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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

३६-मत्स्य-द्वादशीव्रतका विधान तथा फल-कथन

८०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ३३

भगवान् रुद्र प्रसन्न हो जायँ। इनकी प्रसन्नता-मात्रसे सर्वज्ञता सुलभ हो जाती है।' ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर वे देवता भगवान् रुद्रकी स्तुति करने लगे।

देवगण बोले—महात्मन्! आप देवताओंके अधिष्ठाता, तीन नेत्रवाले, जटा-मुकुटसे सुशोभित तथा महान् सर्पका यज्ञोपवीत पहनते हैं। आपके नेत्रोंका रंग कुछ पीला और लाल है। भूत और वेताल सदा आपकी सेवामें संलग्न रहते हैं। ऐसे आप प्रभुको हमारा नमस्कार है। भगके नेत्रको बींधनेवाले भगवन्! आपके मुखसे भयंकर अट्टहास होता है। कपर्दी और स्थाणु आपके नाम हैं। पूषाके दाँत तोड़नेवाले भगवन्! आपको हमारा नमस्कार है। महाभूतोंके संरक्षक प्रभो! आपको हम नमस्कार करते हैं। प्रभो! भविष्यमें वृषभ या धर्म आपकी ध्वजाका चिह्न होगा और त्रिपुरका आप विनाश करेंगे। साथ ही आप अन्धकासुरका भी हनन करेंगे। भगवन्! आपका कैलासपर सुन्दर निवास-स्थान है। आप हाथीका चर्म वस्त्ररूपसे धारण करते हैं। आपके सिरका ऊपर उठा हुआ केश सबको भयभीत कर देता है अतः आपका 'भैरव' नाम है। प्रभो! आपको हमारा बारंबार नमस्कार है। देवेश्वर! आपके तीसरे नेत्रसे आगकी भयंकर ज्वाला निकलती रहती है। आपने चन्द्रमाको मुकुट बना रखा है। आगे आप कपाल धारण करनेका नियम पालन करेंगे। ऐसे आप सर्वसमर्थ प्रभुको हमारा नमस्कार है। प्रभो! आपके द्वारा 'दारुवन'का विध्वंस होगा। नीले कण्ठ एवं तीखे त्रिशूलसे शोभा पानेवाले भगवन्! आपने महान् सर्पको कङ्कण बना रखा है, ऐसे तिग्म त्रिशूली (तेज त्रिशूलवाले) आप देवेश्वरको नमस्कार है। यज्ञमूर्ते! आप हाथमें प्रचण्ड दण्ड धारण करते हैं। आपके मुखमें वडवानलका निवास है। वेदान्तके द्वारा आपका रहस्य जाना जा सकता है। ऐसे आप प्रभुको बारंबार नमस्कार है। शम्भो! आपने दक्षके यज्ञका विध्वंस किया है। शिव! जगत् आपसे भय मानता है। भगवन्! आप विश्वके शासक हैं। विश्वके उत्पादक तथा कपर्दी नामके जटाजूटको धारण करनेवाले महादेव! आपको नमस्कार है।

इस प्रकार देवताओंद्वारा स्तुति किये जानेपर प्रचण्ड धनुषधारी सनातन शम्भु बोले—'सुरगणो! मैं देवताओंका अधिष्ठाता हूँ। मेरे लिये जो भी काम हो, वह बताओ।'

देवताओंने कहा—प्रभो! आप यदि प्रसन्न हैं तो हमें वेदों एवं शास्त्रोंका सम्यक् प्रकारसे ज्ञान यथाशीघ्र प्रदान करनेकी कृपा करें। साथ ही रहस्यसहित यज्ञोंकी विधि भी हमें ज्ञात हो जाय।

महादेवजी बोले—देवताओ! आप सब-के-सब एक ही साथ पशुका रूप धारण कर लें और मैं सबका स्वामी बन जाता हूँ, तब आप सभी अज्ञानसे मुक्ति पा जायँगे। फिर देवताओंने भगवान् शम्भुसे कहा—'बहुत ठीक, ऐसा ही होगा। अब आप सर्वथा पशुपति हो गये।' उस समय ब्रह्माजीका अन्तःकरण प्रसन्नतासे भर गया। अतः उन्होंने उन पशुपतिसे कहा—'देवेश! आपके लिये चतुर्दशी तिथि निश्चित है—इसमें कोई संशय नहीं। जो द्विज उस चतुर्दशी तिथिके दिन श्रद्धापूर्वक आपकी उपासना करें, गेहूँसे तैयार किये पक्वान्न-द्वारा अन्य ब्राह्मणोंको भोजन करायें, उनपर आप परम संतुष्ट हों और उन्हें उत्तम स्थानका अधिकारी बना दें।'

इस प्रकार अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके कहनेपर

अध्याय ३५ ] पूर्णिमा तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें उसके स्वामी चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णन ८१

भगवान् रुद्रने पूषाके दाँत तथा भगके नेत्र पूर्ववत् कर दिये। फिर सभीको यज्ञकी समाप्तिका फल भी प्रदान किया तथा देवताओंके अन्तःकरणमें परम विशुद्ध सम्पूर्ण ज्ञान भर दिया। इस प्रकार परब्रह्म परमात्माने पूर्वकालमें रुद्रको प्रकट किया था। इसी कार्यका सम्पादन करनेसे वे देवताओंके अधिष्ठाता कहलाते हैं।

जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर प्रतिदिन इस कथाका श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर भगवान् रुद्रके लोकको प्राप्त करता है। [अध्याय ३३]


अमावास्या तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें पितरोंकी उत्पत्तिका कथन

महातपाजी कहते हैं—राजन्! अब मैं पितरोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग कहता हूँ, तुम उसे सुनो। पूर्व समयकी बात है—प्रजापति ब्रह्माजी अनेक प्रकारकी प्रजाओंका सृजन करनेके विचारसे मनको एकाग्र करके बैठ गये। फिर उनके मनसे तन्मात्राएँ* बाहर निकलीं। उन्होंने उन सबको प्रधानता दी और 'इनको किन रूपोंसे सुशोभित करें'—यों विचारने लगे। कारण, वे सभी ब्रह्माजीके शरीरमें पहलेसे ही थीं और वहींसे पुनः ये धूम्रवर्णवाली तन्मात्राएँ प्रकट हुई थीं। फिर वे चमककर देवताओंसे कहने लगीं—'हम सोमरस पीना चाहती हैं।' साथ ही उनके मनमें ऊपरके लोकमें जानेकी इच्छा हुई। उन सबोंने सोचा—'हम आकाशमें आसन जमाकर वहीं तपस्या करें।' ऊपर जानेके लिये वे मुख उठाकर तिरछे मार्गका अवलम्बन करना ही चाहती थीं, इतनेमें उन्हें देखकर ब्रह्माजीने कहा—'समस्त गृहाश्रमियोंका कल्याण करनेके लिये आपलोग पितर होकर रहें।' ये जो ऊपर मुख करके जाना चाहते हैं, इनका नाम 'नान्दीमुख' होगा। इस प्रकार कहकर ब्रह्माजीने उनके मार्गका भी निरूपण कर दिया। राजन्! उस समय ब्रह्माजीने उन पितरोंके लिये मार्ग सूर्यका दक्षिणायनकाल बता दिया। इस प्रकार प्रजाकी सृष्टि कर वे जब मौन हो गये, तब पितरोंने उनसे कहा—'भगवन्! हमें जीविका देनेकी कृपा कीजिये, जिससे सुख प्राप्त कर सकें।'

ब्रह्माजी बोले—तुम्हारे लिये अमावास्याकी तिथि ही दिन हो। उस तिथिमें मनुष्य जल,तिल और कुशसे तुम्हारा तर्पण करेंगे। इससे तुम परम तृप्त हो जाओगे। इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। उस अमावास्या तिथिमें तिल देनेका विधान है। पितरोंके प्रति श्रद्धा रखनेवाला जो पुरुष तुम्हारी उपासना करेगा, उसपर अत्यन्त संतुष्ट होकर यथाशीघ्र वर देना तुम्हारा परम कर्तव्य है। [अध्याय ३४]


पूर्णिमा तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें उसके स्वामी चन्द्रमाकी उत्पत्तिका वर्णन

महातपाजी कहते हैं—राजन्! यशस्वी अत्रि मुनि ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। उन्हींके यहाँ पुत्ररूपसे चन्द्रमाका प्राकट्य हुआ था। दक्षप्रजापतिने उन्हें अपना जामाता बना लिया। दक्षकी जो सत्ताईस दाक्षायणी कन्याएँ कही गयी हैं, वे सभी परम माननीया कन्याएँ चन्द्रमाकी पत्नी हुईं। उन कन्याओंमें रोहिणी सबसे श्रेष्ठ थीं। सुनते हैं, चन्द्रमा अकेली उस रोहिणीसे ही अधिक प्रेम करते थे, दूसरी अन्य कन्याओंसे नहीं। तब अन्य सभी कन्याएँ पिता दक्षके पास आयीं और


* पञ्चज्ञानेन्द्रियोंके विषय शब्द-स्पर्शादि ही तन्मात्राएँ हैं। (इनका प्रयोग संस्कृतमें क्लीब एवं पुल्लिंगमें दृष्ट है।)

८२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ३५

उन्होंने चन्द्रमाके विषम व्यवहारका वृत्तान्त सुनाया। दक्ष भी चन्द्रमाके समीप आये और ऐसा न करनेके लिये बार-बार समझाया; किंतु चन्द्रमाने उनकी समतावाली बातपर विशेष ध्यान नहीं दिया। तब दक्षने चन्द्रमाको शाप दे दिया—'तुम (धीरे-धीरे क्षीण होकर) अस्त हो जाओ।'

इस प्रकार दक्षके कहनेपर उनके शापसे चन्द्रमाको क्षय (रोग) हो गया और अन्तमें वे अमावास्याको सर्वथा अस्त हो गये। उनके अभावमें देवता, मनुष्य, पशु, वृक्ष और विशेषतः ओषधियाँ—प्रायः सब-के-सब नष्ट-से हो गये। जब ओषधियोंका अत्यन्त अभाव हो गया, तो मुख्य देवताओंकी आतुरता बढ़ गयी। वे कहने लगे—'चन्द्रमा वृक्षोंकी जड़में स्थित हो गया।'* अब वे चिन्तातुर देवता भगवान् विष्णुकी शरण गये। श्रीहरिने उनसे पूछा—'आप बतलायें, एतदर्थ मैं क्या करूँ?' तब देवताओंने उनसे कहा—'भगवन्! दक्षने चन्द्रमाको शाप दे दिया है, जिससे वे तिरोहित हो गये हैं।'

उस समय उन प्रभुने देवताओंसे कहा—'सुरगणो! तुमलोग गर्जनेवाले समुद्रमें चारों ओर ओषधियाँ डाल दो और बड़ी सावधानीसे उसका मन्थन आरम्भ कर दो।' देवताओंसे ऐसा कहकर स्वयं भगवान् श्रीहरिने फिर महाभाग शंकर एवं ब्रह्माजीको स्मरण किया, साथ ही रस्सीकी जगह प्रयुक्त होनेके लिये वासुकिनागको आज्ञा दी। फिर तो वे सभी एकत्र होकर समुद्रका मन्थन करने लगे। राजन्! जब समुद्र भलीभाँति मथा गया तो चन्द्रमा पुनः प्रकट हो गये। जिन परम पुरुष परमात्माका क्षेत्रज्ञ नाम है, उन्हें ही प्राणियोंका जीवात्मा चन्द्रमा समझना चाहिये। अब परोक्ष मूर्तिके अतिरिक्त वे सुन्दर सोमका स्वरूप धारण करके पृथक् रूपसे भी प्रकाशित होने लगे। सभी देवता, मानव, वृक्ष और ओषधियाँ इन्हीं सोलह कलावाले परम प्रभुका आश्रय पाकर जीवन धारण करनेमें समर्थ हैं। उस समय सोमको उन्हीं प्रभुका स्वरूप समझकर रुद्रने उनकी द्वितीया तिथिकी (अमृता) कलाको अपने मस्तकपर धारण कर लिया। जल उन्हीं (शिव—परमात्मा)-का स्वरूप है। इसीसे उन्हें विश्वमूर्ति कहा गया है। चन्द्रमापर प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने इन्हें पूर्णमासी तिथि प्रदान की। राजन्! इस तिथिमें उपवास रहकर चन्द्रमाकी उपासना एवं ध्यान करना चाहिये। व्रतीको अन्नका आहार करना चाहिये। इस व्रतके फलस्वरूप चन्द्रमा उसे ज्ञान, कान्ति, पुष्टि, धन, धान्य और मोक्ष सुलभ कर देते हैं। [विशेष द्रष्टव्य—अग्नि-नारदादि पुराणों, 'नारदसंहिता', 'रत्नमाला' एवं मुहूर्त्तचिन्ता-मणि आदि ज्योतिषग्रन्थोंमें—

तिथीशा वह्निकौ गौरी गणेशोऽहिर्गुहो रविः। शिवो दुर्गान्तको विश्वे हरिः कामः शिवः शशी॥ (मुहू० चि० १।३) आदिसे क्रमशः कहीं अग्नि, ब्रह्मा, पार्वती, गणेश, नाग, गुह, सूर्य, शिव, दुर्गा, यम, विश्वदेवता, विष्णु, काम, शिव और चन्द्रमाको प्रतिपदादि तिथियोंका स्वामी बतलाया गया है और कहीं ठीक यह वराहपुराणवाला ही क्रम है। पर इसमें सुन्दर कथाओंद्वारा ज्योतिषके रहस्यको स्पष्टकर विशेष सिद्धि-प्राप्तिके सरल साधन निर्दिष्ट हुए हैं। इससे पाठक-पाठिकाओंको अवश्य लाभ उठाना चाहिये।] [अध्याय ३५]


* यह वैदिक मान्यता है, चन्द्रमा अमावास्याको ओषधि, तृण एवं वीरुधोंमें वास करता है।

अध्याय ३६ ] प्राचीन इतिहासका वर्णन [ ८३

प्राचीन इतिहासका वर्णन

महातपा कहते हैं— राजन्! त्रेतायुगके आदिमें जो वीर मणिसे उत्पन्न हुए थे तथा जिनमेंसे एक तुम भी हो, अब उनका वृत्तान्त बताता हूँ, सुनो। नरेन्द्र! सत्ययुगमें जिसका नाम सुप्रभ था, वह तुम ही हो। यहाँ 'प्रजापाल'के नामसे भी तुम्हारी प्रसिद्धि हुई है। राजन्! शेष महाबली नरेश त्रेतायुगमें होंगे। जो दीप्ततेजा था, उसका नाम शान्त कहा गया है। सुरश्मि महाबली राजा शशकर्णके नामसे ख्याति प्राप्त करेगा। शुभदर्शन ही पाञ्चाल राजा होगा—इसमें संदेह नहीं है। सुशान्ति अङ्गवंशमें जन्म लेकर सुन्दर नामसे विख्यात होगा। सुन्द ही (सत्ययुगके अन्तमें) मुचुकुन्द हुआ। इसी प्रकार सुद्युम्न तुरु नामसे, सुमना सोमदत्त नामसे तथा शुभ संवरण नामसे विख्यात हुए। सुशील वसुदान हुआ और सुखद असुपति नामक राजा हुआ। शम्भु सेनापतिके नामसे प्रसिद्ध हुआ। कान्त दशरथके नामसे विख्यात राजा हुए और सोमकी राजा जनक नामसे प्रसिद्धि हुई। राजन्! ये सभी नरेश त्रेतायुगमें हुए थे। वे इस भूमण्डलके राज्य-सुखको भोगकर अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान्‌की आराधना करके निःसंदेह स्वर्गको प्राप्त करेंगे।

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! यह उत्तम 'ब्रह्मविद्यामृत' नामक आख्यान है। इसे सुनकर राजर्षि प्रजापालको अत्यन्त आनन्द हुआ और वे अन्तमें तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये। इस प्रकार तप एवं ब्रह्मका चिन्तन करते हुए उन्होंने पाञ्चभौतिक शरीरका परित्याग कर दिया और अन्तमें ब्रह्ममें ही लीन हो गये। राजा प्रजापालने यह तपस्या वृन्दावनमें की थी। वहाँ तपस्या करते हुए उन्होंने भगवान् गोविन्दकी इस प्रकार स्तुति की थी।

राजा प्रजापालने कहा—जो सम्पूर्ण जगत्‌के रूपमें विराजमान हैं, गोपेन्द्र एवं उपेन्द्र—जिनके नाम हैं, जिनकी किसीसे तुलना नहीं की जा सकती, जो एकमात्र संसार-चक्रको चलानेमें कुशल हैं तथा पृथ्वी जिनके आश्रयपर टिकी है, उन देवेश्वर भगवान् गोविन्दको मैं नमस्कार करता हूँ। श्रीकृष्ण! आप गौओंके रक्षक हैं। जो दुःखरूपी सैकड़ों लहरोंके उठनेसे भयंकर बन गया है तथा जिसमें वृद्धावस्थारूपी जलकी भँवरियाँ उठ रही हैं एवं जो पातालतक गहरा है, ऐसे संसार-समुद्रमें मैं गोते खाता हूँ। ऐसी स्थितिमें मुझे सुख देनेमें समर्थ एकमात्र आप अप्रमेयस्वरूप प्रभु ही हैं। विभो! आपको मेरा नमस्कार है। भगवन्! आधि-व्याधियों तथा ग्रहोंके द्वारा मैं बार-बार इधर-उधर घसीटा जा रहा हूँ। उपेन्द्र! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके बन्धु हैं। जनार्दन! दुःखी एवं व्याकुल व्यक्तिपर कृपा करना आपका स्वाभाविक गुण है। अतः महाभाग! आपको मेरा नमस्कार है। सुरेश! सर्वज्ञोंमें आपका सबसे श्रेष्ठ स्थान है। यह अखिल विश्व आपके प्रयत्नसे ही विस्तृत है। प्रभो! आपकी छत्र-छायामें गोप आनन्द करते हैं। चक्रधर प्रभो! मैं संसारसे भयभीत हो गया हूँ। अतः मेरी रक्षा करनेकी कृपा कीजिये। अच्युत! आप परम देवता हैं। सुरसमाजमें आपकी प्रधानता है। आप पुराणपुरुष हैं। चन्द्रमामें प्रकाश आपका ही तेज है। अग्नि आपका मुख है। गोपेन्द्र! मैं संसारमें भटक रहा हूँ। मेरी रक्षा आप करें। सुरेश! भला इस सुख-दुःख आदि द्वन्द्वमय संसारमें रहनेवाला कौन ऐसा प्राणी है, जो आपकी मायाको पार कर सके। गोपेन्द्र! आप अगोत्र, अस्पर्श, अरूप, अगन्ध, अनिर्देश्य और अज हैं। जो विद्वान् व्यक्ति ऐसे आप पूजनीय

८४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ३७

पुरुषकी उपासना करते हैं, उन्हें मुक्तिका पात्र माना जाता है। आपकी न कोई मूर्ति है और न कोई कर्म। आप परम कल्याणमय हैं। आप शङ्ख, चक्र एवं कमल धारण करते हैं—यह पुराणोंका कथन या सारी स्तुति औपचारिकमात्र है। मैं आपको निरन्तर नमस्कार करता हूँ। आप वामनका अवतार धारण करके तीनों लोकोंपर विजय पा चुके हैं। आप कृष्णादि चतुर्व्यूहसे शोभा पाते हैं। शम्भु, विभु, भूतपति और सुरेश—ये सब आपके ही नाम हैं। ऐसे अनन्त एवं विष्णुनामधारी आप प्रभुको मैं प्रणाम करता हूँ। भगवन्! आप स्थावर-जङ्गम अखिल जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। प्रभो! मैं मुक्ति चाहता हूँ। अतः आप अभी मुझे उस स्थानपर ले चलें, जहाँ गये हुए योगी पुरुष पुनः वापस नहीं आते। विश्वमूर्ते! गोविन्द! आपकी जय हो! सर्वज्ञ, अप्रमेय एवं विश्वेश्वर! आपकी जय हो, जय हो!

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! उस समय राजा प्रजापालने इस प्रकार भगवान् गोविन्दकी स्तुति की और अपने शरीरको उनमें लीन कर दिया और वे शाश्वत धामको पधार गये।

[अध्याय ३६]

आरुणि और व्याधका प्रसङ्ग, नारायण-मन्त्र-श्रवणसे बाघका शापसे उद्धार

**पृथ्वीने पूछा—**भगवन्! आप सम्पूर्ण प्राणियोंका सृजन करते हैं। प्रभो! मैं आपकी उपासनाकी विधि जानना चाहती हूँ—अर्थात् श्रद्धालु स्त्रियाँ अथवा पुरुष आपकी उपासना किस प्रकार करते हैं? विभो! आप मुझे यह सब बतानेकी कृपा कीजिये।

**भगवान् वराह कहते हैं—**देवि! मैं भावसे ही वशीभूत होता हूँ। मैं न तो प्रचुर धनोंसे सुलभ हूँ और न जपादि अन्य उपासनासे ही। साथ ही भक्त लोग मुझे तपद्वारा भी प्राप्त करते हैं—एतदर्थ मैं तुमसे कुछ साधनोंका निर्देश करता हूँ। जो मनुष्य मन, वाणी और कर्मसे मुझमें अपना चित्त लगाये रहता है, उसके लिये अनेक प्रकारके (तपोरूप) व्रत हैं। उन्हें मैं बताता हूँ, सुनो। अहिंसा, सत्यभाषण, चोरी न करना और ब्रह्मचर्यका पालन करना—ये मानसिक व्रत कहे जाते हैं।^१ दिनमें एक समय भोजन करना अथवा केवल एक बार रातमें भोजन करना पुरुषोंके लिये शारीरक व्रत (या तप) हैं। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। वेद पढ़ना, भगवान् विष्णुके नाम-यशका कीर्तन करना, सत्य बोलना, किसीकी चुगली न करना, हितकारी मधुर बात कहना, सबका हित सोचना, धर्मपर आस्था रखना और धर्मयुक्त बातें बोलना—ये वाणीके उत्तम व्रत हैं।

वसुंधरे! इस विषयमें एक प्रसङ्ग सुना जाता है—पूर्वकल्पमें आरुणि नामसे विख्यात एक महान् तपस्वी ब्राह्मण-पुत्र थे। वे ब्राह्मणश्रेष्ठ किसी उद्देश्यसे तप करनेके लिये वनमें गये और वहाँ वे उपवासपूर्वक तपस्या करने लगे। उन ब्राह्मणने देविका नदी^२के सुन्दर तटपर अपने रहनेका आश्रम बनाया था। एक बार किसी दिन वे ब्राह्मण देवता स्नान-पूजा करनेके विचारसे उस नदीके तटपर गये। स्नान करके वे जब जप कर


१. तुलनीय गीता १७।१४
२. इस नामकी कई नदियाँ हैं, पर यहाँ यह पंजाबकी देग नदी है; 'महाभारत' तथा 'स्कन्दपुराण'में इसका बहुधा उल्लेख है।

३७-कूर्म-द्वादशीव्रत

अध्याय ३७ ] आरुणि और व्याधका प्रसङ्ग ८५

रहे थे तो उन्होंने सामनेसे आते हुए एक भयंकर व्याधको देखा, जो हाथमें बड़ा-सा धनुष लिये हुए था। उसकी आँखें बड़ी क्रूर थीं। वह उन ब्राह्मणके वल्कल वस्त्र छीनने और उन्हें मारनेके विचारसे आया था। उस ब्रह्मघातीको देखकर आरुणिके मनमें घबड़ाहट उत्पन्न हो गयी और वे भयसे थरथर काँपने लगे। किंतु ब्राह्मणके अन्तःशरीरमें भगवान् नारायणको देखकर वह व्याध डर-सा गया। उसने उसी क्षण धनुष और बाण हाथसे गिरा दिये और कहा।

व्याधने कहा—ब्रह्मन्! मैं आपको मारनेके विचारसे ही यहाँ आया था; किंतु आपको देखते ही पता नहीं मेरी वह क्रूर-बुद्धि अब कहाँ चली गयी। विप्रवर! मेरा जीवन सदा पाप करनेमें ही बीता है। अबतक मेरे द्वारा हजारों ब्राह्मण मृत्युके मुखमें प्रविष्ट हो गये। प्रायः दस हजार साध्वी स्त्रियोंका भी मैंने अन्त कर डाला है। अहो, ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला मैं पापी पता नहीं, किस गतिको प्राप्त करूँगा? महाभाग! अब आपके पास रहकर मैं भी तप करना चाहता हूँ। आप कृपया उपदेश देकर मेरा उद्धार करें।

व्याधके इस प्रकार कहनेपर उसे ब्रह्मघाती एवं महान् पापी समझकर द्विजश्रेष्ठ आरुणिने उसे कोई उत्तर नहीं दिया; परंतु हृदयमें धर्मकी अभिलाषा जग जानेके कारण ब्राह्मणके कुछ न कहनेपर भी वह व्याध वहीं ठहर गया। ब्राह्मण भी नदीमें स्नानकर वृक्षके नीचे बैठे हुए तप करते रहे। इस प्रकार अब उन दोनोंका नियमित धार्मिक कार्यक्रम चलने लगा। इसी प्रकार कुछ दिन बीत गये। एक दिनकी बात है—आरुणि स्नान करने नदीके जलमें भीतर गये थे। इधर कोई भूखसे व्याकुल बाघ तबतक उन शान्तस्वरूप मुनिको मारनेके लिये आ पहुँचा। पर इसी बीच व्याधने बाघको मार डाला। मरनेपर उस बाघके शरीरसे एक पुरुष निकला। बात ऐसी थी—जिस समय आरुणि जलमें थे और बाघ उनपर झपटा, उस समय घबड़ाहटके कारण मुनिके मुँहसे सहसा 'ॐ नमो नारायणाय' यह मन्त्र निकल गया। बाघके प्राण तबतक उसके कण्ठमें ही थे और उसने यह मन्त्र सुन लिया। प्राण निकलते समय केवल इस मन्त्रको सुनलेनेसे वह एक दिव्य पुरुषके रूपमें परिणत हो गया। तब उसने कहा—'द्विजवर! जहाँ भगवान् विष्णु विराजमान हैं, मैं वहीं जा रहा हूँ। आपकी कृपासे मेरे सारे पाप धुल गये। अब मैं शुद्ध एवं कृतार्थ हो गया।'

इस प्रकार उस पुरुषके कहनेपर विप्रवर आरुणिने उससे पूछा—'नरश्रेष्ठ! तुम कौन हो?' राजेन्द्र! तब पूर्वजन्ममें जो बात बीती थी, उसे बतलाते हुए वह कहने लगा—'इसके पहले जन्ममें मैं 'दीर्घबाहु' नामसे प्रसिद्ध एक राजा था। समस्त वेद, सम्पूर्ण धर्मशास्त्र मुझे सम्यक् प्रकारसे अभ्यस्त थे। अन्य शास्त्र भी मुझसे अपरिचित नहीं थे। पर अन्य ब्राह्मणोंसे मेरा कोई प्रयोजन न था। मैं प्रायः ब्राह्मणोंका अपमान भी कर देता था। मेरे इस व्यवहारसे सभी ब्राह्मण क्रुद्ध हो गये और उन्होंने मुझे भीषण शाप दे दिया—'तू अत्यन्त निर्दयी बाघ होगा; क्योंकि तेरे द्वारा ब्राह्मणोंका भीषण अनादर हो रहा है। तुझे किसी बातका स्मरण भी न रहेगा। अरे प्रचण्ड मूर्ख! मृत्युके समय भगवान् नारायणका नाम तेरे कानोंमें पड़ेगा।'

विप्रवर! वे सभी ब्राह्मण वेदके पारगामी विद्वान् थे। उनका भीषण शाप मुझे लग गया। मुने! जब ब्राह्मणोंने शाप दिया तो मैं उनके पैरोंपर गिर पड़ा तथा उनसे कृपापूर्वक क्षमाकी भीख माँगी। मुझपर उनकी कृपादृष्टि हो गयी।

३८-वराह-द्वादशीव्रत

८६ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ३७

अतएव उन्होंने मेरे उद्धारकी भी बात बता दी और कहा—‘राजन्! प्रत्येक छठे दिन मध्याह्नकालमें तुझे जो कोई मिले, उसे तू खा जाना—वह तेरा आहार होगा। जब तुझे बाण लगेगा और उसके आघातसे तेरे प्राण कण्ठमें आ जायँ, उस समय किसी ब्राह्मणके मुखसे जब ‘ॐ नमो नारायणाय’ यह मन्त्र तेरे कानोंमें पड़ेगा, तब तुझे स्वर्गकी प्राप्ति हो जायगी—इसमें कोई संशय नहीं।’ मुने! मैंने दूसरेके मुखसे भगवान् विष्णुका यह नाम सुना है। परिणामस्वरूप मुझ ब्रह्मद्वेषीको भी भगवान् नारायणका दर्शन सुलभ हो गया। फिर जो ब्राह्मणोंका सम्मानपूर्वक अपने मुँहसे ‘ॐ हरये नमः’ इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए प्राणोंका त्याग करता है तो वह परमपवित्र पुरुष जीतेजी ही मुक्त है। मैं भुजा उठाकर बार-बार कहता हूँ—यह सत्य है, सत्य है और निश्चय ही सत्य है। ब्राह्मण चलते-फिरते देवता हैं। भगवान् पुरुषोत्तम कूटस्थ पुरुष हैं।’

ऐसा कहकर शुद्ध अन्तःकरणवाला वह बाघ (दिव्य पुरुष) स्वर्ग चला गया और ब्राह्मण आरुणि भी बाघके पंजेसे छूटकर व्याधसे कहने लगे—आज बाघ मुझे खानेके लिये उद्यत हो गया था। ऐसे अवसरपर तुमने मेरी रक्षा की है। अतएव उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वत्स! मैं तुमपर संतुष्ट हूँ, तुम वर माँगो।

व्याधने कहा—ब्राह्मणदेवता! मेरे लिये यही वर पर्याप्त है, जो आप प्रेमपूर्वक मुझसे बातें कर रहे हैं। भला, आप ही बताइये—इससे अधिक वरसे मुझे करना ही क्या है?

आरुणिने कहा—व्याध! तुम्हारी तपस्या करनेकी इच्छा थी, अतएव तुमने मुझसे प्रार्थना की थी। किंतु अनघ! उस समय तुममें अनेक प्रकारके पाप थे। तुम्हारा रूप बड़ा भयंकर था। परंतु अब तुम्हारा अन्तःकरण परम पवित्र हो गया है; क्योंकि देविका नदीमें स्नान करने, मेरे दर्शन करने तथा चिरकालतक भगवान् विष्णुके नाम सुननेसे तुम्हारे पाप नष्ट हो गये हैं—इसमें कोई संशय नहीं। साधो! अब मेरा एक वर स्वीकार कर लो, वह यह कि तुम अब यहीं रहकर तपस्या करो। तुम इसके लिये बहुत पहलेसे इच्छुक भी थे।

व्याध बोला—ऋषे! आपने जिन परम प्रभु भगवान् नारायण और विष्णुकी चर्चा की है, उन्हें मानव कैसे प्राप्त कर सकते हैं? यह बतानेकी कृपा करें—यही मेरा अभीष्ट वर है।

ऋषिने कहा—व्याध! कोई भी पुरुष सनातन श्रीहरिके उद्देश्यसे जिस किसी व्रतको भक्तिपूर्वक करनेमें संलग्न हो जाय तो वह उन्हें प्राप्त कर लेता है। पुत्र! तुम ऐसा जानकर भगवान् नारायणका यह व्रत करो। (व्रतका रूप यह है—) कभी भी गणान्न—ब्राह्मणसंघके लिये निर्मित* अन्न नहीं खाना चाहिये और झूठ भी नहीं बोलना चाहिये। व्याध! मैंने तुमसे जो इस उत्तम व्रतकी बात बतायी है, यह बिलकुल सत्य है। अब तुम तपस्वी बनकर जबतक इच्छा हो, यहाँ रहो।

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! आरुणिको यह निश्चय हो गया कि यह व्याध मोक्ष पानेके लिये अत्यन्त चिन्तित है। अतः उन वरदाता ब्राह्मणने उसे इच्छित वर दे दिया। फिर एक दिन वे वहाँसे उठकर सहसा कहीं चले गये।

[ अध्याय ३७]


* यहाँ मूलमें—‘गणान्न’ शब्द है। मनु ४।१०९ तथा ११९ में भी यह शब्द आया है। वहाँ सभी व्याख्याता इसका प्रायः ‘शतब्राह्मणसंघान्नम्’—यही अर्थ करते हैं। मोनियर विलियमके संस्कृत-अँग्रेजी-कोशमें यही भाव और अधिक स्पष्ट है।

अध्याय ३८ ] सत्यतपाका प्राचीन प्रसङ्ग [ ८७

सत्यतपाका प्राचीन प्रसङ्ग

**भगवान् वराह कहते हैं—**पृथ्वि ! अब वह व्याध साधुओंके मार्गका अवलम्बनकर मन-ही-मन गुरुका ध्यान करते हुए निराहार रहकर तपस्या करने लगा। भिक्षा लेनेका समय आनेपर वह वृक्षसे गिरे सूखे पत्ते खा लिया करता था। एक दिनकी बात है, उसे भूख लगी तो किसी वृक्षके नीचे गया। भूखके कारण पेड़के पाससे उसे सूखे पत्ते उठाकर खानेकी इच्छा हुई। पर वैसा करते ही आकाशवाणी हुई—'अरे, ये शाखोटके निकृष्ट पत्ते हैं, इन्हें मत खाओ।' यह शब्द पर्याप्त उच्च स्वरसे हुआ था। अतः वह व्याध उसे छोड़कर हट गया। अब वह किसी दूसरे वृक्षका पत्ता उठाकर लेने लगा। अब पुनः वहाँ भी वैसी ही ध्वनि हुई। इस प्रकारकी आपत्ति मानकर व्याधने उस दिन कुछ भी न खाया और निराहार रहकर बड़ी सावधानीके साथ गुरुदेव आरुणिको स्मरण करते हुए वह तप करनेमें तत्पर रहा।

इस प्रकार वह तप कर ही रहा था कि इतनेमें महर्षि दुर्वासा उस व्याधके पास पधारे। उन ऋषिने देखा—व्याधके प्राणमात्र शरीरमें हैं, पर तपस्याके तेजसे यह ऐसा चमक रहा है, मानो घी डालनेसे अग्नि प्रदीप्त हो रही हो। उस व्याधने उन मुनिवर दुर्वासाजीको सिर झुकाकर प्रणाम किया और बोला—'भगवन् ! आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया। आज श्राद्धका दिन है। आप अतिथि देवता मेरे पास पधारे हैं। सूखे पत्ते आदिसे श्राद्ध करके आप द्विजवरको मैं तृप्त करना चाहता हूँ।' इधर इसमें कितनी पवित्र भावनाएँ हैं, इन्द्रियाँ कितनी वशमें हो गयी हैं तथा इसने तपसे कितना बल प्राप्त कर लिया है—यह जाननेके लिये वे मुनि भी उद्यत थे ही। अतः उन्होंने उच्च स्वरसे व्याधसे कहा—'ठीक है, तुम अपने पास आये मुझ अतिथिको यव, गेहूँ एवं धान्यसे भलीभाँति सिद्ध किया हुआ अन्न दो। मैं भूखसे अत्यन्त पीडित हो रहा हूँ।' दुर्वासाजीके ऐसा कहनेपर व्याध बड़ी चिन्तामें पड़ गया। वह सोचने लगा—'यह सब सामग्री कहाँसे मिलेगी।' वह इस प्रकार सोच ही रहा था इतनेमें एक सोनेका पवित्र पात्र आकाशसे गिरा। वह पात्र सिद्ध अन्नोंसे पूर्ण था। व्याधने उसे हाथमें उठा लिया और उसे लेकर वह डरता हुआ दुर्वासा मुनिसे कहने लगा—'ब्रह्मन् ! आप परम ब्रह्मज्ञ पुरुष हैं। जबतक मैं भिक्षा लाने जाता हूँ, तबतक आप यहीं रहनेकी कृपा करें। मुझपर किसी प्रकार आपकी इतनी कृपा अवश्य होनी चाहिये।'

इस प्रकार कहकर वह साधु व्याध भिक्षा माँगनेके लिये जैसे ही आगे बढ़ा—इतनेमें उसे बहुत-से उपवन एवं अहीरकी बस्तियोंसे युक्त एक नगर दिखायी पड़ा। वहाँ पहुँचनेपर वृक्षोंमेंसे दूसरे अनेक पुरुष सुवर्णपात्र लिये निकल पड़े और विविध दिव्यान्नोंसे उसकी थालीको भर दिया। व्याध उसे लेकर अपनेको कृतार्थ-सा मानता हुआ अपने स्थानपर लौट आया। वहाँ आकर उसने जापकोंमें श्रेष्ठ महर्षि दुर्वासाको बैठे देखा। मुनिको देखकर उसने प्रसन्नतापूर्वक भिक्षाको एक पवित्र स्थानपर रख दिया और उन्हें प्रणाम कर कहा—'ब्रह्मन् ! यदि आपकी मुझपर दया है तो कृपा करें, यह आसन लें और पैर धोकर पवित्र आसनपर बैठ जायें।' व्याधके ऐसा कहनेपर उसके पवित्र तपोबलकी परीक्षा करनेके विचारसे महर्षिने कहा—'व्याध ! मैं नदी जानेमें असमर्थ हूँ। मेरे पास जलपात्र भी नहीं है; फिर मेरा पैर कैसे धुल सकता है?' मुनिके ऐसा कहनेपर

३९-नृसिंह-द्वादशीव्रत

८८ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय ३९

व्याध सोचने लगा—'क्या अब करूँ? मुनिजीका मेरे यहाँ भोजन कैसे हो सकेगा?' फिर उस चतुर व्याधने मन-ही-मन अपने गुरु आरुणिको स्मरण किया। साथ ही उस सुन्दर बुद्धिवाले व्याधने उस देविका नदीकी भी स्तुतिपूर्वक शरण ली।

व्याध बोला—नदियोंमें श्रेष्ठ देविके! मैं व्याध हूँ। मैंने सदा पाप-ही-पाप किये हैं। ब्राह्मण-हत्या-जैसा महापाप भी कर चुका हूँ। देवि! फिर भी मैं आपको स्मरण कर आपकी शरण आया हूँ। आप मेरी रक्षा करें। देवता, मन्त्र और पूजनका विधान—यह सब मैं कुछ भी नहीं जानता। देवि! आप नदियोंमें प्रधान हैं। केवल गुरुके उत्तम चरणोंका ध्यान करनेसे मेरा सदा कल्याण होता आया है। अब आप मुझ पापीपर कृपा करें। आपगे! दुर्वासा ऋषि अपना पैर धो सकें, इस निमित्तसे आप उनके संनिकट पधारनेकी कृपा कीजिये।

इस प्रकार व्याधके प्रार्थना करनेपर पापनाशिनी देविका नदी वहीं पहुँच गयीं, जहाँ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दुर्वासा मुनि विराजमान थे। यह देखकर मुनिको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे विस्मयविमुग्ध रह गये। साथ ही उन विद्वान् मुनिवर दुर्वासाके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने हाथ-पैर धोकर उसके श्रद्धापूर्वक दिये हुए अन्नको खाया तथा आचमन किया। उस समय व्याधके शरीरमें केवल हड्डी ही शेष रह गयी थी। भूखके कारण वह अत्यन्त दुर्बल हो गया था। दुर्वासा ऋषिने उससे कहा—'अङ्गोंसहित वेद तथा रहस्यके साथ पद एवं क्रम, ब्रह्म-विद्या और पुराण—सभी तुम्हें प्रत्यक्ष हो जायँ।' इस प्रकारका वर देकर दुर्वासाजीने उसका नवीन नामकरण किया। उन्होंने कहा—'तुम अब ऋषियोंमें अग्रगण्य सत्यतपा नामक ऋषि होओगे।'*

मुनिवर दुर्वासाजीने जब इस प्रकार व्याधको वर दिया तो उसने मुनिसे कहा—'ब्रह्मन्! मैं व्याध होकर वेदोंका अध्ययन कैसे कर सकूँगा।'

ऋषि बोले—साधु व्याध! निराहार रहकर तपस्या करनेसे अब तुम्हारे पहलेके शरीरके संस्कार समाप्त हो गये हैं। तुम्हारा यह तपोमय शरीर उससे सर्वथा भिन्न है—इसमें कोई संशय नहीं। पूर्वकालीन अज्ञान भी शेष नहीं रह गया है। इस समय तुम्हारे अन्तःकरणमें शुद्धरूप अविनाशी परमात्मा निवास कर रहे हैं। अतः तुम परम पवित्र शरीरवाले बन गये हो—यह मैं तुमसे बिलकुल सच्ची बात बता रहा हूँ। मुने! इस कारण तुम्हें वेद और शास्त्र भलीभाँति प्रतिभासित—ज्ञात होंगे। [अध्याय ३८]


मत्स्यद्वादशीव्रतका विधान तथा फल-कथन

सत्यतपाने कहा—भगवन्! आप ब्रह्म-ज्ञानियोंके शिरोमणि हैं। आपने जो दो शरीरोंकी बात कही है, यह शरीरभेद कैसे है? आप यह मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये।

दुर्वासाजी बोले—दो ही नहीं, किंतु शरीरके तीन भेद हैं—ऐसा कहना चाहिये। प्राणियोंको ये शरीर इसलिये मिलते हैं कि उनको पाकर वह पूर्वकृत भोग भोगे। तुम्हारी पूर्वकी अवस्था भले


* इसी पुराणमें आगे चलकर ९८वें अध्यायमें भगवान्ने बतलाया है कि वस्तुतः ये सत्यतपा इस जन्ममें भी वाल्मीकिके समान ब्राह्मण ही थे। केवल व्याधोंके संसर्गमें रहकर वे व्याध-से बन गये थे। फिर ऋषियोंके सत्सङ्गसे विशेषकर दुर्वासाके उपदेशसे वे ब्राह्मण हो गये—

स हि सत्यतपाः पूर्वं भृगुवंशोद्भवो द्विजः। दस्युसंसर्गसम्भूतो दस्युवत् समजायत॥
ततः कालेन महता ऋषिसङ्गात्पुनर्द्विजः। बभौ दुर्वाससा सम्यग्बोधितश्च विशेषतः॥

४०-वामन-द्वादशीव्रत

अध्याय ३९ ] मत्स्यद्वादशीव्रतका विधान तथा फल-कथन [ ८९

ही पापपूर्ण थी, क्योंकि उस समय तुममें ज्ञानका नितान्त अभाव था। पर वही तुम अब उत्तम व्रतका पालन करनेके कारण दूसरी अवस्थामें आ गये हो—ऐसा समझना चाहिये। ब्रह्मवेत्ता 'विद्वानोंने बताया है कि एक तीसरा भी शरीर है, जिसे इन्द्रियाँ अपना विषय नहीं बना सकतीं तथा जो धर्म और अधर्मको भोगनेके लिये मिलता है। इस प्रकार इसके तीन भेद हैं। धर्म एवं अधर्मके भोग तथा सांसारिक पदार्थोंके भोगका साधन होनेसे भी शरीरके तीन भेद सिद्ध होते हैं। पूर्व समयमें तुम्हारे द्वारा जो प्राणियोंका वध हुआ करता था, उससे वैसे तुम्हारे संस्कार भी बन गये थे। इसीलिये तुम्हें पापमय शरीरवाला कहा जाता था। लोग तुमको पापी कहते थे। किंतु अब निरन्तर तप और दया करनेके कारण तुम्हारी प्रवृत्ति परम पवित्र बन गयी है। इस समय तुम्हें यह धर्ममय दूसरा शरीर सुलभ हो गया है। इस शरीरसे वेदों और पुराणोंकी जानकारी प्राप्त करनेके तुम पूर्ण अधिकारी हो—इसमें कोई संशय नहीं। जैसे जबतक बालककी अवस्था आठ वर्षतककी रहती है, तबतक उसकी मानसिक वृत्तिमं कुछ और ही भाव भरे रहते हैं। वही जब आठ वर्षकी सीमा पार कर जाता है, तो उसकी चेष्टा दूसरी ही बन जाती है। अतः ब्रह्मका विवेचन करनेवाले महापुरुषोंने बताया है कि इसी प्रकार एक ही शरीर अवस्थाओंके भेदसे तीन भेदवाला कहा गया है। भेद केवल नाममें है—जैसे मिट्टी और घड़ा। इन वर्णोंके क्रमसे कर्मकाण्डके भी चार भेद बतलाये गये हैं।'

सत्यतपाने कहा— मुनिवरजी! आपने जिन परब्रह्म परमात्माकी बात कही है, उनके रूपको तो महात्मा एवं योगी पुरुष भी जाननेमें असमर्थ हैं। क्योंकि उन प्रभुमें नाम, गोत्र और आकारका अभाव है। जब उन परब्रह्म परमात्माकी कोई संज्ञा ही नहीं है तो वे जाने भी कैसे जा सकते हैं। गुरो! आप उनकी कोई ऐसी संज्ञा बतानेकी कृपा कीजिये, जिससे मैं उन्हें जान सकूँ। जिनका नाम वेदों एवं शास्त्रोंमें पढ़ा जाता है, क्या वे ही तो ये परब्रह्म परमात्मा नहीं हैं। उन्हें तो वेदोंमें पुरुष, पुण्डरीकाक्ष तथा स्वयं भगवान् नारायण एवं श्रीहरि कहा गया है। मुनिवर! उन्हें पानेके साधन अनेक प्रकारके यज्ञ तथा उचित प्रचुर दान हैं। वे भगवान् इन उपर्युक्त साधनों तथा श्रद्धा, भक्ति एवं तप द्वारा प्राप्त होते हैं। अथवा भगवन्! प्रचुर सम्पत्तिसे तथा बहुत-से अन्य श्रेष्ठ सत्कर्मोंके प्रभावसे वेदके पारगामी विद्वान् तथा पुण्यात्मा पुरुष उन्हें पा सकते हैं। पर मैं एक निर्धन व्यक्ति उन्हें पा सकूँ—आप वैसा उपाय मुझे बतानेकी कृपा कीजिये। विप्रवर! धनके अभावमें दान देना सम्भव नहीं है। धन रहते हुए भी यदि परिवारमें अधिक आसक्ति है, तो उसके मनमें दान करनेकी रुचि नहीं होती। मेरा अनुमान है कि उससे तो भगवान् नारायण सर्वथा दूर ही रहते हैं। क्योंकि वे सनातन श्रीहरि अत्यन्त प्रयासद्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं। इसलिये दयापूर्वक आप मुझे कोई ऐसा सुगम साधन बतानेकी कृपा कीजिये, जिससे सर्वसाधारण व्यक्ति भी उन्हें सुगमतासे प्राप्त कर सके।

दुर्वासाजी बोले— साधो! मैं तुम्हें एक अत्यन्त गोपनीय व्रत बताता हूँ। भगवान् नारायण ही इसके प्रवर्तक हैं। पूर्व समयमें जब पृथ्वी पातालमें डूबी या धँसी जा रही थी तो उसने इस व्रतको किया था। उस समय जलके बहुत बढ़ जानेसे पृथ्वीका पार्थिव अंश प्रायः जलद्वारा नष्ट कर दिया गया था। इस प्रकार जब सर्वत्र जल-ही-जल रह गया तो पृथ्वी रसातलमें चली गयी। वहाँ जाकर प्राणीवर्गको धारण करनेवाले पृथ्वी-देवीने, जो सर्वव्यापी परम प्रभु भगवान् नारायण हैं,

४१-जामदग्न्य-द्वादशीव्रत

९०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ३९

उनकी व्रत एवं उपवासद्वारा आराधना की थी। उसने अनेक प्रकारके नियमोंका पालन करते हुए यह व्रत किया था। बहुत समयतक व्रत करनेपर जिनकी ध्वजापर गरुडका चित्र अङ्कित है, वे भगवान् श्रीहरि उसपर प्रसन्न हो गये। तब उन सनातन प्रभुकी कृपाके फलस्वरूप यह पृथ्वी पातालसे ऊपर लायी गयी और समतलरूपमें सुशोभित हुई।

सत्यतपाने पूछा— मुनिवर! पृथ्वीने जो व्रत-उपवास किये थे, वे कौन-से व्रत तथा कितने नियम थे? यह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

दुर्वासाजी कहते हैं— जब मार्गशीर्ष मासकी दशमी तिथि आ जाय, तब बुद्धिमान् पुरुष नियमपूर्वक रहकर भगवान् श्रीहरिकी पूजा करे। उस समय विधिपूर्वक हवनका कार्य भी सम्पन्न करना चाहिये तथा पवित्र वस्त्र धारण करना चाहिये। प्रसन्न मनसे रहकर व्रती पुरुष भलीभाँति सिद्ध किया हुआ यव आदि हविष्यान्न भोजन करे। फिर कम-से-कम पाँच पग दूर जाकर अपने पैर धोये। पुनः प्रातःकाल उठकर शौचके बाद आठ अंगुलकी लम्बी दतुअनसे मुखको शुद्ध करना चाहिये। दन्तधावनका काष्ठ किसी दूधवाले वृक्षका होना आवश्यक है। इसके बाद विधिपूर्वक आचमन करना चाहिये। शरीरके नौ द्वार हैं, उन सभी द्वारोंको स्पर्श कर फिर भगवान् जनार्दनका ध्यान करे। ध्यानका प्रकार यह है—'भगवान् श्रीहरि सर्वत्र विराजमान हैं। उनकी भुजाओंमें शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म सुशोभित हो रहे हैं। वे पीताम्बर धारण किये हैं तथा उनके मुँहपर मंद मुसकान विराजित है। वे सभी शुभ लक्षणोंसे सुशोभित हैं।' इस प्रकार उनका ध्यान कर पुनः भगवान् जनार्दनको स्मरण करते हुए हाथमें जल ले और उन प्रभुके लिये एक अञ्जलि अर्घ्य दे। महामुने! अर्घ्य देते समय निम्नलिखित मन्त्र पढ़ना चाहिये¹—'कमलके समान नेत्रसे शोभा पानेवाले भगवान् अच्युत! आज एकादशी तिथि है। अतः मैं निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा। आप ही मेरे शरण हैं।'

इस प्रकार कहकर दिनमें नियमपूर्वक उपवास करे। रात्रिके समय देवाधिदेव भगवान् नारायणके समीप बैठकर 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रका जप करे। प्रायः एक सहस्र जप कर व्रतीको सो जाना चाहिये। फिर प्रातःकाल होनेपर व्रती पुरुष समुद्रतक जानेवाली नदी अथवा दूसरी भी किसी नदी या तालाबपर जाकर अथवा घरपर संयमपूर्वक रहकर हाथमें पवित्र मिट्टी लेकर यह मन्त्र पढ़े—'देवि! समस्त प्राणियोंका धारण और पोषण सदा तुमपर ही अवलम्बित है। सुव्रते! यदि यह सत्य है तो इसके फलस्वरूप मेरे सम्पूर्ण पापोंको तुम दूर करनेकी कृपा करो। कश्यपतनये! पूरे ब्रह्माण्डके भीतर रहनेवाले जितने तीर्थ हैं, वे सभी तुमसे स्पृष्ट हैं। उन सबको तुमने ही अपनी पीठपर स्थान दिया है। भगवती पृथ्वि! इसी भावसे भरकर मैं तुमसे यह मृत्तिका ले आज अपने ऊपर धारण करता हूँ।'²

फिर जलके देवता वरुणसे प्रार्थना करे—'महाभाग वरुण! आपमें सभी रस सदा स्थान पाये हुए हैं। उनसे इस मृत्तिकाको गीला करके मुझे यथाशीघ्र पवित्र करनेकी कृपा करें।'³


१. एकादश्यां निराहारः स्थित्वा चैवापरेऽहनि । भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥ (३९ । ३२)
२. धारणं पोषणं त्वत्तो भूतानां देवि सर्वदा ।
तेन सत्येन मे पापं यावन्मोचय सुव्रते । ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि त्वय्यास्पृष्टानि काश्यपि ॥
तेनेमां मृत्तिकां त्वत्तो गृह्य स्थास्येऽद्य मेदिनि । (३९ । ३५, ३७)
३. त्वयि सर्वे रसा नित्याः स्थिता वरुण सर्वदा ॥
तैरियं मृत्तिका प्लाव्य पूतां कुरु च मां चिरम् ॥ (३९ । ३७-३८)

४२-श्रीराम एवं श्रीकृष्ण-द्वादशीव्रत

अध्याय ३९ ] मत्स्यद्वादशीव्रतका विधान तथा फल-कथन ९१

बुद्धिमान् पुरुष इस प्रकारका विधान सम्पन्नकर मिट्टी और जल हाथमें ले अपने सिरपर आलेपन करे। साथ ही शेष बची हुई मृत्तिकाको तीन बार समस्त अङ्गोंमें लगाये। फिर उपर्युक्त वारुणमन्त्र पढ़कर विधिपूर्वक स्नान करे। स्नान करनेके पश्चात् संध्या-तर्पण आदि नित्य-नियम सम्पन्नकर देवालयमें जाय। वहाँ लक्ष्मीसहित भगवान् नारायणकी षोडशोपचारकी विधिसे सर्वाङ्ग-पूजा करे।

पूजाका प्रकार यह है—‘भगवान् केशवको नमस्कार' ऐसा कहकर भगवान्‌के दोनों चरणोंकी पूजा करे और 'दामोदरको नमस्कार' यह कहकर उनके कटिभागकी पूजा करे। 'भगवान् नृसिंहको नमस्कार' ऐसा कहकर उनके दोनों ऊरुओंकी तथा 'श्रीवत्सका चिह्न धारण करनेवाले प्रभुको नमस्कार' कहकर उनके वक्षःस्थलकी पूजा करनी चाहिये। 'कौस्तुभमणिधारी भगवान्‌को नमस्कार' कहकर उनके कमरकी पूजा करे तथा 'लक्ष्मीपतिको नमस्कार' कहकर उनके हृदय-देशकी पूजा करे। 'तीनों लोकोंपर विजय पानेवाले प्रभुको नमस्कार' कहकर उनकी दोनों भुजाओंका तथा 'सर्वात्मा श्रीहरिको नमस्कार' कहकर उनके सिरका पूजन करे। 'रथका चक्र धारण करनेवाले भगवान्‌को नमस्कार' कहकर चक्रकी पूजा करे तथा 'कल्याणकारी प्रभुको प्रणाम' कहकर शङ्खकी पूजा करे। 'गम्भीरस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार' कहकर उनकी गदाका तथा 'शान्तिस्वरूप भगवान्‌को प्रणाम है'—यह कहकर पद्मकी पूजा करनी चाहिये।

भगवान् नारायण सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी हैं। उक्त प्रकारसे उनकी अर्चना करनेके उपरान्त ज्ञानी पुरुष फिर उनके सामने जलपूर्ण चार कलश स्थापित करे। उन कलशोंको मालाओंसे अलंकृतकर उनपर तिलसे भरे पात्र रखे। इन चार कलशोंको चार समुद्र मानकर उनके मध्यभागमें एक मङ्गलमय पीठ या चौकी स्थापित करनी चाहिये, जिसके मध्यमें वस्त्र बिछा हो। फिर एक सोने, चाँदी, ताँबा अथवा लकड़ीके पात्रमें या कुछ न मिल सके तो पलाशके पत्तेमें ही जल रखकर उसपर सभी अवयवोंसे अङ्कित तथा आभूषणोंसे अलंकृत भगवान् जनार्दनकी मत्स्याकार सुवर्ण-प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। फिर उस भगवत्प्रतिमाकी अनेक प्रकारके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, वस्त्र एवं नैवेद्य आदिके द्वारा विधिपूर्वक षोडशोपचारसे पूजा करनी चाहिये। पूजाके उपरान्त यों प्रार्थना करनी चाहिये—'भगवन् ! जिस प्रकार पातालमें प्रविष्ट हुए वेदोंका आपने उद्धार किया था, केशव! आप वैसे ही मेरा भी उद्धार करनेकी कृपा कीजिये।'

इस प्रकार पूजा सम्पन्न हो जानेके पश्चात् प्रार्थना करके रातमें भगवत्प्रतिमाके सामने जागरण करना चाहिये। पुनः प्रातःकाल होनेपर उपर्युक्त स्थापित किये हुए चारों कलशोंको चार ब्राह्मणोंको अर्पण कर दे। पूर्वका कलश ऋग्वेदके ज्ञाता ब्राह्मणको दे। दक्षिणका कलश सामवेदी ब्राह्मणको देना चाहिये। यजुर्वेदके ज्ञाता ब्राह्मणको पश्चिमका कलश देना चाहिये। उत्तरका कलश अपनी इच्छाके अनुसार जिस किसी ब्राह्मणको दे सकते हैं, ऐसी विधि है। कलश वितरण करनेके पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे—'पूर्वकी ओरसे मेरी ऋग्वेद, दक्षिणकी ओरसे सामवेद, पश्चिमकी ओरसे यजुर्वेद तथा उत्तरकी ओरसे अथर्ववेद रक्षा करें। व्रतके अन्तमें भगवान् मत्स्यकी सुवर्णनिर्मित प्रतिमा आचार्यको समर्पण करनेकी विधि है। जो पुरुष इस विधिके अनुसार वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप आदि उपचारोंसे भगवान्‌की भलीभाँति पूजा करता है, जिसके मुखसे भगवन्नामरूपी मन्त्र उच्चरित होते रहते हैं, जिसे

४३-बुद्ध-द्वादशीव्रत

९२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ३९

उन मन्त्रोंका गुणानुपूर्वी अभिप्राय भी अवगत होता रहता है तथा जिसने दानका विधान भी सम्पन्न कर दिया है, उसे करोड़गुना अधिक फल मिलता है। साथ ही जिसने गुरुको अर्पण तो कर दिया, परंतु आसक्ति एवं मोहके वश हो जानेसे उसके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न हो गयी तो ऐसे व्रती पुरुषके फलमें न्यूनता भी आती है। विद्वान् लोग कहते हैं कि विधिका प्रकार बतानेवाला आप्तपुरुष ही गुरुके पदका अधिकारी है।'

इस प्रकार द्वादशीके दिन विधिसहित दान करके पुनः भगवान् विष्णुका पूजन करना चाहिये। अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें उत्तम दक्षिणा दे। भोज्य पदार्थ उत्तम अन्नसे निर्मित होना चाहिये। इसके बाद मनुष्य स्वयं भोजन करे—ऐसा विधान है। फिर संयतेन्द्रिय एवं मौन हो बच्चोंको साथ लेकर भोजन करे। इस व्रतको सर्वप्रथम पृथ्वीने किया था। जो मनुष्य उक्त विधानसे यह व्रत करता है, परम बुद्धिमान् सत्यतपा! उसका पवित्र फल बताता हूँ, सुनो। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महाभाग! यदि मुझे अनेक हजार मुख मिल जायँ तथा ब्रह्माकी आयु-जैसी लंबी आयु सुलभ हो जाय तो सम्भव है कि इस धर्मका फल किसी प्रकार बतला सकूँ। ब्रह्मन्! फिर भी कुछ परिचय प्राप्त हो जाय—इस उद्देश्यसे कहता हूँ, सुनो—मुने! तैंतालीस लाख, बीस हजार वर्षोंकी एक चतुर्युगी होती है। ऐसे एकहत्तर युगोंका एक मन्वन्तर होता है। चौदह मन्वन्तरोंका ब्रह्माका एक दिन और इतनी ही संख्याकी रात होती है। इस प्रकार तीस दिनोंका एक मास और बारह महीनोंका उनका एक वर्ष कहा गया है। ऐसे सौ वर्षोंकी ब्रह्माकी आयु मानी गयी है—इसमें कोई संशयकी बात नहीं। जो पुरुष उक्त विधानके अनुसार इस द्वादशी-व्रतको करता है, वह ब्रह्माजीके लोकमें पहुँच जाता है और वह वहाँ तबतक रहता है, जबतक ब्रह्माकी आयु समाप्त नहीं हो जाती। जब ब्रह्मा अपने शरीरका संवरण करने लगते हैं तो उसी क्षण उनके विग्रहमें वह भी समा जाता है। पुनः ब्राह्मी-सृष्टि आरम्भ होनेपर वह एक महान् दिव्य पुरुष होता है। तपस्वी अथवा राजाका पद उसे प्राप्त होता है। सकाम अथवा निष्काम किसी भी भावसे जो इस व्रतका अनुष्ठान करता है, उसके इस लोकमें किये गये कठिन-से-कठिन जितने पाप हैं, वे सभी उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं। इस लोकमें जो दरिद्र है अथवा अपने राज्यसे च्युत हो गया है, वह विधानके साथ इस व्रतके करनेसे अवश्य ही राजा बन सकता है। यदि कोई सौभाग्यवती स्त्री है और उसे संतान नहीं होती हो तो वह इस कथित विधानसे यह व्रत करे। फलस्वरूप वह स्त्री परम धार्मिक पुत्र प्राप्त कर सकती है। यदि दूसरेका सम्मान करनेवाले किसी व्यक्तिका अगम्या स्त्रीके साथ सम्बन्ध हो गया हो तो वह उक्त विधिके अनुसार प्रायश्चित्तरूपमें यह व्रत करे तो वह भी उस पापसे मुक्त हो सकता है। जिसने बहुत वर्षोंसे ब्रह्म-सम्बन्धी क्रियाका त्याग कर दिया है, वह यदि एक बार भी भक्तिपूर्वक इस व्रतका अनुष्ठान करे तो वह वैदिकसंस्कारसे सम्पन्न हो सकता है। महामुने! इसके विषयमें अब अधिक कहनेसे क्या प्रयोजन! इसकी तुलना करनेवाला अन्य कोई भी व्रत नहीं है। ब्रह्मन्! अप्राप्य वस्तुको प्राप्य बनानेकी जिसमें सामर्थ्य है, वैसी इस मत्स्य-द्वादशीव्रतको निरन्तर करे। जिस समय पृथ्वी पातालमें जलमग्न थी, उस समय उक्त विधानके अनुसार स्वयं उसने इस व्रतका अनुष्ठान किया था। तात! इस विषयमें

अध्याय ४० ] कूर्म-द्वादशीव्रत ९३

और कुछ विचार करना अनावश्यक है। जिसने दीक्षा नहीं ली है और जो नास्तिक है, उसे यह विधान बताना अवाञ्छनीय है। जो देवता अथवा ब्राह्मणसे द्वेष करता है, उसको इसे कभी नहीं सुनाना चाहिये। पापोंको तुरंत प्रशमन करनेवाला यह व्रत गुरुमें श्रद्धा रखनेवाले व्यक्तिको बताना चाहिये। जो मनुष्य यह व्रत करता है, वह इस जन्ममें धन, धान्य और सौभाग्य प्राप्त करता है। उसे अनेक प्रकारकी श्रेष्ठ स्त्रियाँ प्राप्त होती हैं। यह उत्तम प्रसङ्ग द्वादशीकल्प कहलाता है। जो इसे भक्तिपूर्वक सुनाता है अथवा स्वयं पढ़ता-सुनता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जाता है। [अध्याय ३९]

कूर्म-द्वादशीव्रत

दुर्वासाजी कहते हैं—मुने! [जिस प्रकार मार्गशीर्षका यह मत्स्य-द्वादशीव्रत है,] प्रायः ऐसा ही पौषमासका कूर्म-द्वादशीव्रत है। इसी मासमें देवताओंने समुद्रका मन्थनकर अमृत प्राप्त किया था। उस समय भक्तोंको अभिलषित पदार्थ देनेमें कुशल स्वयं भगवान् नारायण कच्छप-रूपसे अवतरित हुए थे। उस दिन यही महान् पवित्र तिथि थी। अतः पौषमासके शुक्लपक्षकी यह दशमी—इन कूर्मरूप धारण करनेवाले परम प्रभु परमात्माकी तिथि है। व्रतीको चाहिये कि पूर्वकथनानुसार दशमी तिथिके दिन स्नान आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ सम्पन्नकर एकादशी तिथिमें भक्तिके साथ भगवान् श्रीजनार्दनकी आराधना करे। मुनिवर! पूजाके मन्त्र अलग-अलग हैं। उन मन्त्रोंसे भगवान् श्रीहरिका पूजन होना आवश्यक है। ‘ॐ कूर्माय नमः’, ‘ॐ नारायणाय नमः’, ‘ॐ सङ्कर्षणाय नमः’, ‘ॐ विशोकाय नमः’, ‘ॐ भवाय नमः’, ‘ॐ सुबाहवे नमः’ तथा ‘ॐ विशालाय नमः।’ इन वाक्योंका उच्चारणकर क्रमशः भगवान् श्रीहरिके चरण, कटिभाग, उदर, वक्षःस्थल, कण्ठ, भुजाएँ एवं सिरकी भलीभाँति (पूर्वोक्त प्रकारसे भी) पूजा करनी चाहिये। फिर ‘भगवन्! आपके लिये नमस्कार है’—ऐसा कहना चाहिये। पुनः नाम-मन्त्रका उच्चारणकर सुन्दर चन्दन, पुष्प, धूप, फल और नैवेद्य आदि अद्भुत उपचारोंसे परम प्रभु भगवान् श्रीहरिकी पूजा करे। फिर सामने एक कलश रखकर उसपर अपनी शक्तिके अनुसार भगवान् कूर्मकी सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करे। साथमें मन्दराचलकी भी प्रतिमा रखे। कलश माला और स्वच्छ वस्त्रसे सुसज्जित एवं अलंकृत हो। कलशके भीतर रत्न डाले तथा ऊपर घृतसे भरा हुआ ताँबेका एक पात्र रखकर उसीमें प्रतिमाका अभिधारण करे। फिर ब्राह्मणकी पूजाकर उसे दान कर दे। उस समय मनमें संकल्प करे—‘मैं कल अपनी शक्तिके अनुरूप दक्षिणा आदिसे ब्राह्मणोंकी पूजा करूँगा। इससे कूर्म-रूपमें प्रकट होनेवाले देवाधिदेव भगवान् नारायणको मैं प्रसन्न करना चाहता हूँ।’ इसके पश्चात् अपने सेवकवर्गके साथ बैठकर भोजन करे।

विप्र! इस प्रकार कार्यसम्पन्न करनेपर व्रतकत्र्ताके पाप नष्ट हो जाते हैं। इसमें कुछ अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। वह पुरुष संसार-चक्रका त्यागकर भगवान् श्रीहरिके सनातन-लोकको चला जाता है। उसके पाप तत्काल विलीन हो जाते हैं और वह शोभा तथा लक्ष्मीसम्पन्न होकर सत्यधर्मका भाजन बन जाता है। भक्तिके साथ व्रत करनेवाले उस पुरुषके अनेक जन्मोंसे-सञ्चित पाप दूर भाग जाते हैं। पहले जो मत्स्य-द्वादशीका फल बताया गया है, इसके उपासकको भी वही फल प्राप्त होता है, तथा भगवान् श्रीनारायण उसपर शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं। [अध्याय ४०]

४४-कल्कि-द्वादशीव्रत

९४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ४१

वराह-द्वादशीव्रत

दुर्वासाजी कहते हैं—व्याध! तुम एक महान् भक्तशील धार्मिक पुरुष हो! जिस प्रकार मार्गशीर्षमें भगवान् नारायणने मत्स्यका रूप तथा पौषमासमें कच्छपका रूप धारण किया था, वैसे ही माघ-मासके शुक्लपक्षमें द्वादशीके दिन पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये वे प्रभु वराहके रूपसे प्रकट हुए हैं। अतः इस तिथिके अवसरपर भी पहले कही हुई विधिके अनुसार संकल्प एवं स्थापन आदि करके विद्वान् पुरुष उनकी पूजा करे। उन अविनाशी प्रभुकी चन्दन, धूप एवं नैवेद्य आदिसे अर्चना होनी चाहिये। पूजनके उपरान्त उनके सामने जलसे भरा एक कलश रखे। फिर ‘ॐ वराहाय नमः’से दोनों पैरोंकी, ‘ॐ माधवाय नमः’से कटिकी, ‘ॐ क्षेत्रज्ञाय नमः’से उदरकी, ‘ॐ विश्वरूपाय नमः’से हृदयकी, ‘ॐ सर्वज्ञाय नमः’से कण्ठकी, ‘ॐ प्रजानां पतये नमः’से सिरकी, ‘ॐ प्रद्युम्नाय नमः’से दोनों भुजाओंकी, ‘ॐ दिव्यास्त्राय नमः’से चक्रकी तथा ‘ॐ अमृतोद्भवाय नमः’से शङ्खकी अर्चना करनी चाहिये। इस प्रकार पूजाकर विवेकी पुरुष वराह भगवान्‌की प्रतिमाको कलशपर स्थापित करे। अपने वैभवके अनुसार सोने, चाँदी अथवा ताँबेका पात्र निर्माण कराकर उसपर प्रतिमा स्थापित करे। यदि शक्ति हो तो चतुर पुरुष भगवान् वराहकी स्वर्णमयी ऐसी प्रतिमा बनवाये, जिसमें उन प्रभुके दाढ़पर पर्वत, वन और वृक्षोंके सहित पृथ्वी विराज रही हो। फिर इस प्रकार भावना करनी चाहिये—‘जो भगवती लक्ष्मीके प्राणपति हैं, जिन्होंने मधुनामक दैत्यको मारा है, अखिलबीज जिनमें सुरक्षित रहते हैं तथा जो रत्नोंके भाजन हैं, वे ही परम प्रभु साकार होनेके विचारसे वराहरूप धारणकर यहाँ स्थित हैं।’

फिर उन्हें कलशपर विराजमान कर दे।

मुने! वह कलश दो सफेद वस्त्रोंसे आच्छादित होना चाहिये। उसपर ताँबेका एक पात्र रहना आवश्यक है। मूर्ति स्थापितकर चन्दन, फूल और नैवेद्य प्रभृति अनेक पवित्र उपचारोंसे अर्चना करे और फूलोंके द्वारा मण्डल बना ले। रातमें स्वयं जगे और दूसरोंको जगनेकी प्रेरणा करे। पण्डित पुरुषका कर्तव्य है—‘इस शुभ समयमें भगवान् श्रीहरि वराहरूपसे अवतरित हुए हैं’—इस विचारसे दूसरेके द्वारा भी पूजा एवं पद्य-गान कराये। इस प्रकार पूजा समाप्तकर प्रातःकाल सूर्यके उदय हो जानेपर शौचादिसे निवृत्त हो स्नान करे। तत्पश्चात् भगवान्‌की पुनः पूजा करके वह प्रतिमा ब्राह्मणको अर्पण कर दे। ग्रहीता ब्राह्मण वेद एवं वेदाङ्गका विद्वान्, साधु-स्वभाववाला, बुद्धिमान्, भगवान् विष्णुका भक्त, शान्त चित्तवाला, श्रोत्रिय तथा परिवारवाला होना चाहिये।

इस प्रकार वराहरूपी भगवान्‌की प्रतिमा कलशके सहित दान करनेका जो फल प्राप्त होता है, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो—इस जन्ममें तो उसे सुन्दर भाग्य, लक्ष्मी, कान्ति और सन्तोषकी प्राप्ति होती है और यदि दरिद्र हो तो वह शीघ्र ही धनवान् हो जाता है। सन्तानहीनको पुत्रकी प्राप्ति हो जाती है। दरिद्रता तुरंत भाग जाती है। बिना बुलाये स्वयं लक्ष्मी घरमें आ जाती हैं। वह पुरुष इस लोकमें सौभाग्यसम्पन्न तो रहता ही है, अब उसके परलोककी बात भी कहता हूँ, सुनो। इस सम्बन्धमें यहाँ एक पुरानी ऐतिहासिक घटनाका उल्लेख मिलता है।

पहले प्रतिष्ठानपुर (पैठण)-में वीरधन्वा नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो चुके हैं। एक समयकी बात है—शत्रुओंको तपानेवाला, वह राजा शिकार

४५-पद्मनाभ-द्वादशीव्रत

अध्याय ४१ ] वराह-द्वादशीव्रत ९५

खेलनेके अभिप्रायसे वनमें गया। उसी वनमें संवर्त ऋषिका भी आश्रम था। राजाने मृगोंको मारनेके साथ ही अनजाने मृगका रूप बनाये हुए पचास ब्राह्मणपुत्रोंका भी वध कर दिया। वे सभी परस्पर भाई थे तथा वेदके अध्ययनमें उन ब्राह्मणोंकी बड़ी तत्परता थी। किंतु उस समय वे मृगका स्वाँग बनाये हुए थे।

सत्यतपाने पूछा—ब्रह्मन्! वे ब्राह्मण मृगका रूप धारण करके वनमें क्यों रहते थे? इस विषयमें मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। मैं आपके शरणागत हूँ। मुझपर प्रसन्न होकर इसका कारण बतानेकी कृपा करें।

दुर्वासाजी कहते हैं—महाराज! किसी समयकी बात है—वे सभी ब्राह्मण वनमें गये। वहाँ उन्होंने हिरनके पाँच बच्चोंको देखा। वे बच्चे अभी-अभी पैदा हुए थे। उन बच्चोंकी माता वहाँ नहीं थी। उन ब्राह्मणोंने एक-एक बच्चेको हाथोंमें ले लिया और गुफामें चले गये। वहीं उन बच्चोंकी चेतना समाप्त हो गयी। तब उन सभी ब्राह्मणोंके मनमें महान् दुःख हुआ। अतः वे अपने पिता संवर्तके पास चले गये। वहाँ जाकर उन लोगोंने मृगहिंसा-सम्बन्धी यह सच्ची घटना कहना आरम्भ कर दी।

ऋषिकुमार बोले—मुने! तुरंत उत्पन्न हुए पाँच मृग हमारे द्वारा मर गये हैं। हमलोग यह काण्ड नहीं चाहते थे। फिर भी घटना घट गयी, अतः हमें प्रायश्चित्त बतानेकी कृपा कीजिये।

संवर्त ऋषिने कहा—प्रिय पुत्रो! मेरे पितामें हिंसाकी वृत्ति थी और उनसे बढ़कर मैं हिंसासे प्रेम रखता था। फिर तुमलोग मेरे पुत्र होकर पाप कर्मसे अछूते रह जाओ—यह असम्भव है। किंतु इससे छूटनेका उपाय यह है कि अब तुमलोग संयमशील बनकर मृगोंका चर्म अपने ऊपर डाल लो और पाँच वर्षोंतक वनमें विचरो। ऐसा करनेसे तुम्हारी शुद्धि हो जायगी।

इस प्रकार संवर्त मुनिके कहनेपर उनके पुत्रोंने अपने पूरे शरीरपर मृगचर्म डाल लिया और शान्तभावसे वनमें जाकर परब्रह्म परमात्माके नामका जप करने लगे। उन्हें ऐसा करते हुए पाँच वर्ष व्यतीत हो गये। उसी समय राजा वीरधन्वा वहाँ आया, जहाँ मृगचर्म लपेटे हुए वे ब्राह्मण वृक्षके नीचे सावधानीके साथ बैठे थे। जपमें उनकी वृत्ति एकाग्र थी। उन्हें देखकर राजा वीरधन्वाने समझा कि ये मृग हैं। अतः उन सभी ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंपर बाण चला दिया और वे सब-के-सब एक साथ ही प्राणोंसे हाथ धो बैठे। जब उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले उन मृत ब्राह्मणोंपर राजा वीरधन्वाकी दृष्टि पड़ी, तो वे भयसे काँप उठे। अब वे देवरातनामक मुनिके आश्रममें गये और उनसे पूछा—'मुनिवरजी! मुझे ब्रह्महत्या लग गयी है, इसके निवारणार्थ मुझे क्या करना चाहिये?' उस समय वीरधन्वाने आदिसे अन्ततककी सभी बातें मुनिसे बता दीं और वे फिर अत्यन्त शोकसे व्याकुल होकर जोर-जोरसे रोने लगे। यों उन्हें रोते देखकर ऋषिने कहा—'राजन्! डरो मत, मैं तुम्हारा पाप दूर कर दूँगा। जिस समय पृथ्वी सुतलनामक पातालमें डूब रही थी, तो देवाधिदेव भगवान् विष्णुने स्वयं वराहका रूप धारणकर उसका उद्धार किया था। राजेन्द्र! वैसे ही ब्रह्महत्याके पापमें डूबते हुए तुम्हारा भी वे प्रभु उद्धार कर दें।' इस प्रकार देवरात ऋषिके कहनेपर राजा वीरधन्वा शान्त एवं प्रसन्न हो गये और उन्होंने मुनिसे पूछा—'महानुभाव! किस प्रकार भगवान् श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हो सकते हैं, जिससे मेरे सब पातक नष्ट होंगे?'

दुर्वासाजी बोले—मुनिवर! जब इस प्रकार

९६ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय ४२

वीरधन्वाने देवरात ऋषिसे पूछा तो उन्होंने उस राजाको यह व्रत बतला दिया और नरेशने इस व्रतका अनुष्ठान किया। इसके प्रभावसे राजा वीरधन्वा ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त होकर अपार भोगोंको भोगनेके पश्चात् सुवर्णके सुन्दर विमानपर चढ़कर स्वर्ग चला गया। वहाँ इन्द्र उठकर उसके स्वागतके लिये अर्घ्य लिये हुए आगे बढ़े। इन्द्रको आते देखकर भगवान् श्रीहरिके पार्षदोंने उनसे कहा—‘देवराज! आप इधर न देखें। कारण, आपकी तपस्या इनसे न्यून है। इसी प्रकार एक-एक करके सभी लोकपाल आये और तपहीन होनेके कारण भगवान् विष्णुके सेवकोंने उनमेंसे किसीको भी स्वागतका अवसर नहीं दिया; क्योंकि राजा वीरधन्वाके तेजप्रतापके सामने वे फीके पड़ रहे थे। महामुने! इस प्रकार वह राजा सत्यलोकतक पहुँच गया। वहाँ पहुँचनेपर जन्म-मरणकी शृङ्खला समाप्त हो जाती है। वह सत्यलोक न तो अग्निसे भस्म होता है और न जलमें लीन ही होता है। आज भी महाराज वीरधन्वा देवताओंद्वारा प्रशंसित होते हुए वहीं विराजमान हैं। यज्ञस्वरूप धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरिके प्रसन्न हो जानेपर कौन-सा ऐसा आश्चर्यकारी कर्म है, जो सम्पन्न न हो सके। उनके प्रसन्न होनेपर इस जन्ममें भी आयु, आरोग्य और सौभाग्य सुलभ हो सकते हैं। इस एक-एक द्वादशीव्रतमें ऐसी शक्ति है कि विधिके साथ उनका आचरण करनेसे मानव उत्तम सौभाग्य पानेका अधिकारी हो जाता है। फिर जो सभी व्रतोंको सम्पन्न करे, उसके लिये तो कहना ही क्या है। उसे तो भगवान् नारायण स्वयं अपना स्थान देनेको तत्पर हो जाते हैं। भगवान् नारायणकी एक-से-एक श्रेष्ठ चार मूर्तियाँ हैं, इसमें कोई संशयकी बात नहीं है। जैसे उनका जलशायी नारायणरूप है, वैसे ही उन प्रभुने मत्स्यका रूप धारण कर वेदोंका उद्धार किया। फिर उसी प्रकार कूर्मरूपसे क्षीरसागरको मन्दराचलके सहारे मथनेकी योजना बनायी। मन्दराचलको पीठपर धारण किया था। यह उनकी दूसरी मूर्ति है। पुनः पृथ्वी रसातलमें चली गयी थी। वैसे ही उसे ऊपर लानेके लिये उन परम प्रभुने वराहका रूप धारण किया था। यह उन भगवान् नारायणकी तीसरी मूर्ति है। (चौथी सम्मूर्ति भगवान् नृसिंहकी है, जो आगे कही जायगी।)’ [अध्याय ४१]


नृसिंह-द्वादशीव्रत

दुर्वासाजी कहते हैं—मुनिवर! पहले कहे हुए व्रतकी भाँति फाल्गुनमासके शुक्ल पक्षमें नृसिंह-द्वादशीव्रत होता है। विद्वान् पुरुष उस दिन उपवास करके विधिके साथ भगवान् श्रीहरिकी आराधना करे। ‘ॐ नरसिंहाय नमः’ कहकर भगवान् नृसिंहके चरणोंकी, ‘ॐ गोविन्दाय नमः’ से ऊरुओंकी, ‘ॐ विश्वभुजे नमः’ से कटिप्रदेशकी, ‘ॐ अनिरुद्धाय नमः’ से वक्षःस्थलकी, ‘ॐ शितिकण्ठाय नमः’ से कण्ठकी, ‘ॐ पिङ्गकेशाय नमः’ कहकर शिरोदेशकी, ‘ॐ असुरध्वंसनाय नमः’ से चक्रकी तथा ‘ॐ तोयात्मने नमः’ कहकर शङ्खकी चन्दन, फूल एवं फल आदिके द्वारा सम्यक् प्रकारसे पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् भगवान्के सामने दो सफेद वस्त्रोंसे सम्पन्न एक कलश रखनेका विधान है। उस कलशपर एक ताँबेका पात्र अथवा अपने वित्तके अनुसार काष्ठ या बाँसका पात्र रखकर उसके ऊपर भगवान् नृसिंहकी स्वर्णमयी मूर्ति पधरानी चाहिये। घड़ेमें रत्न डालकर द्वादशीके दिन पूजा करनेके उपरान्त भगवान्की वह प्रतिमा वेदके विशेषज्ञ ब्राह्मणको अर्पण कर दे।

४६-धरणीव्रत

अध्याय ४३ ] वामन-द्वादशीव्रत [ ९७

महामुने! इस प्रकारका व्रत करनेपर एक राजाको जो फल मिला था, उसे मैं कहता हूँ, सुनो—किम्पुरुष वर्षमें भारत नामसे विख्यात एक धार्मिक राजा रहते थे। उन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम वत्स था। किसी युद्धमें शत्रुओंसे हारकर वह केवल अपनी स्त्रीके साथ पैदल ही वसिष्ठजीके आश्रमपर गया और वहीं रहने लगा। इस प्रकार वहाँ उनके आश्रमपर रहते कुछ दिन बीत गये। एक दिन मुनिने उससे पूछा—'राजन्! तुम किस प्रयोजनसे इस महान् आश्रममें निवास कर रहे हो?'

राजा वत्सने कहा—भगवन्! शत्रुओंने मुझे परास्तकर मेरा राज्य तथा खजाना छीन लिया है। अतः असहाय होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप अपने उपदेश-प्रदानद्वारा मेरे चित्तको शान्त करनेकी कृपा कीजिये।

दुर्वासाजी कहते हैं—मुने! राजा वत्सके इस प्रकार कहनेपर वसिष्ठजीने उसे विधिपूर्वक इस द्वादशीको ही करनेका उपदेश दिया तथा उस राजाने भी सब कुछ वैसा ही किया। व्रत पूर्ण होनेपर भगवान् नृसिंह उस राजापर प्रसन्न हुए और उन परम प्रभुने उस राजाको एक ऐसा चक्र दिया, जो समराङ्गणमें शत्रुओंका संहार कर सके। उस अस्त्रके प्रभावसे महाराज वत्सने शत्रुओंको परास्तकर अपना राज्य फिर जीत लिया। राज्यपर आसीन होकर उस नरेशने एक हजार अश्वमेध यज्ञ किये और अन्तमें वह धर्मात्मा राजा भगवान् विष्णुके परम धामको प्राप्त हुआ। मुने! पापोंका नाश करनेवाली यह नृसिंह-द्वादशी धन्य है। तुम्हारे पूछनेपर मैंने इसका वर्णन कर दिया। अब तुम इसे सुनकर अपनी इच्छाके अनुसार जैसा चाहे करो। [अध्याय ४२]


वामन-द्वादशीव्रत

दुर्वासाजी कहते हैं—मुने! इसी प्रकार चैत्र-मासके शुक्लपक्षमें वामन-द्वादशीव्रत होता है। इसमें भी संकल्पकर रातमें उपवास करके भक्तिके साथ देवाधिदेव भगवान् श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। पूजाकी विधि यह है कि ‘ॐ वामनाय नमः’ इस मन्त्रसे भगवान्‌के दोनों चरणोंकी, ‘ॐ विष्णवे नमः’ कहकर उनके कटिभागकी, ‘ॐ वासुदेवाय नमः’ से उदरकी, ‘ॐ संकर्षणाय नमः’ कहकर हृदयकी, ‘ॐ विश्वभृते नमः’ से कण्ठकी, ‘ॐ व्योमरूपिणे नमः’ से शिरोदेशकी, ‘ॐ विश्वजिते नमः’ तथा ‘ॐ वामनाय नमः’ कहकर दोनों भुजाओंकी और ‘पाञ्चजन्याय नमः’ कहकर शङ्खकी एवं ‘सुदर्शनाय नमः’ कहकर चक्रकी पूजा करनी चाहिये। फिर पूर्वोक्त नरसिंह-व्रतके विधानके अनुसार अर्चनाकर

उन सनातन वामन भगवान्‌की प्रतिमाको रत्नगर्भित कलशपर स्थापित करे। चतुर साधक पहले बताये हुए पात्रपर भगवान् वामनकी शक्तिके अनुसार सुवर्णमयी मूर्ति स्थापित करे और सब कृत्य करे, भगवान्‌को यज्ञोपवीत पहनाये। उन भगवान् वामनके पास कमण्डलु, छाता, खड़ाऊँ, कमलकी माला तथा आसन या चटाई भी रखनी चाहिये। द्वादशीके दिन प्रातःकाल इन उपकरणोंके साथ वह प्रतिमा ब्राह्मणको दान कर दे। उस समय भगवान् वामनकी इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—‘लघुरूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों।’ फिर यों कहे—‘भगवन्! आप चैत्रमासके शुक्लपक्षकी द्वादशीके दिन प्रकट हुए हैं। मैं आपकी प्रसन्नता चाहता हूँ।’ सब अन्य व्रतोंकी तरह इसकी भी विधि है।

९८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ४४

सुनते हैं पहले हर्यश्व नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे, जिन्हें कोई पुत्र न था, अतः वे संतान-प्राप्तिके लिये यज्ञ एवं तपस्या कर रहे थे, इसी बीच भगवान् श्रीहरि ब्राह्मणका वेष धारणकर वहाँ आये और बोले—'राजन्! आपका यह सब उपक्रम किस लक्ष्यको लेकर है?' राजा बोले—'मैं यह सब पुत्र-प्राप्तिके लिये ही कर रहा हूँ।' तब ब्राह्मणने राजासे कहा—'राजन्! तुम वामन-द्वादशीव्रतका अनुष्ठान करो।' फिर वे अन्तर्धान हो गये। राजाने यथाशीघ्र व्रतका अनुष्ठान किया और तेजस्वी, बुद्धिमान् एवं ब्राह्मणको रत्नगर्भित प्रतिमा दान कर दी। और भगवान् वामनसे प्रार्थना की—'भगवन्! अपुत्रा अदितिकी प्रार्थनापर आप स्वयं पुत्ररूपसे उनके यहाँ प्रकट हुए थे' यदि यह बात सत्य है तो मुझे भी संतान प्राप्त हो।

मुने! इस विधानसे व्रत एवं प्रार्थना करनेपर उस राजाको उग्राश्व नामक पुत्रकी प्राप्ति हुई थी, जो आगे चलकर महाबली चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। इस व्रतमें ऐसी शक्ति है कि जिसे पुत्र न हो, वह पुत्रवान् तथा निर्धन व्यक्ति धनवान् बन जाता है। जिसका राज्य छिन गया हो, वह पुनः अपना राज्य वापस पा जाता है। व्रत करनेवाला मनुष्य मरनेपर भगवान् विष्णुके लोकको प्राप्त होता है। फिर स्वर्गमें बहुत समय प्रमोदकर वह मर्त्यलोकमें बुद्धिमान् नहुषकुमार ययातिके समान चक्रवर्ती राजा होता है। [अध्याय ४३]


जामदग्न्य-द्वादशीव्रत

दुर्वासाजी कहते हैं—इसी प्रकार मनुष्य (परशुराम-द्वादशीका व्रती साधक) वैशाखमासके शुक्लपक्षमें पूर्वोक्त नियमानुसार संकल्पकर विधिके साथ मृत्तिका लगाकर स्नान करे और फिर देवालयमें जाय। व्रती पुरुषको भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीहरिके अवतार परशुरामकी—'ॐ जामदग्न्याय नमः' से चरण, 'ॐ सर्वधारिणे नमः' से उदर, 'ॐ मधुसूदनाय नमः' से कटिप्रदेश, 'ॐ श्रीवत्सधारिणे नमः' से जङ्घा, 'ॐ क्षत्रान्तकाय नमः' से भुजाओं, 'ॐ शितिकण्ठाय नमः' से केहुनी, 'ॐ पाञ्चजन्याय नमः' से शङ्ख, 'ॐ सुदर्शनाय नमः' से चक्र तथा 'ॐ ब्रह्माण्डधारिणे नमः' से शिरोदेशकी पूजा करे। इसके बाद पहलेकी ही तरह सामने एक कलश स्थापित करे। उसके ऊपर भगवान् परशुरामकी मूर्ति स्थापितकर पूर्वोक्त नियमानुसार दो वस्त्रोंसे उसे आच्छादित करे। कलशपर बाँसके बने पात्रमें परशुरामजीकी आकृतिवाली सुवर्णकी प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमाके दाहिने हाथमें फरसा धारण कराये, फिर उसकी पुष्प, चन्दन एवं अर्घ्य आदि उपचारोंसे पूजा करे। भगवान्के सामने श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूरी रात जागरण करे। प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर स्वच्छ वेलामें वह प्रतिमा ब्राह्मणको दे दे। इस प्रकार नियमपूर्वक व्रत करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो।

प्राचीन समयकी बात है—वीरसेन नामके एक पराक्रमी तथा भाग्यशाली राजा थे, जो पुत्रप्राप्तिके लिये तीव्र तपस्या कर रहे थे। महर्षि याज्ञवल्क्यका आश्रम वहाँसे निकट ही था, अतः एक दिन वे उन्हें देखने आये। उन तेजस्वी ऋषिको पास आते देखकर राजा वीरसेन हाथ जोड़कर खड़े हो गये और उनका विधिवत् स्वागत किया। तत्पश्चात् याज्ञवल्क्यमुनिने पूछा—'धर्मज्ञ राजन्! तुम्हारे तप करनेका क्या प्रयोजन है? तुम कौन-सा कार्य करना चाहते हो?'

राजा वीरसेनने कहा—महर्षे! मैं पुत्रहीन हूँ।

४७-अगस्त्य-गीता

अध्याय ४५-४६ ] श्रीराम एवं श्रीकृष्ण-द्वादशीव्रत ९९

मुझे कोई संतान नहीं है। द्विजवर ! इस कारण तपस्याद्वारा अपने शरीरको मैं सुखाना चाहता हूँ।

याज्ञवल्क्यजी बोले—राजन् ! तपस्यामें बड़ा क्लेश उठाना पड़ता है, अतः तुम यह विचार छोड़ दो। मैं तुम्हें अत्यन्त सरल उपाय बताता हूँ। उसे करनेसे तुम्हें अवश्य पुत्र प्राप्त हो जायगा।

फिर उन्होंने उस यशस्वी राजाको इस वैशाख मासके शुक्लपक्षमें होनेवाला यही परशुराम-द्वादशीव्रत बतलाया। पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाले राजा वीरसेनने भी पूर्ण विधिके साथ यह व्रत सम्पन्न किया। फलस्वरूप उन्हें राजा नल-जैसा परम धार्मिक पुत्र प्राप्त हुआ, जिन ‘पुण्यश्लोक’ राजाकी कीर्ति अबतक संसारमें गायी जाती है। यह तो इस व्रतके फलका प्रासङ्गिक उल्लेखमात्र हुआ, वस्तुतः जो यह व्रत करता है, उसे सुपुत्र तथा जीवनभर विद्या, श्री और कान्ति सब सुलभ हो जाती है और परलोकमें उसे जो सुख होता है, वह कहता हूँ, सुनो। इस व्रतको करनेवाले व्यक्ति एक कल्पतक, अप्सराओंके साथ आनन्द करते हुए ब्रह्माजीके लोकमें रहते हैं। फिर जब पुनः सृष्टि आरम्भ होती है तब वे चक्रवर्ती राजा होते हैं और तीस हजार वर्षोंकी उन्हें लम्बी आयु प्राप्त होती है।

[अध्याय ४४]


श्रीराम एवं श्रीकृष्ण-द्वादशीव्रत

दुर्वासाजी कहते हैं—इसी प्रकार ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षमें श्रीराम-द्वादशी व्रत होता है। मनुष्यको चाहिये कि वह संकल्प करके विधिके साथ विविध प्रकारके पवित्र पुष्पोंसे परम प्रभु परमात्माकी पूजा करे। ‘ॐ रामाभिरामाय नमः’ कहकर श्रीभगवान्‌के दोनों चरणोंकी, ‘ॐ त्रिविक्रमाय नमः’ कहकर कटिदेशकी, ‘ॐ धृतविश्वाय नमः’ कहकर उनके उदरकी, ‘ॐ संवत्सराय नमः’ से हृदयकी, ‘ॐ संवर्तकाय नमः’ से कण्ठकी, ‘ॐ सर्वास्त्रधारिणे नमः’ से भुजाओंकी, ‘ॐ पाञ्चजन्याय नमः’ से शङ्खकी तथा ‘ॐ सुदर्शनचक्राय नमः’ से चक्रकी एवं ‘ॐ सहस्रशिरसे नमः’ से भगवान्‌के शिरःप्रदेशकी पूजा करे। इस प्रकार विधिवत् पूजाकर पूर्वोक्त विधिद्वारा एक कलश स्थापितकर उसे वस्त्रसे आच्छादित करे। फिर उस कलशपर भगवान् राम एवं लक्ष्मणकी सुवर्णमयी प्रतिमा रखकर विधिपूर्वक पूजन करे और पुत्रकी इच्छावाला व्रती प्रातःकाल उन प्रतिमाओंको ब्राह्मणोंको दे दे।

पहले पुत्र न होनेपर महाराज दशरथने भी पुत्रकी कामनासे वसिष्ठजीकी बड़ी आराधनाकर जब पुत्रोत्पत्तिका उपाय पूछा तो मुनिने उन्हें यही विधान बतलाया था। इस व्रतके रहस्यको जानकर राजा दशरथने इसका अनुष्ठान किया, जिसके फलस्वरूप स्वयं भगवान् श्रीहरि महान् शक्तिशाली रामरूपमें उनके पुत्र हुए। महामुने ! उस समय सनातन श्रीहरिने अपनेको (राम, लक्ष्मणादि) चार रूपोंमें विभक्त कर लिया था। यह तो यहाँकी बात हुई, अब परलोककी बात सुनो। जबतक इन्द्र और सम्पूर्ण देवता स्वर्गमें रहते हैं, तबतक इस व्रतका करनेवाला पुरुष स्वर्गमें विविध भोगोंको भोगता है। वहाँकी अवधि समाप्त हो जानेपर वह पुनः मर्त्यलोकमें आता है। यहाँ आनेपर वह सौ यज्ञ करनेवाला राजा होता है। जो इस व्रतको निष्कामभावसे करता है, उस पुरुषके समस्त पाप समाप्त हो जाते हैं। साथ ही उसे भगवान् श्रीहरिका कैवल्य-पद भी प्राप्त हो जाता है, जो स्वच्छ एवं सनातन है।