्याणका पथ है, उसे परित्याग करके जो सब व्यक्ति केवल ज्ञान प्राप्तिके लिये अर्थात् 'मैं ब्रह्म' हूँ, इसको ही स्थिर रूपमें जाननेके लिये अनेक प्रकारके कष्ट स्वीकार करते हैं, खाली भूसीको पीसनेवालोंको जिस प्रकार चावल नहीं मिलते, उसी प्रकार, उन्हें अन्तमें क्लेशमात्र ही प्राप्त होता है॥ 22 ॥ अनुभाष्य-बछड़ोंको हरण करनेके फलस्वरूप श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माके अभिमानके चूर्ण होनेपर ब्रह्मा श्रीकृष्णके एकान्त शरणागत होकर स्तव कर रहे हैं- हे विभो (भगवन्), ये (जनाः आरोहवादि-तर्कपन्थिनः) श्रेयःसृतिं (श्रेयसां अभ्युदयापवर्गलक्षणानां सृतिं सरणं मार्गभूतां) ते (तव) भक्तिं (शुद्धभजनम्) उदस्य (त्यक्त्वा) केवलबोधलब्धये 332 |
बाइसवाँ अध्याय 22/22-28 ] (भक्तिरहितज्ञानमात्र-प्राप्तये) क्लिश्यन्ति (वैराग्यतपः-क्लेशादिकं स्वीकुर्वन्ति), तेषां (निर्भेद-ब्रह्मवादि-शुष्क-ज्ञानिनां) यथा स्थूलतुषावघातिनां (शस्यानन्तःकणहीनान् स्थूल-धान्याभासान् तुषान् अवघ्नतां यथा व्यर्थश्रमः एव भवति, तथा) असौ (शास्त्राभ्यास-षट्क-साधनादिजनितः) क्लेशालः (क्लेशः व्यर्थश्रमः) एव शिष्यते (अवशिष्यते) न अन्यत् (तेषां न किञ्चित् तदितरं फलम्—तेषां ज्ञानप्राप्तिरपि दुर्लभा एवेत्यर्थः) । श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 22 ॥ भगवान्के शरणागतकी ही मायासे मुक्ति :- श्रीमद्भगवद्गीता (7/14)में— दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ 23 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 23 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह माया मेरी ही शक्ति है, इसलिये दुर्बल जीवके लिये स्वभावतः ही इसका अतिक्रम करना अति कठिन है। जो मेरे भगवत्- स्वरूपकी शरणागति स्वीकार करते हैं, केवल वे ही इस माया समुद्रसे पार हो सकते हैं ॥ 23 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 20/121 संख्या देखें ॥ 23 ॥ जीवके संसार-बन्धनका कारण :- ‘कृष्ण-नित्यदास’—जीव, ताहा भुलि’ गेल। एइ दोषे माया तार गिलाय बान्धिल ॥ 24 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 24 ॥ अनुभाष्य—'जीव श्रीकृष्णका नित्यदास है'—इस सत्यको भूलनेके कारण ही मायाने जीवको अनेक प्रकारसे लुब्ध और विमोहित करके तीन गुणोंकी बेड़ीसे उसके गलेको बाँध रखा है। इस कारण बद्धजीवका भोगवासनारूपी मायिक-बेड़ीके बन्धनसे छूट पाना कठिन है ॥ 24 ॥ उद्धार और प्रयोजनकी प्राप्तिका एकमात्र उपाय :- ताते कृष्ण भजे, करे गुरुर सेवन। मायाजाल छुटे, पाय कृष्णेर चरण ॥ 25 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 25 ॥ अनुभाष्य—गुरुसेवा और श्रीकृष्णभजनके बलसे ही बद्धजीव मायाजालसे मुक्त होकर श्रीकृष्णके चरणकमलोंको प्राप्त करता है ॥ 25 ॥ भक्तिविहीन वर्णाश्रमधर्मके पालनसे नरककी प्राप्ति :- चारि वर्णाश्रमी यदि कृष्ण नाहि भजे। स्वकर्म करिते से रौरवे पड़ि’ मजे ॥ 26 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 26 ॥ अनुभाष्य—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने- अपने वर्ण धर्मका भली-भाँति पालन करनेपर भी, अथवा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी अपने- अपने आश्रमधर्मका भली-भाँति पालन करनेपर भी यदि वे श्रीकृष्णभजन नहीं करते, तब वे लौकिक अभिमानके कारण उच्च अवस्था प्राप्त करनेपर भी अन्तमें पुण्यके क्षय होनेपर रौरव नामक नरकमें अवश्य ही पतित होते हैं। अप्राकृत भक्तिके अनुशीलनके अतिरिक्त विषयी वर्णाश्रमीका कोई भी मङ्गल नहीं हो सकता ॥ 26 ॥ दैववर्णाश्रम-धर्मकी उत्पत्ति :- श्रीमद्भागवत (11/5/2-3)में— मुखबाहूरुपादेभ्यः पुरुषस्याश्रमैः सह। चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादयः पृथक् ॥ 27 ॥ भक्तिके प्रतिकूल आसुरी-वर्णाश्रमीको नरककी प्राप्ति :- य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम्। न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्भ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥ 28 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 27-28 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ब्रह्माके मुखसे 'ब्राह्मण', भुजासे 'क्षत्रिय', जङ्घासे 'वैश्य' और पैरोंसे 'शूद्र'—ये चार वर्ण पृथक् पृथक् आश्रमोंके साथ और अपने वर्णगत गुणोंके साथ उत्पन्न हुए थे। इन चारों वर्णाश्रमियोंमेंसे जो अपने प्रभु भगवान् विष्णुका साक्षात् भजन नहीं करके, अपने-अपने वर्णाश्रमके अहङ्कारके कारण उनके भजनमें । 333
[ 22/27-30 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अवज्ञा करते हैं, वे अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर अधःपतित हो जाते हैं॥27-28॥ अनुभाष्य-श्रीनारद श्रीवसुदेवको श्रीभागवत धर्मका वर्णन करते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्र-संवादका वर्णन कर रहे हैं; 'हरिभजन विमुख गोदास (इन्द्रियोंके दास)की क्या गति होती है?'-महाराज निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक चमस ऋषि निम्नलिखित दो श्लोकोंमें भक्तिके अनुकूल दैव-वर्णाश्रम-सृष्टि और उसके व्यभिचारीकी दुरावस्थाका वर्णन कर रहे हैं- पुरुषस्य (भगवतः वैराजस्य ब्रह्मणः) मुखबाहूरुपादेभ्यः गुणैः (सत्त्वरजस्तमोगुणैः) आश्रमैः (ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थ- भिक्षुकाक्रमचतुष्टयैः) सह पृथक् विप्रादयः (ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः) चत्वारः वर्णाः जज्ञिरे। एषां (विप्रक्षत्रियवैश्यशूद्राणां ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थयतीनां मध्ये) ये (जनाः) साक्षात् आत्मप्रभवम् (आत्मनः प्रभवः जन्म प्राकट्यं वा, यस्मात् तम्) ईश्वरम् [अज्ञात्वा कृतघ्नाः सन्तः] न भजन्ति, अवजानन्ति (ज्ञात्वापि वर्णाश्रम- मर्यादा-मदभरेण कृष्णभजनस्यावश्यकता नास्तीति मन्यमानाः द्विषन्ति), [ते हरि-गुरु-वैष्णव-सेवा-विहीनाः] स्थानात् (स्व-स्व-वर्णाश्रमात्) भ्रष्टाः (सन्तः) अधःपतन्ति (निरयं यान्ति); [यतः प्राकृतवर्णाश्रमधर्मः अनित्यः कालक्षुब्धश्च तात्कालिक-फलोपयोगी असच्छब्द-वाच्यश्च]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [जो प्राकृतवर्णाश्रमधर्म है, वह केवल अनित्य और क्षणिक-फलकी प्राप्तिके लिये उपयोगी है, अतः उसे असत्-धर्म ही कहा जायेगा।]॥ 27-28॥ भक्ति-रहित मुक्ताभिमानी ज्ञानी भी अशुद्ध-मनोधर्मी, शुद्धभक्त ही निर्मल आत्मधर्मी :- ज्ञानी जीवन्मुक्तदशा पाइनु करि' माने। वस्तुतः बुद्धि 'शुद्ध' नहे कृष्णभक्ति बिने॥29॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥29॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मायावादादि मतावलम्बी व्यक्ति आपने आपको 'ज्ञानी' कहते हैं, किन्तु वास्तवमें श्रीकृष्णभक्तिके बिना बुद्धि शुद्ध नहीं होती॥ 29 ॥ अनुभाष्य-यद्यपि ज्ञानी मान सकते हैं, - 'मैं जीवनकालमें ही संसार-बन्धनसे मुक्त हो गया हूँ', तथापि श्रीकृष्णभक्तिके अतिरिक्त अहंग्रहोपासनासे बुद्धि शुद्ध नहीं हो सकती। क्योंकि मुक्तिकामी व्यक्ति जीवित अवस्थामें अपने आपको बद्ध जानकर उससे मुक्त और मुक्त-अवस्था जानकर उसके अतिरिक्त दृश्य वस्तुओंमें बद्ध मानता है, इसलिये वह ऐसे अनित्य भावसमूहके हाथोंसे मुक्त नहीं हो पाता॥ 29 ॥ श्रीकृष्णभक्तिरहित शुष्कज्ञानीको अधोगतिकी प्राप्ति :- श्रीमद्भागवत (10/2/32) में- येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्य- स्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रे पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥30॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 30 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया हूँ, ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित होते हैं॥ 30॥ अनुभाष्य-कंसके कारागारमें बद्ध देवकीके गर्भमें आविर्भूत होनेपर ब्रह्मादि देवता 'गर्भस्तोत्र'-नामसे प्रसिद्ध स्तवसे भगवान्की स्तुति कर रहे हैं- हे अरविन्दाक्ष, (पद्मपलाशलोचन,) अन्ये (अभक्ताः जनाः) ये विमुक्तमानिनः (विमुक्ताः-ज्ञानिनः वयमिति मन्यमानाः) त्वयि (भगवति) अस्तभावात् (अस्तः निरस्तः अतएव असन् यः भावः तस्मात्, भक्तेरभावात् तदनुशीलनराहित्यात्) अविशुद्धबुद्धयः (न विशुद्धा बुद्धिः येषां ते तथा, मुक्तिपिशाचीं बहुमन्यमानाः ज्ञानजनित-कैतव-कल्मषकषाय-दुष्टमतयः इत्यर्थः) कृच्छ्र स्वामिचरणाः, मोक्षपीठादव्यवहितप्रदेशम्) आरुह्य (अधिरुह्य) अनादृतयुष्मदङ्घ्रयः (न आदृतौ युष्मदङ्घ्री यैः ते, तव पादपद्मानित्यसेवयाः अनादरेण अपराधवशात् कृष्णकृपारज्जुविच्छिन्नाः 334 ।
बाइसवाँ अध्याय 22/30-32 ]
सन्तः) ततः (परमोच्चज्ञानाख्य-पीठाप्रान्तात्) अधः पतन्ति (अज्ञानान्धकारे संसार-तमिस्रे निमज्जन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ३० ॥ श्रीकृष्ण-दर्शनमें मायाका दर्शन नहीं, माया-दर्शनमें श्रीकृष्णका दर्शन नहीं :— कृष्ण—सूर्यसम, माया हय अन्धकार। याँहा कृष्ण, ताँहा नाहि मायार अधिकार ॥ ३१ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण सूर्यके समान हैं और माया अन्धकार सदृश है। जहाँपर श्रीकृष्ण हैं, वहाँ मायाका अधिकार नहीं हो सकता ॥ ३१ ॥ अनुभाष्य—भागवतमें चतुःश्लोकीमें लिखा हुआ है— “ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथा भासः यथा तमः॥” [अर्थात् “वास्तव प्रयोजन तत्त्वके अतिरिक्त जो कुछ भी प्रतीत होता है अथवा सत्तायुक्त होनेपर भी मेरे अधिष्ठानमें जिसकी प्रतीति नहीं है, उसे ही मेरी माया समझो।”] प्रकाशके रहनेपर जिस प्रकार अन्धकार नहीं रहता, उसी प्रकार जीव श्रीकृष्णोन्मुख होनेपर मायिक वासनाओंके हाथसे मुक्त हो जाता है। श्रीकृष्णभक्तके अतिरिक्त ज्ञानी, कर्मी और अन्याभिलाषी व्यक्तिको माया ग्रास करती है ॥ ३१ ॥
दुर्बुद्धि व्यक्ति 'मैं', 'मेरा' इस प्रकारकी बहुतसी बातोंके जालको प्रकाशित करते हैं ॥ ३२ ॥ अनुभाष्य—यहाँपर पाठान्तरमें (भाः 2/7/47) श्लोक उद्धृत हुआ है— “शश्वत् प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं शुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्त्वम्। शब्दो न यत्र पुरुकारकवान् क्रियार्थो माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना। तद्वै पदं भगवतः परमस्य पुंसो ब्रह्मेति यद्विदुरजस्रसुखं विशोकम्॥” अर्थात् “मुनिगण जिस वस्तुको 'बृहत् निर्विकल्प-ब्रह्म' कहकर जानते हैं, वही परम-पुरुष भगवान्का प्रथम प्रतीति-स्वरूप है। यह ब्रह्म निरन्तर-सुख-युक्त, शोकरहित, नित्य-प्रशान्त, भेदशून्य, अभय, ज्ञानैकरस, शुद्ध, विषयकरण-सङ्गशून्य, परमात्म-तत्त्व, उत्पत्ति आदि चार प्रकारके क्रियाफलोंका प्रकाशक है। कर्मकाण्डीय-शब्द-कार्य उनका बोध करानेवाला नहीं हो सकता और माया उनके सामने जानेमें लज्जा अनुभव करती है और उनसे दूर भाग जाती है।” देवर्षि नारदके द्वारा लोकपितामह ब्रह्माको तपस्यामें प्रवृत्त देखकर उनके अतिरिक्त भी जो एक स्वतन्त्र सर्वेश्वरेश्वर नियन्त्रण करनेवाला है, उसके विषयमें जिज्ञासा करनेपर ब्रह्मा उन परमात्मा श्रीहरिकी लीला और मायाके द्वारा सृष्टि आदिका वर्णन कर रहे हैं— यस्य (भगवतः) ईक्षापथे (नेत्रगोचरे) स्थातुं विलज्जमानया (मत्कपटोऽसौ प्रभुर्जानातीति लज्जायुक्तया) अमुया (मायया) विमोहिताः (मुग्धाः) दुर्धियः (अविद्यावृत्तज्ञानाः असद्वियः जीवाः एव केवलं) 'मम' 'अहम्' इति [एतत्] विकत्थन्ते (आत्मानं श्लाघ्यन्ते) [तस्मै नमः इति पूर्वेणान्वयः]।
दासी मायाको अपने प्रभुके सामने खड़े होनेमें लज्जा, दूसरी ओर, प्रभुसे विमुख लोगोंको विपरीत बुद्धि देकर कारागारमें बन्द करनेवाली :— श्रीमद्भागवत (2/5/13)में— विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया। विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥ ३२ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ३२ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णके सामने आनेपर माया लज्जित होती है। उस मायाके द्वारा विमोहित होकर श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके सामने आनेपर माया यह सोचकर कि मेरे प्रभु मेरी कपटता जानते हैं, इसलिये लज्जित होती है। उस मायाके द्वारा विमोहित होकर विपरीत बुद्धिग्रस्त व्यक्ति 'मैं', 'मेरा' इस प्रकार कहकर अपनी प्रशंसा करते हैं ॥ ३२ ॥
। 335
[ 22/33–36 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आत्मनिवेदनकारी सम्बन्धज्ञान-प्राप्त साधककी अनर्थ-निवृत्ति :- 'कृष्ण, तोमार हङ' यदि बले एकबार। मायाबन्ध हैते कृष्ण तारे करे पार ॥ 33 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो सब समय केवल मुखसे अभ्यासवशतः “कृष्ण मैं तुम्हारा हूँ”—यह बात बार-बार बोलते हैं, उनकी यह बात सहृदय (सरल) नहीं हैं; किन्तु जो एकबार भी सहृदय (काय-मन और वचनसे) “हे कृष्ण, मैं—आपका दास हूँ”—यह बात कहते हैं, उन्हें श्रीकृष्ण मायाके बन्धनसे पार करते हैं ॥ 33 ॥ परमदयालु श्रीकृष्णकी आश्वासन देनेवाली वाणी :- हरिभक्तिविलास (11/337)में उद्धृत श्लोक, रामायणके लङ्काकाण्ड (18/33)में विभीषणके साथ मिलनके सम्बन्धमें श्रीरामचन्द्रने सुग्रीवसे कहा— सकृदेव प्रपन्नो यस्तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वदा तस्मै ददाम्येतद्व्रतं मम ॥ 34 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 34 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरा यह व्रत है कि यदि कोई वास्तवमें शरणागत होकर एकबार भी “मैं तुम्हारा हूँ” यह कहकर मुझसे अभयकी याचना करता है, तब मैं उसे सदैव अभय प्रदान करता हूँ ॥ 34 ॥ अनुभाष्य— यः (जनः) प्रपन्नः (शरणागतः सन्) तवास्मि (त्वया सह नित्यदास्यसूत्रे आबद्धः भवामि) इति सकृदेव (बारमेकं) च याचते (काकुयुक्तं प्रार्थयते), अहं (दाशरथिः भगवान्) तस्मै सर्वदा अभयं ददामि,—एतत् (एव) मम व्रतं (प्रतिज्ञातम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 34 ॥ सकाम अशान्त पुरुषोंको निरन्तर भजनके फलसे शान्तिकी प्राप्ति :- मुक्ति-भुक्ति-सिद्धिकामी 'सुबुद्धि' यदि हय। गाढ़-भक्तियोगे तबे कृष्णेरे भजय ॥ 35 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 35 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—दुर्वासना और दुःसङ्गके कारण जीवकी मुक्ति, भुक्ति और सिद्धि-कामनाएँ उदित होती हैं। यदि किसी सत्सङ्गसे सुबुद्धि उदित होती है, तब वह जीव मुक्ति-भुक्ति-सिद्धिके लोभका परित्याग करके गाढ़ शुद्धभक्तियोगके द्वारा श्रीकृष्णका भजन करता है ॥ 35 ॥ बुद्धिमान् व्यक्तिके लिये श्रीकृष्णभजन करना ही उचित :- श्रीमद्भागवत (2/3/10)में— अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ 36 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 36 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पहले कोई 'अकाम' अर्थात् सर्वकामनाओंसे रहित हो अथवा 'सर्वकाम' अर्थात् सब प्रकारकी कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्षकी कामना करनेवाला ही क्यों न हो, उदार-बुद्धि होने मात्रसे ही मनुष्य तीव्र शुद्धभक्तियोगसे परमपुरुष श्रीकृष्णका भजन करेंगे ॥ 36 ॥ अनुभाष्य—“जो अल्प समयमें ही मरनेवाला है, ऐसे मनुष्यका क्या कर्त्तव्य है?”—परीक्षितके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीशुकदेव जीवके लिये अहैतुकी शुद्धकृष्णभक्तिको ही एकमात्र नित्यधर्म कहकर दुर्बलचित्त कामी व्यक्तियोंके लिये भी श्रीहरिका भजन करना ही कर्त्तव्य है, यह कह रहे हैं— सर्वकामः (उक्तानुक्तसर्वकामना-युक्तः) मोक्षकामः (मुमुक्षुः) अकामः (एकान्त शुद्धभक्तः) वा, उदारधीः (सुधीः पुरुषः) तीव्रेण (दृढ़ेन स्वभावतः एव अप्रतिहतेन) भक्तियोगेन परं (मायाधीशं) पुरुषं (पुरुषोत्तमं) यजेत (सेवेत)। श्लोक-भावानुवाद—कही गयी अथवा न कही गयी सभी प्रकारकी कामनाओंसे युक्त अथवा मोक्षकामी अथवा अकाम अर्थात् एकान्त शुद्धभक्त, इनमेंसे कोई भी क्यों न हो, बुद्धिमान् व्यक्तिको दृढ़तापूर्वक निरन्तर 336
बाइसवाँ अध्याय 22/36-41 ] भक्तियोगके द्वारा मायाधीश पुरुषोत्तमकी सेवा करनी चाहिये॥ 36 ॥ श्रीकृष्णकी अहैतुकी दयाका परिचय :- अन्यकामी यदि करे कृष्णेर भजन। ना मागिलेह कृष्ण तारे देन स्व-चरण॥ 37 ॥ कृष्ण कहे,-"आमा भजे, मागे विषय-सुख। अमृत छाड़ि' विष मागे, - एइ बड़ मूर्ख ॥ 38 ॥ आमि-विज्ञ, एइ मूर्खे 'विषय' केने दिब? स्वचरणामृत दिया 'विषय' भुलाइब ॥ "39 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 37-39 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मुक्ति, भुक्ति और सिद्धिकी कामना करनेवाले शुद्धभक्तिकी कामना करनेवाले नहीं हैं। किसी सौभाग्यसे यदि वे शुद्ध श्रीकृष्णभजनमें लग जाँय, तो साधनभक्तिका फल जो श्रीकृष्णप्रेम है, यद्यपि तब उनका उद्देश्य नहीं भी हो, तथापि श्रीकृष्ण कृपा करके उन्हें वह प्रदान करते हैं। श्रीकृष्ण यह बात कह रहे हैं,-"इस समय भजनमें लगे हुए इस व्यक्तिके हृदयमें विषय-सुखकी कामना थी और बादमें वह कुछ स्वभावगत हो गई है। अब इसमें प्रेमरूपी अमृतको छोड़कर विषयरूपी विषकी वासना है, इसलिये यह व्यक्ति बड़ा ही मूर्ख है। यद्यपि यह व्यक्ति अज्ञानतावश सद्-विषयकी प्रार्थना नहीं कर पा रहा है, किन्तु मैं-विद्वान और सब कुछ जाननेवाला हूँ, इसके लिये जो सत् और असत् है, उसे जानता हूँ, इसलिये मैं अपना चरणामृत देकर इसकी विषयरूपी विषकी प्यासको भुलवा दूँगा॥ "37-39 ॥ सकाम उपासककी भी श्रीकृष्ण-कृपासे शुद्धभक्तिकी कामना अथवा निष्कामता :- श्रीमद्भागवत (5/19/26)में- सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां नैवार्थदो यत् पुनरर्थिता यतः। स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता- मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम्॥ 40॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्ण प्रार्थना किये जानेपर मनुष्योंकी प्रार्थनाको पूर्ण करते हैं, यह बात सत्य है। किन्तु जिस अर्थसे (भोगकी वस्तुसे) बार-बार भोगके लिये प्रार्थना उदित होती है, श्रीकृष्ण उस अर्थको नहीं देते। अन्यकामी होकर जो एकमात्र उनके पादपल्लवको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करनेपर भी उनका भजन करते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें स्वयं ही अन्य-कामनाओंको शान्त कर देनेवाले अपने चरणकमलोंको दिया करते हैं॥ 40 ॥ अनुभाष्य-देवता भी मानव-जन्मकी सभी जन्मोंकी अपेक्षा श्रेष्ठता और प्रयोजनीयता एवं मनुष्योंमें अवतरित श्रीहरि और अहैतुकी शुद्ध हरिभक्तिके माहात्म्यका गान करते हैं, उसीको श्रीशुकदेव महाराज परीक्षितको बतला रहे हैं- [सः हरिः कामिभिः] अर्थितः (प्रार्थितः सन्) नृणां (कामिनां पुंसाम्) अर्थितं (प्रार्थितम् अभीष्टं द्रव्यं) दिशति (ददाति इति) सत्यम्, [तथापि सः प्रभुः प्रायशः तेषाम्] अर्थदः (परमार्थप्रदः) न [भवत्येव]; यत् (यस्मात्) यतः (दत्तादनन्तरं सकामैः पुरुषैः) पुनः अपि अर्थिता (कामपूरण- प्रार्थना) भवति। [तु] अनिच्छतां (निष्कामानां) भजतां (सेवकानाम्) इच्छापिधानं (इच्छानां वासनानां पिधानम् आच्छादकं सर्वकामपरिपूरकं) स्वयम् एव विधत्ते (सम्पादयति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥ किसी-किसी सकाम उपासककी शुद्धभक्तिके अतिरिक्त असत् कामनाके रहनेपर भी निरन्तर सेवानन्दके प्रभावसे ऐसे अशुभका नाश होता है, तो भी सकामभाव निष्कामभावका कारण नहीं :- काम लागि' कृष्णे भजे, पाय कृष्ण-रसे। काम छाड़ि' 'दास' हैते हय अभिलाषे॥ 41 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सामान्य कामनाओंके उद्देश्यसे यदि कोई श्रीकृष्णभजनके मार्गको खोजते हुए साधुसङ्गमें शुद्ध श्रीकृष्णभजनको अपना ले, तब उसकी पहले । 337
[ 22/41–44 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
चाही गयी कामनाएँ दूर हो जाती हैं और उसे श्रीकृष्णरस प्राप्त होता है। श्रीकृष्णभजन ऐसी एक पवित्र वस्तु है कि श्रीकृष्णभजनमें प्रवृत्त व्यक्ति पहले चाही गयी कामनाओंको त्याग करके श्रीकृष्णदास बननेकी अभिलाषा करता है॥41॥
अनुभाष्य-अनन्त श्रीकृष्णविमुख जीव उपायरहित होकर संसारमें उच्च-नीच योनियोंमें भ्रमण कर रहे हैं। उनमेंसे किसीकी कोई सुकृति उदित होनेपर, वह व्यक्ति महत् व्यक्तिके चरणोंकी सेवाके प्रभावसे संसारसे पार हो जाता है। नदीमें लकड़ीके बहुतसे टुकड़े तैरते हुए जाते हैं; प्रवाहकी ठोकरोंसे कोई एक लकड़ीका टुकड़ा तटपर आकर लगता है, अन्य लकड़ीके टुकड़े जलके प्रवाहमें आगे बढ़ते ही जाते हैं॥43॥
सकाम ध्रुवकी श्रीहरिके दर्शन होनेपर प्रार्थना :- हरिभक्तिसुधोदयमें ध्रुव-चरित्र (7/28)में- स्थानाभिलाषी तपसि स्थितोऽहं त्वां प्राप्तवान् देवमुनीन्द्रगुह्यम्। काचं विचिन्वन्नपि दिव्यरत्नं स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे ॥42॥
श्रीमद्भागवत (10/38/5)- मैवं ममाधमस्यापि स्यादेवाच्युतदर्शनम्। ह्रियमाणः कालनद्या क्वचित्तरति कश्चन ॥44॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥42॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥44॥
अमृतप्रवाह भाष्य-ध्रुवको जब श्रीकृष्णने वर देनेकी इच्छा की, तब ध्रुवने कहा, - हे स्वामी, मैं (विश्वके स्वामी) पदकी अभिलाषासे आपकी तपस्यामें रत हुआ था, किन्तु अब देवताओं और मुनियोंके लिये भी दुर्लभ आपको प्राप्त करके मैं कृतार्थ हो गया हूँ। सामान्य काँचको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मुझे दिव्यरत्न मिल गया है। मैं कृतार्थ हो गया हूँ, अब किसी अन्य वरकी याचना नहीं करता हूँ॥42॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'मैं अत्यन्त अधम होनेके कारण भगवान्का दर्शन प्राप्त नहीं कर पाऊँगा'-मेरी ऐसी आशङ्का झूठी है। कालरूपी नदीके वेगमें बहते-बहते कदाचित् कोई-कोई नदीके पार भी लग जाता है॥44॥
अनुभाष्य-देवर्षि नारदके द्वारा कंसवधादि कार्योंके विषयमें बतलानेके बाद प्रस्थान करनेपर, महात्मा अक्रूर राम-कृष्णको लानेके लिये गोकुल-यात्रा करते हुए मार्गमें अपने श्रीकृष्णदर्शनके सौभाग्यका विचार कर रहे हैं-
अनुभाष्य- स्थानाभिलाषी (स्थानं पदम् अभिलषितुं शीलमस्य तथाभूतः) अहं तपसि स्थितः; हे प्रभो, काचं विचिन्वन् (अन्वेषणं कुर्वन्) दिव्यरत्नम् (इव) देवमुनीन्द्रगुह्यं (देवानां मुनीन्द्राणामपि गुह्यं दुर्लभं) त्वां प्राप्तवान्; हे स्वामिन्, अहं कृतार्थः अस्मि, [अतः अन्यं] वरं न याचे (ना प्रार्थये)।
[एतदुत्तमश्लोकदर्शनं मम दुर्लभम् एवं मन्ये; यद्वा,] मैवम्; अधमस्य (नीचस्यापि) मम अच्युतदर्शनं स्यात् एव; (यतः) कालनद्या ह्रियमाणः कश्चन क्वचित् तरति। अयं भावः-यथा नद्यां ह्रियमाणानां तृणादीनां किञ्चित् कदाचित् तरति, तथा कर्मवशेन कालेन ह्रियमाणानां क्वचित् जीवानामापि मध्ये कश्चित् तरेदिति सम्भवतीत्यर्थः।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥42॥
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इसका भाव यह है-जिस प्रकार नदीमें बहते तिनकोंमेंसे कोई तिनका किनारे लग जाता है, उसी प्रकार कर्मके वशीभूत कालके प्रवाहमें बहते हुए जीवोंमेंसे कोई कभी तर जाता है, ऐसा सम्भव है॥44॥
सुकृतिमान् जीवका वर्णन :- संसार भ्रमिते कोन भाग्ये केह तरे। नदीर प्रवाहे येन काष्ठ लागे तीरे ॥43॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥43॥
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बाइसवाँ अध्याय 22/45-48 ] भक्ति उन्मुखी सुकृतिके फलसे बद्धजीवको सिद्धिकी प्राप्ति :- कोन भाग्ये कारो संसार क्षयोन्मुख हय। साधुसङ्गे तरे, कृष्णे रति उपजाय ॥ 45 ॥ अनुवाद—किसी सौभाग्यसे जब जीवका संसारसे तरनेका समय आता है, तब उसका संसार क्षय होने लगता है और उसे साधुसङ्ग प्राप्त होता है। साधुसङ्गसे उसकी श्रीकृष्णमें रति उत्पन्न हो जाती है॥ 45 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यहाँपर 'भाग्य'-शब्दका अर्थ क्या केवल घटनामात्र है अथवा और कुछ है? भक्तिशास्त्र 'सुकृति'को ही 'भाग्य' कहते हैं। सुकृति तीन प्रकारकी है—भक्ति-उन्मुखी सुकृति, भोग-उन्मुखी सुकृति और मोक्ष-उन्मुखी सुकृति। जो सब कार्य संसारमें शुद्धभक्तिको उत्पन्न करनेवालेके रूपमें स्थिर किये गये हैं, वे सब कार्य भक्ति-उन्मुखी सुकृतिको उत्पन्न करते हैं। जिन सब कार्योंका फल—विषयभोग है, वे सब कार्य ही भोग-उन्मुखी सुकृति प्रदान करनेवाले हैं। जिन सब कार्योंका फल मोक्ष है, वे सब कार्य ही मोक्ष-उन्मुखी सुकृति उत्पन्न करनेवाले हैं। संसारके क्षय होनेपर स्वरूपधर्म श्रीकृष्णभक्तिका उद्घाटन करनेवाली सुकृति जब पुष्ट होकर फलोन्मुखी होती है, तभी भक्त साधुसङ्गमें संसारसे उद्धार प्राप्त करता है और श्रीकृष्णमें उसकी रति उत्पन्न होती है॥ 45 ॥ सुकृतिके फलसे साधुसङ्ग, उसके फलसे भजनमें प्रवृत्ति और अनर्थनिवृत्तिके क्रमसे साधनकी सिद्धि अथवा साध्य श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- श्रीमद्भागवत (10/51/53)में— भवापवर्गो भ्रवतो यदा भवे- ज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागमः। सत्सङ्गमो यर्हि तदैव सद्गतौ परावरेशे त्वयि जायते रतिः॥ 46 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 46 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे अच्युत, संसारमें भ्रमण करते-करते जब भवसागरसे पार होनेका फल उपस्थित होता है, तब यदि जीवको सत्सङ्गकी प्राप्ति होती है, तभी उसकी सद्गति और परमेश्वर-स्वरूप आपमें रति उत्पन्न होती है॥ 46 ॥ अनुभाष्य—कालयवन-दैत्यके पदके आघातसे निद्रासे उठे मुचुकुन्दके दृष्टिपातसे उनको देवताओंसे पूर्वमें प्राप्त वरके प्रभावसे कालयवनके भस्म होनेपर श्रीकृष्ण मुचुकुन्दको वर देनेके लिये उद्यत हुए, तब मुचुकुन्द श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं— हे अच्युत, भ्रमतः (संसरतः) जनस्य यदा (भगवदनु- कम्पया) भवापवर्गः (भवस्य संसारस्य अपवर्गः अन्तः नाशः) भवेत्, (प्रातःकालः स्यादित्यर्थः), [तदा] सत्समागमः (साधुसङ्गः) भवेत्, यर्हि (यदा) सत्सङ्गमः हि भवेत्, [तदा] एव सद्गतौ (सर्वोत्तम-जनप्राप्ये नित्यपरमपदे) परावरेशे (भगवति कृष्णे) त्वयि रतिः (भक्तिः) जायते [ततो संसारात् मुच्यते इति भावः]॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 46 ॥ श्रीकृष्णकी कृपासे ही गुरुकी कृपाकी प्राप्ति :- कृष्ण यदि कृपा करे कोन भाग्यवाने। गुरु-अन्तर्यामि-रूपे शिखाय आपने॥ 47 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्वोक्त भक्ति-उन्मुखी-सुकृतिशाली व्यक्तिके निकट यदि कोई महात्मा पुरुष उपस्थित भी न हों, तथापि श्रीकृष्ण अन्तर्यामी-गुरुके रूपमें उसे शुद्धभक्तिकी शिक्षा प्रदान करते हैं॥ 47 ॥ श्रीमद्भागवत (11/29/6) में :- नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः। योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्व- न्नाचार्यचैत्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति॥ 48 ॥ अनुवाद—हे ईश (भगवन्) ! ब्रह्माके समान आयु-प्राप्त । 339
[ 22/48-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कवि (विद्वान) भी आपकी स्मृतिजनित आनन्दके द्वारा आपके प्रति कृतज्ञता स्वीकार करनेमें समर्थ नहीं हो पाते, क्योंकि आप अपार कृपावशतः देहधारी जीवके समस्त अशुभोंके नाश और स्वगति प्रकाश करनेके लिये बाहरसे आचार्यरूपमें एवं भीतरसे अन्तर्यामीरूपमें अवस्थित हैं॥48॥ अनुभाष्य-आदिलीला 1/48 संख्या देखें॥48॥ दीक्षाके बाद सम्बन्धज्ञान और अभिधेयके फलसे अनर्थनिवृत्ति, रुचि, आसक्ति और प्राप्य-प्रयोजनकी प्राप्ति :- साधुसङ्गे कृष्णभक्त्ये श्रद्धा यदि हय। भक्तिफल 'प्रेम' हय, संसार याय क्षय॥49॥ अनुवाद-साधुसङ्गके प्रभावसे जब श्रीकृष्णभक्तिमें श्रद्धा होती है, तभी भक्तिके फल 'प्रेम'की प्राप्ति होती है और संसार क्षय हो जाता है॥49॥ श्रद्धावान् भक्तियोगी अतिभोगी अथवा अतित्यागी नहीं :- श्रीमद्भागवत (11/20/8)- यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान्। न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः॥50॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी भाग्यके उदित होनेपर जो पुरुष मेरी कथाके प्रति श्रद्धावान् होता है और वह अत्यन्त वैरागी अथवा फल्गुवैरागी भी नहीं होता एवं संसारमें अति आसक्त भी नहीं होता, उसीको ही भक्तियोग प्रेमभक्तिरूपी सिद्धि प्रदान किया करता है॥50॥ अनुभाष्य-श्रीउद्धवको तीन प्रकारके योगोंकी बात बतलाते हुए भगवान् श्रीकृष्ण भक्तियोगके अधिकारीका निर्णय कर रहे हैं- यदृच्छया (केनापि भाग्योदयेन) यः पुमान् मत्कथादौ (भगवत्कथा-श्रवण-कीर्तनादौ) तु जातश्रद्धः, [अथच] निर्विण्णः (अतिविरक्तः फल्गुवैराग्याश्रितः) न, अतिसक्तः (संसारे अत्यभिनिविष्टः) च न, अस्य (श्रद्धालोर्जनस्य एव) भक्तियोगः सिद्धिदः (अभीष्टप्रदः भवति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥ गुरु और वैष्णव अथवा साधुकी कृपासे ही अनर्थनिवृत्ति और शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :- महत्-कृपा बिना कोन कर्मे 'भक्ति' नय। कृष्णभक्ति दूरे रहु, संसार नहे क्षय॥51॥ अनुवाद-महत् अर्थात् शुद्ध श्रीकृष्णभक्तकी कृपाके बिना किसी भी प्रकारका कोई भी कार्य करनेपर किसीमें 'भक्ति' उत्पन्न नहीं हो सकती, श्रीकृष्ण भक्तिकी बातको तो छोड़ो, किसीके संसारका भी क्षय नहीं हो सकता॥51॥ अनुभाष्य-कर्मकाण्डीय किसी प्राकृत सुकृतिके द्वारा अप्राकृत श्रीकृष्णभक्ति नहीं होती। एकमात्र श्रीकृष्णभक्तकी कृपाके अतिरिक्त अप्राकृत श्रीकृष्णभक्तिके उदित होनेकी सम्भावना नहीं है। श्रीकृष्णभक्तिकी बात तो दूर है, प्राकृतबुद्धिरूपी संसार तक भी नष्ट नहीं होता। श्रीकृष्णभक्तके अतिरिक्त अन्य किसी भी जीवमें महानताकी सम्भावना नहीं होती। श्रीकृष्णभक्त ही एकमात्र अप्राकृत हैं। प्राकृत-दर्शनसे कोई-कोई उन्हें 'प्राकृत' समझते हैं। परन्तु वास्तवमें समस्त प्राकृत वस्तुओंको परित्याग करनेवाले श्रीकृष्णभक्तको ही अतुलनीय श्रेष्ठ और जीवोंके एकमात्र प्रार्थनीय हितैषी जानना चाहिये। उनकी कृपाका भिक्षु बननेसे ही जीवके प्राकृत भोग दूर हो जाते हैं और अप्राकृत श्रीकृष्ण सेवाधिकार प्राप्त होता है॥51॥ शुद्धभक्तके आनुगत्यके बिना श्रीकृष्णप्राप्ति सुदुर्लभ :- श्रीमद्भागवत (5/12/12)में- रहूगणैतत् तपसा न याति न चेज्यया निर्वपणाद् गृहाद्वा। न च्छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यै- र्बिना महत्पादरजोऽभिषेकम्॥52॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥52॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे रहूगण, महाजनोंके चरणोंकी 340 ।
बाइसवाँ अध्याय 22/52–54 ]
रजमें अभिषिक्त हुए बिना भगवान्की भक्ति तपस्याके द्वारा, वैदिक अर्चनादिके द्वारा, संन्यास-पालनके द्वारा, गृहस्थ-धर्मके पालनके द्वारा, वेदपाठके द्वारा अथवा जल-अग्नि-सूर्य [आदिकी उपासना] के द्वारा कभी भी प्राप्त नहीं होती ॥ 52 ॥ अनुभाष्य—सिन्धुसौवीरके राजा रहूगणके द्वारा ब्राह्मणकुलमें जन्में अवधूत भरतके मुखसे तत्त्वज्ञानका श्रवण करते समय उन्हें प्रणाम करके दुर्बोध अध्यात्म- योगकी सुबोधरूपमें व्याख्या करनेकी प्रार्थना करनेपर, ब्राह्मणवेषी महाभागवत परमहंस भरत रहूगणको पहले अविद्या और उसके विनाशक शुद्धज्ञानमयविग्रह भगवान् वासुदेवकी कथा सुनाकर बादमें भगवद्-प्राप्तिके उपायका वर्णन कर रहे हैं— हे रहूगण, महत्पादरजोऽभिषेकं (शुद्धकृष्णभक्तपदरेणुना अभिषेकनं) बिना (ऋते) एतत् (अप्राकृतं वासुदेवात्मक-भगवत्तत्त्वं) तपसा (वानप्रस्थधर्मेण) न, इज्यया (वैदिककर्मणा देवार्चनेनेत्यर्थः) च न, निर्वपणात् (योषित्सङ्गराहित्यात् संन्यासात् इत्यर्थः) न, गृहात् (योषित्सङ्गमूलकगृहमेध-यज्ञ-चालनात्) वा न, छन्दसा (वेदाभ्यासेन) न, जलाग्निसूर्यैः (तत्तदुपासितैः) न याति (न प्राप्नोति) एव। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 52 ॥
महत् अथवा शुद्ध वैष्णवकी कृपासे ही अनर्थनाश और उसके फलस्वरूप विष्णुपदकी प्राप्ति :— श्रीमद्भागवत (7/5/32)में— नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः। महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥ 53 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जब तक मनुष्योंकी मति निष्किञ्चन भगवद्भक्तोंकी पदधूलिके द्वारा अभिषिक्त नहीं होती, तब तक वह अनर्थनाशक श्रीकृष्णचरणकमलोंका स्पर्श नहीं कर पाती ॥ 53 ॥
अनुभाष्य—देवर्षि नारद धर्मराज युधिष्ठिरको प्रह्लादके उपाख्यानका वर्णन कर रहे हैं। हिरण्यकशिपुके प्रश्नके उत्तरमें महाभागवत प्रह्लादने विष्णुकी नवधा भक्तिको ही एकमात्र सर्वश्रेष्ठ पाण्डित्य और शिक्षारूपमें वर्णन किया। इस बातसे क्रु षण्ड-अमर्ककी तीव्र भर्त्सना की। तब षण्ड-अमर्कने प्रह्लादकी स्वाभाविकी मतिको ही उनकी विष्णुभक्तिका कारण बतलाकर अपने ऊपर लगाये दोषका निवारण किया। तब हिरण्यकशिपुने प्रह्लादसे उनकी ऐसी वैष्णवी मतिका कारण बतलानेके लिये कहा। किन्तु प्रह्लाद उसके सम्बन्धमें कुछ भी नहीं कहकर विष्णुभक्ति- विरोधी गृहव्रती लोगोंके बन्धन और मोक्षका उपाय बतला रहे हैं— निष्किञ्चनानां (निरस्तसकलविषयाभिमानानां) महीयसां (महत्तमानां वैष्णवानां) पादरजोऽभिषेकं (पदरजसा अभिषेकनं लेपनं) यावत् न वृणीत (कुर्वीत), तावत् [श्रुतिवाक्यतो ज्ञातोऽपि] एषां (गृहव्रतानां) मतिः (प्रवृत्तिः) उरुक्रमाङ्घ्रिम् (उरुक्रमस्य पदं) न स्पृशति (न प्राप्नोति असम्भावनादिभिर्विहन्यते इत्यर्थः); अनर्थापगमः (अनर्थस्य असदवग्रहस्य, तत्पदस्पर्शविघ्नस्य संसारस्येत्यर्थः अपगमः विनाशः) यदर्थः (यस्याः अङ्घ्रिस्पर्शिन्याः मतेः अर्थं फलं, महदनुग्रहाभावान्न तत्त्वनिश्चयः नापि मोक्षस्तेषामित्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 53 ॥
साधुके आधे क्षणके सङ्गके फलसे ही जीवकी चिद्-वृत्ति श्रीकृष्ण-सेवाका प्रबोध और साध्यकी प्राप्ति :— 'साधुसङ्ग' 'साधुसङ्ग'—सर्वशास्त्रे कय। लवमात्र साधुसङ्गे सर्वसिद्धि हय ॥ 54 ॥ अनुवाद—इसलिये सभी शास्त्र 'साधुसङ्ग', 'साधुसङ्ग' करनेके लिये कहते हैं, क्योंकि लवमात्रके (पलक झपकनेके समयके) साधुसङ्गसे सर्वसिद्धिकी प्राप्ति होती है ॥ 54 ॥ अनुभाष्य—'लव'—निमेषकाल, सवा ग्यारह 'लव'का एक सैकेण्ड होता है ॥ 54 ॥
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[ 22/55-59 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
साधुसङ्गकी महिमा :- श्रीमद्भागवत (1/18/13)में- तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्। भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः॥ 55॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 55॥
अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान्के सङ्गीके सङ्गके द्वारा जीवका जो असीम मङ्गल होता है, उसके साथ स्वर्ग अथवा मोक्षकी बिल्कुल भी तुलना नहीं की जा सकती (अति तुच्छ धन-वैभवादिके सम्बन्धमें तो क्या कहना?)॥ 55॥
अनुभाष्य-शौनकादि ऋषि यज्ञानुष्ठान आदि तुच्छ कर्मकाण्डमें स्वयंके व्यर्थके परिश्रमका उल्लेख करके महाभागवत हरिकथा-कीर्तनकारी श्रीसूतके सङ्गके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं-
(हे सूत,) भगवत्सङ्गिसङ्गस्य (भगवत्सङ्गी हरिजनः तस्य सङ्गस्य) लवेन (अत्यल्पक्षणेन) अपि स्वर्गम् (आदर्शसुख-भोगस्थानं) न तुलयाम (तुल्यं न पश्याम), अपुनर्भवं (मोक्षं वा) न [तुलयाम]; मर्त्यानां (प्राकृतदेवविप्रराजन्वादीनाम्) आशिषः (अतितुच्छाः वित्त-वैभवाद्याः) किमुत (किं वक्तव्यं, नैव तुलयामेत्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 55॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ 58॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 57-58॥
अमृतप्रवाह भाष्य-(हे अर्जुन,) तुम मेरे अत्यन्त आत्मीय (प्रिय) हो, इसलिये तुम्हें तुम्हारे हितके लिये सर्वगुह्यतम (सबसे गोपनीय) सर्वश्रेष्ठ उपदेश दे रहा हूँ,-तुम अपना मन पूर्णरूपसे मुझमें लगा दो, मेरे भक्त बनो और मेरा ही अर्चन करो और मेरे शरणागत होवो, तब तुम मुझे निश्चय ही प्राप्त करोगे। तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिये मैंने अपनी इस प्रतिज्ञा-वाक्यको तुमसे कहा है॥ 57-58॥
अनुभाष्य- हे अर्जुन, मे (मम) सर्वगुह्यतमम् (अत्यन्तगोप्यं) परमं वचः (वाक्यं) भूयः (पुनः) शृणु; (यतः) मे (मम) दृढम् (अत्यन्तम्) इष्टः (प्रियतमः) असि, ततः (तस्माद्धेतोः) ते (तव) हितं (मङ्गलं) वक्ष्यामि (कथयामि)-[त्वं] मन्मना (मच्चित्तः) मद्भक्तः (मद्भजनशीलः) मद्याजी (मदर्चनशीलः) भव, माम् (अन्यप्राकृतदेवादीन् परित्यज्य अप्राकृतं मां कृष्णरूपम् एव) नमस्कुरु [एवं वर्तमानस्त्वं मत्प्रसादात् शुद्धभक्त्या] माम् एव एष्यसि (प्राप्स्यसि) [अत्र च संशयं मा कार्षीः]; त्वं हि मे प्रियः असि, (अतः) सत्यं (यथा भवति एवं) ते (तुभ्यम्) अहं प्रतिजाने (प्रतिज्ञां करोमि)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 57-58॥
गीताकी शिक्षा :- कृष्ण कृपालु अर्जुनेरे लक्ष्य करिया। जगतेरे राखियाछेन उपदेश दिया॥ 56॥
अनुवाद-श्रीकृष्ण इतने कृपालु हैं कि उन्होंने अर्जुनको लक्ष्य करके अपने उपदेशोंको प्रदान करके जगत्की रक्षा की है॥ 56॥
पहले कर्मज्ञानयोगादिको अभिधेय कहनेपर भी, सबसे अन्तिम आज्ञा श्रीकृष्णभक्ति ही एकमात्र अभिधेय और विधि :- पूर्व आज्ञा,-वेद-धर्म, कर्म, योग, ज्ञान। सब साधि' अवशेषे एइ आज्ञा-बलवान्॥ 59॥
श्रीकृष्णप्राप्तिके उद्देश्यसे ही सभी क्रियाएँ करना कर्त्तव्य :- श्रीमद्भगवद्गीता (18/64-65)- सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥ 57॥
अनुवाद-श्रीकृष्णने भगवद्-गीतामें पहले वेद-धर्म, कर्म, योग और ज्ञान आदिके भली-भाँति पालन करनेका उपदेश प्रदान किया है, किन्तु उनके द्वारा दिया गया उपरोक्त अन्तिम उपदेश सबसे बलवान है और अन्य सभी उपदेशोंसे ऊपर है॥ 59॥
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बाइसवाँ अध्याय 22/60-63 ] सभी धर्मोंको छोड़कर श्रीकृष्ण भजनकी चेष्टा :- एइ आज्ञाबले भक्तरे 'श्रद्धा' यदि हय। सर्वकर्म त्याग करि' से कृष्णेरे भजय ॥ 60 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके इस उपदेशके बलमें यदि किसी भक्तकी 'श्रद्धा' होती है, तब वह भक्त सब प्रकारके कर्मोंका त्याग करके श्रीकृष्णका ही भजन करता है॥ 60॥ श्रीमद्भागवत (11/20/9) :— तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥ 61 ॥ अनुवाद—जब तक कर्ममार्गमें निर्वेद (वैराग्य) उदित न हो, अथवा मेरी कथा-श्रवणादिमें श्रद्धा उत्पन्न न हो, तब तक नित्य-नैमित्तिकादि कर्म करने चाहिये ॥ 61 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 9/266 संख्या देखें ॥ 61 ॥ श्रद्धाकी संज्ञा :- 'श्रद्धा'-शब्दे विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय। कृष्णे भक्ति कैले सर्वकर्म कृत हय ॥ 62 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 62 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'श्रीकृष्ण भक्ति करनेसे सब कार्य करना हो जाता है'—ऐसे सुदृढ़ निश्चयात्मक विश्वासको भक्तिका अधिकार प्रदान करनेवाली 'श्रद्धा' कहते हैं ॥ 62 ॥ अनुभाष्य—सुदृढ़ निश्चयात्मक विश्वासको 'श्रद्धा' कहते हैं; श्रीकृष्णकी सेवा करनेसे संसारके समस्त पितरों-प्रणियों-देवोंके ऋणको चुकानेके लिये कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं रहती। बद्धजीव भोगोंकी सामग्री जुटानेके लिये कर्म करता है। भगवद्भक्तिके उदित होनेपर कर्मफलके लिये चेष्टा नहीं करनी पड़ती। कर्मफलकी सबसे उत्तम प्राप्य वस्तु 'वैराग्य' सदैव भक्तोंमें आनुषङ्गिक रूपमें रहता है॥ 62॥ श्रीकृष्णके पूजनसे ही सभीकी पूजा :— श्रीमद्भागवत (4/31/14)— यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः। प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या ॥ 63 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस प्रकार वृक्षकी जड़में जल सींचनेसे, उस वृक्षके स्कन्ध, भुजाएँ, उपशाखाएँ आदि सभी तृप्त हो जाते हैं अथवा प्राणोंकी तृप्तिसे ही जिस प्रकार सभी इन्द्रियोंकी तृप्ति होती है, उसी प्रकार श्रीकृष्णकी पूजा करनेसे ही समस्त देवताओंकी पूजा हो जाती है ॥ 63 ॥ अनुभाष्य—प्रजापति दक्षके पुत्र प्रचेतागणोंके द्वारा अपने गुरुदेव देवर्षि श्रीनारदके दर्शन करके उनसे पुनः आत्मतत्त्व अर्थात् श्रीहरिकी कथाका कीर्तन करनेका अनुरोध करनेपर श्रीनारद सर्वभूतात्मा श्रीहरिके माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं— यथा तरोः (वृक्षस्य) मूलनिषेचनेन (पाददेशे जलप्रक्षेपेण) तत्स्कन्धभुजोपशाखाः (स्कन्धादिपत्रपुष्पाद्यन्तानि सर्वाणि वृक्षाङ्गानि) तृप्यन्ति [न तु मूलसेकं बिना ताः स्वस्वनिषेचनेन], यथा प्राणोपहारात् (प्राणस्य उपहारः भोजनं तस्मात्) इन्द्रियाणां च तृप्तिः [न तु तत्तदिन्द्रियेषु पृथक् पृथगन्नलेपनेन], तथा अच्युतेज्या (भगवतः विष्णोः अर्चनम्) एव सर्वार्हणं (सकल-देवताराधनं, न हि पृथगुपासनायामावश्यकतास्तीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—जिस प्रकार वृक्षकी जड़में जल सींचनेसे, उस वृक्षके स्कन्ध, भुजाएँ, उपशाखाएँ आदि सभी तृप्त हो जाते हैं [न कि जड़को सींचनेके बदले स्कन्ध, शाखाओं आदिको सींचनेपर] अथवा प्राणोंकी तृप्तिसे ही जिस प्रकार सभी इन्द्रियोंकी तृप्ति होती है [न कि इन्द्रियोंको पृथक् पृथक् रूपसे आहार देनेपर], उसी प्रकार श्रीकृष्णकी पूजा करनेसे ही समस्त देवताओंकी पूजा हो जाती है अर्थात् उनकी पृथक् । 343
[ 22/63-68 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला रूपसे उपासना करनेकी आवश्यकता नहीं है—यह अर्थ है॥ 63 ॥ भक्तिके अधिकारी (तीन प्रकारके भक्तिके अधिकारियोंका) निर्णय और भेद :- श्रद्धावान् जन हय भक्ति-अधिकारी। 'उत्तम', 'मध्यम', 'कनिष्ठ'—श्रद्धा-अनुसारी॥ 64 ॥ अनुवाद—श्रद्धावान् व्यक्ति ही भक्तिके अधिकारी हैं। श्रद्धाके अनुसार ही वे 'उत्तम', 'मध्यम' और 'कनिष्ठ' अधिकारके भक्त होते हैं॥ 64 ॥ अनुभाष्य—श्रद्धावान् अर्थात् जो श्रीकृष्णको केवल वास्तव-वस्तु, नित्यसत्य और परमार्थ जानता है। जिसका श्रीकृष्णमें ऐसा सुदृढ़-निश्चयात्मक विश्वास है, वही भक्तिका अधिकारी होता है। भक्तके विश्वासकी निश्चयात्मक दृढ़ताके तारतम्यसे ही उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ अधिकारका निर्णय होता है॥ 64 ॥ (1) उत्तम-अधिकारीकी संज्ञा :- शास्त्रयुक्त्ये सुनिपुण, दृढ़श्रद्धा याँर। 'उत्तम-अधिकारी' सेइ तारय संसार॥ 65 ॥ अनुवाद—जो भक्त शास्त्रों और शास्त्रोंकी युक्तियोंमें अत्यन्त निपुण है और जिसकी श्रीकृष्णमें दृढ़ श्रद्धा है, वह 'उत्तम-अधिकारी' है। वह सारे संसारका उद्धार कर सकता है॥ 65 ॥ अनुभाष्य—(भःरःसिः पूःविः द्वितीय लहरी वैधीभक्तिके वर्णनमें श्लोक 11)में श्रीरूपगोस्वामिपादने लिखा है— “शास्त्रे युक्तौ च निपुणः सर्वथा दृढ़ निश्चयः। प्रौढ़ाश्रद्धोऽधिकारी यः स भक्तावुत्तमो मतः॥” अर्थात् “भक्ति-शास्त्रोंमें दक्ष और उसके अतिरिक्त अन्यान्य मार्गोंके खण्डनमें दृढ़ युक्तिमें प्रवीण,—ऐसे प्रौढ़ श्रद्धावाले व्यक्ति ही भक्तोंमें 'उत्तम-अधिकारी' हैं॥”65॥ (2) मध्यम-अधिकारीकी संज्ञा :- शास्त्र-युक्ति नाहि जाने दृढ़, श्रद्धावान्। 'मध्यम-अधिकारी' सेइ महाभाग्यवान्॥ 66 ॥ अनुवाद—जो शास्त्रोंकी युक्तियोंको भली-भाँति नहीं जानता, किन्तु दृढ़ श्रद्धावान् है, वह महाभाग्यवान् व्यक्ति 'मध्यम-अधिकारी' है॥ 66 ॥ (3) कनिष्ठ-अधिकारीकी संज्ञा :- याहार कोमल श्रद्धा, से 'कनिष्ठ' जन। क्रमे क्रमे तैं हो भक्त हइबे 'उत्तम'॥ 67 ॥ अनुवाद—जिसकी श्रद्धा कोमल और आसानीसे बदलनेवाली है, वह कनिष्ठ-अधिकारी है। परन्तु भक्तिकी प्रक्रियाका पालन करनेपर क्रमशः वह भी 'उत्तम' भक्तके स्तरपर पहुँच जाता है॥ 67 ॥ भक्तके तारतम्यका कथन :- रति-प्रेम-तारतम्ये भक्त—तर-तम। एकादश स्कन्धे तार करियाछे लक्षण॥ 68 ॥ अनुवाद—रति और प्रेमके तारतम्यसे भक्तोंमें भी तारतम्य होता है। श्रीमद्भागवतके ग्यारहवें स्कन्धमें इसके लक्षण बतलाये गये हैं॥ 68 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पहले कहे गये मतानुसार जिनके हृदयमें श्रद्धा हुई है, वे ही भक्तिके अधिकारी हैं। वे श्रद्धावान् व्यक्ति-'उत्तम', 'मध्यम' और 'कनिष्ठ'के भेदसे तीन प्रकारके हैं। जो शास्त्र और युक्तिमें दक्ष होकर दृढ़ श्रद्धावान् हुए हैं, वे—'उत्तमाधिकारी' हैं। जो दृढ़ शास्त्रयुक्ति नहीं जानते, किन्तु श्रद्धावान् हैं, वे—'मध्यमाधिकारी' हैं। जिनकी श्रद्धा दृढ़ नहीं हुई, वे 'कनिष्ठाधिकारी' हैं। इन तीन प्रकारके विभागके द्वारा भक्तोंका विभाग हुआ है, केवल ऐसा नहीं है, शुद्धभक्तिके अधिकारी व्यक्तिका भी विभाग हुआ है। 'कनिष्ठ-श्रद्धावान्' केवल 'श्रीकृष्ण भक्ति करना अच्छा है'—इतना ही विश्वास करता है, किन्तु शुद्धभक्ति क्या है और भक्तिके तटस्थ लक्षणोंके द्वारा सिद्ध प्रक्रिया क्या है, वह उसे नहीं जानता। इसलिये कोमल श्रद्धावालोंके हृदयमें ज्ञान-कर्मका मिश्रित भाव पाया जाता है। उसके दूर होनेपर साधक 'मध्यमाधिकारी' बन जाता है। पुनः वह मध्यमाधिकारवाली श्रद्धा शास्त्रयुक्तिके 344 ।
बाईसवाँ अध्याय 22/64-71 ] द्वारा जब दृढ़ होती है, तब वह 'उत्तमाधिकारी' बन जायेगा। यहाँ तक भक्तिका अधिकारका निर्णय हुआ है, अब भक्तोंका विभाग कर रहे हैं। रति और प्रेमके तारतम्यसे 'भक्त', 'भक्ततर' और 'भक्ततम',—ये तीन प्रकारके विभाग हैं॥ 64-68 ॥ अनुभाष्य—(भःरःसिः पूःविः द्वितीय लहरीके 12 श्लोकमें) श्रीरूपगोस्वामिपादने लिखा है,— “यः शास्त्रादिष्वनिपुणः श्रद्धावान् स तु मध्यमः। यो भवेत् कोमलश्रद्धः स कनिष्ठो निगद्यते॥” मध्यमभक्त श्रद्धावान् होनेपर भी शास्त्रादिके तात्पर्यमें उतना कुशल नहीं होता और जो कोमल श्रद्धावाला है, वही कनिष्ठ है। कनिष्ठाधिकारी अभक्तोंके सङ्गसे श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें कोमल श्रद्धासे भी विच्युत हो सकता है। मध्यमाधिकारी शास्त्रादिके तात्पर्यके द्वारा अभक्त-सङ्गके कुफलसे तत्क्षणात् मुक्त नहीं हो पानेपर भी शास्त्रादि और भक्त-सङ्गके प्रभावसे दृढ़ता प्राप्त करता है। अभक्त-सङ्ग किसी भी प्रकारसे उत्तमाधिकारीकी श्रद्धाकी हानि नहीं कर सकता। श्रद्धाकी वृद्धिके साथ-साथ भक्तका अधिकार उन्नत होता है। अजात-रुचि (जिनकी रुचि अभी उत्पन्न नहीं हुई है, ऐसे) वैध-भक्तकी श्रद्धाके परिमाणानुसार रतिका (जातरुचि-भक्तकी श्रद्धाको ही 'रति' कहते हैं) तारतम्य होता है। रतिके तारतम्यके भेदसे प्रेमभक्तिरसका तारतम्य होता है। ग्यारहवें स्कन्धमें श्रीभगवान् और उद्धवके संवादमें भक्तोंका अधिकार लिखा गया है॥ 66-68॥ उत्तमाधिकारी अथवा महाभागवतका लक्षण :- श्रीमद्भागवत (11/2/45-47)में— सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ 69 ॥ अनुवाद—जो उत्तम भागवत होते हैं, वे सभी प्राणियोंमें आत्माके भी आत्मरूप भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रको ही देखते हैं और आत्माके आत्मस्वरूप श्रीकृष्णमें समस्त जीवोंको देख पाते हैं॥ 69 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/274 संख्या देखें ॥ 69 ॥ मध्यमाधिकारीके लक्षण :— ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेम-मैत्री-कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ 70 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो भक्त ईश्वरमें प्रेम, भक्तोंसे मैत्री, मूर्ख व्यक्तियोंके प्रति कृपा और विद्वेषी लोगोंके प्रति उपेक्षा करता है, वह—'मध्यम भक्त' है॥ 70 ॥ अनुभाष्य—श्रीनारद वसुदेवको भागवतधर्मके विषयमें बतलाते हुए विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन कर रहे हैं। निमिके द्वारा तीन प्रकारके भक्तों अथवा भागवतोंके लक्षण और आचरणके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर उसके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक हवि-ऋषिने कहा— यः ईश्वरे (भगवति कृष्णे) प्रेमाणं करोति, तदधीनेषु (उत्तम-मध्यम-कनिष्ठाधिकारिषु भगवद्भक्तेषु) मैत्रीं (शुश्रूषाप्रणति- समादरादि-यथोचितसख्यतां) करोति, बालिशेषु (भक्त्यनभिज्ञेषु) कृपां करोति, द्विषत्सु (भगवद्भागवतविरोधिजनेषु) उपेक्षां करोति (वीतरागं प्रदर्शयति, तेषां सङ्गं सर्वथा वर्जयतीत्यर्थः), सः (भागवतः) 'मध्यमः' (मध्यमसंज्ञकः एवम्भूतस्य भेदस्य दर्शनात्)। श्लोक-भावानुवाद—जो भगवान् श्रीकृष्णसे प्रेम करता है, भगवद्भक्तोंसे यथोचित मैत्री अर्थात् उत्तम भक्तोंकी सेवा और उनके प्रति प्रणति, मध्यम और कनिष्ठ भक्तोंका समादर और प्रीति करता है, भक्तिसे अनभिज्ञ लोगोंपर कृपा करता है, भगवान् और भागवतोंके विरोधी लोगोंकी उपेक्षा करता है अर्थात् उनके प्रति कोई राग न दिखलाकर उनके सङ्गका सर्वथा वर्जन करता है, वह भक्त 'मध्यम' स्तरका कहलाता है (वह इस प्रकार भेद-दर्शन करता है)।॥ 70 ॥ कनिष्ठाधिकारीके लक्षण :— अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते। न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ 71 ॥ । 345
[ 22/71–75 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥71॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो लौकिक और पारिवारिक प्रथाके अनुसार परम्परागत श्रद्धाके साथ अर्चा-मूर्तिमें श्रीहरिकी पूजा करते हैं, परन्तु शास्त्र-अनुशीलनके द्वारा शुद्धभक्तितत्त्वको नहीं जाननेके कारण हरिभक्तोंकी पूजा नहीं करते, वे—'प्राकृत भक्त' हैं अर्थात् उन्होंने अभी भक्तिपर्व आरम्भ मात्र ही किया है। उन्हें 'भक्तप्राय' अथवा 'वैष्णवाभास' शब्दोंके द्वारा सम्बोधित किया जाता है॥71॥ तात्पर्य यह है कि जब कोई ईश्वरके प्रति 'प्रेम', भक्तोंके प्रति 'मैत्री', मूर्ख लोगोंके प्रति 'कृपा' और भगवद्-विद्वेषी और भगवद्भक्त-विद्वेषीकी 'उपेक्षा' कर सकता है, तभी वह शुद्धभक्तरूपमें 'मध्यमभक्त'में गिना जाता है। बादमें भजन करते-करते जब वह सभी प्राणियोंमें अपने सम्बन्धसे भगवद्भाव और आत्मस्वरूप भगवद्-पदार्थमें समस्त प्राणियोंकी विद्यमानता देखता है, तब उसका ईश्वर, उनके अधीन व्यक्ति (भक्त), मूर्ख और विद्वेषीके प्रति भेदभाव नहीं रहता; उस अवस्थामें वह 'भागवतोत्तम' कहलाता है॥69-71॥ अनुभाष्य— यः हरये (भगवते गुरवे आत्मानं निवेद्य) अर्चायां (श्रीविग्रहे) श्रद्धया (दीक्षितः सन् मिश्रत्वेन भक्त्याभासेन पाञ्चरात्रिकविधानेन) पूजाम् ईहते (करोति), तद्भक्तेषु (हरिजनेषु) पूजां न [ईहते भक्ततारतम्यज्ञानाभावात्] अन्येषु च (हरिविमुखसङ्गं च वर्ज्जयतीत्यर्थः), स भक्तः प्राकृतः (कनिष्ठः वैष्णवप्रायः, न तु शुद्ध इत्यर्थः) स्मृतः (कथितः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥71॥ शुद्धभक्त श्रीकृष्णके सभी गुणोंसे विभूषित :— सर्व महागुणगण वैष्णव-शरीरे। कृष्णभक्ते कृष्णेर गुण सकलि सञ्चारे॥72॥ अनुवाद—वैष्णवोंमें समस्त महान गुण विराज करते हैं। श्रीकृष्णके भक्तोंमें श्रीकृष्णके समस्त गुण स्वतः ही सञ्चारित होते हैं॥72॥ अनुभाष्य—श्रीभगवान् विष्णु ही भक्तोंकी एकमात्र उपास्य-वस्तु हैं; भगवद्-गुणसमूह भक्तोंकी ही सम्पत्ति हैं। भगवान्की समस्त गुणराशि शुद्धभक्तमें सञ्चारित होती है॥72॥ शुद्धवैष्णव—सर्वमहागुणोंसे गुणी, अवैष्णव—सर्वथा गुणहीन :— (श्रीमद्भागवत 5/18/12)— यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः। हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहिः॥73॥ अनुवाद—श्रीकृष्णमें जिनकी केवला भक्ति है, उन व्यक्तियोंमें समस्त गुणोंके सहित देवता वास करते हैं। हरिभक्तिविहीन व्यक्तियोंका मन सदा असत् बाह्य विषयोंमें दौड़ता रहता है, इसलिये उनमें महद्गुणोंका होना असम्भव है॥73॥ अनुभाष्य—श्रीशुकदेव परीक्षितसे 'भद्रश्रवा' नामक वर्षपति और उनके सेवकोंके द्वारा किये गये भगवान् श्रीनृसिंह और उनके शुद्धभक्तोंके स्तवगानका वर्णन कर रहे हैं। आदिलीला 8/58 संख्या देखें॥73॥ वैष्णवोंके छब्बीस गुण अथवा लक्षणोंका वर्णन :— सेइ सब गुण हय वैष्णव-लक्षण। सब कहा ना याय, करि दिग्दर्शन॥74॥ अनुवाद—वे सब गुण ही वैष्णवके लक्षण हैं। वैष्णवके समस्त गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता, इसलिये मैं उनका केवल दिग्दर्शन ही करा रहा हूँ॥74॥ उनमेंसे श्रीकृष्णके प्रति शरणागति ही 'स्वरूप' लक्षण, अन्य सभी 'तटस्थ' लक्षण :— कृपालु, अकृतद्रोह, सत्यसार, सम। निर्दोष, वदान्य, मृदु, शुचि, अकिञ्चन॥75॥ 346 |
बाईसवाँ अध्याय [ 22/75-79 ] सर्वोपकारक, शान्त, कृष्णैकशरण। अकाम, निरीह, स्थिर, विजित-षड्गुण ॥ 76 ॥ मितभुक्, अप्रमत्त, मानद, अमानी। गम्भीर, करुण, मैत्र, कवि, दक्ष, मौनी ॥ 77 ॥ **अनुवाद—**श्रीकृष्णभक्त कृपाकी मूर्ति होता है। वह किसीसे भी वैर भाव नहीं रखता और उसके जीवनका सार है सत्य। वह समदर्शी, निर्दोष, दानी, मधुरस्वभाव और पवित्र होता है। वह धनादिके संग्रहसे सर्वथा दूर रहता है। वह सभीका उपकार करनेवाला, शान्त (निष्काम) और श्रीकृष्णमें पूर्ण शरणागत होता है। वह समस्त जागतिक कामनाओंसे रहित, किसी भी जागतिक वस्तुके लिये चेष्टारहित और भक्तिमें स्थिर रहता है। भूख-प्यास, शोक-मोह और जन्म-मृत्यु—ये छहों उसके वशमें रहते हैं। वह परिमित भोग स्वीकार करता है और प्रमादरहित (सावधान) होता है। वह दूसरोंको सम्मान देनेवाला और अपने सम्मानकी अभिलाषासे रहित होता है। वह गम्भीर स्वभावका होता है और उसके हृदयमें करुणा भरी होती है। वह सभीके साथ मित्रताका व्यवहार करता है, मेरे तत्त्वका उसे यथार्थ ज्ञान होता है और वह मेरे सम्बन्धकी बातें दूसरोंको समझानेमें बड़ा निपुण होता है। वह मौनी अर्थात् सदा श्रीकृष्णकथा ही कहता और सांसारिक विषयोंमें सदा मौन होता है॥ 75-77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कृपालु'से लेकर 'मौनी' तक गुणसमूह—वैष्णवोंके विशेष लक्षण हैं॥ 75-77 ॥ प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (3/25/21)में— तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम्। अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधुभूषणाः ॥ 78 ॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 78 ॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**समस्त साधुओंमें सहनशीलता, जीवोंके दुःखमें दयार्द्र होना, प्राणिमात्रका ही नित्य मङ्गलविधान करना, सबको ही भगवान्के सेवक जानकर किसीको भी शत्रु नहीं मानना, निष्काम इसलिये शान्त होना—इन गुणोंसे युक्त होते हैं और ये गुण ही साधुओंके भूषण होते हैं॥ 78 ॥ **अनुभाष्य—**शौनक आदि ऋषियोंके द्वारा भगवान् कपिलदेवकी लीलाकथाकी जिज्ञासा करनेपर महाभागवत सूत उन्हें व्यास-सखा भगवान् मैत्रेयके द्वारा पूर्वकालमें विदुरके समक्ष वर्णित इस आत्मतत्त्व और भगवान् कपिल और देवहूतिके संवादका प्रसङ्ग वर्णन कर रहे हैं, कपिलदेव असद् वस्तुमें आसक्तिको ही जीवके बन्धनका कारण और सद्-वस्तुमें आसक्तिको ही मोक्षके द्वारके रूपमें वर्णन करके सद्वस्तु साधुओंके पहले 'तटस्थ', बादमें 'स्वरूप'-लक्षण बतला रहे हैं— (साधूनां लक्षणमाह—) तितिक्षवः (सहिष्णवः) कारुणिकाः (दयार्द्रचित्ताः) सर्वदेहिनां (सर्वजीवानां) सुहृदः (बान्धवाः) अजातशत्रवः (निर्वैराः) शान्ताः (निष्कामाः) साधुभूषणाः (साधु सुशीलं, तदेव भूषणं येषां ते) साधवः (शास्त्रानुवर्तिनः)। **श्लोक-भावानुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 78 ॥ महत् या वैष्णवोंकी सेवासे ही मायासे छुटकारा; स्त्री-सङ्गीकी सेवासे संसार-बन्धन और नरककी प्राप्ति :— (श्रीमद्भागवत 5/5/2)में— महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्ते- स्तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम्। महान्तस्ते समचित्ताः प्रशान्ता विमन्यवः सुहृदः साधवो ये ॥ 79 ॥ **अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 79 ॥ **अमृतप्रवाह भाष्य—**पण्डित लोग महत्-सेवाको ही वास्तविक मुक्तिका द्वार-स्वरूप और स्त्रियोंके प्रति जिनकी आसक्ति है, उनके सङ्गको ही तमोगुणका द्वार कहते हैं। जो साधु हैं, वे भगवान्में निष्ठायुक्त, समदर्शी, प्रशान्त, क्रोधरहित और सभीका मङ्गल करनेवाले हैं॥ 79 ॥ । 347
[ 22/79-80 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—किसी समय राजर्षि भरतके पिता भगवान् ऋषभदेवने ब्रह्मावर्त्तमें उपस्थित होकर ऋषियोंके निकट उपदेश श्रवणमें रत पुत्रोंको मोक्षधर्म और पारमहंस्य-धर्मका वर्णन किया था— [तत्त्वकोविदाः] महत्सेवां (वैष्णवपरिचर्यां) विमुक्तेः (संसारबन्धनस्य) द्वारं (मोचनहेतुम्) आहुः (कथयन्ति) योषितां सङ्गिसङ्गं (स्त्रीसङ्गिविषयिणां भोक्तॄणां सङ्गं) तमोद्वारं (संसारस्य नरकस्य वा, द्वारं हेतुम् आहुः); [तत्र] ये समचित्ताः (समदर्शिनः पण्डिताः) प्रशान्ताः (शुद्धचित्ताः) विमन्यवः (क्रोधरहिताः) सुहृदः (बान्धवाः) साधवः (परदोषादर्शिनः), ते महान्तः [ज्ञेयाः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 79 ॥ साधुसङ्गके माहात्म्यका वर्णन; साधुसङ्गके फलसे ही श्रीकृष्णसेवाकी प्राप्ति :- कृष्णभक्ति-जन्ममूल हय 'साधुसङ्ग' । कृष्णप्रेम जन्मे, तँहो पुनः मुख्य अङ्ग ॥ 80 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 80 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साधुसङ्ग यद्यपि प्रथमावस्थामें श्रीकृष्णभक्तिके उत्पन्न होनेका मूल कारण है, तथापि श्रीकृष्णप्रेम उत्पन्न होनेपर भी वही साधुसङ्ग ही पुनः प्रेमके मुख्य अङ्गमें गिना जाता है ॥ 80 ॥ अमृतानुकणा—साधुसङ्ग ही भक्तिराज्यमें प्रवेशका एकमात्र उपायस्वरूप है—'भक्तिस्तु भगवद्भक्तसङ्गेन परिजायते।' (वृहन्नारदीय पुराण)। “जिसका अपना स्वभाव अत्यन्त लुप्तप्राय है, उसको कौन जाग्रत करेगा? कर्म, ज्ञान और वैराग्यकी चेष्टासे वह जाग्रत नहीं होगा, इसलिये जिसका किसी सौभाग्यसे निज-स्वभाव जाग्रत होता है, उनके (अर्थात् भगवद्भक्तोंके) सङ्गबलसे ही जीवका गुप्तप्राय निज-स्वभाव जाग्रत हो सकता है। इस विषयमें दो घटनाओंका होना आवश्यक है। जो निज-स्वभावको जाग्रत करनेकी इच्छा करते हैं, वे पूर्व भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके द्वारा कुछ परिमाणमें शरणागति लक्षणवाली श्रद्धा प्राप्त करते हैं—यह एक घटना है। उस सुकृतिके बलसे उनको किसी उपयुक्त साधुका सङ्ग होता है—यह दूसरी घटना है।” (दशमूल-निर्याास)। उसके बाद साधुसङ्गसे ही श्रवण-कीर्त्तनादि समस्त भजनक्रिया आरम्भ होती है, अन्यथा यह सम्भव नहीं है। इसलिये श्रद्धाको श्रीकृष्णभक्ति-लताका अङ्कुर कहनेपर साधुसङ्गको उसका मूल कहना होगा— “आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा रुचिस्ततः॥ अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति। साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः॥” [अर्थात् “सर्वप्रथम श्रद्धा, तदनन्तर साधुसङ्ग, उसके पश्चात् भजनक्रिया, तदनन्तर अनर्थनिवृत्ति, उसके पश्चात् निष्ठा, तदनन्तर रुचि और उसके बाद आसक्ति, तत्पश्चात् भाव और भावके बादमें प्रेमका उदय होता है। साधकोंके हृदयमें प्रेम उत्पन्न होनेका यह क्रम निरूपित हुआ है।”] साधुसङ्गके बिना कोई जब भी अपनी कपोल- कल्पनासे उत्पन्न उपायका सहारा लेगा, तभी माया श्रीकृष्णभक्तिका छल करके उसको भक्तिमार्गसे भ्रष्ट करा देगी और फलभोगवादी-कर्मी, अथवा अभेद- ब्रह्मानुसन्धानपरक ज्ञानी, अथवा सहजिया, सखीभेकी, कर्मजड़-स्मार्त्तबुद्धिपर गोसाईं, आउल, बाउल आदि श्रीकृष्ण बहिर्मुख दलमें शामिल करा देगी। साधुसङ्ग ही भक्तिप्रतिकूल मार्गके अनुसरणकी प्रवृत्तिके मूलको काटनेवाला है। साधुओंके प्रकृष्ट सङ्गमें ही श्रीभगवान्की हृदय और कानोंको रसायन लगनेवाली कथाओंकी चर्चा होती है। उन कथाओंको सुनते-सुनते अविद्यानिवृत्ति मार्गस्वरूप भगवान्के चरणकमलोंमें क्रमशः साधनभक्ति, भावभक्ति और अन्तमें प्रेमभक्ति प्राप्त होती है। प्रेमभक्ति प्राप्त होनेके बाद भी साधुसङ्ग पुनः प्रेमके मुख्य अङ्गके रूपमें ही निर्णित हुआ है, इसलिये साधुसङ्गके नित्य होनेकी घोषणा की गयी है। इसका तात्पर्य यह है कि भक्तिकल्पलताके आश्रित साधकभक्त साधुसङ्गके द्वारा परम प्राप्य प्रेमफल प्राप्त करनेके बाद 348 ।