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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages
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खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९७


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
स गर्भोऽपां पञ्चमः परिणामविशेष आहुतिकर्मसमवायिनीनां श्रद्धाशब्दवाच्यानामुल्बावृत उल्वेन जरायुणावृतो वेष्टितो दश वा नव वा मासानन्तर्मातुः कुक्षौ शयित्वा यावद्वा यावता कालेन न्यूनेनातिरिक्तेन वाथानन्तरं जायते।आहुतिकर्मसे सम्बद्ध 'श्रद्धा' शब्दवाच्य जलका पञ्चम परिणाम-विशेष वह गर्भ उल्बावृत—उल्ब अर्थात् जरायुसंज्ञक गर्भवेष्टन चर्मसे आवृत-वेष्टित हुआ दश या नौ मासतक अथवा जितने भी न्यून या अधिक समयमें पूर्णान्न हो, माताकी कुक्षिमें शयन करनेके अनन्तर फिर उत्पन्न होता है।
उल्बावृत इत्यादि वैराग्यहेतोरिदमुच्यते। कष्टं हि मातुः कुक्षौ मूत्रपुरीषवातपित्तश्लेष्मादिपूर्णे तदनुलिप्तस्य गर्भस्योल्वाशुचिपटावृतस्य लोहितरेतोऽशुचिबीजस्य मातुरशितपीतरसानुप्रवेशेन विवर्धमानस्य निरुद्धशक्तिबलवीर्यतेजः प्रज्ञाचेष्टस्य शयनम्। ततो योनिद्वारेण पीड्यमानस्य कष्टतरा निःसृतिर्जन्मेति वैराग्यं ग्राहयति। मुहूर्तमप्यसह्यं दश वा नव वाउल्बावृत इत्यादि यह सब कथन वैराग्यके लिये है। उल्बरूप अपवित्र वस्त्रसे लिपटे हुए, रज और वीर्यरूप अपवित्र बीजवाले, माताके खाये-पीये पदार्थोंके रसके प्रवेशसे बढ़नेवाले तथा जिसके शक्ति, बल, वीर्य, तेज, बुद्धि और चेष्टा—ये सब निरुद्ध (अविकसित) रहते हैं उस गर्भका माताकी मल-मूत्र-वात-पित्त एवं कफादिसे भरी हुई कुक्षिमें शयन करना कष्टमय ही है। उससे भी अधिक कष्टप्रद योनिद्वारसे पीडित हुए गर्भका बाहर निकलनारूप जन्म है; इस प्रकार श्रुति वैराग्यका ग्रहण कराती है। इसके सिवा जो एक मुहूर्त्तके लिये भी असह्य है उस मातृकुक्षिमें दश या नौ मासके

४९८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५

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४९८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५


| मासानतिदीर्घकालमन्तः शयि- | दीर्घकालपर्यन्त शयन करनेके अनन्तर [ जन्म लेना भी वैराग्यका ही हेतु है ] ॥ १ ॥ | | त्वेति च ॥ १ ॥ | |

— : ० : —

स जातो यावदायूषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः संभूतो भवति ॥ २॥

इस प्रकार उत्पन्न होनेपर वह आयुपर्यन्त जीवित रहता है। फिर मरनेपर कर्मवश परलोकको प्रस्थित हुए उस जीवको अग्निके प्रति ही ले जाते हैं, जहाँसे कि वह आया था और जिससे उत्पन्न हुआ था ॥२॥

| स एवं जातो यावदायूषं पुनः | इस प्रकार उत्पन्न हुआ वह जबतक आयु होती है घटीयन्त्रके समान पुनः-पुनः आवागमनके लिये | | पुनर्घटीयन्त्रवद्गमनागमनाय कर्म | | | कुर्वन्कुलालचक्रवद्वा तिर्यग्भ्रम- | अथवा कुलालचक्रके समान चारों ओर चक्कर काटनेके लिये कर्म करता हुआ कर्मद्वारा जितनी आयु | | णाय यावत्कर्मणोपात्तमायुस्ताव- | प्राप्त की होती है उतना जीवित रहता है। फिर जिसकी आयु क्षीण | | ज्जीवति । तमेनं क्षीणायुषं प्रेतं | हो गयी है ऐसे इस प्रेत—मृत एवं | | मृतं दिष्टं कर्मणा निर्दिष्टं पर- | दिष्ट—कर्मद्वारा परलोकके प्रति नियुक्त किये हुए इस जीवको—क्योंकि यदि वह जीवित रहता तो | | लोकं प्रति यदि चेज्जीवन्वौदिके | कर्म अथवा ज्ञानका अधिकारी होता अतः उस मरे हुए प्राणीको यहाँसे—इस ग्रामसे ऋत्विक् अथवा | | कर्मणि ज्ञाने वाधिकृतस्तमेनं | | | मृतमितोऽस्माद्ग्रामादग्नयेऽग्न्य- | | | र्थमृत्विजो हरन्ति पुत्रा वान्त्य- | |

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खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९९


| कर्मणे । यत एवेत आगतोऽग्नेः सकाशाच्छ्रद्धाद्याहुतिक्रमेण, यतश्च पञ्चम्योऽग्निभ्यः संभूत उत्पन्नो भवति, तस्मा एवाग्नये हरन्ति स्वामेव योनिमग्निमापादयन्तीत्यर्थः ॥ २ ॥ | पुत्रगण अन्त्येष्टि कर्मके लिये अग्निके प्रति ले जाते हैं, जिस अग्निसे कि श्रद्धा आदि आहुतियोंके क्रमसे वह यहाँ आया था तथा जिन पाँच अग्नियोंसे वह उत्पन्न होता है, उस अग्निके प्रति ही वे इसे ले जाते हैं। तात्पर्य यह है कि उसे अपनी योनिभूत अग्निको ही प्राप्त करा देते हैं ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥

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दशम खण्ड

—: ० :—

प्रथम प्रश्नका उत्तर

वेत्थ यदितोऽधि प्रजा प्रयन्तीत्ययं प्रश्नः प्रत्युपस्थितोऽपाकर्त्तव्यतया ।अब, 'क्या तू जानता है कि इस लोकसे परे प्रजा कहाँ जाती है ?' ऐसा यह प्रश्न निराकरणके लिये प्रस्तुत किया जाता है ।

तद्य इत्थं विदुः। ये चे मेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते तेऽर्चिषमभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमपूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासाँस्तान् ॥ १ ॥
मासेभ्यः संवत्सरग्ँ संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवयानः पन्था इति ॥ २ ॥

वे जो कि इस प्रकार जानते हैं तथा वे जो कि वनमें श्रद्धा और तप इनकी उपासना करते हैं [ प्राणप्रयाणके अनन्तर ] अर्चिके अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं; अर्चिके अभिमानी देवताओंसे दिवसाभिमानी देवताओंको; दिवसाभिमानियोंसे शुक्लपक्षाभिमानी देवताओंको; शुक्लपक्षाभिमानियोंसे जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तरकी ओर जाता है, उन छः महीनोंको ॥ १ ॥ उन महीनोंसे संवत्सरको; संवत्सरसे आदित्यको; आदित्यसे चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होते हैं। वहाँ एक अमानव पुरुष है, वह उन्हें ब्रह्म ( कार्यब्रह्म ) को प्राप्त करा देता है। यह देवयानमार्ग है ॥ २ ॥

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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५०१


| [गृहस्थेषु विदुषामुत्तरमार्गः कर्मिणां च दक्षिणमार्ग इति स्थापनम्]<br><br>तत्तत्र लोकं प्रत्युत्थितानामधिकृतानां गृहमेधिनां य इत्थमेवं यथोक्तं पञ्चाग्निदर्शनं द्युलोकाद्यग्निभ्यो वयं क्रमेण जाता अग्निसस्वरूपाः पञ्चाग्न्यात्मान इत्येवं विदुर्जानीयूः ।<br><br>कथमवगम्यत इत्थं विदुरिति गृहस्था एवोच्यन्ते नान्य इति ?<br><br>गृहस्थानां ये त्वनित्थंविदः केवलेष्टापूर्तदत्तपरास्ते धूमादिना चन्द्रं गच्छन्तीति वक्ष्यति । ये चारण्योपलक्षिता वैखानसाः परिव्राजकाश्च श्रद्धा तप इत्युपासते तेषां चेत्थंविद्भिः सहार्चिरादिना गमनं वक्ष्यति पारिशेष्यादग्निहोत्राहुतिसंबन्धाच्च गृहस्था एव गृह्यन्त इत्थं विदुरिति । | वहाँ इस लोकके प्रति उत्थित हुए अधिकारी गृहस्थोंमें जो इस प्रकार यानी उपर्युक्त पञ्चाग्निविद्याको जानते हैं अर्थात् जो ऐसा समझते हैं कि द्युलोकादि अग्नियोंसे क्रमशः उत्पन्न हुए हमलोग अग्नित्वरूप यानी पञ्चाग्निमय हैं [ वे अर्चिके अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं ] ।<br><br>शङ्का—'इत्थं विदुः' इस [सामान्य निर्देश] से यह कैसे जाना गया कि यहाँ गृहस्थोंके विषयमें ही कहा गया है, औरोंके लिये नहीं ?<br><br>**समाधान—**गृहस्थोंमें जो ऐसा जाननेवाले नहीं हैं, बल्कि केवल इष्टापूर्त्त एवं दत्त कर्मोंमें ही लगे रहते हैं वे धूमादिके द्वारा चन्द्रमाको ही प्राप्त होते हैं—ऐसा श्रुति आगे कहेगी; तथा जो 'अरण्य' पदसे उपलक्षित वानप्रस्थ एवं संन्यासी 'श्रद्धा और तप' इनकी उपासना करते हैं उनका तो इस प्रकार जाननेवालोंके साथ गमन करना श्रुति आगे कहेगी; अतः परिशेषसे और अग्निहोत्रकी आहुतियोंका सम्बन्ध होनेके कारण भी 'इत्थं विदुः' इस कथनसे गृहस्थोंका ही ग्रहण होता है । |

५०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

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५०२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| ननु ब्रह्मचारिणोऽप्यगृहीता ग्रामश्रुत्यारण्यश्रुत्या चानुपलक्षिता विद्यन्ते कथं पारिशेष्यसिद्धिः । | शङ्का— जिनका ग्रामश्रुति और अरण्यश्रुति दोनोंहीसे ग्रहण नहीं होता वे ब्रह्मचारी लोग भी तो रह जाते हैं; फिर तुम्हारे परिशेषकी सिद्धि कैसे हो सकती है ? | | नैष दोषः, पुराणस्मृतिप्रामाण्यादूर्ध्वरेतसां नैष्ठिकब्रह्मचारिणामुत्तरेणार्यम्णः पन्थाः प्रसिद्धः। अतस्तेऽप्यरण्यवासिभिः सह गमिष्यन्ति । उपकुर्वाणकास्तु स्वाध्यायग्रहणार्था इति न विशेषनिर्देशार्हाः । | समाधान— यह कोई दोष नहीं है, पुराण और स्मृतियोंसे ऊर्ध्वरेता नैष्ठिक ब्रह्मचारियोंका सूर्यसम्बन्धी उत्तर मार्ग प्रसिद्ध है, अतः वे भी अरण्यवासियोंके साथ ही जायँगे। तथा उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी तो स्वाध्यायग्रहणके लिये होते हैं; अतः वे विशेष निर्देशके योग्य नहीं हैं। | | ननूर्ध्वरेतस्त्वं चेदुत्तरमार्गप्रतिपत्तिकारणं पुराणस्मृतिप्रामाण्यादिष्यत इत्थं वित्त्वमनर्थकं प्राप्तम् । | शङ्का— यदि पुराण और स्मृतियोंकी प्रमाणतासे उत्तरायणकी प्राप्तिका कारण ऊर्ध्वरेता होना माना जाता है तब तो इस प्रकार पञ्चाग्निविद्याका ज्ञान व्यर्थ सिद्ध होता है ? | | न; गृहस्थान्प्रत्यर्थवत्त्वात् । | समाधान— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि गृहस्थोंके लिये वह सार्थक है। | | ये गृहस्था अनित्थंविदस्तेषां स्वभावतो दक्षिणो धूमादिः पन्थाः प्रसिद्धस्तेषां य इत्थं विदुः सगुणं वान्यद्ब्रह्मविदुः, “अथ | जो गृहस्थ ऐसा जाननेवाले नहीं हैं उनके लिये स्वभावतः धूमादि दक्षिण-मार्ग प्रसिद्ध है; किंतु उनमें जो ऐसा जाननेवाले हैं अथवा जो इनसे भिन्न सगुणब्रह्मके उपासक हैं वे (छा० ४। १५। ५ |

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खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५०३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यदु चैवास्मिञ्शव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेव" इति लिङ्गादुत्तरेण ते गच्छन्ति ।के ) “इस (सगुण ब्रह्मोपासक) के लिये प्रेतकर्म करें अथवा न करें वह अर्चिरादि मार्गको ही प्राप्त होता है” इस श्रुतिरूप लिङ्गके अनुसार उत्तर मार्गसे ही जाते हैं ।
नन्वूर्ध्वरेतसां गृहस्थानां च समान आश्रमित्वे ऊर्ध्वरेतसामेवोत्तरेण पथा गमनं न गृहस्थानामिति न युक्तमग्निहोत्रादिवैदिककर्मबाहुल्ये च सति ।**शङ्का—**ऊर्ध्वरेता और गृहस्थ—ये दोनों आश्रमी होनेमें समान ही हैं । अतः उनमें केवल ऊर्ध्वरेताओंका ही उत्तरायणमार्गसे गमन होता है, गृहस्थोंका अग्निहोत्रादि वैदिक कर्मोंकी बहुलता होनेपर भी नहीं होता—यह ठीक नहीं है ।
नैष दोषः, अपूता हि ते । (ऊर्ध्वरेतसां वनौकसां च उत्तरमार्ग एव) शत्रुमित्रसंयोगनिमित्तं हि तेषां रागद्वेषौ तथा धर्माधर्मौ हिंसानुग्रहनिमित्तौ । हिंसानृतमायाब्रह्मचर्यादि च बहुशुद्धिकारणमपरिहार्यं तेषाम्, अतोऽपूताः । अपूतत्वान्नोत्तरेण पथा गमनम् । हिंसानृतमायाब्रह्मचर्यादिपरिहाराच्च शुद्धात्मा-**समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वे अपवित्र होते हैं । शत्रु और मित्रोंका संयोग रहनेके कारण उनमें राग-द्वेष रहते हैं तथा हिंसा और कृपाके कारण धर्माधर्म भी रहते ही हैं । उनके लिये हिंसा, अनृत, कपट और अब्रह्मचर्य आदि बहुतसे अशुद्धिके कारण अनिवार्य ही हैं; इसलिये वे अपवित्र हैं । अपवित्र होनेके कारण उनका उत्तर मार्गसे गमन नहीं हो सकता । किंतु दूसरे वानप्रस्थादि हिंसा, अनृत, माया और अब्रह्मचर्यका त्याग कर देनेके कारण शुद्धचित्त हो जाते हैं, शत्रु-

५०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

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५०४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| नो हीतरे शत्रुमित्ररागद्वेषादिपरिहाराच्च विरजसस्तेषां युक्त उत्तरः पन्थाः । | मित्रसम्बन्धी भाव और राग-द्वेषका त्याग कर देनेसे वे मलहीन हो जाते हैं; अतः उनके लिये उत्तर मार्ग ठीक ही है। | | तथा च पौराणिकाः “ये प्रजामीषिरेऽधीरास्ते श्मशानानि भेजिरे । ये प्रजां नेषिरे धीरास्तेऽमृतत्वं हि भेजिरे” इत्याहुः । | तथा पौराणिक लोग भी ऐसा कहते हैं कि “जिन मन्दमति पुरुषोंने संतानकी इच्छा की वे श्मशानको ही प्राप्त हुए, किंतु जिन बुद्धिमानोंने संतानकी इच्छा नहीं की वे अमरत्वको ही प्राप्त हुए”। | | इत्थंविदां गृहस्थानामरण्यवासिनां च समानमार्गत्त्वेऽमृतत्वफले च सत्यरण्यवासिनां विद्यानर्थक्यं प्राप्तम् । तथा च श्रुतिविरोधः “न तत्र दक्षिणा यन्ति नाविद्वांसस्तपस्विनः” इति “स एनमविदितो न भुनक्ति” इति च विरुद्धम् । | शङ्का—इस प्रकार जाननेवाले गृहस्थ और वनवासियोंको समानमार्ग और अमृतत्वरूप फल प्राप्त होनेपर तो वनवासियोंके ज्ञानकी व्यर्थता सिद्ध होती है और ऐसा होनेसे “वहाँ दक्षिणमार्गी और अज्ञानी तपस्वी नहीं जाते” इस श्रुतिसे विरोध आता है तथा “अपना ज्ञान न होनेपर वह (परमात्मा) इस जीवका [मोक्षदानद्वारा] पालन नहीं करता” यह कथन भी विपरीत हो जाता है। | | न; आभूतसंप्लवस्थानस्यामृतत्वेन विवक्षितत्वात् । तत्रैवोक्तं पौराणिकैः—“आभूतसंप्लवं स्थान- | समाधान—नहीं, क्योंकि यहाँ अमृतत्वसे भूतोंके प्रलयपर्यन्त रहना ही अभिप्रेत है। इसी सम्बन्धमें पौराणिकोंने कहा है कि “भूतोंके प्रलयपर्यन्त रहना अमृतत्व ही |

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खण्ड १० ]शाङ्करभाष्यार्थ५०५
संस्कृतहिन्दी
ममृतत्वं हि भाष्यते" इति । यच्चात्यन्तिकममृतत्वम्, तदपेक्षया "न तत्र दक्षिणा यन्ति" "स एनमविदितो न भुनक्ति" इत्याद्याः श्रुतयः, इत्यतो न विरोधः ।कहलाता है।" किंतु जो आत्यन्तिक अमृतत्व है उसकी अपेक्षासे "वहाँ दक्षिणमार्गी नहीं जाते" "अपना ज्ञान न होनेपर वह (परमात्मा) इस जीवका [मोक्षप्रदानद्वारा] पालन नहीं करता" इत्यादि श्रुतियाँ हैं; अतः इससे कोई विरोध नहीं है ।
"न च पुनरावर्तन्ते" इति "इमं मानवमावर्तं नावर्त्तन्ते" (छा० उ० ४ । १५ । ५) इत्यादिश्रुतिविरोध इति चेत् ।शङ्का— किंतु [ऐसा मानें तो] "वे फिर नहीं लौटते" "इस मानव आवर्त्तमें फिर नहीं आते" इत्यादि श्रुतिसे विरोध आता है ।
न; 'इमं मानवम्' इति विशेषणात् "तेषामिह न पुनरावृत्तिरस्ति' इति च । यदि ह्येकान्तेनैवनावर्तेरन्निमं मानवमिहेति च विशेषणमनर्थकं स्यात् । इममिहेत्याकृतिमात्रमुच्यत इति चेत्, न; अनावृत्तिशब्देनैव नित्यानावृत्त्यर्थस्य प्रतीतत्वादाकृतिकल्पनाऽनर्थिका । अत इममिहेतिसमाधान— ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि 'इमं मानवम्' ऐसा विशेषण है, तथा यह भी कहा गया है कि 'उनकी यहाँ पुनरावृत्ति नहीं होती'। यदि उनकी सर्वथा पुनरावृत्ति न होती तो 'इमं मानवम्' तथा 'इह'—ये विशेषण व्यर्थ हो जाते । यदि कहो कि 'इमम्' और 'इह' इन शब्दोंसे आकृतिमात्र बतलायी गयी है [अर्थात् किसी देशकालविशेषका नियम न करके उसके नित्य मोक्षका प्रतिपादन किया गया है]—तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि नित्य अनावृत्तिरूप अर्थकी प्रतीति तो 'अनावृत्ति' शब्दसे ही हो जाती है; अतः उसमें आकृतिकी कल्पना निरर्थक ही

५०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

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५०६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५
च विशेषणार्थवत्त्वायान्यत्रावृत्तिः कल्पनीया।है। इसलिये 'इमम्' और 'इह' इन विशेषणोंकी सार्थकताके लिये उसकी अन्यत्र आवृत्ति माननी चाहिये।*
न च 'सदेकमेवाद्वितीयम्' आत्मविदोऽनु- इत्येवं प्रत्ययवतां क्रान्तिनिरूपणम् मूर्धन्यनाड्यार्चिरादिमार्गेण गमनम्, 'ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति' (बृ० उ० ४ । ४ । ६)। "तस्मात्तत्सर्वमभवत्" (बृ० उ० १ । ४ । १०)। "न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति। अत्रैव समवलीयन्ते" (बृ० उ० ४ । ४ । ६) इत्यादि श्रुतिशतेभ्यः।इसके सिवा जिनका ऐसा अनुभव है कि 'एकमात्र अद्वितीय सत् ही है' उनका शीर्षस्थानीय नाडीद्वारा अर्चिरादि मार्गसे गमन भी नहीं होता; जैसा कि "वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है" "इसीसे यह सब कुछ हो गया" "उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते, यहीं लीन हो जाते हैं" इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है।
ननु तस्माज्जीवादुच्चिक्रमिषोः प्राणा नोत्क्रामन्ति सहैव गच्छन्तीत्ययमर्थः कल्प्यत इति चेत् ?शङ्का—यदि इस श्रुतिका ऐसा अर्थ माना जाय कि उत्क्रमण करनेकी इच्छावाले उस जीवके पाससे प्राण उत्क्रमण नहीं करते, बल्कि उसके साथ ही जाते हैं, तो ?
न; 'अत्रैव समवलीयन्ते' इति विशेषणानर्थक्यात्, "सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति" (बृ० उ० ४ ।समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे 'यहीं लीन हो जाते हैं' यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा। तथा इसके सिवा "सब प्राण उसका अनुगमन करते हैं"

* अर्चिमार्गसे जानेवाले पुरुषकी इस लोकमें तो आवृत्ति नहीं होती; किंतु ब्रह्मलोकमें ही ऐसे कई लोक हैं जिनमें वह अपने तपके प्रभावसे जाता है। महः, जनः, तपः और सत्य—ये चारों ही लोक ब्रह्मलोकके अन्तर्गत हैं। साधक अपनी साधनाके प्रभावसे इनमेंसे किसी एक लोकमें जाता है और फिर वहाँसे ज्ञानद्वारा उत्तरोत्तर लोकमें जाता हुआ सत्यलोकमें पहुँचकर मुक्त हो जाता है। यह लोकान्तरगमन ही उसकी अन्यत्र आवृत्ति है।

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खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५०७


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
४।२) इति च प्राणैर्गमनस्य प्राप्तत्वात्। तस्मादुत्क्रामन्तीत्यनाशङ्कवैषा।इस श्रुतिसे प्राणोंके सहित जीवका गमन सिद्ध भी होता है। अतः ‘प्राण उत्क्रमण करते हैं’ इस विषयमें कोई शङ्का नहीं हो सकती।
यदापि मोक्षस्य संसारगतिवैलक्षण्यात्प्राणानां जीवेन सहागमनमाशङ्क्य तस्मान्नोत्क्रामन्तीत्युच्यते, तदाप्यत्रैव समवलीयन्त इति विशेषणमनर्थकं स्यात्। न च प्राणैर्वियुक्तस्य गतिरुपपद्यते जीवत्वं वा। सर्वगतत्वात्सदात्मनो निरवयवत्वात् प्राणसंबन्धमात्रमेव ह्यग्निविस्फुलिङ्गवज्जीवत्वभेदकारणमित्यतस्तद्वियोगे जीवत्वं गतिर्वा न शक्या परिकल्पयितुं श्रुतयश्चेत्प्रमाणम्।इसके सिवा संसारगतिसे मोक्षकी विलक्षणता होनेके कारण जब कि जीवके साथ प्राणोंके न जानेकी आशङ्का करके ऐसा कहा जाता है कि वे उससे उत्क्रमण ही नहीं करते [अर्थात् जीव प्राणोंके बिना ही चला जाता है] तो उस समय भी ‘वे यहीं लीन हो जाते हैं’ यह विशेषण व्यर्थ हो जाता है, क्योंकि प्राणोंसे वियुक्त हुए प्राणीकी गति अथवा जीवत्व सम्भव ही नहीं है। क्योंकि सदात्मा तो सर्वगत और निरवयव है; प्राणसे सम्बन्ध होना ही अग्निके विस्फुलिङ्गोंके समान जीवभावरूप भेदका कारण है। अतः यदि श्रुतिको प्रमाण माना जाय तो प्राणोंका वियोग हो जानेपर चिदात्माके जीवत्व अथवा गतिकी कल्पना नहीं की जा सकती।
न च सतोऽणुरवयवः स्फुटितो जीवाख्यः सद्रूपं छिद्रीकुर्वन् गच्छतीति शक्यं कल्पयितुम्।इसके सिवा ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती कि सदात्माका उससे अलग हुआ अणुमात्र अवयव जीवसंज्ञक है और वह सदात्माको छिद्रयुक्त करता हुआ जाता है।

५०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

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५०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| तस्मात् "तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति" इति सगुणब्रह्मोपासकस्य प्राणैः सह नाड्या गमनम्, सापेक्षमेव चामृतत्वम्, न साक्षान्मोक्ष इति गम्यते; "तदपराजिता पूस्तदैरं मदीयं सरः" इत्याद्युक्त्वा "तेषामेवैष ब्रह्मलोकः" इति विशेषणात् । | अतः "उस मूर्धन्य नाडीसे ऊपरकी ओर जाता हुआ वह अमरत्वको प्राप्त होता है" इस प्रकार सगुण ब्रह्मोपासकका प्राणोंके साथ मूर्धन्य नाडीसे जाना सापेक्ष अमृतत्व ही है, साक्षात् मोक्ष नहीं है—यह जाना जाता है; क्योंकि श्रुतिने "वह अपराजिता पुरी है, वह हर्षोत्पादक सरोवर है" ऐसा कहकर "उन [ सगुण ब्रह्मोपासकों ] को ही यह ब्रह्मलोक मिलता है"—ऐसा विशेषण दिया है । | | अतः पञ्चाग्निविदो गृहस्था ये चेमेऽरण्ये वानप्रस्थाः परिव्राजकाश्च सह नैष्ठिकब्रह्मचारिभिः श्रद्धा तप इत्येवमाद्युपासते श्रद्दधानास्तपस्विनश्चेत्यर्थः । उपासनशब्दस्तात्पर्यार्थः, "इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते" इति यद्वत् । श्रुत्यन्तराच्च सत्यं ब्रह्म हिरण्यगर्भाख्यमुपासते ते सर्वेऽर्चिषमर्चिरभिमानिनीं देवतामभिसंभवन्ति प्रतिपद्यन्ते । समा- | अतः पञ्चाग्निवेत्ता गृहस्थ और जो ये वनवासी—नैष्ठिक ब्रह्मचारियोंके सहित वानप्रस्थ और संन्यासी 'श्रद्धा और तप' इत्यादिकी उपासना करते हैं अर्थात् श्रद्धालु एवं तपस्वी हैं । जैसा कि 'इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते" इस श्रुतिमें है उसीके समान यहाँ 'उपासन' शब्द तत्परताके अर्थमें है । तथा एक अन्य श्रुतिके अनुसार जो हिरण्यगर्भसंज्ञक सत्यब्रह्मकी उपासना करते हैं वे सब अर्चि यानी अर्चिके अभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं । शेष सब चतुर्थ अध्यायके अन्तर्गत [ उपकोसल विद्यामें (छा० ४।१५।५ |

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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थं ५०९ ЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖ

नमन्यच्चतुर्थगतिव्याख्यानेन । एष देवयानः पन्था व्याख्यातः सत्यलोकावसानः, नाण्डाद्बहिः, “यदन्तरा पितरं मातरं च” (बृ० उ० ६।२।२) इति मन्त्रवर्णात् ॥ १-२ ॥में ) बतलायी हुई ] गतिकी व्याख्याके समान है । यह सत्यलोकमें समाप्त होनेवाले देवयानमार्गकी व्याख्या की गयी; इस मार्गकी ब्रह्माण्डसे बाहर गति नहीं है; जैसा कि जो “पिता ( द्युलोक ) और माता ( पृथिवी ) के बीचमें है” इस मन्त्रसे सिद्ध होता है ॥ १-२ ॥

—:०:—

तृतीय प्रश्नका उत्तर
( देवयान और धूमयानका व्यावर्तनस्थान )

अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिश्रात्रेपरपक्षमपरपक्षाद्यान्षड् दक्षिणैति मासाँस्तान्नैते संवत्सरमभिप्रामुवन्ति ॥३॥

तथा जो ये गृहस्थलोग ग्राममें इष्ट, पूर्त और दत्त—ऐसी उपासना करते हैं वे धूमको प्राप्त होते हैं; धूमसे रात्रिको, रात्रिसे कृष्णपक्षको तथा कृष्णपक्षसे जिन छः महीनोंमें सूर्य दक्षिणमार्गसे जाता है उनको प्राप्त होते हैं । ये लोग संवत्सरको प्राप्त नहीं होते ॥ ३ ॥

अथेत्यर्थान्तरप्रस्तावनाथः, य इमे गृहस्था ग्रामे, ग्राम इति गृहस्थानामसाधारणं विशेषणमरण्यवासिभ्यो व्यावृत्त्यर्थम् , यथा; वानप्रस्थपरिव्राजकानामरण्यं विशेषणं गृहस्थेभ्यो व्या-‘अथ’ यह शब्द दूसरे विषयकी प्रस्तावनाके लिये है, जो ये गृहस्थगण ग्राममें—जिस प्रकार ‘अरण्यम्’ यह वानप्रस्थ और परिव्राजकोंका गृहस्थोंसे व्यावृत्ति करनेके लिये असाधारण विशेषण था, उसी प्रकार ‘ग्रामे’ यह वनवासियोंसे व्यावृत्ति करनेके लिये गृहस्थोंका

५१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ ]

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५१०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५ ]
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
वृत्त्यर्थम्, तद्वतः; इष्टापूर्ते इष्टमग्निहोत्रादि वैदिकं कर्म, पूर्तं वापीकूपतडागारामदिकरणम्; दत्तं बहिर्वेदि यथाशक्त्यर्थिभ्यो द्रव्यसंविभागो दत्तम्; इत्येवंविधं परिचरणपरित्राणाद्युपासते, इतिशब्दस्य प्रकारदर्शनार्थत्वात्।<br><br>ते दर्शनवर्जितत्वाद्धूमं धूमाभिमानिनीं देवतामभिसंभवन्ति प्रतिपद्यन्ते।असाधारण विशेषण है। 'इष्टापूर्ते'—अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्मको 'इष्ट' कहते हैं तथा वापी, कूप, तड़ाग एवं बगीचे आदि लगवानेका नाम पूर्त है; और वेदीसे बाहर दानपात्र व्यक्तियोंको यथाशक्ति धन देना 'दत्त' कहलाता है। इस प्रकार जो परिचर्या (गुरुशुश्रूषा) एवं परित्राण (धर्मरक्षा) आदिका तत्परतापूर्वक सेवन करते हैं—क्योंकि यहाँ 'इति' शब्द अनुष्ठानका प्रकार प्रदर्शित करनेके लिये है—वे उपासनाशन्य होनेके कारण धूम—धूमाभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं।
तयातिवाहिता धूमाद्रात्रिं रात्रिदेवतां रात्रेर्परपक्षदेवतामेव कृष्णपक्षाभिमानिनीमपरपक्षाद्यान्षण्मासान्दक्षिणा दक्षिणां दिशमेति सविता, तान्मासान्दक्षिणायनषण्मासाभिमानिनीर्देवताः प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः। संघचारिण्योउस धूमाभिमानी देवतासे अतिवाहित (आगे ले जाये जाते) हुए वे धूमसे रात्रिको—रात्रिदेवताको, रात्रिसे अपरपक्ष यानी कृष्णपक्षसे जिन छः महीनोंमें सूर्य दक्षिण दिशाकी ओर होकर चलता है उन महीनोंको अर्थात् दक्षिणायनके छः महीनोंके अभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है। ये षण्मासाभिमानी देवता एक
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५११


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
हि षण्मासदेवता इति मासानिति बहुवचनप्रयोगस्तासु। नैते कर्मिणः प्रकृता संवत्सरं संवत्सराभिमानिनीं देवतामभिप्राप्नुवन्ति ।<br><br>कुतः पुनः संवत्सरप्राप्तिप्रसङ्गो यतः प्रतिषिध्यते ?<br><br>अस्ति हि प्रसङ्गः; संवत्सरस्य ह्येकस्यावयवभूते दक्षिणोत्तरायणे, तत्राचिरादिमार्गप्रवृत्तानामुदगयनमासेभ्योऽवयविनः संवत्सरस्य प्राप्तिरुक्ता । अत इहापि तदवयवभूतानां दक्षिणायनमासानां प्राप्तिं श्रुत्वा तदवयविनः संवत्सरस्यापि पूर्ववत्प्राप्तिरापन्ना; इत्यतस्तत्प्राप्तिः प्रतिषिध्यते नैते संवत्सरमभिप्राप्नुवन्तीति ॥ ३ ॥संघमें रहनेवाले हैं; इसलिये उनके लिये 'मासान्' ऐसा बहुवचनका प्रयोग किया गया है । यहाँ जिनका प्रकरण है, वे ये कर्मकाण्डी संवत्सरको—संवत्सराभिमानी देवताको प्राप्त नहीं होते ।<br><br>शङ्का—किंतु यहाँ संवत्सरप्राप्तिका प्रसङ्ग ही कहाँ था जो प्रतिषेध किया गया ?<br><br>समाधान—हाँ, प्रसङ्ग है; दक्षिणायन और उत्तरायण—ये एक ही संवत्सरके दो अवयव हैं, उनमें अर्चि आदि मार्गसे जानेवाले पुरुषोंकी उत्तरायणके महीनोंसे अपने अवयवी संवत्सरकी प्राप्ति बतलायी गयी थी । इसलिये यहाँ भी उससे अवयवभूत दक्षिणायनके महीनोंकी प्राप्ति सुनकर पूर्ववत् उनके अवयवी संवत्सरकी भी प्राप्ति हो जाती है, इसीसे 'वे संवत्सरको प्राप्त नहीं होते'—ऐसा कहकर उसकी प्राप्तिका प्रतिषेध किया जाता है ॥ ३ ॥

मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति ॥ ४ ॥

५१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

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५१२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

दक्षिणायनके महीनोंसे पितृलोकको, पितृलोकसे आकाशको और आकाशसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। यह चन्द्रमा राजा सोम है। वह देवताओंका अन्न है, देवतालोग उसका भक्षण करते हैं ॥ ४ ॥

मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसम्। कोऽसौ यस्तैः प्राप्यते चन्द्रमाः ? य एष दृश्यतेऽन्तरिक्षे सोमो राजा ब्राह्मणानाम्, तदन्नं देवानाम्, तं चन्द्रमसमन्नं देवा इन्द्रादयो भक्षयन्ति। अतस्ते धूमादिना गत्वा चन्द्रभूताः कर्मिणो देवैर्भक्ष्यन्ते।वे दक्षिणायनके महीनोंसे पितृलोकको, पितृलोकसे आकाशको और आकाशसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। उनके द्वारा जो प्राप्त किया जाता है वह यह चन्द्रमा कौन है ? यह जो आकाशमें दिखायी देता है तथा जो सोम ब्राह्मणोंका राजा है, वह देवताओंका अन्न है; उस चन्द्रमारूप अन्नको इन्द्रादि देवता भक्षण करते हैं। अतः धूमादि मार्गसे जाकर चन्द्रमारूप हुए वे कर्मी देवताओंसे भक्षित होते हैं।
नन्वनर्थायेष्टादिकरणं यद्यन्नभूता देवैर्भक्ष्येरन्।शङ्का— यदि वे अन्नरूप होकर देवताओंद्वारा भक्षित होते हैं तो इष्टादि कर्मोंका करना अनर्थके ही लिये है ?
नैष दोषः— अन्नमित्युपकरणमात्रस्य विवक्षितत्वात्; न हि ते कवलोत्क्षेपेण देवैर्भक्ष्यन्ते, किं तर्हि? उपकरणमात्रं देवानां भवन्ति ते स्त्रीपशुभृत्यादिवत्। दृष्टश्चान्न-समाधान— यह दोष नहीं है, क्योंकि 'अन्न' इस शब्दसे केवल उपभोगकी सामग्री ही विवक्षित है। वे देवताओंद्वारा ग्रासकी तरह उठाकर नहीं खाये जाते, तो फिर क्या होता है ? वे स्त्री, पशु एवं सेवकादिके समान देवताओंके केवल उपकरणमात्र होते हैं। 'अन्न'
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१३


संस्कृतहिन्दी
शब्द उपकरणेषु स्त्रियोऽन्नं पशवोऽन्नं विशोऽन्नं राज्ञामित्यादि। न च तेषां स्त्र्यादीनां पुरुषोपभोग्यत्वेऽप्युपभोगो नास्ति। तस्मात्कर्मिणो देवा-शब्दका उपकरणोंमें भी प्रयोग देखा ही जाता है; जैसे 'राजाओंका स्त्रियाँ अन्न हैं, पशु अन्न हैं, वैश्य अन्न हैं' इत्यादि। पुरुषके उपभोग्य होनेपर भी उन स्त्री आदिको उपभोग प्राप्त न होते हों--ऐसी बात नहीं है। अतः कर्मी लोग देवताओंके
नामुपभोग्या अपि सन्तः सुखिनो देवैः क्रीडन्ति। शरीरं च तेषां सुखोपभोगयोग्यंउपभोग्य होनेपर भी सुखी होकर देवताओंके साथ क्रीडा करते हैं। तथा उनका सुखोपभोगयोग्य जलीय
चन्द्रमण्डल आप्यमारभ्यते। तदुक्तं पुरस्तात्-श्रद्धाशब्दा आपो द्युलोकाग्नौ हुताः सोमो राजा संभवतीति।शरीर चन्द्रमण्डलमें आरम्भ होता है। पहले यह बात कही भी जा चुकी है कि 'श्रद्धा' शब्दवाच्य जलका द्युलोकरूप अग्निमें हवन किये जानेपर सोम राजाकी उत्पत्ति होती है।
ता आपः कर्मसमवायिन्य इतरैश्च भूतैरनुगता द्युलोकं प्राप्य चन्द्रत्वमापन्नाः शरीराद्यारम्भिका इष्टाद्युपासकानां भवन्ति। अन्त्यायां च शरीराहुतावग्नौ हुतायामग्निना दह्यमाने शरीरे तदुत्था आपो धूमेन सहोर्ध्वं यजमानमावेष्ट्य चन्द्रमण्डलं प्राप्य-कुशमृत्तिकास्थानीया बाह्य-वह कर्मसम्बन्धी जल अन्य भूतोंसे अनुगत हो द्युलोकमें पहुँचकर चन्द्रभावको प्राप्त हो इष्टादि कर्मोंकी उपासना करनेवाले पुरुषोंके शरीरादिका आरम्भ करनेवाला होता है। फिर शरीररूप अन्तिम आहुतिके हुत होनेपर जब अग्निद्वारा शरीर दग्ध होने लगता है तो उससे उत्पन्न होनेवाला जल धूमके साथ यजमानको आच्छादित कर ऊपर चन्द्रमण्डलमें पहुँचकर कुश एवं

५१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

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५१४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| ह्यशरीरारम्भका भवन्ति । तदारब्धेन च शरीरेणेष्टादिफलमुपभुञ्जाना आस्ते ॥ ४ ॥ | मृत्तिकास्थानीय बाह्य शरीरका आरम्भ करनेवाला होता है । उससे आरम्भ हुए शरीरसे ही वे इष्टादि कर्मोंका फल भोगते हुए वहाँ रहते हैं ॥ ४ ॥ |

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द्वितीय प्रश्नका उत्तर

( पुनरावर्तनका क्रम )

तस्मिन्यावत्संपातमुषित्वाथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाभ्रं भवति ॥ ५ ॥

वहाँ कर्मोंका क्षय होनेतक रहकर वे फिर इसी मार्गसे जिस प्रकार गये थे उसी प्रकार लौटते हैं । [ वे पहले ] आकाशको प्राप्त होते हैं और आकाशसे वायुको, वायु होकर वे धूम होते हैं और धूम होकर अभ्र होते हैं ॥ ५ ॥

यावत्तदुपभोगनिमित्तस्य कर्मणः क्षयः, संपतन्ति येनेति संपातः कर्मणः क्षयो यावत्संपातं यावत्कर्मणः क्षय इत्यर्थः; तावत्तस्मिंश्चन्द्रमण्डल उषित्वाथानन्तरमेतमेव वक्ष्यमाणमध्वानं मार्गं पुनर्निवर्तन्ते । पुनर्निवर्तन्त इति प्रयोगात्पूर्वमप्यसकृच्चन्द्रमण्डलंजबतक उस चन्द्रलोकके उपभोगोंके निमित्तभूत कर्मका क्षय होता है—जिसके द्वारा सम्पतन होता है उसे सम्पात अर्थात् कर्मका क्षय कहते हैं, यावत्सम्पात अर्थात् जबतक कर्मका क्षय होता है तबतक उस चन्द्रमण्डलमें निवासकर उसके पश्चात् इस आगे कहे जानेवाले मार्गमें ही फिर लौट आते हैं । 'पुनर्निवर्तन्ते' (फिर लौट आते हैं) ऐसा प्रयोग होनेसे यह जाना जाता है कि पहले भी कई बार चन्द्र-
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१५


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
गता निवृत्ताश्चासन्निति गम्यते।<br><br>तस्मादिह लोकं इष्टादिकर्मोपचित्य चन्द्रं गच्छन्ति, तत्क्षये चावर्तन्ते; क्षणमात्रमपि तत्र स्थातुं न लभ्यते, स्थितिनिमित्तकर्मक्षयात्, स्नेहक्षयादिव प्रदीपस्य।<br><br>तत्र किं (कर्मक्षयस्य सावशेषत्वं निरवशेषत्वं वा ? सावशेष इति।) येन कर्मणा चन्द्रमण्डलमारूढस्तस्य सर्वस्य क्षये तस्मादवरोहति किं वा सावशेष इति।<br><br>किं ततः ?<br><br>यदि सर्वस्यैव क्षयः कर्मणश्चन्द्रमण्डलस्थस्यैव मोक्षः प्राप्नोति, तिष्ठतु तावत्तत्रैव मोक्षः स्यान्न वेति, तत आगतस्येहं शरीरोपभोगादि न संभवति।मण्डलको प्राप्त होकर लौट चुके हैं; अतः वे इस लोकमें इष्टादि कर्म करके चन्द्रमण्डलको प्राप्त होते हैं; तथा उनका क्षय होनेपर फिर लौट आते हैं। उस समय वहाँकी स्थितिके निमित्तभूत कर्मोंका क्षय हो जानेके कारण उस स्थानपर उनका एक क्षण भी ठहरना नहीं हो सकता, जिस प्रकार कि तैलका क्षय हो जानेपर दीपक नहीं ठहर सकता।<br><br>**पूर्व०—**जिस कर्मके द्वारा वह चन्द्रमण्डलपर आरूढ होता है क्या उस सबका क्षय होनेपर वह उससे उतरता है अथवा कुछ शेष रह जानेपर ही उतर आता है ?<br><br>**सिद्धान्ती—**इससे तुम्हें क्या लेना है ?<br><br>**पूर्व०—**यदि सारे ही कर्मका क्षय हो जाता है तो चन्द्रमण्डलमें रहते हुए ही उसका मोक्ष सिद्ध हो जाता है, और 'वहाँ रहते हुए ही मोक्ष होता है या नहीं होता' इस विचारको रहने भी दिया जाय तो भी वहाँसे आनेपर इस लोकमें उसके शरीरोपभोग आदि सम्भव नहीं हो सकते तथा

छा० उ० १७—

५१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

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५१६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| ततः शेषेणेत्यादिस्मृतिविरोधश्च स्यात्। | 'ततः शेषेण' (भुक्तावशेष कर्मोंसे जन्म लेता है) इत्यादि स्मृतिसे भी विरोध होता है। | | नन्विष्टापूर्तदत्तव्यतिरेकेणापि मनुष्यलोके शरीरोपभोगनिमित्तानि कर्माण्यनेकानि संभवन्ति, न च तेषां चन्द्रमण्डल उपभोगः, अतोऽक्षीणाणि तानि। | सिद्धान्ती—इस मनुष्यलोकमें इष्ट, पूर्त और दत्त—इन कर्मोंसे भिन्न और भी अनेकों शरीरोपभोगके निमित्तभूत कर्म हो सकते हैं; उनका चन्द्रमण्डलमें फलोपभोग भी नहीं होता, इसलिये वे अक्षीण ही रहते हैं। जिन कर्मोंके कारण वह चन्द्रमण्डलपर आरूढ होता है | | यन्निमित्तं चन्द्रमण्डलमारूढस्तान्येव क्षीणानीत्यविरोधः। | उन्हींका वहाँ क्षय भी होता है—इस प्रकार इसमें कोई विरोध नहीं है। | | शेषशब्दश्च सर्वेषां कर्मत्वसामान्यादविरुद्धः। | सब कर्मोंका कर्मत्व समान होनेके कारण [उपर्युक्त स्मृतिमें] 'शेष' शब्दका प्रयोग किया गया है। इसलिये वह भी अविरुद्ध ही है। | | अत एव च तत्रैव मोक्षः स्यादिति दोषाभावः; विरुद्धानेकयोन्युपभोगफलानां च कर्मणामेकैकस्य जन्तोरारम्भकत्वसंभवात्। न चैकस्मिञ्जन्मनि सर्वकर्मणां क्षय उपपद्यते, ब्रह्महत्यादेश्चैकैकस्य कर्मणोऽनेकजन्मारम्भकत्वस्मरणात्। स्थाव- | इसलिये 'उसका वहीं मोक्ष हो जाना चाहिये' ऐसा भी दोष नहीं आ सकता, क्योंकि एक-एक जीवके ऐसे कर्मोंका आरम्भकत्व सम्भव हो ही सकता है जिनके फल अनेकों विरुद्ध योनियोंमें भोगे जायँ। एक ही जन्ममें समस्त कर्मोंका क्षय हो जाना सम्भव भी नहीं है, क्योंकि स्मृतियोंमें 'ब्रह्महत्या आदि एक-एक कर्म अनेक जन्मोंके आरम्भक हैं' ऐसा बतलाया गया है। तथा |