कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
" इबराहीम और इसहाक आदि " दाऊद और सुलेमान " मूसा
भीतरके अन्धे ।
जितने विद्वान् हैं सब विषयानन्दी भीतरी प्रकाशसे अन्धे हैं । ये अन्धे यथार्थ तात्पर्य तो समझ नहीं सकते । अपढ़ों तथा अपनेसे कम पढ़ोंको भटकाते हैं, इस कारण अपढ़ तथा कम पढ़े हुवे साधुओंकी शिक्षा मान लेते हैं । जो कुछ अधिक पढ़े हैं वे अपनी धूर्तता तथा चालाकी किये बिना नहीं रहते । इस कारण साधु लोग उनको शिक्षा नहीं देते । कारण यह कि, वे साधु जो पहुँचे हुये हैं उनके सामने अरस्तू और अफलातून इत्यादि ऐसे हैं जैसे किसी विद्वान्के समक्ष एक हलवाहा हो । पहुँचे हुवोंकी शिक्षा पर विद्वानोंका खण्डन मण्डन ऐसीही बात है जैसे कि हलवाहा, लुकमान तथा सुकरात आदिको शिष्य बनाना चाहता है । पण्डितों तथा विद्वानोंकी क्या सामर्थ्य है पहुँचेहुवोंकी शिक्षाको काट सकें ? पहुँचेहुवोंसे बढ़कर ब्रह्मज्ञानी है ब्रह्मज्ञानीसे बढ़कर विज्ञानहंस है । जो पूर्ण विज्ञानहंस हो उसकी सबपर श्रेष्ठता है । जो जो ऋषि मुनि हुए तथा अब वर्तमान हैं और वे लोग जितना प्रकाश बन्दना पूजाका रखते हैं । ज्ञानकी जिस सीमापर अधिकृत हैं, विद्वानोंसे उनकी श्रेणी सम्यक् प्रकारसे बढ़कर है । साधनाके प्रकाश बिना, केवल पुस्तकपाठसे आत्मिक प्रकाश प्राप्त कर नहीं सकता । विद्वानोंके हृदय खण्डन मण्डन तथा घमण्डसे भरे होते हैं । इस कारण साधुलोग हलवाहेको लेखनीधारीसे अच्छा समझते हैं । कारण यह कि, हलवाहा तो सेवा स्वीकार करता है । पढ़े लिखोंसे यह बात नहीं होती ।
कालपुरुष किससे डरता है ?
ऐसेही मूसः तो नाममात्रको थे कालपुरुषने सबको परदेसे मारकर गर्दमें मिला दिया । काल तथा उसके समस्त पुत्र समस्त संसारके प्रबन्धक हैं । जैसी उनकी इच्छा होती है किया करते हैं । इस कालपुरुषके राज्यमें बिना कबीर साहबके दूसरेका वश नहीं है कि, बाधा दे सके कारण यह कि, कालपुरुषसे प्रबल अन्य कोई नहीं । केवल कबीर साहबसे वह भयभीत होता है, दूसरा कोई नहीं ; केवल कबीर साहबसे वह डरता है और दूसरा कोई उसका सामना कर नहीं सकता । न उसको अधीन कर सकता है । कौन है जो उसको दबा सके एकभी नहीं । सब इससे भागते तथा दबते हैं । यह बड़ा बलिष्ठ है ।
माया ।
यह समस्त संसार मायापूजक है । जैसे मदिरा पीकर जब मनुष्य अचेत होता है तब मदिराकोही जल समझता है उसको तनिक भी सुध नहीं रहती । इसी प्रकार यह समस्त संसार अज्ञान और विषयोंके आनन्दमें मग्न हो रहा है ।
इस कारण माया और ब्रह्मका कुछ ज्ञान नहीं रहता है। यह शक्तिको सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर समझकर उसका पूजन किया करता है। जबलें यह सच्चे सत्यगुरुको नहीं पहचानता उसके पीछे नहीं चलता तबतक यह शक्तिपूजनमें डूबा रहता है। जब सत्यगुरुका चिह्न मिलेगा और एकको पहचानेगा तब परमेश्वरपूजक होगा। बिना सत्यगुरुके चिह्नके जो एक परमेश्वरके पूजनेकी बात कहता है वह झूठा है। एक परमेश्वरका पूजन बिना पारख गुरुके चिह्न दिये हुए सम्भव नहीं। झूठे दावा करनेवालोंसे दूर भागो। उनके साथ रहनेसे हृदय अन्धकारमय हो जाता है। वे स्वयम् भटकते हैं तथा दूसरोंको भटकाते हैं माया इस जगत्को धोखा दिया करती है। मायाही धोखेमें आती है। वह शुद्ध ब्रह्म न धोखेमें आता है और न किसीको धोखा देता है। तीनों कालके ऋषि मुनि जिनको ब्रह्म शुद्ध नहीं मिला वेही धोखा खाते हैं। वेही दूसरोंको धोखा देते आये हैं। ये लोग अपने अज्ञानही को ज्ञान समझकर घमण्डी तथा मस्त हो रहे हैं। अपने अज्ञानके पृथक करनेकी कुछ चिन्ता न की। इस कारण वे सदैव इसी अज्ञानमें बँधे रहे। जिस किसीपर सत्यगुरुकी कृपा तथा दया हुआ करती है वेही आपसे आप अचेत निद्रासे जागकर सत्यगुरुके चरणको पकड़ते हैं। वेही उसकी रक्षामें जाते और उसका खूंट अत्यंत दृढ़ताके साथ पकड़ते हैं कि, फिर न छूटने पावे, युग युगसे भटकते तथा गोता खाते हुए अब तो सत्यगुरुको पहचान पाया अबकी बार छोड़नेसे फिर कहाँ ठिकाना लगेगा? जो सत्यगुरुके अड़कुरी जीव हैं वे इङ्गित करतेही दौड़कर सत्यगुरुके चरणोंसे लिपट जाते हैं। जो कालपुरुषके जीव हैं वे समझानेसे भी नहीं समझते, सदैव भवसागरमें पड़े गीते खाया करते हैं।
भला सौचने तथा समझनेकी बात है कि, शिव ऐसे योगी मोहिनीके लिय विवश होकर तथा सुध बुद्धि गँवाकर पीछे फिरे। भृंगी ऋषि ऐसे तपस्वी भी स्त्रियोंके फंदेमें आये। रामचन्द्र जैसे, वसिष्ठसे जानी मोहमें रोते फिरे। नारद ऐसे जानी वेदपाठी स्त्रीके पीछे नष्ट हो गये। ऐसे ऐसे श्रेष्ठ तथा जानी लोगोंकी प्रशंसा जो समस्त संसारमें प्रकाशित है वासनाके पीछे कैसे नष्ट होते फिरे हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तुरीया इनमें कालपुरुषने समस्त जीवोंको बांध लिया है। कोई उसके पञ्जेसे निकल नहीं सकता। सबके सब इन्हींमें फँस गये। जो नहीं फँसे हैं, वे लीलासे तमाशा कर जाते हैं। दिखा जाते हैं कि, अपनेको सिद्ध समझकर भी उस प्रपंचमें न पड़ना।
क्या ऋषियोंने युक्तियों करनेमें त्रुटी की ? पर क्या करें उनका कुछ वश नहीं कि, वासनाओंसे पृथक् हों। सब बिलकुल विवश होकर बैठे रहे। वासनाओंसे कोई पृथक् हो नहीं सका। तपस्यासे इस जीवको ऋषियोंने मुरदा समझ रक्खा था। पर एक बार जो ऐसी आग भड़की कि, समस्त तपस्याको भस्म कर दिया क्योंकि त्यों रह गये। जितने जीव ब्रह्माण्डके भीतर हैं सब काल-पुरुषके पेटमें हैं। समस्त पिंडियाँ कालपुरुषके पेटमें बसी हैं। सो सब उसका भोजन हैं जो सत्य पुरुषकी शरण जाते हैं वे इस मायासे पार होते हैं दूसरे नहीं होते।
चक्रनिरूपण ।
कबीर साहिबने ज्ञानसागरमें अष्ट कमलोंका निरूपण किया है कि, "अष्ट कमल तोहि भेद बताऊँ । अजपा सोहँ प्रकट दिखाऊँ ॥" यहाँसे प्रारंभ किया है। उस प्रकरणका तात्पर्य यहाँ लिखे देते हैं। (१) चार दलका मूल कमल है जहाँ गणेशजी ऋद्धि सिद्धियोंके साथ रहते हैं। (२) छः दलका कमल है यहाँ सावित्री समेत, ब्रह्माजी रहा करते हैं। (३) आठ दलका कमल है यहाँ लक्ष्मीसहित भगवान् रहते हैं। (४) बारह दलका है यहाँ शिवजी निवास करते हैं। (५) सोलह दलका है यहाँ जीवात्मा निवास करता है। (६) तीन दलका है यहाँ सरस्वती निवास करती है। (७) दो दलका कमल है यहाँ ब्रह्माका वास है। (८) सुरति कमल जो देहसे बाहिर हो वहाँ उड़कर पहुँचता है। इस प्रकार आठ कहकर देहमें तो छः ही कहते हैं कि, "षट्चक्र बाँधे देहमें तब जो मुद्रा सार हो। प्रेमको बाजें पखावज प्रतिदिना सत्कार हो।" ये छः चक्र कहे हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धरेखा, आज्ञा, ये छः चक्र हैं। क्रमसे ४, ६, १०, १२, १६ और २ दलोंवाले हैं वहाँ कबीर साहिबने यद्यपि इनका नाम निर्देश नहीं किया है पर दलोंके विषयमें किसी योगीका मतभेद नहीं देखते इस कारण वहाँ भी यह माननेके लिये विवश होते हैं कि, यह उन्हींका निर्देश है। किन्तु देवताओंके विषयमें मतभेद देखते हैं। पं० बुलाकीरामजीका जुदा पथ है बाकी सब एकही पैमानेपर बैठ जाते हैं। गुदाके स्थानमें मूलाधार, लिंग मूलमें स्वाधिष्ठान, नाभिचक्रके मूलमें मणिपूर, हृदयमें अनाहत, कण्ठमें विशुद्धरेखा (तालुमें तालुचक्र) भ्रुकुटिके मध्यमें आज्ञाचक्र, ब्रह्म रन्ध्रमें कालचक्र तथा नौमा आकाश चक्र है इससे परे शून्य है। यानी इस नौमे चक्रकीही महाशून्य संज्ञा है क्योंकि इससे परे शून्यही शून्य है।
कबीर साहिब तोसरे मणिपूरचक्रको आठ ही दलोंका मानते हैं बाकी सब योगी दशदलका मानते हैं । बाकी आज्ञाचक्रके दो दलोंतक किसीका मत भेद नहीं है । योगबिन्दु सातवेंमें ६४ दल अमृत भरे आठवेंमें १०० तथा नौवेंमें १००० दल माने है । शिवसंहिताने आज्ञाचक्रके बाद ब्रह्मरंध्रमें एक हजार दलका कमल माना है । इस तरह गोरक्षनाथजीके मतसे ६ शिवसंहितासे ७ कबीर साहिबके ८ तथा योग बिन्दुके मतमें ९ होते हैं, आत्माराम भी ९ चक्र तथा १२ ब्रह्मके गुप्त स्थान जिनमें नौवें चक्र तथा नासिका मन और कुंडलिनी आजाती है । इनके तारतम्यको दिखानेके लिये नीचे नकशा दिखाये देते हैं ।
चक्रादिकोंका मानचित्र ।
यही स्थान अखण्ड परमानन्दका है ।
इसीकी एक मात्रासे सारा संसार सुखी है ॥
<table border="0"> <tbody> <tr> <td>१२</td> <td>महासिद्धचक्र</td> <td>१०००</td> <td>सबकी हृद</td> </tr> <tr> <td>११</td> <td>कमलजात्य धरणी पीठ</td> <td>‘‘मूर्धा</td> <td>सिद्धपुरुषका स्थान</td> </tr> <tr> <td>१०</td> <td>अमृतपूर्णचक्र</td> <td>तालु‘‘</td> <td>अमृत धारा</td> </tr> <tr> <td>९</td> <td>आज्ञा चक्र</td> <td>भ्रूमध्य</td> <td>तेज</td> </tr> <tr> <td>८</td> <td>बलवान् चक्र</td> <td>नासिका</td> <td>ओंकार</td> </tr> <tr> <td>७</td> <td>विशुद्ध रेखाचक्र</td> <td>कंठ‘‘</td> <td>तेजस्वी पुरुष</td> </tr> <tr> <td>६</td> <td>अनाहत चक्र</td> <td>हृदय‘‘</td> <td>जीव यहीं विराजता है</td> </tr> <tr> <td>५</td> <td>मनोचक्र</td> <td></td> <td></td> </tr> <tr> <td>४</td> <td>मणिपूर</td> <td>‘नाभि</td> <td>विष्णुभोलक्ष्मीसहित यह</td> </tr> <tr> <td>३</td> <td>कुण्डलिनी</td> <td></td> <td>प्राणको सुषुम्नामें नहीं जाने देती</td> </tr> <tr> <td>२</td> <td>स्वाधिष्ठानचक्र</td> <td>लिङ्ग‘</td> <td>ब्रह्माजी सावित्रीसहित</td> </tr> <tr> <td>१</td> <td>आधार चक्र</td> <td>गुदा‘‘</td> <td>गणेशजी सिद्धिबुद्धिसहित</td> </tr> </tbody> </table>इस चित्रमें चक्रोंकी व्यवस्थाके अनुसार नीचे ऊंचेका क्रम लेकर इसका निर्णय किया है । नं १२ वैसे ही इसका विशेष विवरण भी पढ़नेको मिलेगा—
ॐ प्रथमः सहजो ब्रह्मा सहजाच्छून्यः शून्यादीश्वरः ईश्वरादाजगद्गीर्यपराक्रमः
तत्प्रकृतिः प्रकृतिपुरुषयोर्मध्ये हेतुः हेतोरग्निरमहत्तमो महत्तमादहंकारः अहं-
कारात्पंचतन्मात्राः पंचतन्मात्राभ्यः पंचमहाभूतानि पंचमहाभूतेभ्योऽखिलं जगत् ।
अनुक्रमणिका ५-१-२-३-४-५-१०-११-१४-१७-२४-२६ ॐ नमः
परमात्मने । पूर्वपक्षामिदं प्रोक्तं परमानंदगिरिकृतम् । अनुभवात्कथितं शास्त्रे
" ईसा
नवचक्रं प्रकीर्तितम् ॥ द्वादश ब्रह्मगुह्यस्थानं शिरस्थानेति वर्णनम् । सूर्य्यकोटि-प्रतीकाशम् । तेजस्विनी दीप्तप्रभा, शिवदेवता, मूलमाया शक्तिः, परमात्मा ऋषिः, अध्वनि स्थितिः, नादात्मकान्यक्षराणि, अघोर मुद्रा, सूक्ष्मा प्रकृतिः, देहात्मनो गोचरध्वनिरपंचविस्मेशानरस्तरात्मा निलेप १ लय २ लक्ष ३ ध्यान समाधिः ४ ॥
अर्थ-पहिले ब्रह्मा सहज है उससे शून्य है । शून्यसे ईश्वर है । ईश्वरसे जगत् बल तथा सामर्थ्य है । इसीसे प्रकृति है । प्रकृति और पुरुषके बीच कारण रहता है । इस कारणके आगे महान् रहता है । उसके आगे अहङ्कार है । उससे पाँच तन्मात्रा प्रकट हुई पाँच तन्मात्राओंसे पंचमहाभूत, पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश उत्पन्न हुए । इनसे समस्त संसार हुवा । परमात्माको नमस्कार करके नौ चक्रोंका वृत्तान्त करता हूँ- बारह महासिद्ध चक्र हैं जिसमें करोड़ों सूर्य्यके समान प्रकाश है उसका विवरण करता हूँ-शिव देवता है । मूल मायाशक्ति है । परमात्मा ऋषि है । अध्वमें स्थिर है । नादात्मक शब्द है । अघोर मुद्रा है । सूक्ष्मा प्रकृति है । देहमें जो आत्मा है उससे सम्बन्ध रखनेवाली आवाज है, लय, लक्ष्य, ध्यान, समाधि इन पाँच आवाजोंका ईश्वर है । वह आत्मा निलेप है ।
ॐ ब्रह्मरंध्र देहसुषुम्णा मार्गसुषुम्णा अवस्था ऊर्ध्वप्रयोगात्माहं ब्रह्मरंध्रेति अग्निचक्रे सकारो भवति । ब्रह्म रन्ध्र जो देहमें सुषुम्णा है, सुषुम्णा राह है । अवस्था, ऊपरको है कामना जिसकी ऐसी अहम् परहम है । तेज चक्रमेंसे बीज प्रकट होता है । इसे सहस्रदल मानते हैं । यह सबकी हृद है इसके बाद बस अखण्डानन्दकाही समुद्र है । दूसरा कुछ न होनेके कारण उसे शून्य कहा है
ॐ एकादशसहस्रदलचक्रं मूर्ध्न स्थानं, गुरु देवता, चैतन्या शक्तिः विराट्, ऋषिः, सर्वोत्कृष्टः साक्षीभूतः तुरीयातीतो गुणातीतः चैतन्यात्मकः सर्ववर्णः सर्वमात्रा सर्वदा विराट् देहस्थित्यवस्था प्रज्ञा वाचा सह वेद अनुपमम् अस्थानम् अजपाजापं एकसहस्रं १००० घटिका २ पल ४ अक्षर ४ सोहं संख्या ३२१६०० एकविंशतिसहस्राणि षट्शतानि तथैव च । शशाहे वहते प्राणा सर्वकाले विनश्यति । सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेष्युतः । सोऽहं सोऽहं ततो मंत्रं जीवो जपति सर्वदा ॥ ॐ आधारलिगनाभौ हृदयसरसिजे जालमूले ललाटे द्वे पत्रे षोडशारे द्विदशदशदले द्वादशारे चतुष्के ॥ वासांते नालमध्ये इह कंठसहिते कंठदेशे सुराणां हंसं तत्त्वार्थयुक्ते सकलदलयुतं वर्णरूपं नमामि ॥
ग्यारहवें सहस्र पत्तोंका कमल जो ऊपरके स्थानोंमें ही है गुरु देवता है । चैतन्या शक्ति है । विराट् ऋषि समस्त श्रेष्ठोंका श्रेष्ठ सबका साक्षी है । तुरी
यातीत अवस्था तथा तीनों गुणोंसे पार है चैतन्य स्वरूप है समस्त अक्षरों तथा मात्रोंसे संयुक्त सदैव विराट् स्वरूप है । बडे ज्ञान तथा बुद्धिके साथ है । प्रशंसासे परे स्थानवाला अजपा जाप एक सहस्र दो घडी दो पल तथा चार अक्षर । सोहम् काश्मा इक्कीस सहस्र छः सौ, एक दिवसमें इतने प्राण चलते हैं । सकार करके प्राण भीतर जाता है । हकार करके बाहर आता है । मैं वह हंस हूँ उसके बीच मंत्रको जीव सदैव जपता है और कमलके मध्यमें लिंग नाभिका स्थान है और फिर बाईस पत्तोंका कमल है कण्ठपर सोलह पत्तोंका कमल है । इसमें उसका स्थान है जिसको जपना है, देवताओंके स्थानोंमें ठीक तात्पर्यसहित और समस्त वर्ण तथा स्वरूपको मैं नमस्कार करता हूँ । यह सहस्र पत्तोंका कमल है और इसकी नालऊपरको है । कमलका शिर नीचेको है । योगी लोग छः चक्रोंको भेदकर उसी चक्रपर जाके अधिकृत होते हैं । यह आदि शक्ति तथा निरंजनके रहनेका स्थान है और उत्पत्ति स्थित तथा विनाशका मुख्य कारण है । इसीपर समस्त रचना निर्भर है । यहाँ सिद्ध पुरुषका स्थान तथा इसे सौ दलकाही दूसरे योगी मानते हैं ।
ॐ दशमें पूर्ण गिरि पीठ ललाटमंडले चन्द्रो देवता अमृता शक्तिः परमात्मा ऋषिः
द्वारविशदलानि अमृता वासिनि कला सुरति अमृतकल्लोला नदीमहाकाल अंबिका
१ लंबिका २ घंटिका ३ तालिका ४ । देहस्वरूपं काकमुखं १ नरनेत्रम् २ गोभृंगम्
३ ललाट ब्रह्मपुरम् ४ हयग्रीवं ५ मयूरपुच्छं ६ हंसवत् पादाः ७ स्थानचारी ८ ॥
ओम्—दशवें पूर्ण गिरिपीठ और ललाटमण्डलमें चन्द्र उसका देवता है । अमृता शक्ति है । परमात्मा ऋषि है । बाईसपत्तोंका कमल है । अमृतके बीच रहनेवाली कला है । धाररूपरसमें नदी है । महाकाल १—अम्बिका २—लम्बिका ३—घण्टिका ४—तालिका । देहका स्वरूपकाग जैसा मुंह है आदमी जैसी आँखें हैं गाय जैसी सींग है माथा ब्रह्मपुर, घोडेकीसी ग्रीवा, मयूरकीसी पुच्छ हंसकैसे पाँव, एवं अपनी जगहमें फिरानेवाला है इसे अमृत पूर्ण चक्र भी कहते हैं । शि० इसके चौसठ दल मानते हैं । ॐ नवमे आज्ञाचक्रं भ्रुवोः स्थानं पीतवर्णं अग्निर्देवता सुषुम्णा शक्तिः हंस ऋषिः चैतन्यवाहन ज्ञानदेही विज्ञान अवस्था अनपूमा वाक् सुषुम्णा चैतन्यं शून्यं निरांभ द्वैदल अंतर मात्रा हहं वहिर्मात्रा २ स्थितिः १ प्रभाली २ अजपाजाप एक सहस्र १००० घटिका २ पल ४ अक्षर ६ प्रसाद लिंग ४ द्वै मात्रे आकारो तत्त्वं जीवहंसः ४ पूजामानसिक सोहंभावेन पूजयेत् अत्रगंधादिसमर्पयामि नमः ॥ नवमा आज्ञा चक्र—भौके बीचका स्थान, पीला रङ्ग, अग्नि देवता, सुषुम्णा शक्ति, हंस ऋषि, अनूपम
वाक् चैतन्य वाहन, ज्ञान देह, विज्ञान अवस्था, सुषुम्णादेव, चैतन्य शून्य, निरारंभ द्वैदली यानी अनारम्भ द्वितीय, भीतरी मात्रा दो। बाहरली मात्रा दो, स्थित तथा प्रकाश, अजपा जाप एक सहस्र। घडी दो, पल छियालिस हर्ष चिन्ह, द्विमात्रा अकार, तत्त्व जीवहंस, पूजा मानसी, सोहम् भाव करके पूजे सुगंधि इतर इत्यादिसे मैं पूजा करता हूँ। ॐ अष्टमे बलवान् चक्रं नासिकास्थानं ओंकारो देवता पुसुषुम्णा शक्तिः विराट् ऋषिः त्रिवर्णीद्विदल त्रिमात्रा अकार उकार मकार सत्त्वगुण रजोगुण तमोगुण ब्रह्माविष्णुरुद्राः पृथ्वी अप तेज वायु आकाश प्राण अपान समान ध्यान उदान ५ शब्द स्पर्श रूप रस गंध ५ नाग कूर्म कुकल देवदत्त धनंजय ५ मन बुद्धि चित्त अंतःकरण अहंकार ५ इडा पिगला सुषुम्णा ॥ ओम् आठवें बलवान् चक्र नाकके स्थानमें है। ओंकार देवता, शुम्णा शक्ति, विराट् ऋषि, तीन अक्षर, दो पत्ते, तीन मात्रा, अकार, उकार, मकार, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आकाश, प्राण, अपान, समान, उदान, ध्यान, शब्द, रूप स्पर्श, रस, गंध, नाग, कूर्म, कुकल, देवदत्त, धनञ्जय, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, अन्तःकरण, इडा पिगला सुषुम्णा ॥
ॐ सप्तमम् विशुद्धचक्रं कण्ठस्थानं ध्रुववर्णं जीवो देवता आद्या शक्ति विराट् ऋषिः वायुवाहन उदान वायु ज्वाला काला ज्वालाग्निवेदः महाकारण देह तुरीया अवस्था परा बाचा अथर्वण वेद जंघ पलङ्ग समता भूमिका सालोक्यता मोक्ष षोडशदलानि १६ षोडश मात्रा १६ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ लृ ॠ ए ऐ ओ औ अं अः अंतर मात्रा १६ बहिर्मात्रा १६ विद्या १ अविद्या २ इच्छा ३ क्रिया ४ ज्ञानशक्तिः ५ भूतल ६ महाविद्या ७ महामाया ८ बुद्धि ९ तामस १० मन्त्र ११ मात्रायणी १२ कुमारी १३ रौद्री १४ पुस्ता १५ सिंहिनी १६ अजपाजापमेक सहस्र १००० घटिका २ पल ४ अक्षर ४० पूजा मानसिका सोहंभावेन पूजयेत अत्र गंधादिसमर्पयामि नमः ॥ ओम् सातवें विशुद्धचक्र है, यह ध्रुवेके रङ्गका है। जीव देवता है आदि शक्ति है विराट् ऋषि है वायु वाहन है उदानवायु है ज्वालाकला है। ज्वाला अग्निवेद है महाकारण देह, तुरीया, अवस्था, परा, बाचा, अथर्वणवेद, जंघ, पलंग, समता भूमिका, सालोक्यता मोक्ष, सोलह पत्ती, सोलह मात्रा इत्यादि ॥ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ लृ ॠ ए ऐ ओ औ अं अः ये सोलह बीज हैं। भीतरी मात्रा सोलह। बाहरी मात्रा सोलह। विद्या, अविद्या, इच्छा, क्रिया, ज्ञान, शक्ति, भूतल, महाविद्या, महामाया, विधि, तामस, यज्ञ मंत्र, मात्रायणी, कुमारी, रुद्र, पुष्टता, सिंहिनी। अजपा-
जाप एक सहस्त्र, घड़ियाँ दो, पल चार, अक्षर चालीस, पूजा मानसी, सोहम् भावकरके पूजना और सुगंधि इत्यादिसे मैं पूजता हूँ यह कहना ॥ ॐ षष्ठम् अनाहदचक्रं हृदयस्थानंश्वेतवर्णं तमोगुणं मकार गुरु देवता तमाशक्तिः हिरण्यगर्भ ऋषिः नन्दी वाहन प्राणवायु ज्योतिः कला कारण देह सुषुम्णा अवस्था वसन्ती वाचा सामवेद गाहृपत्याग्नि शिवलिङ्गंप्राप्ता भूमिका सायुज्यता मुक्ति द्वादशदल १२ द्वादश मात्रा १२ क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ बहिर्मात्रा २१ रुद्राणी १ तेजसा २ तापिनी ३ सुखदा ४ चैतन्या ५ शिवा ६ शान्ती ७ तमा ८ गौरी ९ मातरः १० ज्वाला ११ प्रज्वालिनी १२ देवता अजपाजापषट् सहस्त्र ६००० घटिका १६ पल ३७ अक्षर ४ पूजा मानसिका सोहं भावेन पूजयेत् अत्र गन्धादिसमर्पयामि नमः ॥ ॐ छवा अनाहद चक्र है इसका रङ्ग श्वेत है । तमोगुण मकार है । गुरु देवता, तमा शक्ति, हिरण्यगर्भऋषि, नन्दी वाहन प्राणवायु, ज्योतिःकला, कारणदेह सुषुम्णा, अवस्था वसन्ती, वाचा सामवेद, गाहृपत्यअग्नि, शिवलिङ्ग, प्राप्ता भूमिका, सायुज्यता मोक्ष, बारह यती, बारह मात्रा १-रुद्राणी २-तेज ३-तापिनी ४-सुखदा ५ चैतन्या ६-शिवा ७-शान्ति ८-तमा ९-गौरी-१० मात्रा ११-ज्वाला १२-प्रज्वालिनी देवता अजपा जाप-छः सहस्त्र सोलह घड़ी, सत्तीस पल । अक्षर चार । पूजा मानसी है । इसे सोहम् भावनासे पूजे, तथा यों कहे कि, गन्ध इतर आदिसे मैं पूजता हूँ । ॐ पञ्चमं मनो चक्रं मनो देवता बुद्धिशक्तिः आत्मा ऋषिः नाभिमध्ये स्थितं पद्मनालं तस्य दशांगुलम् ॥ १ ॥ कोमलं तस्य तन्त्रालं निर्मलं चाप्यधोमुखम् । कदलीपुष्पसंकाशं तन्मध्ये चाप्यधिष्ठितम् ॥ पूर्व दलं श्वेतवर्णं यदा विश्रमते मनः ॥ तदा धर्मणिकीर्त्ता च पुरुषस्य मतिर्भवेत् । अग्रं दलं रक्तवर्णं यदा विश्रमते मनः । तदा निद्रालस्येच पुरुषस्य मतिर्भवेत् ॥ २ ॥ दक्षिणं दलं कृष्णवर्णं यदा विश्रमते मनः । तदा क्रोधमात्मनिमतिर्भवेत् ॥ ३ ॥ नैऋत्यां दले नीलवर्णं यदा विश्रमते मनः । तदामतिर्भवेत्तस्य धनदारादिपुत्रके ॥ ४ ॥ पश्चिमे दले कपिलवर्णं यदा विश्रमते मना । तदा वै तस्यपुरुषस्य नन्दोत्साहमतिर्भवेत् ॥ ५ ॥ वायव्यं दलं श्यामवर्णं यदा विश्रमते मनः ॥ तदा वै तस्य पुरुषस्य उच्चाटनमतिर्भवेत् ॥ ६ ॥ उत्तरे दले पीतवर्णं यदा विश्रमते मनः ॥ तदा वै तस्य पुरुषस्य कामहास्यमतिर्भवेत् ॥ ७ ॥ ईशाने दले गौरवर्णं यदा विश्रमते मनः ॥ तदा वै तस्य पुरुषस्य क्षमा ज्ञानं मतिर्भवेत् ॥ सन्धि सन्धिविदोषवात पितादयः अत्रगन्धादि समर्पयामि नमः ॥ ॐ पाँचवा मनोचक्र है, मन देवता, बुद्धि शक्ति, आत्मा ऋषि है, नाभिके मध्य रहता है । पद्मनाल दश अंगुल है । बहुत नरम तथा स्वच्छ है ।
योहन नवी
इसका मुँह नीचेका है साका अक्षर उसके पत्तेमें है। पुष्पके स्थान स्रोतका अक्षर है। इन दोनोंके बीच रहता है। पूर्वका पत्ता श्वेत वर्णका है, यदि इस पत्तेपर मन बैठे तो धर्म यश कीति बुद्धि होती है। आगेका पत्ता लाल रङ्ग है, यदि इस पत्तेपर मन बैठे तो नींद तथा आलस्यवाली निद्रा हो जाती है। दक्षिणका पत्ता काले रङ्गका है, यदि इस पत्तेपर मन स्थिर होवे तो क्रोध आता है। दक्षिण तथा पश्चिमके बीचवाले कोना अर्थात् नैऋत्य ओरका नीला पत्ता है। जब इन पत्तोंपर हृदय ठहरता है तब ऐसा अनुमान होता है कि, मेरा धन मेरी स्त्री मेरा पुत्र है। पश्चिम ओर कपिल वर्णका पत्ता है। जब इसपर हृदय स्थिर होता है तब हर्ष तथा आनन्द होता है। पश्चिम उत्तर अर्थात् वायव्य कोणका पत्ता श्याम रङ्गका है, जब इसपर हृदय बैठता है तब चित्तका उच्छाटन होता है। पीले रङ्गका पत्ता है जब इस पर बैठता है तब कामातुर होता है, हँसी ठढ़ा करता है। उत्तर और पूर्व अर्थात् ईशान कोणमें जो पत्ता है उसका रङ्ग गुलाबी होता है। इसपर स्थिर होनेसे क्षमा तथा दयाकी समझ होती है। ज्ञान होता है। तीन दोष है वे कफ पित्त वात हैं इन्हें संधि कहते हैं। यहां मैं गन्धादिकोंको समर्पित करता हूँ। यह इस चक्रकी पूजा हुई। ॐ चतुर्थ मणिपूरकं चक्रं नाभिस्थानं नीलवर्ण ओकारं सत्त्वगुणः विष्णुर्देवता लक्ष्मीशक्तिः गरुडवाहनः वायुः ऋषिः समान वायु लिंग देह सुषुम्णा अवस्था पश्यन्ती वाचा यजुर्वेदः दक्षिणाग्निः आगता भूमिका सारूप्यता मोक्ष दश दल १० दश मात्रा १० ङं ञं तं थं दं धं नं पं फं अंतर मात्रा १० बहिर मात्रा १० क्षमा १ मेधा २ माया ३ तीव्रा ४ मेधा ५ प्रस्फुरा ६ हंसगामिनी ७ तन्मया ८ लक्ष्मी ९ देवता अमृता १० घटिका षट् सहस्राणि ६००० पलं ३३ नासिका १६ पूजा मानसी पूजयेत् सोहं भावेन अत्रगंधादिसमर्पयामि नमः। ॐ चौथा मणिपूरक चक्र है यह नाभिके स्थानपर है नीलवर्ण है उसका सत्त्वगुण, विष्णु देवता है। लक्ष्मी शक्ति है। गरुड वाहन है। वायु ऋषि है। समान वायु है। लिङ्ग देह है। सुषुम्णा अवस्था है। पश्यन्ती वाणी है। यजुर्वेद है। दक्षिणा भूमि है, आगता भूमिका है। सारूप्यता मोक्ष है, दश यती है। दश मात्रा है। ङं, ञं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं, बं, अन्तरकी मात्रा है। बाहरली मात्रा १ क्षमा, २ मेधा, ३ माया, ४ तीव्रा, ५ मेधा, ६ प्रस्फुरा, ७ हंसगामिनी, ८ तन्मया, ९ लक्ष्मी, १० देवता अमृता यह छः सहस्र जप होता है। सोलह घड़ी ३३ पलमें होता है। नासिका सोलह, मानसीसे पूजा पूजे। सोहमभाव तथा इतर गंध इत्यादिसे मैं पूजता हूँ। ॐ तृतीयं कुंडलिनीस्थानं सिंदूरवर्ण सर्पकारं अधोमुखी अग्निर्देवता कुहरणी शक्तिः ब्रह्माऋषि कूर्म कला
मुहम्मद साहिब
उद्यान बन्धवरुण मंडल कामाक्षा देवीमलागनि गर्भावस्था कामानि वसि २ योगिनी मोक्षदायनी जठराग्नप्रवेशे नाभिस्थानं कुंडलिनी शक्तिः रक्तवर्ण अधोमुखी जगन्माता योगिनी गर्भपुटम् ॥ ॐ तीसरी कुण्डलिनी शक्तिका स्थान है । यह कुण्डलिनी शक्ति सँदूरके रङ्गकी है । यह सर्पके स्वरूपकी है । उसका मुँह नीचेको है, अग्नि उसका देवता है । कोहरनी शक्ति है । ब्रह्मा ऋषि है । कूर्म कला है । उद्यानबन्ध वरुण मण्डल और कामाक्षा देवी है । मल अग्नि है । गर्भकी अवस्था है । सम्भोग कामनामें रहनेवाली योगिनी मोक्षकी देनेवाली है । जठराग्निके भीतर है । नाभिमें इसका स्थान है । इसका नाम कुण्डलिनी देवी है । तँवेकी कला है । समस्त संसारकी माता योगिनी गर्भपर है । यह कुण्डलिनी देवी समस्त उत्पत्तिका कारण है । इसके मुँहसे जो सर्पके सद्गुण फूँकारका शब्द होता है । इस फोंकार ओँकारकासे शब्द बहिर्गत होता है और इस ओँकार शब्दसे हृदय हरा-भरा होता है । और हृदयके हरा-भरा होनेसे समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है । ऊपरका भाग सूर्य है यह कुण्डलिनी देवी एक डब्बेमें रहती है । नीचेके डब्बेके भागमें चाँदका स्थान और कुण्डलिनीकी फूँकारसे प्राण अपान वायु हिलती है । इस वायुके हिलनेसे समस्त संसार जीवित रहता है । और उस नाभिके स्थानमें दोनों वायु लड़ती हैं । इस लड़ाईसे जो अग्नि उत्पन्न होती है उसको जठराग्न कहते हैं । यह देवी बड़ी सुन्दर है ।
ॐ द्वितीयम् स्वाधिष्ठानचक्रं लिंगस्थानं पीतवर्ण रजोगुण आकारं ब्रह्मा देवता सावित्री शक्तिः तेजारुण ऋषि. ३ धारणाप्यदं देहजाग्रतावस्था परा वाचा ऋग्वेद आचार्यः लिंगगता भूमिका सायुज्यता हंसो वाहनः षण्मात्रा बं भं मंयं रं लं ६ अंतर मात्रा ६ वहिर्मात्रा ६ काम १ कामाक्षा २ तेजोसि ३ तक्षासा ४ चेष्टता ११ मैथुन देवता १० अजपाजाप षट् सहस्र ६००० घटिका १६ पल ३२ अक्षर २४ पूजा मानसिका सोहंभावेन पूजयेत् अत्र गंधादि समर्पयामि नमः ॥
ॐ दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र वह लिंग स्थानमें हैं । उसका रंग पीला है । रजोगुण स्वरूप है, ब्रह्मा देवता है, सावित्री शक्ति है, वरुण ऋषि है, सम्भोग कामनाकी अग्नि है, तेजारुण ऋषि है । समस्त धारणा शरीरकी रक्षक है, जाग्रता-वस्था है । परा वाचा है । ऋग्वेद है । कर्म कर्ता लिंग है । उसकी गता भूमिका सायुज्यता है । हंसवाहन है । अक्षर मात्रा है । बं भं मं यं रं लं ये भीतरली छः मात्राएं हैं । बाहरी छःमात्रा हैं वे काम, कामाक्षा, तेजोसि, तक्षासा, चेष्टिता, मथुन देवता ये हैं अजपा जाप षट् सहस्र है । सोलह घड़ी तथा तीसपलमें हैं ही । अक्षरचार हैं सोहम्भावसे मानसी पूजा है । सुगन्धियों इतर इत्यादिके साथ मैं पूजता हूँ उसके
लिये नमस्कार है। ॐ प्रथमाधारचक्रं गुदा स्थानं रक्तवर्णं देवता सिद्धिः बुद्धिः शक्ति कूर्म ऋषि मूषक वाहन अपान वायु कूर्म कला अंकोचन मुद्रा मूल बंध चतुरदल ४ चतुरमात्रा ४ वं शं षं सं अंतर मात्रा ४ वहिर्मात्रा ४ आनंद १ योगानन्द खीरानन्द ३ श्रीपरमानंद ४ अजपा जाप षट्शतानि ६०० घटिका ४ पल ३२ अक्षर ४ पूजा मानसिका सोहंभावेन पूजयेत् अत्र गंधादि समर्पयामि नमः ॥ ॐ प्रथम आधारचक्र है यह गुदाके स्थानमें है लाल रंग है। उसका देवता गणेश है। सिद्धिबुद्धि शक्ति है। कूर्म ऋषि है। मूल बंध है। चार पत्ते हैं। चार मात्रा हैं। बं शं षं सं भीतरी चार मात्रा। बाहरी चार मात्रा, आनन्द, योगानन्द, वीरानन्द और श्रीपरमानन्द हैं। अजपाजाप छः सौ है। यह चार खड़ी तथा बत्तीसपलमें होता है। अक्षर चार है। पूजा मानसी है सोहम् भाव करके पूजें यों कहे कि, इत्र गन्ध इत्यादिसे मैं पूजता हूँ ॥
महासमुद्र अर्थात् समस्त स्थानपर जलही जल परिपूर्ण हो रहा है और दूसरा कुछ नहीं। यह जलस्थान जलरञ्ज गोसाईंका है।
ब्रह्माण्ड ।
पूर्व कहा हुआ स्वरूपही समस्त ब्रह्माण्डका भी है। इसीको तीन लोक भव-सागर कहते हैं। इसीमें उत्पत्ति स्थिति तथा विनाशका समस्त कौतुक हो रहा है। इस कौतुकको बड़े कौतूकीने बनाया है। जिसके भेदको भवसागरके रहनेवाले नहीं जान सकते। जितने खिलाड़ी हैं उन सबमें यह खिलाड़ी बड़ाही बलिष्ठ है। किसी तांत्रिकका तंत्र अथवा कौतुकीका कौतुक इसके आगे जा नहीं सकता। इस कारण संसारमें जितने जादूगर हैं सब इसके चरे बन गये। जो जादूगर उसके सामने खड़ा होता है, उसीको वह दबालेता है। सबको अपने अधीन बना लेता है। ऐसेही तौरीतमें लिखा है कि, जब मूसा बहुतेरे कौतुक दिखलाने लगा, तब फिरऊन बादशाहने अनेक जादूगरोंको बुलवाया, उन जादूगरोंने अनेक सर्प उत्पन्नकर दिये। तब मूसाने अपना सोंटा चलाया वह सोंटा बहुत बड़ा अजगर बन गया। उसने जादूगरोंके समस्त सर्पोंको खालिया। समस्त जादूगर मूसाके सामने न ठहर सके, भाग गये। इस प्रकार समस्त कौतुकवाले इस विशाल कौतुकी की सेवावंदनामें रहते हैं। जिसको सत्यगुरु मिल जावे वह वास्तवमें उसके पञ्जेसे बच निकले। दूजी कोई युक्ति नहीं। इस ब्रह्माण्डका स्वरूप जो बनाया गया उसमें पहला चित्र इस प्रकार नहीं बनाया गया। कारण यह कि, उक्त स्थान-पर्यन्त कोई भी भाग्य शाली पहुँच नहीं सकता है। जितने सिद्ध साधु हैं वे तीन स्थान पर्यन्त पहुँचते हैं। अर्थात् सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, जो सायुज्य मृक्ति
१० अध्याय । विशेष बलि
है वहाँकी पहुँच दुर्लभ है । जितने लोग सांसारिक वासनाओंके आनन्दमें फँसे हैं वे सब इन्हीं चारों श्रेणियोंमें रहते हैं । पर ये चारो श्रेणी बिना सत्यपुरुषकी कृपाके शूलीस्तम्भके सदृश हैं, समस्त जीव इन्हीं चारोंपर लटक रहे हैं । जिनके मनमें वासना है । उनमें कोई न बचेगा । इस भवसागरमें बिलकुल अंधेर हो रहा है । किसीके हृदयपर प्रकाश नहीं, न बल है कि, इस अंधरेसे बाहर निकल सके । परन्तु हों इससे वह मनुष्य बहिर्गत हो सकेगा जिसके निजके दो गुण हों । एक स्वच्छ बुद्धि, दूसरे सोचनेकी शक्ति । जिस मनुष्यमें ये दोनों गुण न होंगे वह अंधकारसे कदापि बहिर्गत नहीं हो सकेगा । यह भवसागर अंधेरपुर नगर है और इसमें चारों ओर अज्ञानता तथा मूर्खताकी लहरें हैं । इसमें समस्त जीव डूबते उछलते रहते हैं, जिसका एक उदाहरण मैं देता हूँ ।
उदाहरण—एक नगर था इसका नाम अंधेरपुर था । इस अंधेरपुर नगरीके राजाका नाम अंधेरी था । इस राजाके राज्यमें महा अंधेर था इस अंधेरपुरमें समस्त पदार्थ टकासेर बिकते थे । साग पात, अन्न घृत, मीठा इत्यादि सभी वस्तुएँ टका सेर बिका करती थीं । दैवात् उस नगरमें दो साधुओंका आगमन हुवा । उनमें से एकका नाम विवेक तथा दूसरेका विचार था । विचारने विवेकसे कहा कि, आओ भाई ! कुछ दिवसों पर्यन्त हमलोग इसी नगरमें निवास करें । कारण यह कि, यहाँकी समस्त वस्तुएँ सस्ती हैं भली भाँति खाएँ पीएँ, चैनसे जीवन व्यतीत करें । दोनोंने ऐसा विचार कर वहाँ रहना आरम्भ किया । भलीभाँति खा पीकर बड़े मोटे हुए । एक रातको उस नगरके एक महाजनके घरमें चोर लगे । उन चोरोंमें से एक चोर दीवारके नीचे दबकर मर गया, तब वे रोते हुए राजा अंधेरीके पास गये, न्यायके प्रार्थी हुए । इस बातके सुनतेही राजाने महाजनको बुलाकर कहा कि, तेरी ही दिवारके नीचे चोर दबकर मर गया अब तू फाँसी पावेगा । यह बात सुनकर उस महाजनने निवेदन किया कि, महाराज मेरा दोष नहीं, दीवार बनाने वालोंका दोष है कारण यह कि, उन्होंने निर्बल दीवार बनाई । तब राजाने राजगीरोंको बुलाया इनको उपस्थित कर राजाने उनसे कहा कि, हे राजगीरो ! तुमने महाजनकी दीवार निर्बल बनाई उसके नीचे चोर दबकर मर गया, इस कारण तुम फाँसी पाओगे, तब राजगीरोंने निवेदन किया कि, महाराज ! हमारा कुछ दोष नहीं इसमें समस्त अपराध मजदूरोंका है कि, उन्होंने हमको नितान्तही निर्बल गारा दिया इस कारणही दीवार निर्बल हो गई । तब राजाने मजदूरोंको बुलाकर कहा कि, तुमने निर्बल गारा बनाया इस कारण महाजनकी दीवार निर्बल होगई ।
उसके नीचे चोर दबके मर गया, इस कारण तुम फाँसी पाओगे तब मजदूरोंने कहा महाराज ! हमारा कोई दोष नहीं, काजीकी बेटी अच्छे अच्छे वस्त्र आभूषण पहनकर अटारीपर चढ़ गई उसके देखनेको हमारा मन दौड़ गया गारेकी ओर ध्यान नहीं रहा, इस कारण हमारा कोई दोष नहीं, दोष काजीकी लड़कीका है। तब राजाने काजीकी लड़कीको बुलाकर कहा कि, तू भली भाँति वस्त्र तथा आभूषण पहनकर अटारीपर चढ़ी तेरे देखनेके निमित्त मजदूरोंका हृदय ललचाया उन्होंने कच्चा गारा बना दिया, महाजनकी कच्ची दीवार हो गई, उसके नीचे चोर दबकर मर गया, इस कारण अब तू फाँसी पावेगी। तब काजीकी बेटीने कहा कि, महाराज ? मेरा कुछ दोष नहीं कारण यह कि, एक बादशाह ससैन्य इस पथसे जाता था, उसके देखनेहीके निमित्त मैं अटारीपर चढ़ी थी सो इस बादशाहका दोष है। तब राजाने आज्ञादी कि, जाओ बादशाहको पकड़ो, उस पर बादशाह की फौज दौड़ी, इधर उधर दूँढा, न बादशाह और न उसकी सैन्यको पकड़ सके, वह बलिष्ठ बादशाह राजाके पकड़नेसे न पकड़ा गया वह डंका देता हुवा अंधेरे नगरसे बाहर निकल गया, राजाका कुछ वश नहीं चला तब राजाने देखा कि, मेरा न्याय तो पूरा नहीं हुवा इस कारण बड़े दुःखमें बैठ था। इतनेमें राजाका मंत्री वहां आन उपस्थित हुआ। पूछा कि, महाराज ! आपके दुःखका क्या कारण है ? तब राजाने कहा कि, मैं चाहता था कि, बादशाहको गिरफ्तार करूं पर वह मेरे वशमें नहीं आया, न मेरा न्यायही पूरा हुआ यह महादुःख मेरे हृदयको बेधे डालता है। यह बात सुनकर मंत्रीने उत्तर दिया कि, आप दुःखी न हों हमारे अंधेरे नगरमें दो सण्ड मुसण्ड साधू फिरते हैं उनको आप फाँसीपर चढ़ावें, कारण यह कि, बादशाह तथा साधुओंकी मयदि समान होती है इस प्रकार आपका न्याय पूरा हो जावेगा। यह बात सुनकर वह अंधेरी राजा प्रसन्न हुवा, विवेक तथा विचार नामक दोनों साधुओंको पकड़ लिया। आज्ञा दी कि, इन दोनों साधुओं को फाँसीपर लटका दो। तब उन दोनों साधुओंने यह युक्ति की कि, आपसमें लड़ने झगड़ने लगे। एक कहता कि, मैं फाँसी चढ़ूँ, दूसरा कहता कि, मैं पहले चढ़ूँ। दोनोंको झगड़ते देखकर राजाने पूछा कि, तुम दोनों क्यों झगड़ते हो। तब उन्होंने उत्तर दिया कि, महाराज ! इसका कारण यह है कि, हम लोग बड़े ज्योतिषी हैं, लग्न तथा मुहूर्तसे भली भाँति विज्ञ हैं, भविष्यकी बातोंको जान लेते हैं और हमें यह जान पड़ा है कि, इस समय चार लग्न ऐसे हैं कि, इन लगनोंमें जो फाँसी चढ़ेगा सो सर्वोच्च भंगीपर अधिकृत होगा। जो पहले फाँसी चढ़ेगा वह
विराट् पुरुषके पहिले अवतारवाला सत्यपुरुष पश्चिमके माहात्माओंका विराट् दर्शन
तीनों लोकका बादशाह होता है तीनों लोकमें उसका राज्य होगा । जो दूसरे लगनमें फ़ौसी चढ़ेगा, वह उसके मंत्री आदिक होंगे, जो तीसरे लगनमें चढ़ेगा सो उसके बराबरके बैठनेवाला तथा सलाही होगा । जो चौथे लगनमें फ़ौसी चढ़ेगा वह सैन्य सिपाही सरदार इत्यादि होगा । यह बात सुनकर राजाने दोनों साधुओं से कहा कि, तुम दोनों साधु पृथक् होवो, साधु तो अलग हो गए और उस अंधेरी राजाको सांसारिक कामनाओं ने इतना दबाया कि, वह पहले फ़ौसी चढ़ गया, दूसरे मंत्री तथा उच्चपदाधिकारीगण फ़ौसी लटके, तीसरे समस्त कारबारी फ़ौसी लटके, चौथे सैन्य दल प्रजा फ़ौसी पर छरपराई । उस समय विवेक तथा विचार दोनों साधु अपने प्राण लेकर उस अंधेर नगरीसे भाग निकले ।
इस प्रकार जिन मनुष्योंके मनमें सांसारिक वासना भरी है, भय आशा तथा दुःख, सुखमें बँधे हैं और बेद तथा पुस्तकोंके अनुसार समस्त आज्ञाओं और वर्जितकार्यों को प्रतिपालन किया करते हैं, वे सब स्वर्गों तथा चार प्रकारकी मुक्तिको कोरी कामनामें हैं, वे निश्चय कालचक्रमें आवेंगे । जब वे सुकार्य करते हैं तब स्वर्गोंमें जा पहुँचते हैं, बुरे कार्यसे चौरासी योनि तथा नरकोंमें अपना घर बनालेते हैं, इस अंधेरी राजाके अधीन रहते हैं । सत्यगुरु जो समस्त सृष्टियों का बादशाह है सो अपने हंसोंको लेकर इस अंधेरपुरसे पार चला जाता है, अंधेरी राजाका कुछ बश नहीं चलता । जो इस अंधेर नगरमें रहकर अंधे होरहे हैं सत्य तथा मिथ्याको जान नहीं सकते वे वासनाओंमें फँसकर मारे गए । वे सत्यगुरुको पहचान नहीं सके क्योंकि इनकी बुद्धि तथा इनका चित्त ठिकाने नहीं रहा ।
गजल ।
दिल किससे लगाऊं मेरा दिलदार कहाँ है ।
बेगानः हैं सारे यगानः पार कहाँ है ॥
अंधेर घेर सारे इस अंधेर पुरीमें ।
मैं ढूँढ़ता महबूब तरहदार कहाँ है ॥
जाँबकश रुह अफजा गुल्फार कहाँ है ॥
न गुल है नहीं बू है इस ब्राग खुश्क में ।
पुरखार चारसू है गुलजार कहाँ है ॥
मस्तान सब हैं झूठे न मस्त कोई है ।
दिलबरके इश्क बाहरा सरशार कहाँ है ॥
सब इश्कके व्यापार चले मुफ़लिस कल्लाश है ।
शरीर और विराटकी एकता
सर हाथ अपना लेके खरीदार कहाँ हैं ॥
हरचार सिम्त दूढ़ता दीवानः दिल मेरा ।
दिल किसके हाथ दीजे दिल अफगार कहाँ है ॥
सहमूरत और सूरत और सरहा पुजारी ।
अंधेरेमें न सूझ वह करतार कहाँ है ॥
जहाँ पहुँच नहीं अकल वहम क्योंकर जाए ।
उनका कवन रूप निराकार कहाँ है ॥
जब आनपड़ा सहमा सारी अकलको मारा ।
बेहोश सारे होगा हुशियार कहाँ है ॥
दाही हजार लख हैं कोई पेशवा है एक ।
सब जिसकी फौज उसका सरदार कहाँ है ॥
सब उलझ पड़े फासिक जञ्जीर जुल्फ में ।
रह जुल्फ मेरे महरू खमदार कहाँ है ॥
सरकार लाख जगमें हुए सदहा हुकमरों ।
सारे हैं फानी बड़ा सरकार कहाँ है ॥
आते हैं और जाते हैं सह पीर पैगम्बर ।
पीरानका जो पीर सो सालार कहाँ है ॥
गाते बजाते हैं सारे ढोल नकारे ।
अब आरजी हैं शब्दका झनकार कहाँ है ॥
तनमनसे हुए आजिज उसकी खाक कदमको ।
खुद हैं खालिक कबीर वारापार कहाँ है ॥
तात्पर्य—मेरा दिलदार इस दुनियाँके बाहिर है । मैं किससे दिल लगाऊँ ? इस अन्धेर नगरीमें अन्धेरही अन्धेरे है, मैं अपने तरफदारको दूढ़ता हूँ वो यहाँ कहाँ है ? सब पशुही बोल रहे हैं मेरे प्राणोंको बचानेवाली प्यारेकी भीठी आवाज यहाँ कहाँ है ? चारों ओर कांटे लगे हुए हैं, यहाँ गुलाब कहाँ है ? जो दुनियाकी मस्तीके मस्त हैं ? उनकी मस्ती झूठी है, यहाँ प्यारे सत्यपुरुषके इश्कसे हरा भरा कोई नहीं है, सब प्रेमके बाजारमें खाली हाथही आजा रहे हैं । शर हाथमें लेकर इश्कका सौदा खरीदने कोई नहीं आता । मैं मेरे दीवानेको चारों दिशाओंमें दूढ़ता हूँ, मैं अपने दिलको कितने दूँ इसके लेनेका पात्र कहाँ है इस अन्धेर नगरीमें सब एकसेही हैं, अज्ञानके अंधेरेमें नहीं दीखता कि, वो करतार कहाँ है ? जब बुद्धिकी पहुँच नहीं तो वहम कैसे पहुँचे उसका रूप क्या वो निराकार कहाँ है ? जब भ्रम
विराटकी उपासना
का भार आगया तो सब बुद्धि दबादी सब बेहोस हो गये हैं यहाँ हुशियारका तो नामही नहीं है । उसकी अर्दलीमें रहनेवाले तो लाख हैं परबो पेश बा एक है । सब जिसकी फौज हैं उस सरदारका पता नहीं है । उसके भूकुटिविलासमें सब फसे पड़े हैं, मेरे प्यारेके वे लचीले जूल्फ कहाँ हैं ? या वो मेरा प्यारा कहाँ है ? निर्द्वन्द्व हुकम करनेवाले अनेको बादशाह हो गये, पर सब मिट गये और मिट जायंगे क्यों कि, उनकी न मिटनेवाली सरकार कहाँ हैं ? सब पीर पैगम्बर आते जाते रहते हैं, जो पीरोंका भी पीर हो वा मालिक कहाँ है ? सब ढोल नगारे बजाते आते हैं, वो शब्द कहाँ है ? जिसकी झनकारसे ये बोल रहे हैं हम उसके चरणोंकी धूलपर तनमनसे कायम हो गये वो कबीर सब संसारका मालिक है, उसका पार किसने पाया है ?
ग्रन्थल ।
आ मेरी गली बुलबुल बीमार हमारे ।
दावत है भली बुलबुल बीमार हमारे ॥
माहे न खिज़ा दाएम जेहि वक्त बहारी ।
गुल है न कली बुलबुल बीमार हमारे ॥
खाली न मेरे कूचः में आ मेरी नज़रला ।
सर हाथ तले बुलबुल बीमार हमारे ॥
जितनी है हवस दिलमें रहे कोई न बाकी ।
इश्क आग जली बुलबुल बीमार हमारे ॥
खिलअत हो अतातर्कतुकर जामए नापाक ।
आफात टली बुलबुल बीमार हमारे ॥
इनसान हो पी प्याला न हो मिस्ल सतूर्राँ ।
मत खाए खुली बुलबुल बीमार हमारे ॥
क्यों सोता पड़ा नालःका वक्त जो आया ।
अब रात ढली बुलबुल बीमार हमारे ॥
अब जाग खबरले तुने जो बोया है आजिज ।
खेतै है फली बुलबुल बीमार हमारे ॥
ए मेरे प्रेमके बीमार बुलबुल ! मेरी गली आ, क्यों कि, वहाँ तेरो खातिरका सामान अच्छा है । तू जानती है कि, फसले बहार सदा नहीं रहा सकती । बहारका समय गया । न तो बागमें फूल है तथा न कलीही है जिसका खिलकर फूल बन जाय । मेरी गली खाली हाथ न आना, कुछ भेंट लेकर आना, अपना शिर हाथपर
सत्य पुरुषका प्रतिपादक पुरुषसूक्त
रखकर आना । ए ! इशककी दिलमें आग लगी हुई है दिलमें जितनी हवस हो उसे पूरा करले । जा तूने दुनियाँकी हवससे नापाक जाम भर रक्खा है उसको छोड़ने कीही भेंट भाट हो ए मेरे बीमार बुलबुल ! उसके छोड़ेसे सब आफत टल जायंगी । प्याला पीकर मनुष्यवर सिंडीके समान न हो, न दुनियाँकी ही हविश कर । जब नाले लगानेका वख्त आया तब सोता पड़ा है । ए ! अब रात बीत चुकी है, जग खबर ले जो तने बीज बोया है, उसीकी खेती फलती है इसमें पूर्ण प्रकरण तथा बुलबुलसे जीवात्माका संबोधन किया है ।
हेला (नदा) के अङ्गकी साखिया ।
कबीर देश दे हम वगरिया, ग्राम ग्राम सब खौरा ।
ऐसा जिवडा न मिला, ए जो फरक विछोर ॥ १ ॥
कबीर समझाए समझे नहीं, पर हाथ आप बिकाय ।
समझाए समझे नहीं, बाँधे यमपुर जाय ॥ २ ॥
कबीर जाए नाता आदिको, विसर गयो वह ठौर ।
चौरासीके विसपर, अखत औरकी और ॥ ३ ॥
कबीर वस्तु है गाहक नहीं, वस्तु सोगरव मोल ।
बिना दामको मानवा, फिरे सो डावों डोल ॥ ४ ॥
कबीर —यह जग तो झेडे गया, भया जोग नहिं भोग ।
तिल तिल झार कबीर लए, तलठी झारें लोग ॥ ५ ॥
सुरनर मुनि और देवता, सात द्वीप नौ खण्ड ।
कहै कबीर सब भोगिया, देह धरेको दण्ड ॥ ६ ॥
कबीर-लघुताई सबते भली, लघुताते सब होय ।
जस दुतियाको चन्द्रमा, शीष नवें सब कोय ॥ ७ ॥
कबीर—जो कोई मिला सो गुरुमिला, चेला मिला न कोय ।
छः लाख छानवे रमैनी, एक जीवपर होय ॥ ८ ॥
कबीर—श्रोता तो घरही नहीं, वक्त बदे सो बाद ।
श्रोत्रा वक्ता एक घर, तब कथनीको स्वाद ॥ ९ ॥
कबीर—सुन कागज छुवों नहीं, कलम गहों नहिं हाथ ।
चारों युगको महात्म, मुखहि जनाई बात ॥ १० ॥
कबीर—दुःख न था संसारमें, था नहिं शोग वियोग ।
सुखहीमें दुःखला दिया, बोली बोलें लोग ॥ ११ ॥
हम देश देश और गाम २ में फिर । सब जगहोंमें गये पर ऐसा कोई जीव
नहीं मिला जिसके दिलमें कोई फरकही न हो ॥१॥ हमने समझाया पर न समझे, दूसरेके हाथोंमें बिक गये, हमने बारंबार कहा कि, मानजा नहीं तो चौरासीमें भटकता फिरेगा, यम पकड़ कर लेजायगा पर अंतमें ऐसाही हुआ ॥ २ ॥ जब गर्भमें था तब भगवान्से पुकारता था कि, मैं तेराही हूँ पर जब वो ठौर छूट गया गर्भके बाहिर आया कि, हठवायुके लगतेही सब भूल गया । चौरासी लाख योनिके चक्करमें पड़ गया औरका औरही होगया ॥ ३ ॥ वस्तु हैं पर उसके खरीददार नहीं क्योंकि, उसकी कीमतें सबकुछ देना पड़ता है । जिसके पास देनेको दाम नहीं अथवा न देसके वो ढाँवा डोल फिरता है ॥ ४ ॥ यह संसार तो झाड़वामें ही रह गया न भोग कर सका एवम् न योग करसका । इसके जन्म लेनेका सार तो कबीर ने लेलिया है लोग तो छूछके पीछे लगे हुए हैं ॥ ५ ॥ सात द्वीप और इसके नौ खण्डोंमें के सुर नर मुनि और देवता सब भोगीही हैं क्योंकि, जिसप्रारब्धसे जो देह बनेगा उसका फल भोगना ही पड़ेगा ॥ ६ ॥ सबसे छोटा बनके रहना सबसे अच्छा है, उसीसे सब कुछ हो सकता है, जैसे कि, द्वितीयाके बालचांदको सबही प्रणाम करते हैं ॥७॥ जितने मिले सब गुरु मिले कोई भी चेला नहीं मिला, इस कारण छः लाख छानवे रमैनी एकही जीवपर गुजर रहीं हैं ॥८॥ जबतक श्रोता न समझे उस समयतक कथा कहना समयको व्यर्थ खोना है । जब श्रोता बक्ता दोनोंका एक विचार मिलजाय तबही कहनेका आनन्द है ॥ ९ ॥ सुन, न मैं कागज छूता हूँ न कलम पकड़ता हूँ । चारों युगोंकी बातें मुहसे कहनेकी बात है ॥१०॥ यदि शोच और वियोगका दुख न होता तो कोई शोच नहीं था, पर जब सुखमें इनसे दुख मिलता है, दुनियाँके लोग बोली बोलते हैं तो फिर इससे जयावा कोई दुख नहीं होता ॥ ११ ॥
शब्द — अन्तर मैल जो तीरथ न्हावे, उसे वैकुण्ठ न जाना ।
लोक पतीजै कछु नहिं होवै, नाहीं राम अयाना ॥
पूजा राम एक है देवा, सांचा नाम न गुरुकी सेवा ।
जलके न्हाए जो गति होवे, नित नित मेंडक न्हावे ॥
जैसे मेंडक तैसे वह नर, फिर फिर जूनी आवे ।
मन कठोर दोनीसे बना रस, नरक न पांचा जावे ॥
हर गानेसे जोबरे, हड़मिए सगरी सैन तराए ।
दिन नहिं रैन वेद नहि शासतर, तहाँ बसे निरंकारा ॥
कहैं कबीर नर ताको ध्यावो, बाहिरिया संसारा ॥
जिसके दिलमें बुरी वासनोंका मेल भरा हुआ है वो चाहे हजार तीरथ करे
बो वेंकुण्ठ नहीं जा सकता । चाहें लोग उसपर विश्वास करें कि, यह महात्मा हो गया इससे क्या है ? वो राम क्या अनजान है जिससे वो छिपजाय । एक रामकी पूजा तथा रामनाम एवं रामके लिये नमन करना ही सच्चा है । सिवा इसके कोई दूसरा देव नहीं है । इससे कल्याण हैं । यदि केवल स्नानसे ही कल्याण होजाय तो मँढक तो रातदिन पानीमें पड़ा रहता है क्यों न मुक्त हो जाय तो फिर २ मँढकही बना करता है । इसी तरह वो मनुष्य भी फिर २ कर योनियोंमें फिरता रहता है । मन तो कठोर पाप करनेमें लगा है फिर नरक क्या पांचमां (या ढाँटा) जायगा । भगवानके गुणानुवाद गानेसे तो वित्त अकुलाता है पर इसकके गन्धे गानाके सुनने में सारी रात बिता देता है । जहाँ सत्यपुरुष विराजते हैं वहाँ रात और दिन दोनों ही नहीं हैं, यानी वहाँ कालकी गति नहीं है, न वहाँ विधि-निषेधके शास्त्र ही हैं । कबीर साहिब कहते हैं कि, मैं तो उसीका ध्यान करता हूँ । यह संसार तो बाहिरिया बेकाम हैं मुझे इससे क्या लेना है ?
मैं किसको कहूँ, कोई न सुनता न मानता, सबकी बुद्धिपर परदा पड़ गया है । एक न भूला दो न भूला सारा संसार भूला पड़ा है, सब अचेत होगये, किसीकी बुद्धि ठिकाने नहीं रही । सब अंधेरीराजाके वशमें आगए इस राजाके मंत्रियोंकी जो दुष्ट बुद्धि है वह सर्व बुद्धिकोंका उपदेश दिया करती है । दोनों साधु जो विचार तथा विवेक हैं उनको मटियामेट किया चाहती है, वे दोनों अपनी बुद्धि-मानोसे बच निकले । कोई मनुष्य हो उसके हृदयके किसी कोनेमें छिपकर दोनों रह गये हों तो वह सोचे तथा समझे कि, जहाँ टका सेर घास मिठाई बिकती हो वहाँ कुशल नहीं है, यहाँके मनुष्य अंधे हैं इनमें तनिक भी सोच विचार नहीं । वे गुरु साधु तथा परमेश्वरको क्या पहचानें ? उनके निमित्त वासनाओंकी फाँसी खड़ी है सब उसके ऊपर लटककर मरते हैं, मर गए और निश्चय मरेंगे ।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह सब फँसनेवालोंके लिये फाँस बनाये गये हैं । सब दौड़ दौड़ कर आपसे आप इस जालमें फँसते हैं । जिसने तन मन धनसे प्रेम किया, मिटनेवाली वस्तुसे मंत्री जोड़ी वह मरेगा । जिस किसीको परमेश्वरने मंत्री प्रदान की वही समझे कि, उत्पत्तिके आरम्भमें केवल एक अण्डा वासनासे भरा हुआ उत्पन्न हुआ था । इसी कारण वह फूटा, आनन्द लेनेके निमित्त उसने सूक्ष्म शरीर धारण किया । यह शरीर कामक्रोधादिकके बंधनमें जबतक पड़ा है और जबलों सांसारिक आनन्दोंका ध्यान है, शरीरकी रक्षा चाहता है तबलों बंधनमें पड़ा रहेगा । मुसलमानी पुस्तकोंमें लिखा है कि, आदम जब अवनकी
वाटिकामें था तब आयुषके वृक्षके फलको खाता था । जब उसने गेहूँका दाना खाया तब उसको शौचकी आवश्यकता हुई । तब परमेश्वरने उसको वैकुण्ठसे बाहर निकालकर कहा कि, यह वैकुण्ठ शौच तथा लघुशंकादिककी जगह नहीं है । अब तू पृथ्वीपर जा ; इस प्रकार यह पृथ्वी मुक्तिकी कामना रखनेवालोंके निमित्त नहीं है ॥
पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड ।
ब्रह्माण्ड और पिण्डका एकही स्वरूप है तनिक भी विभिन्नता नहीं हैं । दोनों की एकसी अवस्था है तनिक भी घट बढ़ नहीं । पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंमें जल है इस जलके बीच विचित्र कौतुक बना है । यह ब्रह्माण्ड भवसागर कहलाता है । इसमें ऐसे कौतुक हैं जो मनुष्योंके अनुमानमें भी आ नहीं सकते । उत्पन्नके पूर्व जल था, इस जलमें एक बुल्ला उठा । अण्डेके स्वरूपमें वह जलपर उतराता फिरता था । सो जलही जल था । वह बुलबुलाभी जल था । जो कुछ जल तथा बुलबुलेमें था सो भी सब जलही था । जल और बुलबुले सब स्थानोंमें परमेश्वरकी आत्मा थी । वह बुलाबुला अर्थात् अण्डा फूट गया । यह ब्रह्माण्ड एक बड़ी नदी है । पिण्ड बूंद हैं, जो कुछ नदीमें है उसीके सामान बूँदमें हैं । नदी बूँद है, तथा बूँद नदी है । लोक तथा वेद इस नदीके दो किनारे हैं । भौति भौतिकी इच्छाएँ हैं, यहाँ श्वासमें जल भरा हुवा है । जब दोनों एक ठहरे तब उचित है कि, प्रथम अपने पिण्डकी अस्थिके जाननेका उद्योग करें । जब पिण्डकी सुध होजायगी तब समस्त ब्रह्माण्ड का समाचार जानलिया । जायगा । जिसने अपने पिण्डका वृत्तान्त नहीं जाना वह ब्रह्माण्डका तनिक भी वृत्तान्त नहीं जान सकता । जो अपनेको न जाने वह परमेश्वर को क्या जान सकता है ? दोनों का समाचार पारख गुरुके अतिरिक्त और कोई दूसरा बतला नहीं सकता । पाँव पाताल सो सातवीं पृथ्वी है । पाँवकी पीठ सो छठी पृथ्वी है । पाँवकी उँगलियाँ सोई असुर हैं । पैरके नाखून सो असुरोंकी सवारी हैं । अष्टालिङ्ग सो पाँचवाँ महातल है । एड़ी चौथा तलातल है । ठिगुनी सो तीसरा सुतल है । जाँघ, सोई तल है । जो पग हैं सोई पहला अतल है, यही भूमि है । लिङ्ग प्रजापति है । स्त्री तथा पुरुष जब दोनोंका वीर्य स्थलित होता है, तब पृथ्वी और आकाश मिलते हैं, तभी वीर्यवृष्टि होती है । चूतङ्गका सिरा सोई प्रभातकी उज्ज्वलताका आरम्भ है । जो पहले दिखाई देता है श्वेतरेङ्ग है । जो मोटी मांस है सो माया है । वह दयालु हैं । जो नाभिकी गम्भीरता है वो समुद्रका घेर है । उधर तो झड़ा अग्नि है । इधर बडवा अग्नि है । समस्त नसें नदियाँ हैं और जो पेट है बही