श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
234 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/168-169 ] भट्टसे मिलनका वर्णन किया, जिसके श्रवणसे गौरप्रेमरूपी अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी धनकी प्राप्ति होती है॥ 168 ॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 169 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 169 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे वल्लभभट्टमिलनं नाम श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें वल्लभभट्टमिलन नामक सप्तमः परिच्छेदः। सातवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
आठवाँ अध्याय कथासार—इस अध्यायमें रामचन्द्रपुरीका इतिहास वर्णित हुआ है। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य होनेपर भी उन्होंने शुष्कज्ञानियोंके सम्प्रदायके सङ्गसे दूषित सिद्धान्तको लेकर अधर्मका उपदेश दिया था। उसीके कारण पुरी-गोसांईने उन्हें 'अपराधी' कहकर उनका त्याग किया; तबसे दूसरोंकी निन्दा, दूसरोंके दोषोंका अनुसन्धान, शुष्कज्ञानका उपदेश, —इन समस्त कार्योंको करनेके कारण वे वैष्णवोंके द्वारा उपेक्षित हुए। इसके उपरान्त महाप्रभुके भोजन आदिकी निन्दा करनेपर भी महाप्रभुने उन्हें गुरु-सम्बन्ध-बुद्धिके कारण कुछ भी नहीं कहकर मौन रूपसे केवलमात्र (अपने भोजन) प्रसाद-अन्नको सङ्कुचित (कम) कर दिया। रामचन्द्रपुरीके पुरुषोत्तमसे चले जानेपर महाप्रभुने उस सङ्कोचको दूर कर दिया। —(अमृतप्रवाह भाष्य) रामचन्द्रपुरीके भयसे भिक्षा ग्रहण करनेमें सङ्कोच करनेवाले महाप्रभुकी वन्दना :— तं वन्दे कृष्णचैतन्यं रामचन्द्रपुरीभयात्। लौकिकाहारतः स्वं यो भिक्षान्नं समकोचयत्॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने रामचन्द्रपुरीके भयसे प्रतिदिन ग्रहण करनेवाले लौकिक लीलानुरूप आहारमें-से भी अपने भोजनको कम कर दिया था, उन श्रीकृष्णचैतन्यकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— यः (कृष्णचैतन्यदेवः) रामचन्द्रपुरीभयात् (रामचन्द्रपुरीत्याख्य- हरिगुरुवैष्णवनिन्दकवाक्यजन्यलौकिकाशङ्काप्रदर्शनात्) लौकिकाहारतः (लोकदर्शन-परिमित-भोज्यान्नात्) स्वं (निजं) भिक्षान्नं (भोजनपरिमाणं युक्ताहार्यम् अपि) समकोचयत् (खर्वीचकार) तं कृष्णचैतन्यम् [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—जिन्होंने हरि-गुरु-वैष्णव निन्दक रामचन्द्रपुरीके वाक्यसे लौकिक आशङ्का प्रदर्शन करनेके लिये प्रतिदिन ग्रहण करनेवाले लौकिक लीलानुरूप आहारमें-से भी अपने भोजनको कम कर दिया था, उन श्रीकृष्णचैतन्यकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य करुणासिन्धु-अवतार। ब्रह्मा-शिवादिक भजे चरण याँहार ॥ 2 ॥ अनुवाद—करुणासिन्धु-अवतार श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो जिनके चरणकमलोंका श्रीब्रह्मा-शिव आदि भी भजन करते हैं॥ 2 ॥ जय जय श्रीवासादि यत भक्तगण। श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु—याँर प्राणधन ॥ 3 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु जिनके प्राणधन हैं, उन श्रीवास पण्डितादि समस्त भक्तोंकी जय हो, जय हो॥ 3 ॥ अनुभाष्य—यहाँपर पाठान्तरमें, — “जय जय अवधूतचन्द्र नित्यानन्द। जगत् बाधिल येंहो दिया प्रेम फाँद॥ जय जय श्रीअद्वैत ईश्वर-अवतार। कृष्ण अवतारि' कैला जगत् निस्तार ॥” [अर्थात् “अवधूतचन्द्र उन श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो, जिन्होंने प्रेमरूपी डोरीके द्वारा समस्त जगत्वासियोंको बाँध दिया। ईश्वरके अवतार उन श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, जय हो, जिन्होंने श्रीकृष्णको अवतरित करवाके जगत्का उद्धार कर दिया।”] ॥ 3 ॥ नीलाचलमें भक्तोंके साथ श्रीगौरचन्द्रकी लीला :— एइमत गौरचन्द्र निजभक्त-सङ्गे। नीलाचले क्रीड़ा करे कृष्णप्रेमरङ्गे ॥ 4 ॥
236 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/4-7 ] अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरचन्द्र अपने भक्तोंके साथ कृष्णप्रेमकी तरङ्गोंमें नीलाचलमें लीलाएँ कर रहे थे॥4॥ रामचन्द्रपुरीका आगमन :- हेनकाले रामचन्द्रपुरी-गोसाञि आइला। परमानन्द-पुरीरे आर प्रभुरे मिलिला॥5॥ अनुवाद—तब रामचन्द्रपुरी गोसाईं नीलाचलमें आये और वे श्रीपरमानन्द पुरी और महाप्रभुसे मिले॥5॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'रामचन्द्रपुरी',—श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य होनेके कारण महाप्रभु और श्रीपरमानन्दपुरीने इनका सम्मान किया था॥5॥ अमृताणुकणा—श्रीगौरगणोद्देश दीपिका (92)में श्रीरामचन्द्रपुरीके सम्बन्धमें कहा गया है,— “विभीषणो यः प्रागासीद्रामचन्द्रपुरी स्मृतः। जटिला राधिका-श्वश्रूः कार्यतोऽविशदेव तम्। अतो महाप्रभुर्भिक्षासङ्कोचादि ततोऽकरोत् ॥ ” “जो पहले विभीषण थे, वे गौरलीलामें रामचन्द्रपुरीके नामसे विख्यात हैं। श्रीराधाकी सास 'जटिला'ने कार्यवशतः उनमें प्रवेश किया था, इसलिये ही महाप्रभुने उनके भयसे भिक्षामें सङ्कोचादि किया।” श्रीमन्महाप्रभु वाराणसीमें दो मास रहनेके समय श्रीरामचन्द्रपुरीके मठमें कुछ समयके लिये छिपे थे। (चैतन्यभागवत मध्यखण्ड 19/05में)— “रामचन्द्रपुरीर मठेते लुकाइया। रहिलेन दुइमास वाराणसी गिया।” श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपादने यह 'गौड़ीय भाष्य'में जनाया है,—“श्रीगौरसुन्दर वाराणसीमें श्रीचन्द्रशेखरके घरमें रहे थे। श्रीचैतन्यभागवतके लेखक ठाकुर वृन्दावन श्रीमन्महाप्रभुके श्रीरामचन्द्रपुरीके मठमें छिपे रहनेकी बातसे अवगत थे। रामचन्द्रपुरी माधवेन्द्रपुरीके एक कपट शिष्य थे, उनका मायावादके प्रति बहुत आग्रह था। लोगोंमें श्रीमन्महाप्रभुने प्रचार किया कि वे रामचन्द्रपुरीके मठमें रहते हैं, परन्तु वे कृष्णभक्तोंके साथ कहीं और रहे। रामचन्द्रपुरी साम्प्रदायिक संन्यासी थे, इसलिये यति-जीवनमें उस मठमें रहनेपर बाहरके लोगोंको उनपर दोषारोपण करनेका अवसर नहीं था॥5॥ श्रीपरमानन्दपुरी और महाप्रभुके द्वारा रामचन्द्रपुरीको यथोचित पदमर्यादा देना :- परमानन्दपुरी कैल चरण वन्दन। पुरी-गोसाञि कैल ताँरे दृढ़ आलिङ्गन॥6॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्दपुरीने रामचन्द्रपुरीके चरणोंकी वन्दना की और रामचन्द्रपुरी गोसाईंने उन्हें दृढ़ आलिङ्गन किया॥6॥ अनुभाष्य—रामचन्द्रपुरी स्वभावसे ईर्ष्यालु और हरि-गुरु-वैष्णव विरोधी होनेपर भी वे बाहरी दृष्टिकोणसे गृहत्यागी अथवा संन्यासीके वेषधारी होनेके कारण ही लोकसमाजमें उस समय 'गोसाईं' (गोस्वामी) नामसे जाने जाते थे। आजकल समाजमें प्रचलित विकृत प्रथाकी भाँति उस समय जाति, कुल अथवा वंशपरम्परामें (गृहस्थोंके लिये) गृहत्यागी व्यक्तियोंकी यह (गोस्वामी) उपाधि व्यवहृत नहीं होती थी, उसका प्रमाण यहाँपर मिलता है॥5-6॥ वैष्णव-संन्यासियोंका साम्प्रदायिक व्यवहार :- महाप्रभु कैला ताँरे दण्डवत् नति। आलिङ्गन करि' तेंहो कैल कृष्णस्मृति॥7॥ अनुवाद—महाप्रभुने रामचन्द्रपुरीको दण्डवत् प्रणाम किया और रामचन्द्रपुरीने श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए उन्हें आलिङ्गन किया॥7॥ अनुभाष्य—महाप्रभुको ईश्वरपुरीका अनुगत जानकर आलिङ्गन करके वैष्णव-संन्यासी मात्रके ही योग्य- सम्भाषण 'कृष्ण'को स्मरण किया। संन्यासियोंका अभिवादन करनेपर संन्यासी 'ॐ नमो भगवते नारायणाय' कहकर कृष्णका स्मरण करते हैं। संन्यासियोंके लिये जीवको आशीर्वाद और नमस्कार करनेकी विधि नहीं है; स्मृति
[ 8/7-16 आठवाँ अध्याय 237
कहती हैं,—'संन्यासी—निराशीर्निर्नमष्क्रियः।'॥ 7॥ श्रीजगदानन्दके द्वारा भिक्षा-दान :— तिनजने इष्टगोष्ठी कैला कतक्षण। जगदानन्द-पण्डित ताँरे कैला निमन्त्रण॥ 8॥ अनुवाद—तीनोंने कुछ समय तक इष्ट-गोष्ठी की और तब श्रीजगदानन्द पण्डितने रामचन्द्रपुरीको भोजनके लिये निमन्त्रण किया॥ 8॥ स्वयं आवश्यकतासे अधिक भोजन करनेके बाद भिक्षा करानेवाले अथवा परिवेशण करनेवालेकी निन्दा :— जगन्नाथेर प्रसाद आनिला भिक्षार लागिया। यथेष्ठ भिक्षा करिला तेंहो निन्दार लागिया॥ 9॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित रामचन्द्रपुरीको भोजन करानेके लिये श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद लेकर आये, रामचन्द्रपुरीने निन्दा करनेके उद्देश्यसे बहुत भोजन किया॥ 9॥ स्वयं श्रीजगदानन्दको प्रचुर भोजन करवाकर 'अत्याहारी' जानकर गौरगणोंकी निन्दा :— भिक्षा करि' कहे पुरी,—“शुन जगदानन्द। अवशेष प्रसाद तुमि करह भक्षण॥”10॥ अनुवाद—भोजन करनेके पश्चात् रामचन्द्रपुरीने कहा,—“हे जगदानन्द, सुनो! तुम बचे हुए प्रसादको खा लो॥”10॥ आग्रह करिया ताँरे बसि' खाओयाइल। आपने आग्रह करि' परिवेशन कैल॥ 11॥ अनुवाद—रामचन्द्रपुरीने आग्रह करके श्रीजगदानन्द पण्डितको खानेके लिये बैठाया और स्वयं ही बहुत आग्रह करके प्रसाद परोसा॥ 11॥ आग्रह करिया पुनः पुनः खाओयाइल। आचमन करि निन्दा करिते लागिल॥ 12॥
वास्तविक शुद्धवैराग्यवान् गौरभक्तोंको वैराग्यहीन समझकर उनकी निन्दा :— “शुनि, चैतन्यगण करे बहुत भक्षण। 'सत्य' सेइ वाक्य,—साक्षात् देखिलुँ एखन॥ 13॥ संन्यासीरे एत खाओयाञा करे धर्मनाश। वैरागी हञा एत खाय, वैराग्येर नाहि 'भास'॥”14॥ अनुवाद—रामचन्द्रपुरी आग्रह करके उनको बार बार खिलाते रहे और जैसे ही श्रीजगदानन्द पण्डितने आचमन किया, रामचन्द्रपुरी उनकी निन्दा करने लगे,—“मैंने सुना था कि चैतन्य महाप्रभुके अनुयायी बहुत अधिक खाते हैं। आज मैंने साक्षात् रूपसे देख लिया कि वह बात सत्य ही है। और वे संन्यासियोंको भी इतना अधिक खिलाकर उनके धर्मको नष्ट करवाते हैं। वे स्वयं वैरागी होकर इतना अधिक खाते हैं, उनमें तो वैराग्यका आभासमात्र भी नहीं है।”12-14॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'भास',—आभासमात्र भी॥ 14॥ रामचन्द्रपुरीका स्वभाव :— एइ त' स्वभाव ताँर आग्रह करिया। पिछे निन्दा करे, आगे बहुत खाओयाञा॥ 15॥ अनुवाद—रामचन्द्रपुरीका स्वभाव ही ऐसा था कि वे पहले तो बहुत आग्रह करके खिलाते और बादमें निन्दा करते॥ 15॥ गुरुके द्वारा त्यक्त रामचन्द्रपुरीके पूर्व वृत्तान्तका वर्णन; गुरुदेव श्रीमाधवेन्द्रपुरीके अप्रकट होनेके समय रामचन्द्रका आगमन :— पूर्वे यबे माधवेन्द्रपुरी करेन अन्तर्धान। रामचन्द्रपुरी तबे आइला ताँर स्थान॥ 16॥ अनुवाद—पूर्वकालमें जब श्रीमाधवेन्द्रपुरी अन्तर्धान लीला कर रहे थे, तब रामचन्द्रपुरी उनकी भजनस्थलीपर आये थे॥ 16॥
238 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/17-24 ] श्रीमाधवेन्द्रपुरीका अप्राकृत विप्रलम्भरसमें कृष्णकीर्तन :— पुरी-गोसाञि करे कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन। ‘मथुरा ना पाइनु’ बलि’ करेन क्रन्दन॥17॥ अनुवाद—उस समय श्रीमाधवेन्द्रपुरी गोसाईं कृष्णनाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे और कभी कभी ‘मुझे मथुराका आश्रय नहीं प्राप्त हुआ’ कहकर क्रन्दन कर रहे थे॥17॥ शुष्कज्ञानी रामचन्द्रका मर्त्यबुद्धिसे गुरु-मर्यादा-लङ्घन :— रामचन्द्रपुरी तबे उपदेशे ताँरे। शिष्य हञा गुरुके कहे, भय नाहि करे॥18॥ रामचन्द्रके द्वारा चिद्विलासका विरोध :— “तुमि—पूर्ण-ब्रह्मानन्द, करह स्मरण। ब्रह्मवित् हञा केने करह रोदन??”19॥ अनुवाद—उस समय रामचन्द्रपुरी शिष्य होकर गुरुको उपदेश देनेमें भी कोई भय नहीं करके उनको उपदेश देते कहने लगे,—“आप पूर्ण ब्रह्मानन्दमें हैं, ब्रह्मका स्मरण कीजिये, आप ब्रह्मको जाननेवाले होनेपर भी रो क्यों रहे हैं?”18-19॥ गुरु माधवेन्द्रपुरीके द्वारा रामचन्द्रको अपराधी मानकर क्रोधसे भरकर उसकी उपेक्षा और भर्त्सना :— शुनि’ माधवेन्द्र-मने क्रोध उपजिल। “दूर दूर, पापी” बलि’ भर्त्सना करिल॥20॥ “कृष्णकृपा ना पाइनु, ना पाइनु ‘मथुरा’। आपन-दुःखे मरौं,—एइ दिते आइल ज्वाला॥21॥ मोरे मुख ना देखाबि तुइ, याउ यथि-तथि। तोरे देखि’ मैले मोर हबे असद्गति॥22॥ कृष्ण ना पाइनु, मरौं आपनार दुःखे। मोरे ‘ब्रह्म’ उपदेशे एइ छार मूर्खे॥”23॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीमाधवेन्द्र पुरीके मनमें बहुत क्रोध उत्पन्न हुआ और “दूर हो जा, दूर हो जा, पापी” कहकर उसकी भर्त्सना की तथा कहा,—“मैं श्रीकृष्णकी कृपाको प्राप्त नहीं कर पाया, मैं मथुराको प्राप्त नहीं कर पाया—एक तो मैं अपने ऐसे ही दुःखसे मर रहा हूँ और ऊपरसे तू मुझे जलानेके लिये आ गया है। मुझे अपना मुख मत दिखला। तेरी जहाँ इच्छा हो, तू वहाँ चला जा। तुझे देखकर मरनेसे मेरी असद्गति होगी। मैं श्रीकृष्णको प्राप्त नहीं कर पानेके कारण मर रहा हूँ, इसलिये मैं दुःखी हूँ और यह दुष्ट मूर्ख मुझे ब्रह्मका उपदेश दे रहा है॥”20-23॥ अनुभाष्य—रामचन्द्रपुरी अपने गुरु श्रीमाधवेन्द्रको श्रीकृष्ण-विरह-कातर देखकर भी उनकी अप्राकृत विप्रलम्भ स्फूर्त्तिको समझनेमें असमर्थ हुए। उन्होंने लौकिक-विचारके अनुसार श्रीमाधवेन्द्रपुरीको साधारण मरणशील व्यक्ति मानकर उन्हें सांसारिक अभावके लिये शोकसे कातर समझा। इसलिये वे उन्हें निर्विशेष-ब्रह्मकी अनुभूति करानेमें लग गये। उनके ऐसा करनेसे श्रीमाधवेन्द्रपुरी अपने शिष्यकी मूर्खता और गुरु-अवज्ञाको समझकर उसके मङ्गलकी आकाङ्क्षासे उदासीन हो गये और उसे त्यागकर निकाल दिया॥20॥ गुरु-अवज्ञारूपी अपराधके कारण विषयभोग अथवा संसार-वासना :— एइ ये श्रीमाधवेन्द्र उपेक्षा करिल। सेइ अपराधे इँहार ‘वासना’ जन्मिल॥24॥ अनुवाद—गुरुमें मर्त्यबुद्धिरूपी अपराधके कारण श्रीमाधवेन्द्रपुरीने रामचन्द्रपुरीकी जो उपेक्षा की, उसी अपराधके फलस्वरूप उनमें संसार-वासना उत्पन्न हुई॥24॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘वासना’,—शुष्क ज्ञान-वासना, उसके कारण भक्तोंकी निन्दा॥24॥ अनुभाष्य—इस विषयमें भक्तिसन्दर्भ (111 संख्या)में ‘वासनाभाष्य’ धृत भगवान्के परिशिष्ट वचन— “जीवन्मुक्ता अपि पुनर्यान्ति संसारवासनाम्। यद्यचिन्त्य-महाशक्तौ भगवत्यपराधिनः॥” अथवा भाः 10/2/32 श्लोककी श्रीजीवगोस्वामिकृत
[ 8/24-30 आठवाँ अध्याय 239 लघुतोषणी टीकामें इस वासनाभाष्य-धृत भगवत्-परिशिष्टका ही पाठान्तरमें,— “जीवन्मुक्ता अपि पुनर्बन्धनं यान्ति कर्मभिः। यद्यचिन्त्य-महाशक्तौ भगवत्यपराधिनः॥” [अर्थात् “अचिन्त्य महाशक्ति सम्पन्न श्रीभगवान्के निकट अपराध होनेपर जीवन्मुक्त व्यक्ति भी पुनः संसारवासनाको प्राप्त होते हैं (पाठान्तरमें—कर्मके द्वारा पुनः बन्धनको प्राप्त होते हैं)।”] एवं रथयात्रा प्रसङ्गमें श्रीविष्णुभक्तिचन्द्रोदयमें उद्धृत पुराणान्तर-वचन आदि शास्त्र-वचन देखें— “जीवन्मुक्ताः प्रपद्यन्ते क्वचित् संसारवासनाम्। योगिनो न विलिप्यन्ते कर्मभिर्भगवत्पराः॥” [अर्थात् “जीवन्मुक्त भी कभी-कभी संसार-वासनाको प्राप्त होते हैं, किन्तु भगवत्-परायण एकान्तिक योगी कभी भी कर्मवासनामें लिप्त नहीं होते।”] ॥ २४ ॥ श्रीकृष्ण-कृष्णभक्त अथवा स्वरूप-तद्रूपवैभवादि चिद्विलास-दर्शनविहीन विष्णुनिन्दा आरम्भ :- शुष्क-ब्रह्मेते नाहि कृष्णेर 'सम्बन्ध'। सर्व-लोक निन्दा करे, निन्दाते निर्बन्ध ॥ २५ ॥ अनुवाद—शुष्क ब्रह्मज्ञानीका श्रीकृष्णसे कोई सम्बन्ध नहीं होता। इसलिये रामचन्द्रपुरीकी निष्ठाके साथ सभी लोगोंकी निन्दामें आसक्ति थी ॥ २५ ॥ अनुभाष्य—‘निर्बन्ध’,—निष्ठाके साथ परनिन्दामें आसक्ति। निर्विशेष मायावादी लोग सम्बन्धज्ञानमें कुशल नहीं होनेके कारण कृष्णसे सम्बन्धको ग्रहण नहीं कर पाते। वे जड़ीय-वितर्कके बलपर ब्रह्मके विषयमें जड़ीय तर्क प्रयोग करते हैं। वे कृष्णभक्तिको मोक्ष-साधकके फलभोग-पिपासा-मूलक कर्मकाण्डके अन्तर्गत अन्य एक कार्य समझते हैं। वे भगवद्भक्तको और उनके अप्राकृत भक्तिके अनुशीलनको चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) प्रदान करनेवाला कर्मसाधनमात्र जानकर उनकी निन्दा करते हैं। अधोक्षज गुरु अथवा भक्तोंके चरणोंमें अपराध होनेपर ही जीव ऐसे भयानक अज्ञानमें पतित होते हैं ॥ २५ ॥ श्रील ईश्वरपुरीकी एकान्तिकी गुरुभक्ति :- ईश्वरपुरी करे श्रीपाद-सेवन। स्वहस्ते करेन मलमूत्रादि मार्जन ॥ २६ ॥ अनुवाद—श्रीईश्वरपुरी श्रीमाधवेन्द्रपुरी-पादकी सेवा करते थे, वे अपने हाथोंसे उनके मल-मूत्र आदिको साफ कर देते थे ॥ २६ ॥ अनुभाष्य—‘श्रीपाद-सेवन’,—श्रीमाधवेन्द्रपुरी-पादकी सेवा ॥ २६ ॥ आदर्श गुरु-सेवाका उदाहरण :- निरन्तर कृष्णनाम करये स्मरण। कृष्णनाम, कृष्णलीला शुनाय अनुक्षण ॥ २७ ॥ अनुवाद—श्रीईश्वरपुरी श्रीमाधवेन्द्रपुरीको निरन्तर कृष्णनामका स्मरण कराते और उन्हें प्रतिक्षण कृष्णनाम तथा कृष्णलीला श्रवण कराते थे ॥ २७ ॥ श्रीईश्वरपुरीको गुरुकृपाकी प्राप्ति :- तुष्ट हञा पुरी ताँरे कैला आलिङ्गन। वर दिला,—“कृष्णे तोमार हउक प्रेमधन ॥”२८ ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीने सन्तुष्ट होकर श्रीईश्वरपुरीको आलिङ्गन किया और उन्हें वरदान देते हुए कहा,—“तुम्हें श्रीकृष्णप्रेमरूपी धनकी प्राप्ति हो ॥”२८ ॥ गुरुसे एकको कृपारूपी लाभके फल, दूसरेको वञ्चना प्राप्तिके फलमें तारतम्य :- सेइ हैते ईश्वरपुरी—'प्रेमेर सागर'। रामचन्द्रपुरी हैल सर्वनिन्दाकर ॥ २९ ॥ हरि-गुरु-वैष्णवकी कृपा और दण्ड प्राप्तिके दो दृष्टान्तोंके द्वारा लोगोंको शिक्षा :- महदनुग्रह-निग्रहेर साक्षी दुइजने। एइ दुइद्वारे शिखाइला जगजने ॥ ३० ॥ अनुवाद—तभीसे श्रीईश्वरपुरी 'प्रेमके सागर' बन
240 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/29-37 ] गये और रामचन्द्रपुरी सबकी निन्दा करनेवाले बन गये। इस प्रकार ये दोनों क्रमशः महान् व्यक्तिके अनुग्रह और दण्डके पात्र होनेके साक्षी हैं। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने इन दोनोंके माध्यमसे जगत्वासियोंको शिक्षा प्रदान की॥29-30॥ अनुभाष्य—महात्मा श्रील माधवेन्द्रपुरीसे श्रीईश्वरपुरीने प्रचुर कृपा प्राप्त की थी और रामचन्द्रपुरीको केवल मात्र निग्रह (दण्ड) प्राप्त हुआ॥30॥ अप्राकृत विप्रलम्भ-अवस्थामें श्रीमाधवेन्द्र गोस्वामीका अप्राकट्य :- जगद्गुरु माधवेन्द्र करि' प्रेमदान। एइ श्लोक पड़ि' तेंहो कैल अन्तर्धान॥३१॥ अनुवाद—जगद्गुरु श्रीमाधवेन्द्रपुरीने जगत्में कृष्णप्रेमका दान किया। निम्नलिखित श्लोकका पाठ करते हुए उन्होंने अन्तर्धान लीला प्रकाशित की॥31॥ पद्यावली 330 अङ्कमें उद्धृत श्रीमाधवेन्द्रपुरी-वचन— अयि दीनदयार्द्रनाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे। हृदयं त्वदलोककातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम्॥३२॥ अनुवाद—ओहे दीनदयार्द्रनाथ! ओहे मथुरानाथ! कब तुम्हारे दर्शन करूँगी? तुम्हारे दर्शनके अभावमें मेरा कातर हृदय अस्थिर हो गया है। हे दयित (प्रियतम)! अब मैं क्या करूँ?32॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 4/197 संख्या देखें॥32॥ श्लोकका मर्मार्थ अथवा तात्पर्य-व्याख्या :- एइ त' श्लोके कृष्णप्रेम करे उपदेश। कृष्णेर विरह, भक्तेर भावविशेष॥३३॥ अनुवाद—उपरोक्त श्लोकमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीने कृष्णप्रेम कैसे प्राप्त किया जाय इसका उपदेश दिया है। श्रीकृष्णके विरहमें भक्तोंके चित्तमें विप्रलम्भ-भावकी स्फूर्ति ही कृष्णप्रेम प्राप्तिका उपाय है॥३३॥ अनुभाष्य—'भावविशेष'—विप्रलम्भ-भावस्फूर्ति; प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदायमें सम्भोगके नामपर साधकोंमें अनेक प्रकारके उपद्रव आकर विप्रलम्भके स्वरूपकी अनुभूतिमें बाधा उत्पन्न करते हैं॥३३॥ श्रीमाधवेन्द्र-कृष्णप्रेमकल्पवृक्षके अङ्कुर, श्रीचैतन्य स्वयं अङ्कुरसे प्रस्फुटित परिवर्धित मूल-वृक्ष :- पृथिवीते रोपण करि' गेला प्रेमाङ्कुर। सेइ प्रेमाङ्कुरेर वृक्ष—चैतन्यठाकुर॥३४॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरी पृथ्वीपर प्रेमका अङ्कुर रोपित कर गये, उसी प्रेमके अङ्कुरसे श्रीचैतन्य महाप्रभु रूपी वृक्ष प्रकाशित हुआ॥34॥ श्रीमाधवेन्द्रके अन्तर्धानके श्रवणसे जीवको श्रीकृष्णविरहसे उत्पन्न सेवाकी शिक्षा :- प्रस्तावे कहिलुँ पुरी-गोसाञिर निर्याण। येइ इहा शुने, सेइ बड़ भाग्यवान्॥३५॥ अनुवाद—मैंने प्रसङ्गवशतः श्रीमाधवेन्द्रपुरी गोस्वामीकी अप्रकट लीलाका वर्णन किया है। जो भी इसका श्रवण करता है, वह बड़ा भाग्यवान् है॥35॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'निर्याण'—अप्रकट॥३५॥ रामचन्द्रपुरीका शुष्क-वैराग्य :- रामचन्द्रपुरी ऐछे रहिला नीलाचले। विरक्त स्वभाव, कभु रहे कोन स्थले॥३६॥ अनुवाद—रामचन्द्रपुरी इस प्रकार श्रीनीलाचलमें रहने लगे। वे विरक्त स्वभावके थे, इसलिये वे कभी किसी एक स्थानपर रहते और कभी किसी अन्य स्थानपर चले जाते॥36॥ दूसरोंके दोषोंको ढूँढ़नेवाले रामचन्द्रपुरी :- अनिमन्त्रण भिक्षा करे, नाहिक निर्णय। अन्येर भिक्षार स्थितिर लयेन निश्चय॥३७॥
[ 8/37-44 आठवाँ अध्याय 241 अनुवाद—रामचन्द्रपुरीका कुछ भी निर्धारित नहीं अनुवाद—रामचन्द्रपुरी महाप्रभुके रहन-सहन, उनकी होता था कि वे कहाँ भोजन करेंगे, वे बिना निमन्त्रणके भजनकी रीति, उनके भोजन, शयन और आवागमन ही भोजन करनेके लिये पहुँच जाते थे। किन्तु आदि समस्त विषयका अनुसन्धान करते रहते॥40॥ अन्यान्य भक्त लोग कहाँ और कितना भोजन करते हैं, वे उस विषयमें पूरी जानकारी रखते थे॥37॥ अधोक्षज स्वयं भगवान् पूर्ण और निर्दोष :— प्रभुर यतेक गुण स्पर्शितॆ नारिल। अमृतप्रवाह भाष्य—'अन्येर भिक्षार स्थिति',—अन्य छिद्र चाहि' बुले, काँहा छिद्र ना पाइल॥41॥ लोग जो भिक्षा (भोजन) करते, उसके नियमको समझ लेते॥37॥ संन्यासीके लिये विधि और निषेध :— “संन्यासी हञा करे मिष्टान्न-भक्षण। अनुभाष्य—'अन्यान्य संन्यासी कहाँ किस परिमाणमें एइ भोगे हय कैछे इन्द्रिय-वारण??” 42॥ भोजन करते हैं, कहाँ वास करते हैं, आदि अन्योंकी सर्वत्र महाप्रभुकी निन्दा, दूसरी ओर चर्चा अथवा ब्योरा लेकर रामचन्द्रपुरी दिन-यापन प्रतिदिन महाप्रभुका दर्शन :— करते।' 'निश्चय',—हिसाब या ब्योरा॥37॥ एइ निन्दा करि' कहे सर्वलोक-स्थाने। प्रभुरे देखितेह अवश्य आइसे प्रतिदिने॥43॥ महाप्रभुकी दैनिक भिक्षाका विवरण—महाप्रभुके साथ श्रीईश्वरपुरीके शिष्य श्रीगोविन्द और अनुवाद—रामचन्द्रपुरी महाप्रभुके दोषोंको ही ढूँढ़ते श्रीकाशीश्वरकी एक साथ भिक्षा :— रहते थे, इसलिये वे उनके गुणोंको लेशमात्र भी स्पर्श प्रभुर निमन्त्रणे लागे कौड़ि चारि पण। नहीं कर पाये। वे महाप्रभुके दोषोंको ढूँढ़ना चाहते थे, कभु काशीश्वर, गोविन्द खाय तिनजन॥38॥ परन्तु बहुत प्रयास करनेपर भी उनमें कोई भी दोष अनुवाद—उन दिनों महाप्रभुके निमन्त्रणमें चार पण नहीं ढूँढ़ पाये। तो अन्तमें वे कहने लगे,—“कृष्णचैतन्य कौड़ी (चार आने) लगते थे, कभी-कभी तो उसीमें ही संन्यासी होकर भी मिष्ठान्न खाता है, इस प्रकारके महाप्रभु, श्रीकाशीश्वर पण्डित तथा श्रीगोविन्द—ये तीनों भोगोंको ग्रहण करनेसे किस प्रकारसे इन्द्रियोंके विकारोंको प्रसाद पाते थे॥38॥ रोका जा सकता है?” इस प्रकार वे सभीके सामने महाप्रभुकी निन्दा करते, किन्तु वे प्रतिदिन महाप्रभुके प्रत्यह प्रभुर भिक्षा इति-उति हय। दर्शन करने भी अवश्य ही आते॥41-43॥ केह यदि मूल्य आने, चारिपण-निर्णय॥39॥ महाप्रभुके द्वारा मर्यादा प्रदान, रामचन्द्रके अनुवाद—प्रतिदिन महाप्रभुका भोजन पृथक् स्थानपर द्वारा निन्दारूपी विष उगलना :— होता था और यदि कोई महाप्रभुके भोजनका मूल्य प्रभु गुरुबुद्धये करेन सम्भ्रम, सम्मान। चुकाना चाहता तो वह मूल्य चार आना ही निर्धारित तेंहो छिद्र चाहि' बुले,—एइ तार काम॥44॥ था॥39॥ स्वयं महाप्रभुको भी मर्त्य जानकर अनुवाद—महाप्रभु रामचन्द्रपुरीको गुरुबुद्धिसे (गुरुका उनके दोषोंको ढूँढ़ना :— गुरुभ्राता मानकर) उनका आदर और सम्मान करते। प्रभुर स्थिति, रीति, भिक्षा, शयन, प्रयाण। परन्तु महाप्रभुके दोषोंको ढूँढ़ना ही रामचन्द्रपुरीका काम रामचन्द्रपुरी करे सर्वानुसन्धान॥40॥ था॥44॥
242 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/45-52 ] अपनी निन्दाको सुननेपर भी महाप्रभुके द्वारा पदोचित सम्मान प्रदान करते हुए पुरीकी वञ्चना :- यत निन्दा करे, ताहा प्रभु सब जाने। तथापि आदर करे बड़इ सम्भ्रमे ॥ 45 ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु सब जानते थे कि रामचन्द्रपुरी सबके सामने उनकी निन्दा करते हैं, तथापि महाप्रभु उनका गौरवपूर्वक आदर करते थे॥ 45 ॥ एक बार प्रातःकालमें महाप्रभुके घरमें चींटियोंकी कतारको देखकर स्वयं-भगवान् महाप्रभुके वैराग्यकी निन्दा करके वहाँसे प्रस्थान :- एकदिन प्रातःकाले आइला प्रभुर घर। पिपीलिका देखि' किछु कहेन उत्तर ॥ 46 ॥ अनुवाद-एकदिन प्रातःकालमें रामचन्द्रपुरी महाप्रभुके वासस्थानपर आये। वहाँ बहुतसी चींटियोंको देखकर वे महाप्रभुकी निन्दा करते कुछ कहने लगे ॥ 46 ॥ रामचन्द्रपुरीके वचन- “रात्रावत्र ऐक्षवमासीत्, तेन पिपीलिकाः सञ्चरन्ति। अहो! विरक्तानां संन्यासिनामियमिन्द्रियलालसेति ब्रुवन्नुत्थाय गतः॥”47 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रात्रिके समय इस स्थानपर गन्नेसे बना गुड़ था, इसी कारण यहाँपर बहुत-सी चींटियाँ घूम रही हैं। अहो, विरक्त संन्यासियोंकी ऐसी इन्द्रिय-लालसा!”-ऐसा कहकर वे उठ खड़े हुए ॥ 47 ॥ अनुभाष्य-प्राकृत-तुच्छत्व आदि गुणोंसे अतीत पूर्ण निर्दोष-विग्रह स्वयं भगवान् महाप्रभुके किसी-न-किसी दोषको पानेकी आशासे रामचन्द्र अनेक प्रयत्न करनेपर भी जब सफल नहीं हो पाये और महाप्रभुके घरमें किसी भी प्रकारकी मिठाईको नहीं देखनेपर भी बहुतसी चींटियोंको घूमते देखकर उन्होंने अनुमान लगाया कि रात्रिके समय यहाँपर गुड़ था; किसी दोषका उल्लेख करके अपने माहात्म्यको वर्धित करना [रामचन्द्रपुरीका] उद्देश्य था ॥ 47 ॥ महाप्रभुके द्वारा अपने कानोंसे पुरीके द्वारा की गयी मिथ्या-निन्दाका श्रवण :- प्रभु पूर्व पूर्व निन्दा करियाछेन श्रवण। एबे साक्षात् शुनिलेन 'कल्पित' निन्दन ॥ 48 ॥ अनुवाद-रामचन्द्रपुरी पहले जो उनकी निन्दा करते थे, महाप्रभुने उसे दूसरोंके मुखसे सुना था, किन्तु अब उन्होंने रामचन्द्रपुरीके द्वारा कल्पित निन्दाको साक्षात् अपने कानोंसे श्रवण किया ॥ 48 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'कल्पित निन्दन'-मिथ्या-आरोपित निन्दा ॥ 48 ॥ विवर्त्तबुद्धिके कारण ही भगवान्के प्रति दोषारोपण :- सहजेइ पिपीलिका सर्वत्र बेड़ाय। ताहाते तर्क उठाञा दोष लागाय ॥ 49 ॥ अनुवाद-चींटियाँ तो प्रायः सभी स्थानोंपर घूमती रहती हैं, किन्तु रामचन्द्रपुरी उन्हींको देखकर तर्क करते हुए महाप्रभुपर दोष लगाने लगे कि उनके घरमें गुड़ आदि मिष्ठान्न है ॥ 49 ॥ अपनी निन्दाको सुनकर जगद्गुरु आचार्यरूपी महाप्रभुका भय और लज्जा :- शुनि' ताहा प्रभुर सङ्कोच-भय मने। गोविन्दे बोलाञा किछु कहेन वचने ॥ 50 ॥ अपनी दैनिक भिक्षाको कम करना और श्रीगोविन्दसे उसके परिमाणको निर्धारित करना :- “आजि हैते भिक्षा आमार एइ त' नियम। पिण्डाभोगेरे एक चौठि, पाँचगण्डार व्यञ्जन ॥ 51 ॥ परिमाणसे अधिक लानेपर स्थानको छोड़कर जानेरूपी भय दिखलाना :- इहा बइ अधिक आर किछु ना लइबा। अधिक आनिले आमा एथा ना देखिबा ॥” 52 ॥ अनुवाद-रामचन्द्रपुरीके वचन सुनकर महाप्रभुके
[ 8/50-60 आठवाँ अध्याय 243 मनमें सङ्कोच और भय हुआ। इसलिये उन्होंने श्रीगोविन्दको बुलाकर उससे कहा,—“आजसे मेरी भिक्षा (भोजन)का नियम होगा कि मैं श्रीजगन्नाथदेवके प्रसादकी प्रमाण-हाण्डीका एक चौथाई भाग और पाँच गण्डे (एक पैसे)की साग-सब्जीको ही ग्रहण करूँगा। इससे अधिक और कुछ भी मत लाना। इससे अधिक लानेपर तुम मुझे यहाँपर नहीं देखोगे॥” 50-52॥ अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद मिट्टीकी हाण्डीमें मिलता है। 'प्रमाण'-हाण्डीके चौथे भागको 'एक चौठि' (एक चौथाई) कहते हैं॥ 51॥ सभी भक्तोंको महाप्रभुके कठोर उपदेशके विषयमें बतलाना, सभी भक्तोंको भीषण दुःख :- सकल वैष्णवे गोविन्द कहे एइ बात। शुनि' सबार माथे यैछे हैल वज्राघात॥ 53॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने सभी वैष्णवोंको महाप्रभुकी इस आज्ञाके विषयमें बतलाया। यह बात सुनकर सभीको ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनके सिरपर वज्रका आघात हुआ हो॥ 53॥ दुरात्मा रामचन्द्रपुरीको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय महाप्रभुका विरोधी जानकर भक्तोंके द्वारा उसकी निन्दा :- रामचन्द्रपुरीके सबाय देय तिरस्कार। “एइ पापिष्ठ आसि' प्राण लइल सबार॥” 54॥ अनुवाद—सभी भक्त रामचन्द्रपुरीका तिरस्कार करते हुए कहने लगे,—“इस पापीने आकर हम सबके प्राण ले लिये हैं॥” 54॥ एक ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :- सेइदिन एकविप्र कैल निमन्त्रण। एक-चौठि भात, पाँच-गण्डार व्यञ्जन॥ 55॥ महाप्रभुके लिये श्रीगोविन्दके द्वारा यथा-निर्दिष्ट-परिमाणमें प्रसाद स्वीकार करना, महाप्रभुके द्वारा बहुत कम आहार ग्रहण करनेसे ब्राह्मणको दुःख :- एइमात्र गोविन्द कैल अङ्गीकार। माथाय घा मारे विप्र, करे हाहाकार॥ 56॥ अनुवाद—उस दिन एक ब्राह्मणने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। जब श्रीगोविन्दने महाप्रभुकी आज्ञाके अनुसार उन ब्राह्मणसे एक चौथाई हाण्डी चावल और पाँच गण्डेकी ही शाक-सब्जियोंको ग्रहण किया, तब वह ब्राह्मण हाहाकार करते हुए अपने हाथोंसे मस्तकपर आघात करने लगा॥ 55-56॥ महाप्रभुके द्वारा आधा भोजन ग्रहण करना, श्रीगोविन्दको उनके आधे अवशिष्टकी प्राप्ति, भक्तोंके द्वारा अन्न और जलका त्याग :- सेइ भात-व्यञ्जन प्रभु अर्द्धेक खाइल। ये किछु रहिल, ताहा गोविन्द पाइल॥ 57॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस चावल और शाक- सब्जियोंमें-से आधा ग्रहण किया एवं जो महाप्रसाद बच गया, उसे श्रीगोविन्दने पा लिया॥ 57॥ अर्द्धाशन करेन प्रभु, गोविन्द अर्द्धाशन। सब भक्तगण तबे छाड़िल भोजन॥ 58॥ अनुवाद—महाप्रभु उस अल्प भोजनका भी आधा खाते हैं और श्रीगोविन्द भी शेष आधा खाते हैं, तब सभी भक्तोंने भोजन करना ही छोड़ दिया॥ 58॥ श्रीगोविन्द और श्रीकाशीश्वरको अन्यत्र भिक्षा-ग्रहण करनेका आदेश :- गोविन्द-काशीश्वरे प्रभु कैला आज्ञापन। “दुँहे अन्यत्र मागि' कर उदर भरण॥” 59॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्द और श्रीकाशीश्वर पण्डितको आज्ञा दी,—“आप दोनों कहीं और भिक्षा माँगकर अपनी उदरपूर्ति कर लिया करो॥” 59॥ महाप्रभुके द्वारा भोजनको कम कर देनेके फलस्वरूप भक्तोंके दुःखको सुनकर रामचन्द्रका महाप्रभुके निकट आगमन :- एइरूप महादुःखे दिन कत गेल। शुनि' रामचन्द्रपुरी प्रभुपाश आइल॥ 60॥
244 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/60-68 ] अनुवाद—इस प्रकार महादुःखमें कुछ दिन बीत गये। इस बातको सुनकर रामचन्द्रपुरी महाप्रभुके पास आये॥60॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥"66॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65-66॥ मानद आचार्यरूपी महाप्रभुके द्वारा सदा रामचन्द्रको सम्मान देना :— प्रणाम करि' प्रभु कैला चरण-वन्दन। प्रभुरे कहये किछु हासिया वचन॥61॥ महाप्रभुको संन्यासी-धर्मकी शिक्षा देना :— “संन्यासीर धर्म नहे 'इन्द्रिय-तर्पण'। यैछे तैछे करे मात्र उदर भरण॥62॥ शुष्क वैराग्यको संन्यास अर्थात् भक्तिके विरुद्ध बतलाकर केवल मुखसे ही प्रचार :— तोमारे क्षीण देखि, शुनि,—कर अर्द्धाशन। एइ 'शुष्क-वैराग्य' नहे संन्यासीर 'धर्म'॥63॥ सभी अवस्थाओंमें युक्तवैराग्यसे ही सिद्धिकी प्राप्ति :— यथायोग्य उदर भरे, ना करे 'विषय'-भोग। संन्यासीर तबै सिद्ध हय ज्ञानयोग॥64॥ अनुवाद—महाप्रभुने रामचन्द्रपुरीको प्रणाम करके उनके चरणोंकी वन्दना की। रामचन्द्रपुरीने मुस्कुराते हुए महाप्रभुसे कहा,—“संन्यासीका धर्म इन्द्रिय-तर्पण करना नहीं है, वह तो जिस किसी प्रकारसे केवल मात्र अपने उदरका भरण करता है। मैं तुम्हें बहुत दुबला-पतला देख रहा हूँ और मैंने सुना है कि तुम आजकल आधा भोजन ग्रहण करते हो। ऐसा शुष्क-वैराग्य संन्यासीका धर्म नहीं है। संन्यासीको आवश्यकता अनुसार केवल उदर पूर्ति करनी चाहिये और विषयोंका भोग नहीं करना चाहिये। इसके द्वारा तब संन्यासीका ज्ञानयोग सिद्ध होता है॥61-64॥ सर्वत्र युक्तवैराग्यसे युक्त भक्तियोगसे ही अनर्थ-नाश :— भगवद्-गीता (6/16-17) में— नात्यश्नतोऽपि योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥65॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे अर्जुन, अधिक भोजन करनेसे 'योग' नहीं होता; सम्पूर्ण भोजन त्यागसे भी 'योग' नहीं होता एवं अधिक निद्रा अथवा निद्रा त्याग करनेपर भी 'योग' नहीं होता। आहार, विहार, समस्त कर्मोंमें चेष्टा, निद्रा, जागरण आदिके उपयुक्तरूपमें नियमित होनेपर दुःखनाशक 'योग' होता है॥"65-66॥ अनुभाष्य— हे अर्जुन, अत्यश्नतः (अत्यधिकभोजनशीलस्य) तु योगः न अस्ति, न च एकान्तम् अनश्नतः (स्वल्पाहारनिरतस्य निराहारिणः), न च अतिस्वप्नशीलस्य (अधिकनिद्राशीलस्य) न च जाग्रतः (अनिद्रस्य) एव योगः (अस्ति)। युक्ताहारविहारस्य (परिमितभोजनशयनादिपरस्य) कर्मसु (साधनानुष्ठानादिषु) युक्तचेष्टस्य (परिमितारम्भपरस्य) युक्तस्वप्नावबोधस्य (परिमितनिद्रा-जागरणनिष्ठस्य) दुःखहा (सर्वदुःख-निवृत्तिहेतुः) योगः भवति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥65-66॥ अमानी-धर्मके आदर्श महाप्रभुकी दैन्य-उक्ति :— प्रभु कहे,—“अज्ञ बालक मुइ, 'शिष्य' तोमार। मोरे शिक्षा देह',—एइ भाग्य आमार॥"67॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं अज्ञानी बालक हूँ, आपका शिष्य हूँ। यह मेरा सौभाग्य ही है कि आप मुझे शिक्षा प्रदान कर रहे हैं॥"67॥ महाप्रभुके भक्तोंके द्वारा आधे भोजनको ग्रहण करनेके विषयमें सुनना :— एत शुनि' रामचन्द्रपुरी उठि' गेला। भक्तगण अर्द्धाशन करे,—गोसाञि शुनिला॥68॥ अनुवाद—इतना सुनकर रामचन्द्रपुरी उठकर चले गये। उन्होंने कई लोगोंसे सुना कि महाप्रभुके भक्त भी
[ 8/68-77 आठवाँ अध्याय 245 अपने भोजनका आधा अंश ही ग्रहण कर रहे हैं॥ 68 ॥ एकदिन श्रीपरमानन्दपुरीको प्रमुख बनाकर भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको यथेष्ट भोजनको ग्रहण करनेका अनुरोध और उनसे रामचन्द्रपुरीके स्वभाव और व्यवहारकी निन्दा :- आर दिन भक्तगणसह परमानन्दपुरी। प्रभु-पाशे निवेदिला दैन्य-विनय करि' ॥ 69 ॥ “रामचन्द्रपुरी हय निन्दुक-स्वभाव। तार बोले अन्न छाड़ि' किबा हवे लाभ ?? 70 ॥ पुरीर स्वभाव, – यथेष्ठ आहार करावा। ये ना खाय, तारे खाओयाय यतन करिया ॥ 71 ॥ खाओयाञा पुनः तारे करये निन्दन। 'एत अन्न खाओ' – तोमार कत आछे धन ?? 72 ॥ संन्यासीके एत खाओयाञा कर धर्म नाश ! अतएव जानिनु, – तोमार किछु नाहि 'भास' ॥ 73 ॥ के कैछे व्यवहारे, केबा कैछे खाय। एइ अनुसन्धान तेंहो करय समाय ॥ 74 ॥ ईर्ष्याके कारण दूसरोंके छल या दोषोंको ढूँढ़ना—शास्त्रविरुद्ध और निषिद्ध :- शास्त्रे येइ दुइ धर्म करियाछे वर्जन। सेइ कर्म निरन्तर इँहार करण ॥ 75 ॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीपरमानन्दपुरी भक्तोंके साथ महाप्रभुके पास आये और दैन्य-विनय करके उनसे निवेदन करने लगे, – “रामचन्द्रपुरी निन्दुक-स्वभाववाले व्यक्ति हैं। उनके कहनेपर भोजनको छोड़नेसे क्या लाभ होगा? उनका स्वभाव है कि वे भक्तोंको जितना वे खा सकते हैं, उतना भोजन कराते हैं और जो नहीं भी खाना चाहता, उसे बहुत बलपूर्वक खिलाते हैं। आवश्यकतासे अधिक खिलानेके बाद पुनः उनकी निन्दा करते हुए उनसे कहते हैं- 'तुम इतना भोजन करते हो, तुम्हारे पास कितना धन है? इसी प्रकार तुम संन्यासियोंको भी इतना खिलाकर उनके धर्मको नष्ट करते हो! इसलिये मैं जान गया हूँ कि तुम्हें धर्म-अधर्मका आभास तक भी नहीं है।' कौन किस प्रकारका व्यवहार करता है और कौन क्या खाता है, रामचन्द्रपुरी सदैव इसीका अनुसन्धान करनेमें ही लगे रहते हैं। रामचन्द्रपुरी शास्त्रोंमें निषिद्ध दो प्रकारके कर्मोंको ही सदा करते हैं ॥ 69-75 ॥ श्रीमद्भागवत (11/28/1) में- परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत्। विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ 76 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - प्रकृति और पुरुषके मिलनमें विश्वको एक-स्वरूप देखकर अन्योंके स्वभाव और कर्मकी कभी भी प्रशंसा अथवा निन्दा मत करना ॥ 76 ॥ अनुभाष्य- श्रीउद्धवसे श्रीभगवान् शुद्धज्ञानीके आचरणकी विधिका वर्णन कर रहे हैं,- प्रकृत्या पुरुषेण च सह एकात्मकं विश्वं पश्यन् परस्वभावकर्माणि (परेषां हिंसार्थं स्वभावान् कर्माणि गुणकृत- नैसर्गिकवृत्याद्यनुष्ठानानि) न प्रशंसेत्, न गर्हयेत् (न निन्देत्)। श्लोक-भावानुवाद - प्रकृति और पुरुषके मिलनमें विश्वको एक-स्वरूप (एक अन्तर्यामी पुरुषके द्वारा नियन्त्रित) देखकर अन्योंसे ईर्ष्याके कारण उनके स्वभाव और कर्मोंकी अर्थात् गुणजात स्वभावके अनुरूप क्रियाओंकी कभी भी प्रशंसा अथवा निन्दा मत करना ॥ 76 ॥ पहले बतलायी गयी प्रशंसाकी विधिकी अपेक्षा बादमें बतलायी गयी निन्दा-निषेधरूपी विधि ही शास्त्रका उद्देश्य :- तार मध्ये पूर्वविधि 'प्रशंसा' छाड़िया। परविधि 'निन्दा' करे 'बलिष्ठ' जानिया ॥ 77 ॥ अनुवाद-उन दोनों विधियोंमें-से वे 'प्रशंसा'का त्यागकर प्रथम विधिका पालन करते हैं। वे बादमें
246 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/77-83 ] बतलायी गयी दूसरी विधि 'निन्दा'को बलवान् जानते हैं, परन्तु उसकी उपेक्षा करके अन्योंकी निन्दा करते हैं॥ 77 ॥ अनुभाष्य—'परस्वभाव'-श्लोकमें पहले बतलायी गयी विधि “प्रशंसा मत करना” और बादमें बतलायी गयी विधि “निन्दा मत करना” है। पहले बतलायी गयी विधिकी अपेक्षा बादमें बतलायी गयी विधिके बलवान् होनेपर यही समझा जाता है कि लोगोंकी प्रशंसा करना उतना दोषपूर्ण नहीं है; परन्तु निन्दा निश्चित रूपसे नहीं करनी चाहिये। किन्तु यहाँ रामचन्द्रने पहले बतलायी गयी विधि “अन्योंकी प्रशंसा मत करना”का पालन किया है; बादमें बतलायी गयी विधि “अन्योंकी निन्दा नहीं करना”का पालन नहीं किया। इसलिये रामचन्द्रने बादमें बतलायी गयी विधिके अनुसार कार्य नहीं किया। इस श्लोकके अर्थकी श्लेष-उक्तिपरक कहकर व्याख्या की जा सकती है॥ 77 ॥ बादमें बतलायी गयी विधिका ही अधिक गुरुत्व :— न्यायवचन— पूर्वपरयोर्मध्ये परविधिर्बलवान्॥ 78 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्व और परविधिमें-से परविधि ही बलवान् है॥ 78 ॥ अनुभाष्य— पूर्वपरयोः (प्राक्-परयोर्विध्योः) मध्ये परविधिः (उत्तर-निर्देशः) बलवान्,—पूर्वविधिं त्यक्त्वा परविधिः ग्राह्यः इत्यर्थः। श्लोक-भावानुवाद—पूर्व (पहलेवाली) और परविधिमें-से परविधि (बादवाली) ही बलवान् है—पूर्वविधिका त्यागकर परविधि ही ग्रहण करने योग्य है, यही अर्थ है॥ 78 ॥ रामचन्द्रपुरीकी मक्खी जैसी वृत्ति :— याँहा गुण शत आछे, ना करे ग्रहण। गुणमध्ये छले करे दोष-आरोपण॥ 79 ॥ अनुवाद—जहाँपर एक सौ गुण हैं, वे उन्हें ग्रहण नहीं करते। अपितु वे गुणोंमें भी छलपूर्वक दोषका आरोप करते हैं॥ 79 ॥ रामचन्द्रके व्यवहार और स्वभावसे भक्तोंके हृदयमें दुःख :— इँहार स्वभाव इँहा कहिते ना युयाय। तथापि कहिये किछु मर्म-दुःख पाय॥ 80 ॥ अनुवाद—इनका स्वभाव ही ऐसा है कि उनके विषयमें कुछ भी कहना उचित नहीं है, तथापि मैं हृदयमें कुछ दुःख पानेके कारण ही यह सब कह रहा हूँ॥ 80 ॥ अनुभाष्य—'पाय',—पाकर॥ 80 ॥ आठवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। रामचन्द्रके वचनोंको तुच्छ मानकर महाप्रभुको भोजन ग्रहण करनेका अनुरोध :— इँहार वचने केने अन्न त्याग कर? पूर्ववत् निमन्त्रण मान',—सबार बोल धर॥" 81 ॥ अनुवाद—इनके कहनेपर आप भोजनको क्यों त्याग रहे हैं? आप हम सबकी बात मानकर पहलेकी ही भाँति निमन्त्रण स्वीकार कीजिये॥" 81 ॥ जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा संन्यासी-धर्मकी विधिका निर्णय; विधिके अतीत ईश्वर और अधीन बद्धजीवमें समान बुद्धि करनेवाला ही 'प्राकृत सहजिया'; पुनः स्वयं ईश्वर होनेपर भी स्वयंको वैराग्य-बाध्य जीव मानकर संन्यासी वेषी आचार्यको निरपेक्षताकी शिक्षा-प्रदान :— प्रभु कहे,—“सबे केने पुरीरे कर रोष? 'सहज' धर्म कहे तैं हो, ताँर किबा दोष?? 82 ॥ यति हञा जिह्वा-लाम्पट्य,—अत्यन्त अन्याय। यतिर धर्म,—प्राण राखिते आहारमात्र खाय॥" 83 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“आप सभी श्रीरामचन्द्रपुरीके
[ 8/82-91 आठवाँ अध्याय 247 प्रति रोष क्यों कर रहे हैं? वे तो सहज धर्मके विषयमें ही बतलाते हैं, इसमें उनका क्या दोष है? संन्यासी होकर जिह्वाके स्वादकी तृप्ति तो बड़ा अपराध है। वास्तवमें संन्यासीका धर्म तो केवल प्राण धारण करनेके लिये ही आहार करना है॥"82-83॥ भक्तोंके आग्रहसे महाप्रभुके द्वारा अर्द्ध-भोजन ग्रहण करना स्वीकार :- तबे सबे मेलि' प्रभुरे बहु यत्न कैला। सबार आग्रहे प्रभु अर्द्धेक राखिला॥84॥ अनुवाद-तब सभी भक्तों ने मिलकर महाप्रभुको पूरा भोजन करनेके लिये बहुत प्रार्थना की, सभी भक्तोंके आग्रहपर महाप्रभुने [एक चौथाईके स्थानपर] आधा भोजन करना स्वीकार किया॥84॥ दुइपण कौड़ि लागे प्रभुर निमन्त्रणे। कभु दुइजन भोक्ता, कभु तिनजने॥85॥ अनुवाद-महाप्रभुको निमन्त्रण करनेपर भोजनका मूल्य दो पण कौड़ी होता था। उस भोजनको कभी दो जन तो कभी तीन जन ग्रहण करते थे॥85॥ अभक्त वर्ण-ब्राह्मण और पंक्ति-ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुके भिक्षाको ग्रहण करनेकी रीतिका वैशिष्ट्य :- अभोज्यान्न विप्र यदि करेन निमन्त्रण। प्रसाद-मूल्य लइते लागे कौड़ि दुइपण॥86॥ अनुवाद-कोई ब्राह्मण जिसके गृहमें भोजन स्वीकार नहीं किया जा सकता, यदि वह महाप्रभुको निमन्त्रण करता तो उसको महाप्रभुके लिये दो पण कौड़ी मूल्यका श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद लाना होता॥86॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'अभोज्यान्न विप्र',-जिस ब्राह्मणके घरमें भोजन नहीं खाया जाता॥86॥ भोज्यान्न विप्र यदि निमन्त्रण करे। किछु 'प्रसाद' आने, किछु पाक करे घरे॥87॥ अनुवाद-जिसके गृहमें निमन्त्रण स्वीकार किया जा सकता है, यदि ऐसा कोई ब्राह्मण महाप्रभुको निमन्त्रण करता, तो वह महाप्रभुके लिये कुछ श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद मूल्य देकर ले आता और शेष स्वयं अपने घरपर पकाकर खिलाता॥87॥ श्रीगदाधर, श्रीभगवान् और श्रीसार्वभौमके घरमें भक्ताधीन भगवान्का भोजन :- पण्डित-गोसाञि, भगवान्-आचार्य, सार्वभौम। निमन्त्रणेर दिने यदि करे निमन्त्रण॥88॥ ताँ सबार इच्छाय प्रभु करेन भोजन। ताँहा प्रभुर स्वातन्त्र्य नाइ, यैछे ताँर मन॥89॥ अनुवाद-श्रीगदाधर पण्डित, श्रीभगवान् आचार्य और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य-यदि इन तीनोंमें-से कोई भी महाप्रभुको निमन्त्रण करनेके दिन निमन्त्रण देते, तो महाप्रभु उन सबकी इच्छानुसार ही भोजन करते। महाप्रभु भक्तोंके मनके अनुसार ही चलते, उसमें उनकी अपनी कोई भी स्वतन्त्रता नहीं थी॥88-89॥ महाप्रभुके अवतारका उद्देश्य और व्यवहार रीति :- भक्तगणे सुख दिते प्रभुर 'अवतार'। याँहा यैछे योग्य, ताँहा करेन व्यवहार॥90॥ अनुवाद-महाप्रभुका अवतार भक्तोंको सुख देनेके लिये ही हुआ है। महाप्रभु भक्तोंके साथ यथायोग्य व्यवहार करते॥90॥ महाप्रभुके द्वारा कभी तो प्राकृत-जीवकी भाँति आचरणके द्वारा वञ्चना, कभी परमेश्वरके रूपमें पूर्ण कृपा :- कभु लौकिक रीति,-येन 'इतर' जन। कभु स्वतन्त्र, करेन ऐश्वर्य्य प्रकटन॥91॥ अनुवाद-महाप्रभु कभी तो साधारण लोगोंकी भाँति लौकिक रीतिका पालन करते और कभी स्वतन्त्र परमेश्वरके रूपमें अपना ऐश्वर्य्य प्रकट करते थे॥91॥
248 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/92-96 ] कभी तो रामचन्द्रपुरीको लौकिकी मर्यादा-प्रदान, कभी तृणकी भाँति उपेक्षा :- कभु रामचन्द्रपुरीर हय भृत्यप्राय। कभु तारे नाहि माने, देखे तृण-प्राय ॥ 92 ॥ उससे भक्तोंके हृदयका भार कम होना और बन्द हुई साँसका खुलना :- तेंहो गेले प्रभुर गण हैल हरषित। शिरेर पाथर येन पड़िल आचम्बित ॥ 95 ॥ अनुवाद-महाप्रभु कभी तो रामचन्द्रपुरीके साथ ऐसा व्यवहार करते जैसे वे स्वयं उनके दास हों और कभी वे उनकी तिनकेके समान उपेक्षा करते ॥ 92 ॥ अनुवाद-रामचन्द्रपुरीके जगन्नाथ पुरीसे चले जानेपर महाप्रभुके समस्त भक्त परम प्रसन्न हुए। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनके सिरपर रखा कोई भारी पत्थरका बोझा अचानक नीचे गिर पड़ा हो ॥ 95 ॥ अचिन्त्य ईश्वरके समस्त आचरण ही नित्य, मङ्गलमय और सुन्दर :- ईश्वर-चरित्र प्रभुर-बुद्धि-अगोचर। यबे येइ करेन, सेइ सब मनोहर ॥ 93 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'शिरेर पाथर,' - सिरपर जो पत्थरका बोझा था, उसके अचानक गिर जानेसे जिस प्रकार सिर हलका हो जाता है, वैसा हुआ ॥ 95 ॥ आठवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुवाद-महाप्रभुका आचरण उनकी स्वयं-भगवत्ताके अनुरूप ही होता है जो सबकी बुद्धिके अगोचर है। वे स्वतन्तरूपमें जब जो कुछ करते हैं, वह सब मनोहर होता है ॥ 93 ॥ लौकिक शुष्क वैराग्यकी विधिको त्याग करके श्रीगौरमें समर्पित प्राणवाले भक्तोंके द्वारा अपनी सर्वात्माके द्वारा महाप्रभुको सन्तुष्ट करना :- स्वच्छन्दे निमन्त्रण, प्रभुर कीर्त्तन-नर्त्तन। स्वच्छन्दे करेन सबे प्रसाद-भोजन ॥ 96 ॥ भगवान्का आश्रय परित्यागकर रामचन्द्रकी तीर्थयात्रा :- एइमत रामचन्द्रपुरी नीलाचले। दिन कत राहि' गेला 'तीर्थ' करिबारे ॥ 94 ॥ अनुवाद-अब भक्त महाप्रभुको स्वच्छन्द रूपसे निमन्त्रण करते, महाप्रभु स्वच्छन्द रूपसे कीर्तन और नृत्य करते एवं समस्त भक्त स्वच्छन्द रूपसे प्रसाद ग्रहण करते ॥ 96 ॥ अनुवाद-इस प्रकार रामचन्द्रपुरी कुछ दिनों तक नीलाचलमें रहनेके पश्चात् तीर्थ करनेके लिये चले गये ॥ 94 ॥
[ 8/96-101 आठवाँ अध्याय 249 गुरुकी अवज्ञाके कारण गुरुके द्वारा उपेक्षाके फलस्वरूप जीवोंका विष्णु-विरोध अथवा पाखण्डी बनना :- गुरु उपेक्षा कैले, ऐछे फल हय। क्रमे ईश्वर-पर्यन्त अपराधे ठेकय ॥ 97 ॥ अनुवाद—गुरुके द्वारा उपेक्षा किये जानेपर ऐसा ही फल हुआ करता है, गुरुके प्रति अपराध क्रमशः बढ़ते-बढ़ते भगवान्के प्रति भी अपराध होने लगता है॥ 97 ॥ अपराधी रामचन्द्रके व्यवहारके द्वारा महाप्रभुकी लोकशिक्षा :- यद्यपि गुरुबुद्ध्ये प्रभु तार दोष ना लइल। तार फलद्वारा लोके शिक्षा कराइल ॥ 98 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुने रामचन्द्रपुरीके प्रति गुरुबुद्धि रखनेके कारण उनका कोई दोष नहीं लिया, तथापि उन्होंने रामचन्द्रपुरीके गुरु-अपराधके फलके द्वारा लोगोंको शिक्षा प्रदान की ॥ 98 ॥ कानके द्वारा श्रीचैतन्यचरितामृतके पानके फलसे हृदय-कानको रसायनकी प्राप्ति :- चैतन्यचरित्र—येन अमृतेर पूर। शुनिते श्रवणे मने लागये मधुर ॥ 99 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र अमृतसे भरपूर है। उसका सुनना कानों और मनको बहुत मधुर लगता है॥ 99 ॥ चैतन्यचरित्रके श्रवणसे ही कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- चैतन्यचरित्र लिखि, शुन एकमने। अनायासे पाबे प्रेम श्रीकृष्णचरणे ॥ 100 ॥ अनुवाद—मैं (ग्रन्थकार) श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरित्रको लिख रहा हूँ। हे पाठकगण ! आप एकाग्रचित्तसे उसका श्रवण करो, इसके द्वारा आपको अनायास ही श्रीकृष्णके चरणकमलोंके प्रति प्रेमकी प्राप्ति होगी ॥ 100 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 101 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे भिक्षासङ्कोचो नाम अष्टमः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 101 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें भिक्षासङ्कोच नामक आठवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
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नौवाँ अध्याय कथासार—इस अध्यायमें श्रीभवानन्द रायके पुत्र गोपीनाथ पट्टनायकके द्वारा राजाके धनको नष्ट करनेके फलसे युवराज बड़-जानाका रुष्ट होना और उसके फलस्वरूप उन्हें पहले चाङ्ग (पयर 13का अमृतप्रवाह भाष्य देखें) पर चढ़ाना तथा बादमें महाप्रभुकी कृपाके छलसे उनके उद्धार और उन्नतिका वर्णन हुआ है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) गौरभक्तोंकी कृपासे अधम विषयी व्यक्तियोंको भी कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— अगण्यधन्यचैतन्यगणानां प्रेमवन्वया। निन्येऽधन्यजनस्वान्तमरुं शश्वदनूपताम्॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य—असंख्य [धन्य] चैतन्य भक्तोंकी प्रेमकी बाढ़के द्वारा अधन्य व्यक्तियोंके [भक्तिरहित] अन्तःकरणरूपी रेगिस्तान भी जलमय हो गये थे॥ १॥ अनुभाष्य— अगण्यधन्यचैतन्यगणानां (अगण्याः गणयितुमशक्याः असंख्याः धन्याः लब्धसिद्धयश्च ये चैतन्यगणाः चैतन्यपादाश्रिताः भक्ताः तेषां) प्रेमवन्वया (प्रेमरूपनदीगर्भातिरिक्तजलप्रवाहेण) अधन्यजनस्वान्तमरुम् (अधन्यानाम् अधमानां जनानां भक्तिरहितानां स्वानाम् अन्तःकरणरूपं मरुं निर्जलप्रदेशं) शश्वत् (निरन्तरं) अनूपतां (जलप्रायतां) निन्ये (प्रापितः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य दयामय। जय जय नित्यानन्द करुण-हृदय॥ २॥ अनुवाद—दयामय श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। करुणासे परिपूर्ण हृदयवाले श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो॥ २॥ जयद्वैताचार्य जय जय दयामय। जय गौरभक्तगण सब रसमय॥ ३॥ अनुवाद—दयामय श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो। आनन्दसे परिपूर्ण समस्त गौरभक्तोंकी जय हो॥ ३॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी नीलाचल-लीला :— एइमत महाप्रभु भक्तगण सङ्गे। नीलाचले वास करेन कृष्णप्रेमरङ्गे॥ ४॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु भक्तोंके साथ नीलाचलमें वास करते हुए कृष्णप्रेमकी तरङ्गोंमें डूबे रहते थे॥ ४॥ महाप्रभुके अन्तरमें और बाहरमें कृष्णविरहप्रेम :— अन्तरे-बाहिरे कृष्णविरह-तरङ्ग। नाना-भावे व्याकुल मन आर अङ्ग॥ ५॥ अनुवाद—महाप्रभुके भीतर और बाहर कृष्णविरहकी तरङ्गें उठती रहती थीं। अनेक प्रकारके भावोंसे महाप्रभुके मन और शरीर व्याकुल रहते॥ ५॥ दिनके समय नृत्य, कीर्तन और दर्शन, रात्रिके समय श्रीस्वरूप और श्रीरायके साथ रसास्वादन :— दिने नृत्य-कीर्त्तन, जगन्नाथ-दरशन। रात्र्ये राय-स्वरूप-सने रस-आस्वादन॥ ६॥ अनुवाद—दिनमें महाप्रभु नृत्य, कीर्तन और भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करते। रात्रिमें वे श्रीरामानन्द राय और श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके साथ रसका आस्वादन करते॥ ६॥ महाप्रभुका दर्शन करनेमात्रसे ही उद्धार और कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— त्रिजगतेर लोक आसि' करेन दरशन। येइ देखे, सेइ पाय कृष्णप्रेम-धन॥ ७॥
252 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/7-13 ] अनुवाद—त्रिभुवनके लोग आकर महाप्रभुके दर्शन करते और जो कोई भी उनके दर्शन करता, उसको कृष्णप्रेमधनकी प्राप्ति हो जाती॥7॥ मनुष्यके वेषमें अनन्त ब्रह्माण्डवासियोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- मनुष्येर वेशे आसि' गन्धर्व-किन्नर। सप्तपातालेर यत दैत्य विषधर॥8॥ अनुवाद—सात उच्च लोकोंसे गन्धर्व-किन्नर आदि और पातालादि सात निम्न लोकोंसे दैत्य तथा नाग आदि मनुष्यके वेशमें आकर महाप्रभुका दर्शन करते॥8॥ अनुभाष्य—'विषधर',—नागलोक॥8॥ सप्तद्वीपे नवखण्डे वैसे यत जन। नाना-वेशे आसि' करे प्रभुर दरशन॥9॥ अनुवाद—सात द्वीपों और नौ खण्डोंमें रहनेवाले लोग भी विविध वेश धारण करके महाप्रभुके दर्शन करने आते॥9॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 2/10 संख्या देखें॥9॥ वैष्णवोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- प्रह्लाद, बलि, व्यास, शुक आदि मुनिगण। आसि' प्रभु देखि' प्रेमे हय अचेतन॥10॥ अनुवाद—श्रीप्रह्लाद महाराज, श्रीबलि महाराज, श्रीव्यासदेव, श्रीशुकदेव गोस्वामी आदि मुनिगण आकर महाप्रभुके दर्शन करते और प्रेममें मूर्च्छित होकर गिर पड़ते॥10॥ अनुभाष्य—'प्रह्लाद',—किसी-किसी ऐतिहासिक-मतमें ये त्रेतायुगमें पंजाब प्रदेशकी राजधानी मुलतानमें कश्यपवंशीय राजा हिरण्यकशिपुके वैष्णव-पुत्रके रूपमें आविर्भूत हुए थे। पिता हिरण्यकशिपुके विष्णु-विद्वेषके फलसे पुत्र प्रह्लादको अनेक प्रकारके कष्ट सहन करने पड़े थे, बादमें भगवान् श्रीनृसिंहदेवने आविर्भूत होकर वैष्णव-विद्वेषी असुर सम्राट्का वध किया था। 'बलि',—प्रह्लादके पुत्र विरोचनके पुत्र ही बलि हैं; भगवान्ने वामनके रूपमें अवतीर्ण होकर तीन पग भूमिकी प्रार्थनाके छलसे आत्मसमर्पण करनेवाले बलिपर कृपा की थी। इनके सौ पुत्रोंमें-से बाण सबसे बड़े थे। 'व्यास',—पाराशरके पुत्र, सात्यवतेय [सत्यवतीके पुत्र] अथवा कृष्ण-द्वैपायन बादरायण-मुनि; ये वेदोंका विभाग करके 'वेदव्यास'के नामसे कहलाये और इन्होंने अठारह महापुराण एवं ब्रह्मसूत्र और उसके भाष्य श्रीमद्भागवत ग्रन्थका प्रणयन किया; ये ब्रह्म-सम्प्रदायके अन्तर्गत श्रीनारद ऋषिके शिष्य थे। 'शुक',—व्यासके पुत्र, पहले आकुमार ब्रह्मज्ञानी और नैष्ठिक ब्रह्मचारीकी लीला दिखलाकर इन्होंने एकान्तिक रूपसे कृष्णकी 'कीर्तनाख्या' भक्तिका आश्रय ग्रहण किया॥10॥ गृहके भीतर बैठे हुए महाप्रभुके दर्शनार्थियोंका बाहरमें कोलाहल, महाप्रभुके द्वारा दर्शन देना, सभीको कृष्णकथा-कीर्तन करनेका आदेश :- बाहिरे फुकारे लोक, दर्शन ना पाञा। “कृष्ण कह” बलेन प्रभु बाहिरे आसिया॥11॥ अनुवाद—दर्शनार्थी भक्त उनके दर्शन नहीं पाकर उनके वासस्थानके बाहर कोलाहल करते। तब महाप्रभु बाहर आकर उन्हें कहते,—“कृष्ण बोलो॥”11॥ महाप्रभुके दर्शनोंसे सभीमें कृष्णप्रेम :- प्रभुर दर्शने सब लोक प्रेमे भासे। एइमत याय प्रभुर रात्रि-दिवसे॥12॥ अनुवाद—महाप्रभुके दर्शन करके समस्त लोग प्रेममें निमग्न हो जाते। इसी प्रकार महाप्रभुके रात-दिन व्यतीत होते॥12॥ महाप्रभुको राजा प्रतापरुद्रके पुत्रके द्वारा श्रीभवानन्दके पुत्र गोपीनाथको मृत्यु-दण्डके विषयमें बतलाना :- एकदिन लोक आसि' प्रभुरे निवेदिल। “गोपीनाथेरे 'बड़ जाना' चाङ्गे चढ़ाइल॥13॥
[ 9/13–21 नौवाँ अध्याय 253 महाप्रभुकी कृपाके बिना उसकी रक्षा होनेके कोई उपाय नहीं :— तले खड्ग पाति’ तारे उपरे डारिबे। प्रभु रक्षा करेन यबे, तबे निस्तारिबे ॥ 14 ॥ सेवककी रक्षाके लिये महाप्रभुकी कृपाकी याचना :— सवंशे तोमार सेवक—भवानन्द-राय। ताँर पुत्र—तोमार सेवके राखिते युयाय ॥” 15 ॥ अनुवाद—एकदिन कुछ लोगोंने आकर महाप्रभुसे निवेदन किया,—“युवराज ‘बड़ जाना’ने गोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गपर चढ़ा दिया है और उसने नीचे तलवारोंको बिछा दिया है। वह गोपीनाथको तलवारोंके ऊपर फैंकवा देगा। हे महाप्रभु! आप यदि रक्षा करें, तभी गोपीनाथ बच सकता है। श्रीभवानन्द राय और उनका पूरा परिवार आपके सेवक हैं। इसलिये आपके लिये श्रीभवानन्द रायके पुत्रकी रक्षा करना ही उपयुक्त है॥ 13–15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘बड़ जाना’,—उड़ीसाके महाराजके बड़े पुत्र अर्थात् युवराज। ‘चाङ्ग’,—वध करनेकी विशेष प्रक्रियाके लिये व्यवहार किये जानेवाला मञ्च,—जिसके नीचेवाले भागमें नंगी तलवारें रखी होती हैं। दण्डित व्यक्तिको मञ्चके ऊपरसे तलवारोंके ऊपर फेंककर उसके प्राणोंका नाश किया जाता है ॥ 13 ॥ अनुभाष्य—‘डारिबे’,—फेंक देंगे ॥ 14 ॥ महाप्रभुके प्रश्नके उत्तरमें संवाददाताके द्वारा गोपीनाथके मृत्यु-दण्डके वृत्तान्तका वर्णन :— प्रभु कहे,—“राजा केने करये ताड़न?” तबे सेइ लोक कहे सब विवरण ॥ 16 ॥ “गोपीनाथ-पट्टनायक—रामानन्द-भाइ। सर्वकाल हय सेइ ‘राजविषयी’ ताइ ॥ 17 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,—“राजा गोपीनाथको दण्ड क्यों दे रहे हैं?” तब वे व्यक्ति सब वृत्तान्त सुनाने लगे,—“श्रीरामानन्द रायके भाई गोपीनाथ पट्टनायक सदासे राजाकी सम्पत्तिके रक्षकके रूपमें कार्य करनेवाले हैं ॥ 16–17 ॥ अनुभाष्य— ‘राजविषयी’,—राजाकी सम्पत्तिके रक्षक ॥ 17 ॥ ‘मालजाठ्या-दण्डपाटे’ तार अधिकार। साधि’ पाड़ि’ आनि’ द्रव्य दिल राजद्वार ॥ 18 ॥ दुइलक्ष काहन तार ठाञि बाकी हइल। दुइलक्ष काहन कौड़ि राजा त’ मागिल ॥ 19 ॥ अनुवाद—मालजाठ्या-दण्डपाट नामक स्थानपर उनकी नियुक्ति हुई है और वे वहींसे राजस्व एकत्रित करके राजाके कोषमें जमा कराते हैं। उनके द्वारा दो लाख काहन कौड़ी कोषमें जमा करवाना शेष रह गया है, इसलिये राजाने उनसे वही दो लाख काहन कौड़ी माँगी है॥ 18–19 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘मालजाठ्या-दण्डपाट’,—मालजाठ्या नामक राज्यके खण्डमें तहसीलदार गोपीनाथ पट्टनायकने जितना पैसा राजाको दिया था, उसमें दो लाख काहन कौड़ी शेष रह गया था ॥ 19 ॥ तेँह कहे,—‘स्थूलद्रव्य नाहि ये दिब। क्रमे-क्रमे बेचि’ किनि’ द्रव्य भरिब ॥ 20 ॥ घोड़ा दश-बार हय, लह’ मूल्य करि’।’ एत बलि’ घोड़ा आने राजद्वारे धरि’ ॥ 21 ॥ अनुवाद—गोपीनाथ पट्टनायकने राजासे कहा,—‘मेरे पास अभी कौड़ीके रूपमें धन नहीं है जो आपको दे सकूँ। मैं धीरे-धीरे अपनी सम्पत्ति क्रय-विक्रय करके आपका बचा हुआ धन चुका दूँगा। मेरे पास दस-बारह घोड़े हैं, आप उनका मूल्य लगाकर उन्हें खरीद लीजिये।’ यह कहकर गोपीनाथ पट्टनायक घोड़ोंको ले आये और उन्हें राजद्वारपर बाँध दिया ॥ 20–21 ॥ अनुभाष्य—‘स्थूलद्रव्य’,—मूल्यवान द्रव्य अथवा मोटा