भारतकोश
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बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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एक और उदाहरण से मैं इस बात को प्रामाणिक कर देना चाहता हूँ कि हाथ की रेखाएं जो भी कहती हैं, वह अपने आप में पूर्ण सत्य होती हैं। मृत्यु का समय तथा मृत्यु की तारीख हाथ की रेखाएं काफी समय पहले स्पष्ट कर देती हैं। मृत्यु से ६ माह पूर्व मध्यमा उंगली के नाखूनों पर आड़ी-तिरछी रेखाओं का जाल-सा बन जाता है। जब ऐसा जाल दिखाई देने लग जाए तब यह समझ लेना चाहिए कि यह व्यक्ति अब छः महीनों से ज्यादा जीवित नहीं रह सकेगा। मैंने अपने जीवन में लगभग १५-२० व्यक्तियों के हाथों में जिस समय ये चिह्न देखे, उस समय वे पूर्णतः स्वस्थ थे परन्तु उनकी मृत्यु की सूचना अगले पांच-छः महीनों में ही मिल गई। ठीक इसी प्रकार मृत्यु से सम्बन्धित रेखाएं तीन प्रकार की होती हैं। १. जीवन रेखा चलते-चलते जहां एकदम रुक जाती है और जहां यह रेखा रुकती है, उसके आगे ही काला धब्बा या क्रास का चिह्न बन जाए और उस क्रास के चिह्न से यदि जीवन रेखा की ओर सीधी रेखा खींचें तब उससे जो समय स्पष्ट होता है, वही उस व्यक्ति की आयु होती है। २. हृदय रेखा मार्ग में लोप हो गई हो और शनि पर्वत के नीचे सहसा ही दिखाई दे जाए तो समझ लेना चाहिए कि इस व्यक्ति की मृत्यु बीच रास्ते में ही हो जाएगी या यह व्यक्ति पूरी आयु नहीं भोग सकेगा। ३. यदि हृदय रेखा मस्तिष्क रेखा से शनि पर्वत के नीचे या गुरु पर्वत के नीचे मिले और दूसरे हाथ में भी ऐसा ही योग दिखाई दे तो वह व्यक्ति पूरी आयु नहीं भोगता है। पूरी आयु से मेरा मतलब उस देश के व्यक्तियों की सामान्य औसत आयु से है। भारतवर्ष में पूर्ण आयु लगभग ६० वर्ष से ७० वर्ष के बीच मानी जाती है। यदि कोई व्यक्ति ४० या ४५ वर्ष की आयु में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो ऐसी मृत्यु पूर्ण आयु नहीं कहलाती। ये तथ्य अपूर्ण आयु के सूचक हैं। अब यह ज्ञात करने के लिए कि वास्तविक आयु कितनी होगी तो जब ऐसा चिह्न दिखाई दे जाए तब सबसे पहले यह बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि इस व्यक्ति की अपूर्ण आयु है और जब यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है तो उस चिह्न से आयु रेखा तक रेखा खींचकर या अनुमान लगाकर आप उसकी वास्तविक आयु ज्ञात कर सकते हैं। मैं ऊपर की पंक्तियों में यह स्पष्ट कर रहा था कि हस्तरेखा मज़ाक की वस्तु नहीं है या इस पर अविश्वास करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि ये रेखाएं पूर्ण सत्य को स्पष्ट करने में सहायक हैं, साथ ही साथ भविष्य से सम्बन्धित तथ्य को जितनी स्पष्टता के साथ ये रेखाएं स्पष्ट करती हैं, उतना अन्य कोई विज्ञान नहीं। हस्तरेखा के अध्ययन के लिए कई बातें ध्यान में रखनी चाहिए। इनमें से कुछ तथ्य अग्रिलिखित हैं :-

( १५ ) १. जब भी आपके पास कोई व्यक्ति अपना हाथ दिखाने के लिए आये तो आपको चाहिए कि आप उसके हाथ का स्पर्श न करें क्योंकि आपके स्पर्श करने से आपके शरीर की विद्युत धारा से उसकी विद्युत धारा का सम्पर्क हो जाएगा और उस व्यक्ति के हाथ की मौलिकता समाप्त हो जाएगी। इसलिए हाथ को देखते समय आप अपने हाथ समेटे रहें। २. सबसे पहले उस व्यक्ति के दोनों हाथों को उल्टा करके देखना चाहिए क्योंकि हाथ को उल्टा करने से अर्थात् हथेलियां जमीन की ओर रहने से आप उसके हाथ के आकार को भली प्रकार से समझ सकेंगे कि यह हाथ वर्गाकार है अथवा चौकोर है अथवा किस प्रकार का हाथ मेरे सामने प्रस्तुत हुआ है। ३. जब हाथ का प्रकार ज्ञात हो जाए तो उसे दोनों हाथ सीधे करने के लिए कहिये और दोनों हाथ सीधे होने पर उसके मणिबन्ध से देखते-देखते ऊपर की ओर आना चाहिए। ४. इसके बाद पर्वत, पर्वत के उभार, पर्वत से जुड़ी हुई उंगलियां और अंगूठे को देखना चाहिए। अन्त में उसकी उंगलियों के अग्र भाग और नाखूनों का निरीक्षण करना चाहिए। ५. इस प्रकार हाथ का अध्ययन बिना स्पर्श किये ही कर लेने के बाद उसके हाथ को छूना चाहिए और पूरे हाथ के जोड़ों को ध्यान में रखना चाहिए। हाथ के जोड़ अर्थात् हथेली के जोड़ों से ग्रहों के भागों का भली भांति अध्ययन हो जाता है। उंगलियों के जोड़ों से भी कई तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं। हाथ का स्पर्श आपको इस बात का भी आभास दे देगा कि वह हाथ नरम है या कठोर, लचीला है अथवा सख्त। हाथ की कोमलता और कठोरता भी हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए अत्यधिक महत्व रखती है। ६. मणिबन्ध की रेखाओं का भी हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए महत्व होता है और उनका भी अध्ययन कर लेना चाहिए। ७. इसके बाद हथेली पर पाये जाने वाले पर्वत, पर्वतों के उभार, व दबाव साथ ही पर्वतों से जुड़ी हुई रेखाएं, दो पर्वतों की संधियां तथा उन पर पाये जाने वाले सूक्ष्म चिह्नों का भी अध्ययन करना चाहिए। ८. अन्त में उंगलियों के सिरों पर शंख, चक्र आदि दिखाई देते हैं, वे भी अपने आप में बहुत अधिक महत्व रखते हैं। अतः उनका भी अध्ययन आवश्यक है। हाथ देखने की विधि १. यों तो हाथ किसी भी समय देखा जा सकता है परन्तु इसके लिए सर्वोत्तम समय प्रातःकाल का होता है जबकि दिखाने वाले ने भोजन या नाश्ता न किया हो।

( १६ ) मेरा ऐसा अनुभव है कि भोजन करने पर रक्त का भ्रमण तेज हो जाता है, जिसकी वजह से उसके हाथ की महीन रेखाएं अदृश्य सी हो जाती हैं । ऐसी स्थिति आने पर सूक्ष्मदर्शक यंत्र का प्रयोग अवश्य ही करना चाहिए । २. हाथ दिखाने से पूर्व हाथ दिखाने वाला पृच्छक स्नान किया हुआ हो, नींद से उठा हुआ, गन्दा या आलस्य से भरा हुआ शरीर, वातावरण को बोझिल बना देता है और इससे भविष्य कथन में बाधा आती है । ३. अत्यधिक भोजन करने के बाद या व्यायाम करने के बाद भी हाथ नहीं दिखाना चाहिए । लगातार कार्य करते-करते एकदम से उठकर भी हाथ दिखाना ज्यादा उचित एवं अनुकूल नहीं कहा जा सकता । ४. अत्यधिक गर्मी में या अत्यधिक सर्दी में भी हाथ नहीं दिखाना चाहिए क्योंकि ज्यादा गर्मी पड़ने से हथेली जरूरत से ज्यादा लाल रहती है और उससे उसका वास्तविक रंग अनुभव नहीं होता । ५. शराब पीया हुआ, नशा किया हुआ या असहजावस्था में भी हस्तरेखा विशेषज्ञ के पास नहीं जाना चाहिए । जहां हाथ दिखाने वाले के लिए कुछ नियम आवश्यक हैं, उसी प्रकार हाथ देखने वाले के लिए भी नीचे लिखे कुछ नियमों का पालन आवश्यक है :— १. जिस समय क्रोध की अवस्था हो या किसी वजह से परेशानी हो उस समय हाथ नहीं देखना चाहिए । यदि कोई हाथ दिखाने के लिए आ ही जाए तो नम्रता- पूर्वक उसे मना कर देना चाहिए । २. हाथ देखते ही उसके सम्बन्ध में अच्छी या बुरी बात अथवा भविष्यफल स्पष्ट नहीं कर देना चाहिए । इससे कई प्रकार की समस्याएं पैदा हो जाती हैं । उदाहरणार्थ यदि किसी की मृत्यु एक महीने बाद ही दिखाई देती हो तो यह बात अप्रत्याशित रूप से सामने वाले को कह देना किसी प्रकार से अनुकूल नहीं है । ३. सामने वाले व्यक्ति के प्रति तटस्थ भाव रखकर के ही हाथ देखना चाहिए । अत्यधिक प्रिय या शत्रु होने पर हाथ देखने वाला तटस्थ नहीं रह पाता और इससे उसके फल-कथन में अस्वाभाविकता आ जाती है । ४. हाथ देखकर जब पूरी तरह से सन्तुष्ट हो जाए और दूसरे हाथ से भी उसकी प्रामाणिकता स्पष्ट हो जाए तभी उसको फल-कथन करना चाहिए । यदि ऊपर के तथ्य ध्यान में रखते हुए हस्तरेखा विशेषज्ञ किसी भी व्यक्ति के हाथ का अध्ययन करे तो वह निस्सन्देह सही भविष्य कथन कर सकता है और जिस प्रकार व्यक्ति स्वच्छ दर्पण में अपनी परछाई देख सकता है, उसी प्रकार उसके हाथ के माध्यम से उसका भविष्य जान सकता है ।

हाथ : एक परिचय

मणिबन्ध वह भाग है, जो भुजा को हाथ से जोड़ने में एक कड़ी के रूप में कार्य करता है । मणिबन्ध के आगे का सम्पूर्ण भाग हथेली कहलाता है और इस हथेली पर पाये जाने वाले चिह्न हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए अत्यन्त आवश्यक होते हैं । हाथ अथवा हथेली छोटी-छोटी हड्डियों से बनी हुई होती है । उस हथेली में लगभग १४ प्रकार की हड्डियां आपस में जुड़ी हुई होती हैं, जिनसे हथेली के आकार का निर्माण होता है। इन १४ हड्डियों के आगे के भाग में तीन-तीन हड्डियों से उंगली तथा दो हड्डियों से अंगूठे का निर्माण होता है । इन हड्डियों के ऊपरी सिरे नाखूनों से सुरक्षित रहते हैं । मणिबन्ध से मध्यमा उंगली के अन्तिम सिरे तक के भाग को हाथ कहते हैं । हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार ये हाथ पांच प्रकार के होते हैं :-- १. अत्यन्त छोटा हाथ । २. छोटा हाथ । ३. सामान्य हाथ । ४. लम्बा हाथ । ५. अत्यन्त लम्बा हाथ । मैंने पीछे ही यह बात स्पष्ट कर दी है कि हाथ की बनावट को देखने के लिए हाथ को उल्टा करके देखना चाहिए । इस प्रकार देखने से यह ज्ञात हो जाता है कि सामने वाले व्यक्ति का हाथ किस प्रकार का है। इस प्रकार के हाथ के भेद से भी व्यक्ति के बारे में बहुत कुछ जानने को मिल जाता है । १. अत्यन्त छोटा हाथ :—इस प्रकार के व्यक्ति अत्यन्त संकीर्ण विचारों वाले तथा सन्देह की प्रवृत्ति के होते हैं । ये अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए झगड़ते रहते हैं । जीवन में अपने ही स्वार्थ को सर्वोपरि महत्व देते हैं और सही रूप में कहा जाए तो धोखा, चालाकी और अवसरवादिता इनके रक्त में मिली हुई होती है । दूसरे की बुराई करना, दूसरे को नीचा दिखाने की भावना तथा दूसरों के प्रति शत्रुवत् व्यवहार करना इनके लिए सहज स्वाभाविक है । समाज की दृष्टि से अथवा देश की दृष्टि से इन व्यक्तियों का कोई बहुत बड़ा मूल्य अथवा योगदान नहीं होता ।

( १८ ) २. छोटा हाथ :—एक प्रकार से ऐसे व्यक्तियों को आलसी कहा जाता है । यद्यपि ये व्यक्ति बढ़-चढ़ कर कल्पनाएं करते हैं और अपनी कल्पना के बल पर सब कुछ करने के लिए तैयार हो जाते हैं परन्तु इनके जीवन में आलस्य जरूरत से ज्यादा होता है, जिसकी वजह से ये अपनी किसी भी योजना को सही रूप से कार्यान्वित नहीं कर सकते । इनको बढ़-चढ़कर बातें करना, डींगें हांकना, अपने चारों ओर आडम्बरपूर्ण वातावरण बनाये रखना इनको प्रिय लगता है, और ये कार्य भी इस प्रकार से करते हैं जिससे चारों ओर इनके भ्रम की सृष्टि अथवा सन्देह का वातावरण बना रह सके । यद्यपि यह बात सही है कि ये तीव्र मस्तिष्क वाले होते हैं परन्तु अवसर का सदुपयोग करना ये नहीं जानते । जब समय बीत जाता है तब ये पछताते रहते हैं । ऐसे व्यक्ति योग्य एवं समर्थ होते हुए भी अपने जीवन में पूर्ण सफल नहीं हो पाते । ३. सामान्य हाथ :—ऐसे व्यक्ति व्यावहारिक बुद्धि से सम्पन्न होते हैं । इनको इस बात का एहसास रहता है कि किससे कब क्या बात की जाए और किसके साथ किस प्रकार से व्यवहार किया जाए । ये सारी बातें इनके दिमाग में होती हैं इस लिए इनको व्यवहार-कुशल कहा जाता है । समाज में ये सम्मान प्राप्त करते हैं तथा किसी भी कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व उसके बारे में काफी समय तक सोचते-विचारते रहते हैं । इनके जीवन में बराबर संघर्ष बना रहता है और संघर्ष के बल पर ही ये व्यक्ति अपने जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं तथा सुविधाओं को जुटा पाते हैं । सामान्यतः इनका स्वास्थ्य ठीक रहता है और सबसे बड़ी बात इनमें यह पाई जाती है कि ये परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढाल लेने की क्षमता रखते हैं । ४. लम्बा हाथ :—ऐसे व्यक्ति समाज के लिए सामान्यतः उपयोगी होते हैं । इनको जीवन में एक रस देखा जा सकता है । ये न तो बहुत अधिक प्रसन्न रहते हैं और न चिन्तायुक्त । जीवन में ये अत्यधिक व्यवहार-कुशल, होशियार तथा मेधावी होते हैं । इनके सामने किसी भी प्रकार की कोई भी बात हो, उस बात की तह तक ये बहुत जल्दी पहुंच जाते हैं और उस कार्य के बारे में अथवा उस कार्य के परिणाम के बारे में ये जो धारणा बनाते हैं, वह धारणा आगे चलकर पूर्णतः सही होती है । अपरिचित से अपरिचित व्यक्ति को देखकर उसके बारे में, उसके चरित्र के बारे में, उसकी कार्यकुशलता के बारे में ये व्यक्ति जो धारणा बनाते हैं, वह आगे चलकर पूर्णतः सही होती है । ऐसे व्यक्ति समाज के लिए ज्यादा उपयोगी कहे जा सकते हैं । ५. अत्यन्त लम्बा हाथ :—समाज की दृष्टि से इन व्यक्तियों का कोई विशेष उपयोग नहीं होता । ऐसे व्यक्ति जरूरत से ज्यादा भावुक तथा कल्पना की दुनिया में ही जीवित रहने वाले होते हैं । जब जीवन का संघर्ष इनके सामने उपस्थित होता है तो ये विचलित हो जाते हैं और उन परिस्थितियों को झेलने की तथा उन संघर्षों का

( १६ ) सामना करने की इनमें क्षमता नहीं रहती। परिस्थितियों को चुनौती देना इनके वश की बात नहीं है। हाथ के प्रकार जान लेने के साथ ही साथ कुछ और तथ्य भी जान लेने चाहिए। हाथ चौड़ा या तंग हो सकता है। नरम अथवा सख्त अनुभव हो सकता है। इसी प्रकार जब हम किसी का हाथ अपने हाथ में लेते हैं तो वह खुश्क अथवा नम अनुभव हो सकता है। ये सारे तथ्य एक हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए समझ लेने आवश्यक होते हैं। हाथ देखते समय यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि उंगलियों के सिरे नुकीले हैं या वर्गाकार हैं अथवा चपटाकार हैं। एक पर्व और दूसरे पर्व के बीच में जो गांठें होती हैं, उनका भी अध्ययन किया जाना चाहिए। ये गांठें मोटी अथवा पतली हो सकती हैं। इसी प्रकार प्रत्येक उंगली की लम्बाई भी अपने आप में महत्व रखती है। यह बात अनुभव से सिद्ध हुई है कि जिस व्यक्ति की कनिष्ठिका अर्थात् सबसे छोटी उंगली का ऊपरी सिरा यदि अनामिका उंगली के तीसरे पर्व से आगे की ओर बढ़ा हुआ हो तो वह व्यक्ति विशेष बुद्धिमान, प्रतिभावान तथा ऊंचे पद पर पहुंचने वाला होता है। जिन व्यक्तियों के हाथों में सबसे छोटी उंगली को लंबा पाया जाता है, वे व्यक्ति वास्तव में ही अपने जीवन में सफल होते देखे गए हैं। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि हमको हाथ का अध्ययन करते समय उंगलियों की लम्बाई पर भी ध्यान रखना चाहिए। उंगलियों के नाम प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में चार उंगलियां तथा एक अंगूठा होता है। अंगूठे को अंगुष्ठ भी कहा जाता है तथा इसके दो भाग होते हैं :— १. तर्जनी :— यह उंगली अंगूठे के पास वाली होती है, इसको तर्जनी उंगली कहा जाता है। इसके तीन पर्व होते हैं। इस उंगली का अध्ययन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि इसका सिरा किस प्रकार का है तथा उसका झुकाव किस तरफ है। झुकाव तीन प्रकार के होते हैं। कुछ उंगलिया बिल्कुल सीधी होती हैं जबकि कुछ उंगलियां अंगूठे की तरफ झुकी हुई होती हैं। इसी प्रकार कुछ उंगलियां मध्यमा की तरफ झुकी हुई हो सकती हैं।

१. प्रथम खण्ड: कर-लक्षण, हस्त-स्वरूप, उंगली एवं अंगुष्ठ विज्ञान

( २० ) २. मध्यमा :—यह हाथ में सबसे बड़ी उंगली होती है, तथा इसको संस्कृत में मध्यमा उंगली कहा जाता है। इसके बारे में अध्ययन करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि इसके पवों के बीच जो गांठें हैं वे गांठें बहुत ज्यादा फूली हुई हैं अथवा मामूली हैं। ऐसे बहुत कम हाथ देखे जाते हैं जिनमें तर्जनी तथा मध्यमा उंगली बराबर हो। परन्तु जिस हाथ में भी तर्जनी तथा मध्यमा उंगली बराबर हों वह व्यक्ति आत्म-हत्या करता है या उसकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से नहीं होती। ३. अनामिका :—मध्यमा के पास वाली उंगली को अनामिका उंगली कहते हैं। सामान्यतः यह उंगली मध्यमा उंगली से छोटी होती है तथा लगभग तर्जनी उंगली के बराबर लम्बी होती है इस उंगली के झुकाव का विशेष अध्ययन करना चाहिए। यदि उस अंगुली का झुकाव मध्यमा की तरफ हो तो वह ज्यादा अच्छी तथा श्रेष्ठ कही जाती है। विपरीत दिशा में झुकाव होने से ऐसा प्रतीत होता है कि उस व्यक्ति का गृहस्थ जीवन ज्यादा सुखमय नहीं रह सकेगा। ४. कनिष्ठिका :—यह हाथ की सबसे छोटी उंगली होती है तथा सामान्यतः इसका अंतिम सिरा अनामिका के ऊपरी सिरे तक अर्थात् ऊपरी जोड़ तक पहुंचता है

( २१ ) परन्तु जिस व्यक्ति के हाथ में यह उंगली जरूरत से ज्यादा लम्बी होती है, वह व्यक्ति निश्चय ही सौभाग्यशाली होता है और अपने प्रयत्नों से वह उच्चस्तरीय सम्मान प्राप्त करता है। [चित्र विवरण: कनिष्ठा, बुधकी ऊँगली, ७६५] हाथ की बनावट हड्डियों के पतले तथा भारी होने से हाथों के प्रकार में अन्तर आ जाता है। इस प्रकार से हम हाथों को सात वर्गों में बांट सकते हैं जो कि निम्नलिखित हैं : १. प्रारम्भिक प्रकार २. वर्गाकार हाथ ३. कर्मठ हाथ ४. दार्शनिक हाथ ५. कलात्मक हाथ ६. आदर्श हाथ ७. मिश्रित हाथ आगे की पंक्तियों में इन हाथों की विशेषताओं को मैं स्पष्ट कर रहा हूं :— १. प्रारम्भिक प्रकार :—सामान्यतः ऐसा हाथ खुरदरा, भारी तथा मोटा-सा होता है। इस हाथ की बनावट बेडौल तथा असुन्दर होती है एवं इसकी उंगलियां असमान-सी अनुभव होती हैं। सही रूप में देखा जाए तो ऐसे व्यक्ति पूर्ण सभ्य नहीं कहे जा सकते। नकल करने की प्रवृत्ति इनमें विशेष रूप से होती है। ये सभ्य हो सकते हैं परन्तु संस्कृति के जो गुण होने चाहिए वे इन व्यक्तियों में नहीं पाये जा सकते ।

( २२ ) एक प्रकार से ये व्यक्ति पूर्णतः भौतिकवादी होते हैं। इनके जीवन का परम उद्देश्य भोजन, वस्त्र और आवास ही होता है। इसके आगे जीवन के मूल्यों को न तो ये समझते हैं और न समझने का प्रयत्न ही करते हैं। एक प्रकार से आदर्श एवं जीवन मूल्यों की दृष्टि से ये सर्वथा कोरे होते हैं। यद्यपि यह बात सही है कि ये व्यक्ति परिश्रमी होते हैं और जो कुछ भी जीवन में उपार्जित करते हैं वह सब परिश्रम के बल पर ही संभव है। छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित हो जाना या उफन जाना इनका स्वभाव होता है। कानून तोड़ना इनके लिए बायें हाथ का खेल होता है। सामाजिक एवं नैतिक दृष्टि से ये व्यक्ति अपराधी वर्ग के अन्तर्गत आते हैं। २. वर्गाकार हाथ :— यदि हाथ को उल्टा करके देखें तो ऐसा हाथ तुरन्त पहचानने में आ जाता है। इस प्रकार के हाथों में ग्रन्थियां विशेष रूप से होती हैं तथा

५x 'वर्गाकार' हाथ

( २३ ) अस्थि प्रधान बेडौल हाथ ही इस वर्ग में आता है परन्तु प्रारम्भिक प्रकार के हाथ और इस हाथ में यह अन्तर होता है कि इस प्रकार के हाथ की उंगलियों में एक विशेष प्रकार की लचक होती है, जिससे इस हाथ को आसानी से पहचाना जा सकता है। ऐसे हाथ प्रारम्भिक प्रकार के हाथों की अपेक्षा पतले और कम खुरदरे होते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रतिभा सम्पन्न एवं बुद्धिजीवी होते हैं। समाज को इनका योगदान बराबर रहता है। ऐसे व्यक्ति ही समाज का नेतृत्व करने में सक्षम होते हैं तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ विशेष धरोहर देकर जाते हैं। ऐसे हाथ वाले व्यक्ति दार्शनिक, कलाकार, चित्रकार, साहित्यकार, मनोवैज्ञानिक आदि होते हैं। यद्यपि यह बात सही है कि इस प्रकार के व्यक्तियों के पास धन का अभाव होता है परन्तु ये अपने जीवन में धन को इतना अधिक महत्व नहीं देते जितना कि अपनी प्रतिष्ठा को, सम्मान को और कीर्ति को देते हैं। ३. कर्मठ हाथ : यह हाथ चौड़ाई की अपेक्षा लम्बाई लिए हुए होता है। हाथ का प्रारम्भ कुछ थुलथुला-सा तथा आगे का भाग उसकी अपेक्षा कुछ हल्का होता है। हथेली पर पाये जाने वाले पर्वत मांसल और कठोर होते हैं तथा अधिकतर पर्वत दबे हुए एवं भारी होते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में बराबर सक्रिय बने रहते हैं और कोई न कोई काम करते ही रहते हैं। खाली बैठना इनको अपने जीवन में अच्छा नहीं लगता। अत्यन्त साधारण श्रेणी में जन्म लेकर भी ये अपने परिश्रम से अपनी स्थिति को अनुकूल बना लेते हैं और जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त कर लेते हैं। इनके कार्यों में विचार, भावना एवं पुरुषार्थ का प्रबल सामंजस्य रहता है। 'कर्मठ' हाथ ऐसे व्यक्ति भावनाओं द्वारा अपने कार्य का संचालन नहीं करते अपितु इनके जीवन में भावना तथा व्यावहारिकता का पूर्ण समन्वय होता है। जीवन में नये-नये कार्यों की तरफ अग्रसर होना, नई से नई वस्तु की खोज करना तथा कुछ न कुछ नया करते रहना इनका स्वभाव होता है। सफल व्यक्तित्व इस प्रकार से इनकी विशेषता कही जा सकती है। ४. दार्शनिक हाथ : ऐसा हाथ फूला हुआ, गठीले जोड़ों से युक्त तथा सामा- न्तया गुदगुदा-सा होता है। यह हाथ न तो विशेष कठोर होता है और न विशेष कोमल। हाथ में लेते ही यह ऐसा प्रतीत होता है कि मानो इस हाथ में एक विशेष प्रकार की लचक और लय हो। ये अपेक्षाकृत पतले, कोमल और मृदुल हाथ होते हैं।

( २४ ) जिनके हाथ दार्शनिक वर्ग के होते हैं, वे व्यक्ति योग्य विद्वान एवं बुद्धिजीवी होते हैं। समाज के लिए ये व्यक्ति ज्यादा उपयोगी तथा नेतृत्व देने वाले सिद्ध हुए हैं। समाज जिन कार्यों से ऊंचा उठता है या देश जिन कार्यों से गौरवान्वित होता है, ऐसे कार्य इन्हीं प्रकार के व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न होते हैं। ऐसे व्यक्ति आदर्श एवं विश्वासों के प्रति पूरी-पूरी आस्था रखते हैं। ज्ञान के क्षेत्र में ये जिज्ञासु बने रहते हैं तथा ज्ञान और बुद्धि में सदैव तत्पर एवं लोगों के लिए हितकारी देखे जा सकते हैं। बड़े-बड़े दार्शनिक, विचारक एवं बुद्धिजीवी इसी प्रकार के

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'दार्शनिक' हाथ

( २२ ) कार्यों से सम्पन्न होते हैं । जीवन में इनको धन का अभाव-सा खलता है परन्तु फिर भी सम्मान की दृष्टि से ये बहुत ऊँचे उठे हुए होते हैं । ५. कलात्मक हाथ : इस प्रकार का हाथ नरम, लचकदार तथा मुलायम होता है । इसका रंग गुलाबी-सी आभा लिये हुए होता है तथा देखने में ये हाथ अत्यन्त सुन्दर होते हैं । हड्डियों के सभी जोड़ समान अनुपात के होते हैं तथा इन हाथों की पहचान इनकी उंगलियों से भली प्रकार से की जा सकती है। इनकी उंगलियां पतली, लम्बी, कलात्मक एवं सुघड़ होती हैं । कलात्मक हाथ ऐसे व्यक्ति स्वभावतः कला प्रेमी एवं सौन्दर्यजीवी होते हैं । इनके हृदय में कला के प्रति एक जिज्ञासा बराबर बनी रहती है तथा ये निरंतर कला के बारे में सोचते

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रहते हैं। यद्यपि ये स्वयं कलाकार होते हैं और दूसरे व्यक्तियों को भी उसी रूप में देखते हैं। किसी कारणवश ये स्वयं कलाकार नहीं भी होते तो भी कला के ये जबर- दस्त पारखी होते हैं और इनके धन का अधिकतर हिस्सा कला से सम्बन्धित कार्यों में व्यय हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों का रुझान प्रेम की तरफ विशेष रहता है परन्तु जीवन में अधिक- तर ये प्रेम के मामले में असफल ही रहते हैं। व्यावहारिक दृष्टि से ये व्यक्ति सफल नहीं होते । क्योंकि ये अधिकतर भावना एवं कल्पना में ही खोए हुए रहते हैं। जीवन में आर्थिक चिन्ता इन्हें बराबर बनी रहती है तथा स्वभाव से ये आलसी होते हैं। मेरे अनुभव में यह भी आया है कि यदि कलात्मक हाथ अत्यधिक लचीला न होकर थोड़ा-सा कड़ाई लिये हुए हो तो ऐसे व्यक्ति कला के माध्यम से अर्थ-संचय भी करते हैं तथा प्रसिद्धि भी प्राप्त करने में सफल रहते हैं। ६. आदर्श हाथ : वास्तव में हाथ का यह सर्वोत्तम प्रकार कहा गया है । ऐसा हाथ सामान्यतः सुडौल, मुलायम तथा एक विशेष लचक लिये हुए होता है। ऐसा हाथ न तो अधिक लम्बा होता है और न अधिक चौड़ा। (चित्र पृष्ठ २७ पर देखें।) ऐसे व्यक्ति भावी घटनाओं को बहुत पहले से जान लेते हैं अर्थात् ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में सूक्ष्मदर्शी होते हैं और बाल की खाल तक पहुंचने में विश्वास रखते हैं। जीवन में इनको जरूरत से ज्यादा बाधाओं एवं संघर्षों से सामना करना पड़ता है परन्तु फिर भी इन कठिनाइयों को देखकर ये विचलित नहीं होते अपितु अपने पथ पर बराबर आगे बढ़ते रहते हैं। यद्यपि कई बार समाज से इनको तिरस्कार एवं उपेक्षा भी मिलती है परन्तु इन सब बातों से ये जीवन में निराश नहीं होते । सांसारिक दृष्टि से ये व्यक्ति केवल आदर्शों में ही जीवित रहने वाले होते हैं, जिसकी वजह से ऐसे व्यक्तियों का सामाजिक जीवन प्रायः असफल-सा ही रहता है। लेकिन फिर भी ये व्यक्ति धुन के धनी होते हैं और जिस कार्य में एक बार ये हाथ डाल देते हैं उस कार्य को पूरा करके ही छोड़ते हैं। समाज के लिए इनका योगदान एक प्रकार से वरदान स्वरूप ही होता है। स्वप्न और आदर्शों में विचरण करने वाले ये व्यक्ति सांसारिक कार्यों में अन- फिट होते हैं। पास में द्रव्य न होने पर भी राजसी ठाटबाट से गुजारा करने में विश्वास रखते हैं तथा धन समाप्त हो जाने पर फाकों पर गुजारा करने में भी नहीं हिचकिचाते । इनके जीवन का अन्तिम भाग अत्यन्त दुखद होता है। ७. मिश्रित हाथ : यह हाथ का अन्तिम वर्ग कहा जा सकता है। पहले छः वर्गों में जो हाथ नहीं आता, उस हाथ की गणना इस वर्ग में की जाती है। इस प्रकार के हाथों में एक से अधिक हाथों के गुण मिलते हैं, इसी लिए इसको मिश्रित हाथ कहा जा सकता है। उदाहरण के लिए कर्मठ हाथ और दार्शनिक हाथ का मिला-जुला जो रूप होगा वह इसी वर्ग के अन्तर्गत आएगा । (चित्र पृष्ठ २८ पर देखें।)

( ३७ ) १८५ 'आदर्श' हाथ हाथ का यह मिश्रण इनके चरित्र एवं व्यवहार में भी देखा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति किसी भी कार्य को जितनी उतावली से प्रारम्भ करते हैं, धीरे-धीरे उस कार्य के प्रति इनकी रुचि समाप्त हो जाती है और उस कार्य को बीच में ही छोड़कर ये नए कार्य को प्रारम्भ कर देते हैं। इनके दिमाग में निरन्तर सन्देह, आशंका और भ्रम का वातावरण बना रहता है। ऐसे व्यक्तियों का चित्त अस्थिर होता है तथा किसी भी कार्य में पूरी तरह से सफलता न मिलने के कारण ये शीघ्र ही निराश हो जाते हैं और इसी वजह से ये धीरे-धीरे आत्म-केन्द्रित बन जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों को जीवन में सफलता बहुत अधिक प्रयत्नों के बाद ही मिलती है।

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'मिश्रित' हाथ

ऊपर मैंने हाथ के सात प्रकारों का विवरण स्पष्ट किया है। हाथ का अध्ययन करने से पूर्व हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए यह बहुत अधिक आवश्यक होता है कि वह सबसे पहले इस बात का अध्ययन कर ले कि सामने वाले व्यक्ति का हाथ किस वर्ग का है और उस वर्ग का हाथ होने से उसमें क्या-क्या विशेषताएं या कमियां हैं, उसको ध्यान में रखकर यदि हम उसके हाथ में पाई जाने वाली अन्य रेखाओं का अध्ययन करेंगे तो निश्चय ही हम सफलता के अत्यधिक निकट होंगे और हमारा भविष्य-कथन एक प्रकार से विज्ञान सम्मत पद्धति पर आधारित होगा ।

हाथ-हथेली, उंगलियां तथा उंगलियों के अग्रभाग

हाथ के अध्ययन में उंगलियां और हाथ की आकृति विशेष महत्व रखती हैं। बड़ा हाथ अपने आप में विशिष्ट हाथ कहलाता है। ऐसे व्यक्ति सूक्ष्मदर्शी और व्यव- हार कुशल होते हैं। इसके विपरीत छोटे हाथ वाले व्यक्ति क्रोधी, सनकी और अस्थिर स्वभाव वाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति जीवन में पूरी तरह से सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। यहां और आगे के पृष्ठों में भी जहां हाथ का वर्णन आएगा वहां हाथ से तात्पर्य मात्र हथेली से ही लिया जाना चाहिए।

हथेली

उंगली की जड़ से पहले मणिबन्ध तक हथेली की लम्बाई कहलाती है तथा अंगूठे की जड़ से दूसरे अन्तिम सिरे तक के भाग को हथेली की चौड़ाई कहा जाता है। इस सारे भाग पर जो भी चिह्न होते हैं, वे सभी चिह्न हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए अत्यन्त आवश्यक होते हैं। १. संकड़ी हथेली : ऐसे व्यक्ति सामान्यतः कमजोर प्रकृति वाले होते हैं। ये व्यक्ति अपने ही स्वार्थ को सर्वाधिक महत्व देते हैं और अपने स्वार्थ साधन में यदि सामने वाले व्यक्ति का अहित भी हो जाता है तो ये इस बात की परवाह नहीं करते। ऐसे व्यक्तियों पर आसानी से विश्वास करना ज्यादा उचित नहीं कहा जा सकता। २. चौड़ी हथेली : जिन व्यक्तियों के पास चौड़ी हथेली होती है, वे चरित्र की दृष्टि से दृढ़ निश्चयी तथा मजबूत हृदय वाले होते हैं। उनकी कथनी और करनी में कोई भेद नहीं होता और एक बार जो ये बात अपने मुंह से कह देते हैं उस पर ये खुद भी दृढ़ रहते हैं और यदि किसी को इस प्रकार का कोई आश्वासन दे देते हैं तो उसे यथासंभव पूरा करने की कोशिश करते हैं। ३. अत्यधिक चौड़ी हथेली : ऐसे व्यक्ति सामान्यतः अस्थिर प्रकृति के होते हैं। इसकी पहचान यह है कि इन लोगों की हथेली लम्बाई की अपेक्षा चौड़ी ज्यादा होती है। ऐसी हथेली वाले व्यक्ति तुरन्त निर्णय नहीं ले पाते और किसी भी कार्य को करने से पूर्व बहुत अधिक सोचते-विचारते रहते हैं।

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इनके जीवन में किसी कार्य का व्यवस्थित रूप नहीं होता। एक बार में ये एक से अधिक कार्य अपने हाथ में ले लेते हैं और उनमें से कोई भी कार्य भली प्रकार से पूर्ण नहीं होता, जिसकी वजह से इनके मन में निराशा भी घर कर लेती है। सामान्यतः ऐसे व्यक्ति जीवन में असफल ही होते हैं । ४. समचौरस हथेली : जिन व्यक्तियों की हथेली समचौरस होती है अर्थात् हथेली की लम्बाई और चौड़ाई बराबर होती है, वे व्यक्ति स्वस्थ, सबल, शान्त और दृढ़ निश्चयी होते हैं। ऐसे व्यक्ति पूरी तरह से पुरुषार्थी कहे जाते हैं। जीवन में ये जो भी बनते हैं या जो भी उन्नति करते हैं वह अपने प्रयत्नों के माध्यम से ही करते हैं। इनके स्वभाव में दृढ़ निश्चय होता है। किसी कार्य को ये तब तक प्रारम्भ नहीं करते जब तक कि इन्हें उस कार्य की सफलता में पूरा-पूरा भरोसा नहीं होता। परन्तु जब ये किसी एक कार्य को प्रारम्भ कर लेते हैं तो अपनी सारी शक्ति उसके पीछे लगा देते हैं और जब तक वह कार्य भली प्रकार से सम्पन्न नहीं हो जाता, तब तक ये विश्राम नहीं लेते। इनके जीवन की सफलता का यही मूल रहस्य है। ५. हाथ के प्रकार : हाथ के प्रकार का भी भविष्य-कथन के लिए बहुत अधिक महत्त्व है। हाथ देखने वाले को चाहिए कि वह जिस समय सामने वाले व्यक्ति के हाथ का स्पर्श करे, उसी समय यह भी जान ले कि उसका हाथ किस प्रकृति का है। मैं इससे सम्बन्धित तथ्य नीचे स्पष्ट कर रहा हूँ :— नरम हाथ : जिन व्यक्तियों के इस प्रकार के हाथ होते हैं, वे सामान्यतः कल्पनाशील व्यक्ति होते हैं। इनके स्वभाव में एक विशेष प्रकार की लचक एवं कोमलता होती है और उसी के अनुसार इनका जीवन भी होता है। किसी भी व्यक्ति की सहायता करने के लिए ये हर समय तैयार रहते हैं। अधिकतर ऐसे हाथ स्त्रियों के होते हैं। यदि किसी पुरुष का भी ऐसा हाथ अनुभव हो जाए तो यह समझ लेना चाहिए कि इस व्यक्ति में स्त्री सम्बन्धी गुण विशेष हैं। ढीला-ढाला नरम हाथ : यदि किसी व्यक्ति का हाथ नरम हो परन्तु वह बड़ा ही ढीला-ढाला हो तो ऐसे व्यक्ति आलसी, निकम्मे तथा अत्यन्त स्वार्थी होते हैं। अधिकतर ऐसे व्यक्तियों में दया नाम की कोई चीज़ नहीं होती। अपराधी वर्ग के हाथ अधिकतर ऐसे ही होते हैं। बुरे तथा समाज विरोधी कार्यों में ऐसे व्यक्ति सर्वदा अग्रणी रहते हैं। ऐसे व्यक्ति हृदयहीन, धोखा देने वाले तथा कपटपूर्ण व्यवहार करने वाले होते हैं। सख्त हाथ : ऐसे व्यक्तियों का जीवन रूखा और कठोर-सा होता है। प्रेम के क्षेत्र में भी कठोर बने रहते हैं और प्रेम के मामले को भी ये युद्ध के मामले की तरह समझते हैं। यदि बहुत अधिक सख्त हाथ हो तो ऐसे व्यक्ति सामान्य मजदूर होते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने कार्य को सबसे अधिक महत्त्व देने वाले होते हैं तथा बाधाओं

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के आने पर भी ऐसे व्यक्ति निराश नहीं होते अपितु लगातार उस कार्य को करते रहते हैं। हाथ का प्रकार देखते समय अवस्था को भी ध्यान में रखना चाहिए । यौवन- काल में हाथ सामान्यतः कम सख्त होता है परन्तु उसी व्यक्ति का हाथ प्रौढ़काल में ज्यादा सख्त होता है । मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि हाथ का प्रकार देखते समय उसकी आयु का भी ध्यान रखना चाहिए । परन्तु सामान्यतः सख्त हाथ वाले व्यक्ति बुद्धिजीवी नहीं होते और परिश्रम करके ही अपना जीवन-यापन करते हैं। अत्यधिक सख्त हाथ : ऐसा हाथ बुद्धि की न्यूनता और अत्याचार को प्रदर्शित करता है । ऐसे व्यक्ति दूसरों को दुखी देखकर आनन्द का अनुभव करते हैं और घोर स्वार्थी बने रहते हैं। अपराधी वर्ग के हाथ ऐसे ही होते हैं। जल्लाद या पेशेवर हत्यारे के हाथों में इसी प्रकार की स्थिति देखी जा सकती है। हाथ के प्रकार को देखने के साथ-साथ हथेली के रंग को भी ध्यान में रखना चाहिए । परन्तु इस बात में यह सावधानी बरतनी चाहिए कि सामने वाले व्यक्ति की हथेली को छूने से पहले ही उसके स्वाभाविक रंग का अध्ययन करना चाहिए । छूने से हथेली का रंग बदल जाता है और वह अपनी सामान्य अवस्था में नहीं रहती । १. लाल : जिस व्यक्ति की हथेली का रंग लाल होता है, वह क्रोधी स्वभाव का तथा दूसरों पर अविश्वास करने वाला व्यक्ति होता है। ऐसे व्यक्ति तुनक मिजाज भी होते हैं । किस समय ऐसा व्यक्ति गुस्सा हो जाएगा, इसका कोई आभास नहीं हो पाता । सामान्यतः ऐसा व्यक्ति संकीर्ण विचारों वाला तथा अदूरदर्शी होता है । २. अत्यधिक लाल : जिस व्यक्ति की हथेली का रंग अत्यधिक लाल होता है, वह क्रूर, अपराध-वृत्ति वाला तथा जरूरत से ज्यादा स्वार्थी होता है। समय पड़ने पर यह मित्र को भी धोखा देने में नहीं चूकता । स्वार्थी इतना अधिक होता है कि यदि किसी का १००) रु० का नुकसान होता हो और उससे इसको एक पैसे की बचत होती है तो यह सामने वाले व्यक्ति को भी धोखा देने से नहीं चूकेगा। इसके साथ भलाई का व्यवहार करने पर भी समय पड़ने पर यह व्यक्ति धोखा देगा। ऐसे व्यक्ति पर विश्वास करना खतरे से खाली नहीं होता । ३. गुलाबी : जिस व्यक्ति की हथेली का रंग गुलाबी होता है वह स्वस्थ, सहृदय तथा उन्नत विचारों वाला होता है । उसके रहन-सहन में एक शालीनता दिखाई देती है। ऐसा व्यक्ति उच्च विचारों का धनी, एवं सन्तुलित मस्तिष्क वाला होता है । ऐसे व्यक्ति जीवन में अपने कार्यों से तथा अपने परिश्रम से सफल होते हैं एवं साधा- रण श्रेणी से उठकर अत्यन्त ऊंचे स्तर पर पहुंचने में समर्थ होते हैं। वास्तव में ऐसे व्यक्ति ही समाज को कुछ नया दे सकते हैं ।

( ३२ ) ४. पीला : पीले रंग की हथेली रोग की सूचक होती है। जिस व्यक्ति की हथेली पीली दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि यह व्यक्ति रोगी है अथवा इसके खून में किसी न किसी प्रकार का कोई विकार है। ऐसा व्यक्ति अस्थिर स्वभाव का तथा चिड़चिड़ा होता है एवं संकीर्ण बुद्धि का होने के साथ-साथ कमजोर मस्तिष्क वाला भी कहा जा सकता है। ५. चिकनी त्वचा : हथेली की त्वचा का भी अपनेआप में अत्यन्त ही महत्त्व होता है। जिस व्यक्ति की हथेली की त्वचा चिकनी और मुलायम होती है, वह व्यक्ति सहृदय तथा निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति का लक्ष्य हमेशा स्पष्ट होता है और वह निरन्तर उस ओर बढ़ता रहता है। जीवन में अधिक- तर ऐसे ही व्यक्ति सफल होते देखे गये हैं। ६. सूखी त्वचा : जिन व्यक्तियों की हथेली की त्वचा या चमड़ी सूखी सी होती है, वे व्यक्ति सामान्यतः रोगी और अस्थिर प्रकृति वाले होते हैं। वे स्वयं किसी प्रकार का कोई निर्णय नहीं ले पाते और इनको जिस प्रकार की भी सलाह दी जाती है उसी के अनुसार ये कार्य करने लग जाते हैं। इनके कार्यों में किसी प्रकार का कोई सामंजस्य नहीं रहता। मानसिक तथा शारीरिक दोनों ही दृष्टियों से ये लगभग बीमार से ही रहते हैं। जीवन में सफलता इनको बहुत अधिक प्रयत्न करने के बाद ही मिलती है। ७. रूखी त्वचा : अत्यधिक सूखी तथा रूखी त्वचा व्यक्ति की कमजोरी तथा लीवर की बीमारी को स्पष्ट करती है। ये व्यक्ति सन्देहशील प्रकृति के होते हैं तथा दुर्बल मनोवृत्ति के होने के कारण जीवन में प्रायः असफल ही रहते हैं। नाखून हथेली का अध्ययन करने के साथ ही साथ उंगलियों के नाखूनों पर भी विशेष विचार करना चाहिए। साधारणतः ये नाखून प्रत्येक व्यक्ति की उंगली के अग्रभाग में होते हैं और उंगली की रक्षा करने में सहायक होते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से नाखूनों के दो कार्य हैं। (१) उंगलियों के पोरों की रक्षा करना, जिससे बाहरी आघात से उंगलियां कट न जाएं और उंगलियों की सुन्दरता को बढ़ाने में ये नाखून सहायक होते हैं। (२) ये नाखून विद्युत प्रवाहक होते हैं। वायुमण्डल में जो नैसर्गिक विद्युत होती है, इन नाखूनों के माध्यम से ही शरीर में प्रवेश करती है। यह ही नहीं अपितु अन्य ग्रहों की रश्मियां भी इन्हीं नाखूनों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर व्यक्तियों को सुचारु रूप से कार्य करने में सक्षम रखती हैं।

( ११ ) विभिन्न प्रकार के नाखून १. छोटे नाखून : छोटे नाखून व्यक्ति की असभ्यता को प्रदर्शित करते हैं। जिस व्यक्ति की उंगलियों पर छोटे-छोटे नाखून होते हैं। इन्हें देखकर तुरन्त समझ जाना चाहिए कि इस व्यक्ति ने भले ही सभ्य और उन्नत घराने में जन्म लिया हो पर प्रकृति से वह संकीर्ण विचारों वाला कमजोर तथा दुष्ट स्वभाव वाला ही होगा। २. छोटे और पीले नाखून : ऐसे नाखून व्यक्ति की मक्कारी को प्रदर्शित करते हैं। ये नाखून इस बात के भी सूचक हैं कि यह व्यक्ति कदम-कदम पर झूठ बोलनेवाला तथा समय पड़ने पर अपने परिवार को भी धोखा देने वाला होगा। ऐसे व्यक्ति कभी भी विश्वासपात्र नहीं हो सकते। ३. छोटे और चौरस नाखून : जिस व्यक्ति के हाथों में इस प्रकार के नाखून होते हैं, वह व्यक्ति हृदय रोग का रोगी होता है तथा उसकी मृत्यु हार्ट अटैक से ही होती है। ४. छोटे और चौड़े नाखून : ऐसा व्यक्ति लड़ाई-झगड़ों में विश्वास रखता है और दूसरों की आलोचना करना या दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप करना इनका प्रिय स्वभाव होता है। ऐसे व्यक्ति अड़ियल किस्म के होते हैं। ५. कठोर और संकरे नाखून : सामान्यतः ऐसे व्यक्ति झगड़ालू प्रकृति के होते हैं। जिस बात को ये एक बार मन में ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही छोड़ते हैं, चाहे वह बात गलत हो या सही कार्य हो। ये इस बात की परवाह नहीं करते, अपितु अपनी बात पर अड़े रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों पर विश्वास करना ठीक नहीं होता।