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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पादग्राह्यास्तेषां भार्या गुरोश्च मातापितरौ यो विद्यादभि-

भाषार्थमहिमा ॥ ५३

पादग्राह्यास्तेषां भार्या गुरोश्च मातापितरौ यो विद्यादभि- वन्दितुमहंमयंभोइति ब्रूयाद्यश्च न विद्यात् प्रत्यभिवाद- ममन्त्रिते स्वरोऽन्त्यः प्लवते सन्ध्यक्षरमप्रगृह्यमायावाभावं चाऽऽपद्यते यथा भो भाविति ॥ १४ ॥ पतितः पिता त्याज्यो माता तु पुत्रे न पतति ॥ १५ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १६ ॥ उपाध्यायाद्दशाऽऽचार्य आचार्याणांशतंपिता । पितुर्दशशतंमाता गौरवेणातिरिच्यते ॥ १७ ॥ भार्याःपुत्राश्चशिष्याश्च संसृष्टाःपापकर्मभिः । परिभाष्यपरित्याज्याः पतितोयोऽन्यथात्यजेत् ॥१८॥ ऋत्विगाचार्यावयाजकानध्यापकौ हेयावन्यत्र हाना-


पग छूने उचित हैं उन की स्त्रियों को भी अभिवादन करे और गुरु के माता पिता को भी अभिवादन करे। जो (वैयाकरण होने से) अभिवादन करना जानता हो वह (अभिवादये देव शर्माऽहंभोः) ऐसा कहे। और जो पुरुष अभिवादन के प्रत्युत्तर (जिस के सम्बोधन में अन्त्य स्वर प्लुत होता और प्रगृह्य संज्ञा न होने पर एकार ओकारादि सन्ध्यक्षर को अय् आव् आदेश होता है जैसे भो इति। भाविति) को नहीं जानता उस मान्य को भी शास्त्र विधि से अभिवादन न करे किन्तु लोक भाषा में बोलकर पाद स्पर्श कर लेवे ॥ १४ ॥ पतित हुए पिता को पुत्र त्याग देवे परन्तु पुत्र के लिये माता पतित नहीं होती अर्थात् पतित हुई माता की भी भोजन वस्त्रादि देके पुत्र रक्षा वा सेवा करता रहे ॥१५॥ यहां श्लोक का भी प्रमाण कहते हैं कि॥१६॥ अध्यापक वा उपाध्याय से दश गुणी मान प्रतिष्ठा आचार्य की, आचार्य से सौ गुणा मान्य पिता का और पिता से हजार गुणा मान्य माता का करना चाहिये और इस से भी जितना अधिक गौरव माता का करे सो सब उचित ही जानो ॥ १७ ॥ स्त्री पुत्र और शिष्य लोग यदि विशेष कर पाप कर्मों से युक्त हों तो उन से कहदे (नोटिस दे देवे) कि तुम लोग अब आगे ऐसा मत करो तथा पिछले किये का प्रायश्चित्त करलो ऐसा सुना देने पर भी न मानें तो उन को त्याग देवे। बिना सुनाये त्यागे तो त्यागने वाला भी पतित हो जाता है ॥ १८ ॥ ऋत्विज् यज्ञ न करासके वा किसी कारण से न

५४ वसिष्ठस्मृतिः ॥

त्पतति ॥ १९॥ पतितोत्पन्नः पतितो भवतीत्याहुरन्यत्र स्त्रियाः ॥ २०॥ सा हि परगामिनी तामरिक्थामुपेयात् ॥ २१ ॥
गुरोर्गुरौसन्निहिते गुरुवद्वृत्तिरिष्यते ।
गुरुवद्गुरुपुत्रस्य वर्तितव्यमिति श्रुतिः ॥ २२ ॥
शस्त्रं विषं सुरा चाप्रतिग्राह्याणि ब्राह्मणस्य ॥ २३॥ विद्या वित्तं वयः संबन्धः कर्म च मान्यम् ॥२४॥ पूर्वः पूर्वो गरीयान् स्थविरबालातुरभारिकस्त्रीचक्रिवतां पन्थाः समागमे परस्मै देयः ॥ २५ ॥ राजस्नातकयोः समागमे राज्ञा स्नातकाय देयः ॥ २६ ॥ सर्वैरेव च वध्वा उह्यमानायै ॥ २७ ॥ तृणभूम्यम्बूदकवाक्सूनृतानसूयाः सतां गृहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन कदाचनेति ॥ २८ ॥
इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥


करावे तथा जो आचार्य वेद को न पढ़ावे उन दोनों को त्याग देना चाहिये। न त्यागे तो पतित हो जाता है ॥ १९ ॥ पतित से उत्पन्न हुआ भी पुत्री को छोड़ कर पतित होता है ऐसा ऋषि लोग कहते मानते हैं ॥ २० ॥ वह स्त्री पतित को प्राप्त हुई इस से उसके साथ के वस्त्राभूषणादि धन को त्याग के केवल कन्या को स्वीकार करे ॥ २१ ॥ गुरु के गुरु भी समीपस्थ हों तो उन के साथ गुरु कासा बर्त्ताव करे और गुरुपुत्र के साथ भी गुरु के तुल्य बर्त्ताव करे ॥ २२ ॥ शस्त्र, विष और मद्य इन को ब्राह्मण दान में न लेवे ॥ २३ ॥ विद्या, कर्म, अवस्था, कुटुम्ब, और धन ये पांच मान्य के स्थान हैं ॥ २४ ॥ इन में पर २ की अपेक्षा पूर्व २ को अधिक मान्य करे। वृद्ध, बालक, रोगी, बोझावाला, स्त्री और गाड़ीवाला इन का समागम होने पर पिछले २ के लिये रास्ता देना चाहिये ॥ २५ ॥ राजा और स्नातक के समागम में राजा स्नातक के लिये मार्ग छोड़े ॥ २६ ॥ तत्काल विवाह हो कर आई बहू के लिये सभी वृद्धादि मार्ग छोड़ें ॥ २७॥ कुशासन या चटाई, भूमि, अग्नि, जल, कोमल वाणी, निन्दा का त्याग, सत्पुरुषों के घर में इन आसनादि मिलने का कदापि अभाव नहीं होता अर्थात् जिन के घर पर आये हुये का आसनादि मिलने द्वारा अवश्य सत्कार हो, वे ही सत्पुरुष हैं ॥ २८ ॥
यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में तेरहवां अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥

भाषार्थसहिता ॥ ५५

अथातो भोज्याभोज्यं च वर्णयिष्यामः ॥१॥ चिकित्सक- मृगयुपुंश्चलोदण्डिकस्तेनाभिशस्तषण्डपतितानामन्नमभो- ज्यम् ॥ २ ॥ कदर्यदीक्षितबद्धातुरसोमविक्रयितक्षकरजक- शौण्डिकसूचकवार्धुषिकचर्मावकृत्तानां शूद्रस्य चास्त्रभृत स्त्रीष्वपतेर्यश्चोपपतिं मन्यते, यश्च गृहान्दहेत् यश्च वधार्हं नोपहन्द्यात्, को भक्षयत इति ॥ ३ ॥ वाचाभिघुष्टं गणान्नं गणिकान्नं चेति ॥४॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ५ ॥ नाश्नन्ति श्ववतोदेवा नाश्नन्तिवृषलीपतेः । भार्याजितस्यनाश्नन्ति यस्यचोपपतिर्गृहे । इति ॥ ६ ॥ एधोदकयवसकुशलाजाभ्युद्यतयानावसथसफरीप्रियङ्गु स्रगन्धमधुमांसानीत्येतेषां प्रतिगृह्णीयात् ॥ ७ ॥ अथाप्यु- दाहरन्ति ॥ ८ ॥


अब इस चौदहवें अध्याय में भक्ष्याभक्ष का विचार दिखाते हैं ॥१॥ वैद्य, व्याधा, व्यभिचारिणी स्त्री, लाठी आदि से पशु हत्या करने वाला, चोर, निन्दित, नपुंसक और पतित इन सबका अन्न अभक्ष्य है ॥ २ ॥ कंजूस, दीक्षित, कदी, रोगी, सोम बेंचने वाला, बढ़ई, धोबी, मद्य बनाने बेंचने वाला कलवार, चुगल, ब्याज लेनेवाला-सूदखोर, शूद्र, अस्त्रधारी, जो अन्य जीवित पुरुष की पत्नी से संग करता हो, जो अपनी स्त्री के जार को मानता ( स्वीकार करता ) हो, जो घरों में आग लगावे, और जो वध करने योग्य को न मारडाले, इन का अन्न कोई न खावे ॥ ३ ॥ वाणी से निन्दित, चन्दा का, और वेश्या का अन्न भी अभक्ष्य है ॥४॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥५॥ कुत्ता पालने वाले, वेश्यागामी, स्त्री की आज्ञा में चलने वाले, अर्थात् जिनको स्त्री ने जीत लिया हो और जिस की स्त्री का दूसरा पति जार पुरुष हो इन सब के होमादि को देवता लोग ग्रहण नहीं करते ॥ ६ ॥ ईंधन, जल, भूसा, कुश, धान वा खीलें, नये बने हुए-सवारी, घर, मछली, कंगुनी, माला, चांवल, शहद, और मांस इन पदार्थों को वैद्यादि निन्दितों सेभी लेलेवे ॥७॥ इस विषय में श्लोक का भी प्रमाण कहते हैं कि ॥८॥ माता पितादि मान्य और स्त्री पुत्रादि दुःखित हों तो उन के निर्वाहार्थ और देवता तथा अतिथियों के

५६ | वसिष्ठस्मृतिः ॥

गुरून्भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन्नर्चिष्यन्देवतातिथीन् । सर्वतःप्रतिगृह्णीयान्नतुतृप्येत्स्वयंततः । इति ॥ ६ ॥ न मृगयोरिषुचारिणः परिवर्ज्यमन्नम् ॥ १०॥ विज्ञायते ह्यगस्त्यो वर्षसाहस्रिके सत्रे मृगयां चकार, तस्याऽऽसंस्तु रस- मयाः पुरोडाशा मृगपक्षिणां प्रशस्तानाम् ॥११॥ अपि ह्यत्र प्राजापत्याञ् श्लोकानुदाहरन्ति ॥ १२ ॥ उद्यतामाहृतांभिक्षां पुरस्तादप्रचोदिताम् । भोज्यां प्रजापतिर्मेने अपिदुष्कृतकारिणः ॥ १३ ॥ श्रद्दधानैर्नभोक्तव्यं चोरस्यापिविशेषतः । नत्वेवबहुयाज्यस्य यश्चोपनयतेबहून् ॥ १४॥ नतस्यपितरोऽश्नन्ति दशवर्षाणिपञ्चच । नचहव्यंवहत्यग्निर्यस्तामभ्यवमन्यते ॥ १५ ॥ चिकित्सकस्यमृगयोः शल्यहस्तस्यपापिनः ।


पूजन के लिये सब किसी से अन्न को ग्रहण करले परन्तु उसको स्वयं न खावे तो दोष नहीं लगता है ॥९॥ धनुष बाण लेकर विचरने वाले व्याध का अन्न वर्जित नहीं ॥ १० ॥ क्योंकि शास्त्रों में लिखा है कि अगस्त्य ऋषि ने हजार वर्ष के सत्र यज्ञ में प्रशस्त मृगों और पक्षियों की शिकार की, उस के रस रूप पुरोडाश बनाये गये । ( यह किन्हीं का मत है । अगस्त्य महर्षि ने तपो बल के प्रभाव से दोष को नष्ट किया इस से साधारण व्याध के अन्न में कुछ दोष रहेगा । इस कारण दशवां सूत्र एक देशी मत जानो )॥ ११ ॥ इस भक्ष्या भक्ष्य विषय में प्रजापति के कहे श्लोक कहते हैं कि॥ १२॥ दाता ने पहिले से न कहा हो कि अमुक वस्तु तुम को मैं दूंगा और अकस्मात् बिना मांगे लाकर सामने धर दे तो ऐसी भिक्षा दुष्कर्मी पुरुष की भी भोजन वा ग्रहण करने योग्य है ॥ १३ ॥ धर्म में श्रद्धा रखने वाले ब्राह्मणों को चोरों का, एक साथ बहुतों को यज्ञ कराने तथा एक साथ बहुतों का उपनयन कराने वाले का अन्न नहीं खाना चाहिये ॥ १४ ॥ जो पुरुष उस अकस्मात् आयी पूर्वोक्त भिक्षा का तिरस्कार करता है उस के श्राद्ध को पितर लोग १५ पन्द्रह वर्ष तक स्वीकार नहीं करते और उस के हविष्यांश को अग्नि देवताओं में नहीं पहुंचाता ॥ १५ ॥ वैद्य, व्याधा, भाला व शूल हाथ लिये पापी

भाषार्थसहिता ॥ ५७

षण्डस्यकुलटायाश्च उद्यतापिनगृह्णतइति ॥ १६ ॥

उच्छिष्टमगुरोर्भोज्यं, स्वमुच्छिष्टोपहतं च ॥ १७ ॥ यदशनं केशकीटोपहतं च ॥१८॥ कामं तु केशकीटानुद्धृत्याद्भिः प्रोक्ष्य भस्मनाऽवकीर्य वाचा प्रशस्तमुपभुञ्जीत ॥१९॥ अपिह्यत्र प्राजापत्यान् श्लोकानुदाहरन्ति ॥ २० ॥

त्रीणिदेवाःपवित्राणि ब्राह्मणानामकल्पयन् ।
अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्चवाचाप्रशस्यते ॥ २१ ॥
देवद्रोण्यांविवाहेषु यज्ञेषुप्रकृतेषुच ।
काकैःश्वभिश्चसंस्पृष्टमन्नंतन्नविसर्जयेत् ॥ २२॥
तस्मादन्नमुद्धृत्य शेषंसंस्कारमर्हति ।
द्रवाणांप्लावनेनैव घनानांप्रोक्षणेनतु ।


हत्यारा, हिजड़ा, और व्यभिचारिणी स्त्री इन की अकस्मात् आयी भिक्षा को भी ग्रहण न करे ॥ १६ ॥ गुरु से भिन्न का उच्छिष्ट, अपना उच्छिष्ट और जिस में उच्छिष्ट का मेल हो गया हो ऐसा अन्न अभक्ष्य है ॥ १७ ॥ जिस भोजन में बाल वा कीड़ा पड़ गये हों वह भी अभक्ष्य है ॥ १८ ॥ जिस में बालादि पड़गये उस में से बालों और कीड़ों को निकाल कर जल सेचन कर भस्म विखेर के वाणी से मन्त्रों ( पितुंनुस्तोषं २ ) द्वारा अन्नस्तुति किये अन्न को भले ही खावे तब दोष नहीं लगता है ॥ १९ ॥ और भी प्रजापति के कहे श्लोकों का उदाहरण देते हैं कि ॥२०॥ देवता लोगों ने ब्राह्मणों के लिये तीन प्रकार के पदार्थ पवित्र कहे हैं-एक जिस में बिना देखी जानी कोई अशुद्धि हो,द्वितीय मन्त्र पूत जल से वा धोने आदि द्वारा जो पवित्र किया गया हो और तीसरा वाणी से जिस की प्रशंसा की गयी हो ॥ २१ ॥ देव द्रोणी अर्थात् दश सेर आदि के भोजन से जहां देव पूजा की जाय, विवाहों में तथा अन्य यज्ञों में बहुत से पकाये अन्न के ढेर में कौवा वा कुत्ता मुख लगा देवें तो उस अन्न का त्याग न करे ॥ २२ ॥ किन्तु उस में से उच्छिष्टांश अन्न को निकाल कर शेष अन्न की शुद्धि कर लेवे । यदि पतले कढ़ी आदि हों तो हिलोराने से, कड़े रोटी पूरी आदि की कुशों द्वारा मार्जन से शुद्धि होती है । और बिल्ली का

५८ वसिष्ठस्मृतिः ॥

मार्जारमुखसंस्पृष्टं शुचिरेवहितद्भवेत् ॥ २३ ॥
अन्नं पर्युषितं भावदुष्टं सकृल्लेखं पुनःसिद्धमाममांसं पक्वं च कामं तु दध्ना घृतेनाभिघारितमुपयुञ्जीत ॥ २४ ॥ अपि-
ह्यत्र प्राजापत्यान् श्लोकानुदाहरन्ति ॥ २५ ॥
हस्तदत्तास्तुयेस्नेहा लवणव्यञ्जनानि च ।
दातारंनोपतिष्ठन्ति भोक्ताभुङ्क्तेचकिल्विषम् ॥ २६ ॥
प्रदद्यान्नतुहस्तेन नाऽऽयासेनकदाचन, इति ॥ २७ ॥
लशुनपलाण्डुकवकगृञ्जनश्लेष्मातकवृक्षनिर्या सलोहितव्रश्चनश्वकाकावलीढशूद्रोच्छिष्टभोजनेषु कृच्छ्रातिकृच्छ्रइतरेष्व-
न्यत्र मधुमांसफलविकर्षेष्वग्राम्यपशुविषयः ॥२८॥ संधिनी-
क्षीरमवत्साक्षीरं गोमहिष्याजानामनिर्दशाहानमन्तर्नाव्यु-


मुख भोज्यान्न में लग गया होतो वह अन्न शुद्ध ही है ॥ २३ ॥ बासी पहिले दिन का धरा हुआ, जिस में ग्लानि वा शंका हो गयी हो, एक बार किसी जान वरने पंजा मार दिया हो, फिर से पकाया, कच्चा मांस, वा पकाया मांस ये सब अभक्ष्य हैं । परन्तु बासे घरे हुये अन्नादि को दही वा घी से संस्कार करके भले ही खालेवे ॥ २४ ॥ और भी यहां प्रजापति के श्लोक उदाहरण में कहते हैं कि ॥२५॥ घी आदि स्नेह, लवण और दही आदि व्यञ्जन ये सब हाथ पर दिये जांय तो देने वाले को दुर्लभ हो जाते और इन को खाने वाला पाप को खाता है अर्थात् भोजन करते हुये को लवण घृतादि हाथ पर नहीं देने चाहिये किन्तु पात्र वा पत्तल पर धर देवें ॥२६॥ और देने वाला भी उक्त पदार्थों को हाथ से न देवे और लोभ में आकर कष्ट मानता हुआ भी कदापि दान न देवे ॥२७॥ लहसन, प्याज, कठफून, गाजर, शलगम, लसोढ़ा, (लभेडा) वृक्षों का गोंद, लाल गोंद, वृक्षों के गोदने से निकला रस वा दूध, कुत्ते कौवे का चाटा हुआ अन्नादि, और शूद्र का उच्छिष्ट इन सब को खालेने पर कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत करे तथा शहद मांस और जिन से फलों की हानि हो ऐसे वृक्षों के फूल वा कली आदि को छोड़ के अन्य अभक्ष्यों में भी यही कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत जानो और वह मांस ग्राम के पशुओं से भिन्न जंगल का जानों ॥ २८ ॥ गाभिन गौ का, जिस का बच्छा मर गया हो, सद्या गौ भैंसि बकरी का व्याने पर दश दिन के भीतर का दूध, नौका का जल, ये सब अभक्ष्य हैं । पुन्ना,

भाषार्थसहिता ॥ ५९

दकमपूपधानाकरम्भसक्तुवटकतैलपायसशाकानि शुक्तानि वर्जयेत्, अन्यांश्च क्षीरयवपिष्टविकारान् ॥ २९ ॥ श्वावि- च्छलुकशशकच्छपगोधाः पञ्चनखानां भक्ष्याः ॥३०॥ अनुष्ट्राः पशूनामन्यतोदतश्च मत्स्यानां वा चेटगवयशिशुमारनक्रकु- लीरा विकृतरूपाः ॥ ३१ ॥ सर्पशीर्षांश्च ॥ ३२ ॥ गौरगवयशर भांश्चानुद्दिष्टाः ॥ ३३ ॥ तथा धेन्वनडुहौ मेध्यौ वाजसनेयके विज्ञायेते ॥ ३४ ॥ खड्गे तु विवदन्त्यग्राम्यशूकरे च ॥ ३५ ॥ शकुनानां च विष्किर्वाविष्किरजालपादाः ॥ ३६ ॥ कलविङ्क- प्लवहंसचक्रवाकभासवायसपारावतकुक्कुटसारङ्गपाण्डुकपो- तकौञ्चक्रकरगृध्रश्येनबकबलाकमद्गुटिट्टिभमान्धातृनक्तं

भुंजे पकाये जौ, दही में मिले सत्तू, केवल सत्तू, तेल के बड़े, पायस-खीर, और पकाये शाक ये सब धरे रहने से खटाय जाने पर अभक्ष्य हैं । तथा दूध, जौ और पिट्ठी के अन्य विकार भी खटाये हुए अभक्ष्य हैं ॥ २९ ॥ पांच नख वाले जीवों में श्वावित्, शल्लक, (दो प्रकार की सेही उन के अवान्तर भेद में दो अवान्तर जाति हैं ) शश, कच्छप, और गोधा ( गोह ) ये पांच भक्ष्य हैं ( यह परिसंख्या विधि राग से सर्वत्र प्राप्त मांस भक्षण के अन्यों में परिवर्जनार्थ है । अर्थात् हिंसाजनक होने से सभी मांस भक्षण त्याज्य है यदि सब का त्याग जो कोई न कर सके तो पांच पञ्चनख वालों में प्रवृत्ति रहने मे कम दोष लगेगा अर्थात् निर्दोष फिर भी न होगा ) ॥ ३० ॥ ऊंट को छोड़ के एक ओर दांतों वाले, चेट, गवय, शिशुमार, नाका, कुलीर इन नामों वाले विकृत भयंकर रूप धारी, ॥ ३१ ॥ सांप के जैसे शिर वाले ये चेट आदि नामक जल जन्तु परिसंख्या विधि से भक्ष्य हैं ॥३२॥ गौर मृग, गवय (नीलगाय) और शरभ नामक जङ्गल के जीव भक्ष्यों में उद्दिष्ट नहीं हैं ॥ ३३ ॥ गौ बैल मेध्य नाम मेधा के अनुकूल हैं ऐसा वाजसनेय श्रुति से जाना जाता है ॥३४॥ गेंडा और बन के सुअर के भक्ष्य होने न होने में विवाद करते हैं ॥ ३५ ॥ पक्षियों में विष्किवि, विष्किर, जालपाद् नामक पक्षी भी अभक्ष्य हैं ॥ ३६ ॥ कलविङ्क, प्लव, हंस, चक्रवाक, भास, कौवा, परेवा, मुर्गा, सारङ्ग, श्वेतकबूतर, क्रौञ्च, क्रकर, गीध, श्येन, बगुला, बलाका, मद्गु, टिट्टिहिया, मान्धाता, चमगीदर,

६० वसिष्ठस्मृतिः ॥

चरदार्वाघाटचटकैलातकहारीतखञ्जरीटग्राम्यकुक्कुटशुकसारिकाकोकिलक्रव्यादा ग्रामचारिणश्चाग्रामचारिणश्चेति ॥ ३७ ॥

इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे चतुर्द्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

(शोणितशुक्रसंभवः पुरुषो मातापितृनिमित्तकः)॥ १ ॥ तस्य प्रदानविक्रयत्यागेषु मातापितरौ प्रभवतः ॥ २ ॥ नत्वेकं पुत्रं दद्यात् प्रतिगृह्णीयाद्वा ॥ ३ ॥ सहि संतानाय पूर्वेषाम् ॥ ४ ॥ न स्त्री दद्यात् प्रतिगृह्णीयाद्वाऽन्यत्रानुज्ञानाद्भर्तुः ॥ ५ ॥ पुत्रं प्रतिग्रहीष्यन् बन्धूनाहूय राजनि चावेद्य निवेशनस्य मध्ये व्याहृतिभिर्हुत्वा दूरेबान्धवं बन्धुसन्निकृष्टमेव प्रतिगृह्णीयात् ॥ ६ ॥ संदेहे चोत्पन्ने दूरेबान्धवं शूद्रमिव स्थापयेत् ॥ ७ ॥ विज्ञायते ह्येकेन बहूँस्त्रायत-


कठफारवा, चिड़िया, रैलातक, हारीत, खञ्जुराट, गांव का मुर्गा, तोता, मैना, कोइल, कच्चा मांस खाने वाले तथा गांव वा वन में रहने वाले ये उक्त सब पक्षी अभक्ष्य हैं ॥ ३७ ॥

यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में चौदहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१४॥

माता पिताजिस के निमित्त कारण हैं ऐसे रजवीर्य से सन्तान का शरीर बना है ॥ १ ॥ उस सन्तान को किसी के लिये दे देने, बेंच देने और त्याग देने का अधिकार माता पिता को है (परन्तु सन्तान का बेंचना काम अच्छा नहीं किन्तु निन्दित पाप कर्म है । यह बात प्रसंगानुसार धर्म शास्त्रों में लिखी है ) ॥ २ ॥ किसी के एक ही पुत्र होतो उसे पिता किसी को दान करके न देवे और लेने वाला भी न लेवे ॥ ३ ॥ क्योंकि वही आगे पूर्वजों का कुल चलाने वाला होगा ॥ ४ ॥ पति की आज्ञा के बिना माता अपने सन्तान का दान किसी को न देवे और किसी के सन्तान का दान भी न लेवे ॥ ५ ॥ दत्रिम वा दत्तक पुत्र को लेना चाहता हुआ पुरुष राजा के दरबार में आवेदन पत्र ( दरखास्त ) देके, कुटुम्बियों को बुलाकर, घर के बीच कुण्ड में व्याहृतियों से होम करके, उन के कुटुम्बी दूर हों तो कुटुम्बियों के सामने ही उस पुत्र को स्वीकार करे ॥ ६ ॥ जिस के माता पितादि कुटुम्बी दूर देश में हों ऐसे पुत्र को ले लेने पर उस की शुद्ध उत्पत्ति में सन्देह हो जाय तो उसे शूद्र के तुल्य अपने घर में रक्खे ॥ ७ ॥ श्रुति से ज्ञा-

भाषार्थसहिता ॥ ६१

इति ॥८॥ तस्मिंश्चेत् प्रतिगृहीत औरसः पुत्र उत्पद्येत, चतुर्थभागभागी स्याद्दत्तकः ॥९॥ यदि नाभ्युदयिकेषु युक्तः स्याद् वेदविप्लवित्रिनः सव्येन पादेन प्रवृत्ताग्रान् दर्भान् लोहितान् वोपस्तीर्य पूर्णपात्रमस्मै निनयेत् ॥ १० ॥ नेतारं चास्य प्रकीर्णकेशा ज्ञातयोऽन्वालभेरन्नपसव्यं कृत्वा गृहेषु स्वैरमापद्येरन्ननऊर्ध्वं ते न धर्मयेयुस्तद्मार्गस्तं धर्मयन्तः ॥११॥ पतितानां तु चरितव्रतानां प्रत्युद्धारः ॥१२॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥१३॥

अग्रेऽभ्युद्धरतांगच्छेत् क्रीडन्निवहसन्निव ।
पश्चात्पातयतांगच्छेच्छोचन्निवरुदन्निव ॥ १४ ॥

आचार्यमातृपितृहन्तारस्तत्प्रसादाद्भयाद्वा, एषा तेषां


ना जाता है कि एक से बहुतों की रक्षा करे ॥ ८ ॥ उस दत्तक पुत्र के ले लेने पर यदि औरस पुत्र उत्पन्न हो जाय तो दत्तक पुत्र पिता के चतुर्थांश का भागी होगा ॥ ९ ॥ यदि वह दत्तक पुत्र शास्त्रोक्त कर्मों में तत्पर न हो किन्तु अधर्मादि कर्मों में प्रवृत्त हो निषेध करने पर भी न माने उलटा वेदविरोधी वेद को डुबाने वाला हो उस के लिये दक्षिणाग्र फैलाये कुशों वा लोहित तृणों पर एक जल से भरे मट्टी के पात्र को बायें पग से ढरका देवें ॥१०॥ चोटी तथा शिर के बाल खोलें बिखेरें हुए अपसव्य करके कुटुम्बी लोग उस जल पात्र ढरकाने वाले का अन्वारम्भ (कुशों द्वारा वा दहिने हाथ से स्पर्श) करें । फिर निरपेक्ष घर को लौट आवें इस के उपरान्त उस के साथ धर्म का व्यवहार रखते वा उस को धर्माचरण कराते हुए कुछ भी आचरण न करें (यह जीवित ही उस को तिलाञ्जलि देने की रीति दिखायी है) ॥ ११ ॥ यदि धर्म से पतित हुए उक्त प्रकार के मनुष्य प्रायश्चित्त कर लें तो उन के साथ ऐसा न करके जाति में मिला लेना चाहिये ॥१२॥ इस पर श्लोक का प्रमाण भी कहते हैं कि ॥१३॥ अन्यों का उद्धार वा उपकार करने वालों में क्रीड़ा करता तथा हंसता आनन्द मानता हुआ सा सब से आगे चले और किसी को पतित करते नीचे गिराते हुओं में शोक मनाता और रोता हुआ सा सब से पीछे चले ॥ १४ ॥ गुरु, माता, और पिता को जो ताड़ना करें उन का प्रायश्चित्त

६२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

प्रत्यापत्तिः ॥ १५॥ पूर्णाब्दात् प्रवृत्ताद्वा काञ्चनं पात्रं माहेयं वा पूरयित्वाऽऽपोहिष्ठेति मन्त्रेणाद्भिरभिषिञ्चति ॥ १६ ॥ स- र्व्वएवाभिषिक्तस्य प्रत्युद्धारः पुत्रजन्मना व्याख्यातो व्याख्यात इति ॥ १७ ॥ इति श्रीवासिष्ठे धर्मशास्त्रे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ अथ व्यवहाराः ॥ १॥ राजमन्त्री सदःकार्याणि कुर्य्यात् ॥ २ ॥ द्वयोर्विवदमानयोर्न पक्षान्तरं गच्छेत् ॥ ३ ॥ यथास- नमपराधो ह्यन्ते नापराधः ॥४॥ समः सर्व्वेषु भूतेषु यथासन- मपराधो ह्याद्यवर्णयोर्विद्यान्ततः ॥५॥ संपन्नं च रक्षदुराज- बालधनान्यप्राप्तव्यवहाराणां प्राप्तकाले तु तद्दद्यात् ॥६॥ लिखितंसाक्षिणोभुक्तिः प्रमाणंत्रिविधंस्मृतम् ।

गुरु आदि की प्रसन्नता से वा भय से निम्नलिखित जानो ॥ १५ ॥ वर्ष की समाप्ति के दिन से वा नये संवत्सर के आरम्भ से व्रत का प्रारम्भ करके सु- वर्ण के वा मट्टी के पात्र को जल से भर के उस से अपना अभिषेक (आपो- हिष्ठा०) मन्त्र पढ़ २ कुशों द्वारा तब तक करे ॥ १६ ॥ कि जब तक उस पात्र का सब जल अभिषेक में चुक जावे इसी से उस के पाप का उद्धार हो जाता है । जिस का व्याख्यान पुत्र जन्म के साथ किया गया जानो ॥ १७ ॥ यह श्रीवासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में पन्द्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१५॥

अब व्यवहारों की व्यवस्था कहते हैं ॥ १ ॥ राजा का मन्त्री (दीवान) सभा के कार्य करे ॥ २ ॥ विवाद करने वाले मुद्दई मुद्दाले दोनों में से किसी एक के पक्ष की ओर न झुके ॥ ३॥ धनादि के लोभ से एक पक्ष में झुकना अ- पराध है । पक्षपात के त्याग में अपराध नहीं है ॥ ४ ॥ न्याय कर्त्ता सब प्रा- णियों पर समदृष्टि रक्खे एक का पक्ष करने में पाप लगता है। ब्राह्मण क्ष- त्रिय दोनों वर्षों के न्याय में विद्या पुस्तकों द्वारा विचार करे ॥ ५ ॥ छोटे राजाओं के न रहने पर व्यवहार की मर्यादा से अनभिज्ञ (नाबालिग) राज पुत्रों की धन सम्पत्तियों की रक्षा करता हुआ उन के समर्थ ( १८ वर्ष के ) हो जाने पर उन की सम्पत्ति सौंप देवे ॥ ६ ॥ समन्मुख का लेख होना, कोई

भाषार्थसहिता ॥ ६३

धनस्वीकरणपूर्व्वं धनीधनमवाप्नुयात्,इति ॥ ७ ॥

मार्गक्षेत्रयोर्विसर्गे तथा परिवर्तनेन तरुणगृहेष्वर्थान्त- रेषु त्रिपादमात्रम् ॥ ८॥ गृहक्षेत्रविरोधे सामन्तप्रत्ययः॥६॥ सामन्तविरोधे लेख्यप्रत्ययः ॥ १० ॥ प्रत्यभिलेख्यविरोधे ग्रा- मनगरवृद्धश्रेणिप्रत्ययः ॥ ११ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ १२ ॥ पैतृकंक्रीतमाधेयमन्वाधेयंप्रतिग्रहम् । यज्ञादुपगमोवेणिस्तथाधूमशिखाष्टमी,इति ॥१३ ॥ तत्रभुक्तानुभुक्तदशवर्षम् ॥ १४॥ अन्यथाऽप्युदाहरन्ति॥१५॥ आधिःसीमाबालधनं निक्षेपोपनिधिःस्त्रियः ।


साक्षी ( गवाहों ) का होना, और भोग होना, यह तीन प्रकार का प्रमाण विवाद के निर्णय में अपेक्षित है। धन लेने वाला ऋणी प्रथम स्वीकार करे तो धनी को उस का धन दिलाया जावे ॥७॥ मार्ग तथा खेत के छोड्ने तथा बदलने से नये घरों में अर्थान्तर करलेने पर अर्थात् घर के स्थान में खेत वा खेत की जगह घर हो जाने पर घर वाले को उस का तीन भाग मूल्य मिले ॥ ८ ॥ घर और खेत के विवाद में विरोध होतो सामन्त ( नंबरदार ) की बात मानी जाय ॥६॥ कई नम्बरदार हों और वे परस्पर विरुद्ध कहें तो लेख जिस का मिले वह माना जाय ॥१०॥ लेख में भी विरोध होतो गांव तथा नगर के वृद्ध लोगों की बात ठीक मानी जाय ॥११॥ इस पर भी श्लोक प्रमाण कहते हैं कि ॥१२॥ जिसके पिताका हो, जिसने खरीदा हो, जिसने स्थापित किया, जिसने जीर्णोद्धार किया, जिसको दान में मिला, यज्ञ की दक्षिणा में जिसको मिला, जिसकी हद्द में हो और कोइलादि चिन्ह मिलें। ये आठ रीति निर्णय करने की हैं कि जिसके पिता का होना आदि सिद्ध हो वह वस्तु उसी का जानो ॥१३॥ अन्यके पदार्थ को भी जिसने दश वर्ष तक भोगा तथा फिर२ भोग किया तब उसी का होजाता है ॥ १४ ॥ इस पर अन्य प्रकार से भी श्लोक प्रमाण कहते हैं कि ॥ १५ ॥ गिर्वी रक्खा वस्तु, सीमा,बालक का धन,गिनाय के दिया वा ताले में बन्द बक्सादि में रक्खा धरोहर, स्त्रियां, ( दासी ) राजा का धन और वेदपाठी का धन ये सब जिसके यहां बहुत काल भी रहें तो भी अन्य के काम में

६४ वसिष्ठस्मृतिः ॥

राजस्वंश्रोत्रियद्रव्यं नसंभोगेनहीयन्ते ॥ १६ ॥
प्रहाणद्रव्याणि राजगामीनि भवन्ति ॥ १७ ॥ ततोऽन्य-
था राजा मन्त्रिभिः सह नागरैश्च कार्याणि कुर्य्यात् ॥१८॥
वेधसो वा राजा श्रेयान् गृध्रपरिवारं स्यात् ॥ १६ ॥ गृध्रप-
रिवारं वा राजा श्रेयान् ॥ २० ॥ गृध्रपरिवारं स्यान्न गृध्रो
गृध्रपरिवारं स्यात् परिवाराद्धि दोषाः प्रादुर्भवन्ति स्तेयहार-
विनाशनं तस्मात् पूर्वमेव परिवारं पृच्छेत् ॥२१॥ अथ सा-
क्षिणः ॥ २२॥ श्रोत्रियोरूपवान् शीलवान् पुण्यवान् सत्यवा
न् साक्षिणः सर्वेषु सर्वएव वा ॥ २३ ॥
स्त्रीणांसाक्ष्यंस्त्रियःकुर्यु र्द्विजानांसदृशाद्विजोः ।
शूद्राणांसन्तःशूद्रांश्च,अन्त्यानामन्त्ययोनयः ॥ २४ ॥
अथाप्युदाहरन्ति ॥ २५ ॥
प्रातिभाव्यंवृथादानं साक्षिकंशौरिकंचयत् ।


छाने मात्र से ये अन्य के नहीं हो जाते हैं ॥ १६ ॥ जिसका कोई दायभागी न हो ऐसे नष्ट हुए मनुष्य का धन राजा के काम में जाना चाहिये ॥ १७ ॥ तिससे अन्य प्रकार राजा मन्त्रियों और नगर के सभ्य मनुष्यों के साथ राज कार्यों को करे ॥ १८ ॥ अथवा गीध पक्षी के समान परिवारवाला राजा विधाता से भी अच्छा होता है । इससे गृध्रपरिवार हो ॥१९॥ गृध्रपरिवार राजा कल्याणकारी है ॥२०॥ गृध्रपरिवार हो पर लालची न हो उदार प्रकृति रहे । लालची परिवार से ही चोरी लूट और विनाशादि दोष होते हैं इससे पहिले ही सब कामों में भाई बन्धुओं की सलाह सम्मति पूछकर काम करे ॥ २१ ॥ अब साक्षियों के विषय का विचार करते हैं ॥ २२ ॥ वेद पाठी, सुरूपवान्, सुशील, पुण्यात्मा, सत्यवादी, सब वर्णों में से साक्षी किये जावें वा सभी प्रकार के साक्षी हों तो बुरों से अच्छों की परीक्षा होगी ॥ २३ ॥ स्त्रियों की गवाही स्त्रियां ही देवें । तथा द्विजों के साक्षी उन्हीं २ के तुल्य द्विज होवें । शूद्रों के साक्षी अच्छे प्रतिष्ठित शूद्र और अन्त्यजों के गवाह भी अन्त्यज ही होने चाहिये ॥२४॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि ॥ २५ ॥ किसी की जामिनी करना, किसी को व्यर्थ देने की प्रतिज्ञा, साक्षी, द्यूत सम्बन्धी, दण्ड (जुर्माना)

भाषाथंसंहिता ॥ ६५

दण्डशुल्कावशिष्टंच नपुत्रोदातुमर्हति, इति ॥ २६ ॥
ब्रूहिसाक्षिन्यथातत्त्वं लम्बन्तेपितरस्तव ।
तववाक्यमुदीक्षाणाउत्पतन्तिपतन्तिच ॥ २७ ॥
नग्नोमुण्डःकपालीच भिक्षार्थीक्षुत्पिपासितः ।
अन्धःशत्रुकुलेगच्छेद्यःसाक्ष्यमनृतंवदेत् ॥ २८ ॥
पञ्चपश्वनृतेहन्ति दशहन्तिगवानृते ।
शतमश्वानृतेहन्ति सहस्त्रंपुरुषानृते ॥ २९ ॥
व्यवहारेमृतेदारे प्रायश्चित्तंकुलस्त्रियाः ।
तेषांपूर्वपरिच्छेदाच्छिद्यन्तेऽत्रापवादिभिः ॥ ३० ॥
उद्वाहकालेरतिसंप्रयोगे प्राणात्ययेसर्वधनापहारे ।


और पिछला बाकी कर, इन सब पिताके प्रारम्भ किये कामों का पता के न रहने पर पुत्र उत्तर दाता नहीं है ॥२६॥ साक्षीसे न्यायाधीश वा अदालत की ओर से नियत हुआ वकील ऐसा कहे कि-हे साक्षिन् ! जैसा तुम जानते हो वैसा ठीक २ सत्य कहो क्योंकि तुम्हारे वाक्य की प्रतीक्षा करते (बाटदेखते) हुए तुम्हारे पितर लोग बीच में लटक रहे हैं । यदि तुम सत्य बोले तो उस सत्य के प्रभाव से तुम्हारे पितर लोग ऊपर के स्वर्गलोकों में प्राप्त हो जांयगे और यदि मिथ्या बोले तो नीचे नरक में गिराये जावेंगे ॥२७॥ आंखों से अन्धा होके नंगा, मुंड़ा हुआ, भूख प्यास से पीड़ित, खप्पर हाथ में लेकर भिक्षा मांगता हुआ शत्रु के घर पर जाकर वह पुरुष दीनता दिखाता है कि जो झूठी गवाही देवे ॥ २८ ॥ साक्षी वा मध्यस्थ पुरुष यदि अन्य पशुओं के विषय में मिथ्या कहे तो पांच, गौ के विषय में झूठ कहे तो दश, घोड़ा के विषय में मिथ्या कहे तो सौ १०० और मनुष्य के विषय में मिथ्या साक्षी देवे तो १००० एक सहस्त्र हत्या का अपराधी होता है ॥ २९ ॥ व्यवहार में, स्त्री के मरने पर और कुलस्त्री का प्रायश्चित्त इन का पूर्व से सम्बन्ध नष्ट किया जाय अर्थात् साथ में न रक्खा जाय तो निन्दक लोग उन सम्बन्धनाशकों का छेदन वा उपहास आक्षेपादि द्वारा करते हैं । अर्थात् व्यवहारादि में पूर्व (अमलियत) सत्य के साथ सम्बन्ध तोड़ना बड़ा पाप है ॥ ३० ॥ परन्तु कन्या के विवाह के लिये, मैथुन के विषय में, प्राण जाने के अवसरमें, सब धनका नाश होता

६६ | वसिष्ठस्मृतिः ॥

विप्रस्यचार्थेह्यनृतंवदेयुः पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥३१॥ स्वजनस्यार्थेयदि वार्थहेतोः पक्षाश्रयेणैववदन्तिकार्य्यम् । तेशब्दवंशस्यकुलस्यपूर्व्वान् स्वर्गस्थितांस्तानपिपातयन्ति, अपिपातयन्ति । इति ॥ ३२ ॥ इति वासिष्ठे धर्मशास्त्रे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

ऋणमस्मिन् सन्नयति अमृतत्वञ्चगच्छति । पितापुत्रस्यजातस्य पश्येच्चेज्जीवतोमुखम् ॥ १ ॥ (१) अनन्ताः पुत्रिणां लोका नापुत्रस्य लोकोऽस्तीति श्रूयते ॥ २ ॥ प्रजाः सन्त्वपुत्रिणइत्यभिशापः ॥ ३ ॥ प्रजाभिरग्नेऽमृतत्त्वमश्यामित्यपि निगमो भवति ॥ ४ ॥ पुत्रेणलोकाञ्जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते ।


हो वहां, और गौ ब्राह्मण की रक्षाके लिये इन पांच मौकों पर मनुष्य भले ही जानकर भी मिथ्या बोले क्योंकि ये पांचों मिथ्या भाषण पातकों में ऋषि लोगों ने नहीं कहे हैं ॥३१॥ जो लोग अपने स्त्री पुत्रादि के लिये, वा धनादि के लोभ से अथवा पक्षपात के हट से किसी काम को मिथ्या कहते हैं वे लोग वेद के अध्ययनादि जन्य पुण्य से स्वर्ग को प्राप्त हुये अपने पूर्व्वजों को भी स्वर्ग से गिरा देते अर्थात् नरक में पहुंचाते हैं ॥ ३२ ॥ यह वासिष्ठ धर्मशास्त्र के भाषानुवाद में सोलहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१६॥

पिता यदि उत्पन्न हुए अपने जीवित पुत्र का मुख देखलेवे तो परंपरा से चले देव ऋषि पितरों के तीन ऋण चुकाने का भार पिता से उतर के पुत्र पर आजाता और पिता मोक्ष का अधिकारी वा मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ १ ॥ पुत्र वालों को अनन्त स्वर्गलोक प्राप्त होते हैं । निर्बंशी के लिये स्वर्ग प्राप्त नहीं होता यह श्रुति में लिखा है ॥२॥ "तेरी सन्तति वा कुल पुत्र हीन हो" यह शाप श्रुति में लिखा है इससे भी सिद्ध है कि सन्तति के बिना उस के कुल की अधोगति शाप से हो जाती है ॥ ३ ॥ "हे अग्ने ! मैं प्रजा नाम सन्तानों के द्वारा मोक्षानन्द को भोगूं" यह भी वेद मन्त्र का प्रमाण है इस से भी पुत्रोत्पत्ति से मोक्ष होना सिद्ध है ॥ ४ ॥ पुत्र के उत्पन्न होने से स्वर्गादि लोकों को जीत लेता, पौत्र के उत्पन्न होने से अनन्त सुख भोगता और पुत्र का पौत्र अर्थात् प्रपौत्र (पन्ती) उत्पन्न हो जाने से आदित्य मण्डल

भाषाधर्मसहिता ॥ ६१

अथपुत्रस्यपौत्रेण ब्रध्नस्याप्नोतिविष्टपम्,इति ॥ ५ ॥
क्षेत्रिणः पुत्रो जनयितुः पुत्रइति विवदन्ते ॥ ६ ॥ तत्रो-
भयथाप्युदाहरन्ति ॥ ७ ॥
यद्यन्यगोषुवृषभो वत्सानांजनयेच्छतम् ।
गोमिनामेवतेवत्सा मोघंस्यन्दितमार्षभम्,इति ॥ ८ ॥
अप्रमत्तारक्षततन्तुमेतं मावःक्षेत्रेपरबीजानिवाप्सुः ।
नजनयितुःपुत्रोभवतिसंपरायेमोघंवेत्ताकुरुतेतन्तुमेतमिति ॥६॥
बहूनामेकजाताना मेकश्चेत्पुत्रवान्नरः ।
सर्वेतेतेनपुत्रेण पुत्रवन्तइतिश्रुतिः ॥ १० ॥
बह्वीनामेकपत्नीनामेकापुत्रवतीयदि ।
सर्वास्तास्तेनपुत्रेण पुत्रवत्यइतिश्रुतिः ॥ ११ ॥


के स्वर्ग को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥ अन्य की स्त्री में जो अन्य पुरुष से पुत्र उत्पन्न होता है वह स्त्री वाले का पुत्र है वा बीज जिस का पड़ा उस का है इस पर दोनों पक्ष वाले विवाद करते हैं ॥६॥ उन में दोनों प्रकार के उदाहरण (प्रमाण) श्लोकों द्वारा देते हैं कि ॥ ७॥ यदि अन्य की गौओं में किसी का बैल सौ बछड़े भी पैदा करे तो वे सब बछड़े गौ वाले के होंगे। और बैल का वीर्य सेचन व्यर्थ ही होगा। अर्थात् बैल वाले को कुछ फल नहीं मिलेगा ॥ ८ ॥ हे मनुष्यो ! प्रमाद को छोड़ कर इस सन्तान की रक्षा करो तुम्हारे खेत (स्त्री) में अन्य लोग बीज न बोयें (तभी शुद्ध सन्तान होंगे। अन्य के बीज से खेत के दूषित हो जाने पर सन्तति बिगड़ जायगी, अर्थात् खेत की रक्षा द्वारा सन्तति की रक्षा करो) पैदा करने (बीज) वाले का पुत्र नहीं होता और अन्य के बीज से पैदा हुए पुत्र को जो क्षेत्र (स्त्री) वाला प्राप्त होता है वह जन्मान्तर में अपने डुबोने वाले को पुत्र बनाता है ॥ ९ ॥ एक पिता से उत्पन्न हुए अनेक भाइयों में एक भी पुत्रवान् हो तो उसी एक पुत्र से सब भाई पुत्र वाले हो जाते हैं यह श्रुति में लिखा है ॥१०॥ एक पुरुष की कई स्त्रियां हों तो उनमें एक स्त्री के उत्पन्न हुए पुत्र से सब पुत्र-वालीं हो जाती हैं क्योंकि वही एक उन सब पिता चाचाओं तथा सब माताओं के स्वत्त्व का दायभागी और पिण्ड देने वाला होगा ॥ ११ ॥ पुराने

द्वादशइत्येव पुत्राः पुराणदृष्टाः ॥१२॥ स्वयमुत्पादितः स्व-

६८ वसिष्ठस्मृतिः ॥

द्वादशइत्येव पुत्राः पुराणदृष्टाः ॥१२॥ स्वयमुत्पादितः स्व- क्षेत्रे संस्कृतायां प्रथमः ॥ १३ ॥ तदलाभे नियुक्तायां क्षेत्रजो द्वितीयः ॥ १४॥ तृतीयः पुत्रिका विज्ञायते ॥ १५ ॥ अभ्रातृका पुंसः पितॄनभ्येति प्रतीचीनं गच्छति पुत्रत्वम् ॥ १६ ॥ तत्र श्लोकः ॥ १७ ॥ अभ्रातृकांप्रदास्यामि तुभ्यंकन्यामलङ्कृताम् । अस्यांयोजायतेपुत्रः समेपुत्रोभवेदिति ॥ १८ ॥ पौनर्भवश्चतुर्थः ॥ १९ ॥ या कौमारं भर्त्तारमुत्सृज्यान्यैः सह चरित्वा तस्यैव कुटुम्बमाश्रयति सा पुनर्भूभवति ॥२०॥ या च क्लीबं पतितमुन्मत्तं वा भर्त्तारमुत्सृज्यान्यं पतिं विन्द- ते मृते वा सा पुनर्भूभवति ॥ २१ ॥ कानीनः पञ्चमः ॥ २२ ॥


लोगों ने वा पुराण ग्रन्थों में बारह ही प्रकार के पुत्र देखे जाने वा माने जाते हैं ॥१२॥ अपनी विवाहिता पत्नी में स्वयं उत्पन्न किया पहिला औरस ॥१३॥ औरस के न होने पर नियुक्त स्त्री में उत्पन्न किया द्वितीय क्षेत्रज ॥ १४ ॥ पुत्री में होने वाले सन्तान को अपना दायभागी स्वीकार करना तीसरा ॥१५॥ श्रुति वेद में लिखा है कि "जिस के कोई भाई नहीं होता ऐसी कन्या पति के घर जाकर पति के मेल से आप ही पुत्र भाव को प्राप्त होती और फिर उलटी आ कर पिता की दायभागिनी बनती तथा पिण्ड देके पिता को संसार से पार करती है"॥१६॥ उसमें श्लोक भी प्रमाण है ॥१७॥ कन्या का पिता वरसे कहता है कि विना भाई वाली वस्त्रों तथा आभूषणों से शोभित कन्या मैं तुम को दूंगा। इस कन्या में जो पुत्र उत्पन्न होगा वह मेरा पुत्र हो ॥१८॥ पुनर्भू (जिस ने पहिले पति को त्याग के अन्य पति कर लिया हो) से उत्पन्न प्रथम पतिका चौथा पौनर्भव पुत्र कहाता है ॥ १९ ॥ जो स्त्री अपने कुमारपति को त्याग कर अन्य पुरुषों के साथ सब प्रकार का व्यवहार करके उसी पहिले पति का फिर सहारा लेवे वह स्त्री पुनर्भू कहाती है ॥२०॥ और जो स्त्री नपुंसक पतित वा उन्मत्त हुए वा मर जाने पर अपने पति को त्याग के अन्य पति को प्राप्त होती वह भी पुनर्भू कहाती है ॥ २१ ॥ विवाह से पहिले कन्या में पैदा हुआ पांचवां कानीन पुत्र कहाता है ॥२२॥ जो विना विवाही पिता के घर में काम

भाषार्थसहिता ॥ ६९

या पितृगृहेऽसंस्कृता कामादुत्पादयेत्, मातामहस्य पुत्रो भ-
वतीत्याहुः ॥ २३ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ २४ ॥
अप्रत्तादुहितायस्य पुत्रंविन्देततुल्यतः ।
पुत्रीमातामहस्तेन दद्यात्पिण्डंहरेद्धनम् , इति ॥ २५ ॥
गृहे च गूढोत्पन्नः षष्ठः ॥ २६ ॥ इत्येते दायादा बान्ध-
वास्त्रातारो महतो भयादित्याहुः ॥ २७ ॥ अथादायादबन्धू-
नां सहोढएव प्रथमो या गर्भिणी संस्क्रियते तस्यां जातः
सहोढः पुत्रो भवति ॥ २८ ॥ दत्तको द्वितीयो यं मातापितरौ
दद्याताम् ॥२९॥ क्रीतस्तृतीयस्तच्छुनःशेपेन व्याख्यातम् ॥३०॥
हरिश्चन्द्रो हवै राजा सोऽजीगर्तस्य सौयावसेः पुत्रं चिक्राय
॥ ३१ ॥ स्वयं क्रीतवान् स्वयमुपागतश्चतुर्थः, तच्छुनःशेपेन
व्याख्यातम् ॥ ३२ ॥ शुनःशेपो हवै यूपे नियुक्तो देवतास्तु-


वश होकर किसी से पुत्र को उत्पन्न करे वह कानीन अपने मातामह—नाना का पुत्र होता ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥२३॥ और भी श्लोक का प्रमाण कहते हैं कि॥ २४ ॥ बिना विवाही जिस की पुत्री अपने तुल्य पुरुष से पुत्र को प्राप्त होतो नाना उस पुत्र से पुत्र वाला हो जाता है वह कानीन पुत्र अपने नाना का पिण्डदान करे और धन का दायभागी (वारिस) बने ॥ २५ ॥ अपने घर में गुप्त रूप से उत्पन्न हुआ गूढोत्पन्न छठा पुत्र है ॥२६॥ ये छहों पुत्र पिता के धन के दायभागी और बड़े भय से बचाने वाले हैं ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥ २७ ॥ अब अदायाद (जो पिता के धन में हक़दार नहीं उन) पुत्रों में पहिला सहोढ कहाता है। जो स्त्री गर्भवती हो तब जिस के साथ गर्भिणी का विवाह हो उस स्त्री से उत्पन्न हुआ सहोढ पुत्र होता है ॥२८॥ माता पिता ने जिस को दे दिया वह उस का द्वितीय दत्तक पुत्र कहाता है ॥२९॥ धन देकर मोल लिया तीसरा क्रीत पुत्र कहाता है कि जैसे शुनःशेप ऋषि हुए ॥३०॥ हरिश्चन्द्र नामक राजा हुआ था उस ने सूयवस के सन्तान अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप को द्रव्य देकर खरीद लिया ॥ ३१ ॥ स्वयं राजा ने खरीदा और शुनःशेप अपनी इच्छा से स्वयं राजा के निकट आगया इस से चौथा क्रीत पुत्र शुनःशेप के साथ व्याख्यात जानो ॥ ३२ ॥ फिर शुनःशेप यज्ञ के यूपस्तम्भ में बांधा गया, वहां उस ने मन्त्रों द्वारा देवता

१० वसिष्ठस्मृतिः ॥

ष्टाव, तस्येह देवताः पाशं विमुमुचुः, तमृत्विजऊचुर्ममैवार्यं पुत्रोऽस्त्विति,तान् ह न संपेदे ते संपादयामासुरेषएव यं कामयेत तस्य पुत्रोऽस्त्विति, तस्य ह विश्वामित्रो होताऽऽसीत्तस्य पुत्रत्वमियाय ॥ ३३ ॥ अपविद्धः पञ्चमो यं मातापितृभ्यामपास्तं प्रतिगृह्णीयात् ॥ ३४ ॥ शूद्रापुत्रएव षष्ठो भवतीत्याहुः ॥ ३५ ॥ इत्येतेऽदायादा बान्धवाः ॥३६॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ३७ ॥ यस्य पूर्वेषां षष्णां न कश्चिद्दायादः स्यादेते तस्य दायं हरेरन्निति ॥ ३८ ॥ अथ भ्रातॄणां दायविभागः ॥ ३९ ॥ द्व्यंशं ज्येष्ठो हरेद्,गवाश्वस्य चानुदशमम् ॥ ४० ॥ अजावयो गृहं च कनिष्ठस्य ॥४१॥ कार्ष्णायसं गृहोपकरणानि च मध्यमस्य ॥४२॥ मातुः पारिणेयं स्त्रियो विभजेरन्॥४३॥


ओं की स्तुति की, इस संसार में उस शुनःशेप को देवताओं ने बन्धनों से मुक्त किया, उस यजमान राजा से ऋत्विज् लोगों ने पृथक् कहा कि यह मेरो पुत्र हो जाय यह मेरा हो इत्यादि । उन ऋत्विजों के पास शुनःशेप नहीं गया, तब ऋत्विजों ने यह सिद्धान्त स्थिर किया कि यह बालक हम सब में जिस के पास रहने की कामना करे उसी का पुत्र हो जाय । उस राजा हरिश्चन्द्र के यज्ञ में ऋग्वेदी काम के सात होताओं में प्रधान होता ऋत्विज् ब्रह्मर्षि विश्वामित्र हुए थे उन का पुत्र शुनःशेप बना ॥ ३३ ॥ जिस को माता पिता ने त्याग दिया वा फेंक दिया उस को जो लाकर रक्षा करे उस का वह पांचवां अपविद्ध पुत्र कहाता है ॥ ३४ ॥ और शूद्रा का पुत्र छठा होता है ॥ ३५ ॥ ये छः अदायाद पुत्र हैं ॥ ३६ ॥ और भी ऋषि लोग कहते हैं कि ॥ ३७ जिस पुरुष के पूर्व कहे औरसादि छहों में से कोई भी दाय भागी पुत्र न हो उस के धन को ये छहों ले सकते हैं ॥३८॥ अब भाइयों का दायभाग दिखाते हैं ॥ ३९ ॥ ज्येष्ठ भाई दो हिस्सा लेवे और गौ घोड़ों में से दशवां हिस्सा अधिक लेवे ॥ ४० ॥ भेड़ बकरी और घर इन के दो भाग छोटा भाई लेवे ॥ ४१ ॥ लोहादि काले वस्तु तथा घर के अन्य सामान को मंझला भाई दो भाग लेवे ॥ ४२ ॥ माता के पास अपने विवाह के समय का जो आभूषणादि होवें उन में सब बहुओं को बराबर भाग मिले ॥ ४३ ॥

भाषार्थसहिता ॥ ३९

यदि ब्राह्मणस्य ब्राह्मणीक्षत्रियावैश्यासु पुत्राः स्युस्त्र्यं- शं ब्राह्मण्याः पुत्रो हरेत, द्व्यंशं राजन्यायाः पुत्रः सम- मितरे विभजेरन् ॥४४॥ येन चैषां स्वयमुत्पादितं स्याद् द्व्यंश मेव हरेत् ॥ ४५ ॥ अनंशास्त्वाश्रामान्तरगताः ॥ ४६ ॥ क्लीवो- न्मत्तपतिताश्च ॥ ४७ ॥ भरणं क्लीवोन्मत्तानाम् ॥४८॥ प्रेत- पत्नी षण्मासान् व्रतचारिण्यक्षारलवणं भुञ्जानाऽधःशयीतो- र्ध्वं षड्भ्यो मासेभ्यः स्नात्वा श्राद्धं च पत्ये दत्त्वा विद्याकर्म गुरुयोनिसंबन्धान् सन्निपात्य पिता भ्राता वा नियोगं कार- येत्तपसे ॥४९॥ न सोन्मत्तामवशां व्याधितां वा नियुञ्ज्यात् ॥५०॥ ज्यायसीमपि षोडशवर्षाणि, नचेदामयावी स्यात्॥५१॥

यदि ब्राह्मण की ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्या ये तीनों वर्ण की विवाहित स्त्रियां हों और उन सब में पुत्र उत्पन्न हुए हों तो तीन भाग ब्राह्मणी के पुत्र को, दो भाग क्षत्रिया के पुत्र को मिलें और बाकी बचे पुत्र बराबर भाग बांट लेवें ॥ ४४ ॥ इन पुत्रों में से जिस ने जितना धनादि स्वयं पैदा किया हो उस में से भी वह दो ही भाग लेवे ॥ ४५ ॥ गृहाश्रम से भिन्न आश्रम में गये भाई लोग पिता के धन में दायभागी नहीं हैं ॥ ४६ ॥ नपुंसक, उन्मत्त ( पागल ) और पतित भाई भी दायभागी नहीं हैं ॥ ४७ ॥ नपुंसक और उन्मत्तों को भी भोजन वस्त्र मिलना चाहिये ॥ ४८ ॥ मरे हुए पुरुष की पत्नी छः महिने तक खार और लवण को छोड़ कर हविष्य भोजन करती हुई व्रत करके पृथ्वी पर सोवे छः महिने के उपरान्त स्नान कर पति का श्राद्ध करके, पति को विद्या पढ़ाने और कर्म कराने वाले गुरु लोगों और पति के भाई आदि की सभा करके सबकी राय होतो स्त्री के लिये सन्तान की विशेष अपेक्षा होने पर स्त्री का पिता वा भाई तप के लिये नियोग करा देवे ( कि उत्पन्न हुआ सन्तान मृत पिता का स्थानापन्न होकर श्राद्धादि कर्म रूप तप करेगा ) ॥४९॥ यदि वह मृत पुरुष की पत्नी उन्मत्त ( पागल ) स्वेच्छा चारिणी अथवा रोगिणी होतो वह पितादि नियोग न करावे ॥ ५० ॥ यदि उन्मत्तादि न हो किन्तु श्रेष्ठ हो तो भी सोलह वर्ष की आयु से पहिले नियोग न करावे । और जिस से नियोग कराना चाहे वह भी रोगी न हो ॥ ५१ ॥ नियुक्त पु-

७२ वसिष्ठस्मृतिः ॥

प्राजापत्ये मुहूर्त्ते पाणिग्राहवदुपचरेत् ॥ ५२ ॥ अन्य- त्र संप्रहास्याद् वाक्पारुष्याद् दण्डपारुष्याच्च ॥ ५३॥ ग्रासा- च्छादनस्नानानुलेपनेषु प्राग्गामिनी स्यात् ॥ ५४ ॥ अनि- युक्तायामुत्पन्न उत्पादितुः पुत्रो भवतीत्याहुः ॥ ५५ ॥ स्या- च्चेन्नियोगिनो रिक्थम् ॥ ५६॥ लोभान्नास्ति नियोगः ॥ ५७ ॥ प्रायश्चित्तं वाऽप्युपनियुञ्ज्यादित्येके ॥५८ ॥ कुमार्यृतुमती त्रीणि वर्षाण्युपासीतोर्ध्वं त्रिभ्यो वर्षेभ्यः पतिं विन्देत्तुल्यम् ॥ ५९ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ६० ॥ पितुःप्रमादान्नुयदीहकन्या वयःप्रमाणंसमतीत्यदीयते । साहन्तिदातारमुदीक्षमाणा कालातिरिक्तागुरुदक्षिणेव ॥६१॥ प्रयच्छेन्नग्निकांकन्यामृतुकालभयात्पिता ।

रुप चार घड़ी रात रहे विवाहित पति के तुल्य नियुक्ता स्त्री से व्यवहार करे ॥ ५२ ॥ परन्तु स्त्री के साथ उपहास वा किसी प्रकार की बात चीत न करे । न धमकावे और किसी अनुचित को देख कर मृत पति के तुल्य नियुक्त पुरुष को पीटने का भी अधिकार नहीं है ॥ ५३ ॥ भोजन वस्त्र स्नान और अनुलेपन इन कामों में पूर्व मृत पति के ध्यान से चलने वाली हो अर्थात् नियुक्त को पति मान भोजनादि न करे ॥५४॥ नियुक्त न हुई अन्य की स्त्री में उत्पन्न किया पुत्र उत्पादक पुरुष का होगा ऐसा ऋषि लोग कहते हैं ॥५५॥ यदि नियुक्ता स्त्री में उत्पन्न पुत्र भी उत्पादक का हो तो वह नियुक्त पिता के धन का भागी होगा ॥ ५६ ॥ काम भोगादि के लालच से नियोग नहीं है ॥ ५७ ॥ लोभ से नियोग करने में कोई आचार्य प्रायश्चित्त करना कहते हैं ॥ ५८॥ यदि पिता वा भाई कन्या का विवाह न करें और वह ऋतुमती (रजस्व- ला ) होने लगे तो तीन वर्ष तक रजस्वला होती हुई पितादि की बाट देखे । तीन वर्ष के उपरान्त अपने तुल्य योग्य वर से स्वयं विवाह कर लेवे ॥ ५९ ॥ इस पर श्लोकों का भी प्रमाण कहते हैं कि ॥ ६० ॥ गृहस्थाश्रम में पिता के प्रमाद से यदि कन्या ऋतुमती होने पर विवाही जाती है तो वह कन्या विवाह की बाट देखती हुई कन्यादान करने वाले का नाश करती है । जैसे कि देने का समय निकल जाने पर गुरु को दी दक्षिणा शिष्य का नाशक करती है ॥ ६१ ॥ रजस्वला होने का अवसर आने से पहिले ऋतुमती होने के भय