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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

३१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उद्दालक ऋषिको (छां. ५. ११-२४) और काशिराज अजातशत्रुने गार्ग्य बालाकीको (बृ. २. १) ब्रह्मज्ञान सिखाया था। परंतु यह वर्णन कहीं नहीं मिलता, कि अश्वपति या जनकने राजपाट छोड़कर कर्मत्यागरूप संन्यास ले लिया। इसके विपरीत, जनक-सुलभा-संवादमें जनकने स्वयं अपने विषयमें कहा है, कि "हम मुक्तसंग होकर-आसक्ति छोड़कर-राज्य करते हैं और यदि हमारे एक हाथमें चंदन लगाया और दूसरेको छील डाला; तोभी उसका सुख और दुःख हमें एकसाही है।" अपनी स्थितिका इस प्रकार वर्णनकर (मभा. शां. ३२०. २६) जनकने आगे सुलभासे कहा है :- मोक्षे हि विविधा निष्ठा दृष्टाऽन्यैर्मोक्षवित्तमैः । ज्ञानं लोकोत्तरं यच्च सर्वत्यागश्च कर्मणाम् ॥ ज्ञाननिष्ठां वदन्त्येके मोक्षशास्त्रविदो जनाः । कर्मनिष्ठां तथैवान्ये यतयः सूक्ष्मदर्शिनः ॥ प्रहायोभयमप्येवं ज्ञानं कर्म च केवलम् । तृतीयेयं समाख्याता निष्ठा तेन महात्मना ॥ "मोक्षशास्त्रके ज्ञाता मोक्षप्राप्तिके लिये तीन प्रकारकी निष्ठाएँ बतलाते हैं :- (१) ज्ञान प्राप्तकर सब कर्मोंका त्याग कर देना-इसीको कुछ मोक्षशास्त्रज्ञ ज्ञाननिष्ठा कहते हैं; (२) इसी प्रकार दूसरे सूक्ष्मदर्शी लोग कर्मनिष्ठा बतलाते हैं, परंतु केवल ज्ञान और केवल कर्म-इन दोनों निष्ठाओंको छोड़कर (३) यह तीसरीही (अर्थात् ज्ञानसे आसक्तिका क्षय कर कर्म करनेकी) निष्ठा (मुझे) उस महात्माने (पंचशिख) बतलाई है" (मभा. शां. ३२०. ३८-४०)। निष्ठा शब्दका सामान्य अर्थ अंतिम स्थिति, आधार या अवस्था है। परंतु इस स्थानपर और गीतामेंभी निष्ठा शब्दका अर्थ है- "मनुष्यके जीवनका वह मार्ग, ढंग, रीति या उपाय है, जिससे आयु बितानेपर अंतमें मोक्षकी प्राप्ति होती है।" गीतापर जो शांकरभाष्य है, उसमेंभी निष्ठा = अनुष्ठेयतात्पर्यम् - अर्थात् आयुष्य या जीवनमें जो कुछ अनुष्ठेय (आचरण करने योग्य) हो, उसमें तत्परता (निमग्न रहना)-यही अर्थ किया है। आयुष्यक्रम या जीवनक्रमके इन मार्गोंमेंसे जैमिनि जैसे प्रमुख मीमांसकोंने ज्ञानको महत्त्व नहीं दिया है; किंतु यह कहा है, कि यज्ञयाग आदि कर्म करनेसेही मोक्षकी प्राप्ति होती है :- ईजाना बहुभिः यज्ञैः ब्राह्मणा वेदपारगाः । शास्त्राणि चेत्प्रमाणं स्युः प्राप्तास्ते परमां गतिम् ॥ क्योंकि, ऐसा न माननेसे शास्त्रकी अर्थात् वेदकी आज्ञा व्यर्थ हो जावेगी (जै. सू. ५. २. २९ पर शांकरभाष्य देखो) और उपनिषदकार तथा बादरायणाचार्यने, यह निश्चय कर कि यज्ञ-याग आदि सभी कर्म गौण हैं, सिद्धान्त किया है, कि मोक्षकी

संन्यास और कर्मयोग ३१७ प्राप्ति ज्ञानमे ही होती है, ज्ञानके सिवा और किसीसेभी मोक्षका मिलना शक्य नहीं है (वे. सू. ३. ४. १, २)। परंतु जनक कहते हैं, कि इन दोनों निष्ठाओंको छोड़- कर आसक्ति-विरहित कर्म करनेकी एक तीसरीही निष्ठा पंचशिखने (स्वयं सांख्य- मार्गी हो करभी) हमें बतलाई है। “दोनों निष्ठाओंको छोड़ कर” इन शब्दोंसे प्रकट होता है, कि यह तीसरी निष्ठा, पहली दो निष्ठाओंमेंसे किसीभी निष्ठाका अंग नहीं है - प्रत्युत स्वतंत्र रीतिसे वर्णित है। वेदान्तसूत्रमेंभी (वे. सू. ३. ४. ३०-३५) जनककी इस तीसरी निष्ठाका अंतमें उल्लेख किया गया है; और भगवद्- गीतामें जनककी उसी तीसरी निष्ठाका - उसीमें भक्तिका नया योग करके - वर्णन किया गया है। परंतु गीताका तो यह सिद्धान्त है, कि मीमांसकोंका केवल कर्मयोग अर्थात् ज्ञानविरहित कर्मयोग मोक्षदायक नहीं है, वह केवल स्वर्गप्रदही है (गीता २. ४२-४४; ९. २१); इसलिये जो मार्ग मोक्षप्रद नहीं है, उसे 'निष्ठा' नामही नहीं दिया जा सकता। क्योंकि, यह व्याख्या सभीको स्वीकृत है, कि जिससे अंतमें मोक्ष मिले, उसी मार्गको 'निष्ठा' कहना चाहिये। अतएव, सब मतोंका सामान्य विवेचन करते समय, यद्यपि जनकने तीन निष्ठाएँ बतलाई हैं, तथापि मीमांसकोंका केवल (अर्थात् ज्ञानविरहित) कर्ममार्ग 'निष्ठा'मेसे पृथक् कर सिद्धान्तपक्षमे स्थिर होनेवाली दो निष्ठाएँही गीताके तीसरे अध्यायके आरंभमें कही गई है (गीता ३. ३)। केवल ज्ञान (सांख्य) और ज्ञानयुक्त निष्काम कर्म (योग), येही वे दो निष्ठाएं हैं। और सिद्धान्तपक्षीय इन दोनों निष्ठाओंमेंसे दूसरी (अर्थात् जनकके कथनानुसार तीसरी) निष्ठाके समर्थनार्थ यह प्राचीन उदाहरण दिया गया है, कि “कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः” (गीता ३. २०) - जनक प्रभृतिने इस प्रकार “कर्म करकेही सिद्धि पाई है।” जनक आदिक क्षत्रिय राजाओंकी बात छोड़ दें; तोभी यह सर्वश्रुत हैही, कि व्यासने विचित्रवीर्यके वंशकी रक्षाके लिये धृतराष्ट्र और पांडु, ये दो क्षेत्रज पुत्र निर्माण किये थे और तीन वर्ष तक निरंतर परि- श्रम करके संसारके उद्धारके निमित्त उन्होंने महाभारतभी लिखा है। एवं कलियुगमें स्मार्त अर्थात् संन्यासमार्गके प्रवर्तक श्रीशंकराचार्यनेभी अपने अलौकिक ज्ञान तथा उद्योगसे धर्म-संस्थापना का कार्य किया था। कहाँ तक कहें? जबसे स्वयं ब्रह्मदेव कर्म करनेके लिये प्रवृत्त हुए, तभीसे सृष्टिका आरंभ हुआ है। मूलतः ब्रह्मदेवसेही मरीचि प्रभृति सात मानसपुत्रोंने उत्पन्न होकर, संन्यास न ले, सृष्टिक्रमको जारी रखनेके लिये मरणपर्यंत प्रवृत्तिमार्गकाही अंगीकार किया; और सनत्कुमार प्रभृति दूसरे सात मानसपुत्र जन्मसेही विरक्त अर्थात् निवृत्ति-पंथी हुए - पहले कह चुके हैं कि, इस कथाका उल्लेख महाभारतमें वर्णित नारायणीय धर्मनिरूपणमें है (मभा. शां. ३३९, ३४०)। ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंने या ब्रह्मदेवनेभी, कर्म करते रहनेके इस प्रवृत्तिमार्गका क्यों अंगीकार किया? - इसकी उपपत्ति वेदान्तसूत्रमें इस प्रकार दी है: “यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिणाम्” (वे. सू. ३. ३. ३२) -

३१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र जिसका जो ईश्वरनिर्मित अधिकार है, उसके पूरे होनेतक कार्योंसे छुट्टी नहीं मिलती। इस उपपत्तिकी जाँच आगे की जावेगी। उपपत्ति कुछभी क्यों न हो, पर यह बात निर्विवाद है, कि प्रवृत्ति और निवृत्ति, ये दोनों पंथ ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंमें संसारके आरंभसे प्रचलित हैं। इससे यहभी प्रकट है, कि उनमेंसे किसीकी श्रेष्ठताका निर्माण सिर्फ आचारकीही ओर ध्यान देकर नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, पूर्वाचार द्विविध होनेके कारण, केवल आचारसेही यद्यपि यह निर्णय नहीं हो सकता, कि निवृत्ति श्रेष्ठ है या प्रवृत्ति, तथापि संन्यासमार्गके लोगोंका यह दूसरा युक्तिवाद है, कि यदि यह निर्विवाद है, कि विना कर्मबंधसे छूटे मोक्ष नहीं होता, तो ज्ञानप्राप्ति हो जानेपर तृष्णामूलक कर्मोंका झगड़ा, जितनी जल्दी हो सके, तोडनेमेंही श्रेय है। महाभारतके शुकानुशासनमें - इसीको 'शुकानुप्रश्न'भी कहते हैं, - संन्यासमार्गकाही प्रतिपादन है। वहाँ शुकने व्यासजीसे पूछा है :- यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च । कां दिशं विद्यया यान्ति कां च गच्छन्ति कर्मणा ॥ “ वेद, कर्म करनेके लियेभी कहता है और छोडनेके लियेभी; तो अब मुझे बतला- इये, कि विद्यासे अर्थात् कर्मरहित ज्ञानसे और केवल कर्मसे कौन-सी गति मिलती है?” (मभा. शां. २४०. १) इसके उत्तरमें व्यासजीने कहा है :- कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते । तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥ “ कर्मसे प्राणी बंधा जाता है; और विद्यासे मुक्त हो जाता है। इसीसे पारदर्शी यति अथवा संन्यासी कर्म नहीं करते” (मभा. शां. २४०. ७)। इस श्लोकके पहले चरणका विवेचन हम पिछले प्रकरणमें कर चुके हैं। “कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते” इस सिद्धान्तपर कुछ वाद नहीं है। परंतु स्मरण रहे, कि वहाँ यह दिखलाया है, कि 'कर्मणा बध्यते' का विचार करनेसे सिद्ध होता है, कि जड़ अथवा अचेतन कर्म किसीको न तो बाँध सकता है और न छोड़ सकता है; मनुष्य फलाशासे अथवा अपनी आसक्तिसे कर्मोंमें बँध जाता है। इस आसक्तिसे अलग होकर वह यदि केवल बाह्य इंद्रियोंसे कर्म करे, तबभी वह मुक्तही है। रामचंद्रजी, इसी अर्थको मनमें लाकर, अध्यात्म रामायणमें (अ. रा. २. ४. ४२) में लक्ष्मणसे कहते हैं, कि :- प्रवाहपतितः कार्यं कुर्वन्नपि न लिप्यते । बाह्ये सर्वत्र कर्तृत्वमावहन्नपि राघव ॥ “ कर्ममय संसारके प्रवाहमें पड़ा हुआ मनुष्य बाहरी सब प्रकारके कर्तव्य-कर्म करकेभी अलिप्त रहता है।” अध्यात्मशास्त्रके इस सिद्धान्तपर ध्यान देनेसे दीख पड़ता है, कि कर्मोंको दुःखमय मानकर उनके त्यागनेकी आवश्यकताही नहीं

संन्यास और कर्मयोग ३१९ रहती; केवल मनको शुद्ध और सम करके फलाशा छोड़ देनेसेही सब काम हो जाते हैं। तात्पर्य यह, कि यद्यपि ज्ञान और काम्यकर्मका विरोध हो, तथापि निष्काम कर्म और ज्ञानके बीच कोईभी विरोध हो नहीं सकता। इसीमे अनुगीतामें 'तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति' - अतएव कर्म नही करते - इस वाक्यके बदले - तस्मात्कर्मसु निःस्नेहा ये केचित्पारदर्शिनः । "इससे पारदर्शी कर्ममें आसक्ति नहीं रखते" (अश्व. ५१. ३३), यह वाक्य आया है। इससे पहले, कर्मयोगका स्पष्ट प्रतिपादन इस प्रकार किया गया है, कि :- कुर्वते ये तु कर्माणि श्रद्दधाना विपश्चितः । अनाशीर्योगसंयुक्तास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥ "जो ज्ञानी पुरुष श्रद्धासे फलाशा न रखकर (कर्म-) योग-मार्गका अवलंब करके कर्म करते हैं, वेही साधुदर्शी हैं" (अश्व. ५०. ६, ७) । इसी प्रकार :- यदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च । इस पूर्वार्धमें जुड़ा हुआही, वनपर्वमें, युधिष्ठिरको शौनकका, यह उपदेश है, कि :- तस्माद्धर्म्मानिमान् सर्वान्नाभिमानात् समाचरेत् । "वेदमें कर्म करने और छोड़नेकीभी आज्ञा है; इसलिये (कर्तृत्वका) अभिमान छोड़कर हमें अपने सब कर्म करने चाहिये" (वन. २. ७३) । शुकानुप्रश्नमेंभी व्यासजीने शुकसे दो बार स्पष्ट कहा है कि :- एषा पूर्वतरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते । ज्ञानवानेव कर्माणि कुर्वन् सर्वत्र सिध्यति ॥ "ब्राह्मणकी पूर्वकी, पुरानी (पूर्वतर) वृत्ति यही है, कि ज्ञानवान होकर, सब काम करकेही सिद्धि प्राप्त करे" (मभा. शां. २३७. १; २३४. २९)। यहीभी प्रकट है, कि यहाँ 'ज्ञानवानेव' पदसे ज्ञानोत्तर और ज्ञानयुक्त कर्मही विवक्षित है। अब यदि दोनों पक्षोंके उक्त सब वचनोंका निराग्रह बुद्धिसे विचार किया जाय, तो मालूम होगा, कि "कर्मणा बध्यते जन्तुः" इस युक्तिवादसे कर्मत्यागविषयक यह सिर्फ एकही अनुमान निष्पन्न नही होता, कि 'तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति' - इससे काम नहीं करते - किंतु उसी युक्तिवादसे यह निष्काम कर्मयोगविषयक दूसरा अनुमानभी उतनीही योग्यताका सिद्ध होता है, कि "तस्मात्कर्मसु निःस्नेहाः" - इससे कर्ममें आसक्ति नहीं रखते। सिर्फ हमही इस प्रकारके दो अनुमान नहीं करते; बल्कि व्यासजीनेभी यही अर्थ शुकानुप्रश्नके निम्न श्लोकमें स्पष्टतया बतलाया है :- द्वाविमावथ पंथानौ यस्मिन् वेदाः प्रतिष्ठिताः । प्रवृत्तिलक्षणो धर्मः निवृत्तिक्ष विभाषितः ॥*

  • इस अंतिम चरणके "निवृत्तिश्च सुभाषितः" और "निवृत्तिश्च विभा- वितः" ऐसे पाठभेदभी हैं। पाठभेद कुछभी हो; पर प्रथम 'द्वाविमौ' यह अवश्य है; जिससे इतना तो निर्विवाद सिद्ध होता है, कि दोनो पंथ स्वतंत्र हैं !

३२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र “ इन दोनों मार्गोंको वेदोंका (एक-सा) आधार है-एक मार्ग प्रवृत्तिविषयक धर्मका और दूसरा निवृत्ति अर्थात् संन्यास लेनेका है” (महा. शां. २४०. ६) । वह पहलेही लिख चुके हैं, कि इसी प्रकार नारायणीय धर्ममेंभी इन दोनों पंथोंका पृथक् पृथक् स्वतंत्र रीतिसे, एवं सृष्टिके आरंभमें प्रचलित होनेका वर्णन किया गया है। परंतु स्मरण रहे, कि महाभारतमें प्रसंगानुसार इन दोनों पंथोंका वर्णन पाया जाता है, इसलिये प्रवृत्तिमार्गके साथही निवृत्तिमार्गके समर्थक वचनभी उसी महा- भारतमें पाये जाते हैं। गीताकी संन्यासमार्गीय टीकाओंमें निवृत्तिमार्गके इन वचनों- कोही मुख्य समझ कर, ऐसा प्रतिपादन करनेका प्रयत्न किया गया है, मानों इसके सिवा और दूसरा पंथही नहीं है; और यदि होभी, तो वह गौण है अर्थात् संन्यास मार्गका केवल अंग है। परंतु यह प्रतिपादन साम्प्रदायिक आग्रहका है; और इसीसे गीताका अर्थ सरल एवं स्पष्ट रहनेपरभी, आजकल बहुतोंको दुर्बोध हो गया है। वह गीताके “लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा” (गीता ३. ३) इस श्लोककी बराबरी- काही “द्वाविमावथ पंथानो” यह श्लोक है; इससे प्रकट होता है, कि इस स्थानपर दो समान-बलवाले मार्ग बतलानेका हेतु है। परंतु इस स्पष्ट अर्थकी ओर अथवा पूर्वापर संदर्भकी ओर ध्यान न देकर, कुछ लोग इसी श्लोकमें, यह दिखलानेका यत्न किया करते हैं, कि दोनों मार्गोंके बदले एकही मार्ग प्रतिपाद्य है। इस प्रकार यह सिद्ध हो गया, कि कर्मसंन्यास (सांख्य) और निष्काम कर्म (योग), दोनों वैदिक धर्मके स्वतंत्र मार्ग हैं और उनके विषयमें गीताका यह निश्चित सिद्धान्त है, कि वे वैकल्पिक नहीं हैं, किंतु “संन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगकी योग्यता विशेष है।” अब कर्मयोगकी श्रेष्ठताके संबंधमें गीतामें आगे कहा है, कि जिस संसारमें हम रहते हैं, वह संसार और उसमें हमारा क्षणभर जीवित रहनाभी जब कर्म ही है; तब कर्म छोड़कर जावें कहां? और यदि इस संसारमें अर्थात् कर्मभूमिमेंही रहना हो, तो कर्म छूटेंगेही कैसे ? हम यह प्रत्यक्ष देखते हैं, कि जब- तक देह है, तबतक भूख और प्यास जैसे विकार नहीं छूटते हैं (गीता ५. ८, ९) और उनके निवारणार्थ भिक्षा मांगने जैसा लज्जित कर्म करनेके लियेभी संन्यासमार्गके अनुसार यदि स्वतंत्रता है तो अनासक्तबुद्धि से अन्य व्यावहारिक शास्त्रोक्त कर्म करनेके लिये ही प्रत्यवाय कौन-सा है? यदि कोई इस डरसे अन्य कर्मोंका त्याग करता हो, कि कर्म करनेसे कर्मपाशमें फंसकर ब्रह्मानन्दसे वंचित रहूँगा; अथवा ब्रह्मा- त्मैक्य रूप अद्वैतबुद्धि विचलित हो जायगी; तो कहना चाहिये, कि अबतक उनका मनोनिग्रह कच्चा है और मनोनिग्रहके कच्चे रहते हुए किया हुआ कर्मत्याग, गीताके अनुसार, मोहका अर्थात् तामस् अथवा मिथ्याचरण है (गीता १८. ७; ३. ६)। ऐसी अवस्थामें यह अर्थ आप-ही-आप प्रकट होता है, कि ऐसे कच्चे मनोनिग्रहको चित्त- शुद्धिके द्वारा पूर्ण करनेके लिये निष्कामबुद्धि बढ़ानेवाले यज्ञ, दान प्रभृति गृहस्था- श्रमके श्रौत या स्मार्त कर्मही इस मनुष्यको करने चाहिये । सारांश, ऐसा कर्मत्याग

संन्यास और कर्मयोग ३२१ कभी श्रेयस्कर नहीं होता । यदि कहें, कि मन निर्विषय है और मनुष्यके अधीन है; तो फिर उसे कर्मका डरही किसलिये है ? अथवा कर्मोंके न करनेका व्यर्थ आग्रहही वह क्यों करे ? बरसाती छतेकी परीक्षा जिस प्रकार वर्षामेंही होती है, उसी प्रकार या - विकारहेतौ सति विक्रियन्ते, येषां न चेतांसि त एव धीराः । "जिन कारणोंसे विकार उत्पन्न होता है, वे कारण अथवा विषय दृष्टिके आगे रहनेपरभी जिनका अंतःकरण मोहके पंजेमें नहीं फँसता, वेही पुरुष धैर्यशाली कहे जाते हैं" ( कुमार १. ५९) - कालिदासके इस व्यापक न्यायसे कर्मोंके द्वाराही मनोनिग्रहकी जाँच हुआ करती है; और स्वयं कर्ताको तथा और लोगोंकोभी ज्ञात हो जाता है, कि मनोनिग्रह पूर्ण हुआ या नहीं। इस दृष्टिसेभी यही सिद्ध होता है, कि शास्त्रसे प्राप्त (अर्थात् प्रवाहपतित) कर्म करनेही चाहिये (गीता १८. ६)। अच्छा; यदि कहें कि "मन वशमें है; और यह डरभी नहीं, कि जो चित्तशुद्धि प्राप्त हो चुकी है, वह कर्म करनेसे बिगड़ जावेगी; परंतु ऐसे व्यर्थ कर्म करके शरीरको कष्ट देना नहीं चाहते, कि जो मोक्षप्राप्तिके लिये अनावश्यक है" तो यह कर्मत्याग 'राजस' कहलावेगा, क्योंकि यह काय-क्लेशका भय करके केवल इस क्षुद्र बुद्धिसे किया गया है, कि देहको कष्ट होगा और इसलिये त्यागसे जो फल मिलना चाहिये, वह ऐसे 'राजस' कर्मत्यागीको नहीं मिलता ( गीता १८. ८)। फिर यही प्रश्न है, कि कर्म छोड़ेंही क्यों ? यदि कोई कहे, कि "सब कर्म मायासृष्टिके हैं; अत- एव अनित्य हैं, इससे ब्रह्मसृष्टिके नित्य आत्माको इन कर्मोंकी झंझटमें पड़ जाना उचित नहीं; " तो यहभी ठीक नहीं है। क्योंकि जब स्वयं परब्रह्मही मायासे आच्छादित है, तब यदि मनुष्यभी उसीके अनुसार मायामें व्यवहार करे, तो क्या हानि है ? मायासृष्टि और ब्रह्मसृष्टिके भेदसे जिस प्रकार इस जगत्केभी दोन भाग किये गये हैं, उसी प्रकार आत्मा और देहेंद्रियोंके भेदसे मनुष्यकेभी दो भाग होते हैं। इनमेंसे आत्मा और ब्रह्मका संयोग करके ब्रह्ममें आत्माका लयकर दो और इस ब्रह्मात्मैक्य- ज्ञानसे बुद्धिको निःसंग रखकर केवल मायिक देहेंद्रियोंद्वारा मायासृष्टिके व्यवहार किया करो । बस; इस प्रकार बर्ताव करनेसे मोक्षमें कोई प्रतिबंध न आवेगा । और उक्त दोनों भागोंका जोड़ा आपसमें मिल जानेसे सृष्टिके किसीभी भागकी उपेक्षा या विच्छेद करनेका दोषभी न लगेगा; तथा ब्रह्मसृष्टि एवं मायासृष्टि - परलोक और इहलोक - दोनोंके कर्तव्यपालनका श्रेयभी मिल जायगा । ईशोपनिषद्में इसी तत्त्वका प्रतिपादन है ( ईश. ११) इन श्रुतिवचनोंका आगे विस्तारसहित विचार किया जावेगा । यहाँ इतनाही कह देते हैं, कि गीतामें जो कहा है, कि "ब्रह्मात्मैक्यके अनुभवी ज्ञानी पुरुष मायासृष्टिके व्यवहार केवल शरीर अथवा केवल इंद्रियोंसेही करते हैं" ( गीता ४ २१; ५. १२ ), उसका तात्पर्यभी यही है; और इसी उद्देश्यसे गी. र. २१

३२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अठारहवें अध्यायमें यह सिद्धान्त किया है, कि “निस्संग-बुद्धिसे, फलाशा छोड़कर, केवल कर्तव्य समझकर, कर्म करनाही सच्चा 'सात्त्विक' कर्मत्याग है”-कर्म छोड़ना सच्चा कर्मत्याग नहीं है (गीता १८. ९)। कर्म मायासृष्टिकेही क्यों न हों, परंतु किसी अगम्य उद्देश्यसे परमेश्वरनेही तो उन्हें बनाया है और उनको बंद करना मनुष्यके अधिकारकी बात नहीं, वह परमेश्वरके अधीन है। अतएव यह बात निर्विवाद है, कि बुद्धिको निःसंग रखकर केवल शरीर-कर्म करनेसे, वे मोक्षके बाधक नहीं होते। तब चित्तको विरक्त कर केवल इंद्रियोंसे शास्त्रसिद्ध कर्म करनेमें हानिही क्या है? गीतामें कहाही है, कि-“नहि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्” (गीता ३. ५; १८. ११)।-इस जगत्में कोई एक क्षणभरभी बिना कर्मके रह नहीं सकता। और अनुगीतामें कहा है कि, “नैष्कर्म्यं नच लोकेऽस्मिन् मुहूर्तमपि लभ्यते” (अश्व. २०. ७) - इस लोकमें (किसीसेभी) घड़ीभरके लियेभी कर्म नहीं छूटते। मनुष्योंकी तो बिसातही क्या ! सूर्य-चंद्र प्रभृतिभी निरंतर कर्मही करते रहते हैं ! अधिक क्या कहें? यह निश्चित सिद्धान्त है, कि कर्मही सृष्टि और सृष्टिही कर्म है। इसीलिये हम प्रत्यक्ष देखते हैं, कि सृष्टिकी घटनाओंको (अथवा कर्मको) क्षणभरके लियेभी विश्राम नहीं मिलता। देखिये; एक ओर भगवान् गीतामें कहते हैं- “कर्म छोड़नेसे खानेकोभी न मिलेगा” (गीता. ३. ८); तो दूसरी ओर वनपर्वमें द्रौपदी युधिष्ठिरसे कहती है, कि “अकर्मणां वै भूतानां वृत्तिः स्यान्नहि काचन” (वन. ३२. ८) अर्थात् कर्मके बिना प्राणिमात्रका निर्वाह नहीं; और इसी प्रकार दासबोधमेंभी पहले ब्रह्मज्ञान बतलाकर श्रीसमर्थ रामदास- स्वामीभी कहते हैं, “यदि प्रपंच छोड़कर परमार्थ करोगे, तो खानेके लिये अन्नभी न मिलेगा” (दास. १२. १. ३)। अच्छा; भगवानकाही चरित्र देखो तो मालूम होगा, कि आप प्रत्येक युगमें भिन्न भिन्न अवतार लेकर इस मायिक जगतमें साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंका विनाशरूप कर्म करते आ रहे हैं (गीता ४. ८ मभा. शां. ३३९. १०३)। और उन्होंनेही गीतामें कहा है, कि यदि मैं येही कर्म न करूँ, तो संसार उजड़कर नष्ट हो जावेगा (गीता. ३. २४)। इससे सिद्ध होता है, कि जब स्वयं भगवान् जगतके धारणार्थ कर्म करते हैं, तब इस कथनसे क्या प्रयोजन है, कि ज्ञानो- त्तर कर्म निरर्थक हैं? अतएव यः क्रियावान् स पंडितः” (मभा. वन. ३१२. १०८)

  • जो क्रियावान् है, वही पंडित है-इस न्यायके अनुसार अर्जुनको निमित्त कर भगवान् सबको उपदेश करते हैं, कि इस जगतमें कर्म किसीसे छूट नहीं सकते, अतः कर्मोंकी बाधासे बचनेके लिये मनुष्य अपने धर्मानुसार प्राप्त कर्तव्यको फलाशा त्यागकर अर्थात् निष्काम बुद्धिसे सदा करता रहे-यही एक मार्ग (योग) मनुष्यके अधिकारमें है; और यही उत्तमभी है। प्रकृति तो अपने व्यवहार सदैवही करती रहेगी; परंतु उसमेंसे कर्तृत्वके अभिमानकी बुद्धि छोड़ देनेसे मनुष्य मुक्तही है (गीता. ३. २७; १३. २९; १४. १९; १८. १६) । मुक्तिके लिये कर्म छोड़नेकी

संन्यास और कर्मयोग ३२३ या सांख्योंके कथनानुसार कर्मसंन्यासरूप वैराग्यकी जरूरत नहीं, इतनाही नहीं तो क्योंकि इस कर्मभूमिमें कर्मका पूर्णतया त्याग कर डालना शक्यही नहीं है। इसपरभी कुछ लोग कहते हैं- हाँ; माना कि कर्मबंध तोडनेके लिये कर्म छोड़नेकी जरूरत नहीं है; सिर्फ कर्म-फलाशा छोड़नेसेही सब निर्वाह हो जाता है; परंतु जब ज्ञानप्राप्तिसे हमारी बुद्धि निष्काम हो जाती है, तब सब वासना- ओंका क्षय हो जाता है; और कर्म करनेकी प्रवृत्ति होनेके लिये कोईभी कारण शेष नहीं रह जाता। तब ऐसी अवस्थामे अर्थात् वासनाके क्षयमे - कायाक्लेश- भयसे नहीं - सब कर्म आप-ही आप छूट जाते हैं। इस संमार्गमें मनुष्यका परम पुरुषार्थ मोक्षही तो है और जिसे ज्ञानसे वह मोक्ष प्राप्त हो जाता है, उसे प्रजा, संपत्ति अथवा स्वर्गादि लोकोंके सुखोमेंसे किसीकीभी 'तृषणा' (इच्छा) नहीं रहती (बृ. ३. ५. १; ४. ४. २२)। इसलिये कर्मोंको न छोड़नेपरभी अंतमें उस ज्ञानका स्वाभाविक परिणाम यही हुआ करता है, कि कर्म आप-ही-आप, छूट जाते हैं। इसी अभिप्रायसे उत्तरगीतामें कहा है - ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः । न चास्ति किंचित्कर्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित् ॥ “ज्ञानामृत पी कर कृतकृत्य हो जानेवाले पुरुषका फिर आगे कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता; और यदि रह जाय, तो वह तत्त्ववित् अर्थात् ज्ञानी नहीं है” * (१. २३)। यदि किसीको शंका हो, कि यह ज्ञानी पुरुषका दोष है; तो वह ठीक नहीं; क्योंकि श्रीशंकराचार्यने कहा है कि, “अलंकारो ह्ययमस्माकं यद्ब्रह्मात्मावगतौ सत्यां सर्व- कर्तव्यताहानिः” (वे. सू. शां. भा. १. १. ४) - अर्थात् यह तो ब्रह्मज्ञानी पुरुषका एक अलंकारही है। इसी प्रकार गीतामें भी ऐसे वचन हैं जैसे - “तस्य कार्यं न विद्यते” (गीता ३. १७) - ज्ञानीको आगे करनेके लिये कुछ नहीं रहता; अथवा उसे समस्त वैदिक कर्मोंका कोई प्रयोजन नहीं रहता (गीता २. ४६)। अथवा “योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते” (गीता ६. ३) - जो योगारूढ हो गया, उसे शमही कारण है। इन वचनोंके अतिरिक्त 'सर्वारंभपरित्यागी' (गीता १२. १६)। अर्थात् समस्त उद्योग छोड़नेवाला, और 'अनिकेतः' (गीता १२. १९) - अर्थात् बिना घरद्वारका, इत्यादि विशेषणभी ज्ञानी पुरुषके लिये गीतामें प्रयुक्त हुए हैं। इन सब बातोंसे कुछ लोगोंकी यह राय है, कि भगवद्गीताको यह

  • यह समझ वास्तवमे ठीक नहीं, कि यह श्लोक श्रुतिका है। वेदान्तसूत्रके शांकरभाष्यमें यह श्लोक नहीं है। परंतु सनत्सुजातीयके भाष्यमें आचार्यने इसे लिया है; और वहाँ कहा है कि यह लिङ्गपुराणका श्लोक है। इसमें संदेह नहीं, कि यह श्लोक संन्यासमार्गवालोंका है; कर्मयोगियोंका नहीं। बौद्ध धर्मग्रंथोंमेभी ऐसेही वचन हैं। (देखो परिशिष्ट प्रकरण)।

३२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मान्य है, कि ज्ञानके पश्चात् कर्म तो आप-ही-आप छूट जाते हैं। परंतु हमारी समझमें गीताके वाक्योंके ये अर्थ और उपर्युक्त युक्तिवादभी ठीक नहीं हैं। इसीसे इसके विरुद्ध हमें जो कुछ कहना है, उसे अब संक्षेपमें कहते हैं। 'सुखदुःख-विवेक' प्रकरणमें हमने दिखलाया है, कि गीता इस बातको नहीं मानती, कि “ज्ञानी हो जानेसे मनुष्यकी सब प्रकारकी इच्छाएँ या वासनाएँ छूटही जानी चाहिये।” सिर्फ़ इच्छा या वासनाके रहनेमें कोई दुःख नहीं, दुःखकी सच्ची जड़ है उसकी आसक्ति। इससे गीताका सिद्धान्त है, कि सब प्रकारकी वासनाओंको नष्ट करनेके बदले ज्ञाताको उचित है, कि वह केवल आसक्तिको छोड़कर कर्म करे। यह आवश्यक नहीं, कि इस आसक्तिके छूटनेसे उसके साथ कर्मभी छूटही जावें। और तो क्या? वासनाके छूट जानेपरभी सब कर्मोंका छूटना शक्य नहीं। वासना हो या न हो, हम देखते हैं, कि श्वासोच्छ्वास प्रभृति कर्म नित्य लगातार हुआ करते हैं। और आखिर क्षणभर जीवित रहनाभी तो कर्मही है, एवं पूर्ण ज्ञान होनेपरभी, अपनी वासनासे अथवा वासनाके क्षयसे वह छूट नहीं सकता। यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है, कि वासनाके छूट जानेसे कोई ज्ञानी पुरुष अपने प्राण नहीं खो बैठता, और इसीसे गीतामें यह वचन आया है, कि “न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्” (गीता ३. ५) — कोई क्यों न हो, बिना कर्म किये, रह नहीं सकता। गीताशास्त्रके कर्म- योगका पहला सिद्धान्त यह है, कि इस कर्मभूमिमें कर्म तो निसर्गतोही प्राप्त, प्रवाह- पतित और अपरिहार्य हैं, वे मनुष्यकी वासनापर अवलंबित नहीं हैं। इस प्रकार यह सिद्ध हो जानेपर, कि कर्म और वासनाका परस्पर नित्य संबंध नहीं है, वासनाके क्षयके साथही कर्मकाभी क्षय मानना निराधार हो जाता है। फिर यह प्रश्न सहजही उत्पन्न होता है, कि वासनाका क्षय हो जानेपरभी ज्ञानी पुरुषको प्राप्त कर्म किस रीतिसे करने चाहिये? इस प्रश्नका उत्तर गीताके तीसरे अध्यायमें दिया गया है (गीता ३ १७-१९ और उसपर हमारी टीका देखो)। गीताको यह मत मान्य है, कि ज्ञानी पुरुषको ज्ञानके पश्चात् उसका अपना कोई कर्तव्य नहीं रह जाता। परंतु इसके आगे बढ़कर गीताका यहभी कथन है; कि कोईभी क्यों न हो, वह कर्मसे छुट्टी नहीं पा सकता। कई लोगोंको ये दोनों सिद्धान्त परस्परविरोधी जान पड़ते हैं, कि ज्ञानी पुरुषको कर्तव्य नहीं रहता और कर्म नहीं छूट सकते। परंतु गीताकी बात ऐसी नहीं है। गीताने उनका यों मेल मिलाया है :- जब कि कर्म अपरिहार्य हैं, तब ज्ञान-प्राप्तिके बादभी ज्ञानी पुरुषको कर्म करनाही चाहिये, पर चूंकि उसको स्वयं अपने लिये कोई कर्तव्य नहीं रह जाता, इसलिये अब उसे अपने सब कर्म निष्काम बुद्धिसे करनाही उचित है। सारांश, तीसरे अध्यायके १७ वें श्लोकके “तस्य कार्यं न विद्यते” वाक्यमें, “कार्यं न विद्यते” इन शब्दोंकी अपेक्षा, 'तस्य' (अर्थात् उस ज्ञानी पुरुषके लिये) शब्द अधिक महत्त्वका है और उसका भावार्थ यह है, कि “स्वयं उसको” अपने लिये कुछ प्राप्त नहीं करना होता। इसीलिये अब (ज्ञान हो

संन्यास और कर्मयोग ३२५ जानेपर) उसको अपना कर्तव्यनिरपेक्ष बुद्धिसे करना चाहिये। आगे १९ वें श्लोकके आरंभमें कारणबोधक 'तस्मात्' पदका प्रयोगकर, अर्जुनको इसी अर्थका उपदेश यों दिया है : “तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर ।” (गीता ३ १९) - इसीसे तू शास्त्रसे प्राप्त अपने कर्तव्यको आसक्ति न रखकर करना जा; कर्मका त्याग मत कर । तीसरे अध्यायके १७ से १९ तकके तीन श्लोकोंमें जो कार्यकारणभाव व्यक्त होता है, उसपर और अध्यायके समूचे प्रकरणके संदर्भपर ठीक ठीक ध्यान देनेसे दीख पड़ेगा कि संन्यासमार्गियोंके कथनानुसार " तस्य कार्य न विद्यते" इसे स्वतंत्र सिद्धान्त मान लेना उचित नहीं। आगे दिये हुए उदाहरण इसके लिये उत्तम प्रमाण हैं। “ज्ञानप्राप्तिके पश्चात् कोई कर्तव्य न रहनेपरभी शास्त्रसे प्राप्त समस्त व्यवहार करने पड़ते हैं" - इस सिद्धान्तकी पुष्टिमें भगवान् कहते हैं :- न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ "हे पार्थ ! 'मेरा' इस त्रिभुवनमें कुछभी कर्तव्य (बाकी) नहीं है, अथवा कोई अप्राप्त वस्तु पानेकी (वासना) नहीं रही है। तथापि मैं कर्मही करता हूँ" (गीता ३. २२)। “न मे कर्तव्यमस्ति” - मुझे कर्तव्य नहीं रहा है- ये शब्द पूर्वोक्त श्लोकके "तस्य कार्य न विद्यते" - उसको कुछ कर्तव्य नहीं रहता (गीता ३. १७) – इन्हीं शब्दोंको लक्ष्य करके कहे गये हैं। इससे सिद्ध होता है, कि इन चारपांच श्लोकोंमें प्रतिपाद्य अर्थ यही है “ज्ञानसे कर्तव्यके शेष न रहनेपरभी (बल्कि इसी कारणसे) शास्त्रतः प्राप्त समस्त व्यवहार अनासक्त बुद्धिसे करनेही चाहिये।” यदि ऐसा न हो, तो “तस्य कार्य न विद्यते" इत्यादि श्लोकोंमें बतलाये हुए सिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिये भगवान्ने जो अपना उदाहरण दिया है, वह (अलग) असंबद्धसा हो जायगा; और यह अनवस्था प्राप्त हो जायगी, कि सिद्धान्त तो कुछ और है, और उदाहरण ठीक उसके विरुद्ध, कुछ औरही है। उस अनवस्थाको टालनेके लिये संन्यासमार्गीय टीकाकार "तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर” के 'तस्मात्' शब्दका अर्थभी निराली रीतिसे किया करते हैं। उनका कथन है, कि गीताका मुख्य सिद्धान्त तो यही है, कि “ज्ञानी पुरुष कर्म छोड़ दे।” परंतु अर्जुन ऐसा ज्ञानी था नहीं; इसलिये - "तस्मात् - भगवान्ने उसे कर्म करनेके लिये कहा है। हम ऊपर कह चुके हैं, कि “गीताके उपदेशके पश्चात्भी अर्जुन अज्ञानीही था" यह युक्ति ठीक नहीं है। उसके अतिरिक्त, यदि 'तस्मात्' शब्दका, अर्थ इस प्रकार खींचातानी कर लगाभी लिया, तो "न मे पार्थास्ति कर्तव्यम्" प्रभृति श्लोकोंमें भगवान्ने - "अपने किसी कर्तव्यके न रहनेपरभी मैं कर्म करता हूँ" - यह जो अपना उदाहरण मुख्य सिद्धान्तके समर्थनमें दिया है, उसका मेलभी इस पक्षमें अच्छा नहीं जमता। इसलिये “तस्य कार्य न विद्यते" वाक्यमें, "कार्य न विद्यते" शब्दोंको मुख्य न मानकर 'तस्य' शब्द-

३२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कोही प्रधान मानना चाहिये, और ऐसा करनेमे “ तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ”का अर्थ यही करना पडता है, कि “ तू ज्ञानी है; इसलिये यह सच है, कि तुझे अपने स्वार्थके लिये कर्म अनावश्यक हैं; परंतु स्वयं तेरे लिये कर्म अनावश्यक हैं, इसीलिये अब तू उन कर्मोंको (जो शास्त्रसे प्राप्त हुए है) मुझे आवश्यक नहीं इस बुद्धिमे “ अर्थात् निष्काम बुद्धिमे कर ! ” थोड़ेमें यही अनुमान निकलता है, कि कर्म छोड़नेका यह कारण नहीं हो सकता, कि “ वह हमें अनावश्यक है। ” किंतु जब कर्म अपरिहार्य है तब शास्त्रमे प्राप्त अपरिहार्य कर्मोंको स्वार्थत्यागबुद्धिसे करतेही रहना चाहिये - यही गीताका कथन है और यदि प्रकरणकी समताकी दृष्टिसे देखें, तोभी यही अर्थ लेना पडता है। कर्मसंन्यास और कर्मयोग, इन दोनोंमें जो बड़ा अंतर है, वह यही है। संन्यासपक्षवाले कहते हैं, कि “ तुझे कुछ कर्तव्य शेष नहीं बचा है, इससे तू कुछभी न कर।” और गीताका (अर्थात् कर्मयोग) कथन है, कि “ तुझे कुछ कर्तव्य शेष नहीं बचा है इसीलिये तुझे जो कुछ करना है, वह सब स्वार्थसंबंधी वासना छोड़कर अनासक्त बुद्धिसे कर।” अब प्रश्न यह है, कि एकही हेतु वाक्यसे इस प्रकार भिन्न भिन्न दो अनुमान क्यों निकले? इसका उत्तर इतनाही है, कि गीता कर्मोंको अपरिहार्य मानती है, इसलिये गीताके तत्त्वविचारके अनुसार यह अनुमान निकलही नहीं सकता, कि “ कर्म छोड़ दे।” अतएव 'तुझे अनावश्यक है” इस हेतु- वाक्यसेही गीतामें यह अनुमान किया गया है, कि स्वार्थबुद्धि छोड़कर कर्म कर। वसिष्ठजीने योगवासिष्ठमें श्रीरामचंद्रको सब ब्रह्मज्ञान बतलाकर निष्कामकर्मकी ओर प्रवृत्त करनेके लिये जो युक्तियाँ बतलाईं है, वेभी इसी प्रकारकी हैं। योग- वासिष्ठके अंतमें भगवद्गीताका उपर्युक्त सिद्धान्तही अक्षरशः आ गया है (यो. ६ उ. १९९; २१६. १४; गीता ३. १९ के अनुवादपर हमारी टिप्पणी देखो)। योगवासिष्ठके समानही बौद्धधर्मके महायान पंथके ग्रंथोंमेंभी इस संबंधमें गीताका अनुवाद किया गया है। परंतु विषयांतर होनेके कारण उसकी चर्चा यहाँ नहीं हो जा सकती; हमने इसका विचार आगे परिशिष्ट प्रकरणमें कर दिया है। आत्मज्ञान होनेसे 'मैं' और 'मेरा' यह अहंकारकी भाषाही शेष नहीं रहती (गीता १८. १६, २६) एवं इसीसे ज्ञानी पुरुषको 'निर-मम' कहते हैं। निर्ममका अर्थ “ मेरा मेरा (मम) न कहनेवाला” है। ज्ञानी पुरुषका वर्णन करते हुए, श्रीज्ञानेश्वर महाराजने इसी अर्थको अपने काव्यम व्यक्त किया है। परंतु भूल न जाना चाहिये, कि यद्यपि ब्रह्मज्ञानसे 'मैं' और 'मेरा' यह अहंकारदर्शक भाव छूट जाता है, तथापि उन दों शब्दोंके बदले 'जगत्' और 'जगत्‌का' - अथवा भक्तिपक्षमें 'परमेश्वर' और 'परमेश्वरका' - ये शब्द आ जाते है। संसारका प्रत्येक सामान्य मनुष्य अपने समस्त व्यवहार 'मेरा' या 'मेरे लिये'ही समझकर किया करता है। परंतु ज्ञानी होनेपर, ममत्वकी वासना छूट जानेके कारण अब वह इस बुद्धिसे (निर्मम बुद्धिसे) उन व्यवहारोंको करने लगता है, कि ईश्वरनिर्मित संसारके समस्त व्यवहार परमेश्वरके

संन्यास और कर्मयोग ३२७ है; और उनको करनेके लियेही ईश्वरने हमें उत्पन्न किया है। अज्ञानी और ज्ञानीमें यही तो भेद है (गीता ३. २३, २८)। गीताके इस सिद्धान्तपर ध्यान देनेसे ज्ञात हो जाता है, कि "योगारूढ पुरुषके लिये आगे शमही कारण होता है" (गीता ६. ३ और उसपर हमारी टिप्पणी देखो)। इस श्लोकका सरल अर्थ क्या होगा। गीताके टीकाकार कहते हैं, कि इस श्लोकमें कहा गया है, कि योगारूढ पुरुष आगे (ज्ञान हो जानेपर) शम अर्थात् शांतिको स्वीकार करे; और कुछ न करे। परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है। शम मनकी शांति है और उसे अंतिम 'कार्य' न कहकर इस श्लोकमें यह कहा है, कि शम अथवा शांति दूसरे किसीका कारण है - शमः कारणमुच्यते। अब शमको 'कारण' मानकर देखना चाहिये, कि आगे उसका 'कार्य' क्या है ? पूर्वापर संदर्भपर विचार करनेसे यही निष्पन्न होता है, कि वह कार्य 'कर्म'ही है। और तब इस श्लोकका अर्थ ऐसे होता है, कि योगारूढ पुरुष अपने चित्तको शांत करें, तथा उस शांति या शमसेही अपने सब अगले व्यवहार करे, टीकाकारोंके कथनानुसार यह अर्थ नहीं किया जा सकता, कि "योगारूढ पुरुष कर्म छोड़ दे।" इसी प्रकार 'सर्वारंभ परित्यागी' और 'अनिकेतः' प्रभृति पदोंका अर्थभी कर्मत्याग- विषयक न करके, फलाशात्याग-विषयकही करना चाहिये। गीताके अनुवादमें (उन स्थलोंपर जहाँ ये पद आये हैं) हमने टिप्पणीमें यह बात खोल दी है। भगवानने यह सिद्ध करनेके लिये - कि ज्ञानी पुरुषकोभी फलाशा त्याग कर चातुर्वर्ण्य आदि सब कर्म यथाशास्त्र करते रहना चाहिये - अपने अतिरिक्त दूसरा उदाहरण जनकका दिया है। जनक एक बड़ेही कर्मयोगी थे। उनकी स्वार्थबुद्धिके छूटनेका परिचय उन्हींके मुखसे यों है - "मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किंचन" (मभा. शां. २७५. ४; २१९. ५०) - मेरी राजधानी मिथिलाके जल जाने परभी मेरी कुछ हानि नहीं! इस प्रकार अपना स्वार्थ अथवा लाभालाभ किसी प्रकार न रहनेपरभी राज्यके समस्त व्यवहार करनेका कारण बतलाये हुए, जनक स्वयं कहते हैं :- देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च भूतेभ्योऽतिथिभिः सह। इत्यर्थं सर्व एवैते समारम्भा भवन्ति वै ॥ "देव, पितर, सर्वभूत (प्राणी) और अतिथियोंके लिये ये समस्त व्यवहार जारी हैं, मेरे लिये नहीं" (मभा. अश्व. ३२. २४)। अपना कोई कर्तव्य शेष न रहनेपर, अथवा अपने लिये किसी वस्तुके पानेकी वासना न रहने परभी यदि जनक-श्रीकृष्ण जैसे महात्मा इस जगतका कल्याण करनेके लिये प्रवृत्त न होंगे, तो कहना न होगा कि यह संसार उत्सन्न (ऊजड़) हो जायगा - "उत्सीदेयुरिमे लोकाः" (गीता ३. २४)। कुछ लोगोंका कहना है, कि गीताके इस सिद्धान्तमें - कि "फलाशा छोड़नी चाहिये; सब प्रकारकी इच्छाओंको छोड़नेकी आवश्यकता नहीं" - और वासना- क्षयके सिद्धान्तमें, बहुत भेद नहीं कर सकते। क्योंकि चाहे वासना छूटे, चाहे फलाशा

३२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र छूटे; दोनों ओर कर्म करनेकी प्रवृत्ति होनेके लिये कुछभी कारण नहीं दीख पड़ता; इससे चाहे जिस पक्षको स्वीकार करें, अंतिम परिणाम - कर्मका छूटना - ही है। परंतु यह आक्षेप अज्ञानमूलक है, क्योंकि 'फलाशा' शब्दका ठीक ठीक अर्थ न जाननेके कारणही यह उत्पन्न हुआ है। फलाशा छोड़नेका अर्थ यह नहीं, कि सब प्रकारकी इच्छाओंको छोड़ देना चाहिये अथवा यह बुद्धि या भाव होना चाहिये, कि मेरे कर्मोंका फल किसीको कभी न मिले, और यदि मिले तो उसे कोईभी न ले; प्रत्युत पाँचवें प्रकरणमे पहलेही हम कह चुके हैं, कि "अमुक फल पानेके लियेही मैं यह कर्म करता हूँ" - इस प्रकारकी फलविषयक ममतायुक्त आसक्तिको या बुद्धिके आग्रहको 'फलाशा', 'संग' या 'काम' ये नाम गीतामें दिये गये हैं। यदि कोई मनुष्य फल पाने- की इच्छा, आग्रह या वृथा आसक्ति न रखे; तो उससे यह मतलब नहीं पाया जाता, कि वह अपने प्राप्त कर्मको, केवल कर्तव्य समझकर, करनेकी बुद्धि और उत्साह- कोभी इस आग्रहके साथ-ही-साथ नष्ट कर डाले। अपने फायदेके सिवा इस संसारमें जिन्हें दूसरा कुछ नहीं दीख पड़ता और जो पुरुष केवल फलकी इच्छासेही कर्म करनेमें निमग्न रहते हैं, उन्हें सचमुच फलाशा छोड़कर कर्म करना शक्य न जँचेगा, परंतु जिनकी बुद्धि ज्ञानसे सम और विरक्त हो गई है, उनके लिये कुछ कठिन नहीं है। पहले तो यह समझही गलत है, कि हमें किसी कामका जो फल मिलता है, वह केवल हमारेही कर्मका फल होता है। यदि पानीकी द्रव्यता या अग्निकी उष्णताकी सहायता न मिले तो मनुष्य कितनाही सिर क्यों न खपावे, उसके प्रयत्नसे पाक-सिद्धि कभी हो नहीं सकेगी - भोजन पकेगाही नहीं; और अग्नि आदिमें इन गुणधर्मोंका होना या न होना मनुष्यके बस या उपायकी बात नहीं है। इसीमे कर्मसृष्टिके इन स्वयंसिद्ध विविध व्यापारों अथवा धर्मोंका पहले यथाशक्ति ज्ञान प्राप्त कर, मनुष्यको उसी ढंगसे अपने व्यवहार करने पड़ते हैं, जिसमे कि वे व्यापार अपने प्रयत्नके अनुकूल हों। इससे कहना चाहिये, कि मनुष्यको प्रयत्नोंके जो फल मिलता है, वह केवल उसकेही प्रयत्नोंका फल नहीं है; वरन् उसका कर्म और कर्म-सृष्टिके तदनुकूल अनेक स्वयंसिद्ध धर्म - इन दोनोंके संयोगका मात्र वह फल है। परंतु मनुष्यके प्रयत्नोंकी सफलताके लिये इस प्रकार जिन नानाविध सृष्टि-व्यापारोंकी अनुकूलता आवश्यक है, उन सबका कई बार मनुष्यको यथार्थ ज्ञान नहीं रहता; और कुछ स्थानोंपर तो वह होनाभी शक्य नही है - इसेही 'दैव' कहते हैं। यदि फल-सिद्धिके लिये ऐसे सृष्टि-व्यापारोंकी सहायता अत्यंत आवश्यक है, जो हमारे अधिकारमें नहीं और जिन्हें हम जानतेभी नहीं हैं; तो आगे कहना नहीं होगा, कि ऐसा अभिमान करना मूर्खता है, कि "केवल अपने प्रयत्नसेही मैं अमुक बात कर लूंगा" (गीता १८. १४-१६)। क्योंकि कर्मसृष्टिके ज्ञात और अज्ञात व्यापारोंका मानवी प्रयत्नोंसे संयोग होनेपर जो फल प्राप्त होता हो, वह केवल कर्मके नियमोंमेही हुआ करता है, इसलिये हम फलकी अभिलाषा करें या न करें - फलसिद्धिमें उसमे कोई फ़र्क

नहीं पड़ता; हमारी फलाशा निःसंदेह हमें दुःखकारक हो जाती है। परंतु स्मरण रहे, कि मनुष्यके लिये आवश्यक बात अकेले सृष्टिव्यापार स्वयं अपनी ओरसे संघटित होकर नहीं कर देते। चनेकी रोटीको स्वादिष्ट बनानेके लिये जिस प्रकार आटेमें थोड़ासा नमकभी मिलाना पड़ता है, उसी प्रकार कर्मसृष्टिके इन स्वयंसिद्ध व्यापारोंको मनुष्योंके लाभकारी होनेके लिये उनमें मानवी प्रयत्नकी थोड़ीसी मात्रा मिलानी पड़ती है। इसीसे ज्ञानी और विवेकी पुरुष सामान्य लोगोंके समान फलकी आसक्ति अथवा अभिलाषा तो नहीं रखते; किंतु वे लोग जगत्के व्यवहारकी सिद्धिके लिये प्रवाहपतित कर्मका (अर्थात् कर्मके अनादि प्रवाहमें शास्त्रसे प्राप्त यथाधिकार कर्मका) जो छोटा-बड़ा भाग मिले, उसेही शांतिपूर्वक, कर्तव्य समझ- कर किया करते हैं और फल पानेके लिये कर्मसंयोगपर अथवा भक्तिदृष्टिसे परमेश्वरकी इच्छापर निर्भर होकर निश्चिंत रहते हैं। "तेरा अधिकार केवल कर्म करनेका है, फल होना तेरे अधिकारकी बात नहीं" (गीता २. ४७) इत्यादि उपदेश जो अर्जुनको किया गया है, उसका रहस्यभी यही है। इस प्रकार फलाशा को त्यागकर कर्म करते रहनेपर आगे कुछ कारणोंसे कदाचित् वह कर्म निष्फल हो जाय तोभी निष्फलताका दुःख माननेके लिये हमें कोई कारणही नहीं रहता, क्योंकि हम तो अपने अधिकारका काम कर चुके हैं। उदाहरण लीजिये; वैद्यकशास्त्रका स्पष्ट मत है, कि आयुकी डोर (अर्थात् शरीरका पोषण करनेवाली नैसर्गिक धातुओंकी शक्ति) सबल रहे बिना निरी औषधियोंसे रोगीको कभी फायदा नहीं होता; और इस डोरकी सबलता अनेक प्राक्तन अथवा पुश्तैनी संस्कारोंका फल है, अतः यह बात वैद्यके हाथों होने योग्य नहीं; और उसे इसका निश्चयात्मक ज्ञान होभी नहीं सकता कि वह कितनी सबल है। ऐसा होते हुएभी हम प्रत्यक्ष देखते हैं, कि रोगी लोगोंको औषधि देना अपना कर्तव्य समझ कर केवल परोपकारकी बुद्धिसे वैद्य अपनी बुद्धिके अनुसार हजारों रोगियोंको दवाई दिया करता है। इस प्रकार निष्काम बुद्धिसे अपना काम करनेपर यदि कोई रोगी चंगा न हो, तो उससे वह वैद्य उद्विग्न नहीं होता, बल्कि बड़े शांत चित्तसे यह शास्त्रीय नियम ढूंढ निकालता है, कि अमुक रोगमें अमुक औषधिसे सैंकडों इतने रोगियोंको आराम होता है। परंतु इसी वैद्यका लड़का जब बीमार पड़ता है, तब उसे औषधि देते समय वह आयुष्यकी डोरवाली बात भूल जाता है और इस ममतायुक्त फलाशासे उसका चित्त घबड़ा जाता है कि "मेरा लड़का अच्छा हो जाय।" इसीसे उसे या तो दूसरा वैद्य बुलाना पड़ता है, या कमसे कम दूसरे वैद्यकी सलाहकी आवश्यकता होती है। इस छोटे-से उदाहरणसे ज्ञात होगा, कि कर्मफलमें ममतारूप आसक्ति किसे कहना चाहिये, और फलाशा न रहने- परभी निरी कर्तव्यबुद्धिसे कोईभी काम किस प्रकार किया जा सकता है। इस प्रकार यह सच है कि फलाशाको नष्ट करनेके लिये ज्ञानकी सहायतासे मनमें वैराग्यका भाव अटल होना चाहिये, परंतु किसी कपड़ेका रंग (राग) दूर करनेके लिये जिस

३३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रकार कोई कपड़ेको फाड़ना उचित नहीं समझता, उसी प्रकार यह कहनेसे, कि "किसी कर्ममें आसक्ति, काम, संग वा राग अथवा प्रीति न रखो " उस कर्मकोही छोड़ देना ठीक नहीं। वैराग्यसे कर्म करनाही यदि अशक्य हो, तो बात निराली है। परंतु हम प्रत्यक्ष देखते हैं, कि वैराग्यसे भली भांति कर्म किये जा सकते हैं; इतनाही क्यों ? यहभी प्रकट है, कि कर्म किसीसे छूटतेही नहीं। इसीलिये अज्ञानी लोग जिन कर्मोंको फलाशासे किया करते हैं, उन्हेंही ज्ञानी पुरुष ज्ञानप्राप्तिके बादभी लाभ- अलाभ तथा सुखदुःखको एकसा मान कर (गीता २. ३८) धैर्य एवं उत्साहसे, किंतु शुद्ध बुद्धिसे अर्थात् फलके विषयमें विरक्त या उदासीन रहकर (गीता १८. २६), केवल कर्तव्य मान कर, अपने अपने अधिकारानुसार शांत चित्तसे करते रहें (गीता ६. ३) - यही नीति और मोक्षकी दृष्टिसे उत्तम जीवनक्रमका सच्चा तत्त्व है। अनेक स्थितप्रज्ञ, महाभगवद्भक्त और परम ज्ञानी पुरुषोंने - एवं स्वयं भगवान्नेभी इसी मार्गका स्वीकार किया है और भगवद्गीता पुकारकर कहती है, कि इस कर्मयोग-मार्गमेंही पराकाष्ठाका पुरुषार्थ है, इसी 'योग'से परमेश्वरका भजनपूजन होता है; और अतमें सिद्धिभी मिलती है (गीता १८. ४६)। इतने परभी यदि कोई स्वयं जानबूझ कर गैरसमझ कर ले, तो उसे दुर्दैवी कहना चाहिये। स्पेन्सरसाहबको यद्यपि अध्यात्म दृष्टि संमत न थी, तथापि उन्होंनेभी अपने "समाज- शास्त्रका अभ्यास" नामक ग्रंथके अंतमें गीताके समानही यह सिद्धान्त किया है:- यह बात आधिभौतिक रीतिसेभी सिद्ध है, कि इस जगतमें किसीभी कामको एकदम कर गुजरना शक्य नहीं, उसके लिये कारणभूत और आवश्यक दूसरी हजारों बातें पहले जिस प्रकार हुई होंगी, उसी प्रकार मनुष्यके प्रयत्न सफल, निष्फल या न्यूना- धिक सफल हुआ करते हैं। इस कारण यद्यपि साधारण मनुष्य किसीभी कामके करनेमें फलाशासेही प्रवृत्त होते हैं. तथापि बुद्धिमान् पुरुषको शांति और उत्साहसे, फलसंबंधी आग्रह छोड़कर अपना कर्तव्य करते रहना चाहिये।* यद्यपि यह सिद्ध हो गया, कि ज्ञानी पुरुष इस संसारमें अपने प्राप्त कर्मोंको, फलाशा छोड़कर निष्काम बुद्धिसे आमरण अवश्य करता रहे; तथापि यह बतलाये विना कर्मयोगका विवेचन पूरा नहीं होता, कि ये कर्म किससे और किस लिये प्राप्त होते हैं ? अतएव भगवानने कर्मयोगके समर्थनार्थ अर्जुनको अंतिम और महत्त्वका उपदेश दिया है, कि "लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि" (गीता ३. २०)

  • लोकसंग्रहकी ओर दृष्टि दे करभी तुझे कर्म करनाही उचित है। लोकसंग्रहका यह अर्थ नहीं, कि कोई ज्ञानी पुरुष "मनुष्योंका केवल जमघट इकट्ठा करे" अथवा
  • " Thus admitting that for the fanatic, some wild anticipa- tion is needful as a stimulus, and recognizing the usefulness of his delusion as adapted to his particular nature and his particular function, the man of higher type must be content with greatly

संन्यास और कर्मयोग ३३१ यहभी अर्थ नहीं, कि “स्वयं कर्मत्यागका अधिकारी होनेपरभी इसलिये कर्म करनेका ढोंग करे, कि अज्ञानी मनुष्य कहीं कर्म न छोड़ बैठें; और उन्हें अपनी (ज्ञानी पुरुष- की) कर्मतत्परता अच्छी लगे।” क्योंकि, गीताका यह सिखलानेका हेतु नहीं, कि लोग अज्ञानी या मूर्ख बने रहें; अथवा उन्हें अज्ञानी बनाये रखनेके लिये ज्ञानी पुरुष कर्म करनेका ढोंग किया करे। ढोंग तो दूरही रहा; परंतु “लोग तेरी अपकीर्ति गावेंगें” (गीता २. ३४) इत्यादि सामान्य लोगोंको जँचनेवाली युक्तियोंसे जब अर्जुनका समाधान न हुआ, तब भगवान्, उन युक्तियोंसेभी अधिक जोरदार और तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे अधिक बलवान् कारण, अब कह रहे हैं। इसलिये कोशमें 'संग्रह' शब्दके जमा करना, इकट्ठा करना, रखना, पालना, नियमन करना प्रभृति जो अर्थ दिये हैं, उन सबको यथासंभव ग्रहण करना पड़ता है। और ऐसा करनेसे “लोगोंका संग्रह करना” या यह अर्थ होता है, कि “उन्हें एकत्र संबद्ध कर, इस रीतिसे उनका पालनपोषण और नियमन करे, कि उनकी परस्पर अनुकूलतासे उत्पन्न होनेवाली सामर्थ्य उनमें आ जावे; एवं उसके द्वारा उनकी सुस्थितिको स्थिर रखकर आगे उन्हें श्रेयःप्राप्तिके मार्गमें लगा दे।” “राष्ट्रका संग्रह” ये शब्द इसी अर्थमें मनुस्मृतिमें (मनु. ७. ११४) आये हैं; शांकरभाष्यमें उपरोक्त शब्दकी व्याख्या यों है- “लोकसंग्रह = लोकस्योन्मार्गप्रवृत्तिनिवारणम्।” इससे दीख पड़ेगा, कि संग्रह शब्दका जो हम ऐसा अर्थ करते हैं कि अज्ञानसे मनमाना बर्ताव करनेवाले लोगोंको ज्ञानवान् बनाकर सुस्थितिमें एकत्र रखना और आत्मोन्नतिके मार्गमें लगाना; वह अपूर्व या निराधार नहीं है। यह संग्रह शब्दका अर्थ हुआ; परंतु यहाँ यहभी बतलाना चाहिये कि 'लोकसंग्रह' में 'लोक' शब्द केवल मनुष्यवाची नहीं है। यद्यपि यह सच है, कि जगत्के अन्य प्राणियोंकी अपेक्षा मनुष्य श्रेष्ठ है; और इसीसे मानवजातिके कल्याणकाही प्रधानतासे 'लोकसंग्रह' शब्दमें समावेश होता है, तथापि भगवान्कीही ऐसी इच्छा है, कि भूलोक, मर्तृलोक, पितृलोक और देवलोक प्रभृति जो अनेक लोक अर्थात् जगत् भगवान्ने बनाये हैं, उनकाभी भली भाँति धारण- पोषण हो; और वे सभी अच्छी रीतिसे चलते रहें; इसलिये कहना पड़ता है, कि moderated expectations, while he perseveres with undiminished efforts. He has to see how comparatively little can be done, and yet to find it worthwhile to do that little: so uniting philanthropic enegry with philosophic calm.”- Spencer’s Study of Sociology,- 8th Ed., p. 403. (The italics are ours.) इस वाक्यमें fanatics के स्थान में “प्रकृतिके गुणोंसे विमूढ” (गीता ३. २९) या 'अहंकारविमूढ' (गीता ३. २७) अथवा भास कविक़ा 'मूर्ख' शब्द और man of higher type के स्थानमें 'विद्वान्' (गीता ३. २५) एवं greatly moderated expectations के स्थानमें 'फलो- दासीन्य' अथवा 'फलाशात्याग' इन समानार्थी शब्दोंकी योजना करनेसे ऐसा दीख पड़ेगा कि स्पेन्सरसाहबने मानो गीताकेही सिद्धान्तका अनुवाद कर दिया है।

३३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इतना सब व्यापक अर्थ 'लोकसंग्रह' पदसे यहाँ विवक्षित है, कि मनुष्यलोकके साथही इन सब लोकोंके व्यवहारभी सुस्थितिसे चलें ( लोकानां संग्रहः ) । जनकके किये अपने कर्तव्यके वर्णनमें - जो पहले लिखा जा चुका है - देव और पितरोंका उल्लेख है, एवं भगवद्गीताके तीसरे अध्यायमें तथा महाभारतके नारायणीयोपाख्यानमें जिस यज्ञचक्रका वर्णन है, उसमेंभी कहा है, कि देवलोक और मनुष्यलोक, दोनों- हीके धारणा-पोषणके लिये ब्रह्मदेवने यज्ञ उत्पन्न किया ( गीता ३. १०-१२ ) । इससे स्पष्ट होता है, कि भगवद्गीतामें 'लोकसंग्रह' पदमें इतना अर्थ विवक्षित है, कि अकेले मनुष्य-लोककाही नहीं; किंतु देवलोक आदि सब लोकोंकाभी उचित धारण-पोषण होवें और वे परस्पर एक दूसरेका श्रेय संपादन करें । सारी सृष्टिका पालन-पोषण करके लोकसंग्रह करनेका यह जो भगवानका अधिकार है, वही पुरुषके ज्ञानी हो जानेपर उसे अपने ज्ञानके कारण प्राप्त हुआ करता है। ज्ञानी पुरुषको जो बात प्रामाणिक जँचती है, अन्य लोगभी उसीही प्रमाण मान कर तदनुकूल व्यव- हार किया करते हैं ( गीता ३. २१) । क्योंकि साधारण लोगोंकी समझ है, कि शांत चित्त और समबुद्धिसे यह विचारनेका काम ज्ञानीहीका है, कि संसारका धारण और पोषण कैसे होगा ? एवं तदनुसार धर्म-प्रबंधकी मर्यादा बना देनाभी उसीका काम है। इस समझमें कुछ भूलभी नहीं है। और यहभी कह सकते हैं, कि सामान्य लोगोंकी समझमें ये बातें भली भांति नही आ सकतीं, तो इसीलिये वे ज्ञानी पुरुषोंके भरोसे रहते हैं। इसी अभिप्रायको मनमें लाकर शांतिपर्वमें युधिष्ठिरसे भीष्मने कहा है :- लोकसंग्रहसंयुक्तं विधात्रा विहितं पुरा । सूक्ष्मधर्मार्थनियतं सतां चरितमुत्तमम् ॥ “ लोकसंग्रहकारक और सूक्ष्म प्रसंगोंपर धर्मार्थका निर्णय कर देनेवाला साधु पुरुषोंका उत्तम चरित्र स्वयं ब्रह्मदेवनेही बनाया है” ( मभा. शां. २५८. २५) । 'लोकसंग्रह' कुछ ठाले बैठेकी बेगार, ढकोसला या लोगोंको अज्ञानमें डाले रखनेकी तरकीब नहीं है; ज्ञानयुक्त कर्मके संसारसे नष्ट हो जानेसे जगत्‌के नष्ट हो जानेकी संभावना है, इसलिये यही सिद्ध होता है, कि ब्रह्मदेवर्निर्मित साधुपुरुषोंके कर्तव्योंमें 'लोक- संग्रह' एक प्रधान कर्तव्य है। और इस भगवद्वचनका भावार्थभी यही है, कि “ मैं यह काम न करूँ, तो ये समस्त लोक अर्थात् जगत् नष्ट हो जावेंगे” (गी. ३. २४)। ज्ञानी पुरुष सब लोगोंके नेत्र हैं और यदि वे अपना काम छोड़ देंगे, तो सारी दुनिया अंधी हो जायगी; और इस संसारका सर्वतः नाश हुए बिना न रहेगा । ज्ञानी पुरुषों- कोही उचित है, कि लोगोंको ज्ञानवान् कर उन्नत बनावें । परन्तु यह काम सिर्फ जीभ हिला देनेसे अर्थात् कोरे उपदेशसे कभी नहीं होता। क्योंकि, जिन्हें सदाचरणकी आदत नहीं और जिनकी बुद्धिभी पूर्ण शुद्ध नहीं रहती, उन्हें यदि कोरा ब्रह्मज्ञान सुनाया जाय, तो वे लोग उस ज्ञानका दुरुपयोग इस प्रकार करते देखे गये हैं, कि

संन्यास और कर्मयोग [दाहिनी ओर: ३३३]

तेरासो मेरा, और मेरा तो मेरा है ही।" इसके सिवा, किसीके उपदेशकी सत्यताकी जाँचभी तो लोग उसके आचरणमेही किया करते हैं। इसलिये यदि ज्ञानी पुरुष स्वयं कर्म न करेगा, तो वह सामान्य लोगोंको आलसी बनानेका एक बहुत बड़ा कारण हो जायगा। इसेही 'बुद्धिभेद' कहते हैं; और यह बुद्धिभेद न होने पावे, तथा सब लोग सचमुच निष्काम होकर अपना कर्तव्य करनेके लिये जागृत हो जावें, इसी हेतु संसारमेंही रहकर अपने कर्मोंसे सब लोगोंको सदाचरणकी – निष्काम बुद्धिसे कर्म करनेकी – प्रत्यक्ष शिक्षा देनाही ज्ञानी पुरुषका कर्तव्य (ढोंग नहीं) हो जाता है। अतएव गीताका कथन है, कि उसे (ज्ञानी पुरुषको) कर्म छोड़नेका अधिकार कभी प्राप्त नहीं होता और अपने लिये न सही, परंतु लोकसंग्रहार्थ चातुर्वर्ण्यके सब कर्म अधिकारानुसार उसे करनेही चाहिये। किंतु संन्यासमार्ग- वालोंका मत है, कि ज्ञानी पुरुषको चातुर्वर्ण्यके कर्म निष्काम बुद्धिसेभी करनेकी कुछ जरूरत नहीं – यही क्यों ? करनेभी नहीं चाहिये; इसलिये इस संप्रदायके टीका- कार गीताके – "ज्ञानी पुरुषको लोकसंग्रहार्थ कर्म करने चाहिये" – इस सिद्धान्तका कुछ गड़बड़ अर्थ लगाकर – यहाँतक कहनेके लिये तैयारसे हो गये हैं, कि स्वयं भगवान्‌भी प्रत्यक्ष नहीं, तो पर्यायसे ढोंगका, उपदेश करते हैं। परंतु पूर्वापर संदर्भसे प्रकट है, कि गीताके लोकसंग्रह शब्दका यह ढुलमुल या पोचा अर्थ सच्चा नहीं। गीताको तो यह मतही मंजूर नहीं, कि ज्ञानी पुरुषको कर्म छोड़नेका अधिकार प्राप्त होता है; और इसके प्रमाणमें गीतामें जो कारण दिये गये हैं, उनमें लोकसंग्रह एक मुख्य कारण है। इसलिये पहले यह मान कर, कि ज्ञानी पुरुषके कर्म छूट जाते हैं, लोकसंग्रह पदका ढोंगी अर्थ करना सर्वथा अन्याय्य है। इस जगत्‌में मनुष्य केवल अपनेही लिये उत्पन्न नहीं हुआ है। यह सच है, कि सामान्य लोग अज्ञानतः स्वार्थमेंही फँसे रहते हैं। परंतु "सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" (गीता ६. २९) – मैं सब भूतोंमें हूँ; और सब भूत मुझमें हैं – इस रीतिसे जिसको समस्त संसारही आत्मभूत हो गया है, उसका यह कहना अपने मुखसे अपने ज्ञानमें बट्टा लगाना है, कि "मुझे तो मोक्ष मिल गया, अब यदि लोग दुःखी हों, तो मुझे इसकी क्या परवाह ?" ज्ञानी पुरुषका आत्मा क्या कोई स्वतंत्र व्यक्ति है? उसके आत्मापर जबतक अज्ञानका पर्दा पड़ा था, तबतक 'मैं' और 'लोग' यह भेद कायम था। परंतु ज्ञानप्राप्तिके बाद सब लोगोंका आत्माही उसका आत्मा है। इसीसे योग- वासिष्ठमें रामसे वसिष्ठने कहा है :- यावल्लोकपरामर्शो निरूढो नास्ति योगिनः । तावद्रूढसमाधित्वं न भवत्येव निर्मलम् ॥ "जबतक लोगोंके परामर्श लेनेका (अर्थात् लोकसंग्रहका) काम थोड़ाभी बाकी है – समाप्त नहीं हुआ है – तबतक यह कभी नहीं कह सकते, कि योगारूढ पुरुषकी स्थिति निर्दोष है" (यो. ६; पृ. १२८. ९७)। उसका केवल अपनेही समाधि-

३३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सुखमें डूब जाना मानो एक प्रकारसे अपनाही स्वार्थ साधना है। संन्यासमार्गवाले इस बातकी ओर दुर्लक्ष करते हैं यही उनकी युक्ति-प्रयुक्तियोंका मुख्य दोष है। भगवान्‌की अपेक्षा किसीकाभी अधिक ज्ञानी, अधिक निष्काम या अधिक योगारूढ होना शक्य नहीं। परंतु जब स्वयं भगवान्‌भी "साधुओंका संरक्षण, दुष्टोंका नाश और धर्म-संस्थापना" ऐसे लोकसंग्रहके काम करनेके लियेही समय-समयपर अवतार लेते हैं (गीता ४. ८), तब लोकसंग्रहके कर्तव्यको छोड़ देनेवाले ज्ञानी पुरुषका यह कहना सर्वथा अनुचित है, कि "जिस परमेश्वरने इन सब लोगोंको उत्पन्न किया है, वह उनका जैसे चाहेगा वैसे धारण-पोषण करेगा, उधर देखना मेरा काम नहीं है।" क्योकि ज्ञानप्राप्तिके बाद 'परमेश्वर', 'मैं' और 'लोग' - यह भेदही नहीं रहता; और यदि रहे, तो उसे ढोंगी कहना चाहिये; ज्ञानी नहीं। यदि ज्ञानसे ज्ञानी पुरुष परमेश्वररूपी हो जाता है, तो परमेश्वर जो काम करता है, उसे परमे- श्वरके समान अर्थात् निस्संगबुद्धिसे करनेकी आवश्यकतासे ज्ञानी पुरुष कैसे छूटेगा (गीता ३. २२; ४. १४, १५) ; इसके अतिरिक्त, परमेश्वरको जो कुछ करना है, वहभी ज्ञानी पुरुषके रूपसे या उसके द्वाराही करेगा। अतएव जिसे परमे- श्वरके स्वरूपका ऐसा अपरोक्ष ज्ञान हो गया है, कि "सब प्राणियोंमें एक आत्मा है" उसके मनमें सर्वभूतानुकंपा आदि उदात्त वृत्तियाँ पूर्णतासे जागृत रह कर स्वभावसेही उसके मनकी प्रवृत्ति लोककल्याणकी ओर हो जानी चाहिये। इसी अभिप्रायसे तुकाराममहाराज साधुपुरुषके लक्षण इस प्रकार बतलाते हैं- "जो दीनदुखियोंको अपनाता है, वही साधु है- ईश्वरभी वहीं (उसीके पास) है" (तु. गा. ९६०. १, २)। अथवा "जिसने परोपकारमें अपनी शक्तियोंका व्यय किया है, उसीने आत्मस्थितिको जाना है" (तु. गा. ४५६२)।* और अंतमें, संत- जनोंका (अर्थात् भक्तिसे परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान पानेवाले महात्माओंका) वर्णन इस प्रकार किया है- "संतोंकी विभूतियाँ जगत्‌के कल्याणहीके लिये हुआ करती हैं। वे लोग परोपकारके लिये अपने शरीरको कष्ट दिया करते हैं।" भर्तृहरिनेभी इस प्रकार वर्णन किया है, कि परार्थही जिसका स्वार्थ हो गया है, वही पुरुष साधुओंमें श्रेष्ठ है - "स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमानेकः सतामग्रणीः।" क्या मनु आदि शास्त्रप्रणेता ज्ञानी न थे? परंतु उन्होंने तृष्णादुःखको बड़ा भारी हौवा मानकर तृष्णाके साथ-ही-साथ परोपकार-बुद्धि आदि सभी उदात्त वृत्तियोंको नष्ट नहीं कर दिया - उन्होंने तो लोकसङ्ग्रहकारक चातुर्वर्ण्य प्रभृति शास्त्रीय मर्यादा बना देनेका

  • इसी भावको कविवर बाबू मैथिलीशरण गुप्तने यों व्यक्त किया है :- वास उसीमें है विभुवरका है बस सच्चा साधु वही - जिसने दुखियोको अपनाया, बढ़ कर उनकी बाह गही। आत्मस्थिति जानी उसनेही परहित जिसने व्यथा सही, परहितार्थ जिनका वैभव है, है, उनमेही धन्य मही॥

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उपयोगी काम किया है, ब्राह्मणको ज्ञान, क्षत्रियको युद्ध, वैश्यको खेती, गोरक्षा और व्यापार अथवा शूद्रको सेवा - ये जो गुण-कर्म और स्वभावके अनुरूप भिन्न भिन्न धर्म शास्त्रोंमें वर्णित हैं, वे केवल किसी व्यक्तिकेही हितके लिये नहीं हैं; प्रत्युत मनुस्मृति ( मनु. १. ८७ ) में कहा गया है, कि चातुर्वर्ण्यके व्यापारोंका विभाग लोकसंग्रहके लियेही इस प्रकार प्रवृत्त हुआ है कि सारे समाजके बचावके लिये कुछ पुरुषोंको प्रतिदिन युद्धकलाका अभ्यास करके सदा तैयार रहना चाहिये; और कुछ लोगोंको खेती, व्यापार एवं ज्ञानार्जन प्रभृति उद्योगोंसे समाजकी अन्यान्य आवश्य- कताएँ पूर्ण करनी चाहिये। गीताका (गीता ४. १३; १८. ४१) अभिप्रायभी ऐसाही है। यह पहले कहाही जा चुका है, कि इस चातुर्वर्ण्य धर्ममेंसे यदि कोई एकभी धर्म डूब जाय, तो समाज उतनाही पंगु हो जायगा; और अंतमें उसका नाश हो जानेकीभी संभावना रहती है। तथापि स्मरण रहे, कि उद्योगोंके विभागकी यह व्यवस्था एकही प्रकारकी नहीं रहती है। प्राचीन यूनानी तत्त्वज्ञ प्लेटोने एतद्विषयक अपने ग्रंथमें और अर्वाचीन फ्रेंच शास्त्रज्ञ कोंटने अपने 'आधि- भौतिक तत्त्वज्ञान' में, समाज-धारणके लिये जो व्यवस्था सूचित की है, वह यद्यपि चातुर्वर्ण्यके सदृश्य है; तथापि इन ग्रंथोंको पढ़नेसे कोईभी जान सकेगा, कि उस व्यवस्थामें धर्मकी चातुर्वर्ण्य व्यवस्थासे कुछ-न-कुछ भिन्नता है। इनमेंसे कौन-सी समाज-व्यवस्था अच्छी है ? अथवा यह अच्छापन सापेक्ष है, और युगमानसे उसमें कुछ.फेरफार हो सकता है या नहीं ? - इत्यादि अनेक प्रश्न यहाँ उठते हैं; और आजकल तो पश्चिमी देशोंमें 'लोकसंग्रह' एक महत्त्वका शास्त्र बन गया है। परंतु गीताका तात्पर्य-निर्णयही हमारा प्रस्तुत विषय है, इसलिये यहाँ उन प्रश्नोंपर विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। यह बात निर्विवाद है, कि गीताके समयमें चातुर्वर्ण्यकी व्यवस्था अनिवार्य रूपसे प्रचलित थी; और मूलतः 'लोकसंग्रह' करनेके हेतुसेही वह प्रवृत्ति की गई थी। इसलिये यही बात मुख्यतः यहाँ बतलानी है। गीताके 'लोकसंग्रह' पदका अर्थ यही होता है, कि लोगोंको प्रत्यक्ष दिखला दिया जावे, कि चातुर्वर्ण्यकी व्यवस्थाके अनुसार प्राप्त अपने कर्म निष्काम बुद्धिसे किस प्रकार करने चाहिये ? ज्ञानी पुरुष समाजके न केवल नेत्रही हैं; वरन् गुरुभी हैं। इससे आप-ही-आप सिद्ध हो जाता है, कि उपर्युक्त प्रकारका लोकसंग्रह करनेके लिये, उन्हें अपने समयकी समाज-व्यवस्थामें यदि कोई न्यूनता जँचे, तो वे उसे श्वेतकेतुके समान देशकालानुरूप परिमार्जित करें; और सनमाजके धारण तथा पोषण शक्तिकी रक्षा करते हुए उसको उन्नतावस्थामें ले जानेका प्रयत्न करते रहें। इसी प्रकारका लोकसंग्रह करनेके लिये राजा जनक संन्यास न लेकर जीवनपर्यंत राज्य करते रहे; और मनुने पहला राजा बनना स्वीकार किया। एवं इसी कारणसे "स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि" (गीता २. ३१) - स्वधर्मके अनुसार जो कर्म प्राप्त ह, उनके लिये रोना तुझे उचित नहीं - अथवा "स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति