श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
६१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र संजय उवाच । § § दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥ पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥ ३ ॥ अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ ४ ॥ धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः ॥ ५ ॥ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ ६ ॥ । पूर्वज कुरु नामका राजा इस मैदानको हलसे बड़े कष्टपूर्वक जोता करता था, । अतएव उसको क्षेत्र ( या खेत ) कहते हैं। जब इंद्रने कुरुको यह वरदान दिया, । कि इस क्षेत्रमें जो लोग तप करते करते या युद्धमें मर जावेंगे, उन्हें स्वर्गकी । प्राप्ति होगी; तब उसने इस क्षेत्रमें हल चलाना छोड़ दिया ( मभा. शल्य. । ५३ ) । इंद्रके इस वरदानके कारणही यह क्षेत्र धर्मक्षेत्र या पुण्यक्षेत्र कहलाने । लगा । इस मैदानके विषयमें यह कथा प्रचलित है, कि यहींपर परशुरामने । एकीस बार सारी पृथ्वीको निःक्षत्रिय करके पितृतर्पण किया था; और अर्वाचीन । कालमेंभी इसी क्षेत्रपर बड़ी बड़ी लड़ाइयाँ हो चुकी हैं । ] संजयने कहा - ( २ ) उस समय पांडवोंकी सेनाको व्यूह रचकर ( खड़ी ) देख, राजा दुर्योधन ( द्रोण ) आचार्यके पास गया; और उनसे कहा लगा, कि - । [ महाभारत ( मभा. भी. १९. ४-७; मनु. ७. १९१ ) के उन अध्यायोंमें, । कि जो गीतासे पहले लिखे गये हैं, यह वर्णन है, कि जब कौरवोंकी सेनाका । भीष्मद्वारा रचा हुआ व्यूह पांडवोंने देखा; और जब उनको अपनी सेना । कौरवोंकी सेनासे कम दीख पड़ी, तब उन्होंने युद्धविद्याके अनुसार वज्र नामक । व्यूह रचकर अपनी सेना खड़ी की । युद्धमें प्रतिदिन ये व्यूह बदला करते थे । ] ( ३ ) हे आचार्य ! पांडुपुत्रोंकी इस बड़ी सेनाको देखिये, कि जिसकी व्यूहरचना तुम्हारे बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्रने ( धृष्टद्युम्न ) की है। ( ४ ) इसमें शूर, महाधनुर्धर, और युद्धमें भीम तथा अर्जुनसरीखे युयुधान ( सात्यकि ) , विराट और महारथी द्रुपद, ( ५ ) धृष्टकेतु, चेकितान और वीर्यवान् काशिराज, पुरुजित् कुंतिभोज, और नरश्रेष्ठ शैब्य, ( ६ ) इसी प्रकार पराक्रमी युधामन्यु और वीर्यशाली उत्तमौजा
पहला अध्याय ६११ अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम । नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥ भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥ अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥ अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥ एवं सुभद्राका पुत्र (अभिमन्यु) तथा द्रौपदीके (पांच) पुत्र-ये सभी महारथी हैं। | [ दस हजार धनुर्धारी योद्धाओके साथ अकेले युद्ध करनेवालेको महारथी | कहते हैं। दोनों ओरकी सेनाओंमें जो रथी, महारथी अथवा अतिरथी थे, उनका | वर्णन उद्योगपर्वके (१६४ से १७१ तक) आठ अध्यायोंमें किया गया है। वहाँ | बतला दिया है, कि धृष्टकेतु शिशुपालका बेटा था। इसी प्रकार पुरुजित् | कुंतिभोज, ये दो भिन्न भिन्न पुरुषोंके नाम नहीं है। जिस कुंतिभोज राजाको | कुंती गोद दी गई थी, पुरुजित् उसका औरस पुत्र था, और कुंतिभोज उसके | कुलका नाम है; एवं यह वर्णन पाया जाता है, कि वह धर्म, भीष्म और | अर्जुनका मामा था। ( मभा. उ. १७१. २ ) । युधामन्यु और उत्तमौजा, दोनों | पांचाल्य थे; और चेकितान एक यादव था। युधामन्यु और उत्तमौजा, युद्धमें, | दोनों अर्जुनके चक्र-रक्षक थे। शैव्य शिबी देशका राजा था। ] ( ७ ) हे द्विजश्रेष्ठ ! अब हमारी ओर, सेनाके जो मुख्य मुख्य नायक हैं, उनके नामभी मैं आपको सुनाता हूँ; ध्यान देकर सुनिये। ( ८ ) आप और भीष्म, कर्ण और रणजित् कृप, अश्वत्थामा और ( दुर्योधनके सौ भाइयोंमेंसे एक ) विकर्ण, तथा सोमदत्तका पुत्र ( भूरिश्रवा ), ( ९ ) एवं इनके सिवा बहुतेरे अन्यान्य शूर मेरे लिये प्राण देनेको तैयार हैं; और सभी नाना प्रकारके शस्त्र चलानेमें निपुण तथा युद्धमें प्रवीण हैं। ( १० ) इस प्रकार हमारी यह सेना - जिसकी रक्षा स्वयं भीष्म कर रहे हैं - अपर्याप्त अर्थात् अपरिमित या अमर्यादित है; किंतु उनकी ( पांडवों ) वह सेना - जिसकी रक्षा भीम कर रहा है - पर्याप्त अर्थात् परिमित या मर्यादित है। | [ इस श्लोकमें 'पर्याप्त' और 'अपर्याप्त' शब्दोंके अर्थके विषयमें मतभेद | है। 'पर्याप्त'का सामान्य अर्थ 'बस' या 'काफ़ी' होता है, इसलिये कुछ लोग यह | अर्थ बतलाते हैं, कि "पांडवोंकी सेना काफ़ी है; और हमारी काफ़ी नहीं है।" | परंतु यह अर्थ ठीक नहीं है। पहले उद्योगपर्वमें, धृतराष्ट्रसे अपनी सेनाका वर्णन | करते समय उक्त मुख्य मुख्य सेनापतियोंके नाम बतलाकर दुर्योधनने कहा है'
६१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥ कि “मेरी सेना बड़ी और गुणवान् है, इसलिये जीत मेरीही होगी” ( उ. ५४. ६०-७० ) । इसी प्रकार आगे चलकर भीष्मपर्वमें, जिस समय द्रोणाचार्यके पास दुर्योधन फिरसे सेनाका वर्णन कर रहा था, उस समयभी, गीताके उपर्युक्त श्लोकोंके समानही श्लोक उसने अपने मुंहसे ज्यों-के-त्यों कहे है ( भीष्म ५१. ४-६ ) । और तीसरी बात यह है, कि सब सैनिकोंको प्रोत्साहित करनेके लियेही हर्षपूर्वक यह वर्णन किया गया है । इन सब बातोंका विचार करनेसे इस स्थानपर ‘अपर्याप्त’ शब्दका ‘अमर्यादित, अपार या अगणित’ के सिवा और कोई अर्थही हो नहीं सकता । ‘पर्याप्त’ शब्दका धात्वर्थ ‘चहुँ ओर (परि-)वेष्टन करने- योग्य’ ( आप् = प्राप्तना ) है । परंतु ‘अमुक कामके लिये पर्याप्त’ या ‘अमुक मनुष्यके लिये पर्याप्त’ इस प्रकार पर्याप्त शब्दके पीछे चतुर्थी अर्थके दूसरे शब्द जोड़कर प्रयोग करनेसे ‘पर्याप्त’ शब्दका यह अर्थ हो जाता है – ‘उस कामके लिये या मनुष्यके लिये भरपूर अथवा समर्थ ।’ और यदि ‘पर्याप्त’के पीछे कोई दूसरा शब्द न रखा जावे, तो केवल ‘पर्याप्त’ शब्दका अर्थ होता है ‘भरपूर, परिमित या जिसकी गिनती की जा सकती है।’ प्रस्तुत श्लोकमें ‘पर्याप्त’ शब्दके पीछे दूसरा शब्द नहीं है, इसलिये यहाँपर उसका उपर्युक्त दूसरा अर्थ (परिमित या मर्यादित) विवक्षित है; और महाभारतके अतिरिक्त अन्यत्रभी ऐसे प्रयोग किये जानेके उदाहरण ब्रह्मानंदगिरिकृत टीकामें दिये गये है। कुछ लोगोंने यह उपपत्ति बतलाई है, कि दुर्योधन भयसे अपनी सेनाको ‘अपर्याप्त’ अर्थात् ‘अधूरा’ कहता है; परंतु यह ठीक नहीं है। क्योंकि, दुर्योधनके डर जानेका वर्णन कहींभी नहीं मिलता, किंतु इसके विपरीत यह वर्णन पाया जाता है, कि दुर्योधनकी बड़ी भारी सेनाको देखकर पांडवोंने वज्र नामक व्यूह रचा; और कौरवोंकी अपार सेनाको देख युधिष्ठिरको बहुत खेद हुआ था (महा. भीष्म. १९. ५; २१. १) । पांडवोंकी सेनाका सेनापति धृष्टद्युम्न था, परंतु “भीम रक्षा कर रहा है” कहनेका कारण यह है, कि पहले दिन पांडवोंने वज्र नामका जो व्यूह रचाथा, उसकी रक्षाके लिये इस व्यूहके अग्रभागमे भीमही नियुक्त किया गया था; अतएव सेनारक्षककी दृष्टिसे दुर्योधनको वही सामने दिखाई दे रहा था ( महा. भीष्म. १९. ४-११, ३३, ३४) ; और इसी अर्थमें इन दोनों सेनाओके विषयमें महाभारतके गीताके पहलेके अध्यायोंमें ‘भीमनेत्र’ और ‘भीष्मनेत्र’ कहा गया है (महा. भी. २०.१)।] ( ११ ) (तो अब) नियुक्तिके अनुसार सब अयनोंमें अर्थात् सेनाके भिन्न भिन्न प्रवेशद्वारोंमे रहकर तुम सबको मिल करके भीष्मकीही सभी ओरसे रक्षा करनी चाहिये ।
पहला अध्याय ६१३ § § तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥ ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥ ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥ पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः । पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥ | [ सेनापति भीष्म स्वयं पराक्रमी और किसीसेभी हार जानेवाले न थे । | " सभी ओरसे सबको उनकी रक्षा करनी चाहिये", इस कथनका कारण दुर्योधनने | दूसरे स्थलपर ( मभा. भी. १५. १५-२०; ९९. ४०, ४१ ) । यह बतलाया है, | कि भीष्मका निश्चय था कि हम शिखंडीपर शस्त्र न चलावेंगे, इसलिये | शिखंडीकी ओरसे भीष्मका घात होनेकी संभावना थी, अतएव सबको सावधानी | रखनी चाहिये :- अरक्ष्यमाणं हि वृको हन्यात् सिंहं महाबलम् । मा सिंहं जंबुकेनेव घातयेथाः शिखंडिना ॥ | " महाबलवान् सिंहकी रक्षा न करें, तो भेड़िया उसे मार डालेगा; इसलिये | जंबुक-सदृश शिखंडीसे सिंहका घात न होने दो ।" शिखंडीको छोड़ और दूसरे | किसीकीभी खबर लेनेके लिये भीष्म अकेलेही समर्थ थे, अन्यकी किसी | सहायताकी उन्हें अपेक्षा न थी । ] ( १२ ) ( इतनेमें ) दुर्योधनको हर्षित हुए प्रतापशाली वृद्ध कौरव पितामह ( सेनापति भीष्म ) ने सिंहकी ऐसी बड़ी गर्जना कर ( लड़ाईकी सलामीके लिये ) अपना शंख फूंका । ( १३ ) इसके साथही साथ अनेक शंख, भेरी ( नौबतें ), पणव, आनक और गोमुख ( ये लड़ाईके बाजे ) एकदम बजने लगे; और इन बाजोंका नाद चारों ओर खूब गूंज उठा । ( १४ ) अनंतर सफ़ेद घोड़ोंसे जुते हुए बड़े रथमें बैठे हुए माधव ( श्रीकृष्ण ) और पांडवने ( अर्जुन ) ( यह सूचना करनेके लिये कि हमारे पक्षकीभी तैयारी है, प्रत्युत्तरके ढंगपर ) दिव्य शंख बजाये । ( १५ ) हृषीकेश अर्थात् श्रीकृष्णने पांचजन्य ( नामक शंख ), अर्जुनने देवदत्त, भयंकर कर्म करनेवाले वृकोदर अर्थात् भीमसेनने पौंड्र नामक बड़ा शंख फूंका;
६१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥ काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥ द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक् पृथक् ॥ १८ ॥ स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । नभश्च पृथिवीं चैव तुमलो व्यनुनादयन् ॥ १९ ॥ § § अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः । प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २० ॥ हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । अर्जुन उवाच । सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ २१ ॥ यावदेतान्निर्रीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् । कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥ योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥ ( १६ ) कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अनंतविजय, नकुल और सहदेवने सुघोष, एवं मणिपुष्पक, ( १७ ) महाधनुर्धर काशिराज, महारथी शिखंडी, धृष्टद्युम्न, विराट, तथा अजेय सात्यकि, ( १८ ) द्रुपद और द्रौपदीके ( पांचों ) बेटे, तथा महाबाहु सौभद्र ( अभिमन्यु ), इन सबने, हे राजा ( धृतराष्ट्र ) ! चारों ओर अपने अपने अलग अलग शंख बजाये । ( १९ ) आकाश और पृथिवीको दहला देनेवाली उस तुमुल आवाजने कौरवोंका कलेजा फाड़ डाला । ( २० ) अनंतर कौरवोंको व्यवस्थामें खड़े देख, परस्पर एक दूसरेपर शस्त्रप्रहार होनेका समय आनेपर धनुष्य उठाकर, कपिध्वज पांडव अर्थात् अर्जुन, ( २१ ) हे राजा धृतराष्ट्र ! श्रीकृष्णसे ये शब्द बोला : अर्जुनने कहा :- हे अच्युत ! मेरा रथ दोनों सेनाओके बीच ले चलकर खड़ा करो, ( २२ ) उतनेमें युद्धकी इच्छा से तैयार हुए इन लोगोंको में अवलोकन करता हूँ; और मुझे इस रणसंग्राममें किनके साथ लड़ना है, एवं ( २३ ) युद्धमें दुर्बुद्धि दुर्योधनका कल्याण
पहला अध्याय ६१५ संजय उवाच । एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥ करनेकी इच्छासे यहाँ जो लड़नेवाले जमा हुए हैं, उन्हें मैं देख लूं । संजय बोला :- ( २४ ) हे धृतराष्ट्र ! गुडाकेश अर्थात् आलस्यको जीतनेवाले अर्जुनके इस प्रकार कहनेपर हृषीकेश अर्थात् इंद्रियोंके स्वामी श्रीकृष्णने ( अर्जुनके ) उत्तम रथको दोनों सेनाओंके मध्यभागमें लाकर खड़ा कर दिया; और :- [ हृषीकेश और गुडाकेश शब्दोंके जो अर्थ ऊपर दिये गये हैं, वे टीका- कारोंके मतानुसार हैं। नारदपंचरात्रमेंभी 'हृषीकेश' की यह निरुक्ति है, कि हृषीक = इंद्रियां और उनका ईश = स्वामी ( नारदपंच. ५. ८. १७ ) ; और अमरकोशपर क्षीरस्वामीकी जो टीका है, उसमें लिखा है, कि हृषीक ( अर्थात् इंद्रियां ) शब्द हृष् = आनंद देना, इस धातुमे बना है; इंद्रियां मनुष्यको आनंद देती हैं, इसलिये उन्हें हृषीक कहते हैं । तथापि, यह शंका होती है, कि हृषीकेश और गुडाकेशके जो अर्थ ऊपर दिये गये हैं, वे ठीक हैं या नहीं ? क्योंकि, हृषीक ( अर्थात् इंद्रियां ) और गुडाका ( अर्थात् निद्रा या आलस्य ) ये शब्द प्रचलित नहीं हैं; हृषीकेश और गुडाकेश इन दोनों शब्दोंकी व्युत्पत्ति दूसरी रीतिसेभी लग सकती है । हृषीक + ईश और गुडाका + ईशके बदले हृषी + केश और गुडा + केश ऐसाभी पदच्छेद किया जा सकता है; और फिर ये अर्थ हो सकते हैं, कि हृषी अर्थात् हर्षसे खड़े किये हुए या प्रशस्त जिसके केश (बाल) हैं, वह श्रीकृष्ण; और गुडा अर्थात् गूढ़ या घने जिसके केश हैं, वह अर्जुन । भारतके टीकाकार नीलकंठने गुडाकेश शब्दका यह अर्थ, गीता १०. २० पर अपनी टीकामें विकल्पसे सूचित किया है; और सूतके बापका जो रोमहर्षण नाम है, उससे हृषीकेश शब्दकी उल्लिखित दूसरी व्युत्पत्तिकोभी असंभवनीय नहीं कह सकते । महाभारतके शांतिपर्वान्तर्गत नारायणीयोपाख्यानमें विष्णुके मुख्य मुख्य नामोंकी निरुक्ति देते हुए यह अर्थ किया है, कि हृषी अर्थात् आनंद- दायक ; और केश अर्थात् किरण ; और कहा है, कि सूर्यचंद्ररूप अपनी विभूतियोंकी किरणोंसे समस्त जगत्को हर्षित करता है, इसलिये उसे हृषीकेश कहते हैं ( महा. शांति. ३४१. ४७; ३४२. ६४, ६५; उद्यो. ६९. ९ ) ; और पहलेके श्लोकोंमें कहा गया है, कि उसी प्रकार केशव शब्दभी केश अर्थात् किरण शब्दसे बना है ( शां. ३४१. ४७ ) इनमेंसे कोईभी अर्थ क्यों न लें; पर श्रीकृष्ण और अर्जुनके ये नाम रखे जानेके, सभी अंशोंमें, योग्य कारण बतलाये जा नहीं सकते, लेकिन यह दोष नैरुक्तिकोंका नहीं है । जो व्यक्तिवाचक या विशेष नाम अत्यंत
६१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥ २५ ॥ तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् । आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥ २६ ॥ श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥ कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् । अर्जुन उवाच । § § दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥ सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥ गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥ निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥ | रूढ हो गये हैं, उनकी निरुक्ति बतलानेमें इस प्रकारकी अडचनोंका आना या | मतभेद हो जाना बिलकुल सहज बात है । ] (२५) भीष्म, द्रोण तथा सब राजाओंके सामने (वे) बोले, कि “अर्जुन ! (यहाँ) एकत्रित हुए इन कौरवोंको देखो ।” (२६) तब अर्जुनको दिखाई दिया, कि वहाँ पर इकट्ठे हुए सब (अपनेही) बड़े-बूढ़े, आजा, आचार्य, मामा, भाई, बेटे, नाती, मित्र, (२७) ससुर और स्नेही दोनोंही सेनाओंमें हैं; (और इस प्रकार) यह देखकर, कि वे सभी एकत्रित हमारे बांधव हैं, कुंतीपुत्र अर्जुन (२८) परम करुणासे व्याप्त होता हुआ खिन्न होकर यह कहने लगा :- अर्जुनने कहा :- हे कृष्ण ! युद्ध करनेकी इच्छासे (यहाँ) जमा हुए इन स्वजनोंको देखकर (२९) मेरे गात्र शिथिल हो रहे हैं, मुँह सूख रहा है, शरीरमें कँपकँपी उठकर रोएँभी खड़े हो गये हैं; (३०) गांडीव (धनुष्य) हाथसे गिर पड़ता है; और शरीरमेंभी सर्वत्र दाह हो रहा है; खड़ा नहीं रहा जाता और मेरा मन चक्कर-सा खा गया है । (३१) इसी प्रकार हे केशव ! (मुझे सब) लक्षण विपरीत दिखते हैं; और स्वजनोंको युद्धमें मारकर श्रेय अर्थात् कल्याण (होगा
पहला अध्याय ६१७ न कांक्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥ येषामर्थे कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥ आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥ ३४ ॥ एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ ३५ ॥ निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानातातयिनः ॥ ३६ ॥ तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् । स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ ३७ ॥ ऐसा ) नही दीख पड़ता । ( ३२ ) हे कृष्ण ! मुझे विजयको इच्छा नहीं, न राज्य चाहिये और न सुखभी । हे गोविंद ! राज्य, उपभोग या जीवित रहनेसेभी हमें उसका क्या उपयोग है ? ( ३३ ) जिनके लिये राज्यकी, उपभोगोंकी और सुखोंकी इच्छा करनी थी, वेही ये लोग जीव और संपत्तिकी आशा छोड़कर युद्धके लिये खड़े हैं । ( ३४ ) आचार्य, बड़े-बूढ़े, लड़के, दादा, मामा, ससुर, नाती, साले और संबंधी ( ३५ ) यद्यपि ये ( हमें ) मारनेके लिये खड़े हैं, तथापि हे मधुसूदन ! त्रैलोक्यके राज्यतकके लिये, मैं ( इन्हें ) भारनेकी इच्छा नहीं करता; फिर पृथ्वीकी बात है क्या चीज ? ( ३६ ) हे जनार्दन ! इन कौरवोंको मारकर हमारा कौन-सा प्रिय होगा ? यद्यपि ये आततायी हैं, तोभी इनको मारनेसे हमें पापही लगेगा । ( ३७ ) इसलिये हमें अपनेही बांधव कौरवोंको मारना उचित नहीं है। क्योंकि हे माधव ! स्वजनोंको मारकर हम सुखी क्योंकर होंगे ? | [ अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः । क्षेत्रदारापहरश्चैव षडेते आत- | तायिनः ।। ( वसिष्टस्मृ. ३. १६ ) अर्थात् घर जलानेके लिये आयाहुआ, विष | देनेवाला, हाथमें हथियार लेकर मारनेके लिये आया हुआ, धन लूटकर ले | जानेवाला और स्त्री या खेत हरणकर्ता - ये छः आततायी हैं। मनुनेभी कहा | है, कि इन दुष्टोंको बेधड़क जानसे मार डालें, इसमें कोई पातक नहीं है | ( मनु. ८. ३५०, ३५१ ) । ]
६१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥ कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् । कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३९ ॥ कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ ४० ॥ ( ३८ ) लोभसे इनकी बुद्धि नष्ट हो गई है, इन्हें कुलके क्षयसे होनेवाला दोष और मित्रद्रोहका पातक यद्यपि दिखाई नहीं देता, ( ३९ ) तथापि हे जनार्दन ! कुलक्षयका दोष हमें स्पष्ट दाख पड़ा रहा है, अतः इस पापसे पराङ्मुख होनेकी बात हमारे मनमें आये बिना कैसे रहेगी ? [ प्रथमसेही यह प्रत्यक्ष हो जानेपर, कि युद्धमें गुरुवध, सुहृद्वध और कुलक्षय होगा, लड़ाईसंबंधी अपने कर्तव्यके विषयमें अर्जुनको जो व्यामोह हुआ, उसका क्या बीज है ? गीतामें आगे जो प्रतिपादन है, उससे इसका क्या संबंध है ? और उस दृष्टिसे प्रथमाध्यायका कौन-सा महत्त्व है ? — इन सब प्रश्नोंका विचार गीतारहस्यके पहले और फिर चौदहवें प्रकरणमें हमने किया है, उसे देखो । इस स्थानपर ऐसी साधारण युक्तियोंका उल्लेख किया गया है, कि लोभसे बुद्धि नष्ट हो जानेके कारण दुष्टोंको अपनी दुष्टता जान न पड़ती हो, तो चतुर पुरुषोंको दुष्टोंके फंदेमें पड़कर दुष्ट न होना चाहिये – “ न पापे प्रतिपापः स्यात् ” उन्हें चुप रहना चाहिये । इन साधारण युक्तियोंका ऐसे प्रसंगपर कहाँतक उपयोग किया जा सकता है, अथवा करना चाहिये ? – यहभी ऊपरके समानही एक महत्त्वका प्रश्न है; और इसका गीताके अनुसार जो उत्तर है, उसका हमने गीतारहस्यके बारहवे प्रकरणमें ( पृ. ३९३-३९८ ) निरूपण किया है । गीताके अगले अध्यायोंमें जो विवेचन है, वह अर्जुनकी उन शंकाओंकी निवृत्ति करनेके लिये है, कि जो उसे पहले अध्यायमें हुई थीं; इस वातपर ध्यान दिये रहनेसे गीताका तात्पर्य समझनेमें किसी प्रकारका संदेह नहीं रह जाता । भारतीय युद्धमें एकही राष्ट्र और धर्मके लोगोंमें फूट हो गई थी; और वे परस्पर मरने- मारनेपर उतारू हो गये थे, इसी कारणसे उक्त शंकाएँ उत्पन्न हुई हैं । अर्वाचीन इतिहासमें जहाँ जहाँ ऐसे प्रसंग आये हैं, वहाँ वहाँ ऐसेही प्रश्न उपस्थित हुए हैं । अस्तु; कुलक्षयसे आगे जो जो अनर्थ होते हैं, उन्हें अर्जुन स्पष्ट कर कहता है । ] ( ४० ) कुलका क्षय होनेसे सनातन कुलधर्म नष्ट होते हैं, और (कुल)धर्मोंके
पहला अध्याय ६१९ अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ ४१ ॥ संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ ४२ ॥ दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः । उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥ उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ४४ ॥ § § अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४५ ॥ यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥ छूटनेसे समूचे कुलपर अधर्मकी धाक जमती है; (४१) हे कृष्ण ! अधर्मके फैलनेसे कुलस्त्रियाँ बिगड़ती हैं; हे वार्ष्णेय ! स्त्रियोंके बिगड़ जानेपर वर्णसंकर होता है। (४२) और वर्णसंकर होनेसे वह कुलघातकको और (समग्र) कुलको निश्चयही नरकमें ले जाता है; एवं पिंडदान और तर्पणादि क्रियाओके लुप्त हो जानेसे उनके पितरभी पतन पाते हैं। (४३) कुलघातकोंके इन वर्णसंकरकारक दोषोसे पुरातन जातिधर्म और कुलधर्म उत्पन्न होते हैं; (४४) और हे जनार्दन ! हम ऐसा सुनते आ रहे हैं, कि जिन मनुष्योंके कुलधर्म विच्छिन्न हो जाते हैं, उनको निश्चयही नरकवास होता है । (४५) देखो तो सही ! हम राज्य-सुख-लोभसे स्वजनोंको मारनेके लिये उद्यत हुए हैं, (सचमुचही) यह हमने एक बड़ा पाप करनेकी योजना की है ! (४६) इसकी अपेक्षा मेरा अधिक कल्याण तो इसमें होगा, कि मैं निःशस्त्र होकर प्रतिकार करना छोड़ दूं; (और ये) शस्त्रधारी कौरव मुझे रणमें मार डालें। संजयने कहा :- । [रथमें खड़े होकर युद्ध करनेकी प्रणाली थी, अतः “रथमें अपने स्थान- । पर बैठ गया” इन शब्दोंसे यही अर्थ अधिक व्यक्त होता है, कि खिन्न हो जानेके । कारण युद्ध करनेकी उसे इच्छा न थी। महाभारतमें कुछ स्थलोंपर इन रथोंका । जो वर्णन है, उससे दीख पड़ता है, कि भारतकालीन रथ प्रायः दो पहियोंके । होते थे; बड़े-बड़े रथोंमें चार-चार घोड़े जोते जाते थे; और रथी एवं
६२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र संजय उवाच। एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४७ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ (४७) इस प्रकार रणभूमिमें भाषण कर, शोकमे व्यथितचित्त अर्जुन (हाथका) धनुष्य-बाण त्याग कर रथमें अपने स्थानपर योंही बैठ गया । । सारथी, दोनों अगले भागमें परस्पर एक दूसरेकी आजूबाजूमें बैठते थे । रथ । की पहचानके लिये प्रत्येक रथपर एक प्रकारकी विशेष ध्वजा लगी रहती थी । । यह बात प्रसिद्ध है, कि अर्जुनकी ध्वजापर प्रत्यक्ष हनुमानही बैठे थे । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, अर्जुनविषादयोग नामक पहला अध्याय समाप्त हुआ । । [ गीतारहस्यके पहले ( पृष्ठ ३ ), तीसरे ( पृष्ठ ६० ), और ग्यारहवें । ( पृष्ठ ३५३ ) प्रकरणमें इस संकल्पका ऐसा अर्थ किया गया है, कि गीतामें । केवल ब्रह्मविद्याही नहीं है, किंतु उसमें ब्रह्मविद्याके आधारपर कर्मयोगका । प्रतिपादन किया गया है । यद्यपि यह संकल्प महाभारतमें नहीं है, परंतु यह । गीतापर संन्यासमार्गी टीका होनेके पहलेका होगा ; क्योंकि, संन्यास-मार्गका । कोईभी पंडित ऐसा संकल्प न लिखेगा । ओर इसमे यह प्रकट होता है, कि गीतामें । संन्यास-मार्गका प्रतिपादन नहीं है, किंतु कर्मयोगका शास्त्र समझकर, संवाद- । रूपसे विवेचन है । संवादात्मक और शास्त्रीय पद्धतिका भेद रहस्यके चौदहवें । प्रकरणके आरंभमें बतलाया गया है । ]
दूसरा अध्याय ६२१ द्वितीयोऽध्यायः । संजय उवाच । तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच । कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥ क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥ ३ ॥ अर्जुन उवाच । § § कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥ ४ ॥ दूसरा अध्याय । संजयने कहा :- ( १ ) इस प्रकार करुणासे व्याप्त, आँखोंमें आँसू भरे हुए और विषाद पानेवाले अर्जुनसे मधुसूदन ( श्रीकृष्ण ) यह बोले - श्रीभगवानने कहा :- ( २ ) हे अर्जुन ! संकटके इस प्रसंगपर तेरे ( मनमें ) यह मोह ( कश्मलं ) कहाँसे आ गया, जिसका कि आर्योंने अर्थात् सत्पुरुषोंने ( कभी ) आचरण नहीं किया, जो अधोगतिको पहुँचानेवाला है, और जो दुष्कीर्तिकारक है ? ( ३ ) हे पार्थ ! ऐसा नामर्द मत हो ! यह तुझे शोभा नहीं देता । अरे, शत्रुओंको ताप देनेवाले ! अंतःकरणकी इस क्षुद्र दुर्बलताको छोड़ ( युद्धके लिये ) खड़ा हो । | [ इस स्थानपर हमने 'परंतप' शब्दका अर्थ कर तो दिया है; परंतु | बहुतेरे टीकाकारोंका यह मत हमारी रायमे युक्तिसंगत नही है, कि अनेक | स्थानोंपर आनेवाले विशेषणरूपी संबोधन या कृष्ण-अर्जुनके नाम गीतामें हेतु- | गर्भित अथवा अभिप्रायसहित प्रयुक्त हुए हैं। हमारा मत है, कि पद्यरचनाके | लिये अनुकूल नामोंका प्रयोग किया गया है; और उनमें कोई विशेष अर्थ उद्दिष्ट | नहीं है। अतएव कई बार हमने श्लोकमें प्रयुक्त नामोंकाही हूबहू अनुवाद न | कर 'अर्जुन' या 'श्रीकृष्ण' ऐसा साधारण अनुवाद कर दिया है।] अर्जुनने कहा :- ( ४ ) हे मधुसूदन ! मैं (परम-)पूज्य भीष्म और द्रोणके
६२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गुरुनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव भुंजीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५ ॥ न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७॥ साथ, हे शत्रुनाशने ! युद्धमें बाणोंसे कैसे लडूंगा ? ( ५ ) महात्मा गुरु लोगोंको न मारकर इस लोकमें भीख माँग करके पेट पालनाभी श्रेयस्कर है; परंतु अर्थलोलुप ( हों, तोभी ) गुरु लोगोंको मारकर इसी जगतमें मुझे उनके रक्तसे सने हुए भोग भोगने पड़ेंगे । | [ 'गुरु लोगोंको' इस बहुवचनान्त शब्दसे 'बड़े-बूढ़ों 'काही अर्थ लेना | चाहिये । क्योंकि, विद्या सिखानेवाला गुरु एक द्रोणाचार्यको छोड़, सेनामें | और कोई दूसरा न था । युद्ध छिड़नेके पहले जब ऐसे गुरु लोगों – अर्थात् भीष्म, | द्रोण और शल्य – की पादवंदना कर उनका आशीर्वाद लेनेके लिये युधिष्ठिर | रणांगणमें अपना कवच उतारकर नम्रतासे उनके समीप गये, तब शिष्ट- | संप्रदायका उचित पालन करनेवाले युधिष्ठिरका अभिनंदन कर सबने इसका | कारण बतलाया, कि दुर्योधनकी ओरसे हम क्यों लड़ेंगे ? अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज ! बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥ | “ सच तो यह है, कि मनुष्य अर्थका गुलाम है, अर्थ किसीका गुलाम नहीं; | इसलिये हे युधिष्ठिर महाराज ! कौरवोंने मुझे अर्थसे जकड़ रखा है ” ( महा. | भी. अ. ४३, श्लो. ३५. ५०, ७६ ) । ऊपर जो यह 'अर्थलोलुप' शब्द है, वह | इसी श्लोकके अर्थका द्योतक है ।] ( ६ ) हम जय प्राप्त करें या हमें ( वे लोग ) जीत ले – इन दोनों बातोंमेंसे हमें श्रेयस्कर कौन है, यहभी समझ नहीं पड़ता। जिन्हें मारकर फिर जीवित रहनेकी इच्छा नहीं, वेही ये कौरव ( युद्धके लिये ) सामने डटे हैं । | [ 'गरीयः' शब्दसे प्रकट होता है, कि अर्जुनके मनमें “ अधिकांश लोगोंके | अधिक सुख ”के समान कर्म और अकर्मकी लघुता-गुरुता ठहरानेकी कसौटी थी, | पर वह इस बातका निर्णय नहीं कर सकता था, कि उन कसौटीके अनुसार | किसकी जीत होनेमें भलाई है ? गीतारहस्य प्र. ४, पृ. ८४-८७ देखो ।] ( ७ ) दीनतासे मेरी स्वाभाविक वृत्ति नष्ट हो गई, है ( मुझे अपने ) धर्म अर्थात्
दूसरा अध्याय ६२३ न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् । अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥ संजय उवाच । एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप । न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥ ९ ॥ तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ १० ॥ कर्तव्यका मनमें मोह हो गया है, इसलिये मैं तुमसे पूछता हूँ, कि जो निश्चयसे श्रेयस्कर हो, वह मुझे बतलाओ । मैं तुम्हारा शिष्य हूँ । मुझ शरणागतको समझाइये । (८) क्योंकि पृथ्वीका निष्कंटक समृद्ध राज्य या देवताओं (स्वर्ग) काभी स्वामित्व मिल जाय, तथापि मुझे ऐसा कुछभी (साधन) नज़र नहीं आता, कि जो इंद्रियोंको सुखा डालनेवाले मेरे इस शोकको दूर करे । संजयने कहा :- (९) इस प्रकार शत्रुसंतापी गुडाकेश अर्थात् अर्जुनने हृषीकेशसे (श्रीकृष्ण) कहा; और फिर श्रीगोविन्दसे 'मैं न लडूंगा' कहकर (वह) चुप हो गया ! (१०) (फिर) हे भारत (धृतराष्ट्र) ! दोनों सेनाओंके बीच खिन्न होकर बैठे हुए अर्जुनसे श्रीकृष्ण कुछ हँसते हुए-से बोले । । [ एक ओर तो क्षत्रियका स्वधर्म और दूसरी ओर गुरुहत्या एव कुलक्षय- | के पातकोंका भय - इस खींचातानीमें 'मरें या मारें', के झमेलेमें पड़कर, लड़ाई | छोड़कर भिक्षा माँगनेके लिये तैयार हो जानेवाले अर्जुनको अब भगवान् इस | जगतके उसके सच्चे कर्तव्यका उपदेश करते हैं । अर्जुनकी शंका थी, कि लड़ाई | जैसे घोर कर्मसे आत्माका कल्याण न होगा । इसीसे, जिन उदार पुरुषोंने परब्रह्मका | ज्ञान प्राप्तकर अपने आत्माका पूर्ण कल्याण कर लिया है, वे इस दुनियामें कैसा | बर्ताव करते हैं; यहींसे गीताके उपदेशका आरंभ हुआ है । भगवान् कहते हैं, | कि संसारकी चाल-ढालके परखनेसे दीख पड़ता है, कि आत्मज्ञानी पुरुषोंके | जीवन बितानेके अनादिकालसे दो मार्ग चले आ रहे हैं (गीता ३. ३; गीता रहस्य | प्र. ११) । आत्मज्ञान संपादन करनेपर शुकसरीखे पुरुष संसार छोड़कर आनंदसे | भिक्षा माँगते फिरते हैं, तो जनकसरीखे दूसरे आत्मज्ञानी ज्ञानके पश्चात्भी | स्वधर्मानुसार लोगोंके कल्याणार्थ संसारके सैकड़ों व्यवहारोंमें अपना समय | लगाया करते हैं । पहले मार्गको सांख्य या सांख्यनिष्ठा कहते हैं; और दूसरेको | कर्मयोग या योग कहते हैं (श्लोक ३९) । यद्यपि ये दोनों निष्ठाएँ प्रचलित हैं, | तथापि गीताका यह सिद्धान्त है, कि इनमेंसे कर्मयोगही अधिक श्रेष्ठ है (गीता
६२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच । § § अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥ न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥ । ५.२) - यह सिद्धान्त आगे बतलाया जावेगा। इन दोनों निष्ठाओंमेंसे । अर्जुनके मनकी चाह अब संन्यासनिष्ठाकी ओरही अधिक बढ़ी हुई थी। अतएव । उसी मार्गके तत्त्वज्ञानसे अर्जुनकी भूल पहले उसे सुझा दी गई है; और । आगे ३९ वें श्लोकसे भगवानने कर्मयोगका प्रतिपादन करना आरंभ कर दिया । है। सांख्य-मार्गवाले पुरुष ज्ञानके पश्चात् कर्म भलेही न करतें हों; पर उनका । ब्रह्मज्ञान और कर्मयोगका ब्रह्मज्ञान कुछ भिन्न भिन्न नहीं है। तब सांख्य-निष्ठाके । अनुसार देखने परभी आत्मा यदि अविनाशी और नित्य है, तो फिर किंचित् । उपहासपूर्वक अर्जुनसे भगवानका प्रथम कथन है, कि तेरी यह बकबक व्यर्थ । है, कि “मैं अमुकको कैसे मारूँ?” ] श्रीभगवानने कहा :- ( ११ ) जिनका शोक न करना चाहिये, तू उन्हींका शोक कर रहा है और ज्ञानकीभी हाँकता है ! किसीके प्राण ( चाहे ) जायें या ( चाहे ) रहें; ज्ञानी पुरुष उनका शोक नहीं करते । । [ इस श्लोकमें यह कहा गया है, कि ज्ञानी लोग स्वाभाविक प्राणोंके । जानेका या रहनेकाभी शोक नहीं करते । इनमेंसे जानेका शोक करना तो । स्वाभाविक है उसे न करनेका उपदेश करना उचित है। पर टीकाकारोंने यह । शंका करके, कि प्राण रहनेका शोक कैसा और क्यों करना चाहिये; उसके । विषयमें बहुत-कुछ चर्चा की है; और कई एकोंने कहा है, कि मूर्ख एवं अज्ञानी । लोगोंके प्राण रहना शोककाही कारण है। किंतु इतनी बालकी खाल निकालते । रहनेकी अपेक्षा ‘शोक करना’ शब्दकाही ‘भला या बुरा लगना’ अथवा । ‘परवाह करना’ ऐसा व्यापक अर्थ करनेसे कोईभी अडचन रह नहीं जाती । । यहाँ इतनाही वक्तव्य है, कि ज्ञानी पुरुषको दोनों बातें एकहीसी होती हैं। ] ( १२ ) देखो न; ऐसा तो हैही नहीं, कि मैं ( पहले ) कभीही था नहीं । ऐसाभी नहीं, कि तू और ये राजा लोग ( पहले ) न थे; और ऐसाभी नहीं हो सकता, कि हम सब लोग अब आगे न होंगे । । [ इस श्लोकपर रामानुज-भाष्यमें जो टीका है, उसमें लिखा है :- इस । श्लोकसे ऐसा सिद्ध होता है, कि ‘मैं’ अर्थात् परमेश्वर और ‘तू एवं राजा लोग’ । अर्थात् अन्यान्य आत्मा, ये दोनों यदि पहले ( अतीतकालमें ) थे; और आगे
दूसरा अध्याय ६२५ देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥ § § मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ | होनेवाले हैं, तो परमेश्वर और आत्मा, ये दोनों पृथक्, स्वतंत्र और नित्य हैं। | किंतु यह अनुमान ठीक नहीं है; सांप्रदायिक आग्रहका है; क्योंकि इस स्थान- | पर प्रतिपाद्य इतनाही है, कि सभी नित्य हैं; उनका पारस्परिक संबंध यहाँ | बतलाया नहीं है और बतलानेकी कोई आवश्यकताभी न थी। जहाँ वैसा प्रसंग | आया है, वहाँ गीतामेंही ऐसा अद्वैत सिद्धान्त (गीता ८. ४; १३. ३१) स्पष्ट | रीतिसे बतला दिया है, कि समस्त प्राणियोंके शरीरमे देहधारी आत्मा मैं अर्थात् | एकही परमेश्वर हूँ।] (१३) जिस प्रकार देह धारण करनेवालेको इस देहमें बालपन, जवानी, और बुढ़ापा (प्राप्त होता है), उसी प्रकार (आगे) दूसरी देह प्राप्त हुआ करती है। (इसलिये) इस विषयमें ज्ञानी पुरुषोंको मोह नहीं होता । | [अर्जुनके मनमें यही तो बड़ा डर या मोह था, कि "अमुकको मैं कैसे | मारूँ।" इसलिये उसे दूर करनेके निमित्त, तत्त्वकी दृष्टिसे भगवान् पहले | इसीका विचार बतलाते हैं, कि मरना क्या है और मारना क्या है (श्लोक | ११-३०)। मनुष्य केवल देहरूपी निरी वस्तुही नहीं है; वरन् देह और | आत्माका समुच्चय है। इनमेंसे 'मैं' इस अहंकाररूपमें व्यक्त होनेवाला आत्मा नित्य | और अमर है; वह आज है, कल था और कलभी रहेगाही। अतएव मरना या | मारना, ये शब्दही उसके लिये उपयुक्त नहीं किये जा सकते और उसका शोकभी | न करना चाहिये। अब बाकी रह गई देह; सो यह प्रकटही है, कि वह अनित्य | और नाशवान् है; आज नहीं तो कल, कल नहीं तो सौ वर्षोंमें सही; उसका तो | नाश होनेहीको है - "अद्य वाऽब्दशतान्ते वा मृत्युर्वै प्राणिनां ध्रुवः" (भाग. | १०. १ ३८); और एक देह छूटभी गई, तोभी कर्मोंके अनुसार आगे दूसरी | देह मिलेविना नहीं रहती, अतएव उसकाभी शोक करना उचित नहीं। सारांश, | देह या आत्मा, दोनों दृष्टियोंसे विचार करें, तो सिद्ध होता है, कि मरे हुएका | शोक करना पागलपन है, यह पागलपन भलेही हो; पर यह अवश्य बतलाना | चाहिये, कि वर्तमान देहका नाश होते समय जो क्लेश होते हैं, उनके लिये | शोक क्यों न करें? अतएव अब भगवान् इन कायिक सुखदुःखोंका स्वरूप बतला | कर दिखलाते हैं, कि उनकाभी शोक करना उचित नहीं है।] (१४) हे कुंतिपुत्र ! शीतोष्ण या सुखदुःख देनेवाले, ये मात्राओं अर्थात् गी. र. ४०
६२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥ बाह्य सृष्टिके पदार्थोंके ( इंद्रियोंमे ) जो संयोग हैं, उनकी उत्पत्ति होती है और नाश होता है। ( अतएव ) वे अनित्य अर्थात् विनाशवान् हैं। हे भारत ! ( शोक न करके ) उनको तू सहन कर । ( १५ ) क्योंकि, हे नरश्रेष्ठ ! सुख और दुःखको समान माननेवाले जिस ज्ञानी पुरुषको इनकी व्यथा नहीं होती, वही अमृतत्व अर्थात् अमृत-ब्रह्मकी स्थितिको प्राप्तकर लेनेमें समर्थ होता है। [ जिस पुरुषको ब्रह्मात्मैक्यज्ञान होनेपरभी नामरूपात्मक जगत् मिथ्या नहीं जान पड़ा है, वह बाह्य पदार्थों और इंद्रियोंके संयोगसे होनेवाले शीत-उष्ण आदि या सुखदुःख आदि विकारोंको सत्य मानकर आत्मामें उनका अध्यारोप किया करता है; और इस कारणसे उसको दुःखकी पीड़ा होती है। परंतु जिसने यह जान लिया है, कि ये सभी विकार प्रकृतिके हैं, आत्मा अकर्ता और अलिप्त है; उसे सुख और दुःख एकहीसे हैं। अब भगवान् अर्जुनसे यह कहते हैं, कि इस सम-बुद्धिसे तू उनको सहन कर। और यही अर्थ अगले अध्यायमें अधिक विस्तारसे वर्णित है। शांकरभाष्यमें 'मात्रा' शब्दका अर्थ इस प्रकार किया है :- " मीयते एभिरिति मात्राः " अर्थात् जिनसे बाहरी पदार्थ मापे जाते हैं या ज्ञात होते हैं, उन्हें इंद्रियाँ कहते हैं। पर मात्राका अर्थ इंद्रियाँ न करके, कुछ लोग ऐसाभी अर्थ करते हैं, कि इंद्रियोंसे मापे जानेवाले शब्दरूप आदि बाह्य पदार्थोंको मात्रा कहते हैं; और उनका इंद्रियोंसे तो स्पर्श अर्थात् संयोग होता है, उसे मात्रास्पर्श कहते हैं। इसी अर्थको हमने स्वीकृत किया है। क्योंकि, इस श्लोकके विचार गीतामें आगे जहाँपर आये हैं (गीता ५. २१-२३), वहाँ 'बाह्यस्पर्श' शब्द है। और 'मात्रास्पर्श' शब्दका, हमारे किये हुए अर्थके समान, अर्थ करनेसे इन दोनों शब्दोंका अर्थ एकही-सा हो जाता है। यद्यपि इस प्रकार ये दोनों शब्द मिलते-जुलते हैं, तोभी मात्रास्पर्श शब्द पुराना दीख पड़ता है। क्योंकि मनु- स्मृतिमें (६. ५७) इसी अर्थमें मात्रासंग शब्द आया है; और बृहदारण्यकोप- निषदमें वर्णन है, कि मरनेपर ज्ञानी पुरुषके आत्माका मात्राओंसे असंसर्ग (मात्राऽसंसर्गः) होता है अर्थात् वह मुक्त हो जाता है; और उसे संज्ञा नहीं रहती (बृ. माध्यं. ४. ५. १४; वे. सू. शां. भा. १. ४. २२)। शीतोष्ण और सुखदुःख पद उपलक्षणात्मक हैं; उनमेंही राग-द्वेष, सत्-असत् और मृत्यु-अमरत्व इत्यादि परस्पर-विरोधी द्वंद्वोंका समावेश होता है। ये सब माया-सृष्टिके द्वंद्व हैं। सच्चा परब्रह्म, नासदीय सूक्तमें जो वर्णन है, उसके अनुसार, इन द्वंद्वोंसे परे है। इसलिये प्रकट है, कि अनित्य माया-सृष्टिके इन द्वंद्वोंको शांतिपूर्वक सहकर, इन द्वंद्वोंसे बुद्धिको छुड़ाये बिना ब्रह्म-प्राप्ति नहीं होती (गीता २. ४५; ७. २८;
दूसरा अध्याय ६२७ § § नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥ | गीतार. प्र. ९, पृष्ठ २२६ और २४५-२४७) । अब अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे | इसी अर्थको व्यक्तकर दिखलाते हैं :- ] ( १६ ) जो नहीं ( असत् ) है, वह होही नहीं सकता; और जो है ( सत् ), उसका अभाव नहीं होता; तत्त्वज्ञानी पुरुषोंने इस प्रकार ‘है और नहीं है’ (इन सत् और असत् ) इन दोनोंका अंत देख लिया है – अर्थात् अंत देखकर उनके स्वरूपका निर्णय किया है । | [ इस श्लोकके ‘अन्त’ शब्दका अर्थ और ‘राद्धान्त’, ‘सिद्धान्त’ एवं | ‘कृतान्त’ शब्दोंके ( गीता १८. १३ ) ‘अन्त’ शब्दका अर्थ एकही है। शाश्वत-, | कोशमें ( शा. ३८१ ) ‘अन्त’ शब्दके ये अर्थ हैं – “स्वरूपप्रान्तयोरन्तमन्तिकेऽपि | प्रयुज्यते । ” इस श्लोकमें सत्का अर्थ ब्रह्म और असत्का अर्थ नामरूपात्मक | दृश्य जगत् है ( गीतार. प्र. ९, पृ. २२६-२२७; और २४५-२४७ ) | स्मरण रहे, कि “ जो है, उसका अभाव नहीं होता ” इत्यादि तत्त्व देखनेमे | यद्यपि सत्कार्यवादके समान दीख पड़े, तोभी उसका अर्थ कुछ निराला है। जहां | एक वस्तुमे दूसरी वस्तु निर्मित है – उदा., बीजसे वृक्ष – वहाँ सत्कार्यवादका तत्त्व | उपयुक्त होता है। प्रस्तुत श्लोकमें इस प्रकारका प्रश्न नहीं है; वक्तव्य इतनाही | है, कि सत् अर्थात् जो है, उसका अस्तित्व ( भाव ) और असत् अर्थात् जो नहीं | है, उसका अभाव, ये दोनों नित्य याने सदैव कायम रहनेवाले हैं। इस प्रकार | क्रमसे दोनोंके भाव-अभावको नित्य मान लें, तो आगे फिर आप-ही-आप कहना | पड़ता है, कि जो ‘सत्’ है, उसका नाश होकर उसीका ‘असत्’ नहीं हो जाता । | परंतु यह अनुमान, और सत्कार्यवादमें पहलेही ग्रहणकी हुई एक वस्तुसे दूसरी | वस्तुकी कार्यकारणरूप उत्पत्ति, ये दोनों एक-सी नहीं हैं ( गीतार. प्र. ७, पृ. | १५६ ) । माध्वभाष्यमें इस श्लोकके “ नासतो विद्यते भावः ” इस पहले चरणके | ‘ विद्यते भावः ’ का ‘ विद्यते + अभावः ’ ऐसा परिच्छेद है और उसका यह अर्थ | किया है, कि असत् याने अव्यक्त-प्रकृतिका अभाव, अर्थात् नाश, नही होता । | और जब कि दूसरे चरणमें यह कहा है, कि सत्काभी नाश नहीं होता, तब | अपने द्वैती संप्रदायके अनुसार मध्वाचार्यने इस श्लोकका ऐसा अर्थ किया है, | कि सत् और असत् दोनों नित्य हैं ! परंतु यह अर्थ सरल नहीं है, इसमे | खीचातानी है । क्योंकि स्वाभाविक रीतिसे दीख पड़ता है, कि परस्पर-विरोधी | असत् और सत् शब्दोंके समानही अभाव और भाव ये दो विरोधी शब्दही इस | स्थलपर प्रयुक्त हैं; एवं दूसरे चरणमें अर्थात् “ नाभावो विद्यते सतः ” यहाँपर
६२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥ अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥ । 'नाभावो'में यदि अभाव शब्दही लेना पड़ता है, तो प्रकट है, कि पहले चरणमें । भाव शब्दही रहना चाहिये। इसके अतिरिक्त यह कहनेके लिये, कि असत् और । सत् ये दोनों नित्य है: 'अभाव' और 'विद्यते' इन पदोंके दो वार प्रयोग करनेकी । कोई आवश्यकता न थी। किंतु मध्वाचार्यके कथनानुसार यदि इस द्विरुक्तिको । आदरार्थक मानभी ले, तोभी आगे अठारहवें श्लोकमें स्पष्टही कहा है, कि व्यक्त । या दृश्यसृष्टिमें आनेवाला मनुष्यका शरीर नाशवान् अर्थात् अनित्य है। अतएव । आत्माके साथही भगवद्गीताके अनुसार, देहकोभी नित्य नहीं मान सकते; प्रकट । रूपसे यह सिद्ध होता है, कि एक नित्य है और दूसरा अनित्य। पाठकोंको यह । दिखलानेके लिये कि, सांप्रदायिक दृष्टिसे खेंचातानी कैसे की जाती है, हमने । नमूनेके ढंगपर यहाँ इस श्लोकका मध्वभाष्यवाला अर्थ लिख दिया है - अस्तु; । जो सत् है, वह कभी नष्ट होनेवाला नहीं, अतएव मत्स्वरूपी आत्माका शोक न । करना चाहिये; और तत्त्वकी दृष्टिसे नामरूपात्मक देह आदि अथवा सुखदुःख । आदि विकार मूलमेही विनाशी हैं, इसलिये उनके नाश होनेका शोक करनाभी । उचित नहीं। फलतः आरंभमें अर्जुनसे जो यह कहा है, कि "जिसका शोक न । करना चाहिये, उसका तू शोक कर रहा है", वह सिद्ध हो गया। अब । 'सत्' और 'असत्'के अर्थोंकोही अगले दो श्लोकोंमें औरभी स्पष्ट कर । बतलाते हैं - (१७) स्मरण रहे, कि यह संपूर्ण ( जगत् ) जिसने फैलाया अथवा व्याप्त किया है, वह ( मूल आत्मस्वरूप ब्रह्म ) अविनाशी है। इस अव्यक्त तत्त्वका विनाश करनेके लिये कोईभी समर्थ नहीं है। । [ पिछले श्लोकमें जिसे सत् कहा है, उसीका यह वर्णन है। यह बतलाकर, । कि शरीरका स्वामी अर्थात् आत्मा इसी 'नित्य' श्रेणीमें आता है; अब यह । बतलाते हैं, कि अनित्य या सत् किसे कहना चाहिये :- ] (१८) कहा है, कि जो शरीरका स्वामी ( आत्मा ) नित्य, अविनाशी और अचिन्त्य है, उसे प्राप्त होनेवाले ये शरीर नाशवान् अर्थात् अनित्य हैं। अतएव हे भारत ! तू युद्ध कर ! । [ सारांश, इस प्रकार नित्य-अनित्यका विवेक करनेसे तो यह भावही । झूठा होता है, कि "मैं अमुकको मारता हूँ", और युद्ध न करनेके लिये
दूसरा अध्याय ६२९ य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥ न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥ वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥ वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥ नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥ [ अर्जुनने जो कारण दिखलाया था, वह निर्मूल हो जाता है। इसी अर्थको अब और अधिक स्पष्ट करते हैं :- ] ( १९ ) ( शरीरके स्वामी या आत्मा ) कोही जो मारनेवाला मानता है, या जो ऐसा समझता है, कि वह मारा जाता है; उन दोनोंकोभी सच्चा ज्ञान नहीं है। ( क्योंकि ) यह ( आत्मा ) न तो मारता है और न माराभी जाता है। [ क्योंकि यह आत्मा नित्य और स्वयं अकर्ता है. सब खेल तो प्रकृतिकाही है। कठोपनिषदमें यह और अगला श्लोक आया है ( कठ. २. १८, १९ )। इसके अतिरिक्त महाभारतके अन्य स्थानोंमेंभी ऐसा वर्णन है, कि कालसे सब ग्रसे हुए हैं; कालकी इस क्रीडाकोही 'मारने और मरने' की लौकिक संज्ञाएं हैं ( शां. २५. १५ )। गीतामेंभी ( गीता ११. ३३ ) आगे भक्ति-मार्गकी भाषामे यही तत्त्व भगवानने अर्जुनको फिर बतलाया है, कि भीष्म-द्रोण आदिको कालस्वरूपसे मैनेही पहले मार डाला है, तू केवल निमित्त हो जा । ] ( २० ) यह ( आत्मा ) न तो कभी जन्मता है और न मरताभी है; ऐसाभी नहीं है, कि यह ( एक बार ) होकर फिर होनेका नहीं: यह अज, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, एवं शरीरका वध हो जाय तोभी मारा नहीं जाता । ( २१ ) हे पार्थ ! जिसने जान लिया, कि यह आत्मा अविनाशी, नित्य, अज और अव्यय है, वह पुरुष किसीको कैसे मरवायेगा और किसीको कैसे मारेगा ? ( २२ ) जिस प्रकार कोई मनुष्य पुराने वस्त्रोंको छोड़कर दूसरे नये ग्रहण करता है, उसी प्रकार देही अर्थात् शरीरका स्वामी आत्मा पुराने शरीर त्यागकर दूसरे नये शरीर धारण करता है । ( २३ ) इसे अर्थात् आत्माको शस्त्र काट नहीं सकते; इसे आग जला नहीं सकती; वैसेही इसे पानी भिगा या गला नहीं सकता और वायु सुखाभी नहीं सकती है ।