वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ८७ ] अगस्त्यद्वारा कथित पापप्रशमनस्तोत्र [ ४३३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमस्ये स्थाणुमनघं नमस्ये वनमालिनम्।<br>नमस्ये लाङ्गलीशं च नमस्येऽहं श्रियः पतिम्॥ १२<br>नमस्ये च त्रिनयनं नमस्ये हव्यवाहनम्।<br>नमस्ये च त्रिसौवर्णं नमस्ये धरणीधरम्॥ १३<br>त्रिणाचिकेतं ब्रह्मेशं नमस्ये शशिभूषणम्।<br>कपर्दिनं नमस्ये च सर्वामयविनाशनम्॥ १४<br>नमस्ये शशिनं सूर्यं ध्रुवं रौद्रं महौजसम्।<br>पद्मनाभं हिरण्याक्षं नमस्ये स्कन्दमव्ययम्॥ १५<br>नमस्ये भीमर्हंसौ च नमस्ये हाटकेश्वरम्।<br>सदाहंसं नमस्ये च नमस्ये प्राणतर्पणम्॥ १६ | मैं स्थाणु एवं अनघको नमस्कार करता हूँ तथा वनमालीको नमस्कार करता हूँ। मैं लाङ्गलीश तथा लक्ष्मीपतिको नमस्कार करता हूँ। मैं त्रिनेत्रको प्रणाम करता हूँ तथा हव्यवाहनको नमस्कार करता हूँ। मैं त्रिसौवर्णको नमस्कार करता हूँ तथा धरणीधरको नमस्कार करता हूँ। मैं त्रिणाचिकेत, ब्रह्मेश तथा शशिभूषणको प्रणाम करता हूँ। मैं सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करनेवाले कपर्दीभगवान्को प्रणाम करता हूँ। मैं चन्द्र, सूर्य, ध्रुव तथा महान् ओजस्वी रुद्रभगवान्को प्रणाम करता हूँ। मैं पद्मनाभ, हिरण्याक्ष तथा अव्यय स्कन्दको प्रणाम करता हूँ। मैं भीम और हंसको प्रणाम करता हूँ। मैं हाटकेश्वरको प्रणाम करता हूँ। मैं सदाहंसको प्रणाम करता हूँ और प्राणोंको तृप्त करनेवालेको प्रणाम करता हूँ॥ ९—१६॥ |
| नमस्ये रुक्मकवचं महायोगिनमीश्वरम्।<br>नमस्ये श्रीनिवासं च नमस्ये पुरुषोत्तमम्॥ १७<br>नमस्ये च चतुर्बाहुं नमस्ये वसुधाधिपम्।<br>वनस्पतिं पशुपतिं नमस्ये प्रभुमव्ययम्॥ १८<br>श्रीकण्ठं वासुदेवं नीलकण्ठं सदण्डिनम्।<br>नमस्ये सर्वमनघं गौरीशं नकुलीश्वरम्॥ १९<br>मनोहरं कृष्णकेशं नमस्ये चक्रपाणिनम्।<br>यशोधरं महाबाहुं नमस्ये च कुशप्रियम्॥ २०<br>भूधरं छादितगदं सुनेत्रं शूलशङ्खिनम्।<br>भद्राक्षं वीरभद्रं च नमस्ये शङ्कुकर्णिकम्॥ २१<br>वृषध्वजं महेशं च विश्वामित्रं शशिप्रभम्।<br>उपेन्द्रं चैव गोविन्दं नमस्ये पङ्कजप्रियम्॥ २२<br>सहस्रशिरसं देवं नमस्ये कुन्दमालिनम्।<br>कालाग्निं रुद्रदेवेशं नमस्ये कृत्तिवाससम्॥ २३<br>नमस्ये छागलेशं च नमस्ये पङ्कजासनम्।<br>सहस्राक्षं कोकनदं नमस्ये हरिशङ्करम्॥ २४ | मैं रुक्म-कवच धारण करनेवाले महायोगी ईश्वरको नमस्कार करता हूँ और पुरुषोत्तम श्रीनिवासभगवान्को नमस्कार करता हूँ। मैं चार भुजा धारण करनेवाले देवको प्रणाम करता हूँ। मैं पृथ्वीके अधिपतिको प्रणाम करता हूँ। मैं वनस्पति, पशुपति और अव्यय प्रभुको प्रणाम करता हूँ। मैं श्रीकण्ठ वासुदेव, दण्डसहित नीलकण्ठ, सर्व, अनघ, गौरीश तथा नकुलीश्वरभगवान्को नमस्कार करता हूँ। मैं मनको हरण करनेवाले कृष्णकेश चक्रपाणि भगवान्को नमस्कार करता हूँ और यशोधारी, महाबाहु कुशप्रियको नमस्कार करता हूँ। मैं भूधर, छादितगद, सुनेत्र, शूलशंखी, भद्राक्ष, वीरभद्र तथा शंकुकर्णिकको नमस्कार करता हूँ। मैं वृषध्वज, महेश, विश्वामित्र, शशिप्रभ, उपेन्द्र, गोविन्द तथा पङ्कजप्रियको नमस्कार करता हूँ। मैं सहस्रशीर्षा तथा कुन्दमाली देवको नमस्कार करता हूँ। मैं कालाग्नि, रुद्रदेवेश तथा कृत्तिवासाको प्रणाम करता हूँ। मैं छागलेशको नमस्कार करता हूँ तथा पङ्कजासनको नमस्कार करता हूँ। मैं सहस्राक्ष, कोकनद तथा हरिशंकरको नमस्कार करता हूँ॥ १७—२४॥ |
| अगस्त्यं गरुडं विष्णुं कपिलं ब्रह्मवाङ्मयम्।<br>सनातनं च ब्रह्माणं नमस्ये ब्रह्मतत्परम्॥ २५ | मैं अगस्त्य, गरुड, विष्णु, कपिल, ब्रह्मवाङ्मय, सनातन, ब्रह्मा तथा ब्रह्मतत्परको नमस्कार करता हूँ। |
| ४३४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८८ |
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| अप्रतर्क्यं चतुर्बाहुं सहस्त्रांशुं तपोमयम्।<br>नमस्ये धर्मराजानं देवं गरुडवाहनम्॥ २६<br><br>सर्वभूतगतं शान्तं निर्मलं सर्वलक्षणम्।<br>महायोगिनमव्यक्तं नमस्ये पापनाशनम्॥ २७<br><br>निरञ्जनं निराकारं निर्गुणं निर्मलं पदम्।<br>नमस्ये पापहन्तारं शरण्यं शरणं व्रजे॥ २८<br><br>एतत् पवित्रं परमं पुराणं<br>प्रोक्तं त्वगस्त्येन महर्षिणा च।<br>धन्यं यशस्यं बहुपापनाशनं<br>संकीर्तनात् स्मरणात् संश्रवाच्च॥ २९ | मैं अनुमानसे परे, चार भुजाधारी, सहस्रांशु, तपोमूर्ति, धर्मराज गरुड़वाहन देवको नमस्कार करता हूँ। मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्याप्त, शान्तस्वरूप, निर्मल, समस्त लक्षणोंसे युक्त, महान् योगी, अव्यक्तस्वरूप एवं पाप नाश करनेवाले भगवान्को नमस्कार करता हूँ। मैं निरञ्जन, निराकार, गुणोंसे रहित, निर्मलपदस्वरूप, पाप हरण करनेवालेको नमस्कार करता हूँ तथा शरणागतकी रक्षा करनेवालेकी शरणमें जाता हूँ। महर्षि अगस्त्यने इस परम पवित्र पुरातन स्तोत्रको कहा था। इसके कथन, स्मरण तथा श्रवण करनेसे अनेक पापोंका विनाश हो जाता है और मनुष्य धन्य एवं यशस्वी हो जाता है॥ २५—२९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्तासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८७॥
अट्टासीवाँ अध्याय
बलिको कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव, उनकी स्तुति, बलिके यज्ञमें जानेकी उत्कण्ठा और भरद्वाजसे स्वस्थानका कथन
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— |
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| गतेऽथ तीर्थयात्रायां प्रह्लादे दानवेश्वरे।<br>कुरुक्षेत्रं समभ्यागाद् यष्टुं वैरोचनो बलिः॥ १ | दानवेश्वर प्रह्लादके तीर्थयात्राके लिये चले जानेपर विरोचनका पुत्र बलि कुरुक्षेत्रमें यज्ञ करनेके लिये गया। |
| तस्मिन् महाधर्मयुते तीर्थे ब्राह्मणपुङ्गवः।<br>शुक्रो द्विजातिप्रवरानामन्रयत् भार्गवान्॥ २ | उस महान् धर्मयुक्त तीर्थमें ब्राह्मणश्रेष्ठ शुक्राचार्यने द्विजोंमें अत्यन्त श्रेष्ठ भार्गवोंको आमन्त्रित किया। |
| भृगूनामन्त्र्यमाणान् वै श्रुत्वात्रेयाः सगौतमाः।<br>कौशिकाङ्गिरसश्चैव तत्यजुः कुरुजाङ्ग्लान्॥ ३ | भृगुवंशीय ब्राह्मणोंका आमन्त्रित किया जाना सुनकर अत्रि, गौतम, कौशिक और अङ्गिरागोत्रीय ब्राह्मणोंने कुरुजाङ्गलका त्याग कर दिया। |
| उत्तराशां प्रजग्मुस्ते नदीमनु शतद्रुकाम्।<br>शातद्रवे जले स्नात्वा विपाशां प्रययुस्ततः॥ ४ | वे उत्तर दिशामें शतद्रु नदीके तटपर गये। शतद्रुके जलमें स्नान करनेके बाद वे वहाँसे विपाशा नदीके निकट चले गये। |
| विज्ञाय तत्राप्यरतिं स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः।<br>प्रजग्मुः किरणां पुण्यां दिनेशकिरणच्युताम्॥ ५ | वहाँ भी मनके अनुकूल न होनेके कारण वे सब स्नान करनेके पश्चात् पितरों एवं देवोंका पूजन कर सूर्यकी किरणोंसे उत्पन्न किरणा नदीके समीप गये। |
अध्याय ८८ ] बलिका कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव ४३५
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्यां स्नात्वाऽर्च्य देवर्षे सर्व एव महर्षयः।<br>ऐरावतीं सुपुण्योदां स्नात्वा जग्मुरथेश्वरीम्॥ ६<br><br>देविकाया जले स्नात्वा पयोष्ण्यां चैव तापसाः।<br>अवतीर्णा मुने स्नातुमात्रेयाद्याः शुभां नदीम्॥ ७<br><br>ततो निमग्ना ददृशुः प्रतिबिम्बमथात्मनः।<br>अन्तर्जले द्विजश्रेष्ठ महदाश्चर्यकारकम्॥ ८ | देवर्षे! उसमें स्नान और अर्चन करनेके बाद सभी महर्षि पवित्र जलवाली ऐरावती नदीके निकट गये तथा उसमें स्नान करके ईश्वरी नदीके तटपर चले गये। मुने! देविका और पयोष्णीमें स्नान करके आत्रेय आदि तपस्वियोंने शुभा नामकी नदीमें स्नान करनेके लिये प्रवेश किया। द्विजश्रेष्ठ! जलमें गोता लगानेपर उन लोगोंने जलके भीतर महान् आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली अपनी-अपनी परछाई देखी॥ ६-८॥ |
| उन्मज्जने च ददृशुः पुनर्विस्मितमानसाः।<br>ततः स्नात्वा समुत्तीर्णा ऋषयः सर्व एव हि॥ ९<br><br>जग्मुस्ततोऽपि ते ब्रह्मन् कथयन्तः परस्परम्।<br>चिन्तयन्तश्च सततं किमेतदिति विस्मिताः॥ १०<br><br>ततो दूरादपश्यन्त वनषण्डं सुविस्तृतम्।<br>वनं हरगलश्यामं खगध्वनिनिनादितम्॥ ११<br><br>अतितुङ्गतया व्योम आवृण्वानं नगोत्तमम्।<br>विस्तृताभिर्जटाभिस्तु अन्तर्भूमिं च नारद॥ १२<br><br>काननं पुष्पितैर्वृक्षैरतिभाति समन्ततः।<br>दशार्द्धवर्णैः सुखदैर्नभस्तारागणैरिव॥ १३<br><br>तं दृष्ट्वा कमलैर्व्याप्तं पुण्डरीकैश्च शोभितम्।<br>तद्वत् कोकनदैर्व्याप्तं वनं पद्मवनं यथा॥ १४<br><br>प्रजग्मुस्तुष्टिमंतुलां ते ह्लादं परमं ययुः।<br>विविशुः प्रीतमनसो हंसा इव महासरः॥ १५<br><br>तन्मध्ये ददृशुः पुण्यमाश्रमं लोकपूजितम्।<br>चतुर्णां लोकपालानां वर्गाणां मुनिसत्तम॥ १६ | महर्षियोंने डुबकी लगानेके बाद जब सिर ऊपर किया, तब पुनः वैसा ही देखा; इससे वे आश्चर्यमें भर गये। उसके बाद स्नान करके सभी ऋषि बाहर निकले। ब्रह्मन्! उसके पश्चात् वे सभी लोग यह क्या है?—इस विषयमें आश्चर्यपूर्वक आपसमें बातचीत एवं विचार-विमर्श करते हुए वहाँसे भी चले गये। उसके बाद उन लोगोंने दूरसे ही अतिविस्तृत, शंकरके कण्ठकी भाँति श्यामवर्णवाले और पक्षियोंकी ध्वनिसे भरा एक वृक्षोंका समूह (वन) देखा। नारदजी! वह वन अत्यन्त ऊँचा होनेके कारण आकाशको घेरे हुए था तथा उसकी नीचेकी भूमि बिखरे हुए फूलोंसे ढकी रहती थी। वह वन तारागणोंसे जगमगाते हुए आकाशके समान खिले हुए पाँचरंगे वृक्षोंसे बहुत सुन्दर लग रहा था। कमल-वनके समान कमलोंसे व्याप्त, पुण्डरीकोंसे विभूषित एवं कोकनदोंसे भरे उस वनको देखकर वे अत्यन्त प्रसन्न एवं गद्गद हो गये। वे लोग संतुष्ट-चित्तसे उसमें इस प्रकार प्रविष्ट हुए, जिस प्रकार हंस महासरोवरमें प्रवेश करते हैं। मुनिसत्तम! उन लोगोंने उसके बीचमें लोकपालोंके चार वर्गों (धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष)-का लोकपूजित पवित्र आश्रम देखा॥ ९—१६॥ |
| धर्माश्रमं प्राङ्मुखं तु पलाशविटपावृतम्।<br>प्रतीच्याभिमुखं ब्रह्मन् अर्थस्येक्षुवनावृतम्॥ १७<br><br>दक्षिणाभिमुखं काम्यं रम्भाशोकवनावृतम्।<br>उदङ्मुखं च मोक्षस्य शुद्धस्फटिकवर्चसम्॥ १८ | ब्रह्मन्! पूर्व दिशाकी ओर मुखवाला पलाशवृक्षसे घिरा हुआ धर्माश्रम, पश्चिममुख इक्षुवनसे घिरा हुआ अर्थाश्रम, दक्षिणकी ओर कदली और अशोकके वनसे घिरा हुआ कामाश्रम तथा उत्तरकी ओर शुद्धस्फटिकके समान तेजस्वी मोक्षाश्रम स्थित था। |
| ४३६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८८ | | :--- | :--- |
| कृतान्ते त्वाश्रमी मोक्षः कामस्त्रेतान्तरे श्रमी।<br>आश्रम्यर्थो द्वापरान्ते तिष्यादौ धर्म आश्रमी ॥ १९<br><br>तान्याश्रमाणि मुनयो दृष्ट्वात्रेयादयोऽव्ययाः।<br>तत्रैव च रतिं चक्रुरखण्डे सलिलाप्लुते ॥ २०<br><br>धर्माद्यैर्भगवान् विष्णुरखण्ड इति विश्रुतः।<br>चतुर्मूर्तिर्जगन्नाथः पूर्वमेव प्रतिष्ठितः ॥ २१<br><br>तमर्चयन्ति ऋषयो योगात्मानो बहुश्रुताः।<br>शुश्रूषयाऽथ तपसा ब्रह्मचर्येण नारद ॥ २२<br><br>एवं ते न्यवसंस्तत्र समेता मुनयो वने।<br>असुरेभ्यस्तदा भीताः स्वाश्रित्याखण्डपर्वतम् ॥ २३<br><br>तथाऽन्ये ब्राह्मणा ब्रह्मन् अश्मकुट्टा मरीचिपाः।<br>स्नात्वा जले हि कालिन्द्याः प्रजग्मुर्दक्षिणामुखाः ॥ २४ | सत्ययुगके अन्तमें मोक्ष अपने आश्रममें निवास करने लगता है, त्रेतामें काम आश्रमवासी हो जाता है, द्वापरके अन्तमें अर्थ आश्रमी बन जाता है और कलिके आदिमें धर्म आश्रममें रहना प्रारम्भ करता है। अव्यय, आत्रेय आदि मुनियोंने उन आश्रमोंको देखकर अखण्ड जलसे परिपूर्ण उस स्थानमें सुखसे रहनेका निश्चय किया। धर्म आदिके द्वारा भगवान् विष्णु अखण्ड नामसे विख्यात हैं। जगन्नाथ चार मूर्तियोंवाले हैं, यह पहलेसे ही निश्चित है। नारदजी ! बहुश्रुत योगात्मा ऋषिलोग सेवा, तप और ब्रह्मचर्यके द्वारा उनकी पूजा करते हैं। असुरोंसे त्रस्त होकर वे मुनिगण सम्मिलितरूपसे उस अखण्ड पर्वतका भलीभाँति आश्रयण कर रहने लगे। ब्रह्मन् ! केवल पत्थरसे कूटे हुए अन्नको खानेवाले वानप्रस्थी साधु तथा सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले अन्य ब्राह्मण आदि कालिन्दीके जलमें स्नान कर दक्षिण दिशाकी ओर चले गये ॥ १७—२४॥ | | अवन्तिविषयं प्राप्य विष्णुमासाद्य संस्थिताः।<br>विष्णोरपि प्रसादेन दुष्प्रवेशं महासुरैः ॥ २५<br><br>बालखिल्यादयो जग्मुरवशा दानवाद् भयात्।<br>रुद्रकोटिं समाश्रित्य स्थितास्ते ब्रह्मचारिणः ॥ २६<br><br>एवं गतेषु विप्रेषु गौतमाङ्गिरसादिषु।<br>शुक्रस्तु भार्गवान् सर्वान् निन्ये यज्ञविधौ मुने ॥ २७<br><br>अधिष्ठिते भार्गवैस्तु महायज्ञेऽमितद्युते।<br>यज्ञदीक्षां बलेः शुक्रश्चकार विधिना स्वयंम् ॥ २८<br><br>श्वेताम्बरधरो दैत्यः श्वेतमाल्यानुलेपनः।<br>मृगाजिनावृतः पृष्ठे बर्हिपत्रविचित्रितः ॥ २९<br><br>समास्ते वितते यज्ञे सदस्यैरभिसंवृतः।<br>हयग्रीवप्रलम्बाद्यैर्मयबाणपुरोगमैः ॥ ३०<br><br>पत्नी विन्ध्यावली चास्य दीक्षिता यज्ञकर्मणि।<br>ललनानां सहस्त्रस्य प्रधाना ऋषिकन्यका ॥ ३१<br><br>शुक्रेणाश्वः श्वेतवर्णो मधुमासे सुलक्षणः।<br>महीं विहर्तुमुत्सृष्टस्तारकाक्षोऽन्वगाच्च तम् ॥ ३२ | वे विष्णुभगवान्की कृपासे महान् असुरोंके कारण प्रवेश पानेमें कठिन अवन्ति नगरीमें पहुँचे और उनके निकट रहने लगे। दानवोंके डरसे विवश होकर बालखिल्य आदि ब्रह्मचारी ऋषि रुद्रकोटि चले गये और वहाँ रहने लगे। मुने! इस प्रकार गौतम और आङ्गिरस आदि ब्राह्मणोंके चले जानेपर शुक्राचार्य सभी भार्गववंशीय ब्राह्मणोंको यज्ञ-कार्यमें ले गये। अमिततेजस्विन्! भार्गव-वंशीय ब्राह्मणोंसे अधिकृत शुक्राचार्यने बलिको महायज्ञमें स्वयं विधिवत् यज्ञकी दीक्षा दी। श्वेत वस्त्र धारण करनेवाले, श्वेत माल्य एवं अनुलेपनसे युक्त, मृग-चर्मसे आवृत एवं मयूरपुच्छसे सुसज्जित दैत्य बलिने हयग्रीव, प्रलम्ब, मय एवं बाण आदि सदस्योंसे घिरे हुए विस्तृत यज्ञ-मण्डपमें आसन ग्रहण किया। उसकी पत्नी विन्ध्यावली भी यज्ञकर्ममें दीक्षित हुई। वह ऋषि-कन्या हजारों ललनाओंमें प्रधान थी। शुक्राचार्यने चैत्रमासमें सुलक्षण अश्व पृथ्वीपर विचरण करनेके लिये छोड़ा। तारकाक्ष नामका असुर उसके पीछे-पीछे चलने लगा ॥ २५—३२॥ |
अध्याय ८८ ] बलिका कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव ४३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवमश्वे समुत्सृष्टे वितथे यज्ञकर्मणि।<br>गते च मासत्रितये हूयमाने च पावके ॥ ३३<br>पूज्यमानेषु दैत्येषु मिथुनस्थे दिवाकरे।<br>सुषुवे देवजननी माधवं वामनाकृतिम् ॥ ३४<br>तं जातमात्रं भगवन्तमीशं<br>नारायणं लोकपतिं पुराणम्।<br>ब्रह्मा समभ्येत्य समं महर्षिभिः<br>स्तोत्रं जगादाथ विभोर्महर्षे ॥ ३५<br>नमोऽस्तु ते माधव सत्त्वमूर्ते<br>नमोऽस्तु ते शाश्वत विश्वरूप।<br>नमोऽस्तु ते शत्रुवनेन्धनाग्ने<br>नमोऽस्तु वै पापमहादवाग्ने ॥ ३६<br>नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन।<br>नमस्ते जगदाधार नमस्ते पुरुषोत्तम ॥ ३७<br>नारायण जगन्मूर्ते जगन्नाथ गदाधर।<br>पीतवासः श्रियःकान्त जनार्दन नमोऽस्तु ते ॥ ३८<br>भवांस्त्राता च गोप्ता च विश्वात्मा सर्वगोऽव्ययः।<br>सर्वधारी धराधारी रूपधारी नमोऽस्तु ते ॥ ३९<br>वर्धस्व वर्धिताशेषत्रैलोक्य सुरपूजित।<br>कुरुष्व दैवतपते मघोनोऽश्रुप्रमार्जनम् ॥ ४०<br>त्वं धाता च विधाता च संहर्ता त्वं महेश्वरः।<br>महालय महायोगिन् योगशायिन् नमोऽस्तु ते ॥ ४१ | इस प्रकार उस अश्वके छोड़े जानेपर यज्ञकर्मके चलते हुए अग्निमें हवन करते तीन मास व्यतीत हो जानेपर तथा दैत्योंके पूजित होने और सूर्यके मिथुन-राशिमें सङ्क्रमण करनेपर देवमाता अदितिने वामनके आकारवाले माधवको जन्म दिया। महर्षे! उन भगवान्, ईश, नारायण लोकपति पुराण-पुरुषके अवतार होते ही ब्रह्मा महर्षियोंके साथ उनके निकट गये तथा (उन) विभुकी स्तुति करने लगे। हे माधव! हे सत्त्वमूर्ते! आपको नमस्कार है। हे शाश्वत! हे विश्वरूप! आपको नमस्कार है। शत्रुरूपी वनके ईंधनके लिये हे अग्निस्वरूप! आपको नमस्कार है। पापरूपी वनके लिये हे महादवाग्निस्वरूप! आपको नमस्कार है। हे पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार है। हे विश्वकी सृष्टि करनेवाले! आपको नमस्कार है। हे जगत्के आधार! आपको नमस्कार है। हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। हे नारायण! हे जगन्मूर्ते! हे जगन्नाथ! हे गदाधर! हे पीताम्बर धारण करनेवाले! हे लक्ष्मीपते! हे जनार्दन! आपको नमस्कार है। आप पालन करनेवाले, रक्षक, विश्वकी आत्मा, सर्वत्र गमन करनेवाले, अविनाशी, सबको धारण करनेवाले, पृथिवीको धारण करनेवाले तथा रूप धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। हे देवपूजित! हे सारी त्रिलोकीको बढ़ानेवाले! आपका अभ्युदय हो। हे दैवतपते! आप इन्द्रके आँसू पोंछें। आप धाता, विधाता, संहर्ता, महेश्वर, महालय, महायोगी और योगशायी हैं। आपको नमस्कार है॥ ३३—४१॥ |
| इत्थं स्तुतो जगन्नाथः सर्वात्मा सर्वगो हरिः।<br>प्रोवाच भगवान् मह्यं कुरूपनयनं विभो ॥ ४२<br>ततश्चकार देवस्य जातकर्मादिकाः क्रियाः।<br>भरद्वाजो महातेजा बार्हस्पत्यस्तपोधनः ॥ ४३<br>व्रतबन्धं तथेशस्य कृतवान् सर्वशास्त्रवित्।<br>ततो ददुः प्रीतियुताः सर्व एव वरान् क्रमात् ॥ ४४ | इस प्रकारकी स्तुति किये जानेपर सर्वात्मा, सर्वगामी जगन्नाथभगवान् श्रीहरिने कहा—विभो! मेरा उपनयन-संस्कार कीजिये। उसके बाद बृहस्पतिवंशमें उत्पन्न महातेजस्वी तपोधन भरद्वाजने वामनकी जातकर्म आदि सभी क्रियाएँ सम्पन्न करायीं। उसके पश्चात् सभी शास्त्रोंके वेत्ता भरद्वाजने ईश्वरका व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत) कराया। उसके बाद अन्य सभीने प्रसन्न होकर वटुकको क्रमशः श्रेष्ठ दान दिये। |
| ४३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८८ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
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| यज्ञोपवीतं पुलहस्त्वहं च सितवाससी।<br>मृगाजिनं कुम्भयोनिर्भरद्वाजस्तु मेखलाम् ॥ ४५<br>पालाशनददद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः।<br>अक्षसूत्रं वारुणिस्तु कौशयं वेदमथाङ्गिराः ॥ ४६ | पुलहने यज्ञोपवीत, मैं (पुलस्त्य)-ने दो शुक्ल वस्त्र, अगस्त्यने मृगचर्म तथा भरद्वाजने मेखला दी। ब्रह्माके पुत्र मरीचिने पलाशदण्ड, वारुणि (वसिष्ठ)-ने अक्षसूत्र एवं अङ्गिराने रेशमी वस्त्र तथा वेद दिया॥ ४२—४६॥ |
| छत्रं प्रादाद् रघू राजा उपानद्युगलं नृगः।<br>कमण्डलुं बृहत्तेजाः प्रादाद्विष्णोर्बृहस्पतिः ॥ ४७<br>एवं कृतोपनयनो भगवान् भूतभावनः।<br>संस्तूयमानो ऋषिभिः साङ्गं वेदमधीयत ॥ ४८<br>भरद्वाजादाङ्गिरसात् सामवेदं महाध्वनिम्।<br>महदाख्यानसंयुक्तं गन्धर्वसहितं मुने ॥ ४९<br>मासेनैकेन भगवान् ज्ञानश्रुतिमहार्णवः।<br>लोकाचारप्रवृत्त्यर्थमभूच्छ्रुतिविशारदः ॥ ५०<br>सर्वशास्त्रेषु नैपुण्यं गत्वा देवोऽक्षयोऽव्ययः।<br>प्रोवाच ब्राह्मणश्रेष्ठं भरद्वाजमिदं वचः ॥ ५१ | राजा रघुने छत्र, नृगने एक जोड़ा जूता एवं अत्यन्त तेजस्वी बृहस्पतिने विष्णुको कमण्डलु दिया। इस प्रकार उपनयन-संस्कार हो जानेपर ऋषियोंसे संस्तुत होते हुए भगवान् भूतभावनने (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष-इन) अङ्गोंके साथ चारों वेदोंका अध्ययन किया। मुने! उन्होंने आङ्गिरस भरद्वाजसे गन्धर्वविद्याके साथ महान् आख्यानोंसे पूर्ण महाध्वन्यात्मक सामवेदका अध्ययन किया। इस प्रकार ज्ञानस्वरूप वेदके अगाध समुद्र भगवान् एक मासमें लोकाचारके व्यवहारके लिये वेदविशारद हो गये। समस्त शास्त्रोंमें निपुण होकर अक्षय, अव्यय वामनने ब्राह्मणश्रेष्ठ भरद्वाजजीसे यह वचन कहा— ॥ ४७-५१ ॥ |
| श्रीवामन उवाच<br><br>ब्रह्मन् व्रजामि देह्याज्ञां कुरुक्षेत्रं महोदयम्।<br>तत्र दैत्यपतेः पुण्यो हयमेधः प्रवर्तते ॥ ५२<br><br>समाविष्टानि पश्यस्व तेजांसि पृथिवीतले।<br>ये संनिधानाः सततं मदंशाः पुण्यवर्धनाः।<br>तेनाहं प्रतिजानामि कुरुक्षेत्रं गतो बलिः ॥ ५३ | श्रीवामनजीने कहा— ब्रह्मन्! मैं अत्यन्त उत्तम कुरुक्षेत्रतीर्थमें जाना चाहता हूँ। आप आज्ञा दीजिये। वहाँ दैत्यराज बलिका पवित्र अश्वमेधयज्ञ हो रहा है। देखिये, पृथ्वीतलपर पुण्यकी वृद्धि करनेवाले मेरे स्थानोंमें तेजोंका समावेश हो रहा है। अतः मुझे यह मालूम हो रहा है कि बलि कुरुक्षेत्रमें स्थित हैं॥ ५२-५३॥ |
| भरद्वाज उवाच<br><br>स्वेच्छया तिष्ठ वा गच्छ नाहमाज्ञापयामि ते।<br>गमिष्यामो वयं विष्णो बलेरध्वरं मा खिद ॥ ५४<br>यद् भवन्तमहं देव परिपृच्छामि तद् वद।<br>केषु केषु विभो नित्यं स्थानेषु पुरुषोत्तम।<br>सान्निध्यं भवतो ब्रूहि ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ५५ | भरद्वाजजीने कहा— आप अपनी इच्छासे यहाँ रहें अथवा जायँ। मैं आपको आदेश नहीं दूँगा। विष्णो! हमलोग बलिके यज्ञमें जायँगे। आप चिन्ता न करें। देव! मैं आपसे जो पूछता हूँ उसे आप बतलायें। विभो! पुरुषोत्तम! मैं यथार्थरूपसे यह जानना चाहता हूँ कि आप किन-किन स्थानोंमें रहते हैं॥ ५४-५५ ॥ |
| वामन उवाच<br><br>श्रूयतां कथयिष्यामि येषु येषु गुरो अहम्।<br>निवसामि सुपुण्येषु स्थानेषु बहुरूपवान् ॥ ५६ | श्रीवामनजी बोले— गुरो! अनेक रूपोंसे युक्त होकर जिन-जिन पवित्र स्थानोंमें मैं रहता हूँ, उनका मैं वर्णन कर रहा हूँ; उसे आप सुनें। |
| अध्याय ८९ ] | वामनभगवान्का विविध स्थानोंमें निवास-वर्णन और कुरुजाङ्गलके लिये प्रस्थान करना | ४३९ |
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| ममावतारैर्वसुधा नभस्तलं<br>पातालमम्भोनिधयो दिवं च।<br>दिशः समस्ता गिरयोऽम्बुदाश्च<br>व्याप्ता भरद्वाज ममानुरूपैः॥ ५७<br>ये दिव्या ये च भौमा<br>जलगगनचराः स्थावरा जङ्गमाश्च<br>सेन्द्राः सार्काः सचन्द्रा<br>यमवसुवरुणा ह्याग्नयः सर्वपालाः।<br>ब्रह्माद्याः स्थावरान्ता द्विजखगसहिता<br>मूर्तिमन्तो ह्यमूर्ता-<br>स्ते सर्वे मत्प्रसूता बहुविविधगुणाः<br>पूरणार्थं पृथिव्याः॥ ५८<br>एते हि मुख्याः सुरसिद्धदानवैः<br>पूज्यास्तथा संनिहिता महीतले।<br>यैर्दृष्टमात्रैः सहसैव नाशं<br>प्रयाति पापं द्विजवर्य कीर्तनैः॥ ५९ | भरद्वाजजी! मेरे अनुरूप मेरे अवतारोंसे पृथ्वी, आकाश, पाताल, समुद्र, स्वर्ग, सभी दिशाएँ, पर्वत तथा मेघ व्याप्त हैं। ब्रह्मन्! दिव्य, पार्थिव, जलचर, आकाशचर, स्थावर, जङ्गम, इन्द्र, सूर्य, चन्द्र, यम, वसु, वरुण, सभी अग्नियाँ, समस्त प्राणियोंके पालक, ब्रह्मासे लेकर स्थावरतक पशु-पक्षिसहित सभी मूर्त और अमूर्त पदार्थ, भाँति-भाँतिके गुणोंसे सम्पन्न—ये सभी पदार्थ पृथ्वीकी पूर्तिके लिये मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं। पृथ्वीपर स्थित ये सभी मुख्य पदार्थ देवों, सिद्धों एवं दानवोंके पूजनीय हैं। द्विजश्रेष्ठ! इनके कीर्तन एवं दर्शनमात्रसे पाप शीघ्र नष्ट हो जाता है॥ ५६—५९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८८ ॥
नवासीवाँ अध्याय
वामनभगवान्का विविध स्थानोंमें निवास-वर्णन और कुरुजाङ्गलके लिये प्रस्थान करना
| श्रीभगवानुवाच<br><br>आद्यं मात्स्यं महद्रूपं संस्थितं मानसे ह्रदे।<br>सर्वपापक्षयकरं कीर्तनस्पर्शनादिभिः॥ १<br><br>कौर्ममन्यत्सन्निधानं कौशिक्यां पापनाशनम्।<br>हयशीर्षं च कृष्णांशे गोविन्दं हस्तिनापुरे॥ २<br><br>त्रिविक्रमं च कालिन्द्यां लिङ्गभेदे भवं विभुम्।<br>केदारे माधवं शौरिं कुब्जाम्रे हृष्टमूर्धजम्॥ ३ | श्रीभगवान् बोले—मेरा प्रथम विशाल मत्स्यरूप मानसरोवरमें स्थित है। वह कीर्तन और स्पर्श आदिसे सभी पापोंका विनाश करनेवाला है। दूसरा पापका विनाश करनेवाला मेरा कूर्मावतार कौशिकी नदीमें स्थित है। कृष्णांशमें हयशीर्ष और हस्तिनापुरमें गोविन्द नामसे विराजमान हैं। कालिन्दीमें त्रिविक्रम तथा लिङ्गभेदमें व्यापक भव, केदारतीर्थमें माधव, शौरि और कुब्जाम्रमें हृष्टमूर्धज स्थित हैं। |
| ४४० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नारायणं बदर्यां च वाराहे गरुडासनम्।<br>जयेशं भद्रकर्णे च विपाशायां द्विजप्रियम्॥ ४<br>रूपधारमिरावत्यां कुरुक्षेत्रे कुरुध्वजम्।<br>कृतशौचे नृसिंहं च गोकर्णे विश्वकर्माणम्॥ ५<br>प्राचीने कामपालं च पुण्डरीकं महाम्भसि।<br>विशाखयूपे ह्यजितं हंसं हंसपदे तथा॥ ६<br>पयोष्णीयामखण्डं च वितस्तायां कुमारिलम्।<br>मणिमत्पर्वते शम्भुं ब्रह्मण्ये च प्रजापतिम्॥ ७<br>मधुनाद्यां चक्रधरं शूलबाहुं हिमालये।<br>विद्धि विष्णुं मुनिश्रेष्ठ स्थितमोषधिसानुनि॥ ८ | बदरिकाश्रममें नारायण, वाराहमें गरुडासन, भद्रकर्णमें जयेश एवं विपाशा नदीके तटपर द्विजप्रिय विद्यमान हैं। इरावतीमें रूपधार, कुरुक्षेत्रमें कुरुध्वज, कृतशौचमें नृसिंह और गोकर्णमें विश्वकर्मा वर्तमान हैं। प्राचीन स्थानमें कामपाल, महाम्भस्में पुण्डरीक, विशाखयूपमें अजित तथा हंसपदमें हंसरूप विद्यमान हैं। पयोष्णीमें अखण्ड, वितस्तामें कुमारिल, मणिमान् पर्वतपर शम्भु एवं ब्रह्मण्यमें प्रजापति रूप स्थित हैं। मुनिश्रेष्ठ! मधुनदीमें चक्रधर, हिमालयमें शूलबाहु और ओषधिप्रस्थमें मेरे विष्णुरूपको अवस्थित जानें॥ १-८॥ |
| भृगुतुङ्गे सुवर्णाक्षं नैमिषे पीतवाससम्।<br>गयायां गोपतिं देवं गदापाणिमधीश्वरम्॥ ९<br>त्रैलोक्यनाथं वरदं गोप्रतारे कुशेशयम्।<br>अर्द्धनारीश्वरं पुण्ये माहेन्द्रे दक्षिणे गिरौ॥ १०<br>गोपालमुत्तरे नित्यं महेन्द्रे सोमपीथिनम्।<br>वैकुण्ठमपि सह्याद्रौ पारियात्रे पराजितम्॥ ११<br>कशेरुदेशे देवेशं विश्वरूपं तपोधनम्।<br>मलयाद्रौ च सौगन्धिं विन्ध्यपादे सदाशिवम्॥ १२<br>अवन्तिविषये विष्णुं निषधेष्वमरेश्वरम्।<br>पाञ्चालिकं च ब्रह्मर्षे पाञ्चालेषु व्यवस्थितम्॥ १३<br>महोदये हयग्रीवं प्रयागे योगशायिनम्।<br>स्वयम्भुवं मधुवने अयोगन्थिं च पुष्करे॥ १४<br>तथैव विप्रप्रवर वाराणस्यां च केशवम्।<br>अविमुक्तकमत्रैव लोलश्चात्रैव गीयते॥ १५<br>पद्मायां पद्मकिरणं समुद्रे वडवामुखम्।<br>कुमारधारे बाह्लीशं कार्तिकेयं च बर्हिणम्॥ १६ | भृगुतुङ्गमें सुवर्णाक्ष, नैमिषमें पीतवासा एवं गयामें गोपति गदाधर ईश्वररूपसे वर्तमान हैं। गोप्रतारमें वरदायक, तीनों लोकोंके स्वामी कुशेशय एवं पवित्र महेन्द्र-पर्वतपर दक्षिणमें अर्धनारीश्वर रूप विद्यमान है। महेन्द्र-पर्वतपर, उत्तरमें सोमपीथी गोपाल, सह्याद्रिपर्वतपर वैकुण्ठ एवं पारियात्रमें अपराजितरूप स्थित है। कशेरुदेशमें तपोधन, विश्वरूप देवेश, मलयपर्वतपर सौगन्धि तथा विन्ध्यपादमें सदाशिव रूप वर्तमान है। ब्रह्मर्षे! अवन्तिदेशमें विष्णु, निषधदेशमें अमरेश्वर और पाञ्चालदेशमें मेरा पाञ्चालिक रूप अवस्थित है। महोदयमें हयग्रीव, प्रयागमें योगशायी, मधुवनमें स्वयम्भुव और पुष्करमें अयोगन्थि रूप विद्यमान है। विप्रश्रेष्ठ! उसी प्रकार वाराणसीमें मेरा केशवरूप तथा यहींपर अविमुक्तक तथा लोलरूप स्थित कहा गया है। पद्मामें पद्मकिरण, समुद्रमें वडवामुख तथा कुमारधारमें बाह्लीश, वहीं और कार्तिकेयरूपसे स्थित हैं॥ ९-१६॥ |
| अजेशे शम्भुमनघं स्थाणुं च कुरुजाङ्गले।<br>वनमालिनमाहुर्मां किष्किन्धावासिनो जनाः॥ १७ | अजेशमें अनघ शम्भु तथा कुरुजाङ्गलमें स्थाणूमूर्ति हैं। किष्किन्धाके निवासी लोग मुझे वनमाली कहते हैं। |
| वीरं कुवलयारूढं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>श्रीवत्साङ्कमुदाराङ्गं नर्मदायां श्रियः पतिम्॥ १८ | नर्मदाके क्षेत्रमें मुझे वीर, कुवलयारूढ, शङ्ख-चक्र-गदाधर, श्रीवत्साङ्क एवं उदाराङ्ग श्रीपति कहा जाता है। |
| माहिष्मत्यां त्रिनयनं तत्रैव च हुताशनम्।<br>अर्बुदे च त्रिसौपर्णं क्ष्माधरं शूकराचले॥ १९ | माहिष्मतीमें मेरा त्रिनयन एवं हुताशन रूप विद्यमान हैं। इसी प्रकार अर्बुदमें त्रिसौपर्ण एवं शूक्राचलमें मेरा क्ष्माधर रूप अवस्थित है। |
| त्रिणाचिकेतं ब्रह्मर्षे प्रभासे च कपर्दिनम्।<br>तथैवात्रापि विख्यातं तृतीयं शशिशेखरम्॥ २० | ब्रह्मर्षे! प्रभासमें मेरा त्रिणाचिकेत, कपर्दी और तृतीय शशिशेखर रूप विख्यात है। |
अध्याय ८९ ] वामनभगवान्का विविध स्थानोंमें निवास-वर्णन और कुरुजाङ्गलके लिये प्रस्थान करना ४४१
| उदये शशिनं सूर्य ध्रुवं च त्रितयं स्थितम्।<br>हेमकूटे हिरण्याक्षं स्कन्दं शरवणे मुने॥ २१<br>महालये स्मृतं रुद्रमुत्तरेषु कुरुष्वथ।<br>पद्मनाभं मुनिश्रेष्ठ सर्वसौख्यप्रदायकम्॥ २२<br>सप्तगोदावरे ब्रह्मन् विख्यातं हाटकेश्वरम्।<br>तत्रैव च महाहंसं प्रयागेऽपि वटेश्वरम्॥ २३<br>शोणे च रुक्मकवचं कुण्डिने घ्राणतर्पणम्।<br>भिल्लीवने महायोगं माद्रेषु पुरुषोत्तमम्॥ २४ | उदयगिरिमें चन्द्र, सूर्य और ध्रुव—ये तीन मूर्तियाँ अवस्थित हैं। मुने! हेमकूटमें हिरण्याक्ष एवं शरवणमें स्कन्द नामक रूप विद्यमान है। मुनिश्रेष्ठ ! महालयमें रुद्र एवं उत्तरकुरुमें हर प्रकारका सुख प्रदान करनेवाला पद्मनाभ रूप विख्यात है। ब्रह्मन्! सप्तगोदावरमें हाटकेश्वर एवं महाहंस तथा प्रयागमें वटेश्वर रूप अवस्थित है। शोणमें रुक्मकवच, कुण्डिनमें घ्राणतर्पण, भिल्लीवनमें महायोग, माद्रमें पुरुषोत्तम रूप विद्यमान है॥ १७—२४॥ | | प्लक्षावतरणे विश्वं श्रीनिवासं द्विजोत्तम।<br>शूर्पारके चतुर्बाहुं मगधायां सुधापतिम्॥ २५<br>गिरिव्रजे पशुपतिं श्रीकण्ठं यमुनातटे।<br>वनस्पतिं समाख्यातं दण्डकारण्यवासिनम्॥ २६<br>कालिञ्जरे नीलकण्ठं सरय्वां शम्भुमुत्तमम्।<br>हंसयुक्तं महाकोश्यां सर्वपापप्रणाशनम्॥ २७<br>गोकर्णे दक्षिणे शर्वं वासुदेवं प्रजामुखे।<br>विन्ध्यशृङ्गे महाशौरिं कन्यायां मधुसूदनम्॥ २८<br>त्रिकूटशिखरे ब्रह्मन् चक्रपाणिमीश्वरम्।<br>लौहदण्डे हृषीकेशं कोसलायां मनोहरम्॥ २९<br>महाबाहुं सुराष्ट्रे च नवराष्ट्रे यशोधरम्।<br>भूधरं देविकानद्यां महोदायां कुशप्रियम्॥ ३०<br>गोमत्यां छादितगदं शङ्खोद्धारे च शङ्खिनम्।<br>सुनेत्रं सैन्धवारण्ये शूरं शूरपुरे स्थितम्॥ ३१<br>रुद्राख्यं च हिरण्वत्यां वीरभद्रं त्रिविष्टपे।<br>शङ्कुकर्णं च भीमायां भीमं शालवने विदुः॥ ३२ | द्विजोत्तम! प्लक्षावतरणमें विश्वात्मक श्रीनिवास, शूर्पारकमें चतुर्बाहु एवं मगधामें सुधापति रूप स्थित हैं। गिरिव्रजमें पशुपति, यमुनातटपर श्रीकण्ठ एवं दण्डकारण्यमें मेरा वनस्पति रूप विख्यात है। कालिञ्जरमें नीलकण्ठ, सरयूमें उत्तम शम्भु और महाकोशीमें सभी पापोंका विनाश करनेवाला हंसयुक्त रूप स्थित है। दक्षिण गोकर्णमें शर्व, प्रजामुखमें वासुदेव, विन्ध्यपर्वतके शिखरमें महाशौरि और कन्यामें मधुसूदन रूप विद्यमान है। ब्रह्मन्! त्रिकूटपर्वतकी ऊँची चोटीपर चक्रपाणि ईश्वर, लौहदण्डमें हृषीकेश तथा कोसलामें मनोहर रूप वर्तमान हैं। सुराष्ट्रमें महाबाहु, नवराष्ट्रमें यशोधर, देविका नदीमें भूधर तथा महोदामें कुशप्रिय रूप स्थित है। गोमतीमें छादितगद, शङ्खोद्धारमें शङ्खी, सैन्धवारण्यमें सुनेत्र एवं शूरपुरमें शूररूप विद्यमान है। हिरण्वतीमें रुद्र, त्रिविष्टपमें वीरभद्र, भीमामें शङ्कुकर्ण और शालवनमें भीम नामक रूपको लोग जानते हैं॥ २५—३२॥ | | विश्वामित्रं च गदितं कैलासे वृषभध्वजम्।<br>महेशं महिलाशैले कामरूपे शशिप्रभम्॥ ३३<br>बलभ्यामपि गोमित्रं कटाहे पङ्कजप्रियम्।<br>उपेन्द्रं सिंहलद्वीपे शक्राहे कुन्दमालिनम्॥ ३४<br>रसातले च विख्यातं सहस्रशिरसं मुने।<br>कालाग्निरुद्रं तत्रैव तथाऽन्यं कृत्तिवाससम्॥ ३५<br>सुतले कूर्ममचलं वितले पङ्कजासनम्।<br>महातले गुरो ख्यातं देवेशं छागलेश्वरम्॥ ३६<br>तले सहस्रचरणं सहस्रभुजमीश्वरम्।<br>सहस्राक्षं परिख्यातं मुसलाकृष्टदानवम्॥ ३७ | कैलासमें वृषभध्वज और विश्वामित्र, महिलाशैलमें महेश और कामरूपमें शशिप्रभ रूप वर्तमान हैं। बलभीमें गोमित्र, कटाहमें पङ्कजप्रिय, सिंहलद्वीपमें उपेन्द्र एवं शक्राह्नमें कुन्दमाली नामक रूप स्थित है। मुने! रसातलमें विख्यात सहस्रशीर्षा एवं कालाग्नि-रुद्र तथा कृत्तिवासा नामक रूप विद्यमान हैं। गुरो! सुतलमें अचल कूर्म, वितलमें पङ्कजासन तथा महातलमें छागलेश्वर नामक विख्यात देवेशरूप स्थित है। तलमें सहस्रचरण, सहस्रबाहु एवं मुसलसे दानवको आकृष्ट करनेवाला मेरा सहस्राक्ष- |
| ४४२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८९ ] |
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| पाताले योगिनामीशं स्थितं च हरिशङ्करम्।<br>धरातले कोकनदं मेदिन्यां चक्रपाणिनम्॥ ३८<br><br>भुवर्लोके च गरुडं स्वर्लोके विष्णुमव्ययम्।<br>महर्लोके तथाऽगस्त्यं कपिलं च जने स्थितम्॥ ३९<br><br>तपोलोकेऽखिलं ब्रह्मन् वाङ्मयं सत्यसंयुतम्।<br>ब्रह्माणं ब्रह्मलोके च सप्तमे वै प्रतिष्ठितम्॥ ४० | रूप अवस्थित है। पातालमें योगीश हरिशङ्कर, धरातलपर कोकनद तथा मेदिनीमें चक्रपाणिरूप वर्तमान है। भुवर्लोकमें गरुड, स्वर्लोकमें अव्यय विष्णु, महर्लोकमें अगस्त्य तथा जनलोकमें कपिल नामक रूप विद्यमान है। ब्रह्मन्! तपोलोकमें सत्यसे संयुक्त अखिल वाङ्मय एवं सप्तम ब्रह्मलोकमें ब्रह्मा नामक रूप प्रतिष्ठित है॥ ३३—४०॥ | | सनातनं तथा शैवे परं ब्रह्म च वैष्णवे।<br>अप्रतर्क्यं निरालम्बे निराकाशे तपोमयम्॥ ४१<br><br>जम्बूद्वीपे चतुर्बाहुं कुशद्वीपे कुशेशयम्।<br>प्लक्षद्वीपे मुनिश्रेष्ठ ख्यातं गरुडवाहनम्॥ ४२<br><br>पद्मनाभं तथा क्रौञ्चे शाल्मले वृषभध्वजम्।<br>सहस्त्रांशुः स्थितः शाके धर्मराट् पुष्करे स्थितः॥ ४३<br><br>तथा पृथिव्यां ब्रह्मर्षे शालग्रामे स्थितोऽस्म्यहम्।<br>सजलस्थलपर्यन्तं चरेषु स्थावरेषु च॥ ४४<br><br>एतानि पुण्यानि ममालयानि<br>ब्रह्मन् पुराणानि सनातनानि।<br>धर्मप्रदानीह महौजसानि<br>संकीर्तनीयान्यघनाशनानि ॥ ४५<br><br>संकीर्तनात् स्मरणाद् दर्शनाच्च<br>संस्पर्शनादेव च देवतायाः।<br>धर्मार्थकामाद्यपवर्गमेव<br>लभन्ति देवा मनुजाः ससाध्याः॥ ४६<br><br>एतानि तुभ्यं विनिवेदितानि<br>ममालयानीह तपोमयानि।<br>उत्तिष्ठ गच्छामि महासुरस्य<br>यज्ञं सुराणां हि हिताय विप्र॥ ४७ | शिवलोकमें सनातन, विष्णुलोकमें परम ब्रह्म, निरालम्बमें अप्रतर्क्य और निराकाशमें तपोमय नामक रूप स्थित है। मुनिश्रेष्ठ! जम्बूद्वीपमें चतुर्बाहु, कुशद्वीपमें कुशेशय और प्लक्षद्वीपमें गरुडवाहन नामसे विख्यात रूप वर्तमान है। क्रौञ्चद्वीपमें पद्मनाभ, शाल्मलद्वीपमें वृषभध्वज, शाकद्वीपमें सहस्रांशु तथा पुष्करद्वीपमें धर्मराज नामक रूप विद्यमान हैं। ब्रह्मर्षे! इसी प्रकार पृथ्वीमें मैं शालग्रामके भीतर अवस्थित हूँ। इस प्रकार जलसे लेकर स्थलपर्यन्त समस्त चराचरमें मैं वर्तमान हूँ। ब्रह्मन्! ये ही मेरे पुण्य, पुरातन एवं सनातन धर्मप्रद, अत्यन्त ओजस्वी, सङ्कीर्तनके योग्य एवं अघोंके नाश करनेवाले निवास-स्थान हैं। देव, मनुष्य और साध्यलोग देवताके कीर्तन, स्मरण, दर्शन और स्पर्श करनेसे ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करते हैं। विप्र! मैंने आपसे अपने इन तपोमय स्थानोंको कह दिया। हे विप्र! अब आप उठिये; देवताओंका हित-साधन करनेके लिये मैं बलिके यज्ञमें जाता हूँ॥ ४१–४७॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं महर्षे<br>विष्णुर्भरद्वाजमृषिं महात्मा।<br>विलासलीलागमनो गिरीन्द्रात्<br>स चाभ्यगच्छत् कुरुजाङ्गलं हि॥ ४८ | पुलस्त्यजी बोले— महर्षे! महात्मा विष्णु महर्षि भरद्वाजसे इस प्रकारका वचन कहकर मनोहर चालसे चलते हुए गिरीन्द्रसे कुरुजाङ्गलमें पहुँचे॥ ४८॥ |
<div align="center">॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें नवासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८९॥
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| अध्याय ९० ] | भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता | ४४३ |
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नब्बेवाँ अध्याय
भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता, बलि और शुक्रके संवाद-प्रसङ्गमें कोशकारकी कथा
| पुलस्त्य उवाच<br>ततः समागच्छति वासुदेवे<br>मही चकम्पे गिरयश्च चेलुः।<br>क्षुब्धाः समुद्रा दिवि ऋक्षमण्डलो<br>बभौ विपर्यस्तगतिर्महर्षे॥ १<br>यज्ञः समागात् परमाकुलत्वं<br>न वेद्मि किं मे मधुहा करिष्यति।<br>यथा प्रदग्धोऽस्मि महेश्वरेण<br>किं मां न संधक्ष्यति वासुदेवः॥ २<br>ऋक्साममन्त्राहूतिभिर्हुताभि-<br>र्वितानकीयान् ज्वलनास्तु भागान्।<br>भक्त्या द्विजेन्द्रैरपि सम्प्रपादितान्<br>नैव प्रतीच्छन्ति विभोर्भयेन॥ ३<br>तान् दृष्ट्वा घोररूपांस्तु उत्पातान् दानवेश्वरः।<br>पप्रच्छोशनसं शुक्रं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥ ४<br>किमर्थमाचार्य मही सशैला<br>रम्भेव वाताभिहता चचाल।<br>किमासुरीयान् सुहुतानपीह<br>भागान् न गृह्णन्ति हुताशनाश्च॥ ५<br>क्षुब्धाः किमर्थं मकरालयाश्च भो<br>ऋक्षा न खे किं प्रचरन्ति पूर्ववत्।<br>दिशः किमर्थं तमसा परिप्लुता<br>दोषेण कस्याद्य वदस्व मे गुरो॥ ६ | **पुलस्त्यजी बोले—**महर्षे! उसके बाद वामनका रूप धारण करनेवाले वासुदेवके आनेपर पृथ्वी काँपने लगी, पर्वत अपने स्थानसे डिग गये, समुद्रमें जोरसे लहरें उठने लगीं और आकाशमें तारासमूहकी गति अव्यवस्थित हो गयी। यज्ञ भी अत्यन्त व्याकुल हो गया और सोचने लगा—न जाने मधुसूदन भगवान् वासुदेव आकर मेरी क्या गति करेंगे? जैसे महेश्वरने मुझे दग्ध कर दिया था, क्या वासुदेव भी मुझे वैसे ही दग्ध (ध्वस्त) तो नहीं कर देंगे? अग्नि विष्णुके भयसे श्रेष्ठ द्विजोंके द्वारा श्रद्धापूर्वक ऋग्वेद एवं सामवेदके मन्त्रोंकी आहुतियोंसे हवन किये गये यज्ञीय भागोंको ग्रहण नहीं कर रहे थे। उन घोर उत्पातोंको देखकर दानवेश्वर (बलि)-ने उशना शुक्राचार्यको प्रणाम किया तथा हाथ जोड़कर उनसे पूछा—आचार्यजी! पर्वतोंके साथ पृथ्वी वायुके झोंकेसे केलेके वृक्षके समान क्यों काँप रही है और अग्निदेव भी विधिपूर्वक हवन किये गये आसुरीय भागोंको क्यों नहीं स्वीकार कर रहे हैं? समुद्रमें भयंकर लहरें क्यों उठ रही हैं? आकाशमें नक्षत्र पहलेकी भाँति क्यों नहीं सुव्यवस्थित रूपसे स्थित हैं और दिशाएँ क्यों अन्धकारसे भर गयी हैं? गुरो! मुझे आप कृपया यह बतलायें कि किसके अपराधसे यह सब हो रहा है?॥ १—६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>शुक्रस्तद् वाक्यमाकर्ण्य विरोचनसुतेरितम्।<br>अथ ज्ञात्वा कारणं च बलिं वचनमब्रवीत्॥ ७ | **पुलस्त्यजी बोले—**विरोचनपुत्रके द्वारा कहे गये उस वाक्यको सुननेके बाद पूछे गये प्रश्नके कारणको जानकर शुक्राचार्यने बलिसे कहा—॥ ७॥ |
| ४४४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९० | | :--- | :--- |
| शुक्र उवाच<br>शृणुष्व दैत्येश्वर येन भागान्<br>नामी प्रतीच्छन्ति हि आसुरीयान्।<br>हुताशना मन्त्रहुतानपीह<br>नूनं समागच्छति वासुदेवः॥ ८<br>तदङ्घ्रिविक्षेपमपारयन्ती<br>मही सशैला चलिता दितीश।<br>तस्यां चलत्यां मकरालयामी<br>उद्वृत्तवेला दितिजाद्य जाताः॥ ९ | शुक्राचार्यने कहा— दैत्येश्वर! सुनो। निश्चय ही वासुदेव आ रहे हैं। इसीलिये अग्निदेव मन्त्रके द्वारा आहुति देनेपर भी आसुरीय भागोंको नहीं ग्रहण कर रहे हैं। दितीश! उनके चरण रखनेके भारको सहन न कर सकनेके कारण पर्वतोंसहित पृथ्वी काँप रही हैं। दितिज! पृथ्वीके कम्पनसे ये समुद्र आज तटका उल्लङ्घन कर गये हैं॥ ८-९॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>शुक्रस्य वचनं श्रुत्वा बलिर्भार्गवमब्रवीत्।<br>धर्मं सत्यं च पथ्यं च सर्वोत्साहसमीरितम्॥ १० | पुलस्त्यजी बोले— शुक्राचार्यका वचन सुनकर बलिने उनसे धर्मसे युक्त, सत्य, कल्याणप्रद और सभी प्रकारके उत्साहसे भरा वचन कहा॥ १०॥ | | बलिरुवाच<br>आयाते वासुदेवे वद मम<br>भगवन् धर्मकामार्थतत्त्वं<br>किं कार्यं किं च देयं मणिकनक-<br>मथो भूगजाश्वादिकं वा।<br>किं वा वाच्यं मुरारेर्निजहित-<br>मथवा तद्धितं वा प्रयुञ्जे<br>तथ्यं पथ्यं प्रियं भो मम वद<br>शुभदं तत्करिष्ये न चान्यत्॥ ११ | बलिने कहा— भगवन्! वासुदेवके आनेपर मेरे करने योग्य धर्म, काम एवं अर्थके तत्त्वको बतलायें। मैं उन्हें मणि, स्वर्ण, पृथ्वी, हाथी अथवा अश्वमेंसे क्या दान करूँ? मैं मुरारिसे क्या कहूँ? अपना अथवा उनका क्या कल्याण सिद्ध करूँ? आप मुझे कल्याणकारी, मङ्गलमय तथा प्रिय तथ्य बतलायें। मैं वही करूँगा, अन्य कुछ नहीं करूँगा॥ ११॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>तद्वाक्यं भार्गवः श्रुत्वा दैत्यनाथेरितं वरम्।<br>विचिन्त्य नारद प्राह भूतभव्यविदीश्वरः॥ १२<br>त्वया कृता यज्ञभुजोऽसुरेन्द्रा<br>बहिष्कृता ये श्रुतिदृष्टमार्गे।<br>श्रुतिप्रमाणं मखभोजिनो बहिः<br>सुरास्तदर्थं हरिरभ्युपैति॥ १३<br>तस्याध्वरं दैत्यसमागतस्य<br>कार्यं हि किं मां परिपृच्छसे यत्।<br>कार्यं न देयं हि विभो तृणाग्रं<br>यदध्वरे भूकनकादिकं वा॥ १४ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! दैत्यपतिद्वारा कहे गये उस उत्तम वचनको सुननेके पश्चात् भूत एवं भविष्यके जाननेवाले भार्गवने विचार कर कहा— तुमने श्रुतिद्वारा प्रतिपादित मार्गमें अनधिकृत असुरेन्द्रों (दैत्यों)-को यज्ञभागका भोक्ता बनाया है एवं वेदप्रमाणके अनुसार यज्ञभोक्ता देवोंको अधिकाररहित कर दिया है। इसी कारण हरि आ रहे हैं। दैत्य! तुमने मुझसे जो प्रश्न किया कि यज्ञमें उनके आनेपर क्या करना चाहिये, तो (उसके विषयमें मेरा यह कहना है कि) यज्ञमें तिनकेके नोकके बराबर भी पृथ्वी या सुवर्ण आदि (कुछ भी) उन्हें नहीं देना चाहिये। |
अध्याय १० ] भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता ४४५
| वाच्यं तथा साम निरर्थकं विभो<br>कस्ते वरं दातुमलं हि शक्नुयात्।<br>यस्योदरे भूर्भुवनाकपाल-<br>रसातलेशा निवसन्ति नित्यशः॥ १५ | इस तरहका अर्थहीन और सामयुक्त वचन उनसे कहना चाहिये कि विभो! जिसके पेटमें भूलोक, भुवर्लोक एवं स्वर्लोकके स्वामी तथा रसातलके शासक सदा निवास करते हैं ऐसे आपको दान देनेमें कौन समर्थ हो सकता है? ॥ १२—१५ ॥ |
|---|---|
| बलिरुवाच<br>मया न चोक्तं वचनं हि भार्गव<br>न चास्ति मह्यं न च दातुमुत्सहे।<br>समागतेऽप्यर्थिनि हीनवृत्ते<br>जनार्दने लोकपतौ कथं तु॥ १६ | बलिने कहा— भार्गव! मैंने निम्नकोटिकी वृत्तिवाले याचकके आनेपर भी यह बात नहीं कही कि मेरे पास कुछ नहीं है और मैं देना नहीं चाहता तो लोकपति जनार्दनके याचक बनकर आनेपर मैं इस प्रकार कैसे कह सकता हूँ। |
| एवं च श्रूयते श्लोकः सतां कथयतां विभो।<br>सद्भावो ब्राह्मणेष्वेव कर्तव्यो भूतिमिच्छता।<br>दृश्यते हि तथा तच्च सत्यं ब्राह्मणसत्तम॥ १७ | विभो! सज्जनोंके द्वारा कही गयी इस तरहकी पवित्र वाणी सुनी जाती है कि ऐश्वर्य चाहनेवाले मनुष्यको ब्राह्मणोंके प्रति अच्छे भाव रखने चाहिये। ब्राह्मणश्रेष्ठ! यह सत्य भी मालूम होता है कि |
| पूर्वाभ्यासेन कर्माणि सम्भवन्ति नृणां स्फुटम्।<br>वाक्कायमानशानीह योन्यन्तरगतान्यपि॥ १८ | वचन, शरीर एवं मनके द्वारा किये गये मनुष्योंके कर्म दूसरी योनियोंमें भी पहलेके अभ्याससे स्पष्टरूपसे प्रकट होते हैं। |
| किं वा त्वया द्विजश्रेष्ठ पौराणी न श्रुता कथा।<br>या वृत्ता मलये पूर्वं कोशकारसुतस्य तु॥ १९ | द्विजश्रेष्ठ! प्राचीन कालमें मलयपर्वतपर घटित हुई कोशकारके पुत्रकी प्राचीन कथाको क्या आपने नहीं सुना है? ॥ १६—१९॥ |
| शुक्र उवाच<br>कथयस्व महाबाहो कोशकारसुताश्रयाम्।<br>कथां पौराणिकीं पुण्यां महाकौतूहलं हि मे॥ २० | शुक्राचार्यने कहा— महाबाहो! कोशकारकी पुत्रसम्बन्धिनी पवित्र प्राचीन कथाको मुझसे कहो। उसे सुननेके लिये मुझे महान् कौतूहल हो रहा है॥ २०॥ |
| बलिरुवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि कथामेतां मखान्तरे।<br>पूर्वाभ्यासनिबद्धां हि सत्यां भृगुकुलोद्वह॥ २१ | बलिने कहा— भृगुकुलश्रेष्ठ! पूर्वके अभ्याससे सम्बद्ध इस सत्य कथाको मैं यज्ञमें कह रहा हूँ; आप सुनें। |
| मुद्गलस्य मुनेः पुत्रो ज्ञानविज्ञानपारगः।<br>कोशकार इति ख्यात आसीद् ब्रह्मांस्तपोरतः॥ २२ | ब्रह्मन्! महर्षि मुद्गलका कोशकार नामसे प्रसिद्ध एवं ज्ञान और विज्ञानसे सम्पन्न एक तपस्वी पुत्र था। |
| तस्यासीद् दयिता साध्वी धर्मिष्ठा नामतः श्रुता।<br>सती वात्स्यायनसुता धर्मशीला पतिव्रता॥ २३ | उसकी पत्नीका नाम था धर्मिष्ठा। वह वात्स्यायनकी कन्या पतिव्रता, साध्वी, धर्मका आचरण करनेवाली तथा पतिकी सेवा करनेमें निष्ठा रखनेवाली थी। |
| तस्यामस्य सुतो जातः प्रकृत्या वै जडाकृतिः।<br>मूकवन्नालपति स न च पश्यति चान्धवत्॥ २४ | उस स्त्रीके गर्भसे एक पुत्र हुआ, जो स्वभावसे ही मूढ़ था। वह गूँगे मनुष्यकी तरह न बोलता और अन्धेकी भाँति वह देखता भी नहीं था। |
| तं जातं ब्राह्मणी पुत्रं जडं मूकं त्वचक्षुषम्।<br>मन्यमाना गृहद्वारि षष्ठेऽहनि समुत्सृजत्॥ २५ | अपने उस जन्मे हुए पुत्रको मूर्ख, गूँगा और अंधा समझकर ब्राह्मणीने छठे दिन उसे घरके द्वारपर फेंक दिया। |
| ४४६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९० |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततोऽभ्यागाद् दुराचारा राक्षसी जातहारिणी।<br>स्वं शिशुं कृशमादाय सूर्पाक्षी नाम नामतः॥ २६<br>तत्रोत्सृज्य स्वपुत्रं सा जग्राह द्विजनन्दनम्।<br>तमादाय जगामाथ भोक्तुं शालोदरे गिरौ॥ २७<br>ततस्तामागतां वीक्ष्य तस्या भर्ता घटोदरः।<br>नेत्रहीनः प्रत्युवाच किमानीतस्त्वया प्रिये॥ २८ | उसके बाद सूर्पाक्षी नामकी एक दुराचारिणी एवं नवजात बालकोंको चुरा लेनेवाली राक्षसी अपने दुबले-पतले पुत्रको लेकर वहाँ आयी और अपने पुत्रको वहाँ छोड़कर उसने ब्राह्मणपुत्रको उठा लिया। उसे लेकर खानेके लिये शालोदर नामक पर्वतपर चली गयी। उसके बाद उसे आयी हुई जानकर घटोदर नामके उसके अंधे पतिने पूछा—प्रिये! तुम क्या लायी हो?॥ २१—२८॥ |
| साऽब्रवीद् राक्षसपते मया स्थाप्य निजं शिशुम्।<br>कोशकारद्विजगृहे तस्यानीतः प्रभो सुतः॥ २९<br>स प्राह न त्वया भद्रे भद्रमाचरितं त्विति।<br>महाज्ञानी द्विजेन्द्रोऽसौ ततः शप्स्यति कोपितः॥ ३०<br>तस्माच्छीघ्रमिमं त्यक्त्वा मनुजं घोररूपिणम्।<br>अन्यस्य कस्यचित् पुत्रं शीघ्रमानय सुन्दरि॥ ३१<br>इत्येवमुक्ता सा रौद्रा राक्षसी कामचारिणी।<br>समाजगाम त्वरिता समुत्पत्य विहायसम्॥ ३२<br>स चापि राक्षससुतो निसृष्टो गृहबाह्यतः।<br>रुरोद सुस्वरं ब्रह्मन् प्रक्षिप्याङ्गुष्ठमानने॥ ३३<br>सा क्रन्दितं चिराच्छ्रुत्वा धर्मिष्ठा पतिमब्रवीत्।<br>पश्य स्वयं मुनिश्रेष्ठ सशब्दस्तनयस्तव॥ ३४<br>त्रस्ता सा निर्जगामाथ गृहमध्यात् तपस्विनी।<br>स चापि ब्राह्मणश्रेष्ठः समपश्यत तं शिशुम्॥ ३५<br>वर्णरूपादिसंयुक्तं यथा स्वतनयं तथा।<br>ततो विहस्य प्रोवाच कोशकारो निजां प्रियाम्॥ ३६ | उसने कहा—राक्षसपते! प्रभो! मैं अपने बच्चेको कोशकार मुनिके घरमें रखकर उनके पुत्रको लायी हूँ। राक्षसने कहा—भद्रे! तुमने यह ठीक नहीं किया। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण महाज्ञानी तो है; किंतु वह (इस कार्यसे) कुपित होकर (तुम्हें) शाप दे देगा। सुन्दरि! इसलिये शीघ्र इस रौद्र रूपवाले मनुष्यको छोड़कर तुम किसी दूसरेके पुत्रको ले आओ। ऐसा कहनेपर वह स्वच्छन्दचारिणी डरावनी राक्षसी आकाशमें उड़ती हुई शीघ्र (वहाँ) चली गयी। ब्रह्मन्! घरके बाहर छोड़ा गया वह राक्षसपुत्र भी मुखमें अँगूठा डालकर उच्च स्वरसे रोने लगा। उस धर्मिष्ठाने अधिक समयके बाद रुलाई सुनकर पतिसे कहा—मुनिश्रेष्ठ! पुत्रको स्वयं देखिये, आपका यह पुत्र शब्द करने लगा। डरकर वह तपस्विनी गृहके भीतरसे बाहर निकली। उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने भी उस शिशुको देखा। अपने पुत्रके ही समान रंग और रूप आदिसे युक्त उस बालकको देखकर कोशकार मुनिने हँसकर अपनी पत्नीसे कहा—॥ २९—३६॥ |
| एतेनाविश्य धर्मिष्ठे भाव्यं भूतेन साम्प्रतम्।<br>कोऽप्यस्माकं छलयितुं सुरूपी भुवि संस्थितः॥ ३७<br>इत्युक्त्वा वचनं मन्त्री मन्त्रैस्तं राक्षसात्मजम्।<br>बबन्धोल्लिख्य वसुधां सकुशेनाथ पाणिना॥ ३८<br>एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता सूर्पाक्षी विप्रबालकम्।<br>अन्तर्धानगता भूमौ चिक्षेप गृहदूरतः॥ ३९ | धर्मिष्ठे! इस बालकके अंदर अवश्य कोई भूत प्रवेश कर गया है। हमलोगोंको धोखा देनेके लिये सुन्दर रूपवाला कोई (भूत) इस स्थानपर विद्यमान है। ऐसा कहकर उस मन्त्रवेत्ताने हाथमें कुशा लेकर मन्त्रोंके द्वारा भूमिको रेखासे अङ्कितकर राक्षसपुत्रको बाँध दिया। इसी बीच सूर्पाक्षी वहाँ पहुँची और अदृश्यरूपमें (छिपकर) घरसे दूर स्थित होकर उसने ब्राह्मणके बालकको फेंका। |
| अध्याय ९० ] | भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता | ४४७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं क्षिप्तमात्रं जग्राह कोशकारः स्वकं सुतम्।<br>सा चाभ्येत्य ग्रहीतुं स्वं नाशकद राक्षसी सुतम्॥ ४०<br>इतश्चेतश्च विभ्रष्टा सा भर्तारमुपागमत्।<br>कथयामास यद् वृत्तं स्वद्विजात्मजहारिणम्॥ ४१<br>एवं गतायां राक्षस्यां ब्राह्मणेन महात्मना।<br>स राक्षसशिशुर्ब्रह्मन् भार्यायै विनिवेदितः॥ ४२<br>स चात्मतनयः पित्रा कपिलायाः सवत्सयाः।<br>दध्ना संयोजितोऽत्यर्थं क्षीरेणेक्षुरसेन च॥ ४३<br>द्वावेव वर्धितौ बालौ संजातौ सप्तवार्षिकौ।<br>पित्रा च कृतनामानौ निशाकरदिवाकरौ॥ ४४ | फेंकते ही कोशकारने अपने उस पुत्रको पकड़ लिया। परंतु वह राक्षसी वहाँ जाकर अपने पुत्रको नहीं पकड़ सकी। दोनों ओरसे हाथ धोकर वह अपने पतिके पास गयी और अपने पुत्र तथा ब्राह्मणपुत्र दोनोंके खोनेकी घटना कह सुनायी। ब्रह्मन्! इस प्रकार राक्षसीके चले जानेपर महात्मा ब्राह्मणने अपनी पत्नीको उस राक्षस-पुत्रको दे दिया। पिताने अपने पुत्रको सवत्सा कपिला गायके दूध, दही और ईखके रससे पाला-पोसा। दोनों ही बालक बढ़कर सात वर्षके हो गये। पिताने उन दोनोंका नाम निशाकर और दिवाकर रखा॥ ३७-४४॥ |
| नैशाचरिर्दिवाकीर्तिर्निशाकीर्तिः स्वपुत्रकः।<br>तयोश्चकार विप्रोऽसौ व्रतबन्धक्रियां क्रमात्॥ ४५ | राक्षसके बालकका नाम दिवाकीर्ति (दिवाकर) और ब्राह्मणके बालकका नाम निशाकीर्ति (निशाकर) था। ब्राह्मणने क्रमशः दोनोंका उपनयन-संस्कार किया। |
| व्रतबन्धे कृते वेदं पपाठासौ दिवाकरः।<br>निशाकरो जडतया न पपाठेति नः श्रुतम्॥ ४६ | उपनयन (जनेऊ) हो जानेपर दिवाकर वेदपाठ करने लगा। किंतु निशाकर जड़ताके कारण वेदाध्ययन नहीं करता था—ऐसा हमलोगोंने सुना है। |
| तं बान्धवाश्च पितरौ माता भ्राता गुरुस्तथा।<br>पर्यनिन्दंस्तथा ये च जना मलयवासिनः॥ ४७ | माता, पिता, भाई, बन्धुजन, गुरु और दूसरे मलयके निवासी उसकी निन्दा करने लगे। |
| ततः स पित्रा क्रुद्धेन क्षिप्तः कूपे निरूदके।<br>महाशिलां चोपरि वै पिधानमवरोपयत्॥ ४८ | उसके बाद पिताने कुपित होकर उसे जलरहित कुएँमें फेंक दिया और ऊपरसे एक बड़ी शिलासे ढँक दिया। |
| एवं क्षिप्तस्तदा कूपे बहुवर्षगणान् स्थितः।<br>तत्रास्त्यामलकीगुल्मः पोषाय फलितोऽभवत्॥ ४९ | इस प्रकार कुएँमें फेंक दिये जानेपर वह बालक बहुत दिनोंतक वहाँ पड़ा रहा। उस कुएँमें एक आँवलेका छोटा वृक्ष (क्षुप) था। उस बालकके लालन-पालनके लिये उसमें फल लग गये। |
| ततो दशसु वर्षेषु समतीतेषु भार्गव।<br>तस्य माताऽगमत् कूपं तमन्धं शिलयाचितम्॥ ५० | भार्गव! उसके बाद दस वर्ष बीत जानेपर उसकी माँ अन्धकार-भरे तथा पत्थरसे ढके हुए उस कुएँके पास गयी। |
| सा दृष्ट्वा निचितं कूपं शिलया गिरिकल्पया।<br>उच्चैः प्रोवाच केनेयं कूपोपरि शिला कृता॥ ५१ | उस कुएँको पर्वतके सदृश शिलासे ढके हुए देखकर उसने ऊँचे स्वरसे कहा—कुएँके ऊपर इस पत्थरको किसने रखा है? |
| कूपान्तस्थः स तां वाणीं श्रुत्वा मातुर्निशाकरः।<br>प्राह प्रदत्ता पित्रा मे कूपोपरि शिला त्वियम्॥ ५२ | कुएँके अंदर पड़े हुए पुत्र निशाकरने माताकी वाणी सुनकर कहा—मेरे पिताजीने कुएँपर इस शिलाको रखा है। |
| ४४८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९० |
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| साऽतिभीताऽब्रवीत् कोऽसि कूपान्तस्थोऽद्भुतस्वरः।<br>सोऽप्याह तव पुत्रोऽस्मि निशाकरेति विश्रुतः॥ ५३<br>साऽब्रवीत् तनयो मह्यं नाम्ना ख्यातो दिवाकरः।<br>निशाकरेति नाम्नाऽहो न कश्चित् तनयोऽस्ति मे॥ ५४<br>स चाह पूर्वचरितं मातुर्निरवशेषतः।<br>साश्रुत्वा तां शिलां सुभ्रूः समुत्क्षिप्यान्यतोऽक्षिपत्॥ ५५<br>सोत्तीर्य कूपाद् भगवन् मातुः पादाववन्दत।<br>सा स्वानुरूपं तनयं दृष्ट्वा स्वजनमग्रतः॥ ५६<br>ततस्तमादाय सुतं धर्मिष्ठा पतिमेत्य च।<br>कथयामास तत्सर्वं चेष्टितं स्वसुतस्य च॥ ५७<br>ततोऽन्वपृच्छद् विप्रोऽसौ किमिदं तात कारणम्।<br>नोक्तवान् यद् भवान् पूर्वं महत्कौतूहलं मम॥ ५८<br>तच्छ्रुत्वा वचनं धीमान् कोशकारं द्विजोत्तमम्।<br>प्राह पुत्रोऽद्भुतं वाक्यं मातरं पितरं तथा॥ ५९ | इस वाणीको सुनकर वह अत्यन्त डर गयी और बोली—कुएँके भीतर इस अपूर्व स्वरवाले तुम कौन हो? उसने भी कहा—मैं तुम्हारा पुत्र हूँ। मेरा नाम निशाकर है॥ ४५–५३॥<br>उसने कहा—मेरे पुत्रका नाम तो दिवाकर है। निशाकर नामका मेरा कोई पुत्र नहीं है। उस बालकने मातासे अपनी पहलेकी घटित सारी घटना कह सुनायी। उसे सुननेके बाद माताने उस शिलाको उठाकर दूसरी ओर फेंक दिया। भगवन्! उस बालकने कुएँसे ऊपर आकर माताके चरणोंकी वन्दना की। उसने अपनेसे उत्पन्न हुए और अपनेसे मिलते-जुलते रूपवाले बालकको सामने देखा। उसके बाद उस बालकको लेकर वह धर्मिष्ठा पतिके पास गयी और अपने पुत्रके सारे चरितको उससे कह सुनायी। उसके बाद उस ब्राह्मणने पूछा—पुत्र! तुम पहले नहीं बोले, इसका क्या कारण है? मुझे बहुत कुतूहल हो रहा है। उस बातको सुनकर बुद्धिमान् पुत्रने ब्राह्मणश्रेष्ठ कोशकार तथा मातासे अद्भुत वचन कहा॥ ५४–५९॥ | | निशाकर उवाच | निशाकरने कहा— | | श्रूयतां कारणं तात येन मूकत्वमाश्रितम्।<br>मया जडत्वमनघ तथाऽन्धत्वं स्वचक्षुषः॥ ६०<br>पूर्वमासमहं विप्र कुले वृन्दारकस्य तु।<br>वृषाकपेश्र्च तनयो मालागर्भसमुद्भवः॥ ६१<br>ततः पिता पाठयन्मां शास्त्रं धर्मार्थकामदम्।<br>मोक्षशास्त्रं परं तात सेतिहासश्रुतिं तथा॥ ६२<br>सोऽहं तात महाज्ञानी परावरविशारदः।<br>जातो मदान्धस्तेनाहं दुष्कर्माभिरतोऽभवम्॥ ६३<br>मदात् समभवल्लोभस्तेन नष्टा प्रगल्भता।<br>विवेको नाशमगमत् मूर्खभावमुपागतः॥ ६४<br>मूढभावतया चाथ जातः पापरतोऽस्म्यहम्।<br>परदारपरार्थेषु मतिर्मे च सदाऽभवत्॥ ६५ | निष्पाप पिताजी! मेरे द्वारा मूकता, जड़ता एवं अपने नेत्रोंके अन्धत्व ग्रहण करनेका कारण सुनिये। विप्र! मैं पहले वृन्दारक (सम्मानित देव)-वंशमें मालाके गर्भसे उत्पन्न हुआ वृषाकपिका पुत्र था। तात! पिताने मुझे धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि देनेवाले शास्त्र तथा इतिहास और वेदसहित मुक्तिदायक (दर्शन) शास्त्रको पढ़ाया। तात! मैं महाज्ञानी एवं लोक-ज्ञान और परलोक-ज्ञानमें कुशल था। उससे मैं अहंकारसे अन्धा होकर बुरे कर्ममें लग गया। मदसे मुझे लोभ हुआ। उससे मेरी वाक्पटुता नष्ट हो गयी। विवेकशक्तिके नष्ट हो जानेसे मैं विवेकहीन हो गया। मूढ़ताके कारण मैं पापी बन गया। मेरा मन सदा दूसरेकी स्त्री एवं धनमें आसक्त हो गया। |
| अध्याय ९० ] | भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता | ४४९ | | :--- | :--- |
| परदाराभिमर्शित्वात् परार्थहरणादपि।<br>मृतोऽस्म्युद्बन्धनेनाहं नरकं रौरवं गतः॥ ६६<br><br>तस्माद् वर्षसहस्रान्ते भुक्तशिष्टे तदागसि।<br>अरण्ये मृगहा पापः संजातोऽहं मृगाधिपः॥ ६७ | परस्त्रीके साथ संसर्ग करने एवं दूसरोंके धनका हरण करनेके कारण कर्मफलके बन्धनसे ग्रस्त होनेपर मैं मरकर (विवशताया) रौरव नरकमें गया। एक हजार वर्षके बाद नरक-भोगसे बचे उस पापके कारण मैं पशुओंकी हत्या करनेवाला पापी बाघ होकर जंगलमें उत्पन्न हुआ॥ ६०—६७॥ | | व्याघ्रत्वे संस्थितस्तात बद्धः पञ्जरगः कृतः।<br>नराधिपेन विभुना नीतश्च नगरं निजम्॥ ६८<br><br>बद्धस्य पिञ्जरस्थस्य व्याघ्रत्वेऽधिष्ठितस्य ह।<br>धर्मार्थकामशास्त्राणि प्रत्यभासन्त सर्वशः॥ ६९<br><br>ततो नृपतिशार्दूलो गदापाणिः कदाचन।<br>एकवस्त्रपरीधानो नगरान्निर्ययौ बहिः॥ ७०<br><br>तस्य भार्या जिता नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि।<br>सा निर्गते तु रमणे ममान्तिकमुपागता॥ ७१<br><br>तां दृष्ट्वा ववृधे मह्यं पूर्वाभ्यासान्मनोभवः।<br>यथैव धर्मशास्त्राणि तथाहमवदं च ताम्॥ ७२<br><br>राजपुत्रि सुकल्याणि नवयौवनशालिनि।<br>चित्तं हरसि मे भीरु कोकिला ध्वनिना यथा॥ ७३<br><br>सा मद्वचनमाकर्ण्य प्रोवाच तनुमध्यमा।<br>कथमेवावयोर्व्याघ्र रतियोगमुपेक्ष्यति॥ ७४<br><br>ततोऽहमब्रुवं तात राजपुत्रीं सुमध्यमाम्।<br>द्वारमुद्घाटयस्वाद्य निर्गमिष्यामि सत्वरम्॥ ७५ | तात! एक प्रभावशाली राजाने व्याघ्रयोनिमें उत्पन्न हुए मुझको बाँधकर पिंजड़ेमें डाल दिया और अपने नगरमें ले गया। व्याघ्रकी योनिको प्राप्त हुए बन्धनसे ग्रस्त और पिंजड़ेमें पड़े हुए मुझे धर्म, अर्थ एवं कामसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी शास्त्र मनमें स्फुरित हो रहे थे।<br>उसके कुछ समय बाद वह श्रेष्ठ राजा हाथमें गदा लिये एक वस्त्र धारणकर नगरसे बाहर चला गया। उसकी जिता नामकी भार्या मृत्युलोकमें अनुपम सुन्दरी थी। पतिके बाहर जानेपर वह मेरे पास आयी। उसे देखकर पूर्व अभ्यासके कारण धर्मशास्त्रोंके ज्ञानकी वृद्धिकी तरह मेरे मनमें कामना बढ़ने लगी। उसके बाद मैंने उससे कहा—हे नवयौवनशालिनी सुकल्याणी! राजपुत्री! तुम मेरा मन उसी प्रकार हरण करती हो जिस प्रकार कोयल अपनी कूकसे लोगोंके चित्तको। उस सुन्दरीने मेरा वचन सुनकर कहा—व्याघ्र! हम दोनोंका सम्भोग कैसे सम्भव है? तात! उसके बाद मैंने उस सुन्दरी राजपुत्रीसे कहा—तुम अभी पिंजड़ेका द्वार खोलो, मैं शीघ्र बाहर निकल आऊँगा॥ ६८—७५॥ | | साऽप्यब्रवीद् दिवा व्याघ्र लोकोऽयं परिपश्यति।<br>रात्रावुद्घाटयिष्यामि ततो रंस्याव स्वेच्छया॥ ७६<br><br>तामेवाहमवोचं वै कालक्षेपेऽहमक्षमः।<br>तस्मादुद्घाटय द्वारं मां बन्धाच्च विमोचय॥ ७७<br><br>ततः सा पीवरश्रोणी द्वारमुद्घाटयन्मुने।<br>उद्घाटिते ततो द्वारे निर्गतोऽहं बहिःक्षणात्॥ ७८<br><br>पाशानि निगदादीनि छिन्नानि हि बलान्मया।<br>सा गृहीता च नृपतेर्भार्या रमितुमिच्छता॥ ७९ | उसने कहा—व्याघ्र! दिनमें लोग देखेंगे। रात्रिमें खोलूँगी, तब इच्छानुकूल हम दोनों विहार करेंगे। मैंने पुनः उससे कहा—देर करनेमें मैं असमर्थ हूँ। इसलिये द्वार खोलो और मुझे बन्धनसे मुक्त करो। उसके बाद उस सुन्दरीने द्वार खोल दिया। द्वार खुलनेपर मैं क्षणमात्रमें बाहर निकला। मैंने बलपूर्वक बेड़ी आदि बन्धनोंको तोड़ डाला और उस राजाकी पत्नीको रमण |
| ४५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९० |
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| ततो दृष्टोऽस्मि नृपतेर्भृत्यैरतुलविक्रमैः।<br>शस्त्रहस्तैः सर्वतश्च तैरहं परिवेष्टितः ॥ ८०<br>महापाशैः शृङ्खलाभिः समाहत्य च मुद्गरैः।<br>बध्यमानोऽब्रुवमहं मा मा हिंसध्वमाकुलाः ॥ ८१<br>ते मद्वचनमाकर्ण्य मत्वैव रजनीचरम्।<br>दृढं वृक्षे समुद्बध्य घातयन्त तपोधन ॥ ८२<br>भूयो गतश्च नरकं परदारनिषेवणात्।<br>मुक्तो वर्षसहस्रान्ते जातोऽहं श्वेतगर्दभः ॥ ८३ | करनेकी कामनासे पकड़ लिया। उसके बाद राजाके अतुल पराक्रमी अनुचरोंने मुझे देखा और हाथमें शस्त्र लेकर उन लोगोंने मुझे चारों ओरसे घेर लिया। मोटी रस्सियों और जंजीरोंसे बाँधकर उन लोगोंने मुझे मुद्गरोंसे बहुत मारा। मारे जाते समय मैंने उनसे कहा—तुमलोग मुझे मत मारो। तपोधन! मेरा वचन सुनकर उन लोगोंने मुझे राक्षस समझा और वृक्षमें कसकर बाँधकर मार डाला। परस्त्री-सेवनके कारण फिर मैं नरकमें गया और हजारों वर्षोंके बाद वहाँसे छुटकारा होनेपर मैं सफेद गदहेकी योनिमें जनमा ॥ ७६-८३ ॥ | | ब्राह्मणस्याग्निवेश्यस्य गेहे बहुकलत्रिणः।<br>तत्रापि सर्वविज्ञानं प्रत्यभासत ततो मम ॥ ८४<br>उपवाह्यः कृतश्चास्मि द्विज्योषिद्भििरादरात्।<br>एकदा नवराष्ट्रीया भार्या तस्याग्रजन्मनः ॥ ८५<br>विमतिर्नामतः ख्याता गन्तुमैच्छद् गृहं पितुः।<br>तामुवाच पतिर्गच्छ आरुह्य श्वेतगर्दभम् ॥ ८६<br>मासेनागमनं कार्यं न स्थेयं परतस्ततः।<br>इत्येवमुक्ता सा भर्त्रा तन्वी मामधिरुह्य च ॥ ८७<br>बन्धनादवमुच्याथ जगाम त्वरिता मुने।<br>ततोऽर्धपथि सा तन्वी मत्पृष्ठादवरुह्य वै ॥ ८८<br>अवतीर्णा नदीं स्नातुं स्वरूपा चार्द्रवाससा।<br>साङ्गोपाङ्गं रूपवतीं दृष्ट्वा तामहमाद्रवम् ॥ ८९<br>मया चाभिद्रुता तूर्णं पतिता पृथिवीतले।<br>तस्यामुपरि भो तात पतितोऽहं भृशातुरः ॥ ९०<br>दृष्टो भर्त्रानुसृष्टेन नृणा तदनुसारिणा।<br>प्रोत्क्षिप्य यष्टिं मां ब्रह्मन् समाधावत् त्वरान्वितः ॥ ९१ | उस योनिमें मैं अनेक स्त्रियोंवाले अग्निवेश्य नामके ब्राह्मणके घरमें रहता था। वहाँ भी पूर्वजन्ममें अर्जित सारे ज्ञानोंका आभास मुझे हो रहा था। ब्राह्मणके घरकी स्त्रियोंने मुझे प्रेमसे सवारीके काममें लगाया। एक समय उस ब्राह्मणकी नवराष्ट्रदेशकी विमति नामक पत्नी अपने पिताके घर जानेके लिये उत्सुक हुई। उसके पतिने उससे कहा—इस सफेद गदहेपर सवार होकर चली जाओ और एक महीनेके भीतर चली आना। उससे अधिक समयतक न रहना। मुने! पतिके इस प्रकार कहनेपर वह सुन्दरी मेरा बन्धन खोल तत्काल मेरे ऊपर सवार हुई और चल पड़ी। उसके बाद आधे मार्गमें वह सुन्दरी मेरी पीठसे उतरकर नदीमें नहानेके लिये उतरी। भींगे वस्त्र होनेसे उसका अङ्ग स्पष्ट दिखायी पड़ा। उस सर्वाङ्गसुन्दरीको देखकर मैं उसकी ओर झपटा। मेरे झपटनेपर वह तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ी। तात! मैं अत्यन्त आतुर होकर उसके ऊपर गिर गया। ब्रह्मन्! स्वामीके आदेशसे उस स्त्रीके पीछे-पीछे आनेवाले अनुचरने मुझे देख लिया और डंडा उठाकर वह वेगसे मेरी ओर दौड़ पड़ा ॥ ८४-९१ ॥ | | तद्भयात् तां परित्यज्य प्रद्रुतो दक्षिणामुखः।<br>ततोऽभिद्रवतस्तूर्णं खलीनरसना मुने ॥ ९२ | उसके आतङ्कसे उस स्त्रीको छोड़कर मैं उसी समय दक्षिण दिशाकी ओर भागा। मुने! बहुत शीघ्रतासे |
| अध्याय ९० ] | भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता | ४५१ | | :--- | :--- |
| Sanskrit | Hindi |
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| ममासक्ता वंशगुल्मे दुर्मोक्षे प्राणनाशने।<br>तत्रासक्तस्य षड्रात्रान्मेऽभूज्जीवितक्षयः॥ ९३<br>गतोऽस्मि नरकं भूयस्तस्मान्मुक्तोऽभवं शुकः।<br>महारण्ये तथा बद्धः शबरेण दुरात्मना॥ ९४<br>पञ्जरे क्षिप्य विक्रीतो वणिक्पुत्राय शालिने।<br>तेनाप्यन्तःपुरवरे युवतीनां समीपतः॥ ९५<br>शब्दशास्त्रविदित्येवं दोषघ्नश्चेत्यवस्थितः।<br>तत्रासतस्तरुणयस्ता ओदनाम्बुफलादिभिः॥ ९६<br>भक्ष्यैश्च दाडिमफलैः पुष्णन्त्यहरहः पितः।<br>कदाचित् पद्मपत्राक्षी श्यामा पीनपयोधरा॥ ९७<br>सुश्रोणी तनुमध्या च वणिक्पुत्रप्रिया शुभा।<br>नाम्ना चन्द्रावली नाम समुद्घाट्याथ पञ्जरम्॥ ९८<br>मां जग्राह सुचार्वङ्गी कराभ्यां चारुहासिनी।<br>चकारोपरि पीनाभ्यां स्तनाभ्यां सा हि मां ततः॥ ९९ | दौड़ते हुए मेरी लगामकी रस्सी प्राणघातिनी बाँसकी विकट झाड़ीमें फँस गयी। वहाँ फँसा हुआ मैं छः रातके बाद मर गया। उसके बाद मुझे फिर नरकमें जाना पड़ा। वहाँसे छुटकारा पानेके बाद मैं शुक पक्षीकी योनिमें उत्पन्न हुआ। उस योनिमें विशाल वनमें दुष्टात्मा शबरने मुझे बाँध लिया। पिंजड़ेमें रखकर (उसने मुझे) एक गृहस्थ वणिक्पुत्रके हाथ बेच दिया। उसने भी उत्तम महलमें युवतियोंके पास मुझे सम्पूर्ण शास्त्रका जाननेवाला तथा दोषोंको दूर करनेवाला समझकर रख दिया। पिताजी! वहाँ रहते समय वे युवतियाँ प्रतिदिन मुझे भात, जल, अनारके फल तथा अन्य भक्ष्य पदार्थ खिलाकर पालने लगीं। एक समय वणिक्पुत्रकी कमलदलके समान नेत्रोंवाली श्यामा, विशाल स्तनों तथा सुन्दर जंघाओं एवं सूक्ष्म कटिवाली कल्याणी चन्द्रावली नामकी प्रियाने पिंजड़ेको खोला। मधुर मुसकानवाली सुन्दरीने मुझे दोनों हाथोंमें पकड़ लिया और अपने दोनों स्तनोंपर रख लिया॥ ९२—९९॥ |
| ततोऽहं कृतवान् भावं तस्यां विलसितुं प्लवन्।<br>ततोऽनुप्लवतस्तत्र हारे मर्कटबन्धनम्॥ १००<br>बद्धोऽहं पापसंयुक्तो मृतश्च तदनन्तरम्।<br>भूयोऽपि नरकं घोरं प्रपन्नोऽस्मि सुदुर्मतिः॥ १०१<br>तस्माच्चाहं वृषत्वं वै गतश्चाण्डालपक्कणे।<br>स चैकदा मां शकटे नियोज्य स्वां विलासिनीम्॥ १०२<br>समारोप्य महातेजा गन्तुं कृतमतिर्वनम्।<br>ततोऽग्रतः स चण्डालो गतस्त्वेषास्य पृष्ठतः॥ १०३<br>गायन्ती याति तच्छ्रुत्वा जातोऽहं व्यथितेन्द्रियः।<br>पृष्ठतस्तु समालोक्य विपर्यस्तस्तथोत्प्लुतः॥ १०४<br>पतितो भूमिमगमं तदक्षे क्षणविक्रमात्।<br>योक्त्रे सुबद्ध एवाशु पञ्चत्वमगमं ततः॥ १०५<br>भूयो निमग्नो नरके दशवर्षशतान्यपि।<br>अतस्तव गृहे जातस्त्वहं जातिमनुस्मरन्॥ १०६<br>तावन्त्येवाद्य जन्मानि स्मरामि चानुपूर्वशः।<br>पूर्वाभ्यासाच्च शास्त्राणि बन्धनं चागतं मम॥ १०७ | उसके बाद मैंने चन्द्रावलीके साथ विहार करनेका आशय प्रकट किया। तब पापमें आसक्त होकर घूमता हुआ मैं उसके हारमें बंदरके बन्धनकी भाँति बँधकर मर गया। मैं पुनः अत्यन्त पापमय बुद्धि होनेके कारण भयंकर नरकमें पड़ गया। उसके बाद मैं बैल होकर चाण्डालके घरमें पहुँचा। उसने एक दिन मुझे गाड़ीमें जोतकर उस गाड़ीपर अपनी स्त्रीको चढ़ाया। इस प्रकार वनमें जानेकी इच्छासे वह महातेजस्वी चाण्डाल आगे चला और उसके पीछे वह गाती हुई चली। उसका गान सुनकर मेरी इन्द्रियाँ विकल हो उठीं। मैंने पीछे घूमकर देखा और कूदा तथा उलट गया। क्षणमात्रके विपरीत गतिके कारण मैं भूमिपर गिर पड़ा और रस्सीमें अत्यन्त बँध जानेसे मृत्युको प्राप्त हो गया। मैं फिर हजार वर्षतक नरकमें पड़ा रहा। वहाँसे अपने पूर्वजन्मका स्मरण करता हुआ मैं आपके गृहमें उत्पन्न हुआ हूँ। मैं आज उन्हीं जन्मोंका क्रमशः स्मरण कर रहा हूँ। पूर्व अभ्याससे मुझे शास्त्रोंका ज्ञान तथा बन्धन मिला है। |
| ४५२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९० |
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| तदहं जातविज्ञानो नाचरिष्ये कथंचन।<br>पापानि घोररूपाणि मनसा कर्मणा गिरा॥ १०८ | अतः ज्ञानी होकर मैं मन, कर्म और वाणीसे कभी घोर पापकर्मोंका आचरण नहीं करूँगा॥ १००—१०८॥ | | शुभं वाप्यशुभं वाऽपि स्वाध्यायं शास्त्रजीविका।<br>बन्धनं वा वधो वाऽपि पूर्वाभ्यासेन जायते॥ १०९<br>जातिं यदा पौर्विकीं तु स्मरते तात मानवः।<br>तदा स तेभ्यः पापेभ्यो निवृत्तिं हि करोति वै॥ ११०<br>तस्माद् गमिष्ये शुभवर्धनाय<br>पापक्षयायाथ मुने ह्यारण्यम्।<br>भवान् दिवाकीर्तिमिमं सुपुत्रं<br>गार्हस्थ्यधर्मे विनियोजयस्व॥ १११ | मङ्गल, अमङ्गल, स्वाध्याय, शास्त्रजीविका, बन्धन या वध पूर्व अभ्यासवश ही होते हैं। तात! मनुष्यको जब अपने पूर्वजन्मका स्मरण होता है तब वह उन पापोंसे दूर रहता है। अतः मुने! शुभकी वृद्धि और पापके क्षयके लिये मैं वनमें जाऊँगा। आप इस सुपुत्र दिवाकीर्तिको गृहस्थधर्ममें लगायें॥ १०९—१११॥ | | बलिरुवाच<br>इत्येवमुक्त्वा स निशाकरस्तदा<br>प्रणम्य मातापितरौ महर्षे।<br>जगाम पुण्यं सदनं मुरारेः<br>ख्यातं बदर्याश्रममाद्यमीड्यम्॥ ११२<br>एवं पुराभ्यासरतस्य पुंसो<br>भवन्ति दानाध्ययनादिकानि।<br>तस्माच्च पूर्वं द्विजवर्य वै मया<br>अभ्यस्तमासीन्ननु ते ब्रवीमि॥ ११३<br>दानं तपो वाऽध्ययनं महर्षे<br>स्तेयं महापातकमग्निदाहम्।<br>ज्ञानानि चैवाभ्यसतां हि पूर्वं<br>भवन्ति धर्मार्थयशांसि नाथ॥ ११४ | बलिने कहा— महर्षे! इस प्रकार कहनेके बाद माता-पिताको प्रणाम कर वह निशाकर भगवान् नारायणके श्रेष्ठ सुप्रसिद्ध पवित्र निवास बदरिकाश्रममें चला गया। इसी प्रकार पूर्वके अभ्यासवश मनुष्यके दान एवं अध्ययन आदि कार्य होते हैं। द्विजवर्य! इसीसे निश्चय ही मैं आपसे अपने पूर्व अभ्यासके तथ्यको कह रहा हूँ। महर्षे! नाथ! दान, तप, अध्ययन, चोरी, महापातक, अग्निदाह, ज्ञान, धर्म, अर्थ एवं यश आदि सभी पूर्वजन्मोंके अभ्याससे उत्पन्न होते हैं॥ ११२—११४॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा बलवान् स शुक्रं<br>दैत्येश्वरः स्वं गुरुमीशितारम्।<br>ध्यायंस्तदास्ते मधुकैटभघ्नं<br>नारायणं चक्रगदासिपाणिम्॥ ११५ | पुलस्त्यजी बोले— दैत्येश्वर बलवान् बलि अपने गुरु और नियमन करनेवाले शुक्राचार्यसे इस प्रकार कहकर मधुकैटभके संहारकारी चक्र-गदा तथा खड्ग धारण करनेवाले नारायणका ध्यान करने लगा॥ ११५॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें नब्बेवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ९०॥