भारतकोश
संग्रह पर लौटें

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

जान लेवा दवाओं का व्यापार

हमारे देश में इस समय लगभग 515 दवाएँ ऐसी हैं जो बाजार में लगभग 8000 विभिन्न नामों से बिक रही हैं। इन दवाओं पर दुनिया के तमाम देशों में पाबन्दी लगायी जा चुकी है तथा इनके निर्माण और बिक्री को घातक अपराध घोषित किया जा चुका है। डाक्टरों और वैज्ञानिकों का कहना है कि ये दवाएँ प्राणघातक हैं और आदमी के रक्त को प्रदूषित कर कैंसर, लकवा, अंधापन, विकलांगता जैसी भयंकर बीमारियों को जन्म देती हैं तथा शरीर की रोग से लड़ने की क्षमता खत्म कर देती हैं। ये दवाइयाँ आने वाली पीढ़ियों में शारीरिक तथा मानसिक-विकृतियाँ भी पैदा करती हैं। यह गम्भीर चिन्ता का विषय है कि दुनिया के अन्य तमाम देशों में “जहर” घोषित की जाने वाली कुछ दवाएँ हिन्दुस्तान में खुली बिक्री की इजाजत पा चुकी हैं। यहाँ कुछ ऐसी दवाओं के नाम दिये जा रहे हैं जो दूसरे तमाम देशों में प्रतिबंधित हैं लेकिन हमारे यहाँ बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनायी और बेची जाती है। इन दवाओं को मुख्य रूप से में एण्ड बेकर, सीबा गायकी, बारोजवेलकम, पार्क डेविस, ज्योफ्रीमैन्स, फाइजर, हेक्स्ट, सैण्डोज, रोस, स्केफ, एस.जी. फार्मास्युटिकल, ग्लैक्सो, बूट्स कंपनी, ईस्ट इंडिया कंपनी तथा इंफार इण्डिया कंपनियाँ बनाती हैं। इन दवाओं को बेचकर ये कंपनियाँ देश का अरबों रूपया प्रतिवर्ष बाहर भेज रही हैं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ऐसे कई सम्मिश्रण बनाये हैं जो कि निरर्थक होने के साथ-साथ हानिप्रद भी होते हैं। मिसाल के तौर पर क्लोरोफेनिकाल तथा स्ट्रैटोमाइसिन का सम्मिश्रण जो पेचिस में दिया जाता है। विशेषज्ञ डॉक्टरों का

कहना है कि यह सम्मिश्रण बहुत ही अतर्कसंगत और नुकसानदेह है, फायदा बिल्कुल नहीं औषध सलाहकारी समिति की 1980 की सिफारिश में क्लोरोफेनिकाल के सभी एफ.डी. सम्मिश्रणों पर रोक लगा दी गयी थी। लेकिन दुःख कि बात है कि इस रोग में उक्त सम्मिश्रण शामिल नहीं था। फलतः आज भी यह खुले बाजारों में उपलब्ध है। इसी तरह पेंसिलीन और स्ट्रैटोमाइसिन, पेंसिलीन और सल्फानामाइड्स, विटामिन्स और एनालजिक्स, टेट्रासाइक्लीन एवं विटामिन सी, आदि के सम्मिश्रण भी बेहद नुकसानदेह हैं। लेकिन सारे सम्मिश्रण बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा तैयार किये और आपूर्ति किये जाते हैं।

खतरनाक गर्भ निरोधक बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवाद के गुप्त हथियार

बहुराष्ट्रीय कंपनियों, विश्व बैंक और अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा थोपे गये संरचनात्मक समायोजन · कार्यक्रमों की अनिवार्य शर्त है जनसंख्या नियंत्रण। हालांकि इस शर्त को लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने से कोई मतलब नहीं पर यह शर्त सुनिश्चित करती है कि हर हथकण्डा अपना कर हर हालत में विकासशील देशों की जनसंख्या को नियंत्रित किया जाए और साथ में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाये जा रहे खतरनाक गर्भ निरोधकों को बेचकर भारी मुनाफा भी कमाया जाए। पिछले तीन दशकों से सरकार का परिवार नियोजन कार्यक्रम अमेरिकी आर्थिक सहायता से जुड़ी शर्तों के अनुसार चल रहा था। जिसके लिए सरकार ने गर्भ निरोधकों के स्थान पर नसबंदी पर जोर

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दिया, परंतु जोर जबरदस्ती नसबंदी करने के राजनैतिक दुष्परिणाम सामने आये तो यह नीति त्याग दी गयी और गर्भ निरोधक दवाइयों को प्रोत्साहन दिया गया।

भारतवासियों को गेहूँ-चावल के बीच चुनाव कर भरपेट खाना दिलाने में असमर्थ रही सरकार इस बात के लिए तैयार थी कि इन भूखी औरतों को दुनिया की नई गर्भ निरोधक दवा मिले। 60 के दशक में इजाद ज्यादातर गर्भ निरोधक, हार्मोन पर आधारित लंबी अवधि तक असर रखने वाले रसायन ही थे। इनमें कृत्रिम हार्मोन इस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रान के अलग-अलग मिश्रणों से बने गर्भ निरोधक शामिल थे, जिन्हें खाने की गोलियों से लेकर सुइयों, चमड़ी के अन्दर रोपे जाने वाले कैप्सूल, योनि में रखे जाने वाले छल्लों, नाक में छिड़की जाने वाली दवाइयों के रूप में इस्तेमाल किया गया। इस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रान के संयोग से बनी ये दवाइयाँ गम्भीर बीमारियों का कारण बनीं, जिनमें दिल व रक्तचाप की बीमारी, थकके जमने की बीमारी, कैंसर, पाचन संबंधी गड़बड़ियाँ, भ्रूण पर विपरीत असर वाली बीमारियाँ शामिल थी। इसी दौरान दो नई प्रकार की सुइयों का भी अविष्कार हुआ। जर्मनी की 'शेरिंग ए जी' नामक कंपनी द्वारा बनायी 'नेट-इन' व अमेरिका की अपजान कंपनी द्वारा बनाई 'डिपो प्रोवेरा'। नेट इन और डिपो प्रोवेरा सुइयों के गंभीर प्रभाव औरतों के शरीर पर पड़ते हैं, सुई लगवाने के बाद औरतों का शरीर फूल जाता है, चक्कर आते हैं, सरदर्द की शिकायत, थकान, भूख न लगना अथवा अत्यधिक भूख लगना, वैवाहिक संबंधों और किसी को हर समय खून रिसता रहता है। अगर वे बच्चे को स्तनपान करा रही हैं तो दूध की मात्रा व गुणवत्ता पर असर पड़ता है। पेट व स्तनों को छूने से दर्द, घबराहट व उदासी की बीमारी, एलर्जी, हृदय रोग खून के थकके जमने की बीमारी भी हो सकती है। कुल मिलाकर डेपो प्रोवेरा के निर्माता ने 78 दुष्प्रभावों को स्वीकार किया है। एक बार लगवाने के बाद दुबारा औरतें इनके पास फटकती भी नहीं। परंतु इनकी निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि इन्होंने विकासशील देशों में अपने बाजार दृढ़ लिये, जहाँ की सरकारें पहले से ही जनसंख्या नियंत्रण के लिए हाथ पैर मार रही थी। डिपो प्रोवेरा के परीक्षणों से ही इतनी ऊपर तक पहुँच थी कि ये गर्भ निरोधक बिक्री के लिए बाजारों में आ गये। अमेरिका में डॉक्टर काली चमड़ी की किशोरियों को उस समय से डिपो प्रोवेरा लगाते चले आ रहे हैं जब वहाँ की सरकार ने इसे स्वीकृति तक नहीं दी थी। इसी तरह न्यूजीलैंड के आदिवासियों व इंग्लैण्ड के अश्वेतों को यह सुई लगाई जा रही है, और अब तीसरी दुनिया के अन्य मुल्कों में इसका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। डिपो प्रोवेरा की भुक्त भोगी वे सभी मनुष्य प्रजातियाँ हैं जिनकी संख्या को सीमित रखना श्वेत नस्ल की अगुवाई बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

एड्स और कण्डोम का व्यापार

एड्स का हल्ला मचा कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों (साथ ही साथ देशी कंपनियों ने भी) कण्डोम का बाजार खड़ा किया है और सौ करोड़ रूपये का सालाना मुनाफा कम रही हैं। हालांकि एड्स खतरनाक बीमारी है और यौन संसर्ग के अलावा कई अन्य तरीकों से भी इसका प्रसार होता है। जैसे इन्जेक्शन की सुई द्वारा, रक्त लेने से एवं पसीने के सम्पर्क द्वारा। परन्तु बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शह पर एड्स को रोकने के जिन तरीकों को ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है उनमें हैं सुरक्षित सम्भोग

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और कण्डोम का प्रयोग। डॉक्टर लार्ड ओ कलिंग्स के अनुसार एक बार के यौन सम्पर्क से 0.1-1 प्रतिशत, सूर्ई से 0.5-1 प्रतिशत, रक्त चढ़ाए जाने से 0.9 प्रतिशत एड्स होने की सम्भावना रहती है। इस तरह संक्रमित व्यक्ति के साथ सम्भोग या सूर्ई के इस्तेमाल और रक्त चढ़ाने से एड्स होने की बराबर सम्भावनाएं रहती हैं। देश में यौन संबंधों के लायक सिर्फ 30% लोग ही हैं जो अधिकतर अपने जीवन साथी के अलावा किसी अन्य से यौन सम्पर्क नहीं बनाते। दूसरी तरफ बच्चे से लेकर बूढ़े तक इन्जेक्शन की सूर्ई का प्रयोग करते हैं अतः इस रास्ते एड्स फैलने की सम्भावनाएं बहुत अधिक हैं। इसके अलावा रक्तदान द्वारा इस बीमारी का होना लगभग तय है और अभी भी हमारे देश में 50% मामलों में रक्त बिना जांच के ही चढ़ा दिये जाते हैं। भारत में विशेष स्थितियों में उपर्युक्त दोनों तरीकों से एड्स प्रसार की ज्यादा सम्भावनाओं को नजर अंदाज कर यौन सम्पर्कों को ही मुख्य जिम्मेदार मानना पश्चिमी का प्रभाव और कण्डोम निर्माता कम्पनियों की पहुंच का ही परिणाम है। विलासी उपभोक्तावादी संस्कृति के इस दौर में कण्डोम संस्कृति और उस का प्रचार विवाहेतर यौन संबंधों को बढ़ाकर इस बीमारी की जड़ को हरा ही बनायेंगे।

हमारे देश में लगभग 40 करोड़ रुपये का कण्डोम देशी कंपनियाँ और इतना ही कण्डोम विदेशी कंपनियाँ बेच रही है। विदेशी कण्डोमों के बारे में यह बात खास तौर से उल्लेखनीय है कि 1982 से ही सरकार ने इनके आयात पर से सीम शुल्क समाप्त कर दिया था और उस फैसले के बाद ही देश का बाजार विदेशी कण्डोमों से भर गया। करीब 25-30 एजेन्सियाँ जापान, कोरिया, ताइवान, हांगकांग, थाइलैण्ड वगैरा से कण्डोम थोक के भाव मंगाती और बेचती हैं। करीब 20 देशी व 80 विदेशी ब्रांडों अर्थात 100 से ज्यादा ब्रांडों में 100 करोड़ से ज्यादा कण्डोम सालाना बिक रहे हैं।

खतरनाक ट्रूथपेस्ट

ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा तैयार किये गये एक अध्ययन में इस बात पर गम्भीर असंतोष व्यक्त किया गया कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के गैंग ने किस प्रकार “दवा और कास्मेटिक एक्ट-1992” की धज्जियाँ उड़ा दी। इस कानून में फ्लोराइड मिले हुए ट्रूथपेस्टों की बिक्री पर कुछ पाबन्दियाँ लगा दी गयी थीं। राष्ट्रीय पेयजल आयोग द्वारा तैयार किये गये इस दस्तावेज में ग्रामीण क्षेत्रों में फ्लोरोसिस नामक बीमारी(जिसमें हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं, दांत गिर जाते हैं) के खिलाफ लड़ रहे स्वास्थ्य कर्मियों एवं अन्य विशेषज्ञों को सचेत किया गया है। 90 पेज के इस दस्तावेज में कहा गया है कि फ्लोरोसिस नामक बीमारी उन क्षेत्रों में अधिक होती है जहाँ पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होती है।

बूचड़ खाने से खून और हड्डियाँ दवा कंपनियाँ ले जाती हैं

दिल्ली के ईदगाह बूचड़खाने से रोजाना निकलने वाला 13 हजार लीटर खून बड़ी-बड़ी दवार कम्पनियाँ टॉनिक बनाने के लिए ले जाती हैं। खासतौर पर गर्भवती महिलाओं के लिए पशुओं के खून से बनने वाला ‘डेक्सोरेंज’ टॉनिक बहुत लोकप्रिय है। खून ही नहीं, काटे गये पशुओं के

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तकरीबन हर अंग का इस्तेमाल टूथपेस्ट, सरेस, फेवीकोल, चीनी के बर्तन, सनमाइका, इंसुलिन इंजेक्शन आदि बनाने में होता है। बूचड़ खाने में सब जानवरों का मिला जुला खून इकट्ठा किया जाता है। इसके बावजूद दवा बनाने वाली कंपनियों को खून की कमी पड़ती रहती है।

खून के साथ-साथ बाकी अंगों का इस्तेमाल भी दवाई और कई दूसरी चीजें बनाने में किया जाता है। इनकी हड्डियों को जलाकर उसका पाउडर टूथपेस्ट, चीनी के बर्तन और सनमाइका बनाने में इस्तेमाल किया जाता है।

मच्छर मार दवाएं घातक हैं

एक तरफ जहाँ अनुसंधानकर्ता मच्छरों से मुक्ति के लिए परेशान हैं वहीं दूसरी तरफ बहुराष्ट्रीय उद्योग मच्छर भगाने वाली दवाएं और अन्य उपकरण काफी बड़े पैमाने पर बनाने में लगे हुए हैं। मच्छरमार दवाओं और उपकरणों को बड़े पैमाने पर उत्पादित, विज्ञापित और बिक्री किया जा रहा है। करोड़ों अरबों डॉलर का इनका कारोबार हो गया है उपकरणों और दवाओं से मच्छर तो भागते हैं परंतु मानव स्वास्थ्य पर इनका गंभीर असर पड़ता है।

पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि मच्छरों से बचने के लिए निकली अधिकतर दवाओं में मेलफोक्कीन नामक रसायन होता है जो दिमाग और शरीर के लिए घातक हो सकता है। हमारे देश में मच्छरमार दवाओं में कुछ ऐसे कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है जो अन्य देशों में प्रतिबंधित हैं। इसी कारण निर्माता कंपनियाँ कीटनाशक उत्पादों की संरचना की जानकारी का खुलासा भी नहीं करतीं।

बाजार में बिक रहे इन मच्छरमार ब्रांडों में विपैले रसायन 'डी-एथीलीन' का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसके लगातार उपयोग से स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हो सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार बिजली से चलने वाले उपकरणों में जो धुँआ निकलता है उसमें फोसफीन नामक गैस से सिरदर्द, एलर्जी, नाक में खुशकी, होठों का सूखना, गले में खराश वगैरा हो जाती है। इसके लगातार प्रयोग से दम घुटने और साँस रूकने की स्थिति बन जाती है जो दिल और दमा के मरीजों के लिए घातक हो सकती है।

अनावश्यक दवाओं व गैर-जरूरी टॉनिकों का उत्पादन

भारत पारराष्ट्रीय निगमों द्वारा प्रतिबंधित अनावश्यक और नुकसानदेह दवाओं को खपाने का बहुत बड़ा बाजार रहा है। देश की जलवायु और यहाँ फैलने वाले विभिन्न रोगों के मुताबिक इन्होंने कभी भी दवाओं का निर्माण नहीं किया। भारत में मुख्य रूप से टी.बी., कुछ रोग, आंत्रज्वर, पेचिस, फाइलेरिया के मरीज अधिक हैं। इस समय बाजार में 50 से 60 हजार प्रकार के फार्मूलेशन उपलब्ध हैं। लेकिन विडम्बना है कि टी.बी मलेरिया, पेचिस तथा फाइलोरिया जैसे रोगों की दवाओं की बाजार में कमी है। हाथी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 117 या 150 दवाएँ ही अत्यावश्यक हैं जो 89-90 प्रतिशत लोगों की रोग के व्याधि में काम आती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के

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मुताबिक भारत में प्रचलित रोगों के इलाज के लिए मात्र 250 दवाओं की जरूरत है मूल उत्पादन जो व्यापक पैमाने पर दवाओं की जरूरतों को पूरा करता है, वह बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा बहुत ही कम तैयार किया जाता रहा है, यहाँ तक की लघु क्षेत्र से भी कम। सन् 1973 में इस देश में 5300 टन मूल रसायन (ब्लक) का उत्पादन हुआ, इनमें से मात्र 10 प्रतिशत का उत्पादन साधन सम्पन्न टेक्नॉलाजी के माध्यम से इन विदेशी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने किया था। बाकि 90 प्रतिशत का उत्पादन भारतीय जनता और निजी संस्थाओं ने किया था। राष्ट्रीय क्षेत्र में 33 प्रतिशत उत्पादन हुआ।

इस बात में किसी संदेह की गुंजाइश नहीं कि विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने दवा उद्योग पर अपना एकाधिकार स्थापित करने एवं बेतहाशा मुनाफा कमाने की नीयत से समूचे नैतिक मानदंडों, राष्ट्रीय कानूनों और वायदों को तोड़ा है। भारत समेत गरीब मुल्कों को इन कम्पनियों ने अपनी जागीर बना रखा है। हमारे देश में जिन रोगों की बहुलता है और उनके इलाज के लिए दवाएँ आवश्यक हैं उनका उत्पादन ये कम्पनियाँ अपने फायदे की गणित सही करने के लिए न के बराबर करती हैं। इसके बदले ये ऐसी दवाओं और टॉनिकों का उत्पादन करती हैं जो गैर-जरूरी होता है। लेकिन जिसमें मुनाफे का प्रतिशत अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा होता है।

आर्थिक दोहन

आजादी के बाद खासकर दवाओं के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को न्योतने के पीछे जो उद्देश्य था वह एक साल के अन्दर चकनाचूर हो गया। देश को करोड़ो मरीजों के लिए पर्याप्त दवाओं की पूर्ति तो हो ही नहीं सकी, उल्टे एक वर्ष की अवधि (1951-52) के दौरान भारत को 15.6 करोड़ रुपये के मूल्य के बराबर दवायें आयात करनी पड़ी। इस गरीब देश की जनता की जेब से करोड़ों-अरबों रूपया रॉयल्टी के नाम पर इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जरिये विदेश चला जाता है। साथ ही साथ इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मुनाफे की राशि साल-दर-साल बढ़ती गयी।

स्वास्थ्य के व्यावसायीकरण की उनकी नीतियों ने भारतीय दवा कम्पनियों का भट्टा बैठा दिया है। दवा के लाइसेंस पर प्रसाधन सामग्रियाँ तथा 90 फीसदी से अधिक गैर-जरूरी दवाएँ बनाने वाली कम्पनियाँ सबसे भ्रष्ट और क्रूर तरीके अपनाकर भारतीय बाजारों पर अपना कब्जा जमायी है। दूसरी तरफ सस्ती और अधिक उपयोगी विकल्प देने वाली भारतीय दवा कम्पनियाँ लगातार घाटे का शिकार होती जा रही हैं।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से मुक्त दवा-उद्योग की जरूरत

हमारे देश में एक से अधिक चिकित्सा पद्धतियाँ प्रचलन में हैं। सर्वप्रथम इस देश की मिट्टी और आबो-हवा से पैदा और यहाँ की परम्परागत सोच और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हुई आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति हैं। इसी से मिलती यूनानी पद्धति है। अंग्रेजी, फ्रांसीसी एवं पुर्तगालियों के सम्पर्क

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की बदौलत एलोपैथी एवं होम्योपैथी आयी। दो सौ सालों के औपनिवेशिक शासन और आजादी के बाद बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के शिकंजे ने हमारी अस्मिता को तोड़ा और वैज्ञानिक धरोहर को रौंदा। नतीजा यह कि एलैपैथी के मुकाबले भारतीय पद्धतियाँ पिछड़ते-पिछड़ते गुलामी की हालत में रह गयी हैं। सरकार ने आजाद भारत में सर्वप्रथम एलोपैथी पद्धति की शिक्षा एवं चिकित्सालयों के नियमन के लिए 1956 में भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (इण्डियन मेडिकल काउंसिल) का गठन संसद से पारित एक आधिनयम के तहत किया। आधुनिक पद्धति में ही अनुसंधान हेतु आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (मेडिकल रिसर्च काउंसिल) पहले से ही गठित थी। कुछ अर्से बाद भारतीय एवं होम्योपैथी अनुसंधान की केन्द्रीय परिषद(सी.सी.आर.एम.एच.) का गठन किया गया। लोकतान्त्रित दबावों के चलते 1970 में केन्द्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद (सी.सी.आई.एच.) का गठन किया गया। इसके बाद भारतीय चिकित्सा एवं होम्योपैथी में अनुसंधान के लिए 1977 में आयुर्वेद एवं सिद्ध, यूनानी, होम्योपैथी, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों हेतु अलग-अलग केन्द्रीय अनुसंधान परिषदों का गठन किया गया। इस प्रकार वर्तमान में केन्द्रीय स्तर पर विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शिक्षा एवं चिकित्साभ्यास हेतु तीन परिषदें एवं अनुसंधान हेतु 6 परिषदें कार्य कर रही हैं। इसके अलावा सी.एस.आई.आर के साथ-साथ आई.सी.एल.आर भी कभी-कभी ऐसे कार्यक्रमों के साथ आगे आती हैं जो चिकित्सा एवं स्वास्थ्य से जुड़े हैं। देश में आधुनिक, भारतीय एवं होम्योपैथी के लगभग 104,120 एवं 94 कालेज चल रहे हैं।

कीटनाशकों का भी निशाना है हमारा स्वस्थ

कीटनाशक दवाइयों के छिड़काव वाले गेहूँ के आटे की तली हुई पूरियाँ खाने वाले उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के करीब डेढ़ सौ व्यक्तियों के मौत के शिकार बनने की घटना अभी जेहन में बरकरार है। हालत यह है कि इस तरह के छोटे-बड़े समाचार आये दिन सुर्खियों में पढ़ने को मिल जाते हैं। इन समाचारों से विचारक एक बार फिर चिंतित होने लगे हैं। संकर बीज के आगमन के बाद कीटनाशकों के उपयोग में तेजी से वृद्धि होने के कारण आज कुल खेती योग्य जमीन के चौथे भाग में इस जह का इस्तेमाल शुरू हो गया है। उसमें आधे से अधिक भाग तो डी.डी.टी.बी.एच.सी और मैलाथियोन का ही है। पचास के दशक में इन दवाइयों का वार्षिक उपयोग सिर्फ दो हजार टन था, जो आज बढ़ कर अस्सी हजार टन तक पहुँच चुका है। फिर भी ताज्जुब तो यह है कि जीव-जन्तु, रोग आदि से फसल को जो नुकसान होता था, उसका आकंड़ा, जो सन् 1976 में 3300 करोड़ टन था, वह आज बढ़कर छः हजार करोड़ टन हो गया है। सन् 1960-61 में 64 लाख हेक्टेअर में यह जहर डाला जाता था, अब उसके स्थान पर आठ करोड़ हेक्टेअर में डालने का यह नतीजा है। ओटावा स्थिति इंटरनेशनल डेवेलपमेंट रिसर्च सेंटर का दावा है कि तथाकथित विकसित देशों में ही कीटनाशकों के जहर से हर वर्ष दस हजार आदमी मर जाते हैं और दूसरे चार लाख आदमी तरह-तरह के विपरीत परिणामों से पीड़ित होते हैं। ऐसे जहरों को हम क्या कहेंगे- कीटनाशक या मानव भक्षक? इनके मुख्य शिकार खेत मजदूर होते हैं। पाश्चात्य देशों में जिन पर पांबदी लगाई गयी है, वैसे रसायन तीसरे विश्व में उड़ेले जाने के कारण यह परिस्थिति पैदा हुई है। महाराष्ट्र तथा आंध्रप्रदेश

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में रूई(कपास) उगाने वाली पट्टी में इन कीटनाशकों के कारण खेत मजदूरों में अन्धत्व, कैंसर, अंगविकृतियाँ, लीवर के रोग तथा ज्ञानतन्तुओं के रोग होने के उदाहरण पाये गये हैं।

पेप्सी कोला-कोका कोला का सच सपनों के सौदागर

5 अगस्त 2003 को भारत के सभी टी.वी चैनलों एवं समाचार पत्रों में पेप्सी-कोला एवं कोका-कोला के बारे में एक भंयकर सत्य उद्घाटित हुआ। दिल्ली की एक वैज्ञानिक संस्था “सेन्टर फॉर सायनस एण्ड एनवायरमेंट” की खोजी रिपोर्ट में बताया गया कि पेप्सी एवं कोका-कोला के सभी ठंडे पेयों में अत्यन्त जहरीले एवं खतरनाक कीटनाशक रसायन मिले हुए हैं। उपर्युक्त संस्था की प्रयोगशाला में पेप्सी एवं कोका-कोला के 12 नमूनों की जांच की गयी। इसमें पाया गया कि इन सभी नमूनों में बहुत अधिक मात्रा में रासायनिक कीटनाशक जैसे क्लोरोपायरीफास, मैलाथियान, डी.डी.टी., लिन्डेन आदि मिले हुए हैं। ये सभी कीटनाशक शरीर के लिए अत्यन्त ही हानिकारक होते हैं। इन कीटनाशकों का शरीर के स्वास्थ्य पर बहुत ही खराब असर होता है। इन कीटनाशकों का लीवर, किडनी, शरीर के प्रतिरोधक तंत्र, प्रजनन तंत्र, तंत्रिका तंत्र, श्वसन तंत्र आदि पर बहुत बुरा असर होता है। उदाहरण के लिए लिन्डेन नामक कीटनाशक से शरीर में कैंसर होता है तथा शरीर की सभी ग्रंथियों को भारी नुकसान पहुँचता है। लिन्डेन कीटनाशक की 40 मिली मात्रा किसी भी महिला या पुरुष की क्षमता को समाप्त कर देती है। इस लिन्डेन से लीवर का कैंसर तथा किडनी का कैंसर भी होता है। शरीर के हृदय को रक्त देने वाली नलियों को भी लिन्डेन क्षतिग्रस्त कर देता है। इसी तरह डी.डी.टी. नाम का रासायनिक कीटनाशक पुरुषों के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या को बहुत कम कर देता है तथा स्त्रियों में वक्ष कैंसर को पैदा करता है। क्लोरोपायरीफॉस नामक जहरीला कीटनाशक मनुष्य के तंत्रिका तंत्र को नष्ट कर सकता है तथा दिमागी विकास को रोक देता है। इस जहरीले कीटनाशक से मनुष्य शरीर में मांसपेशियाँ अत्यंत कमजोर हो जाती है। मैलाथियान नाम के रासायनिक जहर से जन्मजात शारीरिक विकलांगता आती है तथा शरीर के किसी भी हिस्से में पक्षाघात हो सकता है। 6 अगस्त 2003 को इस विषय पर लोकसभा में काफ़ी हंगामा हुआ। लोकसभा के अनेक सदस्यों ने सरकार से मांग की, कि इस विषय पर स्पष्टीकरण दे और पूरे देश को बताये कि सच क्या है?

सराकर की ओर से जवाब देते हुए स्वस्थ एवं परिवार कल्याण मंत्री सुषमा स्वराज्य ने लोकसभा में कहा कि जल्दी ही सरकार इस विषय पर जांच करायेगी। इसी तरह 21 अगस्त 2003 को राज्यसभा में भी बहस हुई। वहाँ भी मंत्री महोदया ने इसी तरह का आश्वासन दिया। अंत में लोकसभा अध्यक्ष के निर्देश पर संयुक्त संसदी समिति गठन करने का फैसला किया गया। यह संयुक्त संसदीय समिति पेप्सी-कोक में मिले हुए कीटनाशक रसायनों की जांच करने के लिए बनाने का तय किया गया। इस तरह 22 अगस्त 2003 को सरकार द्वारा पेप्सी-कोका कोला की जाँच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के गठन की अधिसूचना जारी की गयी। इस संसदीय समिति में 10 सांसद लोकसभा से एवं 5 सांसद राज्यसभा से लिये गये, समिति के अध्यक्ष शरद पंवार को बनाया

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गया। समिति में लोकसभा से अनंत कुमार, डा. सुधा यादव, रमेश चैत्रीथला, अवतार सिंह भड़ाना, के. येरत्रनायडु, ई. अहमद, रंजीत कुमार पांजा, अखिलेश यादव और अनिल बसु को लिया गया। इसी तरह समिति में राज्यसभा से एस.एस. अहलवालिया, पृथ्वीराज च्हाण, संजय निरूपम, प्रेमचन्द गुप्ता, प्रशांत चर्टजी को लिया गया। समिति को यह जांच करने की जिम्मेदारी दी गयी कि पेप्सी कोका-कोला के जो भी ब्रांड भारत में बिक रहे हैं उनमें कीटनाशक हैं या नहीं? साथ ही साथ समिति को यह जिम्मेदारी दी गयी कि सरकार को ठंडे पेयों की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए भी सुझाव दे। इस समिति के लिए डा.एस.के.खन्ना, डा. एन.पी. अग्रिहोत्री, डा.जी. त्यागराजन को विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया गया। इस समिति ने 4 फरवरी 2004 को अपनी रिपोर्ट संसद के सामने पेश की। इस रिपोर्ट को बनाने में संयुक्त संसदीय समिति के सामने कई मंत्रालय पेश हुए। देश के कई विशेषज्ञ एवं संस्थाओं की ओर से भी समिति को काफी जानकारी दी गयी।

सेंटर फॉर सायन्स एण्ड एनवायरमेंट द्वारा मई 2003 में पेप्सी एवं कोका कोला के सभी ब्रांडों की जांच की गयी। जिसमें पाया गया कि यूरोपीय मानकों की तुलना में भारतीय पेप्सी एवं कोक में 21 गुना अधिक लिन्डेन (खतरनाक रासायनिक कीटनाशक), 42 गुना अधिक डी.डी.टी. , 72 गुना अधिक क्लोरोपायरीफॉस, 196 गुना अधिक मैलाथियान उपस्थित है। सी.एस.ई. संस्था की प्रयोगशाला में अमेरिक से लाये हुए पेप्सी एवं कोकाकोला के सभी ब्रांडों की भी जांच की गयी। लेकिन इन अमरीकी नमूनों में कुछ भी रासायनिक कीटनाशक नहीं पाये गये।

संसदीय समिति के अनुसार भारत में कोका-कोला के 52 कारखाने हैं, जिनमें से 27 कारखाने कोका-कोला कंपनी के हैं तथा बाकी 25 कारखाने अन्य दूसरी भारतीय कंपनियों के हैं, लेकिन इनमें 38 कारखाने हैं जिनमें से 17 कारखाने कंपनी के स्वयं के हैं एवं 21 कारखाने अन्य दूसरी भारतीय कंपनियों के हैं, जिनमें पेप्सी-कोला के लिए उत्पादन होता है। पेप्सी एवं कोका-कोला कंपनियों द्वारा संसदीय समिति को दी गयी जानकारी के अनुसार पेप्सी एवं कोका-कोला के ठंडे पेयों की एक साल की कुल बिक्री 4000 करोड़ रुपये से अधिक है।

बहुराष्ट्रीय कंपनी का मकड़जाल

मानव समाज के लम्बे इतिहास में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का उदय एक ऐसी घटना है जिसने मनुष्य की जीवन शैली और अनुभव से परखे टिकाऊ मूल्यों को झकझोर दिया है। नवजात शिशु के भरपूर पोषण के लिए प्रकृति प्रदत्त माँ के स्तनपान की चिरकाल से चली आयी स्वास्थ्य परम्परा के स्थान पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा 'बेबी फूड' को स्थापित करवा देना इसका एक उदाहरण मात्र है। राज्य, राष्ट्रीयता, धर्म, ईमान इन सब से ऊपर उठकर मुनाफा और आर्थिक साम्राज्य की हवस ने इन

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कंपनियों को 'सुपरस्टेट' बना डाला है जो प्रकृति और मनुष्य दोनों के शोषण पर टिकी है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में - रोजमर्रा के उपभोक्ता सामान से लेकर युद्ध के विकराल हथियार बनाने तक - इनकी घुसपैठ हैं। विश्व के पर्यावरण को, विभिन्न क्षेत्रों के उद्भूत संस्कृतियों को इन कंपनियों ने रोड़ रोलर की तरह रौंद डाला है।

यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति ने पश्चिम के देशों को अपने उपनिवेश बनाने में बड़ी मदद दी। इस उपनिवेशीकरण ने पश्चिम के देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को तीसरी दुनिया के देशों में अपना व्यापार जाल फैलाने का भरपूर अवसर दिया। उपनिवेशी ताकतों की छत्र छाया में इन्होंने लातीनी अमरीका, अफ्रीका और एशिया के देशों से सस्ता कच्चा काल बटोरा और अपने मंहगे 'बने बनाए' माल से उनके बाजारों को पाट दिया। नतीजतन इन देशों की टिकाऊ अर्थव्यवस्था टूट गयी और सम्पन्न देश अविकसित देशों की श्रेणी में धकेल दिये गये। द्वितीय महायुद्ध के बाद उपनिवेशीकरण का जाल टूटा, पर विकास के नाम पर ये कंपनियाँ तीसरी दुनिया में अपनी घुसपैठ बनाए रहीं। उपनिवेशकाल में जो काम पुलिस-फौज के हथियार करते थे, उत्तर उपनिवेशकाल में वह काम विश्व बैंक और मुद्राकोष की सहायता से ऋण के हथियार द्वारा किया गया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को तीसरी दुनिया में निर्बाध रूप से अपने पाँव पसारने का कानूनी हक गैट के यूरूग्ने चक्र की समाप्ति पर बने विश्व व्यापार संगठन ने दे दिया जिसके तहत ये कंपनियाँ इन देशों से 'राष्ट्रीय व्यवहार' पाने की हकदार बन गयी हैं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तीसरी दुनिया के देशों की आर्थिक स्वायत्ता को नष्ट कर दिया है तथा व्यापक पैमाने पर गैर-बराबरी, और उपभोक्तावादी अपसंस्कृति फैलाई है। अब तो विकसित देश भी इनके कारण बेरोजगारी और उसके फलस्वरूप फैलते सामाजिक तनाव के शिकार हो रहे हैं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बढ़ता मकड़जाल न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में मानवीय संस्कृति और सभ्यता के लिए खतरे की घंटी बन चुका है। इसलिए इनके खिलाफ चलने वाले इस अभियान में हम सभी एकजुट होकर आवाज उठायेंगे तो निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति और सभ्यता की रक्षा कर सकेंगे।

राजीव दीक्षित जी सेवाग्राम, वर्धा

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का इतिहास

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जड़े मध्यकाल में वेनिस, अंग्रेज, डच व फ्रांसीसी व्यापारियों द्वारा स्थापित कंपनियों में मिलती हैं। प्राचीन सभ्यता में भी व्यापारियों द्वारा दूसरे देश में जाकर व्यापार करने के उदाहरण मिलते हैं। देश की सीमाओं को लांघकर दूसरे देशों में व्यापार करने प्रमाण

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'मेसोपोटामिया सभ्यता' के समय के मौजूद हैं। लेकिन यह व्यापार मुख्यतः स्वतंत्र व्यक्तियों द्वारा ही किया जाता था। व्यापारी समूह बनाकर एक देश से दूसरे देश में अपने माल की बिक्री के लिए जाते थे, और आवश्यकता की वस्तुएं वहाँ से खरीद कर लाते थे। भारत का रोम के साथ व्यापार, भारत का बर्मा, मलाया (मलेशिया) चीन आदि के साथ व्यापार इसी श्रेणी में आता था। रोमन साम्राज्य के समय पार-राष्ट्रीय व्यापार खूब होता था, लेकिन व्यापारियों द्वारा साम्राज्य के पतन के बाद भारत का व्यापार चीन के साथ शुरू हुआ। मुख्यतः दक्षिण भारत का हिस्सा चीन के साथ व्यापारिक गतिविधियों में अधिक संलग्न था। व्यापार के इस स्वरूप में शोषण की कहीं कोई गंजाइश नहीं थी और न ही मेजबान व मेहमान देशों के बीच इस व्यापार को लेकर कोई झगड़ा हुआ करता था।

आधुनिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चरित्र वाली दुनिया की सबसे पहली कंपनी 'The Muskovi Company' मानी जाती है। जिसकी स्थापना सन् 1553 में हुई थी। इस कंपनी ने अपनी स्थापना के 3 वर्षों बाद ही दुनिया के महत्वपूर्ण शहरों में अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान स्थापित कर लिए थे। सन् 1553-1581 तक 'मस्कोवी कंपनी' ने अकूत मुनाफा कमाया और सन् 1581 में कम्पनी के अलमबरदारों ने एक और विशालकाय कंपनी 'The Turkey Company' को स्थापित कर लिया। इस 'टर्की कंपनी' की विशेषता थी कि इसने स्थापना के समय ही दुनिया के महत्वपूर्ण नगरों में अपने पाँव पसारे। ऐसा नहीं था कि 1553 से सन् 1581 तक 'मस्कोवी कंपनी' का व्यापारिक क्षेत्र में एकाधिकार रहा।

सन् 1600 में ईस्ट इण्डिया कंपनी भारत में व्यापार करने के लिए आयी। हालाँकि इस कंपनी की स्थापना ऐलिजाबेथ प्रथम के समय में ही हो चुकी थी, लेकिन इस कंपनी ने बहुराष्ट्रीय चरित्र सन् 1600 में ही ग्रहण किया। भारत आने से पूर्व इस कंपनी ने दुनियाँ के अन्य हिस्सों में भी पैर जमाने की कोशिश की थी लेकिन वह सफल नहीं हो सकी। उस समय दक्षिण-पूर्व एशिया में अनेक छोटी-मोटी डच कंपनियाँ अपना व्यापार कर रही थी। भारत में भी कुछ डच कंपनियों को प्रवेश हो चुका था। ईस्ट इण्डिया कंपनी ने सन् 1612 में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने डच कंपनियों के साथ अम्बोनिया (इण्डोनेशिया) में एक युद्ध लड़ा था। इस युद्ध में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने एक षडयंत्र के तहत डच कंपनियों के अधिकारियों की सामूहिक हत्या करवा दी। सन् 1667 के आते-आते ईस्ट इण्डिया कंपनी ने डच कंपनियों का नामों-निशान मिटा दिया। सूरत के बंदरगाह पर कब्जा करने के लिए ईस्ट इण्डिया कंपनी का पूर्ण अधिकार हो गया। इसके बाद ही ईस्ट इण्डिया कंपनी का शिकंजा पूरे देश पर कसता चला गया।

सन् 1750 के बाद का दौर ब्रिटेन की औद्योगिक क्रान्ति का दौर था। जिसके दौरान उत्पादन की तकनीक में आमूल परिवर्तन आया। सन् 1600 से 1750 के बीच अंग्रेजी कंपनी ने, जिसमें ईस्ट इण्डिया कंपनी भी शामिल थी, अंग्रेजों को अकूत पूँजी का मालिक बना दिया। भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों का शोषण करके अंग्रेजी बाजार में पैसे का प्रवाह अत्याधिक बढ़ गया। बाजार की ताकतें बाजार में ताकतवर होती गयीं। मुद्रा का दबाव लगातार बढ़ने का परिणाम औद्योगिक क्रान्ति के रूप में सामने आया।

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बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारत में प्रवेश

भारत में विदेशी कंपनियाँ तीन तरीके से काम कर रही है। पहला, सीधे अपनी शाखायें स्थापित करके, दूसरा अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से, तीसरा देश की अन्य कंपनियों के साथ साझेदार कंपनी के रूप में।

जून 1995 तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 350 से कुछ अधिक विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अपनी शाखाओं या सहायक कंपनियों के रूप में देश में घुसकर व्यापार कर रही हैं। 20,000 से अधिक विदेशी समझौते देश में चल रहे हैं। औसतन 1000 से अधिक नये विदेशी समझौते प्रतिवर्ष देश में होते हैं। सन् 1972 के अंत तक देश में कुल 740 विदेशी कंपनियाँ थीं। जिनमें से 538 अपनी शाखायें खोलकर व 202 अपनी सहायक कंपनियों के रूप में काम कर रही थीं। इनमें सबसे अधिक कंपनियाँ ब्रिटेन की थीं। लेकिन आज सबसे अधिक कंपनियाँ अमेरिका की हैं। समझौते के अन्तर्गत काम करने वाली सबसे अधिक कंपनियाँ जर्मनी की हैं। 1977 में विदेशी कंपनियों की संख्या 1136 हो गयी।

आजादी के पूर्व सन् 1940 में 55 विदेशी कंपनियाँ देश में सीधे कार्यरत थीं। आजादी के बाद सन् 1952 में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन की 8 विशालकाय कंपनियों के सीधे नियंत्रण में 701 कंपनियाँ भारत में व्यापार कर रही थीं। ब्रिटेन की अन्य 32 कंपनियाँ, भारतीय कंपनियों के साथ किये गये समझौतों के तहत कार्यरत थीं। ये 8 विशालकाय ब्रिटिश कंपनियाँ सन् 1853 से ही भारत में घुसना शुरू हो गयी थीं। ईस्ट इण्डिया कंपनी द्वारा सोची समझी रणनीति के तहत लायी गयी ये कंपनियाँ सन् 1860 तक ईस्ट इण्डिया कंपनी के भारतीय उपमहाद्वीप के शोषण के लिए धारदार हथियार बन चुकी थी। भारतीय उपमहाद्वीप में स्थापित हो जाने के बाद ये कंपनियाँ दुनिया के अन्य दूसरे देशों में शोषण करने चली गयीं।

ये 8 ब्रिटिश कंपनियाँ निम्न थीं –

  1. 1. एन्ड्रयूल एण्ड कंपनी
  2. 2. मेक्लाइड एण्ड कंपनी
  3. 3. बर्न एण्ड कंपनी
  4. 4. डंकन ब्रदर्स एण्ड कंपनी
  5. 5. आक्टेवियस स्टील एण्ड कंपनी
  6. 6. गिलैण्डर अर्बुदनाट एण्ड कंपनी
  7. 7. शा वालेस एण्ड कंपनी

भारत में जैसे-जैसे विदेशी पूँजी का निवेश बढ़ता गया वैसे-वैसे विदेशी कंपनियों की संख्या बढ़ती गयी। इसके साथ जुड़ा हुआ एक आश्चर्यजनक सत्य यह है कि जिन विदेशी कंपनियों ने भारत में

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पूँजी निवेश किया उनमें से अधिकांश कंपनियों ने अपने निवेश करने के अगले वर्षों में ही अपनी निवेश की हुई पूँजी के बराबर या उससे अधिक पूँजी कमा ली। बाकी अन्य कंपनियों ने अधिकतम 5 वर्षों में अपनी निवेश की हुई पूँजी को कमा लिया।

हर क्षेत्र में घुसी हैं बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ

आज देश का छोटा-बड़ा प्रत्येक क्षेत्र इन विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का गुलाम है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में आने वाली कोई भी चीज ऐसी नहीं है, जिसे ये कम्पनियाँ न बनाती हो। दैनिक उपयोग के सामानों का उत्पादन करके ये विदेशी कंपनियाँ घर-घर में घुसी हुई हैं। खेती के काम में आने वाले जहरीले कीटनाशकों, खादों अन्य उपकरणों का उत्पादन करके इन विदेशी कंपनियों ने हमारी आत्मनिर्भर खेती को अपना गुलाम बना लिया है। उद्योगों के क्षेत्र में रद्दी तकनीकी का इस्तेमाल करके वातावरण को विषैला कर दिया है। हवा, पानी और मिट्टी भी अब प्रदूषण से मुक्त नहीं हैं।

नीचे उन क्षेत्रों की सूची दी गयी है जिनमें घुसकर इन विदेशी कंपनियों में हमारी आर्थिक व्यवस्था को पंगु बना या हैं-

कुछ प्रमुख उत्पादन के क्षेत्र, जिनमें विदेशी कंपनियाँ घुसी हुई हैं।

  1. 1. दैनिक उपभोग की सामग्री के क्षेत्र में
  2. 2. दवा उद्योग के क्षेत्र में
  3. 3. खाद, कीटनाशक, दवायें व खेती उपकरणों के क्षेत्र में
  4. 4. मोटर-गाड़ियों के उपकरणों के उत्पादन के क्षेत्र में
  5. 5. भारी इंजीनियरिंग सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में
  6. 6. इलेक्ट्रानिकी व इलेक्ट्रीकल सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में
  7. 7. सैनिक रक्षा सामग्री के क्षेत्र में
  8. 8. सैनिक रक्षा सामग्री के क्षेत्र में
  9. 9. फूड प्रोसेसिंग व प्लांटेशन(चाय, कॉफी, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ, चॉकलेट)
  10. 10. वैज्ञानिक रक्षा अनुसंधान में
  11. 11. सीमेंट उद्योग में
  12. 12. तेल शोधन व उत्पादन के क्षेत्र में
  13. 13. धातुओं के खनन तथा निष्कर्षण क्षेत्र में
  14. 14. जूट उद्योग में
  15. 15. सिले हुए (रेडीमेड) कपड़ों के उत्पादन क्षेत्र में
  16. 16. जूते व अन्य खेल सामानों के उत्पादन क्षेत्र में
  17. 17. रबर इन्डस्ट्रीज के क्षेत्र में
  18. 18. बच्चों के खेलौने व अन्य प्लास्टिक सामानों के उत्पादन में

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विदेशी पूँजी का धोखा

बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जब भी दुनिया के किसी देश में व्यापार करने के लिए जाती हैं तो वे उस देश के लिए भारी सिर दर्द बन जाती हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के किसी भी देश में काम करने से ऐसा नहीं है कि मात्र आर्थिक दुष्प्रभाव ही पड़ते हों अपितु उस देश में इन कंपनियों के व्यापक और गहरे प्रभाव नजर आते हैं। क्योंकि इन कंपनियों का चरित्र ही ऐसा है कि ये देश की नीतियाँ बदलवाने के लिए सीधे राजनैतिक हस्तक्षेप करती हैं। सामाजिक जीवन भी इन कंपनियों के प्रभाव से अछूता नहीं रहता है।

जब ये कंपनियाँ काम करने के लिए अन्य देशों में जाती हैं तो उनके पीछे कुछ मिथ्या धारणायें काम करती हैं जैसे ये अपने साथ पूँजी लायेगी, आधुनिक तकनीक देगी, लोगों के रोजगार के अवसर मुहैया करायेगी, देश का निर्यात बढ़ायेगी, देश के भुगतान संतुलन की स्थिति को चुस्त-दुरुस्त रखेगी, देश की आर्थिक संसाधनों में और अधिक वृद्धि करेगी आदि-आदि। लेकिन असलियत ठीक इन सभी दावों से उल्टी होती है।

विदेशी कंपनियों के पक्ष में सबसे बड़ी दलील दी जाती है कि भारत जैसे गरीब और पिछड़े देश में पूँजी की बड़ी कमी होती है और पूँजी के अभाव में विकास नहीं हो सकता। इसलिए विदेशों से पूँजी आमन्त्रित करके इस कमी को पूरा किया जा सकता है और पिछड़ेपन के दुष्प्रक को तोड़ा जा सकता है।

लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। ये विदेशी कंपनियाँ बाहर से बहुत कम पूँजी लाती हैं, अधिकांश पूँजी यहां के बैंकों से कर्ज लेकर, यहाँ की जनता से कर्ज लेकर और उनको शेयर बेचकर एकत्रित करती हैं। देश में जितनी भी विदेशी कंपनियाँ कार्य कर रही हैं, वे औसतन 5 प्रतिशत तक पूँजी ही बाहर से लाती हैं। बाकी 90 प्रतिशत से लेकर 95 प्रतिशत तक पूँजी ये भारतीय स्रोतों से ही एकत्रित करती हैं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा पूँजी निवेश मात्र एक धोखा है। हिन्दुस्तान लीवर, कॉलगेट, सीबागाइगी जैसी सैकड़ों विदेशी कंपनियों ने मात्र कुछ लाख रुपये से भारत में व्यापार शुरू किया। लाभ कमा-कमा कर बोनस शेयर के रूप में इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपनी शेयर पूँजी करोड़ों रुपये में कर ली। अब ये कंपनियाँ रॉयल्टी, शुद्ध लाभ और टेक्नीकल फीस के रूप में अरबों रुपये भारत से बाहर ले जा रही हैं। इस बात की गंभीरता का अहसास इसी से हो जाता है कि 1967-77 में जहाँ भारत में कार्यरत विदेशी कंपनियाँ 121.54 करोड़ रुपये देश से बाहर ले गयीं, वहीं 1986-87 में यह राशि बढ़कर 494.6 करोड़ रुपये हो गयी। पिछले 11 वर्षों में ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ वैधानिक रूप से 3244.15 करोड़ रुपये भारत से बाह ले जा चुकी हैं, जबकि अवैधानिक तरीके से ये कंपनियाँ इससे कई गुनी अधिक राशि देश से बाहर ले जा चुकी हैं। इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की भारत में शेयर पूँजी लगभग 675 करोड़ रुपये मात्र है। ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ देश के खून-पीसने की कमाई विदेशी मुद्रा का निर्यात अपने मूल देशों को

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कर रही हैं। इन बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ने पूँजी के नाम पर कैसा मकड़जाल इस देश पर फैलाया है, इसका अनुमान दो-तीन उदाहरणों से लगाया जा सकता है।

हिन्दुस्तान लीवर ने भारत में सन् 1933 में जब व्यापार शुरू किया तब इसकी मूल कंपनी यूनीलीवर ने मात्र 24 लाख रुपये लगाये। 1933 में प्रारम्भ हुई इस कंपनी ने ऐसा जाल बिछाया कि 1990 में इसकी मूल कंपनी यूनीलीवर की शेयर पूँजी 47.59 करोड़ रुपये हो गयी। इसमें से 44.51 करोड़ रुपये की शेयर पूँजी बोनस के रूप में जुड़ी। 1975 से 1990 तक के बीच हिन्दुस्तान लीवर ने 80.18 करोड़ रुपये लाभांश के रूप में भारत से बाहर भेज दिये। यह रकम रायल्टी और तकनीकी शुल्क के अतिरिक्त हैं।

इसी तरह कॉलगेट-पामोलिव कंपनी ने सन् 1937 में मात्र 1.5 लाख रुपये से अपना कारोबार शुरू किया। 1989 के आते-आते अमरीकी कंपनी कॉलगेट-पामोलिव की शेयर पूँजी बढ़कर 12.57 करोड़ रुपये हो गयी। इसमें 12.56 करोड़ रुपये की पूँजी बोनस शेयर के रूप में जुड़ी। कॉलगेट-पामोलिव कंपनी 1977 से 1989 के बीच में 18.42 करोड़ रुपये लाभांश के रूप में भारत से अमरीका ले गयी।

सामान्यतः बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जितनी पूँजी लेकर आती हैं, उससे कई गुना अधिक पूँजी तो वे एक ही वर्ष में देश के बाहर भेज देती हैं। उदाहरण – गुडईयर कंपनी ने भारत में 1 करोड़ रुपये पूँजी का निवेश किया। लेकिन 1989 में गुडईयर ने 7.33 करोड़ रुपया भारत से बाहर मुनाफे के रूप में भेज दिया।

वर्षविदेशी पूँजी निवेशभारत से बाहर गया धन
1981108 करोड़ रुपये114 करोड़ रुपये
1982628 करोड़ रुपये641 करोड़ रुपये
1983618 करोड़ रुपये590 करोड़ रुपये
19841130 करोड़ रुपये1169 करोड़ रुपये
19851260 करोड़ रुपये1181 करोड़ रुपये
19861066 करोड़ रुपये1265 करोड़ रुपये
19871077 करोड़ रुपये1193 करोड़ रुपये
1991 से 199525,479 करोड़ रुपये34,240 करोड़ रुपये

स्रोत - रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया रिपोर्ट

उच्च विदेशी तकनीक का झूठ

विदेशी उच्च तकनीक को लाने के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को व्यापार की खुली लूट दी जाती हैं। भारत में आने वाली सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने विदेशी उच्च तकनीक देने के समझौते पर हस्ताक्षर कर रखे हैं। लेकिन वास्तव में अधिकांश बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ऐसे क्षेत्रों में व्यापार

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कर रही हैं, जहाँ विदेशी तकनीक की कोई जरूरत नहीं है। 80 के दशक में सरकार की ओर से एक नीति बनायी गयी थी। इस नीति के अनुसार 850 ऐसी वस्तुएं हैं, जिसके उत्पादन को लघु उद्योगों के लिए सुरक्षित रखा गया है। लेकिन जितनी भी विशालकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हैं, वे सभी इन्हीं उत्पादों के व्यापार में लगी हुई हैं। लघु उद्योगों के लिये आरक्षित उत्पादों के क्षेत्र में घुसपैठ से बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उच्च विदेशी तकनीक लाने की बात एकदम झूठ साबित होती है।

माल देशी, मुहर विदेशी

कई बार ऐसा भी होता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ न तो पूँजी लाती है और न ही कोई उच्च तकनीक। होता यह है कि ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कुछ भारतीय कंपनियों के साथ 'फ्रेंचाइज एग्रीमेंट' करती हैं या 'सब कान्ट्रेक्टिंग एग्रीमेंट' करती हैं। इसके तहत उत्पादन का काम तो वह भारतीय कंपनी करती है लेकिन उत्पादित माल पर नाम बहुराष्ट्रीय कंपनी का ही होता है। अर्थात् बाजार में बिकने वाले माल की उत्पादक कोई स्वदेशी कंपनी है लेकिन माल विदेशी कंपनी के नाम से बिकता है। पूँजी लगाये स्वदेशी कंपनी, तकनीक इस्तेमाल करे स्वदेशी कंपनी, उत्पादन कराये स्वदेशी कंपनी, लेकिन माल बिके विदेशी कंपनी के नाम पर। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का यह गोरखधंधा इस देश में खूब चल रहा है।

घटते रोजगार और बढ़ती बेरोजगारी

आँखे मूंदकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से, जब हम बनी-बनायी तकनीक का आयात करते हैं तो हम दरअसल दूसरे देशों के इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों को काम मुहैया कराते हैं। अर्थात् अपने देश से विकसित देशों को रोजगार का निर्यात करते हैं। इस तकनीकी आयात की प्रक्रिया में भारतीय इंजीनियरों व तकनीकी विशेषज्ञों को जो अतिरिक्त कार्य दिया जा सकता था और अधिक रोजगार के अवसर पैदा किये जा सकते थे, वे एकदम समाप्त हो जाते हैं। इससे हमारे देश के इंजीनियर व तकनीकी विशेषज्ञ बेकार रहते हैं, वही दूसरी ओर किसी विकसित औद्योगिक, देश को जहाँ की कंपनी होती है, अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा हो जाते हैं। इसके अलावा जब बनी बनायी तकनीक आयात होता है तो भारतीय इंजीनियरों का कार्य सिर्फ तंत्र को चालू रखन का होता है। सर्वविदित है कि कारखानों के रख-रखाव के लिए किसी बड़ी प्रतिभा की जरूरत नहीं होती है। जबकि तकनीकी विशेषज्ञता का योगदान नयी विधियाँ विकसित करने में और विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान द्वारा विकास करने में होता है। इस प्रकार जो इंजीनियर या तकनीकी विशेषज्ञ देश में काम में लगे हुए हैं, उनकी प्रतिभा का भी सही उपयोग नहीं हो पाता है।

'सेंटर फॉर प्लानिंग रिसर्च एण्ड एक्शन' (नयी दिल्ली) के अध्ययन के मुताबिक प्रतिभा पलायन के कारण भारत को अब तक 247 अरब रूपये का नुकसान हो चुका है और अगर यह नहीं रूका तो शताब्दी के अंत तक 5 लाख से ज्यादा कुशल और प्रशिक्षित भारतीय विदेशों में काम कर रहे होंगे।

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फिलहाल 4 लाख 10 हजार भारतीय विदेशों में काम कर रहे हैं। अध्ययन के अनुसार भारतीय इंजीनियर विदेशी में 32%, डॉक्टर 28% और वैज्ञानिक 5% हैं।

जब एक डॉक्टर भारत को छोड़कर अमेरिका जाता है तो देश को 35 करोड़ रुपये का नुकसान होता है लेकिन वह अमरीका में 60 करोड़ यानी 20 गुना धन कमा कर उस देश की समृद्धि में भागीदार होता है। जबकि दूसरी ओर भारत एक विकासशील देश है जहाँ डॉक्टरों का अभाव है, जहाँ शहर में 5 हजार लोगों पर एक डॉक्टर है तथा गाँव में 45 हजार लोगों पर एक डॉक्टर है।

भारत से निकलने वाली प्रतिभाओं की एक बड़ी संख्या अमेरिका चली जाती है। 1957 से 1965 तक अमेरिका में भारतीय वैज्ञानिकों, डॉक्टरों तथा इंजीनियरों की संख्या सिर्फ 1000 थीं वही 1966 से 1968 तक वह संख्या 4000 हो गयी। 1977 तक भारत में 16,849 वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर अमेरिका चले गये।

उदार आर्थिक नीतियों के चलते देश में विदेशी अनुबंधों की बाढ़ आ गयी है। जुलाई 1995 तक देश में 20,000 से अधिक विदेशी अनुबंध चल रहे हैं। जिनके चलते गैर जरूरी क्षेत्रों में आर्थिक विकास ज्यादा हुआ है। पिछले 5 वर्षों में संगठित क्षेत्रों में सबसे अधिक विकास हुआ है जबकि इस क्षेत्र में रोजगार अवसरों की वृद्धि दर मात्र 1.5 प्रतिशत रही है। यानी संगठित क्षेत्र में पूँजी निवेश सबसे अधिक हुआ है लेकिन रोजगार के अवसर उस तुलना में पैदा नहीं हुए।

दूसरी ओर देश का लघु उद्योग का क्षेत्र है जिसमें सबसे कम पूँजी का निवेश किया जाता है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि देश के जितने भी रोजगार है उनमें से 80 प्रतिशत इन अंसंगठित लघु उद्योगों में है। लघु उद्योगों में 1986-87 में रोजगार प्राप्त व्यक्तियों की संख्या 10.1 करोड़ थी जो वर्ष 1987-88 में बढ़कर 10.7 करोड़ तक पहुँच गयी भारत में 1988 के अंत तक लघु उद्योगों की कुल संख्या 14.6 लाख थी। इसमें से 3 लाख लघु इकाईयाँ इन विशालकाय कंपनियों के बाजार में एकाधिकार के चलते बीमार हो गयी हैं और बंद होने के कगार पर हैं।

चूँकि इन विदेशी कंपनियों ने लघु उद्योग में बनने वाले हर सामान को बनाने के क्षेत्र में घुसपैठ कर रखी हैं, अतः लगभग 10 लाख 30 हजार अन्य छोटी इकाईयाँ इनके सामने प्रतिस्पर्धा में धीरे-धीरे चल रही हैं। हर वर्ष देश में बीमार इकाईयों की संख्या बढ़ती चली जा रही है जिससे लाखों लोग बेरोजगार होते जा रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार देश में प्रतिवर्ष 1 करोड़ 84 लाख नये बेरोजगार लोग पैदा हो जाते हैं। इनमें से अधिकांश छोटी इकाईयों के बंद हो जाने की वजह से बेरोजगार हो जाते हैं।

इसके अतिरिक्त इन विदेशी कंपनियों ने विकास के नाम पर सैकड़ों वर्षों से चल रहे हमारे देशी कारोबार, हुनर और हस्त शिल्प को रौंदा हैं, जिसमें लगे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छिन गयी हैं। आधुनिकीकरण की सबसे ज्यादा मार पड़ी है कारीगरों, दस्तकारों व कुटीर उद्योगों पर। जूता उद्योग का आधुनिकीकरण होगा तो कौन मारा जायेगा? मोची। कपड़ा उद्योग का मशीनीकरण होगा तो कौन बर्बाद होगा? बुनकर। वस्त्र उद्योग का रेडीमेडकरण होगा तो कौन नष्ट होगा? दर्जी। मिठाई

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बनाने के क्षेत्र में जब विदेशी कंपनियाँ घुसेगी तो कौन हैरान होगा? हलवाई। कुल्हड़ की जगह विदेशी कंपनियाँ प्लास्टिक के गिलास बनाने लगेंगी तो कुम्हार किस काम का रह जायेगा? फलों का रस डिब्बा बंद करके बेचने के लिए विदेशी कंपनियाँ आयेगी तो कौन समाप्त होगा? फलों का रस बेचने वाले लोग। पानी बेचने के लिए भी विदेशी कंपनियाँ आयेगी तो आगे कहा नहीं जा सकता, हम लोग स्वयं सोच लें।

गुलाम होती खेती

आजकल देश में एक नारा बहुत जोर शोर से इन कंपनियों द्वारा दिया जा रहा है कि 'खेती को उद्योग बनाओ'। यानि अब खेत को कारखाना बनाने की साजिश देश में चल रही है। अब ये कम्पनियाँ खेती के बल पर और अधिक मालामाल होने के सपने देख रही हैं। हमें याद होना चाहिए कि आज से लगभग 60 वर्ष पहले इन्हीं कंपनियों द्वारा देश में 'हरित क्रान्ति' का नारा दिया गया था। खेती की उन्नति और विकास के नाम पर चले इस नारे ने भारत की पारंपरिक कृषि व्यवस्था और उसके साथ जुड़ी हुई, समाज व्यवस्था को चौपट करके रख दिया। उसी तरह अब खेती की उन्नति के नाम पर खेती को उद्योग का दर्जा देने की बात भारत के सामान्य और बहुसंख्यक किसानों के लिए देश की बची कूची कृषि व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध होगी।

छह दशक पहले जिस हरित क्रान्ति के नारे के साथ कृषि प्रधान राज्यों ने रसायन और नाइट्रोजन युक्त सस्ता यूरिया खेतों में डालना शुरू किया तब उन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनके खेत सिर्फ फसल नहीं बल्कि गंभीर बीमारी और मौत भी बांटेंगे। बीमार होने वालों में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नाम शीर्ष पर हैं। इन राज्यों ने खेतों में अंधाधुंध नाइट्रोजन युक्त यूरिया का इस्तेमाल किया है। इंडियन नाइट्रोजन ग्रुप के शोध में यह दावा किया गया है कि भारत में नाइट्रोजन प्रदूषण का मुख्य स्रोत कृषि है। वहीं, चावल और गेहूँ की फसलों प्रदूषण का जरिया बन रही हैं। पहली बार नाइट्रोजन के प्रयोग और प्रभाव पर इंडियन नाइट्रोजन ग्रुप ने दस वर्ष का गहन शोध किया है। 120 क्षेत्रों के वैज्ञानिकों ने नाइट्रोजन के विभिन्न स्रोतों का पता लगाया है। चिंता की बात है कि भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर कृषि में सर्वाधिक यूरिया का इस्तेमाल करने वाला देश है। 1960-61 में जहाँ 10 फीसदी नाइट्रोजन उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता था। जो कि 2015-2016 में बढ़कर 82 फीसदी रिकार्ड किया गया है।

एक साल में इतना बिका यूरिया सीएसई के मुताबिक, वर्ष 2015 से 2016 के बीच यूरिया की बिक्री पंजाब में जहाँ 30,86046 टन और हरियाणा ने 21,12981 टन, दिल्ली में 10,792, उत्तर प्रदेश में 57,98991 टन हुई। इस नाइट्रोजन युक्त यूरिया का महज 30 फीसदी ही खेतों तक पहुँचा बाकी पर्यावरण में जहर बनकर घुल गया। यह बच्चों के लिए भी खतरनाक है। नाइट्रेट युक्त पानी यदि छह महीने तक बच्चा पीता है तो वह ब्लू बेबी सिंड्रोम का शिकार हो सकता है। खून संबंधी कई बीमारियाँ भी हो सकती हैं।

बढ़ रहे हैं आईवीएफ सेंटर कुदरती खेती की विधि और सीख देने वाले भगत पूर्ण सिंह फार्म के इंचार्ज राजवीर सिंह बताते हैं कि यूरिया और रसायन के इस्तेमाल से पैदा फसलों ने उपजाऊ जमीन को बर्बाद कर दिया है। फसलों में जिक्र बिल्कुल भी नहीं हैं जिससे लोगों में प्रजनन

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क्षमता कमजोर हुई हैं। पंजाब और हरियाणा में काफी आईवीएफ सेंटर खुल रहे हैं। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में भी इस बात की तस्दीक की गई है। इन फसलों के चलते हमारी मांसपेशियां पूरी तरह विकसित नहीं हो रही हैं। जिसका परिणाम जगह-जगह दिखाई देने वाले आईवीएफ सेंटर हैं।

हरियाणा के भूजल में दुगुना नाइट्रोजन आईएनजी और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट के मूताबिक, मिट्टी में बहुत मात्रा में नाइट्रोजन घुलने से कार्बन तत्व काफी कम हो जाता है। उसमें मौजूद पोषण तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है। नाइट्रोजन प्रदूषण पानी को भी प्रभावित करता है। पंजाब, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के भूमिगत जल में नाइट्रेट की मौजूदगी विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से बहुत अधिक पाई गई है। हरियाणा में यह सर्वाधिक 99.5 एमजी प्रति लीटर है। जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के सामान्य मानक 50 एमजी प्रति लीटर से करीब दोगुना है।

350 थैले यूरिया का इस्तेमाल 1978 में जहाँ एक एकड़ खेत में 7 से 8 थैले यूरिया के इस्तेमाल होते थे। वहीं अब 350 थैले का इस्तेमाल हो रहा है। बावजूद मनचाही फसल की पैदावार किसानों को नहीं मिल रही। हरित क्रांति का नारा जब आया उसी वक्त इसका विरोध हुआ था लेकिन देशभर के लिए अनाज पैदा करने वाला पंजाब प्रयोग की धरती बन कर रह गया। आज खेतों में रहने वाले किसानों में कैंसर, मोतियाबिंद और कई अन्य गंभीर बीमारियां पल रही हैं।

33 फीसदी ही खेत में पहुँचता है यूरिया आईएनजी के अध्यक्ष एन रघुराम बताते हैं कि बीते पांच दशकों में हर भारतीय किसान ने औसत 6 हजार किलों से अधिक यूरिया का इस्तेमाल किया है। सिर्फ 33 प्रतिशत उपभोग ही चावल और गेहूँ की फसलें करती हैं। शेष 67 फीसदी मिट्टी, पानी और पर्यावरण में पहुँचकर उसे तबाह कर रहा है।

कीटनाशकों का कहर

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रायपुरा-जंगला गांव में 15 अप्रैल 1990 की रात को एक समारोह में विषाक्त भोजन खाने से 200 से अधिक लोग मारे गये। इस दर्दनाक हादसे के कारणों का सही-सही पता चला, जब पूरी जांच की गयी, जांच के बाद पाया गया कि लोगों की मौच अत्यंत घातक कीटनाशक पैरथियान और ई.एन.पी के कारण हुई।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जाल में फँसकर यह माना गया कि खेती की उपज बढ़ाने के लिए यदि ढेरों तरह के जहरीले कीटनाशी रसायनों का भरपूर इस्तेमाल जारी नहीं रहा तो कीटाणु सारी फसल को चट कर जायेंगे और सारी मानवता भूखमरी की चपेट में आ जायेगी। इन कंपनियों द्वारा प्रचारित विकास, किसी अन्य विकल्प को प्रकृति प्रेमियों व पर्यावरणवादियों का सुहाना सपना समझकर उसकी खिल्ली उड़ाते हैं। मिट्टी की हिफाजत का परम्परागत देशी तौर तरीका, खरपतवार, घरेलू व कृषि कूड़ा-कचरा और देशी गाय के मल-मूत्र से बनी खाद, परस्पर मदद पहुँचाने वाली फलसों का बारी-बारी से बोया जाना यानी फसल-चक्र, यह सब विदेशी कंपनियों, द्वारा विकसित तकनीक ने छीन लिया है। मिट्टी, हवा, पानी और फसल के बीच जो प्राणवान, समन्वित और निरापद नाता था, वह बेमानी हो गया है। उसका स्थान ले लिया बेकस मिट्टी और जहरीले रासायनिक द्रव्यों ने।

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‘हरित क्रान्ति’ के बाद खेती रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर पूरी तरह निर्भर होकर रह गयी है। इसका नतीजा यह है कि जो अनाज जीवनदायी माना जाता है, वही उर्वरकों व कीटनाशकों के कारण गुणवत्ता में निम्न स्तर का होकर अस्वास्थ्यकर और जानलेवा तक होने लगा है। ‘हरित क्रान्ति’ के दौरान अनाज उत्पादन में चमत्कारिक वृद्धि असल में एक मिथक है, उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार सन् 1947 के बाद के पहले दशक में जहाँ अन्न उत्पादन में 3.5% प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि हुई। वहीं अगले दशक में अर्थात् 60 के दशक में यह दर मात्र 2.25% प्रतिशत रही। यह दर दो दशकों तक जारी रही। एकमात्र गेहूँ ही ऐसा अनाज है जिसका उत्पादन 4.5% वार्षिक दर से बढ़कर 7.62% हो गयी लेकिन दूसरी ओर का सच यह है कि बाकी अन्य सभी अनाजों की वृद्धि दर लगातार घटती गयी। इन आँकड़ों से हरित क्रान्ति के भोजन पर पड़ने वाले प्रभाव स्पष्ट देखे जा सकते हैं। हरित क्रान्ति के दौरान गेहूँ का उत्पादन क्षेत्र बढ़ता गया और मोटे अनाजों, दालों, तिलहन आदि का उत्पादन क्षेत्र घटता गया। इस कारण भोजन में प्रोटीन की मात्रा घटती गयी। नये अनाजों का असर पशुओं को भी झेलना पड़ रहा है क्योंकि ज्यादा उपज देने वाली फसलों का भूसा पोषक तत्वों के मामले में कमजोर होता है।

आज अनाज, फल, सब्जियाँ, दलहन, तिलहन, दूध और मांस-मछली तक सभी में विषाक्त तत्वों की भरभरा है जो एक धीमी मौत की ओर हमें धकेल रही है। इसके बावजूद रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल न केवल जारी है बल्कि तेजी से बढ़ भी रहा है। आँकड़ों पर नजर डालें तो विशेषज्ञों का कहना है कि सन् 1960 से 1980 के दौरान भारत में कीटनाशकों की खपत में 20 गुना इजाफा हुआ है। इस दौरान कीटनाशकों के उत्पादन में 14% की बढ़ोतरी हुई है और इनका आयात भी इस बीच 7 गुना बढ़ा।

संस्कृति पर हमला

क्या करें? “इनकी साँस में बदबू है” कहकर एक नयी नवेली पत्नी उदास हो जाती है। फिर उसकी एक सहेली उसे डॉक्टर के पास ले जाती है। डॉक्टर सलाह देते है कि “यदि साँस की बदबू से छूटकारा पाना है तो ‘कॉलगेट का सुरक्षा चक्र’ अपनाइये।

इसी तरह से ‘क्लोज अप फार क्लोजेज अस’। अर्थात् क्लोज-अप के इस्तेमाल से ही पति-पत्नी नजदीक आ सकते हैं सवाल उठता है कि ‘क्या पति-पत्नि का रिश्ता एक 10 रूपल्ली वाली कोलगेट या क्लोज अप के पेस्ट की ट्यूब पर टिका हुआ है?’ इसी तरह बालों को काला बनाने तथा गिरने से बचाने के लिए कई तरह के हेयर ड्राई, तेल तथा दवाओं के विज्ञापन आते हैं। जबकि सच यह है कि अभी तक बालों को गिरने या सफेद होने से रोकने का कोई उपचार नहीं निकला है। लेकिन हर रोज ऐसे विज्ञापन टी.वी पर आते रहते हैं जो लोगों के मन में सिवाय भ्रम के और कुछ नहीं पैदा करते। यही बात दंत मंजन पर भी लागू होती है। अभी तक दुनिया में ऐसा कोई भी मंजन नहीं है जो दांतों की बीमारियों को दूर कर सके या फिर दांतों को रोग लगने से बचाए। फिर भी टी.वी पर या पत्रिकाओं में जिस तरह के चमकते हुए दांतों को दिखाया जाता है, वह किसी खास कंपनी के मंजन के चमत्कार के रूप में होती है। एक के बाद एक सभी दांतों के खराब हो जाने पर भी लोग उपचार की दृष्टि से मंजनों की निरर्थकता को देख नहीं पाते।

किसी विशेष कंपनी की साड़ी में सजी हुई सुन्दर औरत, सूट में सजा हुआ सुन्दर नौजवान, कोका या पेप्सी की बोतल लिए समुद्र तट के रमणीक माहौल में खड़े सुन्दर स्त्री-पुरुष, विशेष कंपनी के स्वीमिंग सूट में समुद्र तट पर क्रीड़ा करती हुई बालायें – ये सब चटकिले-भड़किले

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विज्ञापन ऐसा मानसिक माहौल तैयार करते हैं कि लोग विज्ञापन मॉडलों की सुंदरता का अर्थ खास कंपनी के परिधानों और सजावट में निहित होने लगता है। जबकि सुंदरता किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य और स्वभाव से आती है।

इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापनों ने एक खास किस्म की 'स्टेटस प्रॉब्लम' को जन्म दिया है। अब रोटी, कपड़ा और मकान वाली विचारधारा तो समाप्त हो चुकी है। उसकी जगह ले ली है नये-नये चिप्स, कुकीज, रेंगलर जींस, वॉल पेपर, आधुनिक टाइल्स आदि ने। भले श्रीमती जी दिन भर पड़ी सोती रहें, पर वैक्यूम क्लीनर न होने की वजह से उन्हें वक्त ही नहीं मिलता खाना बनाने का। या फूट प्रोसेसर जब नहीं होगा तो खाना बनाने में देर तो लगेगी ही, इसमें उनकी क्या गलती है। इन सबका परिणाम होता है अतार्किक एवं अनावश्यक व्यय, जो कि धीरे-धीरे आपको तार्किक एवं आवश्यक लगने लगता है। 'स्टेटस सिंबल' पहले से ऊँचा होना रहता है लेकिन वेतन उस अनुपात में बढ़ता नहीं, नतीजा होता है व्यक्ति के भ्रष्टाचारी बनने की कहानी शुरू होती है यानि विज्ञापनों का भारी रहता है। इस तरह एक ईमानदार व्यक्ति के भ्रष्टाचारी बनने की कहानी शुरू होती है यानि विज्ञापनों का रिश्ता भ्रष्टाचार से भी है।

विज्ञापनों में कभी भी वस्तु को गुणवत्ता के आधार पर बेचने की कोशिश नहीं की जाती है। ये विज्ञापन तो माध्यम वर्ग के ग्लैमर को भुनाने की कोशिश करते हैं। ये विज्ञापन व्यक्ति में एक हीन भावना पैदा करते हैं। अधिकांशतः होता यह है कि विज्ञापित वस्तु होती मध्यमवर्ग के इस्तेमाल की है पर विज्ञापन में दिखाया जाता है, विशुद्ध रईसाना पांच सितारों वाली जीवन शैली। मध्यम वर्ग की एक कमजोरी होती है कि उसमें उच्च वर्गीय जीवन के प्रति एक विशेष किस्म की जिज्ञासा तथा वैसा जीवन जीने की दमित इच्छा होती है। विज्ञापन भयंकर सिद्ध होते हैं। एक आम आदमी चाहे जितनी भी विलासिता की वस्तुएं एकत्रित कर ले पर वह कभी भी उस किस्म की जीवन शैली को वहन नहीं कर सकता जैसी कि उसे विज्ञापन में दिखायी जाती है। इसका परिणाम होता है एक भीषण हीन भावना का जन्म, जो बढ़ती जाती है तथा एक सीमा के आगे जाने पर वैयक्तिक विघटन का कारण बन जाती है।

अब तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने मनोरंजन परोसने के नाम पर अपने टेलीविजन नेटवर्क को शुरू कर दिया है। सी. एन.एन., स्टार, ए.टी.एन, एम.टी.वी., एल.टी.वी, यू.टी.वी आदि अनेकों बहुराष्ट्रीय टेलीविजन कंपनियों का जाल पूरे देश में फैल गया है। मनोरंजन के नाम पर बीसियों चैनल देश में चल रहे हैं। इन चैनलों पर दिखाये जाने वाले सीरियल, फिल्में तथा अन्य कार्यक्रम हमारे समाज को सांस्कृतिक रूप से खोखला बना रहे हैं। दो दर्जन से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इन विदेशी टी.वी चैनलों के प्रमुख समय को खरीद लिया है। सीरियल तथा कार्यक्रमों में क्या संस्कृति दिखायी जायेगी, इसका फैसला बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पैसा तय करता है। यह इस देश में पहली बार हो रहा है जब सीरियल तथा अन्य कार्यक्रम कलाकर्मियों और रचनाकारों की कल्पना या भावना से नहीं बन रहे हैं बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लुटेरों के निर्देशों पर बन रहे हैं। इस नये सांस्कृतिक उद्योग का सय यही है। आज हमारी संस्कृति एक झटके में ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में चली गयी है। विदेशी चैनलों के कार्यक्रमों में एक समूची नई किस्म की उत्तेजक और भौंड़ी जीवन शैली दिखायी जा रही है। इसे देखकर दीनहीन, थके-हारे और निन्दावे बार असफल रहने वाले लोगों के मन में भी कमावासना जागृत हो जाती है। इन चैनलों पर दिखाये जा रहे कार्यक्रमों या फिल्मों द्वारा एक घोषित सैक्स और हिंसा का युद्ध चलाया जाता रहा है। इसका उद्देश्य व्यभिचार, यौनिक लिप्सा और हिंसा को बढ़ावा देना है।

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