वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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26 \ वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता प्रदान करना। साम्प्रदायिकता तथा रक्त-पात, बैर-भाव के अर्थहीन झगड़ों को समाप्त कर राष्ट्र में अमन-चैन का सन्देश फैलाना तथा वैदिक साहित्य से प्रेरणा प्राप्त कर सब समान है न कोई छोटा है न कोई बड़ा, इसका प्रचार करना। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता की अवधारणा राष्ट्रीय एकता से राष्ट्र के समस्त वासियों में ‘हम’ की भावना का बोध होता है। ‘हम’ की भावना से तात्पर्य है राष्ट्रहित के समक्ष अपने वैयक्तिक हितों का त्याग करने में तनिक भी संकोच न करना। जिस राष्ट्र में नागरिक उपर्युक्त गुणों से युक्त होते हैं उनमें ही ‘हम’ की भावना पायी जाती है और यही ‘हम की भावना’ राष्ट्रीय एकता कहलाती है। राष्ट्रीय एकता राष्ट्र का प्राणतत्त्व होती है जिसके बिना राष्ट्र की कल्पना ही निस्सार है। राष्ट्र को सर्वोपरि तथा राष्ट्रहित को ही अपना हित मानते हुए राष्ट्रीय एकता को इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं :- ‘‘जब किसी राष्ट्र के व्यक्तियों में स्थान, जाति, भाषा, धर्म व संस्कृति आदि किसी भी आधार पर भिन्नता होते हुए भी राष्ट्रहित के आधार पर ‘हम’ की भावना होती है और वे राष्ट्रहित के आगे अपने वैयक्तिक हितों का त्याग करते हैं तो इसे राष्ट्रीय एकता कहते है।’’$^१$ राष्ट्रीयएकता के सम्मेलन ने राष्ट्रीयएकता को इस प्रकार परिभाषित किया है :- ‘‘राष्ट्रीयएकता एक मनोवैज्ञानिक एवं शैक्षिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा लोगों के दिलों में एकता, संगठन एवं सन्निकटता की भावना, सामान्य नागरिकता की भावना और राष्ट्र के प्रति भक्ति की भावना का विकास किया जा सकता है।’’$^२$ उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि राष्ट्रीयएकता का स्वरूप अमूर्त है जिसे देखा नहीं जा सकता बल्कि अनुभव किया जा सकता है। जिसकी प्रकृति मनोवैज्ञानिक है, जो देशवासियों के हृदय में राष्ट्र के प्रति प्रेम, भक्ति, त्याग, बलिदान, संगठन, भाईचारे की भावना को जन्म देती है और जो अखण्ड राष्ट्र की निर्माणक है। ‘‘नवभारत टाइम्स’’ के प्रधान सम्पादक श्री अक्षय कुमार जैन ने राष्ट्रीयएकता को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया है :- १. रमन बिहारी लाल की ‘शिक्षा के दार्शनिक और समाजशास्त्रीय सिद्धान्त’ रस्तौगी पब्लिकेशन्स, शिवाजी रोड, मेरठ, पृ० ६५ २. आधुनिक सामाजिक विज्ञान-१ लेखक- उदयवीर सक्सेना एवं शकुन्तला सक्सेना, पृ० ३३३
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प्रथम अध्याय 27 “अनेकता में एकता इस प्रकार बैठी है जैसे शरीर में भिन्न-भिन्न अवयवों के होते हुए भी रीढ़ की हड्डी में चलता हुआ स्नायु मंडल।”१ श्री जैन ने राष्ट्र को मानव शरीर की उपमा देते हुए कहा है- राष्ट्र एक मानव शरीर है। उसमें विभिन्न विचारधाराओं और मतों को मानने वाले विभिन्न धर्मों के लोग भिन्न-भिन्न अवयवों की भाँति होते हैं। भिन्न अवयवों को रीड़ की हड्डी एक शरीर के रूप में स्थापित रखती हैं, परन्तु इस आधार स्तम्भ रीड़ की हड्डी में बहुत ही सूक्ष्म स्नायु मंडल अनेकता के रूप में विद्यमान रहते हैं। यही अनेकता में एकता का मूल सार है। राष्ट्रीय शैक्षणिक नियोजन एवं प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली के निदेशक प्रो० यूनिस रजा के अनुसार “विकास का मनोविज्ञान हमें सिखाता है कि एकता और विभिन्नता की प्रक्रिया परस्पर विरोधी न होकर एक दूसरे की पूरक हैं और इन दोनों के सह- अस्तित्व पर ही मानव शरीर और राष्ट्रों का अस्तित्व निर्भर करता है।”२ श्री रजा एकता तथा विभिन्नता को परस्पर विरोधी नहीं मानते बल्कि वह उन्हें एक दूसरे में अभिन्नता का पूरक मानते हैं। जिस प्रकार एक उपवन में विविध रंग के पुष्प एक साथ खिलते है तथा जिनके अनेक नाम होते है जो नामों से विभिन्नता को धारण करते हुए भी गन्ध रूपी एकता में बँधे हुए होते है। जिनका अस्तित्व एक- दूसरे पर निर्भर करता है। अतः इसी प्रकार राष्ट्र-राष्ट्रीय एकता रूपी भावना पर निर्भर रहता है। डा० जे० एस० वेदी के अनुसार- “राष्ट्रीयएकता का अर्थ है देश के विभिन्न राज्यों के व्यक्तियों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषा-विषयक विभिन्नताओं को वांछनीय सीमा के अन्तर्गत रखना और उनमें भारत की एकता का समावेश करना।”३ उपर्युक्त विचार से स्पष्ट है कि देश के विभिन्न राज्यों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषा सम्बन्धी विभिन्नता के होते हुए भी समानता की भावना तथा देश के प्रति निजत्व की भावना ही विभिन्नता को एकता के सूत्र में बांधे रहती है, जिससे राष्ट्र का स्वरूप सजीव हो उठता है। डा० राधाकृष्णन् के अनुसार- “राष्ट्रीय एकता एक ऐसी समस्या है जिससे सभ्य राष्ट्र के रूप में हमारे अस्तित्व का घनिष्ठ सम्बन्ध है।”४ १. हाई समाजिक विज्ञान भाग- १, पृ० ३६३ २. हाई समाजिक विज्ञान भाग- १, पृ० ३६३ ३. शिक्षा के सामान्य सिद्धान्त, लेखक- पाठक एवं त्यागी, पृ० १६३ ४. उपर्युक्त, पृ० १६३
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28 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता पर बल देते हुए श्री कृष्णन् ने राष्ट्रीय एकता को एक समस्या कहा है और जिसका समाधान करना अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि राष्ट्र से हमारा घनिष्ठ सम्बन्ध है। राष्ट्र ही हमारा अस्तित्व है। अतः राष्ट्र के अस्तित्व को बनाये रखते हेतु राष्ट्रीय एकता का होना अत्यन्त आवश्यक है। राष्ट्रीय एकता के द्वारा ही हम स्वयं को तथा अपने राष्ट्र को सुरक्षित कर सकते हैं। वाई०वी० चव्हाण भारतीयों को राष्ट्रीय एकता से सम्बद्ध करते हुए कहते हैं कि- "राष्ट्रीय एकता समय का सबसे बड़ा सवाल है और हर कीमत पर उसे बनाये रखना है। प्रत्येक नागरिक को यह सोचना चाहिए कि पहले वह भारतीय है, इसके बाद और कुछ।"१ श्री चव्हाण जी के उपर्युक्त मत से स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति पहले भारतीय है तत्पश्चात् कुछ और। अतः इस प्रकार धर्म, जाति, सम्प्रदाय, संस्कृति, सभ्यता, प्रान्त आदि की विविधता राष्ट्रीय एकता में बाधक नहीं, अपितु उन्हें राष्ट्रीयता रूपी एकता के सूत्र में बाँधने में साधक ही है। राष्ट्रीय एकता के प्रति भारतीयों का ध्यान आकर्षित करते हुए डा० कानूनगो लिखते हैं कि "राष्ट्रीय एकता की हर देश को हर समय आवश्यकता है। किन्तु भारत के लिए इसकी कहीं अधिक आवश्यकता है।"२ राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता विषय का उद्देश्य :- राष्ट्रीय एकता राष्ट्र का प्राणतत्त्व होती है। जिस प्रकार प्राण के अभाव में शरीर निष्प्रयोजन हो जाता है उसी प्रकार राष्ट्रीय एकता के अभाव में राष्ट्र का अस्तित्व ही नहीं रह जाता। एकता अर्थात् राष्ट्रीय एकता से तात्पर्य है राष्ट्र के व्यक्तियों में, स्थान, भाषा, धर्म, जाति, संस्कृति आदि किसी भी आधार पर भिन्नता होते हुए भी उन्हें एकता के सूत्र में बँधे रहना। राष्ट्रीय एकता की उपमा हम वृक्ष से दे सकते हैं :- राष्ट्रीयएकता एक सम्पूर्ण वृक्ष है जिसकी शाखाएँ भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के मनुष्य हैं, उन शाखाओं के फूल और फल रीतिरिवाज व विचारधारायें हैं और तना है राष्ट्र। वृक्ष से यदि शाखाओं, फल-फूल, पत्ती और तने को पृथक् कर दिया जाये तो उसे हम सम्पूर्ण वृक्ष नहीं कह सकते, इसी प्रकार राष्ट्रीय एकता भी समस्त नागरिकों को राष्ट्र से जुड़ने अर्थात् १. हाई स्कूल सामाजिक विज्ञान भाग-१, पृ० ३६१ २. शिक्षा के सामान्य सिद्धान्त, लेखक- पाठक एवं त्यागी, पृ० १६४।
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 29 राष्ट्र के प्रति आस्था रखने से ही सम्भव हो सकती है। यही राष्ट्रीय एकता राष्ट्रीय अखण्डता की आधार शिला है। जब तक राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता की भावना समस्त नागरिकों के हृदय में विद्यमान नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय अखण्डता की कल्पना करना ही व्यर्थ है। इस प्रकार राष्ट्रीय एकता राष्ट्रीय अखण्डता की पूरक है। राष्ट्र में अमन-चैन बना रहे तथा राष्ट्र की अखण्डता कभी भंग न हो यही राष्ट्रीय एकता का उद्देश्य है। यह उद्देश्य तभी सार्थक हो सकता है जब समस्त धर्मावलम्बी तथा विविध भाषाभाषी धर्म तथा भाषा की विभिन्नता के होते हुए भी एक-दूसरे को स्वयं उसी प्रकार अभिन्न समझें जिस प्रकार एक घर में रहने वाले व्यक्ति भिन्न- भिन्न प्रकार के वस्त्र, आभूषण तथा पृथक्-पृथक् विचारों वाले होते हुए एक ही घर में रहते हैं तथा उसकी अखण्डता को बनाये रखते हैं। उसी प्रकार राष्ट्र में रहने वाले विभिन्न प्रकार के मतावलम्बी, भाषा-भाषी अपने राष्ट्र को अपने परिवार के समान उसकी देखरेख करते हुए स्वयं को राष्ट्र रूपी शरीर का अंग मानते हैं और अपने राष्ट्र के प्रति सदैव समर्पित रहते हैं। वे ही, उसके आदर्श नागरिक कहलाते हैं। यदि राष्ट्र सुरक्षित होता है तो वह स्वयं को सुरक्षित अनुभव करते हैं, यदि राष्ट्र असुरक्षित होता है तो वह तन, मन, धन से समर्पित हो उसकी मन-वचन कर्म से रक्षा करते हुए, अपने प्राणों को न्यौछावर करने में तनिक भी संकोच नहीं करते क्योंकि जब राष्ट्र उन्नति करता है तो वह स्वयं को उन्नत मानते हैं जिससे राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीय अखण्डता को स्थायित्व प्राप्त होता है। अतः प्रत्येक राष्ट्रवासी का कर्त्तव्य है कि वह राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता में बाधक तत्त्वों का निवारण करे और उसे नन्हें पौधे के समान सींचकर उसको पुष्पित तथा फलित वृक्ष के समान तैयार कर अपने कर्त्तव्यों का पालन करें, तभी राष्ट्र सदैव अखण्ड, उन्नतिशील, समृद्धिवान, प्रभुत्वसम्पन्न रह सकेगा। राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता के द्वारा ही राष्ट्रीय अखण्डता बनी रहती है क्योंकि जब हम एक रहेगें अर्थात् ऊँच-नीच, भेद-भाव, जाति-धर्म, सम्प्रदाय को विस्मृत कर एकता की डोर में बँध जायेगें। प्रत्येक के प्रति हम मानवता का व्यवहार करेगें अर्थात् आदमी को आदमी समझेगें न कि किसी विशेष धर्म, प्रान्त, सम्प्रदाय आदि से सम्बन्धित मानव। तब राष्ट्र के विभाजन का प्रश्न स्वयं ही समाप्त हो जायेगा। जैसे अधोलिखित पक्तियों से स्पष्ट है- प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से मिलने के लिए किसी धर्म, सम्प्रदाय का सहारा नहीं लेना चाहिए बल्कि संकीर्ण विचारधारा से ऊपर उठकर आदमी को आदमी ही समझना चाहिए। एक सामान्य नागरिक जगदीश कश्यप के अनुसार- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 30 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता रात से तुम मिलो चाँदनी की तरह, और दिन से मिलो रोशनी की तरह। प्रार्थना मेरी तुमसे ये है दोस्तो, आदमी से मिलो आदमी की तरह॥ इस प्रकार राष्ट्र की एकता एवम् अखण्डता का प्रमुख उद्देश्य है राष्ट्र को आन्तरिक तथा बाह्य रूप से सुरक्षा प्रदान करना। यह सुरक्षा तभी प्रदान की जा सकती है जब राष्ट्र के समस्त नागरिक एकता की डोर में बँधे हो। यही बन्धन उनमें राष्ट्रीयता की भावना को बल प्रदान करता है। जिससे लोगों में 'हम' की भावना पनपती है और राष्ट्र सबल होता है तथा किसी भी परिस्थिति में आन्तरिक तथा बाह्य दोनों रूप में किसी भी संकट का सामना सरलता से कर सकता है और यह राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के द्वारा ही सम्भव है क्योंकि राष्ट्र में एकता नहीं होगी तो राष्ट्र टुकड़ों-टुकड़ों में बँट जायेगा और चरमरा कर ढह जायेगा। इस प्रकार राष्ट्र की आन्तरिक तथा बाह्य सुरक्षा राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता पर निर्भर है और राष्ट्र, समस्त नागरिकों की एकता की भावना पर। राष्ट्र के समस्त निवासियों पर राष्ट्र की बाह्य तथा आन्तरिक सुरक्षा हेतु पारस्परिक सहयोग अपेक्षित है और प्रत्येक जन-जन का सहयोग तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब उनमें 'हम' की भावना हो। यही भावना उन्हें राष्ट्र से जोड़ती है और राष्ट्र की आन्तरिक व बाह्य सुरक्षा करने को तैयार करती है। विदेशियों द्वारा आक्रमण किये जाने पर या किसी विशेष परिस्थिति, आतंकवाद, अराजकता, अशांति का सामना करने हेतु एकता आवश्यक तत्त्व है और इस तत्त्व के सहयोग से ही राष्ट्र में एकता स्थापित की जा सकती है तथा राष्ट्र को अखण्ड सदैव रखा जा सकता है। देश में शान्ति का स्थायित्व राष्ट्रीय एकता के द्वारा ही प्रदान किया जा सकता है। अगर धर्म, सम्प्रदाय, जाति, वर्ण-भेद आदि को समाप्त कर, सब एक हो जाएँ और राष्ट्र को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करें और यह अनुभव करें कि हम सब एक हैं तो सम्भवतः राष्ट्र में सदैव शान्ति बनी रहेगी, जिससे राष्ट्र प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति करेगा। विदेशों में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त करेगा तथा राष्ट्रीय स्तर ऊँचा उठेगा। राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के द्वारा ही राजनैतिक वातावरण स्वच्छ रह सकता है क्योंकि जब प्रत्येक राजनेता निःस्वार्थ भाव से राष्ट्रहित के लिए कार्य करेगा तो स्वतः ही राष्ट्र का राजनैतिक वातावरण स्वस्थ होगा, जिससे राष्ट्र की शासन-व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहेगी। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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प्रथम अध्याय 31 इस प्रकार राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता का उद्देश्य है राष्ट्र की प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति करना तथा समस्त देशवासियों को एकता के महत्त्व से परिचित कराना। विषय की मौलिकता और महत्त्व- राष्ट्र का आवश्यक तत्त्व राष्ट्रीय एकता स्वयं में सदैव मौलिक रहा है तथा इसकी महत्ता पुरातन् काल से लेकर आज तक सदैव अनुभव की जाती रही है। जब- जब राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता का अभाव हुआ है लोगों में फूट पड़ी है। तब ही राष्ट्र का पतन हुआ है तथा राष्ट्रीय अखण्डता को ठेस पहुँची है तथा राष्ट्र विभिन्न खण्डों में विभाजित हुआ है। नागरिकों में स्वार्थ की भावना पनपी है। धर्मों, सम्प्रदायों, जातियों तथा प्रान्तों आदि को महत्त्व प्रदान किया गया है। एक धर्म, सम्प्रदाय, जाति तथा प्रान्त विशेष के लोग दूसरे धर्म, सम्प्रदाय, जाति तथा प्रान्त विशेष के लोगों के शत्रु हुए हैं। आपसी वैर-भाव, द्वेष, ईर्ष्या आदि सैकड़ों बीमारियाँ फैली है। मानवता त्रस्त हुई है। मानव ने स्वयं को सर्वथा असुरक्षित अनुभव किया है। जिससे वह विभिन्न विचार-धाराओं, राजनैतिक संगठनों, धर्मों के विभिन्न विवादों के घेरे में बँटा है। जिसके कारण परस्पर उपद्रव, दंगे, आतंक, खून-खराबा तथा धर्म के नाम पर झगड़े आदि को बढ़ावा मिला है, तभी राष्ट्रीय भावना लुप्त हुई है अर्थात् राष्ट्रीय एकता व अखण्डता को ठेस पहुँची है। राष्ट्रीय एकता का मानव के जीवन में अत्यधिक महत्त्व है जिसके अभाव में वह स्वयं को आदर्श नागरिक सिद्ध ही नहीं कर सकता तथा राष्ट्र के प्रति अपने सम्पूर्ण कर्त्तव्यों का निःस्वार्थ भाव से पालन ही नहीं कर सकता। आदर्श नागरिकता हेतु आवश्यक है मनुष्य में राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना का होना। यही समर्पण की भावना मनुष्य को राष्ट्र से जोड़ती है। यह समर्पण की भावना नागरिक में तभी आ सकती है जब सम्पूर्ण राष्ट्र में उसका उठना-बैठना अर्थात् आना जाना हो अर्थात् वह राष्ट्र के समस्त उत्सवों, आयोजनों में भाग लेता हो। जब उसका कार्य-व्यवहार एक साथ होगा तो सम्भवतः आत्मीयता बढ़ेगी। आत्मीयता होने के कारण परस्पर एक दूसरे के विचारों, भावनाओं को समझने का सुअवसर प्राप्त होगा जिससे राष्ट्रीय एकता को बल मिलेगा। अखण्ड राष्ट्र से जुड़कर ही प्रत्येक नागरिक राष्ट्र के महत्त्व से परिचित हो सकता है तथा राष्ट्र को धर्म से भी अधिक महत्त्व प्रदान कर सकता है। अर्थात् "राष्ट्र देवोभव" की भावना से स्वयं को गुम्फित कर सकता है। राष्ट्रीय एकता एवम अखण्डता के प्रति अपनी उद्भावना के बल पर उन सभी
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32 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
समस्याओं का निवारण करने की शक्ति होती है जो राष्ट्र के लिए अहितकर हों, अर्थात् राष्ट्रीय एकता व राष्ट्रीय अखण्डता के मार्ग में बाधक हो। इसी कारण राष्ट्रीय एकता व अखण्डता का विषय सर्वथा मौलिक है, जिसकी मौलिकता सदैव बनी रहती है। उक्तानुसार राष्ट्रीय एकता व राष्ट्रीय अखण्डता का हमारे जीवन में अत्यधिक महत्त्व है। राष्ट्रीय एकता राष्ट्र रूपी शरीर में रीढ़ की हड्डी के समान होती है। जिस प्रकार रीढ़ की हड्डी के टूट जाने पर मनुष्य जीवित तो रह सकता है लेकिन सीधा चल-फिर नहीं सकता अर्थात् बिना किसी सहारे के अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता, स्वतन्त्र रूप से कोई कार्य नहीं कर सकता, उसी प्रकार राष्ट्रीय एकता व अखण्डता के अभाव में राष्ट्र किसी भी प्रकार की उन्नति नहीं कर पाता, जिसके कारण राष्ट्र विभिन्न खण्डों में विभक्त हो जाता है। विखण्डित राष्ट्र खण्डित रीढ़ युक्त शरीर के समान जीवित रहते हुए भी मृत शरीर के समान ही होता है और स्वेच्छा से कोई कार्य भी नहीं कर पाता है क्योंकि राष्ट्रीय एकता राष्ट्र का मूल तत्त्व होती है जिसके अभाव में कोई भी राष्ट्र बहुत दिनों तक जीवित ही नहीं रह सकता। जाति- धर्म के नाम पर जो साम्प्रदायिक दंगे व खून-खराबा होता है वह सब राष्ट्रीय एकता के समूल विनाशक हैं। राष्ट्रीय एकता व अखण्डता के महत्त्व को दृष्टिगत रखते हुए आज आवश्यकता है कि हम प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र से जोड़ें, उसमें राष्ट्रीयएकता का विकास करें। राष्ट्रहित के समक्ष अपने हितों का त्याग करने के लिए सदैव तत्पर रहें। यदि आज भी हमने यह सब कार्य नहीं किया तो राष्ट्र का अस्तित्व चरमरा कर ढह जायेगा, जिसकी शासन व्यवस्था सुचारु रूप से कार्य नहीं कर सकेगी तथा उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता के द्वारा ही राष्ट्र में सुव्यवस्था बनाई जा सकती है तथा अपने मूल आदर्शों व सत्यं शिवं सुन्दरम् की स्थापना कर सकते हैं, जो राष्ट्रीय एकता को बनाये रखने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित होता है। मूल आदर्शों के कारण ही उसके हृदय में प्रेम, सहयोग, परोपकार, सहिष्णुता, नम्रता, नैतिकता, सदाचार आदि का विकास होता है। आदर्शों को जीवन में उतारने के कारण ही अर्थात् वह दूसरों के विचारों तथा भावनाओं को समझ पाते हैं, जिससे उनके विचारों में भावात्मक-एकता की झलक देखने को मिलती है और यही भावात्मक-एकता राष्ट्रीय एकता को जन्म देती है। इस प्रकार आदर्शों के द्वारा राष्ट्रीयएकता व अखण्डता के महत्त्व को सरलता से समझा जा सकता है।
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम अध्याय 33 एकता की भावना के कारण जब प्रत्येक व्यक्ति परोपकार, दया, नैतिकता समानता और मानवता की भावना को हृदय में रखकर मूल आदर्शों के पथ पर अग्रसर होता है, तब उसे अपना भविष्य भी प्रकाशमान दिखाई देने लगता है क्योंकि उसके द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य सत्य की ओर ले जाता है। जिससे उसे असीम सुख की प्राप्ति होती है। उसमें धैर्य, संतोष तथा विश्वास की भावना जाग्रत होती है, जिससे उसमें राष्ट्र के प्रति कार्य करने का अर्थात् एकता तथा अखण्डता को बनाये रखने का उत्साह बना रहता है तथा राष्ट्र के प्रति प्राण तक न्यौछावर करने में वह संकोच नहीं करता। राष्ट्र हित के समक्ष वह अपने भूत, भविष्य और वर्तमान की तनिक भी चिन्ता नहीं करता। राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रीय अखण्डता के महत्त्व से परिचित हो जाने के पश्चात् क्षेत्रीयता, प्रान्तीयता, साम्प्रदायिकता, जातिवाद तथा भाषावाद की समस्या स्वतः ही समाप्त हो जाती है। अर्थात् हम इस क्षेत्र के है, इस प्रान्त के, इस सम्प्रदाय के, जाति के तथा इस भाषावाद के हैं, हमारी सभ्यता अन्य क्षेत्रों, प्रान्तों, सम्प्रदायों, जातियों तथा भाषावादियों से भिन्न है, इसलिए हम दूसरे क्षेत्रों, प्रान्तों, सम्प्रदायों, जातियों, भाषावादियों से भिन्न हैं, इनसे हमारा कोई सम्बन्ध ही नहीं है, यह विवाद स्वतः ही समाप्त हो जायेगा। तत्त्वचिन्तन एवं सत्य के उद्घाटन की दिशा में योगदान :- राष्ट्रीयएकता व अखण्डता से रहित देशवासी जीवन, प्रकृति और सत्य का तत्त्वचिन्तन कर पाने मे सर्वथा असफल रहते हैं। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के अभाव में सम्पूर्ण राष्ट्र का वातावरण भय, उपद्रव, आतंक और असुरक्षा एवं स्वार्थ की भावना से ओत-प्रोत होता है। ऐसे वातावरण में राष्ट्र का कोई भी नागरिक जीवन से सम्बन्धित असत्य आवश्यकताओं एवम् वस्तुओं के विषय में ही चिन्तन करता है और जीवन के सत्य के उद्घाटन की ओर अपना ध्यान ही नहीं कर पाता है और वह सत्य के स्वरूप से अपरिचित ही रह जाता है। तत्त्वचिन्तन और सत्य के उद्घाटन के लिए मनुष्य को शान्त और सद्भावनापूर्ण वातावरण की आवश्यकता होती है जिसमें रहते हुए वह अपनी चिन्तन-प्रक्रिया को सही दिशा में जारी रख सके। द्वेष-पूर्ण परस्पर कलह से परिपूर्ण वातावरण में मानव मन कुंठित हो जाता है और ऐसी दशा में सत्य की अति सूक्ष्म अवधारणा का चिन्तन कर पाना दुष्कर ही नहीं असम्भव सा प्रतीत होता है। द्वेषपूर्ण और परस्पर संघर्ष, कलह, जातिवाद, आतंकवाद आदि के कारण दूषित वातावरण की स्थिति उसी CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 34 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता राष्ट्र में उत्पन्न होती है जहाँ राष्ट्रीय एकता का अभाव और राष्ट्र की अखण्डता पर कुठाराघात होता है। अतः हम कह सकते हैं कि तत्त्वचिन्तन और सत्य के उद्घाटन में राष्ट्रीयएकता एवम् अखण्डता का अपना महत्त्वपूर्ण योगदान है। विषय की प्रासंगिकता राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता का विषय पुरातन काल से आज तक सदैव प्रासंगिक विषय रहा है। आज के सन्दर्भ में भी राष्ट्रीय एकता एवम् राष्ट्रीय अखण्डता का विषय अत्यधिक प्रासंगिक है। आज भारत ही नहीं बल्कि विश्व के अधिकतम राष्ट्र इसका अत्यधिक अभाव अनुभव कर रहे हैं। आज भौतिकवादी प्रवृत्ति ने मनुष्य को बहुत ही स्वार्थी बना दिया है जिससे नैतिकता, सदाचार एवं मानव मूल्यों का अत्यधिक ह्रास हुआ है। जिसके कारण मनुष्य अपने शारीरिक सुख- सुविधा के लिए धन जुटाने में लगा रहता है और लौकिक सुखों को प्राप्त करने हेतु वह किसी भी अविवेकपूर्ण कार्य करने में तनिक भी संकोच नहीं करता, चाहे उसमें उसका अपना व्यक्तिगत, सामाजिक अथवा राष्ट्रीय अहित ही क्यों न हो रहा हो। स्वार्थ-भावना की प्रबलता के कारण ही असहिष्णुता एवं अहंभाव को बढ़ावा मिलता है। इस भावना के कारण ही मनुष्य में मनुष्य से, अन्य प्रान्तों से, अन्य सम्प्रदायों तथा राष्ट्रों के प्रति घृणा की भावना जन्म लेती है और वह सबसे घृणा करने लगता है, जिससे समस्त मानव-जाति का अकल्याण होता है। मानवता का विस्तृत स्वरूप स्वार्थ-भावना की प्रबलता के कारण सिमट कर संकीर्ण हो जाता है। जब मानव-मानव का शत्रु हो जाता है, तब एक उन्नत, समृद्ध तथा शक्तिशाली राष्ट्र निर्बल तथा असहाय हो जाता है। जब राष्ट्र निर्बल तथा असहाय हो जाता है तब लोग अपनी मनमानी करने लगते हैं। धनिक तथा शक्तिशाली वर्ग निर्धन तथा कमजोर वर्ग पर शोषण करने लगता है। "जिसकी लाठी उसकी भैंस" वाली कहावत चरितार्थ होने लगती है। जिससे मानवों में पाश्विकवृत्ति का प्रादुर्भाव होता है। मानवता की नैतिकता का ह्रास होने लगता है। विश्व शांति भंग होती है और यही पशुता मानव कल्याण की भावना की विध्वंसक बन जाती है, जिसका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर नहीं वरन् अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पड़ता है। आज बारूद के ढेर पर बैठा हुआ यह विश्व अपनी ही प्राण रक्षा के लिए मृत्यु के दर्पण में विवश होकर ताक रहा है और इसे कहीं कोई ऐसा मार्ग ही नहीं सूझ रहा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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प्रथम अध्याय 35
है जिसमें शान्ति और स्थायी सुख-समृद्धि हो। आज विज्ञान ने मनुष्य के हाथ में ऐसे ऐसे भयानक शस्त्र थमा दिये हैं जिससे वह किसी छोटे-मोटे देश को ही नहीं वरन् सम्पूर्ण पृथ्वी को पल भर में नष्ट कर सकता है। ऐसी स्थिति में आज मनुष्य बहुत अहंकारी हो गया है और वह बल का गलत उपयोग करने में बहुत ही निर्लज्ज होता जा रहा है, जिसके कारण विश्व के अधिकतम राष्ट्रों में आतंकवाद, हत्याएँ, लूट, डकैती, बलात्कार, तस्करी, चोर-बाज़ारी, मूल्यविहीन राजनीति तथा साम्राज्यवाद का बाज़ार गर्म है। राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता के विषय की प्रासंगिकता को लेकर हम अपने भारत की वर्तमान स्थिति पर एक दृष्टि डाले तो हमें अनुभव होगा कि आज भारत में राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता की कितनी आवश्यकता है? भारत आज जातिवाद, आतंकवाद एवम् साम्प्रदायिकता की आग में इस तरह झुलस रहा है कि उसके लिए राष्ट्रीय एकता के जल की बूँदें खोज पाना अत्यधिक कठिन प्रतीत हो रहा है। आज भारत में किसी भी समय साम्प्रदायिक दंगे हो जाना सामान्य बात हो गयी है क्योंकि राष्ट्र, धर्म से बढ़कर है इस भावना का नागरिकों में लोप सा होता जा रहा है। इसी कारण वह स्वयं को हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई आदि पहले समझता है और भारतीय बाद में। जबकि प्राचीन काल से ही व्यक्तिगत धर्म, जाति और संस्कारों से बढ़कर अपने राष्ट्र को महत्त्व दिया जाता रहा है। परन्तु आज भारत में इसके विपरीत घटित हो रहा है। उदाहरण के लिए जैसे— एक हिन्दू और मुसलमान में व्यापारिक सम्बन्ध हैं, और धर्म के लेन-देन को लेकर परस्पर झगड़ा हो जाता है और इन दोनों में से एक को चोट आ जाती है, तभी अवसरवादी तत्त्व इस प्रकरण को इस तरह तूल देते हैं कि यह साम्प्रदायिक दंगें का रूप धारण कर लेती है। जिससे दोनों सम्प्रदायों के लोगों के प्राण जाते हैं, आर्थिक हानि होती है। इस सबके पीछे जातिगत भावनाएँ प्रमुख होती है और राष्ट्रीय भावना नगण्य। ऐसे झगड़ों में लड़ने वाले लोग मात्र यह सोचते हैं कि उनके सम्प्रदाय के व्यक्ति को हानि पहुँची है, अतः वह विरोधी सम्प्रदाय के व्यक्तियों को हानि पहुँचाकर उसका प्रतिशोध अवश्य लेगें। कोई भी व्यक्ति इस बात पर तनिक भी विचार नहीं करता कि उनके इस कृत्य से राष्ट्र को कितनी क्षति होगी। कितने निर्दोष लोगों के समक्ष रोजगार, चिकित्सा, खाद्य-सामग्री, शिक्षा, आवागमन एवम् सुरक्षा की समस्या खड़ी हो जायेगी। इस प्रकार के दुर्भाग्यपूर्ण दंगों के निवारण का एक-मात्र साधन राष्ट्रीय एकता की अनुरक्षा ही है जिसके अभाव में भारत राष्ट्र ने अपने अतीत में बहुत ही भयावह स्थितियों का सामना किया है। इतिहास साक्षी है कि भारतीयों की आपसी फूट के
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 36 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता कारण ही बाहर से आये आक्रमणकारियों और अंग्रेजों ने वर्षों तक भारतवासियों को परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़े रखा। परतन्त्रता की इन बेड़ियों को काटने के लिए भारत के समस्त नागरिकों को जाति, धर्म, प्रान्तीयता से ऊपर उठकर एकजुट होना पड़ा, तब कहीं कड़े संघर्ष के पश्चात् भारत में स्वाधीनता के सूर्य का उदय हुआ। अतः यह बात स्पष्ट रूप से उभर कर आज हमारे समक्ष है कि भारत में राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का होना परमावश्यक है। अन्यथा ऐसी परिस्थिति में किसी भी राष्ट्र को दुर्दिन देखने पड़ सकते हैं। भारत के अतिरिक्त सकल विश्व के अधिकतम राष्ट्रों में आज कुछ ऐसी ही स्थिति बनी हुई है। आज राष्ट्रीय एकता व अखण्डता का विषय अत्यधिक प्रासंगिक है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय खण्ड - परिपार्श्व द्वितीय अध्याय वैदिक वाङ्मय का संक्षिप्त सर्वेक्षण वेद ईश्वरीय ज्ञान है। संसार के समस्त ज्ञानी पुरुष भूमण्डल के इतिहास में सर्वप्राचीन ग्रन्थ के रूप में वेद के महत्त्व को स्वीकार करते हैं। प्राचीनतम ग्रन्थ के रूप में वेद, की गौरव गरिमा के समक्ष विद्वत्मण्डली एक मत से नतमस्तक है। वेद ऐसी दिव्य वाणी है, जो देश-काल-इतिहास की सीमाओं में न बँधकर समान रूप से, सदा सबको कल्याण का निर्देशन करती है। वेद का तात्पर्य "ज्ञान" है और ज्ञान का लक्ष्य है निर्माण, कल्याण, उत्थान। ज्ञान के नेतृत्व में विज्ञान सुख सुविधा का कारण बने, और इस प्रकार जीवन का प्रत्येक चरण सानन्द एवं सौल्लास हो। आर्य जाति अथवा हिन्दू जाति की वेदों में आस्था एवं श्रद्धा अति प्राचीन काल से मान्य है। पृथिवी के किसी भी स्थान का निवासी हिन्दू अपने धर्म तथा संस्कृति के मूल-तत्त्व, वेदों को ही स्वीकार करता है। वेद आर्य जाति के प्राण सदृश हैं। आर्य सभ्यता, आर्य संस्कृति, आर्य-आचार प्रणाली, आर्य दर्शन सब कुछ वेद की ही देन है। वेद, प्राथमिक, अति पवित्र, अति उदात्त तथा श्रेष्ठ प्रमाण है। अपने सृष्टिकाल से लेकर अद्यावधि वेद अक्षुण्ण रूप से आर्य जाति का सहचर बना हुआ है। वेदों में जीवन, प्रकृति में भौतिकता, आध्यात्मिकता में, ज्ञान तथा कर्म में, सामञ्जस्य का सफल प्रयास है। यह आशा का संदेश है, निराशा का नहीं। भारतीय साहित्य में वेदों का गुणगान सदा से किया जाता रहा है। हमारे साहित्य में जो स्थान वेदों को प्राप्त है, वह इतर ग्रन्थों को नहीं। वेदों को ईश्वर-निर्मित तथा अपौरुषेय स्वीकार करके इनकी प्रामाणिकता स्वीकार की गई है। विश्व साहित्य में वेद केवल प्राचीनता की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सृष्टिविज्ञान की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हैं। भारतीय-दर्शन की अधिकांश विचारधाराएँ मुक्त कण्ठ से वेदों को प्रामाण्य मानती हैं। स्मृतियाँ भी वेदों के आदेश एवं उपदेश को मूर्धन्य स्थान प्रदान करती हैं। मनु के अनुसार वेद-निन्दक "नास्तिक" हैं अर्थात् आस्तिक होने के लिए ईश्वर के प्रति निष्ठा उतनी अपेक्षित नहीं, जितनी वेदों के प्रति। मनु की दृष्टि में वेद सनातन चक्षु हैं। वेद में जो कुछ उल्लिखित है, (वही) धर्म है। उसके प्रतिकूल आचरण अधर्म है। आज भी हिन्दुओं के घरों में सामाजिक एवं धार्मिक कृत्य बिना वेद-मन्त्रों के उच्चारण के सम्पन्न नहीं होते। 'गीता' भी शास्त्र के रूप में विधि-निषेध की मर्यादा CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 38 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिये वेदों को ही अधिकार प्रदान करती है। वेद एक प्रकार से सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान का आदि स्रोत है। उसमें सभी विद्याओं के बीज विद्यमान हैं। भारतीय धर्म, दर्शन, साहित्य, भाषा, सभ्यता, संस्कृति तथा कला का भव्य प्रासाद वेदों की सुदृढ़ आधारशिला पर अवलम्बित है। वेद अनन्त ज्ञान-राशि का वह अक्षय भण्डार है, जो आर्यों के पूर्वज ऋषियों के द्वारा परिलक्षित तथा आविष्कृत होकर नाना प्रकार के मन्त्रों एवं विधानों के समूह के रूप में प्रादुर्भूत हुआ है। अधिकांश विद्वानों का मत है कि वेदों से ही धर्म निःसृत हुआ ‘‘वेदाद्धर्मोहिन्निबभौ।’’ वेद-मन्त्र मानव-निर्मित नहीं है, बल्कि ऋषियों ने इनका साक्षात्कार किया है। ऐतरेय ब्राह्मण (३।९) तथा कौषीतकि ब्राह्मण (१०/३०) के अनुसार वेद मन्त्रों का अवलोकन किया गया है। इसीलिये यास्क ने निरुक्त में और कात्यायन ने ‘‘सर्वानुक्रमसूत्र’’ में मन्त्र-दर्शियों को ‘ऋषि’ की संज्ञा से सम्बोधित किया है। कहा भी गया है- ऋषयः मन्त्रद्रष्टारः अर्थात् मन्त्रों को देखने वाले ‘ऋषि’ है। श्वेत-श्वतरोपनिषद् (६/२) के अनुसार यो वै वेदाश्य प्रहिणोति तस्मै अर्थात् सर्वप्रथम ईश्वर ने ब्रह्मा को उत्पन्न किया तथा लोक-शिक्षार्थ उन्हें वेद प्रदान किए। उसी वेद को ऋषियों ने समाधिस्थ-अवस्था में प्राप्त करके छन्दोमयी वाणी के रूप में प्रकट किया। जो मन्त्र ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत किये गये थे, वे मन्त्र कष्ठाम, तथा जो मन्त्र ऋषियों की स्मरण-शक्ति के द्वारा अनुमोदित किए गए, वे मन्त्र कल्प्य कहलाते हैं। वेदों के शब्दों, अर्थों, मन्त्रों एवं छन्दों का रूप नित्य है। वेद और उपवेद वेद शब्द ‘विद् ज्ञाने’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय लगाने से बनता है। इस प्रकार वेद शब्द का अर्थ ‘‘सम्यक ज्ञान’’ है। आचार्य सायण वेद शब्द की मीमांसा करते हुए लिखते हैं- इष्टप्राप्त्यनिष्टपरिहारयोरलौकिकमुपायं यो ग्रन्थो, वेदयति, सः वेदः। भाव यह है कि वैदिक ज्ञान वह है जो नित्य एवं शाश्वत है तथा जिससे अभ्युदय एवं निःश्रेयस की प्राप्ति सहज में ही हो जाती है। वेद चार हैं- १. ऋग्वेद, २. यजुर्वेद, ३. सामवेद, ४. अथर्ववेद। प्रत्येक वेद- संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद् इन चार ही रूपों में चर्चित पाया जाता है। ऋग्वेद की एकमात्र शाकल-शाखा ही उपलब्ध है। शुक्ल यजुर्वेद की काण्व तथा माध्यन्दिन- ये दो शाखाएँ उपलब्ध होती हैं। सामवेद की कौथुम तथा राणायनीय- ये दो शाखाएँ प्राप्त होती हैं। अथर्ववेद की पिप्पलाद एवं शौनक शाखाएँ उपलब्ध हैं। इन शाखाओं में मन्त्र, संख्या-भेद, उच्चारण-भेद तथा पाठ-भेद मिलते हैं जो कि CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 39 प्रायः साम्प्रदायिक हैं। ऋग्वेद का उपवेद 'आयुर्वेद', यजुर्वेद का 'धनुर्वेद', सामवेद का 'गन्धर्ववेद' तथा अथर्ववेद का 'अर्थ-वेद' है। चारों वेदों में चौबीस हजार मंत्र हैं तथा सात लाख अड़सठ हजार शब्द हैं। ऋग्वेद सभी वेदों में बड़ा है। इसमें १० मण्डल हैं। इन मण्डलों में १०२८ सूक्त और १०५८९ ऋचाएँ हैं। इन ऋचाओं में १५, ३८२६ पद हैं जिनमें ४३२००० अक्षर हैं। सामवेद में १५४३ साममन्त्र हैं। यजुर्वेद में ४० अध्याय हैं जिनमें १९७५ कण्डिकाएँ हैं। अथर्ववेद में २० काण्ड हैं जिनमें ७६० सूक्त और लगभग ६००० मन्त्र हैं। वेदत्रयी उपर्युक्त विवेचन में बतलाया गया है कि वेद चार हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। फिर वेदत्रयी से क्या तात्पर्य है ? वस्तुतः वेद तो चार ही हैं, जैसा कि अति प्राचीन काल से माना जाता रहा है, परन्तु विद्या तीन प्रकार की होती है। अतः वेद को त्रयीविद्या भी कहा जाता है। मनु ने इसे त्रयं ब्रह्म की संज्ञा प्रदान की है तथा उसे सनातन स्वीकार किया है। सनातन तथा शाश्वत का अर्थ है— जो सदैव विद्यमान रहे, कभी नष्ट न हो। सृष्टि के आरम्भ में यह विद्या प्रकट होती है और प्रलय काल में ब्रह्म में तिरोहित हो जाती है। गद्य, पद्य तथा गान की दृष्टि से भी वेद तीन प्रकार से उच्चरित होते हैं। यजुर्वेद प्रमुखतः गद्य में ऋग्वेद पद्य में तथा सामवेद गानरूप में है। यह त्रयीविद्या 'ऋग्यजुः साम' लक्षण वाली हैं। शतपथब्राह्मण (४/६/७/१) में कहा गया है— त्रयी वै विद्या ऋचो यजूंषी सामानि। तैत्तरीय ब्राह्मण (१/२/२६) के अनुसार त्रयी यजूंषि सामानि। ऐतरेयब्राह्मण (५/५/६) के अनुसार त्रयोवेदा अजायन्त, ऋग्वेद एव अग्नेरजायत, यजुर्वेदो वायोः सामवेदः आदित्यात्। छान्दोग्यब्राह्मण (१/१७/१/१०) का कथन है— अग्नेर्ऋचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् सएतां त्रयीं विद्यामभ्यपतत्। इन्हीं तीन विद्याओं को आगे चलकर ज्ञान, कर्म तथा भक्ति के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त हुई। ऋग्वेद में ज्ञान की मुख्यता है, यजुर्वेद में कर्मकाण्ड की मुख्यता है और इसी प्रकार सामवेद में भक्ति की मुख्यता है। अथर्ववेद में इन तीनों ही विद्याओं का समाहार है तथा अध्यात्म की प्रधानता है। अतः वेद चार हैं किन्तु विद्या तीन है, अतः विद्या की दृष्टि से "वेदत्रयी" संख्या भी सार्थक है। वेद मन्त्र वेद मन्त्रों का समूह है। मन्त्र शब्द मन् धातु से बना है। मन्त्र का अर्थ होता है- मनन कराने वाला। मंत्राः मननात्। श्री दुर्गाचार्य स्वयं निरुक्त (७/३/६) के भाष्य में CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 40 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता कहते हैं— तेभ्यः मन्त्रेभ्यः हि अध्यात्म अधिदेव अधियज्ञादि मन्तारो मन्यते, तदेषां मन्त्रत्वम्। मनन हेतुर्मन्त्रः। मन्त्र मनन का हेतु है, इन्हीं मन्त्रों से मनन के उपरान्त मननशील विद्वानों, कवियों, ऋषियों तथा विचारकों ने अध्यात्म, अधिदैव तथा अधियज्ञादि को यथार्थ ग्रहण किया। इसी कारण यास्क का कथन है— सत्काम ऋषिः यस्यां आर्थपत्यमिच्छन्। स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति॥ (निरुक्त (७/७/१/१) निरुक्त का सातवां अध्याय दैवत काण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। वेद में अमुक सूक्त अथवा मन्त्र का अमुक देवता है, इस विषय का ज्ञान मनन के बिना सम्भव नहीं। मन्त्र का देवता अथवा मन्त्रार्थ मनन के द्वारा ही स्पष्ट होता है। ऋषियों तथा वेदज्ञों ने आर्थपत्य, पद, पदार्थ पद में छिपी शक्ति, कर्म आदि की अभिलाषा की, तो जिस देवता में उन्हें स्तुति प्रयुक्त जान पड़ी, उसी देवता वाला वह मन्त्र हो गया। इस प्रकार एक ही मन्त्र के तीन प्रकार के अर्थ हो सकते हैं— अध्यात्मपरक, अधिदेवपरक तथा अधियज्ञपरक। इस अर्थ में मन्त्र का मनन ही हेतु होता है। इसके बिना अर्थ ज्ञान सम्भव ही नहीं। यास्क ने निरुक्त में लिखा है— कर्म सम्पत्तिः मन्त्रो वेदे (निरुक्त १, २) अर्थात् मन्त्र वेद में उस कर्म सम्पत्ति के मार्ग को प्रशस्त करते हैं जो हमें आनन्दधाम तक ले जा सकता है। यास्कानुसार जिस इच्छा से ऋषि मन्त्रोच्चारण करता है तथा जिस देवता से वह अपने अर्थ का सम्पादन कराने की अभिलाषा रखता है, वह मन्त्र उसी देवता से सम्बद्ध हो जाता है। अतः तीन प्रकार की इच्छा होने के कारण तीन प्रकार की ऋचाएँ भी होती हैं— (१) परोक्षकृत, (२) प्रत्यक्षकृत एवं (३) आध्यात्मिक। परोक्षकृत ऋचाएँ गुह्य (छिपी हुई) हैं। प्रत्यक्षकृत ऋचाएँ विषय से सीधे सम्बन्धित होते हैं। आध्यात्मिक ऋचाएँ आत्मसम्बन्धी तथा उपासनापरक होती हैं। इन तीन प्रकार की ऋचाओं के अतिरिक्त दो प्रकार की ऋचाएँ और भी होती हैं, उनकी संज्ञा है, प्राजापत्य तथा नराशंस। प्राजापत्य ऋचाओं में जड़ एवं चेतन तत्त्वों का संमिश्रण होता है तथा नाराशंस ऋचाएँ माता, पिता, गुरु, अतिथि आदि से सम्बन्धित होती हैं। सामान्यतया यज्ञों में वेद मन्त्रों का ही विनियोग होता था। सर्वानुक्रमणी वृत्ति की भूमिका में लिखा है— “विनियोक्तव्य रूपो यः स मन्त्र इति चक्षते। विधिस्तुतीकरं शेषं ब्राह्मणाः कथयन्ति हि॥” CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
द्वितीय अध्याय 41 जो विनियोग के योग्य है, वह मन्त्र है। विधि एवं स्तुति करने वाला शेष भाग ब्राह्मण है। इन मन्त्रों में कहीं स्तुति, कहीं याचना, कहीं आशीर्वाद, कहीं विधि, प्रेरणा, प्रश्न, अवधारण, प्रवाहिलका, आज्ञा या रहस्य कथन है। वर्तमान काल में जो वैदिक साहित्य प्राप्त होता है वह चार प्रकार का है- (१) संहिता (२) ब्राह्मणग्रन्थ (३) आरण्यक (४) उपनिषद्। ये सभी रचनाएँ परस्पर सम्बद्ध हैं। इनमें से अनेक रचनाएँ लुप्त भी हो गई हैं। यहाँ पर क्रमशः इन रचनाओं का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है। इनका विस्तृत विवेचन इसी पुस्तक में आगे इन विषयों के पृथक् अध्यायों में किया गया है। १. संहिता :- मन्त्रों के समूह की संज्ञा "संहिता" है। यज्ञानुष्ठान हेतु भिन्न भिन्न ऋत्विजों के उपयोगार्थ इन मंत्रों का संकलन तथा सम्पादन किया गया। दुर्गाचार्य (निरुक्तवृत्ति १/०) के अनुसार- "वेदं तावदेकं सन्तम् अतिमहत्वाद् दुरध्येयमनेक शाखाभेदेन समाम्नासिषुः। सुख ग्रहणाय व्यासेन समाम्नातवन्तः।" अर्थात् इन मन्त्रों का संकलन कार्य अतिमहत्त्वपूर्ण होने के कारण वेद व्यास जी द्वारा सम्पन्न किया गया। महाभारत के अनुसार व्यासकर्म करने के कारण उन्हें वेदव्यास का सम्बोधन प्राप्त हुआ- "वेदान् विव्यास यस्मात्, स वेदव्यास इति स्मृतः।" अर्थात् जिसने वेदों को विन्यस्त किया वह "वेदव्यास" के नाम से स्मरण किया जाता है। अतः संहिता से तात्पर्य सूक्तों, मन्त्रों, देवस्तुतियों तथा याज्ञिक नियमों एवं विधियों से है। संहिताएँ ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्व के भेद से चार प्रकार की होती हैं। क्रमशः विवेचन प्रस्तुत है- (अ) ऋक् संहिता :- यह वेद पदार्थ-विज्ञान का सूचक, भौतिक वस्तुओं को गुणों का निर्देशक और विश्व की सर्वप्राचीन रचना है। महाभाष्यकार पतञ्जलि ने इसकी २१ शाखायें मानी हैं। चरण व्यूह में यह लिखा हुआ है कि अध्येताओं के कारण ऋग्वेद की पाँच शाखाएँ हुई हैं जो इस प्रकार हैं- (१) शाङ्खायन (२) शाकल (३) बाष्कल (४) माण्डूक्य (५) आश्वलायन। श्रीमद्भागवत तथा विष्णु-पुराण में वात्स्य तथा मौद्गल नामक दो शाखाओं का अधिक उल्लेख हैं- शाकलस्य शतं शिष्या नैष्ठिकाब्रह्मचारिणः। पञ्चतेषां गृहस्थास्ते धर्मिष्ठाश्च कुटुम्बिनः॥ शिशिरो बाष्कलः शांखो वात्स्यश्चैवाश्वलायनः। पञ्चैते शाकलाः शिष्याः शाखाभेदप्रवर्तकाः॥
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42 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
महात्मा भर्तृहरि ने वाक्यपदीय में ऋग्वेद की १५ शाखाओं का उल्लेख किया है। कतिपय विद्वानों ने तो इसकी ३४ शाखाएँ बतलाई हैं। श्रीमद्भागवत में लिखा है कि महर्षि वेदव्यास ने मन्त्र समुदाय में से भिन्न-भिन्न प्रकरणों के अनुसार मन्त्रों का संग्रह करके उनसे ऋग्, यजुः, साम तथा अथर्व— ये चार संहिताएं बनाईं। उन्होंने "बह्वृच्" नामक पहली ऋक् संहिता पेल को, "निगद" नामक दूसरी यजुः संहिता वैशम्पायन को, सामश्रुतियों की "छन्दोग- संहिता" जैमिनी को, तथा सुमन्तु को "अथर्वाङ्गिरससंहिता" का अध्यापन कराया- पैलाय संहितामाद्यं बह्वृचाख्यामुवाच ह। वैशम्पायनसंज्ञाय निगदाख्यं यजुर्गणम्॥ साम्नां जैमिनये प्राह तथा छन्दोगसंहिताम्। अथर्वाङ्गिरसीं नाम स्वशिष्याय सुमन्तवे॥ (स्कन्ध १२ अ० ६, श्लोक ५२/५३) पैल मुनि ने संहिता को दो भागों में करके एक का अध्ययन इन्द्रप्रमिति को और दूसरे का बाष्कल को कराया। बाष्कल ने अपनी शाखा के चार भाग करके अपने शिष्य बोध्य याज्ञवल्क्य, पराशर और अग्निमित्र को पढ़ाया। इन्द्रप्रमिति ने अपनी संहिता का अध्ययन माण्डूकेय ऋषि को कराया। माण्डूकेय के पुत्र का नाम शाकल्य था। उन्होंने अपनी संहिता के पाँच भाग करके उन्हें वात्स्य, मुद्गल, शालीय, गोखल्य तथा शिशिर नामक शिष्यों को पढ़ाया। इसी प्रकार का वर्णन विष्णु-पुराण में भी मिलता है। (ब) यजुः संहिता :- यह संहिता दो भागों में विभक्त है— १. शुक्ल संहिता २. कृष्ण संहिता। इसके भेद का कारण सूर्य से वैशम्पायन तथा वैशम्पायन से याज्ञवल्क्य द्वारा आधीत वेद का वमन करना कहा जाता है और उस वमन का तित्तिर के रूप में जिन ऋषियों ने भक्षण किया, उनके द्वारा प्रवर्तित तैत्तरीय शाखा चली और वही कृष्ण यजुर्वेद कहलाया। यह प्रसंग इस प्रकार है— महर्षि वैशम्पायन ने यजुर्वेद की सत्ताइस शाखाओं की रचना की और अपने शिष्यों को पढ़ाया। वैशम्पायन को ब्रह्म हत्या लगी। वैशम्पायन ने अपने शिष्यों से कहा कि वे ब्रह्म हत्या को दूर करने के लिए व्रत का अनुष्ठान करें। इस पर वैशम्पायन के शिष्य याज्ञवल्क्य ने कहा— हे भगवन्! ये सब ब्राह्मण निस्तेज हैं। मैं अकेला ही व्रत का अनुष्ठान करूँगा। इस पर क्रोधित होकर गुरु वैशम्पायन ने कहा कि तू अत्यन्त ही अहंकारी है, तूने जो कुछ भी
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 43 मुझसे पढ़ा है, सब त्याग दे। याज्ञवल्क्य ने गुरु की आज्ञा पाते ही उनके पढ़ाये यजुर्वेद को वमन कर दिया। याज्ञवल्क्य द्वारा वमन किए गए यजुः को वैशम्पायन के अन्य शिष्यों ने तित्तिर बनकर ग्रहण कर लिया, इसलिये वे सब तैत्तरीय कहलाए। गुरु के निर्देश से व्रताचरण करने के कारण यजुः शाखाध्यायी चरकाध्वर्यु हुए, जैसा कि कहा भी गया है— यजूंष्यथ विसृष्टानि याज्ञवल्क्येन वै द्विज। जगृहुस्तित्तिरा भूत्वा तैत्तिरीयास्तु ते ततः॥ ब्रह्महत्याव्रतं चीर्णं गुरुणा चोदितैस्तु यैः। चरकाध्वर्यवस्ते तु चरणान्मुनिसत्तम॥ याज्ञवल्क्य ने भी यजुर्वेद की प्राप्ति के लिए संयतचित्त होकर भगवान् सूर्य की उपासना की। भगवान् सूर्य ने अश्व रूप में प्रकट होकर उन्हें अयातयाम नामक यजुः श्रुतियों का उपदेश दिया जिन्हें उनके गुरु वैशम्पायन भी नहीं जानते थे। उन श्रुतियों का अध्ययन करने वाले ब्राह्मण वाजी के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन वाजि श्रुतियों की काण्व आदि पन्द्रह शाखाएँ हैं— एवमुक्तो ददौ तस्मै यजूंषि भगवान् रविः। अयातयामसंज्ञानि यानि वेन्ति न तद्गुरुः। यजूंषि यैरधीतानि तानि विप्रैर्द्विजोत्तम। वाजिनस्ते समाख्याताः सूर्योऽप्यश्वोऽमवद्यतः। शाखाभेदास्तु तेषां वै दश पञ्च च वाजिनाम्। काण्वाद्यास्सुमहाभाग याज्ञवल्क्याः प्रकीर्तिताः॥ कृष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय, कठ तथा मैत्रायणी मुख्य शाखाएँ हैं जो कि अब प्राप्त नहीं होती। शुक्ल-यजुर्वेद की वाजसनेयी और कठ शाखाएँ पूर्णतया सुरक्षित हैं। ऐसा माना जाता है कि यजुर्वेद में किंचित् गद्यभाग भी उपलब्ध होता है। आधुनिक विचारकों की मान्यता है कि कृष्ण यजुर्वेद में मन्त्र तथा ब्राह्मण साङ्कर्य है तथा उसका विवेक करना अत्यन्त कठिन है अतएव उसकी कृष्ण संज्ञा पड़ गई। शुक्ल यजुर्वेद में मन्त्र तथा ब्राह्मण पृथक्-पृथक् हैं, अतः उसे 'शुक्ल' कहा गया है। कृष्ण यजुर्वेद दाक्षिणात्यों में अधिक प्रचलित है। यजुर्वेद में याज्या, अनुवाक्या आदि ऋचाओं का विशेष निरूपण हुआ है। स्त्रोतों का निरूपण सामवेद में हुआ है। इस प्रकार कर्मों की आधारभित्ति यजुर्वेद है और उसमें विशेषतापादक ऋक् तथा साम हैं। तथाहि— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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44 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अध्वर्युमुख्यैर्ऋत्विग्भिश्चतुर्भैर्यज्ञसम्पदः। निर्मिमीते क्रियासघेरध्वर्युर्यज्ञियं वपुः॥ तदलंकरूते होता ब्रह्मोद्गातेत्यमी त्रयः। यज्ञं यजुर्भिरध्वर्युर्निर्मिमीते तसो ह्यजुः॥ व्याख्यातं प्रथमं पश्चादृग्भ्यां व्याख्यानमोरितम्। साम्नामृगाश्रितत्वेन सामव्याख्याथ वर्ण्यते॥ यजुर्वेद में पहला अध्याय तथा अठ्ठाईसवीं कण्डिका दर्शपूर्णमास का प्रकरण है। द्वितीयाध्याय की समाप्ति तक पिण्डपितृयाग है। तृतीयाध्याय में अग्न्याधान है। अग्निष्टोम होम, अग्नि, उपस्थापन, चातुर्मास्य भी संक्षिप्त रूप में वर्णित है। चतुर्थाध्याय से आठवें अध्याय के ३३वें मन्त्र तक सोम याग है। फिर षोडशी याग, द्वादशाह याग तथा गवानयन है। ९वें अध्याय में ३४वें मन्त्र तक वाजपेय याग है फिर राजसूय है। दशम में भी राजसूय तथा तदन्तर्गत चरक सौत्रामणी है। ११वें अध्याय से १८वें अध्याय तक अग्निचयन है। इसके बाद १४वें अध्याय तक सौत्रामणी है। १८वें अध्याय तक अश्वमेध है। ३९वें अध्याय तक खिलमंत्र है तथा उनमें सर्वमेध और पुरुषमेध का प्रतिपादन हुआ है। ४०वें अध्याय में अध्यात्म विषयों का निरूपण है। (स) साम संहिता :- सामवेद संहिता दो भागों में विभक्त है— छन्दोवेद तथा गानवेद। इसको गान संहिता भी कहते हैं तथा छन्द संहिता भी। इसमें छन्दस् संहिता में तथा गान-संहिता में ऋगादि मन्त्रों का विशेष प्रयोग हुआ है। वर्णविकारों से विकृत गायत्री आदि छन्द गान संहिता में प्रयुक्त हैं। गान का लक्षण है— "आभ्यन्तरप्रयत्नजन्यः वागिन्द्रियव्यापारविशेषो गानम्।" "षड्जश्च ऋषभश्चैव गान्धारो मध्यमस्तथा। पञ्चमो धैवतश्चैवचनिषादः सप्तमः स्वरः॥" गान समय में मनस्वरूप में किंचित् विकृति हो जाती है, उसके ८ कारण हैं- (१) विकार (२) विश्लेष (३) विकर्षण (४) विराम (५) अभ्यास (६) लोप (७) आगम तथा (८) स्तोम। इनमें "विकार" का अर्थ स्पष्ट है जो "इको यणचि" आदि से होता है। सन्धि-विच्छेद को 'विश्लेष' कहते हैं। ह्रस्व के स्थान पर दीर्घ और दीर्घ के स्थान पर लुप्त उच्चारण "विकर्षण" है। वर्णोच्चारण के पश्चात् दो तीन मात्रा काल तक रुकना 'विराम' है। अन्तिम या अथ पद की आवृत्ति या तीन
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 45 बार कथन "अभ्यास" कहलाता है। किसी वर्ण का उच्चारण न करना "लोप" है। किसी पद में किसी अन्य पद का संयोग कर के उच्चारण "आगम" है। जो शब्द मन्त्र के मध्य में गान-काल में असम्बन्ध रूप से बढ़ाकर बोले जावें, उन्हें "स्तोम" कहते हैं। यह कहा भी गया है— "ऋचो यदधिकं किञ्चिद् द्विरुक्तं वापि दृश्यते। स्तोभत्वं तस्य मन्यन्ते क्रमशः शास्त्रचिन्तकाः॥" महर्षि जैमिनि ने सामवेद की शाखाओं का विभाग किया था। जैमिनि के पुत्र सुमन्तु तथा सुमन्तु के पुत्र सुकर्मा ने सामवेद की एक-एक शाखा का अध्ययन किया। सुकर्मा ने सामवेद संहिता के एक हजार शाखा भेद किए— "सहस्रसंहिताभेदं सुकर्मा तत्सुतस्ततः। चकार तं च तच्छिष्यौ जगृहाते महाव्रतौ॥" सामवेद की १००० शाखाओं में सम्प्रति जैमिनीय, राणायनीय तथा कौथुम—ये तीन ही शाखाएँ प्राप्त हैं। सामवेद की प्रशंसा करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है— ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’ । साम की प्रशस्ति में एक स्थान पर कहा गया है— "यद् ऋचा स्तुवते तदसुरा अन्ववायन् यत् साम्ना स्तुवते तदसुरा नान्ववायन्, य एवं विद्वान्, साम्ना स्तुवीत, इत्यृचं निन्दित्वा साम प्रशस्य लिङ्ग प्रत्ययेन साम विहिंत तस्मात् साम्रैव तव्यम्।" बृहद्देवता में तो यहाँ तक कहा गया है कि जो व्यक्ति सामवेद को जानता है, वहीं वस्तुतः वेद को समझता है— "सामानि यो वेत्ति स वेद तत्त्वम्" (द) अथर्व संहिता :- अथर्ववेद के द्रष्टा ऋषि अथर्वा अथवा अङ्गिरस हैं। इसमें २० काण्ड, ७५९ सूक्त और ५९७७ मन्त्र हैं। आदि के दश काण्डों को छोड़कर आगे के दश काण्डों को अङ्गिरोवेद कहते हैं। इसीलिए इसको अथर्वाङ्गिरोवेद भी कहा गया है। यहाँ तक भी ज्ञातव्य है कि "अश्व" शब्द मन का वाचक है। इस प्रकार अश्वमेध का अर्थ मनोनिरोध होगा। जब यजुर्वेदोक्त अश्वमेध को इस भावना से कर चुके तब समाप्ति के अनन्तर पूर्णाहूति के पश्चात् गृहस्थ को ऋग्वेद का उपदेश देना चाहिए तथा जो अश्वमेधकर्ता वृद्ध हों उन्हें यजुर्वेद का द्वितीय दिन उपदेश करना चाहिए। तीसरे दिन युवकों को अथर्ववेद का उपदेश देना चाहिये। चौथे दिन स्त्रियों को अङ्गिरोवेद १०वें काण्ड से अन्तिम काण्ड तक अथर्ववेद का उपदेश देना चाहिए। अन्यत्र कहा भी गया है— "युवतयः शोभना उपसमेता भवन्ति ता उपदिशत्याङ्गिरोवेद।" CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar