भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

सिद्धावस्था और व्यवहार ३७७ वस्थामें कितनीही क्यो न पहुँच गई हो, तोभी उसे ऐसे लोगोंके साथ बर्ताव करना है, जो काम-क्रोध आदिके चक्करमें पड़े हुए हैं; और जिनकी बुद्धि अशुद्ध है। अतएव इन लोगोंके साथ व्यवहार करते समय यदि वह अहिंसा, दया, शांति और क्षमा आदि नित्य एवं परमावधिके सद्गुणोंकोही सब प्रकारसे सर्वदा स्वीकार करें, तो उसका निर्वाह न होगा !* अर्थात् जहाँ सभी स्थितप्रज्ञ हैं, उस समाजकी उन्नत नीति या धर्म-अधर्मसे, उस समाजके धर्म-अधर्म कुछ कुछ भिन्न तो रहेंगेही - कि जिसमें लोभी पुरुषोंकीही भरमार अधिक होगी - वरना साधु पुरुषोंको यह जगत् छोड़ देना पड़ेगा; और सर्वत्र दुष्टोंकाही बोलबाला हो जावेगा। इसका अर्थ यह नहीं है, कि साधु पुरुषको अपनी समता-बुद्धि छोड़ देनी चाहिये। फिरभी समता-समतामेंभी भेद है। गीतामें कहा है, कि "ब्राह्मणे गवि हस्तिनि" (गीता ५. १८) - ब्राह्मण, गाय और हाथीमें पंडितोंकी सम-बुद्धि होती है, इसलिये यदि कोई गायके लिये लाया हुआ चारा ब्राह्मणको और ब्राह्मणके लिये बनाई गई रसोई गायको खिलाने लगे, तो क्या उसे पंडित कहेंगे? संन्यास-मार्गवाले इस प्रश्नका महत्त्व भले न मानें; पर कर्मयोगशास्त्रकी बात ऐसी नहीं है। दूसरे प्रकरणके विवेचनसे पाठक यह जान गयेही होगें, कि कृतयुगी समाजके पूर्णावस्थावाले धर्म-अधर्मके स्वरूपपर ध्यान रखकर स्वार्थपरायण लोगोंके समाजमें स्थितप्रज्ञ यह निश्चय करके बर्ताव है, कि देशकालके अनुसार उसमें कौन कौन फ़र्क़ कर देने चाहिये। और कर्मयोगशास्त्रका यही तो विकट प्रश्न है। साधु पुरुष स्वार्थपरायण लोगोंपर नाराज नहीं होते अथवा उनकी लोभ-बुद्धि देखकर वे अपने मनकी समता डिगने नहीं देते; उलटे इन्हीं लोगोंके कल्याणके लियेही अपने उद्योग केवल कर्तव्य समझ कर वैराग्यसे जारी रखते हैं। इसी तत्त्वको मनमें रखकर श्रीसमर्थ रामदासस्वामीने दासबोधके पूर्वार्धमें पहले ब्रह्मज्ञान बतलाया है; और फिर ग्यारहवें दशकमें (दास. ११. १०; १२. ८-१०; १५. २) इसका वर्णन आरंभ किया है, कि स्थितप्रज्ञ या उत्तम

  • "In the second place, ideal conduct such as ethical theory is concerned with, is not possible for the ideal man in the midst of men otherwise constituted. An absolutely just or perfectly sympathetic person, could not live and act according to his nature in a tribe of cannibals. Among people who are treacherous and utterly without scruple, entire truthfulness and openness must bring ruin." 'Spencer's Data of Ethics, Chap XV, p. 280 स्पेन्सरने इसे Relative Ethics कहा है; और वह कहता है, कि On the evolution- hypothesis, the two ( Abosolute and Relative Ethics ) presuppose one another and only when they co-exist, can there exist that ideal conduct which Absolute Ethics has to formulate, and which Relative Ethics has to take as the standard by which to estimate divergencies from right, or degrees of wrong."

३७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पुरुष साधारण लोगोंको चतुर बनानेके लिये वैराग्यसे अर्थात् निःस्पृहतासे लोक- संग्रहके निमित्त उद्योग किस प्रकार किया करते हैं; और आगे अठारहवें दशकमें (दास. १८.२) कहा है, कि सभीको ज्ञानी पुरुष अर्थात् जानकारके ये गुण- कथा, बातचीत, युक्ति, दाव-पेंच, प्रसंग, साक्षेप, तर्क, चतुराई, राजनीति, सहन- शीलता, तीक्ष्णता, उदारता, अध्यात्मज्ञान, भक्ति, अलिप्तता, वैराग्य, धैर्य, उत्साह, कठोरता, निग्रह, समता और विवेक आदि-सिखने चाहिये। परंतु इस निःस्पृह साधुको लोभी मनुष्योंमेंही बर्तना है, इसलिये अंतमें (दास. १९.९.३०) श्रीसमर्थका यह उपदेश है, कि "लठ्ठका सामना लठ्ठेहीसे करा देना चाहिये। उजड्डके लिये उजड्डही चाहिये; और नटखटके सामने नटखटकीही आवश्यकता है।" तात्पर्य, यह निर्विवाद है, कि पूर्णावस्थासे व्यवहारमें उतरनेपर अत्युच्च श्रेणीके धर्म-अधर्ममें थोड़ा-बहुत अंतर कर देना पड़ता है। इसपर आधिभौतिकवादियोंकी शंका है, कि पूर्णावस्थाके समाजमे नीचे उतरनेपर अनेक बातोंके सार-असारका विचार करके परमावधिके नीति-धर्ममें यदि थोड़ा-बहुत फर्क करनाही पड़ता है, तो नीति-धर्मकी नित्यता कहाँ रह गई ? और भारतसावित्रीमें व्यासने जो यह 'धर्मो नित्यः' तत्त्व बतलाया है, उसकी क्या दशा होगी ? वे कहते हैं, कि अध्यात्म-दृष्टिसे सिद्ध होनेवाला धर्मका नित्यत्व केवल कल्पनाप्रसूत है और प्रत्येक समाजकी स्थितिके अनुसार उस समयमे "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख"-वाले तत्त्वसे जो नीतिधर्म प्राप्त होंगे, वेही चोखे नीति- नियम हैं। परंतु यह युक्तिवाद ठीक नहीं है। भूमितिशास्त्रके नियमानुसार यदि कोई बिना चौड़ाईके सरल रेखा अथवा सर्वांशमें निर्दोष गोलाकार न खींच सके, तो जिस प्रकार इतनेहीसे सरल रेखाकी अथवा शुद्ध गोलाकारकी शास्त्रीय व्याख्या गलत या निरर्थक नहीं हो जाती, उसी प्रकार सरल और शुद्ध नियमोंकी बात है। जबतक किसी बातके परमावधिके शुद्ध स्वरूपका निश्चय पहले न कर लिया जावे, तबतक व्यवहारमें दीख पड़नेवाली उस बातकी अनेक सूरतोंमें सुधार करना अथवा सार-असारका विचार करके अंतमें उसके तारतम्यको पहचान लेनाभी संभव नहीं है। और यही कारण है, कि जो सराफ़ पहलेही निर्णय करता है, कि पूर्ण शुद्ध सोना कौन-सा है ? दिशाप्रदर्शक ध्रुवमत्स्य यंत्र अथवा ध्रुव नक्षत्रकी ओर दुर्लक्षकर अपार महोदधिकी लहरों और वायुकेही तारतम्यको देखकर यदि जहाजके खलासी बराबर अपने जहाजकी पतवार घुमाने लगें, तो उनकी जो स्थिति होगी, वही स्थिति नीति-नियमोंके परमावधिके स्वरूपपर ध्यान न देकर केवल देशकालके अनुसार बर्तनेवाले मनुष्योंकी होनी चाहिये। अतएव यदि निरी आधिभौतिक- दृष्टिसेही विचार करें, तोभी यह पहले अवश्य निश्चित कर लेना पड़ता है, कि ध्रुव जैसा अटल और नित्य नीति-तत्त्व कौन-सा है ? और इस आवश्यकताको एक बार मान लेनेसेही सारा आधिभौतिक पक्ष लँगड़ा हो जाता है। क्योंकि सुखदुःख

सिद्धावस्था और व्यवहार ३७९ आदि सभी विषयोपभोग नामरूपात्मक हैं। अतएव ये अनित्य और विनाशवान् मायाकीही सीमामें रह जाते हैं। इसलिये केवल इन्हीं बाह्य प्रमाणोंके आधारसे सिद्ध होनेवाला कोईभी नीति-नियम नित्य नहीं हो सकता। आधिभौतिक बाह्य सुखदुःखकी कल्पना जैसे जैसे बदलती जावेगी, वैसेही वैसे उसकी बुनियादपर रचे हुए नीतिधर्मोंकोभी बदलते रहना चाहिये। अतः नित्य बदलती रहनेवाली नीति-धर्मकी इस स्थितिको टालनेके लिये माया-सृष्टिके विषयोपभोग छोड़कर नीति-धर्मकी इमारत इस "सब भूतोंमें एक आत्मा"-वाले अध्यात्मज्ञानके मजबूत आधार- परही खड़ी करनी पड़ती है। क्योंकि पीछे नवें प्रकरणमें कह चुके हैं, कि आत्माको छोड़ जगतमें दूसरी कोईभी वस्तु नित्य नहीं है। यही तात्पर्य व्यासजीके इस वचनका है, कि "धर्मो नित्यः सुखदुःख त्वनित्ये" - नीति अथवा सदाचरणके धर्म नित्य हैं; और सुखदुःख अनित्य हैं। यह सच है, कि दुष्ट और लोभियोंके समाजमें अहिंसा एवं सत्य प्रभृति नित्य नीति-धर्म पूर्णतासे पाले नहीं जा सकते; पर उसका दोष इन नित्य नीति-धर्मोंको देना उचित नहीं है। सूर्यकी किरणोंसे किसी पदार्थकी परछाई चौरस मैदानपर सपाट और ऊँचे-नीच स्थानपर ऊँची-नीची पडती देख जैसे यह अनुमान नहीं किया जा सकता, कि वह परछाई मूलमेंही ऊँची-नीची होगी; उसी प्रकार जब कि दुष्टोंके समाजमें नीति-धर्मका पराकाष्ठाका शुद्ध स्वरूप नहीं पाया जाता, तब यह नहीं कह सकते, कि अपूर्णावस्थाके समाजमें पाया जानेवाला नीति-धर्मका अपूर्ण स्वरूपही मुख्य अथवा मूलका है। यह दोष समाजका है, नीतिका नहीं। इसीसे चतुर पुरुष शुद्ध और नित्य नीति-धर्मोंसे झगड़ा न मचा कर ऐसे प्रयत्न किया करते हैं, कि जिनसे समाज ऊँचा उठता हुआ पूर्णावस्था में जा पहुँचे। लोभी मनुष्योंके समाजमें इस प्रकार बर्तते समय नित्य नीति-धर्मोंके कुछ अपवाद यद्यपि अपरिहार्य मानकर हमारे शास्त्रकारोंने बतलाये हैं, तथापि उसके लिये वे प्राय- श्चित्तभी बतलाते हैं। परंतु पश्चिमी आधिभौतिक नीतिशास्त्र इन्हीं अपवादोंको मूछोंपर ताव देकर प्रतिपादन करते हैं, एवं इन प्रतिवादोंका निश्चय करते समय, वे उपयोगमें आनेवाले बाह्य फलोंके तारतम्यके तत्वकोही भ्रमसे नीतिका मूल तत्त्व मानते हैं। अब पाठक समझ जायेंगे, कि पिछले प्रकरणोंमें हमने ऐसा भेद क्यों दिखलाया है ? यह बतला दिया, कि स्थितप्रज्ञ ज्ञानी पुरुषकी बुद्धि और उसका बर्तावही नीतिशास्त्रका आधार है। एवं यहभी बतला दिया, कि उससे निकलनेवाले नीति- नियमोंको - उनके नित्य होनेपरभी - समाजकी अपूर्णावस्थामें थोड़ा-बहुत बदलना पड़ता है; तथा इस रीतिसे बदले जाने परभी नीतिनियमोंकी नित्यतामें उस परि- वर्तनसे कोई बाधा क्यों और कैसे नहीं आती। अब उस पहले प्रश्नका विचार करते हैं, कि स्थितप्रज्ञ ज्ञानी पुरुष अपूर्णावस्थाके समाजमें जो बर्ताव करता है, उसका मूल अथवा बीज-तत्त्व क्या है ? चौथे प्रकरणमें कह चुके हैं, कि यह विचार दो प्रकारसे

किया जा सकता है। एक तो कर्ताकी बुद्धिको प्रधान मानकर और दूसरा उसके बाहरी बर्तावसे । इनमेंसे यदि केवल दूसरीही दृष्टिसे विचार करें, तो विदित होगा कि, स्थितप्रज्ञ जो जो व्यवहार करते हैं, वे प्रायः सब लोगोंके हितकेही होते हैं। गीतामें दो बार कहा गया है, कि परम ज्ञानी सत्पुरुष "सर्वभूतहिते रताः" - प्राणिमात्रके कल्याणमें निमग्न रहते हैं ( गीता ५. २५; १२.४); और महा- भारतमेंभी यही अर्थ अन्य कई स्थानोंमें आया है। हम ऊपर कह चुके हैं, कि स्थित- प्रज्ञ सिद्ध पुरुष अहिंसा आदि जिन नियमोंका पालन करते हैं, वही धर्म अथवा सदा- चारका नमूना है। इन अहिंसा आदि नियमोंका प्रयोजन अथवा इस धर्मका लक्षण बतलाते हुए महाभारतमें धर्मका बाहरी उपयोग दिखलानेवाले ऐसे अनेक वचन हैं - "अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम्" ( वन. २०६. ७३ ) - अहिंसा और सत्य भाषण, ये नीति-धर्म प्राणिमात्रके हितके लिये हैं। "धारणाद्धर्ममित्याहुः" ( शां. १०९. १२) - जगतका धारण करनेसे धर्म है। "धर्म हि श्रेय इत्याहुः" ( अनु. १०५. १४) - कल्याणही धर्म है। "प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम्" ( शां. १०९. १० ) - लोगोंके अभ्युदयके लियेही धर्म-अधर्मशास्त्र बना है; अथवा "लोकयात्रार्थमेवेह धर्मस्य नियमः कृतः । उभयत्र सुखोदर्कः" ( शां. २५८. ४) - धर्म-अधर्मके नियम इसलिये रचे गये हैं, कि उनसे लोकव्यवहार चले; और दोनों लोकोंमें कल्याण हो । इसी प्रकार कहा है, कि धर्म-अधर्म-संशयके समय ज्ञानी पुरुषकोभी लोकयात्रा च द्रष्टव्या धर्मश्चात्महितानि च । "लोकव्यवहार, नीतिधर्म और अपना कल्याण - इन बाहरी बातोंका तारतम्यसे विचार करके" ( अनु. ३७. १६; वन २०५. ९० ) फिर जो कुछ करना हो, उसका निश्चय करना चाहिये; और वनपर्वमें राजा शिबीने धर्म-अधर्मके निर्णयार्थ इसी युक्तिका उपयोग किया है ( वन. १३१. ११, १२ ) । इन वचनोंसे प्रकट होता है, कि समाजका उत्कर्षही स्थितप्रज्ञके व्यवहारकी 'बाह्य नीति' होती है। और यदि यह ठीक है, तो आगे सहजही यह प्रश्न उत्पन्न होता है, कि आधिभौतिक- वादियोंके इस "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख अथवा ( सुख शब्दको व्यापक करके ) हित या कल्याण "वाले नीति-तत्त्वको अध्यात्मवादीभी क्यों नहीं स्वीकार कर लेते ? चौथे प्रकरणमें हमने दिखला दिया हैं, कि इस "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख" सूत्रमें बुद्धिके आत्मप्रसादसे होनेवाले सुखका अथवा उन्नतिका और पार- लौकिक कल्याणका अंतर्भाव नहीं होता, - इसमें यह बड़ा भारी दोष है। किंतु 'सुख' शब्दका अर्थ अधिक व्यापक करके यह दोष अनेक अंशोंमें निकाल डाला जा सकेगा; और नीति-धर्मकी नित्यताके संबंधमें ऊपरही दी हुई आध्यात्मिक उप- पत्तिभी कई लोगोंको विशेष महत्त्वकी जँचेगी। इसलिये नीतिशास्त्रके अध्या- त्मिक और आधिभौतिक मार्गोंमें जो महत्त्वका भेद है, उसका यहाँ और थोड़ासा स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है।

सिद्धावस्था और व्यवहार ३८१ नीतिकी दृष्टिसे किसी कर्मकी योग्यता अथवा अयोग्यताका विचार दो प्रकारोंमें किया जाता है :- ( १ ) उस कर्मका केवल बाह्य फल देख कर अर्थात् यह देख कर कि उसका दृश्य परिणाम जगत्पर क्या हुआ है या होगा ? ( २ ) यह देख कर, कि उस कर्मको करनेवालेकी बुद्धि अर्थात् वासना कैसी है ? पहलेको आधिभौतिक मार्ग कहते हैं। दूसरेके फिर दो पक्ष होते हैं; और इन दोनोंके पृथक् पृथक् नाम हैं। ये सिद्धान्त पिछले प्रकरणोंमें बतलाये जा चुके हैं, कि शुद्ध कर्म होनेके लिये वासनात्मक बुद्धि शुद्ध रखनी पड़ती है और वासनात्मक बुद्धि शुद्ध रखनेके लिये व्यवसायात्मका अर्थात् कार्य-अकार्यका निर्णय करनेवाली बुद्धिभी स्थिर, सम और शुद्ध रहनी चाहिये। इन सिद्धान्तोंके अनुसार किसीकेभी कर्मोंकी शुद्धता जाँचनेके लिये देखना पड़ता है, कि उसकी वासनात्मक बुद्धि शुद्ध है या नहीं ? और वासनात्मक बुद्धिकी शुद्धता जाँचने लगे, तो अंतमें देखनाही पड़ता है, कि व्यवसा- यात्मका बुद्धि शुद्ध है या अशुद्ध ? सारांश, कर्ताकी बुद्धि अर्थात् वासनाकी शुद्धताका निर्णय अंतमें व्यवसायात्मका बुद्धिकी शुद्धतामे करना पड़ता है ( गीता २. ४१ ) । इसी व्यवसायात्मक बुद्धिको सदसद्विवेचन-शक्तिके रूपमें स्वतंत्र देवता मान लेनेसे वह आधिदैविक मार्ग हो जाता है। परंतु यह बुद्धि स्वतंत्र दैवत नहीं है; किंतु आत्माका एक अंतरिंद्रिय है, अतः बुद्धिको प्रधानता न देकर, आत्माको प्रधान मान करके वासनाकी शुद्धताका विचार करनेसे यह नीतिके निर्णयका आध्यात्मिक मार्ग हो जाता है। हमारे शास्त्रकारोंका मत है, कि इन सब मार्गोंमें आध्यात्मिक मार्ग श्रेष्ठ है; और प्रसिद्ध जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटने यद्यपि ब्रह्मात्मैक्यका सिद्धान्त स्पष्ट रूपसे नहीं दिया है, तथापि उसने अपने नीतिशास्त्रके विवेचनका आरंभ शुद्ध-बुद्धिसे अर्थात् एक प्रकारसे अध्यात्म-दृष्टिसेही किया है, एवं उसने इसकी पूर्ण उपपत्तिभी दी है, कि ऐसा क्यों करना चाहिये। * ग्रीनका अभिप्रायभी ऐसाही है; परंतु इस विषयका पूरा विवेचन इस छोटे-से ग्रंथमें नहीं किया जा सकता। हम चौथे प्रकरणमें दो-एक उदाहरण देकर स्पष्ट दिखला चुके हैं, कि नीति-तत्त्वोंका पूरा निर्णय करनेके लिये कर्मके बाहरी फलकी अपेक्षा कर्ताकी शुद्ध-बुद्धिपर विशेष ध्यान क्यों देना पड़ता है, और इस संबंधमें अधिक विचार आगे - पंद्रहवें प्रकरणमें पाश्चात्य और पौरस्त्य नीति-मार्गोंकी तुलना करते समय - किया जावेगा। अभी इतनाही कहते हैं, कि कोईभी कर्म तभी होता है, जब कि पहले उस कर्मको करनेकी बुद्धि उत्पन्न हो, इसलिये कर्मकी योग्यता-अयोग्यताका विचारभी सभी अंशोंमें बुद्धिकी शुद्धता- अशुद्धताके विचारपरही अवलंबित रहता है। बुद्धि बुरी होगी; तो कर्मभी बुरा होगा, परंतु केवल बाह्य कर्मके बुरे होनेसेही यह अनुमान नहीं किया जा सकता,

* Kant's Theory of Ethics, trans. by Abbott. 6th Ed. especially Metaphysics of Morals therein.

३८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कि बुद्धिभी बुरी होनीही चाहिये। क्योंकि भूलसे, कुछ-का-कुछ समझ लेनेसे अथवा अज्ञानसेभी वैसा कर्म हो सकता है; और फिर उसे नीतिशास्त्रकी दृष्टिसे बुरा नहीं कह सकते । “अधिकांश लोगोंके अधिक सुख”-वाला नीतिशास्त्र-तत्त्व केवल बाहरी परिणामोंके लियेही उपयोगी होता है; और जब कि इन सुखदुःखात्मक बाहरी परिणामोंको निश्चित रीतिसे मापनेका बाहरी साधन अब तक नहीं मिला है, तब नीति-तत्त्वोंकी इस कसौटीमे सदैव यथार्थ निर्णय होनेका भरोसाभी नहीं किया जा सकता । इसी प्रकार मनुष्य कितनाही सयाना क्यों न हो जाय, यदि उसकी बुद्धि पूर्ण शुद्ध न हो गई हो, तो यह नहीं कह सकते, कि वह प्रत्येक अवसरपर धर्मसेही बर्तेगा । विशेषतः जहाँ उसका स्वार्थ आ डटा, वहाँ तो फिर कहनाही क्या है ? – “स्वार्थे सर्वे विमुह्यन्ति येऽपि धर्मविदो जनाः” (मभा. वि. ५१. ४)। सारांश, मनुष्य कितनाही बड़ा ज्ञानी, धर्मवेत्ता और सयाना क्यों न हो, किन्तु यदि उसकी बुद्धि प्राणिमात्रमें सम न हो गई हो, तो यह नहीं कह सकते; कि उसका कर्म सदैव शुद्ध अथवा नीतिकी दृष्टिसे निर्दोषही रहेगा । अतएव हमारे शास्त्रकारोने निश्चित कर दिया है, कि नीतिका विचार करते समय कर्मके बाह्य फलकी अपेक्षा कर्ताकी बुद्धिकाही प्रधानतासे विचार करना चाहिये । साम्य-बुद्धिही अच्छे बर्तावका चोखा बीज है। यही भावार्थ भगवद्गीताके इस उपदेशमेंभी है ( गीता २. ४९ ) :- दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ कुछ लोग, इस श्लोकमें, बुद्धिका अर्थ ज्ञान समझकर कहते हैं, कि इसमें कर्म और ज्ञान, इन दोनोंमेंसे ज्ञानकोही श्रेष्ठता दी है। पर हमारे मतमें यह अर्थ ठीक नहीं है। इस स्थलपर शांकरभाष्यमेंभी 'बुद्धियोग'का अर्थ 'समत्व बुद्धियोग' दिया हुआ है; और यह श्लोक कर्मयोगके प्रकरणमें आया है। अतएव वास्तवमें इसका अर्थ कर्मप्रधानही करना चाहिये; और वही सरल रीतिसेही है। कर्म करनेवाले लोग दो प्रकारके होते हैं। पहले प्रकारके फलपर – उदाहरणार्थ, उससे कितने लोगोंको कितना सुख होगा, इसपर – दृष्टि जमा कर कर्म करते हैं; और दूसरे बुद्धिको सम और निष्काम रखकर कर्म करते हैं – फिर कर्मधर्म-संयोगसे उससे जो परिणाम होना हो, सो हुआ करे। इनमेंसे 'फलहेतवः' अर्थात् “फलपर दृष्टि रखकर कर्म करनेवाले” लोगोंको नैतिक दृष्टिसे कृपण अर्थात् कनिष्ठ श्रेणीके बतलाकर, समत्व- बुद्धिसे कर्म करनेवालोंको इस श्लोकमें श्रेष्ठता दी है। इस श्लोकके पहले दो चरणोंमें जो यह कहा है, कि “दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय” – हे धनंजय !

  • इस श्लोकका सरल अर्थ यह है – “हे धनंजय ! (सम-) बुद्धिके योगकी अपेक्षा (कोरा) कर्म बिलकुलही निकृष्ट है। अतएव (सम-) बुद्धिकाही आश्रय कर। फलपर दृष्टि रखकर कर्म करनेवाले (पुरुष) कृपण अर्थात् ओछे दर्जेके है।”

सिद्धावस्था और व्यवहार ३८३ समत्व बुद्धियोगकी अपेक्षा (कोरा) कर्म अत्यंत निकृष्ट है - उसका तात्पर्य यही है; और जब अर्जुनने यह प्रश्न किया, कि "भीष्म-द्रोणको कैसे मारूं?", तब उसको यही उत्तर दिया गया। इसका भावार्थ यह है, कि मरने या मारनेकी निरी क्रियाकी ओर ध्यान न देकर, देखना चाहिये, कि "मनुष्य किस बुद्धिसे उस कर्मको करता है?" अतएव इस श्लोकके तीसरे चरणमें उपदेश है,कि "तू बुद्धि अर्थात् सम-बुद्धिकी शरण जा;" और आगे उपसंहारात्मक अठारहवें अध्यायमेंभी भगवानने फिर कहा है, कि "बुद्धियोगका आश्रय करके तू अपने कर्म कर।" गीताके दूसरे एक श्लोकसेभी व्यक्त होता है, कि गीता निरे कर्मके विचारको कनिष्ठ समझकर, उस कर्मकी प्रेरक बुद्धिकेही विचारको श्रेष्ठ मानती है। अठारहवें अध्यायमें कर्मके भले बुरे - अर्थात् सात्त्विक, राजस और तामस - भेद बतलाये गये हैं। यदि केवल कर्मफलकी ओरही गीताकी दृष्टि होती, तो भगवानने यह कहा होता, कि जो कर्म बहुतेरोंको सुखदायक हो, वही सात्त्विक है। परंतु ऐसा न बतलाकर, अठारहवें अध्यायमें कहा है, कि "फलाशा छोड़कर निस्संग-बुद्धिसे किया हुआ कर्म सात्त्विक अथवा उत्तम है" (गीता १८. २३)। अर्थात् इससे प्रकट होता है, कि कर्मके बाह्य फलकी अपेक्षा कर्ताकी निष्काम, सम और निस्संग-बुद्धिकोही कर्म-अकर्मका विवेचन करनेमें गीता अधिक महत्त्व देती है। यही न्याय स्थितप्रज्ञके व्यवहारके लिये उपयुक्त करनेसे होता है, कि स्थितप्रज्ञ जिस साम्य-बुद्धिसे अपनी बराबरीवाले, छोटे और साधारण लोगोंके साथ बर्तता है, वह साम्य-बुद्धिही उसके आचरणका मुख्य तत्त्व है; और इस आचरणसे जो प्राणिमात्रका मंगल होता है, वह इस साम्य-बुद्धिका निरा बाहरी और आनुषंगिक परिणाम है। ऐसेही जिसकी बुद्धि पूर्णावस्थागें पहुँच गई हो, वह लोगोंको केवल आधिभौतिक सुख प्राप्त करा देनेके लियेही अपने सब व्यवहार न करेगा। यह ठीक है, कि वह दूसरोंका नुकसान न करेगा, पर यह उसका मुख्य ध्येय नहीं है। स्थितप्रज्ञ ऐसे प्रयत्न किया करता है, जिनसे समाजके लोगोंकी बुद्धि अधिकाधिक शुद्ध होती जावें; और अंतमें वे लोग अपने समानही आध्यात्मिक पूर्णावस्थामें जा पहुँचे। मनुष्यके कर्तव्योंमेंसे यही श्रेष्ठ और सात्त्विक कर्तव्य है। केवल आधिभौतिक सुख-वृद्धिके प्रयत्नोंको हम गौण अथवा राजस समझते हैं। गीताका सिद्धान्त है, कि कर्म-अकर्मके निर्णयार्थ कर्मके बाह्य फलपर ध्यान न देकर, कर्ताकी शुद्ध-बुद्धिकोही प्रधानता देनी चाहिये। इसपर कुछ लोगोंका यह तर्कपूर्ण मिथ्या आक्षेप है, कि यदि कर्मफलको न देखकर केवल शुद्ध-बुद्धिकाही इस प्रकार विचार करें, तो मानना होगा, कि शुद्ध-बुद्धिवाला मनुष्य कोईभी बुरा काम कर सकता है! और तब तो वह सभी बुरे कर्म करनेके लिये स्वतंत्र हो जायेगा। इस आक्षेपको हमने केवल अपनीही कल्पनाके बलसे नहीं घर घसीटा है; किंतु गीता-धर्मपर कुछ पादड़ो बहादुरोंके किये हुए इस ढंगके आक्षेप हमारे देखनेमेंभी

३८४ सिद्धावस्था और व्यवहार

आये हैं।* किंतु हमें यह कहनेमें कोईभी दिक्कत नहीं जान पड़ती, कि ये आरोप या आक्षेप बिलकुल मूर्खताके अथवा दुराग्रहके हैं। और यह कहनेमेंभी कोई हानि नहीं है, कि आफ़ीकाका कोई काला-कलूट जंगली मनुष्य सुधरे हुए राष्ट्रके नीति- तत्त्वोंका आकलन करनेमें जिस प्रकार अपात्र और असमर्थ होता है, उसी प्रकार इन भले पादड़ी मानवोंकी बुद्धि वैदिक धर्मके स्थितप्रज्ञकी आध्यात्मिक पूर्णावस्थाका निरा आकलन करनेमेंभी, स्वधर्मके व्यर्थ दुराग्रह अथवा और कुछ ओछे एवं दुष्ट मनोविकारोंसे, असमर्थ हो गई है। उन्नीसवीं सदीके प्रसिद्ध जर्मन तत्त्वज्ञानी कांटने अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथमें अनेक स्थलोंपर लिखा है, कि कर्मके बाहरी फलको न देखकर नीतिके निर्णयार्थ कर्ताकी बुद्धिकाही विचार करना उचित है। § किंतु हमने नहीं देखा, कि कांटपर किसीने ऐसा आक्षेप किया हो। फिर वह गीताके नीति- तत्त्वकोही उपयुक्त कैसे होगा ? प्राणिमात्रमें समबुद्धि होतेही परोपकार करना तो देहका स्वभावही बन जाता है; और ऐसा हो जानेपर परम ज्ञानी एवं परम शुद्ध-बुद्धि- वाले मनुष्यके हाथसे कुकर्म होना उतनाही असंभव है, जितना कि अमृतसे मृत्यु हो जाना। कर्मके बाह्य फलका विचार न करनेके लिये जब गीता कहती है, तब उसका यह अर्थ नहीं है, कि जो दिलमें आ जाय, सो किया करो। प्रत्युत गीता कहती है, कि बाहरी परोपकार करनेका स्वाँग पाखंडसे या लोभसे बना सकता है किंतु प्राणिमात्रमें एक आत्माको पहचाननेसे बुद्धिमें जो स्थिरता और समता आ जाती है, उसका स्वाँग कोई नहीं बना सकता; तब किसीभी कामकी योग्यता-अयोग्यताका विचार करते समय कर्मके बाह्य परिणामकी अपेक्षा कर्ताकी बुद्धिपर योग्य दृष्टि रखनी चाहिये। गीताका संक्षेपमें यह सिद्धान्त कहा जा सकता है, कि कोरे जड़ कर्मोंमेंही नीति-तत्त्व नहीं; किंतु कर्ताकी बुद्धिपर वह सर्वथा अवलंबित रहता है। आगे गीतामेंही ( गीता १८. २५) कहा है, कि इस आध्यात्मिक सिद्धान्तके ठीक तत्त्वको न समझकर यदि


* कलकत्तेके एक पादड़ीकी ऐसी करतूतका उत्तर मिस्टर ब्रूक्सने दिया है, जो कि उनके Kurukshetra (कुरुक्षेत्र) नामक छपे हुए निबंधके अंतमें है; उसे देखिये ( Kurukshetra - Vyasasharma, Adyar, Madras, pp. 48--52 ). § "The second proposition is : That an action done from duty derives its moral worth not from the purpose which is to be attained by it, but from the maxim by which it is determined." .. The moral worth of an action "cannot lie anywhere but in the principle of the will, without regard to the ends which can be attained by action. " Kant's Metaphysics of Morals (trans. by Abbott in Kant's Theory of Ethics, p. 16. (The italics are author's and not our own) And again "When the question is of moral worth, it is not with the action; which we see that we are concerned; but with those inward principles of them which we do not see." p. 24 - Ibid.

सिद्धावस्था और व्यवहार ३८५ कोई मनमानी करने लगे, तो उस पुरुषको राक्षस या तामसी बुद्धिवाला कहना चाहिये । एक बार सम-बुद्धि हो जानेसे, फिर उस पुरुषको कर्तव्य-अकर्तव्यका और अधिक उपदेश नहीं करना पड़ता - इसी तत्त्वपर ध्यान देकर साधु तुकारामने शिवाजी महाराजको जो यह उपदेश किया, कि "इसका एकही कल्याणकारक अर्थ है, कि प्राणिमात्रमें एक आत्माको देखो", उसमेंभी भगवद्गीताके अनुसार कर्मयोगका एकही तत्त्व बतलाया गया है (तु. गा. ४४२८. ९१) । यहाँ फिरभी कह देना उचित है, कि यद्यपि पूर्ण साम्य-बुद्धिही सदाचारका बीज हो, तथापि इससे यहभी अनुमान न करना चाहिये, कि जबतक इस प्रकारकी पूर्ण शुद्ध-बुद्धि न हो जावे, तब- तक कर्म करनेवाला चुपचाप हाथपर हाथ धरे बैठा रहे । स्थितप्रज्ञके समान बुद्धि करलेना तो परम ध्येय है । परंतु गीताके आरंभमेंही (गीता २.४०) यह उपदेश किया है, कि इस परम ध्येयके पूर्णतया सिद्ध होनेतक प्रतीक्षा न करके जितना हो सके उतनाही, निष्काम बुद्धिसे प्रत्येक मनुष्य अपने कर्म करता रहे, इसीसे बुद्धि अधिक शुद्ध होती चली जायगी; और अंतमें पूर्ण सिद्धि हो जायगी । ऐसा आग्रह करके समयको मुक्त न गँवा दे, कि जबतक पूर्ण सिद्धि पा न जाऊँगा, तबतक कर्म करूँगाही नहीं । 'सर्वभूतहित' अथवा "अधिकांश लोगोंके अधिक कल्याण "वाला नीति-तत्त्व केवल बाह्य कर्म उपयुक्त होनेके कारण शाखाग्राही और कृपण है, परंतु "प्राणिमात्रमें एक आत्मा "वाली - स्थितप्रज्ञकी 'साम्यबुद्धि' मूलग्राही है; और उसीको नीति- निर्णयके काममें श्रेष्ठ मानना चाहिये - इस प्रकार यद्यपि यह बात सिद्ध हो चुकी; तथापि इसपर अनेकोंके आक्षेप हैं, कि इस सिद्धान्तसे व्यावहारिक बर्तावकी उपपत्ति ठीक ठीक नहीं लगती । ये आक्षेप प्रायः संन्यास-मार्गी स्थितप्रज्ञके संसारी व्यवहारको देखकरही इन लोगोंको सूझे हैं। किंतु थोडासा विचार करनेसे किसीकोभी सहजही दीख पड़ेगा, कि ये आक्षेप स्थितप्रज्ञ कर्मयोगीके बर्तावको उपयुक्त नहीं होते । और तो क्या ? यहभी कह सकते हैं, कि प्राणिमात्रमें एक आत्मा अथवा आत्मौपम्य बुद्धिके तत्त्वसे व्यावहारिक नीति-धर्मकी जैसी अच्छी उपपत्ति लगती है, वैसी और किसीभी तत्त्वसे नहीं लगती । उदाहरणके लिये सब देशोंमें और सब नीतिशास्त्रोंमें प्रधान माने गये परोपकार धर्मकोही लीजिये । "दूसरेका आत्माही मेरा आत्मा है" इस अध्यात्म-तत्त्वसे परोपकार-धर्मकी जैसी उपपत्ति लगती है, वैसी किसीभी आधि- भौतिक वादसे नहीं लगती । बहुत हुआ तो, आधिभौतिकशास्त्र इतनाही कह सकते हैं, कि परोपकार-बुद्धि एक नैसर्गिक गुण है; और वह उत्क्रांतिवादके अनुसार बढ़ रहा है । किंतु इतनेसेही परोपकारकी नित्यता सिद्ध नहीं हो जाती । यही नहीं; बल्कि स्वार्थ और परार्थके झगड़ेमें, इन दोनों घोड़ोंपर सवार होनेके लालची चतुर स्वार्थियो- कोभी अपना मतलब गाँठनेमें इसके कारण अवसर मिल जाता है, यह बात हम चौथे प्रकरणमें बतला चुके हैं। इसपरभी कुछ लोग कहते हैं, कि परोपकार-बुद्धिकी नित्यता गी. र. २५

३८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सिद्ध करनेसे लाभही क्या है ? प्राणिमात्रमें एकही आत्मा मानकर यदि प्रत्येक पुरुष सदैव प्राणिमात्रकाही हित करने लग जाय, तो उसका जीवन-निर्वाह कैसे होगा ? और जब वह इस प्रकार अपनाही योगक्षेम नहीं चला सकेगा तब वह और लोगोंका कल्याण करही कैसे सकेगा ? लेकिन ये शंकाएँ न तो नईही हैं; और न ऐसी हैं, कि जो टाली न जा सकें । भगवानने गीतामेंही इस प्रश्नका यों उत्तर दिया है – “ तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ” ( गीता. ९. २२ ) ; और अध्यात्मशास्त्रकी युक्तियोंसेभी यही अर्थ निष्पन्न होता है । जिसे लोककल्याण करनेकी बुद्धि हो गई उसे खाना-पीना नहीं छोड़ना पड़ता, परंतु उसकी बुद्धि ऐसी होनी चाहिये, कि मैं लोकोपकारके लियेही देह धारण करता हूँ। जनकने कहा है ( मभा. अश्व. ३२ ), कि जब ऐसी बुद्धि रहेगी, तभी इंद्रियाँ वशमें रहेंगी; और लोककल्याण होगा । और मीमांसकोंके इस सिद्धान्तका तत्त्वभी यही है, कि यज्ञ करके शेष बचा हुआ अन्न ग्रहण करनेवालेको 'अमृताशी' कहना चाहिये (गीता ४. ३१) । क्योंकि उनकी दृष्टिसे जगतका धारण-पोषण करनेवाला कर्मही यज्ञ है । अतएव यह लोककल्याण- कारक कर्म करते समय उसीसे अपना निर्वाह होता है; और करनाभी चाहिये । उनका निश्चय है, कि अपने स्वार्थके लिये यज्ञचक्रको डुबा देना अच्छा नहीं है । दासबोधमें ( १९. ४. १० ) श्रीसमर्थ रामदास स्वामीनेभी वर्णन किया है, कि “ वह परोपकार करताही रहता है, जिसकी सबको जरूरत बनी रहती है । ऐसी दशामें उसे भूमंडलमें किस बातकी कम रह सकती है ?” व्यवहारकी दृष्टिसे देखे, तोभी यही ज्ञात होता है, कि यह उपदेश बिलकुल यथार्थ है । सारांश, जगतमें देखा जाता है, कि लोककल्याणमें जुटे रहनेवाले पुरुषका योगक्षेम कभी अटकता नहीं है । केवल परोपकार करनेके लिये उसे निष्काम बुद्धिसे तैयार रहना चाहिये । एक बार इस भावनाके दृढ़ हो जानेपर, कि “ सभी लोग मुझमें हैं और मैं सब लोगोंमें हूँ ”, फिर यह प्रश्नही नहीं हो सकता, कि परार्थ स्वार्थ भिन्न है या नहीं । 'मैं' पृथक् और 'लोग' पृथक् इस आधिभौतिक द्वैत-बुद्धिसे “ अधिकांश लोगोंके अधिक सुख ” करनेके लिये जो प्रवृत्त होता है, उसके मनमें ऊपर लिखी हुई भ्रामक शंकाएँ उत्पन्न हुआ करती हैं । परंतु जो “ सर्वं खल्विदं ब्रह्म ” इस अद्वैत-बुद्धिसे परोपकार करनेके लिये प्रवृत्त हो जाय, उसे यह शंकाही नहीं रहती । सर्वभूतात्मैक्य-बुद्धिसे निष्पन्न होनेवाले सर्वभूतहितके इस आध्यात्मिक तत्त्वमें, और स्वार्थ एवं परार्थरूपी द्वैतके अर्थात् अधिकांश लोगोंके सुखके तारतम्यसे निकलनेवाले लोककल्याणके आधिभौतिक तत्त्वमें इतनाही भेद है, जो ध्यान देने योग्य है । साधु पुरुष मनमें लोककल्याण करनेका हेतु रखकर, लोककल्याण नहीं किया करते । जिस प्रकार प्रकाश फैलाना सूर्यका स्वभाव है, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानसे मनमें सर्वभूतात्मैक्यका पूर्ण परिचय हो जानेपर लोककल्याण करना तो इन साधु-पुरुषोंका सहज स्वभाव हो जाता है । और ऐसा स्वभाव बन जानेपर सूर्य जैसे दूसरोंको प्रकाश देता हुआ अपने आपको प्रकाशित

सिद्धावस्था और व्यवहार ३८७ कर लेता है, वैसेही साधुपुरुषोंके परार्थ उद्योगसेही उनका योगक्षेमभी आपही-आप सिद्ध होता है। परोपकार करनेके इस देह-स्वभाव और अनासक्त बुद्धिके एकत्र हो जानेपर कितनेही संकट क्यों न चले आवें, तोभी उनकी बिलकुल परवाह न कर और यह न सोच कर, कि संकटोंको सहना भला है, या लोककल्याणको छोड़ देना भला है, ब्रह्मात्मैक्य बुद्धिवाले साधुपुरुष, अपना कार्य सदा जारी रखते है। तथा यदि प्रसंग आ जाय तो आत्मबलिभी दे देनेके लिये तैयार रहते हैं, उन्हें उसकी कुछभी चिंता नही होती। किंतु जो लोग स्वार्थ और परार्थको दो भिन्न वस्तुएँ समझ, उन्हें तराजूके दो पलड़ोंमें डाल काँटेका झुकाव देखकर धर्म-अधर्मका निर्णय करना सीखे हुए हैं, उनकी लोककल्याण करनेकी इच्छाका इतना तीव्र हो जाना कदापि संभव नहीं है। अतएव प्राणिमात्रके हितका तत्त्व यद्यपि भगवद्गीताको संमत है, तथापि उसकी उपपत्ति अधिकांश लोगोंके अधिक बाहरी सुखोंके तारतम्यसे नहीं लगाई है; किंतु लोगोंकी संख्या अथवा उनके सुखोंकी न्यूनाधिकताके विचारोंको आगंतुक अतएव कृपण कहा है; तथा शुद्ध व्यवहारकी मूलभूत साम्य-बुद्धिकी उपपत्ति गीतामें अध्यात्मशास्त्रके नित्य ब्रह्मज्ञानके आधारपर बतलाई है। इससे दीख पड़ेगा, कि प्राणिमात्रके हितार्थ उद्योग करने या लोककल्याण अथवा परोपकार करनेकी युक्तिसंगत उपपत्ति अध्यात्म-दृष्टिसे क्योंकर लगती है ? अब समाजमें एक दूसरेके साथ बर्तनेके संबंधमें साम्य-बुद्धिकी दृष्टिसे हमारे शास्त्रोंमें जो मूल नियम बतलाये गये, हैं, उनका विचार करते हैं। "यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवा भूत्" (बृह. २. ४. १४) - जिसे सर्व आत्ममय हो गया, वह साम्य-बुद्धिसेही सबके साथ बर्तता है, यह तत्त्व बृहदारण्यकके सिवा ईशावास्य (ईश. ६) और कैवल्य (कै. १. १०) उपनिषदोंमें तथा मनुस्मृतिमेंभी (मनु. १२. ९१, १२५) है। एवं इसी तत्त्वका गीताके छठे अध्यायमें (गीता ६. २९) "सर्वभूतस्थ- मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि"के रूपमें अक्षरशः उल्लेख है। सर्वभूतात्मैक्य अथव- साम्य-बुद्धिके इसी तत्त्वका रूपांतर आत्मौपम्य-दृष्टि है। क्योंकि इससे सहजही यह अनुमान निकलता है, कि जब मैं प्राणिमात्रमें हूँ और मुझमें सभी प्राणि हैं, तब मैं अपने साथ जैसे बर्तता हूँ वैसेही अन्य प्राणियोंके साथभी मुझे बर्ताव करना चाहिये। अतएव भगवानने कहा है, कि इस "आत्मौपम्य-दृष्टि अर्थात् समतासे जो सबके साथ बर्तता है, वही उत्तम कर्मयोगी स्थितप्रज्ञ है" और फिर अर्जुनको इसी प्रकार बर्ताव करनेका उपदेश दिया है (गीता. ६. ३०-३२)। अर्जुन अधिकारी था, इस कारण गीतामें इस तत्त्वको खोलकर समझानेकी कोई जरूरत न थी। किंतु साधारण लोगोंको नीतिका और धर्मका बोध करानेके लिये रचे हुए महाभारतमें अनेक स्थानोंपर यह बतलाकर (मभा. शां. २३८. २१; २६१. ३३) व्यासदेवने इसका गंभीर और व्यापक अर्थ स्पष्ट कर दिखलाया है। उदाहरण लीजिये; गीता

३८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और उपनिषदोंमें संक्षेपसे बतलाये हुए आत्मौपम्यके इसी तत्त्वको पहले इस प्रकार समझाया है :- आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति पूरुषः । न्यस्तदण्डो जितक्रोधः स प्रेत्य सुखमेधते ॥ “जो पुरुष अपनेही समान दूसरेको मानता है, और जिसने क्रोधको जीत लिया है, वह परलोकमें सुख पाता है” (मभा. अनु. ११३. ६)। परस्पर एक दूसरेके साथ बर्ताव करनेके वर्णनको यहीं समाप्त न करके आगे कहा है :- न तत्परस्य सन्दध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः । एष संक्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते ॥ “ऐसा बर्ताव औरोंके साथ न करे, कि जो स्वयं अपनेको प्रतिकूल अर्थात् दुःख- कारक जँचे। यही सब धर्मों और नीतियोंका सार है; और बाकी सभी व्यवहार लोभमूलक हैं” (मभा. अनु. ११३. ८) और अंतमें बृहस्पतीने युधिष्ठिरसे कहा है:- प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये । आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति ॥ यथापरः प्रक्रमते परेषु तथा परे प्रक्रमन्तेऽपरस्मिन् । तथैव तेषूपमा जीवलोके यथा धर्मो निपुणेनोपदिष्टः ॥ “सुख या दुःख, प्रिय या अप्रिय, दान अथवा निषेध – इन सब बातोंका दूसरोंके विषयमें वैसाही अनुमान करे, जैसा कि अपने विषयमें जान पड़े। दूसरोंके साथ मनुष्य जैसा बर्ताव करता है, दूसरेभी उसके साथ वैसाही व्यवहार करते हैं। अतएव यही उपमा लेकर इस जगतमें आत्मौपम्यकी दृष्टिसे बर्ताव करनेको सयाने लोगोंने धर्म कहा है (मभा. अनु. ११३. ९, १०) “न तत्परस्य सन्दध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः” यह श्लोक विदुरनीतिमेंभी (मभा. उद्यो. ३८. ७२) है; और आगे शांतिपर्वमें (मभा. शां. १६७. ९) विदुरने फिर यही तत्त्व युधिष्ठिरको बतलाया है। परंतु आत्मौपम्यनियमका यह एक भाग हुआ, कि दूसरोंको दुःख न दो, क्योंकि जो तुम्हें दुःखदायी है, वही और लोगोंकोभी दुःखदायी होता है। अब इसपर कदाचित् किसीको यह दीर्घशंका हो, कि इससे यह निश्चयात्मक अनुमान कहाँ निकलता है, कि तुम्हें जो सुखदायक जँचे, वही औरोंकोभी सुखदायक है, और इसलिये ऐसे ढंगका बर्ताव करो, जो औरोंकोभी सुखदायक हो ? इस शंकाके निरसनार्थ भीष्मने युधिष्ठिरको धर्मके लक्षण बतलाते समय इससेभी अधिक स्पष्टीकरण करके इस नियमके दोनों भागोंका स्पष्ट उल्लेख कर दिया है :- यदन्यैर्विहितं नेच्छेदात्मनः कर्म पूरुषः । न तत्परेषु कुर्वीत जानन्नप्रियमात्मनः ॥ जीवितं यः स्वयं चेच्छेत्कथं सोऽन्यं प्रघातयेत् । यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत् ॥

सिद्धावस्था और व्यवहार ३८९ “हम दूसरोंसे अपने साथ जैसे बर्तावका किया जाना पसंद नहीं करते वैसा अर्थात् अपनी रुचिके अनुकूल बर्ताव हमेंभी दूसरोंके साथ न करना चाहिये। जो स्वयं जीवित रहनेकी इच्छा करता है, वह दूसरोंको कैसे मारेगा ? ऐसी इच्छा रखें, कि जो हम चाहते हैं, वही और लोगभी चाहते हैं।” (मभा. शां. २५८.१९,२१)। और दूसरे स्थानपर इसी नियमको बतलाते हुए इन 'अनुकूल' अथवा 'प्रतिकूल' विशेषणोंका प्रयोग न करके किसीभी प्रकारके आचरणके विषयमें विदुरने कहा है, कि सामान्यतः- तस्माद्धर्मप्रधानेन भवितव्यं यतात्मना। तथा च सर्वभूतेषु वर्तितव्यं यथात्मनि ॥ “इंद्रियनिग्रह करके धर्मसे बर्तना चाहिये; और अपने समानही सब प्राणियोंसे बर्ताव करे” (मभा. शां. १६७. ९)। क्योंकि शुकानुप्रश्नमें व्यास कहते हैं :- यावानात्मनि वेदात्मा तावानात्मा परात्मनि। य एवं सतं वेद सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ “जो सदैव यह जानता है, कि अपने शरीरमें जितना आत्मा है, उतनाही दूसरेके शरीरमेंभी है, वही अमृतत्व अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर लेनेमें समर्थ होता है” (मभा. शां. २३८. २२)। बुद्धको आत्माका अस्तित्व मान्य न था। कमसे-कम उसने यह तो स्पष्टही कह दिया है, कि आत्मविचारकी व्यर्थ उलझनमें न पड़ना चाहिये। तथापि उसनेभी यह बतलाते हुए, कि बौद्ध भिक्षु लोग औरोंके साथ कैसा बर्ताव करें ? - आत्मौपम्यदृष्टिका यह उपदेश किया है :- यथा अहं तथा एते यथा एते तथा अहम् । अत्तानं (आत्मानं) उपमं कत्वा (कृत्वा) न हनेय्यं न घातये ॥ “जैसे मैं, वैसे ये; जैसे ये, वैसे मैं, ( इस प्रकार ) अपनी उपमा समझकर न तो ( किसीकोभी ) मारे; और न मरवावे” (सुत्तनिपात, नालकसुत्त २७)। धम्म- पद नामके दूसरे पाली बौद्ध ग्रंथमेंभी (धम्मपद १२९, १३०) मेंभी इसी श्लोकका दूसरा चरण दो बार ज्यों-का-त्यों आया है; और आगे तुरंतही मनुस्मृति (५. ४५)। एव महाभारत (अनु. ११३. ५) इन दोनों ग्रंथोंमें पाये जानेवाले श्लोकोंका पाली भाषामें इस प्रकार अनुवाद किया गया है -- सुखकामानि भूतानि यो दण्डेन विहिंसति । अत्तनो सुखमेसानो ( इच्छन् ) पेच्च सो न लभते सुखम् ॥ “(अपने समानही) सुखकी इच्छा करनेवाले दूसरे प्राणियोकी जो अपने (अत्तनो) सुखके लिये दंडसे हिंसा करता है, उसे मरनेपर (पेच्च = प्रेत्य) सुख नहीं मिलता” (धम्मपद १३१)। आत्माके अस्तित्वको न माननेपरभी आत्मौपम्यकी यह भाषा जब कि बौद्ध ग्रंथोंमें पाई जाती है, तब यह प्रकटही है, कि बौद्ध ग्रंथकारोंने ये विचार वैदिक धर्म-ग्रंथोंसेही लिये हैं। अस्तु, इसका अधिक विचार

३९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आगे चलकर करेंगे। ऊपरके विवेचनसे स्पष्ट दीख पड़ेगा, कि जिसकी “ सर्व- भूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ” ऐसी स्थिति हो गई, वह औरोंसे बर्तने समय आत्मौपम्य-बुद्धिसेही सदैव काम लिया करता है; और हम प्राचीन कालसे समझते चले आ रहे हैं, कि ऐसे बर्तावका यही एक मुख्य नीति-तत्त्व है। इसे कोईभी स्वीकार कर लेगा, कि समाजमें मनुष्योंके पारंपरिक व्यव- हारका निर्णय करनेके लिये आत्मौपम्य-बुद्धिका यह सूत्र “ अधिकांश लोगोने अधिक हित "वाले आधिभौतिक तत्त्वकी अपेक्षा अधिक अर्थपूर्ण, निर्दोष, निस्संदिग्ध, व्यापक, स्वल्प और बिल्कुल अन-पढ़ोंकीभी समझमें जल्दी आ जानेयोग्य है।* धर्म-अधर्मशास्त्रके इस रहस्य (“ एष संक्षेपतो धर्मः ”) अथवा मूल तत्त्वकी अध्यात्म-दृष्टिसे जैसी उपपत्ति लगती है, वैसी कर्मके बाहरी परिणामपरही नजर देनेवाले आधिभौतिकवादसे नहीं लगती; और इसीसे धर्म-अधर्मशास्त्रके इस प्रधान नियमको उन पश्चिमी पंडितोंके ग्रंथोंमें प्रायः प्रमुख स्थान नहीं दिया जाता, कि जो आधिभौतिक-दृष्टिसे कर्मयोगका विचार करते हैं। और तो क्या, आत्मौ- पम्य दृष्टिके सूत्रको ताकमें रखकर, वे समाजबंधनकी उपपत्ति “ अधिकांश लोगोंके अधिक सुख ” प्रभृति केवल दृश्य तत्त्वोंसेही लगानेका प्रयत्न किया करते हैं। परंतु उपनिषदोंमें, मनुस्मृतिमें, गीतामें महाभारतके अन्यान्य प्रकरणोंमें और केवल बौद्ध धर्ममेंही नहीं; प्रत्युत अन्यान्य देशों एवं धर्मोंमेंभी आत्मौपम्यके इस सरल नीति-तत्त्व- कोही सर्वत्र अग्रस्थान दिया हुआ पाया जाता है। यहूदी और ईसाई धर्म-पुस्तकोंमें जो यह आज्ञा है, कि “ तू अपने पड़ोसियोंसे अपनेही समान प्रीति कर ” ( लेव्हि. १९. १८; मेथ्यू. २२. ३९ ), वह इसी नियमका रूपांतर है। ईसाई लोग इसे सोनेका अर्थात् सोनेसरीखा मूल्यवान् नियम कहते हैं; परंतु आत्मैक्यकी उपपत्ति उनके धर्ममें नहीं है। ईसाका यह उपदेशभी आत्मौपम्य-सूत्रका एक भाग है, कि “ लोगोसे तुम अपने साथ जैसा बर्ताव कराना पसंद करते हो, उनके साथ तुम्हें स्वयंभी वैसाही बर्ताव करना चाहिये ” ( मा. ७. १२; ल्यू. ६. ३१ ) ; और यूनानी तत्त्व- वेत्ता आरिस्टाटलके ग्रंथमें मनुष्योंके परस्पर बर्ताव करनेका यही तत्त्व अक्षरशः बतलाया गया है। आरिस्टाटल ईसासे कोई तीन सौ वर्ष पहले हो गया; परंतु उससेभी लगभग दो सौ वर्ष पहले चीनी तत्त्ववेत्ता खुं-फू-त्से ( अंग्रेजी अपभ्रंश कानफ्यूशियस ) उत्पन्न हुआ था। उसने आत्मौपम्य दृष्टिका उल्लिखित नियम चीनी भाषाकी प्रणालीके अनुसार एकही शब्दमें बतला दिया है! परंतु यह तत्त्व हमारे यहाँ कानफ्यू- शियससेभी बहुत पहलेसे उपनिषदोंमें ( ईश. ६. केन. १२ ) और फिर महाभारतमें,

  • सूत्र शब्दकी व्याख्या इस प्रकार की जाती है :- “ अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सार- वद्विश्वतोमुखम् । अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ।। ” गानेके सुभीतेके लिये किसीभी मंत्रमें जिन अनर्थक अक्षरोंका प्रयोग किया जाता है, उन्हें स्तोभाक्षर कहते हैं। सूत्रमें ऐसे अनर्थक अक्षर नहीं होते। इसीसे इस लक्षणमें यह 'अस्तोभ' पद आया है।

सिद्धावस्था और व्यवहार ३९१ गीतामें, एवं परायेकोभी आत्मवत् मानना चाहिये” (दास. १२. १०. २२) इस रीतिसे मराठा साधु-संतोंके ग्रंथोंमें विद्यमान् है; तथा इस लोकोक्तिकाभी प्रचार है कि “आप बीती सो जग बीती।” यही नहीं; बल्कि इसकी आध्यात्मिक उपपत्तिभी हमारे प्राचीन शास्त्रकारोंने दे दी है। जब हम इस बातपर ध्यान देते हैं, कि यद्यपि नीति-धर्मका यह सर्वमान्य सूत्र वैदिक धर्मसे भिन्न अन्य धर्मोंमें दिया गया हो, तो भी इसकी उपपत्ति नहीं बतलाई गई है। और जब हम इस बातपरभी ध्यान देते हैं, कि इस सूत्रकी उपपत्ति ब्रह्मात्मैकरूप अध्यात्मज्ञानको छोड़ और दूसरे किसीसेभी ठीक ठीक नहीं लगती, तब गीताके आध्यात्मिक नीतिशास्त्रका अथवा कर्मयोगका महत्त्व पूरा पूरा व्यक्त हो जाता है। समाजमें मनुष्योंके पारस्परिक व्यवहारके विषयमें 'आत्मौपम्य'-बुद्धिका नियम इतना सुलभ, व्यापक, सुबोध और विश्वतोमुख है, कि जब एक बार यह बतला दिया, कि प्राणिमात्रमें रहनेवाले आत्माकी एकताको पहचान कर, “आत्मवत् सम-बुद्धिसे दूसरोंके साथ वर्तते जाओ”; तब फिर ऐसे पृथक् पृथक् उपदेश करनेकी जरूरतही नहीं रह जाती, कि लोगोंपर दया करो; उनकी यथाशक्ति मदद करो; उनका कल्याण करो; उन्हें अभ्युदयके मार्गमे लगाओ; उनसे प्रीति करो; उनसे ममता न छोड़ो; उनके साथ न्याय और समताका बर्ताव करो; किसीको धोखा मत दो; किसीका द्रव्यहरण अथवा हिंसा न करो; किसीसे झूठ न बोलो; अधिकांश लोगोंके अधिक कल्याण करनेकी बुद्धिको मनमें रखो; सदैव यह समझकर भाईचारेसे बर्ताव करो, कि हम सब एकही पिताकी संतान हैं। प्रत्येक मनुष्यको स्वभावसे यह सहजही मालूम रहता है, कि उसका अपना सुखदुःख और कल्याण किसमें है? और सांसारिक व्यवहार करते समय गृहस्थीकी व्यवस्थासे इस बातका अनुभवभी उसको होता रहता है, कि “आत्मा वै पुत्रनामासि।” अथवा “अर्धं भार्या शरीरस्य”का भाव समझकर अपनेही समान अपने स्त्री-पुत्रोंसेभी हमें प्रेम करना चाहिये। किंतु घरवालोंसे प्रेम करना आत्मौपम्य-बुद्धि सीखनेका पहलाही पाठ है। सदैव इसीमें न लिपटे रहकर घरवालोंके बाद इष्टमित्रों, आप्तों, गोत्रजों, ग्रामवासियों, जातिभाइयों, धर्मबंधुओं और अंतमें सब मनुष्यों अथवा प्राणिमात्रके विषयमें आत्मौपम्य-बुद्धिका उपयोग करना चाहिये। इस प्रकार प्रत्येक मनुष्यको अपनी आत्मौपम्य-बुद्धि अधिका- धिक व्यापक बनाकर पहचानना चाहिये, कि जो आत्मा अपनेमें है, वही सब प्राणियोंमें है; और अंतमें इसीके अनुसार बर्तावभी करना चाहिये — यही ज्ञानकी तथा आश्रम- व्यवस्थाकी परमावधि अथवा मनुष्यमात्रके साध्यकी सीमा है। आत्मौपम्य-बुद्धिरूप सूत्रका अंतिम और व्यापक अर्थ यही है। फिर आपही आप सिद्ध हो जाता है, कि इस परमावधिकी स्थितिको प्राप्तकर लेनेकी योग्यता जिन जिन यज्ञदान आदि कर्मोंसे बढ़ती जाती है, वे सभी कर्म चित्तशुद्धिकारक, धर्म्य, अतएव गृहस्थाश्रमके कर्तव्य हैं। यह पहलेही कह चुके हैं, कि चित्तशुद्धिका ठीक ठीक अर्थ स्वार्थ-बुद्धिका

छूट जाना और ब्रह्मात्मैक्यको पहचानना है, एवं इसीलिये स्मृतिकारोंने गृहस्थाश्रमके कर्म विहित माने हैं। याज्ञवल्क्यने मैत्रेयीको जो "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" आदि उपदेश किया है, उसका मर्मभी यही है। अध्यात्मज्ञानकी नींवपर रचा हुआ कर्म- योगशास्त्र सबसे कहता है, कि "आत्मा वै पुत्रनामासि" मेंही आत्माकी व्यापकताको संकुचित न करके उसकी इस स्वाभाविक व्याप्तीको पहचानो, कि "लोको वै अय- मात्मा", और इस समझसे बर्ताव किया करो, कि "उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुं- बकम्" - यह सारी पृथिवीही बड़े लोगोंकी घरगृहस्थी है; प्राणिमात्रही उनका परिवार है। हमें विश्वास है, कि इस विषयमें हमारा कर्मयोगशास्त्र अन्यान्य देशोंके पुराने अथवा नये, किसीभी कर्मयोगशास्त्रसे हारनेवाला नहीं है; यही नहीं, तो उन सबको अपने पेटमें रखकर परमेश्वरके समान 'दश अंगुल' बचा रहेगा। इसपरभी कुछ लोग कहते हैं, कि आत्मौपम्य-भावसे 'वसुधैव कुटुंबकम्' रूपी वेदान्ती और व्यापक दृष्टि हो जानेपर हम सिर्फ उन सद्गुणोंकोही न खो बैठेंगे, कि जिन देशाभिमान, कुलाभिमान और धर्माभिमान आदि सद्गुणोंसे कुछ वंश अथवा राष्ट्र आजकल उन्नत अवस्थामें हैं, प्रत्युत यदि कोई हमें मारने या कष्ट देने आवेगा, तो "निर्वैरः सर्वभूतेषु” (गीता ११. ५५), गीताके इस वाक्यानुसार उसको दुष्ट-बुद्धिसे उलटकर न मारना हमारा धर्म हो जायगा (धम्मपद ३३८)। अतः दुष्टोंका प्रतिकार न होगा; और इस कारण उनके बुरे कर्मोंमें साधु-पुरुषोंकी जान जोखिममें पड़ जायेगी और दुष्टोंका दबदबा हो जानेसे पूरे समाज अथवा सारे राष्ट्रका उसमे नाशभी हो जावेगा। महाभारतमें स्पष्टही कहा है, कि "न पापे प्रनिपापः स्यात्साधुरेव सदा भवेत्” (मभा. वन. २०६. ४८) दुष्टोंके साथ दुष्ट न हो जावे; साधुतासे वर्ते, क्योंकि दुष्टतासे अथवा वैर निकालनेसे वैर कभी नष्ट नहीं होता - "न चापि वैरं वैरेण केशव व्युपशाम्यति ।" इसके विपरीत जिसकी हम पराजय करते हैं, वह स्वभावमेही दुष्ट होनेके कारण पराजित होनेपर औरभी अधिक उपद्रव मचाता रहता है, तथा वह फिर बदला लेनेका मौका खोजता रहता है - "जयो वैरं प्रसृजति ।" अतएव महाभारतमे स्पष्ट कहा है कि, शांतिसेही दुष्टोंका निवारण कर देना चाहिये (मभा. उद्यो. ७१. ५९, ६३)। महाभारतके येही श्लोक बौद्ध ग्रंथोंमें हैं (धम्मपद ५, २०१; महावग्ग १०. २, ३); और ऐसेही ईसानेभी इसी तत्त्वका अनुवाद इस प्रकार किया है, कि "तू अपने शत्रुओंसे प्रीति कर।" (मेथ्यू. ५. ४४); और "कोई एक कनपटीमें मारे, तो तू दूसरीभी आगे कर दे" (मेथ्यू. ५. ३९; ल्यू. ६. २९)। ईसामसीहसे पहलेके चीनी तत्त्वज्ञ ला-ओ-त्सेकाभी ऐसाही कथन है; और महाराष्ट्रकी संत-मंडलीमें तो एकनाथ महाराज जैसे साधुओंके इस प्रकार आचरण करनेकी बहुतेरी कथाएँभी हैं। क्षमा अथवा शांतिकी पराकाष्ठाका उत्कर्ष दिखलानेवाले इन उदाहरणोंकी पुनीत योग्यताको घटानेका हमारा कदापि हेतु नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं, कि सत्यसमानही यह क्षमा-धर्मभी अंतमें -

अर्थात् समाजकी पूर्णावस्थामें – अपवादरहित और नित्यरूपसे बना रहेगा। और बहुत क्या कहें, समाजकी वर्तमान अपूर्णावस्थामेंभी अनेक अवसरोंपर देखा जाता है, कि जो काम शांतिसे हो जाता है, वह क्रोधसे नहीं होता। जब अर्जुन देखने लगा, कि दुष्ट दुर्योधनकी सहायता करनेके लिये कौन कौन योद्धा आये हैं, तब उनमें पिता- मह और गुरु जैसे पूज्य मनुष्योंपर दृष्टि पड़तेही उसके ध्यानमें यह बात आ गई, कि दुर्योधनकी दुष्टताका प्रतिकार करनेके लिये मुझे केवल कर्मही नहीं करना पड़ेगा, तो अर्थासक्त गुरुजनोंको शस्त्रोंसे मारनेका दुष्कर कामभी करना पड़ेगा, (गीता २. ५)। और इसीसे वह कहने लगा, कि यद्यपि दुर्योधन दुष्ट हो गया है, तथापि "न पापे प्रतिपापः स्यात्" वाले न्यायसे मुझेभी उसके साथ दुष्ट न हो जाना चाहिये। "यदि वे मेरी जानभी ले लें, तोभी (गीता १. ४६) मेरा 'निर्वैर' अंतःकरणसे चुपचाप बैठ रहनाही उचित है।" अर्जुनकी इस शंकाको दूर भगा देनेके लियेही गीता- शास्त्रकी प्रवृत्ति हुई है; और यही कारण है, कि गीतामें इस विषयका जैसा स्पष्टीकरण किया गया है, वैसा और किसीभी धर्मग्रंथमें नहीं पाया जाता। उदाहरणार्थ, बौद्ध और ईसाई धर्म निर्वैरत्वके तत्त्वको वैदिक धर्मके समानही स्वीकार तो करते हैं; परंतु उनके धर्म-ग्रंथोंमें यह बात स्पष्टतया कहींभी नहीं बतलाई है, कि लोकसंग्रहकी अथवा आत्मसंरक्षणकीभी चिंता न करनेवाले सर्व कर्मत्यागी संन्यासी पुरुषका व्यव- हार और बुद्धिके अनासक्त एवं निर्वैर हो जानेपरभी उसी अनासक्त और निर्वैर- बुद्धिसे सारे बर्ताव करनेवाले कर्मयोगीका व्यवहार, ये दोनों सर्वांशमें एक नहीं हो सकते। इसके विपरीत पश्चिमी नीतिशास्त्रवेत्ताओंके आगे यह समस्या है, कि ईसाने जो उपरोक्त निर्वैरत्वका उपदेश किया है, उसका जगत्की नीतिसे समुचित मेल कैसे मिलावें?* और नित्शे नामक आधुनिक जर्मन पंडितने जो अपने ग्रंथोंमें यह मत लिखा है, कि निर्वैरत्वका यह धर्म-तत्त्व गुलामीका और घातक है; एवं इसीको श्रेष्ठ माननेवाले ईसाई धर्मने यूरोप खंडको नामर्द कर डाला है। परंतु हमारे धर्म- ग्रंथोंको देखनेसे ज्ञात होगा, कि न केवल गीताको, प्रत्युत मनुकोभी यह बात पूर्णतया अवगत और संमत थी, कि संन्यास और कर्मयोग इन दोनों धर्म-मार्गोंसे इस विषयमें भेद करना चाहिये। क्योंकि मनुने यह नियम, "क्रुध्यन्तं न प्रतिक्रुध्येत्" – क्रोधित होनेवालेपर फिर क्रोध न करो (मनु. ६. ४८); न गृहस्थ-धर्ममें बतलाया है; और न राज-धर्ममें; बतलाया है केवल यति-धर्ममेंही। परंतु आजकलके टीकाकार इस बातपर ध्यान नहीं देते, कि इन वचनोंमेंसे कौन वचन किस मार्गका है अथवा उसका कहाँ उपयोग करना चाहिये? उन लोगोंने संन्यास और कर्ममार्ग इन दोनों मार्गोंके परस्पर-विरोधी सिद्धांतोंको गड़बड़कर एकत्र कह डालनेकी जो प्रणाली अपनायी है, उस प्रणालीसे प्रायः कर्मयोगके सच्चे सिद्धांतोंके संबंधमें कैसे भ्रम

  • See Paulsen's System of Ethics, Book III, chap. X (Eng. Trans). and Nietzsche's Anti-Christ.

३९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उत्पन्न हो जाता है, उसका वर्णन हम पाँचवें प्रकरणमें कर चुके हैं। गीताके टीका- कारोंकी इस भ्रामक पद्धतिको छोड़ देनेसे सहजही ज्ञात हो जाता है, कि भागवत- धर्मी कर्मयोगी 'निर्वैर' शब्दका क्या अर्थ करते हैं; क्योंकि ऐसे अवसरपर दुष्टोंके साथ कर्मयोगी गृहस्थको कैसे बर्ताव करना चाहिये, उसके विषयमें परम भगवद्- भक्त प्रल्हादनेही कहा है, कि "तस्मान्नित्यं क्षमा तात पंडितैरपवादिता" (महा. वन. २८. ८) - हे तात ! इसी हेतु चतुर पुरुषोंने क्षमाके लिये सदा अपवाद बत- लाये हैं। जो कर्म हमें दुःखदायी हो, वही कर्म करके दूसरोंको दुःख न देनेका, आत्मौ- पम्य-दृष्टिका सामान्य धर्म है तो ठीक; परंतु महाभारतमें निर्णय किया गया है, कि जिस समाजमें इसी आत्मौपम्य-दृष्टिवाले सामान्य धर्मकी पड़तालके इस दूसरे धर्मके, कि हमेंभी दूसरे लोग दुःख न दें, पालनेवाले न हों, उस समाजमें किसी एकके इस धर्मको पालनेसे कोई लाभ न होगा। यह समता शब्दही दो व्यक्तियोंसे संबद्ध अर्थात् सापेक्ष है। अतएव आततायी पुरुषको मार डालनेसे जैसे अहिंसा धर्ममें बट्टा नहीं लगता, वैसेही दुष्टोंको उचित शासन कर देनेसे साधुओंकी आत्मौपम्य-बुद्धि या निर्वैरतामेंभी कुछ न्यूनता नहीं आती; बल्कि दुष्टोंके अन्यायका प्रतिकारकर दूसरोंको बचा लेनेका श्रेय अवश्य मिल जाता है। जिस परमेश्वरकी अपेक्षा किसीकीभी बुद्धि अधिक सम नहीं है; वह परमेश्वरभी जब साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंका विनाश करनेके लिये समय समयपर अवतार लेकर लोकसंग्रह किया करता है (गीता ४. ७, ८), तब और पुरुषोंकी तो बातही क्या है ! यह कहना भ्रममूलक है, कि 'वसुधैव कुटुंबकम्' रूपी दृष्टि हो जानेसे अथवा फलाशा छोड़ देनेसे पात्रता-अपात्रताका अथवा योग्यता-अयोग्यताका भेदभी मिट जाना चाहिये। गीताका सिद्धान्त यह है, कि फलकी आशामें ममत्व-बुद्धि प्रधान होती है; और उसे छोड़ेबिना पाप-पुण्यसे छुटकारा नही मिलता। किंतु यदि किसी सिद्ध पुरुषको अपना स्वार्थ साधनेकी आवश्यकता न हो, तथापि यदि वह किसी अयोग्य आदमीको कोई ऐसी वस्तु ले लेने दे, कि जो उसके योग्य नहीं; तो उस सिद्ध पुरुषको अयोग्य आद- मियोंकी सहायता करनेका तथा योग्य साधुओं एवं समाजकीभी हानि करनेका पाप लगे बिना न रहेगा। कुबेरसे टक्कर लेनेवाला करोड़पति साहूकार यदि बाजारमें तरकारी लेने जावे, तो जिस प्रकार वह हरी धनियांकी गड्डी की कीमत लाख रुपये नहीं दे देता, उसी प्रकार पूर्ण साम्यावस्थामें पहुँचा हुआ पुरुष किसीकी पात्रता- अपात्रताका तारतम्य भूल नहीं जाता। उसकी बुद्धि सम तो रहती है; पर समताका यह अर्थ नहीं है, कि गायका चारा मनुष्यको और मनुष्यका भोजन गायको खिला दे। तथा भगवानने गीता (गीता १७. २०) मेंभी कहा है, कि 'दातव्य' समझकर जो सात्विक दान करना है, वहभी इसी "देशे काले च पात्रे च" अर्थात् देश, काल और पात्रताका विचारकर देना चाहिये। साधु-पुरुषोंकी साम्य-बुद्धिके वर्णनमें ज्ञानेश्वर महाराजने उन्हें पृथिवीकी उपमा दी है। इसी पृथिवीका दूसरा नाम 'सर्वसहा' है; किंतु

सिद्धावस्था और व्यवहार ३९५ यह 'सर्वसहा'भी, यदि इसे कोई लात मारे, तो मारनेवालेके तलवेमें उतनेही जोरका प्रत्याघात कर अपनी समता-बुद्धि व्यक्त कर देती है। इससे भली भाँति समझा जा सकता है, कि मनमें वैर न रहनेपरभी (अर्थात् निर्वैर) प्रतिकार कैसे किया जाता है ? कर्मविपाक प्रक्रियामें कह चुके हैं, कि इसी कारणसे भगवान्भी " ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् " ( गीता ४. ११ ) – जो मुझे जैसे भजते हैं, उन्हें वैसेही फल देता हूँ – इस प्रकार व्यवहार तो करते हैं; परंतु फिरभी 'वैषम्य-नैर्घृण्य' दोषोंसे अलिप्त रहते हैं। इसी प्रकार व्यवहार अथवा कानून-कायदेमेंभी खूनी आदमीको फाँसीकी सजा देनेवाले न्यायाधीशको, कोई उसका दुश्मन नहीं कहता । अध्यात्मशास्त्रका सिद्धान्त है, कि जब किसीकी बुद्धि निष्काम होकर साम्यावस्था में पहुँच जावे, तब वह मनुष्य अपनी इच्छासे किसी दूसरेका नुकसान नहीं करता, उससे यदि किसी दूसरेका नुकसान होभी जाय, तो समझना चाहिये, कि वह दूसरेके कर्मका फल है; अथवा निष्काम बुद्धिवाला स्थितप्रज्ञ ऐसे समयपर जो काम करता है – फिर देखनेमें वह मातृ-वध या गुरु-वध-सरीखा कितनाही भयंकर क्यों न हो – उसके शुभ- अशुभ फलका बंधन अथवा लेप उसको नहीं लगता ( गीता ४. १४ ; ९. २८; १८. १७ ) । फ़ौजदारी कानूनमें आत्मसंरक्षाके जो नियम हैं वे इसी तत्त्वपर रचे गये हैं। कहते हैं, कि जब लोगोंने मनुसे राजा होनेकी प्रार्थना की, तब उन्होंने पहले यह उत्तर दिया, कि " अनाचारसे चलनेवालोंका शासन करनेके लिये राज्यको स्वीकार करके मैं पापमें नहीं पड़ना चाहता।" परंतु जब लोगोंने यह वचन दिया, कि " तमब्रुवन् प्रजाः मा भैः कर्तृनेनो गमिष्यति " (मभा. शां. ६७. २३) – डरिये नहीं, जिसका पाप उसीको लगेगा, आपको तो रक्षा करनेका पुण्यही मिलेगा; और प्रतिज्ञा की, कि " प्रजाकी रक्षा करनेमें जो खर्च लगेगा, उसे हम लोग 'कर' देकर पूरा करेंगे", तब मनुने प्रथम राजा होना स्वीकार किया । सारांश, जैसे अचेतन सृष्टिका कभीभी न बदलनेवाला यह नियम है, कि " आघातके बराबरही प्रत्याघात " हुआ करता है; वैसेही सचेतन सृष्टिमें उस नियमका यह रूपांतर है, कि " जैसेको तैसा " होना चाहिये । वे साधारण लोग, कि जिनकी बुद्धि साम्या- वस्थामें पहुँच नहीं गई है, इस कर्मविपाकके नियमके विषयमें अपनी ममत्व-बुद्धि उत्पन्न कर लेते हैं, और क्रोधसे अथवा द्वेषसे आघातकी अपेक्षा अधिक प्रत्याघात करके आघातका बदला लिया करते हैं; अथवा अपनेसे दुबले मनुष्यके साधारण या काल्प- निक अपराधके लिये प्रतिकार-बुद्धिके निमित्तसे उसको लूट कर अपना फायदा कर लेनेके लिये सदा प्रवृत्त होते हैं। किंतु साधारण मनुष्योंके समान बदला लेनेकी, दंभकी, अभिमानकी, क्रोधसे – लोभसे, या द्वेषसे दुर्बलोंको लूटनेकी अथवा टेकसे अपने अभिमान, शेखी, सत्ता और शक्तिकी प्रदर्शनी दिखलानेकी बुद्धि जिसके मनमें न रहे, उसकी शांत, निर्वैर और सम-बुद्धि वैसेही नहीं बिगड़ती है, जैसे कि अपने ऊपर गिरी हुई गेंदको सिर्फ़ पीछे लौटा देनेसे बुद्धिमें कोईभी विकार नहीं उपजता; और

३९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लोकसंग्रहकी दृष्टिसे ऐसे प्रत्याघातस्वरूप कर्म करना उसका धर्म अर्थात् कर्तव्य हो जाता है, कि जिससे दुष्टोंका दबदबा बढ़ कर कहीं गरीबोंपर अत्याचार न होने पावे ( गीता ३. २५ ) । गीताकेरे सा उपदेशका सार यही है, कि ऐसे प्रसंगपर सम-बुद्धिसे किया हुआ घोर युद्धभी धर्म्य और श्रेयस्कर है । वैरभाव न रखकर सबसे बर्तना, दुष्टोंके साथ दुष्ट न बन जाना, क्रोध करनेवालेपर क्रुद्ध न होना आदि धर्म- तत्त्व स्थितप्रज्ञ कर्मयोगीको मान्य तो हैही; परंतु संन्यासमार्गका यह मत कर्मयोग नहीं मानता, कि 'निर्वैर' शब्दका अर्थ केवल निष्क्रिय अथवा प्रतिकारशून्य है; किंतु वह निर्वैर शब्दका सिर्फ इतनाही अर्थ मानता है कि वैर अर्थात् मनकी दुष्ट बुद्धि छोड़ देनी चाहिये; और जब कि कर्म किसीके छूटने हैही नहीं, तब उसका कथन है, कि सिर्फ़ लोकसंग्रहके लिये अथवा प्रतिकारार्थ जितने कर्म आवश्यक और शक्य हों, उतने कर्म मनमें दुष्ट बुद्धिको स्थान न देकर - केवल कर्तव्य समझ - वैराग्य और निःसंग-बुद्धिसे करते रहना चाहिये ( गीता ३. १९ ) । अतः इस श्लोकमें ( गीता ११. ५५ ) सिर्फ 'निर्वैर' पदका प्रयोग न करते हुए - मत्कर्मकृन् मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पांडव ॥ उसके पूर्व इस दूसरे महत्त्वके विशेषणकाभी प्रयोग करके - कि 'मत्कर्मकृत्' अर्थात् “ मेरे याने परमेश्वरके प्रीत्यर्थ अर्थात् परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे सारे कर्म करनेवाला ”

  • भगवानने गीतामें निर्वैरत्व और निष्काम कर्मका, भक्तिकी दृष्टिसे, मेल मिला दिया है । इसीसे शांकरभाष्य तथा अन्य टीकाओंमेंभी कहा है, कि इस श्लोकमें पूरे गीता-शास्त्रका निचोड़ आ गया है । गीतामें यह कहींभी नहीं बतलाया, कि बुद्धिको निर्वैर करनेके लिये या उसके निर्वैर हो चुकने परभी, सभी प्रकारके कर्म छोड़ देने चाहिये । इस प्रकार प्रतिकारका कर्म निर्वैरत्व और परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे करनेपर कर्ताको उसका कोईभी पाप या दोष तो लगताही नहीं; उलटे, प्रतिकारका काम हो चुकनेपर, जिन दुष्टोंका प्रतिकार किया गया है, उन्हींका आत्मौपम्य-दृष्टिसे कल्याण करनेकी बुद्धिभी मनसे नष्ट नहीं होनी । एक उदाहरण लीजिये; दुष्ट कर्मके कारण रावणको, निर्वैर और निष्पाप रामचंद्रने युद्धमें मार तो डाला; पर उसकी उत्तरक्रिया करनेमें जब विभीषण हिचकने लगा, तब रामचंद्रने उसको समझाया कि :- मरणांतानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम् । क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ॥ “ ( रावणके मनका ) वैर मरणके साथ चुकही गया । हमारा ( दुष्टोंका नाश करनेका ) काम हो चुका । अब यह जैसा तेरा ( भाई ) है, वैसाही मेराभी है । इसलिये इसका अग्निसंस्कार कर” ( वाल्मीकि रा. ६. १०९. २५ ) रामायणका