वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
द्वितीय अध्याय 41 जो विनियोग के योग्य है, वह मन्त्र है। विधि एवं स्तुति करने वाला शेष भाग ब्राह्मण है। इन मन्त्रों में कहीं स्तुति, कहीं याचना, कहीं आशीर्वाद, कहीं विधि, प्रेरणा, प्रश्न, अवधारण, प्रवाहिलका, आज्ञा या रहस्य कथन है। वर्तमान काल में जो वैदिक साहित्य प्राप्त होता है वह चार प्रकार का है- (१) संहिता (२) ब्राह्मणग्रन्थ (३) आरण्यक (४) उपनिषद्। ये सभी रचनाएँ परस्पर सम्बद्ध हैं। इनमें से अनेक रचनाएँ लुप्त भी हो गई हैं। यहाँ पर क्रमशः इन रचनाओं का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है। इनका विस्तृत विवेचन इसी पुस्तक में आगे इन विषयों के पृथक् अध्यायों में किया गया है। १. संहिता :- मन्त्रों के समूह की संज्ञा "संहिता" है। यज्ञानुष्ठान हेतु भिन्न भिन्न ऋत्विजों के उपयोगार्थ इन मंत्रों का संकलन तथा सम्पादन किया गया। दुर्गाचार्य (निरुक्तवृत्ति १/०) के अनुसार- "वेदं तावदेकं सन्तम् अतिमहत्वाद् दुरध्येयमनेक शाखाभेदेन समाम्नासिषुः। सुख ग्रहणाय व्यासेन समाम्नातवन्तः।" अर्थात् इन मन्त्रों का संकलन कार्य अतिमहत्त्वपूर्ण होने के कारण वेद व्यास जी द्वारा सम्पन्न किया गया। महाभारत के अनुसार व्यासकर्म करने के कारण उन्हें वेदव्यास का सम्बोधन प्राप्त हुआ- "वेदान् विव्यास यस्मात्, स वेदव्यास इति स्मृतः।" अर्थात् जिसने वेदों को विन्यस्त किया वह "वेदव्यास" के नाम से स्मरण किया जाता है। अतः संहिता से तात्पर्य सूक्तों, मन्त्रों, देवस्तुतियों तथा याज्ञिक नियमों एवं विधियों से है। संहिताएँ ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्व के भेद से चार प्रकार की होती हैं। क्रमशः विवेचन प्रस्तुत है- (अ) ऋक् संहिता :- यह वेद पदार्थ-विज्ञान का सूचक, भौतिक वस्तुओं को गुणों का निर्देशक और विश्व की सर्वप्राचीन रचना है। महाभाष्यकार पतञ्जलि ने इसकी २१ शाखायें मानी हैं। चरण व्यूह में यह लिखा हुआ है कि अध्येताओं के कारण ऋग्वेद की पाँच शाखाएँ हुई हैं जो इस प्रकार हैं- (१) शाङ्खायन (२) शाकल (३) बाष्कल (४) माण्डूक्य (५) आश्वलायन। श्रीमद्भागवत तथा विष्णु-पुराण में वात्स्य तथा मौद्गल नामक दो शाखाओं का अधिक उल्लेख हैं- शाकलस्य शतं शिष्या नैष्ठिकाब्रह्मचारिणः। पञ्चतेषां गृहस्थास्ते धर्मिष्ठाश्च कुटुम्बिनः॥ शिशिरो बाष्कलः शांखो वात्स्यश्चैवाश्वलायनः। पञ्चैते शाकलाः शिष्याः शाखाभेदप्रवर्तकाः॥
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42 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
महात्मा भर्तृहरि ने वाक्यपदीय में ऋग्वेद की १५ शाखाओं का उल्लेख किया है। कतिपय विद्वानों ने तो इसकी ३४ शाखाएँ बतलाई हैं। श्रीमद्भागवत में लिखा है कि महर्षि वेदव्यास ने मन्त्र समुदाय में से भिन्न-भिन्न प्रकरणों के अनुसार मन्त्रों का संग्रह करके उनसे ऋग्, यजुः, साम तथा अथर्व— ये चार संहिताएं बनाईं। उन्होंने "बह्वृच्" नामक पहली ऋक् संहिता पेल को, "निगद" नामक दूसरी यजुः संहिता वैशम्पायन को, सामश्रुतियों की "छन्दोग- संहिता" जैमिनी को, तथा सुमन्तु को "अथर्वाङ्गिरससंहिता" का अध्यापन कराया- पैलाय संहितामाद्यं बह्वृचाख्यामुवाच ह। वैशम्पायनसंज्ञाय निगदाख्यं यजुर्गणम्॥ साम्नां जैमिनये प्राह तथा छन्दोगसंहिताम्। अथर्वाङ्गिरसीं नाम स्वशिष्याय सुमन्तवे॥ (स्कन्ध १२ अ० ६, श्लोक ५२/५३) पैल मुनि ने संहिता को दो भागों में करके एक का अध्ययन इन्द्रप्रमिति को और दूसरे का बाष्कल को कराया। बाष्कल ने अपनी शाखा के चार भाग करके अपने शिष्य बोध्य याज्ञवल्क्य, पराशर और अग्निमित्र को पढ़ाया। इन्द्रप्रमिति ने अपनी संहिता का अध्ययन माण्डूकेय ऋषि को कराया। माण्डूकेय के पुत्र का नाम शाकल्य था। उन्होंने अपनी संहिता के पाँच भाग करके उन्हें वात्स्य, मुद्गल, शालीय, गोखल्य तथा शिशिर नामक शिष्यों को पढ़ाया। इसी प्रकार का वर्णन विष्णु-पुराण में भी मिलता है। (ब) यजुः संहिता :- यह संहिता दो भागों में विभक्त है— १. शुक्ल संहिता २. कृष्ण संहिता। इसके भेद का कारण सूर्य से वैशम्पायन तथा वैशम्पायन से याज्ञवल्क्य द्वारा आधीत वेद का वमन करना कहा जाता है और उस वमन का तित्तिर के रूप में जिन ऋषियों ने भक्षण किया, उनके द्वारा प्रवर्तित तैत्तरीय शाखा चली और वही कृष्ण यजुर्वेद कहलाया। यह प्रसंग इस प्रकार है— महर्षि वैशम्पायन ने यजुर्वेद की सत्ताइस शाखाओं की रचना की और अपने शिष्यों को पढ़ाया। वैशम्पायन को ब्रह्म हत्या लगी। वैशम्पायन ने अपने शिष्यों से कहा कि वे ब्रह्म हत्या को दूर करने के लिए व्रत का अनुष्ठान करें। इस पर वैशम्पायन के शिष्य याज्ञवल्क्य ने कहा— हे भगवन्! ये सब ब्राह्मण निस्तेज हैं। मैं अकेला ही व्रत का अनुष्ठान करूँगा। इस पर क्रोधित होकर गुरु वैशम्पायन ने कहा कि तू अत्यन्त ही अहंकारी है, तूने जो कुछ भी
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 43 मुझसे पढ़ा है, सब त्याग दे। याज्ञवल्क्य ने गुरु की आज्ञा पाते ही उनके पढ़ाये यजुर्वेद को वमन कर दिया। याज्ञवल्क्य द्वारा वमन किए गए यजुः को वैशम्पायन के अन्य शिष्यों ने तित्तिर बनकर ग्रहण कर लिया, इसलिये वे सब तैत्तरीय कहलाए। गुरु के निर्देश से व्रताचरण करने के कारण यजुः शाखाध्यायी चरकाध्वर्यु हुए, जैसा कि कहा भी गया है— यजूंष्यथ विसृष्टानि याज्ञवल्क्येन वै द्विज। जगृहुस्तित्तिरा भूत्वा तैत्तिरीयास्तु ते ततः॥ ब्रह्महत्याव्रतं चीर्णं गुरुणा चोदितैस्तु यैः। चरकाध्वर्यवस्ते तु चरणान्मुनिसत्तम॥ याज्ञवल्क्य ने भी यजुर्वेद की प्राप्ति के लिए संयतचित्त होकर भगवान् सूर्य की उपासना की। भगवान् सूर्य ने अश्व रूप में प्रकट होकर उन्हें अयातयाम नामक यजुः श्रुतियों का उपदेश दिया जिन्हें उनके गुरु वैशम्पायन भी नहीं जानते थे। उन श्रुतियों का अध्ययन करने वाले ब्राह्मण वाजी के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन वाजि श्रुतियों की काण्व आदि पन्द्रह शाखाएँ हैं— एवमुक्तो ददौ तस्मै यजूंषि भगवान् रविः। अयातयामसंज्ञानि यानि वेन्ति न तद्गुरुः। यजूंषि यैरधीतानि तानि विप्रैर्द्विजोत्तम। वाजिनस्ते समाख्याताः सूर्योऽप्यश्वोऽमवद्यतः। शाखाभेदास्तु तेषां वै दश पञ्च च वाजिनाम्। काण्वाद्यास्सुमहाभाग याज्ञवल्क्याः प्रकीर्तिताः॥ कृष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय, कठ तथा मैत्रायणी मुख्य शाखाएँ हैं जो कि अब प्राप्त नहीं होती। शुक्ल-यजुर्वेद की वाजसनेयी और कठ शाखाएँ पूर्णतया सुरक्षित हैं। ऐसा माना जाता है कि यजुर्वेद में किंचित् गद्यभाग भी उपलब्ध होता है। आधुनिक विचारकों की मान्यता है कि कृष्ण यजुर्वेद में मन्त्र तथा ब्राह्मण साङ्कर्य है तथा उसका विवेक करना अत्यन्त कठिन है अतएव उसकी कृष्ण संज्ञा पड़ गई। शुक्ल यजुर्वेद में मन्त्र तथा ब्राह्मण पृथक्-पृथक् हैं, अतः उसे 'शुक्ल' कहा गया है। कृष्ण यजुर्वेद दाक्षिणात्यों में अधिक प्रचलित है। यजुर्वेद में याज्या, अनुवाक्या आदि ऋचाओं का विशेष निरूपण हुआ है। स्त्रोतों का निरूपण सामवेद में हुआ है। इस प्रकार कर्मों की आधारभित्ति यजुर्वेद है और उसमें विशेषतापादक ऋक् तथा साम हैं। तथाहि— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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44 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अध्वर्युमुख्यैर्ऋत्विग्भिश्चतुर्भैर्यज्ञसम्पदः। निर्मिमीते क्रियासघेरध्वर्युर्यज्ञियं वपुः॥ तदलंकरूते होता ब्रह्मोद्गातेत्यमी त्रयः। यज्ञं यजुर्भिरध्वर्युर्निर्मिमीते तसो ह्यजुः॥ व्याख्यातं प्रथमं पश्चादृग्भ्यां व्याख्यानमोरितम्। साम्नामृगाश्रितत्वेन सामव्याख्याथ वर्ण्यते॥ यजुर्वेद में पहला अध्याय तथा अठ्ठाईसवीं कण्डिका दर्शपूर्णमास का प्रकरण है। द्वितीयाध्याय की समाप्ति तक पिण्डपितृयाग है। तृतीयाध्याय में अग्न्याधान है। अग्निष्टोम होम, अग्नि, उपस्थापन, चातुर्मास्य भी संक्षिप्त रूप में वर्णित है। चतुर्थाध्याय से आठवें अध्याय के ३३वें मन्त्र तक सोम याग है। फिर षोडशी याग, द्वादशाह याग तथा गवानयन है। ९वें अध्याय में ३४वें मन्त्र तक वाजपेय याग है फिर राजसूय है। दशम में भी राजसूय तथा तदन्तर्गत चरक सौत्रामणी है। ११वें अध्याय से १८वें अध्याय तक अग्निचयन है। इसके बाद १४वें अध्याय तक सौत्रामणी है। १८वें अध्याय तक अश्वमेध है। ३९वें अध्याय तक खिलमंत्र है तथा उनमें सर्वमेध और पुरुषमेध का प्रतिपादन हुआ है। ४०वें अध्याय में अध्यात्म विषयों का निरूपण है। (स) साम संहिता :- सामवेद संहिता दो भागों में विभक्त है— छन्दोवेद तथा गानवेद। इसको गान संहिता भी कहते हैं तथा छन्द संहिता भी। इसमें छन्दस् संहिता में तथा गान-संहिता में ऋगादि मन्त्रों का विशेष प्रयोग हुआ है। वर्णविकारों से विकृत गायत्री आदि छन्द गान संहिता में प्रयुक्त हैं। गान का लक्षण है— "आभ्यन्तरप्रयत्नजन्यः वागिन्द्रियव्यापारविशेषो गानम्।" "षड्जश्च ऋषभश्चैव गान्धारो मध्यमस्तथा। पञ्चमो धैवतश्चैवचनिषादः सप्तमः स्वरः॥" गान समय में मनस्वरूप में किंचित् विकृति हो जाती है, उसके ८ कारण हैं- (१) विकार (२) विश्लेष (३) विकर्षण (४) विराम (५) अभ्यास (६) लोप (७) आगम तथा (८) स्तोम। इनमें "विकार" का अर्थ स्पष्ट है जो "इको यणचि" आदि से होता है। सन्धि-विच्छेद को 'विश्लेष' कहते हैं। ह्रस्व के स्थान पर दीर्घ और दीर्घ के स्थान पर लुप्त उच्चारण "विकर्षण" है। वर्णोच्चारण के पश्चात् दो तीन मात्रा काल तक रुकना 'विराम' है। अन्तिम या अथ पद की आवृत्ति या तीन
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 45 बार कथन "अभ्यास" कहलाता है। किसी वर्ण का उच्चारण न करना "लोप" है। किसी पद में किसी अन्य पद का संयोग कर के उच्चारण "आगम" है। जो शब्द मन्त्र के मध्य में गान-काल में असम्बन्ध रूप से बढ़ाकर बोले जावें, उन्हें "स्तोम" कहते हैं। यह कहा भी गया है— "ऋचो यदधिकं किञ्चिद् द्विरुक्तं वापि दृश्यते। स्तोभत्वं तस्य मन्यन्ते क्रमशः शास्त्रचिन्तकाः॥" महर्षि जैमिनि ने सामवेद की शाखाओं का विभाग किया था। जैमिनि के पुत्र सुमन्तु तथा सुमन्तु के पुत्र सुकर्मा ने सामवेद की एक-एक शाखा का अध्ययन किया। सुकर्मा ने सामवेद संहिता के एक हजार शाखा भेद किए— "सहस्रसंहिताभेदं सुकर्मा तत्सुतस्ततः। चकार तं च तच्छिष्यौ जगृहाते महाव्रतौ॥" सामवेद की १००० शाखाओं में सम्प्रति जैमिनीय, राणायनीय तथा कौथुम—ये तीन ही शाखाएँ प्राप्त हैं। सामवेद की प्रशंसा करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है— ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’ । साम की प्रशस्ति में एक स्थान पर कहा गया है— "यद् ऋचा स्तुवते तदसुरा अन्ववायन् यत् साम्ना स्तुवते तदसुरा नान्ववायन्, य एवं विद्वान्, साम्ना स्तुवीत, इत्यृचं निन्दित्वा साम प्रशस्य लिङ्ग प्रत्ययेन साम विहिंत तस्मात् साम्रैव तव्यम्।" बृहद्देवता में तो यहाँ तक कहा गया है कि जो व्यक्ति सामवेद को जानता है, वहीं वस्तुतः वेद को समझता है— "सामानि यो वेत्ति स वेद तत्त्वम्" (द) अथर्व संहिता :- अथर्ववेद के द्रष्टा ऋषि अथर्वा अथवा अङ्गिरस हैं। इसमें २० काण्ड, ७५९ सूक्त और ५९७७ मन्त्र हैं। आदि के दश काण्डों को छोड़कर आगे के दश काण्डों को अङ्गिरोवेद कहते हैं। इसीलिए इसको अथर्वाङ्गिरोवेद भी कहा गया है। यहाँ तक भी ज्ञातव्य है कि "अश्व" शब्द मन का वाचक है। इस प्रकार अश्वमेध का अर्थ मनोनिरोध होगा। जब यजुर्वेदोक्त अश्वमेध को इस भावना से कर चुके तब समाप्ति के अनन्तर पूर्णाहूति के पश्चात् गृहस्थ को ऋग्वेद का उपदेश देना चाहिए तथा जो अश्वमेधकर्ता वृद्ध हों उन्हें यजुर्वेद का द्वितीय दिन उपदेश करना चाहिए। तीसरे दिन युवकों को अथर्ववेद का उपदेश देना चाहिये। चौथे दिन स्त्रियों को अङ्गिरोवेद १०वें काण्ड से अन्तिम काण्ड तक अथर्ववेद का उपदेश देना चाहिए। अन्यत्र कहा भी गया है— "युवतयः शोभना उपसमेता भवन्ति ता उपदिशत्याङ्गिरोवेद।" CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 46 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अथर्ववेद की नौ शाखाएँ हैं। दक्षिण भारत में शौनक संहिता तथा उत्तर भारत में पैप्पलाद संहिता का अधिक प्रचार है। अथर्ववेद का एक मात्र गोपथ ब्राह्मण है और कौशिक सूत्र नामक एक ही कल्पसूत्र है। अथर्ववेद परिशिष्ट में लिखा है कि जिस राजा के राज्य में अथर्ववेद का ज्ञाता निवास करता है, वह राष्ट्र विघ्न रहित होकर निरन्तर प्रगति की ओर अग्रसर होता है— ‘‘यस्य राज्ञो जनपदे अथर्वा शान्तिपारगः। निवसत्यपि तद् राष्ट्रं वर्धते निरूपद्रवम्॥ तस्माद् राजा विशेषेण अथर्वाणं जितेन्द्रियम्। दानसम्मानसत्कारैर्नित्यं समभिपूजयेत्॥’’ अथर्ववेद की प्रशंसा में एक स्थान पर कहा गया है— ‘‘न तिथिर्न च नक्षत्रं न ग्रहो च न चन्द्रमाः। अथर्वमन्त्रसम्प्राप्त्या सर्वसिद्धिर्भविष्यति॥’’ गोपथ ब्राह्मण में भी इस प्रकार कहा गया है— ‘‘एतद्वैभूमिष्ठं ब्रह्मयद् भृग्वङ्गिरसः। येऽङ्गिरसः सरसः येऽथर्वाणस्तद् भेषजम्, यद् भेषजं तदमृतं, यदमृतं तद् ब्रह्म।’’ स्कन्दपुराण में भी उल्लेख किया गया है— ‘‘यस्तत्राथर्वणान् मन्त्रान् जपेच्छ्रद्धासमन्वितः। तेषामर्थोद्भवं कृत्स्नं फलं प्राप्नोति स ध्रुवम्॥’’ २. ब्राह्मण ग्रन्थ :- ब्राह्मण ग्रन्थ गद्यात्मक रचनाएँ हैं। इनमें आध्यात्मिक तत्त्वों का निरूपण है। आध्यात्मिक तत्त्वों में मुख्यतः यज्ञ-यागों का प्रतिपादन तथा उनकी विधियों की स्पष्ट व्याख्या करना ही ब्राह्मणों का उद्देश्य रहा है। इनमें वैदिक अनुष्ठानों का क्रियात्मक रूप उपलब्ध होता है। इस प्रकार ‘ब्राह्मण’ में मन्त्रों, कर्मों एवं विनियोगों का सम्पूर्ण वर्णन प्राप्त होता है। ‘ब्रह्म’ का अर्थ ‘यज्ञ’ भी होता है। अतः यज्ञ का प्रतिपादन एवं यज्ञों की प्रचुर व्याख्या करने के कारण इनकी ब्राह्मण संज्ञा सार्थक है। वेदों के समान ही ब्राह्मण ग्रन्थों का भी साक्षात्कार किया गया है, किन्तु वेद मन्त्रों के द्रष्टा ऋषि कहलाते हैं, जबकि ब्राह्मणों के द्रष्टा आचार्य। स्वरूप की दृष्टि से भी वेदों तथा ब्राह्मणों में पर्याप्त अन्तर है। प्रायः चारों वेद छन्दों में उपनिबद्ध हैं, जबकि ब्राह्मण ग्रन्थ आद्योपान्त गद्यात्मक ही हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों के प्रतिपाद्य विषय के सम्बन्ध में जैमिनि शबरस्वामी ने निम्न दस घटकों का उल्लेख किया है— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 47 हेतुर्निर्वचनं निन्दा प्रशंसा संशयो विधिः। परक्रिया पुराकल्पो व्यवधारण कल्पना। उपमानं दशैते तु विधयो ब्राह्मणस्य तु॥ (२/१/८) किन्तु विधि ही ब्राह्मणों का प्रधान विषय है। अन्य विषय उसके अङ्ग होने के कारण गौण माने जाते हैं। इसके विपरीत संहिताओं में देव स्तुतियाँ, यज्ञ-यागों के लिए मन्त्र एवं मन्त्रांश तथा ऐहिक और पारलौकिक फल देने वाले विषयों का निदर्शन है। पुरातन-काल में ब्राह्मण साहित्य अति विशाल था, किन्तु उनमें से अधिकांश ग्रन्थ काल-कवलित हो चुके हैं। अनेक ब्राह्मण ग्रन्थों का मात्र नाम ही उपलब्ध होता है। उपलब्ध ब्राह्मण ग्रन्थों के नाम निम्नलिखित हैं— ऋग्वेदीय ब्राह्मण– इसके दो ब्राह्मण हैं— ऐतरेय एवं शाङ्ख्यायन। ऐतरेय ब्राह्मण चालीस अध्यायों वाला है जबकि शाङ्ख्यायन ब्राह्मण तीस अध्यायों के रूप में प्राप्य है। यजुर्वेदीय ब्राह्मण– इस वेद के दो उपविभाग होने के कारण ब्राह्मण भी दो भागों में विभक्त हैं। एक तो कृष्ण-यजुर्वेदीय ब्राह्मण तथा दूसरा शुक्ल-यजुर्वेदीय ब्राह्मण। कृष्ण-यजुर्वेद के ब्राह्मण का नाम तैत्तिरीय ब्राह्मण तथा शुक्ल-यजुर्वेद का ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण कहलाता है। सामवेदीय ब्राह्मण– सामवेद के नौ ब्राह्मण हैं, वे हैं— ताण्ड्य ब्राह्मण, षड्विंश ब्राह्मण, सामविधान ब्राह्मण, आर्षेय ब्राह्मण, दैवत ब्राह्मण, उपनिषद् ब्राह्मण, संहितोपनिषद् ब्राह्मण तथा जैमिनीय ब्राह्मण। अथर्ववेदीय ब्राह्मण– अथर्ववेद का तो मात्र एक ही ब्राह्मण है— गोपथ ब्राह्मण। इसके दो भाग हैं— पूर्वगोपथ तथा उत्तरगोपथ। ३. आरण्यक :- इन ग्रन्थों का किंचित अंश ब्राह्मण से सम्बन्धित है तथा किंचित अंश स्वयं स्वतन्त्र अस्तित्व वाला है। वस्तुतः आरण्यक ब्राह्मण ग्रन्थों के परिशिष्ट भाग के सदृश हैं। 'अरण्य' में पाठ होने के कारण आरण्यक नाम सार्थक है। वस्तुतः ये ग्रन्थ नगरों तथा ग्रामों में न पढ़े जाकर वनों में पढ़े जाते हैं। कहा भी गया है— "अरण्ये एवं पाठ्यत्वादारण्यकमितीर्यते।" इन ग्रन्थों में अरण्यस्थ ऋषियों अथवा वानप्रस्थ आश्रम को ग्रहण कर चुकने वाले व्रतियों के यज्ञ, महाव्रत एवं होत्र आदि का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। मुख्यतः इनमें यज्ञीय रहस्यों का प्रतिपादन है। इनमें आरण्यक ऋषियों के कर्मकाण्ड के अतिरिक् यज्ञ की आध्यात्मिक CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 48 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता व्याख्या एवं दार्शनिक चिन्तन का भी समावेश है। उपनिषदों में विकसित ब्रह्मज्ञान एवं दर्शन का मूल आधार ये आरण्यक ग्रन्थ ही हैं। संहिताओं एवं ब्राह्मणों की संख्या के बराबर ही आरण्यक भी होने चाहिये किन्तु खेद का विषय है कि सम्पूर्ण आरण्यक साहित्य उपलब्ध नहीं है। आरण्यक साहित्य का एक विशाल भाग काल कवलित हो चुका है। जो आरण्यक प्राप्त होते हैं, वे निम्नलिखित हैं- ऋग्वेद के दो आरण्यक मिलते हैं- (१) ऐतरेयारण्यक तथा (२) कौषीतकि या शाङ्खायन आरण्यक। ऐतरेय आरण्यक को ऐतरेय ब्राह्मण का अंश माना जाता है। शाङ्खायन आरण्यक भी ऐतरेय आरण्यक के सदृश ही हैं। सुविख्यात वैदिक भाष्यकार सायण एवं शङ्कर दोनों ने ही, ऐतरेय तथा शाङ्खायन आरण्यकों पर भाष्य लिखे हैं। यजुर्वेद के भी आरण्यक ग्रन्थ प्राप्त होते हैं। शुक्ल यजुर्वेद का बृहदारण्यक है, जो काण्व शाखा से सम्बन्धित हैं। इस पर शङ्कर, रामानुज तथा सायण के प्रामाणिक भाष्य उपलब्ध हैं। कृष्ण यजुर्वेद की मैत्रायणी शाखा का भी एक आरण्यक है, जो मैत्रायणीयोपनिषद् कहलाता है। कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तरीय शाखा से सम्बन्धित आरण्यक की संज्ञा तैत्तरीय आरण्यक है। सामवेद से सम्बद्ध आरण्यक तवलकार आरण्यक के नाम से जाना जाता है। इसका दशम अनुवाद ही केनोपनिषद् है। अथर्ववेद का कोई आरण्यक ग्रन्थ नहीं है। इससे सम्बन्धित उपलब्ध उपनिषद् किसी आरण्यक का अंश नहीं है। वह स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में प्राप्य है। ४. उपनिषद् :- उपनिषद् आरण्यकों में सम्मिलित होने से उन्हीं के विशिष्ट अङ्ग हैं। ये वेद के अन्तिम भाग हैं, वेद के सारभूत सिद्धान्तों के प्रतिपादक हैं, इसीलिए इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है। उपनिषद् वैदिक भावना के विकास के द्योतक हैं। जिस प्रकार वैदिक कर्मकाण्ड की व्याख्या के लिए ब्राह्मण ग्रन्थों का प्रणयन हुआ, उसी प्रकार वैदिक ज्ञान काण्ड के लिए उपनिषद् रचे गए। उपनिषद् शब्द की निष्पत्ति दो शब्दों के योग से होती है, वे शब्द हैं- उप और निषद्। उप का अर्थ होता है निकट तथा निषद् का अर्थ है नीचे बैठने वाला अर्थात् परम तत्त्व के निकट बैठकर ग्रहण किये जाने वाला ज्ञान उपनिषद् के रूप में संग्रहीत हैं। यह अधिकारी को ब्रह्म के पास पहुँचा देता है। इसी कारण उपनिषद् शब्द ब्रह्मविद्या का भी द्योतक है। ये ग्रन्थ, ऋषियों, मुनियों एवं अन्य विद्वानों द्वारा विश्व, ईश्वर तथा मानव (जीव) के CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 49 सम्बन्ध में ध्यानस्थ अवस्था में प्रत्यक्षीकृत ज्ञान का विशाल भण्डार है। " इन ग्रन्थों में एक अत्यन्त पुरातन् भारतीय दर्शन का मूलाधार निहित है। प्राचीन काल में इन ग्रन्थों का बृहद् भण्डार अवश्य रहा होगा और वे ग्रन्थ— गायकों, पुरोहितों एवं विचारकों द्वारा कण्ठस्थ करके कुल क्रमागत रूप में दूसरी पीढ़ियों को प्राप्त कराए जाते रहे होंगे। किन्तु विभिन्न कालों में वेद विरोधी शक्तियों द्वारा अनेक वैदिक ग्रन्थ नष्ट कर दिए गए। उन्हीं में ढेरों उपनिषद् भी समास हो गएं। इसी कारण अब उपलब्ध वैदिक साहित्य अत्यन्त अल्प है, फिर भी इतना अधिक तथा उत्कृष्ट है। उपनिषदों की संख्या के विषय में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद हैं। मुक्तिकोपनिषद् में १०८ उपनिषदों की सूची दी गई है, जिनमें दस उपनिषद् "ऋग्वेद" से सम्बन्धित, उन्नीस "शुक्ल यजुर्वेद" से, बारह 'कृष्ण यजुर्वेद' से, सोलह "सामवेद" से तथा इकतीस "अथर्ववेद" से सम्बन्धित है। किन्तु शङ्कराचार्य ने केवल दस उपनिषदों पर अपना भाष्य लिखा है, वे ही प्रामाणिक उपनिषद् हैं। मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार उनके नाम एवं क्रम इस प्रकार हैं— १. ईशोपनिषद् ६. माण्डूक्योपनिषद् २. केनोपनिषद् ७. तैत्तरीयोपनिषद् ३. कठोपनिषद् ८. ऐतरेयोपनिषद् ४. प्रश्नोपनिषद् ९. छान्दोग्योपनिषद् ५. मुण्डकोपनिषद् १० बृहदारण्यकोपनिषद् उपर्युक्त दस उपनिषदों के अतिरिक्त तीन अन्य उपनिषद् भी प्राचीन माने जाते हैं क्योंकि शङ्कराचार्य ने "ब्रह्मसूत्र भाष्य" में इनका नामोल्लेख किया है; वे हैं— १. कौषीतिकोपनिषद् २. श्वेताश्वतरोपनिषद् ३. मैत्रायणीयोपनिषद् इन उपनिषदों का विस्तृत विवेचन एवं उपनिषद् सम्बन्धी अन्य महत्त्वपूर्ण सामग्री आगे उपनिषदों के पृथक् अध्याय में विस्तारपूर्वक दी गई हैं। वैदिक साहित्य दैविक प्रकाश हैं। इससे निकट का सम्बन्ध रखने वाली रचना 'वेदाङ्ग' है। यह वैदिक साहित्य के अन्तर्गत नहीं आती। वेदाङ्ग :- वेद एक जटिल एवं दुरूह विषय है, भाव की दृष्टि से एवं भाषा की दृष्टि से भी। उसे सरल तथा सुबोध करने के लिए विद्वानों ने एक नूतन सूत्र साहित्य CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 50 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का प्रणयन किया। यह सूत्र साहित्य 'वेदाङ्ग' के नाम से प्रसिद्ध है। 'वेदाङ्ग' का तात्पर्य है- वेद के अङ्ग। अङ्ग का व्युत्पत्ति से प्राप्त अर्थ है उपकारक अर्थात् उपकार करने वाले। जिससे किसी वस्तु के स्वरूपज्ञान में सहायता प्राप्त हो वह अङ्ग कहलाता है। वेद के भावों एवं अर्थों के ज्ञान करने में सहायक शास्त्र 'वेदाङ्ग' की संज्ञा से पुकारा गया। वेदाङ्गों में छह अङ्ग सम्मिलित हैं। जो निम्नलिखित हैं- अ. शिक्षा द. निरुक्त ब. कल्प क. छन्द स. व्याकरण ख. ज्योतिष इनका संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत है- (अ) शिक्षा :- वैदिक साहित्य में वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण का विशेष महत्त्व है। इस कार्य में सहायता प्रदान करने वाला वेदाङ्ग 'शिक्षा' कहा जाता है। शिक्षा की परिधि में प्रातिशाख्य ग्रन्थ भी आते हैं जो संहिताओं एवं पद-पाठ से प्रत्यक्षतः सम्बन्धित हैं। इस प्रकार शिक्षा के अन्तर्गत उच्चारण विधियों का निर्देश प्राप्त होता है। (ब) कल्प :- वैदिक कर्मकाण्ड तथा यज्ञीय अनुष्ठानों के निमित्त प्रवर्तमान वेदाङ्ग कल्प कहलाता है। इनमें क्रमबद्ध सूत्रात्मक संक्षिप्त रूप में यज्ञ-याग के विधान का विवरण उपलब्ध होता है। कल्प का व्युत्पत्ति से प्राप्त अर्थ है- यज्ञीय प्रयोगों का समर्थन करने वाला शास्त्र। अपने अर्थ के अनुसार ही कल्प में वैदिक कर्मकाण्ड का विवेचन है। (स) व्याकरण :- पदस्वरूप एवं पदार्थ निश्चय के लिए उपयोग किए जाने वाला वेदाङ्ग व्याकरण है। वैदिक मन्त्रों के आलोचनात्मक अध्ययन के लिए व्याकरण अत्यन्त आवश्यक शास्त्र है। व्याकरण शास्त्र पदों की प्रकृति एवं प्रत्यय का निर्देश करके उनके अर्थों का निर्णय करता है। (द) निरुक्त :- निर्वचन शास्त्र की ही 'संज्ञा' निरुक्त है। निरुक्त की रचना यास्क ने की है। यह 'निघण्टु' की टीका है। निरुक्त का मुख्य कार्य है- पदों की निरुक्ति एवं व्युत्पत्ति का ज्ञान कराना। निरुक्त की भिन्नता का प्रभाव अर्थों की भिन्नता का कारण बनता है। अतः वेदों के पदों के अर्थ-निर्णयार्थ प्रयुक्त वेदाङ्ग निरुक्त हैं। (क) छन्द :- 'छन्द' पाँचवा वेदाङ्ग है। समस्त वेद छन्दोबद्ध हैं। अतः छन्दों की यथार्थ जानकारी के बिना मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण एवं पाठ सम्भव नहीं है। इस प्रकार छन्दों का ज्ञान मन्त्रों के उच्चारणार्थ अत्यन्त आवश्यक है। इसी कारण 'छन्द' वेदाङ्ग के रूप में प्रतिष्ठित हैं। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 51 (ख) ज्योतिष :- 'ज्योतिष' षष्ठ एवं अन्तिम वेदाङ्ग है। यज्ञों का अनुष्ठान किसी विशिष्ट ऋतु एवं नक्षत्र में होना चाहिए। इस प्रकार नक्षत्र, तिथि, मास एवं संवत्सर के ज्ञान से वैदिक कर्मकाण्ड का उचित काल में आयोजन होता है। इस कार्य के लिए निवर्तमान वेदाङ्ग ही ज्योतिष है। ज्योतिष का प्रतिनिधित्व 'वेदाङ्ग ज्योतिष' ग्रन्थ करता है। सूत्र साहित्य :- 'वेद' तो ईश्वरीय ज्ञान है। ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत साहित्य है। इसके अतिरिक्त एक अन्य रचना है- कल्पसूत्र अथवा सूत्र साहित्य। यह वैदिक साहित्य से अत्यन्त निकटता से सम्बद्ध है, किन्तु इसकी गणना वैदिक साहित्य में नहीं की जाती है। यह वेदाङ्ग के रूप में माना जाता है। यह सूत्र-ग्रन्थ वेदों तथा ब्राह्मणों के प्रतिपाद्य विषय का साररूप है। यह गद्य में विरचित है। उपलब्ध सूत्रों का विवरण निम्नलिखित है- (अ) ऋग्वेदीय सूत्र- आश्वलायन सूत्र तथा शाङ्खायन सूत्र। (ब) शुक्ल यजुर्वेदीय सूत्र- कात्यायन श्रौत सूत्र, पारस्कर गृह्यसूत्र तथा कात्यायन शुल्ब सूत्र। (स) कृष्ण यजुर्वेदीय सूत्र- विभिन्न शाखाओं के भिन्न-भिन्न सूत्र प्राप्त होते हैं, जो निम्नांकित हैं- (अ) बौधायन तथा आपस्तम्ब शाखाएं- श्रौतसूत्र, गृह्य सूत्र, धर्म सूत्र तथा शुल्बसूत्र। (ब) काठक शाखा- काठक गृह्यसूत्र। (स) मैत्रायणी शाखा- मानव श्रौतसूत्र, मानव गृह्यसूत्र तथा वाराह- गृह्यसूत्र। (द) सामवेदीय सूत्र- लाट्यायन श्रौतसूत्र, द्राह्यायन श्रौतसूत्र, खादिर गृह्यसूत्र, जैमिनीय श्रौतसूत्र, जैमिनीय गृह्यसूत्र, गौतम धर्मसूत्र एवं आर्षेय कल्पसूत्र। (क) अथर्ववेदीय सूत्र- वैतान श्रौत्रसूत्र, कौशिक गृह्यसूत्र एवं वैखानस गृह्यसूत्र। अतः स्पष्ट है कि कल्प सूत्रों में श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र एवं शुल्बसूत्रों की भी गणना होती है; इनका किंचित परिचय निम्नलिखित है- (अ) श्रौतसूत्र- श्रौतसूत्र में श्रौतयागों का क्रमबद्ध विवरण किया गया है। अधिक दिनों तक निरन्तर अनेक पुरोहितों द्वारा सम्पादन किए जाने वाले CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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52 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता श्रौताग्नि से सम्बन्धित यज्ञ श्रौत याग कहलाते हैं। कुछ प्रमुख श्रौतयाग निम्नलिखित हैं- दर्श, पौर्णमास, सोमयाग, वाजपेय, राजसूय, सोत्रामणी, अश्वमेधादि। इन्हीं श्रौतयज्ञों के विधानों एवं नियमों का संग्रह श्रौतसूत्रों में उपलब्ध होता है। (ब) गृह्यसूत्र- गृह्याग्नि साध्य यज्ञों, विवाहादि संस्कारों तथा शाला निर्माण एवं कृषि कर्मों के विधान का संग्रह ग्रन्थ गृह्यसूत्र के नाम से विख्यात है। इनमें षोडश संस्कार, पञ्चमहायज्ञ, सप्त पाकयज्ञ, गृह निर्माण, गृह प्रवेश, पशु-पालन, रोग विनाशक विधियों का विवेचन उपलब्ध होता है। (स) धर्मसूत्र- ये भारतवासियों के सर्वप्राचीन न्याय ग्रन्थ हैं। इनमें आध्यात्मिक एवं धार्मिक नियमों के सन्देश प्राप्त होते हैं। इनमें नीति, धर्म, रीति, प्रथाओं, चार वर्णों, चार आश्रमों आदि के कर्तव्यों एवं सामाजिक व्यवहारोपयोगी नियमों का वर्णन है। (द) शुल्ब सूत्र- इन सूत्र-ग्रन्थों का वैज्ञानिक महत्त्व है। क्योंकि इनमें आर्यों की पुरातन ज्यामितीय कल्पनाओं एवं गणनाओं का प्रतिपादन है। प्राचीन भारतीय ज्यामिति के विकास की जानकारी इन ग्रन्थों से पता चलती है। इनमें यज्ञ-वेदी से सम्बद्ध नाप तथा वेदी निर्माण के नियमों का विवेचन है। उपसंहार:- इस प्रकार उपर्युक्त समस्त रचनाएँ वैदिक हैं। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य किसी एक काल की निश्चित अवधि की देन नहीं है। यह तो अतिदीर्घकाल में उपलब्ध गीति- संग्रहों, प्रार्थना-ग्रन्थों, आध्यात्मिक एवं पारमार्थिक निबन्धात्मक धार्मिक रचनाओं का समूह है। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य की विभिन्न विधाओं एवं ग्रन्थों में स्वयं में पर्याप्त भिन्नता होते हुए भी वह एकता के प्रशंसनीय आदर्श का उत्कृष्ट उदाहरण है। आर्यजनों ने सदैव वेदों को "श्रुति" की संज्ञा से सम्बोधित किया है। इसका कारण है कि संहिताओं की रचना तथा अध्ययन नहीं किया गया है, अपितु उच्चारण एवं श्रवण किया गया है। भारतीय दर्शनशास्त्र के अनुसार ऋग्वेद से लेकर उपनिषद् तक आद्योपान्त वैदिक साहित्य ईश्वरीय सम्पत्ति है जिसे प्राचीन महर्षियों ने अपने ध्यान- नेत्रों से प्रत्यक्षीकृत किया है। भारतीय दर्शन की विभिन्न विचारधाराएं परस्पर सैद्धान्तिक रूप से भले ही कितनी भेदयुक्त हो, किन्तु वेदों को सभी समान आदर
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 53 प्रदान करती हैं। भारतीय दर्शन में किसी भी विचारधारा की आस्तिकता अथवा नास्तिकता का निर्धारण ईश्वर की सत्ता पर विश्वास करने अथवा न करने से नहीं होता, बल्कि वेदों की प्रामाणिकता को मानने अथवा न मानने से होता है। वेदों के “प्रामाण्य” को स्वीकार करने वाली विचार पद्धति “आस्तिक” तथा वेदों के “प्रामाण्य” को अस्वीकार करने वाली विचार पद्धति ‘नास्तिक’ कहलाती है। सर्वाधिक आश्चर्यजनक एवं महत्त्वपूर्ण विषय तो यह है कि बौद्ध जो कि नास्तिक हैं क्योंकि वे वेदों के प्रामाण्य को नहीं मानते, वे भी वेदों को परब्रह्म द्वारा प्रदत्त अथवा प्रणीत मानते हैं। जिस व्यक्ति, विषय अथवा ग्रन्थ को उसके विरोधी भी आलौकिक स्वीकार करें, इससे अधिक गौरव की बात, उसके लिए दूसरी क्या हो सकती है। वेदों के साथ ऐसा ही है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ५ द्वितीय वेदों का महत्त्व वैदिक वाङ्मय विश्व का प्राचीनतम वाङ्मय है। यह वाङ्मय अत्यन्त प्राचीन होते हुए भी अपना अनुपम वैशिष्ट्य रखता है। यह समस्त सत्यज्ञान की अप्रतिमराशि एवं विश्व के ग्रन्थागार में सर्वप्राचीन ग्रन्थ है। वह भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता का प्राण है। मानव सभ्यता के विकास के अति प्राचीन काल से ही वेद की शिक्षाएं मानव मात्र को असत् से सत् की ओर प्रेरित करती रही हैं। वैदिक-मन्दाकिनी की सुधाधारा में अवगाहन कर हृदय को परम शान्ति प्राप्त होती है। यह युगों में प्रवाहित होने वाली वह पवित्र अक्षुण्ण ज्ञान-धारा है जो कि अनेक संक्रमण-व्युत्क्रमणों को पार करती हुई आज भी अपने अनवद्यवपु के द्वारा बहती चली आ रही है। यह भारत ही नहीं अपितु समस्त विश्व के मानव हृदय का प्रतिनिधित्व करने वाली, परम शान्ति प्रदान करने वाली वह दिव्य ज्योति है जिससे आलोकित मानव को अपने कर्मपथ का ज्ञान होता है। भारत तथा भारतीयता से स्नेह रखने वाले सुधीजन जिसे सम्मान की दृष्टि से देखते हुए जिसके उपदेश पीयूष का पान कर उस दिव्य स्वर्गस्थ पीयूष की कामना नहीं करते, उस विश्व विश्रुत भगवती श्रुति की उपासना से ही भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन आदि का तात्त्विक अनुशीलन किया जा सकता है। भारत की समस्त मौलिक ज्ञान-विज्ञान की निधि इसी में विद्यमान है। भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन, सभ्यता, ललित साहित्य, विधिशास्त्र, अर्थशास्त्र, स्थापत्य, गणित, फलित, विज्ञान, इतिहास, कलाएँ आदि सबका आदिस्तोत्र वैदिक वाङ्मय ही है। भारत के मौलिक रूप के दर्शनार्थ वैदिक वाङ्मय का अध्ययन अनुशीलन अत्यावश्यक है। आर्य जाति की वेदों के प्रति अपूर्व आस्था है। पृथ्वी के किसी भी स्थान पर निवास करने वाला हिन्दू अपने धर्म और संस्कृति का मूलतत्त्व वेदों को ही मानता है। धार्मिक पर्वों तथा संस्कारों के समय पर हिन्दुओं के घरों में आज भी सादर वेदमन्त्रों का उच्चारण किया जाता है। वेद मन्त्रों के उच्चारण को सुनकर हिन्दू जाति आज भी गौरव का अनुभव करती है। यद्यपि भारत में अनेक मतमतान्तर प्रचलित हैं, परन्तु उन सभी ने अपने मत का आधार वेदों को ही माना है। इस प्रकार वेदों की महत्ता सर्वातिशायी सिद्ध होती है। महर्षि मनु लिखते हैं— “वेद एव द्विजातीयानां निःश्रेयस्करः परम्” CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 55 अर्थात् मानव मात्र के लिए वेद ही एकमात्र सुख का साधन है। इसका अध्ययन पाँच प्रकार से होता है। जैसा कि लिखा गया है— ‘वेदस्वीकरणं पूर्वं विचारोऽभ्यसनं जपः। तद्दानं चैव शिष्येभ्यो वेदाभ्यासोहि पञ्चधा॥’ अर्थात्- (१) वेद पढूँगा, यह निश्चय करना। (२) वेदार्थ का विचार। (३) वेदमन्त्रों का अभ्यास या पाठ। (४) शिष्य-प्रशिष्यों द्वारा वेद का अध्यापन। (५) वेदमन्त्रों का जप। इस प्रकार वेदाध्ययन करने वाले मानव द्विज कहलाए। वेदों को महर्षि मनु ने सर्वज्ञानमय तथा समस्त विधाओं का आधार एवं स्रोत माना है— ‘यः कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः। स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हिं सः॥’ मनु का मत है कि वेदों द्वारा ही तीनों काल के रहस्य को जाना जा सकता है- ‘भूतं भव्यं भविष्यच्च, सर्वं वेदात् प्रसिध्यति।’ चाणक्य तथा महर्षि दयानन्द ने राजा के मंत्री को वेदवित् होना चाहिए, यह स्वीकार किया है। अतएव वेदभक्त कहलाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को स्वाध्याय करना आवश्यक है। यही तो इस स्वाध्यायोऽध्येतव्यः मीमांसक प्रोक्त घोषणा का आशय है। अपि च— “वेत्ति यो विविधान् वेदानधीते च यथाविधिः। स्वधर्मनिरतो विप्रो वैदिकः परिकीर्तितः॥” तथा— “ये साङ्गवेदान् विधिवद् विदन्ति, ते ब्राह्मणाः वैदिकनामधेयाः। वेदेन हीनाः यदि केऽपि सन्ति, ते शूद्रतुल्या भुवि सञ्चरन्ति॥” इस प्रकार वैदिक मतानुसार सृष्टिकाल के आदि में प्रकट हुए वेदों का आविर्भाव काल भी सृष्टिकाल के समान है। अतः मनु का कथन है— ‘युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः। लेभिरे तपसा पूर्वम् अनुज्ञातः स्वयम्भुवा॥’ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 56 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अतः जब वेदों का इतना महत्त्व है तो तन्मूलक स्मृत्यादि का भी महत्त्व स्वयंसिद्ध है। अब हम भिन्न-भिन्न दृष्टियों से वेदों की महत्ता को प्रस्तुत कर रहे हैं— (अ) धार्मिक दृष्टि से महत्त्व :- वेदों का सर्वाधिक महत्त्व धार्मिक दृष्टि से है। वेद हिन्दू धर्म के मूल स्रोत हैं। वेदों का आधार लेकर ही समस्त हिन्दू धर्म से सम्बन्धित ग्रन्थों का प्रणयन हुआ है। 'मनुस्मृति' में लिखा भी है— 'वेदोऽखिलोधर्ममूलम्' अर्थात् वेद धर्म सभी धर्मों के मूल हैं। वे भारतीय ही नहीं, बल्कि संसार के सभी धर्मों के आदि स्रोत हैं— यः कश्चित् कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः। स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः॥ (मनु० २.७) धर्म के तत्त्व को जानने के ईच्छुक सामान्य जनों के लिए वेद परम प्रमाण के रूप में मान्य हैं— "धर्म जिज्ञा समानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः" (मनु २.१३) लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी ने कहा है कि हिन्दू धर्म का लक्षण "केवल वेदों को प्रमाण रूप में स्वीकार करना है"— 'प्रामाण्यबुद्धिर्वेदेषु'। डॉ० सम्पूर्णानन्द के अनुसार ईश्वर की सत्ता न स्वीकार करने वाला हिन्दू संभव है, किन्तु वेद की सत्ता को नकारने वाला 'हिन्दू' सम्बोधन का अधिकारी नहीं। इसी कारण महाभाष्यकार पतञ्जलि ने कामना न करते हुए छः अङ्गों सहित वेदों का अध्ययन ब्राह्मणों के लिए आवश्यक कहा है— "ब्राह्मणेननिष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयोज्ञेयश्च" (महाभाष्य) वेदों में हिन्दुओं के देवी-देवताओं, उनके स्वरूप तथा गुणों, उनकी शक्तिसम्पन्नता, उनकी पूजा तथा सेवा का महत्त्व तथा उनसे उपलब्ध होने वाले लाभादि समस्त धार्मिक तत्त्वों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। मनु का कथन है कि वेदों के अतिरिक्त शास्त्रों का परिश्रमपूर्वक अध्ययन करने वाला ब्राह्मण जीवित शूद्र है— "योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्। स जीवन्नेव शूद्रत्वभाशु गच्छति सान्वयः॥" (मनु : २.१६८) और भी— "आर्षधर्मोपदेशं च वेदशास्त्रविरोधिना। यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्म वेद नेतरः॥" (मनु. १२.१०६) हिन्दू धर्मरूपी महल की आधारशिला 'यज्ञ' है तथा यज्ञ के अनेक प्रकार तथा उनके विधान हेतु आवश्यक मन्त्रादि का विवेचन वेदों में उपलब्ध होता है। 'शतपथ ब्राह्मण' के अनुसार तो धनादि से परिपूर्ण पृथ्वीदान के कर्म से होने वाली फलप्राप्ति CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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द्वितीय अध्याय 57 वेदों के अध्ययनशास्त्र से ही हो जाती है। वेदों के अध्ययन से अक्षय्य लोक की उपलब्ध होती है— "यावन्तं हैवे इमां पृथिवी वित्तेन पूर्णांददतु लोकं जयति, त्रिमिस्तावन्तं जयतिः भूयांस च अक्षय्य च एवं विद्वान् अहरहः स्वाध्यायमधीते, तस्मात् स्वाध्यायोऽध्ये तव्यः'' (शत. ११.५.६१)। आर्यधर्म में यज्ञ की प्रधानता है। वेद इस विश्व के मूल में यज्ञ की भावना को स्वीकार करता है। ऋग्वेद के दशम मण्डलानुसार यज्ञमहिमा अपूर्व है— "यज्ञ द्वारा ही सब कुछ वर्णित है। " गीतानुसार भी यह सृष्टि, यह रचना, यह प्रजा, यज्ञ के साथ ही उत्पन्न हुई है। प्रजापति विश्वरूपी यज्ञ का याजक, होता, अध्वर्यु तथा पुरोहित है। अथर्व संहितानुसार भी सृष्टि का उद्गम-स्थल यज्ञ है। शतपथ ब्राह्मण में भी यज्ञ को उत्तम-कर्म स्वीकार करके प्रजापति तथा विष्णु का रूप कहा गया है। शरीर भी यज्ञ रूप है, जिसमें चक्षु, श्रोत्र, मुख, वाणी, मन आदि भाग ले रहे हैं। मन—यजमान, चक्षु—होता, प्राण—उद्गाता, श्रवण—अध्वर्यु तथा वाणी—ब्रह्मा का रूप है। वेद के अनुसार— "इमं यज्ञं विततं विश्वकर्मणा।" तथा "स्विष्टिनस्ता कृणवद् विश्वकर्मा।" विश्वकर्मा ने ही इस यज्ञ का विस्तार किया। वही हमारी दुरिष्टियों को स्विष्टियों में परिणत कर सकता है। यज्ञ की भावना सहयोग, सौहार्द तथा संस्कृति की जननी है। यज्ञ के द्वारा हम अहिंसा, दान और ज्ञान का प्रसार करते हैं। समाज का सम्पूर्ण कंकाल इसी प्रसार पर अवलम्बित है। यज्ञ के द्वारा ही हम उस परम यज्ञ स्वरूप प्रभु के पास पहुँचते हैं, जिसने सृष्टि को यज्ञ के साथ ही उत्पन्न किया था। उसी ने हम सबको आदेश दिया था कि हम इसी यज्ञ प्रणाली द्वारा अभ्युदय में संलग्न हों। यही यज्ञ हमारे लिए कामधेनु है। गीतानुसार यज्ञ द्वारा ही हम दिव्य-शक्तियों को भावित तथा प्रसन्न करते हैं, इसीलिए देव भी हमें प्रसन्न करते हैं। इस प्रकार परस्पर भावित होते हुए हम सब कल्याण को प्राप्त करते हैं। अतः यज्ञ श्रेष्ठ कर्तव्य माना जाता है। याज्ञिक विधान के अतिरिक्त वेदों में नैतिक मूल्यों का भी अत्यधिक महत्त्व है। धर्म का मेरुदण्ड नैतिकता, सद्गुण तथा सदाचरण आदि हैं। इन सबका वेदों में विपुल वर्णन उपलब्ध होता है। अतः नैतिक दृष्टि से भी वेदों का अत्यन्त महत्त्व है। (ब) सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्व :- सांस्कृतिक तथा सामाजिक दृष्टि से भी वेदों का महत्त्व अपार है। अनेक सामाजिक संस्थाओं के निर्माण तथा नामकरण का श्रेय वेदों को प्राप्त है। मनुस्मृति के अनुसार—
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 58 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता “सर्वेषां तु स नामानि, कर्माणि च पृथक्-पृथक्। वेदशब्देभ्य एवादौ, पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥” वैदिक संस्कृति के विषय में डॉ० आर० के० मुखर्जी का कथन है कि The Ṛgvedic civilization was based on plain living and high thinking यह जानकारी वेदों से ही प्राप्त हुई है। सामाजिक जीवन, वर्ण व्यवस्था, व्यक्ति का संस्कार, परिवार अथवा कुटुम्ब का निर्माण, विवाह संस्था, आश्रम व्यवस्था, स्त्रियों की स्थिति, दासप्रथा, शिक्षा, नियमित यौनसम्बन्ध, सामाजिक आचार तथा व्यवहार, स्वजनों के प्रति कर्तव्य-भावना, सामयिक दायित्वबोध, निवास, भोजन, पेय, वस्त्र, नागरिकता की दृढ़ आधारभूमि तथा अन्य सांस्कृतिक एवं सभ्यता विषयक तत्त्वों के उद्गम तथा विकास की जानकारी के लिए वेद श्रेष्ठ ग्रन्थ हैं। इस विषय में पं० बलदेव उपाध्याय का कथन उचित ही है- “यदि हम जानना चाहते कि हमारे पूर्वज किस प्रकार अपना जीवन बिताते थे, कौन क्रीड़ाएँ उनके मनोरंजन की साधिका थीं, किस प्रकार उनका विवाहसम्बन्ध, देहसम्बन्ध का ही प्रतीक न होकर आध्यात्मिकसंयोग का प्रतिनिधि माना जाता था, किन देवताओं की वे उपासना किया करते थे, किस प्रकार वे प्रातः काल प्राची के मुखमण्डल को उजागर करने वाली पुराणी युवति उषा की सुनहली छटा में अग्नि में आहुति प्रदान किया करते थे, किस तरह आवश्यकतानुसार वे इन्द्र, वरुण, पूषा, सविता तथा पर्जन्य की स्तुति अपने ऐहिक कल्याण तथा आमुष्मिक मंगल की साधना के लिए किया करते थे, तो हमारे पास एक ही साधन है, वेदों का गाढ़ अनुशीलन-श्रुतियों का गहरा अध्ययन।” अपनी बात को सबल तर्कों के साथ सिद्ध करते हुए उपाध्याय जी आगे कहते हैं कि- “ये आर्यों के ही नहीं, प्रत्युत मानव जाति के सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं। मानव जाति के प्राचीन इतिहास, रहन-सहन, आचार-व्यवहार की जानकारी के लिए भी उतने ही उपादेय तथा आदरणीय हैं। वेद मानव जाति के विचारों को लिपिबद्ध करने वाले गौरवमय ग्रन्थों में सबसे प्राचीन माने जाते हैं। अतः अतीव अतीत काल में मानवों के व्यवहार तथा विचार का पता इन अमूल्य ग्रन्थों की पर्यालोचना से भली भाँति लग सकता है।” वेदों का सांस्कृतिक-महत्त्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि वैदिक संस्कृति सदाचार को जितना महत्त्व प्रदान करती है, उतना अन्य उपादानों को नहीं। व्यक्ति चाहे अद्वैतवादी हो चाहे द्वैतवादी, यदि व्यक्ति सदाचारी नहीं है, तो उसका अद्वैतवादी या द्वैतवादी होना निरर्थक है, वह तो बालू में से तेल निकालने के समान है। यदि व्यक्ति सदाचारी है, तो ईश्वर में अविश्वास या विश्वास का प्रश्न उठेगा ही नहीं। वेद के CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 59 शब्दों में ‘‘ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः’’ दुराचारी ऋत (सत्य) के पन्थ को पार कर ही नहीं सकता। सदाचारी व्यक्ति ही ‘ऋतपथ’ का अनुगामी है और जो ऋतपथ पर चल रहा है वह एक दिन उसे पार कर ही जायेगा तथा प्रभु का सामीप्य ग्रहण कर ही लेगा। वैदिक संस्कृति में ऋत या सदाचार का नियम महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि संस्कृति रूपी जीवन की नींव वेद हैं। (स) ज्योतिष ज्ञान की दृष्टि से महत्त्व :- वेद की प्रवृत्ति यज्ञ के सम्पादन के लिए है। यज्ञ का विधान विशिष्ट समयों की अपेक्षा रखता है। यज्ञ याग के लिए समय शुद्धि की बड़ी आवश्यकता रहती है। इसीलिए वैदिक आर्यों का ज्योतिष ज्ञान बहुत बढ़ा-चढ़ा था। नक्षत्र, तिथि, पक्ष, मास, ऋतु तथा सम्वत्सर—काल के समस्त खण्डों के साथ यज्ञ याग का विधान वेदों में पाया जाता है। जो व्यक्ति ज्योतिष को भली प्रकार से जानता है, वहीँ यज्ञ का वास्तविक ज्ञाता है। ज्योतिष शास्त्र के मुख्यतः दो भेद हैं— (१) गणित ज्योतिष (२) फलित ज्योतिष। गणित ज्योतिष- ऋग्वेद तथा यजुर्वेद दोनों में समान रूप से गणित ज्योतिष का विवेचन उपलब्ध होता है। गणित के योग-वियोग का आधार यजुर्वेदान्तर्गत निम्नलिखित मन्त्र में दृष्टव्य है— ‘एक॑या च दश॒भि॑श्च स्वभूते॒ द्वाभ्या॑मि॒ष्टये॑ विंश॒ती च॑। ति॒सृभि॑श्च॒ वह॑से त्रिं॒शता॑ च नि॒युद्भि॑र्वायवि॒ह ता विमु॑ञ्च॥’ (यजु० २७/३३) उपर्युक्त मन्त्र में ‘विमुञ्च’ शब्द द्वारा वियोग प्रक्रिया स्पष्ट होती है। गुणन- प्रक्रिया के लिए निम्नलिखित मन्त्र प्रस्तुत किया जा सकता है— ‘‘युवां देवात्रयः एकादशासः सत्यस्यददृशेपुरस्त्राता’’ (ऋ० १०.५७.२) अर्थात् (देवां) दिव्य गुणों को वहन करने वाले ११×३ = ३३ (सत्याः) सद्गुणों से सम्पन्न है। यजुर्वेद के एकमन्त्र चतस्त्रश्चमे से वर्ग प्रक्रिया पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है जैसे— २×२ = ४ होता है। वेदों में इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि के प्रयोग से योग-वियोगादि का दर्शन उपलब्ध होता है। हमारे वेदज्ञों की संख्या-गणित की अनेक प्रक्रियाएँ पाश्चात्य विद्वानों द्वारा ग्रहण कर ली गई। ऋक् संहिता (८/५६/२२) में हजार की संख्या का अंकन है। बीज-गणित तथा रेखा-गणित के नियमों तथा उपयोग की जानकारी वेदों से प्राप्त होती है। यज्ञीयस्तम्भादि के निर्माण में रेखा गणित का विशेष महत्त्व है। जैसे— रेखा गणित- इयं वेदिः परोअन्तः पृथिव्या अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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60 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता उपर्युक्त मन्त्र से वृत्त के व्यास तथा परिधि की परिभाषा का भी परिज्ञान होता है। यथा- यज्ञवेदी के पृथ्वी का चारों ओर का घेरा परिधि कहलाता है। व्यास- यज्ञवेदी को ऊपर से अन्त तक संयुक्त करने वाली रेखा "व्यास" कहलाती है। फलित ज्योतिष के परिज्ञान की दृष्टि से भी वेद अत्यन्त महत्त्वशाली हैं क्योंकि वेदों में फलित-ज्योतिष सम्बन्धी विवेचन भी पर्याप्त मात्रा में किया गया है। यजुर्वेद के मन्त्र "आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्न" से सूर्य के क्रान्तिवृत्त में गतिशील होने का पता चलता है। क्रान्तिवृत्त सूर्य का मार्ग है। इसके १२ भाग कर लिए गए हैं। यही बारह भाग ही बारह राशियाँ हैं। इसके अतिरिक्त वेदों में अन्य ग्रहों का भी विवेचन है। जैसे- 'शुक्राङ्गारक बुध बृहस्पति शनैश्चर राहु केतु सोम सहित आदित्यः पुरोगाः ग्रहाः प्रीयन्ताम्।' सूर्य चन्द्र के सदृश ही बृहस्पति तथा शुक्र को भी महत्त्वपूर्ण देव माना गया है। यजुर्वेद में राहु की स्तुति उपलब्ध होती है। इसी प्रकार नक्षत्रों तथा मुहूर्त आदि की भी पर्याप्त चर्चा वेदों में की गई है। आर्द्रा से द्वादश नक्षत्र वृष्टि के कारण होते हैं- द्वादश धून्यदगोह्यास्याऽऽतिथ्येरणन्भवः ससन्तः। (ऋ० ४.३३.७)। वेदों में शुभ नक्षत्रों के विधान का भी विवेचन है। वेद में सूर्याकर्षण के बल पर क्षितिज में नक्षत्र का वर्णन उपलब्ध होता है- "तिस्रोद्यावः सवितुर्द्वा उपस्थांएका यमस्यभुवने विराषाट्। अणिं न रथ्यममृताधि तस्थुरिह ब्रवीतुयतच्चिकेतत्। (ऋ० १.३५.६)'' वेदों में बीज रूप में विद्यमान ज्योतिष के तीनों स्कन्धों, सिद्धान्त, गणित तथा फलित का विकास बाद के युग में हुआ। (द) दार्शनिक दृष्टि से महत्त्व :- वेदों की दार्शनिक दृष्टि से भी महत्ता अत्यन्त व्यापक है। वेद ही समस्त भारतीय दर्शन का मूल स्रोत है। भारतीय दर्शन की विभिन्न विचारधाराओं का उद्गम स्थल वेद है। प्रत्येक विचारधारा के प्रमुख सिद्धान्तों का बीज वेदों में विद्यमान है। सभी भारतीय आस्तिक दर्शन तो अपना मूल वेद को स्वीकार करते ही हैं, साथ ही साथ नास्तिक दर्शन भी वैदिक विचारधारा को आधार रूप में ग्रहण करके अपने सिद्धान्तों की विवेचना करते हैं। वैशेषिक दर्शन के अनुसार- 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' (वै०सू० १.१.३)। आचार्य वाचस्पति मिश्र का कथन है कि महाप्रलय में नित्य सर्वज्ञ परमेश्वर वेद का प्रणयन कर सृष्टि के आदि में स्वयं ही सम्प्रदायों का प्रवर्तन करते हैं- "महाप्रलये तु ईश्वरेण वेदान् प्रणीय सृष्ट्यादौ स्वयमेव सम्प्रदायः प्रवर्त्यत एवेतिभावः" (न्यायवार्तिकतात्पर्य टीका)। बौद्ध दर्शन के आविर्भाव के पूर्व ही वैदिक साहित्य का प्रणयन हो चुका था, अतः इस दर्शन के निरूपण में भी वेदों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इस विषय पर पं०
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