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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

१०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र करके सिर्फ यही देखना चाहिये, कि उक्त अपूर्णांकके अंश और हरमें कैसा संबंध है। फिर हमें आप-ही-आप मालूम हो जायगा, कि इस अपूर्णांकका पूर्ण होना असंभव है। “न जातु कामः कामानाम्” इस मनुवचनका (२. ९४) भी यही अर्थ है। संभव है, कि बहुतेरोंको सुख-दुःख नापनेकी गणितकी यह रीति पसंद न हो; क्योंकि यह उष्णतामापक यंत्रके समान कोई निश्चित साधन नहीं है। परंतु इस युक्तिवादसे प्रकट हो जाता है, कि इस बातको सिद्ध करनेके लियेभी कोई निश्चित साधन नहीं, कि “संसारमें सुखही अधिक है।” यह आपत्ति दोनों पक्षोंके लिये समानही है। इसलिये उक्त प्रतिपादनके साधारण सिद्धान्तमें - अर्थात् उस सिद्धान्तमें जो सुखोपभोगकी अपेक्षा सुखेच्छाकी अमर्यादित वृद्धिसे निष्पन्न होता है- यह आपत्ति कुछ बाधा नहीं डाल सकती। धर्म-ग्रंथोंमें तथा संसारके इतिहासमें सिद्धान्तके पोषक अनेक उदाहरण मिलते हैं। किसी जमानेमें स्पेन देशमें मुसलमानोंका राज्य था। वहाँ तीसरा अब्दुल रहमान* नामक एक बहुतही न्यायी और पराक्रमी बादशाह हो गया है। उसने यह देखनेके लिये - कि मेरेदिन कैसे कटते हैं- एक रोजनामचा बनाया था; जिसे देखके अंतमें उसे यह ज्ञात हुआ, कि पचास वर्षके शासन-कालमें उसके केवल चौदह दिन सुखपूर्वक बीते। किसीने हिसाब करके बतलाया है, कि संसारभरके - विशेषतः यूरोपके - प्राचीन और अर्वाचीन सभी तत्त्वज्ञानियोंके मतोंको देखो; तो यही मालूम होगा, कि उनमेंसे प्रायः आधे लोग संसारको दुःखमय कहते हैं, और प्रायः आधे उसे सुखमय कहते हैं। अर्थात् संसारको सुखमय तथा दुःखमय कहनेवालोंकी संख्या प्रायः बराबर है। † यदि इस तुल्य संख्यामें हिंदु तत्त्वज्ञोंके मतोंको जोड़ दें, तो कहना नही होगा, कि संसारको दुःखमय माननेवालोंकी संख्याही अधिक हो जायगी। संसारके सुख-दुःखोंके उक्त विवेचनको सुनकर कोई संन्यासमार्गीय पुरुष कह सकता है; कि यद्यपि तुम इस सिद्धान्तको नहीं मानते कि “सुख कोई सच्चा पदार्थ नहीं है; फलतः सब तृष्णात्मक कर्मोंको छोड़े बिना शांति नहीं मिल सकती।” तथापि तुम्हारेही कथनानुसार यह बात सिद्ध है, कि तृष्णासे असंतोष और असंतोषसे दुःख उत्पन्न होता है। तब ऐसी व्यवस्थामें यह कह देनेमें क्या हर्ज है, कि इस असंतोषको दूर करनेके लिये मनुष्यको अपनी तृष्णाओंका और उन्हींके साथ सब सांसारिक कर्मोंकाभी त्याग करके सदा संतुष्टही रहना चाहिये - फिर तुम्हें इस बातका विचार नहीं करना चाहिये, कि उन कर्मोंको तुम परोपकारके लिये करना चाहते हो या स्वार्थके लिये। महाभारत (महा. वन. २१५. २२) में कहा है, कि “असंतोषस्य नास्त्यन्तस्तुष्टिस्तु परमं सुखम्” अर्थात् असंतोषका अंत

  • Moors in Spain, p. 128 (Story of the Nations Series). † Macmillan's Promotion of Happiness, p. 26.

सुखदुःखविवेक १०९ नहीं है और संतोषही परम सुख है। जैन और बौद्ध धर्मोंकी नींवभी इसी तत्त्वपर डाली गयी है; तथा पश्चिमी देशोंमें शोपेनहर* ने अर्वाचीन कालमें इसी मतका प्रतिपादन किया है; परंतु इसके विरुद्ध यह प्रश्न भी किया जा सकता है, कि जिव्हासे कभी कभी गालियाँ वगैरह अपशब्दोंका उच्चारण करना पड़ता है, तो क्या जीभहीको समूल काटकर फेंक देना चाहिये ? या अग्निसे कभी कभी मकान जल जाते हैं, तो क्या लोगोंने अग्निका सर्वथा त्यागही कर दिया है ? और उन्होंने भोजन बनानाही छोड़ दिया है ? अग्निकी बात कौन कहे; जब हम विद्युत्-शक्तिकोभी मर्यादामें रखकर उसको नित्यव्यवहारके उपयोगमें लाते हैं, तो उसी तरह तृष्णा और असंतोषकीभी सुव्यवस्थित मर्यादा बाँधना कुछ असंभव नहीं है। हां, यदि असंतोष सर्वांशमें और सभी समय हानिकारक होता, तो बात दूसरी थी; परंतु विचार करनेसे मालूम होगा कि सचमुच बात ऐसी नहीं है। असंतोष यह अर्थ बिलकुल नहीं, कि किसी चीजको पानेके लिये रात-दिन हाय हाय करते रहें, रोते रहें; (या न मिलनेपर सिर्फ शिकायतही किया करें)। ऐसे असंतोषको शास्त्रकारोंनेभी निंद्य माना है। परंतु उस इच्छाका मूलभूत असंतोष कभी निंदनीय नहीं कहा जा सकता, जो यह कहे, कि तुम अपनी वर्तमान स्थितिमेंही पड़े पड़े सड़ते मत रहो; किंतु उसमें यथाशक्ति शांत और समचित्तसे अधिकाधिक सुधार करते जाओ; तथा शक्तिके अनुसार उसे उत्तम अवस्थामें ले जानेका प्रयत्न करो। जो समाज चार वर्णोंमें विभक्त है, उसके ब्राह्मणोंने ज्ञानकी, क्षत्रियोंने ऐश्वर्यकी और वैश्योंने धन-धान्यकी उन्नति करनेकी इच्छा या वासना छोड़ दी, तो कहना नहीं होगा, कि वह समाज शीघ्रही अधोगतिको पहुँच जायगा। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर व्यासजीने (मभा. शां. २३. ९) युधिष्ठिरसे कहा है, कि "यज्ञो विद्या समुत्थानमंतोषः श्रियं प्रति" - अर्थात् यज्ञ, विद्या, उद्योग और ऐश्वर्यके विषयमें असंतोष (रखना) ये क्षत्रियके गुण हैं। उसी तरह विदुलानेभी अपने पुत्रको उपदेश करते समय (मभा. उ. १३३-३३) कहा है, कि "संतोषो वै श्रियं हन्ति"

  • अर्थात् संतोषसे ऐश्वर्यका नाश होता है; और किसी अन्य अवसरपर एक वाक्य (मभा. सभा. ५५. ११) में यहभी कहा गया है, कि "असंतोषः श्रियो मूलम्" अर्थात् असंतोषही ऐश्वर्यका मूल है।† ब्राह्मणधर्ममें संतोष एक गुण बतलाया गया है सही; परंतु उसका अर्थ केवल यही है, कि वह चातुर्वर्ण्य-धर्मानुसार द्रव्य * Schopenhauer's World as Will and Representation, Vol. II, chap. 46. संसारके दुःखमयत्वका, शोपेनहरकृत वर्णन अत्यंतही सरस है। मूल ग्रंथ जर्मन भाषामें है और उसका भाषांतर अंग्रेजीमेंभी हो चुका है। † Cf. "Unhappiness is the cause of progress." Dr. Paul Caru's, The Ethical Problem, p. 251 (2nd Ed.).

११० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

और ऐहिक ऐश्वर्यके विषयमें संतोष रखे। यदि कोई ब्राह्मण कहने लगे, कि मुझे जितना ज्ञान प्राप्त हो चुका है, उसीसे मुझे संतोष है, तो वह स्वयं अपना नाश कर बैठेगा। इसी तरह यदि कोई वैश्य या शूद्र, अपने अपने धर्मके अनुसार जितना मिला है उतना पा करही, सदा संतुष्ट बना रहे तो उसकीभी वही दशा होगी। सारांश यह है, कि असंतोष सब भावी उत्कर्षका, प्रयत्नका, ऐश्वर्यका और मोक्षका बीज है। हमें इस बातका सदैव ध्यान रखना चाहिये, कि यदि हम असंतोषका पूर्णतया नाश कर डालेंगे तो, इस लोक और परलोकमेंभी हमारी दुर्गति होगी। श्रीकृष्णका उपदेश सुनते समय जब अर्जुनने कहा, कि "भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्तिमेऽमृतम्" (गीता १०. १८) अर्थात् आपके अमृततुल्य भाषणको सुनकर मेरी तृप्ति होतीही नहीं। इसलिये आप फिरसे अपनी विभूतियोंका वर्णन कीजिये - तब भगवानने फिरसे अपनी विभूतियोंका वर्णन आरंभ किया। उन्होंने ऐसा नहीं कहा, कि तू अपनी इच्छाको वशमें रख। असंतोष या अतृप्ति अच्छी बात नहीं है। इससे सिद्ध होता है, कि योग्य और कल्याणकारक बातोंमें उचित असंतोषका होना भगवानकोभी इष्ट है। भर्तृहरिकाभी इसी आशयका एक श्लोक है। यथा "यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ" अर्थात् रुचि या इच्छा अवश्य होनी चाहिये, परंतु वह यशके लियेही हो। और व्यसनभी होना चाहिये, परंतु वह विद्याका हो, अन्य बातोंका नहीं। काम-क्रोध आदि विकारोंके समान असंतोषकोभी वशसे बाहर नहीं होने देना चाहिये। यदि वह वशमें न रहेगा, तो निःसंदेह हमारे सर्वस्वका नाशकर डालेगा। इसी हेतुसे केवल विषयभोगकी प्रीतिके लिये तृष्णा लादकर और एक आशाके बाद दूसरी आशा रखकर सांसारिक सुखोंके पीछे हमेशा भटकनेवाले पुरुषोंकी संपत्तिको गीताके सोलहवें अध्यायमें 'आसुरी संपत्ति' कहा है। ऐसे रात- दिनके लालचीपनसे मनुष्यके मनकी सात्त्विक वृत्तियोंका नाश हो जाता है - उसकी अधोगति होती है; और तृष्णाकी पूरी तृप्ति होना असंभव होनेके कारण कामोपभोग-वासना नित्य अधिकाधिक बढ़ती जाती है; तथा वह मनुष्य अंतमें उसी दशामें मर जाता है! इसके विपरीत तृष्णा या असंतोषके इस दुष्परिणामसे बचनेके लिये सब प्रकारकी तृष्णाओंके साथ सब कार्योंको एकदम छोड़ देनाभी सात्त्विक मार्ग नहीं है। उपर्युक्त कथनानुसार तृष्णा या असंतोष भावी उत्कर्षका बीज है। इसलिये चोरके डरसे साहकोही मार डालनेका प्रयत्न कभी नहीं करना चाहिये। युक्तिका मध्यम मार्ग तो यही है, कि हम इस बातका भली भांति विचार किया करें कि किस तृष्णा या किस असंतोषसे हमें दुःख होता है; और जो विशिष्ट आशा, तृष्णा या असंतोष दुःखकारक हो उसे छोड़ दें। उसके लिये समस्त कर्मोंको छोड़ देना उचित नहीं। केवल दुःखकारी आशाओंकोही छोड़ने और स्वधर्मानुसार कर्म करनेकी इस युक्ति या कौशल्यकोही योग अथवा कर्मयोग कहते हैं (गीता २. ५०); और यही गीताका मुख्यतः प्रतिपाद्य विषय है। इसलिये यहाँ

सुखदुःखविवेक १११ थोड़ा-सा इस बातका और विचार कर लेना चाहिये, कि गीतामें किस प्रका- रकी आशाको दुःखकारी कहा है। मनुष्य कानसे सुनता है, त्वचासे स्पर्श करता है, आँखोंसे देखता है, जिह्वासे स्वाद लेता है तथा नाकसे संघता है। इंद्रियोंके ये व्यापार जिस परिमाणसे इंद्रियोंकी वृत्तियोंके अनुकूल या प्रतिकूल होते हैं, उसी परिमाणमें मनुष्यको सुख अथवा दुःख हुआ करता है। सुख-दुःखके वस्तुस्वरूपके लक्षणका यह वर्णन पहले हो चुका है; परंतु सुख-दुःखोंका विचार केवल इसी परिभाषासे पूरा नहीं हो जाता। आधिभौतिक सुख-दुःखोंके उत्पन्न होनेके लिये बाह्य पदार्थोंका संयोग इंद्रियोंके साथ होना यद्यपि प्रथमतः आवश्यक है, तथापि इसका विचार करनेपर

  • कि आगे इन सुख-दुःखोंका अनुभव मनुष्य किस रीतिसे करता है - तो यह मालूम होगा, कि इंद्रियोंके स्वाभाविक व्यापारसे उत्पन्न होनेवाले इन सुख-दुःखोंको जाननेका (अर्थात् इन्हें अपने लिये स्वीकार या अस्वीकार करनेका) काम हरएक मनुष्यको अपने मनके अनुसारही करना पड़ता है। महाभारतमें कहा है, कि "चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा न तु चक्षुषा" (मभा. शां. ३११. १७) - अर्थात् देखनेका काम केवल आँखोंसेही नहीं होता; किंतु उसमें मनकीभी सहायता आवश्यक है। और यदि मन व्याकुल हो, तो आँखोंसे देखनेपरभी अन- देखा-सा हो जाता है। बृहदारण्यकोपनिषद् (बृ. १. ५. ३) मेंभी यह वर्णन पाया जाता है; यथा (अन्यत्रमना अभूव नादर्शम्) "मेरा मन दूसरी ओर लगा था; इसलिये मुझे नहीं दीख पड़ा" और (अन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषम्) "मेरा मन दूसरी ओर था; इसलिये मैं सुन नहीं सका" - इससे यह स्पष्टतया सिद्ध हो जाता है, कि आधिभौतिक सुखदुःखोंका अनुभव करनेके लिये इंद्रियोंके साथ मनकीभी सहायता होनी चाहिये; और आध्यात्मिक सुख-दुःख तो मानसिक ही होते हैं। सारांश यह है, कि सब प्रकारके सुख-दुःखोंका अनुभव अंतमें हमारे मनपरही अवलंबित रहता है; और यदि यह बात सच है, तो यहभी आप-ही-आप सिद्ध हो जाता है, कि मनोनिग्रहसे सुख-दुःखोंके अनुभवकाभी निग्रह अर्थात् दमन करना कुछ असंभव नहीं है। इसी बातको ध्यान रखते हुए मनुजीने सुख-दुःखोंका लक्षण नैयायिकोंके लक्षणसे भिन्न प्रकार बतलाया है। उनका कथन है, कि :- सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥ अर्थात् "जो दूसरोंकी (बाह्य-वस्तुओंकी) अधीनतामें है, वह सब दुःख है; और जो अपने (मनके) अधिकारमें है, वह सुख है। यही सुख-दुःखका संक्षिप्त लक्षण है" (मनु. ४. १६०) नैयायिकोंके बतलाये हुए लक्षणको 'वेदना' शब्दमें शारीरिक और मानसिक, दोनों वेदनाओंका समावेश होता है; और उससे सुख-दुःखका

११२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बाह्य वस्तुस्वरूपभी मालूम हो जाता है; और मनका विशेष ध्यान सुख-दुःखोंके केवल आंतरिक अनुभवपर है। बस, इस बातको ध्यानमें रखनेसे सुख-दुःखोंके उक्त दोनों लक्षणोंमें कुछ विरोध नहीं पड़ेगा। इस प्रकार जब सुख-दुःखोंके लिये इंद्रियोंका अवलंब अनावश्यक हो गया, तब तो यही कहना चाहिये कि :- भेषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिंतयेत्। "मनसे दुःखोंका चिंतन न करनाही दुःखनिवारणकी अचूक ओषधि है" (महा. शां. २०५. २); और इसी तरह मनको कठोर बनाकर सत्य तथा धर्मके लिये सुखपूर्वक अग्निमें जलकर भस्म हो जानेवालोंके अनेक उदाहरण इतिहासमेंभी मिलते हैं। इसलिये गीताका कथन है, कि हमें जो कुछ करना है, उसे मनोनिग्रहके साथ और उसकी फलाशाको छोड़ कर तथा सुख-दुःखोंमें समभाव रखकर करना चाहिये। ऐसा करनेसे न तो हमें कर्माचरणका त्याग करना पड़ेगा और न हमें उसके दुःखकी बाधाही होगी। फलाशा-त्यागका यह अर्थ नहीं है, कि हमें जो फल मिले उसे छोड़ दें; अथवा ऐसी इच्छा रखें, कि वह फल कभी किसीको न मिले। इसी तरह फलाशामें और कर्म करनेकी केवल इच्छा, आशा, हेतु या फलके लिये किसी बातकी योजना करनेमेंभी बहुत अंतर है। केवल हाथपैर हिलानेकी इच्छा होनेमें और अमुक मनुष्यको पकड़नेके लिये या किसी मनुष्यको लात मारनेके लिये हाथ- पैर हिलानेकी इच्छामें बहुत भेद है। पहली इच्छा केवल कर्म करनेकीही है, उसमें दूसरा कोई हेतु नहीं होता; और यदि यह इच्छा छोड़ दी जाय, तो कर्मका करनाही रुक जायगा। इस इच्छाके अतिरिक्त प्रत्येक मनुष्यको इस बातका ज्ञानभी होना चाहिये, कि हरएक कर्मका कुछ-न-कुछ फल अथवा परिणाम अवश्यही होगा। बल्कि ऐसे ज्ञानके साथ साथ उसे इस बातकी इच्छा अवश्य होनी चाहिये, कि मैं अमुक फलप्राप्तिके लिये अमुक प्रकारकी योजना करकेही अमुक कर्म करना चाहता हूँ। नहीं तो उसके सभी कार्य पागलोंके-से निरर्थक सिद्ध होंगे। ये सब इच्छाएँ, हेतु, योजनाएँ, परिणाममें दुःखकारक नहीं होती; और, गीताका यह कथनभी नहीं है, कि कोई उनको छोड़ दें। परंतु स्मरण रहे, कि उस स्थितिसे बहुत आगे बढ़ कर जब मनुष्यके मनमें यह भाव होता है, कि "मैं जो कर्म करता हूँ, मेरे उस कर्मका अमुक फल मुझे अवश्यही मिलना चाहिये।" अर्थात् जब कर्मफलके विषयमें, कर्ताकी बुद्धिमें ममत्वकी यह आसक्ति, अभिमान, अभिनिवेश, आग्रह या इच्छा उत्पन्न हो जाती है और मन उसीसे ग्रस्त हो जाता है और जब इच्छानुसार फल मिलनेमें बाधा होने लगती है, तभी दुःख-परंपराका प्रारंभ हुआ करता है। यदि यह बाधा अनिवार्य अथवा दैवकृत हो, तो केवल निराशामात्र होती है, परंतु वह कहीं मनुष्यकृत हुई तो फिर क्रोध या द्वेषभी उत्पन्न हो जाता है, जिससे कुकर्म होनेपर मर मिटना पड़ता है। कर्मके परिणामके विषयमें जो यह ममत्वयुक्त आसक्ति

सुखदुःखविवेक ११३ होती है, उसीको 'फलाशा', 'संग', 'अहंकार-बुद्धि' और 'काम' कहते हैं; और यह बतलानेके लिये, कि संसारकी दुःखपरंपरा यहींसे शुरू होती है, गीताके दूसरे अध्यायमें कहा गया है, कि विषय-संगसे काम, कामसे क्रोध, क्रोधसे मोह और अंतमें मनुष्यका नाशभी होता है (गीता २. ६२, ६३) । अब यह बात सिद्ध हो गई, कि जड़ सृष्टिके अचेतन कर्म स्वयं दुःखके मूल कारण नहीं हैं, किंतु मनुष्य उनमें जो फलाशा, संग, काम या इच्छा लगाये रहता है, वही यथार्थमें दुःखका मूल है। ऐसे दुःखोंसे बचे रहनेका महज उपाय यही है, कि सिर्फ विषयकी फलाशा, संग, काम या आसक्तिको मनोनिग्रहद्वारा छोड़ देना चाहिये। संन्यासमार्गियोंके कथनानुसार सब विषयों और कर्मोंहीको, अथवा सब प्रकारकी इच्छाओंहीको, छोड़ देनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसी लिये गीता (गीता २. ६४) में कहा है, कि जो मनुष्य फलाशाको छोड़कर यथाप्राप्त विषयोंका निष्काम और निस्संग-बुद्धिसे सेवन करता है, वही सच्चा स्थितप्रज्ञ है। संसारके कर्मव्यवहार कभी रुक नहीं सकते। मनुष्य चाहे इस संसारमें रहे या न रहे; परंतु प्रकृति अपने गुणधर्मानुसार सदैव अपना व्यापार करतीही रहेगी। जड़ प्रकृतिको न तो उसमें कुछ सुख है, और न दुःख। मनुष्य व्यर्थही अपने आपको महत्त्व देकरही प्रकृतिके व्यवहारोंमें आसक्त हो जाता है, इसीलिये वह सुख-दुःखका भागी हुआ करता है। यदि वह इस आसक्त- बुद्धिको छोड़ दे और अपने सब व्यवहार इस भावनासे करने लगे, कि "गुणा गुणेषु वर्तन्ते" (गीता ३. २८) - प्रकृतिके गुणधर्मानुसारही सब व्यापार हो रहे हैं- तो असंतापजन्य कोईभी दुःख उसको होही नहीं सकता। इसलिये यह समझकर, कि प्रकृति तो अपना व्यापार करतीही रहती है; उसके लिये संसारको दुःखप्रधान मानकर रोते नहीं रहना चाहिये; और न उसको त्यागनेहीका प्रयत्न करना चाहिये। महाभारत (मभा. शां. २५. २६) में व्यासजीने युधिष्ठिरको यह उपदेश दिया है, कि :- सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाऽप्रियम् । प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥ "चाहे सुख हो या दुःख, प्रिय हो अथवा अप्रिय, जो जिस समय जैसे प्राप्त हो वह उस समय वैसेही, मनको निराश न करते हुए (अर्थात् नाराज बनकर अपने कर्तव्यको न छोड़ते हुए) सेवन करते रहो !" इस उपदेशका महत्त्व पूर्णतया तभी ज्ञात हो सकता है, जब कि हम इस बातको ध्यानमें रखें, कि संसारमें अनेक कर्तव्य ऐसे हैं, जिन्हें दुःख सह करभी करना पड़ता है। भगवद्गीतामेंभी स्थितप्रज्ञका यह लक्षण बतलाया है, कि "यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्" (गीता गी. र. ८

११४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र २. ५७) - अर्थात् शुभ अथवा अशुभ जो कुछ आ पड़े, उसके बारेमें जो सदा निष्काम या निस्संग रहता है, और जो उसका अभिनंदन या द्वेष कुछभी नहीं करता, वही स्थितप्रज्ञ है। फिर पाँचवे अध्याय (गीता ५. २०) में कहा है, कि "न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्" - सुख पा कर फूल न जाना चाहिये। और दुःखमें कातरभी न होना चाहिये। एवं दूसरे अध्याय (गीता २. १४, १५) में इन सुख-दुःखोंको निष्काम-बुद्धिसे भोगनेका उपदेश किया है। भगवान् श्रीकृष्णने उसी उपदेशको बार बार दुहराया है (गीता ५. ९; १३. ९)। वेदान्तशास्त्रकी परिभाषामें उसीको "सब कर्मोंको ब्रह्मार्पण करना" कहते हैं। और भक्ति- मार्गमें 'ब्रह्मार्पण'के बदले 'श्रीकृष्णार्पण' शब्दकी योजना की जाती है। बस यही, गीतार्थ का सारांश है। कर्म चाहे किसीभी प्रकारका हो, परंतु कर्म करनेकी इच्छा और अपने उद्योगको बिना छोड़े तथा फल-प्राप्तिकी आसक्ति न रखकर (अर्थात् निस्संग- बुद्धिसे) उसे करते रहना चाहिये; और साथ-ही-साथ हम भविष्यमें परिणाम- स्वरूप मिलनेवाले सुख-दुःखोंकोभी एकही समान भोगनेके लिये तैयार रहना चाहिये। ऐसा करनेसे अमर्यादित तृष्णादि और असंतोषजनित दुष्परिणामोंसे तो हम बचेंगेही; परंतु दूसरा लाभ यह होगा, कि तृष्णा या असंतोषके साथ साथ कर्मकोभी त्याग देनेसे जीवनकेही नष्ट हो जानेका जो प्रसंग आ सकता है, वह भी नहीं आ सकेगा; और हमारी मनोवृत्तियाँ शुद्ध होकर प्राणिमात्रके लिये हितप्रद हो जायेंगी। इसमें संदेह नहीं, कि इस तरह फलाशा छोड़नेके लियेभी इंद्रियोंका और मनका वैराग्यसे पूरा दमन करना पड़ता है; परंतु स्मरण रहे, कि इंद्रियोंको वशमें करके स्वार्थके बदले वैराग्यसे तथा निष्काम- बुद्धिसे लोकसंग्रहके लिये उन्हें अपने अपने व्यापार करने देना कुछ और बात है; और संन्यास-मार्गानुसार तृष्णाको मारनेके लिये इंद्रियोंके सभी व्यापारोंको अर्थात् कर्मोंको आग्रहपूर्वक समूल नष्ट कर डालना बिलकुलही भिन्न बात है। इन दोनोंमें ज़मीन-आसमानका अंतर है। गीतामें जिस वैराग्यका और जिस इंद्रिय- निग्रहका उपदेश किया गया है, वह पहले प्रकारका है; दूसरे प्रकारका नहीं; और उसी तरह अनुगीता (मभा. अश्व. ३२. १७-२३) में जनक-ब्राह्मण-संवादमें राजा जनक ब्राह्मणरूपधारी धर्मसे कहते हैं कि :- शृणु बुद्धिं च यां ज्ञात्वा सर्वत्र विषयो मम । नाहमात्मार्थमिच्छामि गन्धान् घ्राणगतानपि ॥ . . . . . . . . . . नाहमात्मार्थमिच्छामि मनो नित्यं मनोन्तरे । मनो मे निर्जितं तस्मात् वशे तिष्ठति सर्वदा ॥

सुखदुःखविवेक ११५ अर्थात् "जिस (वैराग्य) बुद्धिको मनमें धारण करके मैं सब विषयोंका सेवन करता हूँ, उसका हाल सुनो। नाकसे मैं 'अपने लिये' वास नहीं लेता (आँखोंसे मैं 'अपने लिये' नहीं देखता, इत्यादि), और मनकाभी उपयोग मैं आत्माके लिये अर्थात् अपने लाभके लिये नहीं करता। अतएव मेरी नाक (आँख इत्यादि) और मन मेरे वशमें हैं, अर्थात् मैंने उन्हें जीत लिया है।" गीताके वचनकाभी (गीता ३. ६, ७) यही तात्पर्य है, कि जो मनुष्य केवल इंद्रियोंकी वृत्तियोंको तो रोक देता है, और मनसे विषयोंका चिंतन करता रहता है, वह पूरा ढोंगी है; और जो मनुष्य मनोनिग्रहपूर्वक काम्य-बुद्धिको जीत कर, सब मनोवृत्तियोंको लोकसंग्रहके लिये अपना अपना काम करने देता है, वही श्रेष्ठ है। बाह्य जगत् या इंद्रियोंके व्यापार हमारे उत्पन्न किये हुए नहीं हैं, वे स्वभावसिद्ध हैं। हम देखते हैं, जब कोई संन्यासी बहुत भूखा होता है तब उसको चाहे वह कितनाही निग्रही हो - भीख माँगनेके लिये कहीं बाहर जानाही पड़ता है (गीता ३. ३३); या बहुत देरतक एक जगह बैठे रहनेसे ऊबकर वह उठ खड़ा हो जाता है। तात्पर्य यह है, कि निग्रह चाहे जितना हो; परंतु इंद्रियोंके जो स्वभावसिद्ध व्यापार हैं, वे कभी नहीं छूटते। और यदि यह बात सच है, तो इंद्रियोंकी वृत्तियों तथा सब कर्मोंको और सब प्रकारकी इच्छाओं या असंतोषको नष्ट करनेके दुराग्रहमें न पड़ना (गीता २. ४७; १८. ५९), एवं मनोनिग्रहपूर्वक फलाशा छोड़ कर सुख-दुःखोंको एक बराबर समझना (गीता २. १८), तथा निष्काम-बुद्धिसे लोकहितके लिये कर्मोंका शास्त्रोक्त रीतिसे करते रहनाही, श्रेष्ठ तथा आदर्श मार्ग है। इसीलिये - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ इस श्लोकमें (गीता २. ४७) श्रीभगवान् अर्जुनको पहले यह बतलाते हैं, कि तू इस कर्मभूमिमें पैदा हुआ है, इसलिये "तुझे कर्म करनेकाही अधिकार है"; परंतु इस बातकोभी ध्यानमें रख, कि तेरा यह अधिकार केवल (कर्तव्य) कर्म करने- तकही सीमित है। इस 'एव' पदका अर्थ है 'केवल'; जिससे यह सहज विदित होता है, कि मनुष्यका अधिकार कर्मके सिवा अन्य बातोंमें - अर्थात् कर्मफलके विषयमें नहीं है। यह महत्त्वपूर्ण बात केवल अनुमानपरही अवलंबित नहीं रख दी है; क्योंकि दूसरे चरणमें भगवान्‌ने स्पष्ट शब्दोंमें पुनः कह दिया है, कि "तेरा अधिकार कर्मफलके विषयमें कुछभी नहीं है।" अर्थात् किसी कर्मका फल मिलना - न मिलना तेरे अधिकारकी बात नहीं है। वह सृष्टिके कर्मविपाकपर या ईश्वरपर अवलंबित है। फिर जिस बातमें हमारा अधिकारही नहीं है उसके विषयमें आशा - करना कि वह अमुक प्रकार हो - केवल मूर्खताका लक्षण है; परंतु यह तीसरी बातभी अनुमानपर अवलंबित नहीं है। तीसरे चरणमें कहा गया है, कि "इसलिये तू कर्म-

११६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र फलकी लालचसे किसीभी कामको मत कर।" क्योंकि, कर्मविपाकके अनुसार तेरे कर्मोंका जो फल प्राप्त होगा वह अवश्य होगाही। तेरी इच्छासे उसमें कुछ न्यूना- धिकता नहीं हो सकती; और उसके देरीसे या जल्दीसे मिल जानेकी संभावना नहीं है। परंतु तेरे लालचीपनसे तो तुझे केवल व्यर्थ दुःखही मिलेगा। अब यहाँ कोई-विशेषतः संन्यासमार्गी पुरुष-प्रश्न करेंगे, कि कर्म करके फलाशा छोड़नेके झगड़ेमें पड़नेकी अपेक्षा कर्माचरणकोही छोड़ देना क्या अच्छा नहीं होगा? इस- लिये भगवान्‌ने अंतमें अपना निश्चित मतभी बतला दिया है, कि "कर्म न करनेका (अकर्मणि) तू हठ मत कर। तेरा जो अधिकार है उसके अनुसार-परंतु फलाशा छोड़कर-कर्म करता जा।" कर्मयोगकी दृष्टिसे ये सब सिद्धान्त इतने महत्त्वपूर्ण हैं, कि उक्त श्लोकके चारों चरणोंको यदि हम कर्मयोगशास्त्र या गीता-धर्मके चतुःसूत्री कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह मालूम हो गया, कि इस संसारमें सुख-दुःख हमेशा क्रमसे मिला करते हैं; और यहाँ सुख की अपेक्षा दुःखकी मात्रा अधिक है। ऐसी अवस्थामेंभी जब यह सिद्धान्त बतलाया जाता है, कि सांसारिक कर्मोंको छोड़ नहीं देना चाहिये; तब कुछ लोगोंकी यह समझ हो सकती है, कि दुःखकी आत्यंतिक निवृत्ति करने और अत्यंत सुख प्राप्त करनेके सब मानवी प्रयत्न व्यर्थ हैं। और केवल आधिभौतिक अर्थात् इंद्रियगम्य बाह्य विषयोपभोगरूपी सुखोंकोही देखें, तो यह नहीं कहा जा सकता, कि उनकी यह समझ ठीक नहीं है। यह सच है, कि यदि कोई बालक पूर्णचंद्रको पकड़नेके लिये हाथ फैला दे, तो जैसे आकाशका चंद्रमा उसके हाथमें कभी नहीं आता; उसी तरह आत्यंतिक सुखकी आशा रखकर केवल आधिभौतिक सुखके पीछे लगे रहनेसे आत्यंतिक सुखकी प्राप्ति कभी नहीं होगी। परंतु स्मरण रहे, कि आधिभौतिक सुखही समस्त प्रकारके सुखोंका भांडार नहीं है। इसलिये उपर्युक्त कठिनाईमेंभी आत्यंतिक और नित्य सुखप्राप्तिका मार्ग ढूंढ़ लिया जा सकता है। यह ऊपर बतलाया जा चुका है, कि सुखोंके दो भेद हैं-एक शारीरिक और दूसरा मानसिक और शरीर अथवा इंद्रियोंके व्यापारोंकी अपेक्षा मनको अंतमें अधिक महत्त्व देना पड़ता है। ज्ञानी पुरुष जो यह सिद्धान्त बतलाते हैं, कि शारीरिक (अर्थात् आधिभौतिक) सुखकी अपेक्षा मानसिक सुखकी योग्यता अधिक है, उसे वे कुछ अपने ज्ञानके घमंडसे नहीं बतलाते। प्रसिद्ध आधिभौतिकवादी मिलनेभी अपने उपयुक्तता- वादविषयक ग्रंथमें साफ़ मंजूर किया है,* कि उस सिद्धान्तमेंही श्रेष्ठ मनुष्य-

  • "It is better to be a human being dissatisfied than a pig satis- fied, better to be Socrates dissatisfied than a fool satisfied. And if the fool, or the pig, is of a different opininon, it is because they only know their own side of the question." Utilitarianism; p. 14 (Longmans 1907).

सुखदुःखविवेक ११७ जन्मकी सच्ची सार्थकता और महत्ता है। कुत्ते, शूकर और बैल इत्यादिकोभी इंद्रियसुखका आनंद मनुष्योंके समानही होता है; और मनुष्यकी यदि यह समझ होती, कि संसारमें सच्चा सुख विषयोपभोगही है; तो मनुष्य पशु बननेपरभी राजी हो गया होता। परंतु पशुओंके सब विषय-सुखोंके नित्य मिलनेका अवसर आने- परभी कोई मनुष्य पशु होनेको राजी नहीं होता। इससे यही विदित होता है, कि पशुकी अपेक्षा मनुष्यमें कुछ-न-कुछ विशेषता अवश्य है। इस विशेषताको समझनेके लिये, उस आत्माके स्वरूपका विचार करना पड़ता है, जिसे मन और बुद्धिद्वारा स्वयं अपना और बाह्यसृष्टिका ज्ञान होता है; और, ज्योंही यह विचार किया जायगा त्योंही स्पष्ट मालूम हो जायगा, कि पशु और मनुष्यके लिये विषयोपभोगसुख तो एकही-सा है; परंतु उसकी अपेक्षा मन और बुद्धिके अत्यंत उदात्त व्यापारमें तथा शुद्धावस्थामें जो सुख है, वही मनुष्यका श्रेष्ठ और आत्यंतिक सुख है। यह सुख आत्मवश है, इसकी प्राप्ति किसी वाह्यवस्तुपर अवलंबित नहीं है और इसकी प्राप्तिके लिये दूसरोंके सुखको न्यून करनेकीभी कुछ आवश्यकता नहीं है। यह सुख अपनेही प्रयत्नसे हमीको मिलता है। और ज्यों ज्यों हमारी उन्नति होती जाती है, त्यों त्यों इस सुखका स्वरूपभी अधिकाधिक शुद्ध और निर्मल होता चला जाता है। भर्तृहरिने सच कहा है, कि "मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः" - मनके प्रसन्न होनेपर क्या दरिद्रता और क्या अमीरी, दोनों समानही हैं। प्लेटो नामक प्रसिद्ध यूनानी तत्त्ववेत्तानेभी यह प्रतिपादन किया है, कि शारीरिक (अर्थात् वाह्य या आधिभौतिक) सुखकी अपेक्षा मनका सुख श्रेष्ठ है, और मनके सुखसेभी बुद्धिग्राह्य (अर्थात् परम आध्यात्मिक) सुख अत्यंत श्रेष्ठ है।* इसलिये यदि हम अभी मोक्षके विचारको छोड़ दें, तोभी यही सिद्ध होता है, कि जो बुद्धि आत्म- विचारमें निमग्न हो, उसीही परम सुख मिल सकता है। इसी कारण भगवद्गीतामें सुखके - सात्त्विक, राजस और तामस तीन भेद किये गये हैं और इनका लक्षणभी बतलाया गया है। यथा-आत्मनिष्ठ बुद्धि (अर्थात् सब भूतोंमें एकही आत्माको जानकर, आत्माके उसी सच्चे स्वरूपमें रत होनेवाली बुद्धि) की प्रसन्नतासे जो आध्यात्मिक सुख प्राप्त होता है, वही श्रेष्ठ और सात्त्विक सुख है - "तन्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तं आत्मबुद्धिप्रसादजम्" (गीता १८. ३७); जो आधिभौतिक सुख इंद्रियोंसे और इंद्रियोंके विषयोंसे होता है, वह सात्त्विक सुखसे कम दर्जेका होता है, और राजस कहलाता है (गीता १८. ३८)। और जिस सुखसे चित्तको मोह होता है, तथा जो सुख, निद्रा या आलस्यसे उत्पन्न होता है, उसकी योग्यता तामस अर्थात् अत्यन्त कनिष्ठ श्रेणीकी है। इस प्रकरणके आरंभमें गीताका जो श्लोक दिया है, उसका यही तात्पर्य है। और गीता (गीता ६. २२) में यहभी कहा है, कि इस * Republic Book IX.

११८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परम सुखका अनुभव मनुष्यको यदि एक बारभी हो जाता है, तो फिर कितनेही भारी दुःखके जबरदस्त धक्के क्यों न लगते रहें, उसकी यह सुखमय स्थिति कभी नहीं डिगने पाती। यह आत्यंतिक सुख स्वर्गकेभी विषयोपभोगसुखमें नहीं मिल सकता और इसे पानेके लिये पहले अपनी बुद्धि प्रसन्न होनी चाहिये। जो मनुष्य बुद्धिको प्रसन्न रखनेकी युक्तिको बिना सोचे-समझे केवल विषयोपभोगमेंही निमग्न हो जाता है, उसका सुख अनित्य और क्षणिक होता है। इसका कारण यह है, कि जो इंद्रियसुख आज है, वह कल नहीं रहता। इतनाही नहीं; किंतु जो बात हमारी इंद्रियोंको आज सुखकारक प्रतीत होती है, वही किसी कारणसे दूसरे दिन दुःखमय हो जाती है। उदाहरणार्थ, ग्रीष्म ऋतुमें जो ठंडा पानी हमें अच्छा लगता है, वही शीतकालमें अप्रिय हो जाता है। अस्तु, इतना करनेपरभी उसमे सुखेच्छाकी पूर्ण तृप्ति होनेही नहीं पाती। इसलिये, सुखका व्यापक अर्थ लेकर यदि हम उस शब्दका उपयोग सभी प्रकारके सुखोंके लिये करें, तोभी हमें सुख-सुखमें भेद करनाही पड़ेगा। नित्य व्यवहारमें सुखका अर्थ मुख्यतः इंद्रियसुखही होता है। परंतु जो इंद्रियातीत है, अर्थात् जो केवल आत्मनिष्ठ बुद्धिकोही ज्ञात हो सकता है, उसमें और विषयोप- भोगरूपी सुखमें जब भिन्नता प्रकट करनी हो, तब आत्मबुद्धि-प्रसादसे उत्पन्न होनेवाले सुखको - अर्थात् आध्यात्मिक सुखको - श्रेय, कल्याण, हित, आनंद अथवा शांति कहते हैं, और विषयोपभोगमे होनेवाले आधिभौतिक सुखको केवल सुख या प्रेय कहते हैं। पिछले प्रकरणके अंतमें दिये हुए कठोपनिषदके वाक्यमें, प्रेय और श्रेयमे नचिकेताने जो भेद बतलाया है उसकाभी अभिप्राय यही है। मृत्युने उसे अग्निका रहस्य पहलेही बतला दिया था। परंतु इस सुखके मिलनेपरभी जब उसने आत्मज्ञान-प्राप्तिका वर माँगा, तब मृत्युने उसके बदलेमें उसे अनेक सांसारिक सुखोंका लालच दिखलाया। परंतु नचिकेता इन अनित्य, आधिभौतिक सुखोंको कल्याणकारक नहीं समझता था। क्योंकि ये (प्रेय) सुख बाहरी दृष्टिमे अच्छे हैं, पर आत्माके श्रेयके लिये अच्छे नहीं। इसीलिये उसने उन सुखोंकी ओर ध्यान नहीं दिया। किंतु उस आत्मविद्याकी प्राप्तिके लियेही हठ किया; जिसका परिणाम आत्माके लिये श्रेयस्कर या कल्याणकारक है, और उसे अंतमें पाकरही छोड़ा। सारांश यह है, कि आत्मबुद्धि-प्रसादसे उत्पन्न होनेवाले केवल बुद्धिगम्य सुखको - अर्थात् आध्यात्मिक सुखकोही - हमारे शास्त्रकार श्रेष्ठ सुख मानते हैं। और उनका कथन है, कि यह नित्य सुख आत्मवश है, इसलिये सभीको प्राप्त हो सकता है; तथा सब लोगोंको चाहिये, कि वे इसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करें। पशु-धर्ममे प्राप्त सुखमें, और मानवी सुखमें जो कुछ विशेषता या विलक्षणता है, वह यही है; और यह आत्मानंद केवल बाह्य उपाधियोंपर कभी निर्भर न होनेके कारण सब सुखोंमें नित्य, स्वतंत्र और श्रेष्ठ है। इसीको गीतामें निर्वाण, अर्थात् परम शांति कहा है (गीता ६. १५), और यही स्थितप्रज्ञोंकी

सुखदुःखविवेक ११९ ब्राह्मी अवस्थाकी परमावधिका मुख है (गीता २. ७१; ६. २८; १२. १२; १८. ६२) । अब इस बातका निर्णय हो चुका, कि आत्माकी शांति या सुखही अत्यंत श्रेष्ठ है; और वह आत्मवश होनेके कारण सब लोगोंको प्राप्यभी है। परंतु यह प्रकट है, कि यद्यपि सब धातुओंमें सोना अधिक मूल्यवान् है, तथापि केवल सोनेसेही

  • लोहा इत्यादि अन्य धातुओंके बिना - जैसे संसारकाम नहीं चल सकता, अथवा जैसे केवल शक्करसेही - विना नमकके - काम नहीं चल सकता, उसी तरह आत्म- सुख या शांतिकोभी समझना चाहिये। इसमें संदेह नहीं, कि इस शांतिके साथ - शरीर-धारणके लिये सही - कुछ सांसारिक वस्तुओंकी आवश्यकता होती है; और इसी अभिप्रायसे आशीर्वादके संकल्पमें केवल 'शांतिरस्तु' न कह कर " शांतिः पुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु" - अर्थात् शांतिके साथ पुष्टि और तुष्टिभी चाहिये - कहनेकी रीति है। यदि शास्त्रकारोंकी यह समझ होती, कि केवल शांतिसे ही तुष्टि हो सकती है, तो इस संकल्पमें 'पुष्टि' शब्दको व्यर्थ घुसेड़ देनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी। इसका यह मतलब नहीं है, कि पुष्टि - अर्थात् ऐहिक सुखोंकी वृद्धिके लिये रात- दिन लालच करते रहो। उक्त संकल्पका भावार्थ यही है, कि तुम्हें शांति, पुष्टि और तुष्टि (संतोष), तीनों उचित परिमाणमें मिलें; और इनकी प्राप्तिके लिये तुम्हें यत्नभी करना चाहिये। कठोपनिषद्‌काभी यही तात्पर्य है। नचिकेता जब मृत्युके अर्थात् यमके लोकमें गया तब यमने उससे कहा, कि तुम कोईभी तीन वर माँग लो; और उससे माँगेपर दे दिये, इतनीही कथा इस उपनिषदमें विस्तारसे दी गयी है; पर उस समय नचिकेताने एकदम यह वर नहीं माँगा, कि मुझे ब्रह्मज्ञानका उपदेश करो। किंतु उसने कहा, कि "मेरे पिता मुझपर क्रुद्ध हैं, इसलिये प्रथम वर आप मुझे यही दीजिये, कि वे मुझपर प्रसन्न हो जावें।" अनंतर उसने दूसरा वर माँगा कि "अग्निके - अर्थात् ऐहिक समृद्धि प्राप्त करा देनेवाले यज्ञ आदि कर्मोंके - ज्ञानका उपदेश करो।" इन दोनों वरोंको प्राप्त करके अंतमें उसने तीसरा वर यह माँगा, कि "मुझे आत्मविद्याका उपदेश करो।" परंतु जब यमराज कहने लगे, कि इस तीसरे वरके बदलेमें तुझे औरभी अधिक संपत्ति देता हूँ; तब - अर्थात् प्रेय (सुख) की प्राप्तिके लिये आवश्यक यज्ञ आदि कर्मोंका ज्ञान प्राप्त हो जाने- पर उसीकी अधिक आशा न करके - नचिकेताने इस बातका आग्रह किया, कि "अब मुझे श्रेय (आत्यंतिक सुख) की प्राप्ति करा देनेवाले ब्रह्मज्ञानकाही उपदेश करो।" सारांश यह है, कि इस उपनिषद्‌के अंतिम मंत्रमें जो वर्णन है, उसके अनुसार 'ब्रह्मविद्या' और 'योगविधि' (अर्थात् यज्ञ-याग आदि कर्म), दोनोंको प्राप्त करके नचिकेता मुक्त हो गया है (कठ. ६. १८)। इससे ज्ञान और कर्म इन दोनोंका समुच्चयही इस उपनिषद्‌का तात्पर्य सिद्ध होता है। इसी विषयपर इंद्रकीभी एक कथा है। कौषीतकी उपनिषद्में कहा गया है, कि इंद्र तो स्वयं ब्रह्मज्ञानी थाही,

१२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और उसने प्रतर्दनकोभी ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया था। तथापि जब इंद्रका राज छिन लिया गया और प्रल्हादको त्रैलोक्यका आधिपत्य मिला, तब इंद्रने देवगुरु बृहस्पतिसे पूछा, कि "मुझे बतलाइये कि श्रेय किसमें है ?" तब बृहस्पतिने राज्यभ्रष्ट इंद्रको ब्रह्मविद्या अर्थात् आत्मज्ञानका उपदेश करके कहा, कि "श्रेय इसीमें है" - एतावच्छ्रेय इति - परंतु इससे इंद्रका समाधान नहीं हुआ। उसने फिर प्रश्न किया, "क्या औरभी कुछ अधिक है ?" - को विशेषो भवेत् ? - तब बृहस्पतिने उसे शुक्राचार्यके पास भेजा। वहाँभी वही हाल हुआ; और शुक्राचार्यने कहा, कि "प्रल्हादको वह विशेषता मालूम है।" तब अंतमें इंद्र ब्राह्मणका रूप धारण करके प्रल्हादका शिष्य बनकर सेवा करने लगा। एक दिन प्रल्हादने उससे कहा, कि शील (सत्य तथा धर्मसे चलने का स्वभाव) ही त्रैलोक्यका राज्य पाने का रहस्य है और वही श्रेय है। अनंतर, जब प्रल्हादने कहा, कि "मैं तेरी सेवासे प्रसन्न हूँ, तू चाहे जो वर माँग," तब ब्राह्मण-वेशधारी इंद्रने यही वर माँगा, कि "आप अपना शील मुझे दीजिये।" प्रल्हादके 'तस्थातु' कहतेही उसके 'शील'के साथ धर्म, सत्य, वृत्त, श्री अथवा ऐश्वर्य आदि सब देवता उसके शरीरसे निकल कर इंद्र-शरीरमें प्रविष्ट हो गये। फलतः इंद्र अपना राज्य पा गया। यह प्राचीन कथा भीष्मने युधिष्ठिरसे महाभारतके शांतिपर्व (महा. शां. १२४) में कही है। इस सुंदर कथासे हमें यह बात साफ़ मालूम हो जाती है, कि केवल ऐश्वर्यकी अपेक्षा केवल आत्मज्ञानकी योग्यता भले ही अधिक हो, परंतु जिस इस संसारमें रहना है, उसको अन्य लोगोंके समानही अपने लिये तथा अपने देशके लिये, ऐहिक समृद्धि प्राप्त कर लेनेकी आवश्यकता और नैतिक हक भी है। इसलिये जब यह प्रश्न उठे, कि इस संसारमें मनुष्यका सर्वोत्तम ध्येय या परम उद्देश्य क्या है, तो हमारे कर्मयोगशास्त्रमें अंतिम उत्तर यही मिलता है, कि शांति और पुष्टि, प्रेय और श्रेय अथवा ज्ञान और ऐश्वर्य दोनोंको एक साथ प्राप्त करो। सोचनेकी बात है, कि जिन भगवान्‌से बढ़कर संसारमें और कोई श्रेष्ठ नहीं और जिनके दिखलाये हुए मार्गपर अन्य सभी लोग चलते हैं (गीता ३ : २३); उस भगवान्‌ने क्या ऐश्वर्य और संपत्तिका छोड़ दिया है ? ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥ अर्थात् "समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, संपत्ति, ज्ञान और वैराग्य इन छः बातोंको 'भग' कहते हैं"। भग शब्दकी ऐसी व्याख्या पुराणोंमें है (विष्णु. ६. ५. ७४)। कुछ लोग इस श्लोकके 'ऐश्वर्य' शब्दका अर्थ 'योगैश्वर्य' किया करते हैं। क्योंकि 'श्री' अर्थात् संपत्तिसूचक शब्द आगे आया है। परंतु व्यवहारमें ऐश्वर्य शब्दमें सत्ता, यश और संपत्तिका, तथा ज्ञानमें वैराग्य और धर्मका समावेश हुआ करता है। इससे हम बिना किसी बाधाके कह सकते हैं, कि लौकिक दृष्टिसे उक्त श्लोकका

सुखदुःखविवेक १२१ सब अर्थ, ज्ञान और ऐश्वर्य इन्हीं दो शब्दोंसे शक्य हो जाता है। और जब कि स्वयं भगवाननेही ज्ञान और ऐश्वर्यको अंगीकार किया है, तब हमेंभी उस बातको प्रमाण समझकर स्वीकार करना चाहिये (गीता. ३. २१; मभा. शां. ३४१. २५) । कर्मयोगमार्गका सिद्धान्त यह कदापि नही, कि कोरा आत्मज्ञानही इस संसारमें परम साध्य वस्तु है। यह तो संन्यासमार्गका सिद्धान्त है; जो कहता है, कि संसार दुःखमय है; इसलिये उसको एकदम छोड़ही देना चाहिये । भिन्न भिन्न मार्गोंके इन सिद्धान्तोंको एकत्र करके गीताके अर्थका अनर्थ करना उचित नहीं है । स्मरण रहे गीताहीका कथन है, कि ज्ञानके बिना केवल ऐश्वर्य, सिवा आसुरी संपत्के और कुछ नहीं है। इसलिये यही सिद्ध होता है, कि ऐश्वर्यके साथ ज्ञान, और ज्ञानके साथ ऐश्वर्य, अथवा शांतिके साथ पुष्टि, हमेशा होनी चाहिये । ऐसा कहनेपर, कि ज्ञानके साथ ऐश्वर्य होना अत्यावश्यक है; कर्म करनेकी आवश्यकता आप-ही-आप उत्पन्न होती है। क्योंकि मनुका कथन है "कर्माण्यारभमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते " (मनु. ९. ३०० ) - कर्म करनेवाले पुरुषकोही इस जगतमें श्री अथवा ऐश्वर्य मिलता है. और प्रत्यक्ष अनुभवसेभी यही बात सिद्ध होती है; एवं गीतामें जो उपदेश अर्जुनको दिया गया है, वहभी ऐसाही है ( गीता ३.८) । इसपर कुछ लोगोंका कहना ' , कि मोक्षकी दृष्टिसे कर्मकी आवश्यकता न होनेके कारण अंतमें - अर्थात् ज्ञानोत्तर अवस्था में - सब कर्मोंको छोड़ देनाही चाहिये । परंतु यहाँ तो केवल सुख- दुःखका विचार करना है। और अबतक मोक्ष तथा कर्मके स्वरूपकी परीक्षाभी नहीं की गई है, इसलिए उक्त आक्षेपका उत्तर यहाँ नही दिया जा सकता। आगे चलकर नौवे तथा दसवें प्रकरणमें अध्यात्म और कर्मविपाकका स्पष्ट विवेचन करके ग्यारहवें प्रकरणमें बतला दिया जायगा, कि यह आक्षेपभी बेसिर-पैरका है। सुख और दुःख दो भिन्न तथा स्वतंत्र वेदनाएँ हैं। सुखेच्छा केवल सुखोप- भोगसेही तृप्त नहीं हो सकती । इसलिये संसारमें बहुधा दुःखकाही अधिक अनुभव होता है। परंतु इस दुःखको टालनेके लिये तृष्णा या असंतोष और साथ साथ सब कर्मोंकाभी समूल नाश करना उचित नहीं। उचित यही है, कि केवल फलाशा छोड़- कर सब कर्मोंको करते रहना चाहिये । केवल विषयोपभोग-सुख कभी पूर्ण न होनेवाला, अनित्य और पशुधर्म है। अतएव इस संसारमें बुद्धिमान मनुष्यका सच्चा ध्येय इस अनित्य पशुधर्मसे ऊंचे दर्जेका होना चाहिये । आत्मबुद्धि-प्रसादसे प्राप्त होनेवाला शांति-सुखही वह सच्चा ध्येय है; परंतु आध्यात्मिक सुखही यद्यपि इस प्रकार ऊंचे दर्जेका हो, तथापि उसके साथ इन सासारिक जीवनमे ऐहिक वस्तुओंकीभी उचित आवश्यकता है; और इसलिये सदा निष्काम-बुद्धिसे प्रयत्न अर्थात् कर्म करतेही रहना चाहिये । - इतनी सब बातें जब कर्मयोगशास्त्रके अनुसार सिद्ध हो चुकी, तो अब सुखकी दृष्टिसे विचार करनेपरभी यह बतलानेकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, कि आधिभौतिक सुखोंकोही परम साध्य मानकर कर्मोंके केवल सुख-

१२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र दुःखात्मक बाह्यपरिणामोंके तारतम्यसेही नीतिमत्ताका निर्णय करना अनुचित है । कारण यह है, कि जो वस्तु कभी पूर्णावस्थाको पहुँचही नहीं सकती, उसे परम साध्य मानना मानो 'परम' शब्दका दुरुपयोग करके मृगजलके स्थानमें जलकी खोज करना है । जब हमारा परम साध्यही अनित्य तथा अपूर्ण है, तब उसकी आशामें बैठे रहनेसे हमें अनित्य-वस्तुको छोड़कर और मिलेगाही क्या ? "धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये" इस वचनका मर्मभी यही है । "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" इस शब्दसमूहके 'सुख' शब्दके अर्थके विषयमें आधिभौतिकवादियोंमेंभी बहुत मतभेद है । उनमेंसे बहुतेरोंका कहना है, कि बहुधा मनुष्य सब विषय-सुखोंको लात मारकर केवल सत्य अथवा धर्मके लिये जान देनेको तैयार हो जाता है । इससे यह मानना अनुचित है, कि मनुष्यकी इच्छा सदैव आधिभौतिक सुख-प्राप्तिकीही रहती है । इसलिये उन पंडितोंने यह सूचना की है, कि सुखके बदलेमें हित अथवा कल्याण शब्दकी योजना करके "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" इस सूत्रका रूपांतर "अधिकांश लोगोंका अधिक हित या कल्याण" कर देना चाहिये, परंतु इतना करनेपरभी इस मतमें यह दोष बनाही रहता है, कि कर्ताकी बुद्धिका कुछभी विचार नहीं किया जाता । अच्छा, यदि यह कहें, कि विषय-सुखोंके साथ मानसिक सुखोंकाभी विचार करना चाहिये; तो उससे आधिभौतिक पक्षकी इस पहलीही प्रतिज्ञाका विरोध हो जाता है, कि किसीभी कर्मकी नीतिमत्ताका निर्णय केवल उसके बाह्य-परिणामोंसेही करना चाहिये; और तब अंशतः अध्यात्म-पक्षका स्वीकार करना पड़ता है, तो उसे अधूरा या अंशतः स्वीकार करनेमे क्या लाभ होगा ? इसीलिये हमारे कर्मयोग-शास्त्रमें यह अंतिम सिद्धान्त निश्चित किया गया है कि, सर्वभूतहित, अधिकांश लोगोंका अधिक सुख और मनुष्यत्वका परम उत्कर्ष इत्यादि नीतिनिर्णयके सब बाह्य साधनोंको अथवा आधिभौतिक मार्गको गौण या अप्रधान समझना चाहिये; और आत्मप्रसाद-रूपी आत्यंतिक सुख तथा उसीके साथ रहने- वाली कर्ताकी शुद्ध-बुद्धिकोही आध्यात्मिक कसौटी जान कर उसीसे कर्म-अकर्मकी परीक्षा करनी चाहिये । उन लोगोंकी बात छोड़ दो, जिन्होंने यह कसम खा ली हो, कि हम दृश्य सृष्टिके परे तत्त्वज्ञानमें प्रवेशही न करेंगे । जिन लोगोंने ऐसी कसम खाई नहीं है, उन्हें युक्तिसे यह मालूम हो जायगा, कि मन और बुद्धिकेभी परे जाकर नित्य आत्माके नित्य कल्याणकोही कर्मयोग-शास्त्रमें प्रधान मानना चाहिये । कई लोग भूलसे समझ बैठते हैं, कि जहाँ एक बार वेदान्तमें घुसे, कि बस, फिर सभी कुछ ब्रह्ममय हो जाता है; और वहाँ व्यवहारकी उपपत्तिका कुछ पताही नही चलता । आजकल जितने वेदान्तविषयक ग्रंथ पढ़े जाते हैं, वे प्रायः संन्यास- मार्गके अनुयायियोंकेही लिखे हुए हैं; और संन्यासमार्गवाले इस तृणारूपी संसारके सब व्यवहारोंको निःसार समझते हैं, इसलिये उनके ग्रंथोंमें कर्मयोगकी ठीक उपपत्ति सचमुच नहीं मिलती । अधिक क्या कहें; इन परसंप्रदाय-असहिष्णु ग्रंथ-

कारोंने संन्यासमार्गीय कोटिक्रम या युक्तिवादको कर्मयोगमें संमिलित करके ऐसाभी प्रयत्न किया है, जिससे लोग समझने लगें, कि कर्मयोग और संन्यास दो स्वतंत्र मार्ग नहीं हैं; किंतु संन्यासही अकेला शास्त्रोक्त मोक्षमार्ग है। परंतु यह ठीक नहीं है। संन्यास-मार्गके समान कर्मयोग-मार्गभी वैदिक धर्ममें अनादि कालसे स्वतंत्रता- पूर्वक चला आ रहा है, और इस मार्गके संचालकोंने वेदान्ततत्त्वोंको न छोड़ते हुए कर्मयोग शास्त्रकी ठीक ठीक उपपत्तिभी दिखलाई है। भगवद्गीता ग्रंथ इसी पंथका है। यदि गीताको छोड़ दें, तोभी जान पड़ेगा, कि अध्यात्म-दृष्टिसे कार्य अकार्य- शास्त्रका विवेचन करनेकी पद्धति ग्रीन सरीखे ग्रंथकार द्वारा इंग्लैंडमेंही शुरू कर दी गई है * और जर्मनीमें तो उससेभी पहले यह पद्धति प्रचलित थी। दृश्य सृष्टिका कितनाही विचार करें; परंतु जब तक यह बात ठीक मालूम नहीं हो जाती, कि इस सृष्टिको देखनेवाला और कर्म करनेवाला कौन है, तबतक तात्त्विक दृष्टिसे इस विषयकाभी विचार पूरा नहीं हो सकता, कि इस संसारमें मनुष्यका परम साध्य, श्रेष्ठ कर्तव्य या अंतिम ध्येय क्या है। इसीलिये याज्ञवल्क्यका यह उपदेश कि “ आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः । ” प्रस्तुत विषयमेंभी अक्षरशः उपयुक्त होता है। दृश्य जगतकी परीक्षा करनेसे यदि परोपकार सरीखे तत्त्वही अंतमें निष्पन्न होते हैं, तो उससे आत्मविद्याका महत्त्व कम तो होता नहीं उलटे उससे सब प्राणियोंमें एकही आत्माके होनेका एक और सबूत मिल जाता है। इस बातका तो कुछ उपायही नहीं है, कि आधिभौतिकवादी अपनीही बनाई हुई मर्यादासे स्वयं बाहर नहीं जा सकते। परंतु हमारे शास्त्रकारोंकी दृष्टि इस संकुचित मर्यादाके परे पहुँच गई है; और इसलिये उन्होंने आध्यात्मिक दृष्टिसेही कर्मयोगशास्त्रकी पूरी उपपत्ति दी है। इस उपपत्तिकी चर्चा करनेके पहले कर्म- अकर्म-परीक्षाके एक और पूर्वपक्षकाभी कुछ विचार कर लेना आवश्यक है। इसलिये अब उस पंथका विवेचन किया जायगा।

  • Prolegomena to Ethics, Book I; and Kant's Metaphysics of Morals (Trans. by Abbot in Kant's Theory of Ethics.)

छठा प्रकरण आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत् । * कर्म-अकर्मकी परीक्षा करनेका - आधिभौतिक मार्गके अतिरिक्त - दूसरा पंथ आधिदैवतवादियोंका है। इस पंथके लोगोंका यह कथन है, कि जब कोई मनुष्य कर्म-अकर्मका या कार्य-अकार्यका निर्णय करता है, तब वह इस झगड़ेमें नहीं पड़ता, कि किसका किस कर्मसे कितना सुख अथवा दुःख होगा; अथवा उनमेंसे सुखका जोड़ अधिक होगा या दुःखका। वह आत्म-अनात्म-विचारकी झंझटमेंभी नहीं पड़ता; और ये झगड़े बहुतेरोंकी तो समझमें नहीं आते। यहभी नहीं कहा जा सकता, कि प्रत्येक प्राणी प्रत्येक कर्मको केवल अपने सुखके लियेही करता है। आधिभौतिकवादी कुछभी उपपत्ति कहें; परंतु यदि इस बातका थोड़ासा विचार किया जाय, कि धर्म-अधर्मका निर्णय करते समय मनुष्यके मनकी स्थिति कैसी होती है, तो यह ध्यानमें आ जायगा, कि मनकी स्वाभाविक और उदात्त मनोवृत्तियां - करुणा, दया, परोपकार आदि - ही किसी कामको करनेके लिये मनुष्यको एकाएक प्रवृत्त किया करती हैं। उदाहरणार्थ, जब कोई भिखारी दीख पड़ता है; तब मनमें यह विचार आनेके पहलेही - कि उसे "दान करनेसे जगत्का अथवा अपने आत्माका कितना हित होगा" - मनुष्यके हृदयमें करुणावृत्ति जागृत हो जाती है; और वह अपनी शक्तिके अनुसार उस याचकको कुछ दान कर देता है। इसी प्रकार जब बालक रोता है, तब माता उसे दूध पिलाते समय इस बातका कुछभी विचार नहीं करती, कि बालकको पिलानेमें कितने लोगोंका इस बातका कितना हित होगा। अर्थात् ये उदात्त मनोवृत्तियांही कर्मयोगशास्त्रकी यथार्थ नींव हैं। हमें किसीने ये मनोवृत्तियां दी नहीं हैं; किंतु ये निसर्गसिद्ध अर्थात् स्वाभाविक अथवा स्वयंभू देवताही हैं। जब न्यायाधीश न्यायासनपर बैठता है, तब उसकी बुद्धिमें न्यायदेवताकी प्रेरणा हुआ करती है; और वह उसी प्रेरणाके अनुसार न्याय किया करता है। परंतु जब कोई न्यायाधीश इस प्रेरणाका अनादर करता है, तभी उससे अन्याय हुआ करते हैं। न्यायदेवताके सदृशही करुणा, दया, परोपकार, कृतज्ञता, कर्तव्यप्रेम, धैर्य आदि सद्गुणोंकी जो स्वाभाविक मनोवृत्तियां हैं, वेभी देवता हैं। प्रत्येक मनुष्य स्वभावतः इन देवताओंके शुद्ध स्वरूपोंसे परिचित

  • "वही बोलना चाहिये जो सत्यपूत अर्थात् सत्यसे शुद्ध किया गया है; और वही आचरण करना चाहिये जो मनको शुद्ध मालूम हो।"

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १२५ रहता है। परंतु यदि लोभ, द्वेष, मत्सर आदि कारणोंसे वह इन देवताओंकी परवाह न करे, तो उसे देवता क्या करें ? यह बात सच है, कि कई बार इन देवताओंमेंभी विरोध उत्पन्न हो जाता है, और तब कोई कार्य करते समय हमें संदेह हो जाता है कि किस देवताकी स्फूर्ति बलवती मानें ? तब इस संदेहका निर्णय करनेके लिये न्याय, करुणा आदि देवताओंके अतिरिक्त किसी दूसरेकी सलाह लेन। आवश्यक जान पड़ता है। परंतु ऐसे अवसरपर अध्यात्मविचार अथवा सुख-दुःखकी न्यूना- धिकताके झगड़ेमें न पड़कर यदि हम अपने मनोदेवताकी गवाही लें, तो वह एकदम इस बातका निर्णय कर देता है, कि इन दोनोंमेंसे कौन-सा मार्ग श्रेयस्कर है। यही कारण है, कि उक्त सब देवताओंमें मनोदेवता श्रेष्ठ है ! 'मनोदेवता' शब्दमें इच्छा, क्रोध, लोभ आदि सभी मनोविकारोंको शामिल नहीं करना चाहिये। किन्तु इस शब्दसे मनकी वह ईश्वरदत्त और स्वाभाविक शक्तिही अभीष्ट है, कि जिसकी सहायतासे केवल भले-बुरेका निर्णय किया जाता है। इसी शक्तिका एक बड़ा भारी नाम 'सदसद्विवेक-बुद्धि' * है और यदि किसी संदेहग्रस्त अवसरपर मनुष्य स्वस्थ अंतःकरणसे और शांतिके साथ विचार करे, तो यह सदसद्विवेक-बुद्धि कभी उसको धोखा नहीं देगी। इतनाही नहीं तो ऐसे अवसरोंपर हम दूसरोंसे यही कहा करते हैं, "कि तू अपने मनसे पूछ।" इस बड़े देवताके पास एक सूची हमेशा मौजूद रहती है। उसमें यह लिखा होता है, कि किस सद्गुणको किस समय कितना महत्त्व दिया जाना चाहिये। यह मनोदेवता समय समयपर इसी सूचीके अनुसार अपना निर्णय झट प्रकट किया करता है। मान लीजिये, किसी समय आत्मरक्षा और अहिंसामें विरोध उत्पन्न हुआ; और यह शंका उपस्थित हुई, कि दुर्भिक्षके समय अभक्ष्य भक्षण करना चाहिये या नहीं ? तब इस संशयको दूर करनेके लिये यदि हम शांत चित्तसे इस मनोदेवताकी मिन्नत करें, तो झट उसका यही निर्णय प्रकट होगा, कि "अभक्ष्य भक्षण करो।" इसी प्रकार यदि कभी स्वार्थ और परार्थ अथवा परोपकारके बीच विरोध उत्पन्न हो जाय, तो उसका निर्णयभी इस मनोदेवताको मनाकर करना चाहिये। मनोदेवताके घरकी - धर्म-अधर्मके न्यूनाधिक भावकी - यह सूची एक ग्रंथकारको शांतिपूर्वक विचार करनेसे उपलब्ध हुई है, जिसे उसने अपने ग्रंथमें प्रकाशित किया है।† इस सूचीमें नम्रतायुक्त पूज्यभावको पहला अर्थात् अत्युच्च स्थान दिया गया है; और उसके बाद करुणा, कृतज्ञता, उदारता,

  • इस सदसद्विवेक-बुद्धिको अंग्रेजी में Conscience कहते हैं और आधि- दैवतपक्ष Intuitionist School कहलाता है। † इस ग्रंथकारका नाम James Martineau (जेम्स मार्टिनो) हैं। इसने यह सूची अपने Types of Ethical Theory (Vol. II, p. 266. 3rd Ed). नामक ग्रंथमें दी है। मार्टिनो अपने पंथको Idio-psychological कहता है। परंतु हम उसे आधिदैवत पक्षहीमें शामिल करते हैं।

१२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वात्सल्य आदि भावोंको क्रमशः नीचेकी श्रेणियोंमें शामिल किया है। इस ग्रंथकारका मत है, कि जब ऊपर और नीचेकी श्रेणियोंके सद्गुणोंमें विरोध उत्पन्न हो, तब ऊपरकी श्रेणीके देवताकोही अधिक मान देना चाहिये । उसके मतके अनुसार कार्य-अकार्यका अथवा धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये इसकी अपेक्षा और कोई उचित मार्ग नहीं है। इसका कारण यह है, कि यद्यपि हम अत्यंत दूरदृष्टिसे यह निश्चित कर लें, कि “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख” किसमें है, तथापि सारासार बुद्धिमें यह कहनेकी सत्ता या अधिकार नहीं है, कि “जिसमें अधिकांश लोगोंका हित हो वही तू कर ।” इसलिये अंतमें इस प्रश्नका निर्णयही नहीं होता, कि “जिसमें अधिकांश लोगोंका हित है, वह बात मैं क्यों करूँ ?” और सारा झगड़ा ज्यों-का त्यों बना रहता है। राजासे बिना अधिकार प्राप्त किये ही जब कोई न्याया- धीश न्याय करता है, तब उसके निर्णयकी जो दशा होती है, ठीक वही दशा उस कार्य-अकार्यके निर्णयकीभी होती है, जो दूरदृष्टिपूर्वक सुखदुःखोंका विचार करके किया जाता है। केवल दूरदृष्टि यह बात किसीसे नहीं कह सकती, कि “तू यह कर, तुझे यह करनाही चाहिये ।” इसका कारण यही है, कि दूरदृष्टिभी हो तोभी वह मनुष्यकृतही है; और इसी कारणसे वह अपना प्रभाव मनुष्योंपर नहीं जमा सकती । ऐसे समयपर आज्ञा करनेवाला हमसे श्रेष्ठ कोई अधिकारी अवश्य होना चाहिये । और यह काम ईश्वरदत्त सदसद्विवेकदेवताही कर सकता है। क्योंकि वह मनुष्यकी अपेक्षा श्रेष्ठ है अतएव मनुष्यपर अपना अधिकार जमानेमें समर्थ है। यह सद- सद्विवेकबुद्धि या ‘देवता’ स्वयंभू है। इसी कारण व्यवहारमें यह कहनेकी रीत है, कि मेरा ‘मनोदेवता’ अमुक प्रकारकी गवाही नहीं देता। जब कोई मनुष्य एक- आध बुरा काम कर बैठता है, तब पश्चात्तापसे वह स्वयं लज्जित हो जाता है: या उसका मन उसे हमेशा टोकता रहता है। यहभी उपर्युक्त देवताके शासनकाही फल है। इस बातसे उक्त स्वतंत्र मनोदेवताका अस्तित्व सिद्ध हो जाता है। कारण कि आधिदैवत पंथके मतानुसार यदि उपर्युक्त सिद्धान्त न माना जाय, तो इस प्रश्नकी उपपत्ति नहीं हो सकती, कि हमारा मन हमें क्यों टोका करता है। ऊपर दिया हुआ वृत्तान्त पश्चिमी आधिदैवत पंथके मतका है। पश्चिमी देशोंमें इस पंथका प्रचार विशेषतः ईसाई धर्मोपदेशकोंने किया है। उनके मतके अनुसार धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये केवल आधिभौतिक साधनोंकी अपेक्षा यह ईश्वरदत्त साधन सुलभ, श्रेष्ठ एवं ग्राह्य है। यद्यपि हमारे देशमें प्राचीन कालमें कर्मयोगशास्त्रका ऐसा कोई स्वतंत्र पंथ नहीं था, तथापि उपर्युक्त मत हमारे प्राचीन ग्रंथोंमें कई जगह पाया जाता है। महाभारतमें अनेक स्थानोंपर मनकी भिन्न भिन्न वृत्तियोंको देवताओंका स्वरूप दिया गया है। पिछले प्रकरणमें यह बतलायाभी गया है, कि धर्म, सत्य, वृत्त, शील, श्री आदि देवताओंने प्रल्हादके शरीरको छोड़ कर इंद्रके शरीरमें कैसे प्रवेश किया। कार्य-अकार्यका अथवा

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १२७ धर्म-अधर्मका निर्णय करनेवाले देवताका नामभी 'धर्म'ही है। ऐसे वर्णन पाये जाते हैं, कि शिबि राजाके सत्त्वकी परीक्षा करनेके लिये श्येनका रूप धर कर, और युधिष्ठिरकी परीक्षा लेनेके लिये यक्षरूपसे तथा दूसरी बार कुत्ता बन कर 'धर्म'देवता प्रकट हुए थे। स्वयं भगवद्गीता (गीता १०. ३४) मेंभी कीर्ति, धी, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा ये सब देवता माने गये हैं। इनमेंसे स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मनके धर्म हैं। मनभी एक देवता है; और परब्रह्मका प्रतीक मान कर उपनिषदोंमें उसकी उपासनाभी बतलाई गई है (तै. ३. ४; छां. ३. १८) । जब मनुजी कहते हैं, कि " मनःपूतं समाचरेत् " (६. ४६) - मनको जो पवित्र मालूम हो, वही करना चाहिये - तब यही बोध होता है, कि उन्हें 'मन' शब्दसे मनोदेवताही अभिप्रेत है। साधारण व्यवहारमें हम यही कहा करते हैं, कि जो मनोदेवताको अच्छा मालूम हो, वही करना चाहिये । मनुजीने मनुसंहिताके चौथे अध्याय (४. १६१) में यह बात विशेष स्पष्ट कर दी है कि :- यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात् परितोषोऽन्तरात्मनः । यत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत् ॥ "वह कर्म प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये, जिसके करनेसे हमारा अंतरात्मा संतुष्ट हो और जो कर्म इसके विपरीत हो, उसे छोड़ देना चाहिये।" इसी प्रकार चातुर्वर्ण्य- धर्म आदि व्यावहारिक नीतिके मूलतत्त्वोंका उल्लेख करते समय मनु, याज्ञवल्क्य आदि स्मृति-ग्रंथकारभी यही कहते हैं :- वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ "वेद, स्मृति, शिष्टाचार और अपने आत्माको प्रिय मालूम होना धर्मके ये चार मूलतत्त्व हैं" (मनु. २. १२) । "अपने आत्माको जो प्रिय मालूम हो " - इसका अर्थ यही है कि मनको जो शुद्ध मालूम हो। इससे स्पष्ट होता है, कि श्रुति, स्मृति और सदाचारसे यदि किसी कार्यकी धर्मता या अधर्मताका निर्णय नहीं हो सकता था, तब निर्णय करनेका चौथा साधन 'मनःपूतता' समझी जाती थी। पिछले प्रकरणमें कही गई प्रल्हाद और इंद्रकी कथा बतला चुकनेपर 'शील'के लक्षणके विषयमें, धृतराष्ट्रने महाभारतमें यह कहा है :- यदन्येषां हितं न स्यात् आत्मनः कर्म पौरुषम् । अपत्रपेत वायेन न तत्कुर्यात् कथंचन ॥ अर्थात् " हमारे जिस कर्मसे लोगोंका हित नहीं हो सकता अथवा जिसके करनेसे स्वयं अपनेहीको लज्जा मालूम होती है, वह कभी नहीं करना चाहिये (मभा. शां. १२४. ६६) । इससे पाठकोंके ध्यानमें यह बात आ जायगी, कि " लोगोंका हित हो नहीं सकता"; "और लज्जा मालूम होती है" इन दो पदोंसे "अधिकांश