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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 7/28-33 सातवाँ अध्याय 213 श्लोकका शब्दार्थ; रासक्रीड़ामें लक्ष्मीका अनधिकार :- 'आत्मभूत'-शब्दे कहे 'पारिषदगण'। ऐश्वर्यज्ञाने लक्ष्मी ना पाइला व्रजेन्द्रनन्दन ॥ २८ ॥ अनुवाद—'आत्मभूत' शब्दका अर्थ 'पार्षद' है। ऐश्वर्यज्ञानसे लक्ष्मी पार्षद होनेपर भी व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णको प्राप्त नहीं कर पायीं॥ २८॥ अनुभाष्य—लक्ष्मी ऐश्वर्यज्ञानमयी होनेपर भी व्रजेन्द्रकुमारकी सेवाको प्राप्त नहीं कर पायीं। लक्ष्मीदेवी और आत्मभूत पार्षदोंका श्रीकृष्णके साथ अभिन्न-शक्ति होनेपर भी, ऐश्वर्यभावसे युक्त लक्ष्मीदेवीको व्रजेन्द्रनन्दनकी मधुर सेवाधिकारकी प्राप्ति नहीं हुई॥ २८॥ शास्त्र-प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (10/47/60) में— नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीत कण्ठ- लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम्॥ २९ ॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरियोंके प्रति जो कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो क्या कहूँ?॥ २९ ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/80 संख्या देखें॥ २९॥ व्रजवासियोंके सख्य और वात्सल्यरसमें केवला या शुद्धा रागात्मिका भक्ति :- शुद्धभावे सखा करे स्कन्ध-आरोहण। शुद्धभावे व्रजेश्वरी करेन बन्धन॥ ३०॥ अनुवाद—शुद्ध अथवा केवला भावसे सखा श्रीकृष्णके कन्धेपर चढ़ते हैं और व्रजेश्वरी श्रीयशोदा श्रीकृष्णको बाँधती हैं॥ ३०॥ अनुभाष्य—'शुद्धभावे',—ऐश्वर्यज्ञानसे मुग्ध अथवा बाध्य नहीं होकर निर्मला अथवा केवला रतिके वशीभूत होकर॥ ३०॥ 'मोर सखा', 'मोर पुत्र',—एइ 'शुद्ध' मन। अतएव शुक-व्यास करे प्रशंसन॥ ३१॥ अनुवाद—'कृष्ण मेरे सखा हैं', 'कृष्ण मेरे पुत्र हैं'—यही शुद्ध अर्थात् ऐश्वर्यज्ञानहीन मनका भाव है। इसलिये श्रीशुकदेव गोस्वामी और श्रीवेदव्यास इन भक्तोंकी प्रशंसा करते हैं॥ ३१॥ शास्त्र प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (10/12/11) में— इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या दास्यं गतानां परदैवतेन। मायाश्रितानां नरदारकेण सार्द्धं विजह्रुः कृतपुण्यपुञ्जाः॥ ३२॥ अनुवाद—श्रीभागवतमें कहा गया है,—जो ज्ञानमार्गमें ब्रह्मसुखानुभूति स्वरूपमें, दास्यरसके भक्तोंको परदेवतारूपमें एवं मायाश्रित व्यक्तियोंको नरबालकके रूपमें प्रतीत होते हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके साथ व्रजके गोपबालकोंने बहुत सुकृतिके फलस्वरूप सख्यरसमें विहार किया था॥ ३२॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/75 संख्या देखें॥ ३२॥ श्रीमद्भागवत (10/8/45) में— त्रय्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगैश्च सात्वतैः। उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं साऽमन्यतात्मजम्॥ ३३॥ अनुवाद—तीनों वेदों, उपनिषद्-समूह, सांख्ययोग और भक्तिशास्त्रोंके द्वारा जिनके माहात्म्यका गान किया जाता है, उन श्रीकृष्णको यशोदा अपना 'पुत्र' समझती हैं॥ ३३॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 19/204 संख्या देखें॥ ३३॥

214 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/34-40 ] श्रीमद्भागवत (10/8/46) में— नन्दः किमकरोद्ब्रह्मन् श्रेय एवं महोदयम्। यशोदा वा महाभागा पपौ यस्याः स्तनं हरिः॥ 34 ॥ अनुवाद—श्रीमद्भागवतमें कहा गया है,—हे ब्रह्मन्! श्रीनन्द महाराजने ऐसी क्या सुकृति की थी, जिसके फलस्वरूप उन्होंने श्रीकृष्णको पुत्रके रूपमें प्राप्त किया था? महाभागा श्रीयशोदाने ही ऐसी क्या सुकृति की थी, जिससे साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्णने उनको 'माँ' कहकर उनका स्तन पान किया था?॥ 34 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/77 संख्या देखें॥ 34 ॥ व्रजके 'केवल'-भावमें ऐश्वर्यज्ञानका अभाव, इसलिये 'केवल'-भावका सर्वश्रेष्ठ होना :— ऐश्वर्य देखिलेह 'शुद्धेर' नहे ऐश्वर्य ज्ञान। अतएव ऐश्वर्य हइते 'केवल'-भाव प्रधान॥ 35 ॥ अनुवाद—ऐश्वर्य देखनेपर भी 'शुद्ध'-भाववाले भक्त उस ऐश्वर्यको नहीं मानते। इसलिये 'केवल'-भाव ऐश्वर्य-भावसे श्रेष्ठ है॥ 35 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरायका अपने शिक्षागुरुके रूपमें प्रचार :— ए-सब शिखाइला मोरे राय-रामानन्द। से-सब शुनिते हय परम आनन्द॥ 36 ॥ अनुवाद—यह सब कुछ राय रामानन्दने ही मुझे सिखलाया है। इन सबको सुननेसे ही हृदयमें परम आनन्द होता है॥ 36 ॥ अनुभाष्य—यहाँपर किसी विशेष पाठमें, “अनर्गल रसवेत्ता प्रेम सुखानन्द” [अर्थात् “रामानन्द राय रसतत्त्वके पूर्ण ज्ञाता और नित्य प्रेमके सुखानन्दमें निमग्न रहनेवाले हैं।”] दिखलायी पड़ता है॥ 36 ॥ श्रीरामानन्दके गुण :— कहन ना याय रामानन्देर प्रभाव। राय-प्रसादे जानिनुँ व्रजेर 'शुद्ध' भाव॥ 37 ॥ अनुवाद—राय रामानन्दके प्रभावका वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि राय रामानन्दकी कृपासे ही मैंने व्रजके शुद्धभावको जाना है॥ 37 ॥ (5) श्रीदामोदर-स्वरूपकी गुणावली; प्रेमरसविग्रह और गोपीतत्त्व-माहात्म्यवेत्ता या व्रज-माधुर्य-रस-तत्त्वाचार्य :— दामोदर-स्वरूप—'प्रेमरस' मूर्त्तिमान्। याँर सङ्गे हैल व्रज-मधुर-रस-ज्ञान॥ 38 ॥ अनुवाद—स्वरूप दामोदर प्रेमरसके साक्षात् मूर्त्तिमान् रूप हैं। उन्हींके सङ्गसे मुझे व्रजके मधुररसका ज्ञान हुआ है॥ 38 ॥ श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंको सन्तुष्ट करनेवाली गोपियोंका माहात्म्य :— 'शुद्धप्रेम' व्रजदेवीरे—कामगन्धहीन। 'कृष्णसुखतात्पर्य',—एइ तार चिह्न॥ 39 ॥ अनुवाद—व्रजदेवियोंके शुद्धप्रेममें कामकी अर्थात् अपने सुखकी अभिलाषाकी गन्ध भी नहीं है। श्रीकृष्णको सुखी करनेका तात्पर्य ही उस शुद्धप्रेमका लक्षण है॥ 39 ॥ शास्त्र प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (10/31/19) में— यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ 40 ॥ अनुवाद—गोपियाँ बोलीं—“हे प्रिय! हम तुम्हारे सुकोमल चरणकमलोंको अपने कठोर स्तनोंपर धीरे-धीरे धारण करतीं हैं, उन्हीं चरणोंके द्वारा तुम अभी वनमें भ्रमण कर रहे हो, वहाँ छोटे-छोटे कङ्कड़-पत्थरादि चुभनेके द्वारा अवश्य ही तुम्हें कष्ट हो रहा होगा। तुम हमारे जीवन स्वरूप हो, इसलिये तुम्हारी चिन्तामें व्याकुल होकर हम सबकी बुद्धि भ्रमित हो रही है॥ 40 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/173 संख्या देखें॥ 40 ॥

[ 7/41-45 सातवाँ अध्याय 215 श्रीमद्भागवत (10/31/16) में— पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान् अतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः। गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥ 41 ॥ अनुवाद—हे कृष्ण, हम अपने पति, पुत्र, अन्वय (पतिके सम्बन्धसे जो पुत्रके समान हैं), भाई और बन्धुओं, सभीका परित्याग करके तुम्हारे पास आयी हैं; हमारे आनेका कारण तुम जानते हो, —तुम्हारे गीतसे मोहित होकर हम आयी हैं। हे धूर्त, रात्रिकालमें स्त्रियोंका [तुम्हारे अतिरिक्त] कौन इस प्रकार परित्याग करता है? ॥ 41 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 19/209 संख्या देखें; पाठान्तरमें, — “गोपीगणेर शुद्धप्रेम—ऐश्वर्यज्ञानहीन। प्रेमेते भर्त्सना करे एइ तार चिह्न॥” [अर्थात् “गोपियोंका श्रीकृष्णके प्रति शुद्धप्रेम है और वे श्रीकृष्णके ऐश्वर्यको देखनेपर भी उसे मानती नहीं हैं, इसलिये कभी श्रीकृष्णकी प्रेमसे भर्त्सना भी कर देती हैं। शुद्धप्रेमका यही लक्षण है।”] ॥ 41 ॥ गोपीप्रेमके निकट श्रीकृष्णका ऋण :— ‘सर्वोत्तम भजन एइ सर्वभक्ति जिनि’। अतएव कृष्ण कहे, —‘आमि तोमार ऋणी’ ॥ 42 ॥ अनुवाद—गोपियोंका मधुररसमें श्रीकृष्ण-भजन अन्य सभी प्रकारकी भक्तिके भावोंको पराभूत करता है। इसलिये श्रीकृष्ण गोपियोंसे कहते हैं, —‘मैं तुम्हारा सदाके लिये ऋणी हूँ।’ ॥ 42 ॥ श्रीमद्भागवत (10/32/22) में— न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः। या माऽभजन् दुर्जयगेहशृंखलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना ॥ 43 ॥ अनुवाद—हे गोपियों! मेरे साथ तुम्हारा मिलन निर्मल है। अनेक जन्मोंमें भी मैं अपने सत्कार्योंके द्वारा तुम्हारे प्रति कर्तव्यानुष्ठान नहीं कर सकता, क्योंकि तुम लोगोंने मेरी प्राप्तिके लिये अति कठिन संसार-शृङ्खलाको सम्पूर्णरूपसे तोड़कर मेरा अन्वेषण किया है। मैं तुम लोगोंके इस ऋणका परिशोधन करनेमें सक्षम नहीं हूँ। इसलिये तुम लोग अपने साधु कार्योंके द्वारा ही परितुष्ट होओ ॥ 43 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/180 संख्या देखें ॥ 43 ॥ व्रजके शुद्ध केवलभावकी श्रेष्ठता, उसके विषयमें श्रीउद्धवकी प्रार्थना ही प्रमाण :— ऐश्वर्यज्ञान हैते केवल-भाव—प्रधान। पृथिवीते भक्त नाहि उद्धव-समान ॥ 44 ॥ तैँह याँर पदधूलि करेन प्रार्थन। स्वरूपेर सङ्गे पाइलुँ ए सब शिक्षण ॥ 45 ॥ अनुवाद—ऐश्वर्यज्ञानसे ‘केवल’-भाव श्रेष्ठ है। पृथ्वीपर उद्धवके समान कोई भक्त नहीं है, किन्तु वे भी उन व्रजगोपियोंके चरणोंकी धूलिकी प्रार्थना करते हैं। स्वरूप दामोदरके सङ्गमें ही मुझे यह सब शिक्षा मिली है ॥ 44–45 ॥ अनुभाष्य—इस स्थानपर पाठान्तरमें—(भाः 10/47/61) श्लोक उद्धृत हुआ देखा जाता है— “आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथञ्च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥” श्रीकृष्णके द्वारा भेजे जानेपर उद्धव व्रजमें आकर कुछ मास तक वहाँ रहे। उन्होंने श्रीकृष्णकथाको सुनाकर व्रजवासियोंका हर्ष उत्पादन किया, तो भी श्रीकृष्णविरहमें तप्त गोपियोंके श्रीकृष्णके द्वारा हरण किये गये चित्तकी विकलताका दर्शन करके उनके ऐश्वर्यज्ञानहीन गाढ़तम श्रीकृष्णप्रेमको आदर्श जानकर

216 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/44-53 ] उसका आदर करते हुए इस श्लोकमें उनके चिरदास्यकी प्रार्थना कर रहे हैं,- याः (गोप्यः) [कृष्णभजनाय] स्वजनं (पतिपुत्रादीन् आत्मीयान्) दुस्त्यजं (दुष्परिहरम्) आर्यपथम् (आर्याणां मार्गं धर्मं पातिव्रत्यमिति यावत्) च हित्वा (परित्यज्य) श्रुतिभिः (वेदैः) विमृग्याम् (अन्वेष्टव्याम् उपास्यां) मुकुन्दपदवीं (कृष्णसरणीं) भेजुः (अन्वगच्छन्), अहो (भाग्यवर्णने) वृन्दावने (अस्मिन् व्रजे) आसां (तासां) चरणरेणुजुषां (पदररेणुभाजां) गुल्मलताौषधीनां (गुल्मादीनां मध्ये यत्) किमपि अहं स्यां (भवेयमित्याशंसा)। अर्थात् “जिन्होंने अति कठिनाईसे त्यागे जानेवाले पति-पुत्रादि निजजन और आर्यपथका परित्याग करके वेदोंके द्वारा खोजे जा रहे मुकुन्दके चरणकमलोंका भजन किया है, इस वृन्दावनमें स्थित समस्त गुल्म, लता और औषधियाँ उन गोपियोंकी चरणरेणुकी सेवामें नियुक्त हैं, अहो! मैं (महासौभाग्यशाली होकर) उनमेंसे कोई एक बन सकूँ॥”44-45॥ (6) महाभागवत आचार्य ठाकुर श्रीहरिदासकी गुणावली :- हरिदास ठाकुर-महाभागवत-प्रधान। प्रतिदिन लय तैं ह तिनलक्ष नाम ॥ 46 ॥ नामेर महिमा आमि ताँर ठाञि शिखिलुँ। ताँर प्रसादे नामेर महिमा जानिलुँ ॥ 47 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुर महाभागवतोंमें प्रधान हैं, वे प्रतिदिन तीन लाख नाम ग्रहण करते हैं। मैंने उनसे ही नामकी महिमाको सीखा है और उनकी कृपासे ही मैंने नामकी महिमाको जाना है॥ 46-47॥ अन्यान्य नाम-प्रेम-प्रचारक गौरभक्तगण :- आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, पण्डित-गदाधर। जगदानन्द, दामोदर, शङ्कर, वक्रेश्वर ॥ 48 ॥ काशीश्वर, मुकुन्द, वासुदेव, मुरारि। आर यत भक्तगण गौड़े अवतरि' ॥ 49 ॥ शुद्धभक्तिका आचार और प्रचार करनेवाले साधुओंके सङ्गसे ही जीवको कृष्णभक्तिकी प्राप्ति :- कृष्ण-नाम-प्रेम कैला जगते प्रचार। इँहा सबार सङ्गे कृष्णभक्ति ये आमार ॥ ”50 ॥ अनुवाद-आचार्यरत्न (श्रीचन्द्रशेखर), आचार्यनिधि (पुण्डरीक विद्यानिधि), गदाधर पण्डित, जगदानन्द पण्डित, दामोदर पण्डित, शङ्कर पण्डित, वक्रेश्वर पण्डित, काशीश्वर पण्डित, मुकुन्द दत्त, वासुदेव दत्त और मुरारि गुप्त आदि जो सब भक्त गौड़देशमें अवतरित हुए हैं, उन्होंने ही जगत्में कृष्णनामके द्वारा कृष्णप्रेमका प्रचार किया है। इन सबके सङ्गसे ही मुझमें कृष्णभक्ति उत्पन्न हुई है॥”48-50॥ श्रीवल्लभके गर्वका हरण करनेके लिये महाप्रभुके द्वारा उनकी अपेक्षा अधिक गुण-सम्पन्न भक्तोंके गुणोंका वर्णन :- भट्टेर् हृदये दृढ़ अभिमान जानि'। भङ्गी करि' महाप्रभु कहे एत वाणी ॥ 51 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीवल्लभ भट्टके हृदयमें दृढ़ अभिमानको जानते थे, इसलिये उसे इङ्गित करते हुए उन्होंने यह सब कहा॥ 51 ॥ अधोक्षजके विषयमें अक्षज-ज्ञानी श्रीवल्लभकी प्राकृत अहङ्कार-चेष्टा; भागवतके आनुगत्यको त्यागकर श्रीवल्लभके द्वारा भागवतकी टीकाकी रचना :- “आमि से ‘वैष्णव',-भक्तिसिद्धान्त सब जानि। आमि से भागवत-अर्थ उत्तम बाखानि ॥”52 ॥ महाप्रभुकी कृपासे श्रीवल्लभका अहङ्कार-चूर्ण :- भट्टेर् मनेते एइ छिल दीर्घ गर्व। प्रभुर वचन शुनि' से हइल खर्व ॥ 53 ॥ अनुवाद-“मैं उन्नत वैष्णव हूँ, मैं समस्त भक्तिसिद्धान्तोंको जानता हूँ, मैं भागवतके अर्थोंको

[ 7/52-62 सातवाँ अध्याय 217 भली-भाँति जानकर उत्तमरूपसे व्याख्या करता हूँ”—श्रीवल्लभ भट्टके मनमें यह बहुत बड़ा गर्व था, किन्तु महाप्रभुके वचनोंको सुनकर वह खण्डित हो गया ॥ 52-53 ॥ अनुभाष्य—‘दीर्घ गर्व’,–अति पुष्ट, अति उच्च अभिमान ॥ 53 ॥ महाप्रभुके मुखसे सुने गौरभक्त वैष्णवोंके दर्शनकी इच्छा :— प्रभुर मुखे वैष्णवता शुनिया सबार। भट्टेर इच्छा हैल सबारे देखिबार॥ 54॥ अनुवाद—महाप्रभुके मुखसे सब भक्तोंकी वैष्णवताके विषयमें सुनकर श्रीवल्लभ भट्टके मनमें उन सबके दर्शनकी इच्छा जाग्रत हुई॥ 54॥ भट्ट कहे,—“ए सब वैष्णव रहे कोन् स्थाने? कोन् प्रकारे पाइमु इँहा-सबार दर्शने??”55॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने कहा,—“ये सब वैष्णव कहाँ रहते हैं? किस प्रकार मुझे इन सबके दर्शन प्राप्त होंगे?” 55॥ महाप्रभुके द्वारा उनके अवस्थानका वर्णन :— प्रभु कहे,—“केह गौड़े, केह देशान्तरे। सब आसियाछे रथयात्रा देखिबारे॥ 56॥ श्रीभट्टको भक्तोंके दर्शनके लिये प्रतीक्षाके लिये आश्वासन देना :— इँहाइ रहेन सबे, वासा—नाना—स्थाने। इँहाइ पाइबा तुमि सबार दर्शने॥”57॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“कुछ तो गौड़देशमें और कुछ अन्य स्थानोंपर रहते हैं, किन्तु अभी सभी रथयात्राके दर्शनके लिये श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये हुए हैं। सभी भक्त यहाँपर ही भिन्न-भिन्न स्थानोंपर रह रहे हैं। आपको यहींपर सभी भक्तोंके दर्शन प्राप्त होंगे॥” 56-57॥ श्रीभट्टके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :— तबे भट्ट कहे बहु विनय वचन। बहु यत्न करि’ प्रभुरे कैल निमन्त्रण॥ 58॥ अनुवाद—तब श्रीवल्लभभट्टने बहुत विनीत वचन कहे और बहुत आग्रह करके महाप्रभुको निमन्त्रित किया॥ 58॥ महाप्रभुके निकट भक्तोंका आगमन और श्रीभट्टके साथ मिलन :— आर दिन सब वैष्णव प्रभुस्थाने आइला। सबा—सने महाप्रभु भट्टे मिलाइला॥ 59॥ अनुवाद—अगले दिन जब सब भक्त महाप्रभुके स्थानपर आये, तब महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टको उन सबसे मिलवाया॥ 59॥ दीप्त सूर्यके आगे निस्तेज जुगनूकी भाँति गौरभक्तोंके सामने श्रीवल्लभभट्ट :— ‘वैष्णवेर’ तेज देखि’ भट्टेर चमत्कार। ताँ—सबार आगे भट्ट—खद्योत—आकार॥ 60॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट वैष्णवोंके तेजको देखकर आश्चर्यचकित हो गये। उन सबके आगे श्रीवल्लभ भट्ट जुगनूकी भाँति प्रतीत होने लगे॥ 60॥ श्रीभट्टके द्वारा सपरिकर महाप्रभुको भिक्षा-प्रदान :— तबे भट्ट बहु महाप्रसाद आनाइल। गण—सह महाप्रभुरे भोजन कराइल॥ 61॥ अनुवाद—तब श्रीवल्लभ भट्टने श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे बहुत-सा महाप्रसाद मँगवाया और महाप्रभुको उनके भक्तों सहित भोजन करवाया॥ 61॥ श्रीपरमानन्दपुरीके सङ्गमें संन्यासी-भक्तोंका एक पंक्तिमें बैठना :— परमानन्द पुरी—सङ्गे संन्यासीर गण। एकदिके कैसे सब करिते भोजन॥ 62॥

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218 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/62-72 ]

[बायाँ स्तम्भ] अनुवाद—एक ओर श्रीपरमानन्दपुरीके साथ बहुतसे संन्यासी भोजन करनेके लिये बैठे ॥ ६२ ॥ महाप्रभुके दोनों ओर दो प्रभु :— अद्वैत, नित्यानन्द-राय—पार्श्वे दुइजन। मध्ये महाप्रभु बसिला, आगे-पाछे भक्तगण ॥ ६३ ॥ अनुवाद—महाप्रभु भक्तोंके बीचमें बैठे, महाप्रभुके दोनों ओर श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु बैठे और उनके आगे-पीछे अन्यान्य समस्त भक्त बैठ गये ॥ ६३ ॥ गौड़ीय भक्तोंका श्रेणीबद्धरूपमें बैठना :— गौड़ेर भक्त यत कहिते ना पारि। अङ्गने बसिला सब हञा सारि सारि ॥ ६४ ॥ अनुवाद—श्रीगौड़देशके कितने भक्त थे, इस विषयमें मैं (ग्रन्थकार) कह नहीं सकता, वे सभी आङ्गनमें पंक्ति बनाकर बैठ गये ॥ ६४ ॥ गौरभक्तोंको देखकर श्रीभट्टके द्वारा प्रणाम :— प्रभुर भक्तगण देखि' भट्टेर चमत्कार। प्रत्यक्षे सबार पदे कैल नमस्कार ॥ ६५ ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भक्तोंको देखकर श्रीवल्लभ भट्ट आश्चर्यचकित रह गये, उन्होंने प्रत्यक्ष रूपसे सभीके चरणोंमें नमस्कार किया ॥ ६५ ॥ छह भक्तोंके द्वारा प्रसाद वितरण :— स्वरूप, जगदानन्द, काशीश्वर, शङ्कर। परिवेशना करे, आर राघव, दामोदर ॥ ६६ ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीशङ्कर पण्डित, श्रीराघव पण्डित और श्रीदामोदर पण्डित—ये प्रसाद परोस रहे थे ॥ ६६ ॥ श्रीवल्लभ-भट्टके द्वारा भक्तों सहित महाप्रभुको प्रसादके द्वारा सन्तुष्ट करना :— महाप्रसाद वल्लभ-भट्ट बहु आनाइल। प्रभु-सह संन्यासिगण भोजने बसिल ॥ ६७ ॥

[दायाँ स्तम्भ] अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने बहुत अधिक मात्रामें महाप्रसाद मँगवाया था। सभी संन्यासी महाप्रभुके साथ भोजन करनेके लिये बैठे ॥ ६७ ॥ सभीके द्वारा एकसाथ हरिध्वनि :— प्रसाद पाय वैष्णवगण बोले, 'हरि' 'हरि'। हरिध्वनि उठिल सब ब्रह्माण्ड भरि' ॥ ६८ ॥ अनुवाद—सभी वैष्णव प्रसाद ग्रहण करते समय 'हरि', 'हरि' बोल रहे थे। उस हरिध्वनिसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भर गया ॥ ६८ ॥ आचमनके बाद सभीको अभिनन्दन :— माला, चन्दन, गुवाक, पान अनेक आनिल। सबा' पूजा करि' भट्ट आनन्दित हैल ॥ ६९ ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट बहुत-सी माला, चन्दन, सुपारी और पान लेकर आये। ये सब सामग्री सभीको भेंट करके उनकी पूजा करके श्रीवल्लभ भट्ट बहुत आनन्दित हुए ॥ ६९ ॥ रथयात्राके समय सात मण्डलियोंके कीर्तनका वर्णन :— रथयात्रादिने प्रभु कीर्त्तन आरम्भिला। पूर्ववत् सातसम्प्रदाय पृथक् करिला ॥ ७० ॥ अनुवाद—रथयात्राके दिन महाप्रभुने कीर्तन आरम्भ किया। पूर्व वर्षोंकी भाँति उन्होंने सात पृथक् मण्डलियाँ बनायीं ॥ ७० ॥ सात मण्डलियोंमें सात कीर्तन करनेवाले :— अद्वैत, नित्यानन्द, हरिदास, वक्रेश्वर। श्रीवास, राघव, पण्डित-गदाधर ॥ ७१ ॥ अलातचक्रकी भाँति महाप्रभुके द्वारा कीर्तनमें भ्रमण :— सातजन सात ठाञि करेन नर्त्तन। 'हरिबोल' बलि' प्रभु करेन भ्रमण ॥ ७२ ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीवास पण्डित, श्रीराघव

[ 7/71-80 सातवाँ अध्याय 219 पण्डित और श्रीगदाधर पण्डित—ये सात भक्त पृथक्-पृथक् सात मण्डलियोंमें जाकर नृत्य करने लगे और महाप्रभु 'हरिबोल' बोलते हुए इन सात मण्डलियोंमें भ्रमण करने लगे॥ 71-72॥ चौदह मृदङ्ग :— चौद्द मादल बाजे उच्च सङ्कीर्त्तन। एक एक नर्त्तकेर प्रेमे भासिल भुवन ॥ 73 ॥ अनुवाद—चौदह मृदङ्ग बज रहे थे, उच्च स्वरमें हरिनाम सङ्कीर्त्तन हो रहा था, प्रत्येक मण्डलीमें एक-एक नर्तकके प्रेमसे सम्पूर्ण जगत् आप्लावित हो गया ॥ 73 ॥ श्रीवल्लभका विस्मय और परमानन्द :— देखि' वल्लभ-भट्टेरे हैल चमत्कार। आनन्दे विह्वल, नाहि आपन-साम्भाल ॥ 74 ॥ अनुवाद—यह सब देखकर श्रीवल्लभ भट्ट अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए। वे आनन्दमें विह्वल होनेके कारण स्वयंको सम्भाल भी नहीं पा रहे थे ॥ 74 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'साम्भाल',—सम्भालना ॥ 74 ॥ नृत्य-कीर्त्तनके बाद महाप्रभुके प्रेम-वैभवको देखकर श्रीवल्लभको विस्मय :— तबे महाप्रभु सबार नृत्य राखिल। प्रभुर चरित्रे भट्टेर चमत्कार हैल ॥ 75 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंसे नृत्यको विराम देनेके लिये कहा। महाप्रभुकी लीलाको देखकर श्रीवल्लभ भट्टके हृदयमें चमत्कार हुआ ॥ 75 ॥ महाप्रभुसे श्रीवल्लभका निवेदन :— यात्रान्तरे भट्ट याय महाप्रभु-स्थाने। प्रभु-चरणे किछु कैल निवेदने ॥ 76 ॥ अपने द्वारा पूर्नलिखित टीकाके श्रवणके लिये महाप्रभुसे प्रार्थना :— “भागवतेर टीका किछु करियाछि लिखन। आपने महाप्रभु यदि करेन श्रवण ॥ ”77॥ अनुवाद—श्रीरथयात्राके समाप्त होनेके बाद एक दिन श्रीवल्लभ भट्ट महाप्रभुके वासस्थानपर गये और उन्होंने महाप्रभुके चरणकमलोंमें कुछ निवेदन किया,—“मैंने भागवतकी कुछ टीका लिखी है। हे महाप्रभु! आप कृपापूर्वक उसे श्रवण करें ॥ ”76-77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'यात्रान्तरे',—अन्य यात्रामें, अन्य दिनमें ॥ 76 ॥ स्वयंको अनधिकारी मानकर महाप्रभुका दैन्य और छलपूर्ण उक्ति; कृष्ण-कार्ष्णके सुख-तात्पर्यके अतिरिक्त जड़विद्या और पाण्डित्यसे भागवतके अर्थ दुर्बोध्य :— प्रभु कहे,—“भागवतार्थ बुझिते ना पारि। भागवतार्थ शुनिते आमि नहि अधिकारी ॥ 78 ॥ थकानरहित निरन्तर शुद्धकृष्णनाम ग्रहण करनेमें निष्ठा और रुचिसे ही भागवत-पाठ श्रवण करनेकी सफलता, इन्द्रिय-तर्पण परायण जड़ीय विद्या और पाण्डित्यको प्रदर्शित करनेके उद्देश्यसे श्रवण-पठनादि वृथा समय व्ययमात्र :— बसि' कृष्णनाम मात्र करिये ग्रहणे। संख्या-नाम पूर्ण मोर नहे रात्रि-दिने ॥ ”79 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं भागवतके अर्थोंको समझ नहीं पाता। मैं भागवतके अर्थको सुननेका अधिकारी भी नहीं हूँ। मैं तो बैठकर केवल कृष्णनामका कीर्त्तन करता हूँ। दिन-रात नाम कीर्त्तन करनेपर भी मेरी नाम-संख्या पूर्ण नहीं होती ॥ ”78-79 ॥ श्रीवल्लभभट्टके द्वारा स्वरचित श्रीकृष्णनामकी व्याख्याके श्रवण हेतु महाप्रभुसे अनुरोध :— भट्ट कहे,—“कृष्णनामेर अर्थ-व्याख्याने। विस्तार करियाछि, ताहा करह श्रवणे ॥ ”80 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने कहा,—“मैंने कृष्णनामके अर्थकी व्याख्याका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, उस व्याख्याको आप श्रवण कीजिये ॥ ”80 ॥

220 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/81-86 ] अभिन्न-चिद्विलासी वाचक कृष्णनाम और स्व-सुखपरक जड़विद्या, बुद्धि या मेधाकी सहायतासे वाच्य गोकुलपति श्रीकृष्ण-विग्रह :- श्रीकृष्णनाम और श्रीकृष्ण-अभिन्न भागवत-व्याख्यादिमें प्रभु कहे,-'कृष्णनामेर बहु अर्थ ना मानि। श्रीकृष्णसुखके अभावको जानकर महाप्रभुकी घृणा :- 'श्यामसुन्दर' 'यशोदानन्दन', -एइमात्र जानि ॥ 81 ॥ फल्गुप्राय भट्टेर नामादि सब व्याख्या। सर्वज्ञ प्रभु जानि' तारे करेन उपेक्षा ॥ 84 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"मैं कृष्णनामके बहुतसे अनुवाद-महाप्रभु सर्वज्ञ हैं, इसलिये वे जानते थे अर्थोंको नहीं मानता, कृष्ण 'श्यामसुन्दर' और 'यशोदानन्दन' कि श्रीवल्लभ भट्टके द्वारा की गयी कृष्णनाम और हैं-मैं केवल इतना ही जानता हूँ॥ 81 ॥ भागवतकी समस्त व्याख्याएँ निस्सार और निरर्थक हैं। कृष्णनामका 'रूढ़ि' अर्थ :- इसलिये महाप्रभु उन व्याख्याओंकी उपेक्षा कर रहे कृष्णसन्दर्भमें उद्धृत श्रीलक्ष्मीधर-कृत नामकौमुदी-श्लोक- थे॥ 84 ॥ तमालश्यामलत्विषि श्रीयशोदास्तनन्धये। अमृतप्रवाह भाष्य-'फल्गुप्राय', -तुच्छप्राय ॥ 84 ॥ कृष्णनाम्नो रूढिरिति सर्वशास्त्र-विनिर्णयः ॥ 82 ॥ अनुभाष्य-पाठान्तरमें- 'फल्गु वलुप्राय' एवं 'फल्गु अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 82 ॥ वलानप्राय'; 'फल्गु',-तुच्छ; 'वलान अथवा वलु',- अमृतप्रवाह भाष्य-तमाल-श्यामलवर्ण और यशोदा- वाक्-आडम्बर ॥ 84 ॥ स्तनपायी, -इन दो कृष्णनामोंमें समस्त शास्त्रोंमें विनिर्णीत दुःखी मनसे श्रीभट्टका प्रस्थान और गर्वके नष्ट होनेके रूढ़ि अर्थात् मुख्य अर्थ विद्यमान है ॥ 82 ॥ कारण महाप्रभुके प्रति भक्तिकी कमी :- अनुभाष्य- विमना हञा भट्ट गेला निज घर। तमाल-श्यामल-त्विषि (तमालवृक्षवत् श्यामला त्विट् कान्तिः प्रभु-विषये भक्ति किछु हइल अन्तर ॥ 85 ॥ यस्य तस्मिन्) श्रीयशोदास्तनन्धये (श्रीयशोदायाः स्तनन्धये अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट दुःखी मनसे अपने घर स्तनपायिनि शिशुस्वरूपे) कृष्णनाम्नः (कृष्णोति नाम, तस्य) लौट गये। महाप्रभुके प्रति उनकी भक्तिमें कुछ कमी रूढ़िः (मुख्या, प्रसिद्धा वृत्तिः) इति सर्वशास्त्रविनिर्णयः (सर्वेषां आ गयी ॥ 85 ॥ शास्त्राणां विशेषेण निर्णयः सकलशास्त्रसिद्धान्तः इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुके विषयमें उनकी जो रूढ़िः-प्रकृति-प्रत्ययके अर्थकी अपेक्षा नहीं करके भक्ति थी, वह कुछ दूर हो गयी ॥ 85 ॥ समुदायके अर्थका बोध करानेवाली शब्द-शक्ति ॥ 82 ॥ अनुभाष्य-श्रीमन्महाप्रभुके चरणकमलोंमें उनकी गाढ़ 'रूढ़ि' अर्थ ही सिद्ध और स्वीकार्य; भक्तिका ह्रास हो गया ॥ 85 ॥ अन्य अर्थ अस्वीकार्य :- श्रीगदाधरकी चाटुता आरम्भ :- एइ अर्थ आमि मात्र जानिये निर्द्धार। तबे भट्ट गेला पण्डित-गोसाञिर ठाञि। आर सर्व-अर्थे मोर नाहि अधिकार ॥" 83 ॥ नाना मते प्रीति करि' करे आसि-याइ ॥ 86 ॥ अनुवाद-मैं कृष्णनामके श्यामसुन्दर और अनुवाद-तब श्रीवल्लभभट्ट श्रीगदाधर पण्डितके यशोदानन्दन-केवल इन्हीं अर्थोंको ही शास्त्रके द्वारा वासस्थानपर गये। वे अनेक प्रकारसे उनसे प्रीति निर्धारित मानता हूँ, अन्य सभी अर्थोंमें मेरा अधिकार दिखाकर उनके पास आना-जाना करके उनसे सम्बन्ध नहीं है ॥" 83 ॥ बनाये रखने लगे ॥ 86 ॥

[ 7/86-94 सातवाँ अध्याय 221

अनुभाष्य—'पण्डित-गोसाञि'—श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी ॥ 86 ॥ महाप्रभुके द्वारा उपेक्षा करनेके कारण भक्तोंकी उनके द्वारा की गयी व्याख्याके प्रति उदासीनता :- प्रभुर उपेक्षाय सब नीलाचलेर जन। भट्टेर व्याख्यान किछु ना करे श्रवण ॥ 87 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके द्वारा उपेक्षा किये जानेके कारण नीलाचलका कोई भी व्यक्ति श्रीवल्लभ भट्टकी किसी भी व्याख्याको श्रवण नहीं करता था॥ 87 ॥ श्रीभट्टका लज्जित होना और श्रीगदाधरकी चाटुकारी :- लज्जित हैल भट्ट, हैल अपमाने। दुःखित हञा गेल पण्डितेर स्थाने ॥ 88 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट लज्जित, अपमानित और दुःखी होकर श्रीगदाधर पण्डितके पास गये ॥ 88 ॥ दैन्य करि' कहे,—“निलुँ तोमार शरण। तुमि कृपा करि' राख आमार जीवन ॥ 89 ॥ श्रीगदाधरको स्वरचित कृष्णनाम-व्याख्याके श्रवणके लिये प्रार्थना करना :- कृष्णनाम व्याख्या यदि करह श्रवण। तबे मोर लज्जा-पङ्क हय प्रक्षालन ॥” 90 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट बड़ी दीनतासे कहने लगे,—“मैंने आपकी शरण ग्रहण की है। आप कृपा करके मेरे जीवनकी रक्षा कीजिये। यदि आप मेरे द्वारा की गयी कृष्णनामकी व्याख्याका श्रवण करेंगे, तभी मुझपर लगा लज्जारूपी कीचड़ धुलेगा॥” 89–90 ॥ अनुभाष्य—'निलुँ',—पाठान्तरमें 'लैलूँ' ॥ 89 ॥ श्रीगदाधरका दोनों ओर सङ्कट :- सङ्कटे पड़िला पण्डित, करये संशय। कि करिबेन,—इहा करिते नारेन निश्चय ॥ 91 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित दुविधामें पड़ गये। उन्हें संशय होने लगा कि मैं क्या करूँ—इसका वे निश्चय नहीं कर पा रहे थे ॥ 91 ॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुने वल्लभभट्टकी उपेक्षा की है, फिर यदि मैं उनसे (वल्लभभट्टसे) नामव्याख्या-मूलक रचना आदि श्रवण करूँ, तो महाप्रभुके मनमें क्लेश होगा। इन दोनोंमें-से किस पक्षकी रक्षा करूँ, यही चिन्ता करके पण्डित गोस्वामी दुविधामें पड़ गये ॥ 91 ॥ श्रीगदाधरकी पहले श्रीवल्लभरचित व्याख्याका श्रवण करनेमें असम्मति; तथापि श्रीभट्टका अनुरोध :- यद्यपि पण्डित ना कैला अङ्गीकार। भट्ट याइ, तबु पड़े करि' बलात्कार ॥ 92 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीगदाधर पण्डित सुनना नहीं चाहते थे, तथापि श्रीवल्लभ भट्ट हठपूर्वक उन्हें स्वरचित कृष्णनामकी व्याख्याको पढ़कर सुनाने लगे ॥ 92 ॥ अनुभाष्य—पण्डित गोस्वामीने प्रकटरूपसे श्रीवल्लभकी रचना सुननेकी इच्छा प्रकाशित नहीं की, तो भी श्रीवल्लभ उनके साथ प्रीतिकी डोरकी कल्पना करके उनके नहीं माननेपर भी उनके सामने पाठ करने लगे ॥ 92 ॥ सबको मान देनेवाले और उद्वेग देनेमें अनिच्छुक श्रीगदाधरका दोनों ओर सङ्कट देखकर श्रीकृष्णकृपाकी याचना :- आभिजात्ये पण्डित करिते नारे निषेधन। “ए सङ्कटे कृष्ण राख, लइलाङ शरण ॥ 93 ॥ भीतरमें अनिच्छुक होनेपर भी श्रीभट्टकी मर्यादाको देखते हुए महाप्रभुके द्वारा उपेक्षित व्याख्याके श्रवण-हेतु अन्तर्यामी महाप्रभुके विचारमें पण्डितका विश्वास, किन्तु महाप्रभुके भक्तोंसे आशङ्का :- अन्तर्यामी प्रभु जानिबेन मोर मन। ताँरे भय नाहि किछु, 'विषम' ताँर गण ॥” 94 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट समाजमें सम्मानित होनेके कारण श्रीगदाधर पण्डित उन्हें बलपूर्वक सुनानेसे मना नहीं कर पाये। इसलिये वे भगवान् श्रीकृष्णसे मन-ही-मनमें प्रार्थना करने लगे,—“हे कृष्ण! इस सङ्कटमें आप मेरी

222 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/93–100 ] रक्षा करो, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। अन्तर्यामी होनेके कारण महाप्रभु अवश्य ही मेरे मनकी स्थितिको समझ लेंगे, मुझे उनसे कोई भय नहीं है, किन्तु उनके पार्षद 'विषम' हैं अर्थात् उन्हें अपने मनकी बात समझाना कठिन होगा॥" 93-94 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'आभिजात्ये', -कुलीनताके कारण अर्थात् पण्डितकुलमें श्रीवल्लभ भट्टका सम्मान होनेके कारण ॥ 93 ॥ अनुभाष्य- 'आभिजात्ये', - (1) लज्जाके कारण, (2) नितान्त भक्तिविरोधी पाण्डित्य नहीं होनेके कारण और (3) सामाजिक-सम्मानके कारण। स्वयं भगवान् श्रीमहाप्रभु सभीके हृदयके भावोंको जाननेवाले हैं; गदाधर पण्डितगोस्वामी किस प्रकारकी अवस्थामें श्रीवल्लभके साथ किस प्रकारका व्यवहार करनेके लिये बाध्य हुए हैं, वह भगवान् गौरसुन्दरके लिये अज्ञात नहीं है। इसलिये महाप्रभुके विरागके पात्र होनेके सम्बन्धमें उन्हें कोई आशङ्का नहीं थी; परन्तु महाप्रभुके आश्रित वैष्णवोंमें-से कोई-कोई भीतरकी सब बातोंको नहीं समझकर बादमें 'वल्लभके सङ्गकारी' कहकर पण्डित गोस्वामीके प्रतिकूल कोई अभिप्राय प्रकाशित करें, - यही आशङ्काका विषय है॥ 93-94 ॥ श्रीवल्लभ-रचित व्याख्याके श्रवणसे अन्याय नहीं होनेपर भी श्रीपण्डितके साथ महाप्रभुके भक्तोंका प्रेम-कलह :- यद्यपि विचारे पण्डितेर नाहि दोष। तथापि प्रभुर गण करे प्रणय-रोष ॥ 95 ॥ अनुवाद-इस विषयमें विचार करनेपर यद्यपि श्रीगदाधर पण्डितका कोई दोष नहीं था, तथापि महाप्रभुके भक्त उनके प्रति प्रणय-रोष करने लगे ॥ 95 ॥ श्रीअद्वैताचार्य आदिके साथ श्रीवल्लभभट्टका कुतर्क :- प्रत्यह वल्लभ-भट्ट आइसे प्रभु-स्थाने। 'उद्ग्राहादि' प्राय करे आचार्यादि-सने ॥ 96 ॥ अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट प्रतिदिन महाप्रभुके वासस्थानपर आते और श्रीअद्वैताचार्य आदिसे वितर्क करते ॥ 96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'उद्ग्राहादि' - वितर्कादि ॥ 96 ॥ अनुभाष्य - 'उद्ग्राहादि प्राय',- आक्रमणके जैसे अर्थात् विद्याविचार-जैसे तर्कोंका प्रदर्शन। 'आचार्यादि',- श्रीअद्वैताचार्य अथवा आचार्य दामोदरस्वरूप आदिके साथ ॥ 96 ॥ श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा श्रीवल्लभके समस्त अभक्तिसिद्धान्तोंका खण्डन :- येइ किछु करे भट्ट 'सिद्धान्त' स्थापन। शुनितेइ आचार्य ताहा करेन खण्डन ॥ 97 ॥ अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट जिस किसी भी सिद्धान्तको स्थापित करते, श्रीअद्वैताचार्य सुनते ही उसका खण्डन कर देते ॥ 97 ॥ गौरभक्तोंके मध्य श्रीभट्ट-जैसे हंसोंके मध्य बगुला :- आचार्यादि-आगे भट्ट यबे यबे याय। राजहंस-मध्ये येन रहे बकप्राय ॥ 98 ॥ अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट जब-जब श्रीअद्वैताचार्य आदिके बीचमें जाते, वे राजहंसोंके मध्य बगुलेकी भाँति ही होते ॥ 98 ॥ प्रकृतिरूपी जीवके लिये उनके नित्य पति श्रीकृष्णके नामोंके उच्चारण करनेके अधिकारमें श्रीवल्लभके द्वारा आपत्ति जतलाना :- एकदिन भट्ट पुछिल आचार्येरे। “जीव-‘प्रकृति’ ‘पति’ करि’ मानये कृष्णेरे ॥ 99 ॥ पतिव्रता हञा पतिर नाम नाहि लय। तोमरा कृष्णनाम-लह, - कोन् धर्म हय?? ” 100 ॥ अनुवाद-एकदिन श्रीवल्लभ भट्टने श्रीअद्वैताचार्यसे पूछा,- “जीव प्रकृति अर्थात् स्त्री है और श्रीकृष्णको पति मानती है। पतिव्रता होनेके कारण पत्नी अपने पतिके नामका उच्चारण नहीं करती, किन्तु आप लोग

[ 7/99-109 सातवाँ अध्याय 223

तो कृष्णका नाम लेते हैं—यह क्या कोई धर्म है?"99-100 ॥ मीमांसाके लिये श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा साक्षात् धर्मके विग्रह महाप्रभुको दिखाना :- आचार्य कहे,—“आगे तोमार 'धर्म' मूर्त्तिमान्। इँहारे पुछह, इँह करिबेन प्रमाण॥” 101 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“आपके सामने मूर्त्तिमान 'धर्म' (महाप्रभु) विराजमान हैं। आप इन्हींसे पूछिये, ये ही आपको इसका प्रमाण देंगे॥” 101 ॥ श्रीवल्लभके ऊपर कृपा और नित्य-मङ्गलका प्रदर्शन करनेके लिये ही महाप्रभुके द्वारा बहुत कठोर किन्तु सत्य उत्तर देना; पतिरूपी श्रीकृष्णके उद्देश्यसे ही प्रकृतिरूपी जीवके लिये सदैव श्रीकृष्णनामको ग्रहण करनेकी विधि :- प्रभु कहेन,—“तुमि ना जानह धर्माधर्म। स्वामी-आज्ञा पाले,—एइ पतिव्रता-धर्म॥ 102 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“तुम धर्म-अधर्मके विषयमें नहीं जानते हो। पतिकी आज्ञाका पालन करना ही पतिव्रता स्त्रीका धर्म होता है॥ 102 ॥ पतिर आज्ञा,—निरन्तर ताँर नाम लइते। पतिर आज्ञा पतिव्रता ना पारे लङ्घिते॥ 103 ॥ अनुवाद—उनका निरन्तर नाम ग्रहण करना ही पतिकी (कृष्णकी) आज्ञा है। इसलिये पतिव्रता स्त्रीको (जीवको) निरन्तर नाम कीर्तन करना चाहिये, क्योंकि वह अपने पतिकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकती॥ 103 ॥ पतिरूपी श्रीकृष्णनाम उच्चारणके फलसे श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रेमका उदय :- अतएव नाम लय, नामेर 'फल' पाय। नामेर फले कृष्णपदे 'प्रेम' उपजाय॥” 104 ॥ अनुवाद—इसलिये [भक्त] जीव कृष्णनामका सदा कीर्तन करके नामके फलको प्राप्त करता है। नामके फलस्वरूप उसका कृष्णके चरणोंमें प्रेम उत्पन्न होता है॥” 104 ॥ प्रतिष्ठाके क्षय होनेपर श्रीवल्लभ-भट्ट अवाक् और चिन्तासे व्याकुल :- शुनिया वल्लभभट्ट हैल निर्वचन। घरे याइ' मने दुःखे करेन चिन्तन॥ 105 ॥ भविष्यमें जयकी आशाकी कल्पनासे प्रतिष्ठाशा-प्रिय श्रीवल्लभका हर्ष-स्वप्न :- 'नित्य आमार एइ सभाय हय कक्षा-पात। एकदिन उपरे यदि हय मोर बात्॥ 106 ॥ तबे सुख हय, आर सब लज्जा याय। स्व-वचन स्थापिते आमि कि करि उपाय??' 107 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीवल्लभ भट्ट मौन हो गये। वे मनमें दुःखी होकर घर गये और विचार करने लगे,—'प्रतिदिन इस सभामें मेरी पराजय होती है, एकदिन भी यदि मेरी बात सबकी बातके ऊपर स्थापित हो जाय, तभी मुझे प्रसन्नता होगी और मेरी समस्त लज्जा दूर होगी। परन्तु मैं अपने वचनोंको स्थापित करनेके लिये क्या करूँ?' 105-107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कक्षा-पात',—पराजय॥ 106 ॥ अनुभाष्य—'कक्षा-पात',—कक्षा (प्रतियोगिता)+पात (नाश), पराजय; 'उपरे हय',—सभीकी उक्तियोंका खण्डन करके स्थापित हो॥ 106 ॥ एकदिन सभामें सपरिकर महाप्रभुके सामने श्रीवल्लभके द्वारा श्रीधरस्वामीकी निन्दा :- आर दिन आसि' बसिला प्रभुरे नमस्करि'। सभाते कहेन किछु मने गर्व करि'॥ 108 ॥ “भागवते स्वामीर व्याख्यान करियाछि खण्डन। लइते ना पारि ताँर व्याख्यान-वचन॥ 109 ॥

224 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/108-113 ] श्रीस्वामिपादकी पहले और बादवाली उक्तिमें सामञ्जस्य अथवा समन्वयके अभावका वर्णन करके उसपर मिथ्या दोषारोपण :- सेइ व्याख्या करेन याँहा येइ पड़े आनि' । एकवाक्यता नाहि, ताते 'स्वामी' नाहि मानि ॥" 110 ॥ अनुवाद-वे अगले दिन आकर महाप्रभुको प्रणाम करके बैठ गये और बड़े गर्वसे कुछ कहने लगे, - “मैंने स्वरचित भागवतकी टीकामें श्रीधरस्वामी कृत भागवतकी व्याख्याका खण्डन किया है। मैं उनकी व्याख्याको स्वीकार नहीं कर पाता। जहाँ जो प्रसङ्ग आता है, उसी प्रकारसे वे वहाँ व्याख्या करते हैं। इस प्रकार उनकी व्याख्यामें सङ्गति नहीं होती, इसलिये मैं उन्हें प्रमाणिक नहीं मानता ॥ 108-110 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- जहाँ जिस प्रकारकी बात आयी, श्रीधरस्वामीने उस प्रकारसे मानकर व्याख्या की। अतएव सर्वत्र उनकी एकवाक्यता (अथवा सामञ्जस्य) नहीं रहती, इसलिये मैं श्रीधरस्वामीको नहीं मानता ॥ 110 ॥ महाप्रभुके द्वारा 'भक्तिके एक रक्षक' श्रीधरस्वामिपादकी भक्तिके अनुकूल व्याख्याका समर्थन; श्रीधरका ही चित्-समन्वयरूप चिदेकविष्णु-स्वामित्व, श्रीधरके विरोधीकी ही चित्-जड़-समन्वय पोषणरूपी मनमानी :- प्रभु हासि' कहे, – “स्वामी ना माने येइ जन। वेश्यार भितरे तारे करिये गणन ॥" 111 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने मुस्कुराते हुए कहा, - “जो स्वामीको [पतिको] प्रमाणिक नहीं मानती, मैं उसकी गणना वेश्याओंमें करता हूँ।" [पक्षान्तरमें - 'जो श्रीधर स्वामीको नहीं मानता, उसकी गणना मैं व्यभिचारियोंमें करता हूँ'] ॥ 111 ॥ महाप्रभुके वचन सुनकर सभी भक्तोंको आनन्द :- एत कहि' महाप्रभु मौन धरिला। शुनिय़ा सबार मने सन्तोष हइला ॥ 112 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने मौन धारण कर लिया। महाप्रभुके वचन सुनकर समस्त उपस्थित भक्तोंके मनमें सन्तोष हुआ ॥ 112 ॥ अविद्या-नाश करनेवाले भुवनमङ्गल परमदयालु अवतारी अन्तर्यामी श्रीगौरसुन्दर :- जगतेर हित लागि' गौर-अवतार। अन्तरेर अभिमान जानेन ताहार ॥ 113 ॥ अनुवाद-जगत्के हितके लिये ही श्रीगौर-अवतार हुआ है। महाप्रभु श्रीवल्लभ भट्टके भीतरके अभिमानको जानते थे ॥ 113 ॥ अमृताणुकणिका-श्रीवल्लभ भट्टसे महाप्रभुकी भेंट सबसे पहले प्रयागमें आड़ाइल ग्राममें हुई थी। तब श्रीरूप गोस्वामी और श्रीअनुपम गोस्वामी, दोनों भाई भी महाप्रभुके साथ थे। इन दोनों भाइयोंपर कृपा करनेके लिये महाप्रभु प्रयागमें पधारे थे। श्रीवल्लभ भट्ट महाप्रभुके आगमनका समाचार सुनकर उनके दर्शन करनेके लिये आये और निमन्त्रण करके उन्हें अपने घरमें ले गये। श्रीवल्लभ भट्ट आयुमें महाप्रभुसे बहुत बड़े थे, किन्तु वह अभिमान छोड़कर उन्होंने अपने हाथोंसे महाप्रभुके चरणोंको धोया। उन्होंने और उनके परिवारने उस जलको अपने-अपने मस्तकपर धारण किया। उन्होंने गन्ध-पुष्प-धूप-दीपसे महाप्रभुकी पूजा की। तब महाप्रभुने निष्कपट रूपसे उनपर कृपा की। श्रीवल्लभ भट्टने भागवतकी 'सुबोधिनी'-नामक एक टीका लिखी थी और वे देश-विदेशमें उसका प्रचार कर रहे थे। एक बार वे दक्षिण देशमें भ्रमण करते हुए विजयनगरमें पधारे। वहाँ एक बार सभामें शङ्कराचार्य-सम्प्रदायके शङ्करका अवतार कहलानेवाले दिग्गज विद्वानके साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ। श्रीवल्लभ भट्टने उनसे पूछा, - "क्या आप 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'- इस वाक्यको मानते हैं?" उन शङ्कर-सम्प्रदायके विद्वानने कहा, - “अवश्य ही हम इसे महावाक्य मानते हैं।" श्रीवल्लभ भट्टने कहा, - "शङ्कराचार्यजीने कहा है-

[ 7/113-120 सातवाँ अध्याय 225 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः', यदि सब कुछ ब्रह्म है, तो आप इस जगत्को मिथ्या क्यों कहते हैं?" शङ्कर-सम्प्रदायके विद्वान उसका जो भी उत्तर दे रहे थे, श्रीवल्लभ भट्ट उसका खण्डन कर देते। अन्तमें जब उनको परास्त कर दिया, तब श्रीवल्लभ भट्टका एक सौ आठ सोनेके घड़ोंके जलसे अभिषेक किया गया। इसको 'कनक-अभिषेक' कहते हैं। यह सम्मान पानेके बाद उनमें कुछ अभिमान आ गया था, जैसे दक्ष प्रजापतिके प्रसङ्गमें भी देखा जाता है। (भाः 4/3/2)— “यदाभिषिक्तो दक्षस्तु ब्रह्मणा परमेष्ठिना। प्रजापतीनां सर्वेषामधिपत्ये स्मयोऽभवत्॥” “जब परमदेवता ब्रह्माजीने दक्षको समस्त प्रजापतियोंके अधिपतिके रूपमें अभिषिक्त किया, तब दक्षके हृदयमें गर्व उत्पन्न हुआ।” महाप्रभु उनके हृदयमें स्थित अभिमानको जानते थे, इसलिये उनका शोधन करनेके लिये उनकी उपेक्षा कर रहे थे।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज”॥ 113 ॥ अधोक्षज महाप्रभुके द्वारा उपेक्षासे ही जड़ेन्द्रिय-ज्ञानके अहङ्कारी 'भक्ति-रक्षक'के (श्रीधरस्वामीके) विरोधीकी अविद्या-हरणरूपी कृपाका वर्णन :- नाना अवज्ञाने भट्टे शोधेन भगवान्। कृष्ण यैछे खण्डिलेन इन्द्रेर अभिमान॥ 114 ॥ अनुवाद-भगवान् महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टकी अनेक प्रकारसे बात न मानकर और खण्डन करके उनका शोधन किया जैसे श्रीकृष्णने इन्द्रके अभिमानको तोड़ा था॥ 114 ॥ अनुभाष्य-कृष्णोत्तर इन्द्रकी पूजाको परिवर्तित करके कृष्णने व्रजमें गिरिराज गोवर्धनकी पूजा प्रवर्तित करवायी। इसके द्वारा मायामुग्ध विमूढात्मा इन्द्रने क्रोधित होकर भीषण वर्षणके द्वारा गोकुलको नष्ट करनेका प्रयास किया। तब कृष्णने गोवर्धन धारण करके वर्षाके द्वारा प्लावित गोकुलकी रक्षा की, जिससे इन्द्रका जड़ीय अभिमान खण्डित और चूर्ण हुआ ॥ 114 ॥ अविद्याग्रस्त अक्षजज्ञानीका प्रेयको ही श्रेय मानना और मनोधर्मके प्रतिकूल कल्याणकारी भगवान्की कृपाको अमङ्गल और दुःख मानना :- अज्ञ जीव निज-'हिते' 'अहित' करि' माने। गर्व चूर्ण हैले, पाछे उघाड़े नयने॥ 115 ॥ अनुवाद-अज्ञानी जीव अपने हितको अहित मानता है, किन्तु गर्वके चूर्ण होनेपर उसके नेत्र खुलते हैं अर्थात् वह अपने वास्तविक हितको देख पाता है॥ 115 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'उघाड़े नयने', - नेत्र खोलता है (नेत्र खुलते हैं) ॥ 115 ॥ रात्रिमें श्रीभट्टके द्वारा महाप्रभुकी पूर्व कृपाके इतिहासका स्मरण :- घरे आसि' रात्र्ये भट्ट चिन्तिते लागिल। “पूर्वे प्रयागे मोरे महा-कृपा कैल॥ 116 ॥ स्वगण-सहिते मोर मानिला निमन्त्रण। एबे केने प्रभुर मोते फिरि' गेल मन?? 117 ॥ समस्त जीवोंके नित्य कल्याणका सम्पादन करना ही ईश्वरका स्वभाव :- 'आमि जिति', - एइ गर्व-शून्य हउक इँहार चित्त। ईश्वर-स्वभाव, - करेन सबाकार हित ॥ 118 ॥ उपेक्षा और अपमानादि इन्द्रियोंको दुःख प्रदान करनेवाले कार्यके द्वारा ही समदर्शी अधोक्षजके द्वारा उनके विमुख अक्षज-ज्ञानीके मद-मात्सर्यका हरण :- आपना जानाइते आमि करि अभिमान। से-गर्व खण्डाइते मोर, करेन अपमान॥ 119 ॥ पहले दुःख देनेवाले, परिणाममें मङ्गलमय कर्मफलको भगवान्की कृपा माननेमें ही बुद्धिमता :- आमार 'हित' करेन, - इहो आमि मानि 'दुःख'। कृष्णेर उपरे येन कैल इन्द्र मूर्ख॥” 120 ॥

226 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/116-126 ] अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट अपने घर आकर रात्रिके समयमें विचार करने लगे,—“महाप्रभु पहले प्रयागमें तो मेरे प्रति बहुत कृपालु थे और उन्होंने अपने गणों सहित मेरे निमन्त्रणको भी स्वीकार किया था, किन्तु अब पुरीमें उनका मन मुझसे क्यों हट गया है ? 'मैं अपनी विद्याके अभिमानके कारण सोचता हूँ कि मैं विजयी होऊँ, किन्तु महाप्रभु विचार करते हैं,-'इनका चित्त इस अभिमानसे रहित हो जाय।' ईश्वरका स्वभाव ही होता है कि वे सभीका हित करते हैं। मुझमें अपने आपको बड़ा विद्वान दिखानेका अभिमान है, महाप्रभु मेरे उस अभिमानको चूर करनेके लिये ही मेरा अपमान करते हैं। महाप्रभु मेरा अपमान करके मेरा हित करते हैं, किन्तु मैं ऐसा हूँ कि उसे अपना दुःख मानता हूँ, जैसे महामूर्ख इन्द्रने भी उसके हितकारी श्रीकृष्णके ऊपर क्रोध किया था॥” 116-120 ॥ अगले दिन प्रातःकाल श्रीवल्लभके द्वारा महाप्रभुके चरणोंमें शरण-ग्रहण :- एत चिन्ति' प्राते आसि' प्रभुर चरणे। दैन्य करि' स्तुति करि' लइल शरणे ॥ 121 ॥ अनुवाद—ऐसा विचार करके श्रीवल्लभ भट्ट अगले दिन प्रातःकाल महाप्रभुके चरणोंमें उपस्थित हुए। उन्होंने अति दीनतापूर्वक महाप्रभुकी स्तुति की और उनकी शरण ग्रहण की ॥ 121 ॥ श्रीवल्लभकी आर्त्ति, दैन्य और अनुतापपूर्ण उक्ति :- “आमि अज्ञ जीव, -अज्ञोचित कर्म कैलुँ। तोमार आगे मूर्ख आमि पाण्डित्य प्रकाशिलुँ ॥ 122 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने अपने दोषको स्वीकार करते हुए कहा,-“मैं अज्ञानी मूर्ख जीव हूँ, मैंने मूर्खतावाला कार्य ही किया है। मैंने मूर्ख होनेपर भी आपके आगे अपने पाण्डित्यको प्रकाशित करनेका प्रयास किया है॥ 122 ॥ अनुभाष्य—दो भिन्न पाठान्तर—"तोमार आगे आमि मूर्ख पाण्डित्य प्रकाशिलुँ” और “तोमार आगे मूर्ख हञा पाण्डित्य प्रकाशिलुँ।” 'मूर्ख-पाण्डित्य',-मूर्खकी चतुरता ॥ 122 ॥ भक्तिरक्षक-श्रीस्वामीके विरोधीके प्रति अवज्ञा और उपेक्षाके द्वारा ही महाप्रभुकी महाकृपाका प्रदर्शन :- तुमि-ईश्वर, निजोचित कृपा कैला। अपमान करि' सर्व गर्व खण्डाइला ॥ 123 ॥ अनुवाद—किन्तु आप ईश्वर हैं। आपने अपने स्वभावके अनुरूप ही मुझपर कृपा की है। आपने मेरा अपमान करके मेरे सम्पूर्ण गर्वको चूर्ण कर दिया है ॥ 123 ॥ इन्द्रकी मूर्खताका दृष्टान्त; पहले दुःख प्रतीत होनेवाली, किन्तु नित्यमङ्गलकारी भगवत्-कृपामें उनका अनिष्ट-भ्रम :- आमि-अज्ञ, 'हित'-स्थाने मानि 'अपमाने'। इन्द्र येन कृष्णेर निन्दा करिल अज्ञाने ॥ 124 ॥ अनुवाद—मैं अज्ञानी मूर्ख हूँ, क्योंकि मैं अपने हितको अपना अपमान समझ रहा था, जैसे इन्द्रने अज्ञानतावश श्रीकृष्णकी निन्दा की थी॥ 124 ॥ भगवत्-कृपाके अञ्जनसे अहङ्कार-तमोरूपी अन्धताका नाश :- तोमार कृपा-अञ्जने गर्व-आन्ध्य गेल। तुमि एत कृपा कैला, -एबे 'ज्ञान' हैल ॥ 125 ॥ अनुवाद—आपकी कृपाके अञ्जनसे मेरी अहङ्कार- तमोरूपी अन्धताका नाश हो गया है। आपने मुझपर इतनी महत् कृपा की है, उसे मैं अब समझा हूँ, मेरा अज्ञान अब दूर हो गया है॥ 125 ॥ महाप्रभुके चरणोंमें श्रीवल्लभके द्वारा शरण-ग्रहण और क्षमा-भिक्षा :- अपराध कैलु, क्षम, लइनु शरण। कृपा करि' मोर माथे धरह चरण ॥” 126 ॥

[ 7/126–135 सातवाँ अध्याय 227 अनुवाद—मैंने बहुत अपराध किये हैं। आप मुझे क्षमा कीजिये, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। आप कृपा करके अपने चरणकमल मेरे सिरपर रख दीजिये॥” 126॥ मानद महाप्रभुकी स्तुतिके द्वारा श्रीभट्टको सान्त्वना प्रदान :— प्रभु कहे,—“तुमि 'पण्डित' 'महाभागवत'। दुइगुण याँहा, ताँहा नाहि गर्व-पर्वत ॥ 127 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीवल्लभका 'भक्तिरक्षक' सर्वजगद्गुरु श्रीधर स्वामीके विरोधके कारण तिरस्कार :— श्रीधरस्वामी निन्दि' निज-टीका कर ! श्रीधरस्वामी नाहि मान',—एत 'गर्व' धर ! ! 128 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीधरकी यथोचित मर्यादाका प्रचार :— श्रीधरस्वामि-प्रसादे 'भागवत' जानि। जगद्गुरु श्रीधरस्वामी, 'गुरु' करि' मानि ॥ 129 ॥ 'भक्तिरक्षक' श्रीधरका अतिक्रम करनेके फलसे लोक-निन्दित भागवतके अर्थकी विपरीतता :— श्रीधर-उपरे गर्वे ये किछु लिखिबे। 'अर्थव्यस्त' लिखन सेइ, लोके ना मानिबे ॥ 130 ॥ चिद्वस्तु विष्णु-स्वामी [सम्प्रदायमें निष्णात] श्रीधरके आनुगत्यमें शुद्धाद्वैतपरक अद्वय-ज्ञानानुकूल भक्ति-व्याख्या ही सर्वमान्य :— श्रीधरेर अनुगत ये करे लिखन। सब लोक मान्य करि' करिबे ग्रहण ॥ 131 ॥ एकमात्र कृष्ण-सेवामें तत्पर श्रीधरके आनुगत्यमें ही भागवत-व्याख्याकी कर्त्तव्यता :— श्रीधरानुगत कर भागवत-व्याख्यान। अभिमान छाड़ि' भज कृष्ण भगवान् ॥ 132 ॥ दस प्रकारके नामापराधसे रहित श्रीकृष्णकीर्त्तनके फलसे श्रीकृष्णपदकी प्राप्ति :— अपराध छाड़ि' कर कृष्णसङ्कीर्त्तन। अचिरात् पाबे तब कृष्णेर चरण॥” 133 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“आप पण्डित हैं और महाभागवत भी हैं। जहाँपर ये दो गुण विराजमान रहते हैं, वहाँ अहङ्काररूपी पर्वत नहीं रह सकता। आपने श्रीधरस्वामीकी टीकाकी निन्दा करके भागवतकी अपनी टीकाकी रचना की है ! आपमें इतना मिथ्या अभिमान है कि आप श्रीधरस्वामीको प्रमाणिक नहीं मानते ! ! जगद्गुरु श्रीधरस्वामीकी कृपासे ही भागवतको जान सकते हैं। मैं श्रीधरस्वामीको अपना गुरु मानता हूँ। आप गर्व करके श्रीधरस्वामीके विचारके ऊपर जाकर जो कुछ भी लिखोगे, वह वास्तविक अर्थके विपरीत ही होगा और लोग उसे स्वीकार नहीं करेंगे। जो श्रीधरस्वामीके अनुगत होकर भागवतकी व्याख्या करेगा, उसे सभी लोग प्रामाणिक मानकर ग्रहण करेंगे। आप श्रीधरस्वामीके अनुगत होकर भागवतकी व्याख्या करो। अपने अभिमानको त्यागकर भगवान् कृष्णका भजन करो। आप अपराधोंको त्याग करके श्रीकृष्ण सङ्कीर्तन करो, तभी आपको अतिशीघ्र श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति होगी॥” 127–133 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अर्थव्यस्त',—विपरीत अर्थ॥ 130 ॥ श्रीभट्टके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :— भट्ट कहे,—“यदि मोरे हइला प्रसन्न। एकदिन पुनः मोर मान' निमन्त्रण ॥” 134 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने कहा,—“यदि आप मेरे प्रति प्रसन्न हो गये हैं, तब पुनः एकदिन मेरे निमन्त्रणको स्वीकार कीजिये॥” 134 ॥ जीवके प्रति भुवनपावन महाप्रभुकी अहैतुकी कृपाका उदाहरण :— प्रभु अवतीर्ण हैला जगत् तारिते। मानिलेन निमन्त्रण, तारे सुख दिते ॥ 135 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सम्पूर्ण जगत्का उद्धार करनेके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं, इसलिये उन्होंने श्रीवल्लभ भट्टकी प्रसन्नताके लिये उनके निमन्त्रणको स्वीकार कर लिया॥ 135 ॥

228 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/136-139 ] अक्षज्ञानी अभिमानीको दण्ड प्रदान करके उसका उद्धार करना :- जगतेर 'हित' हउक, -एइ प्रभुर मन। दण्ड करि' करे तार हृदय शोधन ॥ 136 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी हार्दिक इच्छा है कि सम्पूर्ण जगत्का हित हो। श्रीवल्लभ भट्टके हृदयको शुद्ध करनेके लिये ही महाप्रभुने उनको दण्ड प्रदान किया॥ 136॥ परिकरों सहित महाप्रभुके द्वारा श्रीवल्लभके घरमें भिक्षा-स्वीकार :- स्वगण-सहिते प्रभुर निमन्त्रण कैला। महाप्रभु तारे तब प्रसन्न हइला ॥ 137 ॥ अनुवाद-जब श्रीवल्लभ भट्टने महाप्रभुको उनके परिकरों सहित निमन्त्रित किया, तब महाप्रभु उनके प्रति प्रसन्न हो गये ॥ 137 ॥ सत्यभामाके अवतार श्रीजगदानन्दके वृत्तान्तका वर्णन; उनका वाम्य-स्वभाव और शुद्ध गाढ़ गौरप्रेम :- जगदानन्द-पण्डितेर शुद्ध गाढ़ भाव। सत्यभामा-प्राय प्रेम 'वाम्य-स्वभाव' ॥ 138 ॥ श्रीजगदानन्दका महाप्रभुके साथ प्रणय-कलह :- बार बार प्रणय-कलह करे प्रभु-सने। अन्योऽन्ये खट्मटि चले दुइजने ॥ 139 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितका महाप्रभुके प्रति शुद्ध प्रगाढ़ भाव था। उनका प्रेम प्रायः श्रीसत्यभामाके प्रेमकी भाँति वाम्य-स्वभाववाला था। श्रीजगदानन्द पण्डित बार-बार महाप्रभुके साथ प्रेम-कलह करते थे। उन दोनोंमें सदा विवाद चलता ही रहता था॥ 138-139 ॥ अनुभाष्य-बृहद्भागवतामृत पूः खः सातवें अध्यायमें, श्रीसनातनप्रभु,- “ततोऽन्याभिश्च देवीभिरेतदेवानुमोदितम्। सात्राजिती परं मानगेहं तदसहायविशत् ॥ 85 ॥ श्रीमद्गोपीजन-प्राणनाथः सक्रोधमादिशत्। सा समानीयतामत्र मूर्खराजसुता द्रुतम् ॥ 86 ॥ स्तम्भेऽन्तर्धाय देहं स्वं स्थिता लज्जाभयान्विता ॥89क। अरे सात्राजिति क्षीणचित्ते मानो यथा त्वया।90क। अवरे किं न जानासि मां तदिच्छानुसारिणम् ॥ ”91ख ॥ तासामभावे पूर्वं मे वसतो मथुरापुरे। विवाहकरणे काचिदिच्छाप्यासीन्न मानिनि ॥ 100 ॥ [अर्थात् “(गोपियोंके प्रति श्रीकृष्णका प्रेम अधिक होना उचित ही है, -इस प्रकार) तदुपरान्त अन्य महिषियोंने भी श्रीरुक्मिणीदेवीके विचारोंका अनुमोदन किया, किन्तु सत्राजितकी पुत्री श्रीसत्यभामादेवी उसको सहन न कर पायीं और मान-गृहमें प्रवेश कर गयीं। (यह सुनकर) श्रीगोपीजन-प्राणनाथ श्रीकृष्णने क्रोधपूर्वक आदेश दिया,-'उस महामूढ़ सत्राजित-राजाकी पुत्री सत्यभामाको शीघ्र ही यहाँ ले आओ।' इसके द्वारा सत्यभामा लज्जित और भगवान्‌के क्रोधसे भयभीत होकर स्तम्भके पीछे ही अपनेको छुपाकर खड़ी रहीं। (श्रीकृष्णने सत्यभामाको लक्ष्य करके कहा,-) अरी संकीर्णचित्तवाली सत्राजितकी कन्या ! तुमने मान किया है, किन्तु तुम क्या नहीं जानती कि मैं तो व्रजवासियोंकी इच्छाके वशीभूत हूँ? अयि मानिनि ! पहले मथुरामें वास करनेके समयमें गोपियोंसे विच्छेद होनेपर भी मेरी विवाह करनेकी कदापि इच्छा नहीं थी।”] ॥ 138-139 ॥ अमृताणुकणिका-श्रीजगदानन्द पण्डित स्वरचित श्रीश्रीप्रेमविवर्त ग्रन्थमें कहते हैं कि इसी प्रकारसे महाप्रभुके साथमें उनका बहुत प्रकारसे प्रेम-कलह होता रहता था। उनका प्रेम-कलह कैसा होता था?-परिकरके समान। श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके लिये सिरमें लगानेके लिये नवद्वीपसे सुगन्धित तेल लेकर आये। परन्तु महाप्रभुने कहा कि संन्यासीको तेल लगाना शोभा नहीं देता है, इसे श्रीजगन्नाथके मन्दिरमें प्रदीप जलानेके लिये दे दो। पुनः-पुनः कहनेपर भी जब महाप्रभु नहीं माने, तो श्रीजगदानन्द पण्डितने वह तेलकी मटकी फोड़ दी और मान करके बैठ गये। इस प्रकारसे उनमें दिन-रात प्रेम-कलह होता है। प्रेम-कलह क्यों होता है-इसके लिये श्रीभक्तिविनोद ठाकुरने एक दर्शन दिया है। सूर्य अपनी धुरिपर है

[ 7/139-140 सातवाँ अध्याय 229 और सभी ग्रहोंका आकर्षण करता है। पृथ्वी, चन्द्र, शुक्र, बृहस्पति आदि सभी ग्रहों-उपग्रहोंमें भी आकर्षण शक्ति है और इनका अपना कुछ अस्तित्व है। सूर्य सभी ग्रह-नक्षत्रोंको अपनी ओर आकर्षित करता है। पृथ्वी, चन्द्र, शुक्र, बृहस्पति आदि ग्रह-उपग्रह सूर्यकी ओर खिंचते तो हैं, परन्तु अपने अस्तित्वकी रक्षाके लिये दूर भी रहना चाहते हैं, परिणामस्वरूप वे सूर्यके चारों ओर घूमने लगते हैं। चिद्-जगत्में एकमात्र सूर्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र हैं। कृष्णका अर्थ है जो सभीको आकर्षित करते हैं। वे अपने रूपसे, अपने गुणोंसे, अपनी लीलाओंके माधुर्यसे समस्त जीवोंको अपनी ओर आकर्षित करते हैं, किन्तु जीवोंका भी अपना कुछ व्यक्तित्व है। जीवका अपना व्यक्तित्व उसको पृथक् रखना चाहता है, वह खिंचकर नहीं जाना चाहता। इसलिये वह दूर तो नहीं जाता, किन्तु प्रेम कलह होता है। इस प्रकार जीव अपना पृथक् व्यक्तित्व रखकर उसी प्रकारसे कृष्णकी प्रेममयी सेवा करता है। इस दर्शनको कोई-कोई भाग्यवान् जीव ही समझ पाता है। महाप्रभु स्वयं श्रीकृष्णचन्द्र हैं—वे सर्वाकर्षक हैं और सूर्यके समान हैं और श्रीजगदानन्द पण्डित ग्रहके समान हैं। श्रीजगदानन्द आकृष्ट तो हैं, वे महाप्रभुके निकट भी जाना चाहते हैं, किन्तु पृथक् व्यक्तित्व रहनेके कारण अपने अनुसार महाप्रभुकी सेवा करना चाहते हैं। वे स्वतन्त्र रूपमें उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न करना चाहते हैं, किन्तु वैसा नहीं कर पानेके कारण उनका प्रेम-कलह होता है। इसलिये उन्हें विरह हो जाता है। वे महाप्रभुके विरहमें उनके निकट तो घूमते हैं, किन्तु कुछ पृथक् भी रहना चाहते हैं।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज” ॥ 139 ॥ रुक्मिणीके अवतार श्रीगदाधरका दक्षिण-स्वभाव और शुद्ध गाढ़ गौरप्रेम :- गदाधर-पण्डितेर शुद्ध गाढ़ भाव। रुक्मिणी-देवीरे यैछे 'दक्षिण-स्वभाव' ॥ 140 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितका भी महाप्रभुके प्रति शुद्ध गाढ़ भाव था। उनका श्रीरुक्मिणी देवीकी भाँति दक्षिण स्वभाव था॥ 140 ॥ अमृतानुकम्पा—यहाँपर श्रील गदाधर पण्डितके शुद्ध गाढ़ भावकी श्रीरुक्मिणीदेवीके 'दक्षिण'-स्वभावके साथ तुलना की है, यह देखकर उनको कृष्णलीलामें रुक्मिणी स्वरूपा जानकर वैसा भाव नहीं होना चाहिये, क्योंकि श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (147) में उनके सम्बन्धमें कहा गया है,— “श्रीराधाप्रेमरूपा या पुरा वृन्दावनेश्वरी। सा श्रीगदाधरो गौरवल्लभः पण्डिताख्यकः॥” अर्थात् “पहले जो साक्षात् प्रेमरूपा वृन्दावनेश्वरी श्रीमती राधा हैं, वे ही अब श्रीगौरप्रिय गदाधर पण्डितके नामसे विख्यात हैं।” श्रीगदाधर पण्डित-सभी प्रकारसे मूलस्वरूपा श्रीमती राधाठाकुराणी ही हैं, इसलिये उनके भीतरमें श्रीरुक्मिणीदेवीका 'दक्षिण-स्वभाव' भी विद्यमान है। श्रीराधाके वाम्यभावके विषय एकमात्र व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं, अन्य कोई नहीं- “गोपेन्द्रसुत बिना तेंहों ना स्पर्शे अन्यजन।” (मध्यलीला 8/286), इसलिये गौरलीलामें श्रीगदाधर कभी भी उनके स्वरूपगत 'वाम्यभाव'को प्रकाश नहीं करते हैं। गौरलीलामें उन श्रीकृष्णने स्वयं ही जब अपने विषयभावको त्यागकर श्रीराधा-भावका अवलम्बन किया है, तब वे गदाधररूपी श्रीराधाके वाम्यभावके विषय नहीं रहे। दूसरी बात, गौरलीलामें गदाधररूपमें स्वयं श्रीराधा ही श्रीकृष्णको अपने राधाभावका आस्वादन करवानेके लिये उनकी नित्य सङ्गिनी हैं, क्योंकि “शक्ति-शक्तिमत्तोरभेदः।” वहाँपर उनके द्वारा अपना वाम्य-स्वभाव प्रकट करनेपर श्रीगौरका प्रच्छन्न अवतारत्व न रहकर व्रजेन्द्रनन्दन-स्वरूप प्रकाशित हो जायेगा और इस कारण उनका राधाभाव आस्वादन भी असम्भव हो जायेगा। तीसरी बात, श्रीगदाधरने महाप्रभुको 'गौरनागर'-रूपमें स्थापित करनेका किसी प्रकारका प्रयास नहीं किया। चौथी बात, श्रीगदाधरने श्रीराधाभावयुक्त

230 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/140-144 ] तनु श्रीगौरचन्द्रके सदा वशीभूत-भावके प्रदर्शनके द्वारा श्रीराधादास्योचित-स्वभावकी प्रतिष्ठा की है। श्रीजगदानन्द प्रभु सत्यभामाके समान 'वाम्य-स्वभाव'युक्त होकर महाप्रभुकी सेवाके उद्देश्यसे ही उनके साथ प्रणयकलहमें आबद्ध रहते थे। यहाँपर श्रीजगदानन्दके 'वाम्य-स्वाभाव'के कारण उनको श्रीगदाधरकी अपेक्षा श्रेष्ठ माननेका कारण नहीं है। अपितु कहा जा सकता है कि महाप्रभुके संन्यास-आश्रमोचित कठोर साधनको देखकर श्रीगदाधर ही उनके सत्यभामारूप-अवतार श्रीजगदानन्दके द्वारा प्रणयकलहके माध्यमसे महाप्रभुको अति कठोर साधनसे विरत रखते हैं॥ 140 ॥ महाप्रभुके प्रति श्रीगदाधरका स्वाभाविक ऐश्वर्य-भाव-मिश्रित स्निग्ध-प्रेम, नम्रतावशतः क्रोधका अभाव :- ताँर प्रणय-रोष देखिते प्रभुर इच्छा हय। ऐश्वर्य-ज्ञाने ताँर रोष नाहि उपजाय ॥ 141 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी कभी श्रीगदाधर पण्डितके प्रणय-रोषको देखनेकी इच्छा होती, किन्तु महाप्रभुके प्रति ऐश्वर्य-ज्ञान होनेके कारण उनमें रोष उत्पन्न नहीं होता था ॥ 141 ॥ अनुभाष्य-बृहद्भागवतामृतके पूः खः 7/119 श्लोकमें श्रीसनातन प्रभु- “सर्वा महिष्यः सह सत्यभामया भैष्म्यादयो द्रागभिसृत्य मूर्द्धभिः। पादौ गृहीत्वा रुदितार्द्रकाकुभिः संस्तुत्य भर्तारमशीश-मच्छनैः॥” [अर्थात् “श्रीउद्धवके सङ्केतके अनुसार श्रीरुक्मिणी आदि महिषियोंने श्रीसत्यभामा सहित प्रभु श्रीकृष्णके सम्मुख जाकर अपने-अपने मस्तकको उनके श्रीचरणकमलोंपर रख दिया और क्रन्दन करते हुए विनयपूर्वक वचनोंके द्वारा उन्हें धीरे-धीरे शान्त किया।”] द्वारकामें एक बार श्रीकृष्णके द्वारा श्रीरुक्मिणीको श्लेषपूर्वक (ऐसे वाक्य जिनके एकसे अधिक अर्थ हों) अन्य किसी गुणवान् पतिको ग्रहण करनेका उपदेश देनेपर रुक्मिणी भयभीत होकर दक्षिण-स्वभाववशतः उनके चरणोंमें गिर पड़ीं। गौरलीलामें श्रीजगदानन्द पण्डितगोस्वामी-वाम्य-स्वभावशाली प्रणयकलहशील सत्यभामाके भावयुक्त हैं और गदाधर पण्डितगोस्वामी- दक्षिण-स्वभावशाली रुक्मिणीकी भाँति प्रणय-कलहके स्थानपर आशङ्कित होकर सर्वदा महाप्रभुके आज्ञाकारी थे॥ 141 ॥ श्रीवल्लभके प्रति प्रीतिके उपलक्ष्यमें बाहरसे कृत्रिम क्रोध दिखलाकर श्रीगदाधरके प्रेमकी परीक्षा; श्रीगदाधरका भय :- एइ लक्ष्य पाना प्रभु कैला रोषाभास। शुनि' पण्डितेर चित्ते उपजिल त्रास ॥ 142 ॥ अनुवाद-[श्रीगदाधर पण्डितके द्वारा श्रीवल्लभ भट्टके प्रति प्रीति करनेकी बातसे] महाप्रभुको अवसर प्राप्त हुआ और उन्होंने श्रीगदाधर पण्डितके प्रति रोषाभास प्रदर्शित किया। महाप्रभुके रोषपूर्ण वचन सुनकर श्रीगदाधर पण्डितके हृदयमें बहुत भय उत्पन्न हुआ ॥ 142 ॥ द्वापरयुगमें श्रीकृष्ण और रुक्मिणीका दृष्टान्त :- पूर्वे येन कृष्ण यदि उपहास कैल। शुनि' रुक्मिणीर मने त्रास उपजिल ॥ 143 ॥ अनुवाद-पहले कृष्णलीलामें जब श्रीकृष्णने श्रीरुक्मिणीके साथ उपहास किया था, तब उसे सुनकर श्रीरुक्मिणीके हृदयमें भी बहुत भय उत्पन्न हुआ था ॥ 143 ॥ श्रीवल्लभभट्टका पहले वात्सल्य-रसमें भजन :- वल्लभभट्टेरे हय वात्सल्य-उपासन। बालगोपाल-मन्त्रे तेंहो करेन सेवन ॥ 144 ॥ अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट वात्सल्य रसमें उपासना करते थे। वे श्रीकृष्णकी बालगोपाल-मन्त्रसे उपासना करते थे ॥ 144 ॥

[ 7/145-154 सातवाँ अध्याय 231 श्रीगदाधरके सङ्गसे मधुररसमें भजन करनेकी प्रवृत्ति :- पण्डितेर सने तार मन फिरि' गेल। किशोरगोपाल-उपासनाय मन दिल ॥ 145 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितके सङ्गसे श्रीवल्लभ भट्टका मन परिवर्तित हो गया और उन्होंने अपने मनको किशोरगोपालकी उपासनामें लगा दिया ॥ 145 ॥ श्रीगदाधरसे मन्त्र प्राप्तिकी अभिलाषा, श्रीगदाधरके द्वारा अस्वीकार करना :- पण्डितेर ठाञि चाहे मन्त्रादि शिखिते। पण्डित कहे,—“एइ कर्म नहे आमा हैते ॥ 146 ॥ श्रीगौराङ्ग ही जिनकी एकमात्र गति है, उन श्रीगदाधरकी श्रीगौर-वश्यता :- आमि—परतन्त्र, आमार प्रभु—गौरचन्द्र। ताँर आज्ञा बिना आमि ना हइ 'स्वतन्त्र' ॥ 147 ॥ श्रीवल्लभको मन्त्र-दानके विरुद्धमें युक्ति दिखलाना :- तुमि ये आमार ठाञि कर आगमन। ताहातेइ प्रभु मोरे देन ओलाहन ॥”148 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट श्रीगदाधर पण्डितसे किशोरगोपालकी उपासनाके मन्त्रकी दीक्षा लेना चाहते थे। किन्तु श्रीगदाधर पण्डितने श्रीवल्लभ भट्टसे कहा,–“यह कार्य मुझसे नहीं होगा। मैं परतन्त्र हूँ, मेरे प्रभु श्रीगौरचन्द्र हैं, उनकी आज्ञाके बिना मैं स्वतन्त्र रूपसे कुछ नहीं कर सकता हूँ। आप जो मेरे पास आते रहते हो, उसीके लिये महाप्रभु मुझे उलाहना देते हैं॥”146-148 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘ओलाहन,’—वाक्यदण्ड ॥ 148 ॥ अनुभाष्य—‘मन्त्रादि शिखितेँ,’—दीक्षा ग्रहण करने॥ 146 ॥ श्रीवल्लभको महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :- एइमत भट्टेर कतेक दिन गेल। शेषे यदि प्रभु तारे सुप्रसन्न हैल ॥ 149 ॥ भिक्षाके दिन महाप्रभुके कृत्रिम क्रोधसे दुःखी श्रीगदाधरको महाप्रभुके द्वारा स्नेहसे प्रेमपूर्वक बुलाना :- निमन्त्रणेर दिने पण्डिते बोलाइला। स्वरूप, जगदानन्द, गोविन्दे पाठाइला ॥ 150 ॥ अनुवाद—इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत होनेपर जब अन्तमें महाप्रभु श्रीवल्लभ भट्टके प्रति सुप्रसन्न हुए, तब श्रीवल्लभ भट्टके निमन्त्रणके दिन महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीगोविन्दको भेजकर श्रीगदाधर पण्डितको बुलवाया ॥ 149-150 ॥ श्रीपण्डितको श्रीस्वरूपके द्वारा सान्त्वना प्रदान और सारा वृत्तान्त बतलाना :- पथे पण्डितेरे स्वरूप कहेन वचन। “परीक्षिते प्रभु तोमारे कैला उपेक्षण ॥ 151 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीगदाधरकी प्रतिवाद करनेकी उत्तेजना-चेष्टाके द्वारा परीक्षा :- तुमि केने आसि' ताँरे ना दिला ओलाहन? भीतप्राय हञा केने करिला सहन??”152 ॥ अनुवाद—मार्गमें श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीगदाधर पण्डितसे कहा,–“महाप्रभुने तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये ही तुम्हारी उपेक्षा की थी। किन्तु तुमने आकर उनकी बातका प्रतिवाद करते हुए उलाहना क्यों नहीं दिया? कायर बनकर तुमने उनके अत्याचारको सहन क्यों कर लिया?”151-152 ॥ महाप्रभुके प्रेममें स्निग्ध श्रीपण्डितकी ऐश्वर्यज्ञानमयी वश्यता :- पण्डित कहेन,—“प्रभु सर्वज्ञ-शिरोमणि। ताँर सने ‘हठ’ करि,—भाल नाहि मानि ॥ 153 ॥ श्रीपण्डितकी अपने प्रियतम महाप्रभुके सब प्रकारके स्नेहरूपी अत्याचारको सहन करनेकी स्वाभाविक प्रवृत्ति :- येइ कहे, सेइ सहि निज-शिर धरिं। आपने करिबेन कृपा गुण-दोष विचारिं ॥”154 ॥

232 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/153-162 ] अनुवाद-श्रीगदाधर पण्डितने कहा, - "महाप्रभु तो सर्वज्ञ शिरोमणि हैं। मैं उनके साथ किसी भी प्रकारके हठ करनेको अच्छा नहीं समझता। वे जो कुछ भी कहते हैं, मैं उसे नतमस्तक होकर सहन करता हूँ। वे स्वयं मेरे गुणों और दोषोंका विचार करके मुझपर कृपा करेंगे॥" 153-154॥ श्रीपण्डितका महाप्रभुके निकट आगमन और क्रन्दन :- एत बलि' पण्डित प्रभुर स्थाने आइला। रोदन करिया प्रभुर चरणे पड़िला ॥ 155 ॥ अनुवाद-यह कहकर श्रीगदाधर पण्डित महाप्रभुके स्थानपर पहुँचे और वे रोते हुए महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े॥ 155॥ श्रीपण्डितके प्रेमके वशीभूत महाप्रभुके द्वारा स्नेह-प्रेमपूर्वक श्रीगदाधरका आलिङ्गन और आश्वासन :- ईषत् हासिया प्रभु कैला आलिङ्गन। सबारे शुनाञा कहेन मधुर वचन ॥ 156 ॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा श्रीगदाधरके अतुलनीय स्निग्ध सुदृढ़ गौरप्रेमका वर्णन :- “आमि चालाइलुँ तोमा, तुमि ना चलिला। क्रोधे किछु ना कहिला, सकल सहिला ॥ 157 ॥ आमार भङ्गीते तोमार मन ना चलिला। सुदृढ़ सरलभावे आमारे किनिला ॥ " 158 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए श्रीगदाधर पण्डितका आलिङ्गन किया और सभीको सुनाते हुए उन्होंने मधुर वचन कहे, - "हे गदाधर ! मैं तुम्हें रोषपूर्ण व्यवहारके द्वारा उत्तेजित करना चाहता था, किन्तु तुम उत्तेजित नहीं हुए। तुमने क्रोधमें कुछ भी नहीं कहा, अपितु सब कुछ सहन कर लिया। मेरी इस चालके द्वारा भी तुम्हारा मन विचलित नहीं हुआ और तुम अपने इसी सरल भावमें सुदृढ़ रहे। इसी भावसे तुमने मुझे खरीद लिया है॥ " 156-158॥ अनुभाष्य- 'चालाइलुँ', - रोषपूर्ण व्यवहार प्रदर्शित किया ॥ 157 ॥ महाप्रभुका “गदाधर-प्राणनाथ"-नाम :- पण्डितेर भाव-मुद्रा कहन ना याय। 'गदाधर-प्राणनाथ' नाम हैल याय ॥ 159 ॥ अनुवाद-श्रीगदाधर पण्डितके भाव और उनके उपलक्षणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिये महाप्रभुका अन्य नाम 'गदाधर-प्राणनाथ' है॥ 159 ॥ भक्तोंके द्वारा नित्य 'गदाइ-गौराङ्ग' नामका गान :- पण्डिते प्रभुर प्रसाद कहन ना याय। 'गदाइ-गौराङ्ग' बलि' याँरे लोके गाय ॥ 160 ॥ अनुवाद-श्रीगदाधर पण्डितके प्रति महाप्रभुकी कृपाका वर्णन नहीं किया जा सकता। लोग महाप्रभुको 'गदाइ-गौराङ्ग' अर्थात् 'गदाधरके गौराङ्ग' कहकर पुकारते हैं॥ 160 ॥ अचिन्त्य चैतन्यलीलासिन्धुकी प्रत्येक-तरङ्गमें अनेक उद्देश्योंका सम्पादन :- चैतन्यप्रभुर लीला के बुझिते पारे? एकलीलाय बहे गङ्गार शत शत धारे ॥ 161 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंको कौन समझ सकता है? उनकी एक-एक लीलामें गङ्गाकी भाँति सैकड़ों-सैकड़ों धाराएँ बहती हैं ॥ 161 ॥ महाप्रभुके द्वारा-(1) श्रीपण्डितके गौरप्रेमका प्रचार, (2) श्रीवल्लभका गर्वनाश और उद्धार, (3) अक्षजज्ञानी जीवकी बाहरीरूपसे उपेक्षा ही उसके प्रति अधोक्षज-कृपा एवं (4) वैसे दुःखरूपी दण्डको भगवान्की कृपा माननेमें ही जीवके नित्यमङ्गल और बुद्धिमत्ताका प्रचार :- पण्डितेर सौजन्य, ब्रह्मण्यता-गुण। दृढ़ प्रेममुद्रा लोके करिला क्षेपण ॥ 162 ॥ अनुवाद-उपरोक्त लीलाके माध्यमसे महाप्रभुने श्रीगदाधर पण्डितकी सज्जनता, उनके ब्राह्मणोचित गुणों, दृढ़ प्रेम