वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ३६६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इत्येवमुक्त्वा मधुसूदनं वै<br> स कालनेमिः स्फुरिताधरोष्ठः।<br>गदां खगेन्द्रोपरि जातकोपो<br> मुमोच शैले कुलिशं यथेन्द्रः॥ ४५<br>तामापतन्तीं प्रसमीक्ष्य विष्णु-<br> र्घोरा गदां दानवबाहुमुक्ताम्।<br>चक्रेण चिच्छेद सुदुर्गतस्य<br> मनोरथं पूर्वकृतेव कर्म॥ ४६ | मधुसूदन भगवान् विष्णुसे ऐसा कहकर क्रोधसे अधरोष्ठको फड़काते हुए कालनेमिने, गरुड़पर अपनी गदा इस प्रकार फेंकी जैसे इन्द्र पर्वतपर वज्र फेंकते हैं। भगवान् विष्णुने दानवके हाथसे छूटी हुई उस भयदायिनी गदाको आते देखकर चक्रसे उसे ऐसे नष्ट कर दिया जैसे पूर्वकृत कर्म भाग्यहीन मनुष्यके मनोरथको नष्ट कर देता है॥ ४२—४६॥ |
| गदां छित्त्वा दानवाभ्याशमेत्य<br> भुजौ पीनौ सम्प्रचिच्छेद वेगात्।<br>भुजाभ्यां कृत्ताभ्यां दग्धशैलप्रकाशः<br> संदृश्येताप्यपरः कालनेमिः॥ ४७<br>ततोऽस्य माधवः कोपाच्छिरश्चक्रेण भूतले।<br>छित्त्वा निपातयामास पक्वं तालफलं यथा॥ ४८<br>तथा विबाहुर्विशिरा मुण्डतालो यथा वने।<br>तस्थौ मेरुरिवाकम्प्यः कबन्धः क्ष्माधरेश्वरः॥ ४९<br>तं वैनतेयोऽप्युरसा खगोत्तमो<br> निपातयामास मुने धरण्याम्।<br>यथाऽम्बराद् बाहुशिरः प्रनष्ट-<br> बलं महेन्द्रः कुलिशेन भूम्याम्॥ ५०<br>तस्मिन् हते दानवसैन्यपाले<br> सम्पीड्यमानास्त्रिदशैस्तु दैत्याः।<br>विमुक्तशस्त्रात्तकचर्मवस्त्राः<br> सम्प्राद्रवन् बाणमृतेऽसुरेन्द्राः॥ ५१ | गदाको काटकर विष्णुभगवान् दानवके निकट चले गये और उन्होंने शीघ्रतासे उसकी मोटी-मोटी बाहुओंको काट डाला। भुजाओंके कट जानेपर कालनेमि दूसरे दग्ध पर्वतके समान दिखलायी पड़ने लगा। उसके बाद माधव (लक्ष्मीपति)-ने क्रोधपूर्वक चक्रसे उसके सिरको काटकर पके हुए ताड़के फलके समान धरतीपर गिरा दिया। वनमें ढूँठे तरकुलके समान बाहुओं एवं सिरसे हीन कबन्ध अचल पर्वतराज मेरुके समान खड़ा रहा। मुने! जैसे महेन्द्रने वज्रसे बाँह और सिररहित बलको पृथिवीपर गिराया था, उसी प्रकार पक्षिश्रेष्ठ गरुड़ने अपनी छातीसे धक्का देकर उस (कबन्ध)-को पृथ्वीपर गिरा दिया। उस दानव-सेनापति (कालनेमि)-के मारे जानेपर बाणासुरके सिवा देवोंसे अत्यन्त पीड़ित सभी दैत्य शस्त्र, पट्टा, ढाल और वस्त्रको छोड़कर भाग गये॥ ४७—५१॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७३॥
चौहत्तरवाँ अध्याय
बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना, बलिको प्रह्लादका उपदेश
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— |
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| संनिवृत्ते ततो बाणे दानवाः सत्वरं पुनः।<br>निवृत्ता देवतानां च सशस्त्रा युद्धलालसाः॥ १ | —उसके बाद बाणासुरके लौट आनेपर फिर दानव तुरंत शस्त्र लेकर देवताओंसे युद्ध करनेकी इच्छासे लौट पड़े। |
| विष्णुरप्यमितौजस्तं ज्ञात्वाऽजेयं बलेः सुतम्।<br>प्राह्यामन्त्र्य सुरान् सर्वान् युध्यध्वं विगतज्वराः॥ २ | अत्यधिक तेजस्वी विष्णुने बलिके पुत्र बाणको अजेय जान करके देवताओंको बुलाकर कहा—आपलोग निर्भय होकर (सतर्कतासे) |
अध्याय ७४] बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना ३६७
| विष्णुनाऽथ समादिष्टा देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>युयुधुर्दानवैः सार्धं विष्णुस्त्वन्तरधीयत॥ ३<br><br>माधवं गतमाज्ञाय शुक्नो बलिमुवाच ह।<br>गोविन्देन सुरास्त्यक्तास्त्वं जयस्वाधुना बले॥ ४<br>स पुरोहितवाक्येन प्रीतो याते जनार्दने।<br>गदामादाय तेजस्वी देवसैन्यमभिद्रुतः॥ ५<br>बाणो बाहुसहस्रेण गृह्य प्रहरणान्यथ।<br>देवसैन्यमभिद्रुत्य निजघान सहस्रशः॥ ६<br>मयोऽपि मायामास्थाय तैस्तै रूपान्तरैर्मुने।<br>योधयामास बलवान् सुराणां च वरूथिनीम्॥ ७<br>विद्युज्जिह्वः पारिभद्रो वृषपर्वा शतेक्षणः।<br>विपाको विक्षरः सैन्यं तेऽपि देवानुपाद्रवन्॥ ८<br>ते हन्यमाना दितिजैर्देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>गते जनार्दने देवे प्रायशो विमुखाऽभवन्॥ ९<br>तान् प्रभग्नान् सुरगणान् बलिबाणपुरोगमाः।<br>पृष्ठतश्चाद्रवन् सर्वे त्रैलोक्यविजिगीषवः॥ १०<br>सम्बाध्यमाना दैतेयैर्देवाः सेन्द्रा भयातुराः।<br>त्रिविष्टपं परित्यज्य ब्रह्मलोकमुपागताः॥ ११<br>ब्रह्मलोकं गतेष्वित्थं सेन्द्रेष्वपि सुरेषु वै।<br>स्वर्गभोक्ता बलिर्जातः सपुत्रभ्रातृबान्धवः॥ १२<br>शक्रोऽभूद् भगवान् ब्रह्मन् बलिबाणो यमोऽभवत्।<br>वरुणोऽभून्मयः सोमो राहुर्ह्लादो हुताशनः॥ १३<br><br>स्वर्भानुरभवत् सूर्यः शुक्रश्चासीद् बृहस्पतिः।<br>येऽन्येऽप्यधिकृता देवास्तेषु जाताः सुरारयः॥ १४<br><br>पञ्चमस्य कलेरादौ द्वापरान्ते सुदारुणः।<br>देवासुरोऽभूत् संग्रामो यत्र शक्रोऽप्यभूद् बलिः॥ १५<br><br>पातालाः सप्त तस्यासन् वशे लोकत्रयं तथा।<br>भूर्भुवःस्वरिति ख्यातं दशलोकाधिपो बलिः॥ १६<br>स्वर्गे स्वयं निवसति भुञ्जन् भोगान् सुदुर्लभान्।<br>तत्रोपासन्त गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः॥ १७ | युद्ध कीजिये। विष्णुसे आदेश पाकर इन्द्र आदि देवता दानवोंके साथ युद्ध करने लगे। किंतु विष्णु अदृश्य हो गये। विष्णुको वहाँसे चला गया जानकर शुक्रने बलिसे कहा—बले! विष्णुने देवताओंको अकेले युद्धके लिये छोड़ दिया है। अब तुम जय प्राप्त करो॥ १-४॥<br><br>दुष्टजनोंको ताड़ना देनेवाले भगवान् विष्णुके चले जानेपर तेजस्वी बलि पुरोहित (शुक्राचार्य)-के वाक्यसे हर्षित हो गदा लेकर देवसेनाकी ओर दौड़ा। बाणासुरने हजार हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर देवसेनापर चढ़ाई कर दी और हजारोंका वध कर दिया। मुने! बलवान् मय दानव भी मायाके द्वारा विभिन्न रूपोंको धारणकर अमरोंकी सेनाके साथ युद्ध करने लगा। विद्युज्जिह्व, पारिभद्र, वृषपर्वा, शतेक्षण, विपाक तथा विक्षर भी देवताओंकी सेनापर टूट पड़े॥ ५-८॥<br><br>भगवान् विष्णुके चले जानेपर इन्द्र आदि देवता दैत्योंके द्वारा मारे जानेपर युद्धसे पराङ्मुख हो गये। तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छावाले बलि एवं बाण आदि सभी (दैत्य) भागते हुए देवताओंके पीछे दौड़ पड़े। दैत्योंके द्वारा पीड़ित इन्द्र आदि देवता डरकर और स्वर्गको छोड़कर ब्रह्मलोक चले गये। फिर तो इन्द्रके साथ ही देवताओंके ब्रह्मलोक चले जानेपर बलि अपने पुत्र, भाई और बान्धवोंके साथ स्वर्गका भोक्ता हो गया॥ ९-१२॥<br><br>ब्रह्मन्! भाग्यशाली बलि इन्द्र हुआ और बाण यम बना। मय दानव वरुण बन गया, राहु चन्द्र बना और ह्लाद अग्नि बन गया। केतु सूर्य बना और शुक्राचार्य बृहस्पति बन गये। इसी प्रकार अन्य विभिन्न अधिकार-प्राप्त देवताओंके पदोंपर असुरोंने अधिकार जमा लिया। पाँचवें कलियुगके प्रारम्भ और द्वापरयुगके आखिरी भागमें देवताओं और दैत्योंका भयङ्कर युद्ध हुआ, जब कि बलि इन्द्र बन गया। सातों पाताल और भूः, भुवः, स्वः नामके प्रसिद्ध तीनों लोक उसके वशमें हो गये थे। इस प्रकार बलि दस लोकोंका शासक बन गया था॥ १३-१६॥<br><br>इन्द्र बना हुआ बलि अत्यन्त दुर्लभ भोगोंको स्वयं भोगता हुआ स्वर्गमें रहने लगा। वहाँ विश्वावसु आदि |
७७- प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिका विष्णुको दुर्वचन, प्रह्लादद्वारा बलिको शाप और अनुनय करनेपर उपदेश
| ३६८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तिलोत्तमाद्याप्सरसो नृत्यन्ति सुरतापस।<br>वादयन्ति च वाद्यानि यक्षविद्याधरादयः॥ १८<br><br>विविधानपि भोगांश्च भुञ्जन् दैत्येश्वरो बलिः।<br>सस्मार मनसा ब्रह्मन् प्रह्लादं स्वपितामहम्॥ १९<br><br>संस्मृतो नृमणा चासौ महाभागवतोऽसुरः।<br>समभ्यागात् त्वरायुक्तः पातालात् स्वर्गमव्ययम्॥ २० | गन्धर्व उसकी सेवा करने लगे। देवर्षे! तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ (उसे प्रसन्न करनेके लिये) नृत्य किया करती थीं और यक्ष तथा विद्याधर आदि बाजे बजाते थे। ब्रह्मन्! विविध भोगोंका भोग करते हुए दैत्येश्वर बलिने अपने पितामह प्रह्लादका मनसे स्मरण किया। पौत्र (बलि)-के स्मरण करते ही वे महान् भागवत (विष्णुके परम भक्त) असुर प्रह्लादजी पातालसे अक्षय स्वर्गलोकमें चले आये॥ १७—२०॥ |
| तमागतं समीक्ष्यैव त्यक्त्वा सिंहासनं बलिः।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ववन्दे चरणावुभौ॥ २१<br><br>पादयोः पतितं वीरं प्रह्लादस्त्वरितो बलिम्।<br>समुत्थाप्य परिष्वज्य विवेश परमासने॥ २२<br><br>तं बलिः प्राह भोस्तात त्वत्प्रसादात् सुरा मया।<br>निर्जिताः शक्रराज्यं च हृतं वीर्यबलान्मया॥ २३<br><br>तदिदं तात मद्वीर्यविनिर्जितसुरोत्तमम्।<br>त्रैलोक्यराज्यं भुङ्क्ष्व त्वं मयि भृत्ये पुरःस्थिते॥ २४ | उन्हें आया हुआ देखते ही बलिने सिंहासन छोड़कर और हाथ जोड़कर उनके चरणोंकी वन्दना की। प्रह्लाद चरणोंमें पड़े हुए वीर बलिको जल्दीसे उठाकर और गले लगाकर उचित सुन्दर आसनपर बैठ गये। बलिने उनसे कहा—अये तात! मैंने आपके पुण्य-प्रसादसे (प्राप्त) पराक्रम और बलसे देवताओंको जीत लिया और इन्द्रके राज्यको छीन लिया है। तात! आप मेरे पराक्रमसे जीते गये देवोंवाले इन उत्तम तीनों लोकोंके राज्यका भोग करें और मैं आपके सामने नौकर बनकर रहूँ॥ २१—२४॥ |
| एतावता पुण्ययुतः स्याम तात यत् स्वयम्।<br>त्वदङ्घ्रिपूजाभिरतस्त्वदुच्छिष्टान्नभोजनः॥ २५<br><br>न सा पालयतो राज्यं धृतिर्भवति सत्तम।<br>या धृतिर्गुरुशुश्रूषां कुर्वतो जायते विभो॥ २६<br><br>ततस्तदुक्तं बलिना वाक्यं श्रुत्वा द्विजोत्तम।<br>प्रह्लादः प्राह वचनं धर्मकामार्थसाधनम्॥ २७<br><br>मया कृतं राज्यमकण्टकं पुरा<br> प्रशासिता भूः सुहृदोऽनुपूजिताः।<br>दत्तं यथेष्टं जनितास्तथात्मजाः<br> स्थितो बले सम्प्रति योगसाधकः॥ २८ | तात! इस प्रकार आपके चरणोंकी पूजासे और आपके जूठे अन्नका भोजन करनेसे मैं पुण्यवान् हो जाऊँगा। सत्तम! विभो! राज्यका पालन करनेवाले शासकमें वह धीरता नहीं होती, जो धीरता गुरुकी सेवा करनेवालोंमें होती है। द्विजोत्तम! उसके बाद प्रह्लादने बलिके कहे वचनको सुनकर धर्म, अर्थ और कामका साधक वचन कहा। बलिराज! मैंने पहले शत्रुओंकी विघ्न-बाधासे रहित राज्य किया है। (मैं) पृथ्वीका शासन और मित्रोंका सत्कार कर चुका हूँ, इच्छानुसार दान दे चुका हूँ। (गृहस्थ-धर्मके नाते) मैंने पुत्रोंको भी उत्पन्न किया है। किंतु (इन सबसे शान्ति न पाकर) इस समय मैं योगसाधक बन गया हूँ॥ २५—२८॥ |
| गृहीतं पुत्र विधिवन्मया भूयोऽर्पितं तव।<br>एवं भव गुरूणां त्वं सदा शुश्रूषणे रतः॥ २९<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं करे त्वादाय दक्षिणे।<br>शाक्रे सिंहासने ब्रह्मन् बलिं तूर्णं न्यवेशयत्॥ ३०<br><br>सोपविष्टो महेन्द्रस्य सर्वरत्नमये शुभे।<br>सिंहासने दैत्यपतिः शुशुभे मघवानिव॥ ३१ | पुत्र! मैंने तुम्हारे दिये (राज्य)-को विधिपूर्वक ग्रहणकर पुनः तुमको दे दिया। तुम गुरुओंकी सेवामें इसी प्रकार सदा लगे रहो। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) ब्रह्मन्! ऐसा वचन कहकर (प्रह्लादने बलिका) दाहिना हाथ पकड़कर उसे तुरंत इन्द्रके सिंहासनपर आसीन करा दिया। महेन्द्रके सभी रत्नोंसे बने शुभ सिंहासनपर बैठा हुआ वह दैत्यपति बलि इन्द्रके समान शोभित |
अध्याय ७४] बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना [३६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तत्रोपविष्टश्चैवासौ कृताञ्जलिपुटो नतः।<br>प्रह्लादं प्राह वचनं मेघगम्भीरया गिरा॥ ३२ | हुआ। उसपर बैठनेके बाद उसने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर मेघके गर्जनके समान गम्भीर वाणीमें प्रह्लादसे कहा॥ २९—३२॥ |
| यन्मया तात कर्तव्यं त्रैलोक्यं परिरक्षता।<br>धर्मार्थकाममोक्षेष्वस्तदादिशतु मे भवान्॥ ३३<br><br>तद्वाक्यसमकालं च शुक्रः प्रह्लादमब्रवीत्।<br>यद्युक्तं तन्महाबाहो वदस्वाद्योत्तरं वचः॥ ३४<br><br>वचनं बलिशुक्राभ्यां श्रुत्वा भागवतोऽसुरः।<br>प्राह धर्मार्थसंयुक्तं प्रह्लादो वाक्यमुत्तमम्॥ ३५<br><br>यदायत्यां क्षमं राजन् यद्धितं भुवनस्य च।<br>अविरोधेन धर्मस्य अर्थस्योपार्जनं च यत्॥ ३६<br><br>सर्वसत्त्वानुगमनं कामवर्गफलं च यत्।<br>परत्रेह च यच्छ्रेयः पुत्र तत्कर्म आचर॥ ३७<br><br>यथा श्लाघ्यं प्रयास्यद्य यथा कीर्तिर्भवेत्तव।<br>यथा नायशसो योगस्तथा कुरु महामते॥ ३८ | तात! तीनों लोकोंकी रक्षा करते हुए जो मेरे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—(इन चारों पुरुषार्थों)-के लिये करणीय कार्य है, उसके लिये आप मुझे आदेश दें। उस (बलि)-के वाक्यके साथ ही शुक्रने (भी) प्रह्लादसे कहा—महाबाहो! जो उचित हो वह उत्तर दीजिये। विष्णुके भक्त प्रह्लादने बलि और शुक्रकी बात सुनकर धर्म और अर्थसे युक्त श्रेष्ठ वचन कहा—पुत्र! भविष्यके लिये जो उपयुक्त हो, संसारके लिये जो हितकारी हो और धर्मके अनुकूल जो अर्थका उपार्जन और सभी प्राणियोंके अनुकूल जो कामवर्गका फल है एवं इस लोक और परलोकमें जो कल्याणकारी कर्म हो उसका आचरण करो। महामते! तुम जैसे प्रशंसनीय बन सको तथा जैसे तुम्हें यश प्राप्त हो एवं अकीर्ति न हो वैसे ही कर्तव्यको किया करो॥ ३३—३८॥ |
| एतदर्थं श्रियं दीप्तां काङ्क्षन्ते पुरुषोत्तमाः।<br>येनैतानि गृहेऽस्माकं निवसन्ति सुनिर्वृताः॥ ३९<br><br>कुलजो व्यसने मग्नः सखा चार्थबहिः कृतः।<br>वृद्धो ज्ञातिर्गुणी विप्रः कीर्तिश्च यशसा सह॥ ४०<br><br>तस्माद् यथैते निवसन्ति पुत्र<br>राज्यस्थितस्येह कुलोद्गताद्याः।<br>तथा यतस्वामलसत्त्वचेष्ट<br>यथा यशस्वी भविताऽसि लोके॥ ४१<br><br>भूम्यां सदा ब्राह्मणभूषितायां<br>क्षत्रान्वितायां दृढवापिताताम्।<br>शुश्रूषणासक्तसमुद्भवाया-<br>मृद्धिं प्रयान्तीह नराधिपेन्द्राः॥ ४२ | उत्तम पुरुष उत्कृष्ट लक्ष्मीकी अभिलाषा इसीलिये करते हैं कि विपत्तिमें पड़ा हुआ अच्छे कुलका व्यक्ति, धनहीन मित्र, वृद्ध, ज्ञाति, गुणी ब्राह्मण एवं यशोदायिनी कीर्ति उनके गृहमें शान्तिपूर्वक निवास कर सकें। अतः हे पवित्र विचार एवं चेष्टावाले पुत्र! राज्यके स्थिर हो जानेपर जैसे (उपर्युक्त) कुलोत्पन्नादि (तुम्हारे गृहमें) रह सकें एवं जैसे तुम लोकमें यशस्वी हो सको वैसा ही प्रयत्न करो। पृथ्वीके सदा ब्राह्मणोंसे सुशोभित होने, क्षत्रियोंसे सनाथ होने, (वैश्योंद्वारा) भलीभाँति (जोते)-बोये जाने तथा सेवारत (शूद्रों)-से सम्पन्न होनेपर अच्छे राजाओंको समृद्धि प्राप्त होती है॥ ३९—४२॥ |
| तस्माद् द्विजाग्र्याः श्रुतिशास्त्रयुक्ता<br>नराधिपांस्ते प्रतियाजयन्तु।<br>दिव्यैर्यजन्तु ऋतुभिर्द्विजेन्द्रा<br>यज्ञाग्निधूमेन नृपस्य शान्तिः॥ ४३<br><br>तपोऽध्ययनसम्पन्ना याजनाध्यापने रताः।<br>सन्तु विप्रा बले पूज्यास्त्वत्तोऽनुज्ञामवाप्य हि॥ ४४ | इसलिये (तुम्हारे शासनमें) वेद-शास्त्रसे सम्पन्न उत्तम ब्राह्मण राजाओंसे यज्ञ करवावें एवं श्रेष्ठ द्विजगण दिव्य यज्ञ किया करें। यज्ञकी अग्निके धूएँसे राजाको शान्ति मिलती है। बले! तपस्या और वेदाध्ययनसे संयुक्त यजन और अध्यापनमें लगे रहनेवाले ब्राह्मण तुम्हारी |
| ३७० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७५ |
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| स्वाध्याययज्ञनिरता दातारः शस्त्रजीविनः।<br>क्षत्रियाः सन्तु दैत्येन्द्र प्रजापालनधर्मिणः॥ ४५<br><br>यज्ञाध्ययनसम्पन्ना दातारः कृषिकारिणः।<br>पाशुपाल्यं प्रकुर्वन्तु वैश्या विपणिजीविनः॥ ४६<br>ब्राह्मणक्षत्रियविशां सदा शुश्रूषणे रताः।<br>शूद्राः सन्त्वसुरश्रेष्ठ तवाज्ञाकारिणः सदा॥ ४७<br><br>यदा वर्णाः स्वधर्मस्था भवन्ति दितिजेश्वर।<br>धर्मवृद्धिस्तदा स्याद्वै धर्मवृद्धौ नृपोदयः॥ ४८<br><br>तस्माद्वर्णाः स्वधर्मस्थास्त्वया कार्याः सदा बले।<br>तद्वृद्धौ भवतो वृद्धिस्तद्धानौ हानिरुच्यते॥ ४९<br><br>इत्थं वचः श्राव्य महासुरेन्द्रो<br>बलिं महात्मा स बभूव तूष्णीम्।<br>ततो यदाज्ञापयसे करिष्ये<br>इत्थं बलिः प्राह वचो महर्षे॥ ५० | अनुमति पाकर पूजित हों। दैत्येन्द्र! क्षत्रिय स्वाध्याय एवं यज्ञमें निरत, दान देनेवाले, शस्त्र-जीवी तथा प्रजा-पालन करनेवाले हों। वैश्यगण यज्ञाध्ययनसे सम्पन्न, दाता, कृषिकर्त्ता एवं वाणिज्यजीवी हों तथा पशुपालनका कर्म करें॥ ४३-४६॥<br><br>असुरश्रेष्ठ! शूद्रगण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवामें सदा लगे रहें और तुम्हारे आदेशका सदा पालन करें। दितिजेश्वर! जब सभी वर्णके लोग अपने-अपने धर्ममें स्थित रहते हैं तब निश्चय ही धर्मकी वृद्धि होती है और धर्मकी वृद्धि होनेपर राजाकी उन्नति होती है। इसलिये बले! तुम सभी वर्णोंको उनके धर्ममें सदा लगाये रहो। उसकी (स्वधर्मकी) वृद्धिसे राजाकी वृद्धि होती है। उसकी हानिसे हानि कही गयी है। महासुरेन्द्र महात्मा प्रह्लाद बलिसे ऐसा कहकर मौन हो गये। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) महर्षे! उसके बाद बलिने इस प्रकार कहा—आपने जो आदेश दिया, उसीके अनुसार मैं कार्य करूँगा॥ ४७-५०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७४॥
पचहत्तरवाँ अध्याय
त्रैलोक्य-लक्ष्मीका बलिके यहाँ आना, श्वेत लक्ष्मी आदिकी उत्पत्ति, निधियोंका वर्णन, जयश्रीका बलिमें मिलना और बलिकी समृद्धिका वर्णन
</div>| पुलस्त्य उवाच<br>ततो गतेषु देवेषु ब्रह्मलोकं प्रति द्विज।<br>त्रैलोक्यं पालयामास बलिर्धर्मान्वितः सदा॥ १<br><br>कलिस्तदा धर्मयुतं जगद् दृष्ट्वा कृते यथा।<br>ब्रह्माणं शरणं भेजे स्वभावस्य निषेवणात्॥ २<br><br>गत्वा स ददृशे देवं सेन्द्रैर्देवैः समन्वितम्।<br>स्वदीप्त्या द्योतयन्तं च स्वदेशं ससुरासुरम्॥ ३<br><br>प्रणिपत्य तमाहाथ तिष्यो ब्रह्माणमीश्वरम्।<br>मम स्वभावो बलिना नाशितो देवसत्तम॥ ४ | **पुलस्त्यजी बोले—**द्विज! देवोंके ब्रह्मलोक चले जानेपर बलि सदा धर्मसे युक्त (धार्मिक) रहते हुए तीनों लोकोंका पालन करने लगा। उस समय संसारको सत्ययुगकी भाँति धर्मसे सम्पन्न हुआ देखकर कलियुग अपने कर्त्तव्यका सेवन करनेके हेतु ब्रह्माकी शरणमें गया। वहाँ जाकर उसने ब्रह्माको इन्द्र आदि देवोंके साथ देखा। वे अपनी प्रभासे सुरों और असुरोंसे युक्त अपने लोकको प्रदीपित कर रहे थे। उन ईश्वर ब्रह्माको प्रणामकर कलिने उनसे कहा—देवश्रेष्ठ! बलिने मेरे स्वाभाविक कर्मको नष्ट कर दिया है॥ १-४॥ |
| अध्याय ७५ ] | त्रैलोक्य-लक्ष्मीका बलिके यहाँ आना, श्वेत लक्ष्मी आदिकी उत्पत्ति | ३७१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तं प्राह भगवान् योगी स्वभावं जगतोऽपि हि।<br>न केवलं हि भवतो हृतं तेन बलीयसा ॥ ५<br>पश्यस्व तिष्य देवेन्द्रं वरुणं च समारुतम्।<br>भास्करोऽपि हि दीनत्वं प्रयातो हि बलाद् बलेः ॥ ६<br>न तस्य कश्चित् त्रैलोक्ये प्रतिषेद्धाऽस्ति कर्मणः।<br>ऋते सहस्रं शिरसं हरिं दशशताङ्घ्रिकम् ॥ ७<br>स भूमिं च तथा नाकं राज्यं लक्ष्मीं यशोऽव्ययः।<br>समाहरिष्यति बलेः कर्तुः सद्धर्मगोचरम् ॥ ८ | योगी भगवान् ब्रह्माने उससे कहा—केवल तुम्हारा ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण लोकका स्वभाव उस बलशालीने हरण कर लिया है। कले! मरुत्के साथ वरुण और देवेन्द्रको देखो। बलिके पराक्रमसे सूर्य भी निस्तेज-से हो गये हैं। सहस्रशीर्षा तथा सहस्रपाद (विष्णु)-के सिवा तीनों लोकोंमें उसके कर्मको बंद करनेवाला कोई नहीं दीखता है। वे अविनाशी बलिद्वारा किये गये सद्धर्मके हेतु मिली हुई उसकी भूमि, स्वर्ग, राज्य, लक्ष्मी एवं यशका अपहरण करेंगे ॥ ५-८ ॥ |
| इत्येवमुक्तो देवेन ब्रह्मणा कलिरव्ययः।<br>दीनान् दृष्ट्वा स शक्रादीन् विभीतकवनं गतः ॥ ९<br>कृतः प्रावर्त्तत तदा कलेर्नाशाज्जगत्त्रये।<br>धर्मोऽभवच्चतुष्पादश्चातुर्वर्ण्येऽपि नारद ॥ १०<br>ततोऽहिंसा च सत्यं च शौचमिन्द्रियनिग्रहः।<br>दया दानं त्वानृशंस्यं शुश्रूषा यज्ञकर्म च ॥ ११<br>एतानि सर्वजगतः परिव्याप्य स्थितानि हि।<br>बलिना बलवान् ब्रह्मंस्तिष्योऽपि हि कृतः कृतः ॥ १२ | भगवान् ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर अव्यय कलि, इन्द्र आदि देवताओंको चिन्तित हुआ देखकर विभीतक वनमें चला गया। नारदजी! कलिके अदृश्य हो जानेसे तीनों लोकोंमें सत्ययुग प्रवर्तित हो गया। चारों वर्णोंमें चारों चरणोंसे धर्म व्याप्त हो गया। तपस्या, अहिंसा, सत्य, पवित्रता, इन्द्रियनिग्रह, दया, दान, मृदुता, सेवा और यज्ञकार्य—ये सभी समस्त जगत्में छा गये। ब्रह्मन्! बलिने बलशाली कलिको भी सत्ययुग बना दिया ॥ ९-१२ ॥ |
| स्वधर्मस्थायिनो वर्णा ह्याश्रमांश्चाविशन् द्विजाः।<br>प्रजापालनधर्मस्थाः सदैव मनुजर्षभाः ॥ १३<br>धर्मोत्तरे वर्तमाने ब्रह्मन्नस्मिञ्जगत्त्रये।<br>त्रैलोक्यलक्ष्मीर्वरदा त्वायाता दानवेश्वरम् ॥ १४<br>तामागतां निरीक्ष्यैव सहस्राक्षाश्रियं बलिः।<br>पप्रच्छ काऽसि मां ब्रूहि केनास्यर्थेन चागता ॥ १५<br>सा तद्वचनमाकर्ण्य प्राह श्रीः पद्ममालिनी।<br>बले शृणुष्व याऽस्मि त्वामायाता महिषी बलात् ॥ १६ | सभी वर्ण अपने-अपने धर्ममें स्थित हो गये। द्विजगण अपने-अपने आश्रमोंका पालन करने लगे तथा राजा प्रजापालनरूपी धर्मका आचरण करने लगे। ब्रह्मन्! इन तीनों लोकोंके धर्म-परायण होनेपर वरदायिनी त्रैलोक्यलक्ष्मी दानवराज बलिके पास आयीं। इन्द्रकी लक्ष्मीको उपस्थित हुई देखकर बलिने पूछा—मुझे यह बतलाओ कि तुम कौन हो और किस उद्देश्यसे आयी हो। कमलकी मालासे अलंकृत लक्ष्मीने उसकी बात सुनकर कहा—बले! मैं हठात् तुम्हारे पास आयी हूँ; मैं जो (स्त्री) हूँ उसे सुनो—॥ १३-१६ ॥ |
| अप्रमेयबलो देवो योऽसौ चक्रगदाधरः।<br>तेन त्यक्तस्तु मघवा ततोऽहं त्वामिहागता ॥ १७<br><br>स निर्ममे युवतयश्चतस्रो रूपसंयुताः।<br>श्वेताम्बरधरा चैव श्वेतस्रगनुलेपना ॥ १८<br><br>श्वेतवृन्दारकारूढा सत्त्वाढ्या श्वेतविग्रहा।<br>रक्ताम्बरधरा चान्या रक्तस्रगनुलेपना ॥ १९ | अमित शक्तिशाली चक्र और गदाको धारण करनेवाले देव विष्णुने इन्द्रको छोड़ दिया है। अतः मैं यहाँ तुम्हारे पास आयी हूँ। उन्होंने (विष्णुने) रूपसे सम्पन्न चार युवतियोंकी सृष्टि की। (पहली युवती) सत्त्वप्रधाना, श्वेतवर्णकी शरीरवाली, श्वेतवर्णका वस्त्र धारण करनेवाली, श्वेतमाल्य और अनुलेपनसे युक्त एवं श्वेत गजपर आरूढ़ थी। (दूसरी युवती) रजोगुणप्रधाना, रक्तवर्णकी शरीरवाली, रक्तवर्णके वस्त्रको धारण करनेवाली, रक्तवर्णके माल्य और अनुलेपनसे युक्त |
| ३७२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७५ |
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| रक्तवाजिसमारूढा रक्ताङ्गी राजसी हि सा।<br>पीताम्बरा पीतवर्णा पीतमाल्यानुलेपना ॥ २०<br>सौवर्णस्यन्दनचरा तामसं गुणमाश्रिता।<br>नीलाम्बरा नीलमाल्या नीलगन्धानुलेपना ॥ २१<br>नीलवृषसमारूढा त्रिगुणा सा प्रकीर्तिता।<br>या सा श्वेताम्बरा श्वेता सत्त्वाढ्या कुञ्जरस्थिता ॥ २२<br>सा ब्रह्माणं समायाता चन्द्रं चन्द्रानुगानपि।<br>या रक्ता रक्तवसना वाजिस्था रजसान्विता ॥ २३<br>तां प्रादाद् देवराजाय मनवे तत्समेषु च।<br>पीताम्बरा या सुभगा रथस्था कनकप्रभा ॥ २४<br>प्रजापतिभ्यस्तां प्रादाच्छुक्राय च विशःसु च।<br>नीलवस्त्राऽलिसदृशी या चतुर्थी वृषस्थिता ॥ २५<br>सा दानवान् नैर्ऋतांश्च शूद्रान् विद्याधरानपि।<br>विप्राद्याः श्वेतरूपां तां कथयन्ति सरस्वतीम् ॥ २६ | तथा रक्तवर्णके अश्वपर आरूढ़ थी। (तीसरी युवती) तमोगुण-प्रधाना, पीतवर्णके शरीरवाली, पीतवर्णका वस्त्र धारण करनेवाली, पीतवर्णकी माला और अनुलेपनसे युक्त तथा सुवर्णके बने रथपर आरूढ़ थी। (चौथी युवती) त्रिगुण-प्रधाना, नील शरीरवाली, नीलेवर्णका वस्त्र धारण करनेवाली एवं नीले वर्णकी माला, चन्दन और अनुलेपनसे युक्त तथा नील वर्णके वृषपर आरूढ़ थी। सत्त्वप्रधाना, श्वेतवर्णकी शरीरवाली, श्वेतवस्त्र धारण करनेवाली हाथीपर आरूढ़ (युवती) ब्रह्मा, चन्द्रमा एवं चन्द्रमाके अनुयायियोंके पास चली गयी। रजोगुणसे युक्त, रक्तवर्णकी शरीरवाली, रक्तवस्त्र धारण करनेवाली एवं घोड़ेपर आरूढ़ युवतीको (उन्होंने) इन्द्र, मनु तथा उनके समानवाले लोगोंको प्रदान किया। कनकवर्णकी शरीरवाली, पीतवर्णके वस्त्र धारण करनेवाली, सौभाग्यवती, रथपर आरूढ़ा युवतीको (उन्होंने) प्रजापतियों, शुक्र एवं वैश्योंको दिया। नीलवर्णके वस्त्रको धारण करनेवाली, भ्रमरके समान, वृषपर स्थित चौथी (युवती) दानवों, नैर्ऋतों, शूद्रों एवं विद्याधरोंके पास चली गयी। उस श्वेतरूपाको विप्र आदि सरस्वती कहते हैं॥ १७—२६॥ | | स्तुवन्ति ब्रह्मणा सार्धं मखे मन्त्रादिभिः सदा।<br>क्षत्रिया रक्तवर्णां ता जयश्रीमिति शंसिरे ॥ २७<br>सा चेन्द्रेणासुरश्रेष्ठ मनुना च यशस्विनी।<br>वैश्यास्तां पीतवसनां कनकाङ्गीं सदैव हि ॥ २८<br>स्तुवन्ति लक्ष्मीमित्येवं प्रजापालास्तथैव हि।<br>शूद्रास्तां नीलवर्णाङ्गीं स्तुवन्ति च सुभक्तितः ॥ २९<br>श्रिया देवीति नाम्ना तां समं दैत्यैश्च राक्षसैः।<br>एवं विभक्तास्ता नार्यस्तेन देवेन चक्रिणा ॥ ३० | यज्ञमें वे ब्रह्माके सहित उसका मन्त्रादिसे सदा स्तुति करते हैं। क्षत्रियजन उस रक्तवर्णाको जयश्री कहते हैं। असुरश्रेष्ठ! वह इन्द्र तथा मनुके साथ यशोमती हुई। वैश्य तथा प्रजापतिगण उस पीतवसना कनकाङ्गीकी स्तुति सदा लक्ष्मीके नामसे करते हैं। दैत्यों एवं राक्षसोंके साथ शूद्रगण श्रीदेवीके नामसे भक्तिपूर्वक उस नीलवर्णाङ्गीकी स्तुति करते हैं। इस प्रकार उन चक्र धारण करनेवाले देवने उन नारियोंका विभाजन किया॥ २७—३०॥ | | एतासां च स्वरूपस्थास्तिष्ठन्ति निधयोऽव्ययाः।<br>इतिहासपुराणानि वेदाः साङ्गास्तथोक्तयः ॥ ३१<br>चतुःषष्टिकलाः श्वेता महापद्मो निधिः स्थितः।<br>मुक्तासुवर्णरजतं रथाश्वगजभूषणम् ॥ ३२<br>शस्त्रास्त्रादिकवस्त्राणि रक्ता पद्मो निधिः स्मृतः।<br>गोमहिष्यः खरोष्ट्रं च सुवर्णाम्बरभूमयः ॥ ३३<br>ओषध्यः पशवः पीता महानीलो निधिः स्थितः।<br>सर्वासामपि जातीनां जातिरेका प्रतिष्ठिता ॥ ३४ | अक्षय निधियाँ इनके स्वरूपमें स्थित हैं। इतिहास, पुराण, साङ्ग वेद, स्मृतियाँ, चौंसठ कलाएँ तथा महापद्म निधि श्वेताङ्गीके अन्तर्गत हैं। मुक्ता, सुवर्ण, रजत, रथ, अश्व, गज, भूषण, शस्त्र, अस्त्र एवं वस्त्रस्वरूप पद्मानिधि रक्ताङ्गीके अन्तर्गत हैं। गौ, भैंस, गर्दभ, उष्ट्र, सुवर्ण, वस्त्र, भूमि, ओषधियाँ एवं पशुस्वरूप महानील निधि पीताङ्गीमें स्थित हैं। अन्य सभी जातियोंको अपनेमें समाविष्ट करनेवाली सारी जातियोंमें सर्वश्रेष्ठ जाति |
| अध्याय ७५ ] | त्रैलोक्य-लक्ष्मीका बलिके यहाँ आना, श्वेत लक्ष्मी आदिकी उत्पत्ति | ३७३ |
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| अन्येषामपि संहर्त्री नीला शङ्खे निधिः स्थितः ।<br>एतासु संस्थितानां च यानि रूपाणि दानव ।<br>भवन्ति पुरुषाणां वै तान् निबोध वदामि ते ॥ ३५ | (परसामान्यात्मक) स्वरूप शङ्खनिधिकी नीलाङ्गी देवीमें स्थिति है। दानव ! इन (निधियों)-के स्वरूपके अन्तर्गत पुरुषोंके जो लक्षण होते हैं, मैं उनका वर्णन कर रही हूँ, उन्हें समझो— ॥ ३१–३५ ॥ | | सत्यशौचाभिसंयुक्ता मखदानोत्सवे रताः ।<br>भवन्ति दानवपते महापद्माश्रिता नराः ॥ ३६<br>यज्विनः सुभगा दृप्ता मानिनो बहुदक्षिणाः ।<br>सर्वसामान्यसुखिनो नराः पद्माश्रिताः स्मृताः ॥ ३७<br>सत्यानृतसमायुक्ता दानाहरणदक्षिणाः ।<br>न्यायान्यायव्ययोपेता महानीलाश्रिता नराः ॥ ३८<br>नास्तिकाः शौचरहिताः कृपणा भोगवर्जिताः ।<br>स्तेयानृतकथायुक्ता नराः शङ्खाश्रिता बले ॥ ३९<br>इत्येवं कथितस्तुभ्यं तेषां दानव निर्णयः ॥ ४० | दानवपते! महापद्मके आश्रित रहनेवाले मनुष्य सत्य और शौचसे युक्त तथा यजन, दान और उत्सव करनेमें लीन रहते हैं। पद्मके आश्रित रहनेवाले मनुष्य यज्ञ करनेवाले, सौभाग्यशाली, अहङ्कारी, मानप्रिय, बहुत दक्षिणा देनवाले तथा सर्वसाधारण लोगोंसे सुखी होते हैं। महानीलके आश्रित रहनेवाले व्यक्ति सत्य तथा असत्यसे युक्त, देने और लेनेमें चतुर तथा न्याय, अन्याय और व्यय करनेवाले होते हैं। बले! शङ्खके आश्रित रहनेवाले पुरुष नास्तिक, अपवित्र, कृपण, भोगहीन, चोरी करनेवाले एवं असत्य बोलनेवाले होते हैं। दानव ! मैंने इस प्रकार आपसे उनके स्वरूपका वर्णन किया ॥ ३६–४० ॥ | | अहं सा रागिणी नाम जयश्रीस्त्वामुपागता ।<br>ममास्ति दानवपते प्रतिज्ञा साधुसम्मता ॥ ४१<br>समाश्रयामि शौर्याढ्यं न च क्लीबं कथंचन ।<br>न चास्ति भवतस्तुल्यो त्रैलोक्येऽपि बलाधिकः ॥ ४२<br>त्वया बलविभूत्या हि प्रीतिर्मे जनिता ध्रुवा ।<br>यत्त्वया युधि विक्रम्य देवराजो विनिर्जितः ॥ ४३<br>अतो मम पुरा प्रीतिर्जाता दानव शाश्वती ।<br>दृष्ट्वा ते परमं सत्त्वं सर्वेभ्योऽपि बलाधिकम् ॥ ४४ | वही रागिणी नामकी जयश्री मैं आपके पास आयी हूँ। दानवपते ! मेरी साधुजनोंसे अनुमोदित एक प्रतिज्ञा है। मैं वीर पुरुषका आश्रय करती हूँ। नपुंसकके पास कभी नहीं जाती। तीनों लोकोंमें आपके सदृश बलवान् दूसरा कोई नहीं है। अपनी बल-सम्पत्तिसे तुमने मेरेमें दृढ़ प्रीति उत्पन्न की है, क्योंकि संग्राममें पराक्रम कर तुमने देवराजको जीता है। दानव ! इसीसे आपके श्रेष्ठ सत्त्व एवं सभीसे अधिक बलको देखकर (आपके प्रति) मेरी स्थायी एवं उत्तम प्रीति उत्पन्न हो गयी है ॥ ४१–४४ ॥ | | शौण्डीर्यमानिनं वीरं ततोऽहं स्वयमागता ।<br>नाश्चर्यं दानवश्रेष्ठ हिरण्यकशिपोः कुले ॥ ४५<br>प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कर्म यदीदृशम् ।<br>विशेषितस्त्वया राजन् दैतेयः प्रपितामहः ॥ ४६<br>विजितं विक्रमाद् येन त्रैलोक्यं वै परैर्हृतम् ।<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं दानवेन्द्रं तदा बलिम् ॥ ४७<br>जयश्रीश्चन्द्रवदना प्रविष्टाऽद्योतयच्छुभा ।<br>तस्यां चाथ प्रविष्टायां विधवा इव योषितः ॥ ४८<br>समाश्रयन्ति बलिनं ह्रीश्रीधीधृतिकीर्तयः ।<br>प्रभा मतिः क्षमा भूतिर्विद्या नीतिर्दया तथा ॥ ४९ | अतः मैं अत्यन्त बलशाली तथा मानी वीर आपके पास अपने-आप ही आयी हूँ। दानवश्रेष्ठ ! हिरण्यकशिपुके वंशमें उत्पन्न आप असुरेन्द्रके लिये इस प्रकारके कर्मोंके करनेमें कोई आश्चर्य नहीं है। राजन् ! शत्रुओंकेद्वारा अधिकृत त्रैलोक्यको अपने पराक्रमसे जीतकर आपने दितिके पुत्र अपने प्रपितामहको और विशिष्ट कर दिया है। दानवेन्द्र बलिसे इस प्रकार कहकर चन्द्रवदना शुभा जयश्री (बलिमें) प्रवेश करके (उन्हें) प्रकाशित करने लगी। उनके प्रवेश कर जानेपर ही, श्री, धी (बुद्धि), धृति, कीर्ति, प्रभा, मति, क्षमा, भूति (समृद्धि), विद्या, नीति, दया, |
| ३७४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७६ |
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| श्रुतिः स्मृतिर्धृतिः कीर्तिर्मूर्तिः शान्तिः क्रियान्विता।<br>पुष्टिस्तुष्टी रुचिस्त्वन्या तथा सत्त्वाश्रिता गुणाः।<br>ताः सर्वा बलिमाश्रित्य व्यश्राम्यन्त यथासुखम्॥ ५०<br><br>एवं गुणोऽभूद् दनुपुङ्गवोऽसौ<br>बलिर्महात्मा शुभबुद्धिरात्मवान्।<br>यज्वा तपस्वी मृदुरेव सत्यवाग्<br>दाता विभर्ता स्वजनाभिगोप्ता॥ ५१<br><br>त्रिविष्टपं शासति दानवेन्द्रे<br>नासीत् क्षुधार्तो मलिनो न दीनः।<br>सदोज्ज्वलो धर्मरतोऽथ दान्तः<br>कामोपभोक्ता मनुजोऽपि जातः॥ ५२ | श्रुति, स्मृति, धृति, कीर्ति, मूर्ति, शान्ति, क्रिया, पुष्टि, तुष्टि, रुचि एवं अन्य सभी सत्त्वगुणके आश्रित अन्य देवियाँ भी विधवा स्त्रियोंकी भाँति बलिकी छत्रछायामें आनन्दपूर्वक रहने लगीं। अच्छी बुद्धिवाले, आत्मनिष्ठ, यज्ञ करनेवाले, तपस्वी, कोमल स्वभाववाले, सत्यवक्ता, दानी, अभावग्रस्तोंके अभावको दूरकर पालन-पोषण एवं स्वजनोंकी रक्षा करनेवाले दैत्यश्रेष्ठ महात्मा बलि इस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न थे। दानवेन्द्र बलिके स्वर्गका शासन करते समय कोई भूखसे दुखी, मलिन एवं अभावग्रस्त नहीं था। मनुष्य भी सदा शुद्ध धर्म-परायण, इन्द्रियविजयी एवं इच्छानुकूल भोगसे सम्पन्न हो गये॥ ४५-५२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७५॥
छिहत्तरवाँ अध्याय
प्रायश्चित्त-हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति, वासुदेवका अदितिके पुत्र बननेका आश्वासन और स्वतेजसे अदितिके गर्भमें प्रवेश
| पुलस्त्य उवाच<br>गते त्रैलोक्यराज्ये तु दानवेषु पुरन्दरः।<br>जगाम ब्रह्मसदनं सह देवैः शचीपतिः॥ १<br>तत्रापश्यत् स देवेशं ब्रह्माणं कमलोद्भवम्।<br>ऋषिभिः सार्धमासीनं पितरं स्वं च कश्यपम्॥ २<br>ततो ननाम शिरसा शक्रः सुरगणैः सह।<br>ब्रह्माणं कश्यपं चैव तांश्च सर्वांस्तपोधनान्॥ ३<br>प्रोवाचेन्द्रः सुरैः सार्धं देवनाथं पितामहम्।<br>पितामह हृतं राज्यं बलिना बलिना मम॥ ४<br>ब्रह्मा प्रोवाच शक्रैतद् भुज्यते स्वकृतं फलम्।<br>शक्रः पप्रच्छ भो ब्रूहि किं मया दुष्कृतं कृतम्॥ ५<br>कश्यपोऽप्याह देवेशं भ्रूणहत्या कृता त्वया।<br>दित्युदरात् त्वया गर्भः कृत्तो वै बहुधा बलात्॥ ६ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) तीनों लोकोंका राज्य दानवोंके अधीन हो जानेपर शचीपति इन्द्र देवोंके साथ ब्रह्मलोक गये। वहाँ उन्होंने ऋषियोंके साथ बैठे हुए कमलयोनि ब्रह्मा एवं अपने पिता कश्यपको देखा। उसके बाद इन्द्रने देवताओंके सहित ब्रह्मा, कश्यप एवं उन सभी तपोधनोंको सिर झुकाकर प्रणाम किया। देवोंके साथ इन्द्रने देवनाथ पितामहसे कहा—पितामह! बलवान् बलिने मेरा राज्य छीन लिया है। ब्रह्माने कहा—इन्द्र! यह तुम अपने किये हुए कर्मका फल भोग रहे हो। इन्द्रने पूछा—कृपया आप बतलाइये कि मैंने कौन-सा दुष्कर्म किया है। कश्यपने भी (उत्तरमें) इन्द्रसे कहा—तुमने भ्रूण (गर्भस्थित बालक)-की हत्या की है। तुमने दितिके उदरमें स्थित गर्भको बलपूर्वक अनेक टुकड़ोंमें काट डाला है॥ १-६॥ |
अध्याय ७६ ] प्रायश्चित्त-हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति ३७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पितरं प्राह देवेन्द्रः स मातृदोषतो विभो।<br>कृन्तनं प्राप्तवान् गर्भो यदशौचा हि साभवत् ॥ ७<br>ततोऽब्रवीत् कश्यपस्तु मातृदोषः स दासताम्।<br>गतस्ततो विनिहतो दासोऽपि कुलिशेन भो ॥ ८<br>तच्छ्रुत्वा कश्यपवचः प्राह शक्रः पितामहम्।<br>विनाशं पाप्मनो ब्रूहि प्रायश्चित्तं विभो मम ॥ ९<br>ब्रह्मा प्रोवाच देवेशं वसिष्ठः कश्यपस्तथा।<br>हितं सर्वस्य जगतः शक्रस्यापि विशेषतः ॥ १०<br>शङ्खचक्रगदापाणिर्माधवः पुरुषोत्तमः।<br>तं प्रपद्यस्व शरणं स ते श्रेयो विधास्यति ॥ ११<br>सहस्राक्षोऽपि वचनं गुरूणां स निशम्य वै।<br>प्रोवाच स्वल्पकालेन कस्मिन् प्राप्यो बहूदयः।<br>तमूचुर्देवता मर्त्ये स्वल्पकाले महोदयः ॥ १२ | इन्द्रने अपने पिता कश्यपसे कहा—विभो! जननीके दोषसे वह गर्भ छिन्न हुआ था; क्योंकि वे अपवित्र हो गयी थीं। उसके बाद कश्यपने कहा—माताके दोषसे वह दासताको प्राप्त हो चुका था, उसके बाद तुमने दासको भी वज्रसे मारा। कश्यपके उस वचनको सुनकर इन्द्रने पितामहसे कहा—विभो! मुझे पापका नाश करनेवाला प्रायश्चित्त बतला दीजिये। ब्रह्मा, वसिष्ठ एवं कश्यपने देवेश (इन्द्र)-से सब जगत्के लिये—विशेषरूपसे इन्द्रके लिये हितकारी वचन कहा—तुम शङ्ख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले पुरुषोत्तमभगवान् लक्ष्मीपति श्रीविष्णुकी शरणमें जाओ। वे तुम्हारा कल्याण करेंगे। उन सहस्राक्षने गुरुजनोंका वचन सुनकर कहा—थोड़े समयमें अधिक-से-अधिक उन्नतिकी प्राप्ति कहाँ सम्भव है? देवोंने उनसे कहा—स्वल्प समयमें महती उन्नति मर्त्यलोकमें सम्भव है॥ ७-१२॥ |
| इत्येवमुक्तः सुरराड् विरिञ्चिना<br>मरीचिपुत्रेण च कश्यपेन।<br>तथैव मित्रावरुणात्मजेन<br>वेगान्महीपृष्ठमवाप्य तस्थौ ॥ १३<br>कालिञ्जरस्योत्तरतः सुपुण्य-<br>स्तथा हिमाद्रेरपि दक्षिणस्थः।<br>कुशस्थलात् पूर्वत एव विश्रुतो<br>वसोः पुरात् पश्चिमतौऽवतस्थे ॥ १४<br>पूर्वं गयेन नृवरेण यत्र<br>यज्ञोऽश्वमेधः शतकृत्सदक्षिणः।<br>मनुष्यमेधः शतकृत्सहस्रकृन्<br>नरेन्द्रसूनुश्च सहस्रकृद् वै ॥ १५<br>तथा पुरा दुर्जयतः सुरासुरैः<br>ख्यातो महामेध इति प्रसिद्धः।<br>यत्रास्य चक्रे भगवान् मुरारिः<br>वास्तव्यमव्यक्ततनुः खमूर्तिमत्।<br>ख्यातिं जगामाथ गदाधरेति<br>महाघवृक्षस्य शितः कुठारः ॥ १६ | ब्रह्मा, मरीचिपुत्र कश्यप एवं वसिष्ठके ऐसा कहनेपर सुरराज इन्द्र तेजीसे पृथ्वीतलपर आ गये। वे कालिञ्जर पर्वतके उत्तर, हिमाद्रिके दक्षिण, कुशस्थलके पूर्व एवं वसुपुरके पश्चिममें स्थित विख्यात पुण्य स्थानमें रहने लगे—जहाँ पहले राजा गयने दक्षिणाके साथ सौ अश्वमेधयज्ञ, ग्यारह सौ नरमेधयज्ञ तथा एक हजार राजसूययज्ञका अनुष्ठान किया था। उसी प्रकार पहले (उसने) जहाँपर सुरों एवं असुरोंसे कठिनाईसे किया जा सकनेवाला महामेध नामक प्रसिद्ध यज्ञ अनुष्ठित किया था और उसके लिये जहाँ आकाशस्वरूप अव्यक्तशरीरी मुरारि (विष्णु)-ने वहाँ निवास किया था। इसके बाद वे गदाधर नामसे प्रसिद्ध हुए, जो महान् अघरूपी वृक्षके लिये तीक्ष्ण कुठारस्वरूप हैं॥ १३-१६॥ |
| यस्मिन् द्विजेन्द्राः श्रुतिशास्त्रवर्जिताः<br>समत्वमायान्ति पितामहेन।<br>सकृत् पितॄन् यत्र च सम्प्रपूज्य<br>भक्त्या त्वनन्येन हि चेतसैव।<br>फलं महामेधमखस्य मानवा<br>लभन्त्यनन्त्यं भगवत्प्रसादात् ॥ १७<br>महानदी यत्र सुरर्षिकन्या<br>जलापदेशाद्धिमशैलमेत्य । | जहाँ वेद-शास्त्रसे रहित होनेपर भी कुलीन श्रेष्ठ ब्राह्मण ब्रह्माकी समानता प्राप्त करते हैं एवं मनोयोगसे भक्तिसहित मनुष्य एक बार भी पितरोंका पूजन करके भगवान्के अनुग्रहसे महामेध नामक यज्ञका अनन्त फल प्राप्त कर लेते हैं, वहाँ देवर्षिकी कन्या श्रेष्ठ महानदी है, जो जलरूपसे हिमालयपर प्रवहमान होकर अपने दर्शन, |
| ३७६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७६ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| चक्रे जगत्पापविनष्टिमग्र्यां<br>संदर्शनप्राशनमज्जनेन ॥ १८ | पान एवं मज्जन करनेसे जगत्के पापोंको विनष्ट करती है। |
| तत्र शक्रः समभ्येत्य महानद्यास्तटेऽद्भुते।<br>आराधनाय देवस्य कृत्वाश्रममवस्थितः ॥ १९<br>प्रातःस्नायी त्वधःशायी एकभुक्तस्त्वयाचितः।<br>तपस्तेपे सहस्राक्षः स्तुवन् देवं गदाधरम् ॥ २०<br>तस्यैवं तप्यतः सम्यग्जितसर्वेन्द्रियस्य हि।<br>कामक्रोधविहीनस्य साग्रः संवत्सरो गतः ॥ २१<br>ततो गदाधरः प्रीतो वासवं प्राह नारद।<br>गच्छ प्रीतोऽस्मि भवतो मुक्तपापोऽसि साम्प्रतम् ॥ २२ | विष्णुकी आराधना करनेके लिये इन्द्र वहाँ महानदीके विचित्र तटपर गये और आश्रम बनाकर रहने लगे। वे प्रातःकाल स्नान, भूमिपर शयन एवं बिना माँगे मिले हुए पदार्थसे एक समय भोजन करते हुए गदाधारी देवकी स्तुति करते हुए तपस्या करने लगे। सर्वथा जितेन्द्रिय एवं काम-क्रोधादिसे रहित होकर इस प्रकार तपस्या करते हुए उनका एक वर्ष बीत गया। नारदजी! उसके बाद गदा धारण करनेवाले विष्णुने प्रसन्न होकर इन्द्रसे कहा—जाओ, मैं प्रसन्न हूँ; अब तुम पापसे मुक्त हो गये हो ॥ १७–२२ ॥ |
| निजं राज्यं च देवेश प्राप्स्यसे नचिरादिव।<br>यतिष्यामि तथा शक्र भावि श्रेयो यथा तव ॥ २३<br>इत्येवमुक्तोऽथ गदाधरेण<br>विसर्जितः स्नाप्य मनोहरायाम्।<br>स्नातस्य देवस्य तदैनसो नरा-<br>स्तं प्रोचुरस्माननुशासयस्व ॥ २४<br>प्रोवाच तान् भीषणकर्मकारान्<br>नाम्ना पुलिन्दान् मम पापसम्भवाः।<br>वसध्वमेवान्तरमद्रिमुख्ययो-<br>र्हिमाद्रिकालिञ्जरयोः पुलिन्दाः ॥ २५<br>इत्येवमुक्त्वा सुरराट् पुलिन्दान्<br>विमुक्तपापोऽमरसिद्धयक्षैः।<br>सम्पूज्यमानोऽनुजगाम चाश्रमं<br>मातुस्तदा धर्मनिवासमीड्यम् ॥ २६ | देवेश! (अब) तुम शीघ्र ही अपना राज्य प्राप्त कर लोगे। इन्द्र! जैसे तुम्हारा आगेका श्रेय (कल्याण) होगा, वैसा ही मैं प्रयत्न करूँगा। गदाधर श्रीविष्णुने ऐसा कहनेके बाद इन्द्रको मनोहरा नदीमें स्नान कराकर बिदा कर दिया। इन्द्रके स्नान कर लेनेपर उनके पाप-पुरुषोंने उनसे कहा—हमें अनुशासित कीजिये। (इन्द्रने) उन भयंकर कर्म करनेवाले लोगोंसे कहा—मेरे पापसे उत्पन्न तुम लोग पुलिन्द कहे जाओगे। तुम लोग हिमालय एवं कालिञ्जर नामके दोनों श्रेष्ठ पर्वतोंके बीचकी भूमिमें निवास करो। पुलिन्दोंसे ऐसा कहनेके पश्चात् पापसे मुक्त हुए सुरराज देवों, सिद्धों एवं यक्षोंसे पूजित होते हुए माताके धर्मके आश्रयरूप पूज्य आश्रममें चले गये ॥ २३–२६ ॥ |
| दृष्ट्वाऽदितिं मूर्ध्नि कृताञ्जलिस्तु<br>विनम्रमौलिः समुपाजगाम।<br>प्रणम्य पादौ कमलोदराभौ<br>निवेदयामास तपस्तदात्मनः ॥ २७<br>पप्रच्छ सा कारणमीश्वरं त-<br>माघ्राय चालिङ्ग्य सहस्रदृष्ट्या।<br>स चाचचक्षे बलिना रणे जयं<br>तदात्मनो देवगणैश्च सार्धम् ॥ २८<br>श्रुत्वैव सा शोकपरप्लुताङ्गी<br>ज्ञात्वा जितं दैत्यसुतैः सुतं तम्।<br>दुःखान्विता देवमनाद्यमीड्यं<br>जगाम विष्णुं शरणं वरेण्यम् ॥ २९ | अदितिका दर्शन कर हाथ जोड़ तथा सिर झुकाकर इन्द्र उनके समीप आये एवं उनके कमलकी कान्तिवाले चरणोंमें प्रणाम करनेके बाद उन्होंने अपनी तपस्याका वर्णन किया। उन (अदिति)-ने अश्रुपूर्ण दृष्टिसे (इन्द्रको) सूँघा एवं उनको गले लगाकर (तपस्याका कारण) पूछा। इन्द्रने बलिद्वारा देवोंसहित अपने पराजित होनेका पूरा समाचार कह सुनाया। यह सुननेके बाद अपने उस पुत्रको दितिके पुत्रोंद्वारा पराजित जान शोकसे भर गयीं एवं दुःखसे दुखी होकर (अदिति) वरेण्य एवं अनादि देव विष्णुकी शरणमें गयीं ॥ २७–२९ ॥ |
| नारद उवाच<br>कस्मिन् जनित्री सुरसत्तमानां<br>स्थाने हृषीकेशमनन्तमाद्यम्।<br>चराचरस्य प्रभवं पुराण-<br>माराधयामास शुभे वद त्वम् ॥ ३० | नारदने कहा (पूछा)—(कृपया) आप यह बतलाइये कि देवोंकी माता अदितिने किस शुभ स्थानपर अनादि, अनन्त, चर और अचरके उत्पन्न करनेवाले एवं पुरातन हृषीकेशकी आराधना की ? ॥ ३० ॥ |
अध्याय ७६ ] प्रायश्चित्त-हेतु इन्द्रकी तपस्या, माताके आश्रममें आना, अदितिकी तपस्या और वासुदेवकी स्तुति ३७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>सुरारणिः शक्रमवेक्ष्य दीनं<br>पराजितं दानवनायकेन।<br>सितेऽथ पक्षे मकरर्क्षगोऽर्के<br>घृतार्चिषः स्यादथ सप्तमेऽह्नि॥ ३१<br>दृष्ट्वैव देवं त्रिदशाधिपं तं<br>महोदये शक्रदिशारूढम्।<br>निराशना संयतवाक् सुचित्ता<br>तदोपतस्थे शरणं सुरेन्द्रम्॥ ३२ | **पुलस्त्यजी बोले—**दानव-नायकद्वारा पराजित हुए दीन बने इन्द्रको देखकर अदिति सूर्यके मकर-राशिमें स्थित हो जानेपर शुक्लपक्षकी सूर्य-सप्तमीके दिन उन सुरोंके स्वामी सूर्यदेवको महान् उदयाचलपर पूर्व दिशामें उगनेपर देखकर उपवास करती हुई वाणी एवं मनको संयत करके उन सुरेन्द्र (सूर्य)-की शरणमें गयीं॥ ३१-३२॥ |
| अदितिरुवाच<br>जयस्व दिव्याम्बुजकोशचौर<br>जयस्व संसारतरोः कुठार।<br>जयस्व पापेन्धनजातवेद-<br>स्तमौघसंरोध नमो नमस्ते॥ ३३<br>नमोऽस्तु ते भास्कर दिव्यमूर्ते<br>त्रैलोक्यलक्ष्मीतिलकाय ते नमः।<br>त्वं कारणं सर्वचराचरस्य<br>नाथोऽसि मां पालय विश्वमूर्ते॥ ३४<br>त्वया जगन्नाथ जगन्मयेन<br>नाथेन शक्रो निजराज्यहानिम्।<br>अवाप्तवाञ् शत्रुपराभवं च<br>ततो भवन्तं शरणं प्रपन्ना॥ ३५<br>इत्येवमुक्त्वा सुरपूजितं सा<br>आलिख्य रक्तेन हि चन्दनेन।<br>सम्पूजयित्वा करवीरपुष्पैः<br>संधूप्य धूपैः कणमर्कभोज्यम्॥ ३६<br>निवेद्य चैवाज्ययुतं महार्ह-<br>मन्नं महेन्द्रस्य हिताय देवी।<br>स्तवेन पुण्येन च संस्तुवन्ती<br>स्थिता निराहारमथोपवासम्॥ ३७ | **अदितिने कहा—**हे दिव्य कमलकोशको अपनेमें छिपाकर रखनेवाले! आपकी जय हो। हे संसाररूपी वृक्षके कुठार! आपकी जय हो। हे पापरूपी इन्धनके लिये अग्नि! आपकी जय हो। हे अन्धकार (अज्ञान)-के समूहके विनाश करनेवाले! आपको बारम्बार नमस्कार है। हे भास्कर! हे दिव्यमूर्ते! आपको नमस्कार है। हे त्रैलोक्य-लक्ष्मीके स्वामिन्! आपको नमस्कार है। आप समस्त चर और अचर जगत्के कारण तथा स्वामी हैं। हे विश्वमूर्ते! आप मेरी रक्षा कीजिये। हे जगन्नाथ! जगन्मय आप स्वामीके ही कारण इन्द्रको अपने राज्यकी हानि एवं शत्रुसे पराभवकी भी प्राप्ति हुई है। अतः मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। ऐसा कहनेके बाद रक्तचन्दनद्वारा देवोंसे पूजित सूर्यको चित्रितकर उन देवी (अदिति)-ने कनैंरके पुष्पोंसे उनका पूजन किया और धूपसे धूपित करनेके बाद महेन्द्रकी भलाईके लिये सूर्यके लिये घृतसे बने उत्तम अन्न अर्पित किया तथा निराहार रहकर पवित्र स्तोत्रोंसे स्तुति करती हुई (साधनामें) बैठी रहीं॥ ३३-३७॥ |
| ततो द्वितीयेऽह्नि कृतप्रणामा<br>स्नात्वा विधानेन च पूजयित्वा।<br>दत्त्वा द्विजेभ्यः कणकं तिलाज्यं<br>ततोऽग्रतः सा प्रयता बभूव॥ ३८<br>ततः प्रीतोऽभवद् भानुर्घृतार्चिः सूर्यमण्डलात्।<br>विनिःसृत्याग्रतः स्थित्वा इदं वचनमब्रवीत्॥ ३९<br>व्रतेनानेन सुप्रीतस्तवाहं दक्षनन्दिनि।<br>प्राप्स्यसे दुर्लभं कामं मत्प्रसादान्न संशयः॥ ४०<br>राज्यं त्वत्तनयानां वै दास्ये देवि सुरारणि।<br>दानवान् ध्वंसयिष्यामि सम्भूयैवोदरे तव॥ ४१ | दूसरे दिन प्रणाम करनेके बाद विधिसे स्नान एवं पूजा करके उन्होंने ब्राह्मणोंको कणक, तिल एवं घृत प्रदान किया और उसके बाद वे और अधिक संयत रहने लगीं। इससे घृतार्चि भानु प्रसन्न हो गये। (वे) सूर्य-मण्डलसे निकले एवं अदितिके सामने खड़े होकर यह वचन बोले—दक्षनन्दिनि! तुम्हारे इस व्रतसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अतः मेरी कृपासे तुम निःसन्देह मनोवाञ्छित दुर्लभ वस्तु प्राप्त करोगी। देवि! देवजननि! मैं तुम्हारा पुत्र होकर देवपुत्रोंको राज्य दूँगा और दानवोंका नाश करूँगा॥ ३८-४१॥ |
| ३७८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७७ |
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| तद्वाक्यं वासुदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मन् सुरारणिः।<br>प्रोवाच जगतां योनिं वेपमाना पुनः पुनः॥ ४२<br><br>कथं त्वामुदरेणाहं वोढुं शक्ष्यामि दुर्धरम्।<br>यस्योदरे जगत्सर्वं वसते स्थाणुजङ्गमम्॥ ४३<br><br>कस्त्वां धारयितुं नाथ शक्तस्त्रैलोक्यधार्यसि।<br>यस्य सप्तार्णवाः कुक्षौ निवसन्ति सहाद्रिभिः॥ ४४<br><br>तस्माद् यथा सुरपतिः शक्रः स्यात् सुरराडिह।<br>यथा च न मम क्लेशस्तथा कुरु जनार्दन॥ ४५<br><br>विष्णुरुवाच<br>सत्यमेतन्महाभागे दुर्धरोऽस्मि सुरासुरैः।<br>तथापि सम्भविष्यामि अहं देव्युदरे तव॥ ४६<br><br>आत्मानं भुवनान् शैलांस्त्वाञ्च देवि सकश्यपाम्।<br>धारयिष्यामि योगेन मा विषादं कृथाऽम्बिके॥ ४७<br><br>तवोदरेऽहं दाक्षेयि सम्भविष्यामि वै यदा।<br>तदा निस्तेजसो दैत्याः सम्भविष्यन्त्यसंशयम्॥ ४८<br><br>इत्येवमुक्त्वा भगवान् विवेश<br>तस्याश्च भूयोऽरिगणप्रमर्दी।<br>स्वतेजसोंऽशेन विवेश देव्याः<br>तदोदरे शक्रहिताय विप्र॥ ४९ | [पुलस्त्यजी कहते हैं—] ब्रह्मन्! वासुदेवका वह वाक्य सुनकर बार-बार काँपती हुई देवोंकी माता अदितिने संसारको उत्पन्न करनेवाले विष्णुसे कहा—जिसके (विशाल) उदरमें स्थावर-जङ्गमात्मक समस्त संसार निवास करता है, ऐसे त्रिलोकीको धारण करनेवाले आपको मैं अपने उदरमें कैसे धारण कर सकूँगी? नाथ! आप तीनों लोकोंको धारण करनेवाले हैं। जिसकी कुक्षिमें पर्वतोंके साथ सातों समुद्र अवस्थित हैं ऐसे आपको कौन धारण कर सकता है? अतः हे जनार्दन! आप वैसा ही करें जिससे इन्द्र देवताओंके स्वामी बन जायें और मुझे भी कष्ट न हो॥ ४२—४५॥<br><br>**विष्णुने कहा—**महाभागे! यह सत्य है कि मैं देवों और दैत्योंसे धृत नहीं हो सकता, फिर भी हे देवि! मैं आपके उदरसे उत्पन्न होऊँगा। देवि! स्वयंको, (चौदहों) भुवनों, पर्वतों एवं कश्यपसहित आपको भी मैं योगद्वारा धारण करूँगा। मातः! आप विषाद न करें। दक्षात्मजे! जब मैं आपके उदरमें आऊँगा तब दैत्य निस्सन्देह तेजोहीन हो जायेंगे। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] विप्र! ऐसा कहकर शत्रुओंके नाश करनेवाले भगवान् विष्णु इन्द्रकी भलाईके लिये अपने तेजके अंशमात्रसे उन देवीके उदरमें प्रविष्ट हो गये॥ ४६—४९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७६॥
सतहत्तरवाँ अध्याय
प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिको विष्णुको दुर्वचन, प्रह्लादद्वारा बलिको शाप और अनुनय करनेपर उपदेश
| पुलस्त्य उवाच<br>देवमातुः स्थिते देवे उदरे वामनाकृतौ।<br>निस्तेजसोऽसुरा जाता यथोक्तं विश्वयोनिना॥ १<br>निस्तेजसोऽसुरान् दृष्ट्वा प्रह्लादं दानवेश्वरम्।<br>बलिर्दानवशार्दूल इदं वचनमब्रवीत्॥ २ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी) संसारके उत्पन्न करनेवाले भगवान्के वचनानुसार देवमाता अदितिके गर्भमें वामनरूपमें देवके स्थित हो जानेपर असुर निस्तेज हो गये। असुरोंको निस्तेज देखकर दानवोंमें श्रेष्ठ बलिने दानवेश्वर प्रह्लादसे यह वचन कहा—॥ १-२॥ |
| अध्याय ७७ ] | प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिको विष्णुको दुर्वचन | ३७९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बलिरुवाच<br>तात निस्तेजसो दैत्याः केन जातास्तु हेतुना।<br>कथ्यतां परमज्ञोऽसि शुभाशुभविशारद॥ ३ | बलिने कहा— तात! आप यह बतलानेकी कृपा करें कि दानव किस कारणसे निस्तेज हो गये हैं? शुभ और अशुभके जाननेवाले आप महान् ज्ञानी हैं॥ ३॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>तत्पौत्रवचनं श्रुत्वा मुहूर्तं ध्यानमास्थितः।<br>किमर्थं तेजसो हानिरिति कस्मादतीव च॥ ४<br>स ज्ञात्वा वासुदेवोत्थं भयं दैत्येष्वनुत्तमम्।<br>चिन्तयामास योगात्मा क्व विष्णुः साम्प्रतं स्थितः॥ ५<br>अधो नाभेः स पातालान् सप्त संचिन्त्य नारद।<br>नाभेरूपरि भूरादींल्लोकांश्चर्तुमियाद् वशी॥ ६<br>भूमिं स पङ्कजाकारां तन्मध्ये पङ्कजाकृतिम्।<br>मेरुं ददर्श शैलेन्द्रं शातकौम्भं महर्द्धिमत्॥ ७<br>तस्योपरि महापुर्यस्त्वष्टौ लोकपतींस्तथा।<br>तेषामुपरि वैराजीं ददृशे ब्रह्मणः पुरीम्॥ ८ | पुलस्त्यजी बोले— अपने पौत्र (बलि)-के उस वचनको सुनकर (दानवोंके) तेजकी अत्यधिक हानि क्यों और किससे हुई है—(यह जाननेके लिये) प्रह्लादने क्षणभर ध्यान किया और दैत्योंके लिये वासुदेवद्वारा उत्पन्न हुए अतुलनीय भयको जानकर उन योगात्माने यह सोचा कि इस समय विष्णु कहाँपर स्थित हैं? नारदजी! नाभिके नीचेके स्थानमें सात पातालोंका चिन्तन करनेके बाद (सातों पातालोंमें पता लगानेके बाद) सभीको अपने वशमें करनेवाले वे नाभिके ऊपर भूः आदि लोकमें देखनेके लिये (पता लगानेके लिये) पहुँचे। उन्होंने कमलके आकारकी भूमि और उसके बीच महान् समृद्धिसे सम्पन्न सुवर्णमय कमलके आकार-जैसे पर्वतश्रेष्ठ मेरुको देखा। उसके ऊपर महापुरियोंमें आठ लोक-पति तथा उनके ऊपर ब्रह्माकी वैराजपुरीको देखा॥ ४–८॥ |
| तदधस्तान्महापुण्यमाश्रमं सुरपूजितम्।<br>देवमातुः स ददृशे मृगपक्षिगणैर्वृतम्॥ ९<br>तां दृष्ट्वा देवजननीं सर्वतेजोऽधिकां मुने।<br>विवेश दानवपतिरन्वेष्टुं मधुसूदनम्॥ १०<br>स दृष्ट्वाऽङ्गजगन्नाथं माधवं वामनाकृतिम्।<br>सर्वभूतवरेण्यं तं देवमातुरथोदरे॥ ११<br>तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>सुरासुरगणैः सर्वैः सर्वतो व्याप्तविग्रहम्॥ १२<br>तेनैव क्रमयोगेन दृष्ट्वा वामनतां गतम्।<br>दैत्यतेजोहरं विष्णुं प्रकृतिस्थोऽभवत् ततः॥ १३<br>अथोवाच महाबुद्धिर्विरोचनसुतं बलिम्।<br>प्रह्लादो मधुरं वाक्यं प्रणम्य मधुसूदनम्॥ १४ | उसके नीचे उन्होंने महान् पुण्यसे युक्त देवताओंसे पूजित तथा पशु-पक्षियोंसे भरे देवमाता अदितिके आश्रमको देखा। मुने! समस्त तेजोंसे भी अधिक तेजस्विनी उस देवमाता अदितिको देखकर दानवपति प्रह्लादने मधुसूदनको ढूँढ़नेके लिये (उनके उदरमें) प्रवेश किया। उन्होंने सभी प्राणियोंमें श्रेष्ठ वामनके रूपमें उन जगत्पति माधवको देवमाताके उदरमें देखकर सारे सुरों और असुरोंसे चारों ओर व्याप्त शरीरवाले शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले उन पुण्डरीकनयन भगवान्को देखा। उसी योगके क्रममें वामनरूपको प्राप्त हुए दैत्योंके तेजको हरण करनेवाले विष्णुको जानकर वे प्रकृति-भावमें स्थित हो गये। उसके बाद मधुसूदनको प्रणाम कर महाबुद्धिमान् प्रह्लादने विरोचनपुत्र बलिसे मधुर वचन कहा॥ ९—१४॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये यतो वो भयमागतम्।<br>येन निस्तेजसो दैत्या जाता दैत्येन्द्र हेतुना॥ १५<br>भवता निर्जिता देवाः सेन्द्ररुद्रार्कपावकाः।<br>प्रयाताः शरणं देवं हरिं त्रिभुवनेश्वरम्॥ १६ | प्रह्लादने कहा— दैत्येन्द्र! आपलोगोंको जिससे भय प्राप्त हुआ है और जिस कारण दैत्यगण तेजसे रहित हो गये हैं, वह सब मैं कहता हूँ, सुनो। आपके द्वारा जीते गये इन्द्रसहित रुद्र, सूर्य तथा अग्नि आदि देवता |
| ३८० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७७ |
|---|
| स तेषामभयं दत्त्वा शक्रादीनां जगद्गुरुः।<br>अवतीर्णो महाबाहुरदित्या जठरे हरिः॥ १७<br><br>हृतानि वस्तेन बले तेजांसीति मतिर्मम।<br>नालं तमो विषहितुं स्थातुं सूर्योदयं बले॥ १८ | त्रिभुवनके स्वामी देव हरिकी शरणमें गये। वे लोकगुरु महाबाहु हरि इन्द्र आदि देवताओंको अभय देकर अदितिके उदरमें अवतीर्ण हुए हैं। बले! मेरा ऐसा विचार है कि उन्होंने तुम लोगोंके तेजको हरण कर लिया है। बले! (जैसे कि) सूर्योदयके होते ही अन्धकार ठहर नहीं सकता है॥ १५–१८॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>प्रह्लादवचनं श्रुत्वा क्रोधप्रस्फुरिताधरः।<br>प्रह्लादमाहाथ बलिर्भाविकर्मप्रचोदितः॥ १९ | पुलस्त्यजी बोले— प्रह्लादके वचनको सुनकर क्रोधसे ओठ फड़कड़ाते हुए बलिने होनहारसे प्रेरित होकर प्रह्लादसे कहा॥ १९॥ | | बलिरुवाच<br>तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम्।<br>सन्ति मे शतशो दैत्या वासुदेवबलाधिकाः॥ २०<br>सहस्रशो यैरमराः सेन्द्ररुद्राग्निमारुताः।<br>निर्जित्य त्याजिताः स्वर्गं भग्नदर्पा रणाजिरे॥ २१<br>ये सूर्यस्थाद् वेगाच्चक्रं कृष्टं महाजवम्।<br>स विप्रचित्तिर्बलवान् मम सैन्यपुरस्सरः॥ २२<br>अयःशङ्कुः शिवः शम्भुरसिलोमा विलोमकृत्।<br>त्रिशिरा मकराक्षश्च वृषपर्वा नतेक्षणः॥ २३<br>एते चान्ये च बलिनो नानायुधविशारदाः।<br>येषामेकैकशो विष्णुः कलां नार्हति षोडशीम्॥ २४ | बलिने कहा— तात! ये हरि कौन हैं जिनके कारण हमें भय प्राप्त हुआ है? हमारे पास वासुदेवसे अधिक बलवान् सैकड़ों दैत्य हैं। उन लोगोंने इन्द्रसहित रुद्र, अग्नि तथा वायु आदि हजारों देवोंको युद्धमें जीतकर उनके अहंकारको नष्ट किया एवं उन्हें स्वर्गसे खदेड़ दिया। वह बलशाली विप्रचित्ति मेरी सेनाका अगुआ है, जिसने धावा बोलकर सूर्यके रथसे महान् तीव्रगामी चक्रको खींच लिया था। अयःशङ्कु, शिव, शम्भु, असिलोमा, विलोमकृत्, त्रिशिरा, मकराक्ष, वृषपर्वा एवं नतेक्षण—ये तथा अन्य बहुत-से भाँति-भाँतिके आयुधोंको चलानेमें निपुण बलवान् (दैत्य मेरे सहायक हैं,) जिनमें हर एककी सोलहवीं कलाके भी समान विष्णु नहीं हैं॥ २०–२४॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्लादः क्रोधमूर्च्छितः।<br>धिग्धिगित्याह स बलिं वैकुण्ठाक्षेपवादिनम्॥ २५<br>धिक् त्वां पापसमाचारं दुष्टबुद्धिं सुबालिशम्।<br>हरिं निन्दयतो जिह्वा कथं न पतिता तव॥ २६<br>शोच्यस्त्वमसि दुर्बुद्धे निन्दनीयश्च साधुभिः।<br>यत् त्रैलोक्यगुरुं विष्णुमभिनिन्दसि दुर्मते॥ २७<br>शोच्यश्चास्मि न संदेहो येन जातः पिता तव।<br>यस्य त्वं कर्कशः पुत्रो जातो देवावमान्यकः॥ २८ | पुलस्त्यने कहा— पौत्रके इस वचनको सुनकर अत्यन्त कुपित हुए उन प्रह्लादने विष्णुकी निन्दा करनेवाले बलिसे कहा—पापकर्मा दुष्टबुद्धि तुम मूर्खको धिक्कार है। विष्णुकी निन्दा करते हुए तुम्हारी जीभ क्यों नहीं गिर गयी? दुर्बुद्धे! दुर्मते! तुम शोक करने लायक और सज्जनोंद्वारा निन्दा किये जाने योग्य हो। क्योंकि तुम तीनों लोकोंके गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे हो। निस्सन्देह मैं भी शोक किये जाने लायक हूँ, जिसने तुम्हारे उस पिताको जन्म दिया, जिससे तुम देवताओंकी निन्दा करनेवाले तथा उग्र पुत्र हुए॥ २५–२८॥ | | भवान् किल विजानाति तथा चामी महासुराः।<br>यथा नान्यः प्रियः कश्चिन्मम तस्माज्जनार्दनात्॥ २९<br>जानन्नपि प्रियतरं प्राणेभ्योऽपि हरिं मम।<br>सर्वेश्वरेश्वरं देवं कथं निन्दितवानसि॥ ३०<br>गुरुः पूज्यस्तव पिता पूज्यस्तस्याप्यहं गुरुः।<br>ममापि पूज्यो भगवान् गुरुर्लोकगुरुर्हरिः॥ ३१ | निश्चय ही तुम और ये महासुर भी जानते हैं कि जनार्दनसे अधिक दूसरा कोई मेरा प्रिय नहीं है। विष्णु मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, यह जानते हुए भी तुमने सर्वेश्वरेश्वर देवकी निन्दा किस प्रकार की? तुम्हारे पिता (तुम्हारे लिये) गुरु एवं पूजनीय हैं। उनका भी गुरु तथा पूजनीय मैं हूँ। लोकगुरु भगवान् विष्णु मेरे भी |
| अध्याय ७७ ] | प्रह्लादसे अदितिके गर्भमें विष्णुके प्रविष्ट होनेकी बात जानकर बलिका विष्णुको दुर्वचन | ३८१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गुरोर्गुरुगुरुर्मूढ पूज्यः पूज्यतमस्तव।<br>पूज्यं निन्दयते पाप कथं न पतितोऽस्यधः॥ ३२ | पूजनीय और गुरु हैं। मूढ़ पापिन्! गुरुके भी गुरु तुम्हारे लिये पूज्य एवं पूज्यतम हैं। तुम पूजनीयकी निन्दा करते हो, इसलिये तुम नीचे क्यों नहीं गिर गये॥ २९—३२॥ |
| शोचनीया दुराचारा दानवामी कृतास्त्वया।<br>येषां त्वं कर्कशो राजा वासुदेवस्य निन्दकः॥ ३३<br>यस्मात् पूज्योऽर्चनीयश्च भवता निन्दितो हरिः।<br>तस्मात् पापसमाचार राज्यनाशमवाप्नुहि॥ ३४<br>यथा नान्यत् प्रियतरं विद्यते मम केशवात्।<br>मनसा कर्मणा वाचा राज्यभ्रष्टस्तथा पत॥ ३५<br>यथा न तस्मादपरं व्यतिरिक्तं हि विद्यते।<br>चतुर्दशसु लोकेषु राज्यभ्रष्टस्तथा पत॥ ३६<br>सर्वेषामपि भूतानां नान्यल्लोके परायणम्।<br>यथा तथाऽनुपश्येयं भवन्तं राज्यविच्युतम्॥ ३७ | तुमने दुराचरण करनेवाले इन दानवोंको शोचनीय बना दिया। क्योंकि वासुदेवकी निन्दा करनेवाले कठोर-स्वभावके तुम इनके राजा हो। हे पापका आचरण करनेवाले! यतः तुमने पूजनीय एवं अर्चनीय विष्णुकी निन्दा की है, अतः तुम्हारे राज्यका विनाश होगा। क्योंकि मन, कर्म एवं वाणीसे मेरा केशवसे अधिक दूसरा कोई प्रिय नहीं है, अतः राज्यसे भ्रष्ट होकर तुम अधःपतित हो जाओ। क्योंकि चौदहों लोकोंमें उनसे भिन्न दूसरा कोई नहीं है, अतः राज्य-भ्रष्ट होकर तुम पतित हो जाओ; क्योंकि संसारमें सभी भूतोंका (वासुदेवके अतिरिक्त) दूसरा कोई आधार नहीं है, अतः मैं तुम्हें राज्यच्युत हुआ देखूँ॥ ३३—३७॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>एवमुच्चारिते वाक्ये बलिः सत्वरितस्तदा।<br>अवतीर्यासनाद् ब्रह्मन् कृताञ्जलिपुटो बली॥ ३८<br>शिरसा प्रणिपत्याह प्रसादं यातु मे गुरुः।<br>कृतापराधानपि हि क्षमन्ति गुरवः शिशून्॥ ३९<br>तत्साधु यदहं शप्तो भवता दानवेश्वर।<br>न बिभेमि परेभ्योऽहं न च राज्यपरिक्षयात्॥ ४०<br>नैव दुःखं मम विभो यदहं राज्यविच्युतः।<br>दुःखं कृतापराधत्वाद् भवतो मे महत्तरम्॥ ४१<br>तत् क्षम्यतां तात ममापराधो<br>बालोऽस्म्यनाथोऽस्मि सुदुर्मतिश्च।<br>कृतेऽपि दोषे गुरवः शिशूनां<br>क्षमन्ति दैन्यं समुपागतानाम्॥ ४२ | पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! इस प्रकार कहे जानेपर बलशाली बलि शीघ्र ही आसनसे नीचे उतरा और हाथ जोड़कर उसने सिरसे झुककर प्रणाम कर कहा—गुरो! मेरे ऊपर आप प्रसन्न हों। बड़े लोग अपराध करनेपर भी बालकोंको क्षमा करते हैं। दानवेश्वर! आपका मुझे शाप देना ठीक है। मैं शत्रुओंसे तथा राज्यके विनाश होनेसे भयभीत नहीं हूँ। विभो! मुझे राज्यसे भ्रष्ट हो जानेका कष्ट भी नहीं है, परंतु आपका अपराध करनेका मुझे सबसे अधिक दुःख है। इसलिये तात! आप मेरे अपराधको क्षमा करें। मैं एक अनाथ दुर्बुद्धि शिशु हूँ। गुरुजन दोष करनेपर भी आर्त बने हुए बालकोंको क्षमा कर देते हैं॥ ३८–४२॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>स एवमुक्तो वचनं महात्मा<br>विमुक्तमोहो हरिपादभक्तः।<br>चिरं विचिन्त्याद्भुतमेतदित्थ-<br>मुवाच पौत्रं मधुरं वचोऽथ॥ ४३ | (फिर) पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकारके वचन कहनेपर विष्णुके चरणोंमें श्रद्धा रखनेवाले ज्ञानी महात्मा (प्रह्लाद)-ने बहुत देरतक विचारकर पौत्रसे इस प्रकार अद्भुत एवं मधुर यह वचन कहा॥ ४३॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>तात मोहेन मे ज्ञानं विवेकश्च तिरस्कृतः।<br>येन सर्वगतं विष्णुं जानंस्त्वां शप्तवानहम्॥ ४४<br>नूनमेतेन भाव्यं वै भवतो येन दानव।<br>ममाविशन्महाबाहो विवेकप्रतिषेधकः॥ ४५ | प्रह्लादने कहा— तात! अज्ञानने मेरे ज्ञान एवं विवेकको ढक दिया था। इसीसे विष्णुको सर्वव्यापी जानते हुए भी मैंने तुम्हें शाप दे दिया। दानव! निश्चय ही तुम्हारी इस प्रकारकी होनहार थी। इसीसे विवेकका प्रतिबन्धक—विषय-वासनारूप अज्ञान मुझमें प्रवेश कर |
| ३८२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७७ | | :--- | :--- |
| तस्माद् राज्यम्प्रति विभो न ज्वरं कर्तुमर्हसि।<br>अवश्यं भाविनो ह्यर्था न विनश्यन्ति कर्हिचित्॥ ४६<br>पुत्रमित्रकलत्रार्थे राज्यभोगधनाय च।<br>आगमे निर्गमे प्राज्ञो न विषादं समाचरेत्॥ ४७<br>यथा यथा समायान्ति पूर्वक Check कर्मविधानतः।<br>सुखदुःखानि दैत्येन्द्र नरस्तानी सहेत् तथा॥ ४८<br><br>आपदामागमं दृष्ट्वा न विषण्णो भवेद् वशी।<br>सम्पदं च सुविस्तीर्णां प्राप्य नोऽधृतिमान् भवेत्॥ ४९<br><br>धनक्षये न मुह्यन्ति न हृष्यन्ति धनागमे।<br>धीराः कार्येषु च सदा भवन्ति पुरुषोत्तमाः॥ ५०<br><br>एवं विदित्वा दैत्येन्द्र न विषादं कथंचन।<br>कर्तुमर्हसि विद्वांस्त्वं पण्डितो नावसीदति॥ ५१<br>तथाऽन्यच्च महाबाहो हितं शृणु महार्थकम्।<br>भवतोऽथ तथाऽन्येषां श्रुत्वा तच्च समाचर॥ ५२<br>शरण्यं शरणं गच्छ तमेव पुरुषोत्तमम्।<br>स ते त्राता भयादस्माद् दानवेन्द्र भविष्यति॥ ५३<br>ये संश्रिता हरिमन्तनादिमध्यं<br>विष्णुं चराचरगुरुं हरिमीशितारम्।<br>संसारगर्तपतितस्य करावलम्बं<br>नूनं न ते भुवि नरा ज्वरिनो भवन्ति॥ ५४<br>तन्मना दानवश्रेष्ठ तद्भक्तश्च भवाधुना।<br>स एष भवतः श्रेयो विधास्यति जनार्दनः॥ ५५<br>अहं च पापोपशमार्थमीश-<br>माराध्य यास्ये प्रतितीर्थयात्राम्।<br>विमुक्तपापश्च ततो गमिष्ये<br>यत्राच्युतो लोकपतिर्नृसिंहः॥ ५६ | गया था। इसलिये विभो ! राज्यके लिये कष्ट मत करो। अवश्यम्भावी विषय कभी भी विनष्ट नहीं होते। बुद्धिमान् व्यक्तिको पुत्र, मित्र, पत्नी, राज्यभोग और धनके आने तथा जानेपर चिन्तित नहीं होना चाहिये॥ ४४–४७॥<br><br>दैत्येन्द्र ! पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके विधानसे जैसे-जैसे सुख और दुःख आते हैं, मनुष्यको उसी प्रकार उनको सहन कर लेना चाहिये। संयम करनेवाले व्यक्तिको आपत्तियोंका आगमन देखकर पीड़ित नहीं होना चाहिये एवं अत्यन्त अधिक सम्पत्तिको देखकर धीरता नहीं खो देनी चाहिये। उत्तम पुरुष धनके नष्ट होनेपर चिन्ता एवं धनकी प्राप्ति होनेपर हर्ष नहीं करते। वे कर्तव्य कर्मके प्रति सदा धीर बने रहते हैं। दैत्येन्द्र ! इस प्रकार जानकर तुम्हें किसी प्रकारका शोक नहीं करना चाहिये; तुम विद्वान् हो! विद्वान् व्यक्ति दुःखी नहीं होते॥ ४८–५१॥<br><br>महाबाहो! तुम अपने लिये तथा अन्योंके लिये महान् अर्थपूर्ण एवं कल्याणकर (वचन) सुनो और सुनकर वैसा ही करो। दानवेन्द्र ! तुम उन्हीं शरणागतकी रक्षा करनेवाले पुरुषोत्तमकी शरणमें जाओ। वे ही इस भयसे तुम्हारी रक्षा करेंगे। आदि, मध्य और अन्तसे हीन, चर और अचरके गुरु, संसाररूपी गर्तमें गिरे हुओंके लिये हाथका आश्रय देनेवाले एवं सबके नियन्ता हरि विष्णुकी शरणमें जानेवाले मनुष्य निश्चय ही संसारमें संतप्त नहीं होते। दानवश्रेष्ठ! अब तुम अपना मन उन्हींमें लगाकर उनके भक्त बनो। वे जनार्दन ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। मैं भी पापके विनाशके लिये ईश्वरकी आराधनाकर तीर्थयात्रा करने जाऊँगा और पापसे विमुक्त होकर मैं वहाँ जाऊँगा, जहाँ लोकपति अच्युत नृसिंह हैं॥ ५२–५६॥ | | <center>पुलस्त्य उवाच</center><br>इत्येवमाश्वास्य बलिं महात्मा<br>संस्मृत्य योगाधिपतिं च विष्णुम्।<br>आमन्त्र्य सर्वान् दनुयूथपालान्<br>जगाम कर्तुं त्वथ तीर्थयात्राम्॥ ५७ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकार बलिको आश्वासन देनेके बाद महात्मा (प्रह्लाद)-ने योगके अधिपति विष्णुका स्मरण किया और दानवसमूहोंके पालकोंसे अनुमति लेकर तीर्थयात्रा करने चले गये॥ ५७॥ |
<center>॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सतहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७७ ॥</center>अध्याय ७८ ] प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव [ ३८३
अठहत्तरवाँ अध्याय
प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान, वामनका प्रादुर्भाव और उनके लिये दान देनेका धुन्धुका निश्चय, वामनका त्रिविक्रम होना और धुन्धुका वध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>कानि तीर्थानि विप्रेन्द्र प्रह्लादोऽनुजगाम ह।<br>प्रह्लादतीर्थयात्रां मे सम्यगाख्यातुमर्हसि॥ १ | नारदने कहा (पूछा)— श्रेष्ठ विप्र! प्रह्लाद (क्रमशः) किन-किन तीर्थोंमें गये। कृपया आप मुझसे प्रह्लादकी तीर्थयात्राका भलीभाँति वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि पापपङ्कप्रणाशिनीम्।<br>प्रह्लादतीर्थयात्रां ते शुद्धपुण्यप्रदायिनीम्॥ २<br>संत्यज्य मेरुं कनकाचलेन्द्रं<br>तीर्थं जगामामरसंघजुष्टम्।<br>ख्यातं पृथिव्यां शुभदं हि मानसं<br>यत्र स्थितो मत्स्यवपुः सुरेशः॥ ३<br>तस्मिंस्तीर्थवरे स्नात्वा संतर्प्य पितृदेवताः।<br>सम्पूज्य च जगन्नाथमच्युतं श्रुतिभिर्युतम्॥ ४<br>उपोष्य भूयः सम्पूज्य देवर्षिपितृमानवान्।<br>जगाम कच्छपं द्रष्टुं कौशिक्यां पापनाशनम्॥ ५<br>तस्यां स्नात्वा महानद्यां सम्पूज्य च जगत्पतिम्।<br>समुपोष्य शुचिर्भूत्वा दत्त्वा विप्रेषु दक्षिणाम्॥ ६<br>नमस्कृत्य जगन्नाथमथो कूर्मवपुर्धरम्।<br>ततो जगाम कृष्णाख्यं द्रष्टुं वाजिमुखं प्रभुम्।<br>तत्र देवह्रदे स्नात्वा तर्पयित्वा पितॄन् सुरान्॥ ७<br>सम्पूज्य हयशीर्षं च जगाम गजसाह्वयम्।<br>तत्र देवं जगन्नाथं गोविन्दं चक्रपाणिनम्॥ ८<br>स्नात्वा सम्पूज्य विधिवज्जगाम यमुनां नदीम्।<br>तस्यां स्नातः शुचिर्भूत्वा संतर्प्यर्षिसुरान् पितॄन्।<br>ददर्श देवदेवेशं लोकनाथं त्रिविक्रमम्॥ ९ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! सुनिये; मैं आपसे पापरूपी कीचड़को नष्ट करनेवाली एवं पवित्र पुण्यको देनेवाली प्रह्लादकी तीर्थयात्राको कहता हूँ। सुवर्णमय श्रेष्ठ मेरु पर्वतको छोड़कर वे (सबसे पहले) देवोंसे सेवित (और) पृथ्वीमें प्रसिद्ध कल्याणदायी मानसतीर्थमें गये, जहाँ मत्स्यशरीरधारी (मत्स्यावतारी) देवाधिदेव निवास करते हैं। उस उत्तम तीर्थमें स्नान और पितृ-देव-तर्पण कर उन्होंने वेद-मन्त्रोंसे अच्युत भगवान् विश्वेशका पूजन किया। फिर वहाँ उपवास रहकर देवों, ऋषियों, पितरों और मनुष्योंकी (यथायोग्य) पूजा कर कौशिकीमें (अवस्थित) पापका नाश करनेवाले भगवान् कच्छपका दर्शन करने गये। उस महानदीमें स्नान करनेके बाद उन्होंने जगत्स्वामी भगवान्की पूजा की और उपवास (व्रत) करके पवित्र होकर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दी। उसके बाद कच्छपावतार जगन्नाथ भगवान्को नमस्कार कर वे वहाँसे कृष्ण नामके अश्वमुख भगवान्का दर्शन करने चले गये। वहाँ उन्होंने देवह्रदमें स्नानकर देवों एवं पितरोंका तर्पण किया और हयग्रीव भगवान्का अर्चन कर वे हस्तिनापुर चले गये। वहाँ स्नान करनेके बाद चक्रपाणि विश्वपति गोविन्ददेवकी विधिसे पूजा करनेके बाद वे यमुना नदीके पास पहुँच गये। उसमें स्नान करके पवित्र होकर उन्होंने ऋषियों, पितरों और देवोंका तर्पण किया तथा देवोंके देव जगन्नाथ त्रिविक्रम (वामन भगवान्)-का दर्शन किया॥ २—९॥ |
| नारद उवाच<br>साम्प्रतं भगवान् विष्णुस्त्रैलोक्याक्रमणं वपुः।<br>करिष्यति जगत्स्वामी बलेर्बन्धनमीश्वरः॥ १० | नारदजीने पूछा— इस समय जगत्स्वामी भगवान् विष्णु तीनों लोकोंको आक्रान्त करनेवाला (विशालतम्) देह धारण करेंगे और बलिको बाँधेंगे तो वे भगवान् |
| ३८४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७८ |
|---|
| तत्कथं पूर्वकालेऽपि विभुरासीत् त्रिविक्रमः।<br>कस्य वा बन्धनं विष्णुः कृतवांस्तच्च मे वद ॥ ११ | विष्णु पहले समयमें भी कैसे त्रिविक्रम हुए थे और (उस समय) उन्होंने किसका बन्धन किया था—यह मुझे बतलाइये ॥ १०-११॥ |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच | **पुलस्त्यजी बोले—**नारदजी! वे त्रिविक्रम भगवान् |
| श्रूयतां कथयिष्यामि योऽयं प्रोक्तस्त्रिविक्रमः।<br>यस्मिन् काले सम्बभूव यं च वञ्चितवानसौ ॥ १२ | कौन हैं, कब हुए और उन्होंने किसको ठगा ? यह सब जो आपने पूछा है उसे मैं कहता हूँ; आप सुनिये—दनुके |
| आसीद् धुन्धुरिति ख्यातः कश्यपस्यौरसः सुतः।<br>दनुगर्भसमुद्भूतो महाबलपराक्रमः ॥ १३ | गर्भसे उत्पन्न अत्यन्त बलवान् एवं पराक्रमी धुन्धु नामसे प्रसिद्ध कश्यपका एक औरस पुत्र था। नारदजी! |
| स समाराध्य वरदं ब्रह्माणं तपसाऽसुरः।<br>अवध्यत्वं सुरैः सेन्द्रैः प्रार्थयत् स तु नारद ॥ १४ | उस दैत्यने तपस्यासे वरदानी ब्रह्माकी आराधना करके उनसे इन्द्र आदि देवताओंसे (अपनेको) अवध्य होनेकी याचना की। (उसकी) तपस्यासे प्रसन्न होकर |
| तद् वरं तस्य च प्रादात् तपसा पङ्कजोद्भवः।<br>परितुष्टः स च बली निर्जगाम त्रिविष्टपम् ॥ १५ | कमल-योनि ब्रह्माजीने उसे वह (वाञ्छित) वर दे दिया। उसके बाद वह बलवान् धुन्धु स्वर्गमें चला गया। |
| चतुर्थस्य कलेरादौ जित्वा देवान् सवासवान्।<br>धुन्धुः शक्रत्वमकरोद्धिरण्यकशिपौ सति ॥ १६ | चतुर्थ कलियुगके आदिमें हिरण्यकशिपुके वर्तमान रहते समय धुन्धु इन्द्रसहित देवोंको जीतकर स्वयं इन्द्र बन गया। |
| तस्मिन् काले स बलवान् हिरण्यकशिपुस्ततः।<br>चचार मन्दरगिरौ दैत्यं धुन्धुं समाश्रितः ॥ १७ | उस समय धुन्धुका आश्रय लेकर बलवान् दैत्य हिरण्यकशिपु मन्दरपर्वतपर (स्वच्छन्दतासे) विचरण कर रहा था। |
| ततोऽसुरा यथा कामं विहरन्ति त्रिविष्टपे।<br>ब्रह्मलोके च त्रिदशाः संस्थिता दुःखसंयुताः ॥ १८ | दैत्यगण भी स्वच्छन्दतासे स्वर्गमें विचरण करने लगे। (इससे) सभी देवता दुखी होकर ब्रह्मलोकमें जाकर रहने लगे ॥ १२–१८ ॥ |
| ततोऽमरान् ब्रह्मसदो निवासिनः<br>श्रुत्वाऽथ धुन्धुर्दितिजानुवाच।<br>व्रजाम दैत्या वयमग्रजस्य<br>सदो विजेतुं त्रिदशान् सशक्रान् ॥ १९ | तब देवताओंका ब्रह्मलोकमें रहना सुनकर धुन्धुने दैत्योंसे कहा—दैत्यो! इन्द्रसहित देवोंको जीतनेके लिये हमलोग (अब) ब्रह्मलोक चलें। धुन्धुका वचन सुनकर |
| ते धुन्धुवाक्यं तु निशम्य दैत्याः<br>प्रोचुर्न नो विद्यति लोकपाल।<br>गतिर्यया याम पितामहाजिरं<br>सुदुर्गमोऽयं परतो हि मार्गः ॥ २० | उन दैत्योंने कहा—लोकपाल! हमलोगोंमें वह गति नहीं है, जिससे पितामह (ब्रह्मा)-के लोकमें जा सकें। (वहाँका) मार्ग बहुत दूर एवं बीहड़ है। |
| इतः सहस्रैर्बहुयोजनाख्यै-<br>र्लोको महर्नाम महर्षिजुष्टः।<br>येषां हि दृष्ट्याऽर्पणचोदितेन<br>दह्यन्ति दैत्याः सहसेक्षितेन ॥ २१ | यहाँसे हजारों योजन दूर महर्षियोंसे सेवित 'मह' नामका लोक है। उन ऋषियोंकी सहसा दृष्टि पड़ते ही समस्त दैत्य जल जाते हैं। |
| ततोऽपरो योजनकोटिना वै<br>लोको जनो नाम वसन्ति यत्र।<br>गोमातरोऽस्मासु विनाशकारि<br>यासां रजोऽपीह महासुरेन्द्र ॥ २२ | उससे भी आगे कोटि योजन दूर 'जन' नामक एक लोक है जहाँ गोमाताएँ रहती हैं! महासुरेन्द्र! उनकी धूलि भी हमलोगोंका विनाश कर सकती है। |
| ततोऽपरो योजनकोटिभिस्तु<br>षड्भिस्तपो नाम तपस्विजुष्टः।<br>तिष्ठन्ति यत्रासुर साध्यवर्या<br>येषां हि निःश्वासमरुत् त्वसह्यः ॥ २३ | उसके बाद छः करोड़ योजनकी दूरीपर तपस्वियोंसे भरा 'तप' लोक है। असुरराज! वहाँ श्रेष्ठ साध्यगण रहते हैं। उनका निःश्वास-वायु असहनीय है ॥ १९–२३ ॥ |
अध्याय ७८ ] प्रह्लादकी तीर्थयात्रा, धुन्धु और वामन-प्रसङ्ग, धुन्धुका यज्ञानुष्ठान और वामनका प्रादुर्भाव ३८५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततोऽपरो योजनकोटिभिस्तु<br>त्रिंशद्भिरादित्यसहस्रदीप्तिः ।<br>सत्याभिधानो भगवन्निवासो<br>वरप्रदोऽभूद् भवतो हि योऽसौ ॥ २४<br>यस्य वेदध्वनिं श्रुत्वा विकसन्ति सुरादयः ।<br>संकोचमसुरा यान्ति ये च तेषां सधर्मिणः ॥ २५<br>तस्मान्मा त्वं महाबाहो मतिमेतां समादधः ।<br>वैराजभुवनं धुन्धो दुरारोहं सदा नृभिः ॥ २६<br>तेषां वचनमाकर्ण्य धुन्धुः प्रोवाच दानवान् ।<br>गन्तुकामः स सदनं ब्रह्मणो जेतुमीश्वरान् ॥ २७ | उसके बाद तीस करोड़ योजनकी दूरीपर हजारों सूर्योंके समान प्रदीप्त 'सत्य'नामका लोक है। वह लोक उन्हीं भगवान्का निवास-स्थल है, जिन्होंने आपको वर दिया था। जिनकी वेदध्वनि सुनकर देवता आदि विकसित हो जाते हैं तथा दैत्य और उनके समान धर्मवाले संकुचित (म्लान) हो जाते हैं। अतः महाबाहु धुन्धो! आप ऐसी बुद्धि न करें; क्योंकि ब्रह्मलोक मनुष्यों (एवं दैत्यों)-के लिये सदैव अगम्य है। उनकी बात सुनकर (भी) देवोंको जीतनेके लिये ब्रह्मलोक जानेकी इच्छावाले धुन्धुने दानवोंसे (फिर) कहा— ॥ २४-२७ ॥ |
| कथं तु कर्मणा केन गम्यते दानवर्षभाः ।<br>कथं तत्र सहस्राक्षः सम्प्राप्तः सह दैवतैः ॥ २८<br>ते धुन्धुना दानवेन्द्राः पृष्टाः प्रोचुर्वचोऽधिपम् ।<br>कर्म तन्न वयं विद्मः शुक्रस्तद् वेत्त्यसंशयम् ॥ २९<br>दैत्यानां वचनं श्रुत्वा धुन्धुर्दैत्यपुरोहितम् ।<br>पप्रच्छ शुक्रं किं कर्म कृत्वा ब्रह्मस्रदोगतिः ॥ ३०<br>ततोऽस्मै कथयामास दैत्याचार्यः कलिप्रिय ।<br>शक्रस्य चरितं श्रीमान् पुरा वृत्ररिपोः किल ॥ ३१<br>शक्रः शतं तु पुण्यानां क्रतूनामयजत् पुरा ।<br>दैत्येन्द्र वाजिमेधानां तेन ब्रह्मसदो गतः ॥ ३२ | दानवश्रेष्ठो! वहाँ कैसे और किस कर्मसे जाया जा सकता है ? इन्द्र देवोंके साथ वहाँ कैसे पहुँचे ? धुन्धुके पूछनेपर उन श्रेष्ठ दानवोंने कहा—हमलोग उस कर्मको तो नहीं जानते, किंतु शुक्राचार्य उसको निःसंदेह जानते हैं। दैत्योंका वचन सुनकर धुन्धुने दैत्योंके पुरोहित शुक्राचार्यजीसे पूछा—(आचार्यजी!) किस कर्मको करनेसे ब्रह्मलोकमें जाया जा सकता है? (पुलस्त्यजी कहते हैं—) कलिप्रिय! उसके बाद दैत्योंके गुरु श्रीमान् शुक्राचार्यने उससे वृत्रशत्रु इन्द्रका चरित कहा। उन्होंने कहा—दैत्येन्द्र! पहले समयमें इन्द्रने सौ पवित्र अश्वमेध-यज्ञ किये थे। इसीसे वे ब्रह्मलोक गये ॥ २८-३२ ॥ |
| तद्वाक्यं दानवपतिः श्रुत्वा शुक्रस्य वीर्यवान् ।<br>यष्टुं तुरगमेधानां चकार मतिमुत्तमाम् ॥<br>अथामन्त्र्यासुरगुरुं दानवांश्चाप्यनुत्तमान् ॥ ३३<br>प्रोवाच यक्ष्येऽहं यज्ञैरश्वमेधैः सदक्षिणैः ।<br>तदागच्छध्वमवनीं गच्छामो वसुधाधिपान् ॥ ३४<br>विजित्य हयमेधान् वै यथाकामगुणान्वितान् ।<br>आहूयन्तां च निधयस्त्वाज्ञाप्यन्तां च गुह्यकाः ॥ ३५<br>आमन्त्र्यन्तां च ऋषयः प्रयामो देविकातटम् ।<br>सा हि पुण्या सरिच्छ्रेष्ठा सर्वसिद्धिकरी शुभा ।<br>स्थानं प्राचीनमासाद्य वाजिमेधान् यजामहे ॥ ३६ | शुक्राचार्यके उस वाक्यको सुनकर बलवान् दानवपतिने अश्वमेधयज्ञ करनेकी उत्कट इच्छा की। उसके बाद दैत्योंके गुरुको और अच्छे दैत्योंको बुलाकर उसने कहा—मैं दक्षिणासहित अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा। इसलिये आओ, हमलोग पृथ्वीपर चलें और राजाओंको जीतकर इच्छानुकूल सामग्री एवं विधिसे पूर्ण अश्वमेधोंका अनुष्ठान करें। निधियोंको बुलाओ एवं गुह्यकोंको आदेश दे दो और ऋषियोंको आमन्त्रित करो। हमलोग देविकाके तटपर चलें। वह पुनीत उत्तम नदी कल्याणदायिनी तथा सर्वसिद्धिकारिणी है। उस प्राचीन स्थानपर पहुँचकर हम अश्वमेधयज्ञ करेंगे ॥ ३३-३६ ॥ |
| इत्थं सुरारेर्वचनं निशम्यासुरयाजकः ।<br>बाढमित्यब्रवीद्धुन्धो निधयः संदिदेश सः ॥ ३७ | देवोंके शत्रु धुन्धुके उस वचनको सुनकर दैत्योंके यज्ञ करानेवाले शुक्राचार्यने 'ठीक है'—ऐसा कहा और प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने निधियोंको आदेश दे दिया। उसके |